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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
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		<title>भरत (दुष्यंत पुत्र)</title>
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		<updated>2010-03-21T04:21:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==भरत / Bharat==&lt;br /&gt;
पुरुवंश के राजा [[दुष्यंत]] और [[शकुन्तला]] के पुत्र भरत की गणना '[[महाभारत]]' में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। मान्यता है कि इसी के नाम पर इस देश का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा। इसका एक नाम 'सर्वदमन' भी था क्योंकि इसने बचपन में ही बड़े-बड़े राक्षसों, दानवों और सिंहों का दमन किया था। और अन्य समस्त वन्य तथा पर्वतीय पशुओं को भी सहज ही परास्त कर अपने अधीन कर लेते थे। अपने जीवन काल में उन्होंने [[यमुना]], [[सरस्वती]] तथा [[गंगा]] के तटों पर क्रमश: सौ, तीन सौ तथा चार सौ [[अश्वमेध यज्ञ]] किये थे। प्रवृत्ति से दानशील तथा वीर थे। राज्यपद मिलने पर भरत ने अपने राज्य का विस्तार किया। प्रतिष्ठान के स्थान पर [[हस्तिनापुर]] को राजधानी बनाया। भरत का विवाह विदर्भराज की तीन कन्याओं से हुआ था। जिनसे उन्हें नौ पुत्रों की प्राप्ति हुई। भरत ने कहा-'ये पुत्र मेरे अनुरूप नहीं है।' अत: भरत के शाप से डरकर उन तीनों ने अपने-अपने पुत्र का हनन कर दिया।&lt;br /&gt;
*महाभारत के अनुसार भरत ने बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया तथा महर्षि [[भारद्वाज]] की कृपा से भूमन्यु नामक पुत्र प्राप्त किया। &lt;br /&gt;
*[[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत]] के अनुसार तदनंतर वंश के बिखर जाने पर भरत ने 'मरुत्स्तोम' यज्ञ किया। मरुद्गणों ने भरत को भारद्वाज नामह पुत्र दिया। भारद्वाज जन्म से ब्राह्मण था किन्तु भरत का पुत्र बन जाने के कारण क्षत्रिय कहलाया। भारद्वाज ने स्वयं शासन नहीं किया। भरत के देहावसान के बाद उसने अपने पुत्र वितथ को राज्य का भार सौंप दिया और स्वयं वन में चला  गया। इस वंश के सब राजा 'भरतवंशी' कहलाए।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;महाभारत आदिपर्व, 94। 20 से 25 तक, द्रोणपर्व, 68।-, शांतिपर्व, 29 । 45-50&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;    &lt;br /&gt;
==श्रीमद् भागवत से==&lt;br /&gt;
भरत का विवाह विदर्भराज की तीन कन्याओं से हुआ था। तीनों के पुत्र हुए। भरत ने कहा कि एक पुत्र भी उनके अनुरूप नहीं है। भरत के शाप से डरकर उन तीनों ने अपने-अपने पुत्र का हनन कर दिया। तदनंतर वंश के बिखर जाने पर भरत ने 'मरूत्स्तोम' यज्ञ किया। मरूद्गणों ने भरत को [[भारद्वाज]] नामक पुत्र दिया। भारद्वाज के जन्म की विचित्र कथा है। [[बृहस्पति]] ने अपने भाई उतथ्य की गर्भवती पत्नी ममता का बलपूर्वक गर्भाधान किया। उसके गर्भ में 'दीर्घतमा' नामक संतान पहले से ही विद्यमान थी। बृहस्पति ने उससे कहा- 'इसका पालन-पोषण (भर) कर। यह मेरा औरस और भाई का क्षेत्रज पुत्र होने के कारण दोनों का (द्वाज) पुत्र है।' किंतु ममता तथा बृहस्पति में से कोई भी उसका पालन-पोषण करने को तैयार नहीं था। अत: वे उस 'भारद्वाज' को वहीं छोड़कर चले गये। मरूद्गणों ने उसे ग्रहण किया तथा राजा भरत को दे दिया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;श्रीमद् भागवत, 9।20।23-39&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BF&amp;diff=8292</id>
		<title>बलि</title>
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		<updated>2010-03-21T04:10:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==बलि / Bali==&lt;br /&gt;
*एक बार राजा बलि ने देवताओं पर चढ़ाई करके इन्द्रलोक पर अधिकार कर लिया। &lt;br /&gt;
*उसके दान के चर्चे सर्वत्र होने लगे। &lt;br /&gt;
*तब [[विष्णु]] वामन अंगुल का वेश धारण करके राजा बलि से दान मांगने जा पहुंचे। &lt;br /&gt;
*दैत्यों के गुरु [[शुक्राचार्य]] ने बलि को सचेत किया कि तेरे द्वार पर दान मांगने स्वयं विष्णु भगवान पधारे है। उन्हे दान मत दे बैठना, परन्तु राजा बलि उनकी बात नहीं माना। &lt;br /&gt;
*उसने इसे अपना सौभाग्य समझा कि भगवान उसके द्वार पर भिक्षा मांगने आए हैं। &lt;br /&gt;
*तब विष्णु ने बलि से तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने संकल्प करके भूमि दान कर दी। &lt;br /&gt;
*विष्णु ने अपना विराट रूप धारण करके दो पगों में तीनों लोक नाप लिया और तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखकर उसे पाताल भेज दिया। &lt;br /&gt;
==कथा महाभारत से==&lt;br /&gt;
[[इंद्र]] ने [[ब्रह्मा]] से पूछा कि बलि का निवासस्थान कहां है। ब्रह्मा ने उसके प्रश्न का अनौचित्य बताते हुए उससे कहा कि किसी शून्य घर में अश्व, गो, गर्दभ आदि में जो श्रेष्ठ जीव हो, वही बलि होगा। इंद्र ने पुन: पूछा कि एकांत में मिलने पर इंद्र उसका हनन करे अथवा नहीं। ब्रह्मा ने कहा- 'नहीं'। इंद्र ने एक शून्य घर में गर्दभ योनि में बलि को देखा। इंद्र ने तरह-तरह से, व्यंग्यपूर्वक उससे पूछा कि इतने वैभव, शक्ति, छत्र, चंवर तथा ब्रह्मा की दी हुई माला के अधिपति रहने के उपरांत इस निरीह योनि में उन सब तत्त्वों से विहीन होकर उसे कैसा लग रहा है? न वहां स्वर्णदंड था, न दिव्यमाला, न चंवर इत्यादि। बलि ने हंसकर कहा कि 'उसका प्रश्न अनुचित है तथा उसकी समस्त वैभव-संपन्न वस्तुएं एक गुफा में रखी हुई हैं। अच्छे दिन आने पर वह पुन: उन्हें ग्रहण कर लेगा।' इंद्र का उसके बुरे दिनों में उसका परिहास करना उचित नहीं है। अस्थिर कालचक्र के परिणामस्वरूप कभी भी कुछ भी हो सकता है। तदनंतर इंद्र के देखते-देखते बलि के शरीर से एक सुंदरी निकली। इंद्र ने उसका परिचय पूछा तो जाना कि वह मूर्तिमती [[लक्ष्मी]] थी। वह सत्य, दान, व्रत, तपस्या, पराक्रम तथा धर्म में निवास करती थी। उस योनि को प्राप्त कर बलि इनमें से किसी का भी निर्वाह करने में समर्थ नहीं था। अत: उसके शरीर से वह निकल आयी थी। इंद्र ने कहा कि वह शारीरिक बल तथा मानसिक शक्ति के अनुसार उसे ग्रहण करेगा। साथ ही उसने ऐसा उपाय भी पूछा कि जिससे लक्ष्मी कभी उसका परित्याग न करें यों कोई भी व्यक्ति (देवता या मनुष्य) अकेला, लक्ष्मी को धारण करने में समर्थ नहीं था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लक्ष्मी के कथनानुसार इंद्र ने लक्ष्मी के चारों पैरों को क्रमश:- &lt;br /&gt;
#[[पृथ्वी]], &lt;br /&gt;
#जल, &lt;br /&gt;
#[[अग्नि]] तथा &lt;br /&gt;
#सत्पुरूषों में प्रतिष्ठित कर दिया। इंद्र ने कहा कि जो कोई भी लक्ष्मी को कष्ट देगा, इंद्र के क्रोध तथा दंड का भागी होगा। तदनंतर परित्यक्त बलि ने कहा कि [[सूर्य]] जब अस्ताचल की ओर नहीं बढ़ेगा तथा मध्याह्न काल में स्थिर हो जायेगा तब वह (बलि) देवताओं को पराजित करेगा। इंद्र ने बताया कि ब्रह्मा की व्यवस्था के अधीन सूर्य दक्षिणायण तथा उत्तरायण तो होगा पर मध्याह्न में नहीं रूकेगा। इंद्र ने कहा- 'बलि, तुम्हें जिधर इच्छा हो, चले जाओ। मैंने तुम्हारा वध मात्र इसलिए नहीं किया कि मैं ब्रह्मा से प्रतिज्ञा करके आया था।' तदुपरांत बलि ने दक्षिण की ओर तथा इंद्र ने उत्तर की ओर प्रस्थान किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] के 228 अध्याय में कहा गया है कि लक्ष्मी अपनी आठ सखियों- &lt;br /&gt;
#आशा, &lt;br /&gt;
#श्रद्धा, &lt;br /&gt;
#शांति, &lt;br /&gt;
#धृति, &lt;br /&gt;
#विजिति, &lt;br /&gt;
#संतति, &lt;br /&gt;
#क्षमा और &lt;br /&gt;
#जया- के साथ [[विष्णु]] के विमान पर बैठकर [[इंद्र]] के पास पहुंची क्योंकि दैत्यों में अनाचार आरंभ हो गया था। उस समय [[नारद]] भी इंद्र के पास थे।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;महाभारत, शांतिपर्व, 223-228&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
==कथा ब्रह्म पुराण से==&lt;br /&gt;
बलि नामक दैत्य गुरू भक्त प्रतापी और वीर राजा था। देवता उसे नष्ट करने में असमर्थ थे। वह विष्णु भक्त था। देवता भी विष्णु की शरण में गये। विष्णु ने कहा कि वह भी उनका भक्त है, फिर भी वे कोई युक्ति सोचेंगे। बलि ने [[अश्वमेध यज्ञ]] की योजना की। वहां [[अदिति]] पुत्र [[वामन अवतार|वामन]] (विष्णु) ब्राह्मण-वेश में पहुंचे। [[शुक्राचार्य|शुक्र]] ने उन्हें देखते ही बलि से कहा कि वे [[विष्णु]] हैं, बलि शुक्र से पूछे बिना कोई वस्तु उन्हें दान न करे, किंतु वामन के मांगने पर बलि ने उन्हें तीन पग भूमि देने का वादा कर लिया। वामन ने दो पग में समस्त भूमंण्डल नाप लिया- 'तीसरा पग कहां रखूं?' पूछने पर बलि ने मुस्कराकर कहा- 'इसमें तो कमी आपके ही संसार बनाने की हुई- मैं क्या करूं? मेरी पीठ प्रस्तुत है।' इस प्रकार विष्णु ने उसकी कमर पर तीसरा पग रखा। उसकी भक्ति ने उसकी कमर पर तीसरा पग रखां उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे रसातल के राजा होने का वर दिया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ब्रह्म पुराण, अध्याय 3, 1-56&lt;br /&gt;
&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=9208</id>
		<title>सूर्य देवता</title>
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		<updated>2010-03-14T17:29:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==सूर्य / Surya==&lt;br /&gt;
*वैदिक और पौराणिक आख्यानों के अनुसार भगवान श्री सूर्य समस्त जीव-जगत के आत्मस्वरूप हैं। ये ही अखिल सृष्टि के आदि कारण हैं। इन्हीं से सब की उत्पत्ति हुई है। &lt;br /&gt;
*पौराणिक सन्दर्भ में सूर्यदेव की उत्पत्ति के अनेक प्रसंग प्राप्त होते हैं। यद्यपि उनमें वर्णित घटनाक्रमों में अन्तर है, किन्तु कई प्रसंग परस्पर मिलते-जुलते हैं। सर्वाधिक प्रचलित मान्यता के अनुसार भगवान सूर्य महर्षि [[कश्यप]] के पुत्र हैं। वे महर्षि कश्यप की पत्नी [[अदिति]] के गर्भ से उत्पन्न हुए। अदिति के पुत्र होने के कारण ही उनका एक नाम [[आदित्य]] हुआ। पैतृक नाम के आधार पर वे काश्यप प्रसिद्ध हुए। संक्षेप में यह कथा इस प्रकार है- एक बार दैत्य-दानवों ने मिलकर [[देवता|देवताओं]] को पराजित कर दिया। देवता घोर संकट में पड़कर इधर-उधर भटकने लगे। देव-माता अदिति इस हार से दु:खी होकर भगवान सूर्य की उपासना करने लगीं। भगवान सूर्य प्रसन्न होकर अदिति के समक्ष प्रकट हुए। उन्होंने अदिति से कहा- देवि! तुम चिन्ता का त्याग कर दो। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा तथा अपने हजारवें अंश से तुम्हारे उदर से प्रकट होकर तेरे पुत्रों की रक्षा करूँगा।' इतना कहकर भगवान सूर्य अन्तर्धान हो गये। &lt;br /&gt;
*कुछ समय के उपरान्त देवी अदिति गर्भवती हुईं। संतान के प्रति मोह और मंगल-कामना से अदिति अनेक प्रकार के व्रत-उपवास करने लगीं। महर्षि कश्यप ने कहा- 'अदिति! तुम गर्भवती हो, तुम्हें अपने शरीर को सुखी और पुष्ट रखना चाहिये, परन्तु यह तुम्हारा कैसा विवेक है कि तुम व्रत-उपवास के द्वारा अपने गर्भाण्ड को ही नष्ट करने पर तुली हो। अदिति ने कहा- 'स्वामी! आप चिन्ता न करें। मेरा गर्भ साक्षात सूर्य शक्ति का प्रसाद है। यह सदा अविनाशी है।' समय आने पर अदिति के गर्भ से भगवान सूर्य का प्राकट्य हुआ और बाद में वे देवताओं के नायक बने। उन्होंने देवशत्रु असुरों का संहार किया। &lt;br /&gt;
*भगवान सूर्य के परिवार की विस्तृत कथा [[भविष्य पुराण]], [[मत्स्य पुराण]], [[पद्म पुराण]], [[ब्रह्म पुराण]], [[मार्कण्डेय पुराण]] तथा साम्बपुराण में वर्णित है। &lt;br /&gt;
*[[ब्रह्मा]], [[विष्णु]], [[महेश]] आदि देवगणों का बिना साधना एवं भगवत्कृपा के प्रत्यक्ष दर्शन होना सम्भव नहीं है। शास्त्र के आज्ञानुसार केवल भावना के द्वारा ही ध्यान और समाधि में उनका अनुभव हो पाता है, किन्तु भगवान सूर्य नित्य सबको प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। इसलिये प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की नित्य उपासना करनी चाहिये। &lt;br /&gt;
*वैदिक सूक्तों, पुराणों तथा आगमादि ग्रन्थों में भगवान सूर्य की नित्य आराधना का निर्देश है। मन्त्र महोदधि तथा विद्यार्णव में भगवान सूर्य के दो प्रकार के मन्त्र मिलते हैं। प्रथम मन्त्र- '''ॐ घृणि सूर्य आदित्य ॐ''' तथा द्वितीय मन्त्र- '''ॐ ह्रीं घृणि सूर्य आदित्य: श्रीं ह्रीं मह्यं लक्ष्मीं प्रयच्छ''' है। &lt;br /&gt;
*भगवान सूर्य के अर्घ्यदान की विशेष महत्ता है। प्रतिदिन प्रात:काल रक्तचन्दनादि से मण्डल बनाकर तथा ताम्रपात्र में जल, लाल चन्दन, चावल, रक्तपुष्प और कुशादि रखकर सूर्यमन्त्र का जप करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिये। सूर्यार्घ्य का मन्त्र '''ॐ एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर''' है। अर्घ्यदान से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य आयु, आरोग्य, धन-धान्य, यश, विद्या, सौभाग्य, मुक्ति- सब कुछ प्रदान करते हैं।&lt;br /&gt;
*भगवान विराट के नेत्र से जिनकी अभिव्यक्ति है, जो लोक लोचन के अधिदेवता हैं, जो उपासना करने पर समस्त रोगों, नेत्र दोषों, ग्रह पीड़ाओं को दूर करके उपासक की सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करते हैं, अनादि काल से भारतीय कर्मनिष्ठ द्विजादि जिन्हें प्रतिदिन अपनी अर्ध्यांजलि निवेदित करते हैं, जो समस्त सचराचर जगत के जीवनदाता और सम्पूर्ण प्राणियों के आराध्य हैं, उन ज्योतिघन, जीवन, उष्णता और ज्ञान के स्वरूप भगवान सूर्यनारायण को हमारा शतश: प्रणिपात।&lt;br /&gt;
*दृश्य सूर्यमण्डल उनका एक स्थूल निवास है। विश्व में कोटि-कोटि सूर्य मण्डल हैं। विज्ञान आकाशगंगा के प्रत्येक तारक को सूर्य कहता है। हमारे गगन की आकाशगंगा के पीछे कितने ही नीहारिका मण्डल हैं। सब आकाशगंगा हैं। सब सूर्यों से जगमगाती हैं। कोई नहीं जानता, उनकी संख्या कितनी है। उन सब सूर्यों के अधिष्ठाता भगवान नारायण ही हैं। श्री सूर्यनारायण की आराधना इसी रूप में आराधक करते हैं। &lt;br /&gt;
*महर्षि [[कश्यप]] लोक पिता हैं। उनकी पत्नी देवमाता [[अदिति]] के गर्भ से भगवान विराट के नेत्रों से व्यक्त सूर्यदेव जगत में प्रकट हुए। सूर्य मण्डल का दृश्य रूप भौतिक जगत में उनकी देह है। [[विश्वकर्मा]] की पुत्री [[संज्ञा]] से उनका परिणय हुआ। संज्ञा के दो पुत्र और एक कन्या हुई- श्राद्धदेव [[वैवस्वत|वैवस्वतमनु]] और [[यमराज]] तथा [[यमुना]] जी। संज्ञा भगवान सूर्य के तेज को सहन नहीं कर पाती थी। उसने अपनी छाया उनके पास छोड़ दी और स्वयं घोड़ी का रूप धारण करके तप करने लगी। उस छाया से शनैश्चर, सावर्णि मनु और तपती नामक कन्या हुई। भगवान सूर्य ने जब संज्ञा को तप करते देखा तो उसे तुष्ट करके अपने यहाँ ले आये। संज्ञा के बड़वा (घोड़ी) रूप से [[अश्विनीकुमार]] हुए। [[त्रेता युग|त्रेता]] में कपिराज [[सुग्रीव]] और [[द्वापर युग|द्वापर]] में महारथी [[कर्ण]] भगवान सूर्य के अंश से ही उत्पन्न हुए। &lt;br /&gt;
*पक्षिराज [[गरुड़]] के बड़े भाई विनता नन्दन [[अरुण]] जी भगवान सूर्य के रथ को हाँकते हैं। रथ में सात उज्ज्वल घोड़े जुते हैं। अहर्निश यह रथ पूर्ण वेग से चलता रहता है। &lt;br /&gt;
*सौर सिद्धान्त भी वस्तुत: सूर्य को गतिशील मानता है। विज्ञान के महान विद्वान अभी परस्पर इस सम्बन्ध में सहमत नहीं हैं। उनका अन्वेषण चल रहा है। नित्य नये सिद्धान्त वहाँ बनते जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
*भगवान सूर्य अपने रथ पर आसीन अविश्रान्त भाव से मेरू की प्रदक्षिणा करते रहते हैं। उन्हीं के द्वारा [[दिन]], [[रात्रि]], [[मास]], [[ऋतु]], [[अयन]], [[वर्ष]] आदि का विभाग होता है। वही दिशाओं के भी विभाजक हैं। &lt;br /&gt;
*भगवान सूर्य की उपासना बारह महीनों में बारह नामों से होती है। उस समय उनके पार्षद भी परिवर्तित हो जाते हैं। इन पार्षदों में [[ऋषि]], [[अप्सराएँ]], [[गन्धर्व]], [[राक्षस]], [[भल्ल]] और [[नाग]] हैं। &lt;br /&gt;
*ऋषि रथ से आगे चलते हुए भगवान की स्तुति करते हैं। &lt;br /&gt;
*गन्धर्व गान करते हैं। &lt;br /&gt;
*अप्सराएँ नाचती हैं। &lt;br /&gt;
*राक्षस रथ को पीछे से ठेलते हैं। &lt;br /&gt;
*भल्ल रथयोजक बनते हैं और &lt;br /&gt;
*नाग रथ को ले चलते हैं। &lt;br /&gt;
*यह सूर्यव्यूह निम्न है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;table width=&amp;quot;100%&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; cellpadding=&amp;quot;10&amp;quot; cellspacing=&amp;quot;0&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;tr&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;127&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p align=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;महीना&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;90&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p align=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;भगवान मास-सम्बद्ध नाम&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;78&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p align=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;सूर्य का ऋषि&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;78&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p align=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;अप्सरा&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;66&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p align=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;गन्धर्व&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
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    &amp;lt;td width=&amp;quot;90&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;विष्णु &amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;78&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;विश्वामित्र &amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;78&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;रम्भा &amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;66&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;सूर्यवर्चा &amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;66&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;मखापेत &amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;72&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;सत्यजित् &amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;td width=&amp;quot;61&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;अश्वतर &amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;/td&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/tr&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/table&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
*सन्ध्या भगवान [[आदित्य]] की ही उपासना है और वह द्विजाति मात्र का अनिवार्य कर्तव्य है। &lt;br /&gt;
*भगवान सूर्य साक्षात नारायण हैं। उन श्रुति धाम ने वाजि (अश्व)-रूप धारण करके महर्षि [[याज्ञवल्क्य]] को [[यजुर्वेद|शुक्ल यजुर्वेद]] का उपदेश किया। &lt;br /&gt;
*श्री [[हनुमान]] जी के विद्या गुरु भी वही हैं। &lt;br /&gt;
*भारत में रविवार का व्रत खूब प्रख्यात है। अनेक आर्त उससे सफलकाम होते हैं।  &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
*सूर्य को मानव/अवतार/देवता मानते हुए उसका जन्म अदिति (प्रकृति) से हुआ  माना गया है। &lt;br /&gt;
*सूर्य की दो पत्नियाँ अर्थात सहचरी  बतायी गयीं हैं। &lt;br /&gt;
#[[संज्ञा]]( चेतना या ऊर्जा) और &lt;br /&gt;
#[[छाया]] । &lt;br /&gt;
*छाया की कोख़ से [[शनि]] का जन्म हुआ। गुणों में पिता से विपरीत धर्म-कर्त्तव्य  वाला होने के कारण शनि पिता सूर्य के  साथ मनमुटाव जैसा व्यवहार करता बताया गया है, परंतु सूर्य पुत्र के अवगुणों को तो  कुदृष्टि से देखता है पर पुत्र के साथ तट्स्थ बना  रहता है।   &lt;br /&gt;
*[[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवतपुराण]] में सूर्य के विषय में विस्तार से वर्णन किया गया  है। सूर्य की स्थिति बतायी है - &lt;br /&gt;
'अंडमध्यगतः सूर्यो द्यावाभूम्योर्यदन्तरम।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
सूर्याण्डगोलयोर्मध्ये कोट्यः स्युः पञ्चविंशतिः॥'&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*स्वर्ग और [[पृथ्वी]] के बीच में जो ब्रह्माण्ड का केंद्र है वहीं सूर्य की स्थिति है। &lt;br /&gt;
'मृतेऽण्ड एष एतस्मिन  यद भूत्ततो मार्तण्ड इति  व्यपदेशः।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
हिरण्यगर्भ इति यद्धिरण्याण्डसमुद्भवः॥'&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अर्थ==&lt;br /&gt;
इस अचेतन में विराजने के कारण इसे 'मार्तण्ड' भी कहा जाता है। यह ज्योतिर्मय(हिरण्यमय) ब्रह्मांड  से प्रकट हुए हैं इसलिए इन्हें 'हिरण्यगर्भा' भी कहते हैं। सूर्य ही दिशा, आकाश, द्युलोक   (अंतरिक्ष) भूलोक, स्वर्ग  और मोक्ष के प्रदेश , नरक,  और रसातल और अन्य भागों के विभागों का कारण है। सूर्य ही समस्त देवता, तिर्यक, मनुष्य, सरीसृप और लता-वृक्षादि समस्त जीव समूहों के आत्मा और नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता हैं, अर्थात सूर्य से ही जीवन है।&lt;br /&gt;
'सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशः खं द्यौर्मही भिदा।&lt;br /&gt;
स्वर्गापवर्गोनरका रसौकांसि च सर्वशः॥' &lt;br /&gt;
'देवतिर्यङ्मनुष्याणां सरीसृपसवीरुधाम।&lt;br /&gt;
सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा दृगीश्वरः॥' &lt;br /&gt;
==सूर्य की स्थिति==&lt;br /&gt;
सूर्य ग्रहों और नक्षत्रों का स्वामी है। सूर्य  उत्तरायण, दक्षिणायन और विषुवत नाम वाली  क्रमशः मंद, शीघ्र और समान गतियों से चलते हुए समयानुसार मकरादि राशियों में ऊँचे-नीचे और समान स्थानों में जाकर दिन रात को बड़ा,छोटा करता है।  जब मेष या  तुला  राशि पर आता है तब दिन-रात समान हो जाते हैं। तब प्रतिमास रात्रियों में एक-एक घड़ी कम होती जाती है और दिन बढ़ते जाते हैं।  जब वृश्चिकादि राशियों पर सूर्य चलते हैं तब इसके विपरीत परिवर्तन होता है। [[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवपुराण]] में सूर्य की परिक्रमा का मार्ग नौ करोड़, इक्यावन लाख योजन बताया है। समय के साथ सूर्य को स्पष्ट करने के लिए रुपक है:'सूर्य का [[संवत्सर]] नाम का एक चक्र (पहिया) है, उसमें माह रुपी बारह अरे हैं, ऋतु रुपी छह नेमियाँ हैं और तीन चौमासे रुपी तीन नाभियाँ हैं।'   &lt;br /&gt;
==ज्योतिष में सूर्य==&lt;br /&gt;
ज्योतिष के अनुसार सूर्य सबसे तेजस्वी, प्रतापी और सत और तमो गुण वाला ग्रह कहा गया है। यह आत्मा का कारक और हृदय एवं नाड़ी संस्थान का अधिपति है। सूर्य समस्त ब्रह्मांड का केंद्र ज्योतिष में भी माना गया है। प्राचीन ज्ञान का हर विषय मानवीकरण और रूपक के माध्यम से स्पष्ट किया गया मिलता है। सूर्य भी इससे अछूता नहीं है। &lt;br /&gt;
*सूर्य कृतिका, उत्तराषाढ़ा और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रों का स्वामी है। (कृतिकानक्षत्र ज्ञानार्जन, पशुपालन, रोग, अनासक्ति, अशांत और  तार्किकता इत्यादि गुण-प्रधान बताया गया है तो उत्तराषाढ़ा  चित्रकला, सफ़ाई, यश-कीर्ति,  प्रज्ञा, पुष्टता, गर्वीलापन, दृढ़ता और निपुणता जैसे विषयोंका प्रधान बताया गया है लेकिन  उत्तराफाल्गुनी तेज-स्मरणशक्ति, कला-कुशलता, व्यवहार-कुशलता, एकांतप्रेमी, माता-पिता के सुख से वंचित जैसे गुणों की प्रधानता वाला बताया गया मिलता है।) &lt;br /&gt;
*सूर्य सिंह राशि, जो काल-पुरुष( समय का मानवीयकरण) का आमाशय/ पेट माना गया है और गणना से पांचवी राशि है, का स्वामी माना गया है और भावों के अनुसार पाँचवाँ भाव शिक्षा, संतान, शौक़ और आदत का है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=6007</id>
		<title>सावित्री सत्यवान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=6007"/>
		<updated>2010-03-14T17:29:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==सावित्री सत्यवान / Savitri Satyavan==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सावित्री तथा सत्यवान की कथा'''&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
धर्मराज [[युधिष्ठिर]] ने मार्कण्डेय ऋषि से कहा, &amp;quot;हे ऋषिश्रेष्ठ! मुझे अपने कष्टों की चिन्ता नहीं है, किन्तु इस [[द्रौपदी]] के कष्ट को देखकर अत्यन्त क्लेश होता है। जितना कष्ट यह उठा रही है, क्या और किसी अन्य पतिव्रता नारी ने कभी उठाया है?&amp;quot; तब मार्कण्डेय ऋषि बोले, &amp;quot;हे धर्मराज! तुम्हारे इस प्रश्नै के उत्तर में मैं तुम्हें पतिव्रता सावित्री की कथा सुनाता हूँ।। मद्र देश के राजा का नाम अश्वपति था। उनके कोई भी सन्तान न थी इसलिये उन्होंने सन्तान प्राप्ति के लिये [[सावित्री]] देवी की बड़ी उपासना की जिसके फलस्वरूप उनकी एक अत्यन्त सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई। सावित्री देवी की कृपा से उत्पन्न उस कन्या का नाम अश्वपति ने सावित्री ही रख दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;सावित्री की उम्र, रूप, गुण और लावण्य शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह बढ़ने लगी और वह युवावस्था को प्राप्त हो गई। अब उसके पिता राजा अश्वेपति को उसके विवाह की चिन्ता होने लगी। एक दिन उन्होंने सावित्री को बुला कर कहा कि पुत्री! तुम अत्यन्त विदुषी हो अतः अपने अनुरूप पति की खोज तुम स्वयं ही कर लो। पिता की आज्ञा पाकर सावित्री एक वृद्ध तथा अत्यन्त बुद्धिमान मन्त्री को साथ लेकर पति की खोज हेतु देश-विदेश के पर्यटन के लिये निकल पड़ी। जब वह अपना पर्यटन कर वापस अपने घर लौटी तो उस समय सावित्री के पिता देवर्षि नारद के साथ भगवत्चर्चा कर रहे थे। सावित्री ने दोनों को प्रणाम किया और कहा कि हे पिता! आपकी आज्ञानुसार मैं पति का चुनाव करने के लिये अनेक देशों का पर्यटन कर वापस लौटी हूँ। [[शाल्व राज्य|शाल्व देश]] में द्युमत्सेन नाम से विख्यात एक बड़े ही धर्मात्मा राजा थे। किन्तु बाद में दैववश वे अन्धे हो गये। जब वे अन्धे हुये उस समय उनके पुत्र की बाल्यावस्था थी। द्युमत्सेन के अनधत्व तथा उनके पुत्र के बाल्यपन का लाभ उठा कर उसके पड़ोसी राजा ने उनका राज्य छीन लिया। तब से वे अपनी पत्नी  एवं पुत्र सत्यवान के साथ वन में चले आये और कठोर व्रतों का पालन करने लगे। उनके पुत्र सत्यवान अब युवा हो गये हैं, वे सर्वथा मेरे योग्य हैं इसलिये उन्हीं को मैंने पतिरूप में चुना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;सावित्री की बातें सुनकर देवर्षि [[नारद]] बोले कि हे राजन्! पति के रूप में सत्यवान का चुनाव करके सावित्री ने बड़ी भूल की है। नारद जी के वचनों को सुनकर अश्ववपति चिन्तित होकर बोले के हे देवर्षि! सत्यवान में ऐसे कौन से अवगुण हैं जो आप ऐसा कह रहे हैं? इस पर नारद जी ने कहा कि राजन्! सत्यवान तो वास्तव में सत्य का ही रूप है और समस्त गुणों का स्वामी है। किन्तु वह अल्पायु है और उसकी आयु केवल एक वर्ष ही शेष रह गई है। उसके बाद वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
&amp;quot;देवर्षि की बातें सुनकर राजा अश्वैपति ने सावित्री से कहा कि पुत्री! तुम नारद जी के वचनों को सत्य मान कर किसी दूसरे उत्तम गुणों वाले पुरुष को अपना पति के रूप में चुन लो। इस पर सावित्री बोली कि हे तात्! भारतीय नारी अपने जीवनकाल में केवल एक ही बार पति का वरण करती है। अब चाहे जो भी हो, मैं किसी दूसरे को अपने पति के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। सावित्री द‍ृढ़ता को देखकर देवर्षि नारद अत्यन्त प्रसन्न हुये और उनकी सलाह के अनुसार राजा अश्व्पति ने सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ कर दिया ।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&amp;quot;विवाह के पश्चात सावित्री अपने राजसी वस्त्राभूषणों को त्यागकर तथा वल्कल धारण कर अपने पति एवं सास श्वीसुर के साथ वन में रहने लगी। पति तथा सास श्विसुर की सेवा ही उसका धर्म बन गया। किन्तु ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता जाता था, सावित्री के मन का भय बढ़ता जाता था। अन्त्ततः वह दिन भी आ गया जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चिनत थी। उस दिन सावित्री ने द‍ृढ़ निश्चनय कर लिया कि वह आज अपने पति को एक भी पल अकेला नहीं छोड़ेगी। जब सत्यवान लकड़ी काटने हेतु कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर वन में जाने के लिये तैयार हुये तो सावित्री भी उसके साथ जाने के लिये तैयार हो गई। सत्यवान ने उसे बहुत समझाया कि वन का मार्ग अत्यन्त दुर्गम है और वहाँ जाने में तुम्हें बहुत कष्ट होगा किन्तु सावित्री अपने निश्चतय पर अडिग रही और अपने सास श्वकसुर से आज्ञा लेकर सत्यवान के सा गहन वन में चली गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;लकड़ी काटने के लिये सत्यवान एक वृक्ष पर जा चढ़े किन्तु थोड़ी ही देर में वे अस्वस्थ होकर वृक्ष से उतर आये। उनकी अस्वस्थता और पीड़ा को ध्यान में रखकर सावित्री ने उन्हें वहीं वृक्ष के नीचे उनके सिर को अपनी जंघा पर रख कर लिटा लिया। लेटने के बाद सत्यवान अचेत हो गये। सावित्री समझ गई कि अब सत्यवान का अन्तिम समय आ गया है इसलिये वह चुपचाप अश्रु बहाते हुये ईश्वमर से प्रार्थना करने लगी। अकस्मात् सावित्री ने देखा कि एक कान्तिमय, कृष्णवर्ण, हृष्ट-पुष्ट, मुकुटधारी व्यक्तिय उसके सामने खड़ा है। सावित्री ने उनसे पूछा कि हे देव! आप कौन हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि सावित्री! मैं यमराज हूँ। और तुम्हारे पति को लेने आया हूँ। सावत्री बोली हे प्रभो! सांसारिक प्राणियों को लेने के लिये तो आपके दूत आते हैं किन्तु क्या कारण है कि आज आपको स्वयं आना पड़ा? यमराज ने उत्तर दिया कि देवि! सत्यवान धर्मात्मा तथा गुणों का समुद्र है, मेरे दूत उन्हें ले जाने के योग्य नहीं हैं। इसीलिये मुझे स्वयं आना पड़ा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;इतना कह कर यमराज ने बलपूर्वक सत्यवान के शरीर में से पाश में बँधा अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला जीव निकाला और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ा। सावित्री अपने पति को ले जाते हुये देखकर स्वयं भी यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी। कुछ दूर जाने के बाद जब यमराज ने सावित्री को अपने पीछे आते देखा तो कहा कि हे सवित्री! तू मेरे पीछे मत आ क्योंकि तेरे पति की आयु पूर्ण हो चुकी है और वह अब तुझे वापस नहीं मिल सकता। अच्छा हो कि तू लौट कर अपने पति के मृत शरीर के अन्त्येष्टि की व्यवस्था कर। अब इस स्थान से आगे तू नहीं जा सकती। सावित्री बोली कि हे प्रभो! भारतीय नारी होने के नाते पति का अनुगमन ही तो मेरा धर्म है और मैं इस स्थान से आगे तो क्या आपके पीछे आपके लोक तक भी जा सकती हूँ क्योंकि मेरे पातिव्रत धर्म के बल से मेरी गति कहीं भी रुकने वाली नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;यमराज बोले कि सावित्री! मैं तेरे पातिव्रत धर्म से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। इसलिये तू सत्यवान के जीवन को छोड़कर जो चाहे वह वरदान मुझसे माँग ले। इस पर सावित्री ने कहा कि प्रभु! मेरे श्वमसुर नेत्रहीन हैं। आप कृपा करके उनके नेत्रों की ज्योति पुनः प्रदान कर दें। यमराज बोले कि ऐसा ही होगा, लेकिन अब तू वापस लौट जा। सावित्री ने कहा कि भगवन्! जहाँ मेरे प्राणनाथ होंगे वहीं मेरा निश्च ल आश्रम होगा। इसके सिवा मेरी एक बात और सुनिये। मुझे आज आप जैसे [[देवता]] के दर्शन हुये हैं और देव-दर्शन तथा संत-समागम कभी निष्फल नहीं जाते। इस पर यमराज ने कहा कि देवि! तुमने जो कहा है वह मुझे अत्यन्त प्रिय लगा है। अतः तू फिर सत्यवान के जीवन को छोड़कर एक वर माँग ले। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सावित्री बोली, हे देव! मेरे श्वेसुर राज्य-च्युत होकर वनवासी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। मुझे यह वर दें कि उनका राज्य उन्हें वापस मिल जाये। यमराज बोले 'तथास्तु'। अब तू लौट जा। सावित्री ने फिर कहा कि हे प्रभो! सनातन धर्म के अनुसार मनुष्यों का धर्म है कि वह सब पर दया करे। सत्पुरुष तो अपने पास आये हुये शत्रुओं पर भी दया करते हैं। यमराज बोले कि हे कल्याणी! तू नीति में अत्यन्त निपुण है और जैसे प्यासे मनुष्य को जल पीकर जो आनन्द प्राप्त होता है तू वैसा ही आनन्द प्रदान करने वाले वचन कहती है। तेरी इस बात से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें पुनः एक वर देना चाहता हूँ किन्तु तू सत्यवान का जीवन वर के रूप में नहीं माँग सकती। तब सावित्री ने कहा कि मेरे पिता राजा अश्वेपति के कोई पुत्र नहीं है। अतः प्रभु! कृपा करके उन्हें पुत्र प्रदान करें। यमराज बोले कि मैंने तुझे यह वर भी दिया, अब तू यहाँ से चली जा। सावित्री ने फिर कहा कि हे यमदेव! मैं अपने पति को छोड़ कर एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकूँगी। आप तो संत-हृदय हैं और सत्संग से सहृदयता में वृद्धि ही होती है। इसीलिये संतों से सब प्रेम करते हैं। यमराज बोले कि कल्याणी तेरे वचनों को सुनकर मैं तुझे सत्यवान के जीवन को छोड़कर एक और अन्तिम वर देना चाहता हूँ किन्तु इस वर के पश्चारत् तुम्हें वापस जाना होगा। सावित्री ने कहा कि प्रभु यदि आप मुझसे इतने ही प्रसन्न हैं तो मेरे श्वासुर द्युमत्सेन के कुल की वृद्धि करने के लिये मुझे सौ पुत्र प्रदान करने की कृपा करें। यमराज बोले कि ठीक है, यह वर भी मैंने तुझे दिया, अब तू यहाँ से चली जा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;किन्तु सावित्री यमराज के पीछे ही चलती रही। उसे अपने पीछे आता देख यमराज ने कहा कि सावित्री तू मेरा कहना मान कर वापस चली जा और सत्यवान के मृत शरीर के अन्तिम संस्कार की व्यवस्था कर। इस पर सावित्री बोली कि हे प्रभु! आपने अभी ही मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, यदि मेरे पति का अन्तिम संस्कार हो गया तो मेरे पुत्र कैसे होंगे? और मेरे श्व सुर के कुल की वृद्धि कैसे हो पायेगी? सावित्री के वचनों को सुनकर यमराज आश्च्र्य में पड़ गये और अन्त में उन्होंने कहा कि सावित्री तू अत्यन्त विदुषी और चतुर है। तूने अपने वचनों से मुझे चक्कर में डाल दिया है। तू पतिव्रता है इसलिये जा, मैं सत्यवान को जीवनदान देता हूँ। इतना कह कर यमराज वहाँ से अन्तर्धान हो गये और सावित्री वापस सत्यवान के शरीर के पास लौट आई। सावित्री के निकट आते ही सत्यवान की चेतना लौट आई।&amp;quot;&lt;br /&gt;
इतनी कथा सुनाकर मार्कण्डेय मुनि बोले, &amp;quot;हे युधिष्ठिर! इस प्रकार उस पतिव्रता नारी ने अपने श्वयसुर कुल के साथ ही साथ अपने पिता के कुल का भी उद्धार किया। इसी प्रकार यह पतिव्रता द्रौपदी भी आप सब का उद्धार करेगी। इसलिये आप समस्त चिन्ताओं को भूल कर अच्छे दिन आने की प्रतीक्षा करें।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==[[ब्रह्म वैवर्त पुराण]]==&lt;br /&gt;
भगवान् नारायण कहते हैं- [[नारद]]! जब राजा अश्वपति ने विधि पूर्वक भगवती सावित्री की पूजा करके इस स्तोत्र से उनका स्तवन किया, तब देवी उनके सामने प्रकट हो गयीं।  उनका श्रीविग्रह ऐसा प्रकाशमान था, मानो हजारों सूर्य एक साथ उदित हो गये हों।  साध्वी सावित्री अत्यन्त प्रसन्न होकर हँसती हुई राजा अश्वपति से इस प्रकार बोलीं, मानो माता अपने पुत्र से बात कर रही हो।  उस समय देवी सावित्री की प्रभा से चारों दिशाएँ उद्भासित हो रही थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवी सावित्री ने कहा-- महाराज! तुम्हारे मन की जो अभिलाषा है, उसे मैं जानती हूँ। तुम्हारी पत्नी के सम्पूर्ण मनोरथ भी मुझसे छिपे नहीं हैं। अत: सब कुछ देने के लिये मैं निश्चित रूप से प्रस्तुत हूँ। राजन्! तुम्हारी परम साध्वी रानी कन्या की अभिलाषा करती है और तुम पुत्र चाहते हो; क्रम से दोनों ही प्राप्त होंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सावित्री नामक कन्या की उत्पत्ति, विवाह, सत्यवान् की मृत्यु==&lt;br /&gt;
इस प्रकार कहकर भगवती सावित्री ब्रह्मलोक में चली गयीं और राजा भी अपने घर लौट आये।  यहाँ समयानुसार पहले कन्या का जन्म हुआ।  भगवती सावित्री की आराधना से उत्पन्न हुई लक्ष्मी की कलास्वरूपा उस कन्या का नाम राजा अश्वपति ने सावित्री रखा।  वह कन्या समयानुसार शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान प्रतिदिन बढ़ने लगी। समय पर उस सुन्दरी कन्या में नवयौवन के लक्षण प्रकट हो गये।  द्युमत्सेनकुमार सत्यवान् का उसने पतिरूप में वरण किया; क्योंकि सत्यवान् सत्यवादी, सुशील एवं नाना प्रकार के उत्तम गुणों से सम्पन्न थे।  राजा ने रत्नमय भूषणों से अलंकृत करके अपनी कन्या सावित्री सत्यवान् की समर्पित कर दी।  सत्यवान् भी श्वशुर की ओर से मिले हुए बड़े भारी दहेज के साथ उस कन्या को लेकर अपने घर चले गये। एक वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात सत्य पराक्रमी सत्यवान् अपने पिता की आज्ञा के अनुसार हर्षपूर्वक फल और ईंधन लाने के लिये अरण्य में गये। उनके पीछे-पीछे साध्वी सावित्री भी गयी। दैववश सत्यवान् वृक्ष से गिरे और उनके प्राण प्रयाण कर गये।  मुने! [[यमराज]] ने उनके अंगष्ठ-सदृश जीवात्मा को सूक्ष्म शरीर के साथ बाँधकर यमपुरी के लिये प्रस्थान किया।  तब साध्वी सावित्री भी उनके पीछे लग गयी।  संयमनीपुरी के स्वामी साधुश्रेष्ठ यमराज ने सुन्दरी सावित्री को पीछे-पीछे आती देख मधुर वाणी में कहा।&lt;br /&gt;
==सावित्री और यमराज का संवाद== &lt;br /&gt;
'''धर्मराज ने कहा'''- अहो सावित्री! तुम इस मानव-देह से कहाँ जा रही हो? यदि पतिदेव के साथ जाने की तुम्हारी इच्छा है तो पहले इस शरीर का त्याग कर दो। मर्त्यलोक का प्राणी इस पाञ्चभौतिक शरीर को लेकर मेरे लोक में ही जाने का अधिकारी है। साध्वि! तुम्हारा पति सत्यवान् भारतवर्ष में आया था।  उसकी आयु अब पूर्ण हो चुकी, अतएव अपने किये हुए कर्म का फल भोगने के लिये अब वह मेरे लोक को जा रहा है। प्राणी का कर्म से ही जन्म होता है और कर्म से ही उसकी मृत्यु भी होती है। सुख, दु:ख, भय और शोक- ये सब कर्म के अनुसार प्राप्त होते रहते हैं। कर्म के प्रभाव से जीव [[इन्द्र]] भी हो सकता है। अपना उत्तम कर्म उसे ब्रह्मपुत्र तक बनाने में समर्थ है। अपने शुभ कर्म की सहायता से प्राणी श्रीहरि का दास बनकर जन्म आदि विकारों से मुक्त हो सकता है। सम्पूर्ण सिद्धि, अमरत्व तथा श्रीहरि के सालोक्यादि चार प्रकार के पद भी अपने शुभ कर्म के प्रभाव से मिल सकते हैं। देवता, [[मनु]], राजेन्द्र, [[शिव]], [[गणेश]], मुनीन्द्र, तपस्वी, क्षत्रिय, वैश्य, म्लेच्छ, स्थावर, जंगम, पर्वत, राक्षस, किन्नर, अधिपति, वृक्ष, पशु, किरात, अत्यन्त सूक्ष्म जन्तु कीड़े, दैत्य, दानव तथा असुर- ये सभी योनियाँ प्राणी को अपने कर्म के अनुसार प्राप्त होती हैं।  इसमें कुछ भी संशय नहीं है। &lt;br /&gt;
इस प्रकार सावित्री से कहकर यमराज मौन हो गये।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
भगवान् नारायण कहते हैं- मुने! पतिव्रता सावित्री ने यमराज की बात सुनकर परम भक्ति के साथ उनका स्तवन किया; फिर वह उनसे पूछने लगी।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''सावित्री ने पूछा'''- भगवन्! कौन कार्य है, किस कर्म के प्रभाव से क्या होता है, कैसे फल में कौन कर्म हेतु है, कौन देह है और कौन देही है अथवा संसार में प्राणी किसकी प्रेरणा से कर्म करता है? ज्ञान, बुद्धि, शरीरधारियों के प्राण, इन्द्रियाँ तथा उनके लक्षण एवं देवता, भोक्ता, भोजयिता, भोज, निष्कृति तथा जीव और परमात्मा- ये सब कौन और क्या हैं? इन सबका परिचय देने की कृपा कीजिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''धर्मराज बोले'''- साध्वी सावित्री! कर्म दो प्रकार के हैं- शुभ और अशुभ। वेदोक्त कर्म शुभ हैं। इनके प्रभाव से प्राणी कल्याण के भागी होते हैं। वेद में जिसका स्थान नहीं है, वह अशुभ कर्म नरकप्रद है। भगवान् [[विष्णु]] की जो संकल्परहित अहैतु की सेवा की जाती है, उसे 'कर्म-निर्मूलरूपा' कहते हैं। ऐसी ही सेवा 'हरि-भक्ति' प्रदान करती है। कौन कर्म के फल का भोक्ता है और कौन निर्लिप्त- इसका उत्तर यह है। श्रुति का वचन है कि श्रीहरि का जो भक्त है, वह मनुष्य मुक्त हो जाता है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक और भय- ये उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते।  साध्वि! श्रुति में मुक्ति भी दो प्रकार की बतायी गयी है, जो सर्वसम्मत है।  एक को 'निर्वाणप्रदा' कहते हैं और दूसरी को 'हरिभक्तिप्रदा'। मनुष्य इन दोनों के अधिकारी हैं।  वैष्णव पुरुष हरिभक्तिस्वरूपा मुक्ति चाहते हैं और अन्य साधु-जन निर्वाणप्रदा मुक्ति की इच्छा करते हैं। कर्म का जो बीजरूप है, वही सदा फल प्रदान करने वाला है। कर्म कोई दूसरी वस्तु नहीं, भगवान् श्री[[कृष्ण]] का ही रूप है। वे भगवान् प्रकृति से परे हैं। कर्म भी इन्हीं से होता है; क्योंकि वे उसके हेतु रूप हैं।  जीव कर्म का फल भोगता है; आत्मा तो सदा निर्लिप्त ही है। देही आत्मा का प्रतिबिम्ब है, वही जीव है। देह तो सदा से नश्वर है। [[पृथ्वी]], [[तेज]], [[जल]], [[वायु]] और [[आकाश]]- ये पाँच भूत उसके उपादान हैं। परमात्मा के सृष्टि- कार्य में ये सूत्ररूप हैं।  कर्म करने वाला जीव देही है। वही भोक्ता और अन्तर्यामीरूप से भोजयिता भी है।  सुख एवं दु:ख के साक्षात् स्वरूप वैभवका ही दूसरा नाम भोग है। निष्कृति मुक्ति को ही कहते हैं।  सदसत्सम्बन्धी विवेक के आदिकारण का नाम ज्ञान है। इस ज्ञान के अनेक भेद हैं।  घट-पटादि विषय तथा उनका भेद ज्ञान के भेद में कारण कहा जाता है। विवेचनमयी शक्तिको 'बुद्धि' कहते हैं। श्रुति में ज्ञानबीज नाम से इसकी प्रसिद्धि है। वायु के ही विभिन्न रूप प्राण हैं।  इन्हीं के प्रभाव से प्राणियों के शरीर में शक्तिका संचार होता है।  जो इन्द्रियों में प्रमुख, परमात्मा का अंश, संशयात्मक, कर्मों का प्रेरक, प्राणियों के लिये दुर्निवार्य, अनिरूप्य, अदृश्य तथा बुद्धिका एक भेद है, उसे 'मन' कहा गया है। यह शरीरधारियों का अंग तथा सम्पूर्ण कर्मों का प्रेरक है। यही इन्द्रियों को विषयों में लगाकर दु:खी बनाने के कारण शत्रुरूप हो जाता है और सत्कार्य में लगाकर सुखी बनाने के कारण मित्ररूप है। आँख, कान, नाम, त्वचा, और जिह्वा आदि इन्द्रियाँ हैं। सूर्य, वायु, पृथ्वी और वाणी आदि इन्द्रियों के देवता कहे गये हैं। जो प्राण एवं देहादिकों धारण करता है, उसी की 'जीव' संज्ञा है। प्रकृति से परे जो सर्वव्यापी निर्गुण ब्रह्म हैं, उन्हीं को 'परमात्मा' कहते हैं। ये कारणों के भी कारण हैं। ये स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
वत्से! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने शास्त्रानुसार बतला दिया।  यह विषय ज्ञानियों के लिये परम ज्ञानमय है। अब तुम सुखपूर्वक लौट जाओ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सावित्री ने कहा'''- प्रभो! आप ज्ञान के अथाह समुद्र हैं। अब मैं इन अपने प्राणनाथ और आपको छोड़कर कैसे कहाँ जाऊँ? मैं जो-जो बातें पूछती हूँ, उसे आप मुझे बताने की कृपा करें। जीव किस कर्म के प्रभाव से किन-किन योनियों में जाता है? पिताजी! कौन कर्म स्वर्गप्रद है और कौन नरकप्रद? किस कर्म के प्रभाव से प्राणी मुक्त हो जाता है तथा श्रीहरि में भक्ति उत्पन्न करने के लिये कौन-सा कर्म कारण होता है? किस कर्म के फलस्वरूप प्राणी रोगी होता है और किस कर्मफल से नीरोग? दीर्घजीवी और अल्पजीवी होने में कौन-कौन से कर्म प्रेरक हैं? किस कर्म के प्रभाव से प्राणी सुखी होता है और किस कर्म के प्रभाव से दु:खी? किस कर्म से मनुष्य अंगहीन, एकाक्ष, बधिर, अन्धा, पंगु, उन्मादी, पागल तथा अत्यन्त लोभी और नरघाती होता है एवं सिद्धि और सालोक्यादि मुक्ति प्राप्त होने में कौन कर्म सहायक है? किस कर्म के प्रभाव से प्राणी ब्राह्मण होता है और किस कर्म के प्रभाव से प्राणी ब्राह्मण होता है और किस कर्म के प्रभाव से तपस्वी? स्वर्गादि भोग प्राप्त होने में कौन कर्म साधन है? किस कर्म से प्राणी वैकुण्ठ में जाता है? ब्रह्मन्! गोलोक निरामय और सम्पूर्ण स्थानों से उत्तम धाम है। किस कर्म के प्रभाव से उसकी प्राप्ति हो सकती है? कितने प्रकार के नरक हैं और उनकी कितनी संख्या और उनके क्या-क्या नाम हैं? कौन किस नरक में जाता है और कितने समयतक वहाँ यातना भोगता है? किस कर्म के फल से पापियों के शरीर में कौन-सी व्याधि उत्पन्न होती है? भगवन्! मैंने ये जो-जो प्रश्न किये हैं, इन सबके उत्तर देने की आप कृपा करें। (अध्याय 24-25)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सावित्री-धर्मराज के प्रश्नोत्तर, सावित्री को वरदान==&lt;br /&gt;
भगवान् नारायण कहते हैं- नारद! सावित्री के वचन सुनकर यमराज के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।  वे हँसकर प्राणियों के कर्मविपाक कहने के लिये उद्यत हो गये।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''धर्मराज ने कहा'''- प्यारी बेटी! अभी तुम हो तो अल्प वय की बालिका, किंतु तुम्हें पूर्ण विद्वानों, ज्ञानियों और योगियों से भी बढ़कर ज्ञान प्राप्त है। पुत्री! भगवती सावित्री के वरदान से तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम उन देवी की कला हो। राजा ने तपस्या के प्रभाव से सावित्री-जैसी कन्यारत्न को प्राप्त किया है।  जिस प्रकार [[लक्ष्मी]] भगवान् विष्णु के, [[दुर्गा|भवानी]] [[शंकर]] के, [[राधा]] श्री[[कृष्ण]] के, [[सावित्री]] [[ब्रह्मा]] के, मूर्ति धर्म के, [[स्वायंभुव|शतरूपा]] मनु के, देवहूति कर्दम के, [[अरून्धती]] [[वसिष्ठ]] के, [[अदिति]] [[कश्यप]] के, [[अहिल्या]] [[गौतम]] के, [[शची]] [[इन्द्र]] के, [[रोहिणी]] [[चन्द्र|चन्द्रमा]] के, [[रति]] [[कामदेव]] के, [[स्वाहा]] [[अग्नि]] के, स्वधा पितरों के, [[संज्ञा]] [[सूर्य]] के, [[वरूणानी]] [[वरूण]] के, दक्षिण यज्ञ के, [[पृथ्वी]] [[वाराह]] के और [[देवसेना]] [[कार्तिकेय]] के पास सौभाग्यवती प्रिया बनकर शोभा पाती हैं, तुम भी वैसी ही सत्यवान् की प्रिया बनो। मैंने यह तुम्हें वर दे दिया। महाभागे! इसके अतिरिक्त भी जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह वर माँगो। मैं तुम्हें सभी अभिलाषित वर देने को तैयार हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सावित्री बोली'''- महाभाग! सत्यवान् के औरस अंश से मुझे सौ पुत्र प्राप्त हों- यही मेरा अभिलषित वर है। साथ ही, मेरे पिता भी सौ पुत्रों के जनक हों।  मेरे श्वशुर को नेत्र-लाभ हों और उन्हें पुन: राज्यश्री प्राप्त हो जाय, यह भी मैं चाहती हूँ। जगत्प्रभो! सत्यवान् के साथ मैं बहुत लंबे समय तक रहकर अन्त में भगवान् श्रीहरि के धाम में चली जाऊँ, यह वर भी देने की आप कृपा करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभो! मुझे जीव के कर्मका विपाक तथा विश्वसे तर जाने का उपाय भी सुनने के लिये मनमें महान कौतूहल हो रहा है; अत: आप यह भी बतावें।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''धर्मराज ने कहा'''- महासाध्वि! तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे। अब में प्राणियों का कर्म-विपाक कहता हूँ, सुनो। भारतवर्ष में ही शुभ-अशुभ कर्मों का जन्म होता है- यहीं के कर्मों को 'शुभ' या 'अशुभ' की संज्ञा  दी गयी है। यहाँ सर्वत्र पुण्यक्षेत्र है, अन्यत्र नहीं; अन्यत्र प्राणी केवल कर्मों का फल भोगते हैं।  पतिव्रते! देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा मनुष्य- ये सभी कर्म के फल भोगते हैं। परंतु सबका जीवन समान नहीं है।  उनमें से मानव ही कर्म का जनक होता है अर्थात् मनुष्ययोनिमें ही शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं; जिनका फल सर्वत्र सभी योनियों में भोगना पड़ता है। विशिष्ट जीवधारी- विशेषत: मानव ही सब योनियों में कर्मों का फल भोगते हैं और सभी योनियों में भटकते हैं। वे पूर्व-जन्म का किया हुआ शुभाशुभ कर्म भोगते हैं। शुभ कर्म के प्रभाव से वे स्वर्गलोक में जाते हैं और अशुभ कर्म से उन्हें नरक में भटकना पड़ता है। कर्म का निर्मूलन हो जाने पर मुक्ति होती है। साध्वि! मुक्ति दो प्रकार की बतलायी गयी है- एक निर्वाणस्वरूपा और दूसरी परमात्मा श्रीकृष्ण की सेवारूपा। बुरे कर्म से प्राणी रोगी होता है और शुभ कर्म से आरोग्यवान्।  वह अपने शुभाशुभ कर्म के अनुसार दीर्घजीवी, अल्पायु, सुखी एवं दु:खी होता है।  कुत्सित कर्म से ही प्राणी अंगहीन, अंधे-बहरे आदि होते हैं। उत्तम कर्म के फलस्वरूप सिद्धि आदि की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवि! सामान्य बातें बतायी गयीं; अब विशेष बातें सुनो।  सुन्दरि! यह अतिशय दुर्लभ विषय शास्त्रों और [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित है। इसे सबके सामने नहीं कहना चाहिये।  सभी जातियों के लिये भारतवर्ष में मनुष्य का जन्म पाना परम दुर्लभ है। साध्वि! उन सब जातियों में ब्राह्मण श्रेष्ठ माना जाता है। वह समस्त कर्मों में प्रशस्त होता है। भारतवर्ष में विष्णुभक्त ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है। पतिव्रते! वैष्णव के भी दो भेद हैं- सकाम और निष्काम। सकाम वैष्णव कर्म प्रधान होता है और निष्काम वैष्णव केवल भक्त। सकाम वैष्णव कर्मों का फल भोगता है और निष्काम वैष्णव शुभाशुभ भोग के उपद्रव से दूर रहता है।&lt;br /&gt;
===धर्म का पालन=== &lt;br /&gt;
साध्वि! ऐसा निष्काम वैष्णव शरीर त्यागकर भगवान् विष्णु के निरामय पद को प्राप्त कर लेता है। ऐसे निष्काम वैष्णवों का संसार में पुनरागमन नहीं होता।  द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णब्रह्म परमेश्वर हैं।  उनकी उपासना करने वाले भक्तपुरुष अन्त में दिव्य शरीर धारण करके गोलोक में जाते हैं। सकाम वैष्णव पुरुष उच्च वैष्णव लोकों में जाकर समयानुसार पुन: भारतवर्ष में लौट आते हैं। द्विजातियों के कुल में उनका जन्म होता है।  वे भी कालक्रम से निष्काम भक्त बन जाते और भगवान् उन्हें निर्मल भक्ति भी अवश्य देते हैं। वैष्णव ब्राह्मण से  भिन्न जो सकाम मनुष्य हैं, वे विष्णुभक्ति से रहित होने के कारण किसी भी जन्म में विशुद्ध बुद्धि नहीं पा सकते। साध्वि! जो तीर्थस्थान में रहकर सदा तपस्या करते हैं, वे द्विज ब्रह्मा के लोक में जाते हैं और पुण्यभोग के पश्चात पुन: भारतवर्ष में आ जाते हैं। भारत में रहकर अपने कर्तव्य-कर्मों में संलग्न रहने वाले ब्राह्मण तथा सूर्यभक्त शरीर त्यागने पर सूर्यलोक में जाते हैं और पुण्यभोग के पश्चात पुन: भारतवर्ष में जन्म पाते हैं। अपने धर्म में निरत रहकर शिव, शक्ति तथा गणपति की उपासना करने वाले ब्राह्मण शिवलोक में जाते हैं; फिर उन्हें लौटकर भारतवर्ष में आना पड़ता है। जो धर्मरहित होने पर भी निष्कामभाव से श्रीहरि का भजन करते हैं, वे भी भक्ति के बल से श्रीहरि के धाम में चले जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साध्वि! जो अपने धर्म का पालन नहीं करते, वे आचारहीन, कामलोलुप लोग अवश्य ही नरक में जाते हैं। चारों ही वर्ण अपने धर्म में कटिबद्ध रहने पर ही शुभकर्म का फल भोगने के अधिकारी होते हैं।  जो अपना कर्तव्य-कर्म नहीं करते, वे अवश्य ही नरक में जाते हैं। कर्म का फल भोगने के लिये वे भारतवर्ष में नहीं आ सकते। अतएव चारों वर्णों के लिये अपने धर्म का पालन करना अत्यन्त आवश्यक है।&lt;br /&gt;
===निष्कामभाव=== &lt;br /&gt;
अपने धर्म में संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, स्वधर्मनिरत विप्र को अपनी कन्या देने के फलस्वरूप चन्द्रलोक को जाते हैं और वहाँ चौदह मन्वन्तर काल तक रहते हैं।  साध्वि! यदि कन्या को अलंकृत करके दान में दिया तू उससे दुगुना फल प्राप्त होता है। उन साधु पुरुषों में यदि कामना हो तब तो वे चन्द्रमा के लोक में जाते हैं।  निष्कामभाव से दान करें तो वे भगवान् विष्णु के परम धाम में पहुँच जाते हैं।  गव्य (दूध), चाँदी, सुवर्ण, वस्त्र, घृत, फल और जल ब्राह्मणों को देने वाले पुण्यात्मा पुरुष चन्द्रलोक में जाते हैं।  साध्वि! एक मन्वन्तरतक वे वहाँ सुविधापूर्वक निवास करते हैं।  उस दान के प्रभाव से उन्हें वहाँ सुदीर्घ काल तक निवास प्राप्त होता है। पतिव्रते! पवित्र ब्राह्मण को सुवर्ण, गौ और ताम्र आदि द्रव्य का दान करने वाले सत्पुरुष सूर्यलोक में जाते हैं। वे भय-बाधा से शून्य हो, उस विस्तृत लोक में सुदीर्घ काल तक वास करते हैं। जो ब्राह्मणों को [[पृथ्वी]] अथवा प्रचुर धान्य दान करता है, वह भगवान् विष्णु के परम सुन्दर श्वेतद्वीप में जाता है और दीर्घकाल तक वहाँ वास करता है। भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को गृह-दान करने वाले पुरुष स्वर्गलोक में जाते और वहाँ दीर्घकाल तक निवास करते हैं; वे उस लोक में उतने वर्षों तक रहते हैं, जितनी संख्या में उस दान-गृह के रज:कण हैं। मनुष्य जिस-जिस देवता के उद्देश्य से गृह-दान करता है, अन्त में उसी देवता के लोक में जाता है और घर में जितने धूलिकण हैं, उतने वर्षों तक वहाँ रहता है। अपने घर पर दान करने की अपेक्षा देव मन्दिर में दान करने से चौगुना, पूर्तकर्म (वापी, कूप, तड़ाग आदि के निर्माण)- के अवसर पर करने से सौगुना तथा किसी श्रेष्ठ तीर्थस्थान में करने से आठ गुना फल होता है- यह ब्रह्माजी का वचन है।&lt;br /&gt;
===दान, शुभ और अशुभ कर्मों का फल===&lt;br /&gt;
समस्त प्राणियों के उपकार के लिये तड़ाग का दान करने वाला दस हजार वर्षों की अवधि लेकर जनलोक में जाता है। बावली का दान करने से मनुष्य को सदा सौगुना फल मिलता है।  वह सेतु (पुल)- का दान करने पर तड़ाग के दान का भी पुण्यफल प्राप्त कर लेता है। तड़ाग का प्रमाण चार हजार धनुष चौड़ा और उतना ही लंबा निश्चित किया गया है। इससे जो लघु प्रमाण में है, वह वापी कही जाती है। सत्पात्र को दी हुई कन्या दस वापी के समान पुण्यप्रदा होती है। यदि उस कन्या को अलंकृत करके दान किया जाय तो दुगुना फल मिलता है। तड़ाग के दान से जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही उसके भीतर से कीचड़ और मिट्टी निकालने से सुलभ हो जाता है। वापी के कीचड़ को दूर कराने से उसके निर्माण कराने-जितना फल होता है। पतिव्रते! जो पुरुष पीपल का वृक्षा लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह हजारों वर्षों के लिये भगवान् विष्णु के तपोलोक में जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सावित्री! जो सबकी भलाई के लिये पुष्पोद्यान लगाता है, वह दस हजार वर्षों तक ध्रुवलोक में स्थान पाता है। पतिव्रते! विष्णु के उद्देश्य से विमान का दान करने वाला मानव एक मन्वन्तरतक विष्णुलोक में वास करता है। यदि वह विमान विशाल और चित्रों से सुसज्जित किया गया हो तो उसके दान से चौगुना फल प्राप्त होता है। शिविका-दान में उससे आधा फल होना निश्चित है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरि के उद्देश्य से मन्दिराकार झूला दान करता है, वह अति दीर्घकाल तक भगवान् विष्णु के लोक में वास करता है। पतिव्रते! जो सड़क बनवाता और उसके किनारे लोगों के ठहरने के लिये महल (धर्मशाला) बनवा देता है, वह सत्पुरुष हजारों वर्षों तक इन्द्र के लोक में प्रतिष्ठित होता है। ब्राह्मणों अथवा देवताओं को दिया हुआ दान समान फल प्रदान करता है। जो पूर्वजन्म में दिया गया है, वही जन्मान्तर में प्राप्त होता है। जो नहीं दिया गया है, वह कैसे प्राप्त हो सकता है? पुण्यवान् पुरुष स्वर्गीय सुख भोगकर भारतवर्ष में जन्म पाता है। उसे क्रमश: उत्तम-से-उत्तम ब्राह्मण-कुल में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त होता है।  पुण्यवान् ब्राह्मण स्वर्गसुख भोगने के अनन्तर पुन: ब्राह्मण ही होता है। यही नियम क्षत्रिय आदि के लिये भी है। क्षत्रिय अथवा वैश्य तपस्या के प्रभाव से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है- ऐसी बात श्रुति में सुनी जाती है। धर्मरहित ब्राह्मण नाना योनियों में भटकते हैं और कर्मभोग के पश्चात फिर ब्राह्मणकुल में ही जन्म पाते हैं।  कितना ही काल क्यों न बीत जाय, बिना भोग किये कर्म क्षीण नहीं हो सकते। अपने किये हुए शुभ और अशुभ कर्मों का फल प्राणियों को अवश्य भोगना पड़ता है। देवता और तीर्थ की सहायता तथा कायव्यूह से प्राणी शुद्ध हो जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साध्वि! ये कुछ बातें तो तुम्हें बतला दीं, अब आगे और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय 26)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मराज की व्याख्या तथा सावित्री द्वारा धर्मराज को प्रणाम-निवेदन==&lt;br /&gt;
'''सावित्री ने कहा'''- धर्मराज! जिस कर्म के प्रभाव से पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्ग अथवा अन्य लोक में जाते हैं, वह मुझे बताने की कृपा करें। &lt;br /&gt;
===दान===&lt;br /&gt;
'''धर्मराज बोले'''- पतिव्रते! ब्राह्मण को अन्न दान करने वाला पुरुष इन्द्रलोक में जाता है और दान किये हुए अन्न में जितने दाने होते हैं उतने वर्षों तक वह वहाँ निवास पाता है। अन्नदान से बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा।  इसमें न कभी पात्र की परीक्षा की आवश्यकता होती है और न समय की&amp;lt;ref&amp;gt;अन्नदानात् परं दानं न भूतं न भविष्यति। नात्र पात्रपरीक्षा स्यान्न कालनियम: व्कचित्॥ (प्रकृतिखण्ड 27।3)&amp;lt;/ref&amp;gt;। साध्वि! यदि ब्राह्मणों अथवा देवताओं को आसन दान किया जाय तो हजारों वर्षों तक [[अग्निदेव]] के लोक में रहने की सुविधा प्राप्त हो जाती है। जो पुरुष ब्राह्मण को दूध देने वाली गौ दान करता है, वह गौके शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षों तक वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठित रहता है। यह गोदान साधारण दिनों की अपेक्षा पर्व के समय चौगुना, तीर्थ में सौगुना और नारायण क्षेत्र में कोटिगुना फल देने वाला होता है।  जो मानव भारतवर्ष में रहकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को गौ प्रदान करता है, वह हजारों वर्षों तक चन्द्रलोक में रहने का अधिकारी बन जाता है। दुग्धवती गौ ब्राह्मण को देने वाला पुरुष उसके रोम पर्यन्त वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो ब्राह्मण को वस्त्रसहित [[शालिग्राम]]-शिला का दान करता है, वह चन्द्रमा और सूर्य के स्थितिकाल तक वैकुण्ठ में सम्मान पूर्वक रहता है। ब्राह्मण को सुन्दर स्वच्छ छत्र दान करने वाला व्यक्ति हजारों वर्षों तक वरूण के लोक में आनन्द करता है। साध्वि! जो ब्राह्मण को दो पादुकाएँ प्रदान करता है, उसे दस हजार वर्ष तक वायुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मनोहर दिव्य शय्या ब्राह्मण को देने से दीर्घ काल तक चन्द्रलोक में प्रतिष्ठा होती है। जो देवताओं अथवा ब्राह्मणों को दीप-दान करता है, वह ब्रह्मलोक में वास करता है। उस पुण्य से उसके नेत्रों में ज्योति बनी रहती है तथा वह यमलोक में नहीं जाता।  भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मण को हाथी दान करता है, वह [[इन्द्र]] की आयुपर्यन्त उनके आधे आसन पर विराजमान होता है। ब्राह्मण को घोड़ा देने वाला भारतवासी मनुष्य वरूणलोक में आनन्द करता है। ब्राह्मण को उत्तम शिविका- पालकी प्रदान करने वाला विष्णुलोक में जाता है। जो ब्राह्मण को पंखा तथा सफेद चँवर अर्पण करता है, वह वायुलोक में सम्मान पाता है। जो भारतवर्ष में ब्राह्मण को धान का पर्वत देता है, वह धान के दानों के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। दाता और प्रतिगृहीता दोनों ही वैकुण्ठलोक में चले जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो भारतवर्ष में निरन्तर भगवान् श्रीहरि के नाम का कीर्तन करता है, उस चिरञ्चीवी मनुष्य को देखते ही मृत्यु भाग जाती है। भारतवर्ष में जो विद्वान् मनुष्य पूर्णिमा को रातभर दोलोत्सव मनाने का प्रबन्ध करता है, वह जीवन्मुक्त है। इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह भगवान् [[विष्णु]] के धाम को प्राप्त होता है।  उत्तराफाल्गुनी में उत्सव मनाने से इससे दुगुना फल मिलता है। जो भारतवर्ष में ब्राह्मण को तिलदान करता है, वह तिल के बराबर वर्षों तक विष्णुधाम में सम्मान पाता है। उसके बाद उत्तम योनि में जन्म पाकर चिरजीवी हो सुख भोगता है।  ताँबे के पात्र में तिल रखकर दान करने से दूना फल मिलता है। जो मनुष्य ब्राह्मण को फलयुक्त वृक्ष प्रदान करता है, वह फल के बराबर वर्षों तक इन्द्रलोक में सम्मान पाता है। फिर उत्तम योनि में जन्म पाकर वह सुयोग्य पुत्र प्राप्त करता है। फल वाले वृक्षों के दान की महिमा इससे हजार गुना अधिक बतायी गयी है। अथवा ब्राह्मण को केवल फल का भी दान करने वाला पुरुष दीर्घकाल तक स्वर्ग में वास करके पुन: भारतवर्ष में जन्म पाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
										&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में रहनेवाला जो पुरुष अनेक द्रव्यों से सम्पन्न तथा भाँति-भाँति के धान्यों से भरे-पूरे विशाल भवन ब्राह्मण को दान करता है, वह उसके फलस्वरूप दीर्घकाल तक कुबेर के लोक में वास पाता है। तत्पश्चात उत्तम योनि में जन्म पाकर वह महान धनवान् होता है। साध्वि! हरी-भरी खेती से युक्त सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को अर्पण करने वाला पुरुष निश्चयपूर्वक वैकुण्ठधाम में प्रतिष्ठित होता है। फिर, जहाँ की उत्तम प्रजाएँ हों, जहाँ की भूमि पकी हुई खेतियों से लहलहा रही हो, अनेक प्रकार की पुष्करिणियों से संयुक्त हो तथा फल वाले वृक्ष और लताएँ जिसकी शोभा बढ़ा रही हों, ऐसा श्रेष्ठ नगर जो पुरुष भारतवर्ष में ब्राह्मण को दान करता है, वह बहुत लंबे समय पर्यन्त वैकुण्ठधाम में सुप्रतिष्ठित होता है। फिर भारतवर्ष में उत्तम जन्म पाकर राजेश्वर होता है। उसे लाखों नगरों का प्रभुत्व प्राप्त होता है। इसमें संशय नहीं है।  निश्चितरूप से सम्पूर्ण ऐश्वर्य भूमण्डल पर उसके पास विराजमान रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्यन्त उत्तम अथवा मध्यम श्रेणी का भी नगर प्रजाओं से सम्पन्न हो, वापी, तड़ाग तथा भाँति-भाँति के वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हों, ऐसे सौ नगर ब्राह्मण को दान करने वाला पुण्यात्मा वैकुण्ठलोक में सुप्रतिष्ठित होता है। जैसे इन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर स्वर्गलोक में शोभा पाते हैं, वैसे ही भूमण्डल पर उस पुरुष की शोभा होती है।  दीर्घ काल तक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती। वह महान सम्राट् होता है। अपना सम्पूर्ण अधिकार ब्राह्मण को देने वाला पुरुष चौगुने फल का भागी होता है; इसमें संशय नहीं है। पतिव्रते! जो पुरुष ब्राह्मण को जम्बूद्वीप का दान करता है, उसे निश्चितरूप से सौगुने फल प्राप्त होते हैं।  जो सातों द्वीपों की पृथ्वी का दान करने वाले, सम्पूर्ण तीर्थों में निवास करने वाले, समस्त तपस्याओं में संलग्न, सम्पूर्ण उपवास-व्रत के पालक, सर्वस्व दान करने वाले तथा सम्पूर्ण सिद्धियों के पारगंत तथा श्रीहरि के भक्त हैं, उन्हें पुन: जगत् में जन्म धारण करना नहीं पड़ता।  उनके सामने असंख्य ब्रह्माओं का पतन हो जाता है, परंतु वे श्रीहरि के गोलोक या वैकुण्ठधाम में निवास करते रहते हैं। विष्णु-मन्त्र की उपासना करने वाले पुरुष अपने मानव शरीर का त्याग करने के पश्चात जन्म, मृत्यु एवं जरा से रहित दिव्य रूप धारण करे श्रीहरि का सारूप्य पाकर उनकी सेवा में संलग्न हो जाते हैं। देवता, सिद्ध तथा अखिल विश्व- ये सब-के-सब समयानुसार नष्ट हो जाते हैं, किंतु श्रीकृष्णभक्तों का कभी नाश नहीं होता।  जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था उनके निकट नहीं आ सकती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो पुरुष [[कार्तिक मास]] में श्रीहरि को [[तुलसी]] अर्पण करता है, वह पत्र-संख्याके बराबर युगों तक भगवान् के धाम में विराजमान होता है। फिर उत्तम कुल में उसका जन्म होता और निश्चितरूप से भगवान् के प्रति उसके मन में भक्ति उत्पन्न होती है, वह भारत मं सुखी एवं चिरञ्चीवी होता है। जो कार्तिक में श्रीहरि को घीका दीप देता है, वह जितने पल दीपक जलता है, उतने वर्षों तक हरिधाम में आनन्द भोगता है।  फिर अपनी योनि में आकर विष्णुभक्ति पाता है; महाधनवान् नेत्र की ज्योति से युक्त तथा दीप्तिमान् होता है। जो पुरुष माघ में अरुणोदय के समय प्रयाग की [[गंगा]] में स्नान करता है, उसे दीर्घकाल तक भगवान् श्रीहरि के मन्दिर में आनन्द लाभ करने का सुअवसर मिलता है। फिर वह उत्तम योनि में आकर भगवान् श्रीहरि की भक्ति एवं मन्त्र पाता है; भारत में जितेन्द्रियशिरोमणि होता है। पुन: यथा समय मानव-शरीर को त्यागकर 'भगवद्धाम' में जाता है। वहाँ से पुन: पृथ्वीतल पर आने की स्थिति उसके सामने नहीं आती। भगवान् का सारूप्य प्राप्त कर वह उन्हीं की सेवा में सदा लगा रहता है। गंगा में सर्वदा स्नान करने वाला पुरुष सूर्य की भाँति भूमण्डल पर पवित्र माना जाता है। उसे पद-पदपर [[अश्वमेध यज्ञ]] का फल प्राप्त होता है, यह निश्चित है। उसकी चरण-रज से पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। वह वैकुण्ठलोक में सुखपूर्वक निवास करता है। उस तेजस्वी पुरुष को जीवन्मुक्त कहना चाहिये।  सम्पूर्ण तपस्वी उसका आदर करते हैं। जो पुरुष मीन और कर्क के मध्यवर्तीकाल में भारतवर्ष में सुवासित जल का दान करता है, वह वैकुण्ठ में आनन्द भोगता रहता है। फिर उत्तम योनि में जन्म पाकर रूपवान्, सुखी, शिवभक्त, तेजस्वी तथा [[वेद]] और [[वेदांग]] का पारगामी विद्वान् होता है।  [[वैशाख मास]] में ब्राह्मण को सत्तू दान करने वाला पुरुष सत्तूकण के बराबर वर्षों तक विष्णु मन्दिर में प्रतिष्ठित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===व्रत===&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में रहने वाला जो प्राणी श्री [[कृष्ण जन्माष्टमी]] का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं है। वह दीर्घकाल तक वैकुण्ठलोक में आनन्द भोगता है। फिर उत्तम योनि में जन्म लेने पर उसे भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाती है- यह निश्चित है।  इस भारतवर्ष में ही शिवरात्रि का व्रत करने वाला पुरुष दीर्घकाल तक शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो शिवरात्रि के दिन भगवान् शंकर को बिल्वपत्र चढ़ाता है, वह पत्र-संख्या के बराबर युगों तक कैलास में सुखपूर्वक वास करता है। पुन: श्रेष्ठ योनि में जन्म लेकर भगवान् शिव का परम भक्त होता है। विद्या, पुत्र, सम्पत्ति, प्रजा और भूमि- ये सभी उसके लिये सुलभ रहते हैं। जो व्रती पुरुष जैत्र अथवा [[माघ मास]] में शंकर की पूजा करता है तथा बेंत लेकर उनके सम्मुख रात-दिन भक्ति पूर्वक नृत्य करने में तत्पर रहता है, वह चाहे एक मास, आधा मास, दस दिन, सात दिन अथवा दो ही दिन या एक ही दिन ऐसा क्यों न करे, उसे दिन की संख्या के बराबर युगों तक भगवान् शिव के लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साध्वि! जो मनुष्य भारत में [[रामनवमी]] का व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरों तक विष्णुधाम में आनन्द का अनुभव करता है, फिर अपनी योनि में आकर रामभक्ति पाता और जितेन्द्रियशिरोमणि होता है।  जो पुरुष भगवती की शरत्कालीन महापूजा करता है; साथ ही नृत्य, गीत तथा वाद्य आदि के द्वारा नाना प्रकार के उत्सव मनाता है, वह पुरुष भगवान् शिव के लोक में प्रतिष्ठित होता है।  फिर श्रेष्ठ योनि में जन्म पाकर वह निर्मल बुद्धि पाता है। अतुल सम्पत्ति, पुत्र-पौत्रों की अभिवृद्धि, महान प्रभाव तथा हाथी-घोड़े आदि वाहन- ये सभी उसे प्राप्त हो जाते हैं। वह राजराजेश्वर भी होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। जो पुरुष पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में रहकर [[भाद्रपद मास]] की शुक्लाष्टमी के अवसर पर एक पक्ष तक नित्य भक्ति-भाव से महालक्ष्मी जी की उपासना करता है, सोलह प्रकार के उत्तम उपचारों से भलीभाँति पूजा करने में संलग्र रहता है, वह वैकुण्ठधाम में रहने का अधिकारी होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में कार्तिक की पूर्णिमा के अवसर पर सैकड़ों गोप एवं गोपियों को साथ लेकर रासमण्डल सम्बन्धी उत्सव मनाने की बड़ी महिमा है।  उस दिन पाषाणमयी प्रतिमा में सोलह प्रकार के उपचारों द्वारा श्री[[राधा]]-कृष्ण की पूजा करे।  इस पुण्यमय कार्य को सम्पन्न करने वाला पुरुष गोलोक में वास करता है और भगवान् श्रीकृष्ण का परम भक्त बनता है। उसकी भक्ति क्रमश: वृद्धि को प्राप्त होती है। वह सदा भगवान् श्रीहरि का मन्त्र जपता है। वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त करके उनका प्रमुख पार्षद होता है। जरा और मृत्यु को जीतने वाले उस पुरुष का पुन: वहाँ से पतन नहीं होता।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जो पुरुष शुक्ल अथवा कृष्ण-पक्ष की एकादशी का व्रत करता है, उसे वैकुण्ठ से रहने की सुविधा प्राप्त होती है। फिर भारतवर्ष में आकर वह भगवान् श्रीकृष्ण का अनन्य उपासक होता है। क्रमश: भगवान् श्रीहरि के प्रति उसकी भक्ति सुदृढ़ होती जाती है। शरीर त्यागने के बाद पुन: गोलोक में जाकर वह भगवान् श्रीकृष्ण का सारूप्य प्राप्त करके उनका पार्षद बन जाता है। पुन: उसका संसार में आना नहीं होता।  जो पुरुष भाद्रपदमास की शुक्ल द्वादशी तिथि के दिन इन्द्र की पूजा करता है, वह सम्मानित होता है। जो प्राणी भारतवर्ष में रहकर रविवार, संक्रान्ति अथवा शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को भगवान् सूर्य की पूजा करके हविष्यान्न भोजन करता है, वह सूर्यलोक में विराजमान होता है। फिर भारतवर्ष में जन्म पाकर आरोग्यवान् और धनाढय पुरुष होता है। ज्येष्ठ महीने की कृष्ण-चतुर्दशी के दिन जो व्यक्ति भगवती सावित्री की पूजा करता है, वह ब्रह्मा के लोक में प्रतिष्ठित होता है। फिर वह पृथ्वी पर आकर श्रीमान् एवं अतुल पराक्रमी पुरुष होता है। साथ ही वह चिरंजीवी, ज्ञानी और वैभव सम्पन्न होता है। जो मानव माघमास के शुक्लपक्ष की पञ्चमी तिथि के दिन संयमपूर्वक उत्तम भक्ति के साथ षोडशोपचार से [[सरस्वती देवी|भगवती सरस्वती]] की अर्चना करता है, वह वैकुण्ठधाम में स्थान पाता है। जो भारतवासी व्यक्ति जीवनभर भक्ति के साथ नित्यप्रति ब्राह्मण को गौ और सुवर्ण आदि प्रदान करता है, वह वैकुण्ठ में सुख भोगता है। भारतवर्ष में जो प्राणी ब्राह्मणों को मिष्टान्न भोजन कराता है, वह ब्राह्मण की रोम संख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो भारतवासी व्यक्ति भगवान् श्रीहरि के नामका स्वयं कीर्तन करता है अथवा दूसरे को कीर्तन करने के लिये उत्साहित करता है, वह नाम-संख्या के बराबर युगों तक वैकुण्ठ में विराजमान होता हैं यदि नारायण क्षेत्र में नामोच्चारण किया जाय तो करोड़ों गुना अधिक फल मिलता है। जो पुरुष नारायण क्षेत्र में भगवान् श्रीहरि के नाम का एक करोड़ जप करता है, वह सम्पूर्ण पापों से छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है- यह ध्रुव सत्य है। वह पुन: जन्म न पाकर विष्णुलोक में विराजमान होता है&amp;lt;ref&amp;gt;नाम्रां कोटिं हरेर्यो हि क्षेत्रे नारायणे जपेत्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वपापविनिर्मुक्तो जीवन्मुक्तो भवेद्ध्रुवम्। लभते न पुनर्जन्म वैकुण्ठे स महीयते॥  (प्रकृतिखण्ड 27। 110-111)&amp;lt;/ref&amp;gt;। उसे भगवान् सारूप्य प्राप्त हो जाता है। वहाँ से फिर गिर नहीं सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो पुरुष प्रतिदिन पार्थिव मूर्ति बनाकर [[शिवलिंग]] की अर्चना करता है और जीवन भर इस नियम का पालन करता है, वह भगवान शिव के धाम में जाता है और लंबे समय तक शिवलोक में प्रतिष्ठित रहता है; तत्पश्चात भारतवर्ष में आकर राजेन्द्रपद को सुशोभित करता है। निरन्तर शालिग्राम की पूजा करके उनका चरणोदक पान करने वाला पुण्यात्मा पुरुष अति दीर्घकाल पर्यन्त वैकुण्ठ में विराजमान होता है। उसे दुर्लभ भक्ति सुलभ हो जाती है। संसार में उसका पुन: आना नहीं होता। जिसके द्वारा सम्पूर्ण तप और व्रत का पालन होता है, वह पुरुष इन सत्कर्मों के फलस्वरूप वैकुण्ठ में रहने का अधिकार पाता हैं पुन: उसे जन्म नहीं लेना पड़ता। जो सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करके पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता है, उसे निर्वाणपद मिल जाता है। पुन: संसार में उसकी उत्पत्ति नहीं होती। &lt;br /&gt;
===यज्ञ===&lt;br /&gt;
भारत-जैसे पुण्यक्षेत्र में जो अश्वमेधयज्ञ करता है, वह दीर्घकाल तक इन्द्र के आधे आसन पर विराजमान रहता है। राजसूय यज्ञ करने से मनुष्य को इससे चौगुना फल मिलता है। सुन्दरि! सम्पूर्ण यज्ञों से भगवान् विष्णु का यज्ञ श्रेष्ठ कहा गया है।  [[ब्रह्मा]] ने पूर्वकाल में बड़े समारोह के साथ इस यज्ञ का अनुष्ठान किया था।  पतिव्रते! उसी यज्ञ में दक्ष प्रजापति और शंकर में कलह मच गया था।  ब्राह्मणों ने क्रोध में आकर नन्दी को शाप दिया था और नन्दी ने ब्राह्मणों को।  यही कारण है कि भगवान् शंकर ने [[दक्ष]] के यज्ञ को नष्ट कर डाला।  पूर्वकाल में दक्ष, धर्म, कश्यप, [[शेषनाग]], कर्दममुनि, स्वायम्भुवमनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, [[कपिल]] तथा [[ध्रुव]] ने विष्णुयज्ञ किया था।  उसके अनुष्ठान से हजारों राजसूय यज्ञों का फल निश्चितरूप से मिल जाता है।  वह पुरुष अवश्य ही अनेक कल्पों तक जीवन धारण करने वाला तथा जीवन्मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भामिनि! जिस प्रकार देवताओं में विष्णु, वैष्णवपुरुषों में शिव, शास्त्रों में वेद, वर्णों में ब्राह्मण, तीर्थों में गंगा, पुण्यात्मा पुरुषों में वैष्णव, व्रतों में एकादशी, पुष्पों में तुलसी, नक्षत्रों में चन्द्रमा, पक्षियों में गरुड़, स्त्रियों में भगवती मूलप्रकृति राधा, आधारों में वसुन्धरा, चंचल स्वभाववाली इन्दियों में मन, प्रजापतियों में ब्रह्मा, प्रजेश्वरों में प्रजापति, वनों में [[वृन्दावन]], वर्षों में भारतवर्ष, श्रीमानों में [[लक्ष्मी]], विद्वानों में [[सरस्वती देवी]], पतिव्रताओं में भगवती [[दुर्गा]] और सौभाग्यवती श्रीकृष्ण पत्नियों में श्रीराधा सर्वोपरि मानी जाती हैं; उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञों में विष्णुयज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। सम्पूर्ण तीर्थों का स्नान, अखिल यज्ञों की दीक्षा तथा व्रतों एवं तपस्याओं और चारों वेदों के पाठ का तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा का फल अन्त में यही है कि भगवान् श्रीकृष्ण की मुक्तिदायिनी सेवा सुलभ हो। पुराणों, वेदों और इतिहास में सर्वत्र श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की अर्चना को ही सारभूत माना गया है। भगवान् के स्वरूप का वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम और गुणों का कीर्तन, स्तोत्रों का पाठ, नमस्कार, जप, उनका चरणोदक और नैवेद्य ग्रहण करना- यह नित्यका परम कर्तव्य है। साध्वि! इसे सभी चाहते हैं और सर्वसम्मति से यही सिद्ध भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वत्से! अब तुम प्रकृति से परे तथा प्राकृत गुणों से रहित परब्रह्म श्रीकृष्ण की निरन्तर उपासना करो।  मैं तुम्हारे पतिदेव को लौटा देता हूँ। इन्हें लो और सुखपूर्वक अपने घर को जाओ। मनुष्यों का यह मगंलमय कर्म-विपाक मैंने तुमको सुना दिया। यह प्रसंग सर्वेप्सित, सर्वसम्मत तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाला है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान् नारायण कहते हैं- नारद! धर्मराज के मुख से उपर्युक्त वर्णन सुनकर सावित्री की आँखों में आनन्द के आँसू छलक पड़े। उसका शरीर पुलकायमान हो गया।  उसने पुन: धर्मराज से कहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सावित्री बोली'''- धर्मराज! वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ प्रभो! मैं किस विधि से प्रकृति से भी पर भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करूँ, यह बताइये। भगवन्! मैं आपके द्वारा मनुष्यों के मनोहर शुभकर्म का विपाक सुन चुकी। अब आप मुझे अशुभकर्म विपाक की व्याख्या सुनाने की कृपा करें। &lt;br /&gt;
===धर्मराज की स्तुति===&lt;br /&gt;
ब्रह्मन्! सती सावित्री इस प्रकार कहकर फिर भक्ति से अत्यन्त नम्र हो वेदोक्त स्तुति का पाठ करके धर्मराज की स्तुति करने लगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सावित्री ने कहा'''- प्राचीनकाल की बात है, महाभाग सूर्य ने पुष्कर में तपस्या के द्वारा धर्म की आराधना की। तब धर्म के अंशभूत जिन्हें पुत्ररूप में प्राप्त किया, उन भगवान् धर्मराज को मैं प्रमाण करती हूँ। जो सबके साक्षी हैं, जिनकी सम्पूर्ण भूतों में समता है, अतएव जिनका नाम शमन है, उन भगवान् शमन को मैं प्रणाम करती हूँ। जो कर्मानुरूप काल के सहयोग से विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों का अन्त करते हैं, उन भगवान् कृतान्त को मैं प्रणाम करती हूँ। जो पापीजनों को शुद्ध करने के निमित्त दण्डनीय के लिये ही हाथ में दण्ड धारण करते हैं तथा जो समस्त कर्मों के उपदेशक हैं, उन भगवान् दण्डधर को मेरा प्रणाम है। जो विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों का तथा उनकी समूची आयु का निरन्तर परिगणन करते रहते हैं, जिनकी गति को रोक देना अत्यन्त कठिन है, उन भगवान् काल को मैं प्रणाम करती हूँ।  जो तपस्वी, वैष्णव, धर्मात्मा, देने को उद्यत हैं, उन भगवान् यम को मैं प्रणाम करती हूँ। जो अपनी आत्मा में रमण करने वाले, सर्वज्ञ, पुण्यात्मा पुरुषों के मित्र तथा पापियों के लिये कष्टप्रद हैं, उन 'पुण्यमित्र' नाम से प्रसिद्ध भगवान् धर्मराज को मैं प्रणाम करती हूँ। जिनका जन्म ब्रह्माजी के वंश में हुआ है तथा जो ब्रह्मतेज से सदा प्रज्वलित रहते हैं एवं जिनके द्वारा परब्रह्म का सतत ध्यान होता रहता है, उन ब्रह्मवंशी भगवान् धर्मराज को मेरा प्रणाम है।&amp;lt;ref&amp;gt;तपसा धर्ममाराध्य पुष्करे भास्कर: पुरा । धर्माशं यं सुतं प्राप धर्मराजं नमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समता सर्वभूतेषु यस्य सर्वस्य साक्षिण: । अतो यन्नाम शमन इति तं प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येनान्तश्च कृतो विश्वे सर्वेषां जीविनां परम्। कर्मानुरूपकालेन तं कृतान्तं नमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिभर्ति दण्डं दण्डाय पापिनां शुद्धिहेतवे । नमामि तं दण्डधरं य: शास्ता सर्वकर्मणाम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वं य: कलयत्येव सर्वायुश्चापि सन्ततम्। अतीव दुर्निवार्यं च तं कालं प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपस्वी वैष्णवो धर्मी संयमी संजितेन्द्रिय:। जीविनां कर्मफलदं तं यमं प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वात्मारामश्च सर्वज्ञो मित्रं पुण्यकृतां भवेत्। पापिनां क्लेशदो यश्च पुण्यमित्रं नमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यज्जन्म ब्रह्मणो वंशे ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा । यो ध्यायति परं ब्रह्म ब्रह्मवंशं नमाम्यहम्॥(प्रकृतिखण्ड 28 । 8-15)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुने! इस प्रकार प्रार्थना करके सावित्री ने धर्मराज को प्रणाम किया।  तब धर्मराज ने सावित्री को विष्णु-भजन तथा कर्म के विपाक का प्रसंग सुनाया।  जो मनुष्य प्रात: उठकर निरन्तर इस 'यमाष्टक' का पाठ करता है, उसे यमराज से भय नहीं होता और उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि महान पापी व्यक्ति भी भक्ति से सम्पन्न होकर निरन्तर इसका पाठ करता है तो यमराज अपने कायव्यूह से निश्चित ही उसकी शुद्धि कर देते हैं। (अध्याय 27-28)&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0&amp;diff=6005</id>
		<title>सावित्री धर्मराज के प्रश्नोत्तर</title>
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		<updated>2010-03-14T17:29:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==सावित्री धर्मराज के प्रश्नोत्तर / Savitri Dharmraj Discussion==&lt;br /&gt;
====सावित्री-धर्मराज के प्रश्नोत्तर, सावित्री को वरदान====&lt;br /&gt;
'''([[ब्रह्म वैवर्त पुराण]])'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान् नारायण कहते हैं- नारद! सावित्री के वचन सुनकर यमराज के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।  वे हँसकर प्राणियों के कर्मविपाक कहने के लिये उद्यत हो गये।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''धर्मराज ने कहा'''- प्यारी बेटी! अभी तुम हो तो अल्प वय की बालिका, किंतु तुम्हें पूर्ण विद्वानों, ज्ञानियों और योगियों से भी बढ़कर ज्ञान प्राप्त है। पुत्री! भगवती सावित्री के वरदान से तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम उन देवी की कला हो। राजा ने तपस्या के प्रभाव से सावित्री-जैसी कन्यारत्न को प्राप्त किया है।  जिस प्रकार [[लक्ष्मी]] भगवान् विष्णु के, [[दुर्गा|भवानी]] [[शंकर]] के, [[राधा]] श्री[[कृष्ण]] के, [[सावित्री]] [[ब्रह्मा]] के, मूर्ति धर्म के, [[स्वायंभुव|शतरूपा]] मनु के, देवहूति कर्दम के, [[अरून्धती]] [[वसिष्ठ]] के, [[अदिति]] [[कश्यप]] के, [[अहिल्या]] [[गौतम]] के, [[शची]] [[इन्द्र]] के, [[रोहिणी]] [[चन्द्र|चन्द्रमा]] के, [[रति]] [[कामदेव]] के, [[स्वाहा]] [[अग्नि]] के, स्वधा पितरों के, [[संज्ञा]] [[सूर्य]] के, [[वरूणानी]] [[वरूण]] के, दक्षिण यज्ञ के, [[पृथ्वी]] [[वाराह]] के और [[देवसेना]] [[कार्तिकेय]] के पास सौभाग्यवती प्रिया बनकर शोभा पाती हैं, तुम भी वैसी ही सत्यवान् की प्रिया बनो। मैंने यह तुम्हें वर दे दिया। महाभागे! इसके अतिरिक्त भी जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह वर माँगो। मैं तुम्हें सभी अभिलाषित वर देने को तैयार हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सावित्री बोली'''- महाभाग! सत्यवान् के औरस अंश से मुझे सौ पुत्र प्राप्त हों- यही मेरा अभिलषित वर है। साथ ही, मेरे पिता भी सौ पुत्रों के जनक हों।  मेरे श्वशुर को नेत्र-लाभ हों और उन्हें पुन: राज्यश्री प्राप्त हो जाय, यह भी मैं चाहती हूँ। जगत्प्रभो! सत्यवान् के साथ मैं बहुत लंबे समय तक रहकर अन्त में भगवान् श्रीहरि के धाम में चली जाऊँ, यह वर भी देने की आप कृपा करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभो! मुझे जीव के कर्मका विपाक तथा विश्वसे तर जाने का उपाय भी सुनने के लिये मनमें महान कौतूहल हो रहा है; अत: आप यह भी बतावें।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''धर्मराज ने कहा'''- महासाध्वि! तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे। अब में प्राणियों का कर्म-विपाक कहता हूँ, सुनो। भारतवर्ष में ही शुभ-अशुभ कर्मों का जन्म होता है- यहीं के कर्मों को 'शुभ' या 'अशुभ' की संज्ञा  दी गयी है। यहाँ सर्वत्र पुण्यक्षेत्र है, अन्यत्र नहीं; अन्यत्र प्राणी केवल कर्मों का फल भोगते हैं।  पतिव्रते! देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा मनुष्य- ये सभी कर्म के फल भोगते हैं। परंतु सबका जीवन समान नहीं है।  उनमें से मानव ही कर्म का जनक होता है अर्थात् मनुष्ययोनिमें ही शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं; जिनका फल सर्वत्र सभी योनियों में भोगना पड़ता है। विशिष्ट जीवधारी- विशेषत: मानव ही सब योनियों में कर्मों का फल भोगते हैं और सभी योनियों में भटकते हैं। वे पूर्व-जन्म का किया हुआ शुभाशुभ कर्म भोगते हैं। शुभ कर्म के प्रभाव से वे स्वर्गलोक में जाते हैं और अशुभ कर्म से उन्हें नरक में भटकना पड़ता है। कर्म का निर्मूलन हो जाने पर मुक्ति होती है। साध्वि! मुक्ति दो प्रकार की बतलायी गयी है- एक निर्वाणस्वरूपा और दूसरी परमात्मा श्रीकृष्ण की सेवारूपा। बुरे कर्म से प्राणी रोगी होता है और शुभ कर्म से आरोग्यवान्।  वह अपने शुभाशुभ कर्म के अनुसार दीर्घजीवी, अल्पायु, सुखी एवं दु:खी होता है।  कुत्सित कर्म से ही प्राणी अंगहीन, अंधे-बहरे आदि होते हैं। उत्तम कर्म के फलस्वरूप सिद्धि आदि की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवि! सामान्य बातें बतायी गयीं; अब विशेष बातें सुनो।  सुन्दरि! यह अतिशय दुर्लभ विषय शास्त्रों और [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित है। इसे सबके सामने नहीं कहना चाहिये।  सभी जातियों के लिये भारतवर्ष में मनुष्य का जन्म पाना परम दुर्लभ है। साध्वि! उन सब जातियों में ब्राह्मण श्रेष्ठ माना जाता है। वह समस्त कर्मों में प्रशस्त होता है। भारतवर्ष में विष्णुभक्त ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है। पतिव्रते! वैष्णव के भी दो भेद हैं- सकाम और निष्काम। सकाम वैष्णव कर्म प्रधान होता है और निष्काम वैष्णव केवल भक्त। सकाम वैष्णव कर्मों का फल भोगता है और निष्काम वैष्णव शुभाशुभ भोग के उपद्रव से दूर रहता है।&lt;br /&gt;
===धर्म का पालन=== &lt;br /&gt;
साध्वि! ऐसा निष्काम वैष्णव शरीर त्यागकर भगवान् विष्णु के निरामय पद को प्राप्त कर लेता है। ऐसे निष्काम वैष्णवों का संसार में पुनरागमन नहीं होता।  द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णब्रह्म परमेश्वर हैं।  उनकी उपासना करने वाले भक्तपुरुष अन्त में दिव्य शरीर धारण करके गोलोक में जाते हैं। सकाम वैष्णव पुरुष उच्च वैष्णव लोकों में जाकर समयानुसार पुन: भारतवर्ष में लौट आते हैं। द्विजातियों के कुल में उनका जन्म होता है।  वे भी कालक्रम से निष्काम भक्त बन जाते और भगवान् उन्हें निर्मल भक्ति भी अवश्य देते हैं। वैष्णव ब्राह्मण से  भिन्न जो सकाम मनुष्य हैं, वे विष्णुभक्ति से रहित होने के कारण किसी भी जन्म में विशुद्ध बुद्धि नहीं पा सकते। साध्वि! जो तीर्थस्थान में रहकर सदा तपस्या करते हैं, वे द्विज ब्रह्मा के लोक में जाते हैं और पुण्यभोग के पश्चात पुन: भारतवर्ष में आ जाते हैं। भारत में रहकर अपने कर्तव्य-कर्मों में संलग्न रहने वाले ब्राह्मण तथा सूर्यभक्त शरीर त्यागने पर सूर्यलोक में जाते हैं और पुण्यभोग के पश्चात पुन: भारतवर्ष में जन्म पाते हैं। अपने धर्म में निरत रहकर शिव, शक्ति तथा गणपति की उपासना करने वाले ब्राह्मण शिवलोक में जाते हैं; फिर उन्हें लौटकर भारतवर्ष में आना पड़ता है। जो धर्मरहित होने पर भी निष्कामभाव से श्रीहरि का भजन करते हैं, वे भी भक्ति के बल से श्रीहरि के धाम में चले जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साध्वि! जो अपने धर्म का पालन नहीं करते, वे आचारहीन, कामलोलुप लोग अवश्य ही नरक में जाते हैं। चारों ही वर्ण अपने धर्म में कटिबद्ध रहने पर ही शुभकर्म का फल भोगने के अधिकारी होते हैं।  जो अपना कर्तव्य-कर्म नहीं करते, वे अवश्य ही नरक में जाते हैं। कर्म का फल भोगने के लिये वे भारतवर्ष में नहीं आ सकते। अतएव चारों वर्णों के लिये अपने धर्म का पालन करना अत्यन्त आवश्यक है।&lt;br /&gt;
===निष्कामभाव=== &lt;br /&gt;
अपने धर्म में संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, स्वधर्मनिरत विप्र को अपनी कन्या देने के फलस्वरूप चन्द्रलोक को जाते हैं और वहाँ चौदह मन्वन्तर काल तक रहते हैं।  साध्वि! यदि कन्या को अलंकृत करके दान में दिया तू उससे दुगुना फल प्राप्त होता है। उन साधु पुरुषों में यदि कामना हो तब तो वे चन्द्रमा के लोक में जाते हैं।  निष्कामभाव से दान करें तो वे भगवान् विष्णु के परम धाम में पहुँच जाते हैं।  गव्य (दूध), चाँदी, सुवर्ण, वस्त्र, घृत, फल और जल ब्राह्मणों को देने वाले पुण्यात्मा पुरुष चन्द्रलोक में जाते हैं।  साध्वि! एक मन्वन्तरतक वे वहाँ सुविधापूर्वक निवास करते हैं।  उस दान के प्रभाव से उन्हें वहाँ सुदीर्घ काल तक निवास प्राप्त होता है। पतिव्रते! पवित्र ब्राह्मण को सुवर्ण, गौ और ताम्र आदि द्रव्य का दान करने वाले सत्पुरुष सूर्यलोक में जाते हैं। वे भय-बाधा से शून्य हो, उस विस्तृत लोक में सुदीर्घ काल तक वास करते हैं। जो ब्राह्मणों को [[पृथ्वी]] अथवा प्रचुर धान्य दान करता है, वह भगवान् विष्णु के परम सुन्दर श्वेतद्वीप में जाता है और दीर्घकाल तक वहाँ वास करता है। भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को गृह-दान करने वाले पुरुष स्वर्गलोक में जाते और वहाँ दीर्घकाल तक निवास करते हैं; वे उस लोक में उतने वर्षों तक रहते हैं, जितनी संख्या में उस दान-गृह के रज:कण हैं। मनुष्य जिस-जिस देवता के उद्देश्य से गृह-दान करता है, अन्त में उसी देवता के लोक में जाता है और घर में जितने धूलिकण हैं, उतने वर्षों तक वहाँ रहता है। अपने घर पर दान करने की अपेक्षा देव मन्दिर में दान करने से चौगुना, पूर्तकर्म (वापी, कूप, तड़ाग आदि के निर्माण)- के अवसर पर करने से सौगुना तथा किसी श्रेष्ठ तीर्थस्थान में करने से आठ गुना फल होता है- यह ब्रह्माजी का वचन है।&lt;br /&gt;
===दान, शुभ और अशुभ कर्मों का फल===&lt;br /&gt;
समस्त प्राणियों के उपकार के लिये तड़ाग का दान करने वाला दस हजार वर्षों की अवधि लेकर जनलोक में जाता है। बावली का दान करने से मनुष्य को सदा सौगुना फल मिलता है।  वह सेतु (पुल)- का दान करने पर तड़ाग के दान का भी पुण्यफल प्राप्त कर लेता है। तड़ाग का प्रमाण चार हजार धनुष चौड़ा और उतना ही लंबा निश्चित किया गया है। इससे जो लघु प्रमाण में है, वह वापी कही जाती है। सत्पात्र को दी हुई कन्या दस वापी के समान पुण्यप्रदा होती है। यदि उस कन्या को अलंकृत करके दान किया जाय तो दुगुना फल मिलता है। तड़ाग के दान से जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही उसके भीतर से कीचड़ और मिट्टी निकालने से सुलभ हो जाता है। वापी के कीचड़ को दूर कराने से उसके निर्माण कराने-जितना फल होता है। पतिव्रते! जो पुरुष पीपल का वृक्षा लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह हजारों वर्षों के लिये भगवान् विष्णु के तपोलोक में जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सावित्री! जो सबकी भलाई के लिये पुष्पोद्यान लगाता है, वह दस हजार वर्षों तक ध्रुवलोक में स्थान पाता है। पतिव्रते! विष्णु के उद्देश्य से विमान का दान करने वाला मानव एक मन्वन्तरतक विष्णुलोक में वास करता है। यदि वह विमान विशाल और चित्रों से सुसज्जित किया गया हो तो उसके दान से चौगुना फल प्राप्त होता है। शिविका-दान में उससे आधा फल होना निश्चित है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरि के उद्देश्य से मन्दिराकार झूला दान करता है, वह अति दीर्घकाल तक भगवान् विष्णु के लोक में वास करता है। पतिव्रते! जो सड़क बनवाता और उसके किनारे लोगों के ठहरने के लिये महल (धर्मशाला) बनवा देता है, वह सत्पुरुष हजारों वर्षों तक इन्द्र के लोक में प्रतिष्ठित होता है। ब्राह्मणों अथवा देवताओं को दिया हुआ दान समान फल प्रदान करता है। जो पूर्वजन्म में दिया गया है, वही जन्मान्तर में प्राप्त होता है। जो नहीं दिया गया है, वह कैसे प्राप्त हो सकता है? पुण्यवान् पुरुष स्वर्गीय सुख भोगकर भारतवर्ष में जन्म पाता है। उसे क्रमश: उत्तम-से-उत्तम ब्राह्मण-कुल में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त होता है।  पुण्यवान् ब्राह्मण स्वर्गसुख भोगने के अनन्तर पुन: ब्राह्मण ही होता है। यही नियम क्षत्रिय आदि के लिये भी है। क्षत्रिय अथवा वैश्य तपस्या के प्रभाव से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है- ऐसी बात श्रुति में सुनी जाती है। धर्मरहित ब्राह्मण नाना योनियों में भटकते हैं और कर्मभोग के पश्चात फिर ब्राह्मणकुल में ही जन्म पाते हैं।  कितना ही काल क्यों न बीत जाय, बिना भोग किये कर्म क्षीण नहीं हो सकते। अपने किये हुए शुभ और अशुभ कर्मों का फल प्राणियों को अवश्य भोगना पड़ता है। देवता और तीर्थ की सहायता तथा कायव्यूह से प्राणी शुद्ध हो जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साध्वि! ये कुछ बातें तो तुम्हें बतला दीं, अब आगे और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय 26)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मराज की व्याख्या तथा सावित्री द्वारा धर्मराज को प्रणाम-निवेदन==&lt;br /&gt;
'''सावित्री ने कहा'''- धर्मराज! जिस कर्म के प्रभाव से पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्ग अथवा अन्य लोक में जाते हैं, वह मुझे बताने की कृपा करें। &lt;br /&gt;
===दान===&lt;br /&gt;
'''धर्मराज बोले'''- पतिव्रते! ब्राह्मण को अन्न दान करने वाला पुरुष इन्द्रलोक में जाता है और दान किये हुए अन्न में जितने दाने होते हैं उतने वर्षों तक वह वहाँ निवास पाता है। अन्नदान से बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा।  इसमें न कभी पात्र की परीक्षा की आवश्यकता होती है और न समय की&amp;lt;ref&amp;gt;अन्नदानात् परं दानं न भूतं न भविष्यति। नात्र पात्रपरीक्षा स्यान्न कालनियम: व्कचित्॥ (प्रकृतिखण्ड 27।3)&amp;lt;/ref&amp;gt;। साध्वि! यदि ब्राह्मणों अथवा देवताओं को आसन दान किया जाय तो हजारों वर्षों तक [[अग्निदेव]] के लोक में रहने की सुविधा प्राप्त हो जाती है। जो पुरुष ब्राह्मण को दूध देने वाली गौ दान करता है, वह गौके शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षों तक वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठित रहता है। यह गोदान साधारण दिनों की अपेक्षा पर्व के समय चौगुना, तीर्थ में सौगुना और नारायण क्षेत्र में कोटिगुना फल देने वाला होता है।  जो मानव भारतवर्ष में रहकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को गौ प्रदान करता है, वह हजारों वर्षों तक चन्द्रलोक में रहने का अधिकारी बन जाता है। दुग्धवती गौ ब्राह्मण को देने वाला पुरुष उसके रोम पर्यन्त वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो ब्राह्मण को वस्त्रसहित [[शालिग्राम]]-शिला का दान करता है, वह चन्द्रमा और सूर्य के स्थितिकाल तक वैकुण्ठ में सम्मान पूर्वक रहता है। ब्राह्मण को सुन्दर स्वच्छ छत्र दान करने वाला व्यक्ति हजारों वर्षों तक वरूण के लोक में आनन्द करता है। साध्वि! जो ब्राह्मण को दो पादुकाएँ प्रदान करता है, उसे दस हजार वर्ष तक वायुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मनोहर दिव्य शय्या ब्राह्मण को देने से दीर्घ काल तक चन्द्रलोक में प्रतिष्ठा होती है। जो देवताओं अथवा ब्राह्मणों को दीप-दान करता है, वह ब्रह्मलोक में वास करता है। उस पुण्य से उसके नेत्रों में ज्योति बनी रहती है तथा वह यमलोक में नहीं जाता।  भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मण को हाथी दान करता है, वह [[इन्द्र]] की आयुपर्यन्त उनके आधे आसन पर विराजमान होता है। ब्राह्मण को घोड़ा देने वाला भारतवासी मनुष्य वरूणलोक में आनन्द करता है। ब्राह्मण को उत्तम शिविका- पालकी प्रदान करने वाला विष्णुलोक में जाता है। जो ब्राह्मण को पंखा तथा सफेद चँवर अर्पण करता है, वह वायुलोक में सम्मान पाता है। जो भारतवर्ष में ब्राह्मण को धान का पर्वत देता है, वह धान के दानों के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। दाता और प्रतिगृहीता दोनों ही वैकुण्ठलोक में चले जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो भारतवर्ष में निरन्तर भगवान् श्रीहरि के नाम का कीर्तन करता है, उस चिरञ्चीवी मनुष्य को देखते ही मृत्यु भाग जाती है। भारतवर्ष में जो विद्वान् मनुष्य पूर्णिमा को रातभर दोलोत्सव मनाने का प्रबन्ध करता है, वह जीवन्मुक्त है। इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह भगवान् [[विष्णु]] के धाम को प्राप्त होता है।  उत्तराफाल्गुनी में उत्सव मनाने से इससे दुगुना फल मिलता है। जो भारतवर्ष में ब्राह्मण को तिलदान करता है, वह तिल के बराबर वर्षों तक विष्णुधाम में सम्मान पाता है। उसके बाद उत्तम योनि में जन्म पाकर चिरजीवी हो सुख भोगता है।  ताँबे के पात्र में तिल रखकर दान करने से दूना फल मिलता है। जो मनुष्य ब्राह्मण को फलयुक्त वृक्ष प्रदान करता है, वह फल के बराबर वर्षों तक इन्द्रलोक में सम्मान पाता है। फिर उत्तम योनि में जन्म पाकर वह सुयोग्य पुत्र प्राप्त करता है। फल वाले वृक्षों के दान की महिमा इससे हजार गुना अधिक बतायी गयी है। अथवा ब्राह्मण को केवल फल का भी दान करने वाला पुरुष दीर्घकाल तक स्वर्ग में वास करके पुन: भारतवर्ष में जन्म पाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
										&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में रहनेवाला जो पुरुष अनेक द्रव्यों से सम्पन्न तथा भाँति-भाँति के धान्यों से भरे-पूरे विशाल भवन ब्राह्मण को दान करता है, वह उसके फलस्वरूप दीर्घकाल तक कुबेर के लोक में वास पाता है। तत्पश्चात उत्तम योनि में जन्म पाकर वह महान धनवान् होता है। साध्वि! हरी-भरी खेती से युक्त सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को अर्पण करने वाला पुरुष निश्चयपूर्वक वैकुण्ठधाम में प्रतिष्ठित होता है। फिर, जहाँ की उत्तम प्रजाएँ हों, जहाँ की भूमि पकी हुई खेतियों से लहलहा रही हो, अनेक प्रकार की पुष्करिणियों से संयुक्त हो तथा फल वाले वृक्ष और लताएँ जिसकी शोभा बढ़ा रही हों, ऐसा श्रेष्ठ नगर जो पुरुष भारतवर्ष में ब्राह्मण को दान करता है, वह बहुत लंबे समय पर्यन्त वैकुण्ठधाम में सुप्रतिष्ठित होता है। फिर भारतवर्ष में उत्तम जन्म पाकर राजेश्वर होता है। उसे लाखों नगरों का प्रभुत्व प्राप्त होता है। इसमें संशय नहीं है।  निश्चितरूप से सम्पूर्ण ऐश्वर्य भूमण्डल पर उसके पास विराजमान रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्यन्त उत्तम अथवा मध्यम श्रेणी का भी नगर प्रजाओं से सम्पन्न हो, वापी, तड़ाग तथा भाँति-भाँति के वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हों, ऐसे सौ नगर ब्राह्मण को दान करने वाला पुण्यात्मा वैकुण्ठलोक में सुप्रतिष्ठित होता है। जैसे इन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर स्वर्गलोक में शोभा पाते हैं, वैसे ही भूमण्डल पर उस पुरुष की शोभा होती है।  दीर्घ काल तक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती। वह महान सम्राट् होता है। अपना सम्पूर्ण अधिकार ब्राह्मण को देने वाला पुरुष चौगुने फल का भागी होता है; इसमें संशय नहीं है। पतिव्रते! जो पुरुष ब्राह्मण को जम्बूद्वीप का दान करता है, उसे निश्चितरूप से सौगुने फल प्राप्त होते हैं।  जो सातों द्वीपों की पृथ्वी का दान करने वाले, सम्पूर्ण तीर्थों में निवास करने वाले, समस्त तपस्याओं में संलग्न, सम्पूर्ण उपवास-व्रत के पालक, सर्वस्व दान करने वाले तथा सम्पूर्ण सिद्धियों के पारगंत तथा श्रीहरि के भक्त हैं, उन्हें पुन: जगत् में जन्म धारण करना नहीं पड़ता।  उनके सामने असंख्य ब्रह्माओं का पतन हो जाता है, परंतु वे श्रीहरि के गोलोक या वैकुण्ठधाम में निवास करते रहते हैं। विष्णु-मन्त्र की उपासना करने वाले पुरुष अपने मानव शरीर का त्याग करने के पश्चात जन्म, मृत्यु एवं जरा से रहित दिव्य रूप धारण करे श्रीहरि का सारूप्य पाकर उनकी सेवा में संलग्न हो जाते हैं। देवता, सिद्ध तथा अखिल विश्व- ये सब-के-सब समयानुसार नष्ट हो जाते हैं, किंतु श्रीकृष्णभक्तों का कभी नाश नहीं होता।  जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था उनके निकट नहीं आ सकती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो पुरुष [[कार्तिक मास]] में श्रीहरि को [[तुलसी]] अर्पण करता है, वह पत्र-संख्याके बराबर युगों तक भगवान् के धाम में विराजमान होता है। फिर उत्तम कुल में उसका जन्म होता और निश्चितरूप से भगवान् के प्रति उसके मन में भक्ति उत्पन्न होती है, वह भारत मं सुखी एवं चिरञ्चीवी होता है। जो कार्तिक में श्रीहरि को घीका दीप देता है, वह जितने पल दीपक जलता है, उतने वर्षों तक हरिधाम में आनन्द भोगता है।  फिर अपनी योनि में आकर विष्णुभक्ति पाता है; महाधनवान् नेत्र की ज्योति से युक्त तथा दीप्तिमान् होता है। जो पुरुष माघ में अरुणोदय के समय प्रयाग की [[गंगा]] में स्नान करता है, उसे दीर्घकाल तक भगवान् श्रीहरि के मन्दिर में आनन्द लाभ करने का सुअवसर मिलता है। फिर वह उत्तम योनि में आकर भगवान् श्रीहरि की भक्ति एवं मन्त्र पाता है; भारत में जितेन्द्रियशिरोमणि होता है। पुन: यथा समय मानव-शरीर को त्यागकर 'भगवद्धाम' में जाता है। वहाँ से पुन: पृथ्वीतल पर आने की स्थिति उसके सामने नहीं आती। भगवान् का सारूप्य प्राप्त कर वह उन्हीं की सेवा में सदा लगा रहता है। गंगा में सर्वदा स्नान करने वाला पुरुष सूर्य की भाँति भूमण्डल पर पवित्र माना जाता है। उसे पद-पदपर [[अश्वमेध यज्ञ]] का फल प्राप्त होता है, यह निश्चित है। उसकी चरण-रज से पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। वह वैकुण्ठलोक में सुखपूर्वक निवास करता है। उस तेजस्वी पुरुष को जीवन्मुक्त कहना चाहिये।  सम्पूर्ण तपस्वी उसका आदर करते हैं। जो पुरुष मीन और कर्क के मध्यवर्तीकाल में भारतवर्ष में सुवासित जल का दान करता है, वह वैकुण्ठ में आनन्द भोगता रहता है। फिर उत्तम योनि में जन्म पाकर रूपवान्, सुखी, शिवभक्त, तेजस्वी तथा [[वेद]] और [[वेदांग]] का पारगामी विद्वान् होता है।  [[वैशाख मास]] में ब्राह्मण को सत्तू दान करने वाला पुरुष सत्तूकण के बराबर वर्षों तक विष्णु मन्दिर में प्रतिष्ठित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===व्रत===&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में रहने वाला जो प्राणी श्री [[कृष्ण जन्माष्टमी]] का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं है। वह दीर्घकाल तक वैकुण्ठलोक में आनन्द भोगता है। फिर उत्तम योनि में जन्म लेने पर उसे भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाती है- यह निश्चित है।  इस भारतवर्ष में ही शिवरात्रि का व्रत करने वाला पुरुष दीर्घकाल तक शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो शिवरात्रि के दिन भगवान् शंकर को बिल्वपत्र चढ़ाता है, वह पत्र-संख्या के बराबर युगों तक कैलास में सुखपूर्वक वास करता है। पुन: श्रेष्ठ योनि में जन्म लेकर भगवान् शिव का परम भक्त होता है। विद्या, पुत्र, सम्पत्ति, प्रजा और भूमि- ये सभी उसके लिये सुलभ रहते हैं। जो व्रती पुरुष जैत्र अथवा [[माघ मास]] में शंकर की पूजा करता है तथा बेंत लेकर उनके सम्मुख रात-दिन भक्ति पूर्वक नृत्य करने में तत्पर रहता है, वह चाहे एक मास, आधा मास, दस दिन, सात दिन अथवा दो ही दिन या एक ही दिन ऐसा क्यों न करे, उसे दिन की संख्या के बराबर युगों तक भगवान् शिव के लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साध्वि! जो मनुष्य भारत में [[रामनवमी]] का व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरों तक विष्णुधाम में आनन्द का अनुभव करता है, फिर अपनी योनि में आकर रामभक्ति पाता और जितेन्द्रियशिरोमणि होता है।  जो पुरुष भगवती की शरत्कालीन महापूजा करता है; साथ ही नृत्य, गीत तथा वाद्य आदि के द्वारा नाना प्रकार के उत्सव मनाता है, वह पुरुष भगवान् शिव के लोक में प्रतिष्ठित होता है।  फिर श्रेष्ठ योनि में जन्म पाकर वह निर्मल बुद्धि पाता है। अतुल सम्पत्ति, पुत्र-पौत्रों की अभिवृद्धि, महान प्रभाव तथा हाथी-घोड़े आदि वाहन- ये सभी उसे प्राप्त हो जाते हैं। वह राजराजेश्वर भी होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। जो पुरुष पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में रहकर [[भाद्रपद मास]] की शुक्लाष्टमी के अवसर पर एक पक्ष तक नित्य भक्ति-भाव से महालक्ष्मी जी की उपासना करता है, सोलह प्रकार के उत्तम उपचारों से भलीभाँति पूजा करने में संलग्र रहता है, वह वैकुण्ठधाम में रहने का अधिकारी होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में कार्तिक की पूर्णिमा के अवसर पर सैकड़ों गोप एवं गोपियों को साथ लेकर रासमण्डल सम्बन्धी उत्सव मनाने की बड़ी महिमा है।  उस दिन पाषाणमयी प्रतिमा में सोलह प्रकार के उपचारों द्वारा श्री[[राधा]]-कृष्ण की पूजा करे।  इस पुण्यमय कार्य को सम्पन्न करने वाला पुरुष गोलोक में वास करता है और भगवान् श्रीकृष्ण का परम भक्त बनता है। उसकी भक्ति क्रमश: वृद्धि को प्राप्त होती है। वह सदा भगवान् श्रीहरि का मन्त्र जपता है। वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त करके उनका प्रमुख पार्षद होता है। जरा और मृत्यु को जीतने वाले उस पुरुष का पुन: वहाँ से पतन नहीं होता।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जो पुरुष शुक्ल अथवा कृष्ण-पक्ष की एकादशी का व्रत करता है, उसे वैकुण्ठ से रहने की सुविधा प्राप्त होती है। फिर भारतवर्ष में आकर वह भगवान् श्रीकृष्ण का अनन्य उपासक होता है। क्रमश: भगवान् श्रीहरि के प्रति उसकी भक्ति सुदृढ़ होती जाती है। शरीर त्यागने के बाद पुन: गोलोक में जाकर वह भगवान् श्रीकृष्ण का सारूप्य प्राप्त करके उनका पार्षद बन जाता है। पुन: उसका संसार में आना नहीं होता।  जो पुरुष भाद्रपदमास की शुक्ल द्वादशी तिथि के दिन इन्द्र की पूजा करता है, वह सम्मानित होता है। जो प्राणी भारतवर्ष में रहकर रविवार, संक्रान्ति अथवा शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को भगवान् सूर्य की पूजा करके हविष्यान्न भोजन करता है, वह सूर्यलोक में विराजमान होता है। फिर भारतवर्ष में जन्म पाकर आरोग्यवान् और धनाढय पुरुष होता है। ज्येष्ठ महीने की कृष्ण-चतुर्दशी के दिन जो व्यक्ति भगवती सावित्री की पूजा करता है, वह ब्रह्मा के लोक में प्रतिष्ठित होता है। फिर वह पृथ्वी पर आकर श्रीमान् एवं अतुल पराक्रमी पुरुष होता है। साथ ही वह चिरंजीवी, ज्ञानी और वैभव सम्पन्न होता है। जो मानव माघमास के शुक्लपक्ष की पञ्चमी तिथि के दिन संयमपूर्वक उत्तम भक्ति के साथ षोडशोपचार से [[सरस्वती देवी|भगवती सरस्वती]] की अर्चना करता है, वह वैकुण्ठधाम में स्थान पाता है। जो भारतवासी व्यक्ति जीवनभर भक्ति के साथ नित्यप्रति ब्राह्मण को गौ और सुवर्ण आदि प्रदान करता है, वह वैकुण्ठ में सुख भोगता है। भारतवर्ष में जो प्राणी ब्राह्मणों को मिष्टान्न भोजन कराता है, वह ब्राह्मण की रोम संख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो भारतवासी व्यक्ति भगवान् श्रीहरि के नामका स्वयं कीर्तन करता है अथवा दूसरे को कीर्तन करने के लिये उत्साहित करता है, वह नाम-संख्या के बराबर युगों तक वैकुण्ठ में विराजमान होता हैं यदि नारायण क्षेत्र में नामोच्चारण किया जाय तो करोड़ों गुना अधिक फल मिलता है। जो पुरुष नारायण क्षेत्र में भगवान् श्रीहरि के नाम का एक करोड़ जप करता है, वह सम्पूर्ण पापों से छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है- यह ध्रुव सत्य है। वह पुन: जन्म न पाकर विष्णुलोक में विराजमान होता है&amp;lt;ref&amp;gt;नाम्रां कोटिं हरेर्यो हि क्षेत्रे नारायणे जपेत्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वपापविनिर्मुक्तो जीवन्मुक्तो भवेद्ध्रुवम्। लभते न पुनर्जन्म वैकुण्ठे स महीयते॥  (प्रकृतिखण्ड 27। 110-111)&amp;lt;/ref&amp;gt;। उसे भगवान् सारूप्य प्राप्त हो जाता है। वहाँ से फिर गिर नहीं सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो पुरुष प्रतिदिन पार्थिव मूर्ति बनाकर [[शिवलिंग]] की अर्चना करता है और जीवन भर इस नियम का पालन करता है, वह भगवान शिव के धाम में जाता है और लंबे समय तक शिवलोक में प्रतिष्ठित रहता है; तत्पश्चात भारतवर्ष में आकर राजेन्द्रपद को सुशोभित करता है। निरन्तर शालिग्राम की पूजा करके उनका चरणोदक पान करने वाला पुण्यात्मा पुरुष अति दीर्घकाल पर्यन्त वैकुण्ठ में विराजमान होता है। उसे दुर्लभ भक्ति सुलभ हो जाती है। संसार में उसका पुन: आना नहीं होता। जिसके द्वारा सम्पूर्ण तप और व्रत का पालन होता है, वह पुरुष इन सत्कर्मों के फलस्वरूप वैकुण्ठ में रहने का अधिकार पाता हैं पुन: उसे जन्म नहीं लेना पड़ता। जो सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करके पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता है, उसे निर्वाणपद मिल जाता है। पुन: संसार में उसकी उत्पत्ति नहीं होती। &lt;br /&gt;
===यज्ञ===&lt;br /&gt;
भारत-जैसे पुण्यक्षेत्र में जो अश्वमेधयज्ञ करता है, वह दीर्घकाल तक इन्द्र के आधे आसन पर विराजमान रहता है। राजसूय यज्ञ करने से मनुष्य को इससे चौगुना फल मिलता है। सुन्दरि! सम्पूर्ण यज्ञों से भगवान् विष्णु का यज्ञ श्रेष्ठ कहा गया है।  [[ब्रह्मा]] ने पूर्वकाल में बड़े समारोह के साथ इस यज्ञ का अनुष्ठान किया था।  पतिव्रते! उसी यज्ञ में दक्ष प्रजापति और शंकर में कलह मच गया था।  ब्राह्मणों ने क्रोध में आकर नन्दी को शाप दिया था और नन्दी ने ब्राह्मणों को।  यही कारण है कि भगवान् शंकर ने [[दक्ष]] के यज्ञ को नष्ट कर डाला।  पूर्वकाल में दक्ष, धर्म, कश्यप, [[शेषनाग]], कर्दममुनि, स्वायम्भुवमनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, [[कपिल]] तथा [[ध्रुव]] ने विष्णुयज्ञ किया था।  उसके अनुष्ठान से हजारों राजसूय यज्ञों का फल निश्चितरूप से मिल जाता है।  वह पुरुष अवश्य ही अनेक कल्पों तक जीवन धारण करने वाला तथा जीवन्मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भामिनि! जिस प्रकार देवताओं में विष्णु, वैष्णवपुरुषों में शिव, शास्त्रों में वेद, वर्णों में ब्राह्मण, तीर्थों में गंगा, पुण्यात्मा पुरुषों में वैष्णव, व्रतों में एकादशी, पुष्पों में तुलसी, नक्षत्रों में चन्द्रमा, पक्षियों में गरुड़, स्त्रियों में भगवती मूलप्रकृति राधा, आधारों में वसुन्धरा, चंचल स्वभाववाली इन्दियों में मन, प्रजापतियों में ब्रह्मा, प्रजेश्वरों में प्रजापति, वनों में [[वृन्दावन]], वर्षों में भारतवर्ष, श्रीमानों में [[लक्ष्मी]], विद्वानों में [[सरस्वती देवी]], पतिव्रताओं में भगवती [[दुर्गा]] और सौभाग्यवती श्रीकृष्ण पत्नियों में श्रीराधा सर्वोपरि मानी जाती हैं; उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञों में विष्णुयज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। सम्पूर्ण तीर्थों का स्नान, अखिल यज्ञों की दीक्षा तथा व्रतों एवं तपस्याओं और चारों वेदों के पाठ का तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा का फल अन्त में यही है कि भगवान् श्रीकृष्ण की मुक्तिदायिनी सेवा सुलभ हो। पुराणों, वेदों और इतिहास में सर्वत्र श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की अर्चना को ही सारभूत माना गया है। भगवान् के स्वरूप का वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम और गुणों का कीर्तन, स्तोत्रों का पाठ, नमस्कार, जप, उनका चरणोदक और नैवेद्य ग्रहण करना- यह नित्यका परम कर्तव्य है। साध्वि! इसे सभी चाहते हैं और सर्वसम्मति से यही सिद्ध भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वत्से! अब तुम प्रकृति से परे तथा प्राकृत गुणों से रहित परब्रह्म श्रीकृष्ण की निरन्तर उपासना करो।  मैं तुम्हारे पतिदेव को लौटा देता हूँ। इन्हें लो और सुखपूर्वक अपने घर को जाओ। मनुष्यों का यह मगंलमय कर्म-विपाक मैंने तुमको सुना दिया। यह प्रसंग सर्वेप्सित, सर्वसम्मत तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाला है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान् नारायण कहते हैं- नारद! धर्मराज के मुख से उपर्युक्त वर्णन सुनकर सावित्री की आँखों में आनन्द के आँसू छलक पड़े। उसका शरीर पुलकायमान हो गया।  उसने पुन: धर्मराज से कहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सावित्री बोली'''- धर्मराज! वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ प्रभो! मैं किस विधि से प्रकृति से भी पर भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करूँ, यह बताइये। भगवन्! मैं आपके द्वारा मनुष्यों के मनोहर शुभकर्म का विपाक सुन चुकी। अब आप मुझे अशुभकर्म विपाक की व्याख्या सुनाने की कृपा करें। &lt;br /&gt;
===धर्मराज की स्तुति===&lt;br /&gt;
ब्रह्मन्! सती सावित्री इस प्रकार कहकर फिर भक्ति से अत्यन्त नम्र हो वेदोक्त स्तुति का पाठ करके धर्मराज की स्तुति करने लगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सावित्री ने कहा'''- प्राचीनकाल की बात है, महाभाग सूर्य ने पुष्कर में तपस्या के द्वारा धर्म की आराधना की। तब धर्म के अंशभूत जिन्हें पुत्ररूप में प्राप्त किया, उन भगवान् धर्मराज को मैं प्रमाण करती हूँ। जो सबके साक्षी हैं, जिनकी सम्पूर्ण भूतों में समता है, अतएव जिनका नाम शमन है, उन भगवान् शमन को मैं प्रणाम करती हूँ। जो कर्मानुरूप काल के सहयोग से विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों का अन्त करते हैं, उन भगवान् कृतान्त को मैं प्रणाम करती हूँ। जो पापीजनों को शुद्ध करने के निमित्त दण्डनीय के लिये ही हाथ में दण्ड धारण करते हैं तथा जो समस्त कर्मों के उपदेशक हैं, उन भगवान् दण्डधर को मेरा प्रणाम है। जो विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों का तथा उनकी समूची आयु का निरन्तर परिगणन करते रहते हैं, जिनकी गति को रोक देना अत्यन्त कठिन है, उन भगवान् काल को मैं प्रणाम करती हूँ।  जो तपस्वी, वैष्णव, धर्मात्मा, देने को उद्यत हैं, उन भगवान् यम को मैं प्रणाम करती हूँ। जो अपनी आत्मा में रमण करने वाले, सर्वज्ञ, पुण्यात्मा पुरुषों के मित्र तथा पापियों के लिये कष्टप्रद हैं, उन 'पुण्यमित्र' नाम से प्रसिद्ध भगवान् धर्मराज को मैं प्रणाम करती हूँ। जिनका जन्म ब्रह्माजी के वंश में हुआ है तथा जो ब्रह्मतेज से सदा प्रज्वलित रहते हैं एवं जिनके द्वारा परब्रह्म का सतत ध्यान होता रहता है, उन ब्रह्मवंशी भगवान् धर्मराज को मेरा प्रणाम है।&amp;lt;ref&amp;gt;तपसा धर्ममाराध्य पुष्करे भास्कर: पुरा । धर्माशं यं सुतं प्राप धर्मराजं नमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समता सर्वभूतेषु यस्य सर्वस्य साक्षिण: । अतो यन्नाम शमन इति तं प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येनान्तश्च कृतो विश्वे सर्वेषां जीविनां परम्। कर्मानुरूपकालेन तं कृतान्तं नमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिभर्ति दण्डं दण्डाय पापिनां शुद्धिहेतवे । नमामि तं दण्डधरं य: शास्ता सर्वकर्मणाम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वं य: कलयत्येव सर्वायुश्चापि सन्ततम्। अतीव दुर्निवार्यं च तं कालं प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपस्वी वैष्णवो धर्मी संयमी संजितेन्द्रिय:। जीविनां कर्मफलदं तं यमं प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वात्मारामश्च सर्वज्ञो मित्रं पुण्यकृतां भवेत्। पापिनां क्लेशदो यश्च पुण्यमित्रं नमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यज्जन्म ब्रह्मणो वंशे ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा । यो ध्यायति परं ब्रह्म ब्रह्मवंशं नमाम्यहम्॥(प्रकृतिखण्ड 28 । 8-15)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुने! इस प्रकार प्रार्थना करके सावित्री ने धर्मराज को प्रणाम किया।  तब धर्मराज ने सावित्री को विष्णु-भजन तथा कर्म के विपाक का प्रसंग सुनाया।  जो मनुष्य प्रात: उठकर निरन्तर इस 'यमाष्टक' का पाठ करता है, उसे यमराज से भय नहीं होता और उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि महान पापी व्यक्ति भी भक्ति से सम्पन्न होकर निरन्तर इसका पाठ करता है तो यमराज अपने कायव्यूह से निश्चित ही उसकी शुद्धि कर देते हैं। (अध्याय 27-28)&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%97&amp;diff=5987</id>
		<title>शेषनाग</title>
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		<updated>2010-03-14T17:29:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==शेषनाग / Sheshnag==&lt;br /&gt;
*शेष नाग स्वर्ण पर्वत पर रहते हैं। शेष नाग के हजार मस्तक हैं। वे नील वस्त्र धारण करते हैं तथा समसत देवी-देवताओं से पूजित हैं। उस पर्वत पर तीन शाखाओं वाला सोने का एक ताल वृक्ष है जो महाप्रभु की ध्वजा का काम करता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड,40।50-53&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेष नाग था। उसने अपनी छली मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की। उसकी इच्छा थी कि वह इस शरीर का त्याग कर दे। भाइयों तथा मां का विमाता (विनता) तथा सौतेले भाइयों [[अरुण]] और [[गरुड़]] के प्रति द्वेष भाव ही उसकी सांसारिक विरक्ति का कारण था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर [[ब्रह्मा]] ने उसे वरदान दिया कि उसकी बुद्धि सदैव धर्म में लगी रहे। साथ ही ब्रह्मा ने उसे आदेश दिया कि वह [[पृथ्वी]] को अपने फन पर संभालकर धारण करे, जिससे कि वह हिलना बंद कर दे तथा स्थिर रह सके। शेष नाग ने इस आदेश का पालन किया। उसके पृथ्वी के नीचे जाते ही सर्पों ने उसके छोटे भाई, [[वासुकि]] का राज्यतिलक कर दिया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;महाभारत, आदिपर्व, अ0 35,36&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=5548</id>
		<title>विश्वामित्र</title>
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		<updated>2010-03-14T17:29:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==महर्षि विश्वामित्र / Vishvamitra==&lt;br /&gt;
*विश्वामित्र राजा [[गाधि]] के पुत्र थे। उन्होंने कई हजार वर्ष राज्य किया और फिर [[पृथ्वी]] की परिक्रमा के लिए निकले। &lt;br /&gt;
*मार्ग में वसिष्ठ का आश्रम था। वसिष्ठ का आतिथ्य ग्रहण कर वे लोग चकित रह गये। वसिष्ठ के पास शबला नामक कामधेनु थी, जिसकी सहायता से उन्होंने अनेक प्रकार के व्यंजनों की व्यवस्था कर समस्त [[अक्षौहिणी]] सेना का अद्भुत सत्कार किया था। विश्वामित्र ने अनेक प्रलोभन देकर वसिष्ठ से शबला को मांगा, किंतु वसिष्ठ देने को तैयार न हुए। तब विश्वामित्र ने बलपूर्वक उस शबला को ले जाने का प्रयास किया। कामधेनु ने यह जानकर कि वसिष्ठ की इच्छा के बिना विश्वामित्र उन्हें अपने सैन्यबल के भय से ले जा रहे हैं, वसिष्ठ की आज्ञा से शक, यवन और कांबोज जाति के अनेक सैनिकों का बार-बार उत्पादन किया। विश्वामित्र के समस्त सैनिक मारे गये और वे स्वयं ही युद्ध करने के लिए उतरे। गौ की हुंकार के साथ उसके शरीर के विभिन्न अंग-प्रत्यंगों से अनेक प्रकार के सैनिक उत्पन्न हुए। विश्वामित्र के सौ पुत्र भी वसिष्ठ से युद्ध करने के लिए बढ़े पर वसिष्ठ ने उन्हें भस्म कर डाला। अत्यंत लज्जित होकर विश्वामित्र ने अपने एक पुत्र को राज्य भार सौंपा और स्वयं [[शिव]] जी की तपस्या में लीन हो गये। शिव के वरदान से उन्होंने [[वेद]], [[उपनिषद]] आदि समस्त विद्या तथा शस्त्र-ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने वसिष्ठ का आश्रम उजाड़ डाला। उनके शस्त्र-प्रयोग से रुष्ट हो वसिष्ठ ने अपना दंड उठाकर विश्वामित्र को चुनौती दी। उनके दंड के सम्मुख विश्वामित्र का क्षात्रबल परास्त हो गया और वे लज्जित होकर ब्राह्मणत्व की उपलब्धि के लिए तपस्या करने चले गये। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ एक हजार वर्ष तक तपस्या की तथा ब्रह्मा ने प्रकट होकर कहा-'हे राजर्षि, तुमने अपने तप से सब लोक जीत लिये हैं।' [[ब्रह्मा]] के मुंह से 'राजर्षि' शब्द सुनकर उन्हें बहुत बुरा लगा और विश्वामित्र ने सोचा कि उनकी तपस्या में अभी भी कुछ कमी है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, बाल कांड,सर्ग 52 1-23, सर्ग 53, 1-25, सर्ग 54,1-23, सर्ग 55, 1-28, सर्ग 56, 1-24, सर्ग 57 श्लोक 1-9,&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मेनका और विश्वामित्र==&lt;br /&gt;
तपस्या करते हुए सबसे पहले [[मेनका]] अप्सरा के माध्यम से विश्वामित्र के जीवन में काम का विघ्न आया। ये सब कुछ छोड़कर मेनका के प्रेम में डूब गये। जब इन्हें होश आया तो इनके मन में पश्चात्ताप का उदय हुआ। ये पुन: कठोर तपस्या में लगे और सिद्ध हो गये। काम के बाद क्रोध ने भी विश्वामित्र को पराजित किया। &lt;br /&gt;
==त्रिशंकु और विश्वामित्र==&lt;br /&gt;
राजा [[त्रिशंकु]] सदेह स्वर्ग जाना चाहते थे। यह प्रकृति के नियमों के विरूद्ध होने के कारण वसिष्ठ जी ने उनका कामनात्मक यज्ञ कराना स्वीकार नहीं किया। विश्वामित्र  के तप का तेज उस समय सर्वाधिक था। त्रिशंकु विश्वामित्र के पास गये। वसिष्ठ ने पुराने बैर को स्मरण करके विश्वामित्र ने उनका यज्ञ कराना स्वीकार कर लिया। सभी ऋषि इस यज्ञ में आये, किन्तु वसिष्ठ के सौ पुत्र नहीं आये। इस पर क्रोध के वशीभूत होकर विश्वामित्र ने उन्हें मार डाला। अपनी भयंकर भूल का ज्ञान होने पर विश्वामित्र ने पुन: तप किया और क्रोध पर विजय करके ब्रह्मर्षि हुए। सच्ची लगन और सतत उद्योग से सब कुछ सम्भव है, विश्वामित्र ने इसे सिद्ध कर दिया।&lt;br /&gt;
==रामचन्द्र और विश्वामित्र==  &lt;br /&gt;
श्री विश्वामित्र जी को भगवान श्री[[राम]] का दूसरा गुरु होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ये दण्डकारण्य में यज्ञ कर रहे थे। [[रावण]] के द्वारा वहाँ नियुक्त [[ताड़का]] [[सुबाहु]] और [[मारीच]] जैसे- राक्षस इनके यज्ञ में बार-बार विघ्न उपस्थित कर देते थे। विश्वामित्र जी ने अपने तपोबल से जान लिया कि त्रैलोक्य को भय से त्राण दिलाने वाले परब्रह्म श्री[[राम]] का अवतार [[अयोध्या]] में हो गया है। फिर ये अपनी यज्ञ रक्षा के लिये श्री राम को महाराज [[दशरथ]] से माँग ले आये। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा हुई। इन्होंने भगवान श्री राम को अपनी विद्याएँ प्रदान कीं और उनका [[मिथिला]] में श्री [[सीता]] जी से विवाह सम्पन्न कराया। महर्षि विश्वामित्र आजीवन पुरुषार्थ और तपस्या के मूर्तिमान प्रतीक रहे। [[सप्तर्षि|सप्तऋषि]] मण्डल में ये आज भी विद्यमान हैं।&lt;br /&gt;
==क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व==&lt;br /&gt;
पुरुषार्थ, सच्ची लगन, उद्यम और तप की गरिमा के रूप में महर्षि विश्वामित्र के समान शायद ही कोई हो। इन्होंने अपने पुरुषार्थ से, अपनी तपस्या के बल से क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व प्राप्त किया, राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने, देवताओं और ऋषियों के लिये पूज्य बन गये और उन्हें सप्तर्षियों में अन्यतम स्थान प्राप्त हुआ। साथ ही सबके लिये वे वन्दनीय भी बन गये। इनकी अपार महिमा है। &lt;br /&gt;
इन्हें अपनी समाधिजा प्रज्ञा से अनेक मन्त्रस्वरूपों का दर्शन हुआ, इसलिये ये 'मन्त्रद्रष्टा ऋषि' कहलाते हैं। &lt;br /&gt;
*[[ॠग्वेद]] के दस मण्डलों में तृतीय मण्डल, जिसमें 62 सूक्त हैं, इन सभी सूक्तों (मन्त्रों का समूह) के द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र ही हैं। इसीलिये तृतीय मण्डल 'वैश्वामित्र-मण्डल' कहलाता है। इस मण्डल में [[इन्द्र]], [[अदिति]], [[अग्निदेव]], [[उषा]], [[अश्विनीकुमार|अश्विनी]] तथा [[ऋभु]] आदि देवताओं की स्तुतियाँ हैं और अनेक ज्ञान-विज्ञान, अध्यात्म आदि की बातें विस्तृत हैं, अनेक मन्त्रों में गौ-महिमा का वर्णन है। तृतीय मण्डल के साथ ही प्रथम, नवम तथा दशम मण्डल की कतिपय ऋचाओं के द्रष्टा विश्वामित्र के मधुच्छन्दा आदि अनेक पुत्र हुए हैं। &lt;br /&gt;
*वैसे तो [[वेद]] की महिमा अनन्त है ही, किंतु महर्षि विश्वामित्र जी के द्वारा दृष्ट यह तृतीय मण्डल विशेष महत्त्व का है, क्योंकि इसी तृतीय मण्डल में ब्रह्म-[[गायत्री]] का जो मूल मन्त्र है, वह उपलब्ध होता है। इस ब्रह्म-गायत्री-मन्त्र के मुख्य द्रष्टा तथा उपदेष्टा आचार्य महर्षि विश्वामित्र ही हैं। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल के 62वें सूक्त का दसवाँ मन्त्र 'गायत्री-मन्त्र' के नाम से विख्यात है, जो इस प्रकार है-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्॥'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यदि महर्षि विश्वामित्र न होते तो यह मन्त्र हमें उपलब्ध न होता, उन्हीं की कृपा से, साधना से यह गायत्री-मन्त्र प्राप्त हुआ है। यह मन्त्र सभी वेदमन्त्रों का मूल है- बीज है, इसी से सभी मन्त्रों का प्रादुर्भाव हुआ। इसीलिये गायत्री को 'वेदमाता' कहा जाता है। यह मन्त्र सनातन परम्परा के जीवन में किस तरह अनुस्यूत है तथा इसकी कितनी महिमा है, यह तो स्वानुभव-सिद्ध है। [[उपनयन]]-संस्कार में गुरुमुख द्वारा इसी मन्त्र के उपदेश से द्विजत्व प्राप्त होता है और नित्य-सन्ध्याकर्म में मुख्य रूप से प्राणायाम, सूर्योपस्थान आदि द्वारा गायत्री-मन्त्र के जप की सिद्धि में ही सहायता प्राप्त होती है। इस प्रकार यह गायत्री-मन्त्र महर्षि विश्वामित्र की ही देन है और वे इसके आदि आचार्य हैं। अत: गायत्री-उपासना में इनकी कृपा प्राप्त करना भी आवश्यक है। इन्होंने गायत्री-साधना तथा दीर्घकालीन संध्योपासना की तप:शक्ति से काम-क्रोधादि विकारों पर विजय प्राप्त की और ये तपस्या के आदर्श बन गये। &lt;br /&gt;
*महर्षि ने केवल वैदिक मन्त्रों के माध्यम से ही गायत्री-उपासना पर बल दिया, अपितु उन्होंने अन्य जिन ग्रन्थों का प्रणयन किया, उनमें भी मुख्य रूप से गायत्री-साधना का ही उपदेश प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
#'विश्वामित्रकल्प,' &lt;br /&gt;
#'विश्वामित्रसंहिता' तथा &lt;br /&gt;
#'विश्वामित्रस्मृति' आदि उनके मुख्य ग्रन्थ हैं। इनमें भी सर्वत्र गायत्री देवी की आराधना का वर्णन दिया गया है और यह निर्देश है कि अपने अधिकारानुसार गायत्री-मन्त्र के जप से सभी सिद्धियाँ तो प्राप्त हो ही जाती हैं। इसीलिये केवल इस मन्त्र के जप कर लेने से सभी मन्त्रों का जप सिद्ध हो जाता है। &lt;br /&gt;
*महामुनि विश्वामित्र तपस्या के धनी हैं। इन्हें गायत्री-माता सिद्ध थीं और इनकी पूर्ण कृपा इन्होंने प्राप्त थी। इन्होंने नवीन सृष्टि तथा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग आदि भेजने और ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने-सम्बन्धी जो भी असम्भव कार्य किये, उन सबके पीछे गायत्री-जप एवं संध्योपासना का ही प्रभाव था।&lt;br /&gt;
*भगवती गायत्री कैसी हैं, उनका क्या स्वरूप है, उनकी आराधना कैसे करनी चाहिये, यह सर्वप्रथम आचार्य विश्वामित्र जी ने ही हमें बताया है। उन्होंने भगवती गायत्री को सर्वस्वरूपा बताया है और कहा है कि यह चराचर जगत स्थूल-सूक्ष्म भेद से भगवती का ही विग्रह है, तथापि उपासना और ध्यान की दृष्टि से उनका मूल स्वरूप कैसा है- इस विषय में उनके द्वारा रचित निम्न श्लोक द्रष्टव्य है, जो आज भी गायत्री के उपासकों तथा नित्य सन्ध्या- वन्दनादि करने वालों के द्वारा ध्येय होता रहता है- &amp;lt;ref&amp;gt;मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणैर्युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थवर्णात्मिकाम्।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
गायत्रीं वरदाभयांकुशकशा: सुभ्रं कपालं गुणं शंख चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे॥ (देवीभागवत 12।3)&amp;lt;/ref&amp;gt;'जो मोती मूँगा, सुवर्ण, नीलमणि तथा उज्ज्वल प्रभा के समान वर्णवाले पाँच मुखों से सुशोभित हैं। तीन नेत्रों से जिनके मुख की अनुपम शोभा होती है। जिनके रत्नमय मुकुट में चन्द्रमा जड़े हुए हैं, जो चौबीस वर्णों से युक्त हैं तथा जो वरदायिनी गायत्री अपने हाथों में अभय और वरमुद्राएँ, अंकुश, पाश, शुभ्रकपाल, रस्सी, शंख, चक्र और दो कमल धारण करती हैं, हम उनका ध्यान करते हैं'। &lt;br /&gt;
*इस प्रकार महर्षि विश्वामित्र का इस जगत पर महान उपकार ही है। महिमा के विषय में इससे अधिक क्या कहा जा सकता है कि साक्षात भगवान जिन्हें अपना गुरु मानकर उनकी सेवा करते थे। महर्षि ने सभी शास्त्रों तथा धनुर्विद्या के आचार्य श्री[[राम]] को बला, अतिबला आदि विद्याएँ प्रदान कीं, सभी शास्त्रों का ज्ञान प्रदान किया और भगवान श्रीराम की चिन्मय लीलाओं के वे मूल-प्रेरक रहे तथा लीला-सहचर भी बने। &lt;br /&gt;
*क्षमा की मूर्ति [[वसिष्ठ]] के साथ विश्वामित्र का जो विवाद हुआ, प्रतिस्पर्धा हुई, वह भी लोकशिक्षा का ही एक रूप है। इस आख्यान से गौ-महिमा, त्याग का आदर्श, क्षमा की शक्ति, तपस्या की शक्ति, उद्यम की महिमा, पुरुषार्थ एवं प्रयत्न की दृढ़ता, कर्मयोग, सच्ची लगन और निष्ठा एवं दृढ़तापूर्वक कर्म करने की प्रेरणा मिलती है। इस आख्यान से लोक को यह शिक्षा लेनी चाहिये कि काम, क्रोध आदि साधना के महान बाधक हैं, जब तक व्यक्ति इनके मोहपाश में रहता है; उसका अभ्युदय सम्भव नहीं, किंतु जब वह इन आसुरी सम्पदाओं का परित्याग कर दैवी-सम्पदा का आश्रय लेता है तो वह सर्वपूज्य, सर्वमान्य तथा भगवान का प्रियपात्र हो जाता है। महर्षि वसिष्ठ से जब वे परास्त हो गये, तब उन्होंने तपोबल का आश्रय लिया, काम-क्रोध के वशीभूत होने का उन्हें अनुभव हुआ, अन्त में सर्वस्व त्याग कर वे अनासक्त पथ के पथिक बन गये और जगद्वन्द्य हो गये। [[ब्रह्मा]] जी स्वयं उपस्थित हुए, उन्होंने उन्हें बड़े आदर से ब्रह्मर्षिपद प्रदान किया। महर्षि वसिष्ठ ने उनकी महिमा का स्थापन किया और उन्हें हृदय से लगा लिया। दो महान संतों का अद्भुत मिलन हुआ। देवताओं ने पुष्पवृष्टि की। &lt;br /&gt;
*सत्यधर्म के आदर्श राजर्षि [[हरिश्चन्द्र]] महर्षि विश्वामित्र की दारूण परीक्षा से ही हरिश्चन्द्र की सत्यता में निखार आया, उस वृत्तान्त में महर्षि अत्यन्त निष्ठुर से प्रतीत होते हैं, किंतु महर्षि ने हरिश्चन्द्र को सत्यधर्म की रक्षा का आदर्श बनाने तथा उनकी कीर्ति को सर्वश्रुत एवं अखण्ड बनाने के लिये ही उनकी इतनी कठोर परीक्षा ली। अन्त में उन्होंने उनका राजैश्वर्य उन्हें लौटा दिया, [[रोहिताश्व]] को जीवित कर दिया और महर्षि विश्वामित्र की परीक्षा रूपी कृपा प्रसाद से ही हरिश्चन्द्र राजा से राजर्षि हो गये, सबके लिये आदर्श बन गये। &lt;br /&gt;
*[[ऐतरेय ब्राह्मण]] आदि में भी हरिश्चन्द्र के आख्यान में महर्षि विश्वामित्र की महिमा का वर्णन आया है। &lt;br /&gt;
*ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में 30वें, 33वें तथा 53वें सूक्त में महर्षि विश्वामित्र का परिचयात्मक विवरण आया है। वहाँ से ज्ञान होता है कि ये कुशिक गोत्रोत्पन्न कौशिक थे। &amp;lt;ref&amp;gt; ऋग्वेद(3।26।2-3)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  ये कौशिक लोग महान ज्ञानी थे, सारे संसार का रहस्य जानते थे। &amp;lt;ref&amp;gt; ऋग्वेद(3।29।15)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*ऋग्वेद 53वें सूक्त के 9वें मन्त्र से ज्ञात होता है कि महर्षि विश्वामित्र अतिशय सामर्थ्यशाली, अतीन्द्रियार्थद्रष्टा, देदीप्यमान तेजों के जनयिता और अध्वर्यु आदि में उपदेष्टा हैं तथा राजा [[सुदास]] के यज्ञ के आचार्य रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाभारत और पुराणों में विश्वामित्र== &lt;br /&gt;
महर्षि विश्वामित्र के आविर्भाव का विस्तृत आख्यान [[पुराण|पुराणों]] तथा [[महाभारत]] आदि में आया है। भरत वंश की परंपरा राजा अजमीढ़, जह्नु, सिंधुद्वीप, बलाश्व, बल्लभ, कुशिक से होती हुई गाधि तक पहुंची। गाधि दीर्घकाल तक पुत्रहीन रहे तथा अनेक पुण्यकर्म करने के उपरांत उन्हें सत्यवती नामक कन्या की प्राप्ति हुई। [[च्यवन]] के पुत्र भृगुवंशी ऋचीक ने सत्यवती की याचना की तो गाधि ने उसे दरिद्र समझकर शुल्क रूप में उससे एक सहस्त्र श्वेत वर्ण तथा एक ओर से काले कानों वाले एक सहस्त्र घोड़े मांगे। ऋचीक ने [[वरुण]]देव की कृपा से शुल्क देकर सत्यवती से विवाह कर लिया। कालांतर में पत्नी से प्रसन्न होकर ऋचीक ने वर मांगने को कहा। सत्यवती ने अपनी मां की सलाह से मां के तथा अपने लिए एक-एक पुत्र की कामना की। *ऋचीक ने सत्यवती को दोनों के खाने के लिए एक-एक मन्त्रपूत चरु दिया तथा ऋतुस्नान के उपरांत मां को पीपल के वृक्ष का आलिंगन तथा सत्यवती को गूलर का आलिंगन करने को कहा। मां ने यह सोचकर कि अपने लिए निश्चय ही ऋचीक ने अधिक अच्छे बालक की योजना की होगी, बेटी पर अधिकार जमाकर चारू बदल लिए तथा स्वयं गूलर का और सत्यवती को पीपल का आलिंगन करवाया। गर्भवती सत्यवती को देखकर ऋचीक पर यह भेद खुल गया। उसने कहा-'सत्यवती, मैंने तुम्हारे लिए ब्राह्मण पुत्र तथा मां के लिए क्षत्रियपुत्र की योजना की थी।' सत्यवती यह जानकर बहुत दुखी हुई। उसने ऋचीक से प्रार्थना की कि उसका पौत्र भले ही क्षत्रिय हो जाय, पर पुत्र ब्राह्मण हो। यथासमय सत्यवती की परम्परा में पुत्र रूप में [[जमदग्नि]] पैदा हुए और उन्हीं के पुत्र [[परशुराम]] हुए। जमदग्नि तथा गाधि नामक विख्यात राजा को विश्वामित्र नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। गाधि ने अपने पुत्र का राज्याभिषेक कर अपने शरीर का त्याग कर दिया। प्रजा के मन में पहले से ही संशय था कि विश्वामित्र प्रजा की रक्षा कर पायेंगे कि नहीं। कालांतर में स्पष्ट हो गया कि वे गाधि जितने समर्थ राजा नहीं हैं। प्रजा राक्षसों से भयभीत थी, अत: विश्वामित्र अपनी सेना लेकर निकले। &lt;br /&gt;
*वे [[वसिष्ठ]] के आश्रम के निकट पहुंचे। वसिष्ठ उनके सैनिकों को अन्याय आदि करते देख उनसे रुष्ट हो गये तथा अपनी गौ नंदिनी से उन्होंने भयानक पुरुषों की सृष्टि करने के लिए कहा। उन भयानक पुरुषों ने राजसैनिकों को मार भगाया। अपनी पराजय देखकर विश्वामित्र ने तप को अधिक प्रबल मानकर तपस्या में अपना मन लगाया। वे [[ब्रह्मा]]जी के सरोवर से उत्पन्न हुई [[सरस्वती|सरस्वती नदी]] के तट पर चले गये। वहां उन्होंने अर्ष्टिषेण तीर्थ का सेवन कर ब्रह्मा से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। कालांतर में तपस्या करते हुए उनको वसिष्ठ से स्पर्धा तदनंतर बैर हो गया। सरस्वती के पूर्वी तट पर वसिष्ठ तथा पश्चिमी तट पर विश्वामित्र तपस्या में लगे थे। एक दिन उन्होंने सरस्वती को बुलाकर कहा कि वह वसिष्ठ को बहाकर उनके पास ले आये ताकि वे वसिष्ठ का वध कर पायें। सरस्वती दोनों में से किसी का भी अहित करने से शाप की संभावना का अनुभव कर रही थी, अत: उसने वसिष्ठ से जाकर सब कह सुनाया। उन्होंने उसे विश्वामित्र की आज्ञा का पालन करने के लिए कहा। सरस्वती ने पूर्वी तट को तोड़कर बहाया तथा उस तट को वसिष्ठ सहित विश्वामित्र के पास पहुंचा दिया। विश्वामित्र जप और होम कर रहे थे। वे वसिष्ठ को मारने के लिए कोई अस्त्र ढूंढ़ ही रहे थे कि सरस्वती ने पुन: बहाकर उन्हें दूसरे तट पर पहुंचा दिया। वसिष्ठ को फिर से पूर्वी तट पर देख विश्वामित्र सरस्वती से रुष्ट हो गये। उन्होंने शाप दिया कि वहां उसका जल रक्तमिश्रित हो जाये। उस स्थल पर सरस्वती का जल रक्त की धारा बन गया तथा उसका पान विभिन्न राक्षस इत्यादि करने लगे। कालांतर में कुछ मुनि तीर्थाटन करते हुए वहां पहुंचे। वहां रक्त देख तथा सरस्वती से समस्त घटना के विषय में जानकर उन लोगों ने [[शिव]] की उपासना की। उनकी कृपा से शापमुक्त होकर सरस्वती पुन: स्वच्छ जल-युक्त  हो गयी। जो राक्षस निरंतर प्रवाहित रक्त का पान कर रहे थे, वे अतृप्त और भूखे होने के कारण मुनियों की शरण में गये। उन्होंने अपने पापों को मुक्त कंठ से स्वीकार किया तथा उनसे छुटकारा प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। उन्हें पापमुक्त करने की मुनियों की इच्छा जानकर सरस्वती अपनी ही स्वरूपभूता 'अरुणा' को ले आयी। उसके जल में स्नान करके राक्षस अपने शरीर का त्याग कर स्वर्ग चले गये। अरुणा ब्रह्महत्या का निवारण करनेवाली नदी है। &lt;br /&gt;
*[[त्रेता युग]] और [[द्वापर युग]] की संधि के समय बारह वर्ष तक अनावृष्टि रही। विश्वामित्र भूख से पीड़ित हो अपने परिवार को जनसमुदाय में छोड़कर भक्ष्य-अभक्ष्य ढूंढ़ने निकल पड़े। उन्हें एक चांडाल के घर में कुत्ते की जांघ का मांस दिखायी दिया। वे उसे चुराने की इच्छा से वहीं रह गये। रात्रि के समय यह सोचकर कि सब सो रहे हैं, वे घर में घुसे। चांडाल जगा हुआ था। अत: उसने पूछा, कौन है। परिचय पाकर तथा प्रयोजन जानकर उसने उन्हें इस कुकर्म से विरक्त होने के लिए कहा। यह भी कहा कि मुनि के लिए कुत्ते की जांघ का मांस अभक्ष्य है। विश्वामित्र ने आपत्धर्म मानकर वह मांस वहां से ले लिया तथा अपने परिवार के साथ भक्षण करने का विचार किया। मार्ग में उन्हें ध्यान आया कि इसमें से यज्ञादि के द्वारा देवताओं का भाग भी निकाल देना चाहिए। उनके यज्ञ करते-करते ही वर्षा प्रारंभ हो गयी तथा दुर्भिक्ष दूर हो गया। &amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[शल्य पर्व महाभारत|शल्यपर्व]], 40।13-32।–42, 43। 1-31, शांतिपर्व, 141।–, दानधर्मपर्व, 4।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
*विश्वामित्र ने अपने सातों लड़कों से रुष्ट होकर उन्हें अपने आश्रम से निकाल दिया तथा शाप दिया। वे [[गर्ग]] मुनि को गुरु बनाकर रहने लगे। मुनि के पास एक गाय थी। वह हर साल एक बच्चा देती थी। एक दिन उसे जंगल से लाने गये तो सातों ने सबसे छोटे की सलाह से पितरों का आवाहन करके श्राद्ध निमित्त उस गाय को मारकर खा लिया तथा मुनि से यह कह दिया कि सिंह उसे खा गया है। मुनि ने मान लिया। गाय मारते हुए पितरों का आवाहन करने के कारण वे ज्ञान से च्युत नहीं हुए। पाप कर्म के कारण वे मरकर व्याध के घर में पैदा हुए। इसी प्रकार वे क्रमश: हरिण, चकवा-चकवी, हंस हुए, तदनंतर उनमें से चार ब्राह्मण घर में उत्पन्न हुए और जो राजा बनने के लोभी थे, वे राजा ब्रह्मदत्त और उसके दो मन्त्रियों के रूप में जन्मे। गोवध करते हुए भी पितरों का आवाहन करने के कारण वे अपने पूर्वज्ञान को भूले नहीं। राजा ब्रह्मदत्त की पत्नी राजा से काम-संबंध स्थापित नहीं करती थी। उसे सब ज्ञात था और वह राजा को धर्म के मार्ग की ओर अग्रसर करना चाहती थी। संयोग से चार ब्राह्मण भाई तीर्थाटन के लिए उद्यत हुए तो उन्होंने अपने बूढ़े पिता के हाथ राजा और मन्त्रियों को पूर्वजन्म का आख्यान लिख भेजा। राजा ने ब्राह्मण को धन देकर विदा किया तथा अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर वह योग की ओर प्रवृत्त हुआ। मन्त्रियों ने भी वही मार्ग अपनाकर मुक्ति प्राप्त की। इस प्रकार विश्वामित्र के सातों पुत्रों की इहलोक से मुक्ति हुई। इसका श्रेय पितरों की भक्ति को दिया गया है। &amp;lt;ref&amp;gt;[[शिव पुराण]], 11। 25-26&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि मुनि]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>निम्बार्काचार्य</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==श्रीनिम्बार्काचार्य / Nimbarkacharya==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जीवन-काल'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीनिम्बार्काचार्य की माता का नाम जयन्ती देवी और पिता का नाम श्रीअरुण मुनि था। इन्हें भगवान [[सूर्य]] का अवतार कहा जाता है। कुछ लोग इनको भगवान के सुदर्शन चक्र का भी अवतार मानते हैं तथा इनके पिता का नाम श्री जगन्नाथ बतलाते हैं। वर्तमान अन्वेषकों ने अपने प्रमाणों से इनका जीवन-काल ग्यारहवीं शताब्दी सिद्ध किया है। इनके भक्त इनका जन्म काल [[द्वापर युग|द्वापर]] का मानते हैं। इनका जन्म दक्षिण भारत के [[गोदावरी]] के तट पर स्थित वैदूर्यपत्तन के निकट अरुणाश्रम में हुआ था। ऐसा प्रसिद्ध है कि इनके [[उपनयन]] के समय स्वयं देवर्षि [[नारद]] ने इन्हें श्री गोपाल-मन्त्री की दीक्षा प्रदान की थी तथा श्रीकृष्णोपासना का उपदेश दिया था। इनके गुरु देवर्षि नारद थे तथा नारद के गुरु श्रीसनकादि थे। इसलिये इनका सम्प्रदाय [[सनकादि सम्प्रदाय]] के नाम से प्रसिद्ध है। इनके मत को द्वैताद्वैतवाद कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वैताद्वैतवाद मत==&lt;br /&gt;
श्रीनिम्बार्काचार्य के अनुसार इनका मत अत्यन्त प्राचीन काल से सम्बद्ध है, कोई नया मत नहीं है। इन्होंने अपने भाष्य में नारद और सनत्कुमार के नाम का उल्लेख करके यह सिद्ध किया है कि इनका मत सृष्टि के आदि से है। कहते हैं कि पहले इनका नाम नियमानन्द था। श्रीदेवाचार्य ने इसी नाम से इनको नमस्कार किया है। जब ये [[यमुना]] तटवर्ती ध्रुव क्षेत्र में निवास करते थे, तब एक दिन एक दण्डी संन्यासी इनके आश्रम पर आये। उनके साथ ये आध्यात्मिक विचार-विमर्श में इतने तल्लीन हो गये कि सूर्यास्त हो गया। सूर्यास्त होने पर जब इन्होंने अपने अतिथि संन्यासी से भोजन करने का निवेदन किया, तब उन्होंने सूर्यास्त की बात कहकर भोजन करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। दण्डी संन्यासी प्राय: सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करते हैं। अतिथि के बिना भोजन किये लौट जाने की बात पर श्रीनिम्बार्काचार्य को काफी चिन्ता हुई। भगवान ने इनकी समस्या के समाधान के लिये प्रकृति के नियमों में परिवर्तन की अद्भुत लीला रची। सभी लोगों ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि इनके आश्रम के सन्निकट नीम के ऊपर सूर्यदेव प्रकाशित हो गये। भगवान की अपार करूणा का प्रत्यक्ष दर्शन करके आचार्य का हृदय गद्गद हो गया। भगवान की करूणा के प्रति शत-शत कृतज्ञता प्रकट करते हुए इन्होंने अपने अतिथि को भोजन कराया। अतिथि के भोजनोपरान्त ही सूर्यास्त हुआ। भगवान की इस असीम करूणा को लोगों ने श्रीनिम्बार्काचार्य की सिद्धि के रूप में देखा, तभी से इनका नाम निम्बादित्य अथवा निम्बार्क प्रसिद्ध हुआ। यद्यपि श्रीनिम्बार्काचार्य ने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया, किन्तु वर्तमान में वेदान्त-कृष्ण की पूजा होती है। [[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत]] इस सम्प्रदाय का प्रधान ग्रन्थ है। इनके मत में ब्रह्म से जीव पृथक् भी है और एक भी है। &lt;br /&gt;
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[[Category:विविध]]&lt;br /&gt;
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		<title>त्रिशंकु</title>
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		<updated>2010-03-14T17:29:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==त्रिशंकु / Trishanku==&lt;br /&gt;
*त्रिशंकु के मन में सशरीर स्वर्ग-प्राप्ति के लिए यज्ञ करने की कामना बलवती हुई तो वे [[वसिष्ठ]] के पास पहुचे। वसिष्ठ ने यह कार्य असंभव बतलाया। वे दक्षिण प्रदेश में वसिष्ठ के सौ तपस्वी पुत्रों के पास गये। उन्होंने कहा-'जब वसिष्ठ ने मना कर दिया है तो हमारे लिए कैसे संभव हो सकता है?' त्रिशंकु के यह कहने पर कि वे किसी और की शरण में जायेंगे, उनके गुरु-पुत्रों ने उन्हें चांडाल होने का शाप दिया। चांडाल रूप में वे [[विश्वामित्र]] की शरण में गये। विश्वामित्र ने उसके लिए यज्ञ करना स्वीकार कर लिया। यज्ञ में समस्त ऋषियों को आमन्त्रित किया गया। सब आने के लिए तैयार थे, किंतु वसिष्ठ के सौ पुत्र और महोदय नामक ऋषि ने कहला भेजा कि वे लोग नहीं आयेंगे क्योंकि जिस चांडाल का यज्ञ कराने वाले क्षत्रिय हैं, उस यज्ञ में देवता और ऋषि किस प्रकार हवि ग्रहण कर सकते हैं। विश्वामित्र ने क्रुद्ध होकर शाप दिया कि वे सब काल-पाश में बंधकर यमपुरी चले जायें तथा वहां सात सौ जन्मों तक मुर्दों का भक्षण करें। यज्ञ आरंभ हो गये। बहुत समय बाद देवताओं को आमन्त्रित किया गया पर जब वे नहीं आये तो क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने अपने हाथ में सुवा लेकर कहा-'मैं अपने अर्जित तप के बल से तुम्हें (त्रिशंकु को) सशरीर स्वर्ग भेजता हूं।' त्रिशंकु स्वर्ग की ओर सशरीर जाने लगे तो [[इन्द्र]] ने कहा-'तू लौट जा, क्योंकि गुरु से शापित है। तू सिर नीचा करके यहां से गिर जा।' वह नीचे गिरने लगा तो विश्वामित्र से रक्षा की याचना कीं। उन्होंने कहा-'वहीं ठहरो,' तथा क्रुद्ध होकर इन्द्र का नाश करने अथवा स्वयं दूसरा इन्द्र बनने का निश्चय किया। उन्होंने अनेक नक्षत्रों तथा [[देवता|देवताओं]] की रचना कर डाली। देवता, ऋषि, असुर विनीत भाव से विश्वामित्र के पास गये। अंत में यह निश्चय हुआ कि जब तक सृष्टि रहेगी, [[ध्रुव]], [[सूर्य]], [[पृथ्वी]], [[नक्षत्र]] रहेंगे, तब तक विश्वामित्र का रचा नक्षत्रमंडल और स्वर्ग भी रहेंगे उस स्वर्ग में त्रिशंकु सशरीर, नतमस्तक विद्यमान रहेंगे। &amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, बाल कांड, सर्ग  57, पद 9-22, सर्ग 58, 1-24, सर्ग 59, 1-22, सर्ग 60, 1-34&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मांधाता के कुल में सत्यव्रत नामक पुत्र का जन्म हुआ। सत्यव्रत अपने पिता तथा गुरु के शाप से चांडाल हो गया था तथापि विश्वामित्र के प्रभाव से उसने सशरीर स्वर्ग प्राप्त किया। देवताओं ने उसे स्वर्ग से धकेल दिया। अत: वह सिर नीचे और पांव ऊपर किये आज भी लटका हुआ है, क्योंकि विश्वामित्र के प्रभाव से वह [[पृथ्वी]] पर नहीं गिर सकता। वही सत्यव्रत त्रिशंकु नाम से विख्यात हुआ। &amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद् भागवत, नवम स्कंध, अध्याय 7, श्लोक 4-6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*त्रैय्यारूणि के पुत्र का नाम सत्यव्रत था। चंचलता और कामुकतावश उसने किसी नगरवासी की कन्या का अपहरण कर लिया। त्रैय्यारूणि ने रूष्ट होकर उसे राज्य से निकाल दिया तथा स्वयं भी वन में चला गया। सत्यव्रत चांडाल के घर रहने लगा। [[इन्द्र]] ने बारह वर्ष तक उसके राज्य में वर्षा नहीं की। [[विश्वामित्र]] पत्नी को उसी राज्य में छोड़कर तपस्या करने गये हुए थे। अनावृष्टि से त्रस्त उनकी पत्नी अपने शेष कुटुंब का पालन करने के लिए मंझले पुत्र के गले में रस्सी बांधकर सौ गायों के बदले में उसे बेचने गयी। सत्यव्रत ने उसे छुड़ा दिया। गले में रस्सी पड़ने के कारण वह पुत्र [[गालव]] कहलाया। सत्यव्रत उस परिवार के निमित्त प्रतिदिन मांस जुटाता था। एक दिन वह [[वसिष्ठ]] की गाय को मार लाया। उसने तथा [[विश्वामित्र]]  परिवार ने मांस-भक्षण किया। वसिष्ठ पहले ही उसके कर्मों से रूष्ट थे। गोहत्या के उपरांत उन्होंने उसे त्रिशंकु कहा। विश्वामित्र ने उससे प्रसन्न होकर उसका राज्यभिषेक किया तथा उसे सशरीर स्वर्ग जाने का वरदान दिया। देवताओं तथा वसिष्ठ के देखते-देखते ही वह स्वर्ग की ओर चल पड़ा। उसकी पत्नी ने निष्पाप राजा [[हरिश्चंद्र]] को जन्म दिया। &amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु पुराण, 4।3।18-24&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;ब्र0पु0, 7।97-109, ब्र0 पु0 8।–&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*त्रैय्यारूणि (मुचुकुंद के भाई) का एक पुत्र हुआ, जिसका नाम सत्यव्रत था। वह दुष्ट तथा मन्त्रों को भ्रष्ट करने वाला थां राजा ने क्रुद्ध होकर उसे घर से निकाल दिया। वह रसोईघर के पास रहने लगा। राजा राज्य छोड़कर वन में चला गया। एक दिन मुनि [[विश्वामित्र]] भी तपस्या करने चले गये। एक दिन मुनि पत्नी अपने बीच के लड़के के गले में रस्सी बांधकर उसे सौ गायों के बदले में बेचने के लिए ले जा रही थी। सत्यव्रत ने दयार्द्र होकर उसे बंधन मुक्त करके स्वयं पालना आरंभ कर दिया तब से उसका नाम गालव्य पड़ गया। सत्यव्रत अनेक प्रकार से विश्वामित्र के कुटुंब का पालन करने लगा, किंन्तु किसी ने उसको घर के भीतर नहीं बुलाया। एक बार क्षुधा से व्याकुल होकर उसने [[वसिष्ठ]] की एक गाय मारकर विश्वामित्र के पुत्र के साथ बैठकर खा ली। वसिष्ठ को पता चला तो वे बहुत रूष्ट हुए। विश्वामित्र घर लौटे तो स्वकुटुंब पालन के कारण इतने प्रसन्न हुए कि उसे राजा बना दिया तथा सशरीर उसे स्वर्ग में बैठा दिया। वसिष्ठ ने उसे पतित होकर नीचे गिरने का शाप दिया तथा विश्वामित्र ने वहीं रूके रहने का आशीर्वाद दिया, अत: वह [[आकाश]] और [[पृथ्वी]] के बीच आज भी ज्यों का त्यों लटक रहा है। वह तभी से त्रिशंकु कहलाया&amp;lt;ref&amp;gt;शिव पुराण, 11। 20&amp;lt;/ref&amp;gt;।&lt;br /&gt;
*विष्णु पुराण की कथा से अंतर यहां उल्लिखित है। अरुण के पुत्र का नाम सत्यव्रत था। उसने ब्राह्मण कन्या का अपहरण किया थां प्रजा ने अरुण से कहा कि उसने ब्राह्मण भार्या का अपहरण किया है, अत: राजा ने उसे चांडाल के साथ रहने का शाप देकर राज्य से निर्वासित कर दिया। वसिष्ठ को ज्ञात था कि वह ब्राह्मण कन्या थी, भार्या नहीं किंतु उन्होंने राजा की वर्जना नहीं की, अत: सत्यव्रत उनसे रूष्ट हो गया। वन में उसने विश्वामित्र के परिवार की सेवा की। एक दिन शिकार न मिलने पर वसिष्ठ की गाय का वध करके उन्हें मांस दिया। वसिष्ठ ने रूष्ट होकर उसे कभी स्वर्ग न प्राप्त कर पाने का शाप दिया तथा ब्राह्मण कन्या के अपहरण, राज्य भ्रष्ट होने तथा गोहत्या करने के कारण उसके मस्तक पर तीन शंकु (कुष्ठवात्) का चिह्न वन गया, तभी से वह त्रिशंकु कहलाया। इस सबसे दुखी हो वह आत्महत्या  के लिए तत्पर हुआ, किंतु महादेवी ने प्रकट होकर उसकी वर्जना की। विश्वामित्र के वरदान तथा महादेवी की कृपा से उसे पिता का राज्य प्राप्त हुआ। उसके पुत्र का नाम हरिश्चन्द्र रखा गया। हरिश्चन्द्र को युवराज घोषित करके वह सदेह स्वर्ग-प्राप्ति के लिए यज्ञ करना चाहता थां वसिष्ठ ने उसका यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया। वह किसी और ब्राह्मण पुरोहित की खोज करने लगा तो रूष्ट होकर वसिष्ठ ने उसे श्वपचाकृति पिशाच होने तथा कभी स्वर्ग प्राप्त न करने का शाप दिया। विश्वामित्र त्रिशंकु से विशेष प्रसन्न थे क्योंकि उसने उनके परिवार का पालन किया था, अत: उन्होंने अपने समस्त पुण्य उसे प्रदान करे स्वर्ग भेज दिया। श्वपचाकृति के व्यक्ति को इन्द्र ने स्वर्ग में नहीं घुसने दिया। वहां से पतित होकर उसने विश्वामित्र को स्मरण किया। विश्वामित्र ने उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया, अत: वह मध्य में रूका रह गयां विश्वामित्र उसके लिए दूसरे स्वर्ग का निर्माण करने में लग गये। यह जानकर इन्द्र स्वयं उसे स्वर्ग ले गये।&amp;lt;ref&amp;gt; भागवत, 7 । 10-13&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
== टीका-टिप्पणी ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt; &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=9229</id>
		<title>अरुण देवता</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=9229"/>
		<updated>2010-03-14T17:29:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: अरूण का नाम बदलकर अरुण कर दिया गया है&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{incomplete}}&lt;br /&gt;
== अरुण / Arun  ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अरुण को [[सूर्य]] का सारथि माना जाता है। &lt;br /&gt;
*यह विनता का पुत्र और [[गरुड़]] का ज्येष्ठ भ्राता है । &lt;br /&gt;
*पौराणिक कल्पना के अनुसार यह पंगु अर्थात पाँवरहित है । &lt;br /&gt;
*प्राय: सूर्य मंदिरों के सामने अरुण-स्तम्भ स्थापित किया जाता है । &lt;br /&gt;
*इसका भौतिक आधार है सूर्योदय के पूर्व अरुणिमा (लाली) । इसी के रूपक का नाम अरुण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 [[Category:विविध]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA&amp;diff=5592</id>
		<title>कश्यप</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AA&amp;diff=5592"/>
		<updated>2010-03-14T17:29:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==कश्यप / Kashyap==&lt;br /&gt;
*प्राचीन वैदिक ॠषियों में प्रमुख ॠषि, जिनका उल्लेख एक बार [[ॠग्वेद]] में हुआ है। अन्य संहिताओं में भी यह नाम बहुप्रयुक्त है। इन्हें सर्वदा धार्मिक एंव रह्स्यात्मक चरित्र वाला बतलाया गया है एंव अति प्राचीन कहा गया है। &lt;br /&gt;
*[[ऐतरेय ब्राह्मण]] के अनुसार उन्होंने 'विश्वकर्मभौवन' नामक राजा का [[अभिषेक]] कराया था। ऐतरेय ब्राह्मणों ने कश्यपों का सम्बन्ध [[जनमेजय]] से बताया गया है। &lt;br /&gt;
*[[शतपथ ब्राह्मण]] में [[प्रजापति]] को कश्यप कहा गया हैः&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;quot;स यत्कुर्मो नाम। प्रजापतिः प्रजा असृजत। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
यदसृजत् अकरोत् तद् यदकरोत् तस्मात् कूर्मः कश्यपो वै कूर्म्स्तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः कश्यपः।&amp;quot;&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] एवं [[पुराण|पुराणों]] में असुरों की उत्पत्ति एवं वंशावली के वर्णन में कहा गया है की [[ब्रह्मा]] के छः मानस पुत्रों में से एक '[[मरीचि]]' थे जिन्होंने अपनी इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति पुत्र उत्पन्न किया। &lt;br /&gt;
*कश्यप ने दक्ष प्रजापति की 17 पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तान उत्पन्न हुई उसका विवरण निम्नांकित है -&lt;br /&gt;
#[[अदिति]] से [[आदित्य]] (देवता)&lt;br /&gt;
#[[दिति]] से दैत्य &lt;br /&gt;
#दनु से दानव &lt;br /&gt;
#काष्ठा से अश्व आदि&lt;br /&gt;
#अनिष्ठा से गन्धर्व &lt;br /&gt;
#सुरसा से राक्षस &lt;br /&gt;
#इला से वृक्ष&lt;br /&gt;
#मुनि से अप्सरागण &lt;br /&gt;
#क्रोधवशा से सर्प&lt;br /&gt;
#सुरभि से गौ और महिष &lt;br /&gt;
#सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु)&lt;br /&gt;
#ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि&lt;br /&gt;
#तिमि से यादोगण (जलजन्तु) &lt;br /&gt;
#विनता से [[गरुड़]] और [[अरुण]] &lt;br /&gt;
#कद्रु से नाग &lt;br /&gt;
#पतंगी से पतंग&lt;br /&gt;
#यामिनी से शलभ&lt;br /&gt;
*[[भागवत पुराण]], [[मार्कण्डेय पुराण]] के अनुसार कश्यप की तेरह भांर्याएँ थीं। उनके नाम हैं- &lt;br /&gt;
#[[दिति]] &lt;br /&gt;
#[[अदिति]] &lt;br /&gt;
#[[दनु]] &lt;br /&gt;
#[[विनता]] &lt;br /&gt;
#[[खसा]] &lt;br /&gt;
#कद्रु &lt;br /&gt;
#[[मुनि]] &lt;br /&gt;
#क्रोधा &lt;br /&gt;
#रिष्टा &lt;br /&gt;
#[[इरा]] &lt;br /&gt;
#ताम्रा&lt;br /&gt;
#[[इला]] &lt;br /&gt;
#[[प्रधा]]। &lt;br /&gt;
*इन्हीं से सब सृष्टि हुई।&lt;br /&gt;
*कश्यप एक गोत्र का भी नाम है। यह बहुत व्यापक  गोत्र है। जिसका गोत्र नहीं मिलता उसके लिए कश्यप गोत्र की कल्पना कर ली जाती है, क्योंकि एक परम्परा के अनुसार सभी जीवधारियों की उत्पत्ति कश्यप से हुई। &lt;br /&gt;
*एक बार समस्त [[पृथ्वी]] पर विजय प्राप्त कर [[परशुराम]] ने वह कश्यप मुनि को दान कर दी। कश्यप मुनि ने कहा-'अब तुम मेरे देश में मत रहो।' अत: गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने रात को पृथ्वी पर न रहने का संकल्प किया। वे प्रति रात्रि में मन के समान तीव्र गमनशक्ति से महेंद्र पर्वत पर जाने लगे। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, [[बाल काण्ड वा॰ रा॰|बाल कांड]], सर्ग 76, श्लोक 11-16&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[सत युग]] में [[दक्ष]] प्रजापति की दो कन्याएं थी- [[कद्रु]] तथा विनता। उन दोनों का विवाह महर्षि कश्यप के साथ हुआ। एक बार प्रसन्न होकर कश्यप ने उन दोनों को मनचाहा वर मांगने को कहा। कद्रु ने समान पराक्रमी एक सहस्त्र नाग-पुत्र मांगे तथा विनता ने उसके पुत्रों से अधिक तेजस्वी दो पुत्र मांगे। कालांतर में दोनों को क्रमश: एक सहस्त्र, तथा दो अंडे प्राप्त हुए। 500 वर्ष बाद कद्रु के अंडों के नाग प्रकट हुए। विनता ने ईर्ष्यावश अपना एक अंडा स्वयं ही तोड़ डाला। उसमें से एक अविकसित बालक निकला जिसका ऊर्ध्वभाग बन चुका था, अधोभाग का विकास नहीं हुआ थां उसने क्रुद्ध होकर मां को 500 वर्ष तक कद्रु की दासी रहने का शाप दिया तथा कहा कि यदि दूसरा अंडा समय से पूर्व नहीं फोड़ा तो वह पूर्णविकसित बालक मां को दासित्व से मुक्त करेगा। पहला बालक [[अरुण]] बनकर आकाश में [[सूर्य]] का सारथि बन गया तथा दूसरा बालक [[गरुड़]] बनकर आकाश में उड़ गया। &lt;br /&gt;
*विनता तथा कद्रु एक बार कहीं बाहर घूमने गयीं। वहां उच्चैश्रवा नामक घोड़े को देखकर दोनों की शर्त लग गयी कि जो उसका रंग गलत बतायेगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। अगले दिन घोड़े का रंग देखने की बात रही। विनता ने उसका रंग सफेद बताया था तथा कद्रु ने उसका रंग सफेद, पर पूंछ का रंग काला बताया था। कद्रु के मन में कपट था। उसने घर जाते ही अपने पुत्रों को उसकी पूंछ पर लिपटकर काले बालों का रूप धारण करने का आदेश दिया जिससे वह विजयी हो जाय। जिन सर्पों ने उसका आदेश नहीं माना, उन्हें उसने शाप दिया कि वे [[जनमेजय]] के यज्ञ में भस्म हो जायें। इस शाप का अनुमोदन करते हुए [[ब्रह्मा]] ने कश्यप को बुलाया और कहा-'तुमसे उत्पन्न सर्पों की संख्या बहुत बढ़ गयी है। तुम्हारी पत्नी ने उन्हें शाप देकर अच्छा ही किया, अत: तुम उससे रूष्ट मत होना।' ऐसा कहकर ब्रह्मा ने कश्यप को सर्पों का विष उतारने की विद्या प्रदान की। विनता तथा कद्रु जब उच्चैश्रवा को देखने अगले दिन गयीं तब उसकी पूंछ काले नागों से ढकी रहने के कारण काली जान पड़ रही थी। विनता अत्यंत दुखी हुई तथा उसने कद्रु की दासी का स्थान ग्रहण किया। &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, [[आदि पर्व महाभारत|आदिपर्व]], अध्याय 16, 20 । अ0 23 श्लोक 1 से 3 तक  भा0 2।11।12।–&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[गरुड़]] ने सर्पों से पूछा कि कौन-सा ऐसा कार्य है जिसको करने से उसकी माता को दासित्व से छुटकारा मिल जायेगा? उसके नाग भाइयों ने अमृत लाकर देने के लिए कहा। गरुड़ ने अमृत की खोज में प्रस्थान किया। उसको समस्त [[देवता|देवताओं]] से युद्ध करना पड़ा। सबसे अधिक शक्तिशाली होने के कारण गरुड़ ने सभी को परास्त कर दिया। तदनंतर वे अमृत के पास पहुंचा। अत्यंत सूक्ष्म रूप धारण करके वह अमृतघट के पास निरंतर चलने वाले चक्र को पार कर गया। वहां दो सर्प पहरा दे रहे थे। उन दोनों को मारकर वह अमृतघट उठाकर ले उड़ा। उसने स्वयं अमृत का पान नहीं किया था, यह देखकर [[विष्णु]] ने उसके निर्लिप्त भाव पर प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि कह बिना अमृत पीये भी अजर-अमर होगा तथा विष्णु-ध्वजा पर उसका स्थान रहेगा। गरुड़ ने विष्णु का वाहन बनना भी स्वीकार किया। मार्ग में [[इन्द्र]] मिले। इन्द्र ने उससे अमृत-कलश मांगा और कहा कि यदि सर्पों ने इसका पान कर लिया तो अत्यधिक अहित होगा। गरुड़ ने इन्द्र को बताया कि वह किसी उद्देश्य से अमृत ले जा रहा है। जब वह अमृत-कलश कहीं रख दे, इन्द्र उसे ले ले। इन्द्र ने प्रसन्न होकर गरुड़ को वरदान दिया कि सर्प उसकी भोजन सामग्री होंगे। तदनंतर गरुड़ अपनी मां के पास पहुंचा। उसने सर्पों को सूचना दी कि वह अमृत ले आया है। सर्प विनता को दासित्व से मुक्त कर दें तथा स्नान कर लें। उसने कुशासन पर अमृत-कलश रख दियां जब तक सर्प स्नान करके लौटे, इन्द्र ने अमृत चुरा लिया था। सर्पों ने कुशा को ही चाटा जिससे उनकी जीभ के दो भाग हो गए, अत: वे द्विजिव्ह कहलाने लगे &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 28, अ0 29 श्लोक 1 से 14 तक, अ0 30, श्लोक 32 से 52 तक अध्याय 32, 33, 34&amp;lt;/ref&amp;gt;।&lt;br /&gt;
*[[इन्द्र]] को बालखिल्य महर्षियों से बहुत ईर्ष्या थी। रूष्ट होकर बालखिल्य ने अपनी तपस्या का भाग कश्यप मुनि को दिया तथा इन्द्र का मद नष्ट करने के लिए कहा। कश्यप ने सुपर्णा तथा कद्रु से विवाह किया। दोनों के गर्भिणी होने पर वे उन्हें सदाचार से घर में ही रहने के लिए कहकर अन्यत्र चले गये। उनके जाने के बाद दोनों पत्नियां ऋषियों के यज्ञों में जाने लगीं। वे दोनों ऋषियों के मना करने पर भी हविष्य को दूषित कर देती थीं। अत: उनके शाप से वे नदियां (अपगा) बन गयीं। लौटने पर कश्यप को ज्ञात हुआ। ऋषियों के कहने से उन्होंने शिवाराधना की। [[शिव]] के प्रसन्न होने पर उन्हें आशीर्वाद मिला कि दोनों नदियां [[गंगा]] से मिलकर पुन: नारी-रूप धारण करेंगी। ऐसा ही होने पर प्रजापति कश्यप ने दोनों का सीमांतोन्नयन [[संस्कार]] किया। यज्ञ के समय कद्रु ने एक आंख से संकेत द्वारा ऋषियों का उपहास किया। अत: उनके शाप से वह कानी हो गयी। कश्यप ने पुन: ऋषियों को किसी प्रकार प्रसन्न किया। उनके कथनानुसार गंगा स्नान से उसने पुन: पुर्वरूप धारण किया। &amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण, 100 ।-&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category: पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि मुनि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4&amp;diff=1169</id>
		<title>कृष्ण और महाभारत</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4&amp;diff=1169"/>
		<updated>2010-03-14T17:29:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{कृष्ण}}&lt;br /&gt;
==महाभारत- द्रोणाभिषेकपर्व, आश्वमेधिकपर्व==&lt;br /&gt;
श्री[[कृष्ण]] मंझले भाई थे।  उनके बड़े भाई का नाम [[बलराम]] था जो अपनी भक्ति में ही मस्त रहते थे।  उनसे छोटे का नाम 'गद' था।  वे अत्यंत सुकुमार होने के कारण श्रम से दूर भागते थे।  श्रीकृष्ण के बेटे [[प्रद्युम्न]] अपने दैहिक सौंदर्य से मदासक्त थे।  कृष्ण अपने राज्य का आधा धन ही लेते थे, शेष यादववंशी उसका उपभोग करते थे।  श्रीकृष्ण के जीवन में भी ऐसे क्षण आये जब उन्होंने अपने जीवन का असंतोष [[नारद]] के सम्मुख कह सुनाया और पूछा कि यादववंशी लोगों के परस्पर द्वेष तथा अलगाव के विषय में उन्हें क्या करना चाहिए।  नारद ने उन्हें सहनशीलता का उपदेश देकर एकता बनाये रखने को कहा। &lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;(म0भा0, द्रोणाभिषेकपर्व, 11, श्लोक 10-11, शांतिपर्व 81, आश्व मेधिकपर्व,52)&lt;br /&gt;
==महाभारत- मौसलपर्व / ब्रह्म पुराण==&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] युद्ध में [[कौरव|कौरवों]] के संहार के उपरांत [[गांधारी]] ने श्रीकृष्ण को समस्त वंश सहित नष्ट होने का शाप दिया था।  युद्ध के 36 वर्ष उपरांत यादववंशियों में अन्याय और कलह अपने चरम पर पहुंच गया।  श्रीकृष्ण को बार-बार गांधारी के शाप का स्मरण हो आता।  तभी मौसल युद्ध में समस्त यादव, [[वृष्णि संघ|वृष्णि]] तथा [[अंधक संघ|अंधकवंशी]] लोगों का नाश हो गया। श्रीकृष्ण तपस्या में लगे भाई बलराम के पास तपस्या करने के लिए चले गये। बलराम योगयुक्त समाधिस्थ बैठे थे।  कृष्ण ने देखा कि उनके मुंह से एक श्वेत वर्ण का विशालकाय सर्प निकला जिसके एक सहस्त्र फन थे।  वह महासागर की ओर बढ़ गया।  सागर में से तक्षक, अरुण, कुंजर इत्यादि सब ने भगवान अनंत की भांति उसका स्वागत किया।  इस प्रकार बलराम का शरीर-त्याग देखकर कृष्ण पुन: गांधारी के शाप तथा [[दुर्वासा]] के शरीर पर जूठी खीर पुतवाने की बात स्मरण करते रहे, फिर मन, वाणी और इन्द्रियों का निरोध करके [[पृथ्वी]] पर लेट गये।  उसी समय जरा नामक एक भंयकर व्याध मृगों को मारता हुआ वहां पहुंचा। लेटे हुए कृष्ण को मृग समझकर उसने बाण से प्रहार किया जो श्रीकृष्ण को पांव के तलवों में लगा।  पास जाकर उसने कृष्ण को पहचाना तथा क्षमा-याचना की कृष्ण उसे आश्वस्त कर ऊर्ध्वलोक में चले गये।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(म0भा0, मौसलपर्व, अध्याय 04, ब्र0पु0 , 210 से 211 तक)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाभारत- उद्योगपर्व==&lt;br /&gt;
[[अभिमन्यु]] तथा [[उत्तरा]] के विवाह के उपरांत उपस्थित मित्र तथा संबंधियों ने मन्त्रणा की कि तेरह वर्ष पूर्ण होने पर भी [[कौरव]] आधा राज्य दे देंगे, ऐसा नहीं प्रतीत होता, अत: एक दूत [[दुर्योधन]] के पास भेजना चाहिए ताकि उसके विचार पता चले और दूसरी ओर सेना-संचय प्रारंभ करना चाहिए।  निश्चय के अनुसार [[अर्जुन]] कृष्ण के पास युद्ध में सहायता मांगने के लिए पहुंचा।  इससे पूर्व वहां दुर्योधन पहुंच चुका था। कृष्ण सो रहे थे।  दुर्योधन सिरहाने  की ओर के आसन पर बैठा था- अर्जुन पांव की ओर खड़ा रहा।  कृष्ण ने उठकर पहले अर्जुन को देखा फिर दुर्योधन को दोनों सहायता के लिए आये थे।  एक पहले आया था, दूसरा पहले देखा गया था।  अत: कृष्ण ने एक को सेना देने का तथा दूसरे को स्वयं बिना हथियार उठाए सहायता करने का निश्चय किया।  अर्जुन कृष्ण को पाकर तथा दुर्योंधन सेना पाकर प्रसन्न हो गये।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(म0भा0, उद्योगपर्व , अध्याय 1 से 7)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]] &lt;br /&gt;
[[Category: पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=9231</id>
		<title>आदित्य देवता</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=9231"/>
		<updated>2010-03-14T17:29:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'अरूण' to 'अरुण'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==आदित्य / Aditya==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मा]] के [[मरीचि]] नामक पुत्र थे। उनके पुत्र का नाम [[कश्यप]] हुआ। कश्यप का विवाह [[दक्ष]] की तेरह कन्याओं से हुआ था। प्रत्येक कन्या का संतति विशिष्ट वर्ग की हुई। उदाहरणत: &lt;br /&gt;
*[[अदिति]] ने [[देवता|देवताओं]] को जन्म दिया तथा [[दिति]] ने दैत्यों को। &lt;br /&gt;
*इसी प्रकार दनु से दानव, &lt;br /&gt;
*विनता से [[गरुड़]] और [[अरुण]], &lt;br /&gt;
*कद्रू से नाग मुनि तथा गंधर्व, &lt;br /&gt;
*रवसा से यक्ष और राक्षस, &lt;br /&gt;
*क्रोध से कुल्याएं, &lt;br /&gt;
*अरिष्टा से अप्सराएं, &lt;br /&gt;
*इरा से [[ऐरावत]] और हाथी, &lt;br /&gt;
*श्येनी से श्येन तथा भास, शुक आदि पक्षी उत्पन्न हुए। &lt;br /&gt;
*दैत्य दानव और राक्षस विमाता-पुत्र देवताओं से ईर्ष्या को अनुभव करते थे; अत: उन लोगों का परस्पर संघर्ष होता रहता था। एक बार वर्षों तक पारस्परिक युद्ध के उपरांत देवता पराजित हो गये। अदिति ने दुखी होकर [[सूर्य]] की आराधना की। सूर्य ने सहस्त्र अंशों सहित अदिति के गर्भ से जन्म लेकर असुरों को परास्त कर देवताओं को त्रिलोक का राज्य पुन: दिलाने का आश्वासन दिया। अदिति गर्भकाल में भी पूजापाठ, व्रत में लगी रहती थी। एक बार कश्यप ने रूष्ट होकर कहा-'यह व्रत रखकर तुम गर्भस्थ अंडे को मार डालना चाहती हो क्या?' &lt;br /&gt;
*इस कारण से सूर्य 'मार्तंड' कहलाया। '''कालांतर में सूर्य ने अदिति की कोख से जन्म लिया, इस कारण से आदित्य कहलाया।''' सूर्य की क्रूर दृष्टि के [[तेज]] से दग्ध होकर असुर भस्म हो गये। देवताओं को उनका खोया हुआ राज्य पुन: प्राप्त हो गया। [[विश्वकर्मा]] ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री [[संज्ञा]] का विवाह सूर्य (विवस्वान) से कर दिया। &amp;lt;ref&amp;gt;वैवस्वत मनु मा0 पु0, 99-102&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सूर्य की बारह मूर्तियां हैं: इन्द्र, धाता, पर्जन्य, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, भग, विवस्वान विष्णु, अंश, वरूण और मित्र। ये मूर्तियां क्रमश: देवराजत्व, विविध प्रजा सृष्टि, बादलों, औषधि, वनस्पतियों, अन्न, [[वायु]] संचालन, देहधारी शरीरों, [[अग्नि]], अवतरण, वायु-आनंद, [[जल]] तथा चंद्र सरोवर के तट पर स्थित हैं एक बार मित्र तथा [[वरूण]] को तपस्या करता देख [[नारद]] बहुत विस्मित हुए। उन्होंने मित्र से पूछा-'आप दोनों तो स्वयं पूजनीय हैं, फिर किसकी पूजा कर रहे हैं?' मित्र ने उत्तर दिया-'''सर्वोपरि स्थान सत-असत रूप देवपितृकर्म में पूजित [[ब्रह्मा]] का है, उसी की हम पूजा कर रहे हैं।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:विविध]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A5%E0%A4%A8&amp;diff=6001</id>
		<title>समुद्र मंथन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A5%E0%A4%A8&amp;diff=6001"/>
		<updated>2010-03-14T17:28:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'गरूड़' to 'गरुड़'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==समुद्र मंथन / Samudra Manthan==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
([[स्कन्द पुराण]], माहेश्वर खंड)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन [[बलि]] की सभा में बैठे हुए नीति-निपुण देवराज [[इन्द्र]] ने बलि को सम्बोधित करके हँसते हुए कहा- 'वीरवर ! हमारे हाथी-घोड़े आदि नाना प्रकार के बहुत से रत्न तो इस समय तुम्हें प्राप्त होने योग्य है, तत्काल ही समुद्र में गिर पड़े हैं।  अत: हम लोगों को समुद्र से उन रत्नों का उद्धार करने के लिये बहुत शीघ्र प्रयत्न करना चाहिये।  तुम्हारे कार्य की सिद्धि के लिये समुद्र का मन्थन करना उचित है।' इन्द्र के इस प्रकार प्रेरणा देने पर बलि ने शीघ्रतापूर्वक पूछा- 'यह समुद्र-मन्थन किस उपाय से सम्भव होगा?' &lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==आकाशवाणी==&lt;br /&gt;
इसी समय मेघ के समान गम्भीर स्वर में आकाशवाणी हुई- 'देवताओ और दैत्यो! तुम क्षीर समुद्र का मन्थन करो।  इस कार्य में तुम्हारे बल की वृद्धि होगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।  मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी  बनाओं, फिर [[देवता]] और दैत्य मिलकर मन्थन आरम्भ करो।' यह आकाशवाणी सुनकर सहस्त्रों दैत्य और देवता समुद्र-मन्थन के लिये उद्यत हो सुवर्ण के सदृश कान्तिमान् मन्दराचल के समीप गये।  वह पर्वत सीधा, गोलाकार, बहुत मोटा और अत्यन्त प्रकाशमान था।  अनेक प्रकार के रत्न उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।  चन्दन, पारिजात, नागकेशर, जायफल और चम्पा आदि भाँति-भाँति के वृक्षों से वह हरा-भरा दिखायी देता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मन्दराचल पर्वत==&lt;br /&gt;
उस महान पर्वत को देखकर सम्पूर्ण देवताओं ने हाथ जोड़कर कहा- 'दूसरों का उपकार करनेवाले महाशैल मन्दराचल ! हम सब देवता तुमसे कुछ निवेदन करने के लिये यहाँ आये हैं, उसे तुम सुनो।' उनके यों कहने पर मन्दराचल ने देहधारी पुरुष के रूप में प्रकट होकर कहा- 'देवगण! आप सब लोग मेरे पास किस कार्य से आये हैं, उसे बताइये।' तब इन्द्र ने मधुर वाणी में कहा- 'मन्दराचल! तुम हमारे साथ रहकर एक कार्य में सहायक बनो; हम समुद्र को मथकर उससे अमृत निकालना चाहते हैं, इस कार्य के लिये  तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचल ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और देवकार्य की सिद्धि के लिये देवताओं, दैत्यों तथा विशेषत: इन्द्र से कहा- 'पुण्यात्मा देवराज! आपने अपने वज्र से मेरे दोनों पंख काट डाले हैं, फिर आप लोगों के कार्य की सिद्धि के लिये वहाँ तक मैं चल कैसे सकता हूँ?' तब सम्पूर्ण देवताओं और दैत्यों ने उस अनुपम पर्वत को क्षीर समुद्र तक ले जाने की इच्छा से उखाड़ लिया; परंतु वे उसे धारण करने में समर्थ न हो सके।  वह महान पर्वत उसी समय देवताओं और दैत्यों के ऊपर गिर पड़ा।  कोई कुचले गये, कोई मर गये, कोई मूर्च्छित हो गये, कोई एक-दूसरे को कोसने और चिल्लाने लगे तथा कुछ लोगों ने बड़े क्लेश का अनुभव किया।  इस प्रकार उनका उद्यम और उत्साह भंग हो गया।  वे देवता और दानव सचेत होने पर जगदीश्र्वर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे- 'शरणागतवत्सल महाविष्णो! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है।'&lt;br /&gt;
==वासुकि नाग==&lt;br /&gt;
उस समय देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये [[गरुड़]] की पीठ पर बैठे हुए भगवान [[विष्णु]] सहसा वहाँ प्रकट हो गये।  वे सबको अभय देने वाले हैं।  उन्होंने देवताओं और दैत्यों की ओर दृष्टिपात करके खेल-खेल में ही उस महान पर्वत को उठाकर गरुड़ की पीठ पर रख लिया।  फिर वे देवताओं और दैत्यों को क्षीर-समुद्र के उत्तर-तट पर ले गये और पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल को समुद्र में डालकर तुरंत वहाँ से चल दिये।  तदनन्तर सब देवता दैत्यों को साथ लेकर वासुकि नाग के समीप गये और उनसे भी अपनी प्रार्थना स्वीकार करायी।  इस प्रकार मन्दराचल को मथानी और वासुकि-नाग को रस्सी बनाकर देवताओं और दैत्यों ने क्षीर-समुद्र का मन्थन आरम्भ किया।  इतने में ही वह पर्वत समुद्र में डूबकर रसातल को जा पहुँचा।  तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु ने कच्छपरूप धारण करके तत्काल ही मन्दराचल को ऊपर उठा दिया।  उस समय यह एक अद्भुत घटना हुई।  फिर जब देवता और दैत्यों ने मथानी को घुमाना आरम्भ किया, तब वह पर्वत बिना गुरु के ज्ञान की भाँति कोई सुदृढ़ आधार न होने के कारण इधर-उधर डोलने लगा।  यह देख परमात्मा भगवान् विष्णु स्वयं ही मन्दराचल के आधार बन गये और उन्होंने अपनी चारों भुजाओं से मथानी बने हुए उस पर्वत को भली-भाँति पकड़कर उसे सुखपूर्वक  घुमाने योग्य बना दिया।  तब अत्यन्त बलवान् देवता और दैत्य एकीभूत हो अधिक जोर लगाकर क्षीर-समुद्र का मन्थन करने लगे।  &lt;br /&gt;
==त्रिलोक की रक्षा==&lt;br /&gt;
कच्छप रूपधारी भगवान की पीठ जन्म से ही कठोर थी और उस पर घूमने वाला पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल भी वज्रसार की भाँति दृढ़ था।  उन दोनों की रगड़ से समुद्र में बड़वानल प्रकट हो गया।  साथ ही हालाहल विष उत्पन्न हुआ।  उस विष को सबसे पहले [[नारद]] जी ने देखा।  तब अमित तेजस्वी देवर्षि ने देवताओं को पुकार कर कहा- '[[अदिति]] कुमारो! अब तुम समुद्र का मन्थन न करो।  इस समय सम्पूर्ण उपद्रवों का नाश करने वाले भगवान [[शिव]] की प्रार्थना करो।  वे परात्पर हैं, परमानन्दस्वरूप हैं तथा योगी पुरुष भी उन्हीं का ध्यान करते हैं।' देवता अपने स्वार्थसाधन में संलग्न हो समुद्र मंथन रहे थे।  वे अपनी ही अभिलाषा में तन्मय होने के कारण नारद जी की बात नहीं सुन सके।  केवल उद्यम का भरोसा करके वे क्षीर-सागर के मन्थन में संलग्न  थे।  अधिक मन्थन से जो हालाहल विष प्रकट हुआ, वह तीनों लोकों को भस्म कर देनेवाला था। वह प्रौढ़ विष देवताओं का प्राण लेने के लिये उनके समीप आ पहुँ चा और ऊपर–नीचे तथा सम्पूर्ण दिशाओं में फैल गया।  समस्त प्राणियों को अपना ग्रास बनाने के लिये प्रकट हुए उस कालकूट विष को देखकर वे सब देवता और दैत्य हाथ में पकड़े हुए नागराज वासुकि को मन्दराचल पर्वतसहित वहीं छोड़ भाग खड़े हुए।  उस समय उस लोकसंहारकारी कालकूट विष को भगवान शिव ने स्वयं अपना ग्रास बना लिया।  उन्होंने उस विष को निर्मल (निर्दोष) कर दिया।  इस प्रकार भगवान शंकर की बड़ी भारी कृपा होने से देवता, असुर, मनुष्य तथा सम्पूर्ण त्रिलोकी की उस समय कालकूट विष से रक्षा हुई।&lt;br /&gt;
==चन्द्रदेव का प्राकट्य== &lt;br /&gt;
तदनन्तर भगवान विष्णु के समीप मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर देवताओं ने पुन: समुद्र-मन्थन आरम्भ किया।  तब समुद्र से देवकार्य की सिद्धि के लिये अमृतमयी कलाओं से परिपूर्ण चन्द्रदेव प्रकट हुए।  सम्पूर्ण देवता, असुर और दानवों ने भगवान [[चंद्र|चंद्नमा]] को प्रणाम किया और गर्गाचार्य जी  से अपने-अपने चन्द्रबल की यथार्थ रूप से जिज्ञासा की।  उस समय गर्गाचार्य जी ने देवताओं से कहा- 'इस समय तुम सब लोगों का बल ठीक है। तुम्हारे सभी उत्तम ग्रह केंन्द्र स्थान में (लग्न में, चतुर्थ स्थान में, सप्तम स्थान में और दशम स्थान में) हैं।  चन्द्रमा से गुरु का योग हुआ है। [[बुध]], [[सूर्य]], [[शुक्र]], [[शनि]] और [[मंगल]] भी चन्द्रमा से संयुक्त हुए हैं।  इसलिये तुम्हारे कार्य की सिद्धि के निमित्त इस समय चन्द्रबल बहुत उत्तम है। यह गोमन्त नामक मुहूर्त है, जो विजय प्रदान करने वाला है।' महात्मा गर्गजी  के इस प्रकार आश्र्वासन देने पर महाबली देवता गर्जना करते हुए बड़े वेग से समुद्र-मन्थन करने लगे।  &lt;br /&gt;
==क्षीर-समुद्र का मन्थन==&lt;br /&gt;
मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उठ रही थी।  इस बार के मन्थन से देवकार्यों की सिद्धि के लिये साक्षात् सुरभि [[कामधेनु]] प्रकट हुईं। उन्हें काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएँ घेरे हुए थीं।  उस समय ऋषियों ने बड़े हर्ष में भरकर देवताओं और दैत्यों से कामधेनु के लिये याचन की और कहा- 'आप सब लोग मिलकर भिन्न-भिन्न गोत्रवाले ब्राह्मणों को कामधेनु सहित इन सम्पूर्ण गौओं का दान अवश्य करें।' ऋषियों के याचना करने पर देवताओं और दैत्यों ने भगवान् शंकर की प्रसन्नता के लिये वे सब गौएँ दान कर दीं तथा यज्ञ कर्मों में भली-भाँति मन को लगाने वाले उन परम मंगलमय महात्मा ऋषियों ने उन गौओं का दान स्वीकार किया।  तत्पश्चात सब लोग बड़े जोश में आकर क्षीरसागर को मथने लगे।  तब समुद्र से कल्पवृक्ष, पारिजात, आम का वृक्ष और सन्तान- ये चार दिव्य वृक्ष प्रकट हुए।  &lt;br /&gt;
==रत्न कौस्तुभ==&lt;br /&gt;
उन सबको एकत्र रखकर देवताओं ने पुन: बड़े वेग से समुद्र मन्थन आरम्भ किया।  इस बार के मन्थन से रत्नों में सबसे उत्तम रत्न कौस्तुभ प्रकट हुआ, जो सूर्यमण्डल के समान परम कान्तिमान था।  वह अपने प्रकाश से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रहा था।  देवताओं ने चिन्तामणि को आगे रखकर कौस्तुभ का दर्शन किया और उसे भगवान विष्णु की सेवा में भेंट कर दिया।  तदनन्तर, चिन्तामणि को मध्य में रखकर देवताओं और दैत्यों ने पुन: समुद्र को मथना आरम्भ किया।  वे सभी बल में बढ़े-चढ़े थे और बार-बार गर्जना कर रहे थे।  अब की बार उसे मथे जाते हुए समुद्र से उच्चै:श्रवा नामक अश्र्व प्रकट हुआ।  वह समस्त अश्र्वजाति में एक अद्भुत रत्न था।  उसके बाद गज जाति में रत्न भूत [[ऐरावत]] प्रकट हुआ।  उसके साथ श्वेतवर्ण के चौसठ हाथी और थे।  ऐरावत के चार दाँत बाहर निकले हुए थे और मस्तक से मद की धारा बह रही थी। इन सबको भी मध्य में स्थापित करके वे सब पुन: समुद्र मथने लगे।  उस समय उस समुद्र से मदिरा, भाँग, काकड़ासिंगी, लहसुन, गाजर, अत्यधिक उन्मादकारक धतूर तथा पुष्कर आदि बहुत-सी वस्तुएँ प्रकट हुईं।  इन सबको भी समुद्र के किनारे एक स्थान पर रख दिया गया।  तत्पश्चात वे श्रेष्ठ देवता और दानव पुन: पहले की ही भाँति समुद्र-मन्थन करने लगे।  अब की बार समुद्र से सम्पूर्ण भुवनों की एकमात्र अधीश्वरी दिव्यरूपा देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्हें ब्रह्मवेत्ता पुरुष आन्वीक्षिकी (वेदान्त-विद्या) कहते हैं।  इन्हीं को दूसरे लोग 'मूल-विद्या' कहकर पुकारते हैं।  &lt;br /&gt;
==देवी महालक्ष्मी==&lt;br /&gt;
कुछ सामर्थ्यशाली महात्मा इन्हीं को वाणी और ब्रह्मविद्या भी कहते हैं।  कोई-कोई इन्हीं को ऋद्धि, सिद्धि, आज्ञा और आशा नाम देते हैं। कोई योगी पुरुष इन्हीं को 'वैष्णवी' कहते हैं। सदा उद्यम में लगे रहने वाले माया के अनुयायी इन्हीं को 'माया' के रूप में जानते हैं।  जो अनेक प्रकार के सिद्धान्तों को जानने वाले तथा ज्ञानशक्ति से सम्पन्न हैं, वे इन्हीं को भगवान की 'योगमाया' कहते हैं।  देवताओं ने देखा देवी महालक्ष्मी का रूप परम सुन्दर है।  उनके मनोहर मुख पर स्वाभाविक प्रसन्नता विराजमान है। हार और नूपुरों से उनके श्रीअंगो की बड़ी शोभा हो रही है।  मस्तक पर छत्र तना हुआ है, दोनों ओर से चँवर डुल रहे हैं; जैसे माता अपने पुत्रों की ओर स्नेह और दुलार भरी दृष्टि से देखती है, उसी प्रकार सती महालक्ष्मी ने देवता, दानव, सिद्ध, चारण और नाग आदि सम्पूर्ण प्राणियों की ओर दृष्टिपात किया।  माता महालक्ष्मी की कृपा-दृष्टि पाकर सम्पूर्ण देवता उसी समय श्रीसम्पन्न हो गये।  वे तत्काल राज्याधिकारी के शुभ लक्षणों से सम्पन्न दिखायी देने लगे।&lt;br /&gt;
==लक्ष्मी द्वारा नारायण का वरण== &lt;br /&gt;
तदनन्तर देवी [[लक्ष्मी]] ने भगवान मुकुन्द की ओर देखा।  उनके श्रीअंग तमाल के समान श्यामवर्ण थे।  कपोल और नासिका बड़ी सुन्दर थी। वे परम मनोहर दिव्य शरीर से प्रकाशित हो रहे थे।  उनके वक्ष:स्थल में श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित था।  भगवान एक हाथ में कौमोद की गदा शोभा पा रही थी।  भगवान् नारायण की उस दिव्य शोभा को देखते ही लक्ष्मी जी आश्चर्यचकित हो उठीं और हाथ में वनमाला ले सहसा हाथी से उतर पड़ीं।  वह माला श्रीजी ने अपने ही हाथों बनायी थीं, उसके ऊपर भ्रमर मंडरा रहे थे।  देवी ने वह सुन्दर वनमाला परमपुरुष भगवान विष्णु के कण्ठ में पहना दी और स्वयं उनके वाम भाग में जाकर खड़ी हो गयीं।  उस शोभाशाली दम्पति का वहाँ दर्शन करके सम्पूर्ण देवता, दैत्य, सिद्ध, अप्सराएँ, किन्नर तथा चारणगण परम आनन्द को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>संस्कृत</title>
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		<updated>2010-03-14T17:28:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'गरूड़' to 'गरुड़'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==संस्कृत भाषा / Sanskrit Language==&lt;br /&gt;
संस्कृत भारत की एक शास्त्रीय भाषा है । यह दुनिया की सबसे पुरानी उल्लिखित भाषाओं में से एक है । संस्कृत  हिन्दी-यूरोपीय भाषा परिवार की मुख्य शाखा हिन्दी-ईरानी भाषा की हिन्दी-आर्य उपशाखा की मुख्य भाषा है । आधुनिक भारतीय भाषाएँ हिन्दी, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, बंगला, उड़िया, नेपाली, कश्मीरी, उर्दू   आदि सभी भाषाएं इसी से उत्पन्न हैं । इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है । [[हिन्दू धर्म]] के लगभग सभी [[धर्मग्रन्थ]] संस्कृत भाषा में ही लिखे हुए हैं । आज भी हिन्दू धर्म के [[यज्ञ]] और पूजा संस्कृत भाषा में ही होते हैं ।&lt;br /&gt;
आधुनिक विद्वान मानते हैं कि  संस्कृत भाषा पाँच हजार सालों से चलता आ रहा है । भारतवर्ष में यह आर्यभाषा सर्वाधिक महत्वपूर्ण, व्यापक और संपन्न है । इसके द्वारा भारत की उत्कृष्टतम प्रतिभाएँ, अमूल्य चिंतन, मनन, विवेक, रचनात्मक, सृजन और वैचारिक ज्ञान की  अभिव्यक्ति हुई है । आज भी सभी क्षेत्रों में इस भाषा के द्वारा पुस्तक संरचना की धारा अबाध रूप से बह रही है । आज भी यह भाषा ( अत्यंत सीमित क्षेत्र में ही सही ) बोली, पढ़ी और लिखी जाती है । इसमें व्याख्यान होते हैं और भारत के विभिन्न प्रादेशिक भाषा भाषी योग्यजन इसका परस्पर वार्तालाप में भी प्रयोग करते हैं । हिंदुओं के सांस्कारिक कार्यों में आज भी यह प्रयुक्त होती है । इसी कारण ग्रीक और लैटिन आदि प्राचीन मृत भाषाओं (डेड लैंग्वेजेज़) से संस्कृत की स्थिति सर्वथा भिन्न है । यह अमर भाषा है ।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
संस्कृत का अर्थ है, संस्कार की हुई भाषा।  इसकी गणना संसार की प्राचीनतम ज्ञात भाषाओं में होती है।  संस्कृत को देववाणी भी कहते हैं।  &lt;br /&gt;
*[[ॠग्वेद]]  संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। ऋग्वेद के मन्त्रों का विषय सामान्यत: यज्ञों में की जाने वाली देवताओं की स्तुति है और ये मन्त्र गीतात्मक काव्य हैं।&lt;br /&gt;
*[[यजुर्वेद]]  की शुक्ल और कृष्ण दो शाखाएं हैं। इसमें कर्मकांड के कुछ प्रमुख पद्यों का और कुछ गद्य का संग्रह है। ईशोपनिषद इसी का अंतिम भाग है।&lt;br /&gt;
*[[सामवेद]] में, जिसका संकलन यज्ञों में वीणा आदि के साथ गाने के लिए किया गया है, 75 मौलिक मन्त्रों को छोड़कर शेष ऋग्वेद के मन्त्रों का ही संकलन है। &lt;br /&gt;
*[[अथर्ववेद]]  की भी शौनक और पैप्पलाद नामक दो शाखाएं हैं।  इस वेद में जादू-टोना, वशीकरण आदि विषयक मन्त्रों के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम के सूक्त भी मिलते है। यह प्रथम तीन वेदों से भिन्न तथा गृह्य और सामाजिक कार्यकलापों से संबंधित है। &lt;br /&gt;
*संस्कृत भाषा के दो रूप माने जाते हैं वैदिक या छांदस और लौकिक।  चार [[वेद]] संहिताओं की भाषा ही वैदिक या छांदस कहलाती है।  इसके बाद के ग्रंथों को लौकिक कहा गया है।&lt;br /&gt;
----    &lt;br /&gt;
ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञों के कर्मकांड का विवेचन है।  प्रत्येक वेद के अलग-अलग ब्राह्मण हैं।  ऋग्वेद, के ब्राह्मण '[[ऐतरेय ब्राह्मण|ऐतरेय]]' और '[[कौषीतकी ब्राह्मण|कौषीतकी]]' यजुर्वेद का '[[शतपथ ब्राह्मण|शतपथ]] और सामवेद का '[[पंचविंश]]' है।  ब्राह्मण ग्रंथों के बाद आख्यकों और उपनिषदों का क्रम आता हैं[[उपनिषद|उपनिषदों]]  का कर्मकांड से कोई संबंध नहीं है।  ये ईश्वर, प्रकृति और उनके पारस्परिक संबंध की ब्राह्म विद्या की विवेचना करते हैं।  उपनिषदों की कुल ज्ञात संख्या 18 है जिनमें ये दस प्रमुख हैं-ईश, बृहदारण्यक, ऐतरेय, कौषीतकी, केन, छांद्योग्य, तैत्तरीय, कठ, मंड्रक, और मांडूक्य। ये उपनिषद प्राचीन हैं।  कुछ की रचना बहुत बाद तक होती रही है, जैसे 'अल्लोपनिषद' जो स्पष्टत: मुसलमानों के आगमन के बाद लिखा गया। &lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
हिंदू समाज वेदों को अनादि और अपौरूषेय मानता आया है। पर आधुनिक विद्वानों के एक वर्ग ने [[वेदों का रचना काल]] 6000 ई॰पू0 से लेकर 2500 ई॰पू0 तक तथा ब्राह्मण ग्रंथों और उपनिषदों का समय इसके बाद का निर्धारित किया है। संस्कृत साहित्य में वैदिक वांड्मय के बाद व्यास रचित [[महाभारत]] और [[वाल्मीकि]] रचित [[रामायण]] प्रसिद्ध ग्रंथ है।  महाभारत को उसके विस्तृतज्ञान-भंडार को देखते हुए पांचवां वेद भी कहा जाता है। विषय की दृष्टि से रामायण की कथा पहले की (त्रेता युग) की है और महाभारत की बाद ([[द्वापर युग]]) की।  पर महाभारत का रचना-काल पहले का है। 18 पर्वों का यह ग्रंथ ई॰पू0 चौथी-तीसरी शताब्दी तक अपना मूल रूप ले चुका था।  महाभारत से आख्यानों की परंपरा आरंभ होती है और रामायण से महाकाव्य और खंड काव्यों की; जिस परंपरा में [[कालिदास]] जैसे कवि हुए।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
*[[पुराण|पुराणों]] का अपना महत्व है। ये सृष्टि, लय, [[मन्वन्तर|मन्वंतरों]], प्राचीन ऋषि-मुनियों तथा राजवंशों के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं।  इनका रचनाकाल दूसरी-तीसरी शताब्दी से आठवीं-नंवी शताब्दी तक माना जाता है। इनका महत्व तत्कालीन भारत की सभ्यता और संस्कृति के अध्ययन की दृष्टि से विशेष है। कुल पुराण 18 हैं-[[विष्णु पुराण|विष्णु]], [[पद्म पुराण|पद्म]], [[ब्रह्म पुराण|ब्रह्म]], [[शिव पुराण|शिव]], [[भागवत पुराण|भागवत]], [[नारद पुराण|नारद]], [[मार्कण्डेय पुराण|मार्कण्डेय]], [[अग्नि पुराण|अग्नि]], [[ब्रह्म वैवर्त पुराण|ब्रह्मवैवर्त]], [[लिङ्ग पुराण|लिंग]], [[वराह पुराण|वराह]], [[स्कन्द पुराण|स्कंद]], [[वामन पुराण|वामन]], [[कूर्म पुराण|कूर्म]], [[मत्स्य पुराण|मत्स्य]], [[गरुड़ पुराण|गरुड़]], [[ब्रह्माण्ड पुराण|ब्रह्मांड]] और [[भविष्य पुराण|भविष्य]]।&lt;br /&gt;
*स्मृतियां, जिनमें '[[मनुस्मृति]]', '[[याज्ञवल्क्य स्मृति]]', '[[नारद स्मृति]]' और '[[पाराशर स्मृति]]' मुख्य हैं, दूसरी-तीसरी शताब्दी की रचनाएं मानी जाती हे। '[[अमरकोश]]' की रचना चौथी –पांचवीं ईस्वी में हुई।  [[चाणक्य|कौटिल्य]] का 'अर्थशास्त्र' अपने विषय का एकमात्र ग्रंथ है जिसमें राज्य प्रबंध, राजनीति , समाजिक , आर्थिक संगठन की सांगोपांग विवेचना की गई है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
*संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की माता है । इसकी अधिकांश शब्दावली या तो संस्कृत से ली गयी है या संस्कृत से प्रभावित है । पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक एकरूपता आयेगी जिससे भारतीय एकता बलवती होगी । इसे पुनः प्रचलित भाषा भी बनाया जा सकता है ।&lt;br /&gt;
*[[हिन्दू]], [[बौद्ध]], [[जैन]] आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में ही हैं ।&lt;br /&gt;
*हिन्दुओं के सभी पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कार की भाषा संस्कृत ही है ।&lt;br /&gt;
*हिन्दुओं, बौद्धों और जैनों के नाम भी संस्कृत भाषा पर आधारित होते हैं ।&lt;br /&gt;
*भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली भी संस्कृत से ही व्युत्पन्न की जाती है ।&lt;br /&gt;
*संस्कृत, भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है ।&lt;br /&gt;
*संस्कृत का प्राचीन साहित्य अत्यधिक प्राचीन, विशाल और विविधता से पूर्ण है । इसमें अध्यात्म, [[दर्शन शास्त्र|दर्शन]], ज्ञान-विज्ञान, और साहित्य की भरपूर सामग्री है । इसके अध्ययन से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति को बढावा मिलेगा । संस्कृत साहित्य विविध विषयों का भंडार है। इसका प्रभाव सम्पूर्ण विश्व के चिंतन पर पड़ा है।  भारत की संस्कृति का यह एकमात्र सुदृढ़ आधार है। भारत की लगभग सभी भाषाएं अपने शब्द-भंडार के लिए आज भी संस्कृत पर आश्रित हैं। संस्कृत को कम्प्यूटर के लिये  सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>विदिशा</title>
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		<updated>2010-03-14T17:28:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'गरूड़' to 'गरुड़'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==विदिशा / Vidisha==&lt;br /&gt;
विदिशा भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है। यह मालवा के उपजाऊ पठारी क्षेत्र के उत्तर- पूर्व हिस्से में अवस्थित है तथा पश्चिम में मुख्य पठार से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक व पुरातात्विक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र मध्यभारत का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जा सकता है। नगर से दो मील उत्तर में जहाँ इस समय बेसनगर नामक एक छोटा-सा गाँव है, प्राचीन विदिशा बसी हुई है। यह नगर पहले दो नदियों के संगम पर बसा हुआ था, जो कालांतर में दक्षिण की ओर बढ़ता जा रहा है। इन प्राचीन नदियों में एक छोटी-सी नदी का नाम वैस है। इसे विदिशा नदी के रुप में भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
इसकी भौगोलिक स्थिति बड़ी ही महत्वपूर्ण थी। [[पाटलिपुत्र]] से [[कौशाम्बी]] होते हुये जो व्यापारिक मार्ग [[उज्जयिनी]] (आधुनिक उज्जैन) की ओर जाता था वह विदिशा से होकर गुजरता था। यह वेत्रवती नदी के तट पर बसा था, जिसकी पहचान आधुनिक बेतवा नदी के साथ की जाती है। &lt;br /&gt;
==महाभारत, रामायण में विदिशा== &lt;br /&gt;
इस नगर का सबसे पहला उल्लेख [[महाभारत]] में आता है। इस पुर के विषय में [[रामायण]] में एक परंपरा का वर्णन मिलता है जिसके अनुसार [[राम|रामचन्द्र]] ने इसे [[शत्रुघ्न]] को सौंप दिया था। शत्रुघ्न के दो पुत्र उत्पन्न हुये जिनमें छोटा [[सुबाहु]] नामक था। उन्होंने इसे विदिशा का शासक नियुक्त किया था। थोड़े ही समय में यह नगर अपनी अनुकूल परिस्थितियों के कारण पनप उठा। भारतीय आख्यान, कथाओं एवं इतिहास में इसका स्थान निराले तरह का है। इस नगर की नैसर्गिक छटा ने कवियों और लेखकों को प्रेरणा प्रदान की। वहाँ पर कुछ विदेशी भी आये और इसकी विशेषताओं से प्रभावित हुये। कतिपय [[बौद्ध]] ग्रन्थों के वर्णन से लगता है कि इस नगर का सम्बन्ध संभवत: किसी समय [[अशोक]] के जीवन के साथ भी रह चुका था। इनके अनुसार इस नगर में देव नामक एक धनीमानी सेठ रहता था जिसकी देवा नामक सुन्दर पुत्री थी। अपने पिता के जीवनकाल में अशोक उज्जयिनी का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। पाटलिपुत्र से इस नगर को जाते समय वह विदिशा में रूक गया थां देवा के रूप एवं गुणों से वह प्रभावित हो उठा और उससे उसने विवाह कर लिया। इस रानी से [[महेन्द्र]] नामक आज्ञाकारी पुत्र और [[संघमित्रा]] नामक आज्ञाकारिणी पुत्री उत्पन्न हुई। दोनों ही उसके परम भक्त थे और उसे अपने जीवन में बड़े ही सहायक सिद्ध हुये थे। संघमित्रा को बौद्ध ग्रन्थों में विदिशा की महादेवी कहा गया है।&lt;br /&gt;
==कालिदास के मेघदूत में== &lt;br /&gt;
इस नगर का वर्णन [[कालिदास]] ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ मेघदूत में किया है। अनके अनुसार यहाँ पर दशार्ण देश की राजधानी थी। प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मेघ से कहता है- अरे मित्र! सुन। जब तू दशार्ण देश पहुँचेगा, तो तुझे ऐसी फुलवारियाँ मिलेंगी, जो फूले हुये केवड़ों के कारण उजली दिखायी देंगी। गाँव के मन्दिर कौओं आदि पक्षियों के घोंसलों से भरे मिलेंगे। वहाँ के जंगल पकी हुई काली जामुनों से लदे मिलेंगे और हंस भी वहाँ कुछ दिनों के लिये आ बसे होगें।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुँचेगा, तो तुझे वहाँ विलास की सब सामग्री मिल जायेगी। जब तू वहाँ सुहावनी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती (बेतवा) के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीयेगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
वहाँ तू पहुँच कर थकावट मिटाने के लिये 'नीच' नाम की पहाड़ी पर उतर जाना। वहाँ पर फूले हुय [[कदम्ब]] के वृक्षों को देखकर ऐसा जान पड़ेगा कि मानों तुझसे भेंट करने के कारण उसके रोम-रोम फरफरा उठे हों। उस पहाड़ी की गुफ़ाओं से उन सुगन्धित पदार्थों की गन्ध निकल रही होगी, जिन्हें वहाँ के रसिक वेश्याओं के साथ रति करते समय काम में लाते हैं। इससे तुझे यह भी पता चल जायेगा कि वहाँ के नागरिक कितनी स्वतंत्रता से जवानी का आनन्द लेते हैं। कालिदास के इस वर्णन से लगता है कि वे इस नगर में रह चुके थे और इस कारण वहाँ के प्रधान स्थानों तथा पुरवासियों के सामाजिक जीवन से परिचित थे।&lt;br /&gt;
==मालविकाग्निमित्रम् में== &lt;br /&gt;
*शुंगों के समय में इस नगर का राजनीतिक महत्त्व बढ़ गया। साम्राज्य के पश्चिमी हिस्सों की देख-रेख के लिये वहाँ एक दूसरी राजधानी भी स्थापित की गई। वहाँ शुंग-राजकुमार [[अग्निमित्र]] सम्राट के प्रतिनिधि (वाइसराय) के रूप में रहने लगा। यह वही अग्निमित्र है, जो कालिदास के 'मालविकाग्निमित्रम्' नामक नाटक का नायक है। इस ग्रन्थ में उसे वैदिश अर्थात् विदिशा का निवासी कहा गया है। उसका पुत्र वसुमित्र यवनों से लड़ने के लिये [[सिन्धु नदी]] के तट पर भेजा गया था। देवी धारिणी, जो अग्निमित्र की प्रधान महिषी थीं उस समय विदिशा में ही थीं। 'मालविकाग्निमित्रम्' में अपने पुत्र की सुरक्षा के लिये उन्हें अत्यन्त व्याकुल दिखाया गया है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*शुंगों के बाद विदिशा में नाग राजा राज्य करने लगे। इस नाग-शाखा का उल्लेख [[पुराण|पुराणों]] में हुआ है। इसी वंश में गणपतिनाग हुआ था, जिसके नाम का उल्लेख [[समुद्रगुप्त]] की प्रयाग-प्रशस्ति में हुआ है। वह बड़ा पराक्रमी लगता है। उसके राज्य में [[मथुरा]] का भी नगर सम्मिलित था। वहाँ से उसके सिक्के मिले हैं। कुछ लोगों का अनुमान है कि जब समुद्रगुप्त उत्तरी भारत में दिग्विजय कर रहा था उस समय वहाँ के नव राजाओं ने उसके विरूद्ध एक गुटबन्दी की, जिसका नायक गणपतिनाग था। ऐसा गुट सचमुच बना या नहीं, इस विषय में हम बहुत निश्चित तो नहीं हो सकते। पर इतना स्पष्ट है कि उस समय के राजमंडल में गणपतिनाग का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता था।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*भरहुत के लेखों से लगता है कि विदिशा के निवासी बड़े ही दानी थे। वहाँ के एक अभिलेख के अनुसार वहाँ का रेवतिमित्र नामक एक नागरिक भरहुत आया हुआ था। उसकी भार्या चंदा देवी ने वहाँ पर एक स्तम्भ का निर्माण किया था। भरहुत के अन्य लेखों में विदिशा के कतिपय उन नागरिकों के नाम मिलते हैं, जिन्होंने या तो किसी स्मारक का निर्माण किया था या वहाँ के मठों के भिक्षुसंघ को किसी तरह का दान दिया था। इनमें भूतरक्षित, आर्यमा नामक महिला तथा वेणिमित्र की भार्या वाशिकी आदि प्रमुख थे। &lt;br /&gt;
*कला के क्षेत्र में इस नगर का महत्त्व कुछ कम नहीं थां पेरिप्लस नामक विदेशी महानाविक के अनुसार वहाँ हाथी-दाँत की वस्तुएँ उत्तर कोटि की बनती थीं। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार वहाँ की बनी हुई तेज धार की तलवारों की बड़ी माँग थी। इस स्थान सें शुंग-काल का बना हुआ एक गरुड़-स्तम्भ मिला है, जिससे ज्ञात होता है कि वहाँ पर [[वैष्णव धर्म]] का विशेष प्रचार था। इस स्तम्भ पर एक लेख मिलता है जिसके अनुसार तक्षशिला से हेलिओडोरस नामक यूनानी विदिशा आया था। वह वैष्णव मतावलम्बी था और इस स्तम्भ का निर्माण उसी ने कराया था। सांस्कृतिक *दृष्टि से यह लेख बड़ा ही महत्वपूर्ण है। यह इस बात का परिचायक है कि विदेशियों ने भी भारतीय धर्म और संस्कृति को अपना लिया था। विदिशा में इसी तरह और भी भागों से लोग आये होंगे। इस धर्मकेन्द्र में अपने आध्यात्मिक लाभ के लिये लोगों ने स्मारकों का निर्माण किया होगा। विदिशा को [[स्कन्द पुराण]] में तीर्थस्थान कहा गया है। &lt;br /&gt;
*हेलिओडोरस द्वारा निर्मित विदिशा का उपर्युक्त गरुड़-स्तम्भकला का एक अच्छा नमूना है। वह मूलत: अशोक के ही स्तम्भों के आदर्श पर बना था। पर साथ ही उसमें कुछ मौलिक विशेषतायें भी हैं। इसका सबसे निचला भाग आठ कोनों का है। इसी तरह मध्य भाग सोलह कोने का और ऊपरी भाग बत्तीस कोने का है। यह विशेषता हमें अशोक के स्तम्भों में नहीं दिखाई देती। इससे लगता है कि विदिशा के कलाकार निपुण थे और उनकी प्रतिभा मौलिक कोटि की थी। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]] [[Category:ऐतिहासिक स्थल]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<title>वामन अवतार</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{दशावतार}}&lt;br /&gt;
==वामन अवतार / Vaman Avtar==&lt;br /&gt;
श्री हरि जिस पर कृपा करें, वही सबल है। उन्हीं की कृपा से देवताओं ने अमृत-पान किया। उन्हीं की कृपा से असुरों पर युद्ध में वे विजयी हुए। पराजित असुर मृत एवं आहतों को लेकर अस्ताचल चले गये। असुरेश बलि [[इन्द्र]] के वज्र से मृत हो चुके थे। आचार्य [[शुक्राचार्य|शुक्र]] ने अपनी संजीवनी विद्या से बलि तथा दूसरे असुरों को भी जीवित एवं स्वस्थ कर दिया। बलि ने आचार्य की कृपा से जीवन प्राप्त किया था। वे सच्चे हृदय से आचार्य की सेवा में लग गये। शुक्राचार्य प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञ कराया। [[अग्नि]] से दिव्य रथ, अक्षय त्रोण, अभेद्य कवच प्रकट हुए।&lt;br /&gt;
आसुरी सेना [[अमरावती]] पर चढ़ दौड़ी। इन्द्र ने देखते ही समझ लिया कि इस बार [[देवता]] इस सेना का सामना नहीं कर सकेंगे। बलि ब्रह्मतेज से पोषित थे। देवगुरु के आदेश से देवता स्वर्ग छोड़कर भाग गये। अमर-धाम असुर-राजधानी बना। शुक्राचार्य ने बलि का इन्द्रत्व स्थिर करने के लिये [[अश्वमेध यज्ञ]] कराना प्रारम्भ किया। सौ अश्वमेध करके बलि नियम सम्मत इन्द्र बन जायँगे। फिर उन्हें कौन हटा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
'स्वामी, मेरे पुत्र मारे-मारे फिरते हैं।' देवमाता [[अदिति]] अत्यन्त दुखी थीं। अपने पति महर्षि [[कश्यप]] से उन्होंने प्रार्थना की। महर्षि तो एक ही उपाय जानते हैं- भगवान की शरण, उन सर्वात्मा की आराधना। अदिति ने फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में बारह दिन पयोव्रत करके भगवान की आराधना की। प्रभु प्रकट हुए। अदिति को वरदान मिला। उन्हीं के गर्भ से भगवान प्रकट हुए। शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी चतुर्भुज पुरुष अदिति के गर्भ से जब प्रकट हुए, तत्काल वामन ब्रह्मचारी बन गये। महर्षि कश्यप ने ऋषियों के साथ उनका [[उपनयन]] संस्कार सम्पन्न किया। भगवान वामन पिता से आज्ञा लेकर बलि के यहाँ चले। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[नर्मदा नदी|नर्मदा]] के उत्तर-तट पर असुरेन्द्र बलि अश्वमेध-यज्ञ में दीक्षित थे। यह उनका अन्तिम अश्वमेध था। छत्र, पलाश, दण्ड तथा कमण्डलु लिये, जटाधारी, अग्नि के समान तेजस्वी वामन ब्रह्मचारी वहाँ पधारे। बलि, शुक्राचार्य, ऋषिगण— सभी उस तेज से अभिभूत अपनी अग्नियों के साथ उठ खड़े हुए। बलि ने उनके चरण धोये, पूजन किया और प्रार्थना की कि जो भी इच्छा हो, वे माँग लें।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
'मुझे अपने पैरों से तीन पद भूमि चाहिये!' बलि के कुल की शूरता, उदारता आदि की प्रशंसा करके वामन ने माँगा। बलि ने बहुत आग्रह किया कि और कुछ माँगा जाय; पर वामन ने जो माँगना था, वही माँगा था। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'ये साक्षात [[विष्णु]] हैं!' आचार्य शुक्र ने सावधान किया। समझाया कि इनके छल में आने से सर्वस्व चला जायगा।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
'ये कोई हों, [[प्रह्लाद]] का पौत्र देने को कहकर अस्वीकार नहीं करेगा!' बलि स्थिर रहे। आचार्य ने ऐश्वर्य-नाश का शाप दे दिया। बलि ने भूमिदान का संकल्प किया और वामन विराट हो गये। एक पद में पृथ्वी, एक में स्वर्गादि लोक तथा शरीर से समस्त नभ व्याप्त कर लिया उन्होंने। उनका वाम पद ब्रह्मलोक से ऊपर तक गया। उसके अंगुष्ठ-नख से ब्रह्माण्ड का आवरण तनिक टूट गया। ब्रह्मद्रव वहाँ से ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट हुआ। [[ब्रह्मा]] जी ने भगवान का चरण धोया और चरणोदक के साथ उस ब्रह्मद्रव को अपने कमण्डलु में ले लिया। वही ब्रह्मद्रव [[गंगा]] जी बना।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
'तीसरा पद रखने को स्थान कहाँ है?' भगवान ने बलि को नरक का भय दिखाया। संकल्प करके दान न करने पर तो नरक होगा।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
'इसे मेरे मस्तक पर रख ले!' बलि ने मस्तक झुकाया। प्रभु ने वहाँ चरण रखा। बलि गरुड़ द्वारा बाँध लिये गये।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'तुम अगले [[मन्वन्तर]] में इन्द्र बनोगे! तब तक सुतल में निवास करो। मैं नित्य तुम्हारे द्वार पर गदापाणि उपस्थित रहूँगा।' दयामय द्रवित हुए। प्रह्लाद के साथ बलि सब असुरों को लेकर स्वर्गाधिक ऐश्वर्यसम्पन्न सुतल लोक में पधारे। शुक्राचार्य ने भगवान के आदेश से यज्ञ पूरा किया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
महेन्द्र को स्वर्ग प्राप्त हुआ। ब्रह्मा जी ने भगवान वामन को 'उपेन्द्र' पद प्रदान किया। वे इन्द्र के रक्षक होकर अमरावती में अधिष्ठित हुए। बलि के द्वार पर गदापाणि द्वारपाल तो बन ही चुके थे। [[त्रेता युग]] में दिग्विजय के लिये [[रावण]] ने सुतल-प्रवेश की धृष्टता की। बेचारा असुरेश्वर के दर्शन तक न कर सका। बलि के द्वारपाल ने पैर के अँगूठे से उसे फेंक दिया। [[पृथ्वी]] पर सौ [[योजन]] दूर [[लंका]] में आकर गिरा था वह।    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE_3&amp;diff=10610</id>
		<title>मूर्ति कला मथुरा 3</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE_3&amp;diff=10610"/>
		<updated>2010-03-14T17:28:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'गरूड़' to 'गरुड़'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{|style=&amp;quot;background-color:#F7F7EE;border:1px solid #cedff2&amp;quot; cellspacing=&amp;quot;5&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[मूर्ति कला]] ''':''' [[मूर्ति कला 2]] ''':''' [[मूर्ति कला 3]] ''':''' [[मूर्ति कला 4]] ''':''' [[मूर्ति कला 5]] ''':''' [[मूर्ति कला 6]]&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|}&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==मूर्ति कला 3 / संग्रहालय / Sculptures / Museum==&lt;br /&gt;
==कुषाण कला की प्रमुख देन— उपास्य मूर्तियों का निर्माण==&lt;br /&gt;
[[मथुरा]] में इस समय तीन संप्रदाय प्रमुख थे- [[जैन]], [[बौद्ध]] और [[ब्राह्मण]]। इनमें ब्राह्मण धर्म को छोड़कर किसी को भी मूलत: मूर्तिपूजा मान्य न थी, परन्तु मानव की दुर्बलता एवं अवलम्ब अथवा आश्रय खोजने की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण शनै:शनै: इन संप्रदायों के आचार्य स्वयं ही उपास्य देव बन गये। साथ ही साथ उपासना के प्रतीकों का भी प्रादुर्भाव हुआ। ई॰ पू0 द्वितीय शताब्दी के पहले से ही [[बुद्ध]] के प्रतीक जैसे, [[स्तूप]], भिक्षापात्र, उष्णीश, [[बोधिवृक्ष]], आदि लोकप्रिय हो गये थे। जैने समाज में भी चैत्यस्तम्भ, चैत्य-वृक्ष, अष्ट मांगलिक चिह्न आदि प्रतीकों को मान्यता मिल रही थी। [[शक-कुषाण काल|कुषाणकाल]] तक् पहुँचते पहुँचते इन प्रतीकों के स्थान पर प्रत्यक्ष मूर्ति की संस्थापना की इच्छा बल पकड़ने लगी और अल्प काल में ही माथुरी कला ने तीर्थंकर मूर्तियों और बौद्ध मूर्तियों को जन्म दिया। इसी के साथ [[विष्णु]], [[दुर्गा]], [[शिव]], [[सूर्य]], [[कुबेर]] आदि ब्राह्मण धर्म  की उपास्य मूर्तियाँ भी इसी समय बनीं। भारतीय कला को मथुरा कला की यह सबसे बड़ी देन है। [[गुप्त]] और [[गुप्त काल उत्तरार्ध|गुप्तोत्तर]] कला के विशाल प्रतिमा-संग्रह का आधार कुषाणकला में है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीर्थकर- प्रतिमा का जन्म==&lt;br /&gt;
जैनों की प्रारम्भिक पूजा पद्धति में निम्नांकित प्रतीकों का स्थान महत्त्वपूर्ण था- धर्मचक्र, स्तूप, त्रिरत्न, चैत्यस्तम्भ, चैत्य-वृक्ष, पूर्णघट, श्रीवत्स, शराव-संपुट, पुष्प-पात्र, पुष्प-पडलग, स्वस्तिक, मत्स्य-युग्म, व भद्रासन। इनके यहाँ अर्चा का एक दूसरा प्रतीक था आयागपट्ट। आयागपट्ट एक चौकोर शिलापट्ट होता था जिस पर या तो एकाधिक प्रतीक बने रहते थे या प्रतीकों के साथ तीर्थकर की छोटी सी प्रतिमा भी बनी रहती थी। इनमें से कुछ लेखांकित हैं। जिनसे पता चलता है कि ये पूजन के उद्देश्य से स्थापित किये जाते थे। मथुरा के इस प्रकार के कुषाणकालीन कई सुन्दर आयागपट्ट मिले हैं। इनमें से एक समूचा आयागपट्ट तथा तीर्थकर-प्रतिमा से शोभित दूसरा खंडित आयागपट्ट जो इस संग्रहालय में विद्यमान है, विशेष रूप से उल्लेखनीय है। समूचे वाले आयागपट्ट पर एक जैनस्पूप, उसका तोरण द्वार, सोपान मार्ग और दो चैत्यस्तंभ बने हैं जिन पर क्रमश: धर्मचक्र और सिंह की आकृतियाँ बनी हैं। सिंह का संबंध तीर्थकर [[महावीर]] से है।&lt;br /&gt;
तीर्थकर प्रतिमा के सर्वप्रथम दर्शन हमें आयागपट्टों पर ही होते हैं। यह कहना कठिन है कि तीर्थकर की प्रतिमा एवं बुद्ध की मूर्ति इन दोनों में प्रथम कौन बनी होगी। कदाचित यह दोनों कार्य साथ ही साथ हुए थे।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
मथुरा में [[कंकाली टीला|कंकाली टीले]] पर जैनों का बहुत बड़ा गढ़ था। यहाँ उनके विहार और स्तूप विद्यमान थे। यहीं से तीर्थकरों की प्रारम्भिक प्रतिमाएं मिली हैं। इन मूर्तियों की मुख्य विशेषताएँ अधोलिखित हैं;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*1.	ये मूर्तियाँ केवल दो ही प्रकार की हैं, एक तो पद्मासन बैठी हुई ध्यानस्थ मूर्तियाँ, और दूसरी जाँघ से हाथों को सटाकर सीधी खड़ी प्रतिमाएँ जिन्हें कायोत्सर्ग मुद्रा में स्थित प्रतिमाए कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*2.	तीर्थकरों के मस्तक या तो मुण्डित हैं या छोटे-छोटे घुंघराले केशों से अलंकृत हैं। आँखों की पुतलियाँ साधारण: नहीं दिखाई जाती थीं पर बाद के कलाकारों ने इस कमी को दूर करने के लिए अपने समय में कुछ कुषाणकालीन मूर्तियों में आँखें बनाई हैं। &lt;br /&gt;
*3.	तीर्थकरों के कान कन्धों तक लटकने वाले नहीं हैं और मुख पर भी कोई विशेष भाव लक्षित नहीं होता। &lt;br /&gt;
*4.	महापुरुष के बोधक चिह्नों में हथेलियों पर धर्मचक्र और पैर के तलुओं पर त्रिरत्न और धर्मचक्र दोनों बने रहते हैं। वक्षस्थल पर बीचोंबीच श्रीवत्स चिह्न बना रहता है। कुछ प्रतिमाओं में हाथ की उंगलियों के पोर पर भी श्रीवत्सादि मंगलचिह्न बने हैं। लगता है कि यहाँ बुद्ध बोधिसत्व मूर्तियों की नक़ल की गई है। &amp;lt;ref&amp;gt;[[नीलकंठ पुरुषोत्तम जोशी]], मथुरा कला में मांगलिक चिह्न, आज, [[वाराणसी]], 16 फ़रवरी, 1964।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*5.	उत्तरकाल में दिखलाई पड़ने वाले तीर्थकरों के लांछन या परिचय-चिह्नों का यहाँ अभाव है। इसलिये प्रत्येक तीर्थकर की अलग-अलग पहचान करना कठिन है। आदिनाथ या [[ऋषभदेव|ऋषभनाथ]] कंधों पर लहराती हुई बालों की लटाओं के कारण तथा पार्श्वनाथ मस्तक के पीछे दिखलाई पड़ने वाले सर्पफणाओं के कारण पहचाने जा सकते हैं। [[नेमिनाथ तीर्थंकर|तीर्थकर नेमिनाथ]] की कुछ मूर्तियाँ उन पर बनी हुई [[कृष्ण]] [[बलराम]] की मूर्तियों के कारण पहचानी जा सकती हैं। शेष मूर्तियों के नाम, यदि वे लेखांकित हैं तो, उनके लेखों से ही जाने जा सकते हैं। &lt;br /&gt;
*6.	तीर्थकर प्रतिमाएं निवस्त्र हैं। कदाचित मूर्तियों पर वस्त्र का एक छोटा टुकड़ा हाथ में पकड़े जैन साधु भी दिखलाई पड़ते हैं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ये अर्धफालक सम्प्रदायक के उपासक हैं- लखनऊ संग्रहालय संख्या जे0 12, जे0 14, जे0 623.&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*7.	आसनस्थ तीर्थकर बहुधा सिंहासनों पर बैठे दिखलाये गये हैं जो उनके चक्रवर्तित्व का बोधक है। &lt;br /&gt;
*8. कुषाणकालीन तीर्थकर मूर्तियों के पीछे अर्धचन्द्रावलि या हस्तिनख से शोभित किनारे वाला प्रभामण्डल दिखलाई पड़ता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;लखनऊ संग्रहालय संख्या, जे0 8; जे0 15।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; समकालीन बुद्ध व [[बोधिसत्त्व]] प्रतिमाओं में भी इसके दर्शन होते हैं। &lt;br /&gt;
कुषाणकाल से ही तीर्थकर प्रतिमा का एक और प्रकार चल पड़ा जो चौमुखी मूर्ति या सर्वतोभद्र-प्रतिमा के नाम से पहचाना जाता है। इस प्रकार की मूर्तियों में एक ही पाषाण के चारों ओर चार तीर्थकर प्रतिमाएं बनी रहती हैं। इनमें बहुधा एक ऋषभनाथ व दूसरी पार्श्वनाथ की रहती हे। इस प्रकार की चतुर्मुख प्रतिमा बनाने की पद्धति परवर्तिकाल में ब्राह्मण धर्म द्वारी अपनायी गई।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Shaka-1.jpg|thumb|250px|[[शक]] राज पुरुष (मस्टन) अभिलिखित प्रतिमा&amp;lt;br /&amp;gt; Saka King (Mastan)]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Buddha1.jpg|thumb|250px|अभिलिखित अभय मुद्रा में [[बुद्ध]]&amp;lt;br /&amp;gt; Buddha]]&lt;br /&gt;
__TOC__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जैनधर्म की देव और देवी प्रतिमाएं==&lt;br /&gt;
===मथुरा की कुषाणकला में अधोलिखित जैन प्रतिमाएं मिली हैं;===&lt;br /&gt;
===(1) नेगमेश या हरिनेगमेशी===&lt;br /&gt;
बकरे के मुख वाले इस देवता का शिशु जगत से सम्बन्ध है। यह महत्त्व की बात है कि कुषाणकाल के बाद जैन मन्दिरों में इस देवता के स्वतंत्र रूप से स्थापित किये जाने के उदाहरण नहीं मिलते &amp;lt;balloon title=&amp;quot;उमाकान्त शाह, Harinegameshin, JISOA., लन्दन, खण्ड 19, 1952-53, पृ0 22।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; और न उसकी प्रतिमाओं की बहुलता ही दिखलाई पड़ती है। कुषाण कालीन माथुरी प्रतिमाओं में हम उन्हें बहुधा बच्चों से घिरा हुआ पाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===(2) रेवती या षष्ठी===&lt;br /&gt;
नेगमेश के समान इस देवी का सम्बन्ध बच्चों से है। इसका भी मुख बकरे का ही है। [[मथुरा संग्रहालय]] में कुछ ऐसी स्त्री मूर्तियाँ हैं जिनकी गोद में पालना है। इसमें एक शिशु भी दिखलाई पड़ता है (सं0 सं0 ई॰ 4)&amp;lt;ref&amp;gt;[[वासुदेवशरण अग्रवाल]], The Presiding Deity of Child Birth etc., Jain Antiquary, मार्च 1937, पृ0 75-79।&amp;lt;/ref&amp;gt; इन्हें रेवती या षष्ठी की मूर्तियाँ माना गया है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;उमाकान्त शाह, Harinegameshin, JISOA., खण्ड 19, 1952-53, पृ0 37।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===(3) सरस्वती===&lt;br /&gt;
यह जैनों की भी देवता है। जैन सरस्वती की प्राचीनतम मूर्ति मथुरा के कंकाली टीले से मिली है जो इस समय लक्षनऊ के संग्रहालय में है (लखनऊ सं0 सं0 जे0 24)।&lt;br /&gt;
===(4) कृष्ण बलराम===&lt;br /&gt;
तीर्थकर नेमिनाथ के पार्श्ववर्ती देवताओं के रूप में इनका अंकन किया जाता है। कृष्ण चतुर्भुज हैं बलराम हाथ में मदिरा का चषक लिये हुए हैं, उनके मस्तक पर नागफण हैं। &lt;br /&gt;
==बुद्ध प्रतिमा का निर्माण==&lt;br /&gt;
'''पश्चिम''' के विद्वानों ने भारतीय कला का जब अध्ययन किया तब उन्होंने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्ति कुषाणकाल में गांधार शैली के कलाकारों द्वारा बनाई गई। '''भारतीय विद्वानों ने इस सिद्धांत में कई त्रुटियां देखीं और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बुद्ध की प्रथम प्रतिमा गांधार में नहीं अपितु [[मथुरा]] में बनी।''' उनकी इस धारणा का प्रमुख आधार बुद्ध-बोधिसत्त्वों की वे लेखांकित प्रतिमाएं हैं जिन पर स्पष्टतया कनिष्क के राज्य संवत्सर का उल्लेख है। गांधार कला में इस प्रकार की सुनिश्चित तिथियों से युक्त लेखांकित प्रतिमाओं का सर्वथा अभाव हें इसके अतिरिक्त देश की तत्कालीन स्थिति व धार्मिक अवस्था भी इसी ओर संकेत करती है कि प्रथम बुद्ध मूर्ति मथुरा में ही बनी होगी न कि गांधार में। संक्षेप में उस समय की स्थिति को यों समझा जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ईसवी''' सन् की प्रथम शताब्दी के पूर्व मथुरा में [[वैष्णव धर्म]] व उससे सम्बन्धित भक्ति संप्रदाय जोर पकड़ चुका था। महाक्षत्रप शोडास के समय में ही यहां वासुदेव का मन्दिर था और बलराम अनिरूद्धादि पंचवीरों की प्रतिमाओं का पूजन समाज में प्रचलित था। दूसरी ओर जैन आचार्यों की मूर्तियां गढ़ी जा रही थीं और वहाँ भी भक्ति संप्रदाय बल पकड़ रहा था। रहा बौद्ध समाज, इनमें पुष्पदीपादि द्वारा बुद्ध के प्रतीकों का पूजन तो प्रचलित था ही, केवल निराकार तथागत की साकार प्रतिमा का अभाव था। इस अभाव को दूर करने में महासांघिक मत के बौद्धों ने बड़ी सहायता की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''बौद्धों''' के धार्मिक जगत में इस समय मतभेद चल रहा था। कुछ लोग प्राचीन बातों को अपरिवर्तित रूप में ही मानना उचित समझते थे, पर दूसरा संप्रदाय परिवर्तनवादी था जो महासांधिक नाम से प्रसिद्ध था। आगे चलकर यह दोनों मत [[हीनयान]] और [[महायान]] के नाम से पहिचाने जाने लगे। महासांघिक लोगों ने बुद्ध की निराकार मूर्ति व उसका पूजन उचित माना। उनका कहना था कि निर्वाण प्राप्ति के पूर्व बुद्ध बोधिसत्व के नाम से पहिचाने जाते हैं। निर्वाण के उपरान्त पुन: कोई इस लोक में नहीं आता। बुद्ध ने संबोधि या ज्ञान तो प्राप्त कर लिया था पर निर्वाण को पाना इसलिये अस्वीकार किया कि वे लोगों के कल्याण के लिए बार-बार [[पृथ्वी]] पर अवतीर्ण हो सकें। अत: निर्वाण-प्राप्त बुद्ध की तो नहीं, पर संबोधि-प्राप्त बोधिसत्त्व की प्रतिमा बनाना अवैध नहीं क्योंकि वे साकार रूप में मनुष्यों और देवों के द्वारा देखे और पूजे जाते हैं। कदाचित इसीलिये प्रारंभिक बुद्ध मूर्तियों पर अंकित लेखों में उन्हें बोधिसत्त्व ही कहा गया है। आगे चलकर महायानवादियों ने एक बुद्ध प्रतिमा ही नहीं अपितु शताधिक देवी देवताओं की मूर्तियों के निर्माण और पूजन की पद्धति को अपनाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कुषाण''' सम्राट [[कनिष्क]] का शासन काल भी बुद्ध की प्रतिमा निर्माण के लिए प्रेरक हुआ। इस शासक ने अपनी धार्मिक सहिष्णुता के प्रदर्शन के लिए अपनी मुद्राओं पर विभिन्न धर्म के देवी देवताओं को स्थान दिया। [[शैव मत|शैवों]] का शिव, [[ब्राह्मण धर्म]] के [[चन्द्र]], [[सूर्य]], [[वायु]], आदि अन्य देव तथा [[ईरानी]] मत के देवगणों में एतशो, नाना आदि को इसके सिक्कों पर अंकित किया जा रहा था। इन्हीं के साथ उसने बुद्ध की मूर्ति से भी अपनी कुछ मुद्राएं सुशोभित कीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[गांधार कला]] के बुद्ध मूर्तियों की तिथि विषयक अनिश्चितता की ओर हम पहले संकेत कर चुके हैं। मथुरा में कनिष्क के राज्यारोहण के दूसरे वर्ष से ही बुद्ध प्रतिमा का निर्माण प्रारम्भ हुआ, जो बाद तक चलता रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुद्ध प्रतिमा के निर्माण के आधार&amp;lt;ref&amp;gt; प्रस्तुत विवेचन के आधार निम्नांकित हैं—&amp;lt;br /&amp;gt;(क)	आनन्द कुमारस्वामी HIIA., पृ0 52,53,62। &amp;lt;br /&amp;gt;(ख)	डा॰ वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखाई गई टिप्पणियां&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
बुद्ध की खड़ी मूर्ति की कल्पना यक्ष प्रतिमाओं के आधार पर की गई। इन [[यक्ष]] प्रतिमाओं का उल्लेख हम कर चुके हैं, जो इस समय के पहिले से ही लोककला में बन रही थीं बैठी हुई बुद्ध मूर्ति का आधार कदाचित भरहूत कला में दिखलाई पड़ने वाली दीर्घतापसी की मूर्ति है। कुछ विद्वान इसका आधार उन तीर्थकर प्रतिमाओं को मानते हैं जिनका अंकन जैन आयागपट्टों पर हुआ    है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ए0 एल0 बाशम, The Wonder That Was India, पृ0 267।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''बुद्ध''' के बालों का अंकन निदान कथा के आधार पर हुआ। प्रारम्भिक अवस्था में बुद्ध का मस्तक मुण्डित होता है और केवल एक ही लट ऊपर दाहिनी ओर घूमती हुई दिखलाई पड़ती है। बाद में तो सारा मस्तक ही छोटे-छोटे घुंघरों से आवृत होने लगता है। उनके मस्तक के पीछे दिखलाई पड़ने वाले प्रभामण्डल का उद्भव कदाचित उन ईरानी देवी-देवताओं की मूर्तियों से हुआ जिन्हें वहाँ 'यजत' के नाम से पहिचाना जाता है। कुषाण मुद्राओं पर अंकित इन देवताओं की मूर्तियों में प्रभामण्डल विद्यमान है। &lt;br /&gt;
[[चीवर]], संघाटी आदि बुद्ध के वस्त्रों की कल्पना तो प्रत्यक्ष जगत से ही ली गई होगी। वैसे [[विनय पिटक]] में भी इसका विस्तृत विवरण मिलता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;महावग्ग, 8 चीवरक्खन्धकम्।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; बुद्ध के पैरों के नीचे दिखलाई पड़ने वाला कमल कदाचित सांची की कलाकृतियों की देन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रारम्भिक बुद्ध प्रतिमाओं की विशेषताएं==&lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;देखिये- आनन्द कुमारस्वामी, HIIA., पृ0 57,   Age of the Imperial Unity, खण्ड 2, पृ0 522-23 वासुदेवशरण अग्रवाल,  Buddha and Bodhisatta Images, JUPHS., खण्ड 21, पृ0 77।&amp;lt;/ref&amp;gt;इस प्रकार धर्माचार्य, शासन, कलाकार व तत्कालीन जनता के सहयोग से जो प्रारम्भिक बुद्ध मूर्तियाँ कुषाण काल में बनीं उनमें निम्नांकित विशेषताएं देखी जा सकती हैं—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*1-	मुण्डित मस्तक, ऊपर कपर्द तथा घुमावदार एक लट से शोभित उष्णीष।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*2-	उर्णा या दोनों भोंहों के बीच बना हुआ एक छोटासा वर्तुलाकार चिह्न। महापुरुष के बत्तीस लक्षणों में इसकी गिनती है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ललितविस्तर, 7, पृ0 74 ऊर्णा..... भ्रुवोर्मध्ये जाता हिमरजतप्रकाशा।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; [[ललितविस्तर]] के वर्णनानुसार मार पराजय के समय बोधिसत्त्व की उर्णा से एक ज्योति उद्भूत हुई जिसने मार के प्रसादों को कंपित कर दिया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वही, 21, पृ0 218 सर्वमारमण्डलविध्वंसनकरीं नामैकां रश्मिमुदसृजत।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; कुषाणकालीन बुद्ध मूर्तियों में ऊर्णा चिह्न अनिवार्य रूप से विद्यमान रहता है। एक मूर्ति में (सं0 सं.00 ए. 27) ऊर्णा के स्थान पर अर्थात भ्रूमध्य में गड्ढा बना है जिसमें कदाचित प्रकाश का प्रतीक कोई रत्न जड़ा गया हो।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*3-	विशाल एवं चौड़ी छाती तथा एक, बहुधा बाँया, कन्धा वस्त्र से ढंका हुआ।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वही, 3, पृ0 11, एकांसमुत्तरासंगंकृत्वा।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*4-	दाहिना हाथ अभयमुद्रा में ऊपर उठा हुआ; बांया हाथ आसनस्थ मूर्तियां में जाँघ पर तथा खड़ी प्रतिमाओं में वस्त्र के छोर को पकड़ मुट्ठी बाँधे हुए।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*5-	शरीर में चिपका हुआ तथा बायें कंधे एवं निचले भाग पर सिकुड़नों से शोभित वस्त्र।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*6-	कमर में गाँठ पड़ी हुई पट्टी या कायबन्धन।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*7-	पूरी खुली हुई आँखें तथा स्मितयुक्त मुख।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*8-	आध्यात्मिक भाव एवं देवत्व के प्रगटीकरण की अपेक्षा शारीरिक भाव भंगिमा के चित्रण का आधिक्य।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*9-	दोनों पैरों का समान रूप से सीधे तले रहना। कभी-कभी उनके बीचों कमल कलियों का गुच्छ&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मथुरा संग्रहालय संख्या 28.2798, प्रयाग संग्रहालय संख्या के.1।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;, क्वचित स्त्री मूर्ति&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बम्बई संग्रहालय की मूर्ति  JBORS., XX, 1902, पृ0 269।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;, सिंह&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बोधिसत्व प्रतिमा, सारनाथ संग्रहालय।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;  अथवा मैत्रेय           बोधिसत्त्व&amp;lt;balloon title=&amp;quot;राधाकुमुद मुकर्जी, Notes on Early Indian Art, JUPHS., खण्ड 12, भाग 1, ; लखनऊ संग्रहालय संख्या ओ0 71।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; का बना रहना।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*10-	हस्तिनखों से युक्त प्रभामण्डल।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
गांधार कला के संपर्क में आने के बाद कतिपय मूर्तियों के गढ़न में कुछ परिवर्तन हुये जिनका विवेचन पहले हो चुका है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर कुषाणकाल में आसनस्थ मूर्ति के गढ़ने में शैली अधिक सुधरी हुई है। चीवर तथागत के दोनों कंधों पर पड़ा रहता है। साथ ही दोनों पैर भी वस्त्र में छिपे रहते हैं और वस्त्र का सामने वाला छोर चौकी पर लटकता दिखलाई पड़ता है। जैन तीर्थकरों के समान बुद्ध की चरण चौकी के सामने वाले भाग पर दाताओं की मूर्तियों का अंकन अब प्रारम्भ हो जाता हैं शनै:-शनै: मुण्डित मस्तक लुप्त होकर घूँघरों का निर्माण साधारण परिपाटी बन जाती है। इस काल की बुद्धि व बोधिसत्त्व प्रतिमाओं के हाथ केवल चार मुद्राओं में- अभय, भूमिस्पर्श ध्यान तथा धर्म-चक्र-प्रवर्तन में दिखलाई पड़ते हैं। पाँचवीं मुद्रा वरद का यहां सर्वथा अभाव है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;कृष्णदत्त वाजपेयी, The Kuishna Art of Mathura, मार्ग, खण्ड 9 संख्या 2, मार्च 1962, पृष्ठ 28।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्राह्मण धर्म की देव प्रतिमाओं का निर्माण==&lt;br /&gt;
कुषाणकला के पुजारियों ने जैन तथा बौद्ध धर्मों के समान ही ब्राह्मण धर्म की भी सेवा की। [[वैष्णव]], [[शाक्त]] व सौर संप्रदाय ब्राह्मण धर्म के प्रमुख अंग हैं। शैवों को उसी के अन्तर्गत माना जाता है। गुप्तकाल तक पहुँचते पहुँचते इसमें [[गणेश]] उपासकों का भी गाणपत्य के नाम से समावेश हुआ। इस प्रकार विष्णु, [[दुर्गा]], [[शिव]], सूर्य व गणपति की उपासना पंचदेवोपासना के नाम से प्रसिद्ध हुई। [[ललितविस्तर]] एवं अन्य ग्रन्थों में, जो कुषाणकाल में विद्यमान थे, ब्राह्मण धर्म के तत्कालीन देवी-देवताओं की मूर्तियों की एक तालिका मिलती है जसमें शिव, [[स्कन्द]], सूर्य, चन्द्र, [[ब्रह्म]], नारायण, वैश्रवण, कुबेर, [[शक]] व लोकपाल की प्रतिमाओं को प्रमुखता से गिनाया गया है &amp;lt;ref&amp;gt;ललितविस्तर, 8, पृ0 84। [[दिव्यावदान]], 27, 38; पृ0 493-94।&amp;lt;/ref&amp;gt; । इनमें लगभग सभी की मूर्तियाँ कुषाणकाल में उपलब्ध हैं। कुषाणकाल में गणपति की उपासना मूर्ति-रूप में कदाचित अधिक प्रचलित नहीं थी, पर इसके स्थान पर कार्तिकेय, व कुबेर ख़ूब पूजे जाते थे। ब्रह्मा की केवल इनी-गिनी मूर्तियाँ मिली हैं। इन सभी देवमूर्तियों की अपनी विशेषताएं हैं इनमें से अधिकतर प्रतिमाएं दोनों ओर (in round) उकेरी गई हैं। पीछे की ओर या तो मूर्ति का पृष्ठ भाग अंकित है अथवा वृक्ष बना हुआ है जिस पर गिलहरी, तोता आदि बैठे हुए दिखलाये गये हैं।&lt;br /&gt;
===विष्णु मूर्ति===&lt;br /&gt;
[[वैष्णव संप्रदाय]] की पंचवीर प्रतिमाओं का उल्लेख पहिले ही हो चुका है। दुर्भाग्य से ये प्रतिमाएं खण्डित अवस्था में मिली हैं। अत: उनके विषय में कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता। पर इस काल की बनी चतुर्भुज विष्णु की अखण्डित प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं जो अपनी अधोलिखित विशेषताओं के कारण महत्त्वपूर्ण हैं:&lt;br /&gt;
*1-	हाथों के डौल की दृष्टि से ये मूर्तियाँ समकालीन यक्ष और बोधिसत्व प्रतिमाओं से मिलती जुलती है। इनके हाथ चार हैं, पर तीन में गदा, चक्र व छोटा-सा जलपात्र या शंख हैं और चौथा अभय मुद्रा में कन्धे तक उठा हुआ है। &lt;br /&gt;
*2-	विष्णु चतुर्भुज तो हैं पर उनका प्रभामण्डल, हृदय का कौस्तुभ , गले की वनमाला आदि का अभी कोई उद्भव नहीं हुआ है। &lt;br /&gt;
*3-	गदा का आकार मुद्गर जैसा है तथा उसे पकड़ने की पद्धति भी अविकसित शैली की ओर संकेत करती है। &lt;br /&gt;
*4-	बुद्ध और बोधिसत्त्वों की समकालीन प्रतिमाओं में दिखलाई लड़ने वाला ऊर्णा चिह्न यहां भी विद्यमान है। &lt;br /&gt;
*5-	विष्णु के अवतारों से सम्बन्धित मूर्तियां इस काल में बहुत कम बनीं। हमारे संग्रह में इस प्रकार की केवल दो मूर्तियां हैं जिनका विवेचन आगे यथा स्थान किया जावेगा। &lt;br /&gt;
*6-	गरुड़ारूढ़ विष्णु की प्रतिमा का निर्माण भी इस काल से प्रारम्भ हो गया था।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सं0 सं0 56.4200।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*7-	अष्टभुज विष्णु की मूर्तियाँ भी शनै:शनै: प्रचार में आ रही थीं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सं0 सं0 50.3550; लखनऊ संग्रहालय संख्या 49.217।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===शिवमूर्ति===&lt;br /&gt;
पूजन के लिए शिव की पुरुषाकार प्रतिमा तथा लिंग दोनों प्रचलित थे। [[शिवलिंग]] का पूजन विदेशी लोग भी करते थे और आज के समान कभी-कभी पीपल के पेड़ों के नीचे इन लिंगों की स्थापना की जाती थी। इस काल की कलाकृतियों में ये दृश्य विद्यमान हैं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सं0 सं0 36.2661, लखनऊ संग्रहालय संख्या बी 141।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; साधारण लिंगों के अतिरिक्त एकमुखी लिंग भी बनाये और पूजे जाते थे। &amp;lt;ref&amp;gt;राज्य संग्रहालय, [[भरतपुर]] (राजस्थान) में उत्तर [[शुंग]] या प्रारम्भिक कुषाण-काल का एक बड़ा-सा एक मुख शिवलिंग है। लखनऊ संग्रहालय में भी एक ऐसा ही सुन्दर लिंग है। (संख्या एच. 2)। हाल ही में एक कुषाण कालीन चतुर्मुख लिंग का पता लगा है, जिस पर ऊर्ध्व-मेढ्र लकुलीश और विष्णु बने हैं – रत्नचन्द्र अग्रवाल, Interesting Terracottas and Sculptures, Indian Historical Quarterly. दिसम्बर 1962, पृ0 262-63।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिवलिंग के समान शिव की पुरुषाकार प्रतिमाएं भी लोकप्रिय हो रही थीं। कुषाण सम्राट विम के समय से अन्तिम शासक वासुदेव तक कितने ही कुषाण सिक्के शिव की प्रतिमा से अंकित होते रहे। पाषाण कलाकृतियों में निम्नांकित विशेषताओं के साथ शिवमूर्ति के दर्शन होते हैं। &lt;br /&gt;
*1-	एकमुखी शिवलिंग में केवल मुखमण्डल और जटाभार दिखलाई पड़ता है। शिव का तीसरा नेत्र ललाट पर दिखलाया जाता है पर इस काल में वह सदा आड़ा बना रहता है खड़ा नहीं। &lt;br /&gt;
*2-	कुषाणकाल तक शिव के मुख्य चिह्न बैल, जटाभार, तीन नेत्र व त्रिशूल यही दृष्टिगोचर होते हैं। साँप, चन्द्रमा, व्याघ्राम्बर, डमरू, [[गंगा]] आदि बातों का यहां अभाव है। &lt;br /&gt;
*3-	अकेले शिव के अतिरिक्त उनका शक्ति के साथ अर्धनारीश्वर के रूप में भी पूजन होता था (सं0 सं0 15.874)। इस प्रकार की मूर्तियां [[मथुरा]] में मिलती हैं, जिनमें शिव को ऊर्ध्व-मेढ्र स्थिति में विशेष रूप से दिखलाया गया है। यह उनकी अमोघ उत्पादन शक्ति एवं चिर-स्थायित्व का द्योतक है। &lt;br /&gt;
*4-	[[शिव]] और [[पार्वती]] की स्वतंत्र प्रतिमाएं भी मथुरा कला में प्राप्य है। &amp;lt;ref&amp;gt;यह मूर्ति कौशाम्बी से मिली है-ASIR., 1913-14, फलक 70 बी; गांधार कला में भी शिव प्रतिमाएं मिली हैं- वी. नटेश ऐयर, Trimurti Image, ASIR., 1913-14, पृ0 276-80, फलक 72 ए।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===शक्ति प्रतिमाएं===&lt;br /&gt;
देवी की मूर्तियों में [[लक्ष्मी]], [[महिषमर्दिनी दुर्गा]] व मातृकाओं की मुख्यत: गणना की जा सकती हे। उनके अतिरिक्त हारीति व वसुधारा की प्रतिमाएं भी मिलती हैं। &lt;br /&gt;
लक्ष्मी और गजलक्ष्मी की प्रतिमा तो भरहूत और [[सांची]] से ही चली आ रही थी&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वेणीमाधव बरूआ, Barhut, आदि; जान मार्शल, The Monuments of Sanchi, फलक 11,13,25 आदि।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; और ब्राह्मण धर्म के समान बौद्धों के यहां भी समादृत हो चुकी थी। मथुरा ने थोड़े परिवर्तनों के साथ उसे अपनाया। यहां हमें लक्ष्मी के तीन रूप मिलते हैं;&lt;br /&gt;
*1-	एक साथ में कमल धारण करने वाली आसनस्थ लक्ष्मी। यह बहुधा द्विभुज होती है।&lt;br /&gt;
*2-	उसी प्रकार की खड़ी प्रतिमा।&lt;br /&gt;
*3-	गज लक्ष्मी, एक हाथ में कमल लिये खड़ी। &lt;br /&gt;
*4-	पूर्ण कुंभ से उद्भूत होने वाली श्रीपर्णीलता या कमल लता के बीच खड़ी मातृत्व का संकेत करने वाली श्रीदेवी। &lt;br /&gt;
दुर्गा के रूपों में यहां केवल चतुर्भुज दुर्गा का रूप मिलता है। उसके ऊपरी हाथों में तलवार और ढाल है, निचले दाहिने हाथ में त्रिशूल है और निचले बांयें हाथ से वह महिष को दबा रही है। असुर भी पशु रूप में ही है, मानव-पशु के रूप में नहीं। दुर्गा के आठ हाथ, दस हाथ और अठारह हाथ वाले रूप बाद में बने, कुषाण काल में वे नहीं दिखलाई पड़ते। &amp;lt;ref&amp;gt;अधिक अध्ययन के लिए देखिये, रत्नचन्द्र अग्रवाल, The Goddess Mahishasura- mardini in Kushana Art. Artibus Asiae, खण्ड 19, 3-4 अस्कोना, स्विट्जरलैण्ड, पृ0 368-73।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मातृकाओं का कुषाणकाल में पर्याप्त बोलबाला रहा। कुषाण कालीन जो मातृकापट्ट हमें मिला है, उस पर अंकित देवियां मानव मुखों से नहीं अपितु पशुपक्षियों के मुखों से युक्त हैं और प्रत्येक की गोद में एक शिशु है। उनकी संख्या भी अनिवार्यत: सात नहीं है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
अन्य देवियों में देवी हारीति का स्थान मुख्य है। इनकी कुषाणकालीन प्रतिमाए अच्छी मात्रा में उपलब्ध हुई हैं जिनमें ये बच्चों से घिरी हुई अकेली अथवा कुबेर के साथ दिखलाई पड़ती हैं। &lt;br /&gt;
वसुधारा संपन्नता और ऐश्वर्य की देवी मानी जाती है। पूर्णघट व मत्स्य-युग्म इसके मुख्य चिह्न हैं। मथुरा में इस देवी का पूजन भी पर्याप्त लोकप्रिय था। पाषाण के साथ-साथ मिट्टी की बनी हुई इसकी अनेक मूर्तियां यहां से मिली हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===सूर्य प्रतिमाएं===&lt;br /&gt;
सूर्य का पूजन दो प्रकार से किया जाता हे। एक तो मण्डलाकार बिम्ब का पूजन और दूसरे मानवरूपिणी सूर्य-प्रतिमा का पूजन। सूर्य की भारतीय पद्धति की नराकार प्रतिमा, जिसे कुषाणकाल के पूर्व की माना जाता है, बुद्ध-[[गया]] से मिली है। वह रथारूढ़ है परन्तु यह रूप भारत में विशेषकर कुषाणकाल में लोकप्रिय न हो सका। इसका कदाचित यह भी कारण था कि मानवाकार सूर्य की उपासना हमारे यहां मुख्यत: ईरान से आई। ये विदेशी लोग, जिन्हें भारतीय साहित्य में [[मग]] नाम से पुकारा गया, अपने साथ सूर्योपासना की पद्धति ले आये। इन्हीं के वेश के समान इनके देवताओं की वेश-भूषा होना स्वाभाविक था। इसलिये कुषाणकाल की सूर्यमूर्तियां लम्बा कोट, चुस्त पाजामा और ऊंचे बूट पहले हुए दिखलाई पड़ती हैं। इस वेश को भारत में उदीच्य वेश के नाम से पुकारा गया। कुषाणकालीन माथुरी कला में रथारूढ़ एवं आसनारूढ़ सूर्य की लम्बा कोट, बूट, गोल टोपी तथा इने-गिने अलंकार धारण की हुई प्रतिमाएं मिली हैं। एक मूर्ति में उनके छोटे पंख भी दिखलाये गये हैं (सं0 सं0 डी0 46); दूसरी में उनके आसन पर ठीक वैसी ही अग्नि की वेदी बनी है जैसी कतिपय ईरानी सिक्कों पर पायी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===अन्य प्रतिमाएं===&lt;br /&gt;
ऊपर गिनाई हुई मूर्तियों के अतिरिक्त [[कार्तिकेय]], [[कुबेर]], [[इन्द्र]] व [[अग्नि]] की मूर्तियां भी कुषाणकाल में बनीं। अन्य देवताओं के समान इन देवताओं के ध्यान कुषाणकाल में बड़े ही सीधे सादे थे। कार्तिकेय का मुख्य चिह्न था शक्ति या भाला। एक मुख द्विभुजशक्तिधर कुमार [[कार्तिकेय]] की सुन्दर प्रतिमा इस संग्रहालय में है जो [[शक संवत]] 11 अर्थात ई॰ सन् 89 में बनी थी (सं0 सं0 42.2949)। &lt;br /&gt;
कुबेर की मूर्तियों का मथुरा में वैपुल्य है। मोटे पेट वाले स्थूलकाय धन के देवता कुबेर देखते ही बनते हैं। कभी वे पालथी मार कर सुख से स्मित करते हुए बैठे दिखलाई पड़ते हैं, कभी मदिरा का [[चषक]] हाथ में लिये रहते हैं और कभी लक्ष्मी एवं हारीति के साथ एक ही शिलापट्ट पर शोभित रहते हैं। अग्नि की मुख्य पहिचान उनकी तुंदिल तनु, [[यज्ञोपवीत]], जटाभार व पीछे दिखलाई पड़ने वाली ज्वालाएं हैं (सं0 सं0 40.2880, 40.2883)। इनके विशेष आयुध, वाहन मेष आदि बातें कुषाणकालीन मूर्तियों में नहीं दिखलाई पड़ती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन प्रमुख देवी-देवताओं के अतिरिक्त माथुरी कला में [[नाग]], व नाग-स्त्रियों की प्रतिमाएं भी अच्छी मात्रा में मिलती हैं कुषाणकाल में यहां पर दधिकर्ण नाग का मन्दिर विद्यमान थां इस नाग की लेखांकित प्रतिमा यहां से मिली है। नाग प्रतिमाओं में अन्य नागों के अतिरिक्त [[बलराम]] की मूर्तियों को भी गिनना होगा। पुराणों के अनुसार बलराम शेषावतार थे। उनकी हल और मूसल को धारण करने वाली एक शुंगकालीन मूर्ति यहां से मिली है। यह इस समय लखनऊ के संग्रहालय में है। कुषाणकालीन बलराम की मूर्तियों में वे हाथ में मद्य का प्याला लिये दिखलाई पड़ते हैं, गले में वनमाला पड़ी रहती है, पीछे सर्प की फणा बनी रहती है। इस पर कभी-कभी [[स्वस्तिक]], मत्स्ययुग्म, पूर्णघट आदि अष्टमांगलिक चिह्न भी बने होते हैं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;नीलकण्ठ पुरुषोत्तम जोशी, मथुरा कला में मांगलिक चिह्नों का प्रयोग आज, वाराणसी, 16 फरवरी, 1964 ।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
साधारणतया यहां नाग की प्रतिमाएं मनूष्याकार ही होती हैं, केवल मस्तक के ऊपर सर्पफणा बनी रहती है। हाथ में बहुधा छोटा सा जल कुंभ रहता है। नाग-स्त्रियों की मूर्तियों भी लगभग ऐसी ही होती हैं। एक विशेष मूर्ति ऐसी भी मिली है जिसमें एक नागरानी के कंधों से पांच अन्य नाग शक्तियां उद्भूत होती हुई दिखलाई गई हैं। &lt;br /&gt;
इस प्रकार धर्म निरपेक्ष भाव से नास्तिक एवं आस्तिक दोनों प्रकार के संप्रदायों की सेवा करते हुए कला के एक ऊंचे आदर्श की स्थापना करना माथुरी कला का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[Category:विविध]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<title>कालिय नाग</title>
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		<updated>2010-03-14T17:27:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'गरूड़' to 'गरुड़'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==कालिय नाग / कालियदह / Kaliya Nag / Kaliyadah==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''विभिन्न कथाएँ'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कद्रु का पन्नग जाति का एक नागराज, जो पहले रमण द्वीप में रहता था।  गरुड़ (सर्प जिसका भक्ष है) इसे न सताएं इसलिए कालिय प्रतिमास उसका भोजन भेज दिया करता था।  एक बार वह स्वयं गरुड़ का भक्ष खा गया।  इससे कुपित गरुड़ ने कालिय पर आक्रमण कर दिया।  भयभीत कालिय [[नंदगांव]] के पास [[यमुना]] में जा छिपा।  उसके विष से यमुना का जल जहरीला हो गया।  उसे पीकर गाएं और गोप मरने लगे। एक बार जब खेलते समय गेंद यमुना में गिर जाने से [[कृष्ण]] उसे निकालने के लिए यमुना में कूदे तो वे कालिय के फण पर नाचने लगे।  उन्होंने गरुड़ से निर्भयता का वरदान देकर कालिय को पुन: रमण द्वीप भेज दिया।  यमुना का यह स्थान आज भी 'कालियदह' कहलाता है।&lt;br /&gt;
*काली नाग के लिए 'नागराज' भी कहा जाता है। गरुड़ के भय से यह नागों के निवास-स्थान रमणक द्वीप से भागकर सौमरि मुनि के शाप से गरुड़संरक्षित ब्रजभूमि में एक दह में आकर रहने लगा था।&lt;br /&gt;
{{high right}}&lt;br /&gt;
इसका वर्तमान नाम कालियदह है। [[श्रीकृष्ण]] ने कालिय नाग का यहीं दमन किया था। पास में ही केलि-[[कदम्ब]] है, जिसपर चढ़कर श्रीकृष्ण कालीयह्रद में बड़े वेग से कूदे थे। कालिय नाग के विष से आस-पास के वृक्ष-लता सभी जलकर भस्म हो गये थे। केवल यही एक केलि–कदम्ब बच गया था।&lt;br /&gt;
{{Table close}} &lt;br /&gt;
*इसी के नाम से '[[ब्रज]]' में यमुना तट पर कालीदह नामक स्थान प्रसिद्ध है। ऐसी  प्रसिद्धि है कि इसके वहाँ रहने से वह स्थान उजाड़-सा हो गया था।  एक बार [[कृष्ण]] जब छोटे थे तो खेलते उस स्थान में पहुँचकर दह में गिर पड़े। कालिय ने अन्य नागों के साथ कृष्ण को घेर लिया। ब्रज के [[गोपी|गोप-गोपियाँ]], [[नन्द]]-[[यशोदा]] आदि इससे अत्यन्त चिन्तित हुए।  अन्त में कृष्ण ने इसे अपने वश में कर लिया तथा इसके फन पर खड़े होकर नृत्य किया। ब्रज-मण्डल में ऐसी प्रसिद्धि है कि कृष्ण के उस समय के अंकित पद-चिन्ह आज तक काले नागों में देखें जा सकते हैं। कृष्ण ने कालियनाग को पुन: अपने समूह के साथ रमणीक द्वीप में जाकर रहने की आज्ञा दे दी थी।  गरुड़ ने उस पर कृष्ण के पदाचिन्ह अंकित देखकर उसे क्षमा कर दिया।  हिन्दी कृष्ण-भक्त कवियों में [[सूरदास]], ब्रजवासीदास (ब्रजविलास) तथा [[भागवत]] के भावानुवादों आदि में कालीदमन की कथा आयी है। भक्तकवियों ने कालियनाग को कृष्ण का भक्त एवं कृपाभागी के रूप में चित्रित किया है।              &lt;br /&gt;
*इसका वर्तमान नाम कालियदह है।  श्री[[कृष्ण]] ने कालिय नाग का यहीं दमन किया था।  पास में ही केलि-कदम्ब है, जिसपर चढ़कर श्रीकृष्ण कालीयह्रद में बड़े वेग से कूदे थे।  कालिय नाग के विष से आस-पास के वृक्ष-लता सभी जलकर भस्म हो गये थे।  केवल यही एक केलि–[[कदम्ब]] बच गया था।  इसका कारण यह है कि महापराक्रमी [[गरुड़]] अपनी माता विनता को अपनी विमाता कद्रू के दासीपन से मुक्त कराने के लिए देवलोक से अमृत का कलश लेकर इस केलि-कदम्ब के ऊपर कुछ देर के लिए बैठे थे।  उसके गंध या छींटे के प्रभाव से यह केलि-कदम्ब बच रहा था। &lt;br /&gt;
*कालिय नाग भी बड़ा पराक्रमी था।  जब उसने कृष्ण को अपने फेंटे में बाँध लिया, उस समय कृष्ण कुछ असहाय एवं निश्चेष्ट हो गये।  उस समय नागपत्नियाँ, जो कृष्ण की परम भक्त थीं, प्रार्थना करने लगीं कि भगवद विरोधी पति की स्त्री होने के बदले हम विधवा होना ही अधिक पसन्द करती हैं। किन्तु, ज्योंही कृष्ण नाग के फेंटे से निकल कर उसके मस्तक पर पदाघात करते हुए नृत्य करने लगे, उस समय कालिय अपने सहस्त्रों मुखों से रक्त उगलते हुए भगवान के शरणागत हो गया।  उस समय नाग-पत्नियाँ उसके शरणागत भाव से अवगत होकर, हाथ जोड़कर कृष्ण से उसे जीवन-दान के लिए प्रार्थना करने लगीं।  श्रीकृष्ण ने उनकी स्तव-स्तुति से प्रसन्न होकर कालिय नाग को अभय प्रदान कर सपरिवार रमणक द्वीप में जाने के लिए आदेश दिया तथा उसे अभय देते हुए बोले-अब तुम्हें गरुड़जी का भय नहीं रहेगा।  वे तुम्हारे फणों पर मेरे चरणचिह्न को देखकर तुम्हारे प्रति शत्रुता भूल जायेंगे।  नाग-पत्नियों ने यह प्रार्थना की थी- हे देव ! आपके जिस पदरज की प्राप्ति के लिए श्री लक्ष्मीदेवी ने अपनी सारी अन्य अभिलाषाओं को छोड़कर चिरकाल तक व्रत धारण करती हुई तपस्या की थी, किन्तु वे विफल-मनोरथ हुई, उसी दुर्लभ चरणरेणु को कालिया नाग न जाने किस पुण्य के प्रभाव से प्राप्त करने का अधिकारी हुआ है।&amp;lt;ref&amp;gt;कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
तवाडिघ्ररेणुस्पर्शाधिकार:  ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
यद्वाच्छया श्रीर्ललनाऽऽचरत्तपो&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता ॥&amp;lt;br /&amp;gt;	(श्रीमद्भा0 10/16/36)&amp;lt;/ref&amp;gt;[[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत]] के गौड़ीय टीकाकारों का यहाँ सुसिद्धान्तपूर्ण विचार है। कालिय पर भगवान की अहैतुकी कृपा का कारण और कुछ नहीं बल्कि कालिय नाग की पत्नियों की श्रीकृष्ण के प्रति अहैतुकी भक्ति ही है। क्योंकि भगवद-कृपा  भक्त-कृपा की अनुगामिनी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम==&lt;br /&gt;
जनरल एलेक्जेंडर [[कनिंघम]] ने भारतीय भूगोल लिखते समय यह माना कि क्लीसीबोरा नाम [[वृन्दावन]] के लिए है । इसके विषय में उन्होंने लिखा है कि [[कालिय नाग]] के वृन्दावन निवास के कारण यह नगर `कालिकावर्त' नाम से जाना गया । यूनानी लेखकों के क्लीसोबोरा का पाठ वे `कालिसोबोर्क' या `कालिकोबोर्त' मानते हैं । उन्हें इंडिका की एक प्राचीन प्रति में `काइरिसोबोर्क' पाठ मिला, जिससे उनके इस अनुमान को बल मिला । &amp;lt;ref&amp;gt;देखिए कनिंघम्स ऎंश्यंट जिओग्रफी आफ इंडिया (कलकत्ता  1924)  पृ० 429 ।&amp;lt;/ref&amp;gt; परंतु सम्भवतः कनिंघम का यह अनुमान सही नही है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] [[Category:विविध]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<title>अस्त्र शस्त्र</title>
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		<updated>2010-03-14T17:27:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: Text replace - 'गरूड़' to 'गरुड़'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; &lt;br /&gt;
==अस्त्र शस्त्र / Mythological Weapons==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज हम यूरोप के अस्त्र-शस्त्र देखकर चकित और स्तम्भित हो जाते हैं और सोचने लगते हैं कि ये सब नये आविष्कार हैं। हमें अपनी पूर्व परम्परा का ज्ञान नहीं है। प्राचीन [[आर्यावर्त]] के आर्यपुरुष अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण थे। उन्होंने अध्यात्म-ज्ञान के साथ-साथ आततियों और दुष्टों के दमन के लिये सभी अस्त्र-शस्त्रों की भी सृष्टि की थी। [[आर्य|आर्यों]] की यह शक्ति धर्म-स्थापना में सहायक होती थी। प्राचीन काल में जिन अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग होता था, उनका वर्णन इस प्रकार है- &lt;br /&gt;
*अस्त्र उसे कहते हैं, जिसे मन्त्रों के द्वारा दूरी से फेंकते हैं। वे अग्नि, गैस और विद्युत तथा यान्त्रिक उपायों से चलते हैं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शस्त्र ख़तरनाक हथियार हैं, जिनके प्रहार से चोट पहुँचती है और मृत्यु होती है। ये हथियार अधिक उपयोग किये जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अस्त्रों के विभाग==&lt;br /&gt;
अस्त्रों को दो विभागों में बाँटा गया है- &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(1)वे आयुध जो मन्त्रों से चलाये जाते हैं- ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते हैं। इन बाणों के कुछ रूप इस प्रकार हैं—&lt;br /&gt;
*'''आग्नेय''' यह विस्फोटक बाण है। यह [[जल]] के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''पर्जन्य''' यह विस्फोटक बाण है। यह जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''वायव्य''' इस बाण से भयंकर तूफान आता है और अन्धकार छा जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''पन्नग''' इससे सर्प पैदा होते हैं। इसके प्रतिकार स्वरूप गरुड़ बाण छोड़ा जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''गरुड़''' इस बाण के चलते ही गरुड़ उत्पन्न होते है, जो सर्पों को खा जाते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''ब्रह्मास्त्र''' यह अचूक विकराल अस्त्र है। शत्रु का नाश करके छोड़ता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''पाशुपत''' इससे विश्व नाश हो जाता हैं यह बाण महाभारतकाल में केवल अर्जुन के पास था।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''वैष्णव—नारायणास्त्र''' यह भी पाशुपत के समान विकराल अस्त्र है। इस नारायण-अस्त्र का कोई प्रतिकार ही नहीं है। यह बाण चलाने पर अखिल विश्व में कोई शक्ति इसका मुक़ाबला नहीं कर सकती। इसका केवल एक ही प्रतिकार है और वह यह है कि शत्रु अस्त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक अपने को अर्पित कर दे। कहीं भी हो, यह बाण वहाँ जाकर ही भेद करता है। इस बाण के सामने झुक जाने पर यह अपना प्रभाव नहीं करता। &lt;br /&gt;
इन दैवी बाणों के अतिरिक्त ब्रह्मशिरा और एकाग्नि आदि बाण है। आज यह सब बाण-विद्या इस देश के लिये अतीत की घटना बन गयीं महाराज [[पृथ्वीराज चौहान|पृथ्वीराज]] के बाद बाण-विद्या का सर्वथा लोप हो गया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(2) वे शस्त्र हैं, जो यान्त्रिक उपाय से फेंके जाते हैं; ये अस्त्रनलिका आदि हैं नाना प्रकार के अस्त्र इसके अन्तर्गत आते हैं। अग्नि, गैस, विद्युत से भी ये अस्त्र छोडे जाते हैं। प्रमाणों की ज़रूरत नहीं है कि प्राचीन आर्य गोला-बारूद और भारी तोपें, टैंक बनाने में भी कुशल थे। इन अस्त्रों के लिये देवी और देवताओं की आवश्यकता नहीं पड़ती। ये भयकंर अस्त्र हैं और स्वयं ही अग्नि, गैस या विद्युत आदि से चलते हैं। यहाँ हम कुछ अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन करते हैं, जिनका प्राचीन संस्कृत-ग्रन्थों में उल्लेख है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''शक्ति''' यह लंबाई में गजभर होती है, उसका हेंडल बड़ा होता है, उसका मुँह सिंह के समान होता है और उसमें बड़ी तेज जीभ और पंजे होते हैं। उसका रंग नीला होता है और उसमें छोटी-छोटी घंटियाँ लगी होती हैं। यह बड़ी भारी होती है और दोनों हाथों से फेंकी जाती है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''तोमर''' यह लोहे का बना होता है। यह बाण की शकल में होता है और इसमें लोहे  का मुँह बना होता है साँप की तरह इसका रूप होता है। इसका धड़ लकड़ी का होता है। नीचे की तरफ पंख लगाये जाते हैं, जिससे वह आसानी से उड़ सके। यह प्राय: डेढ़ गज लंबा होता है। इसका रंग लाल होता है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''पाश''' ये दो प्रकार के होते हैं, वरूणपाश और साधारण पाश; इस्पात के महीन तारों को बटकर ये बनाये जाते हैं। एक सिर त्रिकोणवत होता है। नीचे जस्ते की गोलियाँ लगी होती हैं। कहीं-कहीं इसका दूसरा वर्णन भी है। वहाँ लिखा है कि वह पाँच गज का होता है और सन, रूई, घास या चमड़े के तार से बनता है। इन तारों को बटकर इसे बनाते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''ऋष्टि''' यह सर्वसाधारण का शस्त्र है, पर यह बहुत प्राचीन है। कोई-कोई उसे तलवार का भी रूप बताते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''गदा''' इसका हाथ पतला और नीचे का हिस्सा वजनदार होता है। इसकी लंबाई ज़मीन से छाती तक होती है। इसका वजन बीस मन तक होता है। एक-एक हाथ से दो-दो गदाएँ उठायी जाती थीं।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''मुद्गर''' इसे साधारणतया एक हाथ से उठाते हैं। कहीं यह बताया है कि वह हथौड़े के समान भी होता है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''चक्र''' दूर से फेंका जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''वज्र''' कुलिश तथा अशानि-इसके ऊपर के तीन भाग तिरछे-टेढ़े बने होते हैं। बीच का हिस्सा पतला होता है। पर हाथ बड़ा वजनदार होता है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''त्रिशूल''' इसके तीन सिर होते हैं। इसके दो रूप होते है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''शूल''' इसका एक सिर नुकीला, तेज होता है। शरीर में भेद करते ही प्राण उड़ जाते हैं। &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''असि''' तलवार को कहते हैं। यह शस्त्र किसी रूप में पिछले काल तक उपयोग होता रहा। पर विमान, बम और तोपों के आगे उसका भी आज उपयोग नहीं रहा। पर हम इस चमकने वाले हथियार को भी भूल गये। लकड़ी भी हमारे पास नहीं, तब तलवार कहाँ से हो। &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''खड्ग''' बलिदान का शस्त्र है। दुर्गाचण्डी के सामने विराजमान रहता है। &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''चन्द्रहास''' टेढ़ी तलवार के समान वक्र कृपाण है। &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''फरसा''' यह कुल्हाड़ा है। पर यह युद्ध का आयुध है। इसकी दो शक्लें हैं। &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''मुशल''' यह गदा के सदृश होता है, जो दूर से फेंका जाता है। &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''धनुष''' इसका उपयोग बाण चलाने के लिये होता है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''बाण''' सायक, शर और तीर आदि भिन्न-भिन्न नाम हैं ये बाण भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। हमने ऊपर कई बाणों का वर्णन किया है। उनके गुण और कर्म भिन्न-भिन्न हैं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''परिघ''' में एक लोहे की मूठ है। दूसरे रूप में यह लोहे की छड़ी भी होती है और तीसरे रूप के सिरे पर बजनदार मुँह बना होता है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''भिन्दिपाल''' लोहे का बना होता है। इसे हाथ से फेंकते हैं। इसके भीतर से भी बाण फेंकते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'''नाराच''' एक प्रकार का बाण हैं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''परशु''' यह छुरे के समान होता है। भगवान [[परशुराम]] के पास अक्सर रहता था। इसके नीचे लोहे का एक चौकोर मुँह लगा होता है। यह दो गज लंबा होता है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''कुण्टा''' इसका ऊपरी हिस्सा हल के समान होता है। इसके बीच की लंबाई पाँच गज की होती है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''शंकु बर्छी''' भाला है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''पट्टिश''' एक प्रकार का कुल्हाड़ा है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इसके सिवा वशि तलवार या कुल्हाड़ा के रूप में होती है।  &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
इन अस्त्रों के अतिरिक्त अन्य अनेक अस्त्र हैं, जिनका हम यहाँ वर्णन नहीं कर सके। भुशुण्डी आदि अनेक शस्त्रों का वर्णन [[पुराण|पुराणों]] में है। इनमें जितना स्वल्प ज्ञान है, उसके आधार पर उन सबका रूप प्रकट करना सम्भव नहीं।&amp;lt;ref&amp;gt;लगभग 15 वर्ष पहले बस्ती के प्रज्ञाचक्षु पं॰ श्रीधनराज जी के दर्शन हुए थे। उन्होंने बतलाया था कि धनुर्वेद, धनुष-चन्द्रोदय और धनुष-प्रदीप-तीन प्राचीन ग्रन्थ याद है, इनमें से दो की प्रत्येक की श्लोक-संख्या 60000 है। अन्य ग्रन्थों के साथ इन ग्रन्थों की उन्होंने एक सूची भी लिखवायी थी, जो सम्भवतः बनारस के डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज श्रीकृष्णचन्द्रजी श्रीवास्तव के पास है। इसमें 'परमाणु' से शक्ति निर्माण का भी वर्णन है। यह विषय संवत 1995 में प्रकाशित स्वर्गीय प्रो0 श्रीरामदासजी गौड़ के 'हिंदुत्व' नामक ग्रन्थ में भी छप चुका है। इससे पता चलता है कि प्राचीन काल में 'परमाणु' (ऐटम) से शस्त्रादि-निर्माण की क्रिया भी भारतीयों को ज्ञात थी।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज हम इन सभी अस्त्र-शस्त्रों को भूल गये। हम भगवान श्री [[राम]] के हाथ में धनुष-बाण और भगवान श्री [[कृष्ण]] के हाथ में सुदर्शन चक्र, [[शिव|महादेव]] के हाथ में त्रिशूल और [[दुर्गा]] के हाथ में खड़ग देखकर भी उनके भक्त बनते हैं। पर निर्बल, कायर और भीरू पुरुष क्या भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण और दुर्गा के भक्त बन सकते हैं? क्या [[रामायण]], [[गीता]] और दुर्गासप्तशती केवल पाठ करने के ही ग्रन्थ हैं? [[महाभारत]] में, जहाँ उन्होंने [[अर्जुन]] को गीतामृत के द्वारा रण में जूझने के लिये उद्यत किया था। आवश्यकता है कि रण में कभी पीठ न दिखाने वाले भगवान श्रीरामचन्द्र, सुदर्शनचक्रधारी योगेश्वर श्रीकृष्ण और महामाया दुर्गा को हम कभी न भूलें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B2_%E0%A4%A6%E0%A4%AE%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80&amp;diff=1097</id>
		<title>नल दमयन्ती</title>
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		<updated>2010-03-14T17:24:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==नल दमयन्ती / King Nal Damyanti== &lt;br /&gt;
निषध के राजा वीरसेन के पुत्र का नाम नल था। उन्हीं दिनों विदर्भ देश पर भीम नामक राजा राज्य करता थां उनके प्रयत्नों के उपरांत दमन नामक ब्रह्मर्षि को प्रसन्न कर उसे तीन पुत्र (दम, दान्त तथा दमन) और एक कन्या (दमयंती) की प्राप्ति हुई। [[दमयंती]] तथा नल अतीव सुंदर थे। एक-दूसरे की प्रशंसा सुनकर बिना देखे ही वे परस्पर प्रेम करने लगे। नल ने एक हंस से अपना प्रेम-संदेश दमयंती तक पहुंचाया, प्रत्युत्तर में दमयंती ने भी नल के प्रति वैसे ही उद्गार भिजवाए। कालांतर में दमयंती के स्वयंवर का आयोजन हुआ। [[इन्द्र]], [[वरूण]], [[अग्नि]] तथा [[यम]], ये चारों भी उसे प्राप्त करने के लिए इच्छुक थे। इन्होंने भूलोक में नल को अपना दूत बनाया। नल के यह बताने पर भी कि वह दमयंती से प्रेम करता है, उन्होंने उसे दूत बनने के लिए बाध्य कर दिया। दमयंती ने जब नल का परिचय प्राप्त किया तो स्पष्ट कहा-'आप उन चारों देवताओं को मेरा प्रणाम कहिएगा, किंतु स्वयंवर में वरण तो मैं आपका ही करूंगी।' स्वयंवर के समय उन चारों लोकपालों ने नल का ही रूप धारण कर लिया। दमयंती विचित्र परिस्थिति में फंस गयी। उसके लिए नल को पहचानना असंभव हो गया। देवताओं को मन-ही-मन प्रणाम कर उसने नल को पहचानने की शक्ति मांगी। दमयंती ने देखा कि एक ही रूप के पांच युवकों में से चार को पसीना नहीं आ रहा, उनकी पुष्प मालाएं एक दम खिली हुई दिखलायी पड़ रही हैं, वे धूल-कणों से रहित हैं तथा उनके पांव [[पृथ्वी]] का स्पर्श नहीं कर रहे। दमयंती ने पांचवें व्यक्ति को राजा नल पहचान कर उसका वरण कर लिया। &lt;br /&gt;
==लोकपालों द्वारा दिए वरदान==&lt;br /&gt;
लोकपालों ने प्रसन्न होकर नल को आठ वरदान दिये- &lt;br /&gt;
#[[इन्द्र]] ने वर दिया कि नल को यज्ञ में प्रत्यक्ष दर्शन देंगे, तथा &lt;br /&gt;
#सर्वोत्तम गति प्रदान करेंगे। [[अग्नि]] ने वर दिये कि &lt;br /&gt;
#वे नल को अपने समान तेजस्वी लोक प्रदान करेंगे तथा &lt;br /&gt;
#नल जहां चाहे, वे प्रकट हो जायेंगे। [[यमराज]] ने &lt;br /&gt;
#पाकशास्त्र में निपुणता तथा &lt;br /&gt;
#धर्म में निष्ठा के वर दिये। [[वरूण]] ने &lt;br /&gt;
#नल की इच्छानुसार जल के प्रकट होने तथा &lt;br /&gt;
#उसकी मालाओं में उत्तम गंध-संपन्नता के वर दिये। &lt;br /&gt;
देवतागण जब देवलोक की ओर जा रहे थे तब मार्ग में उन्हें कलि और द्वापर साथ-साथ जाते हुए मिले। वे लोग भी दमयंती के स्वयंवर में सम्मिलित होना चाहते थे। इन्द्र से स्वयंवर में नल के वरण की बात सुनकर [[कलि युग]] क्रुद्ध हो उठा, उसने नल को दंड देने के विचार से उसमें प्रवेश करने का निश्चय किया। उसने [[द्वापर युग]] से कहा कि वह जुए के पासे में निवास करके उसकी सहायता करे।&lt;br /&gt;
==नल की जुए में हार==&lt;br /&gt;
कालांतर में नल दमयंती की दो संतानें हुईं। पुत्र का नाम इन्द्रसेन था तथा पुत्री का इन्द्रसेनीं। कलि ने सुअवसर देखकर नल के शरीर में प्रवेश किया तथा दूसरा रूप धारण करके वह [[पुष्कर]] के पास गया। पुष्कर नल का भाई लगता थां उसे कलि ने उकसाया कि वह जुए में नल को हराकर समस्त राज्य प्राप्त कर ले। पुष्कर नल के महल में उससे जुआ खेलने लगा। नल ने अपना समस्त वैभव, राज्य इत्यादि जुए पर लगाकर हार दिया। दमयंती ने अपने सारथी को बुलाकर दोनों बच्चों को अपने भाई-बंधुओं के पास कुण्डिनपुर (विदर्भ देश में) भेज दिया। नल और दमयंती एक-एक वस्त्र में राज्य की सीमा से बाहर चले गये। वे एक जंगल में पहुंचे। वहां बहुत-सी सुंदर चिड़ियां बैठी थीं, जिनकी आंखें सोने की थीं। नल ने अपना वस्त्र उतारकर उन चिड़ियों पर डाल दिया ताकि उन्हें पकड़कर उदराग्नि को तृप्त कर सके और उनकी आंखों के स्वर्ण से धनराशि का संचय करे, किंतु चिड़िया उस धोती को ले उड़ीं तथा यह भी कहती गयीं कि वे जुए के पासे थे जिन्होंने चिड़ियों का रूप धारण कर रखा था तथा वे धोती लेने की इच्छा से ही वहां पहुंची थीं। नग्न नल अत्यंत व्याकुल हो उठा। बहुत थक जाने के कारण जब दमयंती को नींद आ गयी तब नल ने उसकी साड़ी का आधा भाग काटकर धारण कर लिया और उसे जंगल में छोड़कर चला गया। &lt;br /&gt;
==जंगल में अकेली दमयंती== &lt;br /&gt;
भटकती हुई दमयंती को एक अजगर ने पकड़ लिया। उसका विलाप सुनकर किसी व्याध ने अजगर से तो उसकी प्राणरक्षा कर दी किंतु कामुकता से उसकी ओर बढ़ा। दमयंती ने देवताओं का स्मरण कर कहा, कि यदि वह पतिव्रता है तो उसकी सुरक्षा हो जाय। वह व्याध तत्काल भस्म होकर निष्प्राण हो गया। थोड़ी दूर चलने पर दमयंती को एक आश्रम दिखलायी पड़ा। दमयंती ने वहां के तपस्वियों से अपनी दु:खगाथा कह सुनायी और उनसे पूछा कि उन्होंने नल को कहीं देखा तो नहीं है। वे तपस्वी ज्ञानवृद्ध थे। उन्होंने उसके भावी सुनहरे भविष्य के विषय में बताते हुए कहा कि नल अवश्य ही अपना राज्य फिर से प्राप्त कर लेगा और दमयंती भी उससे शीघ्र ही मिल जायेगी। भविष्यवाणी के उपरांत दमयंती देखती ही रह गयी कि वह आश्रम, तपस्वी, नदी, पेड़, सभी अंतर्धान हो गये। तदनंतर उसे शुचि नामक व्यापारी के नेतृत्व में जाती हुई एक व्यापार मंडली मिली। वे लोग [[चेदि]]राज [[सुबाहु]] के जनपद की ओर जा रहे थे। कृपाकांक्षिणी दमयंती को भी वे लोग अपने साथ ले चले। मार्ग में जंगली हाथियों ने उन पर आक्रमण कर दिया। धन, वैभव, जन आदि सभी प्रकार का नाश हुआ। कई लोगों का मत था कि दमयंती नारी के रूप में कोई मायावी राक्षसी अथवा यक्षिणी रही होगी, उसी की माया से यह सब हुआ। उनके मन्तव्य को जानकर दमयंती का दु:ख द्विगुणित हो गया। सुबाहु की राजधानी में भी लोगों ने उसे अन्मत्त समझा क्योंकि वह कितने ही दिनों से बिखरे बाल, धूल से मंडित तन तथा आधी साड़ी में लिपटी देह लिए धूम रही थीं अपने पति की खोज में उसकी दयनीय स्थिति जानकर राजमाता ने उसे आश्रय दिया। दमयंती ने राजमाता से कहा कि वह उनके आश्रय में किन्हीं शर्तों पर रह सकेगी: वह जूठन नहीं खायेंगी, किसी के पैर नहीं धोयेगी, ब्राह्मण से इतर पुरुषों से बात नहीं करेगी, कोई उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करे तो वह दंडनीय होगा। दमयंती ने अपना तथा नल का नामोल्लेख नहीं किया। वहां की राजकुमारी सुनंदा की सखी के रूप में वह वहां रहने लगी। दमयंती के माता-पिता तथा बंधु-बांधव उसे तथा नल को ढूंढ़ निकालने के लिए आतुर थे। उन्होंने अनेक ब्राह्मणों को यह कार्य सौंपा हुआ था। दमयंती के भाई के मित्र सुदैव नामक ब्राह्मण ने उसे खोज निकाला। सुदैव ने उसके पिता आदि के विषय में बताकर राजमाता उसकी मौसी थी किंतु वे परस्पर पहचान नहीं पायी थीं। दमयंती मौसी की आज्ञा लेकर विदर्भ निवासी बंधु-बांधवों, माता-पिता तथा अपने बच्चों के पास चली गयी। उसके पिता नल की खोज के लिए आकुल हो उठे। &lt;br /&gt;
==जंगल में नल==&lt;br /&gt;
दमयंती को छोड़कर जाते हुए नल ने दावालन में घिरे हुए किसी प्राणी का आर्तनाद सुना वह निर्भीकतापूर्वक अग्नि में घुस गया। अग्नि के मध्य [[कर्कोटक]] नामक नाग बैठा था, जिसे [[नारद]] ने तब तक जड़वत निश्चेष्ट पड़े रहने का शाप दिया था जब तक राजा नल उसका उद्धार न करे। नाग ने एक अंगूठे के बराबर रूप धारण कर लिया और [[अग्नि]] से बाहर निकालने का अनुरोध किया। नल ने उसकी रक्षा की, तदुपरांत कर्कोटक ने नल को डंस लिया, जिससे उसका रंग काला पड़ गया। उसने राजा को बताया कि उसके शरीर में कलि निवास कर रहा है, उसके दु:ख का अंत कर्कोटक के विष से ही संभव है। दु:ख के दिनों में श्यामवर्ण प्राप्त राजा को लोग पहचान नहीं पायेंगे। अत: उसने आदेश दिया कि नल बाहुक नाम धर कर [[इक्ष्वाकु]]कुल के ऋतुपर्ण नामक [[अयोध्या]] के राजा के पास जाये। राजा को अश्वविद्या का रहस्य सिखाकर उससे द्यूतक्रीड़ा का रहस्य सीख ले। राजा नल को सर्प ने यह वर दिया कि उसे कोई भी दाढ़ी वाला जंतु तथा वेदवेत्ताओं का शाप त्रस्त नहीं कर पायेगा। सर्प ने उसे दो दिव्य वस्त्र भी दिये जिन्हें ओढ़कर वह पूर्व रूप धारण कर सकता था। तदनंतर कर्कोंटक अंतर्धान हो गया। नल ऋतुपर्ण के यहां गया तथा उसने राजा से निवेदन किया कि उसका नाम बाहुक है और वह पाकशास्त्र, अश्वविद्या तथा विभिन्न शिल्पों का ज्ञाता हे। राजा ने उसे अश्वाध्यक्ष के पद पर नियुक्त कर लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नल की खोज==&lt;br /&gt;
[[विदर्भ]]राज का पर्णाद नामक ब्राह्मण नल को खोजता हुआ अयोध्या में पहुंचा। विदर्भ देश में लौटकर उसने बताया कि वाहुक नामक सारथी का क्रियाकलाप संदेहास्पद है। वह नल से बहुत मिलता है। दमयंती ने पिता से गोपन रखते हुए मां की अनुमति से सुदेव नामक ब्राह्मण के द्वारा ऋतुपर्ण को कहलाया कि अगले दिन दमयंती का दूसरा स्वयंवर है। अत: वह पहुंचे। ऋतुपर्ण ने बाहुक से सलाह करके विदर्भ देश के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में राजा ने बाहुक से कहा कि अमुक पेड़ पर अमुक संख्यक फल हैं। बाहुक वचन की शुद्धता जानने के लिए पेड़ के पास रूक गया तथा उसके समस्त फल गिनकर उसने देखा कि वस्तुत: उतने ही फल हैं। राजा ने बताया कि वह गणित और द्यूत-विद्या के रहस्य को जानता है। ऋतुपर्ण ने बाहुक को द्यूत विद्या सिखा दी तथा उसके बदले में अश्व-विद्या उसी के पास धरोहर रूप में रहने दी। बाहुक के द्यूत विद्या सीखते ही उसके शरीर से [[कलि युग]] निकलकर बहेड़े के पेड़ में छिप गया, फिर क्षमा मांगता हुआ अपने घर चला गया। विदर्भ देश में स्वयंवर के कोई चिह्न नहीं थे। ऋतुपर्ण तो विश्राम करने चला गया किंतु दमयंती ने केशिनी के माध्यम से बाहुक की परीक्षा ली। वह स्वेच्छा से जल तथा [[अग्नि]] को प्रकट कर सकता था। उसके चलाये रथ की गति वैसी ही थी जैसे राजा नल की हुआ करती थी। बाहुक अपने बच्चों से मिलकर खूब रोया भी था। दमयंती को रूप के अतिरिक्त किसी भी वस्तु में बाहुक तथा नल में विषमता नहीं दीख पड़ रही थी। उसने गुरुजनों की आज्ञा लेकर उसे अपने कक्ष में बुलाया। नल को भली भांति पहचानकर दमयंती ने उसे बताया कि नल को ढूंढ़ने के लिए ही दूसरे स्वयंवर की चर्चा की गयी थी। ऋतुपर्ण को अश्व-विद्या देकर नल ने [[पुष्कर]] से पुन: जुआ खेला। उसने दमयंती तथा धन की बाजी लगा दीं पुष्कर संपूर्ण धन धान्य और राज्य हारकर अपने नगर चला गया। नल ने पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।  &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, [[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]], अध्याय 53 से 78 तक&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{महाभारत}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AA&amp;diff=6544</id>
		<title>महाराणा प्रताप</title>
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		<updated>2010-03-11T08:22:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==महाराणा प्रताप / Maharana Pratap==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
*'धर्म रहेगा और [[पृथ्वी]] भी रहेगी, (पर) मुग़ल-साम्राज्य एक दिन नष्ट हो जायगा। अत: हे राणा! विश्वम्भर भगवान के भरोसे अपने निश्चय को अटल रखना।'-अब्दुलरहीम खानखाना &amp;lt;ref&amp;gt;ध्रम रहसी, रहसी धरा, खिस जासे खुरसाण।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अमर बिसंभर ऊपरे रखिओ नहचो राण॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
				-अब्दुलरहीम खानखाना&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*महाराणा का वह निश्चय लोकविश्रुत है—भगवान एकलिंग की शपथ है, प्रताप के इस मुख से [[अकबर]] तुर्क ही कहलायेगा। मैं शरीर रहते उसकी अधीनता स्वीकार करके उसे बादशाह नहीं कहूँगा। [[सूर्य]] जहाँ उगता है, वहाँ पूर्व में ही उगेगा। सूर्य के पश्चिम में उगने के समान प्रताप के मुख से अकबर को बादशाह निकलना असम्भव है। &amp;lt;ref&amp;gt;तुरक कहासी मुख पतो इण तनसूँ इकलिंग।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ऊगै हाँईं ऊगसी, प्राची बीच पतंग॥&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*31 मई सन 1539 (वि0 सं0 1516 ज्येष्ठ शुक्ल 13) की वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़-मुकुट मणि प्रताप का जन्म हुआ। बाप्पा रावल के कुल की अक्षुण्ण कीर्ति की उज्ज्वल पताका, राजपूती आन एवं शौर्य का वह पुण्य प्रतीक, [[महाराणा सांगा]] का वह पावन पौत्र जब (वि0 सं0 1628 फाल्गुन शुक्ल 15) ता0 1 मार्च सन 1573 को सिंहासनासीन हुआ, अधिकांश राजपूत नरेश परम कूटनीतिज्ञ सम्राट अकबर के दरबार में उपस्थित हो चुके थे। अनेकों ने अपनी कन्याएँ देकर बादशाह से सम्बन्ध कर लिया था। शौर्य की मूर्ति प्रताप एकाकी थे। अपनी प्रजा के साथ और एकाकी ही उन्होंने जो धर्म एवं स्वाधीनता के लिये ज्योतिर्मय बलिदान किया, वब विश्व में सदा परतन्त्रता और अधर्म के विरूद्ध संग्राम करनेवाले, मानधनी, गौरवशील मानवों के लिये मशाल सिद्ध होगा। &lt;br /&gt;
*सम्राट अकबर की कूटनीति व्यापक थी, राज्य को जिस प्रकार उन्होंने राजपूत-नरेशों से सन्धि एवं वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा निर्भय एवं विस्तृत कर लिया था, धर्म के सम्बन्ध में भी वे अपने '[[दीन-ए-इलाही|दीन इलाही]]' के द्वारा हिंदू-धर्म की श्रद्धा थकित करने के प्रयास में नहीं थे- कहना कठिन है। आज कोई कुछ कहे, किंतु उस युग में सच्ची राष्ट्रियता थी हिंदुत्व, और उसकी उज्ज्वल ध्वजा गर्व पूर्वक उठाने वाला एक ही अमर सेनानी था- प्रताप। अकबर का शक्ति सागर इस अरावली के शिखर से व्यर्थ ही टकराता रहा- नहीं झुका। &lt;br /&gt;
*अकबर के महासेनापति मानसिंह शोलापुर विजय करके लौट रहे थे। उदय सागर पर महाराणा ने उनके स्वागत का प्रबन्ध किया। हिंदू नरेश के यहाँ, भला अतिथि का सत्कार न होता, किंतु महाराणा प्रताप ऐसे राजपूत के साथ बैठकर भोजन कैसे कर सकते थे, जिसकी बुआ मुग़ल-अन्त:पुर में हो। मानसिंह को बात समझने में कठिनाई नहीं हुई। अपमान से जले वे [[दिल्ली]] पहुँचे। उन्होंने सैन्य सज्जित करके चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हल्दीघाटी== &lt;br /&gt;
राजपूताने की वह पावन बलिदान-भूमि, विश्व में इतना पवित्र बलिदान स्थल कोई नहीं। इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं उस शौर्य एवं तेज की भव्य गाथा से। भीलों का अपने देश और नरेश के लिये वह अमर बलिदान, राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम— इतिहास का, वीरकाव्य का वह परम उपजीव्य है। मेवाड़ के उष्ण रक्त ने श्रावण संवत 1633 वि0 में हल्दीघाटी का कण-कण लाल कर दिया। अपार शत्रु सेना के सम्मुख थोड़े–से राजपूत और भील सैनिक कब तक टिकते? महाराणा को पीछे हटना पड़ा और उनका प्रिय अश्व चेतक-उसने उन्हें निरापद पहुँचाने में इतना श्रम किया कि अन्त में वह सदा के लिये अपने स्वामी के चरणों में गिर पड़ा। &lt;br /&gt;
==महाराणा एक कुशल शासक== &lt;br /&gt;
वे प्रजा के आज से शासक नहीं, हृदय पर शासन करने वाले थे। एक आज्ञा हुई और विजयी सेना ने देखा उसकी विजय व्यर्थ है । चित्तौड़ भस्म हो गया, खेत उजड़ गये, कुएँ भर दिये गये और ग्राम के लोग जंगल एवं पर्वतों मं अपने समस्त पशु एवं सामग्री के साथ अदृश्य हो गये। शत्रु के लिये इतना विकट उत्तर, यह उस समय महाराणा की अपनी सूझ है। अकबर के उद्योग में राष्ट्रीयता का स्वप्न देखने वालों को इतिहासकार [[बदायूँनी]] आसफखाँ के ये शब्द स्मरण कर लेने चाहिये- 'किसी की ओर से सैनिक क्यों न मरे, थे वे हिंदू ही और प्रत्येक स्थिति में विजय इस्लाम की ही थी।' यह कूटनीति थी अकबर की और महाराणा इसके समक्ष अपना राष्ट्रगौरव लेकर अडिंग भाव से उठे थे।&lt;br /&gt;
==महाराणा का वनवास== &lt;br /&gt;
महाराणा चित्तौड़ छोड़कर वनवासी हुए। महाराणी, सुकुमार राजकुमारी और कुमार घास की रोटियों और निर्झर के जल पर किसी प्रकार जीवन व्यतीत करने को बाध्य हुए। अरावली की गुफ़ाएँ ही आवास थीं और शिला ही शैया थी। [[दिल्ली]] का सम्राट सादर सेनापतित्व देने को प्रस्तुत था, उससे भी अधिक- वह केवल चाहता था प्रताप अधीनता स्वीकार कर लें, उसका दम्भ सफल हो जाय। हिंदुत्व पर दीन-इलाही स्वयं विजयी हो जाता। प्रताप-राजपूत की आन का वह सम्राट, हिंदुत्व का वह गौरव-सूर्य इस संकट, त्याग, तप में अम्लान रहा- अडिंग रहा। धर्म के लिये, आन के लिये यह तपस्या अकल्पित है । कहते हैं महाराणा ने अकबर को एक बार सन्धि-पत्र भेजा था, पर इतिहासकार इसे सत्य नहीं मानते। यह अबुल फजल की गढ़ी हुई कहानी भर है। &lt;br /&gt;
अकल्पित सहायता मिली, मेवाड़ के गौरव भामाशाह ने महाराणा के चरणों में अपनी समस्त सम्पत्ति  रख दी। महाराणा इस प्रचुर सम्पत्ति से पुन: सैन्य-संगठन में लग गये। चित्तौड़ को छोड़कर महाराणा ने अपने समस्त दुर्गों का शत्रु से उद्वार कर लिया। उदयपुर उनकी राजधानी बना। अपने 24 वर्षों के शासन काल में उन्होंने मेवाड़ की केशरिया पताका सदा ऊँची रक्खी।&lt;br /&gt;
==महाराणा की प्रतिज्ञा== &lt;br /&gt;
'चित्तौड़ के उद्धार से पूर्व पात्र में भोजन, शय्यापर शयन दोनों मेरे लिये वर्जित रहेंगे।' महाराणा की प्रतिज्ञा अक्षुण्ण रही और जब वे (वि0 सं0 1653 माघ शुक्ल 11) ता0 29 जनवरी सन 1597 में परमधाम की यात्रा करने लगे, उनके परिजनों और सामन्तों ने वही प्रतिज्ञा करके उन्हें आश्वस्त किया। अरावली के कण-कण में महाराणा का जीवन-चरित्र अंकित है। शताब्दियों तक पतितों, पराधीनों और उत्पीड़ितों के लिये वह प्रकाश का काम देगा। चित्तौड़ की उस पवित्र भूमि में युगों तक मानव स्वराज्य एवं स्वधर्म का अमर सन्देश झंकृत होता रहेगा।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राण प्रताप।'''&lt;br /&gt;
'''अकबर सूतो ओधकै, जाण सिराणै साप॥'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category: कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य काल]]&lt;br /&gt;
[[Category: इतिहास-कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A4%B2&amp;diff=6532</id>
		<title>बदनसिंह और सूरजमल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A4%B2&amp;diff=6532"/>
		<updated>2010-03-11T08:01:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==बदनसिंह और पुत्र सूरजमल==&lt;br /&gt;
{{tocright}} &lt;br /&gt;
भरतपुर का इतिहास उसकी भौगोलिक स्थिति ने निर्धारित किया, फिर भी भरतपुर राज्य का सृजन अठारवीं शताब्दी के दो असाधारण राजनेताओं–ठाकुर [[बदनसिंह]] और महाराजा [[सूरजमल]] का ही कृतित्व है। उथल-पुथल से भरी अठारवीं शताब्दी के लगभग पचास सालों तक न कोई जाट-राज्य था, न संगठित जाट-राष्ट्र और न कोई ऐसा जाट-शासक था जिसे सर्व-सम्मति से ‘समान लोगों में प्रथम’ माना या समझा जाता हो। [[ठाकुर चूड़ामन सिंह]] इस स्थिति तक लगभग पहुँच गया था, परन्तु उसने अपने लोगों की सहनशीलता की बड़ी कड़ी परीक्षा ली थी और बदन सिंह को क़ैद करने के बाद वह अपनी प्रतिष्ठा गँवा बैठा था। अभिमानी और हठी, हर थोक (क़बीले) का मुखिया अपनी ही बात पर अड़ा रहता था; उसकी दृष्टि संकीर्ण और महत्त्वाकांक्षा असीम होती थी। बदनसिंह के सम्मुख जो विकट बाधाएँ थीं, उनका उसे भली-भाँति ज्ञान था। अपने ही कुटुम्बी सिनसिनवारों में भी वह बिरादरी का मुखिया स्वीकार किया गया था। चूड़ामन के पुत्रों मोखमसिंह और ज़ुलकरणसिंह ने न अपना दावा त्यागा था और न शत्रुता ही। वरिष्ठ शाख़ा के ये अधिकार वंचित उत्तराधिकारी सदा मौक़ा ढूँढ़ते रहते थे। अन्य सरदारों ने सतर्क रहकर प्रतीक्षा करने की नीति अपनाई थी।&lt;br /&gt;
==बदनसिंह की नीति== &lt;br /&gt;
बदन सिंह में समस्याओं का सामना करने के गुण विद्यमान थे। वह अपने काम में असाधारण कौशल और अथक धैर्य के साथ जुट गया। उसने बल-प्रयोग और अनुनय-विनय-दोनों का ही समझदारी से प्रयोग किया। शत्रुओं का विनाश करने, मित्रों को पुरस्कार देने, अपने राज्य को समृद्ध करने और अपने क्षेत्र को बढ़ाने के लिए उसने सभी उपायों से काम लिया। आवश्यकता पड़ने पर वह युद्ध करता था; खुलकर रिश्वत देता था और उसने बार-बार विवाह किए। अपनी पत्नियों का चुनाव वह शक्ति-सम्पन्न जाट-परिवारों में से करता था। सौम्य-शिष्टाचार तथा सार्वजनिक विनम्रता के पीछे उसकी लौह इच्छा-शक्ति तथा निष्ठुर दृढ़ संकल्प छिपा था। [[जयपुर]] के [[जयसिंह]] कछवाहा के सरंक्षण के कारण उसकी सफलता सुनिश्चित थी। चूड़ामन की 'गद्दी' पर बदनसिंह को बिठाकर जयसिंह ने असाधारण दूरदर्शिता दिखाई थी। जाटों को अपना विरोधी बनाने के बजाय उन्हें अपने पक्ष में रखना हर दृष्टि से समझदारी का काम था। आमेर के शासकों ने मुग़ल साम्राज्य की बड़ी सेवा की थी। उसका इनाम भी उन्हें अच्छा मिला था। अधिकार-प्रभाव पद,प्रतिष्ठा, राज्य-क्षेत्र और धन-सबकुछ उनके पास था। [[आगरा]] और [[मथुरा]] की, जहाँ जाट बसते थे, 'सूबेदारी' एक से अधिक बार आमेर के राजवंश को दी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==किशोर सूरजमल को 'ब्रजराज' उपाधि==&lt;br /&gt;
भरतपुर के पहाड़ी उत्तरी क्षेत्रों में खूँख़ार मेव बसते थे; उनका धर्म इस्लाम था और जीविका का साधन लूटपाट। जयसिंह ने बदनसिंह से मेवों की उच्छृंखल गतिविधियों का दमन करने को कहा। उसने उन से निपटने के लिए अपने किशोर-पुत्र सूरजमल तथा एक निकट सम्बन्धी ठाकुर सुल्तानसिंह को भेजा, परिणाम बहुत सन्तोषजनक रहे। सूरजमल के आचरण और साहस से उनके सैनिक बहुत प्रभावित हुए। इस अभियान की सफलता से जयसिंह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सिनसिनवार सूरजमल को न केवल 'निशान', नगाड़ा और पंचरंगा झंडा ही, बल्कि 'ब्रजराज' की उपाधि भी प्रदान की। 2,40,000 रूपये वार्षिक कर लेकर उसने मेवात को बदनसिंह के अधीन कर दिया, जिससे उसे निश्चित रूप से 18,00,000 रूपये की वार्षिक आय होती थी। बदनसिंह सबके सामने जयसिंह के आभार को स्वीकार करता था। धीरे-धीरे उसने जयसिंह का पूर्ण विश्वास प्राप्त कर लिया और जयसिंह ने इस जाट-सरदार को आगरा, [[दिल्ली]] और जयपुर जाने वाले राजमार्ग पर गश्त करने और इन राजमार्गों का उपयोग करने वालों से पथ-कर उगाहने का कार्य सौंप दिया। इस प्रकार बदनसिंह को प्रभुत्व, उपाधि, और राज्य-क्षेत्र–तीनों चीजें प्राप्त हो गईं, जो अन्य किसी जाट-सरदार के पास नहीं थीं। यह चतुर सिनसिनवार बहुत समझदारी के साथ 'राजा' की उपाधि धारण करने के लोभ का संवरण किए रहा। &lt;br /&gt;
==राजधानी की खोज==&lt;br /&gt;
बदनसिंह ने अपनी राजधानी के लिए खोज शुरू कर दी। थून के साथ उसकी अप्रिय स्मृतियाँ जुड़ी थी। सिनसिनी एकमात्र बड़ा गाँव था, जहाँ पानी भी नहीं था। उसने महात्मा प्रीतमदास की सलाह पर [[डीग]] को चुना। उसने नींव खुदवाई, समारोह में महात्मा जी को भी बुलवाया। जब महात्मा प्रीतमदास भूमि खोदते हए ग्यारह बार फावड़ा चला चुके तब बदनसिंह ने कहा- 'बाबा जी आप थक गए होंगे; ग्यारह काफ़ी हैं। प्रीतमसिंह ने फावड़ा छोड़ दिया और अपना हाथ बदनसिंह के कन्धे पर रखते हुए कहा, 'तुम्हारा वंश ग्यारह पीढ़ी तक शासन करेगा।' उनकी भविष्यवाणी बिलकुल सही निकली।&lt;br /&gt;
==बाग़ीचों और महलों के निर्माण== &lt;br /&gt;
डीग के क़िले बाग़ीचों और महलों के निर्माण का कार्य सन् 1725 में आरम्भ हुआ और उस शताब्दी के समाप्त होने तक चलता रहा। कहीं कोई नया भवन या कहीं कोई मंडप बनवाता, किसी बाग़ीचे में कोई परिवर्तन करता, किसी तालाब को बढ़वाता या बुर्जों को नए ढंग से बनवाता रहा। [[अकबर]] के राज्यकाल में भारतीय वास्तुकला उत्कृष्टता के बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँच गई थी। [[फ़तेहपुर सीकरी]] (जो वर्तमान [[भरतपुर]] से दस मील पूर्व में है) उसका बनवाया स्मारक है। [[जहाँगीर]] की रूचि भवनों के निर्माण में कम और बाग़ीचे बनवाने में अधिक रहीं, परन्तु [[शाहजहाँ]] ने संसार के कुछ सबसे सुन्दर भवन तैयार करवाए।	शाहजहाँ मुग़ल-सम्राटों में अन्तिम भवन-निर्माता था। [[ताजमहल]] आज भी अद्वितीय है, परन्तु उसके राज्य-काल के अन्तिम दिनों (सन् 1658) में बनी मुग़ल इमारतों में वास्तु–कौशल कुछ क्षीण हो गया था। [[औरंगज़ेब]] के राज्य-काल में यह ह्रास साफ दिखता है। उसकी  मृत्यु तक मुग़ल वास्तुकला का अस्तित्व व्यवहारतः समाप्त हो गया था। आगरा और दिल्ली के श्रेष्ठ भवन-निर्माताओं ने राजस्थान के राजाओं के यहाँ नौकरी कर ली थी। सन 1650 से लेकर 1850 तक के 200 वर्षों में जयपुर के गुलाबी शहर और डीग के महलों से सिवाय कला की दृष्टि से कोई भवन बना ही नहीं। दिल्ली में नवाब सफ़दरजंग का मक़बरा भी [[हुमायूँ]] के मक़बरे की, जो उससे केवल मील-भर दूर है, एक नक़ल मात्र है। औरंगाबाद में बना 'बीबी का मक़बरा' भारत-भर में अपने ढंग की सबसे बदसूरत इमारत है; यह उस पुरुष का बिल्कुल उपयुक्त स्मारक है, जिसने सभी सभ्य आमोद-प्रमोदों को त्याज्य ठहरा दिया था।&lt;br /&gt;
==बदनसिंह का सौन्दर्य-बोध==&lt;br /&gt;
निरक्षर होने पर भी, बदनसिंह में आश्चर्यजनक सौन्दर्य-बोध था। सुन्दर उद्यान–प्रासादों की भव्य रूपरेखा उसी ने अकेले रची थी।&lt;br /&gt;
*डीग से पन्द्रह मील पूर्व की ओर, सहर में बदनसिंह ने एक सुन्दर भवन बनवाया, जो बाद में उसका निवास स्थान बन गया। &lt;br /&gt;
*एक पीढ़ी में ही भरतपुर और डींग के प्राकृतिक दृश्य बदल गए थे। पहले डीग एक छोटा-सा क़स्बा था; अब वह बहुत सुन्दर तथा समृद्ध उद्यान-नगर बन गया था, जहाँ पहले बदनसिंह और उसके बाद सूरजमल के आगरा और दिल्ली से होड़ करने वाले शानदार दरबार लगा करते थे। डीग से बीस मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित सोघर के जंगल काट दिए गए और दलदलें पाट दी गईं और वहाँ विशाल एवं भव्य भरतपुर का क़िला बना।&lt;br /&gt;
==सोघर पर अधिकर==&lt;br /&gt;
भरतपुर में सिनसिनवारों के अलावा, एक अन्य प्रमुख जाट-परिवार डीग के दक्षिण-पश्चिम में स्थिर सोघर गाँव के सोघरियों का था। यह चारों तरफ़ दलदल से घिरा था। बरसात में इस गाँव तक पहुँचना बहुत ही मुश्किल था। रक्षा की दृष्टि से यह आदर्श जगह थीं। युद्ध के समय बाण-गंगा और रूपारेल- इन दो नदियों का पानी क्षेत्र को जलमग्न करने के लिए छोड़ा जा सकता था, जिससे शत्रु आगे न बढ़ने पाए। अठारवीं शताब्दी में ठाकुर खेमकरणसिंह सोघरिया ने सोघर तथा आस-पास के गाँवों पर अधिकार जमा लिया था। उसने सबसे ऊँची जगह पर क़िला बनवाया और उसका नाम फ़तहगढ़ रखा। अनेक वर्षों तक वह और उसका कुटुम्ब फलता-फूलता रहा; उनका प्रभाव और प्रतिष्ठा बढ़ती गई। बदनसिंह की माँ अचलसिंह सोघरिया की बेटी थी। परन्तु भरतपुर में दोनों अभिमानी कुटुम्ब साथ-साथ शान्तिपूर्वक नहीं रह सकते थे। बदनसिंह अपने पड़ोस में किसी प्रतिद्वन्द्वी शक्ति को बसाने को तैयार नहीं था। सन 1732 में उसने अपने 25 वर्षीय पुत्र सूरजमल को सोघर पर अधिकार करने के लिए भेजा। सूरजमल ने आक्रमण करके सोघर को जीत लिया। सोघरिया लोग जमकर लड़े, परन्तु हार जाने पर उन्होंने नए शासन को स्वीकार कर लिया। बदनसिंह ने अपने पुत्र को विजय की आवश्यकता और समझौते की उपयोगिता-दोनों बातें सिखलाई थीं। सोघरिया लोगों को व्यवहार-कौशल तथा सद्भावना द्वारा शान्त कर दिया गया। सोघर पर अधिकार करने के बाद एक दिन शाम के समय सूरजमल आस-पास के जंगलों में निकल गया। वह एक झील पर जा पहुँचा। वहाँ एक सिंह और एक गाय बिल्कुल पास खड़े पानी पी रहे थे। इस अदभुत दृश्य का उस पर गहरा प्रभाव पड़ा। निकट ही एक नागा साधु का डेरा था, आस-पास दृश्य बहुत ही मोहक था। सूरजमल उस डेरे की ओर बढ़ा। उसने महात्माजी को प्रणाम  किया। उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और अपनी राजधानी सोघर में बनाने की सलाह दी। सूरजमल ने अद्भुत निर्माण कराए।&lt;br /&gt;
*सर जदुनाथ सरकार लिखते हैं– 'सूरजमल का मुख्य लक्ष्य यह था कि भरतपुर की ऐसी मजबूत क़िलेबन्दी कर दी जाए कि वह बिल्कु्ल अजेय हो और उसके राज्य की उपयुक्त राजधानी बन सक।....इन सभी क़िलों में रक्षा की सुदृढ़ व्यवस्था की गई थी। इनमें लूटकर या ख़रीदकर प्राप्त की गई अनगिनत छोटी तोपें लगी थीं, बड़ी तोपें उसने स्वयं ढलवाई थी।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot; (जदुनाथ सरकार 'फ़ॉल आफ़ द मुग़ल ऐम्पायर', खंड दो पृ.316)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*इन सब तोपों को चलाना या प्रयोग में लाना भी आसान काम नहीं था–48 पौंड का गोला फेंकने वाली एक तोप ऐसी थी, जिसे खींचने के लिए 40 जोड़ी बैल लगते थे। &lt;br /&gt;
*डीग और भरतपुर के बीच कुम्हेर में और वैर में अपेक्षाकृत छोटे क़िले बनाए गए। वैर में सूरजमल का छोटा भाई प्रतापसिंह रहता था। वह विद्वान जाट-राजकुमार वैर के सुन्दर उद्यानों में बरसात की शीतल सन्ध्याओं में अपनी पुस्तकें पढ़ा करता या कोई मधुर गीत गाया करता था। &lt;br /&gt;
*भरतपुर के क़िले का निर्माण-कार्य शुरू करने के कुछ समय बाद बदनसिंह की नज़र कमज़ोर हो गयी थी। अतः अपने सबसे योग्य और विश्वासपात्र पुत्र सूरजमल को राजकाज सौंप दिया। पहले भी शासन वही करता था, बदनसिंह तो केवल नाम का राजा था। बदनसिंह राज्य-परिषद में अध्यक्ष बनकर बैठता था। प्रत्येक नए कार्य  या अभियान के लिए सूरजमल उसकी अनुमति लेने जाता था। जब सन 1739 में नादिरशाह का आक्रमण हुआ, तब तक बदनसिंह एक सामान्य ज़मींदार से बढ़कर, फ़ादर बैंदेल के शब्दों में– 'शीघ्र ही एक ऐसा राजा बन गया था, जिसमें अपने लोगों के विरोध के होते हुए भी अपने पद पर बने रहने लायक़ यथेष्ट शक्ति भी इतनी थी कि लोग न केवल उसका सम्मान करें, अपितु अन्ततोगत्वा उससे डरने भी लगें।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(बैंदेल, 'आर्म की पांडुलिपि')&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*फ़ादर बैंदेल का कथन है कि ठाकुर बदनसिंह की 50 पत्नियाँ थीं। &amp;quot;इनमें से कुछ तो बाक़ायदा विवाह द्वारा प्राप्त हुई थीं और कुछ को उसने यों-ही ज़बरदस्ती रख लिया था।&amp;quot; बदनसिंह की सचमुच ही अनेक पत्नियाँ थीं और उस काल के चलन के अनुसार कई रखैलें भी थीं। उसके छब्बीस पुत्रों के नाम मिलते हैं। उसकी कुछ पुत्रियाँ भी अवश्य हुई होंगी, परन्तु उन का विवरण नहीं मिलता। सूरजमल राज्य का शासन करता था, परन्तु बाक़ी पच्चीस में से प्रत्येक को जागीरें दी गई थी। उनके वंशजों का भरतपुर में आज भी आदर होता है। वे 'कोठरीबन्द ठाकुरों' के रूप में विख्यात हैं।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(बैदेल, 'आर्म की पांडुलिपि')&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*अपने जीवन के अन्तिम दस वर्षों में बदनसिंह अधिकांश समय सहर और डीग में बिताता था। वह हर साल अपनी जयपुर 'तीर्थ-यात्रा' पर जाया करता था, परन्तु सन 1750 के बाद उसका यह जाना कम हो गया। दिल्ली जाने के लिए उसे कोई राज़ी नहीं कर पाया। 'मैं तो एक ज़मीदार हूँ। शाही दरबार में मेरा क्या काम।' &lt;br /&gt;
*फ़ादर बैंदेल, एक अप्रामाणिक इतिहासकार होते हुए भी, सजीव और रोचक हैं। बदनसिंह के विशाल परिवार का वर्णन करते हुए वे कहते हैं- 'यह भी अफ़वाह है कि उसके वंशजों का चींटी-दल इतना ज़्यादा बड़ा है कि जब उसके परिवार के कोई सदस्य उसके पास लाए जाते हैं, तब स्वयं उसे उन्हें पहचानने में और यह याद करने में कठिनाई होती है कि किस बच्चे की माँ कौन थी। ज्यों-ज्यों आयु और विषयासक्ति के फलस्वरूप उसकी दृष्टि क्रमशः घटने लगी, त्यों-त्यों यह कठिनाई अधिकाधिक बढ़ती गई। अन्त में तो स्थिति यह हो गई कि जब उसके बच्चे पिता को प्रणाम करने आते थे, तब उन्हें अपनी माता का नाम, अपनी आयु और अपना निवास-स्थान बताना पड़ता था, तभी उनके प्रणाम का उत्तर मिल पाता था।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(वैंदेल 'और्म की पांडुलिपि')&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{जाट इतिहास}}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
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[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>साँचा:शिव</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
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		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>परशुराम</title>
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		<updated>2010-03-10T15:08:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
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{{दशावतार}}&lt;br /&gt;
==परशुराम / Parshuram==&lt;br /&gt;
राजा प्रसेनजित की पुत्री [[रेणुका]] और भृगुवंशीय [[जमदग्नि]] के पुत्र, [[विष्णु के अवतार]] परशुराम [[शिव]] के परम भक्त थे इनका नाम तो राम था, किन्तु [[शंकर]] द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण ये परशुराम कहलाते थे। एक बार इनके पिता ने अपने सब पुत्रों को माता का वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी तैयार न हुआ। अत: जमदग्नि ने सबको संज्ञाहीन कर दिया। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर माता का शीश काट डाला। पिता ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान माँगे-&lt;br /&gt;
#माँ पुनर्जीवित हो जायँ, &lt;br /&gt;
#उन्हें मरने की स्मृति न रहे, &lt;br /&gt;
#भाई चेतना-युक्त हो जायँ और &lt;br /&gt;
#मैं परमायु होऊँ। जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिये। &lt;br /&gt;
*एक बार कार्त्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था, जिससे परशुराम ने क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। &lt;br /&gt;
*कार्त्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से जमदग्नि का वध कर दिया। &lt;br /&gt;
*इस पर परशुराम ने 21 बार [[पृथ्वी]] को क्षत्रिय-विहीन कर दिया। &lt;br /&gt;
*रामावतार में [[राम|रामचन्द्र]] द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर ये क्रुद्ध होकर आये थे। इन्होंने परीक्षा के लिए उनका धनुष रामचन्द्र को दिया। जब राम ने धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गये कि रामचन्द्र [[विष्णु]] के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या करने चले गये। &lt;br /&gt;
*'कहि जय जय रघुकुल केतू। भुगुपति गए बनहि तप हेतु॥' यह वर्णन 'राम चरितमानस', प्रथम सोपान में 267 से 284 दोहे तक मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि मुनि]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%A8&amp;diff=7065</id>
		<title>रसखान का दर्शन</title>
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		<updated>2010-03-10T14:39:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
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{{रसखान}}&lt;br /&gt;
==रसखान का दर्शन==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
साहित्य, दर्शन और जीवन तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। साहित्य जीवन को हृदय द्वारा समझने का प्रयास है, और दर्शन उसे मस्तिष्क के द्वारा समझता है। मस्तिष्क जीवन को जिस रूप में समझता है साहित्य उसी को सरस बनाकर जन-जन के मन में उतारने का प्रयास करता है। दर्शन जीवन की गहराइयों का ठीक-ठीक पता बताता है। साहित्य उसे जन-जन के लिए सुलभ करता है। जैसे ईश्वर-प्राप्ति के लिए ज्ञान और भक्ति दो अलग-अलग मार्ग हैं, वैसे ही साहित्य और दर्शन में दोनों की पहुंच एक ही तथ्य तक है। दोनों का प्रतिपाद्य विषय भी एक ही है। साक्षात ज्ञान के समान दर्शन को श्रेय और साहित्य को प्रेम तक कहने की उदारता करते हैं। &lt;br /&gt;
*आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री अपनी रचना 'साहित्य दर्शन' में इसका तीव्र खंडन करते हुए कहते हैं कि 'साहित्य को प्रेम कहना उसे दूसरे शब्दों में नरक का पंथ कहना है। साहित्य स्वर्ग का स्वर्णिम सोपान है।' साहित्य और दर्शन को एक ही श्रेय का हृदय और मस्तिष्क भाव और अनुभूति और चिंता कहकर समान मिलना चाहिए।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;साहित्यदर्शन, पृ0 38&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; भक्ति-काव्य में साहित्य और दर्शन दोनों ही एक दूसरे के घनिष्ठ संबंधी हैं। अत: भक्त कवि के साहित्य में दर्शन की खोज करना समीचीन है। &lt;br /&gt;
*डॉ॰ रामकुमार वर्मा के अनुसार रसखान श्री[[कृष्ण]] प्रेम और तन्मयता के लिए प्रसिद्ध हैं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ0 595&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*श्यामसुन्दर के मतानुसार [[कृष्ण]] भक्त कवियों में सच्चे प्रेममग्न कवि रसखान का नाम भगवान कृष्ण की सगुगोपासना में विशेष ऊंचा है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हिंदी साहित्य, पृ0 230&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार यह बड़े भारी कृष्ण भक्त थे। इनका प्रेम अत्यंत भगवद्-भक्ति में परिणत हुआ।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ0 176&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार परमाकर्षक कृष्ण भक्ति के मुस्लिम सहृदयों में रसखान एक प्रमुख कवि हैं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हिंदी साहित्य, पृ0 205&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*पं॰ विश्वनाथ प्रसाद अनेक तर्क देते हुए अन्त में कहते हैं कि रसखान भक्तिमार्गी कृष्ण भक्तों , प्रेममार्गी सूफियों, रीतिमार्गी कवियों इन सब ही से पृथक् स्वच्छंदमार्गी प्रेमोन्मत्त गायक थे। यदि उन्हें भक्त कहना हो तो स्वच्छंद प्रेममार्गी भक्त कहा जा सकता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रसखानि ग्रंथावली, प्रस्तावना, पृ0 22&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
उपर्युक्त मतों में अधिकांश इस विषय पर एकमत हैं कि ये प्रेम के दीवाने थे। इनकी भक्ति में प्रेम की प्रधानता है। &lt;br /&gt;
*मिश्र जी के तर्कों का सार इस प्रकार है: हिन्दी-साहित्य के मध्यकाल में तीन प्रकार की काव्यधाराएं थीं- एक शुद्ध भक्ति की, दूसरी काव्य-रीति की, तीसरी स्चच्छंद वृत्ति की। प्रथम पक्ष वालों के लिए भक्ति साध्य थी, कविता साधन, क्योंकि वे केवल भक्ति की अभिव्यक्ति के लिए कविता नहीं करते थे। वे भक्ति के प्रचारक भी थे। पर रसखान की रचना को हम भक्ति की प्रचारक रचना नहीं कह सकते जैसा [[कबीर]], जायसी, [[सूरदास|सूर]] और [[तुलसीदास|तुलसी]] की रचना को कहा जाता है। रसखान तो प्रेमोमंग के कवि थे। ये हिंदी की स्वच्छंद काव्यधारा के सबसे प्राचीन कवि ठहरते हैं। रीतिधारा वालों के लिए काव्य ही साध्य था किंतु काव्य के साधन रीति के ऊपर ही इन्होंने विशेष ध्यान दिया। वे केवल चमत्कार के लिए कविता करते थे। रसखान में हृदय-पक्ष की प्रधानता के कारण उन्हें इस धारा में नहीं माना जा सकता। तीसरी धारा थी स्वच्छंद इस धारा के कवियों को कलापक्ष का आग्रह नहीं था। प्रेम में लीन होने पर काव्य का प्रवाह आप से आप बाहर आ जाता था। अत: रसखान को स्वच्छंद काव्यधारा का ही कवि मानना चाहिए। कृष्ण भक्तों की गीति परम्परा का त्याग करके कवित्त सवैया-पद्धति का सहारा लेना ही उन्हें भक्त कवियों की सामान्य श्रेणी से अलग कर देता है। इसी से रसखान को उन्मुक्त प्रेमोन्मत्त कवि कहा जाता है। मिश्र जी आगे चलकर कहते हैं कि निर्गुण में रूप की योजना न होने के कारण उन्होंने सगुण में अपनी स्वच्छंद वृत्ति लीन की—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;आनन्द-अनुभव होत नहिं बिना प्रेम जग जान। &lt;br /&gt;
कै वह विषयानन्द कै ब्रह्मानंद बखान ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रसखानि ग्रंथावली, प्रस्तावना, पृ0 19&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इसीलिए वे कृष्ण भक्ति की ओर आकृष्ट और लीन हुए। इसी कारण से उन्हें शुद्ध भक्त न मानकर प्रमोमंग का कवि माना जाता है। वे [[बिहारी]], [[घनानंद]], [[रहीम]], रसखान, आलम, शेख को भक्ति के पद रचने पर भी उनको शुद्ध भक्त कहने में हिचक प्रकट करते हैं। रसखान ने कृष्ण भक्ति दर्शन में [[वल्लभाचार्य]] जी का [[शुद्धाद्वैतवाद]], [[निम्बार्काचार्य|निंबार्क]] का [[द्वैताद्वैतवाद]], [[मध्वाचार्य]] का द्वैतवाद अथवा [[चैतन्य महाप्रभु]] के अचिंत्य भेदाभेद किसी का भी अनुसरण नहीं किया। वल्लभाचार्य जी ने हृदय के संस्कार और विकास की दृष्टि से ईश्वर भक्ति अर्थात अलौकिक प्रेम को ही साध्य माना है किन्तु रसखान लौकिक प्रेम को साध्य मानते हुए कहते हैं—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;अकथ कहानी प्रेम की, जानत लैली खूब। &lt;br /&gt;
दो तनहूँ जहँ एक भे, मन मिलाइ महबूब॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेमवाटिका, 33&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार यह शुद्ध अद्वैतवादी पुष्टि मार्ग से भी अलग हो जाते हैं। मिश्र जी के अनुसार रसखान ने भक्तों की गीति और रीति दोनों का ही त्याग कर दिया। इसी से उन्हें स्वच्छंद मार्गी प्रेमोन्मत्त गायक ही कहा जा सकता है भक्त नहीं। यद्यपि मिश्र जी का विवेचन अत्यन्त तर्कपूर्ण है किन्तु फिर भी कुछ विचारणीय विषय रह जाता है। ग्रंथावली की भूमिका में स्थान-स्थान पर यह कहा गया है यदि कोई इन्हें भक्ति विषयक रचना के कारण भक्त कहता है तो कहे, स्वच्छंद प्रेममार्गी भक्त कहा जाय तो कोई बाधा नहीं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रसखानि (ग्रंथावली), प्रस्तावना, पृ0 22&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; इन बातों से यह स्पष्ट हो गया कि मिश्र जी इनकी कविता को भक्ति का विषय मानते हैं और अगर कोई इन्हें भक्त कवि कहे तो उसमें कोई आपत्ति भी नहीं मानते। यहां तक कि जब उन्हें भक्तों की श्रेणी से खारिज करने की बात आती है तो जोरदार शब्दों में यह भी कहते हैं कि इन्हें भक्तों की श्रेणी से खारिज करने की आवश्यकता नहीं। इससे सिद्ध होता है कि मिश्र जी भी इस बात को मानते हैं कि वे शक्त थे। इनकी रचना भक्ति प्रधान है। इन दो तथ्यों को प्राय: सभी ने पूर्णरूपेण स्वीकार भी किया है। &lt;br /&gt;
	&lt;br /&gt;
अब प्रश्न यह उठता है कि जब वे भक्त थे और उनकी रचना भक्ति प्रधान है तो उसका कोई दर्शन भी अवश्य होगा। जहां आलोचक की जानकारी के लिए नियमों की श्रृंखला में कोई वस्तु नहीं बंधती, वहां उसे स्वच्छंद कह दिया जाता है। पर वास्तव में ऐसी बात नहीं। प्रत्येक कार्य का मूल कारण अवश्य रहता है। मिश्र जी ने एक बात बार-बार कही है कि रसखान में विदेशीपन की झलक अवश्य दिखाइर पड़ती है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रसखानि (ग्रंथावली), प्रस्तावना, पृ0 24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; यह प्रेममार्गी भक्त थे।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रसखानि (ग्रंथावली), प्रस्तावना, पृ0 22&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; लौकिक पक्ष में इनका विरह फारसी काव्य की वंदना से प्रभावित है, अलौकिक पक्ष में सूफियों की प्रेमपीर से। आगे कहते हैं स्वच्छंद कवियों ने प्रेम की पीर सूफी कवियों से ही ली है इसमें कोई संदेह नहीं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रसखानि (ग्रंथावली), प्रस्तावना, पृ0 18&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान जैसे पिछले कांटे के कृष्णभक्त कवि सूफी संतों और फारसी साहित्य की प्रवृत्ति से प्रभावित हुए हैं, यह असंदिग्ध है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रसखानि (ग्रंथावली), प्रस्तावना, पृ0 18&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सूफी साधना में सूफी मत गणित की तरह कोई वस्तु नहीं जो समझाने से समझ में आ जाय। न ही चलचित्र की भांति कोई कला है कि चित्रों के देखने से सारी स्थिति स्पष्ट हो जाय। &lt;br /&gt;
*डॉ0 ताराचंद के अनुसार तसव्वुफ वास्तव में गहन पवित्रता, उपासना, तल्लीनता एवं आत्मसमर्पण का धर्म है। मुहब्बत उसका आवेग है। काव्य, संगीत नृत्य उसकी साधना और लौकिक अवस्था से गुजर कर खुदा से मिल जाना उसका लक्ष्य है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;इंफ्लूएंस आफ इस्लाम ओन इंडियन कल्चर, पृ0 83&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; सूफियों के संबंध में कहा गया है कि जब प्रेम का पूर्ण स्फुरण हो जाता है तब वे संसार को समझने-देखने लगते हैं। उनके हृदय में मुसलमान, इसाई, हिन्दू का भेदभाव नहीं रह जाता। उसका धर्म केवल एक रह जाता है, वह है प्रेम का धर्म।&lt;br /&gt;
* प्रसिद्ध सूफी साधक रूमी ने एक स्थान पर कहा है- इश्क का मजहब सभी मजहबों से अलग है। खुदा के आशिकों का खुदा के अलावा कोई मजहब नहीं है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मध्ययुगीन हिन्दी प्रेमाख्यान, पृ0 16&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*इब्नुल अरबी का कथन है कि सच्चे सूफी को हर मजहब में खुदा मिल जाता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मीरासे इस्लाम, पृ0 314&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; हो सकता है कि रसखान भी इस विषय में पूर्ण विश्वास रखते हों और उन्होंने खुदा की प्राप्ति भारत के प्रसिद्ध अवतार [[कृष्ण]] के माध्यम से की। &lt;br /&gt;
*अब्दुलवाहिद बिलग्रामी ने हकाएके-हिंदी की रचना 1566 ई॰ में की।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हकाएके हिन्दी, पृ0 31&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; जिसके द्वारा उन्होंने हिंदी कविता की आध्यात्मिक कुंजी दी। &lt;br /&gt;
*उसके संबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि इस पुस्तक से केवल सूफी साधकों के आध्यात्मिक संकेतों का ही ज्ञान नहीं होता अपितु [[सूरदास]] के पूर्ववर्ती [[ब्रजभाषा]] साहित्य की एक समृद्ध परम्परा का भी आभास मिलता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हकाएके हिन्दी प्राक्कथन, पृ0 12&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*गुलामअली आजाद की कथन है कि समा (संगीत) को चिश्ती सूफियों की साधना में बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। इस प्रश्न पर वह कट्टर आलिमों तथा राज्य के अधिकारियों से भी टक्कर लेने में न डरते थे। यद्यपि शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी तथा हुजबेरी ने अपनी पुस्तक में समा के नियम निर्धारित कर दिए थे और बाद के सूफियों ने भी उन नियमों का पालन करने तथा कराने का प्रयत्न किया, किन्तु भावावेश में किसी  नियम का पालन करना तथा कराना कठिन है। &lt;br /&gt;
*[[अमीर ख़ुसरो]] ने हिंदी रागों का भी आविष्कार किया और प्रचलित रागों में भी संशोधन किए। इस प्रकार समा में भी हिन्दी गानों को प्रविष्ट कर दिया गया। कभी-कभी हिन्दी राग तो फारसी गजलों से कहीं अधिक प्रभावशाली हो जाते थे। कुरान की आयतें भी हिन्दी रागों में गाई जाने लगी थीं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मआसेरूलकराम, पृ0 39&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*सैयद अतहर अब्बास रिजवी के अनुसार इन हिन्दी कविताओं में भारतीय तथा हिन्दू संस्कार मूलरूप में विद्यमान रहते थे। हकाएके-हिन्दी के अध्ययन से पता चलता है कि ध्रुवपद तथा विष्णुपद को सबसे अधिक प्रसिद्धि प्राप्त थी। श्रीकृष्ण तथा [[राधा]] की प्रेम-कथाएं सूफियों को भी अलौकिक रहस्य से पूर्ण ज्ञात होती थीं। इन कविताओं का 'समा' में गाया जाना आलिमों को तो अच्छा लगता ही न होगा। कदाचित कुछ सूफी भी इन हिन्दी गानों की कटु आलोचना करते होंगे। अत: इन कविताओं का आध्यात्मिक रहस्य बताना भी परम आवश्यक हो गया है। अब्दुल वाहिद सूफी ने हकाएके हिंदी में उन ही शब्दों के रहस्य की बड़ी गूढ़ व्याख्या है जो उस समय हिन्दी गानों में प्रयोग में आते थे।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हकाएके हिन्दी, पृ0 22&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*रसखान ने भी कृष्ण का निरूपण अलौकिक सौंदर्य या रहस्य के प्रतीक या आधार रूप में किया। यह भी संभव है कि रसखान मीर अब्दुल वाहिद और उनकी रचना हकाएके हिन्दी से भी परिचित रहे हों क्योंकि वे आयु में रसखान से लगभग चौंतीस वर्ष बड़े थे। अत: उस समय की परिस्थिति और सूफी मत के स्वरूप को देखते हुए रसखान ने भी उसका निरूपण मौलिक ढंग से किया जो उनकी प्रतिभा और मस्त स्वभाव के अनुकूल सर्वथा है। &lt;br /&gt;
*स्वच्छन्द कवि होने के कारण रसखान से सूफी सिद्धांतों के पूर्ण विवेचन की आशा नहीं करनी चाहिए। संभवत: इसी कारण रसखान के काव्य में सूफी मत के सिद्धान्तों का विधिवत निरूपण नहीं मिलता। स्त्री के रूप में अलौकिक सौंदर्य की चर्चा तथा मसनवी शैली के भी दर्शन नहीं होते। किन्तु रसखान के काव्य का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि सूफी मत का विधिवत निरूपण न होने पर उनके काव्य दर्शन पर सूफी साधना का व्यापक प्रभाव पड़ा। उनकी भक्ति का बाहरी स्वरूप भारतीय है किंतु आत्मा सूफी से रंजित है। सूफी साधना के उस स्वरूप का विवेचन प्रस्तुत है जो रसखान के काव्य में परिलक्षित होता है। &lt;br /&gt;
*इश्क (प्रेम) 'किसी के गुण पर जब रुझान होता है तो उस दशा को मुहब्बत कहते हैं लेकिन जब यह मुहब्बत बढ़ते-बढ़ते तीव्र हो जाती है तो इश्क कहलाती है। यही आशिक (प्रेमी) माशूक (प्रिय) के मिलन का कारण बन जाती है। तसव्वुक पूर्णतया इश्क पर आधारित है। साधक को खुदा के औसाफ (गुण) नजर आने लगते हैं और प्रेम बढ़ता ही जाता है। प्रेम की अधिकता के कारण खुदा की प्राप्ति के मार्ग में साधक सबको त्यागने लगता है। यहां तक कि लोक-परलोक का भेद समाप्त हो जाता है। खुदा के अतिरिक्त उसे और किसी की चिन्ता नहीं रहती। ऐसी अवस्था आ जाती है कि इश्क में तल्लीन साधक को संसार का कोई दु:ख दु:ख नहीं प्रतीत होता। हर समय मृत्यु की प्रतीक्षा रहती है कि आत्मा स्वतंत्र होकर वास्तविक प्रिय से जा मिले।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आइनाए मारफत, पृ0 101&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान में इस इश्क का पूर्ण निरूपण मिलता है। मनुष्य का खुदा से इश्क करना, स्वयं को उसमें लीन कर देना सूफी मत की संगेबुनियाद (नींव) है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मीर नम्बर दिल्ली कॉलेज उर्दू पत्रिका पृ0 223&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; सूफियों ने प्रेम के दो सोपान माने हैं: इश्के मजाजी और इश्के हकीकी (अलौकिक)। सूफी साधक इश्के मजाजी के माध्यम से इश्के हकीकी को प्राप्त करता है। रसखान ने अलौकिक सत्ता की प्राप्ति का आधार इश्क को मानते हुए लौकिक अलौकिक दोनों प्रेमों की चर्चा की है। बिना प्रेम के किसी भी प्रकार के आनन्द की प्राप्ति संभव नहीं—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;आनन्द अनुभव होत नहिं बिना प्रेम जग जान। &lt;br /&gt;
कै वह बिषयानन्द कै ब्रह्मानन्द बखान॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 11&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
*ज्ञान, कर्म और उपासना के द्वारा सूफी साधक को खुदा की प्राप्ति नहीं। यह सूफी मत की चार अवस्थाओं में से प्रथम अवस्था शरीयत मानी गई है। रसखान उस हकीकत मत इश्क के द्वारा ही पहुंचते हैं। उसी के माध्यम से उन्हें दृढ़ निश्चय की प्राप्ति होती है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;ज्ञान कर्म रु उपासना, सब अहमिति को मूल। &lt;br /&gt;
दृढ़ निस्चय नहिं होत, बिन किये प्रेम अनुकूल॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 12&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
रसखान शास्त्रों और [[वेद|वेदों]] के पाठ को भी व्यर्थ बताते हुए कहते हैं कि वेद और कुरान के पढ़ने से कुछ नहीं होता जब तक साधक को प्रेम का पूर्ण ज्ञान नहीं होता अर्थात खुदा को इश्क के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;ज्ञान ध्यान बिद्यामती, मत बिस्वास बिबेक। &lt;br /&gt;
बिना प्रेम सब धूरि हैं अगजग एक अनेक॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 25&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्रसिद्ध फारसी सूफी कवि हाफिज ने भी कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;इश्कत रसद बफरयाद गर खुद बसान हाफिज।&lt;br /&gt;
कुरान जबर बखवानी बाचार दह रिवायत॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;अलतकश्शुक अन मुहिम्मातुत तसव्वुफ, पृ0 416&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यदि तुम इतने बड़े ज्ञानी भी हो कि कुरानमजीद चौदह रिवायतें के साथ तुम्हें कंठस्थ हो तो भी बगैर इश्क के तुम्हारा काम नहीं चलेगा। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;सास्त्रन पढ़ि पंडित भए, कै मौलवी कुरान। &lt;br /&gt;
जु पै प्रेम जान्यौ नहीं, कहा कियौ रसखान॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 13&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*फारसी के प्रसिद्ध कवि नजीरी ने भी कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;किताबे हफते मिल्लतगर बेखवांद आदमी आमी अस्त। &lt;br /&gt;
न खुवांद ताजे जुज आशनाई दास्तानीए रा॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;नफहाते अबीरी शरह दीवाने नजीरी, पृ0 100&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; अर्थात अगर इंसान सातों धर्मों की किताबें पढ़ ले तो भी जाहिल रहता है जब तक कि मुहब्बत की किताब से कोई दास्तां न पढ़े। रसखान ने इश्क को पूर्णतया निर्लिप्त माना है जहां काम, क्रोध, मद, मोह, भय, लोभ आदि होता है सूफी साधना के अनुसार वहां प्रेम नहीं होता। रसखान ने भी कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;काम क्रोध मद मोह भय लोभ द्रोह मात्सर्य। &lt;br /&gt;
इन सब ही तें प्रेम है परे, कहत मुनिवर्य॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 14&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्रसिद्ध फारसी कवि मौलाना रूम ने भी कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;हर करा जामा ज इश्के चाक शुद। &lt;br /&gt;
ऊ जे हिरसो जुमलए ऐबो पाक शुद॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मसनवी मानवी, पहला भाग, पृ0 4&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; अर्थात जिसने अपना लिबास इश्क में चाक किया, वह लालच और समस्त दुर्गुणों से पाक हो गया। इश्के हकीकी लौकिक स्वरूपों से ऊंचा उठकर खुदा से प्रेम करना है। रसखान के अनुसार इश्क शुद्ध, कामना रहित रूप, गुण, यौवन, धन आदि से परे होना चाहिए:&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि। &lt;br /&gt;
सुद्ध कामना तें रहित प्रेम सकल रसखानि ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 15&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मंसूर हल्लाज ने कहा है ईश्वर से मिलन तभी संभव है जब हम कष्टों के बीच से होकर गुजरें।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आउट लाइन ऑफ इस्लामिक कल्चर, पृ0 350&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्य में भी प्रेम के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का निरूपण किया गया है। &lt;br /&gt;
*हुज्वेरी ने भी यह बताया है कि प्रेम मार्ग में मुसीबतें झेलना अनिवार्य है। ईश्वर से पृथक् होकर रूह (आत्मा) उस समय तक निरन्तर कष्ट सहती रहती है जब तक कि वह अपने प्रिय ईश्वर से साक्षात्कार या तादात्म्य न हो जाय। फारसी साहित्य में जो इश्किया मसनवियां हैं उनमें प्रेमी को बहुत कष्ट उठाना पड़ता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मध्ययुगीन प्रेमाख्यान, पृ0 16&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; प्रेम के मार्ग को अगम्य तथा सागर के समान रसखान ने भी बताया है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान। &lt;br /&gt;
जो आवत यहि ढिग बहुरि जात नाहिं रसखान॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 3&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*फारसी के प्रसिद्ध कवि हाफिज का वर्णन भी इससे मिलता-जुलता है:&lt;br /&gt;
बहरीस्त बहरे इश्क कि हीचश किनारा नीस्त। &lt;br /&gt;
आँजा जजा नीके जाम बेसिपारंद चारा नीस्त॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;अलतकश्शुफ अन मुहिम्मातुत यसव्वुफ, पृ0 410&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्रेम मार्ग में साधक को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है कितने कष्ट सहने पड़ते हैं। कैसे उसके प्राण तड़पते हैं। रसखान के अनुसार केवल उसांसें ही चलती रहती हैं—&lt;br /&gt;
प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, कठिन प्रेम की फाँस। &lt;br /&gt;
प्रान तरफि निकरै नहीं, केवल चलत उसाँस॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 23&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सच्चे प्रेम के स्वरूप का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि यह अत्यन्त सूक्ष्म, कोमल, क्षीण और अगम्य सदैव एक-सा रहने वाला रस से परिपूर्ण होते हुए भी कठिन होता है—&lt;br /&gt;
अति सूछम कोमल अतिहि अति पतरो अति दूर। &lt;br /&gt;
प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इक रस भरपूर॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 16&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्रेम मार्ग की अद्भुतता, दुर्गमता एवं दुर्लभता का उल्लेख करते हुए रसखान कहते हैं कि प्राणों को निछावर करके ही प्रिय की प्राप्ति होती है—&lt;br /&gt;
पै ऐतोहू हम सुन्यौं, प्रेम अजूबो खेल। &lt;br /&gt;
जाँबाजी बाजी जहाँ दिल का दिल से मेल॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 31&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
रसखान के अनुसार संसार में समस्त चीजें देखी एव जानी जा सकती हैं किन्तु खुदा एवं प्रेम ऐसे हैं कि न उनको देखा जा सकता है न जाना।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 17&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; सूफियों के प्रेम को केवल अनुभव किया जा सकता है। दाम्पत्य सुख सांसारिक पदार्थों से प्राप्त आनन्द, पूजा, धार्मिक विश्वास इन सबसे इश्के  हकीकी उच्च एवं परे हैं—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दम्पति सुख अरु बिषय रस पूजा निष्ठा ध्यान। &lt;br /&gt;
इन तें परे बखानियै शुद्ध द्रेम रसखानि ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 19&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सूफी साधक प्रेम-मार्ग में समस्त सांसारिक संबंध को त्याग अपना ध्यान इश्के हकीकी के माध्यम से अलौकिक सत्ता की ओर केन्द्रित कर लेता है। वह केवल अपने प्रेमी की ही सत्ता को सर्वस्व आधार मानकर उसी में तल्लीनता को प्रेम मानते हैं। रसखान के अनुसार भी—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;इक अंगी बिनु कारणहि, इकरस सदा समान। &lt;br /&gt;
गनै प्रियहि सर्वस्व जो सोइ प्रेम प्रमान ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 21&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*हजरत मुहम्मद साहेब की एक हदीस में कहा गया है, 'अल्लाह ने कहा मेरा बंदा प्रेम-साधना और पुण्य कार्यों से मेरे निकट हो जाता है और मैं उससे मुहब्बत करने लगता हूं, मैं उसकी आंख बन जाता हूं गोया वह मेरे जरिए देखता है। मैं उसकी जबान बन जाता हूं, वह मेरे जरिए बोलता है। मैं उसका हाथ बन जाता हूं, वह मेरे द्वारा ग्रहण करता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मीरा से इस्लाम, पृ0 297&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; खुदा के इस प्रेम के वशीभूत होने की चर्चा रसखान के काव्य में भी मिलती है। वह कृष्ण के रूप में कुंज-कुटीर में [[राधा]] के पैर दबाता दृष्टिगोचर होता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 17&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; संभवत: यहां राधा का आत्मा और कृष्ण का परमात्मा के रूप में चित्रण हुआ है। रसखान संपत्ति, रूप, भोग, जोग एवं मुक्ति सबको व्यर्थ मानते हुए कहते हैं कि जो स्वयं राधिका रानी के रंग में रचा हुआ है अर्थात प्रेम के वशीभूत है उसी में लीन होकर प्रेम करना चाहिए- दै चित्तताके न रंग रच्यौ जु रह्यौ रचि राधिका रानी के रंगहि।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 16&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; खुदा के प्रेम के वशीभूत होने की चर्चा रसखान ने अनेक स्थलों पर की है। प्रेम के वशीभूत होने पर वह छछिया भरी छाछ पर नाचने को तैयार है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;संकर से सुर जाहि जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावै। &lt;br /&gt;
नेकु हियें जिहि आनत ही जड़ मूढ़ महा रसखानि कहावै। &lt;br /&gt;
जा पर देव अदेव भू अंगना वारत प्रानन प्रानन पावै। &lt;br /&gt;
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भर छाछ पै नाच नचावै।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 14&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्रेम की तल्लीनता इस सीमा तक बढ़ती है कि एक बंदे और खुदा एक हो जाते हैं। रसखान ने बंदे खुदा के एक होने तथा हरि के प्रेमाधीन स्वरूप की चर्चा है:&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;हरि के सब आधीन, पै हरी प्रेम-आधीन। &lt;br /&gt;
याही तें हरि आपुहीं, याहि बड़प्पन दीन॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 36&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्रसिद्ध सूफी जुनैद का कथन है प्रिय की विशेषताओं में अपनी विशेषताओं को मिला देना प्रेम है। प्रेम की विशेषता यह होती है कि निज के व्यक्तित्व को समाप्त कर दिया जाय। यह आनंद ऐसा होता है कि इस पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। यह ईस्वरीय कृपा है जो निरंतर विनय करते रहने व आकांक्षा करते रहने से प्राप्त होती है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मिस्टिक्स आफ इस्लाम, पृ0 112&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;प्रेम हरी को रूप है त्यौ हरि प्रेम-सरूप। &lt;br /&gt;
एक होइ है यौं लसै ज्यों सूरज औ धूप।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
सिर काटौ, छेदौ हियो, टूक टूक करि देहु। &lt;br /&gt;
पै याके बदले बिहँसि वाह वाह ही लेहु।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;	प्रेम वाटिका, 32&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्रसिद्ध सूफी अलफराबी ने प्रेम को ही ईश्वर माना है और सृष्टि का राज भी उन्होंने प्रेम को ही स्वीकार किया है। उनका मत है कि 'भौतिक वस्तुओं तथा ज्ञान और बुद्धि से परे एक विशिष्ट वस्तु है जिसे प्रेम कहते हैं। प्रेम के सहारे इस सृष्टि में हर चीज जिसमें व्यक्ति भी शामिल है, अपनी पूर्णता पर पहुंच जाती है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आउट लाइन आफ इस्लामि क कल्चर, पृ0 311&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; सूफियों के अनुसार ईश्वर ने आत्मबोध के लिए सृष्टि की रचना की। एक हदीस के अनुसार 'मैं एक छिपा हुआ खजाना था मेरी चाह थी कि मैं पहचाना जाऊं, सब लोग मुझे जानें, अत: मैंने सृष्टि की रचना की।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;कुतो कंजन मखफिया फअह वबतो अन ओ रफा, फखलकतुल खलक&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*अलफराबी के अनुसार ईश्वर स्वयं प्रेम है। सृष्टि की रचना का कारण भी प्रेम है। प्रेम के द्वारा सृष्टि प्रेम के परमस्त्रोत में, जो पूर्ण सौंदर्य और सर्वोत्तम है, निमग्न हो जाने के लिए पूर्ण रूप से जुड़ी हुई है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आउट लाइन ऑफ इस्लामिक कल्चर, पृ0 311&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान ने प्रेम का निरूपण करते हुए प्रेम की वास्तविकता के सम्बन्ध में कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;कारज कारन रूप यह, प्रेम अहै रसखान। &lt;br /&gt;
कर्ता कर्म क्रिया करन, आपहि प्रेम बखान॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 47&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
जातें उपजत प्रेम सोई, बीज कहावत प्रेम। &lt;br /&gt;
जामैं उपजत प्रेम सोइ क्षेत्र कहावत प्रेम॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 43&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
जाते पनपत बढ़त अरु फूलत फलत महान। &lt;br /&gt;
सो सब प्रेमहिं प्रेम यह कहत रसिक रसखान॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 44&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
वही बीज अंकुर वही, सेक वही आधार। &lt;br /&gt;
डाल पात फल फूल सब वही प्रेम सुखसार॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 45&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो जातें जामैं बहुरि जा हित कहियत बेष। &lt;br /&gt;
सो सब प्रेमहिं प्रेम है जग रसखानि असेष॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 46&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सच्चा प्रेमी मृत्यु से भयभीत नहीं होता। वह उसे एक यात्रा का अवसान और दूसरी यात्रा का प्रारंभ समझता है। निजामी ने लैला मजनू में मृत्यु के दर्शन किये हैं। उनके अनुसार यह मौत नहीं, बाग और बोस्तां है यह दोस्त के महल का रास्ता है। इसके बिना महबूबा तक पहुंचना नहीं होगा।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;लैला मजनू, पृ0 4&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; इसी मसनवी में उन्होंने कहा है, अगर मैं अक्ल की आंख से देखूं तो यह मौत, मौत नहीं है बल्कि एक जगह से दूसरी जगह जाना है। इसी सिद्धांत में विश्वास रखते हुए रसखान ने भी कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ। &lt;br /&gt;
जौ जन जानै प्रेम तौ, मरै जगत क्यौं रोइ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 2&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
इसी भाव का फारसी के प्रसिद्ध कवि हाफिज ने इस प्रकार वर्णन किया है—&lt;br /&gt;
हरगिज नमीरद आकि दिलश जेंदाशुद्ध बइश्क। &lt;br /&gt;
सिबत् अस्त कर जुरीदाए आलमे दवामे मा॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;अलतकश्शुफ अन महिम्मातुततसव्वुफ, पृ0 218&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रेम में आत्मसर्पण कर प्राण देकर जीव सदा जीवित रहता है। रसखान ने प्रेम के इस स्वरूप का निरूपण करते हुए कहा है—&lt;br /&gt;
प्रेम-फाँस मैं फँसि मरै, सोइ जियै सदाहि।&lt;br /&gt;
प्रेम-मरम जाने बिना, मरि कोउ जीवत नाहिं॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 26&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
पै तिठास या मार के, रोम रोम भरपूर। &lt;br /&gt;
मरत जियै, झुकतौ थिरै बने सु चकनाचूर॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 30&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*अत: मनुष्य प्रेम के मार्ग में मरकर ही अमर होता है। मुसलमानों की धार्मिक पुस्तकों में कहा गया है कि मरने के बाद कयामत महाप्रलय होगी। उस समय प्रत्येक मानव को एक पुल (पुले सरात) से गुजरना होगा। वह पुल बाल से भी अधिक बारीक, तलवार की धार से अधिक तेज होगा। प्रेमी व्यक्ति ईश्वर के सच्चे साधक उसे पार कर लेंगे। रसखान ने भी कुछ इसी प्रकार भावों का निरूपण किया—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;कमलतंतु सो हीन अरु कठिन खड्ग की धार। &lt;br /&gt;
अति सूघो टेढ़ो बहुरि प्रेम पंथ अनिवार॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका 6&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अत: कहा जा सकता है रसखान द्वारा निरूपित प्रेम सूफी साधना से पूर्णतया रंजित है। &lt;br /&gt;
==तवक्कुल==&lt;br /&gt;
तवक्कुल का सम्बन्ध अपने निजत्व से तनिक भी सम्बन्ध रखने वाली प्रत्येक वस्तु के प्रतिपूर्ण उदासीलता से होता है। यह उस स्थिति का नाम है जब मनुष्य अपने समस्त सम्बन्धों को खुदा को सौंपकर यकीन कर ले कि जो कुछ करेगा खुदा ही करेगा।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आइतरे मारफत पृ0 89&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; तवक्कुल में इस बात पर पूर्ण विश्वास हो जाता है कि जो कुछ है खुदा है उसके सिवा कोई भी नहीं न दूसरा कुछ करना है। तवक्कुल में साधक पूरी तल्लीनता से साधना करता हे, उसका ध्यान किसी तरफ नहीं भटकता वह खुदा पर पूरा भरोसा रखता है। रसखान के काव्य में भी तवक्कुल की सफल अभिव्यंजना हुई है वे कहते हैं कि मनुष्य अनेक देवी-देवताओं को भेजकर अनेक साधनों से धन एकत्रित करते हैं तथा अपने मन की आशाएं पूर्ण करते हैं, किन्तु रसखान कहते हैं कि मेरा साधन तो केवल यही (परम सत्ता) है। मैं उस पर तवक्कुल करता हूं—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;सेष सुरेस दिनेस गनेस प्रजेस धनेस महेस मनावौ। &lt;br /&gt;
कोऊ भवानी भजौ, मन की सब आस सभी विधि पुरावौ। &lt;br /&gt;
कोऊ रमा भजि लेहु महा धन, कोऊ कहूँ मनवांछित पावौ। &lt;br /&gt;
पै रसखानि वही मेरो साधन, और त्रिलोक रहौ कि नवासौ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 5&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*तवक्कुल पर अटल विश्वास रखते हुए रसखान अपने मन को सांत्वना देते हुए कहते हैं—&lt;br /&gt;
द्रौपदी औ गनिका गज गीध अजामिल सों कियौं सो न निहारो। &lt;br /&gt;
गौतम-गेहनो कैसी तरी, प्रहलाद कों कैसे हरयौ दुख भारो। &lt;br /&gt;
काहे को सोच करै रसखानि कहा करि है रविनंद बिचारो। &lt;br /&gt;
ताखन जाखन राखियै माखन चाखन हारो सो राखन हारो॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 18&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*तवक्कुल की भावना पर अटल विश्वास रखते हुए अपने आप को पूर्णतया निश्चिंत रखते हुए रसखान कहते हैं—&lt;br /&gt;
कहा करै रसखानि को कोऊ चुगुल लबार। &lt;br /&gt;
जौ पै राखन हार है माखन चाखन हार॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान,19&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==फकीर और फुकर==&lt;br /&gt;
तसव्वुफ की शब्दावली में फकीर उसे कहते हैं जो यह विश्वास रखता हो कि लोक-परलोक में मैं किसी वस्तु का स्वामी नहीं हूं। न मुझे किसी चीज पर अधिकार है यहां तक कि वह साधना को भी अपनी संपत्ति नहीं समझता। लोक-परलोक की समस्त चीजों को हेच निस्सार समझता है। न उसे धन सम्पत्ति की इच्छा होती है न नरक-स्वर्ग का ध्यान। उसे केवल खुदा का ध्यान रहता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आइनए मारफत पृ0 96&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; यह स्थिति दैन्य की स्थिति से मिलती-जुलती है। सच्चा दैन्य केवल संपति का अभाव नहीं बल्कि संपयि की इच्छा का भी अभाव है। वर्तमान जीवन एवं भविष्य जीवन दोनों से पूर्णरूप से पृथक् हो जाना तथा वर्तमान जीवन और भविष्य जीवन के स्वामी के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की इच्छा न रखना ही सच्चा दैन्य है। ऐसा फकीर व्यक्तिगत अस्तित्व से निर्लिप्त होता है, यहां तक कि वह किसी क्रिया, भावना या गुण का आरोप अपने में नहीं &lt;br /&gt;
करता।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;इस्लाम के सूफी साधक, पृ0 31&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान के काव्य के अवलोकन से ज्ञात होता है कि रसखान के काव्य में इस प्रकार के भाव पूर्णतया विद्यमान हैं। 'कलधौत के धाम' , 'कंचन मंदिर' , 'मानक मोति' किसी के भी प्रति उनके मन में तनिक मोह नहीं। सिद्धियों और निधियों को जो कठिन साधना से प्राप्त होती हैं रसखान तनिक महत्त्व न देते हुए कहते हैं—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;वा लकुटी अरु कामरिया पर राज तहूँ पुर को तजि डारौ। &lt;br /&gt;
आठहु सिद्धि नवौ निधि को सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौ। &lt;br /&gt;
एक रसखानि जबै इन नैनन तैं ब्रज के बन-बाग निहारौ। &lt;br /&gt;
कोटक ये कलधौत के धाम करील की कुंजन ऊपर वारौं॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 3&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
रसखान ने निर्लिप्त सूफी फकीर की विशेषताएं विद्यमान हैं उन्हें तनिक भी मोह नहीं। &lt;br /&gt;
कंचन मंदिर ऊंचे बनाइ कै मानिक लाई सदा झलकैयत। &lt;br /&gt;
प्रात ही तें सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत। &lt;br /&gt;
जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत। &lt;br /&gt;
ऐसे भए तो कहा रसखानि जो साँवरे उचार सों नेह न लैयत॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 6&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
रसखान सुखसंपत्ति को भी सारहीन समझते हैं। योग आदि में विश्वास न रखते हुए कहते हैं—&lt;br /&gt;
कहा रसखानि सुख संपत्ति सुमार कहा, &lt;br /&gt;
कहा तन जोगी ह्व लगाए अंग छार को&lt;br /&gt;
कहा साधे पंचानल, कहा सौए बीच नल&lt;br /&gt;
कहा जीति लाए राज सिंधु-आर-पार को&lt;br /&gt;
जप बार बार, तप संजम बयार व्रत,&lt;br /&gt;
तीरथ हजार अरे बूझत लबार को। &lt;br /&gt;
कीन्हौ नहीं प्यार, नहीं से यौ दरबार, चित&lt;br /&gt;
चाहयौ न निहारयौ जौ पै नंद के कुमार को।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 9&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सूफी फकीर को केवल खुदा का ध्यान रहता है, उसके लिए सोना मिट्टी के बराबर है। दूसरों के माल पर नजर डालना पाप है—&lt;br /&gt;
डरै सदा चाहै न कछु, सहै सबै जो होइ। &lt;br /&gt;
रहै एकरस चाहि कै, प्रेम बखानौ सोइ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 22&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जिक्रफिक्र==&lt;br /&gt;
सूफी अनुशासन के विधायक तत्त्वों में जिक्र को सभी रहस्यवादी सूफी एक मत से स्वीकार करते हैं। कुरान में धर्म पर ईमान लाने वालों को उपदेश दिया गया है कि ईश्वर का स्मरण प्राय करते रहो।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शारटर एंसाइक्लोपीडिया आफ इस्लामख् पृ0 75&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; खुदा के नाम के अनेक पर्याय हैं जिनके जप पर महत्त्व दिया गया है, 'जिक्र ही पहली सीढ़ी निजत्व को भूलना है और अन्तिम सीढ़ी उपासक का उपासना-कार्य में इस प्रकार लुप्त हो जाना कि उसे उपासना की चेतना न रहे और वह उपास्य में ऐसा लवलीन हो जाय कि उसका स्वयं तक लौटना प्रतिबंधित हो जाय।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;इस्लाम के सूर्फ साधक, पृ0 40&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान के काव्य में हमें जिक्र का निरूपण पद: पद: मिलता है। यह दूसरी बात है कि उन्होंने जिक्र का आधार कृष्ण और कृष्ण लीलाओं को बनाया। उस युग में कृष्णलीला को अलौकिक रहस्य प्राप्ति का मार्ग मानना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं मानी गई होगी। कृष्ण काव्य के इस स्वरूप को देखकर ही सम्भवत: मीर अब्दुलवाहिद विलग्रामी ने अपने ग्रंथ हकाएके हिंदी को तीन भागों में बांटा है। प्रथम भाग में ध्रुव-पद में प्रयुक्त हिन्दी-शब्दों के सूफियाना अर्थ दिये गए हैं। दूसरे भाग में उन हिंदी शब्दों की व्याख्या है जो विष्णु-पद में प्रयुक्त होते थे। तीसरे भाग में अन्य प्रकार के गीतों और काव्यों आदि में आय शब्दों की व्याख्या की गयी है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;	हकाएके हिंदी, पृ0 6&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; उदाहरणार्थ यदि हिंदी काव्यों में कृष्ण अथवा अन्य नामों का उल्लेख हो तो उससे मुहम्मद साहब की ओर संकेत होता है, कभी केवल मनुष्य से तात्पर्य, कभी मनुष्य की वास्तविकता समझी जाती है जो परमेश्वर के जात (सत्ता) की वहदत (एक होना) से संबंधित होती है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हकाएके हिंदी, पृ0 73&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; कहीं-कहीं कन्हैया मारग रोकी से इबलीस के नाना प्रकार से मार्ग-भ्रष्ट करने की ओर संकेत होता है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हकाएके हिंदी पृ0 80&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; [[होली]] खेलने की चर्चा लगभग समस्त कृष्ण-भक्त कवियों ने किया है। उसका संकेत [[अग्नि]] की ओर किया जाता है जो आशिकों के हृदय को सजाए हुए है और इस अग्नि ने उनके अस्तित्व को सिर से पैर तक घेर रखा &lt;br /&gt;
है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;हकाएके हिंदी पृ0 102&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान ने होली के पदों के माध्यम से इस आग का जिक्र किया है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 191, 192, 193, 194, 195, 196, 197, 198&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान उस अलौकिक रहस्य की चर्चा कृष्ण के जिक्र के माध्यम से करते हैं। यदि उनकी जिह्वा किसी शब्द का उच्चारण करे तो केवल उनके नाम का हो—&lt;br /&gt;
जो रसना रसना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 40&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सूफी साधक भी जिक्र को बहुत महत्त्व देते हैं। वे जिक्र करते-करते अलौकिक रहस्य में इतने तल्लीन हो जाते हैं कि उन्हें अपनी सुध नहीं रहती। रसखान ने अलौकिक प्रेम की प्राप्ति के लिए श्रवण कीर्तन दर्शन को आवश्यक माना है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्त्रवन कीरतन दरसनहिं जो उपजत सोइ प्रेम।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मीरासे इस्लाम, पृ0 324&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यहां कीर्तन से अभिप्राय जिक्र से है। रसखान ने श्रीकृष्ण के माध्यम से अलौकिक रहस्य का जिक्र किया। फारसी के प्रसिद्ध ईरानी सूफी जलालुद्दीन रूमी ने अपनी तसव्वुफ की प्रसिद्ध पुस्तक मसनवी के पहले शेर (पद) में रुह (आत्मा) को जो खुदा से अलग हो चुकी है वंशी से तारबीर (उपमा) किया है। प्रसिद्ध मौलविया संप्रदाय के सूफी साधक बांसुरी को अपना मुकद्दम (पवित्र) साज (राग) समझते हैं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आइनए मारफत पृ0 219&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान ने भी इस साज के अलौकिक प्रभाव की चर्चा (जिक्र) की है। गोपियों का वंशी ध्वनि से बेसुध होना जीवात्मा की बेसुधी का प्रतीक है। &lt;br /&gt;
*रसखान ने अलौकिक रहस्य के जिक्र को बहुत महत्त्व दिया। उनका जिक्र कृष्ण चर्चा तथा लीलागान के रूप में मिलता है। संभवत: इसी कारण उनकी कृष्ण चर्चा में आवेग की गहन अनुभूति, तल्लीनता और आत्मसमर्पण की सफल अभिव्यंजना मिलती है। &lt;br /&gt;
==तर्क (त्याग)==&lt;br /&gt;
सूफियों ने तर्क को बहुत महत्ता प्रदान की है। जब तक संसार में लिप्त रहने की इच्छा मन में रहती है। साधक अपनी मंजिल से दूर रहता है। 'सूफी के लिए तर्केदुनिया इतना ही जरूरी है जितना कि जहाज के लिए पानी या नमाज के लिए वजू। जब तक दुनिया की ख्वाहिश दिल से दूर नहीं मंज़िले मकसूद कोसों दूर रहती है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 3&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; रसखान के काव्य में भी तर्क के दर्शन होते हैं—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;जग में सब ते अधिक अति, ममता तनहिं लखाइ। &lt;br /&gt;
पै या तनहूँ ते अधिक, प्यारों प्रेम कहाई॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 28&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*रसखान अपनी साधना के माध्यम से उस मंजिल तक पहुंच चुके थे जहां पहुंच कर स्वर्ग और हरि की प्राप्ति की इच्छा भी बाकी नहीं रहती—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;जेहि पाए बैकुंठ अरु, हरि हूँ की नहिं चाहि। &lt;br /&gt;
सोइ अलौकिक सुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 35&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यह अवस्था तर्के-तर्क की अवस्था है। साधक इस अवस्था में इतना निर्लिप्त हो जाता है कि सब कुछ तर्क (त्याग) कर देता है। मुक्ति भी उसकी दृष्टि में निस्सार हो जाती है। इस सम्बन्ध में रसखान कहते हैं—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;याही तें सब मुक्ति तें, लही बढ़ाई प्रेम। &lt;br /&gt;
प्रेम भए नसि जाहिं सब, बंधे जगत के नाम॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आइनए मारफत, पृ0 87&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==फना==&lt;br /&gt;
तसव्वुफ में फना को अंतिम सोपान माना गया है। साधक इस स्थिति में अपने व्यक्तित्व को पूर्णतया ईश्वर को समर्पित कर अपनी इच्छाओं एवं अहम् भावनाओं को समाप्त कर दे।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 4&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; उसकी स्मृति में इतना तल्लीन हो जाय कि उसे अपनी सुधि न रहे। आत्म विस्तृति की यह अवस्था ही फना कहलाती है। रसखान के काव्य में इस आत्म विस्तृति और समर्पण का विवेचन मिलता है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सों सानी। &lt;br /&gt;
हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी। &lt;br /&gt;
जान वही उन आन के संग औ मान वही जु करै मनमानी। &lt;br /&gt;
त्यौं रसखानि वही रसखानि जु है रसखानि सों रसखानि॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;इस्लाम के सूफी साधक, पृ0 50&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यह स्थिति मन को परमात्मा के चिंतन में केंद्रीभूत करके मानसिक पृथक्करण अर्थात् मन को सभी दृश्य पदार्थों, विचारों, कार्यो तथा भावनाओं से अलग करना है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सुजान रसखान, 90&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; सिखाने के अनुसार समस्त शारीरिक अंगों की सार्थकता उस प्रिय में तल्लीन हो जाने में है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;प्रान वही जु रहैं रिझि वा पर रूप वही जिहि वाहि रिझायौ। &lt;br /&gt;
सीस वही जिन वे परसे पद अंक वही जिन वा परसायौ। &lt;br /&gt;
दूध वही जु दुहायौ री वाही दही सु सही जु वही ढरकायौ। &lt;br /&gt;
और कहाँलौं कहौं रसखानि री भाव वही जु वही मन भायौं॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 33&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*फना की स्थिति में साधक को अपना ज्ञान नहीं रहता। आत्मा के समस्त रागों और इच्छाओं का अंत हो जाता है। रसखान द्वारा निरूपित फना की स्थिति इस प्रकार है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;अकथ कहानी प्रेम की जानत लैली खूब। &lt;br /&gt;
दो तनहूँ जहँ एक भे, मन मिलाइ महबूब।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 34&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
दो मन एक होते सुन्यौ, पै वह प्रेम न आहि। &lt;br /&gt;
होइ जबै द्वै तनहूँ इक, सोई प्रेम कहाहि॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;प्रेम वाटिका, 30&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*रसखान ने इस अवस्था का इस प्रकार वर्णन किया है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पै मिठास वा मार के, रोम-रोम भरपूर। &lt;br /&gt;
मरत जियै झुकतो थिरै बनै सु चकनाचूर॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;	प्रे0 वा0, 30&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इस स्थिति को सूफी फनाअल फना कहते हैं, फना की पूर्ण स्थिति में अहम् का लोभ हो जाता है और आत्मा का परमात्मा में वास हो जाता है। सूफी सिद्धांतों की दृष्टि से रसखान के काव्य पर विचार करने से यह भली भांति विदित होता है कि उनके काव्य की आत्मा सूफी साधना से पूर्णतया रंजित है। &lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]][[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A5%81&amp;diff=9202</id>
		<title>विष्णु</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A5%81&amp;diff=9202"/>
		<updated>2010-03-10T14:36:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==भगवान विष्णु / God Vishnu==&lt;br /&gt;
[[चित्र:God-Vishnu.jpg|thumb|250px|भगवान विष्णु&amp;lt;br /&amp;gt; God Vishnu]]&lt;br /&gt;
*सर्वव्यापक परमात्मा ही भगवान श्री विष्णु हैं। यह सम्पूर्ण विश्व भगवान विष्णु की शक्ति से ही संचालित है। वे निर्गुण भी हैं और सगुण भी। &lt;br /&gt;
*वे अपने चार हाथों में क्रमश: शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं। &lt;br /&gt;
*जो किरीट और कुण्डलों से विभूषित, पीताम्बरधारी, वनमाला तथा कौस्तुभमणि को धारण करने वाले, सुन्दर कमलों के समान नेत्र वाले भगवान श्री विष्णु का ध्यान करता है वह भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। &lt;br /&gt;
*[[पद्म पुराण]] के उत्तरखण्ड में वर्णन है कि भगवान श्री विष्णु ही परमार्थ तत्व हैं। वे ही [[ब्रह्मा]] और [[शिव]] सहित समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है वहीं शिव को संहारक माना गया है। विष्णु की सहचारिणी [[लक्ष्मी]] है ।&lt;br /&gt;
*वे ही नारायण, वासुदेव, परमात्मा, अच्युत, [[कृष्ण]], शाश्वत, [[शिव]], ईश्वर तथा हिरण्यगर्भ आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। नर अर्थात जीवों के समुदाय को नार कहते हैं। &lt;br /&gt;
*सम्पूर्ण जीवों के आश्रय होने के कारण भगवान श्री विष्णु ही नारायण कहे जाते हैं। &lt;br /&gt;
*कल्प के प्रारम्भ में एकमात्र सर्वव्यापी भगवान नारायण ही थे। वे ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि करके सबका पालन करते हैं और अन्त में सबका संहार करते हैं। इसलिये भगवान श्री विष्णु का नाम हरि है। [[मत्स्य अवतार|मत्स्य]], [[कूर्म अवतार|कूर्म]], [[वाराह अवतार|वाराह]], [[वामन अवतार|वामन]], [[हयग्रीव]] तथा श्री[[राम]]-[[कृष्ण]] आदि भगवान श्री [[विष्णु के अवतार|विष्णु के ही अवतार]] हैं। &lt;br /&gt;
*भगवान श्री विष्णु अत्यन्त दयालु हैं। वे अकारण ही जीवों पर करूणा-वृष्टि करते हैं। उनकी शरण में जाने पर परम कल्याण हो जाता है। &lt;br /&gt;
*जो भक्त भगवान श्री विष्णु के नामों का कीर्तन, स्मरण, उनके अर्चाविग्रह का दर्शन, वन्दन, गुणों का श्रवण और उनका पूजन करता है, उसके सभी पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
*यद्यपि भगवान विष्णु के अनन्त गुण हैं, तथापि उनमें भक्त वत्सलता का गुण सर्वोपरि है। चारों प्रकार के भक्त जिस भावना से उनकी उपासना करते हैं, वे उनकी उस भावना को परिपूर्ण करते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Four-Armed-Vishnu-With-Varaha-And-Nrisimha-Faces-Mathura-Museum-17.jpg|विष्णु&amp;lt;br /&amp;gt;Vishnu&amp;lt;br /&amp;gt;[[संग्रहालय मथुरा|राजकीय संग्रहालय]], [[मथुरा]]|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
*[[ध्रुव]], [[प्रह्लाद]], [[अजामिल]], [[द्रौपदी]], गणिका आदि अनेक भक्तों का उनकी कृपा से उद्धार हुआ। &lt;br /&gt;
*भक्त वत्सल भगवान को भक्तों का कल्याण करनें में यदि विलम्ब हो जाय तो भगवान उसे अपनी भूल मानते हैं और उसके लिये क्षमा-याचना करते हैं। धन्य है उनकी भक्त वत्सलता। &lt;br /&gt;
*मत्स्य, कूर्म, वाराह, श्री राम, श्री कृष्ण आदि अवतारों की कथाओं में भगवान श्री विष्णु की भक्त वत्सलता के अनेक आख्यान आये हैं। ये जीवों के कल्याण के लिये अनेक रूप धारण करते हैं। &lt;br /&gt;
*[[वेद|वेदों]] में इन्हीं भगवान श्री विष्णु की अनन्त महिमा का गान किया गया है। &lt;br /&gt;
*विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वर्णन मिलता है कि लवण समुद्र के मध्य में विष्णु लोक अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है। उसमें भगवान श्री विष्णु वर्षा ऋतु  के चार मासों में [[लक्ष्मी]] द्वारा सेवित होकर शेषशय्या पर शयन करते हैं। &lt;br /&gt;
*[[पद्म पुराण]] के उत्तरखण्ड के 228वें अध्याय में भगवान विष्णु के निवास का वर्णन है। &lt;br /&gt;
*वैकुण्ठ धाम के अन्तर्गत [[अयोध्या|अयोध्यापुरी]] में एक दिव्य मण्डप है। मण्डप के मध्य भाग में रमणीय सिंहासन है। वेदमय धर्मादि [[देवता]] उस सिंहासन को नित्य घेरे रहते हैं। धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य, वैराग्य सभी वहाँ उपस्थित रहते हैं। मण्डप के मध्यभाग में [[अग्नि]], [[सूर्य]] और [[चंद्रमा]] रहते है। कूर्म, नागराज तथा सम्पूर्ण [[वेद]] वहाँ पीठ रूप धारण करके उपस्थित रहते हैं। सिंहासन के मध्य में अष्टदल कमल है; जिस पर देवताओं के स्वामी परम पुरुष भगवान श्री विष्णु लक्ष्मी के साथ विराजमान रहते हैं।&lt;br /&gt;
*भक्त वत्सल भगवान श्री विष्णु की प्रसन्नता के लिये जप का प्रमुख मन्त्र- '''ॐ नमो नारायणाय''' तथा '''ॐ नमो भगवते वासुदेवाय''' है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म कोश]]  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4&amp;diff=6444</id>
		<title>आर्यावर्त</title>
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		<updated>2010-03-10T12:26:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==आर्यावर्त / Aaryavart==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
*इसका शाब्दिक अर्थ है 'आर्यो आवर्तन्तेऽत्र' अर्थात आर्य जहाँ सम्यक प्रकार से बसते है। &lt;br /&gt;
*इसका दूसरा अर्थ है 'पुण्यभूमि'। &lt;br /&gt;
*मनुस्मृति&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मनुस्मृति(2.22)&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में आर्यावर्त की परिभाषा इस प्रकार दी हुई है :&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुर्बुधा: ॥&amp;lt;ref&amp;gt;[ पूर्व में समुद्र तक और पश्चिम में समुद्र तक, (उत्तर दक्षिण में हिमालय, विन्ध्याचल) दोनों पर्वतों के बीच अन्तराल (प्रदेश) को विद्वान आर्यावर्त कहते हैं।]&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*मेधातिथि मनुस्मृति के उपर्युक्त श्लोक का भाष्य करते हुए लिखते हैं:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आर्या आवर्तन्ते तत्र पुन: पुनरूद्भवन्ति। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
आक्रम्याक्रम्यापि न चिरं तत्र म्लेच्छा: स्थातारो भवन्ति।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt; आर्य वहाँ बसते हैं, पुन: पुन: उन्नति को प्राप्त होते हैं। कई बार आक्रमण करके भी म्लेच्छ (विदेशी) स्थिर रूप से वहाँ नहीं बस पाते।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्राचीन [[संस्कृत]] साहित्य में आर्यावर्त नाम से उत्तर भारत के उस भाग को अभिहित किया जाता था जो पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र तक और [[हिमालय]] से विंध्याचल तक विस्तृत है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात् तयोरेवान्तरंगिर्यो: (हिमवतविन्ध्यों:) आर्यावर्त विदुर्बुधा:'- मनुस्मृति 2,22&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शाब्दिक अर्थ==&lt;br /&gt;
इसका शाब्दिक अर्थ है- जहां आर्य निवास करते हैं। प्राचीन वांड्मय में इस स्थान के बारे में विभिन्न मत हैं। &lt;br /&gt;
*[[ॠग्वेद]] इसे 'सप्तसिंधु प्रदेश' बताता है। &lt;br /&gt;
*[[उपनिषद]] काल में यह [[काशी]] और [[विदेह]] जनपदों तक फैल गया था। &lt;br /&gt;
*[[मनुस्मृति]] में इसकी परिभाषा देते हुए कहा गया है कि पूर्व में समुद्र तट, पश्चिम में समुद्र तट, उत्तर में [[हिमालय]] से दक्षिण में [[विंध्याचल]] तक के प्रदेश को विद्वान आर्यावर्त कहते हैं। &lt;br /&gt;
*[[पतंजलि]] के मत से [[गंगा]] और [[यमुना]] के मध्य का भू-भाग आर्यावर्त है। इन कथनों से विदित होता है कि उस समय उत्तर भारत के सभी जनपद इसमें सम्मिलित थे और आर्य संस्कृति का विस्तार इतना ही था। [[पुराण|पुराणों]] का समय आते-आते यह देशव्यापी हो गई और भारतवर्ष और आर्यावर्त पर्यायवाची माने जाने लगे। &lt;br /&gt;
==मध्यकालीन इतिहास में==&lt;br /&gt;
*भारत के मध्यकालीन इतिहास में उत्तर भारत के लिए 'आर्यावर्त' शब्द का प्रयोग मिलता है। मनुस्मृति में आर्यावर्त की सीमाओं का निर्देश करते हुए उत्तर भारत में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम में समुद्रतटों तक उसका विस्तार बताया गया है। &lt;br /&gt;
*आर्यावर्त के लिए अन्य अन्य पाँच भौगोलिक नामों का भी उल्लेख मिलता है-&lt;br /&gt;
#उदीची (उत्तर), &lt;br /&gt;
#प्रतीची (पश्चिम), &lt;br /&gt;
#प्राची (पूर्व), &lt;br /&gt;
#दक्षिण और &lt;br /&gt;
#मध्य। आर्यावर्त का मध्य भाग ही हिन्दी भाषा और साहित्य का उद्गम एवं विकास स्थल मध्यदेश कहलाता है। 12 वीं शती तक के साहित्य में इस नाम का निरन्तर प्रयोग हुआ है। तत्पश्चात इसका प्रयोग कम होता गया। विभिन्न युगों में आर्य संस्कृति के विस्तार एवं विकास के साथ आर्यावर्त की भी सीमाएँ बदलती रहीं हैं&amp;lt;balloon title=&amp;quot;'स्कन्दगुप्त', पृ0 70)[सहायक ग्रन्थ-मध्य देश: डा॰ धीरेन्द्र वर्मा।] ----रा0कु0&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
आजकल यह समझा जाता है कि इसके उत्तर में [[हिमालय]] श्रृंखला, दक्षिण में विन्ध्यमेखला, पूर्व में पूर्वसागर (वंग आखात) और पश्चिम में पश्चिम पयोधि (अरब सागर) है। उत्तर भारत के प्राय: सभी जनपद इसमें सम्मिलित हैं। परन्तु कुछ विद्वानों के विचार में हिमालय का अर्थ है पूरी हिमालय श्रृखंला, जो प्रशान्त महासागर से भूमध्य महासागर तक फैली हुई है और जिसके दक्षिण में सम्पूर्ण पश्चिमी एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के प्रदेश सम्मिलित थे। इन प्रदेशों में सामी और किरात प्रजाति बाद में आकर बस गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%81&amp;diff=5634</id>
		<title>क्रतु</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%81&amp;diff=5634"/>
		<updated>2010-03-06T10:21:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==क्रतु ऋषि / Kratu==&lt;br /&gt;
*क्रतु ऋषि भी सोलह प्रजापतियों में से एक तथा [[ब्रह्मा]] जी के मानस पुत्रों में से एक हैं। &lt;br /&gt;
*[[दक्ष प्रजापति]] तथा क्रिया से उत्पन्न पुत्री सन्नति से क्रतु ऋषि ने विवाह रचाया। ब्रह्मा जी से आज्ञा लेकर क्रतु ऋषि ने विवाह किया। &lt;br /&gt;
*इस दंपत्ति से साठ हजार 'बालखिल्य' नाम के पुत्र भी हुए, इन बालखिल्यों का आकार अंगूठे के बराबर माना जाता है। &lt;br /&gt;
*शास्त्रों में आता है कि ये बाल्खिल्य नाम के बेटे भगवान [[सूर्य]] के उपासक थे। सूर्य के रथ के आगे अपना मुख सूर्य की ओर किये हुए बालखिल्य चलते हैं और उनकी स्तुति करते हैं। इन ब्रह्मर्षियों की तपस्या शक्ति सूर्यदेव को प्राप्त होती रहती है।&lt;br /&gt;
*क्रतु ऋषि ही बाद में व्यास ऋषि हुए, जिनका वर्णन वाराहकल्प में आता है। &lt;br /&gt;
*इनका काम है [[वेद|वेदों]] का विभाजन करना, [[पुराण|पुराणों]] का प्रदर्शन करना और ज्ञान का उपदेश देना।&lt;br /&gt;
*माना जाता है कि [[ध्रुव]] की प्रदक्षिणा करने में क्रतु ऋषि आज भी तत्पर रहते हैं, लीन रहते हैं। इनका वर्णन पुराणों तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि मुनि]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A5%A0%E0%A4%B7%E0%A4%BF-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF&amp;diff=1043</id>
		<title>साँचा:ॠषि-मुनि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A5%A0%E0%A4%B7%E0%A4%BF-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF&amp;diff=1043"/>
		<updated>2010-03-06T10:20:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;sidebar&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{PageMenu}}&lt;br /&gt;
*ॠषि-मुनि&lt;br /&gt;
**अंगिरा|अंगिरा&lt;br /&gt;
**अगस्त्य|अगस्त्य&lt;br /&gt;
**अत्रि|अत्रि&lt;br /&gt;
**अदिति|अदिति&lt;br /&gt;
**अनुसूया|अनुसूया&lt;br /&gt;
**अपाला|अपाला&lt;br /&gt;
**अरुन्धती|अरुन्धती&lt;br /&gt;
**उद्दालक|उद्दालक&lt;br /&gt;
**कण्व|कण्व&lt;br /&gt;
**कपिल|कपिल&lt;br /&gt;
**कश्यप|कश्यप&lt;br /&gt;
**कात्यायन|कात्यायन&lt;br /&gt;
**क्रतु|क्रतु&lt;br /&gt;
**गार्गी|गार्गी&lt;br /&gt;
**गालव|गालव&lt;br /&gt;
**गौतम|गौतम&lt;br /&gt;
**घोषा|घोषा&lt;br /&gt;
**च्यवन|च्यवन&lt;br /&gt;
**जैमिनि|जैमिनि&lt;br /&gt;
**दत्तात्रेय|दत्तात्रेय&lt;br /&gt;
**दधीचि|दधीचि&lt;br /&gt;
**दिति|दिति&lt;br /&gt;
**दुर्वासा|दुर्वासा&lt;br /&gt;
**धन्वन्तरि|धन्वन्तरि&lt;br /&gt;
**नारद|नारद&lt;br /&gt;
**पतंजलि|पतंजलि&lt;br /&gt;
**परशुराम|परशुराम&lt;br /&gt;
**पराशर|पराशर&lt;br /&gt;
**पुलह|पुलह&lt;br /&gt;
**पिप्पलाद|पिप्पलाद&lt;br /&gt;
**पुलस्त्य|पुलस्त्य&lt;br /&gt;
**भारद्वाज|भारद्वाज &lt;br /&gt;
**भृगु|भृगु&lt;br /&gt;
**मरीचि|मरीचि&lt;br /&gt;
**याज्ञवल्क्य|याज्ञवल्क्य&lt;br /&gt;
**रैक्व|रैक्व&lt;br /&gt;
**लोपामुद्रा|लोपामुद्रा&lt;br /&gt;
**वसिष्ठ|वसिष्ठ&lt;br /&gt;
**वाल्मीकि|वाल्मीकि&lt;br /&gt;
**विश्वामित्र|विश्वामित्र&lt;br /&gt;
**व्यास|व्यास&lt;br /&gt;
**शुक्राचार्य|शुक्राचार्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/sidebar&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>पुलह</title>
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		<updated>2010-03-06T09:35:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==पुलह ऋषि / Pulah==&lt;br /&gt;
विश्व के सोलह प्रजापतियों में पुलह ऋषि का भी नाम आता है। यह भी [[ब्रह्मा]] जी के मानस पुत्र माने जाते हैं। इनके जीवन का मुख्य लक्ष्य जगत को अधिकाधिक सुख, शान्ति व समृध्दि दिलाना है। ब्रह्मा जी ने इन्हें सृष्टि की वृध्दि करने के लिए विवाह करने के लिए कहा। इन्होंने आदेश का पालन करते हुए महर्षि [[कर्दम]] की पुत्रियों तथा [[दक्ष प्रजापति]] की पाँच बेटियों से विवाह रचाए। उनसे सतानें पैदा की। इनकी संतानें अनेक योनि व जातियों की हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि  पुलह ने महर्षि सनंदन को गुरु स्वीकार किया। उनसे शिक्षा दीक्षा ग्रहण की। संप्रदाय की रक्षा की ज़िम्मेदारी ली। आश्रम में रह कर तत्वज्ञान का संपादन किया। बाद में महर्षि [[गौतम]] ने इन्हें गुरु बनाया। उन्होंने गौतम को अपने ज्ञान का भंडार दिया। गौतम ने भी पुलह  ऋषि से प्राप्त ज्ञान का विस्तार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्णन मिलता है- 'ये महर्षि शिव जी के बड़े भक्त थे। इन्होंने [[काशी]] में पुलहेश्वर नामक लिंग की स्थापना की, जो अभी तक है। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव ने अपना श्रीविग्रह प्रकट किया था।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुलह ऋषि का वर्णन [[पुराण|पुराणों]] और अन्य ग्रंथों में मिलता है। लगातार जप, तप करने में लीन रहने वाले पुलह ऋषि ने जगत को आध्यात्मिक, आधिदैविक और  आधिभौतिक शान्ति प्रदान करने का कार्य किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि मुनि]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>आंगिरस</title>
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		<updated>2010-03-05T06:52:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: नया पन्ना:  {{Incomplete}} ==आंगिरस / Aangiras== मनुस्मृति में भी यह कथा है कि आंगिरस नामक ए…&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{Incomplete}}&lt;br /&gt;
==आंगिरस / Aangiras==&lt;br /&gt;
मनुस्मृति में भी यह कथा है कि आंगिरस नामक एक ऋषि को छोटी अवस्था में ही बहुत ज्ञान हो गया था; इसलिए उसके काका–मामा आदि बड़े बूढ़े नातीदार उसके पास अध्ययन करने लग गए थे। एक दिन पाठ पढ़ाते–पढ़ाते आंगिरस ने कहा '''पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान्।''' बस, यह सुनकर सब वृद्धजन क्रोध से लाल हो गए और कहने लगे कि यह लड़का मस्त हो गया है! उसको उचित दण्ड दिलाने के लिए उन लोगों ने देवताओं से शिकायत की। देवताओं ने दोनों ओर का कहना सुन लिया और यह निर्णय लिया कि 'आंगिरस ने जो कुछ तुम्हें कहा, वही न्याय है।' इसका कारण यह है किः–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।'''&lt;br /&gt;
'''यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः।।'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'सिर के बाल सफ़ेद हो जाने से ही कोई मनुष्य वृद्ध नहीं कहा जा सकता; देवगण उसी को वृद्ध कहते हैं जो तरूण होने पर भी ज्ञानवान हो'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि_मुनि]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<title>जैसी संगति वैसा चरित्र</title>
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		<updated>2010-03-04T06:17:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==जैसी संगति वैसा चरित्र==&lt;br /&gt;
संगति का सबसे बडा गहरा प्रभाव पडता है। हम जैसे साथियों के साथ रहते हैं, उनके अच्छे और बुरे स्वभाव का असर हम पर भी धीरे धीरे पडने लगता है। यदि हमारे मित्र या साथी ऐसे हैं जो बहुत ही बुद्धिमान पढने में अत्यन्त रूचि रखने वाले तथा माता पिता एंव गुरूजनों के आज्ञाकारी हैं तो निश्चित रूप से एक दिन हम भी ऐसे ही बन जाएंगे लेकिन यदि हमारे साथी आवारा गाली गलौज करने वाले तथा झगडालू स्वभाव के हैं तो हमें भी गालियां देने में सकोंच नहीं होगा तथा हमारे चारों ओर जिस तरह  का वातावरण होगा उसी से हम अच्छे  और बुरे व्यक्ति के रूप में ढल जाएंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[कण्व]] ऋषि के वंश में सौभरि नामक एक अत्यन्त विद्वान महापुरूष उत्पन्न हुए हैं। उन्होंने गुरूकुल में रहकर [[वेद|वेदों]] का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने संसार को और परमार्थ को अच्छी तरह समझ लिया था। वे ये जान गए थे कि संसार की प्रत्येक वस्तु एक दिन समाप्त हो जाती है। जो वस्तु आज हमें सुख देती है, अत्यन्त प्रिय लगती है, उसका अधिक सेवन करने से वही बुरी लगने लगती है। फिर यदि उसमें सुख है तो सभी को अच्छी लगनी चाहिए लेकिन कुछ उसे बिल्कुल भी पंसद नहीं करते। यह स्थिति संसार की प्रत्येक वस्तु के साथ है चाहे वह खाने पीने की हो, पहनने ओढ़ने की हो या हमारे प्रयोग में आती हो। इस प्रकार उनका मन संसार की किसी वस्तु में नहीं लगता था बस भगवान के भजन में तथा वेद शास्त्रों के अध्ययन मनन तथा चिंतन में ही वे लगे रहते थे। उनका मन उनसे बार बार कहता कि घर छोडकर किसी शांत सुंदर प्राकृतिक स्थान पर चला जाए तथा वहां रहकर तपस्या की जाए। माता पिता को भी पुत्र की इस भावना का पता लग गया। उन्होनें उसे बहुत समझाया- 'बेटे प्रत्येक वस्तु समय पर ही अच्छी लगती है। तुम युवा हो इस समय यद्यपि तुम्हारी भावनाएं वैराग्य की ओर हैं लेकिन युवावस्था में मन बडा चंचल होता है, वह जरा सी देर में डिग जाता है। इस समय तुम्हें गृहस्थी बसाना चाहिए तथा गृहस्थी धम का पालन करने के पश्चात फिर संसार को त्याग कर भगवान का भजन करना। कोई तुम्हारे इरादे में बाधा नहीं डालेगा और उस समय चूंकि तुम संसार को देख लोगे तुम्हारा चित्त पूरी तरह स्थिर रहेगा। तुम दृढता के साथ भगवान के भजन में लग सकोगे। लेकिन सौभरि विवाह करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हुए। उन्हें गृहस्थी बसाकर वृद्धावस्था की प्रतीक्षा करना समय बरबाद करना ही लगा। वे दूसरों के गृहस्थ जीवन को देख चुके थे। उन्हें उस सबसे&lt;br /&gt;
घृणा थीं। हां कभी कभी वे यह अवश्य विचार करते थे कि क्या माता पिता की आज्ञा का पालन न करना उचित है लेकिन अन्दर से फिर आवाज आती कि '''आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति''' अर्थात आत्मकल्याण ही सबसे प्रिय वस्तु है। वे इस द्वंद्व में कुछ दिनों तक फंसे रहे। आखिर इसी निश्चिय पर पहुंचे कि सत्य का अनुभव करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है और एक दिन चुपचाप घर त्यागकर वन में चले गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चलते चलते वह [[यमुना]] नदी के किनारे एक अत्यन्त सुन्दर स्थान पर पहुंचे जिसे उन्होंने अपनी तपस्यास्थली के रूप में चुना। वहां चारों ओर हरे भरे वृक्ष फल और फूलों से लदे हुए थे जिन पर रंगबिरंगी चिडियां चहचहाती रहती थीं। यमुना नदी धीर गंभीर गति से बहती रहती। हवा के झोंकों द्वारा उत्पन्न छोटी छोटी लहरें किनारे से आकर टकराती और हल्की सी मीठी ध्वनि उत्पन्न करतीं जो महात्मा सौभरि के मन को गुप्त ध्वनि के समान लगती और उसी को एकाग्र होकर सुनते। जब वे जल में खडे होकर अथवा बैठकर ध्यान लगाते तो छोटी बडी मछलियां उनके चारों ओर किलोल करती रहती। कभी कभी उनकी गोद में भी आकर रूक जातीं। शाम के समय आस पास के गांवों की विभिन्न रंग की गाएं झुंड के झुंड गले में पडीं घंटियां बजाती हुई थकी मांदी थनों में दूध के भार को लिए जब लौटती तो उन्हें देखकर महात्मा सौभरि का मन झूम उठता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनेक दिन ऐसे बीत गए। सर्दी और गर्मी उनके लिए समान थी। वर्षा के दिनों में नदी का जल ऊपर तक उफन आता तथा किनारे तोडकर बहने लगता लेकिन ऋषि का मन न तो बढता और न घटता। वह तो समान रूप से शांत और स्थिर रहता। धीरे धीरे वर्षों बीत गए। जो भी उनकी तपस्या को देखता आश्चर्य करता। कभी वे वृक्ष के नीचे ध्यान लगाए दिनों बैठे रहते और कभी पानी के अंदर। जाडों में जब ठण्ड के मारे शरीर अकड़ जाता बर्फीली हवाएं शरीर को कंपा देतीं, वे खुले बदन ऐसे ही बैठे रहते। गर्मी के दिनों में जब झुलसा देने वाली लू चलती वे धूप में बैठकर [[अग्नि]] तापते। उनका शरीर जड़ हो गया था उस पर किसी प्रकार का कोई असर नहीं पडता। भूख प्यास तो पूरी तरह उनके नियन्त्रण में थीं। जो कुछ जंगल से फल फूल मिल जाते अथवा गांव वाले कभी दे जाते वहीं उनका भोजन था। मिल गया तो ठीक नहीं तो प्रभु इच्छा। वर्षों बीत गए, यहीं पता नहीं चला कि जवानी कब चली गई। लम्बी दाढी और मूछों ने चेहरे को ढ़क लिया। सिर के बाल भी श्वेत होने लगे। अचानक मीठे दूध से भरे कटोरे में विष की बूंद गिरी या कहें कि देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी जिसमें कि वे बुरी तरह असफल हुए। वे प्रायः पानी के अंदर बैठकर तपस्या किया करते थे। मछलियां उनके चारों ओर तैरती ही रहती थीं। वे ऋषि की परिक्रमा सी करती रहतीं और उनके शरीर को छूती फिसलती रहती। वे जरा भी उनकी उपस्थिति से विचलित नहीं होतीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन अचानक ऋषि का ध्यान कुछ अधिक ही उनकी ओर चला गया। उन्होनें देखा कि एक मत्स्य जोडा कितने आनन्द से एक दूसरे का पीछा कर रहा है तथा किस तरह से लड़ते झगड़ते तथा मुस्कराते हुए लग रहे हैं। उनके चारों ओर उनके अनेक बच्चे इधर उधर घूम रहे हैं तथा पानी में खेल रहे हैं। अचानक ऋषि सोचने लगे, यह भी संसार का एक आनन्द है जिससे मैं वंचित रह गया। इसमें भी सुख है जिसकी वजह से लगभग सभी मनुष्य गृहस्थ धर्म का पालन करते हैं। मुझे इसे भी भोगना चाहिए था। मेरे पिता ने मुझे कितना समझाया, लेकिन मैंने उनकी एक न मानी। वे बेचैनी के साथ पानी से बाहर निकल आए। उनका मन चंचल हो उठा। वह किसी प्रकार भी शांत न होता था और न भगवान के ध्यान में लगता था। जब भी वे ध्यान करने बैठते उन्हें मछलियां दिखाई देने लगतीं, जो हंसी-खुशी से पानी में किलोल करती फिर रही थीं। यह उन मछलियों की नित्य प्रति की संगति का ही प्रभाव था जिसने ऋषि सौभरि की तपस्या को भंग कर दिया था । वास्तव में ऋषि ने संयम के द्वारा अपने शरीर को तो तपा लिया, अपने बस में कर लिया लेकिन वे अपने मन को नहीं बदल सके। शरीर और इन्द्रियों के नियंत्रण के साथ- साथ मन का बदलना भी आवश्यक है। जब तक वह नहीं बदलता, कुछ नहीं पाया जा सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन उन्होंने कुछ निश्चय किया और अपना स्थान छोडकर एक ओर को चले दिए। चलते- चलते वे सिंध प्रदेश में सबसे अधिक शक्तिशाली एंव प्रतापी राजा ‘त्रसद्दस्यु’ के दरबार में सहसा उपस्थित हो गए। राजा त्रसद्दस्यु का नाम वास्तव में साथक था उनके नाम से ही आर्यों के शत्रु दस्यु राजा कांपने लगते थे। उन्होंने कभी भी अपने शत्रुओं को सिर नहीं उठाने दिया था। वे ऋषि-महर्षियों का भी बड़ा आदर-सम्मान करते थे। सौभरि ऋषि का नाम सारे भारत मे विख्यात था उनकी तपस्या से सभी चमत्त्कृत थे। उन्हें दरबार में अचानक देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। राजा ने सिंहासन छोडकर उनका स्वागत किया तथा उन्हें जल आदि से तृप्त करके सुखपूर्वक बैठाया और तब उनसे कुशल-मंगल पूछते हुए अत्यन्त विनम्रता के साथ आने का प्रयोजन जानना चाहा। ऋषि बोले, 'मैं तुम्हारी कन्या से विवाह करने का इच्छुक हूँ।' राजा इस बात को सुनते ही सकते में आ गए। वे सोचने लगे कि कहां यह वृद्ध ऋषि और कहां मेरी सुकुमारी बेटी! क्या यह उचित होगा कि मैं अपनी युवा बेटी का विवाह इस वृद्ध पुरूष के साथ कर दूँ। अन्य राजा लोग क्या कहेंगे, मेरी प्रजा में क्या ख्याति रह जाएगी। इस वृद्ध को देखो, इस आयु में गृहस्थ जीवन बिताने की सोच रहा है, लेकिन इन्कार भी नहीं किया जा सकता। यदि कहीं क्रुद्ध हो गए तो राज्य की खैर नहीं। अंत में राजा ने एक युक्ति सोच ली। वे बोले, 'महात्मन्, हम लोग क्षत्रिय हैं, हमारे यहां  स्वयंवर का रिवाज है , आप मेरे साथ अतः पुर में चलें, जो राजकुमारी आपको पसंद कर लेगी मैं उसी से आपका विवाह कर दूँगा।' दोनों महल के रनिवास की ओर चल दिए। रास्ते में ऋषि ने अपने तपोबल से एक अत्यन्त सुंदर युवा का रूप धारण कर लिया। वे ऐसे लगने लगे जैसे साक्षात सौन्दर्य के देवता अनंग हो। जैसे ही महल में पहुँचे और राजा ने आगन्तुक के आने का कारण बताया, सभी राजकुमारियों ने ऋषि के सौंदर्य और आकर्षण को देखकर उन्हें घेर लिया तथा सभी उनके साथ विवाह करने के लिए उत्सुक हो गई उनकी संख्या पचास थी  । राजा ने यह स्थिति देखकर शुभ मुहुर्त में अत्यन्त उत्साह एवं उल्लास के साथ सभी राजकुमारियों का विवाह ऋषि सौभरि के साथ कर दिया। उन्हें इतना घर गृहस्थी का सामान दिया कि ऋषि को किसी प्रकार की भी कोई चिन्ता न रही । गायों  के  झुंड, घोडे विभिन्न प्रकार के वस्त्र, रत्न तथा आभूषण प्राप्त करके ऋषि का मन आनन्दित हो गया। रास्ते में ऋषि ने [[इन्द्र]] देवता की प्रार्थना की और उन्हें [[यज्ञ]] में उपस्थित होकर भेंट स्वीकार करने का आग्रह किया। उन्होंने यही चाहा कि उनका यौवन सदा बना रहे, उनकी पत्नियां उनसे सदा प्रसन्न रहें। वे कभी आपस में कलह न करें। देवताओं के भवन निर्माता [[ब्रह्मा|विश्वकर्मा]] उनके लिए यमुना के किनारे पर एक सोने का महल बना दें जो धन-धान्य से पूर्ण हो तथा जिसके चारों ओर स्वर्गीय फलों और फूलों की वाटिकाएं हों ताकि वे गृहस्थ का भरपूर सुख उठा सकें। इन्द्र देवता उनकी तपस्या और प्रार्थना से पहले ही संतुष्ट थे। उन्होंने 'तथास्तु' कहा और स्वर्ग ओर प्रस्थान कर गए। अब ऋषि आनन्दपूर्वक अपने दिन बिताने लगे। चारों ओर सुंदर स्त्रियों का समूह, हास–परिहास तथा भांति–भांति के खेल। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षों बीत गए, समय का पता नहीं चला। छोटे-छोटे बच्चों की तोतली बोली उनके मन में आनन्द की लहरें उठाती रहती। परन्तु धीरे-धीरे मन अब फिर उकताने लगा। मन ने प्रश्न किया, क्या यह सत्य है, सदा ऐसे ही रहेगें? वैराग्य की वृत्ति ने फिर सिर उठाना प्रारम्भ किया। जिस वस्तु को प्राव्त करने के लिए मन अथक परिश्रम करता है और जब उस प्राप्त कर लेता है तो वह भोगते-भोगते नीरस हो जाती है। ऋषि के मन में विचार आया कि तूने किस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए घर छोडा था और फिर एक इतना बडा जंगल खडा कर लिया। जिसके लिए मैंने अपनी वर्षों की घोर तपस्या का त्याग किया क्या वास्तव में यह उससे बडी वस्तु है। क्या इसी मनुष्य सुखमय गृहस्थ जीवन कहते हैं। इससे तो मैं कल्याण का रास्ता छोड़ बैठा और संसार में फंस गया। मैनें योग का रास्ता सांसारकि भोगों के लिए छोड दिया। कितनी बडी भूल की। इस समय उन्हें सच्चा वैराग्य उत्पन्न हो गया था। युवावस्था  का वैराग्य कच्चा था, अनुभवहीन था। उन मछलियों की सगंति ने उनके स्वभाव को परिवर्तित कर दिया था। उन्होंने तपस्या के समय की शांति, सतोंष और मन की स्थिरता को देखा था और अब गृहस्थ के सुख को भी भोगा। तब उनकी समझ में यह आया कि गृहस्थ का अनुभव भी आवश्यक है और एक दिन जब उनके सभी बच्चे समर्थ हो गए तो उन्होंने गृहस्थी का त्याग कर दिया और जंगल में जाकर पुनः तपस्या में रत हो गए तथा अंत में भगवान के दर्शन करके आवागमन के चक्र से सदा-सदा के लिए मुक्त हो गए। उनकी पत्नियों पर भी उनकी संगति का गहरा प्रभाव पडा। वे सब भी उन्हीं के बताए हुए मार्ग पर चल पडी और सदगति को प्राप्त हुई। इसलिए सदा अच्छे मित्रों, साथियों तथा सज्जन व्यक्तियों को ढूंढते रहना चाहिए तथा उन्हीं की सगंति में रहना चाहिए। &lt;br /&gt;
{{कथा}}                         &lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>साँचा:कथा</title>
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		<updated>2010-03-04T06:17:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; align=&amp;quot;left&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:10%; font-size:100%;background-color:#FFFCF0;border:1px solid #FFE391;padding:5px;&amp;quot; valign=&amp;quot;center&amp;quot; | &amp;lt;div style=&amp;quot;background-color: #646400;color:white;padding:5px&amp;quot; align=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;'''कथा'''&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:85%; font-size:100%;background-color:#FFFCF0;border:1px solid #FFE391;padding:5px;&amp;quot; valign=&amp;quot;center&amp;quot; | &lt;br /&gt;
&amp;lt;sort2 type=&amp;quot;inline&amp;quot; separator=&amp;quot;&amp;amp;sp;|&amp;amp;sp;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[कच देवयानी]]&lt;br /&gt;
[[समुद्र मंथन]]&lt;br /&gt;
[[गंगावतरण]]&lt;br /&gt;
[[सावित्री सत्यवान]]&lt;br /&gt;
[[गणेश जी की कथा]]&lt;br /&gt;
[[नहुष]] &lt;br /&gt;
[[ययाति]]&lt;br /&gt;
[[शर्मिष्ठा]]&lt;br /&gt;
[[पूतना वध]]&lt;br /&gt;
[[शकटासुर वध]]&lt;br /&gt;
[[करवा चौथ]]&lt;br /&gt;
[[अहोई अष्टमी]]&lt;br /&gt;
[[यम द्वितीया]]&lt;br /&gt;
[[प्रह्लाद]]&lt;br /&gt;
[[परीक्षित]]&lt;br /&gt;
[[अनन्त चतुर्दशी]]&lt;br /&gt;
[[मधु कैटभ| मधु कैटभ कथा]]&lt;br /&gt;
[[महिषासुर|महिषासुर वध]]&lt;br /&gt;
[[धेनुकासुर वध]]&lt;br /&gt;
[[दधीचि का अस्थि दान]]&lt;br /&gt;
[[जड़भरत की कथा]]&lt;br /&gt;
[[वत्सासुर का वध]]&lt;br /&gt;
[[बकासुर का वध]]&lt;br /&gt;
[[अघासुर का वध]]&lt;br /&gt;
[[सती शिव की कथा]]&lt;br /&gt;
[[सहस्त्रबाहु और परशुराम]]&lt;br /&gt;
[[मत्स्य अवतार की कथा]]&lt;br /&gt;
[[ॠषभदेव का त्याग]]&lt;br /&gt;
[[वराह अवतार की कथा]]&lt;br /&gt;
[[शिव अर्जुन युद्ध]]&lt;br /&gt;
[[रुक्मिणी|रुक्मिणी परिणय]]&lt;br /&gt;
[[सत्यकाम की कथा]]&lt;br /&gt;
[[नचिकेता की कहानी]] &lt;br /&gt;
[[शबरी के बेर]]&lt;br /&gt;
[[वेणु का विनाश]]&lt;br /&gt;
[[कुबेर पुत्रों का उद्धार]]&lt;br /&gt;
[[इंद्र का अहंकार]]&lt;br /&gt;
[[लक्ष्मी की महिमा]]&lt;br /&gt;
[[वरूणदेव का वरदान]]&lt;br /&gt;
[[आरूणि उद्दालक की कथा]]&lt;br /&gt;
[[नारद मोह की कथा]]&lt;br /&gt;
[[रैक्व की कथा]]&lt;br /&gt;
[[ऐतरेय की कथा]]&lt;br /&gt;
[[द का अर्थ]]&lt;br /&gt;
[[विजय का रहस्य]]&lt;br /&gt;
[[तिरूपति में विष्णु]]&lt;br /&gt;
[[याज्ञवल्क्य और मैत्रियी की कथा]]&lt;br /&gt;
[[विश्वामित्र और वसिष्ठ कथा]]&lt;br /&gt;
[[जैसी संगति वैसा चरित्र]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/sort2&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>द का अर्थ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5&amp;diff=5915"/>
		<updated>2010-03-04T05:29:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
=='द' का अर्थ ==&lt;br /&gt;
[[बृहदारण्यकोपनिषद]] में एक शिक्षाप्रद कथा है । [[ब्रह्मा|प्रजापिता]] की तीन संताने थीं- देवता, मनुष्य तथा दानव । एक बार ये तीनों अपने पिता के पास कुछ उपदेश पाने के निमित्त गए। पिता ने उन्हें कुछ कठोर नियमों का पालन करते हुए कुछ समय व्यतीत करने के लिए कहा ताकि यह जाना जा सके कि वास्तव में वे ज्ञान प्राप्त करने के प्रति कितने गभींर हैं। जब थोड़ा समय बीत गया तो प्रजापिता ने बारी –बारी से एक एक को अपने पास बुलाया। '''सर्वप्रथम देवता पहुँचे।''' उन्होनें पिता को प्रणाम करते हुए उपदेश देने के लिए प्रार्थना की, ब्रह्मा बोले, 'द'। यह सुनकर देवता वापस जाने लगे तब [[ब्रह्मा]]जी उनसे बोले, 'तुम क्या समझे?' देवता बोले, 'हमने समझा दमन करो।' ब्रह्मा ने आर्शीवाद दिया और कहा, 'तुम ठीक समझे, इसी का आचरण करो।' देवता हर समय, भोग-विलास और नाच गान में व्यस्त रहते हैं। हमने संसार के भोगों को संयमपूर्वक रहते हुए छोड़ दिया, परोपकार मे सारा जीवन व्यतीत कर दिया, व्रत उपवास, पूजा-पाठ और सादगी के साथ रहे, क्या इसलिए कि हम शरीर छोड़ने के पश्चात स्वर्ग को प्राप्त हों और दिव्य भोगों का रसास्वादन करें और ऐसा ही हुआ तो ब्रह्माजी उपदेश देते हैं कि ‘दमन करो’। अपनी इच्छाओं का दमन करो, अपनी  इन्द्रियों पर नियंत्रण रखो और संयमपूर्वक रहो, तभी तुम्हारा कल्याण है क्योंकि पुण्य अर्थात तुम्हारे अच्छे कर्मों का फल समाप्त होने के पश्चात तुम्हें फिर संसार में ही जन्म लेना पड़ेगा। स्वर्ग के भोगों को भोगो लेकिन संयमपूर्वक, उसमें खो मत जाओ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अब मनुष्य प्रजापिता के पास गए''' और उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें उपदेश दें। प्रजापिता ने उनसे भी केवल 'द' अक्षर ही कहा। मनुष्य उसे समझकर संतुष्ट होकर वापस चल दिए। ब्रह्मा जी ने उनसे भी देवताओं के समान वही प्रश्न किया, 'क्या समझे?' मनुष्य बोले कि हम समझ गए कि आपने हमें 'दान क्रिया' का आदेश दिया है। ब्रह्मा जी ने कहा, 'तुम ठीक समझे हो।' वास्तव में दान एक ऐसी क्रिया है, जिससे दूसरों का हित तो होता ही है, हमारे भी अहम का विस्तार होता चला जाता है। मनुष्य प्रायः स्वार्थी होता है। उसका अपना एक परिवार होता है यूं कहें कि उसके कुछ अपने होते हैं जिनके हित में ही वह लगा रहता है, शेष सबको वह गैर समझता है, उनके सुख-दुख की कोई चिन्ता नहीं करता। किसी के साथ कितनी ही बड़ी दुर्घटना क्यों न हो जाए, जरा सी देर के लिए महसूस करेगा फिर थो़ड़ी ही देर में भूल जाएगा, लेकिन जब उसके अपने किसी व्यक्ति के साथ ऐसा हादसा हो जाता है तो वह तड़प उठता है, बैचेन हो जाता है। अपनी आवश्यकता में कटौती करके अथवा अपने फालतू धन से, वस्तु से जब हम किसी की सहायता करते हैं, उसे निःस्वार्थ भाव से दान देते हैं, जो हमारे अन्दर उदारता, सहनशीलता, परदु:ख कातरता तथा त्याग और बलिदान जैसे गुणो का विस्तार करता चला जाता है। हमारे भोगों के एकत्रीकरण की प्रवृत्ति को रोकता है तथा समाज में सबको समान बनाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अंत में दानव ब्रहाजी के पास पहुँचे।''' उनसे भी ब्रह्मा जी ने 'द' अक्षर का ही उच्चारण किया। वे भी जब वापस जाने लगे तो उनसे भी ब्रह्मा जी ने यह प्रश्न किया, 'क्या वे समझ गए हैं?' उन्होंने भी 'हां' में उत्तर दिया कि आपने हमें बताया, 'दया करें।' ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए कि दानव भी समझ गए कि वे क्या चाहते हैं। दानवों अथवा असुरों का स्वभाव बिना कारण दूसरों को दु:ख पहुंचाना होता है। उन्हें कुछ लाभ हो या न हो, पीडित व्यक्ति सज्जन है या दुर्जन, इससे उनका कोई मतलब नहीं, बस दु:ख देना उनका स्वभाव है, आचरण है। आज भी समाज में ऐसे लोग दिखाई देते हैं जो दूसरों के दु:ख में ही अपना सुख समझते हैं। दूसरों को कितनी पीडा होती है, उनके बसे-बसाए, फलते–फूलते परिवार, उनकी जलन, द्वेष, घृणा, क्रूरता और अत्याचार के कारण नष्ट हो जाते हैं, बरबाद हो जाते हैं, इसे वे नहीं देखते। ऐसे लोगों को प्रजापिता ब्रह्मा का आदेश है कि वे दूसरों पर ‘दया करें’, उन्हें अपने जैसा ही समझें और जैसा व्यवहार वे दूसरों के द्वारा अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही दूसरों के साथ करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार तीन प्रकार के स्वभाव वाले, देवताओं, मनुष्यों और दानवों के लिए उनके पिता ब्रह्मा जी का उपदेश है, '''वे दमन करें, दान करें तथा दया करें।''' इसी से यह समाज सुव्यवस्थित एंव सुख-शांतिपूर्वक रह सकेगा और निरंतर भौतिक तथा धार्मिक क्षेत्रों मे उन्नति करता चला जाएगा । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सुगा ऋतस्य पन्थाः&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ऋग्वेद-8/31/13&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; अर्थात 'सत्य का मार्ग सुख से गमन करने योग्य है, सरल है।'''&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>याज्ञवल्क्य और मैत्रियी की कथा</title>
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		<updated>2010-03-04T02:32:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==याज्ञवल्क्य और मैत्रियी की कथा / Story of Yagyavalkya and Maitriyee==&lt;br /&gt;
महर्षि [[याज्ञवल्क्य]] वैदिक युग में एक अत्यन्त विद्वान व्यक्ति हुए हैं। वे ब्रह्मज्ञानी थे। उनकी दो पत्नियां थीं। एक का नाम कात्यायनी तथा दूसरी का [[मैत्रियी]] था । कात्यायनी सामान्य स्त्रियों के समान थीं, वह घर गृहस्थी में ही व्यस्त रहती थी। सांसारिक भोगों में उसकी अधिक रूचि थी। सुस्वादी भोजन, सुन्दर वस्त्र और विभिन्न प्रकार के आभूषणो में ही वह खोई रहती थी। याज्ञवल्क्य जैसे प्रसिद्ध महर्षि की पत्नी होते हुए भी उसका धर्म में उसे कोई आकर्षण नहीं दिखाई देता था। वह पूरी तरह अपने संसार में मोहित थी। जबकि मैत्रियी अपने पति के साथ प्रत्येक धार्मिक कार्य में लगी रहती थी। उनके प्रत्येक कर्मकाण्ड में सहायता देना तथा प्रत्येक आवश्यक वस्तु उपलब्ध कराने मे उसे आनन्द आता था। अध्यात्म में उसकी गहरी रूचि थी तथा अपने पति के साथ अधिक समय बिताने के कारण आध्यात्मिक जगत में उसकी गहरी पैठ थी। वह प्रायः महर्षि याज्ञवल्क्य के उपदेशों को सुनती, उनके धार्मिक क्रिया-कलापों में सहयोग देती तथा स्वंय भी चिन्तन-मनन में लगी रहती थी। सत्य को जानने की उसमें तीव्र जिज्ञासा थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार महर्षि याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ त्यागकर संन्यास लेने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को अपने समीप बुलाया और उनसे बोले, 'हे मेरी प्रिय धर्मपत्नियों, मैं गृहस्थ त्यागकर संन्यास ले रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे पश्चात तुम दोनों में किसी प्रकार का विवाद न हो। इसलिए मेरी जो भी धन-सम्पत्ति है तथा घर में जो भी सामान है, उसे तुम दोनों में आधा-आधा बांट देना चाहता हूं।' कात्यायनी तुंरत तैयार हो गई लेकिन मैत्रियी सोचने लगी कि ऐसी क्या वस्तु है जो गृहस्थ से भी अधिक सुख, सतोंष देने वाली है और जिसे प्राप्त करने के लिए महर्षि गृहस्थ का त्याग कर रहे हैं। वह बोली, 'भगवन आप जिस स्थिति को प्राप्त करने के लिए गृहस्थ का त्याग कर रहे हैं, क्या वह इस गृहस्थ जीवन से अधिक मूल्यवान है?' महर्षि ने उत्तर दिया, 'मैत्रियी वह  अमृत है, यह संसार नाशवान है। इसका सुख क्षणिक है, वह स्थायी आनन्द है। उसी की खोज में मैं अपना शेष जीवन व्यतीत कर देना चाहता हूं।' मैत्रियी फिर बोली, 'भगवन यदि धन-धान्य से पूर्ण यह समस्त पृथ्वी मुझे मिल जाए तो क्या मृत्यु मेरा पीछा छोड़ देगी, मैं अमर हो जाऊंगी।' महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा, 'प्रिय मैत्रियी, धन से तो सांसारिक वस्तुओं का ही प्रबंध किया जा सकता है। यह तो शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति, भोग-विलास तथा वैभव का ही साधन है। इससे अमरत्व का कोई सम्बंध नहीं है।' तब मैत्रियी ने कहा, 'यदि ऐसा है तो आप मुझे इससे क्यों बहला रहे हैं। मुझें इसकी आवश्यकता नहीं है। मुझे तो आप उस तत्व का उपदेश दीजिए जिसमें मैं सदा रहने वाला सुख पा सकूं। उसे जान सकूं जिसे जानने के पश्चात कुछ भी जानना शेष नहीं रहता तथा इस आवागमन के चक्र से मुफ्त होकर सदा-सदा के लिए अमर हो जाऊं।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि अपनी पत्नी की सत्य के प्रति जिज्ञासा को जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी पत्नी की प्रशंसा करते हुए कहा, 'हे मैत्रियी, तुम्हारी इस सच्ची लगन को देखकर मैं पहले भी तुमसे प्रसन्न था और तुम्हें प्यार करता था, अब तुम्हारी बातें सुनकर मैं तुमसे बहुत अधिक प्रसन्न हूं, आओ, मेरे पास बैठो, मैं तुम्हें वह ज्ञान दूंगा जिससे वास्तव में तुम्हारी आत्मा का कल्याण होगा और तुम संसार के माया-मोह से सदा के लिए मुफ्त हो जाओगी।' और ऐसा ही हुआ, मैत्रियी ने अपने पति के द्वारा ज्ञान प्राप्त करके, ईश्वर को पा लिया और उसका मन स्थायी &lt;br /&gt;
शांति तथा आनन्द से परिपूर्ण हो गया।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्मेति&amp;lt;balloon title=&amp;quot;श्वेताश्वतरोपिनषद 4/14&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।&lt;br /&gt;
'''उस कल्याणकारी परमात्मा को जानकर ही भक्त अत्यन्त शान्ति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>तिरूपति में विष्णु</title>
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		<updated>2010-03-04T02:16:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==तिरूपति में विष्णु / Lord Vishnu in Tirupati==&lt;br /&gt;
हमारे प्राचीन ग्रन्थों में विनम्रता का मनुष्यों का ही नहीं देवताओं का भी सर्वोच्च गुण माना गया है। इसका अर्थ है कि अपनी हानि होने पर भी अपनी शिष्टता तथा सभ्यता को न खोना तथा दूसरों का किसी प्रकार भी अपमान न करना, मीठी वाणी बोलते हुए दूसरे का स्वागत-सत्कार करना। महर्षि [[भृगु]] [[वेद|वेदों]] के काल में हुए हैं तथा [[सप्तर्षि]] मण्डल में से एक हैं। वे अत्यन्त बुद्धिमान तथा सामर्थ्यवान ऋषि माने जाते थे। वे मन्त्र योगी तथा सिद्ध पुरूष थे। उनकी पहुंच [[पृथ्वी]] पर ही नहीं सभी लोकों में समान थीं। वे अपनी मनः शक्ति से क्षणमात्र में कहीं भी पहुंच सकते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार कुछ ऋषियों में यह विचार उत्पन्न हुआ कि तीनों देवों [[ब्रह्मा]], [[विष्णु]], [[महेश]] में सबसे बड़ा कौन है? इसे कैसे जाना जाए तथा इसकी परीक्षा कौन ले। सभी की दृष्टि भृगु ऋषि पर पड़ी, क्योंकि वे ही इतने साहस वाले थे कि देवताओं की परीक्षा ले सकें। महर्षि भृगु भी अन्य ऋषियों का आशय समझ गए और वे इस काम के लिए तैयार हो गए। ऋषियों से विदा लेकर वे सर्वप्रथम अपने पिता ब्रह्म के पास, जिनके वे मानसपुत्र थे, पहुंचे। ब्रह्मा जी की परीक्षा के लिए उन्होंने उन्हें प्रणाम नहीं किया इससे ब्रह्मा जी अत्यन्त कुपित हुए और बजाय उन्हें प्रिय वचनों द्वारा शिष्टता सिखाने के अपना कमण्डल लेकर उन्हें मारने (शाप) के लिए भागे। भृगु ऋषि चुपचाप वहां से चले आए। फिर वे [[शिव]] जी महाराज के पास पहुंचे। यहां भी उन्होंने यही धृष्टता की तथा बिना अन्दर आने की सूचना भेजे स्वंय प्रवेश कर गए। शिव जी महाराज भी उन पर बहुत क्रोधित हुए तथा अपना त्रिशूल लेकर उन पर दौड़े। उस समय माता [[पार्वती]] उनकी जंघा पर विराजमान थीं। महर्षि भृगु इनसे भी संतुष्ट नही हुए। अंत में वे भगवान विष्णु के पास क्षीर सागर पहुंचे। यहां उन्होंने क्या देखा कि विष्णु जी शेष शय्या पर लेटे हुए निद्रा ले रहे हैं और देवी [[लक्ष्मी]] उनके चरण दबा रही है। महर्षि भृगु दो जगह डांट खाकर आ रहे थे। इसलिए उन्हें स्वाभाविक रूप से क्रोध आ रहा था। विष्णु जी को सोते हुए देखकर उनका पारा और गरम हो गया और उन्होंने विष्णु जी की छाती में एक लात मारी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विष्णु जी एकदम जाग उठे और उन्होंने भृगु ऋषि के पैर को पकड़ लिया तथा बोले, 'हे महर्षि, मेरी छाती वज्र की तरह कठोर है और आपका शरीर तपस्या के कारण दुर्बल और कोमल, कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं आई। आपने मुझे सावधान करके बड़ी कृपा की है। इसको याद रखने के लिए यह आपका चरणचिन्ह मेरे वक्ष पर सदा अंकित रहेगा।' महर्षि भृगु को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने तो भगवान विष्णु की परीक्षा लेने के लिए यह दुष्कर्म किया था लेकिन भगवान मुस्करा रहे थे। उन्होंने यह निश्चय किया कि वे वास्तव में विष्णु ही सबसे बड़े देवता हैं। उनकी विनम्रता की किसी भी अन्य देवता से कोई तुलना नहीं हैं। लौटकर उन्होंने सभी ऋषियों को पूरी घटना सुनाई और सभी ने एक मत से यह निश्चय किया कि वे वास्तव में भगवान विष्णु ही सबसे महान हैं और तभी से उन्हें सभी देवताओं में श्रेष्ठ एवं पूज्य माना जाता है। अब इससे आगे की कथा तिरूपति के मन्दिर से मिलती है, जो केरल प्रांत में स्थित है । वहां के एक विद्वान पंडित ने बताया कि जब लक्ष्मी जी ने महर्षि भृगु को अपने पति की छाती पर लात मारते हुए देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया, परन्तु यह क्या? इतने शक्तिशाली एवं सामर्थ्यवान देव होते हुए भी वे तो भृगु ऋषि के चरण पकड़े बैठे हैं और उल्टे उनसे क्षमा मांग रहे हैं। यह उनका कैसा पति है, जो इतना कायर है। यह कैसे धर्म की रक्षा करने के लिए अधर्मियों एवं दुष्टों का नाश करता होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भृगु जी के जाने के पश्चात वे अवसर मिलते ही ग्लानि और शर्म के मारे पृथ्वी पर आकर एक वन में तपस्या करने लगीं। यही पर तपस्या करते-करते उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया और दरिद्र् ब्राह्मण के यहां जन्म ले लिया। विष्णु जी उन्हें ढूंढ़ते फिर रहे थे, तीनों लोकों में उन्होंने खोज की, लेकिन माता लक्ष्मी की शक्ति ने उन्हें भ्रमित रखा। आखिर भगवान विष्णु को पता लग ही गया, लेकिन तब तक वे अपना शरीर छोड़ चुकीं थी। अपनी दिव्य दृष्टि द्वारा उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका जन्म किस ब्राह्मण परिवार में हुआ है। वे तुंरत एक सामान्य ब्राह्मण युवक का वेष धारण कर उस सौभाग्यशाली ब्राह्मण के यहां पहुंचे और उससे उसकी कन्या का हाथ मांगा। ब्राह्मण सोचने लगा कि क्या करना चाहिए। उन्होंने सोच-विचार कर एक लम्बी रकम ब्राह्मण युवक से मांगी। युवक ने शर्त को स्वीकार कर लिया। लेकिन विष्णु जी के पास इतनी रकम कहां से आए। वे सोचने लगे कि क्या करें, कहां से इतना सारा धन लाएं लक्ष्मी तो उनके पास से पहले ही चली गई, इसलिए धन कहां से होता। आखिर विचार करते-करते उन्हें [[कुबेर]] का ध्यान आया और वे उसके पास चल पड़े। उन्होंने अपनी समस्या कुबेर के सामने रखी। कुबेर ने जब जाना कि यह स्वंय विष्णु भगवान हैं तो वह धन देने के लिए राजी हो गया, लेकिन शर्त यह थी कि धन मय ब्याज के वापस करना पड़ेगा और जब तक यह ऋण उतर नहीं जाएगा, वे वहीं केरल में रहेंगे। भगवान क्या करते । लक्ष्मी जी को वे छोड़ नहीं सकते थे । इसलिए उन्होंने सोचा कि हमें तो कहीं न कहीं रहना ही है । इसलिए केरल प्रदेंश ही सही। दोनों का विवाह हो गया, ब्राह्मण देवता को, जो उनसे धन मांगा दे दिया, लेकिन तभी से भगवान विष्णु श्री[[कृष्ण]] भगवान के रूप में  तिरूपति में ही रह रहे हैं । रोज हजारों-लाखों रूपया चढ़ावे में आता है और वह कुबेर के भंडार में चला जाता है । लम्बी रकम और फिर उसका ब्याज, ऐसा लगता है कि यह रकम तो कभी उतरेगी ही नही और बेचारे विष्णु जी को केरल प्रदेश के मन्दिर में ही बन्दी बनकर रहना पड़ेगा।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम्।'''&lt;br /&gt;
'''ममेदह क्र तावसो मम चित्तमुपायसी&amp;lt;balloon title=&amp;quot;अथर्ववेद 1/34/2&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।।&lt;br /&gt;
'''मेरी जिह्वा के अग्रभाग में माधुर्य हो। मेरी जिह्वा के मूल में मधुरता हो। मेरे कर्म में माधुर्य का निवास हो और हे माधुर्य, मेरे ह्वदय तक पहुंचो'''’&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<title>विजय का रहस्य</title>
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		<updated>2010-03-04T01:53:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==विजय का रहस्य / Secret of Success==&lt;br /&gt;
[[वैदिक काल]] में प्रायः देवताओं और असुरों में संघर्ष  होता रहता था। ये दोनों सभ्यताएं एक दूसरे को नष्ट करने पर तुली थीं। देवता दैवी सम्पदा के आगार थे, असुर पूर्णतया भौतिकवादी थे। उनमें अनेक प्रकार की कमियों थीं। वे अत्यन्त क्रूर एवं अत्याचारी थे, जबकि देवता चाहते थे कि सभी शान्तिपर्वक रहें। जो अच्छी बातें हो उन्हें सभी अपनाएं और मिल-जुलकर रहें। उनका उद्देश्य विभिन्नता में एकता था, विभिन्नता को नष्ट करके एकता लाना नहीं था। [[वेद]] कहता है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया।'''&lt;br /&gt;
'''सर्वे भद्राणि  पश्यन्तु, मा कश्चित दुखभागभवेत।।'''&lt;br /&gt;
'''सब सुखी रहे, किसी को भय न हो, सभी कल्याण को देखें तथा किसी को भी दुख प्राप्त न हो ।'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
लेकिन असुर गण केवल अपने ही विषय में सोचते थे, वे दूसरी विचारधाराओं को सहन नहीं करते थे। एक बार देवता और असुर [[ब्रह्मा]] जी के पास पहुंचे और उनसे आत्मा के विषय में पूछा। ब्रह्मा जी ने कहा कि जल में झांककर देखो, तुम्हे जो दिखाई देगा, वही आत्मा है। दोनों ने जल में झांका और उन्हें अपनी सूरत जल में दिखाई दी। दोनों ही सतुष्ट होकर चले गए। असुरों ने अपनी बुद्धि को लगाने का बिल्कुल प्रयास नहीं किया और यह समझ लिया कि शरीर ही सब कुछ है। इसको ही सुखी रखना कर्तव्य है। बस वे संसार के भोगों को भोगने और इन्द्रियों को हर प्रकार से तृप्त करने में लग गए, लेकिन देवताओं ने जब लौट कर इस पर विचार किया तो यह समझा कि यह शरीर तो आत्मा हो ही नहीं सकता क्योंकि आत्मा तो अविनाशी बताई जाती है जबकि यह शरीर नित्य नष्ट होता हुआ दिखाई पड़ता है। वे पुनः ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और अपनी शंका उनके सामने रखी। ब्रह्मा जी ने फिर उनसे जल में देखने के लिए कहा। अबकी बार उन्होंने नेत्रों में जिसको अकिंत हुए पाया उसे आत्मा समझा लेकिन यह नेत्रो में झांकता हुआ पुरूष सोते समय कहां चला जाता है। अतः वे बार-बार ब्रह्मा जी के पास जाते रहे जब तक कि उन्होंने आत्मा का अनुभव न कर लिया। असुर अपने शरीर को लेकर ही रह गए और उससे आगे नहीं बढ़ सके। वे घोर स्वार्थी तथा असामाजिक बन गए। इसी विषय को और स्पष्ट करने के लिए निम्न कथा है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवताओं और असुरों में एक बार इस बात पर विवाद छिड़ गया कि उन दोनों में कौन बड़ा है। असुरों ने अपनी वीरता, कूटनीति तथा देवताओं पर अनेक बार होने वाली अपनी विजयों का वर्णन किया, जबकि देवताओं ने भी अपनी आध्यात्मिक शक्तियों तथा असुरो को युद्ध में परास्त करके भगा देने का वर्णन किया। जब किसी प्रकार भी निर्णय नहीं हो पाया तो यह निश्चय हुआ कि [[विष्णु]] जी के पास चला जाए और उनसे निर्णय कराया जाए क्योंकि वे ही देवताओं मे निष्पक्ष तथा सबके साथ समान व्यवहार करने वाले हैं। भगवान विष्णु ने शान्तिपूर्वक दोनों के तर्क सुने और बोले, 'देखो भाई, मैंने तुम दोनों के विचार अच्छी तरह सुने। मैं समझता हूं कि यदि मैंने स्वंय तुम्हारे तर्कों के आधार पर निर्णय दिया तो हो सकता है कि तुममें से किसी को अच्छा न लगे और वह समझा जाए कि मैं पक्षपात कर रहा हूं, क्योंकि मैं भी देवताओं की श्रेणी में आता हूं, इसलिए मैं आप दोनों के सामने एक परीक्षा रख रहा हूं, जो भी उसमें उत्तीर्ण होगा वही दूसरे से श्रेष्ठ माना जाएगा।'  देवता और असुर दोनों को यह बात बहुत अच्छी लगी और उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक स्थान पर एक लड्डुओं की बहुत बड़ी परात रख दी गई। सर्वप्रथम असुरों को बुलाया गया। उनके हाथों में बड़े चमचे इस तरह बांधे गए कि उनकी डण्डी कोहनी से पीछे निकल गई जिससे कोहनी किसी ओर भी मुड़ नहीं सकती थी। चमचे का आगे का गोल सिरा हाथों से आगे निकला हुआ था। अब उनसे कहा गया कि इन लड्डुओं को एक घंटे के अन्दर-अन्दर खा डालना है। असुर तुंरत उन लड्डुओं पर झपटे और उन्हें अपने मुंह में डालने लगे, लेकिन हाथ तो सीधा खड़ा था। किसी का लड्डू आंख पर, किसी कर गाल पर और किसी का नाक पर गिरा। दो-चार असुर जिनके मुंह बहुत बड़े थे, कुछ लड्डू खा सके। शेष सब एक घण्टा बीत जाने के पश्चात भी यूं ही रखे थे। समय समाप्त हो गया, असुरों को हटा दिया गया और बारी थी देवताओं की। उनके हाथों में भी उसी प्रकार चमचे बांध दिए और उनसे भी एक घण्टे के अन्दर लड्डू खाने के लिए कहा गया। देवताओं ने कुछ क्षण विचार किया और फिर सावधानीपूर्वक लड्डू उठाकर बजाय स्वयं खाने का प्रयास करने के, एक-दूसरे को खिलाने प्रारम्भ कर दिए। एक घण्टे से पहले ही सारे लड्डू समाप्त हो गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवताओं और असुरों के निर्णायक मण्डल ने जिस भगवान [[विष्णु]] ने प्रारम्भ में ही बना दिया था तथा जिसके साथ वे निरंतर बैठे रहे थे ताकि उन पर यह आरोप न आए कि उन्होंने देवताओं को युक्ति बता दी होगी, स्वयं यह निर्णय दिया कि देवता विजयी हुए हैं और असुर परास्त हो गए। तो यह अंतर है श्रेष्ठ और निकृष्ट में, ऊंच और नीच मे, परोपकार और पुण्य में। जो दूसरे का ध्यान रखते हैं, दूसरे के हित में लगे रहते हैं, वे ही बड़े हैं। स्वार्थी और केवल अपने और अपने परिवार तक सीमित लोग अत्यन्त छोटे होते हैं। वे समाज और राष्ट्र के लिए अत्यन्त घातक तथा शत्रुओं के समान ही हैं। अपने लाभ के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। इसलिए [[गीता]] में भगवान श्री[[कृष्ण]] कहते हैं कि जो केवल अपने लिए पकाता है वह तो पाप को ही खाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पुरन्धिं जनय&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सामवेद 861&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; अर्थात बहुत से उत्तम कर्म करने में समर्थ बुद्धि को उत्पन्न करो।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>नारद मोह की कथा</title>
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		<updated>2010-03-03T18:32:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==नारद मोह की कथा / Narad ki Katha==&lt;br /&gt;
[[नारद]] जी ने एक आश्रम में जन्म लिया था । उनकी मां उस आश्रम की सेविका थीं। नारद जी का बचपन ऋषि कुमारों के साथ खेल-कूदकर बीता। ऋषि-महर्षियों के संग ने उनके मन में छुपी हुई आध्यात्मिक जिज्ञासा को जगा दिया और वे भी योग के रास्ते पर चल पड़े। अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने ऋद्धि-सिद्धियां प्राप्त कीं और सदा के लिए अमर हो गए। नारद जी को यह अभिमान हो गया कि उनसे बढ़कर इस [[पृथ्वी]] पर और कोई दूसरा [[विष्णु]] भगवान का भक्त नहीं है। उनका व्यवहार भी इस भावना से प्रेरित होकर कुछ बदलने लगा। वे भगवान के गुणों का गान करने के साथ-साथ अपने सेवा कार्यों का भी वर्णन करने लगे। भगवान से कोई बात छुपी थोड़े ही है। उन्हें तुरंत इसका पता चल गया। भला वे अपने भक्त का पतन कैसे देख सकते थे। इसलिए उन्होंने नारदजी को इस दुष्प्रवृत्ति से बचाने का निर्णय किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन नारद जी और भगवान विष्णु  साथ-साथ वन में जा रहे थे कि अचानक विष्णु जी एक वृक्ष के नीचे थककर बैठ गए और बोले, 'भई नारद जी हम तो थक गए,प्यास भी लगी है। कहीं से पानी मिल जाए तो लाओ। हमसे तो प्यास के मारे चला ही नहीं जा रहो है। हमारा तो गला सूख रहा है।' नारद जी तुंरत सावधान हो गए, उनके होते हुए भला भगवान प्यासे रहें। वे बोले, 'भगवान अभी लाया, आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें।' नारद जी एक ओर के दौड़ लिए। उनके जाते ही भगवान मुस्कराए और अपनी माया को नारद जी को सत्य के मार्ग पर लाने का आदेश दिया। माया शुरू हो गई। नारद जी थोड़ी दूर ही गए होगें कि एक गांव दिखाई पड़ा, जिसके बाहर कुएं पर कुछ युवा स्त्रियां पानी भर रही थीं। कुएं के पास जब वे पहुंचे तो एक कन्या को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठे, बस उसे ही निहारने लगे। यह भूल गए कि वे भगवान के लिए पानी लेने आए थे। कन्या भी समझ गई। वह जल्दी-जल्दी जल से घड़ा भरकर अपनी सहेलियों को पीछे छोड़कर घर की ओर लपकी। नारद जी भी उसके पीछे हो लिए। कन्या तो घर के अंदर चली गई लेकिन नारद जी ने द्वार पर खड़े होकर 'नारायण', 'नारायण' का अलख जगाया । गृहस्वामी नारायण का नाम सुनकर बाहर आया । उसने नारद जी को तुरंत पहचान लिया। अत्यन्त विनम्रता और आदर के साथा वह उन्हें घर के अन्दर ले गया और उनके हाथ-पैर धुलाकर स्वच्छ आसन पर बैठाया तथा उनकी सेवा-सत्कार में कोई कमी न छोड़ी। तब शान्ति के साथ उनके आगमन से अपने को धन्य बताते हुए अपने योग्य सेवा के लिए आग्रह किया। नारदजी बोल, 'आपके घर में जो आपकी कन्या जल का घड़ा लेकर अभी-अभी आई है, मैं उससे विवाह करना चाहता हूं।' गृहस्वामी एकदम चकित रह गया लेकिन उसे प्रसन्नता भी हुई कि मेरी कन्या एक ऐसे महान योगी तथा संत के पास जाएगी। उसने स्वीकृति प्रदान कर दी और नारद जी को अपने घर में ही रख लिया। दो-चार दिन पश्चात शुभ मुहूर्त ने अपनी कन्या का विवाह नारद जी के साथ कर दिया तथा उन्हें ग्राम में ही उतनी धरती का टुकड़ा दे दिया कि खेती करके वे आराम से अपना पेट भर सकें। अब नारद जी की वीणा एक खूंटी पर टंगी रहती जिसकी ओर उनका ध्यान बहुत कम जाता। अपनी पत्नी के आगे नारायण को वे भूल गए। दिन भर खेती में लगे रहते ।कभी हल चलाते, कभी पानी देते, कभी बीज बोते, कभी निराई-गुड़ाई करते। जैसे-जैसे पौधे बढ़ते उनकी प्रसन्नता का पारावार न रहता। फसलें हर वर्ष पकतीं, कटतीं, अनाज से उनके कोठोर भर जाते । नारद जी की गृहस्थी भी बढ़ती गई। तीन-चार लड़के-लड़कियां भी हो गए। अब नारद जी को एक क्षण भी फुरसत न थी। वे हर समय उनके पालन-पोषण तथा पढ़ाई-लिखाई में लगे रहते अथवा खेती में काम करते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अचानक एक बार वर्षा के दिनों में तेज बारिश हुई। कई दिनों तक बंद होने का नाम ही नहीं लिया। बादलों की गरज और बिजली की कड़क ने सबके ह्दय में भय उत्पन्न कर दिया। मूसलाधार वर्षा ने ग्राम के पास बहने वाली नदी में बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी। किनारे तोड़कर नदी उफन पड़ी। चारों ओर पानी ही पानी कच्चे-पक्के सभी मकान ढहने लगे। घर का सामान बह गया। पशु भी डूब गए। अनेक व्यक्ति मर गए। गांव में त्राहि-त्राहि मच गई। नारद जी अब क्या करें। उन्होंने भी घर में जो कीमती थोड़ा-बहुत सामान बचा था उसकी गठड़ी-मुठरी बांधी और अपनी पत्नी तथा बच्चों को लेकर पानी में से होते हुए जान बचाने के लिए घर से बाहर निकले। बगल में गठरी, एक हाथ से एक बच्चे का पकड़े, दूसरे से अपनी स्त्री को संभाले तथा पत्नी भी एक बच्चे को गोद में लिए, एक का हाथ पकड़े धीरे-धीरे आगे बढ़े। पानी का बहाव अत्यन्त तेज था तथा यह भी पता नहीं चलता था कि कहां गड्ढा है और कहां टीला। अचानक नारद जी ने ठोकर खाई और गठरी बगल से निकलकर बह गई। नारद जी गठरी कैसे पकड़ें, दोनों हाथ तो घिरे थे। सोचा जैसा उसकी इच्छा फिर कमा लेंगे। कुछ दूर जाने पर पत्नी एक गड्ढे में गिर पड़ी ओर गोद का बच्चा बह गया। पत्नी बहुत रोई, लेकिन क्या हो सकता था, धीरे-धीरे और दो बच्चे भी पानी में बह गए, बहुत कोशिश की उन्हें बचाने की, लेकिन कुछ न हो सका। दोनों पति-पत्नी बड़े दुखी, रोते, कलपते, एक-दूसरे को सात्वना देते, आगे कोई ऊंची जगह ढूंढते बढ़ते रहे। एक जगह आगे चलकर दोनों एक गड्ढे समा गए। नारद जी तो किसी प्रकार के गड्ढे में से निकल आए, लेकिना उनकी पत्नी का पता नहीं चला । बहुत देर तक नारदजी उसे इधर से उधर दूर-दूर तक ढूंढ़ते रहे लेकिन व्यर्थ, रोते-रोते उनका बुरा हाल था, ह्दय पत्नी और बच्चों को याद कर करके फटा जा रहा था । उनकी तो सारी गृहस्थी उजड़ गई थी। बेचारे क्या करें, किसे कोसें अपने भाग्य को या भगवान को। भगवान का ध्यान आते ही नारद जी के मस्तिष्क में प्रकाश फैल गया और पुरानी सभी बातें याद आ गई। वे किसलिए आए थे और कहां फंस गए। ओ हो! भगवान [[विष्णु]] तो उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। वे तो उनके लिए जल लेने आए थे और यहां गृहस्थी बसाकर बैठ गए। वर्षो बीत गए, गृहस्थी को बसाने मे और फिर सब नष्ट हो गया। क्या भगवान अब भी मेरी प्रतीक्षा में उसी वृक्ष के नीचे बैठे होंगे। यह सोचते ही बाढ़ नदारद हो गई। गांव भी अतंर्धान हो गया। वे तो घने वन में खड़े थे। नारद जी पछताते और शरमाते हुए दौड़े, देखा कुछ ही दूर पर उसी वृक्ष के नीचे भगवान लेटे हैं। नारद जी को देखते ही वे उठ बैठे और बोले, 'अरे भाई नारद, कहां चले गए थे, बड़ी देर लगा दी । पानी लाए या नहीं।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारद जी भगवान के चरण पकड़कर बैठ गए और लगे अश्रु बहाने। उनके मुंह से एक बोल भी न फटा। भगवान मुस्कराए और बोल, 'तुम अभी तो गए थे। कुछ अधिक देर थोड़े ही हुई है।' लेकिन नारद जी को लगता है कि वर्षों बीत गए। अब उनकी समझ में आया कि सब भगवान की माया थी, जो उनके अभिमान को चूर-चूर करने के लिए पैदा हुई थी। उन्हें बड़ा घमण्ड था कि उनसे बढ़कर त्रिलोक में दूसरा कोई भक्त नहीं है। जरा सी देर में ढेर हो गया। वे पुनः सरलता और विनय के साथ भगवान के गुण गाने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हमारे पास कुछ है, हमने अथक परिश्रम, लगन तथा निष्ठा से कुछ प्राप्त कर लिया है चाहे वह अपार धन हो, शारीरिक शक्ति हो, भरा-पूरा परिवार हो या फिर कोई ऊंची योग्यता, पद या यश हो तो उस पर घमण्ड क्यों करें। क्या हमसे ऊपर और लोग नहीं हैं? क्या हम ही सर्वोपरि हैं? अनेक हमसे पहले हो चुके हैं और आगे भी होगें फिर घमण्ड कैसा। अपनी इस विशेषता से अपना और दूसरों का लाभ होने दें तभी उसका कुछ महत्व है अन्यथा वह तो कोयले की बोरी के समान है जो आपके स्टोर मे व्यर्थ में ही बिना उपयोग में आए रखी है। इकट्ठा करने में नहीं बांटने में सुख है, आनन्द है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सं किर&amp;lt;balloon title=&amp;quot;अथर्ववेद-3/24/5&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सैकड़ों हाथों से इकट्ठा करो और हजारों हाथों से बांटो।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>आरुणि उद्दालक की कथा</title>
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		<updated>2010-03-03T15:43:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==आरूणि उद्दालक की कथा / Story of Aaruni Uddalak==&lt;br /&gt;
महर्षि [[धौम्य]] वन में आश्रम बनाकर रहा करते थे । वे बहुत ही विद्वान महापुरूष थे । [[वेद|वेदों]] पर उनका पूरा अधिकार था तथा अनेक विद्याओं में वे पारंगत थे । दूर-दूर से उनके आश्रम में बालक पढ़ने के लिए आया करते थे और शिक्षा प्राप्त करके अपने-अपने स्थानों पर लौट जाते थे। ऋषि धौम्य के आश्रम में आरूणि नाम का एक शिष्य भी था । वह गुरू का अत्यन्त आज्ञाकारी शिष्य था । सदा उनके आदेश का पालन करने में तत्पर रहता था । यद्यपि वह अधिक  कुशाग्र बुद्धि नहीं था परन्तु इस आज्ञाकारिता के गुण के कारण वह ऋषि धौम्य का प्रिय शिष्य था । एक दिन बड़े जोर की वर्षा हुई, जो लगातार बहुत देर तक होती रही । आश्रम में एक उसके चारों ओर पानी ही पानी हो गया । आश्रम के चारों ओर आश्रम के खेत थे जिनमें अन्न तथा साग-सब्जी उगी हुई थी । वर्षा की दशा देखकर ऋषि को यह चिन्ता हुई कि कहीं खेतों में अधिक पानी न भर गया हो । यदि ऐसा हो गया तो सभी फसल नष्ट हो जाएंगी । उन्होंने आरूणि को अपने पास बुलाया और उससे कहा कि वह जाकर देखे कि खेतों में कहीं अधिक पानी तो नहीं भर गया । कोई बरहा (नाली) तो पानी के जोर से नहीं टूट गया है । यदि ऐसा हो गया है तो उस जाकर बंद कर दें । आरूणि तुंरत फावड़ा लेकर चल दिया । वर्षा जोरों पर थीं पर उसने इसकी कोई चिन्ता न की । वह सारे खेतों में बारी-बारी से घूमता रहा । एक जगह उसने देखा कि बरहा टूटा पड़ा है और पानी बड़े वेग के साथ खेत में घूस रहा है । वह तुंरत उसे रोकने में लग गया । बहुत प्रयास किया परन्तु बरहा बार-बार टूट जाता था । जितनी मिट्टी वह डालता सब बह जाती । काफी देर संघर्ष करते हो गई लेकिन पानी को आरूणि नहीं रोक पाया । उसे गुरू के आदेश का पालन करना था चाहे कुछ भी हो । जब थक गया तो एक उपाय उसकी समझ में आया, वह स्वंय उस टूटी हुई मेंड़ पर लेट गया अब उसके बहने का तो प्रश्न ही नहीं था । पानी बंद हो गया और वह चुपचाप वहीं लेटा रहा । धीरे-धीरे वर्षा कम होने लगी, लेकिन पानी का बहाव अभी वैसा ही था, इसलिए उसने उठना उचित नहीं समझा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इधर, गुरू को चिंता सवार हूई । आखिर इतनी देर हो गई आरूणि कहां गया । उन्होंने अपने सभी शिष्यों से पूछा, लेकिन किसी को भी आरूणि के लौटने का ज्ञान नहीं था । तब ऋषि धौम्य कुछ शिष्यों को साथ लेकर खेतों की ओर चल दिए । वे जगह-जगह रूक कर आरूणि को आवाज लगाते लेकिन कोई उत्तर न पाकर आगे बढ़ जाते । एक जगह जब उन्होंने पुनः आवाज लगाई, 'आरूणि तुम कहां हो?' तो आरूणि ने उसे सुन लिया, लेकिन वह उठा नहीं और वहीं से लेटे-लेटे बोला, 'गुरूजी मैं यहां हूं।' गुरू और सभी उसकी आवाज की ओर दौड़े और उन्होंने पास जाकर देखा कि आरूणि पानी में तर-बतर और मिट्टी में सना मेंड़ पर लेटा हुआ है । गुरू कर दिल भर आया । आरूणि की गुरू भक्ति ने उन्हें हिलाकर रख दिया । उन्होंने तुरंत उसे उठने की आज्ञा दी और गद् गद होकर अपने सीने से लगा लिया । सारे शिष्य इस अलौकिक दृश्य को देखकर रोमांचित हो गए । उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे । वे आरूणि को अत्यन्त सौभाग्यशाली समझ रहे थे, जो गुरूजी के सीने  से लगा हुआ रो रहा था ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरू ने उसके अश्रु अपने हाथ से पीछे और बोले,'बेटे, आज तुमने गुरू भक्ति का एक अपूर्व उदाहरण किया है, तुम्हारी यह तपस्या और त्याग युगों-युगों तक याद किया जाएगा । तुम एक आदर्श शिष्य के रूप में सदा याद किए जाओगे तथा अन्य छात्र तुम्हारा अनुकरण करेंगे । मेरा आर्शीवाद है कि तुम एक दिव्य बुद्धि प्राप्त करोगे तथा सभी शास्त्र तुम्हें प्राप्त हो जाएंगे । तुम्हें उनके लिए प्रयास नहीं करना पड़ेगा । आज से तुम्हारा नाम उद्दालक के रूप में प्रसिद्ध होगा अर्थात जो जल से निकला उत्पन्न हुआ और यही हुआ।’ आरूणि का नाम उद्दालक के नाम से प्रसिद्ध हुआ और सारी विद्याएं उन्हें बिना पढ़े, स्वंय ही प्राप्त हो गई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शिवा नः सन्तु वार्षिकीः&amp;lt;balloon title=&amp;quot;अथर्ववेद-1/6/4&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें वर्षा द्वारा प्राप्त जल सुख दे ।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
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[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>वरुणदेव का वरदान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=5967"/>
		<updated>2010-03-03T15:14:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: नया पन्ना:  ==वरूण देव का वरदान / Blessing of Varun== मां−बाप के मर जाने पर त्र…&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==वरूण देव का वरदान / Blessing of Varun==&lt;br /&gt;
मां−बाप के मर जाने पर त्रिलोकनाथ अनाथ हो गया। परिवार में अब केवल बड़ा भाई आलोक बचा था जो उससे द्वेष रखता था, क्योंकि वह सौतेला था। आलोक शादी−शुदा था। उसकी पत्नी उसके कहने में चलती थी और पति की भांति वह भी त्रिलोकनाथ से कोई खास स्नेह नहीं रखती थी। अतः त्रिलोक को रूखा−सूखा जो कुछ भी मिलता, वह उसी में संतोष कर लेता था। आलोक और उसकी पत्नी आराम से रहते, खाते−पीते और मौज करते थे, जबकि त्रिलोक दिन−भर घर का काम करता, जानवरों को चारा−पानी देता और बाकी समय खेतों में जुटा रहता। फिर भी वह भर पेट भोजन नहीं पाता था। इस पर भी वह संतोषी इतना था कि किसी से कोई शिकवा−शिकायत नहीं करता था। कुछ दिन बाद आलोक ने उसका विवाह कर दिया और जायदाद का बंटवारा करके उसे अपने से अलग कर दिया। दोनों भाई अलग−अलग गृहस्थी चलाने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आलोक ने मां−बाप की एकत्रित की गई धनराशि का बड़ा हिस्सा पहले ही हथिया लिया था। चालाक और लोभी तो वह था ही, अतः जायदाद में अच्छी और कीमती जमीन उसने ले ली थी, जबकि त्रिलोक के हिस्से में बंजर जमीन और बेकार की चीजें ही आईं। फिर भी वह कुछ नहीं बोला। जो कुछ मिला, उसे लेकर प्रसन्न मन से अलग रहने लगा। आलोक ने तो बंटवारे में भी छल−कपट से काम लिया था, अतः उसका घर सम्पन्न था। सुख−सुविधा की हर वस्तु उसके घर में मौजूद थी। वह अच्छा खाता−पहनता था और लेन−देन का धंधा भी करता था। इस प्रकार उसका धन दिन−प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। दूसरी ओर त्रिलोक मेहनत−मजदूरी करके अपना पेट पाल रहा था। आलोक दिन−प्रतिदिन अमीर होता जा रहा था और त्रिलोक गरीब। घर की आवश्यकता को पूरा करने के लिए उसे जब−तब त्रिलोक के आगे हाथ फैलाना पड़ता था। जिसका परिणाम यह निकला कि कुछ ही वर्षों में त्रिलोक की सारी जमीन आलोक के यहाँ गिरवी हो गई। गाँव के दूसरे लोगों का भी बहुत−सा कर्ज उस पर चढ़ गया था। अब वह नित्य मजदूरी करता और उसी से घर का खर्च चलाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी ओर आलोक ने नया पक्का मकान बनवा लिया था। नए बैल खरीदे और गाड़ी भी ले आया था। उसकी पत्नी हमेशा जेवरों से लदी रहती थी। इस प्रकार आलोक के यहाँ हर प्रकार की मौज थी। कमी थी तो बस एक, कि आलोक के घर कोई संतान नहीं थी। इसके लिए उसने कई मन्नतें मांगी, मनौतियाँ बोलीं; लेकिन शायद उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का ही यह प्रभाव था कि उसके घर−आंगन में किसी बच्चे की किलकारियाँ न गूंज सकीं। अतः कुछ तो सम्पत्ति का प्रभाव, कुछ बेऔलाद होने का दुःख और कुछ धन के अहंकार में आलोक और भी रूखा, झगड़ालू, लालची और कंजूस हो गया था। वह संसार भर की दौलत बटोरकर अपने घर में भर लेने का सपना देखा करता था। कंजूस इतना था कि उसके घर से न कुत्ते को टुकड़ा मिलता था, न किसी भिखारी को भीख। इसके विपरीत त्रिलोक उदार, दयालु, परोपकारी और सरल स्वभाव का था। लड़ाई−झगड़े और बेईमानी से कोसों दूर वह सबकी सेवा के लिए तैयार रहता था। गांव के लोग उसे बहुत चाहते थे। दोनों भाइयों में जमीन−आसमान का अंतर था। आलोक किसी के दुःख में तो क्या, घमंड की वजह से किसी के सुख में भी शामिल होकर राजी न था, जबकि तिरलोक की प्रवृत्ति ऐसी थी कि एक बार किसी के सुख में भले ही न जाए, परंतु दुःख में अवश्य शरीक होता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन त्रिलोक दोपहर को खेतों से काम निपटाकर घर पर लौट रहा था। रास्ते में एक तालाब था। गरमी तो थी ही, अतः त्रिलोक ने सोचा, यहीं नहा लूं। यही सोचकर उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर एक किनारे रख दिया और तालाब में घुस गया। दोपहर का समय होने के कारण आस−पास कोई न था। तालाब में कमल खिले हुए थे। नहाते−नहाते त्रिलोक ने सोचा कि क्यों न दो−चार फूल तोड़ लूं, घर जाते समय मंदिर में चढ़ा दूंगा। गाँव में [[वरूण]] देवता का एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग बड़ी श्रद्धा से वहाँ पूजा करने जाते थे। त्रिलोक जब फूल तोड़ रहा था, तभी उसकी निगाह एक कली पर पड़ी। वह सोने की तरह चमक रही थी। उत्सुकता में आकर त्रिलोक ने उसे तोड़ लिया। उसके हाथ में आते ही वह कली फूल बन गयी। लेकिन वह फूल साधारण न होकर सोने का फूल था−ठोस और असली। त्रिलोक दंग रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि यह कैसी और किसकी लीला है और अब उसे करना करना चाहिए? ठीक तभी एक बहुत सुंदर मनुष्य जल में प्रकट हुआ और त्रिलोक के पास आकर बोला, 'त्रिलोक! यह फूल मुझे दे दो।' त्रिलोक ने उस अद्भुत मनुष्य की ओर देखते हुए पूछा, 'क्यों? आप कौन हैं? यह सुंदर फूल मैं आपको क्यों दूं?' 'मैं वरूण हूँ। इस तालाब में रोज एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरूष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरूण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरूण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरूण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'तथास्तु!' कहकर वरूण देवता अंतर्ध्यान हो गए। झटका खाकर गहरी नींद से जागे हुए व्यक्ति की तरह त्रिलोक इधर−उधर देखने लगा। कहीं भी कोई न था। था तो केवल वह तालाब, वही कमल के फूल और पत्ते। लेकिन वरूण देवता या उस सोने के फूल का कहीं कोई चिह्न न था। त्रिलोक सोचने लगा कि कहीं जागती आँखों से वह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा था। किंतु नहीं, अभी−अभी उसके हाथ में सोने का फूल था और स्वयं वरूण देवता उससे मुखातिब थे। 'हे भगवान! क्या होने वाला है?' इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ तिरलोक कंधे पर लकड़ियों का गट्ठर लादकर घर की ओर चल पड़ा। दूसरे दिन जैसे कोई चमत्कार होने लगा। त्रिलोक जिस काम में हाथ डालता, उसमें दोगुना नहीं, बल्कि दसियों गुना लाभ होता। उसके घर में सारी चीजें न जाने कैसे बढ़ जाती थीं। कोई भी वस्तु कम नहीं पड़ती थी। चाहे जितना खर्च किया जाता, सामान बच ही जाता था। खेतों की पैदावार तो इतनी बढ़ी कि कहीं अनाज रखने की जगह नहीं बची। बहुत−सा धान और अनाज त्रिलोक ने गाँव वालों को बाँट दिया। इतने पर भी घमंड उससे कोसों दूर था। वह तो किसी से ऊँची आवाज में बात भी नहीं करता था। बँटवारे के समय आलोक ने बेईमानी के कारण बाप का बहुत−कर्ज बता रखा था। उसका आधा हिस्सा त्रिलोक को भरना पड़ता था। इन दिनों जब वह सम्पन्न हुआ तो महाजन के पास जाकर अपने और आलोक के हिस्से का भी पूरा कर्ज अदा कर आया। गाँव के कितने ही गरीबों को वह अनाज व कपड़े बाँट देता था। यहाँ तक कि दूसरे गाँवों के लोग भी उससे सहायता लेने लगे। इस प्रकार त्रिलोक की कीर्ति दिनों−दिन बढ़ती जा रही थी। चारों ओर उसकी सहृदयता के चर्चे सुनाई देते थे। आलोक ने यह सब देखकर सोचा, 'क्या त्रिलोक को कोई खजाना मिल गया है? तभी तो वह इस तरह दिल खोलकर रूपया लुटा रहा है। खुद तो मौज मार ही रहा है, दूसरों पर भी धन लुटा रहा है। लगता है, उसने बापू की कोई रकम पहले से ही चुरा रखी थी। जिसका मुझे पता नहीं है और अब इतने दिनों बाद उसे निकालकर मौज कर रहा है। किंतु मैं भी खामोश बैठने वाला नहीं हूँ। मैं यह रहस्य जानकर ही रहूँगा कि उसके पास इतना धन कहाँ से आया।' और फिर दूसरे ही दिन वह त्रिलोक के पास जा पहुँचा। त्रिलोक ने दिल खोलकर उसकी खातिरदारी की। त्रिलोक की पत्नी ने भी उसके आदर से चरण स्पर्श किए। उसके पश्चात त्रिलोक ने पूछा, 'मेरी याद कैसे आ गई भैया?' 'देखो तिरलोक!' आलोक ने कहा, 'तुम मुझे सच−सच बता दो कि तुम इतना सारा धन कहाँ से लाए हो? तुम्हें कहीं से कोई खजाना मिल गया है या बापू की कोई रकम तुम छिपाए हुए थे?' भोले त्रिलोक ने बैर−विरोध भूलकर सारी घटना सच−सच सुना दी कि किस प्रकार वरूण देव ने उसे वरदान दिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरूण देवता के वरदान की बात सुनकर आलोक ने कहा, 'अच्छा! तो यह बात है।' फिर चुपचाप वह वहाँ से चला आया और घर आते−आते उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि कल मैं भी तालाब पर जाकर वरूण देवता से वरदान प्राप्त करूंगा। दूसरे दिन ठीक दोपहर के समय आलोक तालाब के किनारे जा पहुँचा। इधर−उधर कोई न था। उसने जल्दी−जल्दी वस्त्र उतारे और तालाब में जा घुसा। कुछ देर तक तो वह नहाने का नाटक करता रहा, फिर कमल तोड़ने लगा। एकाएक उसे सोने की कली दिखाई पड़ी। उसकी आँखें फैल गईं−'अरे! इसका मतलब त्रिलोक ने जो बताया, सब सच था।' सोचते हुए उसने लपककर वह कली तोड़ ली। आलोक के कली तोड़ते ही वरूण देवता ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और कहने लगे, 'आलोक! यह फूल मेरी पूजा का है। मुझे दे दो।'&lt;br /&gt;
आलोक ने देखा, उस देवता का रंग−रूप ठीक वैसा ही है जैसा त्रिलोक ने उसे बताया था। तब अवश्य ही यह वरूण देवता हैं। किंतु उसके मन में किसी−भी प्रकार का भक्ति−भाव उत्पन्न नहीं हुआ। लोभ से उतावली उसकी बुद्धि यह सोच रही थी कि मुझे इनसे कौन−सा वरदान माँगना चाहिए?' तब तक वरूण देवता ने फिर कहा, 'लाओ आलोक! मेरा फूल मुझे दे दो। पूजा के लिए देर हो रही है।' आलोक हौले से चौंका फिर संभलकर बोला, 'पहले मुझे कोई वरदान तो दीजिए। बिना वरदान पाए मैं फूल नहीं दूँगा।' वरूण देवता को उसका व्यवहार पसंद नहीं आया। वे समझ गए कि यह व्यक्ति लालची है। अवश्य ही यह अपने भाई त्रिलोक की कहानी जानकर यहाँ आया है ताकि उसकी भाँति मुझसे कोई वर पा सके। अतः वे बड़े ही रूखे स्वर में बोले, 'बोलो, कौन−सा वरदान चाहते हो?' आलोक चालाक था। इतनी देर में उसने वरदान सोच लिया था। वह बोला, 'मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं जो कुछ चाहूं, जो भी सोचूं, जैसी भी इच्छा करूं; वह सब पूर्ण हो जाए।' 'ठीक है। ऐसा ही होगा। लाओ, अब फूल मुझे दो।' 'लीजिए' आलोक ने खुशी−खुशी फूल उन्हें दे दिया। वरूण देवता अंतर्ध्यान हो गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आलोक जल्दी से सरोवर से निकला और लंबे−लंबे डग भरता हुआ गाँव की ओर चल दिया। वरूण देवता के वरदान का लाभ उठाने के लिए वह बेचैन हो रहा था। जैसे−तैसे घर पहुंचकर उसने अपनी पत्नी से कहा, 'मैं वरूण देवता से वरदान प्राप्त कर चुका हूँ। यदि वह सच्चा निकला तो मेरी बराबरी दुनिया में कोई नहीं कर सकेगा। आओ, वरूण देवता के वरदान की आजमाइश करते हैं। बोलो, क्या माँगें?' 'आप ही माँगिए। वरूणदेव ने आपको ही वरदान दिया है।' 'ठीक है, मैं ही माँगता हूँ।' आलोक बोला, फिर मन ही मन में उसने कहा, 'मैं थाली भर मिठाई चाहता हूँ।'&lt;br /&gt;
तुरंत मिठाई आ गई। अब पति−पत्नी की प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही न रहा। दोनों ने पेट−भर मिठाई खाई। उसके बाद आलोक ने जेवर, कपड़े और मकान की इच्छा की। वे सब इच्छाएँ भी क्षण भर में पूरी हो गईं। अब तो आलोक अपने को साक्षात [[विष्णु]] और [[इंद्र]] समझने लगा। पलक झपकते ही वह साधारण किसान से [[कुबेर]] हो गया था। अब तो संसार−भर की सारी सहूलियतें उसकी मुट्ठी में थीं। लोभी और अहंकारी तो वह था ही, ये सब पाकर उसका लोभ और अहंकार और भी बढ़ गया। घमंड ने उसकी बुद्धि को और अधिक भ्रष्ट कर दिया और इतना वैभव पाकर भी उसने वरूण देवता को धन्यवाद नहीं दिया। उसी शाम को आलोक की पत्नी त्रिलोक के घर गई ताकि अपने वैभव का बखान करके उस पर रोब जमा सके। लौटते समय अँधेरा हो गया। जब वह घर आई तब आलोक बाहर बरामदे में ही बैठा था। अँधेरे के कारण ठीक से दिखाई नहीं पड़ रहा था इसलिए आलोक उसे पहचान न सका। यह सर्वविदित है कि जिसके मन में कपट और चोर होता है, वह हमेशा उलटी बातें ही सोचता है। उसे देखकर आलोक भी सोचने लगा−'अरे, इतना मोटा, इतना काला आदमी कौन है? कहीं यह कोई भूत−प्रेत तो नहीं है?' ऐसा सोचते वक्त उसे बिलकुल भी ध्यान नहीं रहा कि उसने वरूणदेव से क्या वरदान माँगा था। उसने कहा था कि जो भी चाहूँ, जो भी सोचूं, जो भी करूं; वह पूर्ण हो जाए। फलस्वरूप ऐसा सोचते ही उसकी पत्नी तुरंत प्रेत बन गई। उसे भीतर की ओर आते देखकर आलोक ने सोचा, 'अरे, यह तो अंदर आ रहा है। ऐसा न हो कि यह मुझे पकड़ ले।' आलोक का ऐसा सोचना था कि तुरंत प्रेत ने उसे पकड़ लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भय की वजह से आलोक साँस तक न ले सका। उसकी घिग्घी बंध गई। होश−हवास गायब हो गए। उस पर दहशत इस कदर हावी हुई कि वह चीखना−चिल्लाना भी भूल गया। आँखें आतंक से फट पड़ीं और उसे जान पड़ा कि प्रेत बस, उसे निगलने ही वाला है। और दूसरे ही क्षण प्रेत उसे निगलकर अदृश्य हो गया। वरूण देवता के वरदान से प्राप्त सारा वैभव ज्यों का त्यों पड़ा था। पर उसको प्राप्त करने वाला आलोक प्रेत का आहार बन चुका था। रात भर किसी को मालूम नहीं हुआ कि आलोक के घर में कैसी भयानक घटना घट चुकी है। सवेरे लोगों ने देखा कि दरवाजे में आलोक और उसकी पत्नी की ठिठरी हुई लाशें पड़ी हुईं थीं, मगर क्या हुआ? कैसे हुआ? यह सब कोई भी नहीं जान सका। बेचारे त्रिलोक को भी जब इस घटना का पता चला, तो भाई और भाभी की मौत पर वह भी बेहद दुःखी हुआ। परंतु अब किया भी क्या जा सकता था। रो−रोकर उसने अपने भाई व भाभी का क्रियाकर्म किया और अंत में वही सम्पूर्ण सम्पत्ति का स्वामी बना।&lt;br /&gt;
उसी रात वरूण देवता ने उसे स्वप्न में आलोक के सर्वनाश का कारण बताते हुए कहा, 'आलोक को दिया हुआ वरदान मैं तुम्हें भी दे सकता हूँ। बोलो, चाहते हो?' त्रिलोक ने उनके चरणों में सिर रख दिया और कहा, 'स्वामी! मुझे आपने पहले जो कुछ दिया है, वही बहुत है। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मैं अपने भाई की सम्पत्ति भी नहीं चाहता। सुबह होते ही मैं इस सारी सम्पत्ति को गरीबों और जरूरतमंदों में दान कर दूँगा। मुझे तो जो कुछ भी आपने दिया है, मैं उसी में खुश और संतुष्ट हूँ।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'सदा सुखी रहो' कहकर वरूण देवता ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा और अदृश्य हो गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिलोक की नींद टूट गई। चौंककर उठ बैठा वह। देखा, पूरब में ऊषा की लाली छा रही थी। वह उठा और वरूण देवता को प्रणाम करने के लिए सीधे मंदिर की ओर चल पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>लक्ष्मी की महिमा</title>
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		<updated>2010-03-03T14:45:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: नया पन्ना:  ==लक्ष्मी की महिमा / Glory of Laxmi== एक दिन लक्ष्मी जी की बड़ी बहन ज्येष…&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==लक्ष्मी की महिमा / Glory of Laxmi==&lt;br /&gt;
एक दिन [[लक्ष्मी]] जी की बड़ी बहन ज्येष्ठा ने उनसे कहा, 'बहुत दिनों से एक बात मेरे मस्तिष्क में कौंध रही है। सोचती हूँ कि तुमसे पूछूं या नहीं।' 'ऐसी क्या बात है बहन? मन में जो कुछ भी है, निःसंकोच पूछो। वैसे भी कोई बात मन में न रखकर उसका समाधान कर लेना ही बुद्धिमानी है।' लक्ष्मी जी ने मुस्कराकर कहा। 'मैं अक्सर यही सोचती रहती हूँ कि सुंदरता में हम दोनों बराबर हैं, फिर भी लोग तुम्हारा आदर करते हैं और मैं जहाँ भी जाती हूँ, वहाँ उदासी छा जाती है। मुझे लोगों की घृणा और क्रोध का शिकार होना पड़ता है जबकि हम दोनों सगी बहनें हैं। ऐसा क्यों?' लक्ष्मी जी ने हँसकर कहा, 'सगी बहन या समान सुंदरता होने से ही आदर नहीं मिलता। उसके लिए अपने को भी कुछ करना चाहिए। लोग मेरा आदर इसलिए करते हैं क्योंकि मैं उनके घर पहुँचते ही सुख के साधन जुटा देती हूँ। सम्पत्ति और वैभव से आनंदित होकर लोग मेरा उपकार मानते हैं, तभी मेरी पूजा करते हैं। उधर, तुम्हारा यह हाल है कि जिसके यहाँ भी तुम जाती हो; उसको गरीबी, रोग और आपदा सहनी पड़ती है। इसी वजह से लोग तुमसे घृणा करते हैं। कोई आदर नहीं करता। आदर पाना है तो दूसरों को सुख पहुँचाओ।' ज्येष्ठा को लक्ष्मी जी की बात चुभ गई। उन्हें लगा कि लक्ष्मी को अपनी महिमा का अभिमान हो गया है। उन्होंने तड़प कर कहा, 'लक्ष्मी! तुम मुझसे हर बात में छोटी हो−अवस्था में भी और प्रभाव में भी। मुझे उपदेश देने का भी विचार न करो। अगर तुम्हें अपने वैभव का अहंकार है तो मेरे पास भी अपना एक प्रभाव है। मैं जब अपनी पर आ जाऊँ तो तुम्हारे करोड़पति भक्त को भी पल भर में भिखारी बना दूँ।'&lt;br /&gt;
लक्ष्मी जी को हँसी आ गई और कहने लगीं, 'बहन! तुम बड़ी हो, इसलिए कुछ भी कह लो। लेकिन जहाँ तक प्रभाव की बात है, मैं तुमसे कम नहीं हूँ। जिसको तुम भिखारी बनाओगी, उसे मैं दूसरे दिन रंक से फिर राजा बना दूँगी। मेरी महिमा का अभी तुम्हें पता ही कहाँ है।' 'और तुम्हें भी मेरी महिमा का पता ही नहीं है। जिसकी तुम सहायता करोगी, उसे मैं दाने−दाने के लिए भी मोहताज कर दूँगी।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'देखो बहन! दाने−दाने के लिए तो तुम उसे मोहताज कर सकती हो जिससे मैं रूठ जाऊँ। जिसके सिर पर मेरा वरदहस्त न हो, उसका तुम कुछ भी बिगाड़ सकती हो। परंतु जिस पर मेरी कृपादृष्टि है, उसका कोई भी बाल तक बांका नहीं कर सकता। अगर तुम अपना प्रभाव दिखाने को इतनी ही उतावली हो रही हो तो कल अपना प्रभाव दिखाकर देख लेना।' 'ठीक है। बोलो, कहाँ चलें?' 'दूर क्यों जाएँ, पास ही अनुराधापुर है। उसमें एक ब्राह्मण रहता है−दीनानाथ। वह रोज मंदिर में पूजा करने जाता है और मेरा पक्का भक्त है। उसी पर हमें अपनी−अपनी महिमा दिखानी है।'&lt;br /&gt;
ज्येष्ठा को ताव आ गया। उन्होंने हाथ झटककर कहा, 'ठीक है, ठीक है। देख लेना, कल तुम्हारा सिर ही झुक जाएगा।' कहकर वह एक ओर चली गई। लक्ष्मी जी वहीं खड़ी बहन के क्रोध ओर अहंकार पर मुस्कराती रहीं। दूसरे दिन दोनों बहनें अनुराधापुर के [[विष्णु]] मंदिर में पहुँचीं। उन्होंने वेश बदल रखा था। साधारण स्त्रियों की तरह वे दोनों मंदिर के द्वार पर बैठ गईं। लोगों ने देखा अवश्य, किंतु किसी ने उनकी ओर कोई खास ध्यान नहीं दिया। ध्यान देने वाली कोई खास बात थी भी नहीं। वह मंदिर था और वहाँ हर रोज दीन दुःखी आते−जाते रहते थे। वहाँ आने वाले सभी किसी न किसी परेशानी में घिरे रहते थे। फिर भला उन्हें किसी दूसरे की परेशानी से क्या सरोकार हो सकता था। थोड़ी देर बाद वहाँ दीनू पंडित आया। दोनों बहनों की नजरें उस पर जम गईं। पूजा करके जब वह लौटने लगा तो ज्येष्ठा ने कहा, 'लक्ष्मी! वह तुम्हारा भक्त आ रहा है। बन पड़े तो कोई सहायता करो।' 'हाँ, करती हूँ।' कहकर लक्ष्मी जी ने एक पोला बांस दीनू के रास्ते में रख दिया जिसमें मोहरें भरी हुई थीं। ज्येष्ठा ने बांस को छूकर कहा, 'अब तुम मेरा प्रभाव भी देख लेना।' पूजा करके लौट रहे दीनू ने रास्ते में पड़ा हुआ वह बांस का टुकड़ा उठा लिया। उसका विचार था कि वह किसी काम आ जाएगा। घर में सौ जरूरतें होती हैं। अभी वह पंडित कुछ ही आगे बढ़ा था कि उसे एक लड़का मिला। लड़के ने पहले पंडित जी से राम−राम की, फिर बड़ी ही नम्रता से बोला, 'पंडित जी! मुझे अपनी चारपाई के लिए बिल्कुल ऐसा ही बांस चाहिए। दादा जी ने यह कहकर भेजा है कि जाओ, बाज़ार से ले आओ। ऐसा बांस पंडित जी कहाँ मिलेगा?'&lt;br /&gt;
दीनू ने कहा, 'मैंने मोल नहीं लिया। रास्ते में पड़ा था; सो उठा लाया। लो, तुम्हें जरूरत है तो तुम ही रख लो। वैसे बाज़ार में एक रूपये से कम का नहीं है।' लड़के ने चवन्नी देते हुए कहा, 'मगर मेरे पास तो यह चवन्नी ही है, पंडित जी। अभी तो आप इसे ही रखिए, बाकी बारह आने शाम को दे जाऊँगा।' पंडित जी खुश थे कि बिना किसी हील−हुज्जत के रूपया कमा लिया। दीनू पंडित ने चवन्नी लेकर बांस लड़के को दे दिया और वह चवन्नी अपनी डोलची में रख दी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मंदिर के पास खड़ी दोनों देवियाँ यह सारी लीला देख रही थीं। ज्येष्ठा ने कहा, 'लक्ष्मी! देखा तुमने? तुम्हारी इतनी सारी मोहरें मात्र एक चवन्नी में बिक गईं। और अभी क्या, यह चवन्नी भी तुम्हारे भक्त के पास नहीं रूकेगी। चलो, उसके पीछे चलते हैं और देखते हैं कि क्या होता है।' दोनों बहने दीनू के पीछे−पीछे चलने लगीं। एक तालाब के पास दीनू ने डोलची रख दी और कमल के फूल तोड़ने लगा। उसी बीच एक चरवाहे का लड़का आया और डोलची में रखी हुई चवन्नी लेकर भाग गया। दीनू को पता ही नहीं चला। फूल तोड़कर वह अपने घर चलने लगा। इतने में वही लड़का आता हुआ दिखाई दिया जिसने चवन्नी देकर उससे बांस ले लिया था। करीब आकर वह बोला, 'पंडित जी! यह बांस तो बहुत वजनी है। दादाजी ने कहा है कि कोई हल्का बांस चाहिए। इसकी चारपाई ठीक न होगी। यह लीजिए, आप अपना बांस वापस ले लीजिए।' कहकर उसने बांस पंडित जी के हवाले कर दिया। दीनू ने बांस ले लिया। लेकिन चवन्नी तो डोलची में थी ही नहीं। तब उसने कहा, 'बेटा, चवन्नी तो कहीं गिर गई। तुम मेरे साथ घर चलो, वहाँ दूसरी दे दूँगा। इस समय मेरे पास एक भी पैसा नहीं है।' 'तब आप जाइए। मैं शाम को आकर घर से ले लूँगा।' यह कहकर लड़का अपनी राह लौट गया। बांस फिर से पंडित जी के ही पास आ गया और लक्ष्मी जी हौले से मुस्कराईं। उनको इस प्रकार मुस्कराते देखकर ज्येष्ठा मन ही मन में जल उठीं। वह बोलीं, 'अभी तो खेल शुरू ही हुआ है। देखती चलो कि मैं इसे कैसे तिगनी का नाच नचाती हूँ।' दीनू बेचारा इन सब बातों से बेखबर अपनी ही धुन में आगे बढ़ा चला जा रहा था। उसे क्या पता था कि वह शतरंज का मोहरा बना हुआ है। वह तो धूप−छाँव की भाँति दोनों बहनों का प्रभाव सहता चुपचाप चला जा रहा था। आगे चलकर गाँव का एक अहीर मिला। उसने दीनू को चवन्नी वापस करते हुए बताया, 'पंडित जी! मेरा लड़का आपकी डोलची से यह चवन्नी उठा लाया था। वह बड़ा ही शैतान है। मैं आपकी वही चवन्नी लौटाने आया हूँ। हो सके तो उस शैतान को माफ कर दीजिएगा।' दीनू ने आशीर्वाद देकर चवन्नी ले ली और प्रसन्न मन से उस लड़के को पुकारने लगा जो शाम को घर आकर चवन्नी लेने की बात कहकर लौटा जा रहा था। आवाज़ सुनकर लड़का लौट आया। अपनी चवन्नी वापस पाकर वह भी प्रसन्न हो गया। दीनू पंडित निश्चिंत मन से घर की ओर बढ़ने लगा। उसके एक हाथ में पूजा की डोलची थी और दूसरे में वही पाँच हाथ का लम्बा बांस।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राह चलते दीनू पंडित सोच रहा था, 'बांस तो काफी वजनी है। वजनी है तो मजबूत भी होगा, क्योंकि ठोस है। इसे दरवाजे के छप्पर में लगा दूँगा। कई साल के लिए बल्ली से छुटकारा मिल जाएगा।' ज्येष्ठा को उसके विचार पर क्रोध आ गया। लक्ष्मी जी के प्रभाव से दीनू को लाभ होता देख वह मन ही मन बुरी तरह जली जा रहीं थीं। जब उन्होंने देखा कि पंडित का घर करीब आ गया है तो कोई उपाय न पाकर उन्होंने दीनू को मारने डालने का विचार किया। उन्होंने कहा, 'लक्ष्मी! धन−सम्पत्ति तो मैं छीन ही लेती हूँ, अब तुम्हारे भक्त के प्राण भी ले लूँगी। देखो, वह किस तरह तड़प−तड़प कर मरता है।' और वह तुरंत साँप बनकर दीनू की ओर दौड़ पड़ीं। लक्ष्मी जी को तनिक भी घबराहट नहीं हुई। वह उसी तरह खड़ी मुस्कराती रहीं। सहसा दीनू चौंक पड़ा। एक भयानक साँप फन उठाए उसकी ओर झपट रही था। प्राण तो सभी को प्रिय होते हैं। उपाय रहते कोई अपने को संकट में नहीं पड़ने देता। दीनू ने पगडंडी वाला रास्ता छोड़ दिया और एक ओर को भागने लगा। लेकिन साँप बनी ज्येष्ठा उसे भला कहाँ छोड़ने वाली थीं। वह तो उस गरीब के प्राणों की प्यासी हो चुकी थीं। वह भी दीनू के आगे−पीछे, दाएं−बाएं बराबर दौड़ती ही रहीं। दीनू घबरा गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, 'नाग देवता! मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा। शांति से अपनी राह लौट जाओ। आखिर क्यों मुझ गरीब के पीछे पड़े हो? व्यर्थ में किसी ब्राह्मण को सताना अच्छी बात नहीं है।' लेकिन वह नाग तो ज्येष्ठा का रूप था, जो दीनू को किसी भी तरह डसना चाहता था। प्रार्थना पर कुछ भी ध्यान न देकर वह साँप एक बारगी फुफकारता हुआ झपट पड़ा। जब दीनू ने देख लिया कि बिना संघर्ष किए अब जान नहीं बचेगी तो उसने प्राण−रक्षा के लिए भरपूर जोर लगाकर वही बांस साँप के ऊपर दे मारा। धरती से टकराते ही बांस के दो टुकड़े हो गए और उसके भीतर भरी हुईं मोहरें खन−खनाकर बिखर गईं, जैसे लक्ष्मी हँस रही हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीनू के मुँह से हैरतपूर्ण चीख−सी निकली, 'अरे!' थोड़ी देर के लिए वह ठगा−सा खड़ा आँखें फाड़े, उन मोहरों की ओर देखता रहा। एक पल के लिए तो वह साँप को भूल ही गया। परंतु फिर जैसे उसे झटका−सा लगा। साँप का ध्यान आते ही उसने उसकी ओर गरदन घुमायी, तो देखा कि बांस की चोट से साँप की कमर टूट गयी है और वह लहूलुहान अवस्था में झाड़ी की ओर भागा जा रहा है। दूसरे क्षण वह मोहरों पर लोट गया और कहने लगा, 'तेरी जय हो लक्ष्मी माता! जीवन−भर का दारिद्रय आज दूर हो गया। तेरी महिमा कौन जान सकता है। चलो, अब घर में बैठकर तुम्हारी पूजा−आरती करूँगा।' और फिर जल्दी−जल्दी उसने सारी मोहरें अंगोछे में बाँध दीं और लम्बे−लम्बे कदमों से घर की ओर चल दिया। पीछे एक पेड़ की छाया में खड़ी लक्ष्मी अपनी बहन ज्येष्ठा से मुस्कराकर पूछ रहीं थीं, 'कहो बहन! सच बताना, बड़प्पन की थाह मिली कि अभी नहीं? बड़प्पन किसी को कुछ देने में ही है, उससे छीनने में नहीं।' ज्येष्ठा ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप उदास खड़ी रहीं। लक्ष्मी जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा, 'फिर भी, हम दोनों बहनें हैं। जहाँ रहेंगीं, साथ ही रहेंगीं। आओ, अब चलें।'&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>कुबेर पुत्रों का उद्धार</title>
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		<updated>2010-03-03T12:12:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==कुबेर पुत्रों का उद्धार / Kuber's sons== &lt;br /&gt;
[[द्वापर युग]] में [[कुबेर]] जैसा शानवान कोई नहीं था। उसके दो पुत्र थे। एक का नाम नलकूबर था व दूसरे का मणिग्रीव। कुबेर के ये दोनों बेटे अपने पिता की धन−सम्पत्ति के प्रमाद में घमंडी और उद्दंड हो गए थे। राह चलते लोगों को छेड़ना, उन पर व्यंग्य कसना, गरीब लोगों का मखौल उड़ाना उन दोनों की प्रवृत्ति बन गयी थी। एक दिन दोनों भाई नदी में स्नान कर रहे थे। तभी आकाश मार्ग से आते हुए उन्हें देवर्षि [[नारद]] दिखाई दिए। उनके मुख से 'नारायण−नारायण' का स्वर सुनकर नदी पर स्नान के लिए पहुँचे लोग उन्हें प्रणाम करने लगे, लेकिन नलकूबर और मणिग्रीव तो अपने पिता के धन के कारण दंभ में भरे हुए थे। उन्होंने नारद को प्रणाम करने के स्थान पर उनकी ओर मुँह बिचकाया और उनका उपहास उड़ाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन दोनों का व्यवहार नारद को बहुत अखरा। क्रोध में भरकर उन दोनों को शाप दे दिया, 'जाओ, मर्त्यलोक में जाकर वृक्ष बन जाओ।' शापवश उसी समय दोनों मर्त्यलोक में, [[गोकुल]] में [[नंद]] बाबा के द्वार पर पेड़ बन कर खड़े हो गए। कुबेर को अपने पुत्रों की दुर्दशा की खबर मिली तो वह बहुत दुःखी हुआ और महर्षि नारद से बार−बार क्षमा याचना करने लगा। नारद जी को उस पर दया आ गई। उन्होंने अपने शाप का परिमार्जन करते हुए कहा, 'अभी तो कुछ हो नहीं सकता, किंतु जब द्वापर में भगवान [[विष्णु]] [[कृष्ण]] के रूप में वहाँ अवतरित होंगे और दोनों वृक्षों का स्पर्श करेंगे तब उन्हें मुक्ति मिल जाएगी।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारद के वचनों को सिद्ध करने के लिए ही मानो वासुदेव श्रीकृष्ण को गोकुल के राजा नंद के घर पलने के लिए छोड़ गए। वैसे तो सभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण के गोकुल छोड़ आने का उद्देश्य था− प्रजा को [[कंस]] के अत्याचारों से बचाना। नंद की पत्नी [[यशोदा]] कृष्ण को बड़े लाड़−प्यार से पालती थी, परंतु कृष्ण को तो अपनी लीला रचानी थी। ग्वालिनों के घरों से मक्खन चुराना, उनके मटके फोड़ देना, घर के मक्खन को ग्वाल सखाओं में बाँटना, आदि खेल कृष्ण करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन सुबह−सुबह माता यशोदा दही मथ रही थीं और नंद बाबा गौशाला में बैठकर गायों का दूध दुहवा रहे थे, तभी कृष्ण जाग गए और माता यशोदा से दुग्ध पान की जिद करने लगे। किंतु काम में व्यस्त होने के कारण यशोदा को थोड़ा−सा विलम्ब हो गया। बस, फिर क्या था, कृष्ण रूठ गए और गुस्से में मथनी ही तोड़ डाली। यशोदा को भी क्रोध आ गया। उन्होंने एक रस्सी से कृष्ण को बांध दिया और रस्सी एक ऊखल से बांध दी। कृष्ण ठहरे अंतर्यामी, इन्हें अपने दरवाजे के दो शापित वृक्षों की याद आ गई। नारद द्वारा शापित कुबेर के पुत्र काफी समय तक अपनी अशिष्टा की सजा पा चुके थे। अब उन्हें मुक्त करना था। ऐसा सोचकर ऊखल खिसकाते हुए कृष्ण आगे बढ़े और दोनों वृक्षों के समीप आकर उनका स्पर्श किया और ऊखल से धक्का मारा। दोनों वृक्ष तत्काल हरहराते हुए नीचे आ गिरे। वृक्षों के गिरने से जो भारी शोर हुआ, उसे सुनकर नंद बाबा, माता यशोदा सहित सभी पड़ोसी वहाँ दौड़ते हुए पहुँचे। तब सभी ने एक चमत्कार देखा। उन वृक्षों में से दो सुंदर युवक, जो कोई देवता जैसे लग रहे थे, कृष्ण के सामने हाथ जोड़े खड़े थे। फिर वे अंतर्ध्यान होकर अपने लोक को चले गए। इस प्रकार नलकूबर और मणिग्रीव को नारद के शाप से मुक्ति मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>शबरी के बेर</title>
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		<updated>2010-03-03T11:36:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==शबरी के बेर / Shabri ke Beer==&lt;br /&gt;
शबरी जाति की भीलनी का नाम था श्रमणा। बाल्यकाल से ही वह भगवान श्री[[राम]] की अनन्य भक्त थी। उसे जब भी समय मिलता, वह भगवान की सेवा−पूजा करती। घर वालों को उसका व्यवहार अच्छा नहीं लगता। बड़ी होने पर श्रमणा का विवाह हो गया। पर अफसोस, उसके मन के अनुरूप कुछ भी नहीं मिला। उसका पति भी उसके मन के अनुसार नहीं था। यहां के लोग अत्यंत अनाचारी−दुराचारी थे। हर समय लूट−मार तथा हत्या के काम में लिप्त रहते। श्रमणा का उनसे अक्सर झगड़ा होता रहता था। इस गन्दे माहौल में श्रमणा जैसी सात्विक स्त्री का रहना बड़ा कष्टकर हो गया था। वह इस वातावरण से निकल भागना चाहती थी। वह किसके पास जाकर आश्रय के लिए शरण मांगे! यह भी एक समस्या थी। आखिर काफी सोच−विचार के बाद उसने मतंग ऋषि के आश्रम में रहने का निश्चय किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौका पाकर वह ऋषि के आश्रम में पहुंची। अछूत होने के कारण वह आश्रम के अंदर प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा सकी और वहीं दरवाजे के पास गठरी−सी बनी बैठ गई। क़ाफी देर बाद उस स्थान पर मतंग ऋषि आए। श्रमणा को देखकर चौंक पड़े। श्रमणा से आने का कारण पूछा। उसने बहुत ही नम्र स्वर में अपने आने का कारण बताया। मतंग ऋषि सोच में पड़ गए। काफी देर बाद उन्होंने श्रमणा को अपने आश्रम में रहने की अनुमति प्रदान कर दी। श्रमणा अपने व्यवहार और कार्य−कुशलता से शीघ्र ही आश्रमवासियों की प्रिय बन गई। इस बीच जब उसके पति को पता चला कि वह मतंग ऋषि के आश्रम में रह रही है तो वह आग−बबूला हो गया। श्रमणा को आश्रम से उठा लाने के लिए वह अपने कुछ हथियारबंद साथियों को लेकर चल पड़ा। मतंग ऋषि को इसके बारे में पता चल गया। श्रमणा दोबारा उस वातावरण में नहीं जाना चाहती थी। उसने करूण दृष्टि से ऋषि की ओर देखा। ऋषि ने फौरन उसके चारों ओर [[अग्नि]] पैदा कर दी। जैसे ही उसका पति आगे बढ़ा, उस आग को देखकर डर गया और वहां से भाग खड़ा हुआ। इस घटना के बाद उसने फिर कभी श्रमणा की तरफ कदम नहीं बढ़ाया। दिन गुजरते रहे।&lt;br /&gt;
भगवान श्रीराम [[सीता]] की खोज में मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे। मतंग ने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने दोनों भाइयों का यथायोग्य सत्कार किया। श्रमणा को बुलाकर कहा, 'श्रमणा! जिस राम की तुम बचपन से सेवा−पूजा करती आ रही थीं, वही राम आज साक्षात तुम्हारे सामने खड़े हैं। मन भरकर इनकी सेवा कर लो।' श्रमणा भागकर कंद−मूल लेने गई। कुछ क्षण बाद वह लौटी। कंद−मूलों के साथ वह कुछ जंगली बेर भी लाई थी। कंद−मूलों को उसने श्री भगवान के अर्पण कर दिया। पर बेरों को देने का साहस नहीं कर पा रही थी। कहीं बेर खराब और खट्टे न निकलें, इस बात का उसे भय था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने बेरों को चखना आरंभ कर दिया। अच्छे और मीठे बेर वह बिना किसी संकोच के श्रीराम को देने लगी। श्रीराम उसकी सरलता पर मुग्ध थे। उन्होंने बड़े प्रेम से जूठे बेर खाए। श्रीराम की कृपा से श्रमणा का उद्धार हो गया। वह स्वर्ग गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही श्रमणा रामायण में शबरी के नाम से प्रसिद्ध हुई।&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>बुलंद दरवाज़ा</title>
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		<updated>2010-02-25T11:48:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: नया पन्ना:  ==बुलंद दरवाजा / Buland Darwaza== *फतेहपुर सीकरी में अकबर के समय के अनेक…&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==बुलंद दरवाजा / Buland Darwaza==&lt;br /&gt;
*[[फतेहपुर सीकरी]] में [[अकबर]] के समय के अनेक भवनों, प्रासादों तथा राजसभा के भव्य अवशेष आज भी वर्तमान हैं। &lt;br /&gt;
*यहां की सर्वोच्च इमारत बुलंद दरवाजा है, जिसकी ऊंचाई भूमि से 280 फुट है। &lt;br /&gt;
*52 सीढ़ियों के पश्चात दर्शक दरवाजे के अंदर पहुंचता है। &lt;br /&gt;
*दरवाजे में पुराने जमाने के विशाल किवाड़ ज्यों के त्यों लगे हुए हैं। &lt;br /&gt;
*शेख सलीम की मान्यता के लिए अनेक यात्रियों द्वारा किवाड़ों पर लगवाई हुई घोड़े की नालें दिखाई देती हैं। &lt;br /&gt;
*बुलंद दरवाजे को, 1602 ई॰ में अकबर ने अपनी गुजरात-विजय के स्मारक के रूप में बनवाया था। &lt;br /&gt;
*इसी दरवाजे से होकर शेख की दरगाह में प्रवेश करना होता है। &lt;br /&gt;
*बाईं ओर जामा मस्जिद है और सामने शेख का मज़ार। मज़ार या समाधि के पास उनके संबंधियों की कब्रें हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:दर्शनीय-स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्थापत्य_कला]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<title>आर्षेय ब्राह्मण</title>
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		<updated>2010-02-17T07:40:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Menu}}&lt;br /&gt;
==आर्षेय ब्राह्मण / Arsheya Brahman==&lt;br /&gt;
सामवेदीय ब्राह्मण के मध्य [[आर्षेय ब्राह्मण]] का चतुर्थ स्थान है। इसके प्रतिपाद्य के सन्दर्भ में, ग्रन्थारम्भ में कहा गया है- 'अथ खल्वयमार्षप्रदेशो भवति'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ग्रन्थारम्भ, 1.1.1&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; तदनुसार इसमें [[सामवेद]] के ॠषियों से सम्बद्ध विवरण है। नामधेय से भी यही स्पष्ट होता है, किन्तु व्यवहारत: न  तो यह साम-गान के ॠषियों का कथन करता है और न ही ॠषि-गायकों की ही व्यापक सूची प्रस्तुत करता है। इसमें केवल गानों के नाम उनके प्रसिद्ध नामान्तरों के साथ प्रतत्त है।  प्राय: गानों के नाम उन ॠषियों के नाम पर हैं, जिन्होंने उनकी योजना की है। अतएव आर्षेय ब्राह्मण का नामकरण इस दृष्टि से सार्थक है कि इसकी विषय-वस्तु ॠषियों से सम्बद्ध है। चार प्रकार के साम-गानों में से आर्षेय का सम्बन्ध मात्र प्रथम दो गानों-ग्रामगेय और अरण्यगेय से है, जो महानाम्न्यार्चिक के साथ मिलकर सामसंहिता के पूर्वार्चिक भाग के अन्तर्गत हैं। आर्षेय ब्राह्मण ऊह और ऊह्यगानों पर विचार नहीं करता। सामगानों का नामकरण प्राय: पाँच आधारों पर हुआ है, जिनके कारण गानों की पाँच कोटियाँ बन गई हैं। गानों का नामकरण जिन आधारों पर हुआ है, वें ये हैं-&lt;br /&gt;
#उन ॠषियों के नामों के आधार पर, जिन्होंने उनका साक्षात्कार किया, यथा-सैन्धुक्षित, औशन आदि।&lt;br /&gt;
#ॠक् के प्रारम्भिक पदों के आधार पर, जैसे विशोविशीय, यज्ञायज्ञीय आदि। &lt;br /&gt;
#निधन (गान का अन्त्यभाग) के आधार पर, जैसे-सुतं रयिष्ठीय, दावसुनिधन इत्यादि।&lt;br /&gt;
#प्रयोजनमूलक, जैसे संवर्ग, रक्षोघ्न इत्यादि।&lt;br /&gt;
#जो इनमें से किसी श्रेणी में नहीं आते, जैसे वीङ्क, इत्यादि।&lt;br /&gt;
इनमें से प्रथम कोटि के नाम ही उनके साक्षात्कर्ता ॠषियों के नामों पर प्रकाश डालते हैं। अन्य चार प्रकार के नामों की स्थिति इसके विपरीत है। इस कारण आर्षेय ब्राह्मण गानों के नाम देते समय उनके ॠषियों के नामों का भी उल्लेख कर देता है, यथा-'अग्नेवैंश्वानरस्य यज्ञायज्ञीयम्'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आर्षेय ब्राह्मण 1.5.1&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;, 'प्रजापते: सुतं रयिष्ठीये'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आर्षेय ब्राह्मण 2.4.7&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;, 'अग्नेवैंश्वानरस्य राक्षोघ्नमत्रैर्वा वसिष्ठस्य वीङ्कम्'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आर्षेय ब्राह्मण 1.7.3&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; इत्यादि। इस सन्दर्भ में यह उल्लेख्य है कि कभी-कभी किसी गान के ॠषि का नामकरण उस गान के आधार पर दिखलाई देता है, जिसकी उसने योजना की। ऐसी स्थिति में उस ॠषि की प्रसिद्धि किसी उपनाम से हो जाती है और वास्तविक नाम विस्मरण के गर्त में निमग्न हो जाता है, किन्तु आर्षेय ब्राह्मण में उस ॠषि-नाम के साथ गोत्र-नाम का भी उल्लेख है, जैसे 'दावसुनिधन' गान के ॠषि हैं दावसु और 'हविष्मत्' गान के ॠषि हैं हविष्मान्; इन दोनों ॠषियों का नामकरण गानों के निधनभाग क्रमश: 'दावसू' 2345 और 'हविष्मते' 2345 के आधार पर हुआ है; किन्तु इन गानों का उल्लेख करते समय आर्षेय ब्राह्मण यह कहना नहीं भूलता कि प्रकृत गानद्रष्टा ॠषियों  का सम्बन्ध [[अंगिरा]] गोत्र से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[आर्षेय ब्राह्मण]] की रचना सूत्र-शैली में हुई है जो [[सामवेद]] के अनुब्राह्मणों की विशेषता है। आर्षेय ब्राह्मण में ग्रामगेयगानों का उल्लेख संहितोक्तक्रम से है। आर्षेय ब्राह्मण के अनुसार साम-गानों के ॠषि-नामों और उनके गोत्रों के ज्ञान से स्वर्ग, यश, धनादि फलों की प्राप्ति होती है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''ॠषीणां नामधेयगोत्रोपधारणम्। &lt;br /&gt;
स्वग्र्य यशस्यं धन्यं पुण्यं पुत्र्यं पशव्यं ब्रह्मवर्चस्यं स्मार्त्तमायुष्यम्'''।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आर्षेय ब्राह्मण 1.1.1-2&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस ब्राह्मण का अध्ययन प्रात: प्रातराश से पूर्व होना चाहिए- 'प्राक् प्रातराशिकमित्याचक्षते'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आर्षेय ब्राह्मण 1.1.4&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; आर्षेय ब्राह्मण का तिरुपति संस्करण 1967 में बी॰आर॰ शर्मा द्वारा सम्पादित होकर प्रकाशित है। &lt;br /&gt;
[[Category:कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्राह्मण_ग्रन्थ]]&lt;br /&gt;
{{ब्राह्मण साहित्य}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%B0&amp;diff=7709</id>
		<title>कश्मीर</title>
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		<updated>2010-02-16T10:40:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==कश्मीर / काश्मीर / Kashmir==&lt;br /&gt;
*प्राचीन नाम कश्यपमेरु या कश्यपमीर (कश्यप का झील)। &lt;br /&gt;
*किंवदंती है कि महर्षि [[कश्यप]] श्री नगर से तीन मील दूर हरि-पर्वत पर रहते थे। जहाँ आजकल [[कश्मीर]] की घाटी है, वहाँ अति प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में एक बहुत बड़ी झील थी जिसके पानी को निकाल कर महर्षि कश्यप ने इस स्थान को मनुष्यों के बसने योग्य बनाया था।  &lt;br /&gt;
*भूविद्या-विशारदों के विचारों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है कि काश्मीर तथा [[हिमालय]] के एक विस्तृत भू-भाग में अब से सहस्त्रों वर्ष पूर्व समुद्र स्थित था। काश्मीर का इतिहास अतिप्राचीन है। &lt;br /&gt;
*वैदिक काल में यहाँ [[आर्य|आर्यों]] की बस्तियाँ थी। &amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]] वन 130, 10 में काश्मीर मंडल का उल्लेख है- 'काश्मीर मंडलं चैतत् सर्वपुण्यमरिंदम; महर्षिभिश्चाध्युषितं पश्येदं भ्रातृभि: सह्।'&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कश्मीर के लिए कश्मीरमंडल शब्द के प्रयोग से सूचित होता है कि [[महाभारत]] काल में भी वर्तमान कश्मीर के विशाल समूचे प्रदेश को ही कश्मीर समझा जाता था। उस काल में महर्षियों के रहने के अनेक स्थान थे, यह भी इस उद्धरण से ज्ञात होता है। &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, सभा0 34, 12('द्राविडा:-सिंहलाश्चैव राजा काश्मीरकस्तथा') से सूचित हिता है कि कश्मीर का राजा भी [[युधिष्ठिर]] के [[राजसूय यज्ञ]] में आया था। उसने भेंट में अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त अंगूर के गुच्छे भी [[युधिष्ठिर]] को दिए थे, 'काश्मीरराजोमार्द्वीकं शुद्धं च रसवन्मधु बलिं च कृत्स्ननादाय पांडवायाभ्युपाहरत'--सभा0 51, दक्षिणात्य पाठ्।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[कल्हण]] की [[राजतरंगिणी]] में जो कश्मीर का बृहत इतिहास है, इस देश के इतिहास को अति प्राचीनकाल से प्रारम्भ किया गया है। &lt;br /&gt;
*कश्मीर में [[अशोक]] के समय में बौद्धधर्म ने पहली बार प्रवेश किया। श्रीनगर की स्थापना इस मौर्य सम्राट ने ही की थी। दूसरी शती ई॰ में कुशान नरेशों ने कश्मीर को अपने विशाल, मध्य एशिया तक फैले हुए साम्राज्य का अंग बनाया। &lt;br /&gt;
*कश्मीर से हाल में प्राप्त भारत-बैक्ट्रिआई और भारत-पार्थिआयी नरेशों के सिक्कों से प्रमाणित होता है कि [[गुप्त काल]] के पूर्व, कश्मीर का सम्बन्ध उत्तरपश्चिम में स्थापित ग्रीक राज्यों से था। *[[विष्णु पुराण]] के एक उल्लेख से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है--&lt;br /&gt;
'सिंधु तटदाविकोर्वीचन्द्रभागा काश्मीरविषयांश्चव्रात्यम्लेच्छशूद्रादयो भोक्ष्यन्ति' &amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु पुराण 4, 24, 69&amp;lt;/ref&amp;gt;। इससे कश्मीर आदि देशों में संभवत: गुप्तपूर्वकाल में अनार्य जातियों के राज्य का होना सूचित होता है। &lt;br /&gt;
*गुप्तकाल में ही [[बौद्ध]]-धर्म की अवनति अन्य प्रदेशों की भाति कश्मीर में भी प्रारम्भ हो गई थी और [[शैवमत|शैव धर्म]] का उत्कर्ष धीरे -धीरे बढ़ रहा था। [[शैवमत]] के तथा पुनरुज्जीवित हिन्दूधर्म के प्रचार में अभिनवगुप्त तथा [[शंकराचार्य]] जैसे दार्शनिकों का बड़ा हाथ था। श्रीनगर के पास शंकराचार्य की पहाड़ी, दक्षिण के महान आचार्य की सुदूर उत्तर के इस देश की दार्शनिक दिग्विजय-यात्रा का स्मारक है। हिंदूधर्म के उत्कर्ष के साथ ही साथ कश्मीर की राजनैतिक शक्ति का भी तेजी से विकास हुआ। &lt;br /&gt;
*राजतरंगिणी के अनुसार कश्मीर-नरेश मुक्तापीड ललितादित्य ने 8वीं शती में सन्पूर्ण उत्तर भारत में [[कान्यकुब्ज]] तथा पार्श्ववर्ती प्रदेश तक, अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। &lt;br /&gt;
*13वीं शती में कश्मीर मुसलमानों के प्रभाव में आया। &lt;br /&gt;
*ईरान के हज़रत सैयद अली हमदान नामक संत ने अपने धर्म का यहाँ जोरों से प्रचार किया और धीरे-धीरे राज्यसत्ता भी मुसलमानों के हाथ में पहुँच गई। कश्मीर के मुसलमानों का राज्य 1338 ई॰ से 1587 ई॰ तक रहा और ज़ेनुलअब्दीन के शासनकाल  में कश्मीर भारत-ईरानी संस्कृति का प्रख्यात केंद्र बन गया। इस शासक को उसके उदार विचारों और संस्कृति प्रेम के कारण काश्मीर का [[अकबर]] कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*1587 से 1739 ई॰ तक कश्मीर मुग़ल साम्राज्य का अभिन्न अंग बना रहा। [[जहाँगीर]] और [[शाहजहाँ]] के समय के अनेक स्मारक आज भी कश्मीर के सर्वोत्कृष्ट स्मारक माने जाते हैं। इनमें निशात बाग़, शालामार उद्यान आदि प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
*1739 से 1819 ई॰ तक काबुल के राजाओं ने कश्मीर पर राज्य किया। &lt;br /&gt;
*1819 ई॰ में पंजाब केसरी रणजीत सिंह ने कश्मीर को काबुल के अमीर दोस्त मुहम्मद से छीन लिया किन्तु शीघ्र ही पंजाब कश्मीर के सहित अंग्रेजों के हाथ में हाथ में आ गया। &lt;br /&gt;
*1846 ई॰ में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कश्मीर को डोंगरा सरदार गुलाब सिंह के हाथों बेच दिया। इस वंश का 1947 तक वहाँ शासन रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:विविध]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<title>प्रज्ञापारमितासूत्र</title>
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		<updated>2010-02-16T10:30:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Menu}}&lt;br /&gt;
{{बौध्द दर्शन}}&lt;br /&gt;
==प्रज्ञापारमितासूत्र / Pragyaparmitasutra==&lt;br /&gt;
*प्रज्ञापारमितासूत्र प्रमुखत: भगवान बुद्ध द्वारा गृध्रकूट पर्वत पर द्वितीय धर्मचक्र के काल में उपदिष्ट देशनाएं हैं। कालान्तर में ये सूत्र जम्बूद्वीप में विलुप्त हो गये। &lt;br /&gt;
*आचार्य [[नागार्जुन बौद्धाचार्य|नागार्जुन]] ने नागलोक जाकर उन्हें प्राप्त किया और वे वहाँ से पुन: जम्बूद्वीप लाए। प्रज्ञापारमितासूत्रों के दो पक्ष हैं। &lt;br /&gt;
#एक दर्शनपक्ष है, जिसे प्रज्ञापक्ष या शून्यतापक्ष भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
#दूसरा है साधनापक्ष, जिसे उपायपक्ष या करुणापक्ष भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*नागार्जुन ने प्रज्ञापारमितासूत्रों के दर्शन पक्ष को अपनी कृतियों द्वारा प्रकाशित किया। प्रज्ञापारमितासूत्रों के आधार पर उन्होंने प्रमुखत: मूलमाध्यमिककारिका आदि ग्रन्थों में शून्यता-दर्शन को युक्तियों द्वारा प्रतिष्ठापित किया, जिसे आगे चलकर उनके अनुयायियों ने और अधिक विकसित किया। प्रज्ञापारमितासूत्रों के साधनापक्ष को आर्य [[असंग बौद्धाचार्य|असंग]] ने अपनी कृतियों द्वारा प्रकाशित किया। तदनन्तर उनके अनुयायियों ने उसे और अधिक पल्लवित एवं पुष्पित किया। शून्यता, अनुत्पाद, अनिरोध आदि पर्यायवाची शब्द हैं। सभी धर्मों की नि:स्वभावता प्रज्ञापारमितासूत्रों का मुख्य प्रतिपाद्य है। प्रज्ञापारमितासूत्रों की संख्या अत्यधिक है। शतसाहस्रिका (एक लाख श्लोकात्मक) प्रज्ञापारमिता से लेकर एकाक्षरी प्रज्ञापारमिता तक ये सूत्र पाये जाते हैं। महायानी वैपुल्यसूत्रों के दो प्रकार हैं। एक प्रकार के वे सूत्र हैं, जिनमें बुद्ध, बोधिसत्त्व, बुद्धयान आदि की महत्ता प्रदर्शित की गई है। ललितविस्तर, सद्धर्मपुण्डरीक आदि सूत्र इसी प्रकार के हैं। दूसरे प्रकार में वे सूत्र आते हैं, जिनमें शून्यता और प्रज्ञा की महत्ता प्रदर्शित है, ये सूत्र प्रज्ञापारमितासूत्र ही हैं। शून्यता और महाकरुणा- इन दोनों का समन्वय प्रज्ञापारमितासूत्रों में दृष्टिगोचर होता है। &lt;br /&gt;
*महायान साहित्य में प्रज्ञापारमितासूत्रों का अत्यधिक महत्त्व है। अन्य सूत्रों में अधिकतर बुद्ध और बोधिसत्त्वों का संवाद दिखलाई देता है, जबकि प्रज्ञापारमितासूत्रों में बुद्ध सुभूति नामक स्थविर से प्रश्न करते हैं। सुभूति और शारिपुत्र इन दो स्थविरों का शून्यता के बारे में संवाद ही तात्त्विक एवं गम्भीर है। इन सूत्रों की प्राचीनता इसी से प्रमाणित है कि ई. सन 179 में प्रज्ञापारमितासूत्र का चीनी भाषा में रूपान्तर हो गया था। प्राय: सभी बौद्ध धर्मानुयायी देशों में इन सूत्रों का अत्यधिक समादर है। &lt;br /&gt;
*नेपाली परम्परा के अनुसार मूल प्रज्ञापारमिता महायान सूत्र सवा लाख श्लोकात्मक है। पुन: एक लक्षात्मक, पच्चीस हजार, दस हजार और आठ हजार श्लोकात्मक प्रज्ञापारमितासूत्र भी प्रकाशित हैं। चीनी और तिब्बती परम्परा में इसके और भी अनेक प्रकार हैं। &lt;br /&gt;
*संस्कृत में निम्नलिखित सूत्र अंशत: या पूर्णरूपेण उपलब्ध होते हैं- &lt;br /&gt;
#शतसाहस्रिकाप्रज्ञापारमिता, &lt;br /&gt;
#पञ्चविंशतिसाहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता, &lt;br /&gt;
#अष्टसाहस्त्रिकाप्रज्ञापारमिता, &lt;br /&gt;
#सार्धद्विसाहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता, &lt;br /&gt;
#सप्तशतिका प्रज्ञापारमिता, &lt;br /&gt;
#वज्रच्छेदिका (त्रिशतिका) प्रज्ञापारमिता, &lt;br /&gt;
#अल्पाक्षरा प्रज्ञापारमिता, &lt;br /&gt;
#भगवती प्रज्ञापारमितासूत्र आदि। &lt;br /&gt;
*प्रज्ञापारमितासूत्रों को जननी सूत्र भी कहते हैं। प्रज्ञापारमिता के बिना बुद्धत्व का लाभ सम्भव नहीं है, अत: यह बुद्धत्व को उत्पन्न करने वाली है। इसी अर्थ में इसे जननी, बुद्धमाता आदि शब्दों से भी अभिहित करते हैं। इन्हें 'भगवती' भी कहते हैं, जो इनके प्रति अत्यधिक आदर का सूचक है। जननी सूत्रों का तीन में विभाजन भी किया जाता है, यथा- विस्तृत, मध्यम एवं संक्षिप्त जिनजननीसूत्र। &lt;br /&gt;
*शतसाहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता विस्तृत जिनजननीसूत्र है, जिसका उपदेश भगवान ने मृदु-इन्द्रिय और विस्तृतरुचि विनेयजनों के लिए किया है। मध्येन्द्रिय और मध्यरुचि विनेयजनों के लिए मध्यम जिनजननी अर्थात पञ्चविंशति साहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता का तथा तीक्ष्णेन्द्रिय और संक्षिप्त रुचि विनेयजनों के लिए संक्षिप्त जिनजननी अर्थात अष्टसाहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता का भगवान ने उपदेश किया है। इन सभी में अष्टसाहस्त्रिका पूर्णत: उपलब्ध है, अत: उसका यहाँ निरुपण किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौध्द_दर्शन]]&lt;br /&gt;
[[Category:बुद्ध]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
	</entry>
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		<title>यज्ञ</title>
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		<updated>2010-02-16T08:41:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==यज्ञ \ Yagna \ Yagya==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
*यज्ञ पांच प्रकार के माने जाते हैं:&lt;br /&gt;
#लोक,&lt;br /&gt;
#क्रिया,&lt;br /&gt;
#सनातन गृह,&lt;br /&gt;
#पंचभूत तथा&lt;br /&gt;
#मनुष्य। &lt;br /&gt;
==यज्ञ के अंग==&lt;br /&gt;
*यज्ञ के चारों अंग हैं:&lt;br /&gt;
#स्नान,&lt;br /&gt;
#दान,&lt;br /&gt;
#होम और&lt;br /&gt;
#जप &lt;br /&gt;
==यज्ञ के प्रकार==&lt;br /&gt;
===अश्वमेध यज्ञ===&lt;br /&gt;
[[अश्वमेध यज्ञ|अश्वमेध]] मुख्यत: राजनीतिक यज्ञ था और इसे वही सम्राट कर सकता था, जिसका अधिपत्य अन्य सभी नरेश मानते थे। आपस्तम्ब: में लिखा है:&amp;lt;balloon title=&amp;quot;राजा सार्वभौम: अश्वमेधेन यजेत्। नाप्यसार्वभौम:&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; सार्वभौम राजा अश्वमेध करे असार्वभौम कदापि नहीं। यह यज्ञ उसकी विस्तृत विजयों, सम्पूर्ण अभिलाषाओं की पूर्ति एवं शक्ति तथा साम्राज्य की वृद्धि का द्योतक होता था।&lt;br /&gt;
===राजसूय यज्ञ===&lt;br /&gt;
[[ऐतरेय ब्राह्मण]]&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(ऐतरेय ब्राह्मण 8॰20)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; इस यज्ञ के करने वाले महाराजों की सूची प्रस्तुत करता है, जिन्होंने अपने राज्यारोहण के पश्चात [[पृथ्वी]] को जीता एवं इस यज्ञ को किया। इस प्रकार यह यज्ञ सम्राट का प्रमुख कर्तव्य समझा जाने लगा। जनता इसमें भाग लेने लगी एवं इसका पक्ष धार्मिक की अपेक्षा अधिक सामाजिक होता गया। यह यज्ञ चक्रवर्ती राजा बनने के लिए किया जाता था। &lt;br /&gt;
==दैनिक यज्ञ==&lt;br /&gt;
इस प्रकार के यज्ञ प्रतिदिन किये जाते हैं।&lt;br /&gt;
==पौराणिक महत्व==&lt;br /&gt;
वैदिक यज्ञों में अश्वमेध यज्ञ का महत्वपूर्ण स्थान है। यह महाक्रतुओं में से एक है। &lt;br /&gt;
*[[ॠग्वेद]] में इससे सम्बन्धित दो मन्त्र हैं। &lt;br /&gt;
*[[शतपथ ब्राह्मण]]&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शतपथ ब्राह्मण 13॰1-5)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में इसका विशद वर्णन प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
*[[तैत्तिरीय ब्राह्मण]]&amp;lt;balloon title=&amp;quot;तैत्तिरीय ब्राह्मण 3॰8-1&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;, &lt;br /&gt;
*कात्यायनीय श्रोतसूत्र&amp;lt;balloon title=&amp;quot;कात्यायनीय श्रोतसूत्र 20&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;, &lt;br /&gt;
*आपस्तम्ब:&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आपस्तम्ब 20&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;, &lt;br /&gt;
*आश्वलायन&amp;lt;balloon title=&amp;quot;आश्वलायन 10॰6&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;, &lt;br /&gt;
*शंखायन&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शंखायन 16&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; तथा दूसरे समान ग्रन्थों में इसका वर्णन प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]]&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(महाभारत 10॰71॰14)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में महाराज [[युधिष्ठिर]] द्वारा [[कौरव|कौरवौं]] पर विजय प्राप्त करने के पश्चात पाप मोचनार्थ किये गये अश्वमेध यज्ञ का विशद वर्णन है। &lt;br /&gt;
==यज्ञ की महिमा==&lt;br /&gt;
*[[ब्रह्म वैवर्त पुराण]] में [[सावित्री]] और [[यमराज]] संवाद में वर्णन आया-&lt;br /&gt;
*भारत-जैसे पुण्यक्षेत्र में जो [[अश्वमेध यज्ञ]] करता है, वह दीर्घकाल तक [[इन्द्र]] के आधे आसन पर विराजमान रहता है। &lt;br /&gt;
*[[राजसूय यज्ञ]] करने से मनुष्य को इससे चौगुना फल मिलता है।  &lt;br /&gt;
*सम्पूर्ण यज्ञों से भगवान [[विष्णु]] का यज्ञ श्रेष्ठ कहा गया है।  &lt;br /&gt;
*[[ब्रह्मा]] ने पूर्वकाल में बड़े समारोह के साथ इस यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उसी यज्ञ में [[दक्ष]] प्रजापति और [[शंकर]] में कलह मच गया था।  ब्राह्मणों ने क्रोध में आकर नन्दी को शाप दिया था और नन्दी ने ब्राह्मणों को।  यही कारण है कि भगवान शंकर ने [[दक्ष]] के यज्ञ को नष्ट कर डाला।  &lt;br /&gt;
*पूर्वकाल में [[दक्ष]], धर्म, [[कश्यप]], [[शेषनाग]], कर्दममुनि, स्वायम्भुवमनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, [[कपिल]] तथा [[ध्रुव]] ने विष्णुयज्ञ किया था।  उसके अनुष्ठान से हजारों राजसूय यज्ञों का फल निश्चित रूप से मिल जाता है।  वह पुरुष अवश्य ही अनेक कल्पों तक जीवन धारण करने वाला तथा जीवन्मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
*जिस प्रकार देवताओं में [[विष्णु]], वैष्णव पुरुषों में [[शिव]], शास्त्रों में [[वेद]], वर्णों में ब्राह्मण, तीर्थों में [[गंगा]], पुण्यात्मा पुरुषों में [[वैष्णव]], व्रतों में एकादशी, पुष्पों में [[तुलसी]], [[नक्षत्र|नक्षत्रों]] में [[चन्द्रमा]], पक्षियों में [[गरुड़]], स्त्रियों में भगवती मूल प्रकृति [[राधा]], आधारों में [[पृथ्वी|वसुन्धरा]], चंचल स्वभाववाली इन्दियों में मन, प्रजापतियों में [[ब्रह्मा]], प्रजेश्वरों में प्रजापति, वनों में [[वृन्दावन]], वर्षों में भारतवर्ष, श्रीमानों में [[लक्ष्मी]], विद्वानों में [[सरस्वती देवी]], पतिव्रताओं में भगवती [[दुर्गा]] और सौभाग्यवती श्री[[कृष्ण]] पत्नियों में श्री[[राधा]] सर्वोपरि मानी जाती हैं; उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञों में विष्णु यज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू कर्मकाण्ड]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>आशा</name></author>
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		<title>श्रीलात आचार्य</title>
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		<updated>2010-02-16T08:37:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;आशा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Menu}}&lt;br /&gt;
{{बौध्द दर्शन}}&lt;br /&gt;
==श्रीलात / Shrilaat==&lt;br /&gt;
सौत्रान्तिक आचार्य परम्परा में स्थविर [[भदन्त आचार्य]] के बाद काल की दृष्टि से दूसरे आचार्य श्रीलात प्रतीत होते हैं। ग्रन्थों में उनके श्रीलात, श्रीलाभ, श्रीलब्ध, श्रीरत आदि अनेक नाम उपलब्ध होते हैं। इनमें से उनका कौन नाम वास्तविक हैं, इसका निश्चय करना कठिन है। भोट-अनुवाद के अनुसार श्रीलात नाम ठीक प्रतीत होता है। 'अभिधर्म कोश भाष्य' में अनेक जगह यही नाम प्रयुक्त हुआ है। स्थविर श्रीलात से सम्बद्ध उनके जीवनवृत्त का व्यवस्थित और पर्याप्त विवरण कहीं उपलब्ध नहीं होता। बौद्ध धर्म के इतिहास ग्रन्थों में और [[हुएन-सांग|ह्रेनसांग]] की भारत यात्रा के विवरण में प्रसंगवश उनके नाम का उल्लेख हुआ है। अभिधर्म कोश भाष्य और उसकी टीकाओं में सिद्धान्तों के खण्डन या मण्डन के अवसरों पर श्रीलात या श्रीलाभ के सिद्धान्तों के उद्धरण दिखलाई पड़ते हैं। इसी तरह माध्यमिक आचार्यों ने अपने ग्रन्थों मे आचार्य के नाम का उल्लेख किया है। इन सब आधारों पर स्थविर श्रीलात का जीवन वृत्तान्त संक्षेप में निम्नलिखित है:&lt;br /&gt;
*आचार्य श्रीलात कश्मीर के निवासी थे। सम्भवत: [[तक्षशिला]] में आचार्य पद पर प्रतिष्ठत थे। इनके शिष्य परिवार में बहुसंख्यक श्रामणेर और भिक्षु विद्यमान थे। इन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। इससे विपरीत चीनी यात्री ह्रेनसांग इनका निवास स्थान [[अयोध्या]] बतलाते हैं। उस समय अयोध्या प्रसिद्ध विद्या केन्द्र था। हो सकता है कि श्रीलात जैसे प्रसिद्ध विद्वान वहाँ भी आये हों और निवास किया हो। यह असंगत भी नहीं है, क्योंकि [[गान्धार]] देश में जन्मे आचार्य असंग और वसुबन्धु का भी विद्या क्षेत्र [[अयोध्या]] ही रहा है। अयोध्या उस समय बौद्ध और अबौद्ध सभी प्रकार के विद्वानों की समवाय-स्थली थी। ह्नेनसांग अपने यात्रा विवरण में आगे लिखते हैं कि अयोध्या से कुछ दूरी पर सम्राट [[अशोक]] द्वारा निर्मित एक संघाराम है, उसमें लगभग 200 फुट ऊँचा एक स्तूप है। उस स्तूप के समीप एक दूसरा भी भग्न (खण्डहर के रूप में) संघाराम है, जिसमें बैठकर श्रीलब्ध शास्त्री ने सौत्रान्तिक सम्प्रदाय के अनुरूप एक 'विभाषाशास्त्र' की रचना की थी। इस वृत्तान्त से बुद्ध शासन से सम्बद्ध श्रीलात के कार्यों की सूचना मिलती है। अन्य ग्रन्थों में उनके जन्मस्थान की चर्चा नहीं मिलती, किन्तु अयोध्या या मध्यप्रदेश का सर्वत्र चारिका करने वाले बौद्ध भिक्षु का विद्या क्षेत्र अयोध्या होना आश्चर्यकर नहीं है। &lt;br /&gt;
*स्थविर भदन्त और श्रीलात के काल में अधिक अन्तर नहीं है। भदन्त के कुछ ही वर्षों बाद आचार्य श्रीलात का समय निर्धारित किया जा सकता है। कनिष्क के निधन के बाद उनका पुत्र सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। उसी समय [[नागार्जुन बौद्धाचार्य]] के गुरु विद्वन्मूर्धन्य सरहपाद, सरोरुवज्र अथवा राहुलभद्र भी विद्यमान थे। उसी समय [[वाराणसी]] में वैभाषिक आचार्य बुद्धदेव भी हजारों भिक्षुओं के साथ विराजमान थे। ये सभी आचार्य समकालिक हैं। यह वह समय था, जब सौत्रान्तिक चिन्तन पराकष्ठा को प्राप्त था। &lt;br /&gt;
*इस तरह आचार्य श्रीलात का समय हम बुद्धाब्द चतुर्थ शतक के अन्तिम भाग अथवा ईसा-पूर्व प्रथम शताब्दी में या इसके आसपास निश्चित कर सकते हैं, क्योंकि सम्राट कनिष्क के अवसान के समय इनके अस्तित्व का साक्ष्य उपलब्ध है। यही आचार्य नागार्जुन के जीवन का आदिम काल भी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कृतियाँ''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*आचार्य श्रीलात ने सौत्रान्तिक सम्मत विभाषा शास्त्र की रचना की थी। &lt;br /&gt;
*इनके अतिरिक्त भी उनकी रचनाएं सम्भावित हैं, किन्तु यह मात्र कल्पना ही है। &lt;br /&gt;
*इस समय विभाषा शास्त्र नहीं उपलब्ध है। &lt;br /&gt;
*आचार्य के कुछ विशिष्ट सिद्धान्त तथा दार्शनिक विशेषताएं 'अभिधर्म कोश भाष्य' और उसकी यशोमित्रकृत 'स्फुटार्था टीका' में उद्धरण के रूप में मिलते हैं किन्तु इतने मात्र से उनके सम्पूर्ण दर्शन का आकलन सम्भव नहीं है। &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
[[Category:कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौध्द_दर्शन]]&lt;br /&gt;
[[Category:बुद्ध]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>आशा</name></author>
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