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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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	<updated>2026-05-25T06:33:17Z</updated>
	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
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		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
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		<updated>2011-11-16T06:00:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
==संन्यासी को गाड़ने की प्रथा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति (संन्यासी) को प्राचीन काल में भी गाड़ा जाता था। ऊपर ऋतु का मत प्रकाशित किया गया है कि ब्रह्मचारी एवं यति का शव उत्तपन अग्नि से जलाया जाता है। इस विषय में शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्याख्या उपस्थित की है कि यहाँ पर यति कुटीचक श्रेणी का संन्यासी है और उसने यह भी बताया है कि चार प्रकार के संन्यासी लोगों (कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस) की अन्त्येष्टि किस प्रकार से की जाती है। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षेप में लिखा है, जिसे स्मृत्यर्थसार&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृत्यर्थसार, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ अन्तरों के साथ ग्रहण कर लिया है और परिव्राजक की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन उपस्थित किया है-किसी को ग्राम के पूर्व या दक्षिण में जाकर पलाश वृक्ष के नीचे या नदी तट पर या किसी अन्य स्वच्छ स्थल पर व्याहृतियों के साथ यति के दण्ड के बराबर गहरा गड्ढा खोदना चाहिए; इसके उपरान्त प्रत्येक बार सात व्याहृतियों के साथ उस पर तीन बार जल छिड़कना चाहिए, गड्ढे में दर्भ बिछा देना चाहिए, माला, चन्दनलेप आदि से शव को सजा देना चाहिए और मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.1.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ शव को गड्ढे में रख देना चाहिए। परिव्राजक के दाहिने हाथ में दण्ड तीन खण्डों में करके थमा देना चाहिए, और ऐसा करते समय ऋग्वेद;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.22.17&amp;lt;/ref&amp;gt; वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 5.15&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.2.13.1&amp;lt;/ref&amp;gt; का मन्त्रपाठ करना चाहिए। शिक्य को बायें हाथ में मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 4.2.5.2&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ रखा जाता है और फिर क्रम से पानी छानने वाला वस्त्र मुख पर&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.4.8.6 के मन्त्र के साथ&amp;lt;/ref&amp;gt;, गायत्री मन्त्र&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 3.62.10; वाजसनेयी संहिता 3.35; तैत्तिरीय संहिता 1.5.6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ पात्र को पेट पर और जलपात्र को गुप्तांगों के पास रखा जाता है। इसके उपरान्त 'चतुर्होतार:' मन्त्रों का पाठ किया जाता है। अन्य कृत्य नहीं किये जाते, न तो शवदाह होता है, न अशौच मनाया जाता है और न जल-तर्पण ही किया जाता है, क्योंकि यति संसार की विषयवासना से मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृत्यर्थसार ने इतना जोड़ दिया है कि न तो एकोद्दिष्ट श्राद्ध और न सपिण्डीकरण ही किया जाता है, केवल ग्यारहवें दिन पार्वण श्राद्ध होता है। किन्तु कुटिचक जलाया जाता है, बहूदक गाड़ा जाता है, हंस को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है और परमहंस को भली-भाँति गाड़ा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु, पृष्ठ 634-635&amp;lt;/ref&amp;gt; गाड़ने के उपरान्त गड्ढे को भली-भाँति बालू से ढँक दिया जाता है, जिससे कुत्ते, श्रृगाल आदि शव को (पंजों से गड्ढा खोदकर) निकाल न डालें। धर्मसिंधु&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 497&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि मस्तक को शंख या कुल्हाड़ी से छेद देना चाहिए, यदि ऐसा करने में असमर्थता प्रदर्शित हो तो मस्तक पर गुड़ की भेली रखकर उसे ही तोड़ देना चाहिए। इसने भी यही कहा है कि कुटीचक को छोड़कर कोई यति नहीं जलाया जाता। आजकल सभी यति गाड़े जाते हैं, क्योंकि बहूदक एवं कुटीचक आजकल पाये नहीं जाते, केवल परमहंस ही देखने में आते हैं। यतियों को क्यों गाड़ा जाता है? सम्भवत: उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थों की भाँति श्रौताग्नियाँ या स्मार्ताग्नियाँ नहीं रखते और वे लोग भोजन के लिए साधारण अग्नि भी नहीं जलाते। गृहस्थ लोग अपनी श्रौत या स्मार्त अग्नियों के साथ जलाये जाते हैं, किन्तु यति लोग बिना अग्नि के होते हैं, अत: गाड़े जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;गाड़ने की विधि के लिए देखिए वैखानसस्मार्तसूत्र (10.8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==गर्भिणी नारी के शवदाह के नियम== &lt;br /&gt;
जो स्त्रियाँ बच्चा जनते समय या जनने के तुरन्त उपरान्त ही या मासिक धर्म की अवधि में मर जाती हैं, उनके शवदाह के विषय में विशिष्ट नियम हैं। मिताक्षरा द्वारा उद्धृत एक स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका (1, पृष्ठ 121)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सूतिका के विषय में लिखा है कि एक पात्र में जल एवं पंचगव्य लेकर मन्त्रोचारण&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.9.1-9, 'आपो हि ष्ठा'&amp;lt;/ref&amp;gt; करना चाहिए और उससे सूतिका को स्नान कराकर जलाना चाहिए। मासिक धर्म वाली मृत नारी को भी इसी प्रकार जलाना चाहिए, किन्तु उसे दूसरा वस्त्र पहनाकर जलाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए गरुड़पुराण (2.4.171) एवं निर्णयसिंधु (पृष्ठ 621)&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार गर्भिणी नारी के शव के विषय में भी नियम हैं&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.9; निर्णयसिंधु, पृष्ठ 622&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विभिन्न कालों में शव-क्रिया==&lt;br /&gt;
विभिन्न कालों एवं विभिन्न देशों में शव-क्रिया (अन्त्येष्टि क्रिया) विभिन्न ढंगों से की जाती रही है। अन्त्येष्टि क्रिया के विभिन्न प्रकार ये हैं-जलाना (शवदाह), भूमि में गाड़ना, जल में बहा देना, शव को खुला छोड़ देना, जिससे चील, गिद्ध, कोए या पशु आदि उसे खा लें (यथा पारसियों में)&amp;lt;ref&amp;gt;पारसियों के शास्त्रों के अनुसार शव को गाड़ देना महान अपराध माना जाता है। यदि शव कब्र से बाहर नहीं निकाला गया तो मज्द के क़ानून के प्राध्यापक (शिक्षक) के विषय में कोई प्रायश्चित नहीं है, या उसके लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है, जिसने मज्द के क़ानून को पढ़ा है, और जब वे छ: मास या एक वर्ष के भीतर शव को कब्र से बाहर नहीं निकालते तो उन्हें क्रम से 500 या 1000 कोड़े खाने पड़ते हैं। देखिए वेंडिडाड, फ़र्गार्ड 3 (सैक्रेड बुक आफ़ दि ईस्ट, जिल्द 4, पृष्ठ 31-32)। पर्वतों के शिखरों पर शव रख दिये जाते हैं और उन्हें पक्षीगण एवं कुत्ते खा डालते हैं। शव को खुला छोड़ देना मज्द रीति की अत्यन्त विचित्र बात है।&amp;lt;/ref&amp;gt;, गुफ़ाओं में सुरक्षित रख छोड़ना या ममी रूप में (यथा मिस्र में) सुरक्षित रख छोड़ना।&amp;lt;ref&amp;gt;पियाज्ज़ा बर्बेरिनी के पास रोम के कपूचिन चर्च के भूगर्भ कब्रगाहों की दीवारों में 4000 पादरियों की हड्डियाँ सुरक्षित हैं। देखिए पक्ल की पुस्तक 'फ़्यूनरल कस्टम्स (पृष्ठ 136)'।&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक हमें साहित्यिक प्रमाण मिलता है, भारत में सामान्य नियम शव को जला देना ही था, किन्तु अपवाद भी थे, यथा-शिशुओं, संन्यासियों आदि के विषय में। प्राचीन भारतीयों ने शवदाह की वैज्ञानिक किन्तु कठोर हृदय वाली विधि किस प्रकार निकाली, यह बतलाना कठिन है। प्राचीन भारत में शव को गाड़ देने की बात अज्ञात नहीं थी।&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 5.30.14 'मा नु भूमिगृहो भुवत' एवं 18.2.34&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्तिम मन्त्र का रूप यों है-&amp;quot;हे अग्नि, उन सभी पितरों को यहाँ ले आओ, जिससे कि वे हवि ग्रहण करें, उन्हें भी बुलाओ, जिनके शरीर गाड़े गये थे या खुले रूप में छोड़ दिये गये थे या ऊपर (पेड़ों पर या गुहाओं में?) रख दिये गये थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिता:। सर्वास्तानग्न आ वह पितृन् हविषे अत्तवे।। अथर्ववेद (18.2.14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु सम्भव है कि शव के गाड़ने की ओर संकेत न भी हो। कुछ पूर्वज बहुत दूर लड़ाई में मारे गये हों, या शत्रुओं द्वारा पकड़ लिये गये हों, मार डाले गये हों और उनके शव यों ही छोड़ दिये गये हों, अर्थात् न तो उन्हें जलाया गया, न गाड़ दिया गया। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 8.8.5&amp;lt;/ref&amp;gt; में आये हुए एक कथन से कुछ विद्वान गाड़ने की बात निकालते हैं-'अत: वे उन भी मनुष्यों को असुर नाम देते हैं, जो दान नहीं देते, जो विश्वास नहीं रखते (धर्म नहीं मानते) और न ही यज्ञ करते हैं; क्योंकि यह असुरों का गूढ़ सिद्धान्त है। वे मृत के शरीर को भिक्षा (धूप-गंध या पुष्प?) एवं वस्त्र से सँवारते हैं और सोचते हैं कि वे इस प्रकार दूसरे लोक को जीत लेंगे।' यद्यपि यह वचन स्पष्ट नहीं है किन्तु असुरों, उनके शव श्रृंगार और परलोक प्राप्ति की ओर जो संकेत हैं, उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि असुरों में शव को गाड़ने की प्रथा सम्भवत: थी। ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 7.89.1&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऋषि ने प्रार्थना की है कि 'हे वरुण, मैं मिट्टी के घर में न जाऊँ।' सम्भवत: यह गाड़ने की प्रथा की ओर संकेत है। इसके अतिरिक्त अस्थियों को इकट्ठा करके पात्र में रखकर भूमि में गाड़ने और बहुत दिनों उपरान्त उस पर श्मशान बना देने आदि की प्रथा भी प्रचलित थी। अथर्ववेद&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 18.2.25&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है-'उन्हें वृक्ष कष्ट न दे और पृथिवी माता ही (ऐसा करे)।' इससे शवाधार (ताबूत) एवं शव को गाड़ने की ओर सम्भवत: संकेत मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*यह कुछ विचित्र सा है कि प्रगतिशील राष्ट्र बाइबिल के कथन की शाब्दिक व्याख्या में विश्वास करते हुए कि 'मृत का भौतिक शरीरोत्थान होता है', केवल शव को गाड़ने की प्रथा से ही चिपके रहे और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ईसाई लोक शवदाह के लिए कभी तत्पर नहीं हुए। सन 1906 में क्रेमेशन एक्ट (इंग्लैण्ड में) पारित हुआ जिसके अनुसार स्वास्थ्यमंत्री-समर्थित समतल भूमि पर शवदाह करने की अनुमति अन्त्येष्टि क्रिया के अध्यक्ष को प्राप्त होने लगी। कैथोलिक चर्च वाले अब भी शवदाह नहीं करते। आदिकालीन रोम के लोग शवदाह को सम्मान्य समझते थे और शव गाड़ने की रीति केवल उन लोगों के लिए बरती जाती थी, जो आत्महन्ता या हत्यारे होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुछ समय तक शव को विकृत होने से बचाने के लिए तेल आदि में रख छोड़ना भारत में अज्ञात नहीं था। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 29.4.29&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वैखानसश्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसश्रौतसूत्र 31.32&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि आहिताग्नि अपने लोगों से सुदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो उसके शव को तिल-तेल से पूर्ण द्रोण (नाद) में रखकर गाड़ी द्वारा घर लाना चाहिए। रामायण में कई बार यही कहा गया है कि [[भरत (दशरथ पुत्र)|भरत]] के आने के बहुत दिन पूर्व ही राजा [[दशरथ]] का शव तेलपूर्ण लम्बे द्रोण या नाद में रख दिया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;अयोध्याकाण्ड, 66.14-16, 76.4&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णु पुराण में आया है कि [[निमि]] का शव तेल तथा अन्य सुगंधित पदार्थों से इस प्रकार सुरक्षित रखा हुआ था कि वह सड़ा नहीं और लगता था कि मृत्यु मानो अभी हुई हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*ऋग्वेद के प्रणयन के पूर्व की स्थिति के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद तथा [[सिंधु घाटी]] के [[मोहनजोदड़ो]] एवं [[हड़प्पा]] अवशेषों के काल के निर्णय के विषय में अभी कोई सामान्य निश्चय नहीं हो सका है। सर जॉन मार्शल&amp;lt;ref&amp;gt;मोहनजोदड़ो, जिल्द 1, पृष्ठ 86&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पूर्ण रूप से गाड़ने, आंशिक रूप से गाड़ने एवं शवदाह के उपरान्त गाड़ने के रीतियों की ओर संकेत किया है। लौरिया नन्दनगढ़ की खुदाई से कुछ ऐसी श्मशान भूमियों का पता चला है, जो वैदिक काल की कही जाती हैं और उनमें एक छोटी स्वर्णिम वस्तु पायी गयी है, जो नंगी स्त्री, सम्भवत: पृथिवी माता की हैं। ये सब बातें पुरातत्ववेत्ताओं से सम्बन्ध रखती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 126&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[आदि पुराण|आदिपुराण]] का एक वचन उद्धृत करते हुए लिखा है कि मग के लोग गाड़े जाते थे और दरद लोग एवं लुप्त्रक लोग अपने सम्बन्धियों के शवों को पेड़ पर लटकाकर चल देते थे।&lt;br /&gt;
====बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया====&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भिक बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरने वाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बान सुत्तगें बौद्धधर्म के महान प्रस्थापक की अन्त्येष्टि क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;4.14&amp;lt;/ref&amp;gt; इस ग्रन्थ से इस विषय में जो कुछ एकत्र किया जा सकता है, वह यह है-'बुद्ध के अत्यन्त प्रिय शिष्य आनन्द ने कोई पद्य नहीं कहा, कुछ ऐसे शिष्य जो विषयभोग से रहित नहीं थे, रो पड़े और पृथिवी पर धड़ाम से गिर पड़े, और अन्य लोग (अर्हत्) किसी प्रकार दु:ख को सम्भाल सके। दूसरे दिन आनन्द कुशीनारा के मल्लों के पास गये, मल्लों ने धूप, मालाएँ, वाद्ययंत्र तथा पाँच सौ प्रकार के वस्त्र आदि एकत्र किये; मल्लों ने शाल वृक्षों की कुंज में पड़े बुद्ध के शव की प्रार्थना सात दिनों तक की और नाच, स्तुतियों, गायन, मालाओं एवं गंधों से पूजा-अर्चनाएँ कीं और वस्त्रों से शव को ढँकते रहे। सातवें दिन वे भगवान के शव को दक्षिण की ओर ले चले, किन्तु एक चमत्कार&amp;lt;ref&amp;gt;6.29-32 में वर्णित&amp;lt;/ref&amp;gt; के कारण वे उत्तरी द्वार से नगर के बीच से होकर शव को लेकर चले और पूर्व दिशा में उसे रख दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;सामान्य नियम यह था कि शव को गाँव के मध्य से लेकर नहीं जाया जाता और उसे दक्षिण की और ले जाया जाता था, किन्तु बुद्ध इतने असाधारण एवं पवित्र थे कि उपर्युक्त प्रथाविरुद्ध ढंग उनके लिए मान्य हो गया।&amp;lt;/ref&amp;gt; बुद्ध का शव नये वस्त्रों से ढँका गया और ऊपर से रूई एवं ऊन के चोगे बाँधे गये और फिर उनके ऊपर एक नया वस्त्र बाँधा गया। इस प्रकार वस्त्रों एवं सूत्रों के पाँच सौ स्तरों से शरीर ढँक दिया गया। इसके उपरान्त एक ऐसे लोहे के तैलपात्र में रखा गया, जो स्वयं एक तैलपात्र में रखा हुआ था। इसके पश्चात् सभी प्रकार के गंधों से युक्त चिता बनायी गई और उस पर शव रख दिया गया। तब महाकस्सप एवं पाँच सौ अन्य बौद्धों ने, जो साथ में आये थे, अपने परिधानों को कंधों पर सजाया&amp;lt;ref&amp;gt;उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने [[यज्ञोपवीत]] को धारण करते हैं|उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने यज्ञोपवीत को धारण करते हैं&amp;lt;/ref&amp;gt;, उन्होंने बद्धबाहु होकर सिर झुकाया और श्रद्धापूर्वक शव की तीन बार प्रदक्षिणा की। इसके उपरान्त शव का दाह किया गया। केवल अस्थियाँ बच गयीं। इसके उपरान्त मगधराज, [[अजातशत्रु]], [[वैशाली]] के [[लिच्छवी|लिच्छवियों]] आदि ने [[बुद्ध]] के अवशेषों पर अपना-अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया। बुद्ध के [[अवशेष]] आठ भागों में बाँटे गये। जिन्हें ये भाग प्राप्त हुए, उन्होंने उन पर स्तूप (धूप) बनवाये, मोरिय लोगों ने जिन्हें केवल राख मात्र प्राप्त हुई थी, उस पर स्तूप बनवाया और एक ब्राह्मण द्रोण (दोन) ने उसे घड़े पर, जिसमें अस्थियाँ एकत्र कर रखी गयी थीं, एक स्तूप बनवाया।' श्री राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रन्थों एवं जन्म गाथाओं में अन्त्येष्टियों का वर्णन मिलता है, किन्तु कहीं भी प्रचलित धार्मिक क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जा सकता है कि बौद्ध अन्त्येष्टि क्रिया, यद्यपि सरल है, तथापि वह आश्वलायनगृह्यसूत्र के कुछ नियमों से बहुत कुछ मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए जे.आर.ए.एस. (1906, पृष्ठ 655-671 एवं 881-913) में प्रकाशित फ़्लीट के लेख, जो महापरिनिब्बान-सुत्त, दिव्यावदान, फाहियान के ग्रन्थ, सुमंगलविलासिनी एवं अन्य ग्रन्थों के आधार पर लिखे गये ऐसे लेख हैं, जो बुद्ध की अस्थियों एवं भस्म के बँटवारे अथवा उन पर बने स्तूपों पर प्रकाश डालते हैं। फ़्लीट का कहना है कि पिप्रहवा अवशेष-कुंभ में, जिस पर एक अभिलेख अंकित है, जो अब तक पाये गये [[अभिलेख|अभिलेखों]] में सबसे पुराना है (लगभग ईसापूर्व सन 375) और जिसमें सात सौ वस्तुएँ पायी गई हैं, भगवान बुद्ध के अवशेष चिह्न नहीं हैं, प्रत्युत उनके सम्बन्धियों के हैं। फ़्लीट ने एक परम्परा की ओर संकेत किया है जो बतलाती है कि सम्राट [[अशोक]] ने बुद्ध के अवशेष चिह्नों पर बने 8 स्तूपों में 7 को खोदकर उनमें पाये गये अवशेषों को 84000 सोने और चाँदी के पात्रों में परिवर्तित कर दिया और उन्हें सम्पूरण भारत में वितरित कर दिया। इस प्रकार 84000 स्तूपों का निर्माण उन पर किया गया। राइस डेविड्स ने अपने ग्रन्थ 'बुद्धिस्ट इंडिया' (पृष्ठ 78-80) में यह कहते हुए कि जन या धन से विशिष्ट मृत लोगों का राजकर्मचारियों या शिक्षकों के शव जलाये जाते और अवशिष्ट भस्मांश स्तूपों (पालि में थूप या टोप) के अन्दर गाड़ दिये जाते थे। निर्देश किया है कि साधारण लोगों के शव अजीव ढंग से रखे जाते थे। वे खुले स्थल में रख दिये जाते थे। नियमानुकूल वे शव या चितावशेष गाड़े नहीं जाते थे, प्रत्युत पक्षियों या पशुओं द्वारा नष्ट किये जाने के लिए छोड़ दिये जाते थे अथवा वे स्वयं प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====शीर्षक====&lt;br /&gt;
जब मृत के सम्बन्धीगण (पुत्र आदि) जल-तर्पण एवं स्नान करके जल (नदी, जलाशय आदि) से बाहर निकल कर हरी घास के किसी स्थल पर बैठ गये हों, तो गुरुजनों (वृद्ध आदि) को उनके दु:ख कम करने के लिए प्राचीन गाथाएँ कहनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.7 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 1.4.2 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोकमुत्सृज्य कल्याणीभिर्वाग्भि: सात्त्विकाभि: कथाभि: पुराणै: सुकृतिभि: श्रुत्वाधोमुखा व्रजन्ति। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौतमपितृमेधसूत्र (1.4.2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र 20.22-53&amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है कि किस प्रकार काल (समय, मृत्यु) सभी को, यहाँ तक इन्द्र, देवों, दैत्यों, महान राजाओं एवं ऋषियों को धर दबोचता है, कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेकर एक दिन मरण को प्राप्त होता ही है (मृत्यु अवश्यंभावी है), कि (पत्नी को छोड़कर) कोई भी मृत व्यक्ति के साथ यमलोक को नहीं जाता है, कि किस प्रकार सदसत् कर्म मृतात्मा के पास आते हैं, कि किस प्रकार श्राद्ध मृतात्मा के लिए कल्याणकर है। इसने निष्कर्ष निकाला है कि इसीलिए जीवित सम्बन्धियों को श्राद्ध करना चाहिए और रुदन छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उससे लाभ नहीं और केवल धर्म ही ऐसा है, जो मृतात्मा के साथ जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह अवलोकनीय है कि विष्णु धर्मसूत्र के कुछ पद्य (20.29, 48-49 एवं 51-53) भगवदगीता के पद्यों (2.22-28, 13.23-25) के समान ही हैं। विष्णु धर्मसूत्र (20.47 यथा धेनुसहस्रेषु आदि) शान्तिपर्व (181.16, 187.27 एवं 323.16) एवं विष्णुधर्मोत्तर (2.78.27) के समान ही है। इसी प्रकार देखिए विष्णुधर्मसूत्र (20.41) एवं शान्तिपर्व (175.15 एवं 322.73)। देखिए लक्ष्मीधर का कृत्यकल्पतरु (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 91-97), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.7, 11), विष्णुधर्मसूत्र (20.22-53) एवं भगवदगीता (2.13, 18)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी ही बातें याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;3.8-11=गरुड़पुराण 2.4.8184&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है; जो व्यक्ति मानव जीवन में, जो केले के पौधे के समान सारहीन है, और जो पानी के बुलबुले के समान अस्थिर है, अमरता खोजता है, वह भ्रम में पड़ा हुआ है। रुदन से क्या लाभ है जब कि शरीर पूर्व जन्म के कर्मों के कारण पंचतत्त्वों से निर्मित हो पुन: उन्हीं तत्त्वों में समा जाता है। पृथिवी, सागर और देवता नाश को प्राप्त होने वाले हैं (भविष्य में जब कि प्रलय होता है)। यह कैसे सम्भव है कि वह मृत्युलोक, जो फेन के समान क्षणभंगुर है, नाश को प्राप्त नहीं होगा? मृतात्मा को असहाय होकर अपने सम्बन्धियों के आँसू एवं नासिकारंध्रों से निकले द्रव पदार्थ को पीना पड़ता है, अत: उन सम्बन्धियों को रोना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म आदि करना चाहिए। गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने बलपूर्वक कहा है कि 'जो नाशवान है और जो सभी प्राणियो की विशेषता (नियति) है, उसके लिए रोना-कलपना क्या? केवल शुभ कर्मों के सम्पादन में, जो तुम्हारे साथ जाने वाले हैं, लगे रहो।' गोभिल ने याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.8-10&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[महाभारत]] को उद्धृत किया है-'सभी संग्रह क्षय को प्राप्त होते हैं, सभी उदय पतन को, सभी संयोग वियोग और जीवन मरण को।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छया:। संयोग विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।। और देखिए शान्तिपर्व (331.20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपरार्क ने रामायण एवं महाभारत से उदाहरण दिये हैं, यथा [[दुर्योधन]] की मृत्यु पर [[वासुदेव (कृष्ण)|वासुदेव]] द्वारा [[धृतराष्ट्र]] के प्रति कहे गये वचन। पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 292-293&amp;lt;/ref&amp;gt;, शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 205-206 &amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने विष्णुधर्मसूत्र, याज्ञवल्क्यस्मृति एवं गोभिलस्मृति के वचन उद्धृत किये हैं।&lt;br /&gt;
==सती प्रथा==&lt;br /&gt;
गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2.4.91-100&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पति की मृत्यु पर पत्नी के (पति चिता पर) बलिदान अर्थात् मर जाने एवं पतिव्रता की चमत्कारिक शक्ति के विषय में बहुत कुछ लिखा है और कहा है कि ब्राह्मण स्त्री को अपने पति से पृथक नहीं चलना चाहिए (अर्थात् साथ ही जल जाना चाहिए), किन्तु क्षत्रिय एवं अन्य नारियाँ ऐसा नहीं भी कर सकतीं। उसमें यह भी लिखा है कि सती प्रथा सभी नारियों, यहाँ तक की चाण्डाल नारियों के लिए भी, समान ही है, केवल गर्भवती नारियों को या उन्हें जिनके बच्चे अभी छोटे हों, ऐसा नहीं करना चाहिए। उसमें यह भी लिखा है कि जब तक पत्नी सती नहीं हो जाती, तब तक वह पुनर्जन्म से छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरुजनों का दार्शनिक उपदेश सुनने के उपरान्त सम्बन्धीगण अपने घर लौटते हैं। बच्चों को आगे करके द्वार पर खड़े होकर और मन को नियंत्रित कर नीम की पत्तियाँ दाँतों से चबाते हैं। आचमन करते हैं, अग्नि, जल, गोबर एवं श्वेत सरसों छूते हैं। इसके उपरान्त किसी पत्थर पर धीरे से, किन्तु दृढ़ता से पाँव रखकर घर में प्रवेश करते हैं। शंख के अनुसार सम्बन्धियों द्वारा दूर्वाप्रवाल (दूब की शाखा), अग्नि, बैल को छूना चाहिए, मृत को घर के द्वार पर पिण्ड देना चाहिए और तब घर में प्रवेश करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;दूर्वाप्रवालमग्निं वृषभं चालभ्य गृहद्वारे प्रेताय पिण्डं दत्त्वा पश्चात्प्रविशेयु:। शंख (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3।13, पराशरमाधवीय 1।2, पृष्ठ 293)।&amp;lt;/ref&amp;gt; बैजवाप&amp;lt;ref&amp;gt;बैजवाप शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 319&amp;lt;/ref&amp;gt;; निर्णयसिन्धु&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु 3, पृष्ठ 580&amp;lt;/ref&amp;gt; ने शमी, अश्मा (पत्थर), अग्नि को स्पर्श करते समय मन्त्रों के उच्चारण की व्यवस्था दी है और कहा है कि अपने एवं पशुओं (गाय एवं बकरी) के बीच में अग्नि रखकर उन्हें छूना चाहिए। एक ही प्रकार का भोजन खरीदना या दूसरे के घर से लेना चाहिए, उसमें नमक नहीं होना चाहिए, उसे केवल एक दिन और वह भी केवल एक बार खाना चाहिए तथा सारे कर्म तीन दिनों तक स्थगित रखने चाहिए। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.14&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उसके बतलाये हुए कर्मया&amp;lt;ref&amp;gt;ज्ञवल्क्यस्मृति 3.12&amp;lt;/ref&amp;gt;, यथा-नीम की पत्तियों को कुतरने से लेकर गृह प्रवेश तक के कार्य उन लोगों द्वारा भी सम्पादित होने चाहिए, जो सम्बन्धी नहीं हैं, किन्तु शव ढोने, उसे सँवारने, जलाने आदि में सम्मिलित थे।&lt;br /&gt;
==शवदाह के पश्चात नियम===&lt;br /&gt;
[[शांखायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायन श्रौतसूत्र 4.15.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, आश्वलाय गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलाय गृह्यसूत्र 4.4.17-27&amp;lt;/ref&amp;gt;, बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 1.12.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 82.33-35 एवं 42-47&amp;lt;/ref&amp;gt;, पारस्कर गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्कर गृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.3.10.4-10&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[गौतम धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.15-36&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मनुस्मृति]]&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.73&amp;lt;/ref&amp;gt;, वसिष्ठ.&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठ. 4.14-15&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.16-17&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[विष्णु धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.14.17&amp;lt;/ref&amp;gt;, संवर्त&amp;lt;ref&amp;gt;संवर्त 39-43&amp;lt;/ref&amp;gt;, शंख&amp;lt;ref&amp;gt;शंख 15-25&amp;lt;/ref&amp;gt;, गरुड़ पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़ पुराण (प्रेतखंड, 5.1-5)&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने उन लोगों (पुरुषों एवं स्त्रियों) के लिए कतिपय नियम दिये हैं, जिनके सपिण्ड मर जाते हैं और लिखा है कि श्मशान से लौटने के उपरान्त तीन दिनों तक क्या करना चाहिए। शांखायन श्रौतसूत्र ने व्यवस्था दी है कि उन्हें खाली (बिस्तरहीन) भूमि पर सोना चाहिए, केवल याज्ञिक भोजन करना चाहिए, वैदिक अग्नियों से सम्बन्धित कर्मों को करते रहना चाहिए, किन्तु अन्य धार्मिक कृत्य नहीं करने चाहिए, और ऐसा एक रात के लिए या नौ रातों के लिए या अस्थि संचय करने तक करना चाहिए। आश्वलाय गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलाय गृह्यसूत्र 4.4.17-24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने निम्न बातें दी हैं-उस रात उन्हें भोजन नहीं बनाना चाहिए। खरीदकर या अन्य के घर से प्राप्त भोजन करना चाहिए, तीन रातों तक निर्मित या खान से प्राप्त नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि मुख्य गुरुओं&amp;lt;ref&amp;gt;पिता, माता या वह जिसने [[उपनयन संस्कार]] कराया हो या जिसने [[वेद]] पढ़ाया हो&amp;lt;/ref&amp;gt; में किसी की मृत्यु हो गयी हो, तो विकल्प 12 रातों तक दान देना तथा वेदाध्ययन स्थगित कर देना चाहिए। पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए, दिन में केवल एक बार खाना चाहिए। उस दिन वेदपाठ स्थगित रखना चाहिए तथा वेदाग्नियों के कृत्यों को छोड़कर अन्य धार्मिक कृत्य भी स्थगित कर देने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वसिष्ठसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठसूत्र 4.14-15&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि सम्बन्धियों को चटाई पर तीन दिन बैठकर उपवास करना चाहिए। यदि उपवास न किया जा सके तो बाज़ार से मँगाकर या बिना माँगे प्राप्त भोजन सामग्री का आहार करना चाहिए। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उस रात उन्हें एक मिट्टी के पात्र में दूध एवं जल डालकर उसे खुले स्थान में शिक्य (सिकहर) पर रखकर यह कहना चाहिए-'हे मृतात्मा, यहाँ (जल में) स्नान करो और इस दूध को पीओ।' याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt;, पैठिनसि, मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.84&amp;lt;/ref&amp;gt;, पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि का कथन है कि मृतात्मा के सम्बन्धियों को श्रौत अग्नियों से सम्बन्धित आह्निककृत्य (अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास आदि) तथा स्मार्त अग्नियों वाले कृत्य (यथा, प्रात: एवं सायं के होम आदि) करते रहना चाहिए, क्योंकि वेद के ऐसे ही आदेश हैं (यथा, व्यक्ति को आमरण अग्निहोत्र करते जाना चाहिए)। टीकाकारों ने कई एक सीमाएँ एवं नियंत्रण घोषित किए हैं। मिताक्षरा&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.84&amp;lt;/ref&amp;gt; ने केवल श्रौत एवं स्मार्त अग्नियों के कृत्यों का अपवाद, किया है, अत: पंच महायज्ञ-जैसे धार्मिक कर्म नहीं करने चाहिए। वैश्वदेव, जिसका सम्पादन अग्नि में होता है, छोड़ दिया जाता है, क्योंकि संवर्त ने स्पष्ट रूप से कहा है कि (सपिण्ड की मृत्यु पर) ब्राह्मण को 10 दिनों तक वैश्वदेव रहित रहना चाहिए। श्रौत एवं स्मार्त कृत्य दूसरों के द्वारा करा देने चाहिए, जैसा कि पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र (3.10 'अन्य एतानि कृर्यु:')&amp;lt;/ref&amp;gt; ने स्पष्ट रूप से आज्ञापित किया है। केवल नित्य एवं नैमित्तक कृत्यों को, जो श्रौत एवं स्मार्त अग्नियों में किये जाते हैं, करने की आज्ञा दी गयी है, अत: काम्य कर्म नहीं किये जा सकते।&lt;br /&gt;
====अग्निहोत्री====&lt;br /&gt;
आजकल भी अग्निहोत्री लोग स्वयं श्रौत नित्य होम अशौच के दिनों में करते हैं, यद्यपि कुछ लोग ऐसा अन्य लोगों से कराते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17 एवं मनुस्मृति 5.84&amp;lt;/ref&amp;gt; यद्यपि गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संध्या का निषेध किया है, किन्तु पैठानसि का हवाला देकर मिताक्षरा ने कहा है कि सूर्य को जल दिया जा सकता है। कुछ अन्य लोगों का कथन है कि संध्या के मन्त्रों को मन में कहा जा सकता है, केवल प्राणायाम के मन्त्र नहीं कहे जाते।&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृतिमुक्ताफल पृष्ठ 478&amp;lt;/ref&amp;gt; आजकल [[भारत]] के बहुत से भागों में ऐसा ही किया जाता है। विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 22.6&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि जन्म एवं मरण के अशौच में होम (वैश्वदेव), दान देना एवं ग्रहण करना तथा वेदाध्ययन रुक जाता है। वैखानसस्मार्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसस्मार्तसूत्र 6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से संध्या पूजन, देवों एवं पितरों के कृत्य, दान देना एवं लेना तथा वेदाध्ययन अशौच की अवधि में छोड़ देना चाहिए। गौतम धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.44&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि वेदाध्ययन के लिए जन्म-मरण के समय ब्राह्मण पर अशौच का प्रभाव नहीं पड़ता। दूसरी ओर संवर्त&amp;lt;ref&amp;gt;संवर्त 43&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जन्म-मरण के अशौच में पंच महायज्ञ एवं वेदाध्ययन नहीं करना चाहिए। नित्याचारपद्धति&amp;lt;ref&amp;gt;नित्याचारपद्धति पृष्ठ 544&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि अशौच में भी [[विष्णु]] के सहस्र नामों का पाठ किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
==अस्थिसञ्चयन या सञ्चयन==&lt;br /&gt;
अस्थिसञ्चयन या सञ्चयन वह कृत्य है, जिसमें शवदाह के उपरान्त जली हुई, अस्थियाँ एकत्र की जाती हैं। यह कृत्य बहुत से सूत्रों एवं स्मृतियों में वर्णित है, यथा-शांखायन श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायन श्रौतसूत्र 4.15.12-18&amp;lt;/ref&amp;gt;, सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 28.3&amp;lt;/ref&amp;gt;, आश्वलायन गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायन गृह्यसूत्र 4.5.1-18&amp;lt;/ref&amp;gt;, गौतम पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम पितृमेधसूत्र 1.5&amp;lt;/ref&amp;gt;, विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.10-12&amp;lt;/ref&amp;gt;, बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 5.7&amp;lt;/ref&amp;gt;, यम&amp;lt;ref&amp;gt;यम 87-88&amp;lt;/ref&amp;gt;, संवर्त&amp;lt;ref&amp;gt;संवर्त 38&amp;lt;/ref&amp;gt;, गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.54-59&amp;lt;/ref&amp;gt;, हारलता।&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 183&amp;lt;/ref&amp;gt; यह कृत्य किस दिन किया जाए, इस विषय में मतैक्य नहीं है। उदाहरणार्थ, सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 28.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से अस्थि संचयन शवदाह के एक दिन उपरान्त या तीसरे, पाँचवें या सातवें दिन होना चाहिए; संवर्त&amp;lt;ref&amp;gt;संवर्त 38&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं गरुड़ पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़ पुराण प्रेतखंड, 5.15&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से पहले, तीसरे सातवें या नवें दिन और विशेषत: द्विजों के लिए चौथे दिन अस्थि संचयन होना चाहिए। वामन पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वामन पुराण 14.97-98&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पहले, चौथे या सातवें दिन की अनुमति दी है। यम&amp;lt;ref&amp;gt;यम 87&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सम्बन्धियों को शवदाह के उपरान्त प्रथम दिन से लेकर चौथे दिन तक अस्थियाँ एकत्र कर लेने को कहा है और पुन:&amp;lt;ref&amp;gt;यम, 88&amp;lt;/ref&amp;gt; कहा है कि चारों वर्णों में संचयन क्रम से चौथे, पाँचवें, सातवें एवं नवें दिन होना चाहिए। आश्वलायन गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायन गृह्यसूत्र 4.5.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से शवदाह के उपरान्त दसवें दिन (कृष्ण पक्ष में) संचयन होना चाहिए, किन्तु विषम तिथियों (प्रथमा, तृतीया, एकादशी, त्रयोदशी एवं अमावस्या के दिन) में तथा उस नक्षत्र में, जिसका नाम दो या दो से अधिक नक्षत्रों के साथ प्रयुक्त नहीं होता है (अर्थात् दो आषाढ़ाओं, दो फाल्गुनियों एवं दो भाद्रपदाओं को छोड़कर)। विष्णुधर्मसूत्र (19।10), वैखानसस्मार्त (5।7), कूर्मपुराण (उत्तर, 23), कौशिकसूत्र (82।29), विष्णुपुराण (3।13।14) आदि ने कहा है कि संचयन दाह के चौथे दिन अवश्य होना चाहिए। विस्तार के विषय में भी मतैक्य नहीं है। आश्वलायनगृह्यसूत्र (4।5) में निम्न बातें पायी जाती हैं-पुरुष की अस्थियाँ अचिह्नित पात्र (ऐसे पात्र जिसमें कहीं गंड या शोथ आदि न उभरा हो) में एकत्र करनी चाहिए और स्त्री की अस्थियाँ गण्डयुक्त पात्र में एकत्र करनी चाहिए। विषम संख्या में बूढ़ों द्वारा (इसमें स्त्रियाँ नहीं रहतीं) अस्थियाँ एकत्र की जाती हैं। कर्ता चितास्थल की परिक्रमा अपने वामांग को उस ओर करके तीन बार करता है और उस पर जलयुक्त दूध शमी की टहनी से छिड़कता है और ऋग्वेद (10।16।14) के 'शीतिके' का पाठ करता है। अँगूठे और अनामिका अँगुली से अस्थियाँ उठाकर एक-एक संख्या में पात्र में बिना स्वर उत्पन्न किये रखी जाती हैं। सर्वप्रथम पाँव की अस्थियाँ उठायी जाती हैं और अन्त में सिर की। अस्थियों को भली-भाँति एकत्र करके और उन्हें पछोड़ने वाले पात्र से स्वच्छ करके एवं पात्र में एकत्र करके ऐसे स्थान में रखा जाता है, जहाँ चारों पानी आकर एकत्र नहीं होता और 'उपसर्प' (ऋग्वेद 10।18।10) का पाठ किया जाता है। इसके उपरान्त चिता के गड्ढे में मिट्टी भर दी जाती है और ऋग्वेद (10।18।11) का मन्त्रोच्चारण किया जाता है। फिर ऋग्वेद (10।18।12) का पाठ किया जाता है। अस्थिपात्र को ढक्कन से बन्द करते समय (ऋग्वेद 10।18।13) का पाठ (उत् ते स्तभ्निम) किया जाता है। इसके उपरान्त बिना पीछे घूमे घर लौट आया जाता है, स्नान किया जाता है और कर्ता द्वारा अकेले मृत के लिए श्राद्ध किया जाता है। कौशिकसूत्र (82।29-32) ने अस्थिसंचयन की विधि कुछ दूसरे ही प्रकार से दी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===================================&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
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		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
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		<updated>2011-11-15T12:01:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
==संन्यासी को गाड़ने की प्रथा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति (संन्यासी) को प्राचीन काल में भी गाड़ा जाता था। ऊपर ऋतु का मत प्रकाशित किया गया है कि ब्रह्मचारी एवं यति का शव उत्तपन अग्नि से जलाया जाता है। इस विषय में शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्याख्या उपस्थित की है कि यहाँ पर यति कुटीचक श्रेणी का संन्यासी है और उसने यह भी बताया है कि चार प्रकार के संन्यासी लोगों (कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस) की अन्त्येष्टि किस प्रकार से की जाती है। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षेप में लिखा है, जिसे स्मृत्यर्थसार&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृत्यर्थसार, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ अन्तरों के साथ ग्रहण कर लिया है और परिव्राजक की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन उपस्थित किया है-किसी को ग्राम के पूर्व या दक्षिण में जाकर पलाश वृक्ष के नीचे या नदी तट पर या किसी अन्य स्वच्छ स्थल पर व्याहृतियों के साथ यति के दण्ड के बराबर गहरा गड्ढा खोदना चाहिए; इसके उपरान्त प्रत्येक बार सात व्याहृतियों के साथ उस पर तीन बार जल छिड़कना चाहिए, गड्ढे में दर्भ बिछा देना चाहिए, माला, चन्दनलेप आदि से शव को सजा देना चाहिए और मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.1.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ शव को गड्ढे में रख देना चाहिए। परिव्राजक के दाहिने हाथ में दण्ड तीन खण्डों में करके थमा देना चाहिए, और ऐसा करते समय ऋग्वेद;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.22.17&amp;lt;/ref&amp;gt; वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 5.15&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.2.13.1&amp;lt;/ref&amp;gt; का मन्त्रपाठ करना चाहिए। शिक्य को बायें हाथ में मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 4.2.5.2&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ रखा जाता है और फिर क्रम से पानी छानने वाला वस्त्र मुख पर&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.4.8.6 के मन्त्र के साथ&amp;lt;/ref&amp;gt;, गायत्री मन्त्र&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 3.62.10; वाजसनेयी संहिता 3.35; तैत्तिरीय संहिता 1.5.6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ पात्र को पेट पर और जलपात्र को गुप्तांगों के पास रखा जाता है। इसके उपरान्त 'चतुर्होतार:' मन्त्रों का पाठ किया जाता है। अन्य कृत्य नहीं किये जाते, न तो शवदाह होता है, न अशौच मनाया जाता है और न जल-तर्पण ही किया जाता है, क्योंकि यति संसार की विषयवासना से मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृत्यर्थसार ने इतना जोड़ दिया है कि न तो एकोद्दिष्ट श्राद्ध और न सपिण्डीकरण ही किया जाता है, केवल ग्यारहवें दिन पार्वण श्राद्ध होता है। किन्तु कुटिचक जलाया जाता है, बहूदक गाड़ा जाता है, हंस को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है और परमहंस को भली-भाँति गाड़ा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु, पृष्ठ 634-635&amp;lt;/ref&amp;gt; गाड़ने के उपरान्त गड्ढे को भली-भाँति बालू से ढँक दिया जाता है, जिससे कुत्ते, श्रृगाल आदि शव को (पंजों से गड्ढा खोदकर) निकाल न डालें। धर्मसिंधु&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 497&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि मस्तक को शंख या कुल्हाड़ी से छेद देना चाहिए, यदि ऐसा करने में असमर्थता प्रदर्शित हो तो मस्तक पर गुड़ की भेली रखकर उसे ही तोड़ देना चाहिए। इसने भी यही कहा है कि कुटीचक को छोड़कर कोई यति नहीं जलाया जाता। आजकल सभी यति गाड़े जाते हैं, क्योंकि बहूदक एवं कुटीचक आजकल पाये नहीं जाते, केवल परमहंस ही देखने में आते हैं। यतियों को क्यों गाड़ा जाता है? सम्भवत: उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थों की भाँति श्रौताग्नियाँ या स्मार्ताग्नियाँ नहीं रखते और वे लोग भोजन के लिए साधारण अग्नि भी नहीं जलाते। गृहस्थ लोग अपनी श्रौत या स्मार्त अग्नियों के साथ जलाये जाते हैं, किन्तु यति लोग बिना अग्नि के होते हैं, अत: गाड़े जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;गाड़ने की विधि के लिए देखिए वैखानसस्मार्तसूत्र (10.8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==गर्भिणी नारी के शवदाह के नियम== &lt;br /&gt;
जो स्त्रियाँ बच्चा जनते समय या जनने के तुरन्त उपरान्त ही या मासिक धर्म की अवधि में मर जाती हैं, उनके शवदाह के विषय में विशिष्ट नियम हैं। मिताक्षरा द्वारा उद्धृत एक स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका (1, पृष्ठ 121)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सूतिका के विषय में लिखा है कि एक पात्र में जल एवं पंचगव्य लेकर मन्त्रोचारण&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.9.1-9, 'आपो हि ष्ठा'&amp;lt;/ref&amp;gt; करना चाहिए और उससे सूतिका को स्नान कराकर जलाना चाहिए। मासिक धर्म वाली मृत नारी को भी इसी प्रकार जलाना चाहिए, किन्तु उसे दूसरा वस्त्र पहनाकर जलाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए गरुड़पुराण (2.4.171) एवं निर्णयसिंधु (पृष्ठ 621)&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार गर्भिणी नारी के शव के विषय में भी नियम हैं&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.9; निर्णयसिंधु, पृष्ठ 622&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विभिन्न कालों में शव-क्रिया==&lt;br /&gt;
विभिन्न कालों एवं विभिन्न देशों में शव-क्रिया (अन्त्येष्टि क्रिया) विभिन्न ढंगों से की जाती रही है। अन्त्येष्टि क्रिया के विभिन्न प्रकार ये हैं-जलाना (शवदाह), भूमि में गाड़ना, जल में बहा देना, शव को खुला छोड़ देना, जिससे चील, गिद्ध, कोए या पशु आदि उसे खा लें (यथा पारसियों में)&amp;lt;ref&amp;gt;पारसियों के शास्त्रों के अनुसार शव को गाड़ देना महान अपराध माना जाता है। यदि शव कब्र से बाहर नहीं निकाला गया तो मज्द के क़ानून के प्राध्यापक (शिक्षक) के विषय में कोई प्रायश्चित नहीं है, या उसके लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है, जिसने मज्द के क़ानून को पढ़ा है, और जब वे छ: मास या एक वर्ष के भीतर शव को कब्र से बाहर नहीं निकालते तो उन्हें क्रम से 500 या 1000 कोड़े खाने पड़ते हैं। देखिए वेंडिडाड, फ़र्गार्ड 3 (सैक्रेड बुक आफ़ दि ईस्ट, जिल्द 4, पृष्ठ 31-32)। पर्वतों के शिखरों पर शव रख दिये जाते हैं और उन्हें पक्षीगण एवं कुत्ते खा डालते हैं। शव को खुला छोड़ देना मज्द रीति की अत्यन्त विचित्र बात है।&amp;lt;/ref&amp;gt;, गुफ़ाओं में सुरक्षित रख छोड़ना या ममी रूप में (यथा मिस्र में) सुरक्षित रख छोड़ना।&amp;lt;ref&amp;gt;पियाज्ज़ा बर्बेरिनी के पास रोम के कपूचिन चर्च के भूगर्भ कब्रगाहों की दीवारों में 4000 पादरियों की हड्डियाँ सुरक्षित हैं। देखिए पक्ल की पुस्तक 'फ़्यूनरल कस्टम्स (पृष्ठ 136)'।&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक हमें साहित्यिक प्रमाण मिलता है, भारत में सामान्य नियम शव को जला देना ही था, किन्तु अपवाद भी थे, यथा-शिशुओं, संन्यासियों आदि के विषय में। प्राचीन भारतीयों ने शवदाह की वैज्ञानिक किन्तु कठोर हृदय वाली विधि किस प्रकार निकाली, यह बतलाना कठिन है। प्राचीन भारत में शव को गाड़ देने की बात अज्ञात नहीं थी।&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 5.30.14 'मा नु भूमिगृहो भुवत' एवं 18.2.34&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्तिम मन्त्र का रूप यों है-&amp;quot;हे अग्नि, उन सभी पितरों को यहाँ ले आओ, जिससे कि वे हवि ग्रहण करें, उन्हें भी बुलाओ, जिनके शरीर गाड़े गये थे या खुले रूप में छोड़ दिये गये थे या ऊपर (पेड़ों पर या गुहाओं में?) रख दिये गये थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिता:। सर्वास्तानग्न आ वह पितृन् हविषे अत्तवे।। अथर्ववेद (18.2.14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु सम्भव है कि शव के गाड़ने की ओर संकेत न भी हो। कुछ पूर्वज बहुत दूर लड़ाई में मारे गये हों, या शत्रुओं द्वारा पकड़ लिये गये हों, मार डाले गये हों और उनके शव यों ही छोड़ दिये गये हों, अर्थात् न तो उन्हें जलाया गया, न गाड़ दिया गया। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 8.8.5&amp;lt;/ref&amp;gt; में आये हुए एक कथन से कुछ विद्वान गाड़ने की बात निकालते हैं-'अत: वे उन भी मनुष्यों को असुर नाम देते हैं, जो दान नहीं देते, जो विश्वास नहीं रखते (धर्म नहीं मानते) और न ही यज्ञ करते हैं; क्योंकि यह असुरों का गूढ़ सिद्धान्त है। वे मृत के शरीर को भिक्षा (धूप-गंध या पुष्प?) एवं वस्त्र से सँवारते हैं और सोचते हैं कि वे इस प्रकार दूसरे लोक को जीत लेंगे।' यद्यपि यह वचन स्पष्ट नहीं है किन्तु असुरों, उनके शव श्रृंगार और परलोक प्राप्ति की ओर जो संकेत हैं, उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि असुरों में शव को गाड़ने की प्रथा सम्भवत: थी। ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 7.89.1&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऋषि ने प्रार्थना की है कि 'हे वरुण, मैं मिट्टी के घर में न जाऊँ।' सम्भवत: यह गाड़ने की प्रथा की ओर संकेत है। इसके अतिरिक्त अस्थियों को इकट्ठा करके पात्र में रखकर भूमि में गाड़ने और बहुत दिनों उपरान्त उस पर श्मशान बना देने आदि की प्रथा भी प्रचलित थी। अथर्ववेद&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 18.2.25&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है-'उन्हें वृक्ष कष्ट न दे और पृथिवी माता ही (ऐसा करे)।' इससे शवाधार (ताबूत) एवं शव को गाड़ने की ओर सम्भवत: संकेत मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*यह कुछ विचित्र सा है कि प्रगतिशील राष्ट्र बाइबिल के कथन की शाब्दिक व्याख्या में विश्वास करते हुए कि 'मृत का भौतिक शरीरोत्थान होता है', केवल शव को गाड़ने की प्रथा से ही चिपके रहे और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ईसाई लोक शवदाह के लिए कभी तत्पर नहीं हुए। सन 1906 में क्रेमेशन एक्ट (इंग्लैण्ड में) पारित हुआ जिसके अनुसार स्वास्थ्यमंत्री-समर्थित समतल भूमि पर शवदाह करने की अनुमति अन्त्येष्टि क्रिया के अध्यक्ष को प्राप्त होने लगी। कैथोलिक चर्च वाले अब भी शवदाह नहीं करते। आदिकालीन रोम के लोग शवदाह को सम्मान्य समझते थे और शव गाड़ने की रीति केवल उन लोगों के लिए बरती जाती थी, जो आत्महन्ता या हत्यारे होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुछ समय तक शव को विकृत होने से बचाने के लिए तेल आदि में रख छोड़ना भारत में अज्ञात नहीं था। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 29.4.29&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वैखानसश्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसश्रौतसूत्र 31.32&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि आहिताग्नि अपने लोगों से सुदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो उसके शव को तिल-तेल से पूर्ण द्रोण (नाद) में रखकर गाड़ी द्वारा घर लाना चाहिए। रामायण में कई बार यही कहा गया है कि [[भरत (दशरथ पुत्र)|भरत]] के आने के बहुत दिन पूर्व ही राजा [[दशरथ]] का शव तेलपूर्ण लम्बे द्रोण या नाद में रख दिया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;अयोध्याकाण्ड, 66.14-16, 76.4&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णु पुराण में आया है कि [[निमि]] का शव तेल तथा अन्य सुगंधित पदार्थों से इस प्रकार सुरक्षित रखा हुआ था कि वह सड़ा नहीं और लगता था कि मृत्यु मानो अभी हुई हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*ऋग्वेद के प्रणयन के पूर्व की स्थिति के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद तथा [[सिंधु घाटी]] के [[मोहनजोदड़ो]] एवं [[हड़प्पा]] अवशेषों के काल के निर्णय के विषय में अभी कोई सामान्य निश्चय नहीं हो सका है। सर जॉन मार्शल&amp;lt;ref&amp;gt;मोहनजोदड़ो, जिल्द 1, पृष्ठ 86&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पूर्ण रूप से गाड़ने, आंशिक रूप से गाड़ने एवं शवदाह के उपरान्त गाड़ने के रीतियों की ओर संकेत किया है। लौरिया नन्दनगढ़ की खुदाई से कुछ ऐसी श्मशान भूमियों का पता चला है, जो वैदिक काल की कही जाती हैं और उनमें एक छोटी स्वर्णिम वस्तु पायी गयी है, जो नंगी स्त्री, सम्भवत: पृथिवी माता की हैं। ये सब बातें पुरातत्ववेत्ताओं से सम्बन्ध रखती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 126&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[आदि पुराण|आदिपुराण]] का एक वचन उद्धृत करते हुए लिखा है कि मग के लोग गाड़े जाते थे और दरद लोग एवं लुप्त्रक लोग अपने सम्बन्धियों के शवों को पेड़ पर लटकाकर चल देते थे।&lt;br /&gt;
====बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया====&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भिक बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरने वाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बान सुत्तगें बौद्धधर्म के महान प्रस्थापक की अन्त्येष्टि क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;4.14&amp;lt;/ref&amp;gt; इस ग्रन्थ से इस विषय में जो कुछ एकत्र किया जा सकता है, वह यह है-'बुद्ध के अत्यन्त प्रिय शिष्य आनन्द ने कोई पद्य नहीं कहा, कुछ ऐसे शिष्य जो विषयभोग से रहित नहीं थे, रो पड़े और पृथिवी पर धड़ाम से गिर पड़े, और अन्य लोग (अर्हत्) किसी प्रकार दु:ख को सम्भाल सके। दूसरे दिन आनन्द कुशीनारा के मल्लों के पास गये, मल्लों ने धूप, मालाएँ, वाद्ययंत्र तथा पाँच सौ प्रकार के वस्त्र आदि एकत्र किये; मल्लों ने शाल वृक्षों की कुंज में पड़े बुद्ध के शव की प्रार्थना सात दिनों तक की और नाच, स्तुतियों, गायन, मालाओं एवं गंधों से पूजा-अर्चनाएँ कीं और वस्त्रों से शव को ढँकते रहे। सातवें दिन वे भगवान के शव को दक्षिण की ओर ले चले, किन्तु एक चमत्कार&amp;lt;ref&amp;gt;6.29-32 में वर्णित&amp;lt;/ref&amp;gt; के कारण वे उत्तरी द्वार से नगर के बीच से होकर शव को लेकर चले और पूर्व दिशा में उसे रख दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;सामान्य नियम यह था कि शव को गाँव के मध्य से लेकर नहीं जाया जाता और उसे दक्षिण की और ले जाया जाता था, किन्तु बुद्ध इतने असाधारण एवं पवित्र थे कि उपर्युक्त प्रथाविरुद्ध ढंग उनके लिए मान्य हो गया।&amp;lt;/ref&amp;gt; बुद्ध का शव नये वस्त्रों से ढँका गया और ऊपर से रूई एवं ऊन के चोगे बाँधे गये और फिर उनके ऊपर एक नया वस्त्र बाँधा गया। इस प्रकार वस्त्रों एवं सूत्रों के पाँच सौ स्तरों से शरीर ढँक दिया गया। इसके उपरान्त एक ऐसे लोहे के तैलपात्र में रखा गया, जो स्वयं एक तैलपात्र में रखा हुआ था। इसके पश्चात् सभी प्रकार के गंधों से युक्त चिता बनायी गई और उस पर शव रख दिया गया। तब महाकस्सप एवं पाँच सौ अन्य बौद्धों ने, जो साथ में आये थे, अपने परिधानों को कंधों पर सजाया&amp;lt;ref&amp;gt;उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने [[यज्ञोपवीत]] को धारण करते हैं|उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने यज्ञोपवीत को धारण करते हैं&amp;lt;/ref&amp;gt;, उन्होंने बद्धबाहु होकर सिर झुकाया और श्रद्धापूर्वक शव की तीन बार प्रदक्षिणा की। इसके उपरान्त शव का दाह किया गया। केवल अस्थियाँ बच गयीं। इसके उपरान्त मगधराज, [[अजातशत्रु]], [[वैशाली]] के [[लिच्छवी|लिच्छवियों]] आदि ने [[बुद्ध]] के अवशेषों पर अपना-अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया। बुद्ध के [[अवशेष]] आठ भागों में बाँटे गये। जिन्हें ये भाग प्राप्त हुए, उन्होंने उन पर स्तूप (धूप) बनवाये, मोरिय लोगों ने जिन्हें केवल राख मात्र प्राप्त हुई थी, उस पर स्तूप बनवाया और एक ब्राह्मण द्रोण (दोन) ने उसे घड़े पर, जिसमें अस्थियाँ एकत्र कर रखी गयी थीं, एक स्तूप बनवाया।' श्री राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रन्थों एवं जन्म गाथाओं में अन्त्येष्टियों का वर्णन मिलता है, किन्तु कहीं भी प्रचलित धार्मिक क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जा सकता है कि बौद्ध अन्त्येष्टि क्रिया, यद्यपि सरल है, तथापि वह आश्वलायनगृह्यसूत्र के कुछ नियमों से बहुत कुछ मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए जे.आर.ए.एस. (1906, पृष्ठ 655-671 एवं 881-913) में प्रकाशित फ़्लीट के लेख, जो महापरिनिब्बान-सुत्त, दिव्यावदान, फाहियान के ग्रन्थ, सुमंगलविलासिनी एवं अन्य ग्रन्थों के आधार पर लिखे गये ऐसे लेख हैं, जो बुद्ध की अस्थियों एवं भस्म के बँटवारे अथवा उन पर बने स्तूपों पर प्रकाश डालते हैं। फ़्लीट का कहना है कि पिप्रहवा अवशेष-कुंभ में, जिस पर एक अभिलेख अंकित है, जो अब तक पाये गये [[अभिलेख|अभिलेखों]] में सबसे पुराना है (लगभग ईसापूर्व सन 375) और जिसमें सात सौ वस्तुएँ पायी गई हैं, भगवान बुद्ध के अवशेष चिह्न नहीं हैं, प्रत्युत उनके सम्बन्धियों के हैं। फ़्लीट ने एक परम्परा की ओर संकेत किया है जो बतलाती है कि सम्राट [[अशोक]] ने बुद्ध के अवशेष चिह्नों पर बने 8 स्तूपों में 7 को खोदकर उनमें पाये गये अवशेषों को 84000 सोने और चाँदी के पात्रों में परिवर्तित कर दिया और उन्हें सम्पूरण भारत में वितरित कर दिया। इस प्रकार 84000 स्तूपों का निर्माण उन पर किया गया। राइस डेविड्स ने अपने ग्रन्थ 'बुद्धिस्ट इंडिया' (पृष्ठ 78-80) में यह कहते हुए कि जन या धन से विशिष्ट मृत लोगों का राजकर्मचारियों या शिक्षकों के शव जलाये जाते और अवशिष्ट भस्मांश स्तूपों (पालि में थूप या टोप) के अन्दर गाड़ दिये जाते थे। निर्देश किया है कि साधारण लोगों के शव अजीव ढंग से रखे जाते थे। वे खुले स्थल में रख दिये जाते थे। नियमानुकूल वे शव या चितावशेष गाड़े नहीं जाते थे, प्रत्युत पक्षियों या पशुओं द्वारा नष्ट किये जाने के लिए छोड़ दिये जाते थे अथवा वे स्वयं प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====शीर्षक====&lt;br /&gt;
जब मृत के सम्बन्धीगण (पुत्र आदि) जल-तर्पण एवं स्नान करके जल (नदी, जलाशय आदि) से बाहर निकल कर हरी घास के किसी स्थल पर बैठ गये हों, तो गुरुजनों (वृद्ध आदि) को उनके दु:ख कम करने के लिए प्राचीन गाथाएँ कहनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.7 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 1.4.2 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोकमुत्सृज्य कल्याणीभिर्वाग्भि: सात्त्विकाभि: कथाभि: पुराणै: सुकृतिभि: श्रुत्वाधोमुखा व्रजन्ति। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौतमपितृमेधसूत्र (1.4.2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र 20.22-53&amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है कि किस प्रकार काल (समय, मृत्यु) सभी को, यहाँ तक इन्द्र, देवों, दैत्यों, महान राजाओं एवं ऋषियों को धर दबोचता है, कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेकर एक दिन मरण को प्राप्त होता ही है (मृत्यु अवश्यंभावी है), कि (पत्नी को छोड़कर) कोई भी मृत व्यक्ति के साथ यमलोक को नहीं जाता है, कि किस प्रकार सदसत् कर्म मृतात्मा के पास आते हैं, कि किस प्रकार श्राद्ध मृतात्मा के लिए कल्याणकर है। इसने निष्कर्ष निकाला है कि इसीलिए जीवित सम्बन्धियों को श्राद्ध करना चाहिए और रुदन छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उससे लाभ नहीं और केवल धर्म ही ऐसा है, जो मृतात्मा के साथ जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह अवलोकनीय है कि विष्णु धर्मसूत्र के कुछ पद्य (20.29, 48-49 एवं 51-53) भगवदगीता के पद्यों (2.22-28, 13.23-25) के समान ही हैं। विष्णु धर्मसूत्र (20.47 यथा धेनुसहस्रेषु आदि) शान्तिपर्व (181.16, 187.27 एवं 323.16) एवं विष्णुधर्मोत्तर (2.78.27) के समान ही है। इसी प्रकार देखिए विष्णुधर्मसूत्र (20.41) एवं शान्तिपर्व (175.15 एवं 322.73)। देखिए लक्ष्मीधर का कृत्यकल्पतरु (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 91-97), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.7, 11), विष्णुधर्मसूत्र (20.22-53) एवं भगवदगीता (2.13, 18)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी ही बातें याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;3.8-11=गरुड़पुराण 2.4.8184&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है; जो व्यक्ति मानव जीवन में, जो केले के पौधे के समान सारहीन है, और जो पानी के बुलबुले के समान अस्थिर है, अमरता खोजता है, वह भ्रम में पड़ा हुआ है। रुदन से क्या लाभ है जब कि शरीर पूर्व जन्म के कर्मों के कारण पंचतत्त्वों से निर्मित हो पुन: उन्हीं तत्त्वों में समा जाता है। पृथिवी, सागर और देवता नाश को प्राप्त होने वाले हैं (भविष्य में जब कि प्रलय होता है)। यह कैसे सम्भव है कि वह मृत्युलोक, जो फेन के समान क्षणभंगुर है, नाश को प्राप्त नहीं होगा? मृतात्मा को असहाय होकर अपने सम्बन्धियों के आँसू एवं नासिकारंध्रों से निकले द्रव पदार्थ को पीना पड़ता है, अत: उन सम्बन्धियों को रोना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म आदि करना चाहिए। गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने बलपूर्वक कहा है कि 'जो नाशवान है और जो सभी प्राणियो की विशेषता (नियति) है, उसके लिए रोना-कलपना क्या? केवल शुभ कर्मों के सम्पादन में, जो तुम्हारे साथ जाने वाले हैं, लगे रहो।' गोभिल ने याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.8-10&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[महाभारत]] को उद्धृत किया है-'सभी संग्रह क्षय को प्राप्त होते हैं, सभी उदय पतन को, सभी संयोग वियोग और जीवन मरण को।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छया:। संयोग विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।। और देखिए शान्तिपर्व (331.20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपरार्क ने रामायण एवं महाभारत से उदाहरण दिये हैं, यथा [[दुर्योधन]] की मृत्यु पर [[वासुदेव (कृष्ण)|वासुदेव]] द्वारा [[धृतराष्ट्र]] के प्रति कहे गये वचन। पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 292-293&amp;lt;/ref&amp;gt;, शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 205-206 &amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने विष्णुधर्मसूत्र, याज्ञवल्क्यस्मृति एवं गोभिलस्मृति के वचन उद्धृत किये हैं।&lt;br /&gt;
==सती प्रथा==&lt;br /&gt;
गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2.4.91-100&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पति की मृत्यु पर पत्नी के (पति चिता पर) बलिदान अर्थात् मर जाने एवं पतिव्रता की चमत्कारिक शक्ति के विषय में बहुत कुछ लिखा है और कहा है कि ब्राह्मण स्त्री को अपने पति से पृथक नहीं चलना चाहिए (अर्थात् साथ ही जल जाना चाहिए), किन्तु क्षत्रिय एवं अन्य नारियाँ ऐसा नहीं भी कर सकतीं। उसमें यह भी लिखा है कि सती प्रथा सभी नारियों, यहाँ तक की चाण्डाल नारियों के लिए भी, समान ही है, केवल गर्भवती नारियों को या उन्हें जिनके बच्चे अभी छोटे हों, ऐसा नहीं करना चाहिए। उसमें यह भी लिखा है कि जब तक पत्नी सती नहीं हो जाती, तब तक वह पुनर्जन्म से छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरुजनों का दार्शनिक उपदेश सुनने के उपरान्त सम्बन्धीगण अपने घर लौटते हैं। बच्चों को आगे करके द्वार पर खड़े होकर और मन को नियंत्रित कर नीम की पत्तियाँ दाँतों से चबाते हैं। आचमन करते हैं, अग्नि, जल, गोबर एवं श्वेत सरसों छूते हैं। इसके उपरान्त किसी पत्थर पर धीरे से, किन्तु दृढ़ता से पाँव रखकर घर में प्रवेश करते हैं। शंख के अनुसार सम्बन्धियों द्वारा दूर्वाप्रवाल (दूब की शाखा), अग्नि, बैल को छूना चाहिए, मृत को घर के द्वार पर पिण्ड देना चाहिए और तब घर में प्रवेश करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;दूर्वाप्रवालमग्निं वृषभं चालभ्य गृहद्वारे प्रेताय पिण्डं दत्त्वा पश्चात्प्रविशेयु:। शंख (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3।13, पराशरमाधवीय 1।2, पृष्ठ 293)।&amp;lt;/ref&amp;gt; बैजवाप&amp;lt;ref&amp;gt;बैजवाप शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 319&amp;lt;/ref&amp;gt;; निर्णयसिन्धु&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु 3, पृष्ठ 580&amp;lt;/ref&amp;gt; ने शमी, अश्मा (पत्थर), अग्नि को स्पर्श करते समय मन्त्रों के उच्चारण की व्यवस्था दी है और कहा है कि अपने एवं पशुओं (गाय एवं बकरी) के बीच में अग्नि रखकर उन्हें छूना चाहिए। एक ही प्रकार का भोजन खरीदना या दूसरे के घर से लेना चाहिए, उसमें नमक नहीं होना चाहिए, उसे केवल एक दिन और वह भी केवल एक बार खाना चाहिए तथा सारे कर्म तीन दिनों तक स्थगित रखने चाहिए। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.14&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उसके बतलाये हुए कर्मया&amp;lt;ref&amp;gt;ज्ञवल्क्यस्मृति 3.12&amp;lt;/ref&amp;gt;, यथा-नीम की पत्तियों को कुतरने से लेकर गृह प्रवेश तक के कार्य उन लोगों द्वारा भी सम्पादित होने चाहिए, जो सम्बन्धी नहीं हैं, किन्तु शव ढोने, उसे सँवारने, जलाने आदि में सम्मिलित थे।&lt;br /&gt;
==शवदाह के पश्चात नियम===&lt;br /&gt;
[[शांखायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायन श्रौतसूत्र 4.15.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, आश्वलाय गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलाय गृह्यसूत्र 4.4.17-27&amp;lt;/ref&amp;gt;, बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 1.12.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 82.33-35 एवं 42-47&amp;lt;/ref&amp;gt;, पारस्कर गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्कर गृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.3.10.4-10&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[गौतम धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.15-36&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मनुस्मृति]]&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.73&amp;lt;/ref&amp;gt;, वसिष्ठ.&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठ. 4.14-15&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.16-17&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[विष्णु धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.14.17&amp;lt;/ref&amp;gt;, संवर्त&amp;lt;ref&amp;gt;संवर्त 39-43&amp;lt;/ref&amp;gt;, शंख&amp;lt;ref&amp;gt;शंख 15-25&amp;lt;/ref&amp;gt;, गरुड़ पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़ पुराण (प्रेतखंड, 5.1-5)&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने उन लोगों (पुरुषों एवं स्त्रियों) के लिए कतिपय नियम दिये हैं, जिनके सपिण्ड मर जाते हैं और लिखा है कि श्मशान से लौटने के उपरान्त तीन दिनों तक क्या करना चाहिए। शांखायन श्रौतसूत्र ने व्यवस्था दी है कि उन्हें खाली (बिस्तरहीन) भूमि पर सोना चाहिए, केवल याज्ञिक भोजन करना चाहिए, वैदिक अग्नियों से सम्बन्धित कर्मों को करते रहना चाहिए, किन्तु अन्य धार्मिक कृत्य नहीं करने चाहिए, और ऐसा एक रात के लिए या नौ रातों के लिए या अस्थि संचय करने तक करना चाहिए। आश्वलाय गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलाय गृह्यसूत्र 4.4.17-24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने निम्न बातें दी हैं-उस रात उन्हें भोजन नहीं बनाना चाहिए। खरीदकर या अन्य के घर से प्राप्त भोजन करना चाहिए, तीन रातों तक निर्मित या खान से प्राप्त नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि मुख्य गुरुओं&amp;lt;ref&amp;gt;पिता, माता या वह जिसने [[उपनयन संस्कार]] कराया हो या जिसने [[वेद]] पढ़ाया हो&amp;lt;/ref&amp;gt; में किसी की मृत्यु हो गयी हो, तो विकल्प 12 रातों तक दान देना तथा वेदाध्ययन स्थगित कर देना चाहिए। पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए, दिन में केवल एक बार खाना चाहिए। उस दिन वेदपाठ स्थगित रखना चाहिए तथा वेदाग्नियों के कृत्यों को छोड़कर अन्य धार्मिक कृत्य भी स्थगित कर देने चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वसिष्ठसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठसूत्र 4.14-15&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि सम्बन्धियों को चटाई पर तीन दिन बैठकर उपवास करना चाहिए। यदि उपवास न किया जा सके तो बाज़ार से मँगाकर या बिना माँगे प्राप्त भोजन सामग्री का आहार करना चाहिए। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उस रात उन्हें एक मिट्टी के पात्र में दूध एवं जल डालकर उसे खुले स्थान में शिक्य (सिकहर) पर रखकर यह कहना चाहिए-'हे मृतात्मा, यहाँ (जल में) स्नान करो और इस दूध को पीओ।' याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt;, पैठिनसि, मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.84&amp;lt;/ref&amp;gt;, पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि का कथन है कि मृतात्मा के सम्बन्धियों को श्रौत अग्नियों से सम्बन्धित आह्निककृत्य (अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास आदि) तथा स्मार्त अग्नियों वाले कृत्य (यथा, प्रात: एवं सायं के होम आदि) करते रहना चाहिए, क्योंकि वेद के ऐसे ही आदेश हैं (यथा, व्यक्ति को आमरण अग्निहोत्र करते जाना चाहिए)। टीकाकारों ने कई एक सीमाएँ एवं नियंत्रण घोषित किए हैं। मिताक्षरा&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.84&amp;lt;/ref&amp;gt; ने केवल श्रौत एवं स्मार्त अग्नियों के कृत्यों का अपवाद, किया है, अत: पंच महायज्ञ-जैसे धार्मिक कर्म नहीं करने चाहिए। वैश्वदेव, जिसका सम्पादन अग्नि में होता है, छोड़ दिया जाता है, क्योंकि संवर्त ने स्पष्ट रूप से कहा है कि (सपिण्ड की मृत्यु पर) ब्राह्मण को 10 दिनों तक वैश्वदेव रहित रहना चाहिए। श्रौत एवं स्मार्त कृत्य दूसरों के द्वारा करा देने चाहिए, जैसा कि पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र (3.10 'अन्य एतानि कृर्यु:')&amp;lt;/ref&amp;gt; ने स्पष्ट रूप से आज्ञापित किया है। केवल नित्य एवं नैमित्तक कृत्यों को, जो श्रौत एवं स्मार्त अग्नियों में किये जाते हैं, करने की आज्ञा दी गयी है, अत: काम्य कर्म नहीं किये जा सकते।&lt;br /&gt;
====अग्निहोत्री====&lt;br /&gt;
आजकल भी अग्निहोत्री लोग स्वयं श्रौत नित्य होम अशौच के दिनों में करते हैं, यद्यपि कुछ लोग ऐसा अन्य लोगों से कराते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17 एवं मनुस्मृति 5.84&amp;lt;/ref&amp;gt; यद्यपि गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संध्या का निषेध किया है, किन्तु पैठानसि का हवाला देकर मिताक्षरा ने कहा है कि सूर्य को जल दिया जा सकता है। कुछ अन्य लोगों का कथन है कि संध्या के मन्त्रों को मन में कहा जा सकता है, केवल प्राणायाम के मन्त्र नहीं कहे जाते।&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृतिमुक्ताफल पृष्ठ 478&amp;lt;/ref&amp;gt; आजकल [[भारत]] के बहुत से भागों में ऐसा ही किया जाता है। विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 22.6&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि जन्म एवं मरण के अशौच में होम (वैश्वदेव), दान देना एवं ग्रहण करना तथा वेदाध्ययन रुक जाता है। वैखानसस्मार्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसस्मार्तसूत्र 6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से संध्या पूजन, देवों एवं पितरों के कृत्य, दान देना एवं लेना तथा वेदाध्ययन अशौच की अवधि में छोड़ देना चाहिए। गौतम धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.44&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि वेदाध्ययन के लिए जन्म-मरण के समय ब्राह्मण पर अशौच का प्रभाव नहीं पड़ता। दूसरी ओर संवर्त&amp;lt;ref&amp;gt;संवर्त 43&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जन्म-मरण के अशौच में पंच महायज्ञ एवं वेदाध्ययन नहीं करना चाहिए। नित्याचारपद्धति&amp;lt;ref&amp;gt;नित्याचारपद्धति पृष्ठ 544&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि अशौच में भी [[विष्णु]] के सहस्र नामों का पाठ किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
==अस्थिसञ्चयन या सञ्चयन==&lt;br /&gt;
अस्थिसञ्चयन या सञ्चयन वह कृत्य है, जिसमें शवदाह के उपरान्त जली हुई, अस्थियाँ एकत्र की जाती हैं। यह कृत्य बहुत से सूत्रों एवं स्मृतियों में वर्णित है, यथा-शांखायन श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायन श्रौतसूत्र 4.15.12-18&amp;lt;/ref&amp;gt;, सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 28.3&amp;lt;/ref&amp;gt;, आश्वलायन गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायन गृह्यसूत्र 4.5.1-18&amp;lt;/ref&amp;gt;, गौतम पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम पितृमेधसूत्र 1.5&amp;lt;/ref&amp;gt;, विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.10-12&amp;lt;/ref&amp;gt;, बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 5.7&amp;lt;/ref&amp;gt;, यम&amp;lt;ref&amp;gt;यम 87-88&amp;lt;/ref&amp;gt;, संवर्त&amp;lt;ref&amp;gt;संवर्त 38&amp;lt;/ref&amp;gt;, गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.54-59&amp;lt;/ref&amp;gt;, हारलता।&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 183&amp;lt;/ref&amp;gt; यह कृत्य किस दिन किया जाए, इस विषय में मतैक्य नहीं है। उदाहरणार्थ, सत्याषाढश्रौतसूत्र (28।3।1) के मत से अस्थि संचयन शवदाह के एक दिन उपरान्त या तीसरे, पाँचवें या सातवें दिन होना चाहिए; संवर्त (38) एवं गरुड़पुराण (प्रेतखंड, 5।15) के मत से पहले, तीसरे सातवें या नवें दिन और विशेषत: द्विजों के लिए चौथे दिन अस्थि संचयन होना चाहिए। वामनपुराण (14।97-98) ने पहले, चौथे या सातवें दिन की अनुमति दी है। यम (87) ने सम्बन्धियों को शवदाह के उपरान्त प्रथम दिन से लेकर चौथे दिन तक अस्थियाँ एकत्र कर लेने को कहा है और पुन: (88) कहा है कि चारों वर्णों में संचयन क्रम से चौथे, पाँचवें, सातवें एवं नवें दिन होना चाहिए। आश्वलायनगृह्यसूत्र (4।5।1) के मत से शवदाह के उपरान्त दसवें दिन (कृष्ण पक्ष में) संचयन होना चाहिए, किन्तु विषम तिथियों (प्रथमा, तृतीया, एकादशी, त्रयोदशी एवं अमावस्या के दिन) में तथा उस नक्षत्र में, जिसका नाम दो या दो से अधिक नक्षत्रों के साथ प्रयुक्त नहीं होता है (अर्थात् दो आषाढ़ाओं, दो फाल्गुनियों एवं दो भाद्रपदाओं को छोड़कर)। विष्णुधर्मसूत्र (19।10), वैखानसस्मार्त (5।7), कूर्मपुराण (उत्तर, 23), कौशिकसूत्र (82।29), विष्णुपुराण (3।13।14) आदि ने कहा है कि संचयन दाह के चौथे दिन अवश्य होना चाहिए। विस्तार के विषय में भी मतैक्य नहीं है। आश्वलायनगृह्यसूत्र (4।5) में निम्न बातें पायी जाती हैं-पुरुष की अस्थियाँ अचिह्नित पात्र (ऐसे पात्र जिसमें कहीं गंड या शोथ आदि न उभरा हो) में एकत्र करनी चाहिए और स्त्री की अस्थियाँ गण्डयुक्त पात्र में एकत्र करनी चाहिए। विषम संख्या में बूढ़ों द्वारा (इसमें स्त्रियाँ नहीं रहतीं) अस्थियाँ एकत्र की जाती हैं। कर्ता चितास्थल की परिक्रमा अपने वामांग को उस ओर करके तीन बार करता है और उस पर जलयुक्त दूध शमी की टहनी से छिड़कता है और ऋग्वेद (10।16।14) के 'शीतिके' का पाठ करता है। अँगूठे और अनामिका अँगुली से अस्थियाँ उठाकर एक-एक संख्या में पात्र में बिना स्वर उत्पन्न किये रखी जाती हैं। सर्वप्रथम पाँव की अस्थियाँ उठायी जाती हैं और अन्त में सिर की। अस्थियों को भली-भाँति एकत्र करके और उन्हें पछोड़ने वाले पात्र से स्वच्छ करके एवं पात्र में एकत्र करके ऐसे स्थान में रखा जाता है, जहाँ चारों पानी आकर एकत्र नहीं होता और 'उपसर्प' (ऋग्वेद 10।18।10) का पाठ किया जाता है। इसके उपरान्त चिता के गड्ढे में मिट्टी भर दी जाती है और ऋग्वेद (10।18।11) का मन्त्रोच्चारण किया जाता है। फिर ऋग्वेद (10।18।12) का पाठ किया जाता है। अस्थिपात्र को ढक्कन से बन्द करते समय (ऋग्वेद 10।18।13) का पाठ (उत् ते स्तभ्निम) किया जाता है। इसके उपरान्त बिना पीछे घूमे घर लौट आया जाता है, स्नान किया जाता है और कर्ता द्वारा अकेले मृत के लिए श्राद्ध किया जाता है। कौशिकसूत्र (82।29-32) ने अस्थिसंचयन की विधि कुछ दूसरे ही प्रकार से दी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===================================&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=234473</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=234473"/>
		<updated>2011-11-15T11:22:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
==संन्यासी को गाड़ने की प्रथा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति (संन्यासी) को प्राचीन काल में भी गाड़ा जाता था। ऊपर ऋतु का मत प्रकाशित किया गया है कि ब्रह्मचारी एवं यति का शव उत्तपन अग्नि से जलाया जाता है। इस विषय में शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्याख्या उपस्थित की है कि यहाँ पर यति कुटीचक श्रेणी का संन्यासी है और उसने यह भी बताया है कि चार प्रकार के संन्यासी लोगों (कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस) की अन्त्येष्टि किस प्रकार से की जाती है। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षेप में लिखा है, जिसे स्मृत्यर्थसार&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृत्यर्थसार, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ अन्तरों के साथ ग्रहण कर लिया है और परिव्राजक की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन उपस्थित किया है-किसी को ग्राम के पूर्व या दक्षिण में जाकर पलाश वृक्ष के नीचे या नदी तट पर या किसी अन्य स्वच्छ स्थल पर व्याहृतियों के साथ यति के दण्ड के बराबर गहरा गड्ढा खोदना चाहिए; इसके उपरान्त प्रत्येक बार सात व्याहृतियों के साथ उस पर तीन बार जल छिड़कना चाहिए, गड्ढे में दर्भ बिछा देना चाहिए, माला, चन्दनलेप आदि से शव को सजा देना चाहिए और मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.1.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ शव को गड्ढे में रख देना चाहिए। परिव्राजक के दाहिने हाथ में दण्ड तीन खण्डों में करके थमा देना चाहिए, और ऐसा करते समय ऋग्वेद;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.22.17&amp;lt;/ref&amp;gt; वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 5.15&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.2.13.1&amp;lt;/ref&amp;gt; का मन्त्रपाठ करना चाहिए। शिक्य को बायें हाथ में मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 4.2.5.2&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ रखा जाता है और फिर क्रम से पानी छानने वाला वस्त्र मुख पर&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.4.8.6 के मन्त्र के साथ&amp;lt;/ref&amp;gt;, गायत्री मन्त्र&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 3.62.10; वाजसनेयी संहिता 3.35; तैत्तिरीय संहिता 1.5.6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ पात्र को पेट पर और जलपात्र को गुप्तांगों के पास रखा जाता है। इसके उपरान्त 'चतुर्होतार:' मन्त्रों का पाठ किया जाता है। अन्य कृत्य नहीं किये जाते, न तो शवदाह होता है, न अशौच मनाया जाता है और न जल-तर्पण ही किया जाता है, क्योंकि यति संसार की विषयवासना से मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृत्यर्थसार ने इतना जोड़ दिया है कि न तो एकोद्दिष्ट श्राद्ध और न सपिण्डीकरण ही किया जाता है, केवल ग्यारहवें दिन पार्वण श्राद्ध होता है। किन्तु कुटिचक जलाया जाता है, बहूदक गाड़ा जाता है, हंस को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है और परमहंस को भली-भाँति गाड़ा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु, पृष्ठ 634-635&amp;lt;/ref&amp;gt; गाड़ने के उपरान्त गड्ढे को भली-भाँति बालू से ढँक दिया जाता है, जिससे कुत्ते, श्रृगाल आदि शव को (पंजों से गड्ढा खोदकर) निकाल न डालें। धर्मसिंधु&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 497&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि मस्तक को शंख या कुल्हाड़ी से छेद देना चाहिए, यदि ऐसा करने में असमर्थता प्रदर्शित हो तो मस्तक पर गुड़ की भेली रखकर उसे ही तोड़ देना चाहिए। इसने भी यही कहा है कि कुटीचक को छोड़कर कोई यति नहीं जलाया जाता। आजकल सभी यति गाड़े जाते हैं, क्योंकि बहूदक एवं कुटीचक आजकल पाये नहीं जाते, केवल परमहंस ही देखने में आते हैं। यतियों को क्यों गाड़ा जाता है? सम्भवत: उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थों की भाँति श्रौताग्नियाँ या स्मार्ताग्नियाँ नहीं रखते और वे लोग भोजन के लिए साधारण अग्नि भी नहीं जलाते। गृहस्थ लोग अपनी श्रौत या स्मार्त अग्नियों के साथ जलाये जाते हैं, किन्तु यति लोग बिना अग्नि के होते हैं, अत: गाड़े जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;गाड़ने की विधि के लिए देखिए वैखानसस्मार्तसूत्र (10.8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==गर्भिणी नारी के शवदाह के नियम== &lt;br /&gt;
जो स्त्रियाँ बच्चा जनते समय या जनने के तुरन्त उपरान्त ही या मासिक धर्म की अवधि में मर जाती हैं, उनके शवदाह के विषय में विशिष्ट नियम हैं। मिताक्षरा द्वारा उद्धृत एक स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका (1, पृष्ठ 121)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सूतिका के विषय में लिखा है कि एक पात्र में जल एवं पंचगव्य लेकर मन्त्रोचारण&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.9.1-9, 'आपो हि ष्ठा'&amp;lt;/ref&amp;gt; करना चाहिए और उससे सूतिका को स्नान कराकर जलाना चाहिए। मासिक धर्म वाली मृत नारी को भी इसी प्रकार जलाना चाहिए, किन्तु उसे दूसरा वस्त्र पहनाकर जलाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए गरुड़पुराण (2.4.171) एवं निर्णयसिंधु (पृष्ठ 621)&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार गर्भिणी नारी के शव के विषय में भी नियम हैं&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.9; निर्णयसिंधु, पृष्ठ 622&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विभिन्न कालों में शव-क्रिया==&lt;br /&gt;
विभिन्न कालों एवं विभिन्न देशों में शव-क्रिया (अन्त्येष्टि क्रिया) विभिन्न ढंगों से की जाती रही है। अन्त्येष्टि क्रिया के विभिन्न प्रकार ये हैं-जलाना (शवदाह), भूमि में गाड़ना, जल में बहा देना, शव को खुला छोड़ देना, जिससे चील, गिद्ध, कोए या पशु आदि उसे खा लें (यथा पारसियों में)&amp;lt;ref&amp;gt;पारसियों के शास्त्रों के अनुसार शव को गाड़ देना महान अपराध माना जाता है। यदि शव कब्र से बाहर नहीं निकाला गया तो मज्द के क़ानून के प्राध्यापक (शिक्षक) के विषय में कोई प्रायश्चित नहीं है, या उसके लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है, जिसने मज्द के क़ानून को पढ़ा है, और जब वे छ: मास या एक वर्ष के भीतर शव को कब्र से बाहर नहीं निकालते तो उन्हें क्रम से 500 या 1000 कोड़े खाने पड़ते हैं। देखिए वेंडिडाड, फ़र्गार्ड 3 (सैक्रेड बुक आफ़ दि ईस्ट, जिल्द 4, पृष्ठ 31-32)। पर्वतों के शिखरों पर शव रख दिये जाते हैं और उन्हें पक्षीगण एवं कुत्ते खा डालते हैं। शव को खुला छोड़ देना मज्द रीति की अत्यन्त विचित्र बात है।&amp;lt;/ref&amp;gt;, गुफ़ाओं में सुरक्षित रख छोड़ना या ममी रूप में (यथा मिस्र में) सुरक्षित रख छोड़ना।&amp;lt;ref&amp;gt;पियाज्ज़ा बर्बेरिनी के पास रोम के कपूचिन चर्च के भूगर्भ कब्रगाहों की दीवारों में 4000 पादरियों की हड्डियाँ सुरक्षित हैं। देखिए पक्ल की पुस्तक 'फ़्यूनरल कस्टम्स (पृष्ठ 136)'।&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक हमें साहित्यिक प्रमाण मिलता है, भारत में सामान्य नियम शव को जला देना ही था, किन्तु अपवाद भी थे, यथा-शिशुओं, संन्यासियों आदि के विषय में। प्राचीन भारतीयों ने शवदाह की वैज्ञानिक किन्तु कठोर हृदय वाली विधि किस प्रकार निकाली, यह बतलाना कठिन है। प्राचीन भारत में शव को गाड़ देने की बात अज्ञात नहीं थी।&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 5.30.14 'मा नु भूमिगृहो भुवत' एवं 18.2.34&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्तिम मन्त्र का रूप यों है-&amp;quot;हे अग्नि, उन सभी पितरों को यहाँ ले आओ, जिससे कि वे हवि ग्रहण करें, उन्हें भी बुलाओ, जिनके शरीर गाड़े गये थे या खुले रूप में छोड़ दिये गये थे या ऊपर (पेड़ों पर या गुहाओं में?) रख दिये गये थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिता:। सर्वास्तानग्न आ वह पितृन् हविषे अत्तवे।। अथर्ववेद (18.2.14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु सम्भव है कि शव के गाड़ने की ओर संकेत न भी हो। कुछ पूर्वज बहुत दूर लड़ाई में मारे गये हों, या शत्रुओं द्वारा पकड़ लिये गये हों, मार डाले गये हों और उनके शव यों ही छोड़ दिये गये हों, अर्थात् न तो उन्हें जलाया गया, न गाड़ दिया गया। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 8.8.5&amp;lt;/ref&amp;gt; में आये हुए एक कथन से कुछ विद्वान गाड़ने की बात निकालते हैं-'अत: वे उन भी मनुष्यों को असुर नाम देते हैं, जो दान नहीं देते, जो विश्वास नहीं रखते (धर्म नहीं मानते) और न ही यज्ञ करते हैं; क्योंकि यह असुरों का गूढ़ सिद्धान्त है। वे मृत के शरीर को भिक्षा (धूप-गंध या पुष्प?) एवं वस्त्र से सँवारते हैं और सोचते हैं कि वे इस प्रकार दूसरे लोक को जीत लेंगे।' यद्यपि यह वचन स्पष्ट नहीं है किन्तु असुरों, उनके शव श्रृंगार और परलोक प्राप्ति की ओर जो संकेत हैं, उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि असुरों में शव को गाड़ने की प्रथा सम्भवत: थी। ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 7.89.1&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऋषि ने प्रार्थना की है कि 'हे वरुण, मैं मिट्टी के घर में न जाऊँ।' सम्भवत: यह गाड़ने की प्रथा की ओर संकेत है। इसके अतिरिक्त अस्थियों को इकट्ठा करके पात्र में रखकर भूमि में गाड़ने और बहुत दिनों उपरान्त उस पर श्मशान बना देने आदि की प्रथा भी प्रचलित थी। अथर्ववेद&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 18.2.25&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है-'उन्हें वृक्ष कष्ट न दे और पृथिवी माता ही (ऐसा करे)।' इससे शवाधार (ताबूत) एवं शव को गाड़ने की ओर सम्भवत: संकेत मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*यह कुछ विचित्र सा है कि प्रगतिशील राष्ट्र बाइबिल के कथन की शाब्दिक व्याख्या में विश्वास करते हुए कि 'मृत का भौतिक शरीरोत्थान होता है', केवल शव को गाड़ने की प्रथा से ही चिपके रहे और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ईसाई लोक शवदाह के लिए कभी तत्पर नहीं हुए। सन 1906 में क्रेमेशन एक्ट (इंग्लैण्ड में) पारित हुआ जिसके अनुसार स्वास्थ्यमंत्री-समर्थित समतल भूमि पर शवदाह करने की अनुमति अन्त्येष्टि क्रिया के अध्यक्ष को प्राप्त होने लगी। कैथोलिक चर्च वाले अब भी शवदाह नहीं करते। आदिकालीन रोम के लोग शवदाह को सम्मान्य समझते थे और शव गाड़ने की रीति केवल उन लोगों के लिए बरती जाती थी, जो आत्महन्ता या हत्यारे होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुछ समय तक शव को विकृत होने से बचाने के लिए तेल आदि में रख छोड़ना भारत में अज्ञात नहीं था। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 29.4.29&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वैखानसश्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसश्रौतसूत्र 31.32&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि आहिताग्नि अपने लोगों से सुदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो उसके शव को तिल-तेल से पूर्ण द्रोण (नाद) में रखकर गाड़ी द्वारा घर लाना चाहिए। रामायण में कई बार यही कहा गया है कि [[भरत (दशरथ पुत्र)|भरत]] के आने के बहुत दिन पूर्व ही राजा [[दशरथ]] का शव तेलपूर्ण लम्बे द्रोण या नाद में रख दिया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;अयोध्याकाण्ड, 66.14-16, 76.4&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णु पुराण में आया है कि [[निमि]] का शव तेल तथा अन्य सुगंधित पदार्थों से इस प्रकार सुरक्षित रखा हुआ था कि वह सड़ा नहीं और लगता था कि मृत्यु मानो अभी हुई हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*ऋग्वेद के प्रणयन के पूर्व की स्थिति के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद तथा [[सिंधु घाटी]] के [[मोहनजोदड़ो]] एवं [[हड़प्पा]] अवशेषों के काल के निर्णय के विषय में अभी कोई सामान्य निश्चय नहीं हो सका है। सर जॉन मार्शल&amp;lt;ref&amp;gt;मोहनजोदड़ो, जिल्द 1, पृष्ठ 86&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पूर्ण रूप से गाड़ने, आंशिक रूप से गाड़ने एवं शवदाह के उपरान्त गाड़ने के रीतियों की ओर संकेत किया है। लौरिया नन्दनगढ़ की खुदाई से कुछ ऐसी श्मशान भूमियों का पता चला है, जो वैदिक काल की कही जाती हैं और उनमें एक छोटी स्वर्णिम वस्तु पायी गयी है, जो नंगी स्त्री, सम्भवत: पृथिवी माता की हैं। ये सब बातें पुरातत्ववेत्ताओं से सम्बन्ध रखती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 126&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[आदि पुराण|आदिपुराण]] का एक वचन उद्धृत करते हुए लिखा है कि मग के लोग गाड़े जाते थे और दरद लोग एवं लुप्त्रक लोग अपने सम्बन्धियों के शवों को पेड़ पर लटकाकर चल देते थे।&lt;br /&gt;
====बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया====&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भिक बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरने वाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बान सुत्तगें बौद्धधर्म के महान प्रस्थापक की अन्त्येष्टि क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;4.14&amp;lt;/ref&amp;gt; इस ग्रन्थ से इस विषय में जो कुछ एकत्र किया जा सकता है, वह यह है-'बुद्ध के अत्यन्त प्रिय शिष्य आनन्द ने कोई पद्य नहीं कहा, कुछ ऐसे शिष्य जो विषयभोग से रहित नहीं थे, रो पड़े और पृथिवी पर धड़ाम से गिर पड़े, और अन्य लोग (अर्हत्) किसी प्रकार दु:ख को सम्भाल सके। दूसरे दिन आनन्द कुशीनारा के मल्लों के पास गये, मल्लों ने धूप, मालाएँ, वाद्ययंत्र तथा पाँच सौ प्रकार के वस्त्र आदि एकत्र किये; मल्लों ने शाल वृक्षों की कुंज में पड़े बुद्ध के शव की प्रार्थना सात दिनों तक की और नाच, स्तुतियों, गायन, मालाओं एवं गंधों से पूजा-अर्चनाएँ कीं और वस्त्रों से शव को ढँकते रहे। सातवें दिन वे भगवान के शव को दक्षिण की ओर ले चले, किन्तु एक चमत्कार&amp;lt;ref&amp;gt;6.29-32 में वर्णित&amp;lt;/ref&amp;gt; के कारण वे उत्तरी द्वार से नगर के बीच से होकर शव को लेकर चले और पूर्व दिशा में उसे रख दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;सामान्य नियम यह था कि शव को गाँव के मध्य से लेकर नहीं जाया जाता और उसे दक्षिण की और ले जाया जाता था, किन्तु बुद्ध इतने असाधारण एवं पवित्र थे कि उपर्युक्त प्रथाविरुद्ध ढंग उनके लिए मान्य हो गया।&amp;lt;/ref&amp;gt; बुद्ध का शव नये वस्त्रों से ढँका गया और ऊपर से रूई एवं ऊन के चोगे बाँधे गये और फिर उनके ऊपर एक नया वस्त्र बाँधा गया। इस प्रकार वस्त्रों एवं सूत्रों के पाँच सौ स्तरों से शरीर ढँक दिया गया। इसके उपरान्त एक ऐसे लोहे के तैलपात्र में रखा गया, जो स्वयं एक तैलपात्र में रखा हुआ था। इसके पश्चात् सभी प्रकार के गंधों से युक्त चिता बनायी गई और उस पर शव रख दिया गया। तब महाकस्सप एवं पाँच सौ अन्य बौद्धों ने, जो साथ में आये थे, अपने परिधानों को कंधों पर सजाया&amp;lt;ref&amp;gt;उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने [[यज्ञोपवीत]] को धारण करते हैं|उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने यज्ञोपवीत को धारण करते हैं&amp;lt;/ref&amp;gt;, उन्होंने बद्धबाहु होकर सिर झुकाया और श्रद्धापूर्वक शव की तीन बार प्रदक्षिणा की। इसके उपरान्त शव का दाह किया गया। केवल अस्थियाँ बच गयीं। इसके उपरान्त मगधराज, [[अजातशत्रु]], [[वैशाली]] के [[लिच्छवी|लिच्छवियों]] आदि ने [[बुद्ध]] के अवशेषों पर अपना-अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया। बुद्ध के [[अवशेष]] आठ भागों में बाँटे गये। जिन्हें ये भाग प्राप्त हुए, उन्होंने उन पर स्तूप (धूप) बनवाये, मोरिय लोगों ने जिन्हें केवल राख मात्र प्राप्त हुई थी, उस पर स्तूप बनवाया और एक ब्राह्मण द्रोण (दोन) ने उसे घड़े पर, जिसमें अस्थियाँ एकत्र कर रखी गयी थीं, एक स्तूप बनवाया।' श्री राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रन्थों एवं जन्म गाथाओं में अन्त्येष्टियों का वर्णन मिलता है, किन्तु कहीं भी प्रचलित धार्मिक क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जा सकता है कि बौद्ध अन्त्येष्टि क्रिया, यद्यपि सरल है, तथापि वह आश्वलायनगृह्यसूत्र के कुछ नियमों से बहुत कुछ मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए जे.आर.ए.एस. (1906, पृष्ठ 655-671 एवं 881-913) में प्रकाशित फ़्लीट के लेख, जो महापरिनिब्बान-सुत्त, दिव्यावदान, फाहियान के ग्रन्थ, सुमंगलविलासिनी एवं अन्य ग्रन्थों के आधार पर लिखे गये ऐसे लेख हैं, जो बुद्ध की अस्थियों एवं भस्म के बँटवारे अथवा उन पर बने स्तूपों पर प्रकाश डालते हैं। फ़्लीट का कहना है कि पिप्रहवा अवशेष-कुंभ में, जिस पर एक अभिलेख अंकित है, जो अब तक पाये गये [[अभिलेख|अभिलेखों]] में सबसे पुराना है (लगभग ईसापूर्व सन 375) और जिसमें सात सौ वस्तुएँ पायी गई हैं, भगवान बुद्ध के अवशेष चिह्न नहीं हैं, प्रत्युत उनके सम्बन्धियों के हैं। फ़्लीट ने एक परम्परा की ओर संकेत किया है जो बतलाती है कि सम्राट [[अशोक]] ने बुद्ध के अवशेष चिह्नों पर बने 8 स्तूपों में 7 को खोदकर उनमें पाये गये अवशेषों को 84000 सोने और चाँदी के पात्रों में परिवर्तित कर दिया और उन्हें सम्पूरण भारत में वितरित कर दिया। इस प्रकार 84000 स्तूपों का निर्माण उन पर किया गया। राइस डेविड्स ने अपने ग्रन्थ 'बुद्धिस्ट इंडिया' (पृष्ठ 78-80) में यह कहते हुए कि जन या धन से विशिष्ट मृत लोगों का राजकर्मचारियों या शिक्षकों के शव जलाये जाते और अवशिष्ट भस्मांश स्तूपों (पालि में थूप या टोप) के अन्दर गाड़ दिये जाते थे। निर्देश किया है कि साधारण लोगों के शव अजीव ढंग से रखे जाते थे। वे खुले स्थल में रख दिये जाते थे। नियमानुकूल वे शव या चितावशेष गाड़े नहीं जाते थे, प्रत्युत पक्षियों या पशुओं द्वारा नष्ट किये जाने के लिए छोड़ दिये जाते थे अथवा वे स्वयं प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====शीर्षक====&lt;br /&gt;
जब मृत के सम्बन्धीगण (पुत्र आदि) जल-तर्पण एवं स्नान करके जल (नदी, जलाशय आदि) से बाहर निकल कर हरी घास के किसी स्थल पर बैठ गये हों, तो गुरुजनों (वृद्ध आदि) को उनके दु:ख कम करने के लिए प्राचीन गाथाएँ कहनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.7 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 1.4.2 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोकमुत्सृज्य कल्याणीभिर्वाग्भि: सात्त्विकाभि: कथाभि: पुराणै: सुकृतिभि: श्रुत्वाधोमुखा व्रजन्ति। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौतमपितृमेधसूत्र (1.4.2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र 20.22-53&amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है कि किस प्रकार काल (समय, मृत्यु) सभी को, यहाँ तक इन्द्र, देवों, दैत्यों, महान राजाओं एवं ऋषियों को धर दबोचता है, कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेकर एक दिन मरण को प्राप्त होता ही है (मृत्यु अवश्यंभावी है), कि (पत्नी को छोड़कर) कोई भी मृत व्यक्ति के साथ यमलोक को नहीं जाता है, कि किस प्रकार सदसत् कर्म मृतात्मा के पास आते हैं, कि किस प्रकार श्राद्ध मृतात्मा के लिए कल्याणकर है। इसने निष्कर्ष निकाला है कि इसीलिए जीवित सम्बन्धियों को श्राद्ध करना चाहिए और रुदन छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उससे लाभ नहीं और केवल धर्म ही ऐसा है, जो मृतात्मा के साथ जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह अवलोकनीय है कि विष्णु धर्मसूत्र के कुछ पद्य (20.29, 48-49 एवं 51-53) भगवदगीता के पद्यों (2.22-28, 13.23-25) के समान ही हैं। विष्णु धर्मसूत्र (20.47 यथा धेनुसहस्रेषु आदि) शान्तिपर्व (181.16, 187.27 एवं 323.16) एवं विष्णुधर्मोत्तर (2.78.27) के समान ही है। इसी प्रकार देखिए विष्णुधर्मसूत्र (20.41) एवं शान्तिपर्व (175.15 एवं 322.73)। देखिए लक्ष्मीधर का कृत्यकल्पतरु (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 91-97), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.7, 11), विष्णुधर्मसूत्र (20.22-53) एवं भगवदगीता (2.13, 18)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी ही बातें याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;3.8-11=गरुड़पुराण 2.4.8184&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है; जो व्यक्ति मानव जीवन में, जो केले के पौधे के समान सारहीन है, और जो पानी के बुलबुले के समान अस्थिर है, अमरता खोजता है, वह भ्रम में पड़ा हुआ है। रुदन से क्या लाभ है जब कि शरीर पूर्व जन्म के कर्मों के कारण पंचतत्त्वों से निर्मित हो पुन: उन्हीं तत्त्वों में समा जाता है। पृथिवी, सागर और देवता नाश को प्राप्त होने वाले हैं (भविष्य में जब कि प्रलय होता है)। यह कैसे सम्भव है कि वह मृत्युलोक, जो फेन के समान क्षणभंगुर है, नाश को प्राप्त नहीं होगा? मृतात्मा को असहाय होकर अपने सम्बन्धियों के आँसू एवं नासिकारंध्रों से निकले द्रव पदार्थ को पीना पड़ता है, अत: उन सम्बन्धियों को रोना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म आदि करना चाहिए। गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने बलपूर्वक कहा है कि 'जो नाशवान है और जो सभी प्राणियो की विशेषता (नियति) है, उसके लिए रोना-कलपना क्या? केवल शुभ कर्मों के सम्पादन में, जो तुम्हारे साथ जाने वाले हैं, लगे रहो।' गोभिल ने याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.8-10&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[महाभारत]] को उद्धृत किया है-'सभी संग्रह क्षय को प्राप्त होते हैं, सभी उदय पतन को, सभी संयोग वियोग और जीवन मरण को।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छया:। संयोग विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।। और देखिए शान्तिपर्व (331.20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपरार्क ने रामायण एवं महाभारत से उदाहरण दिये हैं, यथा [[दुर्योधन]] की मृत्यु पर [[वासुदेव (कृष्ण)|वासुदेव]] द्वारा [[धृतराष्ट्र]] के प्रति कहे गये वचन। पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 292-293&amp;lt;/ref&amp;gt;, शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 205-206 &amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने विष्णुधर्मसूत्र, याज्ञवल्क्यस्मृति एवं गोभिलस्मृति के वचन उद्धृत किये हैं।&lt;br /&gt;
==सती प्रथा==&lt;br /&gt;
गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2.4.91-100&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पति की मृत्यु पर पत्नी के (पति चिता पर) बलिदान अर्थात् मर जाने एवं पतिव्रता की चमत्कारिक शक्ति के विषय में बहुत कुछ लिखा है और कहा है कि ब्राह्मण स्त्री को अपने पति से पृथक नहीं चलना चाहिए (अर्थात् साथ ही जल जाना चाहिए), किन्तु क्षत्रिय एवं अन्य नारियाँ ऐसा नहीं भी कर सकतीं। उसमें यह भी लिखा है कि सती प्रथा सभी नारियों, यहाँ तक की चाण्डाल नारियों के लिए भी, समान ही है, केवल गर्भवती नारियों को या उन्हें जिनके बच्चे अभी छोटे हों, ऐसा नहीं करना चाहिए। उसमें यह भी लिखा है कि जब तक पत्नी सती नहीं हो जाती, तब तक वह पुनर्जन्म से छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरुजनों का दार्शनिक उपदेश सुनने के उपरान्त सम्बन्धीगण अपने घर लौटते हैं। बच्चों को आगे करके द्वार पर खड़े होकर और मन को नियंत्रित कर नीम की पत्तियाँ दाँतों से चबाते हैं। आचमन करते हैं, अग्नि, जल, गोबर एवं श्वेत सरसों छूते हैं। इसके उपरान्त किसी पत्थर पर धीरे से, किन्तु दृढ़ता से पाँव रखकर घर में प्रवेश करते हैं। शंख के अनुसार सम्बन्धियों द्वारा दूर्वाप्रवाल (दूब की शाखा), अग्नि, बैल को छूना चाहिए, मृत को घर के द्वार पर पिण्ड देना चाहिए और तब घर में प्रवेश करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;दूर्वाप्रवालमग्निं वृषभं चालभ्य गृहद्वारे प्रेताय पिण्डं दत्त्वा पश्चात्प्रविशेयु:। शंख (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3।13, पराशरमाधवीय 1।2, पृष्ठ 293)।&amp;lt;/ref&amp;gt; बैजवाप&amp;lt;ref&amp;gt;बैजवाप शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 319&amp;lt;/ref&amp;gt;; निर्णयसिन्धु&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु 3, पृष्ठ 580&amp;lt;/ref&amp;gt; ने शमी, अश्मा (पत्थर), अग्नि को स्पर्श करते समय मन्त्रों के उच्चारण की व्यवस्था दी है और कहा है कि अपने एवं पशुओं (गाय एवं बकरी) के बीच में अग्नि रखकर उन्हें छूना चाहिए। एक ही प्रकार का भोजन खरीदना या दूसरे के घर से लेना चाहिए, उसमें नमक नहीं होना चाहिए, उसे केवल एक दिन और वह भी केवल एक बार खाना चाहिए तथा सारे कर्म तीन दिनों तक स्थगित रखने चाहिए। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.14&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उसके बतलाये हुए कर्मया&amp;lt;ref&amp;gt;ज्ञवल्क्यस्मृति 3.12&amp;lt;/ref&amp;gt;, यथा-नीम की पत्तियों को कुतरने से लेकर गृह प्रवेश तक के कार्य उन लोगों द्वारा भी सम्पादित होने चाहिए, जो सम्बन्धी नहीं हैं, किन्तु शव ढोने, उसे सँवारने, जलाने आदि में सम्मिलित थे।&lt;br /&gt;
======&lt;br /&gt;
[[शांखायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायन श्रौतसूत्र 4.15.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, आश्वलाय गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलाय गृह्यसूत्र 4.4.17-27&amp;lt;/ref&amp;gt;, बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 1.12.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 82.33-35 एवं 42-47&amp;lt;/ref&amp;gt;, पारस्कर गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्कर गृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.3.10.4-10&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[गौतम धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.15-36&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मनुस्मृति]]&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.73&amp;lt;/ref&amp;gt;, वसिष्ठ.&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठ. 4.14-15&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.16-17&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[विष्णु धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.14.17&amp;lt;/ref&amp;gt;, संवर्त&amp;lt;ref&amp;gt;संवर्त 39-43&amp;lt;/ref&amp;gt;, शंख&amp;lt;ref&amp;gt;शंख 15-25&amp;lt;/ref&amp;gt;, गरुड़ पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़ पुराण (प्रेतखंड, 5.1-5)&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने उन लोगों (पुरुषों एवं स्त्रियों) के लिए कतिपय नियम दिये हैं, जिनके सपिण्ड मर जाते हैं और लिखा है कि श्मशान से लौटने के उपरान्त तीन दिनों तक क्या करना चाहिए। शांखायन श्रौतसूत्र ने व्यवस्था दी है कि उन्हें खाली (बिस्तरहीन) भूमि पर सोना चाहिए, केवल याज्ञिक भोजन करना चाहिए, वैदिक अग्नियों से सम्बन्धित कर्मों को करते रहना चाहिए, किन्तु अन्य धार्मिक कृत्य नहीं करने चाहिए, और ऐसा एक रात के लिए या नौ रातों के लिए या अस्थि संचय करने तक करना चाहिए। आश्वलाय गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलाय गृह्यसूत्र 4.4.17-24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने निम्न बातें दी हैं-उस रात उन्हें भोजन नहीं बनाना चाहिए। खरीदकर या अन्य के घर से प्राप्त भोजन करना चाहिए, तीन रातों तक निर्मित या खान से प्राप्त नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि मुख्य गुरुओं&amp;lt;ref&amp;gt;पिता, माता या वह जिसने [[उपनयन संस्कार]] कराया हो या जिसने [[वेद]] पढ़ाया हो&amp;lt;/ref&amp;gt; में किसी की मृत्यु हो गयी हो, तो विकल्प 12 रातों तक दान देना तथा वेदाध्ययन स्थगित कर देना चाहिए। पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए, दिन में केवल एक बार खाना चाहिए। उस दिन वेदपाठ स्थगित रखना चाहिए तथा वेदाग्नियों के कृत्यों को छोड़कर अन्य धार्मिक कृत्य भी स्थगित कर देने चाहिए। वसिष्ठसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठसूत्र 4.14-15&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि सम्बन्धियों को चटाई पर तीन दिन बैठकर उपवास करना चाहिए। यदि उपवास न किया जा सके तो बाज़ार से मँगाकर या बिना माँगे प्राप्त भोजन सामग्री का आहार करना चाहिए। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उस रात उन्हें एक मिट्टी के पात्र में दूध एवं जल डालकर उसे खुले स्थान में शिक्य (सिकहर) पर रखकर यह कहना चाहिए-'हे मृतात्मा, यहाँ (जल में) स्नान करो और इस दूध को पीओ।' याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt;, पैठिनसि, मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.84&amp;lt;/ref&amp;gt;, पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि का कथन है कि मृतात्मा के सम्बन्धियों को श्रौत अग्नियों से सम्बन्धित आह्निककृत्य (अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास आदि) तथा स्मार्त अग्नियों वाले कृत्य (यथा, प्रात: एवं सायं के होम आदि) करते रहना चाहिए, क्योंकि वेद के ऐसे ही आदेश हैं (यथा, व्यक्ति को आमरण अग्निहोत्र करते जाना चाहिए)। टीकाकारों ने कई एक सीमाएँ एवं नियंत्रण घोषित किए हैं। मिताक्षरा&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.84&amp;lt;/ref&amp;gt; ने केवल श्रौत एवं स्मार्त अग्नियों के कृत्यों का अपवाद, किया है, अत: पंच महायज्ञ-जैसे धार्मिक कर्म नहीं करने चाहिए। वैश्वदेव, जिसका सम्पादन अग्नि में होता है, छोड़ दिया जाता है, क्योंकि संवर्त ने स्पष्ट रूप से कहा है कि (सपिण्ड की मृत्यु पर) ब्राह्मण को 10 दिनों तक वैश्वदेव रहित रहना चाहिए। श्रौत एवं स्मार्त कृत्य दूसरों के द्वारा करा देने चाहिए, जैसा कि पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र (3.10 'अन्य एतानि कृर्यु:')&amp;lt;/ref&amp;gt; ने स्पष्ट रूप से आज्ञापित किया है। केवल नित्य एवं नैमित्तक कृत्यों को, जो श्रौत एवं स्मार्त अग्नियों में किये जाते हैं, करने की आज्ञा दी गयी है, अत: काम्य कर्म नहीं किये जा सकते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===================================&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=234464</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=234464"/>
		<updated>2011-11-15T10:42:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
==संन्यासी को गाड़ने की प्रथा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति (संन्यासी) को प्राचीन काल में भी गाड़ा जाता था। ऊपर ऋतु का मत प्रकाशित किया गया है कि ब्रह्मचारी एवं यति का शव उत्तपन अग्नि से जलाया जाता है। इस विषय में शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्याख्या उपस्थित की है कि यहाँ पर यति कुटीचक श्रेणी का संन्यासी है और उसने यह भी बताया है कि चार प्रकार के संन्यासी लोगों (कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस) की अन्त्येष्टि किस प्रकार से की जाती है। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षेप में लिखा है, जिसे स्मृत्यर्थसार&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृत्यर्थसार, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ अन्तरों के साथ ग्रहण कर लिया है और परिव्राजक की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन उपस्थित किया है-किसी को ग्राम के पूर्व या दक्षिण में जाकर पलाश वृक्ष के नीचे या नदी तट पर या किसी अन्य स्वच्छ स्थल पर व्याहृतियों के साथ यति के दण्ड के बराबर गहरा गड्ढा खोदना चाहिए; इसके उपरान्त प्रत्येक बार सात व्याहृतियों के साथ उस पर तीन बार जल छिड़कना चाहिए, गड्ढे में दर्भ बिछा देना चाहिए, माला, चन्दनलेप आदि से शव को सजा देना चाहिए और मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.1.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ शव को गड्ढे में रख देना चाहिए। परिव्राजक के दाहिने हाथ में दण्ड तीन खण्डों में करके थमा देना चाहिए, और ऐसा करते समय ऋग्वेद;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.22.17&amp;lt;/ref&amp;gt; वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 5.15&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.2.13.1&amp;lt;/ref&amp;gt; का मन्त्रपाठ करना चाहिए। शिक्य को बायें हाथ में मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 4.2.5.2&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ रखा जाता है और फिर क्रम से पानी छानने वाला वस्त्र मुख पर&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.4.8.6 के मन्त्र के साथ&amp;lt;/ref&amp;gt;, गायत्री मन्त्र&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 3.62.10; वाजसनेयी संहिता 3.35; तैत्तिरीय संहिता 1.5.6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ पात्र को पेट पर और जलपात्र को गुप्तांगों के पास रखा जाता है। इसके उपरान्त 'चतुर्होतार:' मन्त्रों का पाठ किया जाता है। अन्य कृत्य नहीं किये जाते, न तो शवदाह होता है, न अशौच मनाया जाता है और न जल-तर्पण ही किया जाता है, क्योंकि यति संसार की विषयवासना से मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृत्यर्थसार ने इतना जोड़ दिया है कि न तो एकोद्दिष्ट श्राद्ध और न सपिण्डीकरण ही किया जाता है, केवल ग्यारहवें दिन पार्वण श्राद्ध होता है। किन्तु कुटिचक जलाया जाता है, बहूदक गाड़ा जाता है, हंस को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है और परमहंस को भली-भाँति गाड़ा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु, पृष्ठ 634-635&amp;lt;/ref&amp;gt; गाड़ने के उपरान्त गड्ढे को भली-भाँति बालू से ढँक दिया जाता है, जिससे कुत्ते, श्रृगाल आदि शव को (पंजों से गड्ढा खोदकर) निकाल न डालें। धर्मसिंधु&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 497&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि मस्तक को शंख या कुल्हाड़ी से छेद देना चाहिए, यदि ऐसा करने में असमर्थता प्रदर्शित हो तो मस्तक पर गुड़ की भेली रखकर उसे ही तोड़ देना चाहिए। इसने भी यही कहा है कि कुटीचक को छोड़कर कोई यति नहीं जलाया जाता। आजकल सभी यति गाड़े जाते हैं, क्योंकि बहूदक एवं कुटीचक आजकल पाये नहीं जाते, केवल परमहंस ही देखने में आते हैं। यतियों को क्यों गाड़ा जाता है? सम्भवत: उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थों की भाँति श्रौताग्नियाँ या स्मार्ताग्नियाँ नहीं रखते और वे लोग भोजन के लिए साधारण अग्नि भी नहीं जलाते। गृहस्थ लोग अपनी श्रौत या स्मार्त अग्नियों के साथ जलाये जाते हैं, किन्तु यति लोग बिना अग्नि के होते हैं, अत: गाड़े जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;गाड़ने की विधि के लिए देखिए वैखानसस्मार्तसूत्र (10.8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==गर्भिणी नारी के शवदाह के नियम== &lt;br /&gt;
जो स्त्रियाँ बच्चा जनते समय या जनने के तुरन्त उपरान्त ही या मासिक धर्म की अवधि में मर जाती हैं, उनके शवदाह के विषय में विशिष्ट नियम हैं। मिताक्षरा द्वारा उद्धृत एक स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका (1, पृष्ठ 121)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सूतिका के विषय में लिखा है कि एक पात्र में जल एवं पंचगव्य लेकर मन्त्रोचारण&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.9.1-9, 'आपो हि ष्ठा'&amp;lt;/ref&amp;gt; करना चाहिए और उससे सूतिका को स्नान कराकर जलाना चाहिए। मासिक धर्म वाली मृत नारी को भी इसी प्रकार जलाना चाहिए, किन्तु उसे दूसरा वस्त्र पहनाकर जलाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए गरुड़पुराण (2.4.171) एवं निर्णयसिंधु (पृष्ठ 621)&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार गर्भिणी नारी के शव के विषय में भी नियम हैं&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.9; निर्णयसिंधु, पृष्ठ 622&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विभिन्न कालों में शव-क्रिया==&lt;br /&gt;
विभिन्न कालों एवं विभिन्न देशों में शव-क्रिया (अन्त्येष्टि क्रिया) विभिन्न ढंगों से की जाती रही है। अन्त्येष्टि क्रिया के विभिन्न प्रकार ये हैं-जलाना (शवदाह), भूमि में गाड़ना, जल में बहा देना, शव को खुला छोड़ देना, जिससे चील, गिद्ध, कोए या पशु आदि उसे खा लें (यथा पारसियों में)&amp;lt;ref&amp;gt;पारसियों के शास्त्रों के अनुसार शव को गाड़ देना महान अपराध माना जाता है। यदि शव कब्र से बाहर नहीं निकाला गया तो मज्द के क़ानून के प्राध्यापक (शिक्षक) के विषय में कोई प्रायश्चित नहीं है, या उसके लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है, जिसने मज्द के क़ानून को पढ़ा है, और जब वे छ: मास या एक वर्ष के भीतर शव को कब्र से बाहर नहीं निकालते तो उन्हें क्रम से 500 या 1000 कोड़े खाने पड़ते हैं। देखिए वेंडिडाड, फ़र्गार्ड 3 (सैक्रेड बुक आफ़ दि ईस्ट, जिल्द 4, पृष्ठ 31-32)। पर्वतों के शिखरों पर शव रख दिये जाते हैं और उन्हें पक्षीगण एवं कुत्ते खा डालते हैं। शव को खुला छोड़ देना मज्द रीति की अत्यन्त विचित्र बात है।&amp;lt;/ref&amp;gt;, गुफ़ाओं में सुरक्षित रख छोड़ना या ममी रूप में (यथा मिस्र में) सुरक्षित रख छोड़ना।&amp;lt;ref&amp;gt;पियाज्ज़ा बर्बेरिनी के पास रोम के कपूचिन चर्च के भूगर्भ कब्रगाहों की दीवारों में 4000 पादरियों की हड्डियाँ सुरक्षित हैं। देखिए पक्ल की पुस्तक 'फ़्यूनरल कस्टम्स (पृष्ठ 136)'।&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक हमें साहित्यिक प्रमाण मिलता है, भारत में सामान्य नियम शव को जला देना ही था, किन्तु अपवाद भी थे, यथा-शिशुओं, संन्यासियों आदि के विषय में। प्राचीन भारतीयों ने शवदाह की वैज्ञानिक किन्तु कठोर हृदय वाली विधि किस प्रकार निकाली, यह बतलाना कठिन है। प्राचीन भारत में शव को गाड़ देने की बात अज्ञात नहीं थी।&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 5.30.14 'मा नु भूमिगृहो भुवत' एवं 18.2.34&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्तिम मन्त्र का रूप यों है-&amp;quot;हे अग्नि, उन सभी पितरों को यहाँ ले आओ, जिससे कि वे हवि ग्रहण करें, उन्हें भी बुलाओ, जिनके शरीर गाड़े गये थे या खुले रूप में छोड़ दिये गये थे या ऊपर (पेड़ों पर या गुहाओं में?) रख दिये गये थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिता:। सर्वास्तानग्न आ वह पितृन् हविषे अत्तवे।। अथर्ववेद (18.2.14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु सम्भव है कि शव के गाड़ने की ओर संकेत न भी हो। कुछ पूर्वज बहुत दूर लड़ाई में मारे गये हों, या शत्रुओं द्वारा पकड़ लिये गये हों, मार डाले गये हों और उनके शव यों ही छोड़ दिये गये हों, अर्थात् न तो उन्हें जलाया गया, न गाड़ दिया गया। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 8.8.5&amp;lt;/ref&amp;gt; में आये हुए एक कथन से कुछ विद्वान गाड़ने की बात निकालते हैं-'अत: वे उन भी मनुष्यों को असुर नाम देते हैं, जो दान नहीं देते, जो विश्वास नहीं रखते (धर्म नहीं मानते) और न ही यज्ञ करते हैं; क्योंकि यह असुरों का गूढ़ सिद्धान्त है। वे मृत के शरीर को भिक्षा (धूप-गंध या पुष्प?) एवं वस्त्र से सँवारते हैं और सोचते हैं कि वे इस प्रकार दूसरे लोक को जीत लेंगे।' यद्यपि यह वचन स्पष्ट नहीं है किन्तु असुरों, उनके शव श्रृंगार और परलोक प्राप्ति की ओर जो संकेत हैं, उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि असुरों में शव को गाड़ने की प्रथा सम्भवत: थी। ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 7.89.1&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऋषि ने प्रार्थना की है कि 'हे वरुण, मैं मिट्टी के घर में न जाऊँ।' सम्भवत: यह गाड़ने की प्रथा की ओर संकेत है। इसके अतिरिक्त अस्थियों को इकट्ठा करके पात्र में रखकर भूमि में गाड़ने और बहुत दिनों उपरान्त उस पर श्मशान बना देने आदि की प्रथा भी प्रचलित थी। अथर्ववेद&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 18.2.25&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है-'उन्हें वृक्ष कष्ट न दे और पृथिवी माता ही (ऐसा करे)।' इससे शवाधार (ताबूत) एवं शव को गाड़ने की ओर सम्भवत: संकेत मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*यह कुछ विचित्र सा है कि प्रगतिशील राष्ट्र बाइबिल के कथन की शाब्दिक व्याख्या में विश्वास करते हुए कि 'मृत का भौतिक शरीरोत्थान होता है', केवल शव को गाड़ने की प्रथा से ही चिपके रहे और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ईसाई लोक शवदाह के लिए कभी तत्पर नहीं हुए। सन 1906 में क्रेमेशन एक्ट (इंग्लैण्ड में) पारित हुआ जिसके अनुसार स्वास्थ्यमंत्री-समर्थित समतल भूमि पर शवदाह करने की अनुमति अन्त्येष्टि क्रिया के अध्यक्ष को प्राप्त होने लगी। कैथोलिक चर्च वाले अब भी शवदाह नहीं करते। आदिकालीन रोम के लोग शवदाह को सम्मान्य समझते थे और शव गाड़ने की रीति केवल उन लोगों के लिए बरती जाती थी, जो आत्महन्ता या हत्यारे होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुछ समय तक शव को विकृत होने से बचाने के लिए तेल आदि में रख छोड़ना भारत में अज्ञात नहीं था। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 29.4.29&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वैखानसश्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसश्रौतसूत्र 31.32&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि आहिताग्नि अपने लोगों से सुदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो उसके शव को तिल-तेल से पूर्ण द्रोण (नाद) में रखकर गाड़ी द्वारा घर लाना चाहिए। रामायण में कई बार यही कहा गया है कि [[भरत (दशरथ पुत्र)|भरत]] के आने के बहुत दिन पूर्व ही राजा [[दशरथ]] का शव तेलपूर्ण लम्बे द्रोण या नाद में रख दिया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;अयोध्याकाण्ड, 66.14-16, 76.4&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णु पुराण में आया है कि [[निमि]] का शव तेल तथा अन्य सुगंधित पदार्थों से इस प्रकार सुरक्षित रखा हुआ था कि वह सड़ा नहीं और लगता था कि मृत्यु मानो अभी हुई हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*ऋग्वेद के प्रणयन के पूर्व की स्थिति के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद तथा [[सिंधु घाटी]] के [[मोहनजोदड़ो]] एवं [[हड़प्पा]] अवशेषों के काल के निर्णय के विषय में अभी कोई सामान्य निश्चय नहीं हो सका है। सर जॉन मार्शल&amp;lt;ref&amp;gt;मोहनजोदड़ो, जिल्द 1, पृष्ठ 86&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पूर्ण रूप से गाड़ने, आंशिक रूप से गाड़ने एवं शवदाह के उपरान्त गाड़ने के रीतियों की ओर संकेत किया है। लौरिया नन्दनगढ़ की खुदाई से कुछ ऐसी श्मशान भूमियों का पता चला है, जो वैदिक काल की कही जाती हैं और उनमें एक छोटी स्वर्णिम वस्तु पायी गयी है, जो नंगी स्त्री, सम्भवत: पृथिवी माता की हैं। ये सब बातें पुरातत्ववेत्ताओं से सम्बन्ध रखती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 126&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[आदि पुराण|आदिपुराण]] का एक वचन उद्धृत करते हुए लिखा है कि मग के लोग गाड़े जाते थे और दरद लोग एवं लुप्त्रक लोग अपने सम्बन्धियों के शवों को पेड़ पर लटकाकर चल देते थे।&lt;br /&gt;
====बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया====&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भिक बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरने वाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बान सुत्तगें बौद्धधर्म के महान प्रस्थापक की अन्त्येष्टि क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;4.14&amp;lt;/ref&amp;gt; इस ग्रन्थ से इस विषय में जो कुछ एकत्र किया जा सकता है, वह यह है-'बुद्ध के अत्यन्त प्रिय शिष्य आनन्द ने कोई पद्य नहीं कहा, कुछ ऐसे शिष्य जो विषयभोग से रहित नहीं थे, रो पड़े और पृथिवी पर धड़ाम से गिर पड़े, और अन्य लोग (अर्हत्) किसी प्रकार दु:ख को सम्भाल सके। दूसरे दिन आनन्द कुशीनारा के मल्लों के पास गये, मल्लों ने धूप, मालाएँ, वाद्ययंत्र तथा पाँच सौ प्रकार के वस्त्र आदि एकत्र किये; मल्लों ने शाल वृक्षों की कुंज में पड़े बुद्ध के शव की प्रार्थना सात दिनों तक की और नाच, स्तुतियों, गायन, मालाओं एवं गंधों से पूजा-अर्चनाएँ कीं और वस्त्रों से शव को ढँकते रहे। सातवें दिन वे भगवान के शव को दक्षिण की ओर ले चले, किन्तु एक चमत्कार&amp;lt;ref&amp;gt;6.29-32 में वर्णित&amp;lt;/ref&amp;gt; के कारण वे उत्तरी द्वार से नगर के बीच से होकर शव को लेकर चले और पूर्व दिशा में उसे रख दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;सामान्य नियम यह था कि शव को गाँव के मध्य से लेकर नहीं जाया जाता और उसे दक्षिण की और ले जाया जाता था, किन्तु बुद्ध इतने असाधारण एवं पवित्र थे कि उपर्युक्त प्रथाविरुद्ध ढंग उनके लिए मान्य हो गया।&amp;lt;/ref&amp;gt; बुद्ध का शव नये वस्त्रों से ढँका गया और ऊपर से रूई एवं ऊन के चोगे बाँधे गये और फिर उनके ऊपर एक नया वस्त्र बाँधा गया। इस प्रकार वस्त्रों एवं सूत्रों के पाँच सौ स्तरों से शरीर ढँक दिया गया। इसके उपरान्त एक ऐसे लोहे के तैलपात्र में रखा गया, जो स्वयं एक तैलपात्र में रखा हुआ था। इसके पश्चात् सभी प्रकार के गंधों से युक्त चिता बनायी गई और उस पर शव रख दिया गया। तब महाकस्सप एवं पाँच सौ अन्य बौद्धों ने, जो साथ में आये थे, अपने परिधानों को कंधों पर सजाया&amp;lt;ref&amp;gt;उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने [[यज्ञोपवीत]] को धारण करते हैं|उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने यज्ञोपवीत को धारण करते हैं&amp;lt;/ref&amp;gt;, उन्होंने बद्धबाहु होकर सिर झुकाया और श्रद्धापूर्वक शव की तीन बार प्रदक्षिणा की। इसके उपरान्त शव का दाह किया गया। केवल अस्थियाँ बच गयीं। इसके उपरान्त मगधराज, [[अजातशत्रु]], [[वैशाली]] के [[लिच्छवी|लिच्छवियों]] आदि ने [[बुद्ध]] के अवशेषों पर अपना-अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया। बुद्ध के [[अवशेष]] आठ भागों में बाँटे गये। जिन्हें ये भाग प्राप्त हुए, उन्होंने उन पर स्तूप (धूप) बनवाये, मोरिय लोगों ने जिन्हें केवल राख मात्र प्राप्त हुई थी, उस पर स्तूप बनवाया और एक ब्राह्मण द्रोण (दोन) ने उसे घड़े पर, जिसमें अस्थियाँ एकत्र कर रखी गयी थीं, एक स्तूप बनवाया।' श्री राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रन्थों एवं जन्म गाथाओं में अन्त्येष्टियों का वर्णन मिलता है, किन्तु कहीं भी प्रचलित धार्मिक क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जा सकता है कि बौद्ध अन्त्येष्टि क्रिया, यद्यपि सरल है, तथापि वह आश्वलायनगृह्यसूत्र के कुछ नियमों से बहुत कुछ मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए जे.आर.ए.एस. (1906, पृष्ठ 655-671 एवं 881-913) में प्रकाशित फ़्लीट के लेख, जो महापरिनिब्बान-सुत्त, दिव्यावदान, फाहियान के ग्रन्थ, सुमंगलविलासिनी एवं अन्य ग्रन्थों के आधार पर लिखे गये ऐसे लेख हैं, जो बुद्ध की अस्थियों एवं भस्म के बँटवारे अथवा उन पर बने स्तूपों पर प्रकाश डालते हैं। फ़्लीट का कहना है कि पिप्रहवा अवशेष-कुंभ में, जिस पर एक अभिलेख अंकित है, जो अब तक पाये गये [[अभिलेख|अभिलेखों]] में सबसे पुराना है (लगभग ईसापूर्व सन 375) और जिसमें सात सौ वस्तुएँ पायी गई हैं, भगवान बुद्ध के अवशेष चिह्न नहीं हैं, प्रत्युत उनके सम्बन्धियों के हैं। फ़्लीट ने एक परम्परा की ओर संकेत किया है जो बतलाती है कि सम्राट [[अशोक]] ने बुद्ध के अवशेष चिह्नों पर बने 8 स्तूपों में 7 को खोदकर उनमें पाये गये अवशेषों को 84000 सोने और चाँदी के पात्रों में परिवर्तित कर दिया और उन्हें सम्पूरण भारत में वितरित कर दिया। इस प्रकार 84000 स्तूपों का निर्माण उन पर किया गया। राइस डेविड्स ने अपने ग्रन्थ 'बुद्धिस्ट इंडिया' (पृष्ठ 78-80) में यह कहते हुए कि जन या धन से विशिष्ट मृत लोगों का राजकर्मचारियों या शिक्षकों के शव जलाये जाते और अवशिष्ट भस्मांश स्तूपों (पालि में थूप या टोप) के अन्दर गाड़ दिये जाते थे। निर्देश किया है कि साधारण लोगों के शव अजीव ढंग से रखे जाते थे। वे खुले स्थल में रख दिये जाते थे। नियमानुकूल वे शव या चितावशेष गाड़े नहीं जाते थे, प्रत्युत पक्षियों या पशुओं द्वारा नष्ट किये जाने के लिए छोड़ दिये जाते थे अथवा वे स्वयं प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====शीर्षक====&lt;br /&gt;
जब मृत के सम्बन्धीगण (पुत्र आदि) जल-तर्पण एवं स्नान करके जल (नदी, जलाशय आदि) से बाहर निकल कर हरी घास के किसी स्थल पर बैठ गये हों, तो गुरुजनों (वृद्ध आदि) को उनके दु:ख कम करने के लिए प्राचीन गाथाएँ कहनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.7 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 1.4.2 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोकमुत्सृज्य कल्याणीभिर्वाग्भि: सात्त्विकाभि: कथाभि: पुराणै: सुकृतिभि: श्रुत्वाधोमुखा व्रजन्ति। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौतमपितृमेधसूत्र (1.4.2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र 20.22-53&amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है कि किस प्रकार काल (समय, मृत्यु) सभी को, यहाँ तक इन्द्र, देवों, दैत्यों, महान राजाओं एवं ऋषियों को धर दबोचता है, कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेकर एक दिन मरण को प्राप्त होता ही है (मृत्यु अवश्यंभावी है), कि (पत्नी को छोड़कर) कोई भी मृत व्यक्ति के साथ यमलोक को नहीं जाता है, कि किस प्रकार सदसत् कर्म मृतात्मा के पास आते हैं, कि किस प्रकार श्राद्ध मृतात्मा के लिए कल्याणकर है। इसने निष्कर्ष निकाला है कि इसीलिए जीवित सम्बन्धियों को श्राद्ध करना चाहिए और रुदन छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उससे लाभ नहीं और केवल धर्म ही ऐसा है, जो मृतात्मा के साथ जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह अवलोकनीय है कि विष्णु धर्मसूत्र के कुछ पद्य (20.29, 48-49 एवं 51-53) भगवदगीता के पद्यों (2.22-28, 13.23-25) के समान ही हैं। विष्णु धर्मसूत्र (20.47 यथा धेनुसहस्रेषु आदि) शान्तिपर्व (181.16, 187.27 एवं 323.16) एवं विष्णुधर्मोत्तर (2.78.27) के समान ही है। इसी प्रकार देखिए विष्णुधर्मसूत्र (20.41) एवं शान्तिपर्व (175.15 एवं 322.73)। देखिए लक्ष्मीधर का कृत्यकल्पतरु (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 91-97), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.7, 11), विष्णुधर्मसूत्र (20.22-53) एवं भगवदगीता (2.13, 18)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी ही बातें याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;3.8-11=गरुड़पुराण 2.4.8184&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है; जो व्यक्ति मानव जीवन में, जो केले के पौधे के समान सारहीन है, और जो पानी के बुलबुले के समान अस्थिर है, अमरता खोजता है, वह भ्रम में पड़ा हुआ है। रुदन से क्या लाभ है जब कि शरीर पूर्व जन्म के कर्मों के कारण पंचतत्त्वों से निर्मित हो पुन: उन्हीं तत्त्वों में समा जाता है। पृथिवी, सागर और देवता नाश को प्राप्त होने वाले हैं (भविष्य में जब कि प्रलय होता है)। यह कैसे सम्भव है कि वह मृत्युलोक, जो फेन के समान क्षणभंगुर है, नाश को प्राप्त नहीं होगा? मृतात्मा को असहाय होकर अपने सम्बन्धियों के आँसू एवं नासिकारंध्रों से निकले द्रव पदार्थ को पीना पड़ता है, अत: उन सम्बन्धियों को रोना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म आदि करना चाहिए। गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने बलपूर्वक कहा है कि 'जो नाशवान है और जो सभी प्राणियो की विशेषता (नियति) है, उसके लिए रोना-कलपना क्या? केवल शुभ कर्मों के सम्पादन में, जो तुम्हारे साथ जाने वाले हैं, लगे रहो।' गोभिल ने याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.8-10&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[महाभारत]] को उद्धृत किया है-'सभी संग्रह क्षय को प्राप्त होते हैं, सभी उदय पतन को, सभी संयोग वियोग और जीवन मरण को।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छया:। संयोग विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।। और देखिए शान्तिपर्व (331.20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपरार्क ने रामायण एवं महाभारत से उदाहरण दिये हैं, यथा [[दुर्योधन]] की मृत्यु पर [[वासुदेव (कृष्ण)|वासुदेव]] द्वारा [[धृतराष्ट्र]] के प्रति कहे गये वचन। पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 292-293&amp;lt;/ref&amp;gt;, शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 205-206 &amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने विष्णुधर्मसूत्र, याज्ञवल्क्यस्मृति एवं गोभिलस्मृति के वचन उद्धृत किये हैं।&lt;br /&gt;
==सती प्रथा==&lt;br /&gt;
गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2.4.91-100&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पति की मृत्यु पर पत्नी के (पति चिता पर) बलिदान अर्थात् मर जाने एवं पतिव्रता की चमत्कारिक शक्ति के विषय में बहुत कुछ लिखा है और कहा है कि ब्राह्मण स्त्री को अपने पति से पृथक नहीं चलना चाहिए (अर्थात् साथ ही जल जाना चाहिए), किन्तु क्षत्रिय एवं अन्य नारियाँ ऐसा नहीं भी कर सकतीं। उसमें यह भी लिखा है कि सती प्रथा सभी नारियों, यहाँ तक की चाण्डाल नारियों के लिए भी, समान ही है, केवल गर्भवती नारियों को या उन्हें जिनके बच्चे अभी छोटे हों, ऐसा नहीं करना चाहिए। उसमें यह भी लिखा है कि जब तक पत्नी सती नहीं हो जाती, तब तक वह पुनर्जन्म से छुटकारा नहीं प्राप्त कर सकती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरुजनों का दार्शनिक उपदेश सुनने के उपरान्त सम्बन्धीगण अपने घर लौटते हैं। बच्चों को आगे करके द्वार पर खड़े होकर और मन को नियंत्रित कर नीम की पत्तियाँ दाँतों से चबाते हैं। आचमन करते हैं, अग्नि, जल, गोबर एवं श्वेत सरसों छूते हैं। इसके उपरान्त किसी पत्थर पर धीरे से, किन्तु दृढ़ता से पाँव रखकर घर में प्रवेश करते हैं। शंख के अनुसार सम्बन्धियों द्वारा दूर्वाप्रवाल (दूब की शाखा), अग्नि, बैल को छूना चाहिए, मृत को घर के द्वार पर पिण्ड देना चाहिए और तब घर में प्रवेश करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;दूर्वाप्रवालमग्निं वृषभं चालभ्य गृहद्वारे प्रेताय पिण्डं दत्त्वा पश्चात्प्रविशेयु:। शंख (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3।13, पराशरमाधवीय 1।2, पृष्ठ 293)।&amp;lt;/ref&amp;gt; बैजवाप&amp;lt;ref&amp;gt;बैजवाप शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 319&amp;lt;/ref&amp;gt;; निर्णयसिन्धु&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु 3, पृष्ठ 580&amp;lt;/ref&amp;gt; ने शमी, अश्मा (पत्थर), अग्नि को स्पर्श करते समय मन्त्रों के उच्चारण की व्यवस्था दी है और कहा है कि अपने एवं पशुओं (गाय एवं बकरी) के बीच में अग्नि रखकर उन्हें छूना चाहिए। एक ही प्रकार का भोजन खरीदना या दूसरे के घर से लेना चाहिए, उसमें नमक नहीं होना चाहिए, उसे केवल एक दिन और वह भी केवल एक बार खाना चाहिए तथा सारे कर्म तीन दिनों तक स्थगित रखने चाहिए। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.14&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उसके बतलाये हुए कर्मया&amp;lt;ref&amp;gt;ज्ञवल्क्यस्मृति 3.12&amp;lt;/ref&amp;gt;, यथा-नीम की पत्तियों को कुतरने से लेकर गृह प्रवेश तक के कार्य उन लोगों द्वारा भी सम्पादित होने चाहिए, जो सम्बन्धी नहीं हैं, किन्तु शव ढोने, उसे सँवारने, जलाने आदि में सम्मिलित थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===================================&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=234457</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
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		<updated>2011-11-15T10:35:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: /* विभिन्न कालों में शव-क्रिया */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
==संन्यासी को गाड़ने की प्रथा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति (संन्यासी) को प्राचीन काल में भी गाड़ा जाता था। ऊपर ऋतु का मत प्रकाशित किया गया है कि ब्रह्मचारी एवं यति का शव उत्तपन अग्नि से जलाया जाता है। इस विषय में शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्याख्या उपस्थित की है कि यहाँ पर यति कुटीचक श्रेणी का संन्यासी है और उसने यह भी बताया है कि चार प्रकार के संन्यासी लोगों (कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस) की अन्त्येष्टि किस प्रकार से की जाती है। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षेप में लिखा है, जिसे स्मृत्यर्थसार&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृत्यर्थसार, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ अन्तरों के साथ ग्रहण कर लिया है और परिव्राजक की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन उपस्थित किया है-किसी को ग्राम के पूर्व या दक्षिण में जाकर पलाश वृक्ष के नीचे या नदी तट पर या किसी अन्य स्वच्छ स्थल पर व्याहृतियों के साथ यति के दण्ड के बराबर गहरा गड्ढा खोदना चाहिए; इसके उपरान्त प्रत्येक बार सात व्याहृतियों के साथ उस पर तीन बार जल छिड़कना चाहिए, गड्ढे में दर्भ बिछा देना चाहिए, माला, चन्दनलेप आदि से शव को सजा देना चाहिए और मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.1.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ शव को गड्ढे में रख देना चाहिए। परिव्राजक के दाहिने हाथ में दण्ड तीन खण्डों में करके थमा देना चाहिए, और ऐसा करते समय ऋग्वेद;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.22.17&amp;lt;/ref&amp;gt; वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 5.15&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.2.13.1&amp;lt;/ref&amp;gt; का मन्त्रपाठ करना चाहिए। शिक्य को बायें हाथ में मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 4.2.5.2&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ रखा जाता है और फिर क्रम से पानी छानने वाला वस्त्र मुख पर&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.4.8.6 के मन्त्र के साथ&amp;lt;/ref&amp;gt;, गायत्री मन्त्र&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 3.62.10; वाजसनेयी संहिता 3.35; तैत्तिरीय संहिता 1.5.6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ पात्र को पेट पर और जलपात्र को गुप्तांगों के पास रखा जाता है। इसके उपरान्त 'चतुर्होतार:' मन्त्रों का पाठ किया जाता है। अन्य कृत्य नहीं किये जाते, न तो शवदाह होता है, न अशौच मनाया जाता है और न जल-तर्पण ही किया जाता है, क्योंकि यति संसार की विषयवासना से मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृत्यर्थसार ने इतना जोड़ दिया है कि न तो एकोद्दिष्ट श्राद्ध और न सपिण्डीकरण ही किया जाता है, केवल ग्यारहवें दिन पार्वण श्राद्ध होता है। किन्तु कुटिचक जलाया जाता है, बहूदक गाड़ा जाता है, हंस को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है और परमहंस को भली-भाँति गाड़ा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु, पृष्ठ 634-635&amp;lt;/ref&amp;gt; गाड़ने के उपरान्त गड्ढे को भली-भाँति बालू से ढँक दिया जाता है, जिससे कुत्ते, श्रृगाल आदि शव को (पंजों से गड्ढा खोदकर) निकाल न डालें। धर्मसिंधु&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 497&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि मस्तक को शंख या कुल्हाड़ी से छेद देना चाहिए, यदि ऐसा करने में असमर्थता प्रदर्शित हो तो मस्तक पर गुड़ की भेली रखकर उसे ही तोड़ देना चाहिए। इसने भी यही कहा है कि कुटीचक को छोड़कर कोई यति नहीं जलाया जाता। आजकल सभी यति गाड़े जाते हैं, क्योंकि बहूदक एवं कुटीचक आजकल पाये नहीं जाते, केवल परमहंस ही देखने में आते हैं। यतियों को क्यों गाड़ा जाता है? सम्भवत: उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थों की भाँति श्रौताग्नियाँ या स्मार्ताग्नियाँ नहीं रखते और वे लोग भोजन के लिए साधारण अग्नि भी नहीं जलाते। गृहस्थ लोग अपनी श्रौत या स्मार्त अग्नियों के साथ जलाये जाते हैं, किन्तु यति लोग बिना अग्नि के होते हैं, अत: गाड़े जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;गाड़ने की विधि के लिए देखिए वैखानसस्मार्तसूत्र (10.8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==गर्भिणी नारी के शवदाह के नियम== &lt;br /&gt;
जो स्त्रियाँ बच्चा जनते समय या जनने के तुरन्त उपरान्त ही या मासिक धर्म की अवधि में मर जाती हैं, उनके शवदाह के विषय में विशिष्ट नियम हैं। मिताक्षरा द्वारा उद्धृत एक स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका (1, पृष्ठ 121)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सूतिका के विषय में लिखा है कि एक पात्र में जल एवं पंचगव्य लेकर मन्त्रोचारण&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.9.1-9, 'आपो हि ष्ठा'&amp;lt;/ref&amp;gt; करना चाहिए और उससे सूतिका को स्नान कराकर जलाना चाहिए। मासिक धर्म वाली मृत नारी को भी इसी प्रकार जलाना चाहिए, किन्तु उसे दूसरा वस्त्र पहनाकर जलाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए गरुड़पुराण (2.4.171) एवं निर्णयसिंधु (पृष्ठ 621)&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार गर्भिणी नारी के शव के विषय में भी नियम हैं&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.9; निर्णयसिंधु, पृष्ठ 622&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विभिन्न कालों में शव-क्रिया==&lt;br /&gt;
विभिन्न कालों एवं विभिन्न देशों में शव-क्रिया (अन्त्येष्टि क्रिया) विभिन्न ढंगों से की जाती रही है। अन्त्येष्टि क्रिया के विभिन्न प्रकार ये हैं-जलाना (शवदाह), भूमि में गाड़ना, जल में बहा देना, शव को खुला छोड़ देना, जिससे चील, गिद्ध, कोए या पशु आदि उसे खा लें (यथा पारसियों में)&amp;lt;ref&amp;gt;पारसियों के शास्त्रों के अनुसार शव को गाड़ देना महान अपराध माना जाता है। यदि शव कब्र से बाहर नहीं निकाला गया तो मज्द के क़ानून के प्राध्यापक (शिक्षक) के विषय में कोई प्रायश्चित नहीं है, या उसके लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है, जिसने मज्द के क़ानून को पढ़ा है, और जब वे छ: मास या एक वर्ष के भीतर शव को कब्र से बाहर नहीं निकालते तो उन्हें क्रम से 500 या 1000 कोड़े खाने पड़ते हैं। देखिए वेंडिडाड, फ़र्गार्ड 3 (सैक्रेड बुक आफ़ दि ईस्ट, जिल्द 4, पृष्ठ 31-32)। पर्वतों के शिखरों पर शव रख दिये जाते हैं और उन्हें पक्षीगण एवं कुत्ते खा डालते हैं। शव को खुला छोड़ देना मज्द रीति की अत्यन्त विचित्र बात है।&amp;lt;/ref&amp;gt;, गुफ़ाओं में सुरक्षित रख छोड़ना या ममी रूप में (यथा मिस्र में) सुरक्षित रख छोड़ना।&amp;lt;ref&amp;gt;पियाज्ज़ा बर्बेरिनी के पास रोम के कपूचिन चर्च के भूगर्भ कब्रगाहों की दीवारों में 4000 पादरियों की हड्डियाँ सुरक्षित हैं। देखिए पक्ल की पुस्तक 'फ़्यूनरल कस्टम्स (पृष्ठ 136)'।&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक हमें साहित्यिक प्रमाण मिलता है, भारत में सामान्य नियम शव को जला देना ही था, किन्तु अपवाद भी थे, यथा-शिशुओं, संन्यासियों आदि के विषय में। प्राचीन भारतीयों ने शवदाह की वैज्ञानिक किन्तु कठोर हृदय वाली विधि किस प्रकार निकाली, यह बतलाना कठिन है। प्राचीन भारत में शव को गाड़ देने की बात अज्ञात नहीं थी।&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 5.30.14 'मा नु भूमिगृहो भुवत' एवं 18.2.34&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्तिम मन्त्र का रूप यों है-&amp;quot;हे अग्नि, उन सभी पितरों को यहाँ ले आओ, जिससे कि वे हवि ग्रहण करें, उन्हें भी बुलाओ, जिनके शरीर गाड़े गये थे या खुले रूप में छोड़ दिये गये थे या ऊपर (पेड़ों पर या गुहाओं में?) रख दिये गये थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिता:। सर्वास्तानग्न आ वह पितृन् हविषे अत्तवे।। अथर्ववेद (18.2.14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु सम्भव है कि शव के गाड़ने की ओर संकेत न भी हो। कुछ पूर्वज बहुत दूर लड़ाई में मारे गये हों, या शत्रुओं द्वारा पकड़ लिये गये हों, मार डाले गये हों और उनके शव यों ही छोड़ दिये गये हों, अर्थात् न तो उन्हें जलाया गया, न गाड़ दिया गया। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 8.8.5&amp;lt;/ref&amp;gt; में आये हुए एक कथन से कुछ विद्वान गाड़ने की बात निकालते हैं-'अत: वे उन भी मनुष्यों को असुर नाम देते हैं, जो दान नहीं देते, जो विश्वास नहीं रखते (धर्म नहीं मानते) और न ही यज्ञ करते हैं; क्योंकि यह असुरों का गूढ़ सिद्धान्त है। वे मृत के शरीर को भिक्षा (धूप-गंध या पुष्प?) एवं वस्त्र से सँवारते हैं और सोचते हैं कि वे इस प्रकार दूसरे लोक को जीत लेंगे।' यद्यपि यह वचन स्पष्ट नहीं है किन्तु असुरों, उनके शव श्रृंगार और परलोक प्राप्ति की ओर जो संकेत हैं, उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि असुरों में शव को गाड़ने की प्रथा सम्भवत: थी। ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 7.89.1&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऋषि ने प्रार्थना की है कि 'हे वरुण, मैं मिट्टी के घर में न जाऊँ।' सम्भवत: यह गाड़ने की प्रथा की ओर संकेत है। इसके अतिरिक्त अस्थियों को इकट्ठा करके पात्र में रखकर भूमि में गाड़ने और बहुत दिनों उपरान्त उस पर श्मशान बना देने आदि की प्रथा भी प्रचलित थी। अथर्ववेद&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 18.2.25&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है-'उन्हें वृक्ष कष्ट न दे और पृथिवी माता ही (ऐसा करे)।' इससे शवाधार (ताबूत) एवं शव को गाड़ने की ओर सम्भवत: संकेत मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*यह कुछ विचित्र सा है कि प्रगतिशील राष्ट्र बाइबिल के कथन की शाब्दिक व्याख्या में विश्वास करते हुए कि 'मृत का भौतिक शरीरोत्थान होता है', केवल शव को गाड़ने की प्रथा से ही चिपके रहे और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ईसाई लोक शवदाह के लिए कभी तत्पर नहीं हुए। सन 1906 में क्रेमेशन एक्ट (इंग्लैण्ड में) पारित हुआ जिसके अनुसार स्वास्थ्यमंत्री-समर्थित समतल भूमि पर शवदाह करने की अनुमति अन्त्येष्टि क्रिया के अध्यक्ष को प्राप्त होने लगी। कैथोलिक चर्च वाले अब भी शवदाह नहीं करते। आदिकालीन रोम के लोग शवदाह को सम्मान्य समझते थे और शव गाड़ने की रीति केवल उन लोगों के लिए बरती जाती थी, जो आत्महन्ता या हत्यारे होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुछ समय तक शव को विकृत होने से बचाने के लिए तेल आदि में रख छोड़ना भारत में अज्ञात नहीं था। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 29.4.29&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वैखानसश्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसश्रौतसूत्र 31.32&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि आहिताग्नि अपने लोगों से सुदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो उसके शव को तिल-तेल से पूर्ण द्रोण (नाद) में रखकर गाड़ी द्वारा घर लाना चाहिए। रामायण में कई बार यही कहा गया है कि [[भरत (दशरथ पुत्र)|भरत]] के आने के बहुत दिन पूर्व ही राजा [[दशरथ]] का शव तेलपूर्ण लम्बे द्रोण या नाद में रख दिया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;अयोध्याकाण्ड, 66.14-16, 76.4&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णु पुराण में आया है कि [[निमि]] का शव तेल तथा अन्य सुगंधित पदार्थों से इस प्रकार सुरक्षित रखा हुआ था कि वह सड़ा नहीं और लगता था कि मृत्यु मानो अभी हुई हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*ऋग्वेद के प्रणयन के पूर्व की स्थिति के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद तथा [[सिंधु घाटी]] के [[मोहनजोदड़ो]] एवं [[हड़प्पा]] अवशेषों के काल के निर्णय के विषय में अभी कोई सामान्य निश्चय नहीं हो सका है। सर जॉन मार्शल&amp;lt;ref&amp;gt;मोहनजोदड़ो, जिल्द 1, पृष्ठ 86&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पूर्ण रूप से गाड़ने, आंशिक रूप से गाड़ने एवं शवदाह के उपरान्त गाड़ने के रीतियों की ओर संकेत किया है। लौरिया नन्दनगढ़ की खुदाई से कुछ ऐसी श्मशान भूमियों का पता चला है, जो वैदिक काल की कही जाती हैं और उनमें एक छोटी स्वर्णिम वस्तु पायी गयी है, जो नंगी स्त्री, सम्भवत: पृथिवी माता की हैं। ये सब बातें पुरातत्ववेत्ताओं से सम्बन्ध रखती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 126&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[आदि पुराण|आदिपुराण]] का एक वचन उद्धृत करते हुए लिखा है कि मग के लोग गाड़े जाते थे और दरद लोग एवं लुप्त्रक लोग अपने सम्बन्धियों के शवों को पेड़ पर लटकाकर चल देते थे।&lt;br /&gt;
====बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया====&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भिक बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरने वाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बान सुत्तगें बौद्धधर्म के महान प्रस्थापक की अन्त्येष्टि क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;4.14&amp;lt;/ref&amp;gt; इस ग्रन्थ से इस विषय में जो कुछ एकत्र किया जा सकता है, वह यह है-'बुद्ध के अत्यन्त प्रिय शिष्य आनन्द ने कोई पद्य नहीं कहा, कुछ ऐसे शिष्य जो विषयभोग से रहित नहीं थे, रो पड़े और पृथिवी पर धड़ाम से गिर पड़े, और अन्य लोग (अर्हत्) किसी प्रकार दु:ख को सम्भाल सके। दूसरे दिन आनन्द कुशीनारा के मल्लों के पास गये, मल्लों ने धूप, मालाएँ, वाद्ययंत्र तथा पाँच सौ प्रकार के वस्त्र आदि एकत्र किये; मल्लों ने शाल वृक्षों की कुंज में पड़े बुद्ध के शव की प्रार्थना सात दिनों तक की और नाच, स्तुतियों, गायन, मालाओं एवं गंधों से पूजा-अर्चनाएँ कीं और वस्त्रों से शव को ढँकते रहे। सातवें दिन वे भगवान के शव को दक्षिण की ओर ले चले, किन्तु एक चमत्कार&amp;lt;ref&amp;gt;6.29-32 में वर्णित&amp;lt;/ref&amp;gt; के कारण वे उत्तरी द्वार से नगर के बीच से होकर शव को लेकर चले और पूर्व दिशा में उसे रख दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;सामान्य नियम यह था कि शव को गाँव के मध्य से लेकर नहीं जाया जाता और उसे दक्षिण की और ले जाया जाता था, किन्तु बुद्ध इतने असाधारण एवं पवित्र थे कि उपर्युक्त प्रथाविरुद्ध ढंग उनके लिए मान्य हो गया।&amp;lt;/ref&amp;gt; बुद्ध का शव नये वस्त्रों से ढँका गया और ऊपर से रूई एवं ऊन के चोगे बाँधे गये और फिर उनके ऊपर एक नया वस्त्र बाँधा गया। इस प्रकार वस्त्रों एवं सूत्रों के पाँच सौ स्तरों से शरीर ढँक दिया गया। इसके उपरान्त एक ऐसे लोहे के तैलपात्र में रखा गया, जो स्वयं एक तैलपात्र में रखा हुआ था। इसके पश्चात् सभी प्रकार के गंधों से युक्त चिता बनायी गई और उस पर शव रख दिया गया। तब महाकस्सप एवं पाँच सौ अन्य बौद्धों ने, जो साथ में आये थे, अपने परिधानों को कंधों पर सजाया&amp;lt;ref&amp;gt;उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने [[यज्ञोपवीत]] को धारण करते हैं|उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने यज्ञोपवीत को धारण करते हैं&amp;lt;/ref&amp;gt;, उन्होंने बद्धबाहु होकर सिर झुकाया और श्रद्धापूर्वक शव की तीन बार प्रदक्षिणा की। इसके उपरान्त शव का दाह किया गया। केवल अस्थियाँ बच गयीं। इसके उपरान्त मगधराज, [[अजातशत्रु]], [[वैशाली]] के [[लिच्छवी|लिच्छवियों]] आदि ने [[बुद्ध]] के अवशेषों पर अपना-अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया। बुद्ध के [[अवशेष]] आठ भागों में बाँटे गये। जिन्हें ये भाग प्राप्त हुए, उन्होंने उन पर स्तूप (धूप) बनवाये, मोरिय लोगों ने जिन्हें केवल राख मात्र प्राप्त हुई थी, उस पर स्तूप बनवाया और एक ब्राह्मण द्रोण (दोन) ने उसे घड़े पर, जिसमें अस्थियाँ एकत्र कर रखी गयी थीं, एक स्तूप बनवाया।' श्री राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रन्थों एवं जन्म गाथाओं में अन्त्येष्टियों का वर्णन मिलता है, किन्तु कहीं भी प्रचलित धार्मिक क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जा सकता है कि बौद्ध अन्त्येष्टि क्रिया, यद्यपि सरल है, तथापि वह आश्वलायनगृह्यसूत्र के कुछ नियमों से बहुत कुछ मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए जे.आर.ए.एस. (1906, पृष्ठ 655-671 एवं 881-913) में प्रकाशित फ़्लीट के लेख, जो महापरिनिब्बान-सुत्त, दिव्यावदान, फाहियान के ग्रन्थ, सुमंगलविलासिनी एवं अन्य ग्रन्थों के आधार पर लिखे गये ऐसे लेख हैं, जो बुद्ध की अस्थियों एवं भस्म के बँटवारे अथवा उन पर बने स्तूपों पर प्रकाश डालते हैं। फ़्लीट का कहना है कि पिप्रहवा अवशेष-कुंभ में, जिस पर एक अभिलेख अंकित है, जो अब तक पाये गये [[अभिलेख|अभिलेखों]] में सबसे पुराना है (लगभग ईसापूर्व सन 375) और जिसमें सात सौ वस्तुएँ पायी गई हैं, भगवान बुद्ध के अवशेष चिह्न नहीं हैं, प्रत्युत उनके सम्बन्धियों के हैं। फ़्लीट ने एक परम्परा की ओर संकेत किया है जो बतलाती है कि सम्राट [[अशोक]] ने बुद्ध के अवशेष चिह्नों पर बने 8 स्तूपों में 7 को खोदकर उनमें पाये गये अवशेषों को 84000 सोने और चाँदी के पात्रों में परिवर्तित कर दिया और उन्हें सम्पूरण भारत में वितरित कर दिया। इस प्रकार 84000 स्तूपों का निर्माण उन पर किया गया। राइस डेविड्स ने अपने ग्रन्थ 'बुद्धिस्ट इंडिया' (पृष्ठ 78-80) में यह कहते हुए कि जन या धन से विशिष्ट मृत लोगों का राजकर्मचारियों या शिक्षकों के शव जलाये जाते और अवशिष्ट भस्मांश स्तूपों (पालि में थूप या टोप) के अन्दर गाड़ दिये जाते थे। निर्देश किया है कि साधारण लोगों के शव अजीव ढंग से रखे जाते थे। वे खुले स्थल में रख दिये जाते थे। नियमानुकूल वे शव या चितावशेष गाड़े नहीं जाते थे, प्रत्युत पक्षियों या पशुओं द्वारा नष्ट किये जाने के लिए छोड़ दिये जाते थे अथवा वे स्वयं प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====शीर्षक====&lt;br /&gt;
जब मृत के सम्बन्धीगण (पुत्र आदि) जल-तर्पण एवं स्नान करके जल (नदी, जलाशय आदि) से बाहर निकल कर हरी घास के किसी स्थल पर बैठ गये हों, तो गुरुजनों (वृद्ध आदि) को उनके दु:ख कम करने के लिए प्राचीन गाथाएँ कहनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.7 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 1.4.2 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोकमुत्सृज्य कल्याणीभिर्वाग्भि: सात्त्विकाभि: कथाभि: पुराणै: सुकृतिभि: श्रुत्वाधोमुखा व्रजन्ति। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौतमपितृमेधसूत्र (1.4.2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र 20.22-53&amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है कि किस प्रकार काल (समय, मृत्यु) सभी को, यहाँ तक इन्द्र, देवों, दैत्यों, महान राजाओं एवं ऋषियों को धर दबोचता है, कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेकर एक दिन मरण को प्राप्त होता ही है (मृत्यु अवश्यंभावी है), कि (पत्नी को छोड़कर) कोई भी मृत व्यक्ति के साथ यमलोक को नहीं जाता है, कि किस प्रकार सदसत् कर्म मृतात्मा के पास आते हैं, कि किस प्रकार श्राद्ध मृतात्मा के लिए कल्याणकर है। इसने निष्कर्ष निकाला है कि इसीलिए जीवित सम्बन्धियों को श्राद्ध करना चाहिए और रुदन छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उससे लाभ नहीं और केवल धर्म ही ऐसा है, जो मृतात्मा के साथ जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह अवलोकनीय है कि विष्णु धर्मसूत्र के कुछ पद्य (20.29, 48-49 एवं 51-53) भगवदगीता के पद्यों (2.22-28, 13.23-25) के समान ही हैं। विष्णु धर्मसूत्र (20.47 यथा धेनुसहस्रेषु आदि) शान्तिपर्व (181.16, 187.27 एवं 323.16) एवं विष्णुधर्मोत्तर (2.78.27) के समान ही है। इसी प्रकार देखिए विष्णुधर्मसूत्र (20.41) एवं शान्तिपर्व (175.15 एवं 322.73)। देखिए लक्ष्मीधर का कृत्यकल्पतरु (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 91-97), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.7, 11), विष्णुधर्मसूत्र (20.22-53) एवं भगवदगीता (2.13, 18)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी ही बातें याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;3.8-11=गरुड़पुराण 2.4.8184&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है; जो व्यक्ति मानव जीवन में, जो केले के पौधे के समान सारहीन है, और जो पानी के बुलबुले के समान अस्थिर है, अमरता खोजता है, वह भ्रम में पड़ा हुआ है। रुदन से क्या लाभ है जब कि शरीर पूर्व जन्म के कर्मों के कारण पंचतत्त्वों से निर्मित हो पुन: उन्हीं तत्त्वों में समा जाता है। पृथिवी, सागर और देवता नाश को प्राप्त होने वाले हैं (भविष्य में जब कि प्रलय होता है)। यह कैसे सम्भव है कि वह मृत्युलोक, जो फेन के समान क्षणभंगुर है, नाश को प्राप्त नहीं होगा? मृतात्मा को असहाय होकर अपने सम्बन्धियों के आँसू एवं नासिकारंध्रों से निकले द्रव पदार्थ को पीना पड़ता है, अत: उन सम्बन्धियों को रोना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म आदि करना चाहिए। गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने बलपूर्वक कहा है कि 'जो नाशवान है और जो सभी प्राणियो की विशेषता (नियति) है, उसके लिए रोना-कलपना क्या? केवल शुभ कर्मों के सम्पादन में, जो तुम्हारे साथ जाने वाले हैं, लगे रहो।' गोभिल ने याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.8-10&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[महाभारत]] को उद्धृत किया है-'सभी संग्रह क्षय को प्राप्त होते हैं, सभी उदय पतन को, सभी संयोग वियोग और जीवन मरण को।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छया:। संयोग विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।। और देखिए शान्तिपर्व (331.20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपरार्क ने रामायण एवं महाभारत से उदाहरण दिये हैं, यथा [[दुर्योधन]] की मृत्यु पर [[वासुदेव (कृष्ण)|वासुदेव]] द्वारा [[धृतराष्ट्र]] के प्रति कहे गये वचन। पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 292-293&amp;lt;/ref&amp;gt;, शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 205-206 &amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने विष्णुधर्मसूत्र, याज्ञवल्क्यस्मृति एवं गोभिलस्मृति के वचन उद्धृत किये हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===================================&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
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		<updated>2011-11-15T10:33:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
==संन्यासी को गाड़ने की प्रथा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति (संन्यासी) को प्राचीन काल में भी गाड़ा जाता था। ऊपर ऋतु का मत प्रकाशित किया गया है कि ब्रह्मचारी एवं यति का शव उत्तपन अग्नि से जलाया जाता है। इस विषय में शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्याख्या उपस्थित की है कि यहाँ पर यति कुटीचक श्रेणी का संन्यासी है और उसने यह भी बताया है कि चार प्रकार के संन्यासी लोगों (कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस) की अन्त्येष्टि किस प्रकार से की जाती है। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षेप में लिखा है, जिसे स्मृत्यर्थसार&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृत्यर्थसार, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ अन्तरों के साथ ग्रहण कर लिया है और परिव्राजक की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन उपस्थित किया है-किसी को ग्राम के पूर्व या दक्षिण में जाकर पलाश वृक्ष के नीचे या नदी तट पर या किसी अन्य स्वच्छ स्थल पर व्याहृतियों के साथ यति के दण्ड के बराबर गहरा गड्ढा खोदना चाहिए; इसके उपरान्त प्रत्येक बार सात व्याहृतियों के साथ उस पर तीन बार जल छिड़कना चाहिए, गड्ढे में दर्भ बिछा देना चाहिए, माला, चन्दनलेप आदि से शव को सजा देना चाहिए और मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.1.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ शव को गड्ढे में रख देना चाहिए। परिव्राजक के दाहिने हाथ में दण्ड तीन खण्डों में करके थमा देना चाहिए, और ऐसा करते समय ऋग्वेद;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.22.17&amp;lt;/ref&amp;gt; वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 5.15&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.2.13.1&amp;lt;/ref&amp;gt; का मन्त्रपाठ करना चाहिए। शिक्य को बायें हाथ में मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 4.2.5.2&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ रखा जाता है और फिर क्रम से पानी छानने वाला वस्त्र मुख पर&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.4.8.6 के मन्त्र के साथ&amp;lt;/ref&amp;gt;, गायत्री मन्त्र&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 3.62.10; वाजसनेयी संहिता 3.35; तैत्तिरीय संहिता 1.5.6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ पात्र को पेट पर और जलपात्र को गुप्तांगों के पास रखा जाता है। इसके उपरान्त 'चतुर्होतार:' मन्त्रों का पाठ किया जाता है। अन्य कृत्य नहीं किये जाते, न तो शवदाह होता है, न अशौच मनाया जाता है और न जल-तर्पण ही किया जाता है, क्योंकि यति संसार की विषयवासना से मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृत्यर्थसार ने इतना जोड़ दिया है कि न तो एकोद्दिष्ट श्राद्ध और न सपिण्डीकरण ही किया जाता है, केवल ग्यारहवें दिन पार्वण श्राद्ध होता है। किन्तु कुटिचक जलाया जाता है, बहूदक गाड़ा जाता है, हंस को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है और परमहंस को भली-भाँति गाड़ा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु, पृष्ठ 634-635&amp;lt;/ref&amp;gt; गाड़ने के उपरान्त गड्ढे को भली-भाँति बालू से ढँक दिया जाता है, जिससे कुत्ते, श्रृगाल आदि शव को (पंजों से गड्ढा खोदकर) निकाल न डालें। धर्मसिंधु&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 497&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि मस्तक को शंख या कुल्हाड़ी से छेद देना चाहिए, यदि ऐसा करने में असमर्थता प्रदर्शित हो तो मस्तक पर गुड़ की भेली रखकर उसे ही तोड़ देना चाहिए। इसने भी यही कहा है कि कुटीचक को छोड़कर कोई यति नहीं जलाया जाता। आजकल सभी यति गाड़े जाते हैं, क्योंकि बहूदक एवं कुटीचक आजकल पाये नहीं जाते, केवल परमहंस ही देखने में आते हैं। यतियों को क्यों गाड़ा जाता है? सम्भवत: उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थों की भाँति श्रौताग्नियाँ या स्मार्ताग्नियाँ नहीं रखते और वे लोग भोजन के लिए साधारण अग्नि भी नहीं जलाते। गृहस्थ लोग अपनी श्रौत या स्मार्त अग्नियों के साथ जलाये जाते हैं, किन्तु यति लोग बिना अग्नि के होते हैं, अत: गाड़े जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;गाड़ने की विधि के लिए देखिए वैखानसस्मार्तसूत्र (10.8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==गर्भिणी नारी के शवदाह के नियम== &lt;br /&gt;
जो स्त्रियाँ बच्चा जनते समय या जनने के तुरन्त उपरान्त ही या मासिक धर्म की अवधि में मर जाती हैं, उनके शवदाह के विषय में विशिष्ट नियम हैं। मिताक्षरा द्वारा उद्धृत एक स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका (1, पृष्ठ 121)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सूतिका के विषय में लिखा है कि एक पात्र में जल एवं पंचगव्य लेकर मन्त्रोचारण&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.9.1-9, 'आपो हि ष्ठा'&amp;lt;/ref&amp;gt; करना चाहिए और उससे सूतिका को स्नान कराकर जलाना चाहिए। मासिक धर्म वाली मृत नारी को भी इसी प्रकार जलाना चाहिए, किन्तु उसे दूसरा वस्त्र पहनाकर जलाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए गरुड़पुराण (2.4.171) एवं निर्णयसिंधु (पृष्ठ 621)&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार गर्भिणी नारी के शव के विषय में भी नियम हैं&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.9; निर्णयसिंधु, पृष्ठ 622&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विभिन्न कालों में शव-क्रिया==&lt;br /&gt;
विभिन्न कालों एवं विभिन्न देशों में शव-क्रिया (अन्त्येष्टि क्रिया) विभिन्न ढंगों से की जाती रही है। अन्त्येष्टि क्रिया के विभिन्न प्रकार ये हैं-जलाना (शवदाह), भूमि में गाड़ना, जल में बहा देना, शव को खुला छोड़ देना, जिससे चील, गिद्ध, कोए या पशु आदि उसे खा लें (यथा पारसियों में)&amp;lt;ref&amp;gt;पारसियों के शास्त्रों के अनुसार शव को गाड़ देना महान अपराध माना जाता है। यदि शव कब्र से बाहर नहीं निकाला गया तो मज्द के क़ानून के प्राध्यापक (शिक्षक) के विषय में कोई प्रायश्चित नहीं है, या उसके लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है, जिसने मज्द के क़ानून को पढ़ा है, और जब वे छ: मास या एक वर्ष के भीतर शव को कब्र से बाहर नहीं निकालते तो उन्हें क्रम से 500 या 1000 कोड़े खाने पड़ते हैं। देखिए वेंडिडाड, फ़र्गार्ड 3 (सैक्रेड बुक आफ़ दि ईस्ट, जिल्द 4, पृष्ठ 31-32)। पर्वतों के शिखरों पर शव रख दिये जाते हैं और उन्हें पक्षीगण एवं कुत्ते खा डालते हैं। शव को खुला छोड़ देना मज्द रीति की अत्यन्त विचित्र बात है।&amp;lt;/ref&amp;gt;, गुफ़ाओं में सुरक्षित रख छोड़ना या ममी रूप में (यथा मिस्र में) सुरक्षित रख छोड़ना।&amp;lt;ref&amp;gt;पियाज्ज़ा बर्बेरिनी के पास रोम के कपूचिन चर्च के भूगर्भ कब्रगाहों की दीवारों में 4000 पादरियों की हड्डियाँ सुरक्षित हैं। देखिए पक्ल की पुस्तक 'फ़्यूनरल कस्टम्स (पृष्ठ 136)'।&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक हमें साहित्यिक प्रमाण मिलता है, भारत में सामान्य नियम शव को जला देना ही था, किन्तु अपवाद भी थे, यथा-शिशुओं, संन्यासियों आदि के विषय में। प्राचीन भारतीयों ने शवदाह की वैज्ञानिक किन्तु कठोर हृदय वाली विधि किस प्रकार निकाली, यह बतलाना कठिन है। प्राचीन भारत में शव को गाड़ देने की बात अज्ञात नहीं थी।&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 5.30.14 'मा नु भूमिगृहो भुवत' एवं 18.2.34&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्तिम मन्त्र का रूप यों है-&amp;quot;हे अग्नि, उन सभी पितरों को यहाँ ले आओ, जिससे कि वे हवि ग्रहण करें, उन्हें भी बुलाओ, जिनके शरीर गाड़े गये थे या खुले रूप में छोड़ दिये गये थे या ऊपर (पेड़ों पर या गुहाओं में?) रख दिये गये थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिता:। सर्वास्तानग्न आ वह पितृन् हविषे अत्तवे।। अथर्ववेद (18.2.14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु सम्भव है कि शव के गाड़ने की ओर संकेत न भी हो। कुछ पूर्वज बहुत दूर लड़ाई में मारे गये हों, या शत्रुओं द्वारा पकड़ लिये गये हों, मार डाले गये हों और उनके शव यों ही छोड़ दिये गये हों, अर्थात् न तो उन्हें जलाया गया, न गाड़ दिया गया। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 8.8.5&amp;lt;/ref&amp;gt; में आये हुए एक कथन से कुछ विद्वान गाड़ने की बात निकालते हैं-'अत: वे उन भी मनुष्यों को असुर नाम देते हैं, जो दान नहीं देते, जो विश्वास नहीं रखते (धर्म नहीं मानते) और न ही यज्ञ करते हैं; क्योंकि यह असुरों का गूढ़ सिद्धान्त है। वे मृत के शरीर को भिक्षा (धूप-गंध या पुष्प?) एवं वस्त्र से सँवारते हैं और सोचते हैं कि वे इस प्रकार दूसरे लोक को जीत लेंगे।' यद्यपि यह वचन स्पष्ट नहीं है किन्तु असुरों, उनके शव श्रृंगार और परलोक प्राप्ति की ओर जो संकेत हैं, उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि असुरों में शव को गाड़ने की प्रथा सम्भवत: थी। ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 7.89.1&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऋषि ने प्रार्थना की है कि 'हे वरुण, मैं मिट्टी के घर में न जाऊँ।' सम्भवत: यह गाड़ने की प्रथा की ओर संकेत है। इसके अतिरिक्त अस्थियों को इकट्ठा करके पात्र में रखकर भूमि में गाड़ने और बहुत दिनों उपरान्त उस पर श्मशान बना देने आदि की प्रथा भी प्रचलित थी। अथर्ववेद&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 18.2.25&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है-'उन्हें वृक्ष कष्ट न दे और पृथिवी माता ही (ऐसा करे)।' इससे शवाधार (ताबूत) एवं शव को गाड़ने की ओर सम्भवत: संकेत मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*यह कुछ विचित्र सा है कि प्रगतिशील राष्ट्र बाइबिल के कथन की शाब्दिक व्याख्या में विश्वास करते हुए कि 'मृत का भौतिक शरीरोत्थान होता है', केवल शव को गाड़ने की प्रथा से ही चिपके रहे और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ईसाई लोक शवदाह के लिए कभी तत्पर नहीं हुए। सन 1906 में क्रेमेशन एक्ट (इंग्लैण्ड में) पारित हुआ जिसके अनुसार स्वास्थ्यमंत्री-समर्थित समतल भूमि पर शवदाह करने की अनुमति अन्त्येष्टि क्रिया के अध्यक्ष को प्राप्त होने लगी। कैथोलिक चर्च वाले अब भी शवदाह नहीं करते। आदिकालीन रोम के लोग शवदाह को सम्मान्य समझते थे और शव गाड़ने की रीति केवल उन लोगों के लिए बरती जाती थी, जो आत्महन्ता या हत्यारे होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुछ समय तक शव को विकृत होने से बचाने के लिए तेल आदि में रख छोड़ना भारत में अज्ञात नहीं था। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 29.4.29&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वैखानसश्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसश्रौतसूत्र 31.32&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि आहिताग्नि अपने लोगों से सुदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो उसके शव को तिल-तेल से पूर्ण द्रोण (नाद) में रखकर गाड़ी द्वारा घर लाना चाहिए। रामायण में कई बार यही कहा गया है कि [[भरत (दशरथ पुत्र)|भरत]] के आने के बहुत दिन पूर्व ही राजा [[दशरथ]] का शव तेलपूर्ण लम्बे द्रोण या नाद में रख दिया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;अयोध्याकाण्ड, 66.14-16, 76.4&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णु पुराण में आया है कि [[निमि]] का शव तेल तथा अन्य सुगंधित पदार्थों से इस प्रकार सुरक्षित रखा हुआ था कि वह सड़ा नहीं और लगता था कि मृत्यु मानो अभी हुई हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*ऋग्वेद के प्रणयन के पूर्व की स्थिति के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद तथा [[सिंधु घाटी]] के [[मोहनजोदड़ो]] एवं [[हड़प्पा]] अवशेषों के काल के निर्णय के विषय में अभी कोई सामान्य निश्चय नहीं हो सका है। सर जॉन मार्शल&amp;lt;ref&amp;gt;मोहनजोदड़ो, जिल्द 1, पृष्ठ 86&amp;lt;/ref&amp;gt; ने पूर्ण रूप से गाड़ने, आंशिक रूप से गाड़ने एवं शवदाह के उपरान्त गाड़ने के रीतियों की ओर संकेत किया है। लौरिया नन्दनगढ़ की खुदाई से कुछ ऐसी श्मशान भूमियों का पता चला है, जो वैदिक काल की कही जाती हैं और उनमें एक छोटी स्वर्णिम वस्तु पायी गयी है, जो नंगी स्त्री, सम्भवत: पृथिवी माता की हैं। ये सब बातें पुरातत्ववेत्ताओं से सम्बन्ध रखती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हारलता[[हारलता पृष्ठ 126|हारलता(पृष्ठ 126)]] ने [[आदि पुराण|आदिपुराण]] का एक वचन उद्धृत करते हुए लिखा है कि मग के लोग गाड़े जाते थे और दरद लोग एवं लुप्त्रक लोग अपने सम्बन्धियों के शवों को पेड़ पर लटकाकर चल देते थे।&lt;br /&gt;
====बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया====&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भिक बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरने वाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बान सुत्तगें बौद्धधर्म के महान प्रस्थापक की अन्त्येष्टि क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;4.14&amp;lt;/ref&amp;gt; इस ग्रन्थ से इस विषय में जो कुछ एकत्र किया जा सकता है, वह यह है-'बुद्ध के अत्यन्त प्रिय शिष्य आनन्द ने कोई पद्य नहीं कहा, कुछ ऐसे शिष्य जो विषयभोग से रहित नहीं थे, रो पड़े और पृथिवी पर धड़ाम से गिर पड़े, और अन्य लोग (अर्हत्) किसी प्रकार दु:ख को सम्भाल सके। दूसरे दिन आनन्द कुशीनारा के मल्लों के पास गये, मल्लों ने धूप, मालाएँ, वाद्ययंत्र तथा पाँच सौ प्रकार के वस्त्र आदि एकत्र किये; मल्लों ने शाल वृक्षों की कुंज में पड़े बुद्ध के शव की प्रार्थना सात दिनों तक की और नाच, स्तुतियों, गायन, मालाओं एवं गंधों से पूजा-अर्चनाएँ कीं और वस्त्रों से शव को ढँकते रहे। सातवें दिन वे भगवान के शव को दक्षिण की ओर ले चले, किन्तु एक चमत्कार&amp;lt;ref&amp;gt;6.29-32 में वर्णित&amp;lt;/ref&amp;gt; के कारण वे उत्तरी द्वार से नगर के बीच से होकर शव को लेकर चले और पूर्व दिशा में उसे रख दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;सामान्य नियम यह था कि शव को गाँव के मध्य से लेकर नहीं जाया जाता और उसे दक्षिण की और ले जाया जाता था, किन्तु बुद्ध इतने असाधारण एवं पवित्र थे कि उपर्युक्त प्रथाविरुद्ध ढंग उनके लिए मान्य हो गया।&amp;lt;/ref&amp;gt; बुद्ध का शव नये वस्त्रों से ढँका गया और ऊपर से रूई एवं ऊन के चोगे बाँधे गये और फिर उनके ऊपर एक नया वस्त्र बाँधा गया। इस प्रकार वस्त्रों एवं सूत्रों के पाँच सौ स्तरों से शरीर ढँक दिया गया। इसके उपरान्त एक ऐसे लोहे के तैलपात्र में रखा गया, जो स्वयं एक तैलपात्र में रखा हुआ था। इसके पश्चात् सभी प्रकार के गंधों से युक्त चिता बनायी गई और उस पर शव रख दिया गया। तब महाकस्सप एवं पाँच सौ अन्य बौद्धों ने, जो साथ में आये थे, अपने परिधानों को कंधों पर सजाया&amp;lt;ref&amp;gt;उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने [[यज्ञोपवीत]] को धारण करते हैं|उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने यज्ञोपवीत को धारण करते हैं&amp;lt;/ref&amp;gt;, उन्होंने बद्धबाहु होकर सिर झुकाया और श्रद्धापूर्वक शव की तीन बार प्रदक्षिणा की। इसके उपरान्त शव का दाह किया गया। केवल अस्थियाँ बच गयीं। इसके उपरान्त मगधराज, [[अजातशत्रु]], [[वैशाली]] के [[लिच्छवी|लिच्छवियों]] आदि ने [[बुद्ध]] के अवशेषों पर अपना-अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया। बुद्ध के [[अवशेष]] आठ भागों में बाँटे गये। जिन्हें ये भाग प्राप्त हुए, उन्होंने उन पर स्तूप (धूप) बनवाये, मोरिय लोगों ने जिन्हें केवल राख मात्र प्राप्त हुई थी, उस पर स्तूप बनवाया और एक ब्राह्मण द्रोण (दोन) ने उसे घड़े पर, जिसमें अस्थियाँ एकत्र कर रखी गयी थीं, एक स्तूप बनवाया।' श्री राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रन्थों एवं जन्म गाथाओं में अन्त्येष्टियों का वर्णन मिलता है, किन्तु कहीं भी प्रचलित धार्मिक क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जा सकता है कि बौद्ध अन्त्येष्टि क्रिया, यद्यपि सरल है, तथापि वह आश्वलायनगृह्यसूत्र के कुछ नियमों से बहुत कुछ मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए जे.आर.ए.एस. (1906, पृष्ठ 655-671 एवं 881-913) में प्रकाशित फ़्लीट के लेख, जो महापरिनिब्बान-सुत्त, दिव्यावदान, फाहियान के ग्रन्थ, सुमंगलविलासिनी एवं अन्य ग्रन्थों के आधार पर लिखे गये ऐसे लेख हैं, जो बुद्ध की अस्थियों एवं भस्म के बँटवारे अथवा उन पर बने स्तूपों पर प्रकाश डालते हैं। फ़्लीट का कहना है कि पिप्रहवा अवशेष-कुंभ में, जिस पर एक अभिलेख अंकित है, जो अब तक पाये गये [[अभिलेख|अभिलेखों]] में सबसे पुराना है (लगभग ईसापूर्व सन 375) और जिसमें सात सौ वस्तुएँ पायी गई हैं, भगवान बुद्ध के अवशेष चिह्न नहीं हैं, प्रत्युत उनके सम्बन्धियों के हैं। फ़्लीट ने एक परम्परा की ओर संकेत किया है जो बतलाती है कि सम्राट [[अशोक]] ने बुद्ध के अवशेष चिह्नों पर बने 8 स्तूपों में 7 को खोदकर उनमें पाये गये अवशेषों को 84000 सोने और चाँदी के पात्रों में परिवर्तित कर दिया और उन्हें सम्पूरण भारत में वितरित कर दिया। इस प्रकार 84000 स्तूपों का निर्माण उन पर किया गया। राइस डेविड्स ने अपने ग्रन्थ 'बुद्धिस्ट इंडिया' (पृष्ठ 78-80) में यह कहते हुए कि जन या धन से विशिष्ट मृत लोगों का राजकर्मचारियों या शिक्षकों के शव जलाये जाते और अवशिष्ट भस्मांश स्तूपों (पालि में थूप या टोप) के अन्दर गाड़ दिये जाते थे। निर्देश किया है कि साधारण लोगों के शव अजीव ढंग से रखे जाते थे। वे खुले स्थल में रख दिये जाते थे। नियमानुकूल वे शव या चितावशेष गाड़े नहीं जाते थे, प्रत्युत पक्षियों या पशुओं द्वारा नष्ट किये जाने के लिए छोड़ दिये जाते थे अथवा वे स्वयं प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====शीर्षक====&lt;br /&gt;
जब मृत के सम्बन्धीगण (पुत्र आदि) जल-तर्पण एवं स्नान करके जल (नदी, जलाशय आदि) से बाहर निकल कर हरी घास के किसी स्थल पर बैठ गये हों, तो गुरुजनों (वृद्ध आदि) को उनके दु:ख कम करने के लिए प्राचीन गाथाएँ कहनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.7 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 1.4.2 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोकमुत्सृज्य कल्याणीभिर्वाग्भि: सात्त्विकाभि: कथाभि: पुराणै: सुकृतिभि: श्रुत्वाधोमुखा व्रजन्ति। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौतमपितृमेधसूत्र (1.4.2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र 20.22-53&amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है कि किस प्रकार काल (समय, मृत्यु) सभी को, यहाँ तक इन्द्र, देवों, दैत्यों, महान राजाओं एवं ऋषियों को धर दबोचता है, कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेकर एक दिन मरण को प्राप्त होता ही है (मृत्यु अवश्यंभावी है), कि (पत्नी को छोड़कर) कोई भी मृत व्यक्ति के साथ यमलोक को नहीं जाता है, कि किस प्रकार सदसत् कर्म मृतात्मा के पास आते हैं, कि किस प्रकार श्राद्ध मृतात्मा के लिए कल्याणकर है। इसने निष्कर्ष निकाला है कि इसीलिए जीवित सम्बन्धियों को श्राद्ध करना चाहिए और रुदन छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उससे लाभ नहीं और केवल धर्म ही ऐसा है, जो मृतात्मा के साथ जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह अवलोकनीय है कि विष्णु धर्मसूत्र के कुछ पद्य (20.29, 48-49 एवं 51-53) भगवदगीता के पद्यों (2.22-28, 13.23-25) के समान ही हैं। विष्णु धर्मसूत्र (20.47 यथा धेनुसहस्रेषु आदि) शान्तिपर्व (181.16, 187.27 एवं 323.16) एवं विष्णुधर्मोत्तर (2.78.27) के समान ही है। इसी प्रकार देखिए विष्णुधर्मसूत्र (20.41) एवं शान्तिपर्व (175.15 एवं 322.73)। देखिए लक्ष्मीधर का कृत्यकल्पतरु (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 91-97), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.7, 11), विष्णुधर्मसूत्र (20.22-53) एवं भगवदगीता (2.13, 18)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी ही बातें याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;3.8-11=गरुड़पुराण 2.4.8184&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है; जो व्यक्ति मानव जीवन में, जो केले के पौधे के समान सारहीन है, और जो पानी के बुलबुले के समान अस्थिर है, अमरता खोजता है, वह भ्रम में पड़ा हुआ है। रुदन से क्या लाभ है जब कि शरीर पूर्व जन्म के कर्मों के कारण पंचतत्त्वों से निर्मित हो पुन: उन्हीं तत्त्वों में समा जाता है। पृथिवी, सागर और देवता नाश को प्राप्त होने वाले हैं (भविष्य में जब कि प्रलय होता है)। यह कैसे सम्भव है कि वह मृत्युलोक, जो फेन के समान क्षणभंगुर है, नाश को प्राप्त नहीं होगा? मृतात्मा को असहाय होकर अपने सम्बन्धियों के आँसू एवं नासिकारंध्रों से निकले द्रव पदार्थ को पीना पड़ता है, अत: उन सम्बन्धियों को रोना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म आदि करना चाहिए। गोभिलस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने बलपूर्वक कहा है कि 'जो नाशवान है और जो सभी प्राणियो की विशेषता (नियति) है, उसके लिए रोना-कलपना क्या? केवल शुभ कर्मों के सम्पादन में, जो तुम्हारे साथ जाने वाले हैं, लगे रहो।' गोभिल ने याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.8-10&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[महाभारत]] को उद्धृत किया है-'सभी संग्रह क्षय को प्राप्त होते हैं, सभी उदय पतन को, सभी संयोग वियोग और जीवन मरण को।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छया:। संयोग विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।। और देखिए शान्तिपर्व (331.20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपरार्क ने रामायण एवं महाभारत से उदाहरण दिये हैं, यथा [[दुर्योधन]] की मृत्यु पर [[वासुदेव (कृष्ण)|वासुदेव]] द्वारा [[धृतराष्ट्र]] के प्रति कहे गये वचन। पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 292-293&amp;lt;/ref&amp;gt;, शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 205-206 &amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य ग्रन्थों ने विष्णुधर्मसूत्र, याज्ञवल्क्यस्मृति एवं गोभिलस्मृति के वचन उद्धृत किये हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
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		<updated>2011-11-06T11:50:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
==संन्यासी को गाड़ने की प्रथा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति (संन्यासी) को प्राचीन काल में भी गाड़ा जाता था। ऊपर ऋतु का मत प्रकाशित किया गया है कि ब्रह्मचारी एवं यति का शव उत्तपन अग्नि से जलाया जाता है। इस विषय में शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्याख्या उपस्थित की है कि यहाँ पर यति कुटीचक श्रेणी का संन्यासी है और उसने यह भी बताया है कि चार प्रकार के संन्यासी लोगों (कुटीचक, बहूदक, हंस एवं परमहंस) की अन्त्येष्टि किस प्रकार से की जाती है। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षेप में लिखा है, जिसे स्मृत्यर्थसार&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृत्यर्थसार, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ अन्तरों के साथ ग्रहण कर लिया है और परिव्राजक की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन उपस्थित किया है-किसी को ग्राम के पूर्व या दक्षिण में जाकर पलाश वृक्ष के नीचे या नदी तट पर या किसी अन्य स्वच्छ स्थल पर व्याहृतियों के साथ यति के दण्ड के बराबर गहरा गड्ढा खोदना चाहिए; इसके उपरान्त प्रत्येक बार सात व्याहृतियों के साथ उस पर तीन बार जल छिड़कना चाहिए, गड्ढे में दर्भ बिछा देना चाहिए, माला, चन्दनलेप आदि से शव को सजा देना चाहिए और मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.1.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ शव को गड्ढे में रख देना चाहिए। परिव्राजक के दाहिने हाथ में दण्ड तीन खण्डों में करके थमा देना चाहिए, और ऐसा करते समय ऋग्वेद;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.22.17&amp;lt;/ref&amp;gt; वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 5.15&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1.2.13.1&amp;lt;/ref&amp;gt; का मन्त्रपाठ करना चाहिए। शिक्य को बायें हाथ में मन्त्रों&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 4.2.5.2&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ रखा जाता है और फिर क्रम से पानी छानने वाला वस्त्र मुख पर&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.4.8.6 के मन्त्र के साथ&amp;lt;/ref&amp;gt;, गायत्री मन्त्र&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 3.62.10; वाजसनेयी संहिता 3.35; तैत्तिरीय संहिता 1.5.6.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ पात्र को पेट पर और जलपात्र को गुप्तांगों के पास रखा जाता है। इसके उपरान्त 'चतुर्होतार:' मन्त्रों का पाठ किया जाता है। अन्य कृत्य नहीं किये जाते, न तो शवदाह होता है, न अशौच मनाया जाता है और न जल-तर्पण ही किया जाता है, क्योंकि यति संसार की विषयवासना से मुक्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृत्यर्थसार ने इतना जोड़ दिया है कि न तो एकोद्दिष्ट श्राद्ध और न सपिण्डीकरण ही किया जाता है, केवल ग्यारहवें दिन पार्वण श्राद्ध होता है। किन्तु कुटिचक जलाया जाता है, बहूदक गाड़ा जाता है, हंस को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है और परमहंस को भली-भाँति गाड़ा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु, पृष्ठ 634-635&amp;lt;/ref&amp;gt; गाड़ने के उपरान्त गड्ढे को भली-भाँति बालू से ढँक दिया जाता है, जिससे कुत्ते, श्रृगाल आदि शव को (पंजों से गड्ढा खोदकर) निकाल न डालें। धर्मसिंधु&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 497&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि मस्तक को शंख या कुल्हाड़ी से छेद देना चाहिए, यदि ऐसा करने में असमर्थता प्रदर्शित हो तो मस्तक पर गुड़ की भेली रखकर उसे ही तोड़ देना चाहिए। इसने भी यही कहा है कि कुटीचक को छोड़कर कोई यति नहीं जलाया जाता। आजकल सभी यति गाड़े जाते हैं, क्योंकि बहूदक एवं कुटीचक आजकल पाये नहीं जाते, केवल परमहंस ही देखने में आते हैं। यतियों को क्यों गाड़ा जाता है? सम्भवत: उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थों की भाँति श्रौताग्नियाँ या स्मार्ताग्नियाँ नहीं रखते और वे लोग भोजन के लिए साधारण अग्नि भी नहीं जलाते। गृहस्थ लोग अपनी श्रौत या स्मार्त अग्नियों के साथ जलाये जाते हैं, किन्तु यति लोग बिना अग्नि के होते हैं, अत: गाड़े जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;गाड़ने की विधि के लिए देखिए वैखानसस्मार्तसूत्र (10.8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==स्त्री के शवदाह में &lt;br /&gt;
जो स्त्रियाँ बच्चा जनते समय या जनने के तुरन्त उपरान्त ही या मासिक धर्म की अवधि में मर जाती हैं, उनके शवदाह के विषय में विशिष्ट नियम हैं। मिताक्षरा द्वारा उद्धृत एक स्मृति एवं स्मृतिचंद्रिका (1, पृष्ठ 121) ने सूतिका के विषय में लिखा है कि एक पात्र में जल एवं पंचगव्य लेकर मन्त्रोचारण (ऋग्वेद 10।9।1-9, 'आपो हि ष्ठा') करना चाहिए और उससे सूतिका को स्नान कराकर जलाना चाहिए। मासिक धर्म वाली मृत नारी को भी इसी प्रकार जलाना चाहिए, किन्तु उसे दूसरा वस्त्र पहनाकर जलाना चाहिए। देखिए गरुड़पुराण (2।4।171) एवं निर्णयसिंधु (पृष्ठ 621)। इसी प्रकार गर्भिणी नारी के शव के विषय में भी नियम हैं (बौधायनपितृमेधसूत्र 3।9; निर्णयसिंधु, पृष्ठ 622) जिन्हें हम यहाँ नहीं दे रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विभिन्न कालों एवं विभिन्न देशों में शव-क्रिया (अन्त्येष्टि क्रिया) विभिन्न ढंगों से की जाती रही है। अन्त्येष्टि क्रिया के विभिन्न प्रकार ये हैं-जलाना (शवदाह), भूमि में गाड़ना, जल में बहा देना, शव को खुला छोड़ देना, जिससे चील, गिद्ध, कोए या पशु आदि उसे खा लें (यथा पारसियों में), &amp;lt;ref&amp;gt;पारसियों के शास्त्रों के अनुसार शव को गाड़ देना महान अपराध माना जाता है। यदि शव कब्र से बाहर नहीं निकाला गया तो मज्द के क़ानून के प्राध्यापक (शिक्षक) के विषय में कोई प्रायश्चित नहीं है, या उसके लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है, जिसने मज्द के क़ानून को पढ़ा है, और जब वे छ: मास या एक वर्ष के भीतर शव को कब्र से बाहर नहीं निकालते तो उन्हें क्रम से 500 या 1000 कोड़े खाने पड़ते हैं। देखिए वेंडिडाड, फ़र्गार्ड 3 (सैक्रेड बुक आफ़ दि ईस्ट, जिल्द 4, पृष्ठ 31-32)। पर्वतों के शिखरों पर शव रख दिये जाते हैं और उन्हें पक्षीगण एवं कुत्ते खा डालते हैं। शव को खुला छोड़ देना मज्द रीति की अत्यन्त विचित्र बात है।&amp;lt;/ref&amp;gt; गुफ़ाओं में सुरक्षित रख छोड़ना या ममी रूप में (यथा मिस्र में) सुरक्षित रख छोड़ना।&amp;lt;ref&amp;gt;पियाज्ज़ा बर्बेरिनी के पास रोम के कपूचिन चर्च के भूगर्भ कब्रगाहों की दीवारों में 4000 पादरियों की हड्डियाँ सुरक्षित हैं। देखिए पक्ल की पुस्तक 'फ़्यूनरल कस्टम्स (पृष्ठ 136)'।&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक हमें साहित्यिक प्रमाण मिलता है, भारत में सामान्य नियम शव को जला देना ही था, किन्तु अपवाद भी थे, यथा-शिशुओं, संन्यासियों आदि के विषय में। प्राचीन भारतीयों ने शवदाह की वैज्ञानिक किन्तु कठोर हृदय वाली विधि किस प्रकार निकाली, यह बतलाना कठिन है। प्राचीन भारत में शव को गाड़ देने की बात अज्ञात नहीं थी (अथर्ववेद 5।30।14 'मा नु भूमिगृहो भुवत' एवं 18।2।34)। अन्तिम मन्त्र का रूप यों है-&amp;quot;हे अग्नि, उन सभी पितरों को यहाँ ले आओ, जिससे कि वे हवि ग्रहण करें, उन्हें भी बुलाओ, जिनके शरीर गाड़े गये थे या खुले रूप में छोड़ दिये गये थे या ऊपर (पेड़ों पर या गुहाओं में?) रख दिये गये थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिता:। सर्वास्तानग्न आ वह पितृन् हविषे अत्तवे।। अथर्ववेद (18।2।14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु सम्भव है कि शव के गाड़ने की ओर संकेत न भी हो। कुछ पूर्वज बहुत दूर लड़ाई में मारे गये हों, या शत्रुओं द्वारा पकड़ लिये गये हों, मार डाले गये हों और उनके शव यों ही छोड़ दिये गये हों, अर्थात् न तो उन्हें जलाया गया, न गाड़ दिया गया। छान्दोग्योपनिषद (8।8।5) में आये हुए एक कथन से कुछ विद्वान गाड़ने की बात निकालते हैं-'अत: वे उन भी मनुष्यों को असुर नाम देते हैं, जो दान नहीं देते, जो विश्वास नहीं रखते (धर्म नहीं मानते) और न ही यज्ञ करते हैं; क्योंकि यह असुरों का गूढ़ सिद्धान्त है। वे मृत के शरीर को भिक्षा (धूप-गंध या पुष्प?) एवं वस्त्र से सँवारते हैं और सोचते हैं कि वे इस प्रकार दूसरे लोक को जीत लेंगे।' यद्यपि यह वचन स्पष्ट नहीं है किन्तु असुरों, उनके शव श्रृंगार और परलोक प्राप्ति की ओर जो संकेत हैं, उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि असुरों में शव को गाड़ने की प्रथा सम्भवत: थी। ऋग्वेद (7।89।1) में ऋषि ने प्रार्थना की है कि 'हे वरुण, मैं मिट्टी के घर में न जाऊँ।' सम्भवत: यह गाड़ने की प्रथा की ओर संकेत है। इसके अतिरिक्त अस्थियों को इकट्ठा करके पात्र में रखकर भूमि में गाड़ने और बहुत दिनों उपरान्त उस पर श्मशान बना देने आदि की प्रथा भी प्रचलित थी, जैसा कि हम शतपथ ब्राह्मण आदि की उक्तियों में अभी जानेंगे। अथर्ववेद (18।2।25) में ऐसा आया है-'उन्हें वृक्ष कष्ट न दे और पृथिवी माता ही (ऐसा करे)।' इससे शवाधार (ताबूत) एवं शव को गाड़ने की ओर सम्भवत: संकेत मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह कुछ विचित्र सा है कि प्रगतिशील राष्ट्र बाइबिल के कथन की शाब्दिक व्याख्या में विश्वास करते हुए कि 'मृत का भौतिक शरीरोत्थान होता है', केवल शव को गाड़ने की प्रथा से ही चिपके रहे और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ईसाई लोक शवदाह के लिए कभी तत्पर नहीं हुए। सन 1906 में क्रेमेशन एक्ट (इंग्लैण्ड में) पारित हुआ जिसके अनुसार स्वास्थ्यमंत्री-समर्थित समतल भूमि पर शवदाह करने की अनुमति अन्त्येष्टि क्रिया के अध्यक्ष को प्राप्त होने लगी। कैथोलिक चर्च वाले अब भी शवदाह नहीं करते। आदिकालीन रोम के लोग शवदाह को सम्मान्य समझते थे और शव गाड़ने की रीति केवल उन लोगों के लिए बरती जाती थी, जो आत्महन्ता या हत्यारे होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ समय तक शव को विकृत होने से बचाने के लिए तेल आदि में रख छोड़ना भारत में अज्ञात नहीं था। शतपथ ब्राह्मण (29।4।29) एवं वैखानसश्रौतसूत्र (31।32) ने व्यवस्था दी है कि आहिताग्नि अपने लोगों से सुदूर मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो उसके शव को तिल-तेल से पूर्ण द्रोण (नाद) में रखकर गाड़ी द्वारा घर लाना चाहिए। रामायण में कई बार यही कहा गया है कि भरत के आने के बहुत दिन पूर्व ही राजा दशरथ का शव तेलपूर्ण लम्बे द्रोण या नाद में रख दिया गया था (अयोध्याकाण्ड, 66।14-16, 76।4)। विष्णुपुराण में आया है कि निमि का शव तेल तथा अन्य सुगंधित पदार्थों से इस प्रकार सुरक्षित रखा हुआ था कि वह सड़ा नहीं और लगता था कि मृत्यु मानो अभी हुई हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद के प्रणयन के पूर्व की स्थिति के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद तथा सिंधु घाटी के मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा अवशेषों के काल के निर्णय के विषय में अभी कोई सामान्य निश्चय नहीं हो सका है। सर जॉन मार्शल (मोहनजोदड़ो, जिल्द 1, पृष्ठ 86) ने पूर्ण रूप से गाड़ने, आंशिक रूप से गाड़ने एवं शवदाह के उपरान्त गाड़ने के रीतियों की ओर संकेत किया है। लौरिया नन्दनगढ़ की खुदाई से कुछ ऐसी श्मशान भूमियों का पता चला है, जो वैदिक काल की कही जाती हैं और उनमें एक छोटी स्वर्णिम वस्तु पायी गयी है, जो नंगी स्त्री, सम्भवत: पृथिवी माता की हैं। ये सब बातें पुरातत्ववेत्ताओं से सम्बन्ध रखती हैं। अत: हम इन पर यहाँ विचार नहीं करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हारलता (पृष्ठ 126) ने आदिपुराण का एक वचन उद्धृत करते हुए लिखा है कि मग के लोग गाड़े जाते थे और दरद लोग एवं लुप्त्रक लोग अपने सम्बन्धियों के शवों को पेड़ पर लटकाकर चल देते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भिक बौद्धों में अन्त्येष्टि क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरने वाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बान सुत्तगें बौद्धधर्म के महान प्रस्थापक की अन्त्येष्टि क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है (4।14)। इस ग्रन्थ से इस विषय में जो कुछ एकत्र किया जा सकता है, वह यह है-'बुद्ध के अत्यन्त प्रिय शिष्य आनन्द ने कोई पद्य नहीं कहा, कुछ ऐसे शिष्य जो विषयभोग से रहित नहीं थे, रो पड़े और पृथिवी पर धड़ाम से गिर पड़े, और अन्य लोग (अर्हत्) किसी प्रकार दु:ख को सम्भाल सके। दूसरे दिन आनन्द कुशीनारा के मल्लों के पास गये, मल्लों ने धूप, मालाएँ, वाद्ययंत्र तथा पाँच सौ प्रकार के वस्त्र आदि एकत्र किये; मल्लों ने शाल वृक्षों की कुंज में पड़े बुद्ध के शव की प्रार्थना सात दिनों तक की और नाच, स्तुतियों, गायन, मालाओं एवं गंधों से पूजा-अर्चनाएँ कीं और वस्त्रों से शव को ढँकते रहे। सातवें दिन वे भगवान के शव को दक्षिण की ओर ले चले, किन्तु एक चमत्कार (6।29-32 में वर्णित) के कारण वे उत्तरी द्वार से नगर के बीच से होकर शव को लेकर चले और पूर्व दिशा में उसे रख दिया (सामान्य नियम यह था कि शव को गाँव के मध्य से लेकर नहीं जाया जाता और उसे दक्षिण की और ले जाया जाता था, किन्तु बुद्ध इतने असाधारण एवं पवित्र थे कि उपर्युक्त प्रथाविरुद्ध ढंग उनके लिए मान्य हो गया)। बुद्ध का शव नये वस्त्रों से ढँका गया और ऊपर से रूई एवं ऊन के चोगे बाँधे गये और फिर उनके ऊपर एक नया वस्त्र बाँधा गया। इस प्रकार वस्त्रों एवं सूत्रों के पाँच सौ स्तरों से शरीर ढँक दिया गया। इसके उपरान्त एक ऐसे लोहे के तैलपात्र में रखा गया, जो स्वयं एक तैलपात्र में रखा हुआ था। इसके पश्चात् सभी प्रकार के गंधों से युक्त चिता बनायी गई और उस पर शव रख दिया गया। तब महाकस्सप एवं पाँच सौ अन्य बौद्धों ने, जो साथ में आये थे, अपने परिधानों को कंधों पर सजाया (उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण लोग अपने यज्ञोपवीत को धारण करते हैं), उन्होंने बद्धबाहु होकर सिर झुकाया और श्रद्धापूर्वक शव की तीन बार प्रदक्षिणा की। इसके उपरान्त शव का दाह किया गया। केवल अस्थियाँ बच गयीं। इसके उपरान्त मगधराज, अजातशत्रु, वैशाली के लिच्छवियों आदि ने बुद्ध के अवशेषों पर अपना-अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया। बुद्ध के अवशेष आठ भागों में बाँटे गये। जिन्हें ये भाग प्राप्त हुए, उन्होंने उन पर स्तूप (धूप) बनवाये, मोरिय लोगों ने जिन्हें केवल राख मात्र प्राप्त हुई थी, उस पर स्तूप बनवाया और एक ब्राह्मण द्रोण (दोन) ने उसे घड़े पर, जिसमें अस्थियाँ एकत्र कर रखी गयी थीं, एक स्तूप बनवाया।' श्री राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रन्थों एवं जन्म गाथाओं में अन्त्येष्टियों का वर्णन मिलता है, किन्तु कहीं भी प्रचलित धार्मिक क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जा सकता है कि बौद्ध अन्त्येष्टि क्रिया, यद्यपि सरल है, तथापि वह आश्वलायनगृह्यसूत्र के कुछ नियमों से बहुत कुछ मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए जे.आर.ए.एस. (1906, पृष्ठ 655-671 एवं 881-913) में प्रकाशित फ़्लीट के लेख, जो महापरिनिब्बान-सुत्त, दिव्यावदान, फाहियान के ग्रन्थ, सुमंगलविलासिनी एवं अन्य ग्रन्थों के आधार पर लिखे गये ऐसे लेख हैं, जो बुद्ध की अस्थियों एवं भस्म के बँटवारे अथवा उन पर बने स्तूपों पर प्रकाश डालते हैं। फ़्लीट का कहना है कि पिप्रहवा अवशेष-कुंभ में, जिस पर एक अभिलेख अंकित है, जो अब तक पाये गये अभिलेखों में सबसे पुराना है (लगभग ईसापूर्व सन 375) और जिसमें सात सौ वस्तुएँ पायी गई हैं, भगवान बुद्ध के अवशेष चिह्न नहीं हैं, प्रत्युत उनके सम्बन्धियों के हैं। फ़्लीट ने एक परम्परा की ओर संकेत किया है जो बतलाती है कि सम्राट अशोक ने बुद्ध के अवशेष चिह्नों पर बने 8 स्तूपों में 7 को खोदकर उनमें पाये गये अवशेषों को 84000 सोने और चाँदी के पात्रों में परिवर्तित कर दिया और उन्हें सम्पूरण भारत में वितरित कर दिया। इस प्रकार 84000 स्तूपों का निर्माण उन पर किया गया। राइस डेविड्स ने अपने ग्रन्थ 'बुद्धिस्ट इंडिया' (पृष्ठ 78-80) में यह कहते हुए कि जन या धन से विशिष्ट मृत लोगों का राजकर्मचारियों या शिक्षकों के शव जलाये जाते और अवशिष्ट भस्मांश स्तूपों (पालि में थूप या टोप) के अन्दर गाड़ दिये जाते थे। निर्देश किया है कि साधारण लोगों के शव अजीव ढंग से रखे जाते थे। वे खुले स्थल में रख दिये जाते थे। नियमानुकूल वे शव या चितावशेष गाड़े नहीं जाते थे, प्रत्युत पक्षियों या पशुओं द्वारा नष्ट किये जाने के लिए छोड़ दिये जाते थे अथवा वे स्वयं प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मृत के सम्बन्धीगण (पुत्र आदि) जल-तर्पण एवं स्नान करके जल (नदी, जलाशय आदि) से बाहर निकल कर हरी घास के किसी स्थल पर बैठ गये हों, तो गुरुजनों (वृद्ध आदि) को उनके दु:ख कम करने के लिए प्राचीन गाथाएँ कहनी चाहिए (याज्ञवल्क्यस्मृति 3।7 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 1।4।2)।&amp;lt;ref&amp;gt;शोकमुत्सृज्य कल्याणीभिर्वाग्भि: सात्त्विकाभि: कथाभि: पुराणै: सुकृतिभि: श्रुत्वाधोमुखा व्रजन्ति। गौतमपितृमेधसूत्र (1।4।2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र (20।22-53) में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है कि किस प्रकार काल (समय, मृत्यु) सभी को, यहाँ तक इन्द्र, देवों, दैत्यों, महान राजाओं एवं ऋषियों को धर दबोचता है, कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेकर एक दिन मरण को प्राप्त होता ही है (मृत्यु अवश्यंभावी है), कि (पत्नी को छोड़कर) कोई भी मृत व्यक्ति के साथ यमलोक को नहीं जाता है, कि किस प्रकार सदसत् कर्म मृतात्मा के पास आते हैं, कि किस प्रकार श्राद्ध मृतात्मा के लिए कल्याणकर है। इसने निष्कर्ष निकाला है कि इसीलिए जीवित सम्बन्धियों को श्राद्ध करना चाहिए और रुदन छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उससे लाभ नहीं और केवल धर्म ही ऐसा है, जो मृतात्मा के साथ जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यह अवलोकनीय है कि विष्णुधर्मसूत्र के कुछ पद्य (20।29, 48-49 एवं 51-53) भगवदगीता के पद्यों (2।22-28, 13।23-25) के समान ही हैं। विष्णुधर्मसूत्र (20।47 यथा धेनुसहस्रेषु आदि) शान्तिपर्व (181।16, 187।27 एवं 323।16) एवं विष्णुधर्मोत्तर (2।78।27) के समान ही है। इसी प्रकार देखिए विष्णुधर्मसूत्र (20।41) एवं शान्तिपर्व (175।15 एवं 322।73)। देखिए लक्ष्मीधर का कृत्यकल्पतरु (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 91-97), याज्ञवल्क्यस्मृति (3।7, 11), विष्णुधर्मसूत्र (20।22-53) एवं भगवदगीता (2।13, 18)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी ही बातें याज्ञवल्क्यस्मृति (3।8-11=गरुड़पुराण 2।4।8184) में भी पायी जाती है; जो व्यक्ति मानव जीवन में, जो केले के पौधे के समान सारहीन है, और जो पानी के बुलबुले के समान अस्थिर है, अमरता खोजता है, वह भ्रम में पड़ा हुआ है। रुदन से क्या लाभ है जब कि शरीर पूर्व जन्म के कर्मों के कारण पंचतत्त्वों से निर्मित हो पुन: उन्हीं तत्त्वों में समा जाता है। पृथिवी, सागर और देवता नाश को प्राप्त होने वाले हैं (भविष्य में जब कि प्रलय होता है)। यह कैसे सम्भव है कि वह मृत्युलोक, जो फेन के समान क्षणभंगुर है, नाश को प्राप्त नहीं होगा? मृतात्मा को असहाय होकर अपने सम्बन्धियों के आँसू एवं नासिकारंध्रों से निकले द्रव पदार्थ को पीना पड़ता है, अत: उन सम्बन्धियों को रोना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म आदि करना चाहिए। गोभिलस्मृति (3।39) ने बलपूर्वक कहा है कि 'जो नाशवान है और जो सभी प्राणियो की विशेषता (नियति) है, उसके लिए रोना-कलपना क्या? केवल शुभ कर्मों के सम्पादन में, जो तुम्हारे साथ जाने वाले हैं, लगे रहो।' गोभिल ने याज्ञवल्क्यस्मृति (3।8-10) एवं महाभारत को उद्धृत किया है-'सभी संग्रह क्षय को प्राप्त होते हैं, सभी उदय पतन को, सभी संयोग वियोग और जीवन मरण को।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छया:। संयोग विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।। और देखिए शान्तिपर्व (331।20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपरार्क ने रामायण एवं महाभारत से उदाहरण दिये हैं, यथा दुर्योधन की मृत्यु पर वासुदेव द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति कहे गये वचन। पराशरमाधवीय (1।2, पृष्ठ 292-293), शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 205-206) एवं अन्य ग्रन्थों ने विष्णुधर्मसूत्र, याज्ञवल्क्यस्मृति एवं गोभिलस्मृति के वचन उद्धृत किये हैं।&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
===================================&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A7_%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=232604</id>
		<title>पितृमेध या अन्त्यकर्म संस्कार</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A7_%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=232604"/>
		<updated>2011-11-06T11:40:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{अस्वीकरण}}&lt;br /&gt;
{{प्रतीक्षा|तिथि-समय=16:39, 3 नवम्बर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''पितृमेध या अन्त्यकर्म या अंत्येष्टि संस्कार''' [[हिन्दू धर्म संस्कार|हिन्दू धर्म संस्कारों]] में षोडश संस्कार है। यह अन्तिम संस्कार है। मृत्यु के पश्चात यह संस्कार किया जाता है। इस संस्कार को पितृमेध, अन्त्कर्म, दाह-संस्कार, श्मशानकर्म तथा अन्त्येष्टि-क्रिया आदि भी कहते हैं। यह संस्कार वेदमंत्रों के उच्चारण द्वारा होता है। हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद दाह-संस्कार करने का विधान है। केवल संन्यासी-महात्माओं के लिए—निरग्रि होने के कारण शरीर छूट जाने पर भूमिसमाधि या जलसमाधि आदि देने का विधान है। कहीं-कहीं संन्यासी का भी दाह-संस्कार किया जाता है और उसमें कोई दोष नहीं माना जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक-कल्याण संस्कार-अंक ([[जनवरी]] सन [[2006]] ई. से&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।। &amp;lt;ref&amp;gt;और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण: ...।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गधा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पृष्ठ 251&amp;lt;/ref&amp;gt; या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
==मरणासन्न अवस्था==&lt;br /&gt;
[[भारत]] के '''अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं। यह प्रथा [[यूरोप]] में भी है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;प्रो. एडगर्टन का लेख; ‘दी आवर आव डेथ’, एनल्स आव दी भण्डारकर ओ. आर. इंस्टीट्यूट, जिल्द 8, पृष्ठ 219-249&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  80|3&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है; जब व्यक्ति शक्तिहीन होता है, अर्थात् मरने लगता है तो (पुत्र या सेवा करने वाला कोई सम्बन्धी) शाला में लगी हुई घास पर कुश बिछा देता है और उसे 'स्योनास्मै भव' मन्त्र के साथ (बिस्तर या खाट से) उठाकर उस पर रख देता है। &lt;br /&gt;
*बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3|1|18&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से जब यजमान के मरने का भय हो जाए तो यज्ञशाला में पृथिवी पर बालू बिछा देनी चाहिए और उस पर दर्भ फैला देने चाहिए, जिनकी नोंक दक्षिण की ओर होती है, मरणासन्न के दायें कान में 'आयुष: प्राणं सन्तनु' से आरम्भ होने वाले अनुवाक का पाठ (पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धी द्वारा) होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3।22), पितृदयिता आदि।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलीभवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोहयति। &lt;br /&gt;
मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते। यत्ते कृष्णेत्यवदीपयति।।&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र (80|3-5)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;'स्योनास्मै' मन्त्र के लिए देखिए [[अथर्ववेद]] (18-2-19), [[ऋग्वेद]] (1|22|15) एवं वाजसनेयीसंहिता (36|13), देखिए निरुक्त (9|32)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
:'यदा कण्ठस्थानगतजीवी विह्वलो देही भवति तदा बहिर्गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ कुशान्दक्षिणाग्रानास्तीर्य तदुपरि दक्षिणशिरसं स्थापयित्वा सुवर्णरजतगोभूमिदीपतिलपात्राणि दापयेत्।'&amp;lt;ref&amp;gt;पितृदयिता, पृष्ठ 74&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलं स्नापयित्वा तु शुद्धचैलाभिसंवृतम्। &lt;br /&gt;
दक्षिणाशिरसं भूमौ बहिष्मत्यां निवेशयेत्।।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति- 3।22&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश  पृष्ठ 151-152&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि जब कोई व्यक्ति मृतप्राय हो, उसकी आंखें आधी बन्द हो गई हों और वह खाट से नीचे उतार दिया गया हो, तो उसके पुत्र या किसी सम्बन्धी को चाहिए कि वह उससे निम्न प्रकार का कोई एक या सभी प्रकार के दस दान कराये-[[गौ]], भूमि, तिल, [[सोना]], घृत, [[वस्त्र]], धान्य, गुड़, रजत ([[चाँदी]]) एवं [[नमक]]।&amp;lt;ref&amp;gt;दानानि च जातूकर्ण्य आह। उत्क्रान्तिवैतरण्यौ च दश दानानि चैव हि। प्रेतेऽपि कृत्वा तं प्रेतं शवधर्मेण दाहयेत्।.....दश दानानि च तेनैवोक्तानि। गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च। रूप्यं लवणमित्याहुर्दश दानान्यनुक्रमात्।। शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 152)। और देखिए [[गरुड़ पुराण]] (प्रेतखण्ड, 4।4); एपिग्रैफ़िया इण्डिका (जिल्द 19, पृष्ठ 230)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये दान गयाश्राद्ध या सैकड़ों अश्वमेधों से बढ़कर हैं। संकल्प इस प्रकार का होता है-'अभ्युदय (स्वर्ग) की प्राप्ति या पापमोचन के लिए मैं दस दान करूँगा।' दस दानों के उपरान्त उत्क्रान्ति-धेनु (मृत्यु को ध्यान में रखकर बछड़े के साथ गौ) दी जाती है, और इसके उपरान्त वैतरणी गौ का दान किया जाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;आसन्नमृत्युना देया गौ: सवत्सा तु पूर्ववत्। &lt;br /&gt;
तदभावे तु गौरेव नरकोत्तरणाय च।। &lt;br /&gt;
तदा यदि न शक्नोति दातुं वैतरणीं तु गाम। &lt;br /&gt;
शक्तोऽन्योऽरुक् तदा दत्त्वा दद्याच्छ्रेयो मृतस्य च।।&amp;lt;ref&amp;gt;व्यास (शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 300; शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 153; अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 7)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण- प्रेतखण्ड, 4।6&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है:-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;नदीं वैतरणीं तर्तु दद्याद्वैतरणीं च गाम्। &lt;br /&gt;
कृष्णस्तनी सकृष्णांगी सा वै वैतरणी स्मृता।।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
अर्थात; यम के द्वार पर वैतरणी नाम की नदी है, जो रक्त एवं पैने अस्त्रों से परिपूर्ण है; जो लोग मरते समय गौदान करते हैं, वे उस नदी को गाय की पूँछ पकड़कर पार कर जाते हैं। [[स्कन्दपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[स्कन्दपुराण]] 6|226|32-33&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ वैतरणी की चर्चा है:-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;मृत्युकाले प्रचच्छन्ति ये धेनुं ब्राह्मणाय वै। &lt;br /&gt;
तस्या: पुच्छं समाश्रित्य ते तरन्ति च तां नृप।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 152-153&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन मन्त्रों का (जो वैदिक नहीं है) उल्लेख है जो दानों के समय कहे जाते हैं। अन्त्येष्टिपद्धति अन्त्यकर्मदीपक आदि ने व्यवस्था दी है कि जब व्यक्ति आसन्नमृत्यु हो, तो उसके पुत्र या सम्बन्धियों को चाहिए कि वे उससे व्रतोद्यापन, सर्वप्रायश्चित्त एवं दस दानों के कृत्य करायें, किन्तु यदि मरणासन्न इन कृत्यों को स्वयं करने में अशक्त हो तो पुत्र या सम्बन्धी को उसके लिए ऐसा कर देना चाहिए। जब व्यक्ति संकल्पित व्रत नहीं कर पाता तो मरते समय वह व्रतोद्यापन कृत्य करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====व्रतोद्यापन====&lt;br /&gt;
संक्षेप में व्रतोद्यापन यों है-पुत्र या सम्बन्धी मरणासन्न व्यक्ति को स्नान द्वारा या पवित्र जल से मार्जन करके या गंगा जल पिलाकर पवित्र करता है, स्वयं स्नानसन्ध्या से पवित्र हो लेता है, दीप जलाता है, [[गणेश]] एवं [[विष्णु]] की पूजा-वन्दना करता है, पूजा की सामग्री रखकर संकल्प करता है:-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्वे...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...अमुकतियौ अमुकगोत्र...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...अमुकशमहिं ममात्मन: (मम पित्रादे:) व्रतग्रहणदिवसादारभ्य अद्य यावत्फलाभिलाषादिगृहीतानां निष्कामतया गृहीतानां च अमुकामुकव्रतानामकृतोद्यापनदोषपरिहारार्थ श्रुतिस्मृति-पुराणोक्ततत्तदव्रतजन्यसांगफलप्राप्त्यर्थ विष्ण्वादीनां तत्तद्देवानां प्रीपये इदं सुवर्णमग्निदैवतम् (तदभावे इदं रजतं चन्द्रदैवतम्) अमुकगोत्रायामुकशर्मण् ब्राह्मणाय दास्ये ओं तत्सत् न मम इति संकल्प...आदि-आदि।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमन्त्रित ब्राह्मण को सम्मानित करता है और पहले से संकल्पित सोना उसे देता है और ब्राह्मण घोषित करता है-'सभी व्रत पूर्ण हों। उद्यापन (व्रत-पूर्ति) के फल की प्राप्ति हो।' सर्वप्रायश्चित में पुत्र चार या तीन विद्वान ब्राह्मणों या एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण को 6, 3 या डेढ़ वर्ष वाले प्रायश्चित्तों के निष्क्रिय रूप में सोना आदि का दान देता है और इसकी घोषणा करता है और वह अशौच के उपरान्त प्रायश्चित करता है। मरणासन्न व्यक्ति को या पुत्र या सम्बन्धी को सर्वप्रायश्चित करना पड़ता है। वह क्षीरकर्म करके स्नान करता है, पंचगव्य पीता है, चन्दनलेप एवं अन्य पदार्थों से एक ब्राह्मण को सम्मानित करता है, गोपूजा करके या उसके स्थान पर धन का दान करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देशकालौ संकीर्त्य मम (मत्पत्रादेर्वां) ज्ञाताज्ञातकामाकामसकृदसकृत्कायिकवाचिकमानसिकतांसर्गिक-स्पृष्टास्पृष्ट-भुक्ताभुक्त-पीतापीतसकलपातकानुपातकोपपातकलघुपातकसंकरीकरणमलिनीकरणपात्री- करणजातिभ्रंशकरप्रकीर्णकादिनानाविधपातकानां निरासेन देहावसानकाले देहशुद्धिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थमिमां सर्वप्रायश्चित्तप्रत्याम्नायभूतां यथाशक्त्यलंकृतां सवत्सां गां रुद्रदेवताममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ओं तत्सत् न मम।&amp;lt;ref&amp;gt; अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 5)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वप्रायश्चित के उपरान्त दश-दान होते हैं। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण  2|4|7-9&amp;lt;/ref&amp;gt; ने महादान संज्ञक अन्य दानों की व्यवस्था दी है, यथा-[[तिल]], [[लोहा]], सोना, रूई, नमक, सात प्रकार के अन्न, भूमि, गौ; कुछ अन्य दान भी हैं, यथा-छाता, [[चन्दन]], अँगूठी, जलपात्र, आसन, भोजन, जिन्हें पददान कहा जाता है। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2|4|47&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यदि मरणासन्न व्यक्ति आतुर-संन्यास नियमों के अनुसार संन्यास ग्रहण कर लेता है, तो वह आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा पा जाता है। आदिकाल से ही ऐसा विश्वास रहा है कि मरते समय व्यक्ति जो विचार रखता है, उसी के अनुसार दैहिक जीवन के उपरान्त उसका जीवात्मा आक्रान्त होता है (अन्ते या मति: सा गति:), अत: मृत्यु के समय व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया छोड़कर हरि या [[शिव]] का स्मरण करना चाहिए और मन ही मन 'ऊँ नमो वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8|5-6) एवं [[पद्म पुराण]] (5|47|262)-'मरणे या मति: पुंसां गतिर्भवति तादृशी।'&amp;lt;/ref&amp;gt; बहुत से वचनों के अनुसार उसे वैदिक पाठ सुनाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम-पितृमेधसूत्र 1|1-8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मरणासन्न व्यक्ति द्वारा स्मरण====&lt;br /&gt;
हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र 1|1&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से आहिताग्नि के मरते समय पुत्र या सम्बन्धी को उसके कान में (जब वह ब्रह्मज्ञानी हो) [[तैत्तिरीयोपनिषद]] के दो अनुवाक (2|1 एवं 3|1) कहने चाहिए। अन्त्यकर्मदीपक&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक  पृष्ठ 18&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जब मरणासन्न व्यक्ति जप न कर सके तो उसे [[विष्णु]] या शिव का रमणीय रूप मन में धारण कर विष्णु या शिव के सहस्र नाम सुनने चाहिए और भगवद्गीता, भागवत, [[रामायण]], ईशावास्य आदि [[उपनिषद|उपनिषदों]] एवं सामवेदीय मन्त्रों का पाठ सुनना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जपेऽसमर्थश्चेद हृदये चतुर्भुजं शंखचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरकिरीटकेयूरकौस्तुभवनमालाधरं रमणीयरूपं विष्णुं त्रिशूलडमरुधरं त्रिनेत्रं गंगाधरं शिवं वा भावयन् सहस्रनामगीताभागवतभारतरामायणेशावास्याद्युपनिषद: पावमानादीनि सूक्तानि च यथासम्भवं शृणुयात्।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 18)&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुसहस्रनाम के लिए देखिए [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]] (149|14-120); शिव के 1008 नामों के लिए देखिए वही (17|31-153); और शिव सहस्रनाम के लिए देखिए शान्तिपर्व भी (285|74)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपनिषदों में भी मरणासन्न व्यक्ति की भावनाओं के विषय में संकेत मिलते हैं। [[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]] (शाण्डिल्य-विद्या, 314|1)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'सभी ब्रह्म है। व्यक्ति को आदि, अन्त एवं इसी स्थिति के रूप में इसका (ब्रह्म का) ध्यान करना चाहिए। इसी की इच्छा की सृष्टि मनुष्य है। इस विश्व में उसकी जो इच्छा (या भावना) होगी, उसी के अनुसार वह इहलोक से जाने के उपरान्त होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वखल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीताथ खलु क्रतुमय: पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत: प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत।&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद् (3|14|1)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। &lt;br /&gt;
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:।। &lt;br /&gt;
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। &lt;br /&gt;
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावित:।।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8|5-6) देखिए और शंकरभाष्य, वेदान्तसूत्र (1|2|1 एवं 4|1|12)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार की भावना [[प्रश्नोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रश्नोपनिषद]] 3|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है। वहाँ ऐसा आया है कि विचार-शक्ति आत्मा को उच्चतर उठाती जाती है, जिससे मनुष्य-मन को ऐसा परिज्ञान होना चाहिए कि अखिल ब्रह्माण्ड में जितने भौतिक पदार्थ या अभिव्यक्तियाँ हैं, वे सब एक हैं और उनमें एक ही विभु रूप समाया हुआ है। भगवद्गीता ने यही भावना और अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त की है-'वह व्यक्ति, जो अन्तकाल में मुझे स्मरण करता हुआ इस जीवन से विदा होता है, वह मेरे पास आता है, इसमें संशय नहीं है'।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रश्नोपनिषद 8|5 &amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु एक बात स्मरणीय यह है कि अन्तकाल में ही केवल भगवान का स्मरण करने से कुछ न होगा, जब जीवन भर आत्मा ऐसी भावना से अभिभूत रहता है, तभी भगवत्प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है-'व्यक्ति मृत्यु के समय जो भी रूप (या वस्तु) सोचता है, उसी को वह प्राप्त होता है, और यह तभी सम्भव है, जबकि वह जीवन भर ऐसा करता आया हो।'&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता 8|6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====तीर्थस्थान गमन====&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के आधार पर कुछ निबन्धों का ऐसा कथन है कि अन्तकाल उपस्थित होने पर व्यक्ति को, यदि सम्भव हो तो, किसी तीर्थ-स्थान (यथा गंगा) में ले जाना चाहिए। शुद्धितत्त्व&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व पृष्ठ 299&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[कूर्मपुराण]] को उद्धृत किया है-'[[गंगा]] के जल में, [[वाराणसी]] के स्थल या जल में, गंगासागर में या उसकी भूमि, जल या अन्तरिक्ष में मरने से व्यक्ति मोक्ष (संसार से अन्तिम छुटकारा) पाता है।' इसी अर्थ में स्कन्दपुराण में आया है-'गंगा के तटों से एक गव्यूति (दो कोस) तक क्षेत्र (पवित्र स्थान) होता है, इतनी दूर तक दान, जप एवं होम करने से गंगा का ही फल प्राप्त होता है; जो इस क्षेत्र में मरता है, वह स्वर्ग जाता है और पुन: जन्म नहीं पाता'।&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 299-300; शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 155&amp;lt;/ref&amp;gt; पूजारत्नाकर में आया है-'जहाँ जहाँ शालग्रामशिला होती है, वहाँ हरि का निवास रहता है; जो शालग्रामशिला के पास मरता है, वह हरि का परमपद प्राप्त करता है।' ऐसा भी कहा गया है कि यदि कोई अनार्य देश (कीकट) में भी शालग्राम से एक कोस की दूरी पर मरता है, वह [[वैकुण्ठ]] (विष्णुलोक) पाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति [[तुलसी]] के वन में मरता है या मरते समय जिसके मुख में तुलसीदल रहता है, वह करोड़ों पाप करने पर भी मोक्षपद प्राप्त करता है। इस प्रकार की भावनाएँ आज भी लोकप्रसिद्ध हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'''कूर्मपुराणम्'''- गंगायां च जले मोक्षो वाराणस्यां जले स्थले। &lt;br /&gt;
जले स्थले चान्तरिक्षे गंगासागरसंगमे।। &lt;br /&gt;
'''स्कन्दे'''- तीराद् गव्यूतिमात्रं तु परित: क्षेत्रमुच्यते। &lt;br /&gt;
अत्र दानं जपो होमो गंगायां नात्र संशय:।। &lt;br /&gt;
अत्रस्थास्त्रिदिवं यान्ति ये मृता न पुनर्भवा:।&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299-300); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''पूजारत्नाकरे'''- शालग्रामशिला यत्र तत्र संनिहितो हरि:। &lt;br /&gt;
तत्सन्निघौ त्यजेत् प्राणान् याति विष्णो: परं पदम्।। &lt;br /&gt;
'''लिंगपुराणे'''-शालग्रामसमीपे तु क्रोशमात्रं समन्तत:। &lt;br /&gt;
कीकटेपि मृतो याति वैकुण्ठभवनं नर:।। &lt;br /&gt;
'''वैष्णवामृते व्यास'''-तुलसीकानने जन्तोर्यदि मृत्युर्भवेत् क्वचित्। &lt;br /&gt;
स निर्भर्त्स्य नरं पापी लीलयैव हरिं विशेत्।। &lt;br /&gt;
प्रयाणकाले यस्यास्ये दीयते तुलसीदलम्। &lt;br /&gt;
निर्वाणं याति पक्षीन्द्र पापकोटियृतोपि स:।। &amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कीकट मगध देश का नाम है, जिसे ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद (3।53।14)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आर्यधर्म से बाहर की भूमि कहा गया है। और देखिए निरुक्त&amp;lt;ref&amp;gt;निरुक्त (6।32)&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ कीकट देश को अनार्य निवास कहा गया है। शुद्धिप्रकाश ‘कीकटेपि’ के स्थान पर ‘कीटकोऽपि’ लिखता है जो अधिक समीचीन है, किन्तु यह संशोधन भी हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु का उत्तम काल==&lt;br /&gt;
मृत्यु के उत्तम काल के विषय में भी कुछ धारणाएँ हैं। [[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व (298।23, कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 254)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- ''''जो व्यक्ति सूर्य के उत्तर दिशा में जाने पर (उत्तरायण होने पर) मरता है या किसी अन्य शुभ [[नक्षत्र]] एवं मुहूर्त में मरता है, वह सचमुच पुण्यवान है।'''' यह भावना उपनिषदों में व्यक्त उत्तरायण एवं दक्षिणायन में मरने की धारणा पर आधारित है। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 4|15|5-6&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- 'अब (यदि यह आत्मज्ञानी व्यक्ति मरता है) चाहे लोग उसकी अन्त्येष्टि क्रिया ([[श्राद्ध]] आदि) करें या न करें, वह अर्चि: अर्थात् प्रकाश को प्राप्त होता है, प्रकाश से दिन, दिन से चन्द्र के अर्ध प्रकाश ([[शुक्ल पक्ष]]), उससे उत्तरायण के छ: मास, उससे वर्ष, वर्ष से [[सूर्य]], सूर्य से चन्द्र, [[चन्द्र ग्रह|चन्द्र]] से विद्युत को प्राप्त होता है। अमानव उसे ब्रह्म की ओर ले जाता है। यह देवों का मार्ग है; वह मार्ग, जिससे ब्रह्म की प्राप्ति होती है। जो लोग इस मार्ग से जाते हैं, वे मानव जीवन में पुन: नहीं लौटते। हाँ, वे नहीं लौटते।' ऐसी ही बात छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5।10।1-2&amp;lt;/ref&amp;gt; में आयी है, जहाँ कहा गया है कि पंचाग्नि-विद्या जानने वाले गृहस्थ तथा विश्वास (श्रद्धा) एवं तप करने वाले वानप्रस्थ एवं परिव्राजक (जो अभी ब्रह्म को नहीं जानते) भी देवयान (देवमार्ग) से जाते हैं। और जो लोग ग्रामवासी हैं,&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5|10|3-7&amp;lt;/ref&amp;gt; यज्ञपरायण हैं, दान-दक्षिणायुक्त हैं, धूम को जाते हैं, वे धूम से रात्रि, रात्रि से चन्द्र के अर्ध अंधकार ([[कृष्ण पक्ष]]) में, उससे दक्षिणायन के छ: मास, उससे पितृलोक, उससे आकाश एवं चन्द्र को जाते हैं, जहाँ वे कर्मफल पाते हैं और पुन: उसी मार्ग से लौट आते हैं। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5|10|8&amp;lt;/ref&amp;gt; ने एक तीसरे स्थान की ओर संकेत किया है, जहाँ कीट-पतंग आदि लगातार आते-जाते रहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बृहदारण्यकोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;बृहदारण्यकोपनिषद 6|2|115-16&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी देवलोग, पितृलोक एवं उस लोक का उल्लेख किया है, जहाँ कीट, पतंग आदि जाते हैं। भगवद्गीता&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता 8|23-25&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी उपनिषदों के इन वचनों को सूक्ष्म रूप में कहा है-मैं उन कालों का वर्णन करूँगा, जब कि भक्तगण कभी न लौटने के लिए इस विश्व से विदा होते हैं। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण सूर्य के छ:; जब ब्रह्मज्ञानी इन कालों में मरते हैं, तो ब्रह्मलोक जाते हैं। धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष, दक्षिणायन सूर्य के छ: मासों में मरने वाले भक्तगण चन्द्रलोक में जाते हैं और पुन: लौट आते हैं। इस विषय में ये दो मार्ग, जो प्रकाशमान एवं अंधकारमय हैं, सनातन हैं। एक से जाने वाला कभी नहीं लौटता, किन्तु दूसरे से आने वाला लौट आता है। वेदान्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वेदान्तसूत्र 4|3|4-6&amp;lt;/ref&amp;gt; ने 'प्रकाश', 'दिन' आदि शब्दों को यथाश्रुत शाब्दिक अर्थ में लेने को नहीं कहा है; अर्थात् उसके मत से ये मार्गों के लक्षण या स्तर नहीं हैं, प्रत्युत ये उन देवताओं के प्रतीक हैं, जो मृतात्माओं को सहायता देते हैं और देवलोक एवं पितृलोक के मार्गों में उन्हें ले जाते हैं, अर्थात् वे आतिवाहिक एवं अभिमानी देवता हैं। शंकर ने वेदान्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वेदान्तसूत्र (4|2|20 अतश्चायनेपि दक्षिणे)&amp;lt;/ref&amp;gt; की व्याख्या में बताया है कि जब [[भीष्म]] ने उत्तरायण की बाट जोही तो इससे यही समझना चाहिए कि वहाँ अर्चिरादि की प्रशस्ति मात्र है-जो ब्रह्मज्ञानी है, वह यदि दक्षिणायन में मर जाता है तो भी वह अपने ज्ञान का फल पाता है, अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त करता है। जब भीष्म ने उत्तरायण की बाट जोही तो ऐसा करके उन्होंने केवल लोकप्रसिद्ध प्रयोग या आचरण को मान्यता दी और उन्होंने यह भी प्रकट किया कि उनमें यह शक्ति भी थी कि वे अपनी इच्छाशक्ति से ही मर सकते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें ऐसा वर दे रखा था।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति (3|9193-196) 'देवयान' एवं 'पितृयान' के विषय में देखिए ऋग्वेद में भी, यथा-3|58|5; 7|38|8; 7|76|2; 10|51|5; 10|98|11; 10|18|1; 10|2|7 और [[तैत्तिरीय ब्राह्मण]] (2|6|3|5); [[शतपथ ब्राह्मण]] (1।9।3।2); बृहदारण्यकोपनिषद् (1।5।16)।&amp;lt;/ref&amp;gt; शंकर एवं वेदान्तसूत्र के वचनों के रहते हुए भी लोकप्रसिद्ध बात यही रही है कि उत्तरायण में मरना उत्तम है।&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 2।|7|21 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 2|7|1-2&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्त्येष्टि एक संस्कार==&lt;br /&gt;
अन्त्येष्टि एक संस्कार है। यह द्विजों द्वारा किये जाने वाले सोलह या इससे भी अधिक संस्कारों में एक है और मनु&amp;lt;ref&amp;gt;मनु 2।16&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 1|10&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं जातुकर्ण्य&amp;lt;ref&amp;gt;जातुकर्ण्य (संस्कारप्रकाश, पृष्ठ 135 एवं अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 1)&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यह वैदिक मन्त्रों के साथ किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधि:। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन् ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्।। मनु 2।16; ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रो द्विजा:। निषेकाद्या: श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रत: क्रिया:।। याज्ञवल्क्यस्मृति (1।10); आधानपुंससीमन्तजातनामान्नचौलका:। मौञ्जी व्रतानि गोदानं समावर्तविवाहका:।। अर्न्त्य चैतानि कर्माणि प्रोच्यन्ते षोडशैव तु।। जातूकर्ण्य (संस्कारप्रकाश, पृष्ठ 135 एवं अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 1)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये संस्कार पहले स्त्रियों के लिए भी&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायनगृह्यसूत्र 1|15|12, 1|16|6, 1|17|11 एवं मनु 2|66&amp;lt;/ref&amp;gt; होते थे, किन्तु बिना वैदिक मन्त्रों के (किन्तु विवाह संस्कार में वैदिक मन्त्रोंच्चारण होता है) और शूद्रों के लिए&amp;lt;ref&amp;gt;मनु 10।127 एवं याज्ञवल्क्यस्मृति 1।10&amp;lt;/ref&amp;gt; भी बिना वैदिक मन्त्रों के। बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 3|1|4&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि प्रत्येक मानव के लिए दो संस्कार ऋण-स्वरूप हैं (अर्थात् उनका सम्पादन अनिवार्य है) और वे हैं, जन्म संस्कार एवं मृतक संस्कार। दाह संस्कार तथा श्राद्ध आदि आहिताग्नि&amp;lt;ref&amp;gt;जो श्रौत अग्निहोत्र अर्थात् वैदिक यज्ञ करता है&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं स्मार्ताग्नि&amp;lt;ref&amp;gt;जो केवल स्मार्त अग्नि को पूजता है, अर्थात् स्मृतियों में व्यवस्थित धार्मिक कृत्य करता है&amp;lt;/ref&amp;gt; के लिए भिन्न-भिन्न रीतियों से होते हैं, तथा उन लोगों के लिए भी जो श्रौत या स्मार्त कोई अग्नि नहीं रखते। जो स्त्री है, बच्चा है, परिव्राजक है, जो दूर देश में मरता है, जो अकाल मृत्यु पाता है या आत्महत्या करता है या दुर्घटनावश मर जाता है; उनके लिए अन्त्येष्टि-कृत्य भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। एक ही विषय की कृत्य-विधियों में [[श्रौतसूत्र]] एवं [[गृह्यसूत्र]] विभिन्न बातें कहते हैं और आगे चलकर मध्य एवं पश्चात्यकालीन युगों युगों में विधियाँ और भी विस्तृत होती चली गयी हैं। निर्णयसिन्धु&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु पृष्ठ 569&amp;lt;/ref&amp;gt; ने स्पष्ट कहा है कि, अन्त्येष्टि प्रत्येक शाखा में भिन्न रूप से उल्लिखित है, किन्तु कुछ बातें सभी शाखाओं में एक-सी हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रतिशाखं भिन्नेप्यन्त्यकर्मणि साधारणं किंचिदुच्यते। निर्णयसिन्धु (पृष्ठ 569)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्त्य-कर्मों के विस्तार, अभाव एवं उपस्थिति के आधार पर सूत्रों, स्मृतियों, पुराणों एवं निबन्धों के काल-क्रम-सम्बन्धी निष्कर्ष निकाले गये हैं,&amp;lt;ref&amp;gt;जैसा कि डॉक्टर कैलैण्ड ने किया है&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु ये निष्कर्ष बहुधा अनुमानों एवं वैयक्तिक भावनाओं पर ही आधारित हैं।&lt;br /&gt;
==ऋग्वेद के सूक्त==&lt;br /&gt;
श्रौतसूत्रों, गृह्यसूत्रों एवं पश्चात्कालीन ग्रन्थों में उल्लिखित अन्त्य कर्मों को उपस्थित करने के पूर्व ऋग्वेद के पाँच सूक्तों&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|14-18&amp;lt;/ref&amp;gt; का अनुवाद इस प्रकार है। इन सूक्तों की ऋचाएँ (मन्त्र) बहुधा सभी सूत्रों द्वारा प्रयुक्त हुई हैं और उनका प्रयोग आज भी अन्त्येष्टि के समय होता है और उनमें अधिकांश वैदिक संहिताओं में भी पायी जाती हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य टीकाकारों ने इन मन्त्रों की टीका एवं व्याख्या विभिन्न प्रकार से की है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री बेर्ट्रम एस. पकिल (Bertrum S. Puckle) ने अपनी पुस्तक ‘फ़्यूनरल कस्टम्स’ (Funeral Customs : London 1926) में अन्त्य कर्मों आदि के विषय में बड़ी मनोरंजक बातें दी हैं। उन्होंने [[इंग्लैण्ड]], [[फ़्राँस]] आदि यूरोपीय देशों, [[यहूदी|यहूदियों]] तथा विश्व के अन्य भागों के अन्त्य कर्मों के विषय में विस्तार के साथ वर्णन किया है। उनके द्वारा उपस्थापित वर्णन प्राचीन एवं आधुनिक भारतीय विश्वासों एवं आचारों से बहुत मेल खाते हैं, यथा-जहाँ व्यक्ति रोगग्रस्त पड़ा रहता है, वहाँ काक (काले कौआ) या काले पंख वाले पक्षी का उड़ते हुए बैठ जाना मृत्यु की सूचना है (पृष्ठ 17), कब्र में गाड़ने के पूर्व शव को स्नान कराना या उस पर लेप करना (पृष्ठ 34 एवं 36), मृत व्यक्ति के लिए रोने एवं शोक प्रकट करने के लिए पेशेवर स्त्रियों को भाड़े पर बुलाना (पृष्ठ 67), रात्रि में शव को न गाड़ना (पृष्ठ 77), सूतक के कारण क्षौरकर्म करना (पृष्ठ 91), मृत के लिए कब्र पर मांस एवं मद्य रखना (पृष्ठ 99-100), कब्रगाह में बपतिस्मा-रहित बच्चों, आत्महन्ताओं, पागलों एवं जातिच्युतों को न गाड़ने देना (पृष्ठ 143)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====प्रथम सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|14&amp;lt;/ref&amp;gt; में प्रथम सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#&amp;quot;(यजमान!) उस यम की पूजा करो, जो (पितरों का) राजा है, विवस्वान् का पुत्र है, (मृत) पुरुषों को एकत्र करने वाला है, जिसने (शुभ कर्म करने वाले) बहुतों के लिए मार्ग खोज डाला है और जिसने महान (अपार्थिव) ऊँचाइयाँ पार कर ली हैं। &lt;br /&gt;
#हम लोगों के मार्ग का ज्ञान सर्वप्रथम यम को हुआ; वह ऐसा चारागाह (निवास) है, जिसे कोई नहीं छीन सकता, वह वही निवास-स्थान है, जहाँ हमारे प्राचीन पूर्वज अपने-अपने मार्ग को जानते हुए गये। &lt;br /&gt;
#मातलि (इन्द्र के सारथि या स्वयं इन्द्र) 'काव्य' नामक (पितरों) के साथ, यम [[अंगिरस|अंगिरसों]] के साथ एवं [[बृहस्पति]] ऋक्वनों के साथ समृद्धिशाली होते हैं (शक्ति में वृद्धि पाते हैं); जिन्हें (अर्थात् पितरों को) देवगण आश्रय देते हैं और जो देवगण को आश्रय देते हैं; उनमें कुछ लोग (देवगण, इन्द्र तथा अन्य) स्वाहा से प्रसन्न होते हैं और अन्य लोग (पितर) स्वधा से प्रसन्न होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;काव्य, अंगिरस एवं ऋक्वन् लोग पितरों की विभिन्न कोटियों के द्योतक हैं। ऋग्वेद 7|10|4&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऋक्वन (गायक) लोग बृहस्पति से सम्बन्धित हैं। अन्य स्थानों पर वे विष्णु, अज-एकपाद एवं सोम से भी सम्बन्धित माने गये हैं। स्वाहा का उच्चारण देवगण को आहुति देते समय तथा स्वधा का उच्चारण पितरों को आहुति देते समय किया जाता है।&lt;br /&gt;
#हे यम! अंगिरस् नामक पितरों के साथ एकमत होकर इस [[यज्ञ]] में जाओ और (कुशों के) आसन पर बैठो। विज्ञ लोगों (पुरोहितों) द्वारा कहे जाने वाले मन्त्र तुम्हें (यहाँ) लायें। (राजन्!) इस आहुति से प्रसन्न होओ। &lt;br /&gt;
#हे यम! अंगिरसों एवं वैरूपों (के साथ जाओ) और आनन्दित होओ। मैं तुम्हारे पिता विवस्वान का आह्वान करता हूँ; यज्ञ में बिछे हुए कुशासन पर बैठकर (वे स्वयं आनन्दित हों)।&amp;lt;ref&amp;gt;वैरूप लोग अंगिरसों की उपकोटि में आते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
#अंगिरस, नवग्व, अथर्व एवं भृगु लोग हमारे पितर हैं और सोम से प्रीति रखते हैं। हमें उन श्रद्धास्पदों की सदिच्छा प्राप्त हो! हमें उनका कल्याणप्रद अनुग्रह भी प्राप्त हो! &lt;br /&gt;
#जिन मार्गों से हमारे पूर्वज गये, उन्हीं प्राचीन मार्गों से शीघ्रता करके जाओ। तुम लोग (अर्थात् मृत लोग) यम एवं वरुण नामक दो राजाओं को स्वेच्छापूर्वक आनन्द मनाते हुए देखो।&amp;lt;ref&amp;gt;यह और आगे आने वाले तीन मन्त्र मृत लोगों को सम्बोधित हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
#हे मृत! उच्चतम स्वर्ग में पितरों, यम एवं अपने इष्टापूर्त के साथ जा मिलो।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए इस ग्रन्थ का खण्ड 2, अध्याय 35, जहाँ इष्टापूर्त की व्याख्या उपस्थित की गई है। इष्टापूर्त का अर्थ है, यज्ञकर्मों (इष्ट) एवं दान-कर्मों (पूर्त) से उत्पन्न समन्वित आध्यात्मिक अथवा पारलौकिक फलोत्पत्ति।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपने पापों को वहीं छोड़कर अपने घर को लौट जाओ! दिव्य ज्योति से परिपूर्ण हो (नवीन) शरीर से जा मिलो!&amp;lt;ref&amp;gt;पितृलोक के आनन्दों की उपलब्धि के लिए मृतात्मा के वायव्य शरीर की कल्पना की गयी है। यह ऋग्वेदीय कल्पना अपूर्व है।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
#हे दुष्टात्माओं! दूर हटो, प्रस्थान करो, इस स्थान (श्मशान) से अलग हट जाओ; पितरों ने उसके (मृत) के लिए यह स्थान (निवास) निर्धारित किया है। यम ने उसको यह विश्रामस्थान दिया है, जो जलों, दिवसों एवं रातों से भरा-पूरा है। &lt;br /&gt;
#हे मृतात्मा! शीघ्रता करो, अच्छे मार्ग से बढ़ते हुए सरमा की संतान (यम के) दो कुत्तों से, जिन्हें चार आंखें प्राप्त हैं, बचकर बढ़ो। इस प्रकार अपने पितरों के साथ पहुँचो, जो तुम्हें पहचान लेंगे और जो स्वयम् यम के साथ आनन्दोपभोग करते हैं। &lt;br /&gt;
#हे राजा यम! इसे (मृतात्मा को) उन अपने दो कुत्तों से, जो रक्षक हैं, चार-चार आंख वाले हैं, जो पितृलोक के मार्ग की रक्षा करते हैं और मनुष्यों पर दृष्टि रखते हैं, सुरक्षा दो। तुम इसको आनन्द और स्वास्थ्य दो। &lt;br /&gt;
#यम के दो दूत, जिनके नथुने चौड़े होते हैं, जो अति शक्तिशाली हैं और जिन्हें कठिनाई से संतुष्ट किया जा सकता है, मनुष्यों के बीच में विचरण करते हैं। वे दोनों (दूत) हमें आज वह शुभ जीवन फिर से प्रदान करें, जिससे कि हम सूर्य को देख सकें। &lt;br /&gt;
#हे पुरोहितों! यम के लिए सोमरस निकालो, यम को आहुति दो। वह यज्ञ, जिससे अग्नि देवों तक ले जाने वाला दूत कहा गया है और जो पूर्णरूपेण संन्नद्ध है, यम के पास पहुँचता है। &lt;br /&gt;
#पुरोहितों! घी-मिश्रित आहुतियों यम को दो और तब प्रारम्भ करो। वह हमें देवपूजा में लगे रहने दे, जिससे हमें लम्बी आयु प्राप्त हो। &lt;br /&gt;
#यमराज को अत्यन्त मधुर आहुति दो, यह प्रणाम उन ऋषियों को है, जो हमसे बहुत पहले उत्पन्न हुए थे और जिन्होंने हमारे लिए मार्ग बनाया। वह बृहत् (बृहत्साम) तीन यज्ञों में और छ: बृहत् विस्तारों में विचरता है। त्रिष्टुप्, गायत्री आदि छन्द-सभी यम में केन्द्रित हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====द्वितीय सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15&amp;lt;/ref&amp;gt; में द्वितीय सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#&amp;quot;सोम-निम्न, मध्यम या उत्तरतर श्रेणियों के स्नेही [[पितर]] लोग आगे आंयें, और वे पितर लोग भी जिन्होंने शाश्वत जीवन या मृतात्मा का रूप धारण किया है, कृपालु हों और आगे आयें, क्योंकि वे दयापूर्ण एवं ऋतु के ज्ञाता हैं। वे पितर लोग, जिनका हम आह्वान करें, हमारी रक्षा करें। &lt;br /&gt;
#आज हमारा प्रणाम उन पितरों को है जो (इस मृत के जन्म के पूर्व ही) चले गये या (इस मृत के जन्मोपरान्त) बाद को गये, और (हम उन्हें भी प्रणाम करते हैं) जो इस विश्व में विराजमान हैं या जो शक्तिशाली लोगों के बीच स्थान ग्रहण करते हैं। &lt;br /&gt;
#मैं उन पितरों को जान गया हूँ जो मुझे (अपना वंशज) पहचानेंगे और मैं विष्णु के पादन्यास एवं उनके बच्चे (अर्थात् अग्नि) को जान गया हूँ। वे पितर, जो कुशों पर बैठते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार हवि एवं सोम ग्रहण करते हैं, बारम्बार यहाँ आयें।&lt;br /&gt;
#हे कुशासन पर बैठने वाले पितर लोगों, (नीचे) अपनी रक्षा लेकर हमारी ओर आओ; हमने आपके लिए हवि तैयार कर रखी है; इन्हें ग्रहण करो। कल्याणकारी रक्षा के साथ आओ और ऐसा आनन्द दो जो दु:ख से रहित हो। &lt;br /&gt;
#कुश पर रखी हुई प्रिय निधियों (हव्यों) को ग्रहण करने के लिए आमन्त्रित सोमप्रिय पितर लोग आयें। वे हमारी स्तुतियाँ (यहाँ) सुने। वे हमारे पक्ष में बोलें और हमारी रक्षा करें। &lt;br /&gt;
#हे पितर लोगों, आप सभी, घुटने मोड़कर एवं हव्य की दायीं ओर बैठकर यज्ञ की प्रशंसा करें; मनुष्य होने के नाते हम आपके प्रति जो ग़लती करें, उसके लिए आप हमें पीड़ा न दें। &lt;br /&gt;
#पितर लोग अग्नि की दिव्य ज्वाला के सामने (उसकी गोद में) बैठकर मुझ मर्त्य यजमान को धन दें। आप मृत व्यक्ति के पुत्रों को धन दें और उन्हें शक्ति दें।&lt;br /&gt;
#यम हमारे जिन पुराने एवं समृद्ध पितरों संगीत का आनन्द उठाते हैं, वे सोमपान के लिए एक-एक करके आयें, जो यशस्वी थे और जिनकी संगति में (पितरों के राजा) यम को आनन्द मिलता है, वह (हमारे द्वारा दिये गये) हव्य स्वेच्छापूर्वक ग्रहण करें।&lt;br /&gt;
#हे अग्नि, उन पितरों के साथ जाओ, जो तृषा से व्याकुल थे और (देवों के लोकों में पहुँचने में) पीछे रह जाते थे, जो यज्ञ के विषय में जानते थे और जो स्तुतियों के रूप में स्तोमों के प्रणेता थे, जो हमें भली-भाँति जानते थे, वे (हमारी पुकार) अवश्य सुनते हैं। जो काव्य नामक हवि ग्रहण करते हैं और जो गर्म दूध के चतुर्दिक बैठते हैं। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि, उन अवश्य आने वाले पितरों के साथ पहले और समय से कालान्तर में जाओ और जो (दिये हुए) हव्य ग्रहण करते हैं, जो हव्य का पान करते हैं, जो उसी रथ में बैठते हैं, जिसमें इन्द्र एवं अन्य देव विराजमान हैं, जो सहस्रों की संख्या में देवों को प्रणाम करते हैं और जो गर्म दूध के चतुर्दिक बैठते हैं। &lt;br /&gt;
#हे अग्निष्वात्त नामक पितर लोगों, जो अच्छे पथप्रदर्शक कहे जाते हैं, (इस यज्ञ में) आओ और अपने प्रत्येक उचित आसन पर विराजमान होओ। (दिये हुए) पवित्र हव्य को, जो कुश पर रखा हुआ है, ग्रहण करो और शूर पुत्रों के साथ समृद्धि दो। &lt;br /&gt;
#हे जातवेदा अग्नि, (हम लोगों द्वारा) प्रशंसित होने पर, हव्यों को स्वादयुक्त बना लेने पर और उन्हें लाकर (पितरों को) दे देने पर वे उन्हें अभ्यासवश ग्रहण करें। हे देव, आप पूत हव्यों को खायें। &lt;br /&gt;
#हे जातवेदा, आप जानते हैं कि कितने पितर हैं, यथा-वे जो यहाँ (पास) हैं, जो यहाँ नहीं हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं जानते हैं (क्योंकि वे हमारे ऊपर दूर के पूर्वज हैं)। आप इस भली प्रकार बने हुए हव्य को अपने आचरण के अनुसार कृपा कर ग्रहण करें। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि, उनके (पितरों के) साथ जो (जिनके शरीर) अग्नि से जला दिये गए थे, जो नहीं जलाये गए थे और जो स्वधा के साथ आनन्दित होते हैं, आप मृत की इच्छा के अनुसार शरीर की व्यवस्था करें, जिससे नये जीवन (स्वर्ग) में उसे प्रेरणा मिले।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====तृतीय सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|16&amp;lt;/ref&amp;gt; में तृतीय सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#&amp;quot;हे अग्नि! इस (मृत व्यक्ति ?) को न जलाओ, चतुर्दिक इसे न झुलाओ, इसके चर्म (के भागों को) इतस्तत: न फेंको; हे जातवेदा (अग्नि)! जब तुम इसे भली प्रकार जला लो तो इसे (मृत को) पितरों के यहाँ भेज दो। &lt;br /&gt;
#हे जातवेदा! जब तुम इसे पूर्णरूपेण जला लो तो इसे पितरों के अधीन कर दो। जब यह (मृत व्यक्ति) उस मार्ग का अनुसरण करता है, जो इसे (नव) जीवन की ओर ले जाता है, तो यह वह हो जाये जो देवों की अभिलाषाओं को होता है। &lt;br /&gt;
#तुम्हारी आंखें सूर्य की ओर जायें, तुम्हारी साँस हवा की ओर जाये और तुम अपने गुणों के कारण स्वर्ग या पृथिवी को जाओ या तुम जल में जाओ, यदि तुम्हें वहाँ आनन्द प्राप्त हो (या यदि यहीं तुम्हारा भाग्य हो तो), अपने सारे अंगों के साथ तुम ओषधियों (जड़ी-बूटियों) में विराजमान होओ। &lt;br /&gt;
#हे जातवेदा, तुम उस बकरी को जला डालो, जो तुम्हारा भाग है, तुम्हारी ज्वाला, तुम्हारा दिव्य प्रकाश उस बकरी को जला डाले;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद (10।16।4)......अजो भाग:-इससे उस बकरी की ओर संकेत है, जो शव के साथ ले जायी जाती थी। और देखिए ऋग्वेद (10|6|7), जहाँ शव के साथ गाय के जलाने की बात कही गयी है।&amp;lt;/ref&amp;gt; तुम इसे (मृत को) उन लोगों के लोक में ले जाओ, जो तुम्हारे कल्याणकारी शरीरों (ज्वालाओं) के द्वारा अच्छे कर्म करते हैं। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि, (इस मृत को) पितरों की ओर छोड़ दो, यह जो तुम्हें अर्पित है, चारों ओर धूम रहा है। हे जातवेदा, यह (नव) जीवन ग्रहण करे और अपने हव्यों को बढ़ाये तथा एक नवीन (वायव्य) शरीर से युक्त हो जाए। &lt;br /&gt;
#हे मृत व्यक्ति! वह अग्नि जो सब कुछ जला डालता है, तुम्हारे उस शरीरांग को दोषमुक्त कर दे, जो काले पक्षी (कौआ) द्वारा काट लिया गया है, या जिसे चींटी या सर्प या जंगली पशु ने काटा है, और ब्राह्मणों में प्रविष्ट सोम भी यही करे। &lt;br /&gt;
#हे मृत व्यक्ति! तुम गायों के साथ अग्नि का कवच धारण करो (अर्थात् अग्नि की ज्वालाओं से बचने के लिए गाय का चर्म धारण करो) और अपने को मोटे मांस से छिपा लो, जिससे (वह अग्नि) जो अपनी ज्वाला से घेर लेता है, जो (वस्तुओं को नष्ट करने में) आनन्दित होता है, जो तीक्ष्ण है और पूर्णतया भस्म कर देता है, (तुम्हारे भागों को) इधर-उधर बिखेर न दे। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि, इस प्याले को, जो देवों को एवं सोमप्रिय (पितरों) को प्रिय है, नष्ट न करो। इस चमस (चम्मच या प्याले) में, जिससे देव पीते हैं, अमर देव लोग आनन्द लेते हैं। &lt;br /&gt;
#जो अग्नि कच्चे मांस का भक्षण करता है, मैं उसे बहुत दूर भेज देता हूँ, वह अग्नि जो दुष्कर्मों (पापों) को ढोता है, यम लोक को जाए! दूसरा अग्नि (जातवेदा), जो सब कुछ जानता है, देवों को अर्पित हव्य ग्रहण करे। &lt;br /&gt;
#मैं, पितरों को हव्य देने के हेतु (जातवेदा) अग्नि को निरीक्षित करता हुआ, कच्चा मांस खाने वाले अग्नि को पृथक करता हूँ, जो तुम्हारे घर में प्रविष्ट हुआ था; वह (दूसरा अग्नि) धर्म (गर्म दूध या हव्य) को उच्चतम लोक की ओर प्रेरित करे।&amp;lt;ref&amp;gt;यह मन्त्र कुछ जटिल है। यदि इस मन्त्र के शाब्दिक अर्थ पर ध्यान दें तो प्रकट होता है कि 'क्रव्याद्' अग्नि पितृयज्ञ में प्रयुक्त होती है। ऐसा कहना सम्भव है कि 'क्रव्याद्' अग्नि को अपवित्र माना जाता था और वह साधारण या यज्ञिय अग्नि से पृथक थी।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
#वह अग्नि जो हव्यों को ले जाता है, ऋत के अनुसार समृद्धि पाने वाले पितरों को उसे दे। वह देवों एवं पितरों को हव्य दे। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि! हमने, जो तुम्हें प्यार करते हैं, तुम्हें प्रतिष्ठापित किया है और जलाया है। तुम प्यारे पितरों को यहाँ ले आओ, जो हमें प्यार करते हैं और वे हव्य ग्रहण करें। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि! तुम उस स्थल को, जिसे तुमने शवदाह में जलाया, (जल से) बुझा दो। कियाम्बु (पौधा) यहाँ उगे और दूर्वा घास अपने अंकुरों को फैलाती हुई यहाँ उगे। &lt;br /&gt;
#हे शीतिका (शीतल पौधे), हे शीतलाप्रद औषधि, हे ह्लादिका (तरोताजा करने वाली बूटी) आनन्द बिखेरती हुई मेढकी के साथ पूर्णरूपेण घुल-मिल जाओ। तुम इस अग्नि का आनन्दित करो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====चतुर्थ सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|17&amp;lt;/ref&amp;gt; में चतुर्थ सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
इस सूक्त के तीन से लेकर छ: तक के मन्त्रों को छोड़कर अन्य मन्त्र अन्त्येष्टि पर प्रकाश नहीं डालते, अत: हम केवल चार मन्त्रों को ही अनूदित करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1, 2. प्रथम दो मन्त्र त्वष्टा की कन्या एवं विवस्वान् के विवार एवं विवस्वान् से उत्पन्न यम एवं यमी के जन्म की ओर संकेत करते हैं। निरुक्त&amp;lt;ref&amp;gt;निरुक्त 12|10-11&amp;lt;/ref&amp;gt; में दोनों की व्याख्या विस्तार से दी हुई है। सरस्वती की स्तुति वाले मन्त्र (7-9) [[अथर्ववेद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अथर्ववेद]] 18|1|41-43&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पाये जाते हैं। और कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  81-39&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन्हें अथर्ववेद&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 7|68|1-2 एवं 18|3|25&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ अन्त्येष्टि कृत्य के लिए प्रयुक्त किया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. &amp;quot;सर्वविज्ञ पूषा, जो पशुओं को नष्ट नहीं होने देता और विश्व की रक्षा करता है, तुम्हें इस लोक से (दूसरे लोक में) भेजे। वह तुम्हें इन पितरों के अधीन कर दे और अग्नि तुम्हें जानने वाले देवों के अधीन कर दे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. वह पूषा जो इस विश्व का जीवन है, जो स्वयं जीवन है, तुम्हारी रक्षा करे। वे लोग जो तुमसे आगे गये हैं (स्वर्ग के) मार्ग में तुम्हारी रक्षा करें। सविता देव तुम्हें वहाँ प्रतिष्ठापित करे, जहाँ सुन्दर कर्म करने वाले जाकर निवास करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. पूषा इन सभी दिशाओं को क्रम से जानता है। वह हमें उस मार्ग से ले चले, जो भय से रहित है। वह समृद्धिदाता है, प्रकाशमान है, उसके साथ सभी शूरवीर हैं; वह विज्ञ हमारे आगे बिना किसी त्रुटि के बढ़े। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
6. पूषा (पितृलोक में जाने वाले) मार्गों के सम्मुख स्थित है, वह स्वर्ग को जाने वाले मार्गों और पृथिवी के मार्गों पर खड़ा है। हमको प्रिय लगने वाला वह दोनों लोकों के सम्मुख खड़ा है और वह विज्ञ दोनों लोकों में आता-जाता रहता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====पंचम सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|18&amp;lt;/ref&amp;gt; में पंचम सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#&amp;quot;हे मृत्यु! उस मार्ग की ओर हो जाओ, जो तुम्हारा है और देवयान से पृथक है। मैं तुम्हें, जो आंखों एवं कानों से युक्त हो, सम्बोधित करता हूँ। हमारी सन्तानों को पीड़ा न दो, हमारे वीर पुत्रों को हानि न पहुँचाओ। &lt;br /&gt;
#हे यज्ञ करने वाले (याज्ञिक) हमारे सम्बन्धीगण! क्योंकि तुम मृत्यु के पदचिह्नों को मिटाते हुए आये हो और अपने लिए दीर्घ जीवन प्रतिष्ठापित कर चुके हो तथा समृद्धि एवं सन्तानों से युक्त हो, तुम पवित्र एवं शुद्ध बनो। &lt;br /&gt;
#ये जीवित (सम्बन्धी) मृत से पृथक हो पीछे घूम गये हैं; आज के दिन देवों के प्रति हमारा आह्वान कल्याणकारी हो गया। तब हम नाचने के लिए, (बच्चों के साथ) हँसने के लिए और दीर्घ जीवन को दृढ़ता से स्थापित करते हुए आगे गये। &lt;br /&gt;
#मैं जीवित (सम्बन्धियों, पुत्र आदि) की रक्षा के लिए यह बाधा (अवरोध) रख रहा हूँ, जिससे कि अन्य लोक (इस मृत व्यक्ति के) लक्ष्य को न पहुँचे। वे सौ शरदों तक जीवित रहें। वे इस पर्वत (पत्थर) के द्वारा मृत्यु को दूर रखें। &lt;br /&gt;
#हे धाता! बचे हुए लोगों को उसी प्रकार सम्भाल के रखो, जिस प्रकार दिन के उपरान्त दिन एक-एक क्रम में आते रहते हैं, जिस प्रकार अनुक्रम से ऋतुएँ आती हैं, जिससे कि छोटे लोग अपने बड़े (सम्बन्धी) को न छोड़ें। &lt;br /&gt;
#हे बचे हुए लोगों, बुढ़ापा स्वीकार कर दीर्घ आयु पाओ, क्रम से जो भी तुम्हारी संख्याएँ हो (वैसा ही प्रयत्न करो कि तुम्हें लम्बी आयु मिले); भद्र जन्म वाला एवं कृपालु त्वष्टा तुम्हें यहाँ (इस विश्व में) दीर्घ जीवन दे। &lt;br /&gt;
#ये नारियाँ, जिनके पति योग्य एवं जीवित हैं, आँखों में अंजन के समान घृत लगाकर घर में प्रवेश करें। ये पत्नियाँ प्रथमत: सुसज्जित, अश्रुहीन एवं पीड़ाहीन हो घर में प्रवेश करे। &lt;br /&gt;
#हे (मृत की) पत्नी! तुम अपने को जीवित (पुत्रों एवं अन्य सम्बन्धी) लोगों के लोक की ओर उठाओ; तुम उस (अपने पति) के निकट सोयी हुई हो, जो मृत है; आओ, तुम पत्नीत्व के प्रति सत्य रही हो और उस पति के प्रति, जिसने पहले (विवाह के समय) तुम्हारा हाथ पकड़ा था और जिसने तुम्हें भली-भाँति प्यार किया, सत्य रही हो। &lt;br /&gt;
#(मैं) मृत (क्षत्रिय) के हाथ से प्रण करता हूँ, जिससे कि हममें सैनिक वीरता, दिव्यता एवं शक्ति आये। तुम (मृत) वहाँ और हम यहाँ शूर पुत्र पायें और यहाँ सभी आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय पायें। &lt;br /&gt;
#हे मृत! इस विशाल एवं सुन्दर माता पृथिवी के पास आओ। यह नयी (पृथिवी), जिसने तुम्हें भेंट दी और तुम्हें मृत्यु की गोद से सुरक्षित रखा, तुम्हारे लिए ऊन के समान मृदु लगे। &lt;br /&gt;
#हे पृथिवी! ऊपर उठ जाओ, इसे न दबाओ, इसके लिए सरल पहुँच एवं आश्रय बनो, और इस (हड्डियों के रूप में मृत व्यक्ति) को उसी प्रकार ढँको, जिस प्रकार माता अपने आँचल से पुत्र को ढँकती है। &lt;br /&gt;
#पृथिवी ऊपर उठे और अटल रहे। सहस्रों स्तम्भ इस घर को सम्भाले हुए खड़े रहें। ये घर (मिट्टी के खण्ड) उसे भोजन दें। वे यहाँ सभी दिनों के लिए उसके हेतु (हड्डियों के रूप में मृत के लिए) आश्रय बनें। &lt;br /&gt;
#मैं तुम्हारे चारों ओर तुम्हारे लिए मिट्टी का आश्रय बना दे रहा हूँ। मिट्टी का यह खण्ड रखते समय मेरी कोई हानि न हो। पितर लोग इस स्तम्भ को अटल रखें। यम तुम्हारे लिए यहाँ आसनों की व्यवस्था कर दें। &lt;br /&gt;
#देवगण ने मुझे दिन में रखा है, जो पुन: तीर के पंख के समान (कल के रूप में) लौट आयेगा; (अत:) मैं अपनी वाणी उसी प्रकार रोक रहा हूँ, जिस प्रकार कोई लगाम से घोड़ा रोकता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====ऋग्वेद में पितृ-यज्ञ====&lt;br /&gt;
यह अवलोकनीय है कि 'पितृ-यज्ञ' शब्द ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|16|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है। इसका क्या तात्पर्य है? हमें यह स्मरण रखना है कि ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15-18&amp;lt;/ref&amp;gt; की ऋचाएँ किसी एक व्यक्ति के मरने के उपरान्त के कृत्यों की ओर संकेत करती है। उनका सम्बन्ध पूर्वपुरुषों की श्राद्ध-क्रियाओं से नहीं है। पूर्वपुरुषों से, जिन्हें बर्हिषद: एवं अग्निष्वात्तात्&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15|3-4, 11&amp;lt;/ref&amp;gt; कहा गया है, तुरन्त के मृतात्मा के प्रति स्नेह प्रदर्शित करने के लिए उत्सुकता अवश्य प्रकट की गयी है। पूर्वपुरुषों को 'हवि:' दिया गया है और वे उसे ग्रहण करते हैं, ऐसा प्रदर्शित किया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15|11-12&amp;lt;/ref&amp;gt; तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1|8|5&amp;lt;/ref&amp;gt; में दिये गये मन्त्रों के उद्देश्य&amp;lt;ref&amp;gt;जो साकमेघ में सम्पादित पितृयज्ञ की ओर संकेत करता है&amp;lt;/ref&amp;gt; से उपर्युक्त ऋग्वेदीय मन्त्रों का उद्देश्य पृथक है। यह बात ठीक है कि तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1|8|5&amp;lt;/ref&amp;gt; के तीन मन्त्र ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|57|3-5&amp;lt;/ref&amp;gt; के हैं और वे पिण्ड-पितृयज्ञ में प्रयुक्त होते हैं। किन्तु यह कहने के लिए कोई तर्क नहीं है कि ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15|10&amp;lt;/ref&amp;gt; का 'पितृयज्ञ', पिण्ड-पितृयज्ञ से अधिक प्राचीन है। यह सम्भव है कि ये दोनों विभिन्न बातों की ओर संकेत करते हुए समकालिक प्रचलन के ही द्योतक हों।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सूत्रग्रंथों के अनुसार मरणोपरांत कृत्य==&lt;br /&gt;
====आश्वलायन श्रौतसूत्र के अनुसार====&lt;br /&gt;
सोमयज्ञ या सत्र के लिए दीक्षित व्यक्ति के (यज्ञ-समाप्ति के पूर्व ही) मर जाने पर जो कृत्य होते थे, उनका वर्णन [[आश्वलायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[आश्वलायन श्रौतसूत्र]] 6|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में हुआ है। इसमें आया है-&amp;quot;जब दीक्षित मर जाता है, तो उसके शरीर को वे तीर्थ से ले जाते हैं, उसे उस स्थान पर रखते हैं, जहाँ अवभृथ&amp;lt;ref&amp;gt;सोमयज्ञ या सत्र-यज्ञ की परिसमाप्ति पर स्नान&amp;lt;/ref&amp;gt; होने वाला था और उसे उन अलंकरणों से सजाते हैं, जो बहुधा शव पर रखे जाते हैं। वे शव के सिर, चेहरे एवं शरीर के बाल और नख काटते हैं। वे नलद (जटामांसी) का लेप लगाते हैं और शव पर नलदों का हार चढ़ाते हैं। कुछ लोग अँतड़ियों को काटकर उनसे मल निकाल देते हैं और उनमें पृषदाज्य (मिश्रित घृत एवं दही) भर देते हैं। वे शव के पाँव के बराबर नवीन वस्त्र का एक टुकड़ा काट लेते हैं और उससे शव को इस प्रकार ढँक देते हैं कि अंचल पश्चिम दिशा में पड़ जाता है (शव पूर्व में रखा रहता है) और शव के पाँव खुले रहते हैं। कपड़े के टुकड़े का भाव पुत्र आदि ले लेते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शव के वस्त्र को 'शव वस्त्रम्‌' या 'शव आच्छादनम्‌' कहते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में '[[कफ़न]]' (अरबी भाषा) कहते हैं।'''&lt;br /&gt;
{{seealso|कफ़न}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृत की श्रौत अग्नियाँ अरणियों पर रखी रहती हैं, शव को वेदि से बाहर लाया जाता है और दक्षिण की ओर ले जाते हैं, [[घर्षण]] से अग्नि उत्पन्न की जाती है और उसी में शव जला दिया जाता है। श्मशान से लौटने पर उन्हें दिन का कार्य समाप्त करना चाहिए। दूसरे दिन प्रात: शस्त्रों का पाठ, स्तोत्रों का गायन एवं सस्तवों (समवेत रूप में मन्त्रपाठ) का गायन बिना दुहराये एवं बिना 'हिम्' स्वर उच्चारित किये होता है। उसी दिन पुरोहित लोग ग्रहों (प्यालों) को लेने के पूर्व तीर्थों से आते हैं, दाहिने हाथ को ऊँचा करके श्मशान की परिक्रमा करते हैं और निम्न प्रकार से उसके चतुर्दिक बैठ जाते हैं; होता श्मशान के पश्चिम में, अध्वर्यु उत्तर में, अद्गाता अध्वर्यु के पश्चिम और ब्रह्मा दक्षिण में। इसके उपरान्त धीमे स्वर में 'आयं गौ: पृश्निरक्रमीत्' से आरम्भ होने वाला मन्त्र गाते हैं। गायन समाप्त होने के उपरान्त होता अपने बायें हाथ को श्मशान की ओर करके श्मशान की तीन परिक्रमा करता है और बिना 'ओम' का उच्चारण किये उद्गाता के गायन तुरंत पश्चात् धीमें स्वर में स्तोत्रिय का पाठ करता है और निम्न मन्त्रों को, जो यम एवं याम्यायनों (ऋषियों या प्रणेताओं) के मन्त्र हैं, कहता है; यथा-ऋग्वेद।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|14|7-8, 10-11; 10|16|1-6; 10|17-3-6; 10|18|10-13; 10|154|1-5&amp;lt;/ref&amp;gt;उन्हें ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|14|10&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ समाप्त करना चाहिए और इसके उपरान्त किसी घड़े में अस्थियाँ एकत्र करनी चाहिए, घड़े को तीर्थ की तरफ़ से ले जाना चाहिए और उस आसन पर रखना चाहिए, जहाँ मृत यजमान बैठता था।&amp;lt;ref&amp;gt;चात्वाल एवं उत्कर के मध्य वाले यज्ञ-स्थान को जाने वाला मार्ग तीर्थ कहा जाता है। देखिए इस ग्रन्थ का खण्ड 2, अध्याय 29। स्तोत्रिय के लिए देखिए खण्ड 2, अध्याय 33। शतपथ ब्राह्मण (12|5|2|5) ने मृत व्यक्ति के शरीर से सभी गन्दे पदार्थों के निकाल देने की परम्परा की ओर संकेत किया है, किन्तु इसे अकरणीय ठहराया है। उसका इतना ही कथन है-'उसके भीतर को स्वच्छ कर लेने के उपरान्त वह उस पर घृत का लेप करता है और इस प्रकार शरीर को यज्ञिय रूप में पवित्र कर देता है।'&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====अन्य श्रौतसूत्रों के अनुसार====&lt;br /&gt;
[[शांखायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शांखायन श्रौतसूत्र]] 4|14-15&amp;lt;/ref&amp;gt; ने आहिताग्नि की अन्त्येष्टि-क्रिया के विषय में विस्तार के साथ लिखा है। [[कात्यायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कात्यायन श्रौतसूत्र]] 25|7&amp;lt;/ref&amp;gt; ने यही बातें संक्षेप में कही है। कात्यायन श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कात्यायन श्रौतसूत्र 25|7|18&amp;lt;/ref&amp;gt; ने केश एवं नख काटने एवं मल पदार्थ निकाल देने की चर्चा की है। कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 80.13-16&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं शांखायन श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायन श्रौतसूत्र 4.14.4-5&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी इन सब बातों की ओर संकेत किया है और इतना जोड़ दिया है कि यदि वे दाहिनी ओर से अँतड़ियाँ काटकर निकालते हैं, तो उन्हें पुन: दर्भ से सी देते हैं या वे केवल शरीर को स्नान करा देते हैं (बिना मल स्वच्छ किये), उसे वस्त्र से ढँक देते हैं, सँवारते हैं, आसन्दी पर, जिस पर काला मृगचर्म&amp;lt;ref&amp;gt;जिसका मुख वाला भाग दक्षिण की ओर रहता है&amp;lt;/ref&amp;gt; बिछा रहता है, रख देते हैं, उस पर नलद की माला रख देते हैं,&amp;lt;ref&amp;gt;प्रयोगरत्न के सम्पादक ने नलद को उशीर कहा है। कुछ ग्रन्थों में नलद के स्थान पर जपा पुष्प की बात कही गयी है।&amp;lt;/ref&amp;gt; और उसे नवीन वस्त्र से ढँक देते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;जैसा कि ऊपर आश्वलायनश्रौतसूत्र के अनुसार लिखा गया है&amp;lt;/ref&amp;gt; सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 28.1.22&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं गौतमपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतमपितृमेधसूत्र 1.10-14&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी ऐसी बातें दी हुई हैं और यह भी है कि शव के हाथ एवं पैर के अँगूठे श्वेत सूत्रों या वस्त्र के अंचल भाग से बाँध दिये जाते हैं और आसन्दी&amp;lt;ref&amp;gt;वह छोटा सा पंलग या कुर्सी जिस पर शव रखकर ढोया जाता है&amp;lt;/ref&amp;gt; उदुम्बर लकड़ी की बनी होती है। कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 80.3.3.45&amp;lt;/ref&amp;gt; ने अथर्ववेद के बहुत-से मन्त्रों का उल्लेख किया है, जो चिता जलाने पर एवं हवि देते समय कहे जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 18.2.4 एवं 36; 18.3.4; 18.1.49-50 एवं 58; 18.1.41-43; 7.68.1-2; 18.3.25; 18.2.4-18; (18.2.10 को छोड़कर); 18.4.1-15 आदि।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====शवदहन प्रक्रिया====&lt;br /&gt;
शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 12.5.2.14&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि पत्थर एवं मिट्टी के बने यज्ञ-पात्र किसी [[ब्राह्मण]] को दान दे देने चाहिए, किन्तु लोग मिट्टी के पात्रों को शववाहन समझते हैं, अत: उन्हें जल में फेंक देना चाहिए। अनुस्तरणी (बकरी या गाय) की वपा (वसा या चर्बी) निकालकर उससे (अन्त्येष्टि क्रिया करने वाले द्वारा) मृत के मुख एवं सिर को ढँक देना चाहिए और ऐसा करते समय 'अग्नेर्वर्म'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.16.7&amp;lt;/ref&amp;gt; का पाठ करना चाहिए। पशु के दोनों वृक्क निकालकर मृत के हाथों में रख देने चाहिए-दाहिना वृक्क दाहिने हाथ में और बायाँ बायें हाथ में-और 'अतिद्रव'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.14.10&amp;lt;/ref&amp;gt; का केवल एक बार पाठ करना चाहिए। वह पशु के हृदय को शव के हृदय पर रखता है, '''कुछ लोगों के मत से भात या जौ के आटे के दो पिण्ड भी रखता है।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार अनुस्तरणी पशु को कान के पास घायल करके मारा जाता है। जातूकर्ण्य के मत से शव के विभिन्न भागों पर पशु के उन्हीं भागों के अंग रखे जाते हैं। किन्तु कात्यायन इसे नहीं मानते, क्योंकि ऐसा करने पर जलाने के पश्चात् अस्थियों को एकत्र करते समय पशु की अस्थियाँ भी एकत्र हो जायेंगी, अत: उनके मत से केवल मांस भाग ही शव के अंगों में लगाना चाहिए। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण (12.5.9-12)&amp;lt;/ref&amp;gt; आश्वलायनगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायनगृह्यसूत्र (4.2.4)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कहा है कि पशु का प्रयोग विकल्प से होता है,&amp;lt;ref&amp;gt;नारायण की व्याख्यानुसार&amp;lt;/ref&amp;gt; अर्थात् या तो पशु काटा जा सकता है या छोड़ दिया जा सकता है '''या किसी ब्राह्मण को दे दिया जा सकता है'''&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 1.10.2 भी&amp;lt;/ref&amp;gt;। शांखायनश्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायनश्रौतसूत्र (4.14.14-15)&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि मारे गये या जीवित पशु के दोनों वृक्क पीछे से निकालकर दक्षिण अग्नि में थोड़ा गर्म करके मृत के दोनों हाथों में रख देने चाहिए और 'अतिद्रव'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.14.10-11&amp;lt;/ref&amp;gt; का पाठ करना चाहिए। शव के अंगों पर पशु के वही अंग काट-काटकर रख देता है और पुन: उसकी खाल से शव को ढँककर प्रणीता के जल को आगे ले जाते समय वह (अन्त्येष्टि कर्म करने वाला) 'इमम् अग्ने'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.16.8&amp;lt;/ref&amp;gt; का आह्वान के रूप में पाठ करता है। अपना बायाँ घुटना मोड़कर वह दक्षिण-अग्नि में घृत की चार आहुति यह कहकर डालता है-'अग्नि को स्वाहा! सोम को स्वाहा! लोक को स्वाहा! अनुमति को स्वाहा!' पाँचवीं आहुति शव की छाती पर यह कहकर दी जाती है, 'जहाँ से तू उत्पन्न हुआ है! वह तुझसे उत्पन्न हो, न न। स्वर्गलोक को स्वाहा'।&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 25.22&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके उपरान्त आश्वलायन गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायन गृह्यसूत्र 4.4.2-5&amp;lt;/ref&amp;gt; यह बताता है कि यदि आहवनीय अग्नि या गार्हपत्य या दक्षिण अग्नि शव के पास प्रथम पहुँचती है या सभी अग्नियाँ एक साथ ही शव के पास पहुँचती हैं, तो क्या समझना चाहिए; और जब शव जलता रहता है तो वह उस पर मन्त्रपाठ करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.14.7 आदि&amp;lt;/ref&amp;gt; जो व्यक्ति यह सब जानता है, उसके द्वारा जलाये जाने पर धूम के साथ मृत व्यक्ति स्वर्गलोक जाता है, ऐसा ही (श्रुति से) ज्ञात है। 'इमे जीवा:'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.18.3&amp;lt;/ref&amp;gt; के पाठ के उपरान्त सभी (सम्बन्धी) लोग दाहिने से बायें घूमकर बिना पीछे देखे चल देते हैं। वे किसी स्थिर जल के स्थल पर जाते हैं और उसमें एक बार डुबकी लेकर और दोनों हाथों को ऊपर करके मृत का गौत्र, नाम उच्चारित करते हैं, बाहर आते हैं, दूसरा वस्त्र पहनते हैं, एक बार पहने हुए वस्त्र को निचोड़ते हैं और अपने कुरतों के साथ उन्हें उत्तर की ओर दूर रखकर वे तारों के उदय होने तक बैठे रहते हैं या सूर्यास्त का एक अंश दिखाई देता है तो वे घर लौट आते हैं, छोटे लोग पहले और बूढे लोग अन्त में प्रवेश करते हैं। घर लौटने पर वे पत्थर, अग्नि, गोबर, भुने जौ, तिल एवं जल स्पर्श करते हैं। और&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण (13.8.4.5) एवं वाजसनेयी संहिता (35-14, ऋग्वेद 1.50.10)&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ अन्य कृत्य भी दिये गये हैं, यथा स्नान करना, जल-तर्पण करना, बैल को छूना, आंख में अंजन लगाना तथा शरीर में अंगराग लगाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====अग्निहोत्र==== &lt;br /&gt;
शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 13.8.4.11&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पारस्कर गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्कर गृह्यसूत्र 3.10.10&amp;lt;/ref&amp;gt; ने स्पष्ट लिखा है कि जिसका [[उपनयन संस्कार]] हो चुका है, उसकी अन्त्येष्टि क्रिया उसी प्रकार की जाती है, जिस प्रकार श्रौत अग्निहोत्र करने वाले व्यक्ति की, अन्तर केवल इतना होता है कि आहिताग्नि तीनों वैदिक अग्नियों के साथ जला दिया जाता है, जिसके पास केवल स्मार्त अग्नि या औपासन अग्नि होती है, वह उसके साथ जला दिया जाता है और साधारण लोगों का शव केवल साधारण अग्नि से जलाया जाता है। देवल का कथन है कि साधारण अग्नि के प्रयोग में चाण्डाल की अग्नि या अशुद्ध अग्नि या सूतकगृह-अग्नि या पतित के घर की अग्नि या चिता की अग्नि का व्यवहार नहीं करना चाहिए। पितदयिता के मत से जिसने अग्निहोत्र न किया हो, उसके लिए 'अस्मात् त्वम् आदि' मन्त्र का पाठ नहीं करना चाहिए। पारस्कर गृह्यसूत्र ने व्यवस्था दी है कि एक ही गाँव के रहने वाले सम्बन्धी एक ही प्रकार का कृत्य करते हैं, वे एक ही वस्त्र धारण करते हैं, यज्ञोपवीत को दाहिने कंधे से लटकाते हैं और बायें हाथ की चौथी अँगुली से वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 35.6&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ जल तर्पण करते हैं तथा दक्षिणाभिमुख होकर जल में डुबकी लेते हैं और अंजलि से एक बार जल तर्पण करते हैं। &lt;br /&gt;
====परिवारजनों द्वारा स्नान====&lt;br /&gt;
[[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]] 2.6.15.2-7&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जब किसी व्यक्ति की माता या पिता की सातवीं पीढ़ी के सम्बन्धी या जहाँ तक वंशावली ज्ञात हो, वहाँ तक के व्यक्ति मरते हैं, तो एक वर्ष से छोटे बच्चों को छोड़कर सभी लोगों को स्नान करना चाहिए। जब एक वर्ष से कम अवस्था वाला बच्चा मरता है तो माता-पिता एवं उनको जो बच्चे का शव ढोते हैं, स्नान करना चाहिए। उपर्युक्त सभी लोगों को बाल नहीं सँवारने चाहिए, बालों से धूल हटा देनी चाहिए, एक ही वस्त्र धारण करना चाहिए, दक्षिणाभिमुख होना चाहिए, पानी में डुबकी लगानी चाहिए, मृत को तीन बार जल तर्पण करना चाहिए और नदी या जलाशय के पास बैठ जाना चाहिए। इसके पश्चात् गाँव को लौट जाना चाहिए तथा स्त्रियाँ जो कुछ कहें उसे करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;अग्नि, पत्थर, बैल आदि स्पर्श करना चाहिए&amp;lt;/ref&amp;gt; याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.2&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी ऐसे नियम दिये हैं और 'अप न: शोशुचद् अघम्'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.97.1; अथर्ववेद 4.33.1 एवं [[तैत्तिरीय आरण्यक|तैत्तिरीयारण्यक]] 6.10.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के पाठ की व्यवस्था दी है। &lt;br /&gt;
====गौतमपितृमेधसूत्र के मत से चिता का निर्माण====&lt;br /&gt;
गौतमपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतमपितृमेधसूत्र 2.23&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से चिता का निर्माण यज्ञिय वृक्ष की लकड़ी से करना चाहिए और सपिण्ड लोग जिनमें स्त्रियाँ और विशेषत: कम अवस्था वाली सबसे आगे रहती हैं। चिता पर रखे गये शव पर अपने वस्त्र के अन्तभाग (आँचल) से हवा करते हैं, अन्त्येष्टि क्रिया करने वाला एक जलपूर्ण घड़ा लेता है और अपने सिर पर दर्भेण्डु रखता है और तीन बार शव की परिक्रमा करता है। पुरोहित घड़े पर एक पत्थर (अश्म) या कुल्हाड़ी से धीमी चोट करता है और 'इमा आप: आदि' का पाठ करता है। जब टूटे घड़े से जल की धार बाहर निकलने लगती है तो मन्त्र के शब्दों में कुछ परिवर्तन हो जाता है, यथा 'अस्मिन् लोके' के स्थान पर 'अन्तरिक्षे आदि'। अन्त्येष्टिकर्ता खड़े रूप में जलपूर्ण घड़े को पीछे फेंक देता है। इसके उपरान्त 'तस्मात् त्वमधिजातोसि......असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' के पाठ के साथ शव को जलाने के लिए चिता में अग्नि प्रज्वलित करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतमपितृमेधसूत्र 1.3.1-13&amp;lt;/ref&amp;gt; शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 28.1.38&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि घर के लोग अपनी दाहिनी जाँघों को पीटते हैं, आँचल से शव पर हवा करते हैं और तीन बार शव की बायें ओर होकर परिक्रमा करते हैं तथा 'अप न: शोशुचदघम्'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.47.1 तथा तैत्तिरीयारण्यक 6.10.1&amp;lt;/ref&amp;gt; पढ़ते हैं। इसने आगे कहा है&amp;lt;ref&amp;gt;28.1.37-46&amp;lt;/ref&amp;gt; कि शव किसी गाड़ी में या चार पुरुषों के द्वारा ढोया जाता है, और ढोते समय चार स्थानों पर रोका जाता है और उन चारों स्थानों पर पृथ्वी खोद दी जाती है और उसमें भात का पिण्ड 'पूषा त्वेत:'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.17.3 एवं तैत्तिरीयारण्यक 6.10.1&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं 'आयुर्विश्वायु:'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.17.4 एवं तैत्तिरीयारण्यक 6.10.2&amp;lt;/ref&amp;gt; मन्त्रों के साथ आहुति के रूप में रख दिया जाता है। [[वराह पुराण]] के अनुसार पौराणिक मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए, अन्त्येष्टिकर्ता को चिता की परिक्रमा करनी चाहिए और उसके उस भाग में अग्नि प्रज्वलित करनी चाहिए जहाँ पर सिर रखा रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शव को ले जाने के नियम==&lt;br /&gt;
शव को ले जाने के विषय में कई प्रकार के नियमों की व्यवस्था है। हमने ऊपर देख लिया है कि शव गाड़ी में ले जाया जाता था या सम्बन्धियों या नौकरों (दासों) द्वारा विशिष्ट प्रकार से बने पलंग या कुर्सी या अरथी द्वारा ले जाया जाता था। इस विषय में कुछ सूत्रों, स्मृतियों, टीकाओं एवं अन्य ग्रन्थों ने बहुत-से नियम प्रतिपादित किये हैं। [[रामायण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अयोध्या काण्ड|अयोध्या काण्ड वा. रा.]] 76.13&amp;lt;/ref&amp;gt;  में आया है कि [[दशरथ]] की मृत्यु पर उनके पुरोहितों द्वारा शव के आगे वैदिक अग्नियाँ ले जायी जा रही थीं, शव एक पालकी (शिबिका) में रखा हुआ था, नौकर ढो रहे थे, सोने के सिक्के एवं वस्त्र अरथी के आगे दरिद्रों के लिए फेंके जा रहे थे। सामान्य नियम यह था कि तीन उच्च वर्णों में शव को मृत व्यक्ति के वर्ण वाले ही ढोते थे और शूद्र उच्च वर्ण का शव तब तक नहीं ढो सकते थे, जब तक उस वर्ण के लोग नहीं पाये जाते थे। उच्च वर्ण के लोग शूद्र के शव को नहीं ढोते थे और इस नियम का पालन करने पर तत्सम्बन्धी अशौच मृत व्यक्ति की जाति से निर्णीत होता था।&amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु धर्मसूत्र]] (9.1-4), [[गौतम धर्मसूत्र]] (14.29), [[मनुस्मृति]] (5.10.4), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.26) एवं पराशरमाधवीय (3.43-45)&amp;lt;/ref&amp;gt; ब्रह्मचारी को किसी व्यक्ति या अपनी जाति के किसी व्यक्ति के शव को ढोने की आज्ञा नहीं थी, किन्तु वह अपने माता-पिता, गुरु, आचार्य एवं उपाध्याय के शव को ढो सकता था और ऐसा करने पर उसे कोई कल्मष नहीं लगता था।&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठ (23.7), मनुस्मृति (5.91), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.15), लघु हारीत (92-93), [[ब्रह्म पुराण]] (पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 278)&amp;lt;/ref&amp;gt; गुरु, आचार्य और उपाध्याय की परिभाषा याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 1.34-35&amp;lt;/ref&amp;gt; ने दी है। यदि कोई ब्रह्मचारी उपर्युक्त पाँच व्यक्तियों के अतिरिक्त किसी अन्य का शव ढोता था, तो उसका ब्रह्मचर्यव्रत खण्डित माना जाता था और उसे व्रतलोप का प्रायश्चित करना पड़ता था। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति (5.103 एवं याज्ञवल्क्यस्मृति 3.13-14)&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जो लोग स्वजातीय व्यक्ति का शव ढोते हैं, उन्हें वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए; नीम की पत्तियाँ दाँत से चबानी चाहिए; आचमन करना चाहिए; अग्नि, जल, गोबर, श्वेत सरसों का स्पर्श करना चाहिए; धीरे से किसी पत्थर पर पैर रखना चाहिए और तब घर में प्रवेश करना चाहिए। सपिण्डों का यह कर्तव्य है कि वे अपने सम्बन्धी का शव ढोएँ, ऐसा करने के उपरान्त उन्हें केवल स्नान करना होता है, अग्नि को छूना होता है और पवित्र होने के लिए घृत पीना पड़ता है।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.29; याज्ञवल्क्यस्मृति 3.26; मनुस्मृति 4.103; पराशरमाधवीय 3.42; देवल, पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 277 एवं हारीत, अपरार्क पृष्ठ 871&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत शरीर को ढोने वाले के लिए नियम====&lt;br /&gt;
सपिण्डरहित ब्राह्मण के मृत शरीर को ढोने वाले की पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 3.3.41&amp;lt;/ref&amp;gt; ने बड़ी प्रशंसा की है और कहा है कि जो व्यक्ति मृत ब्राह्मण के शरीर को ढोता है, वह प्रत्येक पग पर एक-एक [[यज्ञ]] के सम्पादन का फल पाता है और केवल पानी में डुबकी लेने और प्राणायाम करने से ही पवित्र हो जाता है। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.101-102&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जो व्यक्ति किसी सपिण्डरहित व्यक्ति के शव को प्रेमवश ढोता है, वह तीन दिनों के उपरान्त ही अशौचरहित हो जाता है। आदिपुराण को उद्धृत करते हुए हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 121&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि यदि कोई क्षत्रिय या वैश्य किसी दरिद्र ब्राह्मण या क्षत्रिय (जिसने सब कुछ खो दिया हो) के या दरिद्र वैश्य के शव को ढोता है, वह बड़ा यश एवं पुण्य पाता है और स्नान के उपरान्त ही पवित्र हो जाता है। सामान्यत: आज भी (विशेषत: ग्रामों में) एक ही जाति के लोग शव को ढोते हैं या साथ जाते हैं और वस्त्रसहित स्नान करने के पश्चात् पवित्र मान लिये जाते हैं। कुछ मध्यकाल की टीकाओं, यथा मिताक्षरा ने जाति-संकीर्णता की भावना से प्रेरित होकर व्यवस्था दी है कि &amp;quot;यदि कोई व्यक्ति प्रेमवश शव ढोता है, मृत के परिवार में भोजन करता है और वहीं रह जाता है तो वह दस दिनों तक अशौच में रहता है। यह नियम तभी लागू होता है, जब कि शव को ढोने वाला मृत की जाति का रहता है। यदि ब्राह्मण किसी मृत शूद्र के शव को ढोता है, तो वह एक मास तक अपवित्र रहता है, किन्तु यदि कोई शूद्र किसी मृत ब्राह्मण के शव को ढोता है तो वह दस दिनों तक अशौच में रहता है।&amp;quot; [[कूर्म पुराण]] ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई ब्राह्मण किसी मृत ब्राह्मण के शव को शुल्क लेकर ढोता है या किसी अन्य स्वार्थ के लिए ऐसा करता है तो वह दस दिनों तक अपवित्र (अशौच) में रहता है, और इसी प्रकार कोई क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र ऐसा करता है तो क्रम से 12, 15 एवं 30 दिनों तक अपवित्र रहता है।&lt;br /&gt;
====शव को ले जाने का मार्ग ====&lt;br /&gt;
[[विष्णु पुराण]] का कथन है कि यदि कोई व्यक्ति शुल्क लेकर शव ढोता है तो वह मृत व्यक्ति की जाति के लिए व्यवस्थित अवधि तक अपवित्र रहता है। हारीत&amp;lt;ref&amp;gt;मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.2; मदनपारिजात पृष्ठ 395&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से शव को मार्ग के गाँवों में होकर नहीं ले जाना चाहिए। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.92&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वृद्ध-हारीत&amp;lt;ref&amp;gt;वृद्ध-हारीत 9.100-101&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि [[शूद्र]], [[वैश्य]], [[क्षत्रिय]] एवं [[ब्राह्मण]] का मृत शरीर क्रम से ग्राम या बस्ती के दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी एवं पूर्वी मार्ग से ले जाना चाहिए। यम एवं [[गरुड़ पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;यम एवं [[गरुड़ पुराण]] 2.4.56-58&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि चिता के लिए अग्नि, काष्ठ (लकड़ी), तृण, हवि आदि उच्च वर्णों की अन्त्येष्टि के लिए शूद्र द्वारा नहीं ले जाना चाहिए, नहीं तो मृत व्यक्ति सदा प्रेतावस्था में ही रह जायेगा। हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 121&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि यदि शूद्रों द्वारा लकड़ी ले जायी जाये तो ब्राह्मण के शव के चिता-निर्माण के लिए ब्राह्मण ही प्रयुक्त होना चाहिए। [[स्मृतियाँ|स्मृतियों]] एवं [[पुराण|पुराणों]] ने व्यवस्था दी है कि शव को नहलाकर जलाना चाहिए, शव को नग्न रूप में कभी नहीं जलाना चाहिए। उसे वस्त्र से ढँका रहना चाहिए, उस पर पुष्प रखने चाहिए और चन्दन लेप करना चाहिए; अग्नि को शव के मुख की ओर ले जाना चाहिए। किसी व्यक्ति को कच्ची मिट्टी के पात्र में पका हुआ भोजन ले जाना चाहिए, किसी अन्य व्यक्ति को उस भोजन का कुछ अंश मार्ग में रख देना चाहिए और चाण्डाल आदि (जो श्मशान में रहते हैं) के लिए वस्त्र आदि दान करना चाहिए। [[ब्रह्म पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण - शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 159&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि शव को श्मशान ले जाते समय वाद्ययंत्रों द्वारा पर्याप्त निनाद किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;भरत ने चार प्रकार के वाद्यों की चर्चा यों की है-'ततं चैवावनद्धं घनं सुषिरमेव च।' अमरकोश ने उन्हें निम्न प्रकार से समझाया है-'ततं वीणादिकं वाद्यमानद्धं मुरजादिकम्। वंशादिकं तु सुषिरं कांस्यतालादिकं घनम्।'&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====वपन के नियम====&lt;br /&gt;
शव को जलाने के उपरान्त, अन्त्येष्टि क्रिया के अंग के रूप में कर्ता को वपन (मुंडन) करवाना पड़ता है और उसके उपरान्त स्नान करना होता है, किन्तु वपन के विषय में कई नियम हैं। स्मृति-वचन यों है-'दाढ़ी-मूँछ बनवाना सात बातों में घोषित है, यथा-गंगातट पर, भास्कर क्षेत्र में, माता, पिता या गुरु की मृत्यु पर, श्रौताग्नियों की स्थापना पर एवं सोमयज्ञ में।'&amp;lt;ref&amp;gt;गंगायां भास्करक्षेत्रे मातापित्रोर्गृरोम् तौ। आधानकाले सोमे च वपनं सप्तसु स्मृतम्।। देखिए मिताक्षरा (याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17), पराशरमाधवीय (1.2, पृष्ठ 296), शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 161), प्रायश्चितत्ततत्त्व (पृष्ठ 496)। भास्कर क्षेत्र प्रयाग का नाम है।&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्त्यकर्मदीपक&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 19&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि अन्त्येष्टि क्रिया करने वाले पुत्र या किसी अन्य कर्ता को सबसे पहले वपन कराकर स्नान करना चाहिए और तब शव को किसी पवित्र स्थल पर ले जाना चाहिए तथा वहाँ स्नान कराना चाहिए, या यदि ऐसा स्थान वहाँ न हो तो शव को स्नान कराने वाले जल में [[गंगा]], [[गया]] या अन्य तीर्थों का आवाहन करना चाहिए। इसके उपरान्त शव पर [[घी]] या [[तिल]] के तेल का लेप करके पुन: उसे नहलाना चाहिए, नया वस्त्र पहनाना चाहिए, यज्ञोपवीत, गोपीचन्दन, तुलसी की माला से सजाना चाहिए और सम्पूर्ण शरीर में [[चन्दन]], कपूर, कुंकुम, कस्तूरी आदि सुंगधित पदार्थों का प्रयोग करना चाहिए। यदि अन्त्येष्टि क्रिया रात्रि में हो तो वपन रात्रि में नहीं होना चाहिए, बल्कि दूसरे दिन होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;रात्रौ दग्ध्वा तु पिण्डान्त कृत्वा वपनवर्जितम्। वपनं नेष्यते रात्रौ श्वस्तनी वपनक्रिया।। संग्रह संग्रह (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 161)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्य स्मृतियों ने दूसरे, तीसरे, पाँचवें या सातवें दिन या ग्यारहवें दिन के श्राद्धकर्म के पूर्व किसी दिन भी वपन की व्यवस्था दी है।&amp;lt;ref&amp;gt;अलुप्तकेशो य: पूर्व सोऽत्र केशान् प्रवापचेत्। द्वितीये तृतीयेऽह्नि पंचमे स्पतमेऽपि वा।। यावच्छाद्धं प्रदीयेत तावदित्यपरं मतम्।। बौधायन (पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 2); वपनं दशमेऽहनि कार्यम्। तदाह देवल:। दशमेऽहनि संप्राप्ते स्नानं ग्रामाद बहिर्भवेत्। तत्र त्याज्यानि वासांसि केशश्मश्रुनखानि च।। (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17); मदनपारिजात (पृष्ठ 416) ने देवल आदि को उद्धृत करते हुए लिखा है-'पंचमादिदिनेषु कृतक्षौरस्यापि शुद्धयर्थ दशमदिनेपि वपनं कर्तव्यम्।'&amp;lt;/ref&amp;gt; आपस्तम्ब धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.3.10.6&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से मृत व्यक्ति से छोटे सभी सपिण्ड लोगों को वपन कराना चाहिए। मदनपारिजात का कथन है कि अन्त्येष्टि कर्ता को वपन-कर्म प्रथम दिन तथा अशौच की समाप्ति पर कराना चाहिए, किन्तु शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 162&amp;lt;/ref&amp;gt; ने मिताक्षरा&amp;lt;ref&amp;gt;मिताक्षरा  (याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17)&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत का समर्थन करते हुए कहा है कि वपन-कर्म का दिन स्थान-विशेष की परम्परा पर निर्भर है। वाराणसी सम्प्रदाय के मत से कर्ता अन्त्येष्टि कर्म के समय वपन कराता है, किन्तु मिथिला सम्प्रदाय के मत से अन्त्येष्टि के समय वपन नहीं होता। [[गरुड़ पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[गरुड़ पुराण]] 2.4.67-69&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से घोर रुदन शवदाह के समय किया जाना चाहिए, किन्तु दाह-कर्म एवं जल-तर्पण के उपरान्त रुदन-कार्य नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;
{{सूचक}}&lt;br /&gt;
==उदकक्रिया या जलवान==&lt;br /&gt;
सपिण्डों एवं समानोदकों द्वारा मृत के लिए जो उदकक्रिया या जलवान होता है, उसके विषय में मतैक्य नहीं है। आश्वलायन गृह्यसूत्र ने केवल एक बार जल-तर्पण की बात कही है, किन्तु सत्यषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्यषाढ श्रौतसूत्र 28.2.72&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि ने व्यवस्था दी है कि तिलमिश्रित जल अंजलि द्वारा मृत्यु के दिन मृत का नाम एवं गौत्र बोलकर तीन बार दिया जाता है और ऐसा ही प्रतिदिन ग्यारहवें दिन तक किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;केशान् प्रकीर्य पांसूनोप्यैकवाससो दक्षिणामुख: सकृदुन्मज्ज्योत्तीर्य सव्यं जान्वाच्य वास: पीडयित्वोपविशन्त्येवं त्रिस्तत्प्रत्ययं तिलमिश्रमुदकं त्रिरुत्सिच्याहरहरञ्जलिनैकोत्तरवृद्धिरैकादशाहात्। सत्याषाढश्रौतसूत्र (28.2.72)। गौतमपितृमेधसूत्र (1.4.7) ने भी कही है। जल-तर्पण इस प्रकार होता है-'काश्यपगोत्र देववत्त शर्मन्, एतत्ते उदकम्' या 'काश्यपगोत्राय देवदत्तशर्मणे प्रेतायैतत्तिलोदकं ददामि' (हरदत्त) या 'देवदत्तनामा काश्यपगोत्र: प्रेतस्तृप्यतु' (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.5)। और देखिए गोभिलस्मृति (3.36-37, अपरार्क पृष्ठ 874 एवं पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 287)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[गौतम धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[गौतम धर्मसूत्र]] 14.38&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वसिष्ठ धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठ धर्मसूत्र 4.12&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि जलदान सपिण्डों द्वारा प्रथम, तीसरे, सातवें एवं नवें दिन दक्षिणाभिमुख होकर किया जाता है, किन्तु हरदत्त का कथन है कि सब मिलाकर 75 अंजलियाँ देनी चाहिए (प्रथम दिन 3, तीसरे दिन 9, सातवें दिन 30 एवं नवें दिन 33), किन्तु उनके देश में परम्परा यह थी कि प्रथम दिन अंजलि द्वारा तीन बार और आगे के दिनों में एक-एक अंजलि अधिक जल दिया जाता था। विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.7 एवं 13&amp;lt;/ref&amp;gt;, प्रचेता एवं पैठिनसि&amp;lt;ref&amp;gt;अपरार्क पृष्ठ 874&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि मृत को जल एवं पिण्ड दस दिनों तक देते रहना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;दिने दिनेऽञ्जलीन् पूर्णान् प्रदद्यात्प्रेतकारणात्। तावद् वृद्धिश्च कर्तव्या यावत्पिड: समाप्यते।। प्रचेता (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3।3); 'यावदाशौचं तावत्प्रेतस्योदकं पिण्डं च दद्यु:।' विष्णुधर्मसूत्र (19।13)। यदि एक दिन केवल एक ही अंजलि जल दिया जाए तो दस दिनों में केवल दस अंजलियाँ होंगी, यदि प्रतिदिन 10 अंजलियाँ दी जायें तो 100, किन्तु यदि प्रथम दिन एक अजंलि और उसके उपरान्त प्रतिदिन एक अंजलि बढ़ाते जायें तो कुल मिलाकर 55 अंजलियाँ होंगी।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 202&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गृह्यपरिशिष्ट के कतिपय वचन उद्धृत कर लिखा है कि कुछ के मत से केवल 10 अंजलियाँ और कुछ के मत से 100 और कुछ के मत से 55 अंजलियाँ दी जाती हैं, अत: इस विषय में लोगों को अपनी वैदिक शाखा के अनुसार परम्परा का पालन करना चाहिए। यही बात आश्वलाय गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;परिशिष्ट 3.4&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी कही है। गरुड़ पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़ पुराण (प्रेतखण्ड, 5.22-23)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी 10, 55 या 100 अंजलियों की चर्चा की है। कुछ स्मृतियों ने जाति के आधार पर अंजलियों की संख्या दी है। प्रचेता&amp;lt;ref&amp;gt;प्रचेता (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.4)&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र मृतक के लिए क्रम से 10, 12, 15 एवं 30 अंजलियाँ दी जानी चाहिए। यम (श्लोक 92-94) ने लिखा है कि नाभि तक पानी में खड़े होकर किस प्रकार जल देना चाहिए और कहा है (श्लोक 98) कि देवों एवं पितरों को जल में और जिनका उपनयन संस्कार न हुआ हो, उनके लिए भूमि में खड़े होकर जल तर्पण करना चाहिए। देवयाज्ञिक द्वारा उद्धृत एक स्मृति में आया है कि मृत्यु काल से आगे 6 पिण्ड निम्न रूप में दिये जाने चाहिए; मृत्यु स्थल पर, घर की देहली पर, चौराहे पर, श्मशान के मार्ग पर जहाँ शव यात्री रुकते हैं, चिता पर तथा अस्थियों को एकत्र करते समय। स्मृतियों में ऐसा भी आया है कि लगातार दस दिनों तक तेल का दीपक जलाना चाहिए, जलपूरण मिट्टी का घड़ा भी रखा रहना चाहिए और मृत का नाम-गौत्र कहकर दोपहर के समय एक मुट्ठी भात भूमि पर रखना चाहिए। इसे पाथेय श्राद्ध कहा जाता है, क्योंकि इससे मृत को यमलोक जाने में सहायता मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 463&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ निबन्धों के मत से मृत्यु के दिन सपिण्डों द्वारा वपन, स्नान, ग्राम एवं घर में प्रवेश कर लेने के उपरान्त नग्न-प्रच्छादन नामक श्राद्ध करना चाहिए। नग्न-प्रच्छादन श्राद्ध में एक घड़े में अनाज भरा जाता है, एक पात्र में घृत एवं सामर्थ्य के अनुसार सोने के टुकड़े या सिक्के भरे जाते हैं। अन्नपूर्ण घड़े की गर्दन वस्त्र से बँधी रहती है। [[विष्णु]] का नाम लेकर दोनों पात्र किसी कुलीन दरिद्र ब्राह्मण को दे दिये जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृतिमुक्ताफल, पृष्ठ 595-596 एवं स्मृतिचन्द्रिका, पृष्ठ 176&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====पिण्डदान प्रक्रिया==== &lt;br /&gt;
स्मृतियों एवं पुराणों&amp;lt;ref&amp;gt;यथा-कूर्म पुराण, उत्तरार्ध 23.70&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से अंजलि से जल देने के उपरान्त पके हुए चावल या जौ का पिण्ड तिलों के साथ दर्भ पर रख दिया जाता है। इस विषय में दो मत हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.16&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से पिण्डपितृयज्ञ की व्यवस्था के अनुसार तीन दिनों तक एक-एक पिण्ड दिया जाता है;&amp;lt;ref&amp;gt;इसमें जनेऊ दाहिने कंधे पर या अपसव्य रखा जाता है&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.13&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से अशौच के दिनों में प्रतिदिन एक पिण्ड दिया जाता है। यदि मृत व्यक्ति का उपनयन हुआ है तो पिण्ड दर्भ पर दिया जाता है, किन्तु मन्त्र नहीं पढ़ा जाता, यो पिण्ड पत्थर पर भी दिया जाता है। जल तो प्रत्येक सपिण्ड या अन्य कोई भी दे सकता है, किन्तु पिण्ड पुत्र&amp;lt;ref&amp;gt;यदि कई पुत्र हों तो ज्येष्ठ पुत्र, यदि वह दोषरहित हो&amp;lt;/ref&amp;gt; देता है; पुत्रहीनता पर भाई या भतीजा देता है और उनके अभाव में माता के सपिण्ड, यथा-मामा या ममेरा भाई आदि देते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;पुत्राभावे सपिण्डा मातृसपिण्डा: शिष्याश्च वा दद्यु:। तदभावे ऋत्विगाचार्यों। गौतमधर्मसूत्र (15.13-14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; वैसी स्थिति में जब पिण्ड तीन दिनों तक दिये जाते हैं या जब अशौच केवल तीन दिनों का रहता है, शातातप ने पिण्डों की संख्या10 दी है और पारस्कर ने उन्हें निम्न रूप से बाँटा है; प्रथम दिन 3, दूसरे दिन 4 और तीसरे दिन 3। किन्तु दक्ष ने उन्हें निम्न रूप में बाँटा है; प्रथम दिन में एक, दूसरे दिन 4 और तीसरे दिन 5। पारस्कर ने जाति के अनुसार क्रम से 10, 12, 15 एवं 30 पिण्डों की संख्या दी है। वाराणसी सम्प्रदाय के मत से शवदाह के समय 4, 5 या 6 पिण्ड तथा मिथिला सम्प्रदाय के अनुसार केवल एक पिण्ड दिया जाता है। गृह्यपरिशिष्ट एवं गरुड़ पुराण के मत से उन सभी को, जिन्होंने मृत्यु के दिन कर्म करना आरम्भ किया है, चाहे वे सगोत्र हों या किसी अन्य गोत्र के हों, दिस दिनों तक सभी कर्म करने पड़ते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;असगोत्र: सगोत्रो वा यदि स्त्री यदि वा पुमान्। प्रथमेऽहनि यो दद्यात्स दशाहं समापयेत्।। गृह्यपरिशिष्ट (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 1.255 एवं 3.16; अपरार्क, पृष्ठ 887; मदनपारिजात, पृष्ठ 400; हारलता, पृष्ठ 172)। देखिए लम्बाश्वलायन (20.6) एवं गरुड़ पुराण (प्रेतखण्ड, 5।19-20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी व्यवस्था है कि यदि कोई व्यक्ति कर्म करता आ रहा है और इसी बीच में पुत्र आ उपस्थित हो तो प्रथम व्यक्ति ही 10 दिनों तक कर्म करता रहता है, किन्तु ग्यारहवें दिन का कर्म पुत्र या निकट सम्बन्धी (सपिण्ड) करता है। [[मत्स्य पुराण]] का कथन है कि मृत के लिए पिण्डदान 12 दिनों तक होना चाहिए, ये पिण्ड मृत के लिए दूसरे लोक में जाने के लिए पाथेय होते हैं और वे उसे संतुष्ट करते हैं। मृत 12 दिनों के उपरान्त मृतात्माओं के लोक में चला जाता है, अत: इन दिनों के भीतर वह अपने घर, पुत्रों एवं पत्नी को देखता रहता है।&lt;br /&gt;
====जल-तर्पण के समय प्रार्थना==== &lt;br /&gt;
जिस प्रकार एक ही गोत्र के सपिण्डों एवं समानोदकों को जल-तर्पण करना अनिवार्य है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति को अपने नाना तथा अपने दो अन्य पूर्वपुरुषों एवं आचार्य को उनकी मृत्यु के उपरान्त जल देना अनिवार्य है। व्यक्ति यदि चाहे तो अपने मित्र, अपनी विवाहिता बहिन या पुत्री, अपने भानजे, श्वशुर, पुरोहित को उनकी मृत्यु पर जल दे सकता है।&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10; शंख-लिखित, याज्ञवल्क्यस्कृति 3.4&amp;lt;/ref&amp;gt; पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; ने एक विचित्र रीति की ओर संकेत किया है। जब सपिण्ड लोग स्नान करने के लिए जल में प्रवेश करने को उद्यत होते हैं और जब वे मृत को जल देना चाहते हैं तो अपने सम्बन्धियों या साले से जल के लिए इस प्रकार प्रार्थना करते हैं-'हम लोग उदकक्रिया करना चाहते हैं', इस पर दूसरा कहता है-'ऐसा करो किन्तु पुन: न आना।' ऐसा तभी किया जाता था, जब कि मृत 100 वर्ष से कम आयु का होता था, किन्तु जब वह 100 वर्ष का या इससे ऊपर का होता था, तो केवल 'ऐसा करो' कहा जाता था। गौतमपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतमपितृमेधसूत्र 1.4.4-6&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी ऐसा ही प्रतीकात्मक वार्तालाप आया है। कोई राजकर्मचारी, सगोत्र या साला (या बहनोई) एक कँटीली टहनी लेकर उन्हें जल में प्रवेश करने से रोकता है और कहता है, 'जल में प्रवेश न करो'; इसके उपरान्त सपिण्ड उत्तर देता है-'हम लोग पुन: जल में प्रवेश नहीं करेंगे।' इसका सम्भवत: यह तात्पर्य है कि वे कुटुम्ब में किसी अन्य की मृत्यु से छुटकारा पायेंगे, अर्थात् शीघ्र ही उन्हें पुन: नहीं आना पड़ेगा या कुटुम्ब में कोई मृत्यु शीघ्र न होगी।&lt;br /&gt;
====जल-तर्पण के अयोग्य==== &lt;br /&gt;
मृत को जल देने के लिए कुछ लोग अयोग्य माने गये हैं और कुछ मृत व्यक्ति भी जल पाने के लिए अयोग्य ठहराये गये हैं। नपुंसक लोगों, सोने के चोरों, व्रात्यों, विधर्मी लोगों, भ्रूणहत्या (गर्भपात) करने वाली तथा पति की हत्या करने वाली स्त्रियों, निषिद्ध मद्य पीने वालों (सुरापियों) को जल देना मना था। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.6&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था की है कि नास्तिकों, चार प्रकार के आश्रमों में न रहने वालों, चोरों, पति की हत्या करने वाली नारियों, व्यभिचारिणियों, सुरापियों, आत्महत्या करने वालों को न तो मरने पर जल देना चाहिए और न अशौच मनाना चाहिए। यही बात मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.89-90&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी कही है। गौतम धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उन लोगों की न तो अन्त्येष्टि क्रिया होती है, न अशौच होता है, और न जल-तर्पण होता है और न पिण्डदान होता है, जो क्रोध में आकर महाप्रयाण करते हैं, जो उपवास से या अग्नि से या विष से या जल-प्रवेश से या फाँसी लगाकर लटक जाने से या पर्वत से कूदकर या पेड़ से गिरकर आत्महत्या कर लेते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रायानाशकशस्त्राग्निविषोदकोद्बन्धनप्रपतनैश्चेच्छताम्। गौतम धर्मसूत्र (14.11); क्रोधात् प्रायं विषं वह्नि: शस्त्रमुद्बन्धनं जलम्। गिरिवृक्षप्रपातं च ये कुर्वन्ति नराधमा:।। ब्रह्मदण्डहया ये च ये चैव ब्राह्मणैर्हता:। महापातकिनो ये च पतितास्ते प्रकीर्तिता:।। पतितानां न दाह: स्यान्न च स्यादस्थिसंचय:। न चाश्रुपात: पिण्डो वा कार्या श्राद्धक्रिया न च।। ब्रह्म पुराण (हरदत्त, गौतमधर्मसूत्र 14.11; अपरार्क पृष्ठ 902-903), देखिए औशनशसस्मृति (7.1, पृष्ठ 539), संवर्त (178-179), अत्रि (216-217), कूर्म पुराण (उत्तरार्ध 23.60-63), हारलता (पृष्ठ 204), शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 59)।&amp;lt;/ref&amp;gt; हरदत्त&amp;lt;ref&amp;gt;हरदत्त गौतम धर्मसूत्र 14.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ब्रह्म पुराण से तीन पद्य उद्धृत कर कहा है कि जो ब्राह्मण-शाप या अभिचार से मरते हैं या जो पतित हैं, वे इसी प्रकार की गति पाते हैं। किन्तु अंगिरा&amp;lt;ref&amp;gt;मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.6&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जो लोग असावधानी से जल या अग्नि द्वारा मर जाते हैं, उनके लिए अशौच होता है और उदकक्रिया की जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[[वैखानस श्रौतसूत्र|वैखानस श्रौतसूत्र]] 5.11&amp;lt;/ref&amp;gt;, जहाँ ऐसे लोगों की सूची है, जिनका दाह-कर्म नहीं होता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] में अन्त्येष्टि कर्म का बहुधा वर्णन हुआ है, यथा [[आदिपर्व महाभारत|आदिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;आदिपर्व अध्याय 127&amp;lt;/ref&amp;gt; में पाण्डु का दाह-कर्म&amp;lt;ref&amp;gt;चारों ओर से ढँकी शिबिका में शव ले जाया गया था, वाद्य यंत्र थे, जुलूस में राजछत्र एवं चामर थे, साधुओं को धन बाँटा जा रहा था, गंगातट के एक सुरम्य स्थल पर शव ले जाया गया था, शव को स्नान कराया गया था, उस पर चन्दनलेप लगाया गया था&amp;lt;/ref&amp;gt;; [[स्त्रीपर्व महाभारत|स्त्रीपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[स्त्रीपर्व महाभारत|स्त्रीपर्व]] अध्याय 23.39-42&amp;lt;/ref&amp;gt; में [[द्रोण]] का दाह-कर्म&amp;lt;ref&amp;gt;तीन मास पढ़े गये थे, उनके शिष्यों ने पत्नी के साथ चिता की परिक्रमा की, गंगा के तट पर लोग गये थे&amp;lt;/ref&amp;gt;; अनुशासनपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 169.10-19&amp;lt;/ref&amp;gt; में [[भीष्म]] का दाह-कर्म&amp;lt;ref&amp;gt;चिता पर सुगन्धित पदार्थ डाले गये थे, शव सुन्दर वस्त्रों एवं पुष्पों से ढँका था, शव के ऊपर छत्र एवं चामर थे, कौरवों की नारियाँ शव पर पंखे झल रही थीं और सामवेद का गायन हो रहा था&amp;lt;/ref&amp;gt;; [[मौसलपर्व महाभारत|मौसलपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मौसलपर्व महाभारत|मौसलपर्व]] 7.19-25&amp;lt;/ref&amp;gt; में वासुदेव का, स्त्रीपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;स्त्रीपर्व 26.28-43&amp;lt;/ref&amp;gt; में अन्य योद्धाओं का तथा [[आश्रमवासिकपर्व महाभारत|आश्रमवासिकपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[आश्रमवासिकपर्व महाभारत|आश्रमवासिकपर्व]], अध्याय 39&amp;lt;/ref&amp;gt; में [[कुन्ती]], [[धृतराष्ट्र]] एवं [[गान्धारी]] का दाह-कर्म वर्णित है। रामायण&amp;lt;ref&amp;gt;रामायण- अयोध्याकाण्ड, 76.16-20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि दशरथ की चिता चन्दन की लकड़ियों से बनी थी और उसमें अगुरु एवं अन्य सुगन्धित पदार्थ थे; सरल, पद्मक, देवदारु आदि की सुगन्धित लकड़ियाँ भी थीं; कौसल्या तथा अन्य स्त्रियाँ शिबिकाओं एवं अपनी स्थिति के अनुसार अन्य गाड़ियों में शवयात्रा में सम्मिलित हुई थीं। यदि आहिताग्नि (जो श्रौत अग्निहोत्र करता हो) विदेश में मर जाए तो उसकी अस्थियाँ मँगाकर काले मृगचर्म पर फैला दी जानी चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 2.5.1.13-14&amp;lt;/ref&amp;gt; और उन्हें मानव-आकार में सजा देना चाहिए तथा रूई एवं घृत तथा श्रौत अग्नियों एवं यात्राओं के साथ जला डालना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;कात्यायनश्रौतसूत्र (25.8.9), बौधायनपितृमेधसूत्र (3.8), गोभिलस्मृति (3.47) एवं वसिष्ठधर्मसूत्र (4.37)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अस्थियाँ प्राप्त न होने पर==&lt;br /&gt;
यदि अस्थियाँ न प्राप्त हो सकें तो सूत्रों ने [[ऐतरेय ब्राह्मण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऐतरेय ब्राह्मण]] 32.1&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर यह व्यवस्था दी है कि पलाश की 360 पत्तियों से काले मृगचर्म पर मानव-पुत्तल बनाना चाहिए और उसे ऊन के सूत्रों से बाँध देना चाहिए। उस पर जल से मिश्रित जौ का आटा डाल देना चाहिए और घृत डालकर मृत की अग्नियों एवं यज्ञपात्रों के साथ जला डालना चाहिए। ब्रह्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण- शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 187&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी ऐसे ही नियम दिये हैं और तीन दिनों का अशौच घोषित किया है। अपरार्क&amp;lt;ref&amp;gt;अपरार्क पृष्ठ 545&amp;lt;/ref&amp;gt; द्वारा उद्धृत एक स्मृति में पलाश की पत्तियों की संख्या 362 लिखी हुई है। बौधायन पितृमेधसूत्र एवं गौतम पितृमेधसूत्रों के मत से ये पत्तियाँ निम्न रूप से सजायी जानी चाहिए; सिर के लिए40, गर्दन के लिए 10, छाती के लिए 20, उदर (पेट) के लिए 10, पैरों के लिए 70, पैरों के अँगूठों के लिए 10, दोनों बाँहों के लिए 50, हाथों की अँगुलियों के लिए 10, लिंग के लिए 8 एवं अण्डकोशों के लिए 12। यही वर्णन सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 19439&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी है।&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायनश्रौतसूत्र (4.15.19-31), कात्यायन श्रौतसूत्र (25.8.15), बौधायन पितृमेधसूत्र (3.8), गौतम पितृमेधसूत्र (2.1.6-14), गोभिल. (3.48), हारीत (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 186) एवं गरुड़ पुराण (2.4.134-154 एवं 2.40.44)&amp;lt;/ref&amp;gt; सूत्रों एवं स्मृतियों में पलाश-पत्रों की उन संख्याओं में मतैक्य नहीं है, जो विभिन्न अंगों के लिए व्यवस्थित हैं। अपरार्क&amp;lt;ref&amp;gt;अपरार्क, पृष्ठ 545&amp;lt;/ref&amp;gt; द्वारा उद्धृत एक स्मृति में संख्या यों है-सिर के लिए 32, गरदन के लिए 60, नितम्ब के लिए 20, दोनों हाथों के लिए 20-20, अँगुलियों के लिए 10, अंडकोशों के लिए 6, लिंग के लिए 4, जाँघों के लिए 60, घुटनों के लिए 20, पैरों के निम्न भागों के लिए 20, पैर के अँगूठों के लिए 10। जातूकर्ण्य&amp;lt;ref&amp;gt;अपरार्क, पृष्ठ 545&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यदि पुत्र 15 वर्षों तक विदेश गये हुए अपने पिता के विषय में कुछ न जान सके तो उसे पुत्तल जलाना चाहिए। पुत्तल जलाने को आकृति दहन कहा जाता है। बृहस्पति ने इस विषय में 12 वर्षों तक जोहने की बात कही है। वैखानसस्मार्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसस्मार्तसूत्र 5.12&amp;lt;/ref&amp;gt; ने आकृतिदहन को फलदायक कर्म माना है और इसे केवल शव या अस्थियों की अप्राप्ति तक ही सीमित नहीं माना है। शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 187&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ब्रह्म पुराण को उद्धृत कर कहा है कि आकृतिदहन केवल आहिताग्नि तक ही सीमित नहीं मानना चाहिए, यह कर्म उनके लिए भी है, जिन्होंने श्रौत अग्निहोत्र नहीं किया है। इस विषय में आहिताग्नियों के लिए अशौच 10 दिनों तक तथा अन्य लोगों के लिए केवल 3 दिनों तक होता है।&lt;br /&gt;
==आहिताग्नि==&lt;br /&gt;
सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 29.4.41&amp;lt;/ref&amp;gt;, बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 3.7.4&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं गरुड़ पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़ पुराण 2.4.169-70&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसी व्यवस्था दी हुई है कि यदि विदेश गया हुआ व्यक्ति आकृतिदहन (पुत्तल-दाह) के उपरान्त लौट आये, अर्थात् मृत समझा गया व्यक्ति जीवित अवस्था में लौटे तो वह घृत से भरे कुण्ड में डुबोकर बाहर निकाला जाता है; पुन: उसको स्नान कराया जाता है और जातकर्म से लेकर सभी संस्कार किये जाते हैं। इसके उपरान्त उसको अपनी पत्नी के साथ पुन: विवाह करना होता है, किन्तु यदि उसकी पत्नी मर गयी है तो वह दूसरी कन्या से विवाह कर सकता है और तब वह पुन: अग्निहोत्र आरम्भ कर सकता है। कुछ सूत्रों ने ऐसी व्यवस्था दी है कि यदि आहिताग्नि की पत्नी उससे पूर्व ही मर जाए, तो वह चाहे तो उसे श्रौताग्नियों द्वारा जला सकता है या गोबर से ज्वलित अग्नि या तीन थालियों में रखे, शीघ्र ही जलने वाले घास-फस से उत्पन्न अग्नि द्वारा जला सकता है। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.167-168&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि यदि आहिताग्नि द्विज की सवर्ण एवं सदाचारिणी पत्नी मर जाये तो आहिताग्नि पति अपनी श्रौत एवं स्मार्त अग्नियों से उसे यज्ञपात्रों के साथ जला सकता है। इसके उपरान्त वह पुन: विवाह कर अग्निहोत्र आरम्भ कर सकता है।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति (1.89), बौधायन पितृमेधसूत्र (2.4 एवं 6), गोभिलस्मृति (3.5), वैखानसस्मार्तसूत्र (7.2), वृद्ध हारीत (11.213), लघु आश्वलायनगृह्यसूत्र (20.59)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वरूप&amp;lt;ref&amp;gt;विश्वरूप  (याज्ञवल्क्यस्मृति 1.87)&amp;lt;/ref&amp;gt; आहिताग्नि के विषय में काठक-श्रुति को उद्धृत कर कहा है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की मृत्यु के उपरान्त भी वे ही पुरानी श्रौताग्नियाँ रखता है तो वे अग्नियाँ उस अग्नि के समान अपवित्र मानी जाती हैं, जो शव के लिए प्रयुक्त होती हैं, और उसने इतना जोड़ दिया है कि यदि आहिताग्नि की क्षत्रिय पत्नी उसके पूर्व मर जाये तो उसका दाह भी श्रौताग्नियों से ही होता है। यह सिद्धान्त अन्य टीकाकारों के मत का विरोधी है, किन्तु उसने मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.167&amp;lt;/ref&amp;gt; में प्रयुक्त 'सवर्ण' को केवल उदाहरण स्वरूप लिया है, क्योंकि ऐसा न करने से वाक्यभेद दोष उत्पन्न हो जायेगा। अत: ब्राह्मण पत्नि के अतिरिक्त क्षत्रिय पत्नी को भी मान्यता दी गई है। कुछ स्मृतियों ने ऐसा लिखा है कि आहिताग्नि विधुर रूप में रहकर भी अपना अग्निहोत्र सम्पादित कर सकता है, और पत्नी की सोने या कुश की प्रतिमा बनाकर यज्ञादि कर सकता है, जैसा कि [[राम]] ने किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3.9-10) एवं वृद्ध-रहित (11.214)&amp;lt;/ref&amp;gt; जब गृहस्थ अपनी मूल पत्नी को श्रौताग्नियों के साथ जलाने के उपरान्त पुन: विवाह नहीं करता है और न पुन: नवीन वैदिक (श्रौत) अग्नियाँ रखता है तो वह मरने के उपरान्त साधारण अग्नियों से ही जलाया जाता है। यदि गृहस्थ पुन: विवाह नहीं करता है तो वह अपनी मृत पत्नी के शव को अरणियों से उत्पन्न अग्नि में जला सकता है। यदि आहिताग्नि पहले मर जाये तो उसकी विधवा अरणियों से उत्पन्न अग्नि (निर्मन्थ्य) से जलायी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र (4.6-8), कात्यायन श्रौतसूत्र (29.4.34-35) एवं त्रिकाण्डमंडन (2.121)&amp;lt;/ref&amp;gt; जब पत्नी का दाह-कर्म होता है तो 'अस्मात्त्वमभिजातोसि' नामक मन्त्र का पाठ नहीं होता।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.52&amp;lt;/ref&amp;gt; केवल सदाचारिणी एवं पतिव्रता स्त्री का दाह-कर्म श्रौत या स्मार्त अग्नि से होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.53&amp;lt;/ref&amp;gt; ऋतु&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 3.1.9-13&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार विधुर एवं विधवा का दाहकर्म कपाल नामक अग्नि (कपाल को तपाकर कण्डों से उत्पादित अग्नि) से, ब्रह्मचारी एवं यति (साधु) का उत्तपन (या कपालज) नामक अग्नि से, कुमारी कन्या तथा उपनयनरहित लड़के का भूसा से उत्पन्न अग्नि से होता है। यदि आहिताग्नि पतित हो जाए या किसी प्रकार से आत्महत्या कर ले या पशुओं या सर्पों से भिड़कर मर जाए तो उसकी श्रौताग्नियाँ जल में फेंक देनी चाहिए, स्मार्त अग्नियाँ चौराहे या जल में फेंक देनी चाहिए, यज्ञपात्रों को जला डालना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 226; पराशर 5.10-11; वैखानसस्मार्तसूत्र 5.11&amp;lt;/ref&amp;gt; और उसे साधारण (लौकिक) अग्नि से जलाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कम अवस्था के बच्चों की अन्त्येष्टि के विषय में विकल्प==&lt;br /&gt;
मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.68&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.1&amp;lt;/ref&amp;gt;, पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 3.14&amp;lt;/ref&amp;gt;, विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 22.27-28&amp;lt;/ref&amp;gt;, ब्रह्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्मपुराण- पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 238&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से गर्भ से पतित बच्चे, भ्रूण, मृतोत्पन्न शिशु तथा दन्तहीन शिशु को वस्त्र से ढँककर गाड़ देना चाहिए। छोटी अवस्था के बच्चों को नहीं जलाना चाहिए, किन्तु इस विषय में प्राचीन स्मृतियों में अवस्था सम्बन्धी विभेद पाया जाता है। पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.1&amp;lt;/ref&amp;gt;, मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.68-6&amp;lt;/ref&amp;gt;, यम आदि ने व्यवस्था दी है कि वर्ष के भीतर के बच्चों को ग्राम के बाहर श्मशान से दूर किसी स्वच्छ स्थान पर गाड़ देना चाहिए। ऐसे बच्चों के शवों पर घृत का लेप करना चाहिए, उन पर चन्दनलेप, पुष्प आदि रखने चाहिए, न तो उन्हें जलाना चाहिए और न जल-तर्पण करना चाहिए और न उनका अस्थि-चयन करना चाहिए। सम्बन्धी साथ में नहीं भी जा सकते हैं। यम ने यमसूक्त&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.14&amp;lt;/ref&amp;gt; के पाठ एवं यम के सम्मान में स्तुतिपाठ करने की व्यवस्था दी है। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.70&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाएँ दी हैं, यथा-दाँत वाले बच्चों या नामकरण-संस्कृत बच्चों के लिए जल-तर्पण किया जा सकता है, अर्थात् ऐसे बच्चों का शवदाह भी हो सकता है। अत: दो वर्ष से कम अवस्था के बच्चों की अन्त्येष्टि के विषय में विकल्प है, अर्थात् नामकरण एवं दाँत निकलने के उपरान्त ऐसे बच्चे जलाये या गाड़े जा सकते हैं। किन्तु ऐसा करने में सभी सपिण्डों का शव के साथ जाना आवश्यक नहीं है। यदि बच्चा दो वर्ष का हो या यदि अधिक अवस्था का हो, किन्तु अभी उपनयन संस्कार नहीं हुआ हो तो उसका दाहकर्म लौकिक अग्नि से अवश्य होना चाहिए और मौन रूप से जला देना चाहिए। लौगाक्षि के मत से चूड़ाकरण-संस्कृत बच्चों की अनत्येष्टि भी इसी प्रकार होनी चाहिए। वैखानसस्मार्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसस्मार्तसूत्र 5.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कहा है कि 5 वर्ष के लड़के तथा 7 वर्ष की लड़की का दाहकर्म नहीं होता। उपनयन के उपरान्त आहिताग्नि की भाँति दाहकर्म होता है, किन्तु यज्ञपात्रों का दाह एवं मन्त्रोच्चारण नहीं होता। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 2.3.10-11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि चूड़ाकरण के पूर्व मृत बच्चों का शवदाह नहीं होता, कुमारी कन्याओं एवं उपनयन रहित लड़कों का पितृमेध नहीं होता। उसने यह भी व्यवस्था दी है कि बिना दाँत के बच्चों को 'ओम' के साथ तथा दाँत वाले बच्चों को व्याहृतियों के साथ गाड़ा जाता है। मिताक्षरा&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.2&amp;lt;/ref&amp;gt; ने नियमों को निम्न रूप से दिया है-'नामकरण के पूर्व केवल गाड़ा जाता है, जल-तर्पण नहीं होता; नामकरण के उपरान्त तीन वर्ष तक गाड़ना या जलाना (जल-तर्पण के साथ) विकल्प से होता है; तीन वर्ष से उपनयन के पूर्व तक शवदाह एवं तर्पण मौन रूप से (बिना मन्त्रों के) होता है; यदि तीन वर्ष के पूर्व चूड़ाकरण हो गया हो तो मरने पर यही नियम लागू होता है। उपनयन के उपरान्त मृत का दाहकर्म लौकिक अग्नि से होता है, किन्तु ढंग वही होता है जो आहिताग्नि के लिए निर्धारित है।'&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म संस्कार}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू_संस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू_धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A7_%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=232603</id>
		<title>पितृमेध या अन्त्यकर्म संस्कार</title>
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		<updated>2011-11-06T11:34:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{अस्वीकरण}}&lt;br /&gt;
{{प्रतीक्षा|तिथि-समय=16:39, 3 नवम्बर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''पितृमेध या अन्त्यकर्म या अंत्येष्टि संस्कार''' [[हिन्दू धर्म संस्कार|हिन्दू धर्म संस्कारों]] में षोडश संस्कार है। यह अन्तिम संस्कार है। मृत्यु के पश्चात यह संस्कार किया जाता है। इस संस्कार को पितृमेध, अन्त्कर्म, दाह-संस्कार, श्मशानकर्म तथा अन्त्येष्टि-क्रिया आदि भी कहते हैं। यह संस्कार वेदमंत्रों के उच्चारण द्वारा होता है। हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद दाह-संस्कार करने का विधान है। केवल संन्यासी-महात्माओं के लिए—निरग्रि होने के कारण शरीर छूट जाने पर भूमिसमाधि या जलसमाधि आदि देने का विधान है। कहीं-कहीं संन्यासी का भी दाह-संस्कार किया जाता है और उसमें कोई दोष नहीं माना जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक-कल्याण संस्कार-अंक ([[जनवरी]] सन [[2006]] ई. से&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।। &amp;lt;ref&amp;gt;और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण: ...।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गधा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पृष्ठ 251&amp;lt;/ref&amp;gt; या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
==मरणासन्न अवस्था==&lt;br /&gt;
[[भारत]] के '''अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं। यह प्रथा [[यूरोप]] में भी है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;प्रो. एडगर्टन का लेख; ‘दी आवर आव डेथ’, एनल्स आव दी भण्डारकर ओ. आर. इंस्टीट्यूट, जिल्द 8, पृष्ठ 219-249&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  80|3&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है; जब व्यक्ति शक्तिहीन होता है, अर्थात् मरने लगता है तो (पुत्र या सेवा करने वाला कोई सम्बन्धी) शाला में लगी हुई घास पर कुश बिछा देता है और उसे 'स्योनास्मै भव' मन्त्र के साथ (बिस्तर या खाट से) उठाकर उस पर रख देता है। &lt;br /&gt;
*बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3|1|18&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से जब यजमान के मरने का भय हो जाए तो यज्ञशाला में पृथिवी पर बालू बिछा देनी चाहिए और उस पर दर्भ फैला देने चाहिए, जिनकी नोंक दक्षिण की ओर होती है, मरणासन्न के दायें कान में 'आयुष: प्राणं सन्तनु' से आरम्भ होने वाले अनुवाक का पाठ (पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धी द्वारा) होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3।22), पितृदयिता आदि।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलीभवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोहयति। &lt;br /&gt;
मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते। यत्ते कृष्णेत्यवदीपयति।।&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र (80|3-5)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;'स्योनास्मै' मन्त्र के लिए देखिए [[अथर्ववेद]] (18-2-19), [[ऋग्वेद]] (1|22|15) एवं वाजसनेयीसंहिता (36|13), देखिए निरुक्त (9|32)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
:'यदा कण्ठस्थानगतजीवी विह्वलो देही भवति तदा बहिर्गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ कुशान्दक्षिणाग्रानास्तीर्य तदुपरि दक्षिणशिरसं स्थापयित्वा सुवर्णरजतगोभूमिदीपतिलपात्राणि दापयेत्।'&amp;lt;ref&amp;gt;पितृदयिता, पृष्ठ 74&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलं स्नापयित्वा तु शुद्धचैलाभिसंवृतम्। &lt;br /&gt;
दक्षिणाशिरसं भूमौ बहिष्मत्यां निवेशयेत्।।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति- 3।22&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश  पृष्ठ 151-152&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि जब कोई व्यक्ति मृतप्राय हो, उसकी आंखें आधी बन्द हो गई हों और वह खाट से नीचे उतार दिया गया हो, तो उसके पुत्र या किसी सम्बन्धी को चाहिए कि वह उससे निम्न प्रकार का कोई एक या सभी प्रकार के दस दान कराये-[[गौ]], भूमि, तिल, [[सोना]], घृत, [[वस्त्र]], धान्य, गुड़, रजत ([[चाँदी]]) एवं [[नमक]]।&amp;lt;ref&amp;gt;दानानि च जातूकर्ण्य आह। उत्क्रान्तिवैतरण्यौ च दश दानानि चैव हि। प्रेतेऽपि कृत्वा तं प्रेतं शवधर्मेण दाहयेत्।.....दश दानानि च तेनैवोक्तानि। गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च। रूप्यं लवणमित्याहुर्दश दानान्यनुक्रमात्।। शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 152)। और देखिए [[गरुड़ पुराण]] (प्रेतखण्ड, 4।4); एपिग्रैफ़िया इण्डिका (जिल्द 19, पृष्ठ 230)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये दान गयाश्राद्ध या सैकड़ों अश्वमेधों से बढ़कर हैं। संकल्प इस प्रकार का होता है-'अभ्युदय (स्वर्ग) की प्राप्ति या पापमोचन के लिए मैं दस दान करूँगा।' दस दानों के उपरान्त उत्क्रान्ति-धेनु (मृत्यु को ध्यान में रखकर बछड़े के साथ गौ) दी जाती है, और इसके उपरान्त वैतरणी गौ का दान किया जाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;आसन्नमृत्युना देया गौ: सवत्सा तु पूर्ववत्। &lt;br /&gt;
तदभावे तु गौरेव नरकोत्तरणाय च।। &lt;br /&gt;
तदा यदि न शक्नोति दातुं वैतरणीं तु गाम। &lt;br /&gt;
शक्तोऽन्योऽरुक् तदा दत्त्वा दद्याच्छ्रेयो मृतस्य च।।&amp;lt;ref&amp;gt;व्यास (शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 300; शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 153; अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 7)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण- प्रेतखण्ड, 4।6&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है:-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;नदीं वैतरणीं तर्तु दद्याद्वैतरणीं च गाम्। &lt;br /&gt;
कृष्णस्तनी सकृष्णांगी सा वै वैतरणी स्मृता।।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
अर्थात; यम के द्वार पर वैतरणी नाम की नदी है, जो रक्त एवं पैने अस्त्रों से परिपूर्ण है; जो लोग मरते समय गौदान करते हैं, वे उस नदी को गाय की पूँछ पकड़कर पार कर जाते हैं। [[स्कन्दपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[स्कन्दपुराण]] 6|226|32-33&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ वैतरणी की चर्चा है:-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;मृत्युकाले प्रचच्छन्ति ये धेनुं ब्राह्मणाय वै। &lt;br /&gt;
तस्या: पुच्छं समाश्रित्य ते तरन्ति च तां नृप।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 152-153&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन मन्त्रों का (जो वैदिक नहीं है) उल्लेख है जो दानों के समय कहे जाते हैं। अन्त्येष्टिपद्धति अन्त्यकर्मदीपक आदि ने व्यवस्था दी है कि जब व्यक्ति आसन्नमृत्यु हो, तो उसके पुत्र या सम्बन्धियों को चाहिए कि वे उससे व्रतोद्यापन, सर्वप्रायश्चित्त एवं दस दानों के कृत्य करायें, किन्तु यदि मरणासन्न इन कृत्यों को स्वयं करने में अशक्त हो तो पुत्र या सम्बन्धी को उसके लिए ऐसा कर देना चाहिए। जब व्यक्ति संकल्पित व्रत नहीं कर पाता तो मरते समय वह व्रतोद्यापन कृत्य करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====व्रतोद्यापन====&lt;br /&gt;
संक्षेप में व्रतोद्यापन यों है-पुत्र या सम्बन्धी मरणासन्न व्यक्ति को स्नान द्वारा या पवित्र जल से मार्जन करके या गंगा जल पिलाकर पवित्र करता है, स्वयं स्नानसन्ध्या से पवित्र हो लेता है, दीप जलाता है, [[गणेश]] एवं [[विष्णु]] की पूजा-वन्दना करता है, पूजा की सामग्री रखकर संकल्प करता है:-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्वे...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...अमुकतियौ अमुकगोत्र...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...अमुकशमहिं ममात्मन: (मम पित्रादे:) व्रतग्रहणदिवसादारभ्य अद्य यावत्फलाभिलाषादिगृहीतानां निष्कामतया गृहीतानां च अमुकामुकव्रतानामकृतोद्यापनदोषपरिहारार्थ श्रुतिस्मृति-पुराणोक्ततत्तदव्रतजन्यसांगफलप्राप्त्यर्थ विष्ण्वादीनां तत्तद्देवानां प्रीपये इदं सुवर्णमग्निदैवतम् (तदभावे इदं रजतं चन्द्रदैवतम्) अमुकगोत्रायामुकशर्मण् ब्राह्मणाय दास्ये ओं तत्सत् न मम इति संकल्प...आदि-आदि।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमन्त्रित ब्राह्मण को सम्मानित करता है और पहले से संकल्पित सोना उसे देता है और ब्राह्मण घोषित करता है-'सभी व्रत पूर्ण हों। उद्यापन (व्रत-पूर्ति) के फल की प्राप्ति हो।' सर्वप्रायश्चित में पुत्र चार या तीन विद्वान ब्राह्मणों या एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण को 6, 3 या डेढ़ वर्ष वाले प्रायश्चित्तों के निष्क्रिय रूप में सोना आदि का दान देता है और इसकी घोषणा करता है और वह अशौच के उपरान्त प्रायश्चित करता है। मरणासन्न व्यक्ति को या पुत्र या सम्बन्धी को सर्वप्रायश्चित करना पड़ता है। वह क्षीरकर्म करके स्नान करता है, पंचगव्य पीता है, चन्दनलेप एवं अन्य पदार्थों से एक ब्राह्मण को सम्मानित करता है, गोपूजा करके या उसके स्थान पर धन का दान करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देशकालौ संकीर्त्य मम (मत्पत्रादेर्वां) ज्ञाताज्ञातकामाकामसकृदसकृत्कायिकवाचिकमानसिकतांसर्गिक-स्पृष्टास्पृष्ट-भुक्ताभुक्त-पीतापीतसकलपातकानुपातकोपपातकलघुपातकसंकरीकरणमलिनीकरणपात्री- करणजातिभ्रंशकरप्रकीर्णकादिनानाविधपातकानां निरासेन देहावसानकाले देहशुद्धिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थमिमां सर्वप्रायश्चित्तप्रत्याम्नायभूतां यथाशक्त्यलंकृतां सवत्सां गां रुद्रदेवताममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ओं तत्सत् न मम।&amp;lt;ref&amp;gt; अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 5)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वप्रायश्चित के उपरान्त दश-दान होते हैं। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण  2|4|7-9&amp;lt;/ref&amp;gt; ने महादान संज्ञक अन्य दानों की व्यवस्था दी है, यथा-[[तिल]], [[लोहा]], सोना, रूई, नमक, सात प्रकार के अन्न, भूमि, गौ; कुछ अन्य दान भी हैं, यथा-छाता, [[चन्दन]], अँगूठी, जलपात्र, आसन, भोजन, जिन्हें पददान कहा जाता है। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2|4|47&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यदि मरणासन्न व्यक्ति आतुर-संन्यास नियमों के अनुसार संन्यास ग्रहण कर लेता है, तो वह आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा पा जाता है। आदिकाल से ही ऐसा विश्वास रहा है कि मरते समय व्यक्ति जो विचार रखता है, उसी के अनुसार दैहिक जीवन के उपरान्त उसका जीवात्मा आक्रान्त होता है (अन्ते या मति: सा गति:), अत: मृत्यु के समय व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया छोड़कर हरि या [[शिव]] का स्मरण करना चाहिए और मन ही मन 'ऊँ नमो वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8|5-6) एवं [[पद्म पुराण]] (5|47|262)-'मरणे या मति: पुंसां गतिर्भवति तादृशी।'&amp;lt;/ref&amp;gt; बहुत से वचनों के अनुसार उसे वैदिक पाठ सुनाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम-पितृमेधसूत्र 1|1-8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मरणासन्न व्यक्ति द्वारा स्मरण====&lt;br /&gt;
हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र 1|1&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से आहिताग्नि के मरते समय पुत्र या सम्बन्धी को उसके कान में (जब वह ब्रह्मज्ञानी हो) [[तैत्तिरीयोपनिषद]] के दो अनुवाक (2|1 एवं 3|1) कहने चाहिए। अन्त्यकर्मदीपक&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक  पृष्ठ 18&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जब मरणासन्न व्यक्ति जप न कर सके तो उसे [[विष्णु]] या शिव का रमणीय रूप मन में धारण कर विष्णु या शिव के सहस्र नाम सुनने चाहिए और भगवद्गीता, भागवत, [[रामायण]], ईशावास्य आदि [[उपनिषद|उपनिषदों]] एवं सामवेदीय मन्त्रों का पाठ सुनना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जपेऽसमर्थश्चेद हृदये चतुर्भुजं शंखचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरकिरीटकेयूरकौस्तुभवनमालाधरं रमणीयरूपं विष्णुं त्रिशूलडमरुधरं त्रिनेत्रं गंगाधरं शिवं वा भावयन् सहस्रनामगीताभागवतभारतरामायणेशावास्याद्युपनिषद: पावमानादीनि सूक्तानि च यथासम्भवं शृणुयात्।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 18)&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुसहस्रनाम के लिए देखिए [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]] (149|14-120); शिव के 1008 नामों के लिए देखिए वही (17|31-153); और शिव सहस्रनाम के लिए देखिए शान्तिपर्व भी (285|74)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपनिषदों में भी मरणासन्न व्यक्ति की भावनाओं के विषय में संकेत मिलते हैं। [[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]] (शाण्डिल्य-विद्या, 314|1)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'सभी ब्रह्म है। व्यक्ति को आदि, अन्त एवं इसी स्थिति के रूप में इसका (ब्रह्म का) ध्यान करना चाहिए। इसी की इच्छा की सृष्टि मनुष्य है। इस विश्व में उसकी जो इच्छा (या भावना) होगी, उसी के अनुसार वह इहलोक से जाने के उपरान्त होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वखल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीताथ खलु क्रतुमय: पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत: प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत।&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद् (3|14|1)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। &lt;br /&gt;
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:।। &lt;br /&gt;
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। &lt;br /&gt;
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावित:।।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8|5-6) देखिए और शंकरभाष्य, वेदान्तसूत्र (1|2|1 एवं 4|1|12)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार की भावना [[प्रश्नोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रश्नोपनिषद]] 3|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है। वहाँ ऐसा आया है कि विचार-शक्ति आत्मा को उच्चतर उठाती जाती है, जिससे मनुष्य-मन को ऐसा परिज्ञान होना चाहिए कि अखिल ब्रह्माण्ड में जितने भौतिक पदार्थ या अभिव्यक्तियाँ हैं, वे सब एक हैं और उनमें एक ही विभु रूप समाया हुआ है। भगवद्गीता ने यही भावना और अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त की है-'वह व्यक्ति, जो अन्तकाल में मुझे स्मरण करता हुआ इस जीवन से विदा होता है, वह मेरे पास आता है, इसमें संशय नहीं है'।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रश्नोपनिषद 8|5 &amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु एक बात स्मरणीय यह है कि अन्तकाल में ही केवल भगवान का स्मरण करने से कुछ न होगा, जब जीवन भर आत्मा ऐसी भावना से अभिभूत रहता है, तभी भगवत्प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है-'व्यक्ति मृत्यु के समय जो भी रूप (या वस्तु) सोचता है, उसी को वह प्राप्त होता है, और यह तभी सम्भव है, जबकि वह जीवन भर ऐसा करता आया हो।'&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता 8|6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====तीर्थस्थान गमन====&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के आधार पर कुछ निबन्धों का ऐसा कथन है कि अन्तकाल उपस्थित होने पर व्यक्ति को, यदि सम्भव हो तो, किसी तीर्थ-स्थान (यथा गंगा) में ले जाना चाहिए। शुद्धितत्त्व&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व पृष्ठ 299&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[कूर्मपुराण]] को उद्धृत किया है-'[[गंगा]] के जल में, [[वाराणसी]] के स्थल या जल में, गंगासागर में या उसकी भूमि, जल या अन्तरिक्ष में मरने से व्यक्ति मोक्ष (संसार से अन्तिम छुटकारा) पाता है।' इसी अर्थ में स्कन्दपुराण में आया है-'गंगा के तटों से एक गव्यूति (दो कोस) तक क्षेत्र (पवित्र स्थान) होता है, इतनी दूर तक दान, जप एवं होम करने से गंगा का ही फल प्राप्त होता है; जो इस क्षेत्र में मरता है, वह स्वर्ग जाता है और पुन: जन्म नहीं पाता'।&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 299-300; शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 155&amp;lt;/ref&amp;gt; पूजारत्नाकर में आया है-'जहाँ जहाँ शालग्रामशिला होती है, वहाँ हरि का निवास रहता है; जो शालग्रामशिला के पास मरता है, वह हरि का परमपद प्राप्त करता है।' ऐसा भी कहा गया है कि यदि कोई अनार्य देश (कीकट) में भी शालग्राम से एक कोस की दूरी पर मरता है, वह [[वैकुण्ठ]] (विष्णुलोक) पाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति [[तुलसी]] के वन में मरता है या मरते समय जिसके मुख में तुलसीदल रहता है, वह करोड़ों पाप करने पर भी मोक्षपद प्राप्त करता है। इस प्रकार की भावनाएँ आज भी लोकप्रसिद्ध हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'''कूर्मपुराणम्'''- गंगायां च जले मोक्षो वाराणस्यां जले स्थले। &lt;br /&gt;
जले स्थले चान्तरिक्षे गंगासागरसंगमे।। &lt;br /&gt;
'''स्कन्दे'''- तीराद् गव्यूतिमात्रं तु परित: क्षेत्रमुच्यते। &lt;br /&gt;
अत्र दानं जपो होमो गंगायां नात्र संशय:।। &lt;br /&gt;
अत्रस्थास्त्रिदिवं यान्ति ये मृता न पुनर्भवा:।&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299-300); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''पूजारत्नाकरे'''- शालग्रामशिला यत्र तत्र संनिहितो हरि:। &lt;br /&gt;
तत्सन्निघौ त्यजेत् प्राणान् याति विष्णो: परं पदम्।। &lt;br /&gt;
'''लिंगपुराणे'''-शालग्रामसमीपे तु क्रोशमात्रं समन्तत:। &lt;br /&gt;
कीकटेपि मृतो याति वैकुण्ठभवनं नर:।। &lt;br /&gt;
'''वैष्णवामृते व्यास'''-तुलसीकानने जन्तोर्यदि मृत्युर्भवेत् क्वचित्। &lt;br /&gt;
स निर्भर्त्स्य नरं पापी लीलयैव हरिं विशेत्।। &lt;br /&gt;
प्रयाणकाले यस्यास्ये दीयते तुलसीदलम्। &lt;br /&gt;
निर्वाणं याति पक्षीन्द्र पापकोटियृतोपि स:।। &amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कीकट मगध देश का नाम है, जिसे ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद (3।53।14)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आर्यधर्म से बाहर की भूमि कहा गया है। और देखिए निरुक्त&amp;lt;ref&amp;gt;निरुक्त (6।32)&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ कीकट देश को अनार्य निवास कहा गया है। शुद्धिप्रकाश ‘कीकटेपि’ के स्थान पर ‘कीटकोऽपि’ लिखता है जो अधिक समीचीन है, किन्तु यह संशोधन भी हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु का उत्तम काल==&lt;br /&gt;
मृत्यु के उत्तम काल के विषय में भी कुछ धारणाएँ हैं। [[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व (298।23, कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 254)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- ''''जो व्यक्ति सूर्य के उत्तर दिशा में जाने पर (उत्तरायण होने पर) मरता है या किसी अन्य शुभ [[नक्षत्र]] एवं मुहूर्त में मरता है, वह सचमुच पुण्यवान है।'''' यह भावना उपनिषदों में व्यक्त उत्तरायण एवं दक्षिणायन में मरने की धारणा पर आधारित है। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 4|15|5-6&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- 'अब (यदि यह आत्मज्ञानी व्यक्ति मरता है) चाहे लोग उसकी अन्त्येष्टि क्रिया ([[श्राद्ध]] आदि) करें या न करें, वह अर्चि: अर्थात् प्रकाश को प्राप्त होता है, प्रकाश से दिन, दिन से चन्द्र के अर्ध प्रकाश ([[शुक्ल पक्ष]]), उससे उत्तरायण के छ: मास, उससे वर्ष, वर्ष से [[सूर्य]], सूर्य से चन्द्र, [[चन्द्र ग्रह|चन्द्र]] से विद्युत को प्राप्त होता है। अमानव उसे ब्रह्म की ओर ले जाता है। यह देवों का मार्ग है; वह मार्ग, जिससे ब्रह्म की प्राप्ति होती है। जो लोग इस मार्ग से जाते हैं, वे मानव जीवन में पुन: नहीं लौटते। हाँ, वे नहीं लौटते।' ऐसी ही बात छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5।10।1-2&amp;lt;/ref&amp;gt; में आयी है, जहाँ कहा गया है कि पंचाग्नि-विद्या जानने वाले गृहस्थ तथा विश्वास (श्रद्धा) एवं तप करने वाले वानप्रस्थ एवं परिव्राजक (जो अभी ब्रह्म को नहीं जानते) भी देवयान (देवमार्ग) से जाते हैं। और जो लोग ग्रामवासी हैं,&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5|10|3-7&amp;lt;/ref&amp;gt; यज्ञपरायण हैं, दान-दक्षिणायुक्त हैं, धूम को जाते हैं, वे धूम से रात्रि, रात्रि से चन्द्र के अर्ध अंधकार ([[कृष्ण पक्ष]]) में, उससे दक्षिणायन के छ: मास, उससे पितृलोक, उससे आकाश एवं चन्द्र को जाते हैं, जहाँ वे कर्मफल पाते हैं और पुन: उसी मार्ग से लौट आते हैं। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5|10|8&amp;lt;/ref&amp;gt; ने एक तीसरे स्थान की ओर संकेत किया है, जहाँ कीट-पतंग आदि लगातार आते-जाते रहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बृहदारण्यकोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;बृहदारण्यकोपनिषद 6|2|115-16&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी देवलोग, पितृलोक एवं उस लोक का उल्लेख किया है, जहाँ कीट, पतंग आदि जाते हैं। भगवद्गीता&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता 8|23-25&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी उपनिषदों के इन वचनों को सूक्ष्म रूप में कहा है-मैं उन कालों का वर्णन करूँगा, जब कि भक्तगण कभी न लौटने के लिए इस विश्व से विदा होते हैं। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण सूर्य के छ:; जब ब्रह्मज्ञानी इन कालों में मरते हैं, तो ब्रह्मलोक जाते हैं। धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष, दक्षिणायन सूर्य के छ: मासों में मरने वाले भक्तगण चन्द्रलोक में जाते हैं और पुन: लौट आते हैं। इस विषय में ये दो मार्ग, जो प्रकाशमान एवं अंधकारमय हैं, सनातन हैं। एक से जाने वाला कभी नहीं लौटता, किन्तु दूसरे से आने वाला लौट आता है। वेदान्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वेदान्तसूत्र 4|3|4-6&amp;lt;/ref&amp;gt; ने 'प्रकाश', 'दिन' आदि शब्दों को यथाश्रुत शाब्दिक अर्थ में लेने को नहीं कहा है; अर्थात् उसके मत से ये मार्गों के लक्षण या स्तर नहीं हैं, प्रत्युत ये उन देवताओं के प्रतीक हैं, जो मृतात्माओं को सहायता देते हैं और देवलोक एवं पितृलोक के मार्गों में उन्हें ले जाते हैं, अर्थात् वे आतिवाहिक एवं अभिमानी देवता हैं। शंकर ने वेदान्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वेदान्तसूत्र (4|2|20 अतश्चायनेपि दक्षिणे)&amp;lt;/ref&amp;gt; की व्याख्या में बताया है कि जब [[भीष्म]] ने उत्तरायण की बाट जोही तो इससे यही समझना चाहिए कि वहाँ अर्चिरादि की प्रशस्ति मात्र है-जो ब्रह्मज्ञानी है, वह यदि दक्षिणायन में मर जाता है तो भी वह अपने ज्ञान का फल पाता है, अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त करता है। जब भीष्म ने उत्तरायण की बाट जोही तो ऐसा करके उन्होंने केवल लोकप्रसिद्ध प्रयोग या आचरण को मान्यता दी और उन्होंने यह भी प्रकट किया कि उनमें यह शक्ति भी थी कि वे अपनी इच्छाशक्ति से ही मर सकते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें ऐसा वर दे रखा था।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति (3|9193-196) 'देवयान' एवं 'पितृयान' के विषय में देखिए ऋग्वेद में भी, यथा-3|58|5; 7|38|8; 7|76|2; 10|51|5; 10|98|11; 10|18|1; 10|2|7 और [[तैत्तिरीय ब्राह्मण]] (2|6|3|5); [[शतपथ ब्राह्मण]] (1।9।3।2); बृहदारण्यकोपनिषद् (1।5।16)।&amp;lt;/ref&amp;gt; शंकर एवं वेदान्तसूत्र के वचनों के रहते हुए भी लोकप्रसिद्ध बात यही रही है कि उत्तरायण में मरना उत्तम है।&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 2।|7|21 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 2|7|1-2&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्त्येष्टि एक संस्कार==&lt;br /&gt;
अन्त्येष्टि एक संस्कार है। यह द्विजों द्वारा किये जाने वाले सोलह या इससे भी अधिक संस्कारों में एक है और मनु&amp;lt;ref&amp;gt;मनु 2।16&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 1|10&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं जातुकर्ण्य&amp;lt;ref&amp;gt;जातुकर्ण्य (संस्कारप्रकाश, पृष्ठ 135 एवं अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 1)&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यह वैदिक मन्त्रों के साथ किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधि:। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन् ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्।। मनु 2।16; ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रो द्विजा:। निषेकाद्या: श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रत: क्रिया:।। याज्ञवल्क्यस्मृति (1।10); आधानपुंससीमन्तजातनामान्नचौलका:। मौञ्जी व्रतानि गोदानं समावर्तविवाहका:।। अर्न्त्य चैतानि कर्माणि प्रोच्यन्ते षोडशैव तु।। जातूकर्ण्य (संस्कारप्रकाश, पृष्ठ 135 एवं अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 1)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये संस्कार पहले स्त्रियों के लिए भी&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायनगृह्यसूत्र 1|15|12, 1|16|6, 1|17|11 एवं मनु 2|66&amp;lt;/ref&amp;gt; होते थे, किन्तु बिना वैदिक मन्त्रों के (किन्तु विवाह संस्कार में वैदिक मन्त्रोंच्चारण होता है) और शूद्रों के लिए&amp;lt;ref&amp;gt;मनु 10।127 एवं याज्ञवल्क्यस्मृति 1।10&amp;lt;/ref&amp;gt; भी बिना वैदिक मन्त्रों के। बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 3|1|4&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि प्रत्येक मानव के लिए दो संस्कार ऋण-स्वरूप हैं (अर्थात् उनका सम्पादन अनिवार्य है) और वे हैं, जन्म संस्कार एवं मृतक संस्कार। दाह संस्कार तथा श्राद्ध आदि आहिताग्नि&amp;lt;ref&amp;gt;जो श्रौत अग्निहोत्र अर्थात् वैदिक यज्ञ करता है&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं स्मार्ताग्नि&amp;lt;ref&amp;gt;जो केवल स्मार्त अग्नि को पूजता है, अर्थात् स्मृतियों में व्यवस्थित धार्मिक कृत्य करता है&amp;lt;/ref&amp;gt; के लिए भिन्न-भिन्न रीतियों से होते हैं, तथा उन लोगों के लिए भी जो श्रौत या स्मार्त कोई अग्नि नहीं रखते। जो स्त्री है, बच्चा है, परिव्राजक है, जो दूर देश में मरता है, जो अकाल मृत्यु पाता है या आत्महत्या करता है या दुर्घटनावश मर जाता है; उनके लिए अन्त्येष्टि-कृत्य भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। एक ही विषय की कृत्य-विधियों में [[श्रौतसूत्र]] एवं [[गृह्यसूत्र]] विभिन्न बातें कहते हैं और आगे चलकर मध्य एवं पश्चात्यकालीन युगों युगों में विधियाँ और भी विस्तृत होती चली गयी हैं। निर्णयसिन्धु&amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयसिन्धु पृष्ठ 569&amp;lt;/ref&amp;gt; ने स्पष्ट कहा है कि, अन्त्येष्टि प्रत्येक शाखा में भिन्न रूप से उल्लिखित है, किन्तु कुछ बातें सभी शाखाओं में एक-सी हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रतिशाखं भिन्नेप्यन्त्यकर्मणि साधारणं किंचिदुच्यते। निर्णयसिन्धु (पृष्ठ 569)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्त्य-कर्मों के विस्तार, अभाव एवं उपस्थिति के आधार पर सूत्रों, स्मृतियों, पुराणों एवं निबन्धों के काल-क्रम-सम्बन्धी निष्कर्ष निकाले गये हैं,&amp;lt;ref&amp;gt;जैसा कि डॉक्टर कैलैण्ड ने किया है&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु ये निष्कर्ष बहुधा अनुमानों एवं वैयक्तिक भावनाओं पर ही आधारित हैं।&lt;br /&gt;
==ऋग्वेद के सूक्त==&lt;br /&gt;
श्रौतसूत्रों, गृह्यसूत्रों एवं पश्चात्कालीन ग्रन्थों में उल्लिखित अन्त्य कर्मों को उपस्थित करने के पूर्व ऋग्वेद के पाँच सूक्तों&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|14-18&amp;lt;/ref&amp;gt; का अनुवाद इस प्रकार है। इन सूक्तों की ऋचाएँ (मन्त्र) बहुधा सभी सूत्रों द्वारा प्रयुक्त हुई हैं और उनका प्रयोग आज भी अन्त्येष्टि के समय होता है और उनमें अधिकांश वैदिक संहिताओं में भी पायी जाती हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य टीकाकारों ने इन मन्त्रों की टीका एवं व्याख्या विभिन्न प्रकार से की है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री बेर्ट्रम एस. पकिल (Bertrum S. Puckle) ने अपनी पुस्तक ‘फ़्यूनरल कस्टम्स’ (Funeral Customs : London 1926) में अन्त्य कर्मों आदि के विषय में बड़ी मनोरंजक बातें दी हैं। उन्होंने [[इंग्लैण्ड]], [[फ़्राँस]] आदि यूरोपीय देशों, [[यहूदी|यहूदियों]] तथा विश्व के अन्य भागों के अन्त्य कर्मों के विषय में विस्तार के साथ वर्णन किया है। उनके द्वारा उपस्थापित वर्णन प्राचीन एवं आधुनिक भारतीय विश्वासों एवं आचारों से बहुत मेल खाते हैं, यथा-जहाँ व्यक्ति रोगग्रस्त पड़ा रहता है, वहाँ काक (काले कौआ) या काले पंख वाले पक्षी का उड़ते हुए बैठ जाना मृत्यु की सूचना है (पृष्ठ 17), कब्र में गाड़ने के पूर्व शव को स्नान कराना या उस पर लेप करना (पृष्ठ 34 एवं 36), मृत व्यक्ति के लिए रोने एवं शोक प्रकट करने के लिए पेशेवर स्त्रियों को भाड़े पर बुलाना (पृष्ठ 67), रात्रि में शव को न गाड़ना (पृष्ठ 77), सूतक के कारण क्षौरकर्म करना (पृष्ठ 91), मृत के लिए कब्र पर मांस एवं मद्य रखना (पृष्ठ 99-100), कब्रगाह में बपतिस्मा-रहित बच्चों, आत्महन्ताओं, पागलों एवं जातिच्युतों को न गाड़ने देना (पृष्ठ 143)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====प्रथम सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|14&amp;lt;/ref&amp;gt; में प्रथम सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#&amp;quot;(यजमान!) उस यम की पूजा करो, जो (पितरों का) राजा है, विवस्वान् का पुत्र है, (मृत) पुरुषों को एकत्र करने वाला है, जिसने (शुभ कर्म करने वाले) बहुतों के लिए मार्ग खोज डाला है और जिसने महान (अपार्थिव) ऊँचाइयाँ पार कर ली हैं। &lt;br /&gt;
#हम लोगों के मार्ग का ज्ञान सर्वप्रथम यम को हुआ; वह ऐसा चारागाह (निवास) है, जिसे कोई नहीं छीन सकता, वह वही निवास-स्थान है, जहाँ हमारे प्राचीन पूर्वज अपने-अपने मार्ग को जानते हुए गये। &lt;br /&gt;
#मातलि (इन्द्र के सारथि या स्वयं इन्द्र) 'काव्य' नामक (पितरों) के साथ, यम [[अंगिरस|अंगिरसों]] के साथ एवं [[बृहस्पति]] ऋक्वनों के साथ समृद्धिशाली होते हैं (शक्ति में वृद्धि पाते हैं); जिन्हें (अर्थात् पितरों को) देवगण आश्रय देते हैं और जो देवगण को आश्रय देते हैं; उनमें कुछ लोग (देवगण, इन्द्र तथा अन्य) स्वाहा से प्रसन्न होते हैं और अन्य लोग (पितर) स्वधा से प्रसन्न होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;काव्य, अंगिरस एवं ऋक्वन् लोग पितरों की विभिन्न कोटियों के द्योतक हैं। ऋग्वेद 7|10|4&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऋक्वन (गायक) लोग बृहस्पति से सम्बन्धित हैं। अन्य स्थानों पर वे विष्णु, अज-एकपाद एवं सोम से भी सम्बन्धित माने गये हैं। स्वाहा का उच्चारण देवगण को आहुति देते समय तथा स्वधा का उच्चारण पितरों को आहुति देते समय किया जाता है।&lt;br /&gt;
#हे यम! अंगिरस् नामक पितरों के साथ एकमत होकर इस [[यज्ञ]] में जाओ और (कुशों के) आसन पर बैठो। विज्ञ लोगों (पुरोहितों) द्वारा कहे जाने वाले मन्त्र तुम्हें (यहाँ) लायें। (राजन्!) इस आहुति से प्रसन्न होओ। &lt;br /&gt;
#हे यम! अंगिरसों एवं वैरूपों (के साथ जाओ) और आनन्दित होओ। मैं तुम्हारे पिता विवस्वान का आह्वान करता हूँ; यज्ञ में बिछे हुए कुशासन पर बैठकर (वे स्वयं आनन्दित हों)।&amp;lt;ref&amp;gt;वैरूप लोग अंगिरसों की उपकोटि में आते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
#अंगिरस, नवग्व, अथर्व एवं भृगु लोग हमारे पितर हैं और सोम से प्रीति रखते हैं। हमें उन श्रद्धास्पदों की सदिच्छा प्राप्त हो! हमें उनका कल्याणप्रद अनुग्रह भी प्राप्त हो! &lt;br /&gt;
#जिन मार्गों से हमारे पूर्वज गये, उन्हीं प्राचीन मार्गों से शीघ्रता करके जाओ। तुम लोग (अर्थात् मृत लोग) यम एवं वरुण नामक दो राजाओं को स्वेच्छापूर्वक आनन्द मनाते हुए देखो।&amp;lt;ref&amp;gt;यह और आगे आने वाले तीन मन्त्र मृत लोगों को सम्बोधित हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
#हे मृत! उच्चतम स्वर्ग में पितरों, यम एवं अपने इष्टापूर्त के साथ जा मिलो।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए इस ग्रन्थ का खण्ड 2, अध्याय 35, जहाँ इष्टापूर्त की व्याख्या उपस्थित की गई है। इष्टापूर्त का अर्थ है, यज्ञकर्मों (इष्ट) एवं दान-कर्मों (पूर्त) से उत्पन्न समन्वित आध्यात्मिक अथवा पारलौकिक फलोत्पत्ति।&amp;lt;/ref&amp;gt; अपने पापों को वहीं छोड़कर अपने घर को लौट जाओ! दिव्य ज्योति से परिपूर्ण हो (नवीन) शरीर से जा मिलो!&amp;lt;ref&amp;gt;पितृलोक के आनन्दों की उपलब्धि के लिए मृतात्मा के वायव्य शरीर की कल्पना की गयी है। यह ऋग्वेदीय कल्पना अपूर्व है।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
#हे दुष्टात्माओं! दूर हटो, प्रस्थान करो, इस स्थान (श्मशान) से अलग हट जाओ; पितरों ने उसके (मृत) के लिए यह स्थान (निवास) निर्धारित किया है। यम ने उसको यह विश्रामस्थान दिया है, जो जलों, दिवसों एवं रातों से भरा-पूरा है। &lt;br /&gt;
#हे मृतात्मा! शीघ्रता करो, अच्छे मार्ग से बढ़ते हुए सरमा की संतान (यम के) दो कुत्तों से, जिन्हें चार आंखें प्राप्त हैं, बचकर बढ़ो। इस प्रकार अपने पितरों के साथ पहुँचो, जो तुम्हें पहचान लेंगे और जो स्वयम् यम के साथ आनन्दोपभोग करते हैं। &lt;br /&gt;
#हे राजा यम! इसे (मृतात्मा को) उन अपने दो कुत्तों से, जो रक्षक हैं, चार-चार आंख वाले हैं, जो पितृलोक के मार्ग की रक्षा करते हैं और मनुष्यों पर दृष्टि रखते हैं, सुरक्षा दो। तुम इसको आनन्द और स्वास्थ्य दो। &lt;br /&gt;
#यम के दो दूत, जिनके नथुने चौड़े होते हैं, जो अति शक्तिशाली हैं और जिन्हें कठिनाई से संतुष्ट किया जा सकता है, मनुष्यों के बीच में विचरण करते हैं। वे दोनों (दूत) हमें आज वह शुभ जीवन फिर से प्रदान करें, जिससे कि हम सूर्य को देख सकें। &lt;br /&gt;
#हे पुरोहितों! यम के लिए सोमरस निकालो, यम को आहुति दो। वह यज्ञ, जिससे अग्नि देवों तक ले जाने वाला दूत कहा गया है और जो पूर्णरूपेण संन्नद्ध है, यम के पास पहुँचता है। &lt;br /&gt;
#पुरोहितों! घी-मिश्रित आहुतियों यम को दो और तब प्रारम्भ करो। वह हमें देवपूजा में लगे रहने दे, जिससे हमें लम्बी आयु प्राप्त हो। &lt;br /&gt;
#यमराज को अत्यन्त मधुर आहुति दो, यह प्रणाम उन ऋषियों को है, जो हमसे बहुत पहले उत्पन्न हुए थे और जिन्होंने हमारे लिए मार्ग बनाया। वह बृहत् (बृहत्साम) तीन यज्ञों में और छ: बृहत् विस्तारों में विचरता है। त्रिष्टुप्, गायत्री आदि छन्द-सभी यम में केन्द्रित हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====द्वितीय सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15&amp;lt;/ref&amp;gt; में द्वितीय सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#&amp;quot;सोम-निम्न, मध्यम या उत्तरतर श्रेणियों के स्नेही [[पितर]] लोग आगे आंयें, और वे पितर लोग भी जिन्होंने शाश्वत जीवन या मृतात्मा का रूप धारण किया है, कृपालु हों और आगे आयें, क्योंकि वे दयापूर्ण एवं ऋतु के ज्ञाता हैं। वे पितर लोग, जिनका हम आह्वान करें, हमारी रक्षा करें। &lt;br /&gt;
#आज हमारा प्रणाम उन पितरों को है जो (इस मृत के जन्म के पूर्व ही) चले गये या (इस मृत के जन्मोपरान्त) बाद को गये, और (हम उन्हें भी प्रणाम करते हैं) जो इस विश्व में विराजमान हैं या जो शक्तिशाली लोगों के बीच स्थान ग्रहण करते हैं। &lt;br /&gt;
#मैं उन पितरों को जान गया हूँ जो मुझे (अपना वंशज) पहचानेंगे और मैं विष्णु के पादन्यास एवं उनके बच्चे (अर्थात् अग्नि) को जान गया हूँ। वे पितर, जो कुशों पर बैठते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार हवि एवं सोम ग्रहण करते हैं, बारम्बार यहाँ आयें।&lt;br /&gt;
#हे कुशासन पर बैठने वाले पितर लोगों, (नीचे) अपनी रक्षा लेकर हमारी ओर आओ; हमने आपके लिए हवि तैयार कर रखी है; इन्हें ग्रहण करो। कल्याणकारी रक्षा के साथ आओ और ऐसा आनन्द दो जो दु:ख से रहित हो। &lt;br /&gt;
#कुश पर रखी हुई प्रिय निधियों (हव्यों) को ग्रहण करने के लिए आमन्त्रित सोमप्रिय पितर लोग आयें। वे हमारी स्तुतियाँ (यहाँ) सुने। वे हमारे पक्ष में बोलें और हमारी रक्षा करें। &lt;br /&gt;
#हे पितर लोगों, आप सभी, घुटने मोड़कर एवं हव्य की दायीं ओर बैठकर यज्ञ की प्रशंसा करें; मनुष्य होने के नाते हम आपके प्रति जो ग़लती करें, उसके लिए आप हमें पीड़ा न दें। &lt;br /&gt;
#पितर लोग अग्नि की दिव्य ज्वाला के सामने (उसकी गोद में) बैठकर मुझ मर्त्य यजमान को धन दें। आप मृत व्यक्ति के पुत्रों को धन दें और उन्हें शक्ति दें।&lt;br /&gt;
#यम हमारे जिन पुराने एवं समृद्ध पितरों संगीत का आनन्द उठाते हैं, वे सोमपान के लिए एक-एक करके आयें, जो यशस्वी थे और जिनकी संगति में (पितरों के राजा) यम को आनन्द मिलता है, वह (हमारे द्वारा दिये गये) हव्य स्वेच्छापूर्वक ग्रहण करें।&lt;br /&gt;
#हे अग्नि, उन पितरों के साथ जाओ, जो तृषा से व्याकुल थे और (देवों के लोकों में पहुँचने में) पीछे रह जाते थे, जो यज्ञ के विषय में जानते थे और जो स्तुतियों के रूप में स्तोमों के प्रणेता थे, जो हमें भली-भाँति जानते थे, वे (हमारी पुकार) अवश्य सुनते हैं। जो काव्य नामक हवि ग्रहण करते हैं और जो गर्म दूध के चतुर्दिक बैठते हैं। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि, उन अवश्य आने वाले पितरों के साथ पहले और समय से कालान्तर में जाओ और जो (दिये हुए) हव्य ग्रहण करते हैं, जो हव्य का पान करते हैं, जो उसी रथ में बैठते हैं, जिसमें इन्द्र एवं अन्य देव विराजमान हैं, जो सहस्रों की संख्या में देवों को प्रणाम करते हैं और जो गर्म दूध के चतुर्दिक बैठते हैं। &lt;br /&gt;
#हे अग्निष्वात्त नामक पितर लोगों, जो अच्छे पथप्रदर्शक कहे जाते हैं, (इस यज्ञ में) आओ और अपने प्रत्येक उचित आसन पर विराजमान होओ। (दिये हुए) पवित्र हव्य को, जो कुश पर रखा हुआ है, ग्रहण करो और शूर पुत्रों के साथ समृद्धि दो। &lt;br /&gt;
#हे जातवेदा अग्नि, (हम लोगों द्वारा) प्रशंसित होने पर, हव्यों को स्वादयुक्त बना लेने पर और उन्हें लाकर (पितरों को) दे देने पर वे उन्हें अभ्यासवश ग्रहण करें। हे देव, आप पूत हव्यों को खायें। &lt;br /&gt;
#हे जातवेदा, आप जानते हैं कि कितने पितर हैं, यथा-वे जो यहाँ (पास) हैं, जो यहाँ नहीं हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं जानते हैं (क्योंकि वे हमारे ऊपर दूर के पूर्वज हैं)। आप इस भली प्रकार बने हुए हव्य को अपने आचरण के अनुसार कृपा कर ग्रहण करें। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि, उनके (पितरों के) साथ जो (जिनके शरीर) अग्नि से जला दिये गए थे, जो नहीं जलाये गए थे और जो स्वधा के साथ आनन्दित होते हैं, आप मृत की इच्छा के अनुसार शरीर की व्यवस्था करें, जिससे नये जीवन (स्वर्ग) में उसे प्रेरणा मिले।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====तृतीय सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|16&amp;lt;/ref&amp;gt; में तृतीय सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#&amp;quot;हे अग्नि! इस (मृत व्यक्ति ?) को न जलाओ, चतुर्दिक इसे न झुलाओ, इसके चर्म (के भागों को) इतस्तत: न फेंको; हे जातवेदा (अग्नि)! जब तुम इसे भली प्रकार जला लो तो इसे (मृत को) पितरों के यहाँ भेज दो। &lt;br /&gt;
#हे जातवेदा! जब तुम इसे पूर्णरूपेण जला लो तो इसे पितरों के अधीन कर दो। जब यह (मृत व्यक्ति) उस मार्ग का अनुसरण करता है, जो इसे (नव) जीवन की ओर ले जाता है, तो यह वह हो जाये जो देवों की अभिलाषाओं को होता है। &lt;br /&gt;
#तुम्हारी आंखें सूर्य की ओर जायें, तुम्हारी साँस हवा की ओर जाये और तुम अपने गुणों के कारण स्वर्ग या पृथिवी को जाओ या तुम जल में जाओ, यदि तुम्हें वहाँ आनन्द प्राप्त हो (या यदि यहीं तुम्हारा भाग्य हो तो), अपने सारे अंगों के साथ तुम ओषधियों (जड़ी-बूटियों) में विराजमान होओ। &lt;br /&gt;
#हे जातवेदा, तुम उस बकरी को जला डालो, जो तुम्हारा भाग है, तुम्हारी ज्वाला, तुम्हारा दिव्य प्रकाश उस बकरी को जला डाले;&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद (10।16।4)......अजो भाग:-इससे उस बकरी की ओर संकेत है, जो शव के साथ ले जायी जाती थी। और देखिए ऋग्वेद (10|6|7), जहाँ शव के साथ गाय के जलाने की बात कही गयी है।&amp;lt;/ref&amp;gt; तुम इसे (मृत को) उन लोगों के लोक में ले जाओ, जो तुम्हारे कल्याणकारी शरीरों (ज्वालाओं) के द्वारा अच्छे कर्म करते हैं। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि, (इस मृत को) पितरों की ओर छोड़ दो, यह जो तुम्हें अर्पित है, चारों ओर धूम रहा है। हे जातवेदा, यह (नव) जीवन ग्रहण करे और अपने हव्यों को बढ़ाये तथा एक नवीन (वायव्य) शरीर से युक्त हो जाए। &lt;br /&gt;
#हे मृत व्यक्ति! वह अग्नि जो सब कुछ जला डालता है, तुम्हारे उस शरीरांग को दोषमुक्त कर दे, जो काले पक्षी (कौआ) द्वारा काट लिया गया है, या जिसे चींटी या सर्प या जंगली पशु ने काटा है, और ब्राह्मणों में प्रविष्ट सोम भी यही करे। &lt;br /&gt;
#हे मृत व्यक्ति! तुम गायों के साथ अग्नि का कवच धारण करो (अर्थात् अग्नि की ज्वालाओं से बचने के लिए गाय का चर्म धारण करो) और अपने को मोटे मांस से छिपा लो, जिससे (वह अग्नि) जो अपनी ज्वाला से घेर लेता है, जो (वस्तुओं को नष्ट करने में) आनन्दित होता है, जो तीक्ष्ण है और पूर्णतया भस्म कर देता है, (तुम्हारे भागों को) इधर-उधर बिखेर न दे। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि, इस प्याले को, जो देवों को एवं सोमप्रिय (पितरों) को प्रिय है, नष्ट न करो। इस चमस (चम्मच या प्याले) में, जिससे देव पीते हैं, अमर देव लोग आनन्द लेते हैं। &lt;br /&gt;
#जो अग्नि कच्चे मांस का भक्षण करता है, मैं उसे बहुत दूर भेज देता हूँ, वह अग्नि जो दुष्कर्मों (पापों) को ढोता है, यम लोक को जाए! दूसरा अग्नि (जातवेदा), जो सब कुछ जानता है, देवों को अर्पित हव्य ग्रहण करे। &lt;br /&gt;
#मैं, पितरों को हव्य देने के हेतु (जातवेदा) अग्नि को निरीक्षित करता हुआ, कच्चा मांस खाने वाले अग्नि को पृथक करता हूँ, जो तुम्हारे घर में प्रविष्ट हुआ था; वह (दूसरा अग्नि) धर्म (गर्म दूध या हव्य) को उच्चतम लोक की ओर प्रेरित करे।&amp;lt;ref&amp;gt;यह मन्त्र कुछ जटिल है। यदि इस मन्त्र के शाब्दिक अर्थ पर ध्यान दें तो प्रकट होता है कि 'क्रव्याद्' अग्नि पितृयज्ञ में प्रयुक्त होती है। ऐसा कहना सम्भव है कि 'क्रव्याद्' अग्नि को अपवित्र माना जाता था और वह साधारण या यज्ञिय अग्नि से पृथक थी।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
#वह अग्नि जो हव्यों को ले जाता है, ऋत के अनुसार समृद्धि पाने वाले पितरों को उसे दे। वह देवों एवं पितरों को हव्य दे। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि! हमने, जो तुम्हें प्यार करते हैं, तुम्हें प्रतिष्ठापित किया है और जलाया है। तुम प्यारे पितरों को यहाँ ले आओ, जो हमें प्यार करते हैं और वे हव्य ग्रहण करें। &lt;br /&gt;
#हे अग्नि! तुम उस स्थल को, जिसे तुमने शवदाह में जलाया, (जल से) बुझा दो। कियाम्बु (पौधा) यहाँ उगे और दूर्वा घास अपने अंकुरों को फैलाती हुई यहाँ उगे। &lt;br /&gt;
#हे शीतिका (शीतल पौधे), हे शीतलाप्रद औषधि, हे ह्लादिका (तरोताजा करने वाली बूटी) आनन्द बिखेरती हुई मेढकी के साथ पूर्णरूपेण घुल-मिल जाओ। तुम इस अग्नि का आनन्दित करो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====चतुर्थ सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|17&amp;lt;/ref&amp;gt; में चतुर्थ सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
इस सूक्त के तीन से लेकर छ: तक के मन्त्रों को छोड़कर अन्य मन्त्र अन्त्येष्टि पर प्रकाश नहीं डालते, अत: हम केवल चार मन्त्रों को ही अनूदित करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1, 2. प्रथम दो मन्त्र त्वष्टा की कन्या एवं विवस्वान् के विवार एवं विवस्वान् से उत्पन्न यम एवं यमी के जन्म की ओर संकेत करते हैं। निरुक्त&amp;lt;ref&amp;gt;निरुक्त 12|10-11&amp;lt;/ref&amp;gt; में दोनों की व्याख्या विस्तार से दी हुई है। सरस्वती की स्तुति वाले मन्त्र (7-9) [[अथर्ववेद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अथर्ववेद]] 18|1|41-43&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पाये जाते हैं। और कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  81-39&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन्हें अथर्ववेद&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद 7|68|1-2 एवं 18|3|25&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ अन्त्येष्टि कृत्य के लिए प्रयुक्त किया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. &amp;quot;सर्वविज्ञ पूषा, जो पशुओं को नष्ट नहीं होने देता और विश्व की रक्षा करता है, तुम्हें इस लोक से (दूसरे लोक में) भेजे। वह तुम्हें इन पितरों के अधीन कर दे और अग्नि तुम्हें जानने वाले देवों के अधीन कर दे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. वह पूषा जो इस विश्व का जीवन है, जो स्वयं जीवन है, तुम्हारी रक्षा करे। वे लोग जो तुमसे आगे गये हैं (स्वर्ग के) मार्ग में तुम्हारी रक्षा करें। सविता देव तुम्हें वहाँ प्रतिष्ठापित करे, जहाँ सुन्दर कर्म करने वाले जाकर निवास करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. पूषा इन सभी दिशाओं को क्रम से जानता है। वह हमें उस मार्ग से ले चले, जो भय से रहित है। वह समृद्धिदाता है, प्रकाशमान है, उसके साथ सभी शूरवीर हैं; वह विज्ञ हमारे आगे बिना किसी त्रुटि के बढ़े। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
6. पूषा (पितृलोक में जाने वाले) मार्गों के सम्मुख स्थित है, वह स्वर्ग को जाने वाले मार्गों और पृथिवी के मार्गों पर खड़ा है। हमको प्रिय लगने वाला वह दोनों लोकों के सम्मुख खड़ा है और वह विज्ञ दोनों लोकों में आता-जाता रहता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====पंचम सूक्त====&lt;br /&gt;
ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|18&amp;lt;/ref&amp;gt; में पंचम सूक्त का वर्णन इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#&amp;quot;हे मृत्यु! उस मार्ग की ओर हो जाओ, जो तुम्हारा है और देवयान से पृथक है। मैं तुम्हें, जो आंखों एवं कानों से युक्त हो, सम्बोधित करता हूँ। हमारी सन्तानों को पीड़ा न दो, हमारे वीर पुत्रों को हानि न पहुँचाओ। &lt;br /&gt;
#हे यज्ञ करने वाले (याज्ञिक) हमारे सम्बन्धीगण! क्योंकि तुम मृत्यु के पदचिह्नों को मिटाते हुए आये हो और अपने लिए दीर्घ जीवन प्रतिष्ठापित कर चुके हो तथा समृद्धि एवं सन्तानों से युक्त हो, तुम पवित्र एवं शुद्ध बनो। &lt;br /&gt;
#ये जीवित (सम्बन्धी) मृत से पृथक हो पीछे घूम गये हैं; आज के दिन देवों के प्रति हमारा आह्वान कल्याणकारी हो गया। तब हम नाचने के लिए, (बच्चों के साथ) हँसने के लिए और दीर्घ जीवन को दृढ़ता से स्थापित करते हुए आगे गये। &lt;br /&gt;
#मैं जीवित (सम्बन्धियों, पुत्र आदि) की रक्षा के लिए यह बाधा (अवरोध) रख रहा हूँ, जिससे कि अन्य लोक (इस मृत व्यक्ति के) लक्ष्य को न पहुँचे। वे सौ शरदों तक जीवित रहें। वे इस पर्वत (पत्थर) के द्वारा मृत्यु को दूर रखें। &lt;br /&gt;
#हे धाता! बचे हुए लोगों को उसी प्रकार सम्भाल के रखो, जिस प्रकार दिन के उपरान्त दिन एक-एक क्रम में आते रहते हैं, जिस प्रकार अनुक्रम से ऋतुएँ आती हैं, जिससे कि छोटे लोग अपने बड़े (सम्बन्धी) को न छोड़ें। &lt;br /&gt;
#हे बचे हुए लोगों, बुढ़ापा स्वीकार कर दीर्घ आयु पाओ, क्रम से जो भी तुम्हारी संख्याएँ हो (वैसा ही प्रयत्न करो कि तुम्हें लम्बी आयु मिले); भद्र जन्म वाला एवं कृपालु त्वष्टा तुम्हें यहाँ (इस विश्व में) दीर्घ जीवन दे। &lt;br /&gt;
#ये नारियाँ, जिनके पति योग्य एवं जीवित हैं, आँखों में अंजन के समान घृत लगाकर घर में प्रवेश करें। ये पत्नियाँ प्रथमत: सुसज्जित, अश्रुहीन एवं पीड़ाहीन हो घर में प्रवेश करे। &lt;br /&gt;
#हे (मृत की) पत्नी! तुम अपने को जीवित (पुत्रों एवं अन्य सम्बन्धी) लोगों के लोक की ओर उठाओ; तुम उस (अपने पति) के निकट सोयी हुई हो, जो मृत है; आओ, तुम पत्नीत्व के प्रति सत्य रही हो और उस पति के प्रति, जिसने पहले (विवाह के समय) तुम्हारा हाथ पकड़ा था और जिसने तुम्हें भली-भाँति प्यार किया, सत्य रही हो। &lt;br /&gt;
#(मैं) मृत (क्षत्रिय) के हाथ से प्रण करता हूँ, जिससे कि हममें सैनिक वीरता, दिव्यता एवं शक्ति आये। तुम (मृत) वहाँ और हम यहाँ शूर पुत्र पायें और यहाँ सभी आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय पायें। &lt;br /&gt;
#हे मृत! इस विशाल एवं सुन्दर माता पृथिवी के पास आओ। यह नयी (पृथिवी), जिसने तुम्हें भेंट दी और तुम्हें मृत्यु की गोद से सुरक्षित रखा, तुम्हारे लिए ऊन के समान मृदु लगे। &lt;br /&gt;
#हे पृथिवी! ऊपर उठ जाओ, इसे न दबाओ, इसके लिए सरल पहुँच एवं आश्रय बनो, और इस (हड्डियों के रूप में मृत व्यक्ति) को उसी प्रकार ढँको, जिस प्रकार माता अपने आँचल से पुत्र को ढँकती है। &lt;br /&gt;
#पृथिवी ऊपर उठे और अटल रहे। सहस्रों स्तम्भ इस घर को सम्भाले हुए खड़े रहें। ये घर (मिट्टी के खण्ड) उसे भोजन दें। वे यहाँ सभी दिनों के लिए उसके हेतु (हड्डियों के रूप में मृत के लिए) आश्रय बनें। &lt;br /&gt;
#मैं तुम्हारे चारों ओर तुम्हारे लिए मिट्टी का आश्रय बना दे रहा हूँ। मिट्टी का यह खण्ड रखते समय मेरी कोई हानि न हो। पितर लोग इस स्तम्भ को अटल रखें। यम तुम्हारे लिए यहाँ आसनों की व्यवस्था कर दें। &lt;br /&gt;
#देवगण ने मुझे दिन में रखा है, जो पुन: तीर के पंख के समान (कल के रूप में) लौट आयेगा; (अत:) मैं अपनी वाणी उसी प्रकार रोक रहा हूँ, जिस प्रकार कोई लगाम से घोड़ा रोकता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====ऋग्वेद में पितृ-यज्ञ====&lt;br /&gt;
यह अवलोकनीय है कि 'पितृ-यज्ञ' शब्द ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|16|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है। इसका क्या तात्पर्य है? हमें यह स्मरण रखना है कि ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15-18&amp;lt;/ref&amp;gt; की ऋचाएँ किसी एक व्यक्ति के मरने के उपरान्त के कृत्यों की ओर संकेत करती है। उनका सम्बन्ध पूर्वपुरुषों की श्राद्ध-क्रियाओं से नहीं है। पूर्वपुरुषों से, जिन्हें बर्हिषद: एवं अग्निष्वात्तात्&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15|3-4, 11&amp;lt;/ref&amp;gt; कहा गया है, तुरन्त के मृतात्मा के प्रति स्नेह प्रदर्शित करने के लिए उत्सुकता अवश्य प्रकट की गयी है। पूर्वपुरुषों को 'हवि:' दिया गया है और वे उसे ग्रहण करते हैं, ऐसा प्रदर्शित किया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15|11-12&amp;lt;/ref&amp;gt; तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1|8|5&amp;lt;/ref&amp;gt; में दिये गये मन्त्रों के उद्देश्य&amp;lt;ref&amp;gt;जो साकमेघ में सम्पादित पितृयज्ञ की ओर संकेत करता है&amp;lt;/ref&amp;gt; से उपर्युक्त ऋग्वेदीय मन्त्रों का उद्देश्य पृथक है। यह बात ठीक है कि तैत्तिरीय संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;तैत्तिरीय संहिता 1|8|5&amp;lt;/ref&amp;gt; के तीन मन्त्र ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|57|3-5&amp;lt;/ref&amp;gt; के हैं और वे पिण्ड-पितृयज्ञ में प्रयुक्त होते हैं। किन्तु यह कहने के लिए कोई तर्क नहीं है कि ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|15|10&amp;lt;/ref&amp;gt; का 'पितृयज्ञ', पिण्ड-पितृयज्ञ से अधिक प्राचीन है। यह सम्भव है कि ये दोनों विभिन्न बातों की ओर संकेत करते हुए समकालिक प्रचलन के ही द्योतक हों।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सूत्रग्रंथों के अनुसार मरणोपरांत कृत्य==&lt;br /&gt;
====आश्वलायन श्रौतसूत्र के अनुसार====&lt;br /&gt;
सोमयज्ञ या सत्र के लिए दीक्षित व्यक्ति के (यज्ञ-समाप्ति के पूर्व ही) मर जाने पर जो कृत्य होते थे, उनका वर्णन [[आश्वलायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[आश्वलायन श्रौतसूत्र]] 6|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में हुआ है। इसमें आया है-&amp;quot;जब दीक्षित मर जाता है, तो उसके शरीर को वे तीर्थ से ले जाते हैं, उसे उस स्थान पर रखते हैं, जहाँ अवभृथ&amp;lt;ref&amp;gt;सोमयज्ञ या सत्र-यज्ञ की परिसमाप्ति पर स्नान&amp;lt;/ref&amp;gt; होने वाला था और उसे उन अलंकरणों से सजाते हैं, जो बहुधा शव पर रखे जाते हैं। वे शव के सिर, चेहरे एवं शरीर के बाल और नख काटते हैं। वे नलद (जटामांसी) का लेप लगाते हैं और शव पर नलदों का हार चढ़ाते हैं। कुछ लोग अँतड़ियों को काटकर उनसे मल निकाल देते हैं और उनमें पृषदाज्य (मिश्रित घृत एवं दही) भर देते हैं। वे शव के पाँव के बराबर नवीन वस्त्र का एक टुकड़ा काट लेते हैं और उससे शव को इस प्रकार ढँक देते हैं कि अंचल पश्चिम दिशा में पड़ जाता है (शव पूर्व में रखा रहता है) और शव के पाँव खुले रहते हैं। कपड़े के टुकड़े का भाव पुत्र आदि ले लेते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शव के वस्त्र को 'शव वस्त्रम्‌' या 'शव आच्छादनम्‌' कहते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में '[[कफ़न]]' (अरबी भाषा) कहते हैं।'''&lt;br /&gt;
{{seealso|कफ़न}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृत की श्रौत अग्नियाँ अरणियों पर रखी रहती हैं, शव को वेदि से बाहर लाया जाता है और दक्षिण की ओर ले जाते हैं, [[घर्षण]] से अग्नि उत्पन्न की जाती है और उसी में शव जला दिया जाता है। श्मशान से लौटने पर उन्हें दिन का कार्य समाप्त करना चाहिए। दूसरे दिन प्रात: शस्त्रों का पाठ, स्तोत्रों का गायन एवं सस्तवों (समवेत रूप में मन्त्रपाठ) का गायन बिना दुहराये एवं बिना 'हिम्' स्वर उच्चारित किये होता है। उसी दिन पुरोहित लोग ग्रहों (प्यालों) को लेने के पूर्व तीर्थों से आते हैं, दाहिने हाथ को ऊँचा करके श्मशान की परिक्रमा करते हैं और निम्न प्रकार से उसके चतुर्दिक बैठ जाते हैं; होता श्मशान के पश्चिम में, अध्वर्यु उत्तर में, अद्गाता अध्वर्यु के पश्चिम और ब्रह्मा दक्षिण में। इसके उपरान्त धीमे स्वर में 'आयं गौ: पृश्निरक्रमीत्' से आरम्भ होने वाला मन्त्र गाते हैं। गायन समाप्त होने के उपरान्त होता अपने बायें हाथ को श्मशान की ओर करके श्मशान की तीन परिक्रमा करता है और बिना 'ओम' का उच्चारण किये उद्गाता के गायन तुरंत पश्चात् धीमें स्वर में स्तोत्रिय का पाठ करता है और निम्न मन्त्रों को, जो यम एवं याम्यायनों (ऋषियों या प्रणेताओं) के मन्त्र हैं, कहता है; यथा-ऋग्वेद।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|14|7-8, 10-11; 10|16|1-6; 10|17-3-6; 10|18|10-13; 10|154|1-5&amp;lt;/ref&amp;gt;उन्हें ऋग्वेद&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10|14|10&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ समाप्त करना चाहिए और इसके उपरान्त किसी घड़े में अस्थियाँ एकत्र करनी चाहिए, घड़े को तीर्थ की तरफ़ से ले जाना चाहिए और उस आसन पर रखना चाहिए, जहाँ मृत यजमान बैठता था।&amp;lt;ref&amp;gt;चात्वाल एवं उत्कर के मध्य वाले यज्ञ-स्थान को जाने वाला मार्ग तीर्थ कहा जाता है। देखिए इस ग्रन्थ का खण्ड 2, अध्याय 29। स्तोत्रिय के लिए देखिए खण्ड 2, अध्याय 33। शतपथ ब्राह्मण (12|5|2|5) ने मृत व्यक्ति के शरीर से सभी गन्दे पदार्थों के निकाल देने की परम्परा की ओर संकेत किया है, किन्तु इसे अकरणीय ठहराया है। उसका इतना ही कथन है-'उसके भीतर को स्वच्छ कर लेने के उपरान्त वह उस पर घृत का लेप करता है और इस प्रकार शरीर को यज्ञिय रूप में पवित्र कर देता है।'&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====अन्य श्रौतसूत्रों के अनुसार====&lt;br /&gt;
[[शांखायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शांखायन श्रौतसूत्र]] 4|14-15&amp;lt;/ref&amp;gt; ने आहिताग्नि की अन्त्येष्टि-क्रिया के विषय में विस्तार के साथ लिखा है। [[कात्यायन श्रौतसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कात्यायन श्रौतसूत्र]] 25|7&amp;lt;/ref&amp;gt; ने यही बातें संक्षेप में कही है। कात्यायन श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कात्यायन श्रौतसूत्र 25|7|18&amp;lt;/ref&amp;gt; ने केश एवं नख काटने एवं मल पदार्थ निकाल देने की चर्चा की है। कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 80.13-16&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं शांखायन श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायन श्रौतसूत्र 4.14.4-5&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी इन सब बातों की ओर संकेत किया है और इतना जोड़ दिया है कि यदि वे दाहिनी ओर से अँतड़ियाँ काटकर निकालते हैं, तो उन्हें पुन: दर्भ से सी देते हैं या वे केवल शरीर को स्नान करा देते हैं (बिना मल स्वच्छ किये), उसे वस्त्र से ढँक देते हैं, सँवारते हैं, आसन्दी पर, जिस पर काला मृगचर्म&amp;lt;ref&amp;gt;जिसका मुख वाला भाग दक्षिण की ओर रहता है&amp;lt;/ref&amp;gt; बिछा रहता है, रख देते हैं, उस पर नलद की माला रख देते हैं,&amp;lt;ref&amp;gt;प्रयोगरत्न के सम्पादक ने नलद को उशीर कहा है। कुछ ग्रन्थों में नलद के स्थान पर जपा पुष्प की बात कही गयी है।&amp;lt;/ref&amp;gt; और उसे नवीन वस्त्र से ढँक देते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;जैसा कि ऊपर आश्वलायनश्रौतसूत्र के अनुसार लिखा गया है&amp;lt;/ref&amp;gt; सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 28.1.22&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं गौतमपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतमपितृमेधसूत्र 1.10-14&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी ऐसी बातें दी हुई हैं और यह भी है कि शव के हाथ एवं पैर के अँगूठे श्वेत सूत्रों या वस्त्र के अंचल भाग से बाँध दिये जाते हैं और आसन्दी&amp;lt;ref&amp;gt;वह छोटा सा पंलग या कुर्सी जिस पर शव रखकर ढोया जाता है&amp;lt;/ref&amp;gt; उदुम्बर लकड़ी की बनी होती है। कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 80.3.3.45&amp;lt;/ref&amp;gt; ने अथर्ववेद के बहुत-से मन्त्रों का उल्लेख किया है, जो चिता जलाने पर एवं हवि देते समय कहे जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र 18.2.4 एवं 36; 18.3.4; 18.1.49-50 एवं 58; 18.1.41-43; 7.68.1-2; 18.3.25; 18.2.4-18; (18.2.10 को छोड़कर); 18.4.1-15 आदि।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====शवदहन प्रक्रिया====&lt;br /&gt;
शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 12.5.2.14&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि पत्थर एवं मिट्टी के बने यज्ञ-पात्र किसी [[ब्राह्मण]] को दान दे देने चाहिए, किन्तु लोग मिट्टी के पात्रों को शववाहन समझते हैं, अत: उन्हें जल में फेंक देना चाहिए। अनुस्तरणी (बकरी या गाय) की वपा (वसा या चर्बी) निकालकर उससे (अन्त्येष्टि क्रिया करने वाले द्वारा) मृत के मुख एवं सिर को ढँक देना चाहिए और ऐसा करते समय 'अग्नेर्वर्म'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.16.7&amp;lt;/ref&amp;gt; का पाठ करना चाहिए। पशु के दोनों वृक्क निकालकर मृत के हाथों में रख देने चाहिए-दाहिना वृक्क दाहिने हाथ में और बायाँ बायें हाथ में-और 'अतिद्रव'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.14.10&amp;lt;/ref&amp;gt; का केवल एक बार पाठ करना चाहिए। वह पशु के हृदय को शव के हृदय पर रखता है, '''कुछ लोगों के मत से भात या जौ के आटे के दो पिण्ड भी रखता है।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार अनुस्तरणी पशु को कान के पास घायल करके मारा जाता है। जातूकर्ण्य के मत से शव के विभिन्न भागों पर पशु के उन्हीं भागों के अंग रखे जाते हैं। किन्तु कात्यायन इसे नहीं मानते, क्योंकि ऐसा करने पर जलाने के पश्चात् अस्थियों को एकत्र करते समय पशु की अस्थियाँ भी एकत्र हो जायेंगी, अत: उनके मत से केवल मांस भाग ही शव के अंगों में लगाना चाहिए। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण (12.5.9-12)&amp;lt;/ref&amp;gt; आश्वलायनगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायनगृह्यसूत्र (4.2.4)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कहा है कि पशु का प्रयोग विकल्प से होता है,&amp;lt;ref&amp;gt;नारायण की व्याख्यानुसार&amp;lt;/ref&amp;gt; अर्थात् या तो पशु काटा जा सकता है या छोड़ दिया जा सकता है '''या किसी ब्राह्मण को दे दिया जा सकता है'''&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 1.10.2 भी&amp;lt;/ref&amp;gt;। शांखायनश्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायनश्रौतसूत्र (4.14.14-15)&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि मारे गये या जीवित पशु के दोनों वृक्क पीछे से निकालकर दक्षिण अग्नि में थोड़ा गर्म करके मृत के दोनों हाथों में रख देने चाहिए और 'अतिद्रव'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.14.10-11&amp;lt;/ref&amp;gt; का पाठ करना चाहिए। शव के अंगों पर पशु के वही अंग काट-काटकर रख देता है और पुन: उसकी खाल से शव को ढँककर प्रणीता के जल को आगे ले जाते समय वह (अन्त्येष्टि कर्म करने वाला) 'इमम् अग्ने'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.16.8&amp;lt;/ref&amp;gt; का आह्वान के रूप में पाठ करता है। अपना बायाँ घुटना मोड़कर वह दक्षिण-अग्नि में घृत की चार आहुति यह कहकर डालता है-'अग्नि को स्वाहा! सोम को स्वाहा! लोक को स्वाहा! अनुमति को स्वाहा!' पाँचवीं आहुति शव की छाती पर यह कहकर दी जाती है, 'जहाँ से तू उत्पन्न हुआ है! वह तुझसे उत्पन्न हो, न न। स्वर्गलोक को स्वाहा'।&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 25.22&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके उपरान्त आश्वलायन गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आश्वलायन गृह्यसूत्र 4.4.2-5&amp;lt;/ref&amp;gt; यह बताता है कि यदि आहवनीय अग्नि या गार्हपत्य या दक्षिण अग्नि शव के पास प्रथम पहुँचती है या सभी अग्नियाँ एक साथ ही शव के पास पहुँचती हैं, तो क्या समझना चाहिए; और जब शव जलता रहता है तो वह उस पर मन्त्रपाठ करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.14.7 आदि&amp;lt;/ref&amp;gt; जो व्यक्ति यह सब जानता है, उसके द्वारा जलाये जाने पर धूम के साथ मृत व्यक्ति स्वर्गलोक जाता है, ऐसा ही (श्रुति से) ज्ञात है। 'इमे जीवा:'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.18.3&amp;lt;/ref&amp;gt; के पाठ के उपरान्त सभी (सम्बन्धी) लोग दाहिने से बायें घूमकर बिना पीछे देखे चल देते हैं। वे किसी स्थिर जल के स्थल पर जाते हैं और उसमें एक बार डुबकी लेकर और दोनों हाथों को ऊपर करके मृत का गौत्र, नाम उच्चारित करते हैं, बाहर आते हैं, दूसरा वस्त्र पहनते हैं, एक बार पहने हुए वस्त्र को निचोड़ते हैं और अपने कुरतों के साथ उन्हें उत्तर की ओर दूर रखकर वे तारों के उदय होने तक बैठे रहते हैं या सूर्यास्त का एक अंश दिखाई देता है तो वे घर लौट आते हैं, छोटे लोग पहले और बूढे लोग अन्त में प्रवेश करते हैं। घर लौटने पर वे पत्थर, अग्नि, गोबर, भुने जौ, तिल एवं जल स्पर्श करते हैं। और&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण (13.8.4.5) एवं वाजसनेयी संहिता (35-14, ऋग्वेद 1.50.10)&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ अन्य कृत्य भी दिये गये हैं, यथा स्नान करना, जल-तर्पण करना, बैल को छूना, आंख में अंजन लगाना तथा शरीर में अंगराग लगाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====अग्निहोत्र==== &lt;br /&gt;
शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 13.8.4.11&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पारस्कर गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्कर गृह्यसूत्र 3.10.10&amp;lt;/ref&amp;gt; ने स्पष्ट लिखा है कि जिसका [[उपनयन संस्कार]] हो चुका है, उसकी अन्त्येष्टि क्रिया उसी प्रकार की जाती है, जिस प्रकार श्रौत अग्निहोत्र करने वाले व्यक्ति की, अन्तर केवल इतना होता है कि आहिताग्नि तीनों वैदिक अग्नियों के साथ जला दिया जाता है, जिसके पास केवल स्मार्त अग्नि या औपासन अग्नि होती है, वह उसके साथ जला दिया जाता है और साधारण लोगों का शव केवल साधारण अग्नि से जलाया जाता है। देवल का कथन है कि साधारण अग्नि के प्रयोग में चाण्डाल की अग्नि या अशुद्ध अग्नि या सूतकगृह-अग्नि या पतित के घर की अग्नि या चिता की अग्नि का व्यवहार नहीं करना चाहिए। पितदयिता के मत से जिसने अग्निहोत्र न किया हो, उसके लिए 'अस्मात् त्वम् आदि' मन्त्र का पाठ नहीं करना चाहिए। पारस्कर गृह्यसूत्र ने व्यवस्था दी है कि एक ही गाँव के रहने वाले सम्बन्धी एक ही प्रकार का कृत्य करते हैं, वे एक ही वस्त्र धारण करते हैं, यज्ञोपवीत को दाहिने कंधे से लटकाते हैं और बायें हाथ की चौथी अँगुली से वाजसनेयी संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी संहिता 35.6&amp;lt;/ref&amp;gt; के साथ जल तर्पण करते हैं तथा दक्षिणाभिमुख होकर जल में डुबकी लेते हैं और अंजलि से एक बार जल तर्पण करते हैं। &lt;br /&gt;
====परिवारजनों द्वारा स्नान====&lt;br /&gt;
[[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[आपस्तम्ब धर्मसूत्र]] 2.6.15.2-7&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जब किसी व्यक्ति की माता या पिता की सातवीं पीढ़ी के सम्बन्धी या जहाँ तक वंशावली ज्ञात हो, वहाँ तक के व्यक्ति मरते हैं, तो एक वर्ष से छोटे बच्चों को छोड़कर सभी लोगों को स्नान करना चाहिए। जब एक वर्ष से कम अवस्था वाला बच्चा मरता है तो माता-पिता एवं उनको जो बच्चे का शव ढोते हैं, स्नान करना चाहिए। उपर्युक्त सभी लोगों को बाल नहीं सँवारने चाहिए, बालों से धूल हटा देनी चाहिए, एक ही वस्त्र धारण करना चाहिए, दक्षिणाभिमुख होना चाहिए, पानी में डुबकी लगानी चाहिए, मृत को तीन बार जल तर्पण करना चाहिए और नदी या जलाशय के पास बैठ जाना चाहिए। इसके पश्चात् गाँव को लौट जाना चाहिए तथा स्त्रियाँ जो कुछ कहें उसे करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;अग्नि, पत्थर, बैल आदि स्पर्श करना चाहिए&amp;lt;/ref&amp;gt; याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.2&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी ऐसे नियम दिये हैं और 'अप न: शोशुचद् अघम्'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.97.1; अथर्ववेद 4.33.1 एवं [[तैत्तिरीय आरण्यक|तैत्तिरीयारण्यक]] 6.10.1&amp;lt;/ref&amp;gt; के पाठ की व्यवस्था दी है। &lt;br /&gt;
====गौतमपितृमेधसूत्र के मत से चिता का निर्माण====&lt;br /&gt;
गौतमपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतमपितृमेधसूत्र 2.23&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से चिता का निर्माण यज्ञिय वृक्ष की लकड़ी से करना चाहिए और सपिण्ड लोग जिनमें स्त्रियाँ और विशेषत: कम अवस्था वाली सबसे आगे रहती हैं। चिता पर रखे गये शव पर अपने वस्त्र के अन्तभाग (आँचल) से हवा करते हैं, अन्त्येष्टि क्रिया करने वाला एक जलपूर्ण घड़ा लेता है और अपने सिर पर दर्भेण्डु रखता है और तीन बार शव की परिक्रमा करता है। पुरोहित घड़े पर एक पत्थर (अश्म) या कुल्हाड़ी से धीमी चोट करता है और 'इमा आप: आदि' का पाठ करता है। जब टूटे घड़े से जल की धार बाहर निकलने लगती है तो मन्त्र के शब्दों में कुछ परिवर्तन हो जाता है, यथा 'अस्मिन् लोके' के स्थान पर 'अन्तरिक्षे आदि'। अन्त्येष्टिकर्ता खड़े रूप में जलपूर्ण घड़े को पीछे फेंक देता है। इसके उपरान्त 'तस्मात् त्वमधिजातोसि......असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' के पाठ के साथ शव को जलाने के लिए चिता में अग्नि प्रज्वलित करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतमपितृमेधसूत्र 1.3.1-13&amp;lt;/ref&amp;gt; शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 28.1.38&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि घर के लोग अपनी दाहिनी जाँघों को पीटते हैं, आँचल से शव पर हवा करते हैं और तीन बार शव की बायें ओर होकर परिक्रमा करते हैं तथा 'अप न: शोशुचदघम्'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 1.47.1 तथा तैत्तिरीयारण्यक 6.10.1&amp;lt;/ref&amp;gt; पढ़ते हैं। इसने आगे कहा है&amp;lt;ref&amp;gt;28.1.37-46&amp;lt;/ref&amp;gt; कि शव किसी गाड़ी में या चार पुरुषों के द्वारा ढोया जाता है, और ढोते समय चार स्थानों पर रोका जाता है और उन चारों स्थानों पर पृथ्वी खोद दी जाती है और उसमें भात का पिण्ड 'पूषा त्वेत:'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.17.3 एवं तैत्तिरीयारण्यक 6.10.1&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं 'आयुर्विश्वायु:'&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.17.4 एवं तैत्तिरीयारण्यक 6.10.2&amp;lt;/ref&amp;gt; मन्त्रों के साथ आहुति के रूप में रख दिया जाता है। [[वराह पुराण]] के अनुसार पौराणिक मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए, अन्त्येष्टिकर्ता को चिता की परिक्रमा करनी चाहिए और उसके उस भाग में अग्नि प्रज्वलित करनी चाहिए जहाँ पर सिर रखा रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शव को ले जाने के नियम==&lt;br /&gt;
शव को ले जाने के विषय में कई प्रकार के नियमों की व्यवस्था है। हमने ऊपर देख लिया है कि शव गाड़ी में ले जाया जाता था या सम्बन्धियों या नौकरों (दासों) द्वारा विशिष्ट प्रकार से बने पलंग या कुर्सी या अरथी द्वारा ले जाया जाता था। इस विषय में कुछ सूत्रों, स्मृतियों, टीकाओं एवं अन्य ग्रन्थों ने बहुत-से नियम प्रतिपादित किये हैं। [[रामायण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अयोध्या काण्ड|अयोध्या काण्ड वा. रा.]] 76.13&amp;lt;/ref&amp;gt;  में आया है कि [[दशरथ]] की मृत्यु पर उनके पुरोहितों द्वारा शव के आगे वैदिक अग्नियाँ ले जायी जा रही थीं, शव एक पालकी (शिबिका) में रखा हुआ था, नौकर ढो रहे थे, सोने के सिक्के एवं वस्त्र अरथी के आगे दरिद्रों के लिए फेंके जा रहे थे। सामान्य नियम यह था कि तीन उच्च वर्णों में शव को मृत व्यक्ति के वर्ण वाले ही ढोते थे और शूद्र उच्च वर्ण का शव तब तक नहीं ढो सकते थे, जब तक उस वर्ण के लोग नहीं पाये जाते थे। उच्च वर्ण के लोग शूद्र के शव को नहीं ढोते थे और इस नियम का पालन करने पर तत्सम्बन्धी अशौच मृत व्यक्ति की जाति से निर्णीत होता था।&amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु धर्मसूत्र]] (9.1-4), [[गौतम धर्मसूत्र]] (14.29), [[मनुस्मृति]] (5.10.4), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.26) एवं पराशरमाधवीय (3.43-45)&amp;lt;/ref&amp;gt; ब्रह्मचारी को किसी व्यक्ति या अपनी जाति के किसी व्यक्ति के शव को ढोने की आज्ञा नहीं थी, किन्तु वह अपने माता-पिता, गुरु, आचार्य एवं उपाध्याय के शव को ढो सकता था और ऐसा करने पर उसे कोई कल्मष नहीं लगता था।&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठ (23.7), मनुस्मृति (5.91), याज्ञवल्क्यस्मृति (3.15), लघु हारीत (92-93), [[ब्रह्म पुराण]] (पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 278)&amp;lt;/ref&amp;gt; गुरु, आचार्य और उपाध्याय की परिभाषा याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 1.34-35&amp;lt;/ref&amp;gt; ने दी है। यदि कोई ब्रह्मचारी उपर्युक्त पाँच व्यक्तियों के अतिरिक्त किसी अन्य का शव ढोता था, तो उसका ब्रह्मचर्यव्रत खण्डित माना जाता था और उसे व्रतलोप का प्रायश्चित करना पड़ता था। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति (5.103 एवं याज्ञवल्क्यस्मृति 3.13-14)&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जो लोग स्वजातीय व्यक्ति का शव ढोते हैं, उन्हें वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए; नीम की पत्तियाँ दाँत से चबानी चाहिए; आचमन करना चाहिए; अग्नि, जल, गोबर, श्वेत सरसों का स्पर्श करना चाहिए; धीरे से किसी पत्थर पर पैर रखना चाहिए और तब घर में प्रवेश करना चाहिए। सपिण्डों का यह कर्तव्य है कि वे अपने सम्बन्धी का शव ढोएँ, ऐसा करने के उपरान्त उन्हें केवल स्नान करना होता है, अग्नि को छूना होता है और पवित्र होने के लिए घृत पीना पड़ता है।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.29; याज्ञवल्क्यस्मृति 3.26; मनुस्मृति 4.103; पराशरमाधवीय 3.42; देवल, पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 277 एवं हारीत, अपरार्क पृष्ठ 871&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत शरीर को ढोने वाले के लिए नियम====&lt;br /&gt;
सपिण्डरहित ब्राह्मण के मृत शरीर को ढोने वाले की पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 3.3.41&amp;lt;/ref&amp;gt; ने बड़ी प्रशंसा की है और कहा है कि जो व्यक्ति मृत ब्राह्मण के शरीर को ढोता है, वह प्रत्येक पग पर एक-एक [[यज्ञ]] के सम्पादन का फल पाता है और केवल पानी में डुबकी लेने और प्राणायाम करने से ही पवित्र हो जाता है। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.101-102&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जो व्यक्ति किसी सपिण्डरहित व्यक्ति के शव को प्रेमवश ढोता है, वह तीन दिनों के उपरान्त ही अशौचरहित हो जाता है। आदिपुराण को उद्धृत करते हुए हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 121&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि यदि कोई क्षत्रिय या वैश्य किसी दरिद्र ब्राह्मण या क्षत्रिय (जिसने सब कुछ खो दिया हो) के या दरिद्र वैश्य के शव को ढोता है, वह बड़ा यश एवं पुण्य पाता है और स्नान के उपरान्त ही पवित्र हो जाता है। सामान्यत: आज भी (विशेषत: ग्रामों में) एक ही जाति के लोग शव को ढोते हैं या साथ जाते हैं और वस्त्रसहित स्नान करने के पश्चात् पवित्र मान लिये जाते हैं। कुछ मध्यकाल की टीकाओं, यथा मिताक्षरा ने जाति-संकीर्णता की भावना से प्रेरित होकर व्यवस्था दी है कि &amp;quot;यदि कोई व्यक्ति प्रेमवश शव ढोता है, मृत के परिवार में भोजन करता है और वहीं रह जाता है तो वह दस दिनों तक अशौच में रहता है। यह नियम तभी लागू होता है, जब कि शव को ढोने वाला मृत की जाति का रहता है। यदि ब्राह्मण किसी मृत शूद्र के शव को ढोता है, तो वह एक मास तक अपवित्र रहता है, किन्तु यदि कोई शूद्र किसी मृत ब्राह्मण के शव को ढोता है तो वह दस दिनों तक अशौच में रहता है।&amp;quot; [[कूर्म पुराण]] ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई ब्राह्मण किसी मृत ब्राह्मण के शव को शुल्क लेकर ढोता है या किसी अन्य स्वार्थ के लिए ऐसा करता है तो वह दस दिनों तक अपवित्र (अशौच) में रहता है, और इसी प्रकार कोई क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र ऐसा करता है तो क्रम से 12, 15 एवं 30 दिनों तक अपवित्र रहता है।&lt;br /&gt;
====शव को ले जाने का मार्ग ====&lt;br /&gt;
[[विष्णु पुराण]] का कथन है कि यदि कोई व्यक्ति शुल्क लेकर शव ढोता है तो वह मृत व्यक्ति की जाति के लिए व्यवस्थित अवधि तक अपवित्र रहता है। हारीत&amp;lt;ref&amp;gt;मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.2; मदनपारिजात पृष्ठ 395&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से शव को मार्ग के गाँवों में होकर नहीं ले जाना चाहिए। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.92&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वृद्ध-हारीत&amp;lt;ref&amp;gt;वृद्ध-हारीत 9.100-101&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि [[शूद्र]], [[वैश्य]], [[क्षत्रिय]] एवं [[ब्राह्मण]] का मृत शरीर क्रम से ग्राम या बस्ती के दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी एवं पूर्वी मार्ग से ले जाना चाहिए। यम एवं [[गरुड़ पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;यम एवं [[गरुड़ पुराण]] 2.4.56-58&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि चिता के लिए अग्नि, काष्ठ (लकड़ी), तृण, हवि आदि उच्च वर्णों की अन्त्येष्टि के लिए शूद्र द्वारा नहीं ले जाना चाहिए, नहीं तो मृत व्यक्ति सदा प्रेतावस्था में ही रह जायेगा। हारलता&amp;lt;ref&amp;gt;हारलता पृष्ठ 121&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि यदि शूद्रों द्वारा लकड़ी ले जायी जाये तो ब्राह्मण के शव के चिता-निर्माण के लिए ब्राह्मण ही प्रयुक्त होना चाहिए। [[स्मृतियाँ|स्मृतियों]] एवं [[पुराण|पुराणों]] ने व्यवस्था दी है कि शव को नहलाकर जलाना चाहिए, शव को नग्न रूप में कभी नहीं जलाना चाहिए। उसे वस्त्र से ढँका रहना चाहिए, उस पर पुष्प रखने चाहिए और चन्दन लेप करना चाहिए; अग्नि को शव के मुख की ओर ले जाना चाहिए। किसी व्यक्ति को कच्ची मिट्टी के पात्र में पका हुआ भोजन ले जाना चाहिए, किसी अन्य व्यक्ति को उस भोजन का कुछ अंश मार्ग में रख देना चाहिए और चाण्डाल आदि (जो श्मशान में रहते हैं) के लिए वस्त्र आदि दान करना चाहिए। [[ब्रह्म पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण - शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 159&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि शव को श्मशान ले जाते समय वाद्ययंत्रों द्वारा पर्याप्त निनाद किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;भरत ने चार प्रकार के वाद्यों की चर्चा यों की है-'ततं चैवावनद्धं घनं सुषिरमेव च।' अमरकोश ने उन्हें निम्न प्रकार से समझाया है-'ततं वीणादिकं वाद्यमानद्धं मुरजादिकम्। वंशादिकं तु सुषिरं कांस्यतालादिकं घनम्।'&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====वपन के नियम====&lt;br /&gt;
शव को जलाने के उपरान्त, अन्त्येष्टि क्रिया के अंग के रूप में कर्ता को वपन (मुंडन) करवाना पड़ता है और उसके उपरान्त स्नान करना होता है, किन्तु वपन के विषय में कई नियम हैं। स्मृति-वचन यों है-'दाढ़ी-मूँछ बनवाना सात बातों में घोषित है, यथा-गंगातट पर, भास्कर क्षेत्र में, माता, पिता या गुरु की मृत्यु पर, श्रौताग्नियों की स्थापना पर एवं सोमयज्ञ में।'&amp;lt;ref&amp;gt;गंगायां भास्करक्षेत्रे मातापित्रोर्गृरोम् तौ। आधानकाले सोमे च वपनं सप्तसु स्मृतम्।। देखिए मिताक्षरा (याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17), पराशरमाधवीय (1.2, पृष्ठ 296), शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 161), प्रायश्चितत्ततत्त्व (पृष्ठ 496)। भास्कर क्षेत्र प्रयाग का नाम है।&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्त्यकर्मदीपक&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 19&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि अन्त्येष्टि क्रिया करने वाले पुत्र या किसी अन्य कर्ता को सबसे पहले वपन कराकर स्नान करना चाहिए और तब शव को किसी पवित्र स्थल पर ले जाना चाहिए तथा वहाँ स्नान कराना चाहिए, या यदि ऐसा स्थान वहाँ न हो तो शव को स्नान कराने वाले जल में [[गंगा]], [[गया]] या अन्य तीर्थों का आवाहन करना चाहिए। इसके उपरान्त शव पर [[घी]] या [[तिल]] के तेल का लेप करके पुन: उसे नहलाना चाहिए, नया वस्त्र पहनाना चाहिए, यज्ञोपवीत, गोपीचन्दन, तुलसी की माला से सजाना चाहिए और सम्पूर्ण शरीर में [[चन्दन]], कपूर, कुंकुम, कस्तूरी आदि सुंगधित पदार्थों का प्रयोग करना चाहिए। यदि अन्त्येष्टि क्रिया रात्रि में हो तो वपन रात्रि में नहीं होना चाहिए, बल्कि दूसरे दिन होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;रात्रौ दग्ध्वा तु पिण्डान्त कृत्वा वपनवर्जितम्। वपनं नेष्यते रात्रौ श्वस्तनी वपनक्रिया।। संग्रह संग्रह (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 161)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्य स्मृतियों ने दूसरे, तीसरे, पाँचवें या सातवें दिन या ग्यारहवें दिन के श्राद्धकर्म के पूर्व किसी दिन भी वपन की व्यवस्था दी है।&amp;lt;ref&amp;gt;अलुप्तकेशो य: पूर्व सोऽत्र केशान् प्रवापचेत्। द्वितीये तृतीयेऽह्नि पंचमे स्पतमेऽपि वा।। यावच्छाद्धं प्रदीयेत तावदित्यपरं मतम्।। बौधायन (पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 2); वपनं दशमेऽहनि कार्यम्। तदाह देवल:। दशमेऽहनि संप्राप्ते स्नानं ग्रामाद बहिर्भवेत्। तत्र त्याज्यानि वासांसि केशश्मश्रुनखानि च।। (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17); मदनपारिजात (पृष्ठ 416) ने देवल आदि को उद्धृत करते हुए लिखा है-'पंचमादिदिनेषु कृतक्षौरस्यापि शुद्धयर्थ दशमदिनेपि वपनं कर्तव्यम्।'&amp;lt;/ref&amp;gt; आपस्तम्ब धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.3.10.6&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से मृत व्यक्ति से छोटे सभी सपिण्ड लोगों को वपन कराना चाहिए। मदनपारिजात का कथन है कि अन्त्येष्टि कर्ता को वपन-कर्म प्रथम दिन तथा अशौच की समाप्ति पर कराना चाहिए, किन्तु शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 162&amp;lt;/ref&amp;gt; ने मिताक्षरा&amp;lt;ref&amp;gt;मिताक्षरा  (याज्ञवल्क्यस्मृति 3.17)&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत का समर्थन करते हुए कहा है कि वपन-कर्म का दिन स्थान-विशेष की परम्परा पर निर्भर है। वाराणसी सम्प्रदाय के मत से कर्ता अन्त्येष्टि कर्म के समय वपन कराता है, किन्तु मिथिला सम्प्रदाय के मत से अन्त्येष्टि के समय वपन नहीं होता। [[गरुड़ पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[गरुड़ पुराण]] 2.4.67-69&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से घोर रुदन शवदाह के समय किया जाना चाहिए, किन्तु दाह-कर्म एवं जल-तर्पण के उपरान्त रुदन-कार्य नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उदकक्रिया या जलवान==&lt;br /&gt;
सपिण्डों एवं समानोदकों द्वारा मृत के लिए जो उदकक्रिया या जलवान होता है, उसके विषय में मतैक्य नहीं है। आश्वलायन गृह्यसूत्र ने केवल एक बार जल-तर्पण की बात कही है, किन्तु सत्यषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्यषाढ श्रौतसूत्र 28.2.72&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि ने व्यवस्था दी है कि तिलमिश्रित जल अंजलि द्वारा मृत्यु के दिन मृत का नाम एवं गौत्र बोलकर तीन बार दिया जाता है और ऐसा ही प्रतिदिन ग्यारहवें दिन तक किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;केशान् प्रकीर्य पांसूनोप्यैकवाससो दक्षिणामुख: सकृदुन्मज्ज्योत्तीर्य सव्यं जान्वाच्य वास: पीडयित्वोपविशन्त्येवं त्रिस्तत्प्रत्ययं तिलमिश्रमुदकं त्रिरुत्सिच्याहरहरञ्जलिनैकोत्तरवृद्धिरैकादशाहात्। सत्याषाढश्रौतसूत्र (28.2.72)। गौतमपितृमेधसूत्र (1.4.7) ने भी कही है। जल-तर्पण इस प्रकार होता है-'काश्यपगोत्र देववत्त शर्मन्, एतत्ते उदकम्' या 'काश्यपगोत्राय देवदत्तशर्मणे प्रेतायैतत्तिलोदकं ददामि' (हरदत्त) या 'देवदत्तनामा काश्यपगोत्र: प्रेतस्तृप्यतु' (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.5)। और देखिए गोभिलस्मृति (3.36-37, अपरार्क पृष्ठ 874 एवं पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 287)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[गौतम धर्मसूत्र]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[गौतम धर्मसूत्र]] 14.38&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं वसिष्ठ धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वसिष्ठ धर्मसूत्र 4.12&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि जलदान सपिण्डों द्वारा प्रथम, तीसरे, सातवें एवं नवें दिन दक्षिणाभिमुख होकर किया जाता है, किन्तु हरदत्त का कथन है कि सब मिलाकर 75 अंजलियाँ देनी चाहिए (प्रथम दिन 3, तीसरे दिन 9, सातवें दिन 30 एवं नवें दिन 33), किन्तु उनके देश में परम्परा यह थी कि प्रथम दिन अंजलि द्वारा तीन बार और आगे के दिनों में एक-एक अंजलि अधिक जल दिया जाता था। विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.7 एवं 13&amp;lt;/ref&amp;gt;, प्रचेता एवं पैठिनसि&amp;lt;ref&amp;gt;अपरार्क पृष्ठ 874&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि मृत को जल एवं पिण्ड दस दिनों तक देते रहना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;दिने दिनेऽञ्जलीन् पूर्णान् प्रदद्यात्प्रेतकारणात्। तावद् वृद्धिश्च कर्तव्या यावत्पिड: समाप्यते।। प्रचेता (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3।3); 'यावदाशौचं तावत्प्रेतस्योदकं पिण्डं च दद्यु:।' विष्णुधर्मसूत्र (19।13)। यदि एक दिन केवल एक ही अंजलि जल दिया जाए तो दस दिनों में केवल दस अंजलियाँ होंगी, यदि प्रतिदिन 10 अंजलियाँ दी जायें तो 100, किन्तु यदि प्रथम दिन एक अजंलि और उसके उपरान्त प्रतिदिन एक अंजलि बढ़ाते जायें तो कुल मिलाकर 55 अंजलियाँ होंगी।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 202&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गृह्यपरिशिष्ट के कतिपय वचन उद्धृत कर लिखा है कि कुछ के मत से केवल 10 अंजलियाँ और कुछ के मत से 100 और कुछ के मत से 55 अंजलियाँ दी जाती हैं, अत: इस विषय में लोगों को अपनी वैदिक शाखा के अनुसार परम्परा का पालन करना चाहिए। यही बात आश्वलाय गृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;परिशिष्ट 3.4&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी कही है। गरुड़ पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़ पुराण (प्रेतखण्ड, 5.22-23)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी 10, 55 या 100 अंजलियों की चर्चा की है। कुछ स्मृतियों ने जाति के आधार पर अंजलियों की संख्या दी है। प्रचेता&amp;lt;ref&amp;gt;प्रचेता (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.4)&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र मृतक के लिए क्रम से 10, 12, 15 एवं 30 अंजलियाँ दी जानी चाहिए। यम (श्लोक 92-94) ने लिखा है कि नाभि तक पानी में खड़े होकर किस प्रकार जल देना चाहिए और कहा है (श्लोक 98) कि देवों एवं पितरों को जल में और जिनका उपनयन संस्कार न हुआ हो, उनके लिए भूमि में खड़े होकर जल तर्पण करना चाहिए। देवयाज्ञिक द्वारा उद्धृत एक स्मृति में आया है कि मृत्यु काल से आगे 6 पिण्ड निम्न रूप में दिये जाने चाहिए; मृत्यु स्थल पर, घर की देहली पर, चौराहे पर, श्मशान के मार्ग पर जहाँ शव यात्री रुकते हैं, चिता पर तथा अस्थियों को एकत्र करते समय। स्मृतियों में ऐसा भी आया है कि लगातार दस दिनों तक तेल का दीपक जलाना चाहिए, जलपूरण मिट्टी का घड़ा भी रखा रहना चाहिए और मृत का नाम-गौत्र कहकर दोपहर के समय एक मुट्ठी भात भूमि पर रखना चाहिए। इसे पाथेय श्राद्ध कहा जाता है, क्योंकि इससे मृत को यमलोक जाने में सहायता मिलती है।&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मसिंधु, पृष्ठ 463&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ निबन्धों के मत से मृत्यु के दिन सपिण्डों द्वारा वपन, स्नान, ग्राम एवं घर में प्रवेश कर लेने के उपरान्त नग्न-प्रच्छादन नामक श्राद्ध करना चाहिए। नग्न-प्रच्छादन श्राद्ध में एक घड़े में अनाज भरा जाता है, एक पात्र में घृत एवं सामर्थ्य के अनुसार सोने के टुकड़े या सिक्के भरे जाते हैं। अन्नपूर्ण घड़े की गर्दन वस्त्र से बँधी रहती है। [[विष्णु]] का नाम लेकर दोनों पात्र किसी कुलीन दरिद्र ब्राह्मण को दे दिये जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृतिमुक्ताफल, पृष्ठ 595-596 एवं स्मृतिचन्द्रिका, पृष्ठ 176&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====पिण्डदान प्रक्रिया==== &lt;br /&gt;
स्मृतियों एवं पुराणों&amp;lt;ref&amp;gt;यथा-कूर्म पुराण, उत्तरार्ध 23.70&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से अंजलि से जल देने के उपरान्त पके हुए चावल या जौ का पिण्ड तिलों के साथ दर्भ पर रख दिया जाता है। इस विषय में दो मत हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.16&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से पिण्डपितृयज्ञ की व्यवस्था के अनुसार तीन दिनों तक एक-एक पिण्ड दिया जाता है;&amp;lt;ref&amp;gt;इसमें जनेऊ दाहिने कंधे पर या अपसव्य रखा जाता है&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 19.13&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से अशौच के दिनों में प्रतिदिन एक पिण्ड दिया जाता है। यदि मृत व्यक्ति का उपनयन हुआ है तो पिण्ड दर्भ पर दिया जाता है, किन्तु मन्त्र नहीं पढ़ा जाता, यो पिण्ड पत्थर पर भी दिया जाता है। जल तो प्रत्येक सपिण्ड या अन्य कोई भी दे सकता है, किन्तु पिण्ड पुत्र&amp;lt;ref&amp;gt;यदि कई पुत्र हों तो ज्येष्ठ पुत्र, यदि वह दोषरहित हो&amp;lt;/ref&amp;gt; देता है; पुत्रहीनता पर भाई या भतीजा देता है और उनके अभाव में माता के सपिण्ड, यथा-मामा या ममेरा भाई आदि देते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;पुत्राभावे सपिण्डा मातृसपिण्डा: शिष्याश्च वा दद्यु:। तदभावे ऋत्विगाचार्यों। गौतमधर्मसूत्र (15.13-14)।&amp;lt;/ref&amp;gt; वैसी स्थिति में जब पिण्ड तीन दिनों तक दिये जाते हैं या जब अशौच केवल तीन दिनों का रहता है, शातातप ने पिण्डों की संख्या10 दी है और पारस्कर ने उन्हें निम्न रूप से बाँटा है; प्रथम दिन 3, दूसरे दिन 4 और तीसरे दिन 3। किन्तु दक्ष ने उन्हें निम्न रूप में बाँटा है; प्रथम दिन में एक, दूसरे दिन 4 और तीसरे दिन 5। पारस्कर ने जाति के अनुसार क्रम से 10, 12, 15 एवं 30 पिण्डों की संख्या दी है। वाराणसी सम्प्रदाय के मत से शवदाह के समय 4, 5 या 6 पिण्ड तथा मिथिला सम्प्रदाय के अनुसार केवल एक पिण्ड दिया जाता है। गृह्यपरिशिष्ट एवं गरुड़ पुराण के मत से उन सभी को, जिन्होंने मृत्यु के दिन कर्म करना आरम्भ किया है, चाहे वे सगोत्र हों या किसी अन्य गोत्र के हों, दिस दिनों तक सभी कर्म करने पड़ते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;असगोत्र: सगोत्रो वा यदि स्त्री यदि वा पुमान्। प्रथमेऽहनि यो दद्यात्स दशाहं समापयेत्।। गृह्यपरिशिष्ट (मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 1.255 एवं 3.16; अपरार्क, पृष्ठ 887; मदनपारिजात, पृष्ठ 400; हारलता, पृष्ठ 172)। देखिए लम्बाश्वलायन (20.6) एवं गरुड़ पुराण (प्रेतखण्ड, 5।19-20)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसी व्यवस्था है कि यदि कोई व्यक्ति कर्म करता आ रहा है और इसी बीच में पुत्र आ उपस्थित हो तो प्रथम व्यक्ति ही 10 दिनों तक कर्म करता रहता है, किन्तु ग्यारहवें दिन का कर्म पुत्र या निकट सम्बन्धी (सपिण्ड) करता है। [[मत्स्य पुराण]] का कथन है कि मृत के लिए पिण्डदान 12 दिनों तक होना चाहिए, ये पिण्ड मृत के लिए दूसरे लोक में जाने के लिए पाथेय होते हैं और वे उसे संतुष्ट करते हैं। मृत 12 दिनों के उपरान्त मृतात्माओं के लोक में चला जाता है, अत: इन दिनों के भीतर वह अपने घर, पुत्रों एवं पत्नी को देखता रहता है।&lt;br /&gt;
====जल-तर्पण के समय प्रार्थना==== &lt;br /&gt;
जिस प्रकार एक ही गोत्र के सपिण्डों एवं समानोदकों को जल-तर्पण करना अनिवार्य है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति को अपने नाना तथा अपने दो अन्य पूर्वपुरुषों एवं आचार्य को उनकी मृत्यु के उपरान्त जल देना अनिवार्य है। व्यक्ति यदि चाहे तो अपने मित्र, अपनी विवाहिता बहिन या पुत्री, अपने भानजे, श्वशुर, पुरोहित को उनकी मृत्यु पर जल दे सकता है।&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10; शंख-लिखित, याज्ञवल्क्यस्कृति 3.4&amp;lt;/ref&amp;gt; पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt; ने एक विचित्र रीति की ओर संकेत किया है। जब सपिण्ड लोग स्नान करने के लिए जल में प्रवेश करने को उद्यत होते हैं और जब वे मृत को जल देना चाहते हैं तो अपने सम्बन्धियों या साले से जल के लिए इस प्रकार प्रार्थना करते हैं-'हम लोग उदकक्रिया करना चाहते हैं', इस पर दूसरा कहता है-'ऐसा करो किन्तु पुन: न आना।' ऐसा तभी किया जाता था, जब कि मृत 100 वर्ष से कम आयु का होता था, किन्तु जब वह 100 वर्ष का या इससे ऊपर का होता था, तो केवल 'ऐसा करो' कहा जाता था। गौतमपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतमपितृमेधसूत्र 1.4.4-6&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी ऐसा ही प्रतीकात्मक वार्तालाप आया है। कोई राजकर्मचारी, सगोत्र या साला (या बहनोई) एक कँटीली टहनी लेकर उन्हें जल में प्रवेश करने से रोकता है और कहता है, 'जल में प्रवेश न करो'; इसके उपरान्त सपिण्ड उत्तर देता है-'हम लोग पुन: जल में प्रवेश नहीं करेंगे।' इसका सम्भवत: यह तात्पर्य है कि वे कुटुम्ब में किसी अन्य की मृत्यु से छुटकारा पायेंगे, अर्थात् शीघ्र ही उन्हें पुन: नहीं आना पड़ेगा या कुटुम्ब में कोई मृत्यु शीघ्र न होगी।&lt;br /&gt;
====जल-तर्पण के अयोग्य==== &lt;br /&gt;
मृत को जल देने के लिए कुछ लोग अयोग्य माने गये हैं और कुछ मृत व्यक्ति भी जल पाने के लिए अयोग्य ठहराये गये हैं। नपुंसक लोगों, सोने के चोरों, व्रात्यों, विधर्मी लोगों, भ्रूणहत्या (गर्भपात) करने वाली तथा पति की हत्या करने वाली स्त्रियों, निषिद्ध मद्य पीने वालों (सुरापियों) को जल देना मना था। याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.6&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था की है कि नास्तिकों, चार प्रकार के आश्रमों में न रहने वालों, चोरों, पति की हत्या करने वाली नारियों, व्यभिचारिणियों, सुरापियों, आत्महत्या करने वालों को न तो मरने पर जल देना चाहिए और न अशौच मनाना चाहिए। यही बात मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.89-90&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी कही है। गौतम धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम धर्मसूत्र 14.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि उन लोगों की न तो अन्त्येष्टि क्रिया होती है, न अशौच होता है, और न जल-तर्पण होता है और न पिण्डदान होता है, जो क्रोध में आकर महाप्रयाण करते हैं, जो उपवास से या अग्नि से या विष से या जल-प्रवेश से या फाँसी लगाकर लटक जाने से या पर्वत से कूदकर या पेड़ से गिरकर आत्महत्या कर लेते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रायानाशकशस्त्राग्निविषोदकोद्बन्धनप्रपतनैश्चेच्छताम्। गौतम धर्मसूत्र (14.11); क्रोधात् प्रायं विषं वह्नि: शस्त्रमुद्बन्धनं जलम्। गिरिवृक्षप्रपातं च ये कुर्वन्ति नराधमा:।। ब्रह्मदण्डहया ये च ये चैव ब्राह्मणैर्हता:। महापातकिनो ये च पतितास्ते प्रकीर्तिता:।। पतितानां न दाह: स्यान्न च स्यादस्थिसंचय:। न चाश्रुपात: पिण्डो वा कार्या श्राद्धक्रिया न च।। ब्रह्म पुराण (हरदत्त, गौतमधर्मसूत्र 14.11; अपरार्क पृष्ठ 902-903), देखिए औशनशसस्मृति (7.1, पृष्ठ 539), संवर्त (178-179), अत्रि (216-217), कूर्म पुराण (उत्तरार्ध 23.60-63), हारलता (पृष्ठ 204), शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 59)।&amp;lt;/ref&amp;gt; हरदत्त&amp;lt;ref&amp;gt;हरदत्त गौतम धर्मसूत्र 14.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ब्रह्म पुराण से तीन पद्य उद्धृत कर कहा है कि जो ब्राह्मण-शाप या अभिचार से मरते हैं या जो पतित हैं, वे इसी प्रकार की गति पाते हैं। किन्तु अंगिरा&amp;lt;ref&amp;gt;मिताक्षरा, याज्ञवल्क्यस्मृति 3.6&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जो लोग असावधानी से जल या अग्नि द्वारा मर जाते हैं, उनके लिए अशौच होता है और उदकक्रिया की जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[[वैखानस श्रौतसूत्र|वैखानस श्रौतसूत्र]] 5.11&amp;lt;/ref&amp;gt;, जहाँ ऐसे लोगों की सूची है, जिनका दाह-कर्म नहीं होता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] में अन्त्येष्टि कर्म का बहुधा वर्णन हुआ है, यथा [[आदिपर्व महाभारत|आदिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;आदिपर्व अध्याय 127&amp;lt;/ref&amp;gt; में पाण्डु का दाह-कर्म&amp;lt;ref&amp;gt;चारों ओर से ढँकी शिबिका में शव ले जाया गया था, वाद्य यंत्र थे, जुलूस में राजछत्र एवं चामर थे, साधुओं को धन बाँटा जा रहा था, गंगातट के एक सुरम्य स्थल पर शव ले जाया गया था, शव को स्नान कराया गया था, उस पर चन्दनलेप लगाया गया था&amp;lt;/ref&amp;gt;; [[स्त्रीपर्व महाभारत|स्त्रीपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[स्त्रीपर्व महाभारत|स्त्रीपर्व]] अध्याय 23.39-42&amp;lt;/ref&amp;gt; में [[द्रोण]] का दाह-कर्म&amp;lt;ref&amp;gt;तीन मास पढ़े गये थे, उनके शिष्यों ने पत्नी के साथ चिता की परिक्रमा की, गंगा के तट पर लोग गये थे&amp;lt;/ref&amp;gt;; अनुशासनपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 169.10-19&amp;lt;/ref&amp;gt; में [[भीष्म]] का दाह-कर्म&amp;lt;ref&amp;gt;चिता पर सुगन्धित पदार्थ डाले गये थे, शव सुन्दर वस्त्रों एवं पुष्पों से ढँका था, शव के ऊपर छत्र एवं चामर थे, कौरवों की नारियाँ शव पर पंखे झल रही थीं और सामवेद का गायन हो रहा था&amp;lt;/ref&amp;gt;; [[मौसलपर्व महाभारत|मौसलपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मौसलपर्व महाभारत|मौसलपर्व]] 7.19-25&amp;lt;/ref&amp;gt; में वासुदेव का, स्त्रीपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;स्त्रीपर्व 26.28-43&amp;lt;/ref&amp;gt; में अन्य योद्धाओं का तथा [[आश्रमवासिकपर्व महाभारत|आश्रमवासिकपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[आश्रमवासिकपर्व महाभारत|आश्रमवासिकपर्व]], अध्याय 39&amp;lt;/ref&amp;gt; में [[कुन्ती]], [[धृतराष्ट्र]] एवं [[गान्धारी]] का दाह-कर्म वर्णित है। रामायण&amp;lt;ref&amp;gt;रामायण- अयोध्याकाण्ड, 76.16-20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि दशरथ की चिता चन्दन की लकड़ियों से बनी थी और उसमें अगुरु एवं अन्य सुगन्धित पदार्थ थे; सरल, पद्मक, देवदारु आदि की सुगन्धित लकड़ियाँ भी थीं; कौसल्या तथा अन्य स्त्रियाँ शिबिकाओं एवं अपनी स्थिति के अनुसार अन्य गाड़ियों में शवयात्रा में सम्मिलित हुई थीं। यदि आहिताग्नि (जो श्रौत अग्निहोत्र करता हो) विदेश में मर जाए तो उसकी अस्थियाँ मँगाकर काले मृगचर्म पर फैला दी जानी चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण 2.5.1.13-14&amp;lt;/ref&amp;gt; और उन्हें मानव-आकार में सजा देना चाहिए तथा रूई एवं घृत तथा श्रौत अग्नियों एवं यात्राओं के साथ जला डालना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;कात्यायनश्रौतसूत्र (25.8.9), बौधायनपितृमेधसूत्र (3.8), गोभिलस्मृति (3.47) एवं वसिष्ठधर्मसूत्र (4.37)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अस्थियाँ प्राप्त न होने पर==&lt;br /&gt;
यदि अस्थियाँ न प्राप्त हो सकें तो सूत्रों ने [[ऐतरेय ब्राह्मण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऐतरेय ब्राह्मण]] 32.1&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं अन्य प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर यह व्यवस्था दी है कि पलाश की 360 पत्तियों से काले मृगचर्म पर मानव-पुत्तल बनाना चाहिए और उसे ऊन के सूत्रों से बाँध देना चाहिए। उस पर जल से मिश्रित जौ का आटा डाल देना चाहिए और घृत डालकर मृत की अग्नियों एवं यज्ञपात्रों के साथ जला डालना चाहिए। ब्रह्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण- शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 187&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी ऐसे ही नियम दिये हैं और तीन दिनों का अशौच घोषित किया है। अपरार्क&amp;lt;ref&amp;gt;अपरार्क पृष्ठ 545&amp;lt;/ref&amp;gt; द्वारा उद्धृत एक स्मृति में पलाश की पत्तियों की संख्या 362 लिखी हुई है। बौधायन पितृमेधसूत्र एवं गौतम पितृमेधसूत्रों के मत से ये पत्तियाँ निम्न रूप से सजायी जानी चाहिए; सिर के लिए40, गर्दन के लिए 10, छाती के लिए 20, उदर (पेट) के लिए 10, पैरों के लिए 70, पैरों के अँगूठों के लिए 10, दोनों बाँहों के लिए 50, हाथों की अँगुलियों के लिए 10, लिंग के लिए 8 एवं अण्डकोशों के लिए 12। यही वर्णन सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 19439&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी है।&amp;lt;ref&amp;gt;शांखायनश्रौतसूत्र (4.15.19-31), कात्यायन श्रौतसूत्र (25.8.15), बौधायन पितृमेधसूत्र (3.8), गौतम पितृमेधसूत्र (2.1.6-14), गोभिल. (3.48), हारीत (शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 186) एवं गरुड़ पुराण (2.4.134-154 एवं 2.40.44)&amp;lt;/ref&amp;gt; सूत्रों एवं स्मृतियों में पलाश-पत्रों की उन संख्याओं में मतैक्य नहीं है, जो विभिन्न अंगों के लिए व्यवस्थित हैं। अपरार्क&amp;lt;ref&amp;gt;अपरार्क, पृष्ठ 545&amp;lt;/ref&amp;gt; द्वारा उद्धृत एक स्मृति में संख्या यों है-सिर के लिए 32, गरदन के लिए 60, नितम्ब के लिए 20, दोनों हाथों के लिए 20-20, अँगुलियों के लिए 10, अंडकोशों के लिए 6, लिंग के लिए 4, जाँघों के लिए 60, घुटनों के लिए 20, पैरों के निम्न भागों के लिए 20, पैर के अँगूठों के लिए 10। जातूकर्ण्य&amp;lt;ref&amp;gt;अपरार्क, पृष्ठ 545&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यदि पुत्र 15 वर्षों तक विदेश गये हुए अपने पिता के विषय में कुछ न जान सके तो उसे पुत्तल जलाना चाहिए। पुत्तल जलाने को आकृति दहन कहा जाता है। बृहस्पति ने इस विषय में 12 वर्षों तक जोहने की बात कही है। वैखानसस्मार्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसस्मार्तसूत्र 5.12&amp;lt;/ref&amp;gt; ने आकृतिदहन को फलदायक कर्म माना है और इसे केवल शव या अस्थियों की अप्राप्ति तक ही सीमित नहीं माना है। शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 187&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ब्रह्म पुराण को उद्धृत कर कहा है कि आकृतिदहन केवल आहिताग्नि तक ही सीमित नहीं मानना चाहिए, यह कर्म उनके लिए भी है, जिन्होंने श्रौत अग्निहोत्र नहीं किया है। इस विषय में आहिताग्नियों के लिए अशौच 10 दिनों तक तथा अन्य लोगों के लिए केवल 3 दिनों तक होता है।&lt;br /&gt;
==आहिताग्नि==&lt;br /&gt;
सत्याषाढ श्रौतसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;सत्याषाढ श्रौतसूत्र 29.4.41&amp;lt;/ref&amp;gt;, बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 3.7.4&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं गरुड़ पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़ पुराण 2.4.169-70&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसी व्यवस्था दी हुई है कि यदि विदेश गया हुआ व्यक्ति आकृतिदहन (पुत्तल-दाह) के उपरान्त लौट आये, अर्थात् मृत समझा गया व्यक्ति जीवित अवस्था में लौटे तो वह घृत से भरे कुण्ड में डुबोकर बाहर निकाला जाता है; पुन: उसको स्नान कराया जाता है और जातकर्म से लेकर सभी संस्कार किये जाते हैं। इसके उपरान्त उसको अपनी पत्नी के साथ पुन: विवाह करना होता है, किन्तु यदि उसकी पत्नी मर गयी है तो वह दूसरी कन्या से विवाह कर सकता है और तब वह पुन: अग्निहोत्र आरम्भ कर सकता है। कुछ सूत्रों ने ऐसी व्यवस्था दी है कि यदि आहिताग्नि की पत्नी उससे पूर्व ही मर जाए, तो वह चाहे तो उसे श्रौताग्नियों द्वारा जला सकता है या गोबर से ज्वलित अग्नि या तीन थालियों में रखे, शीघ्र ही जलने वाले घास-फस से उत्पन्न अग्नि द्वारा जला सकता है। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.167-168&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि यदि आहिताग्नि द्विज की सवर्ण एवं सदाचारिणी पत्नी मर जाये तो आहिताग्नि पति अपनी श्रौत एवं स्मार्त अग्नियों से उसे यज्ञपात्रों के साथ जला सकता है। इसके उपरान्त वह पुन: विवाह कर अग्निहोत्र आरम्भ कर सकता है।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति (1.89), बौधायन पितृमेधसूत्र (2.4 एवं 6), गोभिलस्मृति (3.5), वैखानसस्मार्तसूत्र (7.2), वृद्ध हारीत (11.213), लघु आश्वलायनगृह्यसूत्र (20.59)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वरूप&amp;lt;ref&amp;gt;विश्वरूप  (याज्ञवल्क्यस्मृति 1.87)&amp;lt;/ref&amp;gt; आहिताग्नि के विषय में काठक-श्रुति को उद्धृत कर कहा है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की मृत्यु के उपरान्त भी वे ही पुरानी श्रौताग्नियाँ रखता है तो वे अग्नियाँ उस अग्नि के समान अपवित्र मानी जाती हैं, जो शव के लिए प्रयुक्त होती हैं, और उसने इतना जोड़ दिया है कि यदि आहिताग्नि की क्षत्रिय पत्नी उसके पूर्व मर जाये तो उसका दाह भी श्रौताग्नियों से ही होता है। यह सिद्धान्त अन्य टीकाकारों के मत का विरोधी है, किन्तु उसने मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.167&amp;lt;/ref&amp;gt; में प्रयुक्त 'सवर्ण' को केवल उदाहरण स्वरूप लिया है, क्योंकि ऐसा न करने से वाक्यभेद दोष उत्पन्न हो जायेगा। अत: ब्राह्मण पत्नि के अतिरिक्त क्षत्रिय पत्नी को भी मान्यता दी गई है। कुछ स्मृतियों ने ऐसा लिखा है कि आहिताग्नि विधुर रूप में रहकर भी अपना अग्निहोत्र सम्पादित कर सकता है, और पत्नी की सोने या कुश की प्रतिमा बनाकर यज्ञादि कर सकता है, जैसा कि [[राम]] ने किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3.9-10) एवं वृद्ध-रहित (11.214)&amp;lt;/ref&amp;gt; जब गृहस्थ अपनी मूल पत्नी को श्रौताग्नियों के साथ जलाने के उपरान्त पुन: विवाह नहीं करता है और न पुन: नवीन वैदिक (श्रौत) अग्नियाँ रखता है तो वह मरने के उपरान्त साधारण अग्नियों से ही जलाया जाता है। यदि गृहस्थ पुन: विवाह नहीं करता है तो वह अपनी मृत पत्नी के शव को अरणियों से उत्पन्न अग्नि में जला सकता है। यदि आहिताग्नि पहले मर जाये तो उसकी विधवा अरणियों से उत्पन्न अग्नि (निर्मन्थ्य) से जलायी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र (4.6-8), कात्यायन श्रौतसूत्र (29.4.34-35) एवं त्रिकाण्डमंडन (2.121)&amp;lt;/ref&amp;gt; जब पत्नी का दाह-कर्म होता है तो 'अस्मात्त्वमभिजातोसि' नामक मन्त्र का पाठ नहीं होता।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.52&amp;lt;/ref&amp;gt; केवल सदाचारिणी एवं पतिव्रता स्त्री का दाह-कर्म श्रौत या स्मार्त अग्नि से होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति 3.53&amp;lt;/ref&amp;gt; ऋतु&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 166&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं बौधायन पितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायन पितृमेधसूत्र 3.1.9-13&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार विधुर एवं विधवा का दाहकर्म कपाल नामक अग्नि (कपाल को तपाकर कण्डों से उत्पादित अग्नि) से, ब्रह्मचारी एवं यति (साधु) का उत्तपन (या कपालज) नामक अग्नि से, कुमारी कन्या तथा उपनयनरहित लड़के का भूसा से उत्पन्न अग्नि से होता है। यदि आहिताग्नि पतित हो जाए या किसी प्रकार से आत्महत्या कर ले या पशुओं या सर्पों से भिड़कर मर जाए तो उसकी श्रौताग्नियाँ जल में फेंक देनी चाहिए, स्मार्त अग्नियाँ चौराहे या जल में फेंक देनी चाहिए, यज्ञपात्रों को जला डालना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 226; पराशर 5.10-11; वैखानसस्मार्तसूत्र 5.11&amp;lt;/ref&amp;gt; और उसे साधारण (लौकिक) अग्नि से जलाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कम अवस्था के बच्चों की अन्त्येष्टि के विषय में विकल्प==&lt;br /&gt;
मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.68&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.1&amp;lt;/ref&amp;gt;, पराशरमाधवीय&amp;lt;ref&amp;gt;पराशरमाधवीय 3.14&amp;lt;/ref&amp;gt;, विष्णु धर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णु धर्मसूत्र 22.27-28&amp;lt;/ref&amp;gt;, ब्रह्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्मपुराण- पराशरमाधवीय 1.2, पृष्ठ 238&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से गर्भ से पतित बच्चे, भ्रूण, मृतोत्पन्न शिशु तथा दन्तहीन शिशु को वस्त्र से ढँककर गाड़ देना चाहिए। छोटी अवस्था के बच्चों को नहीं जलाना चाहिए, किन्तु इस विषय में प्राचीन स्मृतियों में अवस्था सम्बन्धी विभेद पाया जाता है। पारस्करगृह्यसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;पारस्करगृह्यसूत्र 3.10&amp;lt;/ref&amp;gt;, याज्ञवल्क्यस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.1&amp;lt;/ref&amp;gt;, मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.68-6&amp;lt;/ref&amp;gt;, यम आदि ने व्यवस्था दी है कि वर्ष के भीतर के बच्चों को ग्राम के बाहर श्मशान से दूर किसी स्वच्छ स्थान पर गाड़ देना चाहिए। ऐसे बच्चों के शवों पर घृत का लेप करना चाहिए, उन पर चन्दनलेप, पुष्प आदि रखने चाहिए, न तो उन्हें जलाना चाहिए और न जल-तर्पण करना चाहिए और न उनका अस्थि-चयन करना चाहिए। सम्बन्धी साथ में नहीं भी जा सकते हैं। यम ने यमसूक्त&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 10.14&amp;lt;/ref&amp;gt; के पाठ एवं यम के सम्मान में स्तुतिपाठ करने की व्यवस्था दी है। मनुस्मृति&amp;lt;ref&amp;gt;मनुस्मृति 5.70&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाएँ दी हैं, यथा-दाँत वाले बच्चों या नामकरण-संस्कृत बच्चों के लिए जल-तर्पण किया जा सकता है, अर्थात् ऐसे बच्चों का शवदाह भी हो सकता है। अत: दो वर्ष से कम अवस्था के बच्चों की अन्त्येष्टि के विषय में विकल्प है, अर्थात् नामकरण एवं दाँत निकलने के उपरान्त ऐसे बच्चे जलाये या गाड़े जा सकते हैं। किन्तु ऐसा करने में सभी सपिण्डों का शव के साथ जाना आवश्यक नहीं है। यदि बच्चा दो वर्ष का हो या यदि अधिक अवस्था का हो, किन्तु अभी उपनयन संस्कार नहीं हुआ हो तो उसका दाहकर्म लौकिक अग्नि से अवश्य होना चाहिए और मौन रूप से जला देना चाहिए। लौगाक्षि के मत से चूड़ाकरण-संस्कृत बच्चों की अनत्येष्टि भी इसी प्रकार होनी चाहिए। वैखानसस्मार्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वैखानसस्मार्तसूत्र 5.11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कहा है कि 5 वर्ष के लड़के तथा 7 वर्ष की लड़की का दाहकर्म नहीं होता। उपनयन के उपरान्त आहिताग्नि की भाँति दाहकर्म होता है, किन्तु यज्ञपात्रों का दाह एवं मन्त्रोच्चारण नहीं होता। बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 2.3.10-11&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि चूड़ाकरण के पूर्व मृत बच्चों का शवदाह नहीं होता, कुमारी कन्याओं एवं उपनयन रहित लड़कों का पितृमेध नहीं होता। उसने यह भी व्यवस्था दी है कि बिना दाँत के बच्चों को 'ओम' के साथ तथा दाँत वाले बच्चों को व्याहृतियों के साथ गाड़ा जाता है। मिताक्षरा&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति 3.2&amp;lt;/ref&amp;gt; ने नियमों को निम्न रूप से दिया है-'नामकरण के पूर्व केवल गाड़ा जाता है, जल-तर्पण नहीं होता; नामकरण के उपरान्त तीन वर्ष तक गाड़ना या जलाना (जल-तर्पण के साथ) विकल्प से होता है; तीन वर्ष से उपनयन के पूर्व तक शवदाह एवं तर्पण मौन रूप से (बिना मन्त्रों के) होता है; यदि तीन वर्ष के पूर्व चूड़ाकरण हो गया हो तो मरने पर यही नियम लागू होता है। उपनयन के उपरान्त मृत का दाहकर्म लौकिक अग्नि से होता है, किन्तु ढंग वही होता है जो आहिताग्नि के लिए निर्धारित है।'&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म संस्कार}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू_संस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू_धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=231101</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
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		<updated>2011-10-31T12:17:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&amp;lt;ref&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’ और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:........।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गधा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पृष्ठ 251&amp;lt;/ref&amp;gt; या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
==मरणासन्न  प्रथा==&lt;br /&gt;
[[भारत]] के अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं। यह प्रथा [[यूरोप]] में भी है।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रो. एडगर्टन का लेख; ‘दी आवर आव डेथ’, एनल्स आव दी भण्डारकर ओ. आर. इंस्टीट्यूट, जिल्द 8, पृष्ठ 219-249&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  80|3&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है; जब व्यक्ति शक्तिहीन होता है, अर्थात् मरने लगता है तो (पुत्र या सेवा करने वाला कोई सम्बन्धी) शाला में लगी हुई घास पर कुश बिछा देता है और उसे 'स्योनास्मै भव' मन्त्र के साथ (बिस्तर या खाट से) उठाकर उस पर रख देता है। &lt;br /&gt;
*बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3|1|18&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से जब यजमान के मरने का भय हो जाए तो यज्ञशाला में पृथिवी पर बालू बिछा देनी चाहिए और उस पर दर्भ फैला देने चाहिए, जिनकी नोंक दक्षिण की ओर होती है, मरणासन्न के दायें कान में 'आयुष: प्राणं सन्तनु' से आरम्भ होने वाले अनुवाक का पाठ (पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धी द्वारा) होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3।22), पितृदयिता आदि। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलीभवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोहयति। &lt;br /&gt;
मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते। यत्ते कृष्णेत्यवदीपयति। कौशिक. (80|3-5)। 'स्योनास्मै' मन्त्र के लिए देखिए [[अथर्ववेद]] (18-2-19), [[ऋग्वेद]] (1|22|15) एवं वाजसनेयीसंहिता (36|13), देखिए निरुक्त (9|32)।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पितृदयिता (पृष्ठ 74) में आया है-'यदा कण्ठस्थानगतजीवी विह्वलो देही भवति तदा बहिर्गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ कुशान्दक्षिणाग्रानास्तीर्य तदुपरि दक्षिणशिरसं स्थापयित्वा सुवर्णरजतगोभूमिदीपतिलपात्राणि दापयेत्। &lt;br /&gt;
गोभिलस्मृति (3।22)-‘दुर्बलं स्नापयित्वा तु शुद्धचैलाभिसंवृतम्। दक्षिणाशिरसं भूमौ बहिष्मत्यां निवेशयेत्।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश  पृष्ठ 151-152&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि जब कोई व्यक्ति मृतप्राय हो, उसकी आंखें आधी बन्द हो गई हों और वह खाट से नीचे उतार दिया गया हो, तो उसके पुत्र या किसी सम्बन्धी को चाहिए कि वह उससे निम्न प्रकार का कोई एक या सभी प्रकार के दस दान कराये-[[गौ]], भूमि, तिल, [[सोना]], घृत, [[वस्त्र]], धान्य, गुड़, रजत ([[चाँदी]]) एवं [[नमक]]।&amp;lt;ref&amp;gt;दानानि च जातूकर्ण्य आह। उत्क्रान्तिवैतरण्यौ च दश दानानि चैव हि। प्रेतेऽपि कृत्वा तं प्रेतं शवधर्मेण दाहयेत्।.....दश दानानि च तेनैवोक्तानि। गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च। रूप्यं लवणमित्याहुर्दश दानान्यनुक्रमात्।। शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 152)। और देखिए [[गरुड़ पुराण]] (प्रेतखण्ड, 4।4); एपिग्रैफ़िया इण्डिका (जिल्द 19, पृष्ठ 230)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये दान गयाश्राद्ध या सैकड़ों अश्वमेधों से बढ़कर हैं। संकल्प इस प्रकार का होता है-'अभ्युदय (स्वर्ग) की प्राप्ति या पापमोचन के लिए मैं दस दान करूँगा।' दस दानों के उपरान्त उत्क्रान्ति-धेनु (मृत्यु को ध्यान में रखकर बछड़े के साथ गौ) दी जाती है, और इसके उपरान्त वैतरणी गौ का दान किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;आसन्नमृत्युना देया गौ: सवत्सा तु पूर्ववत्। तदभावे तु गौरेव नरकोत्तरणाय च।। तदा यदि न शक्नोति दातुं वैतरणीं तु गाम। शक्तोऽन्योऽरुक् तदा दत्त्वा दद्याच्छ्रेयो मृतस्य च।। व्यास (शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 300; शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 153; अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 7)। गरुड़पुराण (प्रेतखण्ड, 4।6) में आया है-'नदीं वैतरणीं तर्तु दद्याद्वैतरणीं च गाम्। कृष्णस्तनी सकृष्णांगी सा वै वैतरणी स्मृता।।' ऐसा आया है कि यम के द्वार पर वैतरणी नाम की नदी है, जो रक्त एवं पैने अस्त्रों से परिपूर्ण है; जो लोग मरते समय गौदान करते हैं, वे उस नदी को गाय की पूँछ पकड़कर पार कर जाते हैं। [[स्कन्दपुराण]] 6|226|32-33 जहाँ वैतरणी की चर्चा है; ‘मृत्युकाले प्रचच्छन्ति ये धेनुं ब्राह्मणाय वै। तस्या: पुच्छं समाश्रित्य ते तरन्ति च तां नृप।।’&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 152-153&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन मन्त्रों का (जो वैदिक नहीं है) उल्लेख है जो दानों के समय कहे जाते हैं। अन्त्येष्टिपद्धति अन्त्यकर्मदीपक आदि ने व्यवस्था दी है कि जब व्यक्ति आसन्नमृत्यु हो, तो उसके पुत्र या सम्बन्धियों को चाहिए कि वे उससे व्रतोद्यापन, सर्वप्रायश्चित्त एवं दस दानों के कृत्य करायें, किन्तु यदि मरणासन्न इन कृत्यों को स्वयं करने में अशक्त हो तो पुत्र या सम्बन्धी को उसके लिए ऐसा कर देना चाहिए। जब व्यक्ति संकल्पित व्रत नहीं कर पाता तो मरते समय वह व्रतोद्यापन कृत्य करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====व्रतोद्यापन ====&lt;br /&gt;
संक्षेप में व्रतोद्यापन यों है-पुत्र या सम्बन्धी मरणासन्न व्यक्ति को स्नान द्वारा या पवित्र जल से मार्जन करके या गंगा जल पिलाकर पवित्र करता है, स्वयं स्नानसन्ध्या से पवित्र हो लेता है, दीप जलाता है, [[गणेश]] एवं [[विष्णु]] की पूजा-वन्दना करता है, पूजा की सामग्री रखकर संकल्प करता है&amp;lt;ref&amp;gt;संकल्प यह है-अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्वे.........अमुकतियौ अमुकगोत्र..........अमुकशमहिं ममात्मन: (मम पित्रादे:) व्रतग्रहणदिवसादारभ्य अद्य यावत्फलाभिलाषादिगृहीतानां निष्कामतया गृहीतानां च अमुकामुकव्रतानामकृतोद्यापनदोषपरिहारार्थ श्रुतिस्मृति-पुराणोक्ततत्तदव्रतजन्यसांगफलप्राप्त्यर्थ विष्ण्वादीनां तत्तद्देवानां प्रीपये इदं सुवर्णमग्निदैवतम् (तदभावे इदं रजतं चन्द्रदैवतम्) अमुकगोत्रायामुकशर्मण् ब्राह्मणाय दास्ये ओं तत्सत् न मम इति संकल्प........आदि-आदि (अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 4)’।&amp;lt;/ref&amp;gt; निमन्त्रित ब्राह्मण को सम्मानित करता है और पहले से संकल्पित सोना उसे देता है और ब्राह्मण घोषित करता है-'सभी व्रत पूर्ण हों। उद्यापन (व्रत-पूर्ति) के फल की प्राप्ति हो।' सर्वप्रायश्चित में पुत्र चार या तीन विद्वान ब्राह्मणों या एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण को 6, 3 या डेढ़ वर्ष वाले प्रायश्चित्तों के निष्क्रिय रूप में सोना आदि का दान देता है और इसकी घोषणा करता है और वह अशौच के उपरान्त प्रायश्चित करता है। मरणासन्न व्यक्ति को या पुत्र या सम्बन्धी को सर्वप्रायश्चित करना पड़ता है। वह क्षीरकर्म करके स्नान करता है, पंचगव्य पीता है, चन्दनलेप एवं अन्य पदार्थों से एक ब्राह्मण को सम्मानित करता है, गोपूजा करके या उसके स्थान पर धन का दान करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;देशकालौ संकीर्त्य मम (मत्पत्रादेर्वां) ज्ञाताज्ञातकामाकामसकृदसकृत्कायिकवाचिकमानसिकतांसर्गिक-स्पृष्टास्पृष्ट-भुक्ताभुक्त-पीतापीतसकलपातकानुपातकोपपातकलघुपातकसंकरीकरणमलिनीकरणपात्री- करणजातिभ्रंशकरप्रकीर्णकादिनानाविधपातकानां निरासेन देहावसानकाले देहशुद्धिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थमिमां सर्वप्रायश्चित्तप्रत्याम्नायभूतां यथाशक्त्यलंकृतां सवत्सां गां रुद्रदेवताममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ओं तत्सत् न मम। अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 5)।&amp;lt;/ref&amp;gt; सर्वप्रायश्चित के उपरान्त दश-दान होते हैं। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण  2|4|7-9&amp;lt;/ref&amp;gt; ने महादान संज्ञक अन्य दानों की व्यवस्था दी है, यथा-[[तिल]], [[लोहा]], सोना, रूई, नमक, सात प्रकार के अन्न, भूमि, गौ; कुछ अन्य दान भी हैं, यथा-छाता, [[चन्दन]], अँगूठी, जलपात्र, आसन, भोजन, जिन्हें पददान कहा जाता है। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2|4|47&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यदि मरणासन्न व्यक्ति आतुर-संन्यास नियमों के अनुसार संन्यास ग्रहण कर लेता है, तो वह आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा पा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदिकाल से ही ऐसा विश्वास रहा है कि मरते समय व्यक्ति जो विचार रखता है, उसी के अनुसार दैहिक जीवन के उपरान्त उसका जीवात्मा आक्रान्त होता है (अन्ते या मति: सा गति:), अत: मृत्यु के समय व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया छोड़कर हरि या [[शिव]] का स्मरण करना चाहिए और मन ही मन 'ऊँ नमो वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8।5-6) एवं [[पद्म पुराण]] (5।47।262)-'मरणे या मति: पुंसां गतिर्भवति तादृशी।'&amp;lt;/ref&amp;gt; बहुत से वचनों के अनुसार उसे वैदिक पाठ सुनाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम-पितृमेधसूत्र 1|1-8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मरणासन्न व्यक्ति द्वारा स्मरण====&lt;br /&gt;
हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र 1|1&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से आहिताग्नि के मरते समय पुत्र या सम्बन्धी को उसके कान में (जब वह ब्रह्मज्ञानी हो) [[तैत्तिरीयोपनिषद]] के दो अनुवाक (2|1 एवं 3|1) कहने चाहिए। अन्त्यकर्मदीपक&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक  पृष्ठ 18&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जब मरणासन्न व्यक्ति जप न कर सके तो उसे [[विष्णु]] या शिव का रमणीय रूप मन में धारण कर विष्णु या शिव के सहस्र नाम सुनने चाहिए और भगवद्गीता, भागवत, [[रामायण]], ईशावास्य आदि [[उपनिषद|उपनिषदों]] एवं सामवेदीय मन्त्रों का पाठ सुनना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;जपेऽसमर्थश्चेद हृदये चतुर्भुजं शंखचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरकिरीटकेयूरकौस्तुभवनमालाधरं रमणीयरूपं विष्णुं त्रिशूलडमरुधरं त्रिनेत्रं गंगाधरं शिवं वा भावयन् सहस्रनामगीताभागवतभारतरामायणेशावास्याद्युपनिषद: पावमानादीनि सूक्तानि च यथासम्भवं शृणुयात्। अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 18)। विष्णुसहस्रनाम के लिए देखिए [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]] (149|14-120); शिव के 1008 नामों के लिए देखिए वही (17|31-153); और शिव सहस्रनाम के लिए देखिए शान्तिपर्व भी (285|74)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपनिषदों में भी मरणासन्न व्यक्ति की भावनाओं के विषय में संकेत मिलते हैं। [[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]] (शाण्डिल्य-विद्या, 314|1)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'सभी ब्रह्म है। व्यक्ति को आदि, अन्त एवं इसी स्थिति के रूप में इसका (ब्रह्म का) ध्यान करना चाहिए। इसी की इच्छा की सृष्टि मनुष्य है। इस विश्व में उसकी जो इच्छा (या भावना) होगी, उसी के अनुसार वह इहलोक से जाने के उपरान्त होगा।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वखल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीताथ खलु क्रतुमय: पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत: प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत। छान्दोग्योपनिषद् (3|14|1)। अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:।। यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावित:।। भगवद्गीता (8|5-6) देखिए और शंकरभाष्य, वेदान्तसूत्र (1|2|1 एवं 4|1|12)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार की भावना [[प्रश्नोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रश्नोपनिषद]] 3|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है। वहाँ ऐसा आया है कि विचार-शक्ति आत्मा को उच्चतर उठाती जाती है, जिससे मनुष्य-मन को ऐसा परिज्ञान होना चाहिए कि अखिल ब्रह्माण्ड में जितने भौतिक पदार्थ या अभिव्यक्तियाँ हैं, वे सब एक हैं और उनमें एक ही विभु रूप समाया हुआ है। भगवद्गीता ने यही भावना और अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त की है-'वह व्यक्ति, जो अन्तकाल में मुझे स्मरण करता हुआ इस जीवन से विदा होता है, वह मेरे पास आता है, इसमें संशय नहीं है'।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रश्नोपनिषद 8|5 &amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु एक बात स्मरणीय यह है कि अन्तकाल में ही केवल भगवान का स्मरण करने से कुछ न होगा, जब जीवन भर आत्मा ऐसी भावना से अभिभूत रहता है, तभी भगवत्प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है-'व्यक्ति मृत्यु के समय जो भी रूप (या वस्तु) सोचता है, उसी को वह प्राप्त होता है, और यह तभी सम्भव है, जबकि वह जीवन भर ऐसा करता आया हो।'&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता 8|6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के आधार पर कुछ निबन्धों का ऐसा कथन है कि अन्तकाल उपस्थित होने पर व्यक्ति को, यदि सम्भव हो तो, किसी तीर्थ-स्थान (यथा गंगा) में ले जाना चाहिए। शुद्धितत्त्व&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व पृष्ठ 299&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[कूर्मपुराण]] को उद्धृत किया है-'[[गंगा]] के जल में, [[वाराणसी]] के स्थल या जल में, गंगासागर में या उसकी भूमि, जल या अन्तरिक्ष में मरने से व्यक्ति मोक्ष (संसार से अन्तिम छुटकारा) पाता है।' इसी अर्थ में स्कन्दपुराण में आया है-'गंगा के तटों से एक गव्यूति (दो कोस) तक क्षेत्र (पवित्र स्थान) होता है, इतनी दूर तक दान, जप एवं होम करने से गंगा का ही फल प्राप्त होता है; जो इस क्षेत्र में मरता है, वह स्वर्ग जाता है और पुन: जन्म नहीं पाता'।&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 299-300; शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 155&amp;lt;/ref&amp;gt; पूजारत्नाकर में आया है-'जहाँ जहाँ शालग्रामशिला होती है, वहाँ हरि का निवास रहता है; जो शालग्रामशिला के पास मरता है, वह हरि का परमपद प्राप्त करता है।' ऐसा भी कहा गया है कि यदि कोई अनार्य देश (कीकट) में भी शालग्राम से एक कोस की दूरी पर मरता है, वह [[वैकुण्ठ]] (विष्णुलोक) पाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति [[तुलसी]] के वन में मरता है या मरते समय जिसके मुख में तुलसीदल रहता है, वह करोड़ों पाप करने पर भी मोक्षपद प्राप्त करता है। इस प्रकार की भावनाएँ आज भी लोकप्रसिद्ध हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;कूर्मपुराणम्। गंगायां च जले मोक्षो वाराणस्यां जले स्थले। जले स्थले चान्तरिक्षे गंगासागरसंगमे।। तथा स्कन्दे-तीराद् गव्यूतिमात्रं तु परित: क्षेत्रमुच्यते। अत्र दानं जपो होमो गंगायां नात्र संशय:।। अत्रस्थास्त्रिदिवं यान्ति ये मृता न पुनर्भवा:। शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299-300); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)। पूजारत्नाकरे-शालग्रामशिला यत्र तत्र संनिहितो हरि:। तत्सन्निघौ त्यजेत् प्राणान् याति विष्णो: परं पदम्।। लिंगपुराणे-शालग्रामसमीपे तु क्रोशमात्रं समन्तत:।। कीकटेपि मृतो याति वैकुण्ठभवनं नर:। वैष्णवामृते व्यास:-तुलसीकानने जन्तोर्यदि मृत्युर्भवेत् क्वचित्। स निर्भर्त्स्य नरं पापी लीलयैव हरिं विशेत्।। प्रयाणकाले यस्यास्ये दीयते तुलसीदलम्। निर्वाणं याति पक्षीन्द्र पापकोटियृतोपि स:।। शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)। कीकट मगध देश का नाम है, जिसे ऋग्वेद (3।53।14) में आर्यधर्म से बाहर की भूमि कहा गया है। और देखिए निरुक्त (6।32) जहाँ कीकट देश को अनार्य निवास कहा गया है। शुद्धिप्रकाश ‘कीकटेपि’ के स्थान पर ‘कीटकोऽपि’ लिखता है जो अधिक समीचीन है, किन्तु यह संशोधन भी हो सकता है।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु का उत्तम काल==&lt;br /&gt;
मृत्यु के उत्तम काल के विषय में भी कुछ धारणाएँ हैं। [[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व (298।23, कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 254)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जो व्यक्ति सूर्य के उत्तर दिशा में जाने पर (उत्तरायण होने पर) मरता है या किसी अन्य शुभ [[नक्षत्र]] एवं मुहूर्त में मरता है, वह सचमुच पुण्यवान है।' यह भावना उपनिषदों में व्यक्त उत्तरायण एवं दक्षिणायन में मरने की धारणा पर आधारित है। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 4|15|5-6&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'अब (यदि यह आत्मज्ञानी व्यक्ति मरता है) चाहे लोग उसकी अन्त्येष्टि क्रिया ([[श्राद्ध]] आदि) करें या न करें, वह अर्चि: अर्थात् प्रकाश को प्राप्त होता है, प्रकाश से दिन, दिन से चन्द्र के अर्ध प्रकाश ([[शुक्ल पक्ष]]), उससे उत्तरायण के छ: मास, उससे वर्ष, वर्ष से [[सूर्य]], सूर्य से चन्द्र, [[चन्द्र ग्रह|चन्द्र]] से विद्युत को प्राप्त होता है। अमानव उसे ब्रह्म की ओर ले जाता है। यह देवों का मार्ग है; वह मार्ग, जिससे ब्रह्म की प्राप्ति होती है। जो लोग इस मार्ग से जाते हैं, वे मानव जीवन में पुन: नहीं लौटते। हाँ, वे नहीं लौटते।' ऐसी ही बात छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5।10।1-2&amp;lt;/ref&amp;gt; में आयी है, जहाँ कहा गया है कि पंचाग्नि-विद्या जानने वाले गृहस्थ तथा विश्वास (श्रद्धा) एवं तप करने वाले वानप्रस्थ एवं परिव्राजक (जो अभी ब्रह्म को नहीं जानते) भी देवयान (देवमार्ग) से जाते हैं। और जो लोग ग्रामवासी हैं,&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5|10|3-7&amp;lt;/ref&amp;gt; यज्ञपरायण हैं, दान-दक्षिणायुक्त हैं, धूम को जाते हैं, वे धूम से रात्रि, रात्रि से चन्द्र के अर्ध अंधकार ([[कृष्ण पक्ष]]) में, उससे दक्षिणायन के छ: मास, उससे पितृलोक, उससे आकाश एवं चन्द्र को जाते हैं, जहाँ वे कर्मफल पाते हैं और पुन: उसी मार्ग से लौट आते हैं। छान्दोग्योपनिषद&amp;lt;ref&amp;gt;छान्दोग्योपनिषद 5|10|8&amp;lt;/ref&amp;gt; ने एक तीसरे स्थान की ओर संकेत किया है, जहाँ कीट-पतंग आदि लगातार आते-जाते रहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बृहदारण्यकोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;बृहदारण्यकोपनिषद 6|2|115-16&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी देवलोग, पितृलोक एवं उस लोक का उल्लेख किया है, जहाँ कीट, पतंग आदि जाते हैं। भगवद्गीता&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता 8|23-25&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी उपनिषदों के इन वचनों को सूक्ष्म रूप में कहा है-मैं उन कालों का वर्णन करूँगा, जब कि भक्तगण कभी न लौटने के लिए इस विश्व से विदा होते हैं। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण सूर्य के छ:; जब ब्रह्मज्ञानी इन कालों में मरते हैं, तो ब्रह्मलोक जाते हैं। धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष, दक्षिणायन सूर्य के छ: मासों में मरने वाले भक्तगण चन्द्रलोक में जाते हैं और पुन: लौट आते हैं। इस विषय में ये दो मार्ग, जो प्रकाशमान एवं अंधकारमय हैं, सनातन हैं। एक से जाने वाला कभी नहीं लौटता, किन्तु दूसरे से आने वाला लौट आता है। वेदान्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वेदान्तसूत्र 4|3|4-6&amp;lt;/ref&amp;gt; ने 'प्रकाश', 'दिन' आदि शब्दों को यथाश्रुत शाब्दिक अर्थ में लेने को नहीं कहा है; अर्थात् उसके मत से ये मार्गों के लक्षण या स्तर नहीं हैं, प्रत्युत ये उन देवताओं के प्रतीक हैं, जो मृतात्माओं को सहायता देते हैं और देवलोक एवं पितृलोक के मार्गों में उन्हें ले जाते हैं, अर्थात् वे आतिवाहिक एवं अभिमानी देवता हैं। शंकर ने वेदान्तसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;वेदान्तसूत्र (4|2|20 अतश्चायनेपि दक्षिणे)&amp;lt;/ref&amp;gt; की व्याख्या में बताया है कि जब [[भीष्म]] ने उत्तरायण की बाट जोही तो इससे यही समझना चाहिए कि वहाँ अर्चिरादि की प्रशस्ति मात्र है-जो ब्रह्मज्ञानी है, वह यदि दक्षिणायन में मर जाता है तो भी वह अपने ज्ञान का फल पाता है, अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त करता है। जब भीष्म ने उत्तरायण की बाट जोही तो ऐसा करके उन्होंने केवल लोकप्रसिद्ध प्रयोग या आचरण को मान्यता दी और उन्होंने यह भी प्रकट किया कि उनमें यह शक्ति भी थी कि वे अपनी इच्छाशक्ति से ही मर सकते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें ऐसा वर दे रखा था।&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति (3|9193-196) 'देवयान' एवं 'पितृयान' के विषय में देखिए ऋग्वेद में भी, यथा-3|58|5; 7|38|8; 7|76|2; 10|51|5; 10|98|11; 10|18|1; 10|2|7 और [[तैत्तिरीय ब्राह्मण]] (2|6|3|5); [[शतपथ ब्राह्मण]] (1।9।3।2); बृहदारण्यकोपनिषद् (1।5।16)।&amp;lt;/ref&amp;gt; शंकर एवं वेदान्तसूत्र के वचनों के रहते हुए भी लोकप्रसिद्ध बात यही रही है कि उत्तरायण में मरना उत्तम है।&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 2।|7|21 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 2|7|1-2&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=231086</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=231086"/>
		<updated>2011-10-31T11:47:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&amp;lt;ref&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’ और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:........।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गधा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पृष्ठ 251&amp;lt;/ref&amp;gt; या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
==मरणासन्न  प्रथा==&lt;br /&gt;
[[भारत]] के अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं। यह प्रथा [[यूरोप]] में भी है।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रो. एडगर्टन का लेख; ‘दी आवर आव डेथ’, एनल्स आव दी भण्डारकर ओ. आर. इंस्टीट्यूट, जिल्द 8, पृष्ठ 219-249&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  80|3&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है; जब व्यक्ति शक्तिहीन होता है, अर्थात् मरने लगता है तो (पुत्र या सेवा करने वाला कोई सम्बन्धी) शाला में लगी हुई घास पर कुश बिछा देता है और उसे 'स्योनास्मै भव' मन्त्र के साथ (बिस्तर या खाट से) उठाकर उस पर रख देता है। &lt;br /&gt;
*बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3|1|18&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से जब यजमान के मरने का भय हो जाए तो यज्ञशाला में पृथिवी पर बालू बिछा देनी चाहिए और उस पर दर्भ फैला देने चाहिए, जिनकी नोंक दक्षिण की ओर होती है, मरणासन्न के दायें कान में 'आयुष: प्राणं सन्तनु' से आरम्भ होने वाले अनुवाक का पाठ (पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धी द्वारा) होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3।22), पितृदयिता आदि। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलीभवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोहयति। &lt;br /&gt;
मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते। यत्ते कृष्णेत्यवदीपयति। कौशिक. (80|3-5)। 'स्योनास्मै' मन्त्र के लिए देखिए [[अथर्ववेद]] (18-2-19), [[ऋग्वेद]] (1|22|15) एवं वाजसनेयीसंहिता (36|13), देखिए निरुक्त (9|32)।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पितृदयिता (पृष्ठ 74) में आया है-'यदा कण्ठस्थानगतजीवी विह्वलो देही भवति तदा बहिर्गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ कुशान्दक्षिणाग्रानास्तीर्य तदुपरि दक्षिणशिरसं स्थापयित्वा सुवर्णरजतगोभूमिदीपतिलपात्राणि दापयेत्। &lt;br /&gt;
गोभिलस्मृति (3।22)-‘दुर्बलं स्नापयित्वा तु शुद्धचैलाभिसंवृतम्। दक्षिणाशिरसं भूमौ बहिष्मत्यां निवेशयेत्।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश  पृष्ठ 151-152&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि जब कोई व्यक्ति मृतप्राय हो, उसकी आंखें आधी बन्द हो गई हों और वह खाट से नीचे उतार दिया गया हो, तो उसके पुत्र या किसी सम्बन्धी को चाहिए कि वह उससे निम्न प्रकार का कोई एक या सभी प्रकार के दस दान कराये-[[गौ]], भूमि, तिल, [[सोना]], घृत, [[वस्त्र]], धान्य, गुड़, रजत ([[चाँदी]]) एवं [[नमक]]।&amp;lt;ref&amp;gt;दानानि च जातूकर्ण्य आह। उत्क्रान्तिवैतरण्यौ च दश दानानि चैव हि। प्रेतेऽपि कृत्वा तं प्रेतं शवधर्मेण दाहयेत्।.....दश दानानि च तेनैवोक्तानि। गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च। रूप्यं लवणमित्याहुर्दश दानान्यनुक्रमात्।। शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 152)। और देखिए [[गरुड़ पुराण]] (प्रेतखण्ड, 4।4); एपिग्रैफ़िया इण्डिका (जिल्द 19, पृष्ठ 230)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये दान गयाश्राद्ध या सैकड़ों अश्वमेधों से बढ़कर हैं। संकल्प इस प्रकार का होता है-'अभ्युदय (स्वर्ग) की प्राप्ति या पापमोचन के लिए मैं दस दान करूँगा।' दस दानों के उपरान्त उत्क्रान्ति-धेनु (मृत्यु को ध्यान में रखकर बछड़े के साथ गौ) दी जाती है, और इसके उपरान्त वैतरणी गौ का दान किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;आसन्नमृत्युना देया गौ: सवत्सा तु पूर्ववत्। तदभावे तु गौरेव नरकोत्तरणाय च।। तदा यदि न शक्नोति दातुं वैतरणीं तु गाम। शक्तोऽन्योऽरुक् तदा दत्त्वा दद्याच्छ्रेयो मृतस्य च।। व्यास (शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 300; शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 153; अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 7)। गरुड़पुराण (प्रेतखण्ड, 4।6) में आया है-'नदीं वैतरणीं तर्तु दद्याद्वैतरणीं च गाम्। कृष्णस्तनी सकृष्णांगी सा वै वैतरणी स्मृता।।' ऐसा आया है कि यम के द्वार पर वैतरणी नाम की नदी है, जो रक्त एवं पैने अस्त्रों से परिपूर्ण है; जो लोग मरते समय गौदान करते हैं, वे उस नदी को गाय की पूँछ पकड़कर पार कर जाते हैं। [[स्कन्दपुराण]] 6|226|32-33 जहाँ वैतरणी की चर्चा है; ‘मृत्युकाले प्रचच्छन्ति ये धेनुं ब्राह्मणाय वै। तस्या: पुच्छं समाश्रित्य ते तरन्ति च तां नृप।।’&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 152-153&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन मन्त्रों का (जो वैदिक नहीं है) उल्लेख है जो दानों के समय कहे जाते हैं। अन्त्येष्टिपद्धति अन्त्यकर्मदीपक आदि ने व्यवस्था दी है कि जब व्यक्ति आसन्नमृत्यु हो, तो उसके पुत्र या सम्बन्धियों को चाहिए कि वे उससे व्रतोद्यापन, सर्वप्रायश्चित्त एवं दस दानों के कृत्य करायें, किन्तु यदि मरणासन्न इन कृत्यों को स्वयं करने में अशक्त हो तो पुत्र या सम्बन्धी को उसके लिए ऐसा कर देना चाहिए। जब व्यक्ति संकल्पित व्रत नहीं कर पाता तो मरते समय वह व्रतोद्यापन कृत्य करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====व्रतोद्यापन ====&lt;br /&gt;
संक्षेप में व्रतोद्यापन यों है-पुत्र या सम्बन्धी मरणासन्न व्यक्ति को स्नान द्वारा या पवित्र जल से मार्जन करके या गंगा जल पिलाकर पवित्र करता है, स्वयं स्नानसन्ध्या से पवित्र हो लेता है, दीप जलाता है, [[गणेश]] एवं [[विष्णु]] की पूजा-वन्दना करता है, पूजा की सामग्री रखकर संकल्प करता है&amp;lt;ref&amp;gt;संकल्प यह है-अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्वे.........अमुकतियौ अमुकगोत्र..........अमुकशमहिं ममात्मन: (मम पित्रादे:) व्रतग्रहणदिवसादारभ्य अद्य यावत्फलाभिलाषादिगृहीतानां निष्कामतया गृहीतानां च अमुकामुकव्रतानामकृतोद्यापनदोषपरिहारार्थ श्रुतिस्मृति-पुराणोक्ततत्तदव्रतजन्यसांगफलप्राप्त्यर्थ विष्ण्वादीनां तत्तद्देवानां प्रीपये इदं सुवर्णमग्निदैवतम् (तदभावे इदं रजतं चन्द्रदैवतम्) अमुकगोत्रायामुकशर्मण् ब्राह्मणाय दास्ये ओं तत्सत् न मम इति संकल्प........आदि-आदि (अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 4)’।&amp;lt;/ref&amp;gt; निमन्त्रित ब्राह्मण को सम्मानित करता है और पहले से संकल्पित सोना उसे देता है और ब्राह्मण घोषित करता है-'सभी व्रत पूर्ण हों। उद्यापन (व्रत-पूर्ति) के फल की प्राप्ति हो।' सर्वप्रायश्चित में पुत्र चार या तीन विद्वान ब्राह्मणों या एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण को 6, 3 या डेढ़ वर्ष वाले प्रायश्चित्तों के निष्क्रिय रूप में सोना आदि का दान देता है और इसकी घोषणा करता है और वह अशौच के उपरान्त प्रायश्चित करता है। मरणासन्न व्यक्ति को या पुत्र या सम्बन्धी को सर्वप्रायश्चित करना पड़ता है। वह क्षीरकर्म करके स्नान करता है, पंचगव्य पीता है, चन्दनलेप एवं अन्य पदार्थों से एक ब्राह्मण को सम्मानित करता है, गोपूजा करके या उसके स्थान पर धन का दान करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;देशकालौ संकीर्त्य मम (मत्पत्रादेर्वां) ज्ञाताज्ञातकामाकामसकृदसकृत्कायिकवाचिकमानसिकतांसर्गिक-स्पृष्टास्पृष्ट-भुक्ताभुक्त-पीतापीतसकलपातकानुपातकोपपातकलघुपातकसंकरीकरणमलिनीकरणपात्री- करणजातिभ्रंशकरप्रकीर्णकादिनानाविधपातकानां निरासेन देहावसानकाले देहशुद्धिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थमिमां सर्वप्रायश्चित्तप्रत्याम्नायभूतां यथाशक्त्यलंकृतां सवत्सां गां रुद्रदेवताममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ओं तत्सत् न मम। अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 5)।&amp;lt;/ref&amp;gt; सर्वप्रायश्चित के उपरान्त दश-दान होते हैं। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण  2|4|7-9&amp;lt;/ref&amp;gt; ने महादान संज्ञक अन्य दानों की व्यवस्था दी है, यथा-[[तिल]], [[लोहा]], सोना, रूई, नमक, सात प्रकार के अन्न, भूमि, गौ; कुछ अन्य दान भी हैं, यथा-छाता, [[चन्दन]], अँगूठी, जलपात्र, आसन, भोजन, जिन्हें पददान कहा जाता है। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2|4|47&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यदि मरणासन्न व्यक्ति आतुर-संन्यास नियमों के अनुसार संन्यास ग्रहण कर लेता है, तो वह आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा पा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदिकाल से ही ऐसा विश्वास रहा है कि मरते समय व्यक्ति जो विचार रखता है, उसी के अनुसार दैहिक जीवन के उपरान्त उसका जीवात्मा आक्रान्त होता है (अन्ते या मति: सा गति:), अत: मृत्यु के समय व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया छोड़कर हरि या [[शिव]] का स्मरण करना चाहिए और मन ही मन 'ऊँ नमो वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8।5-6) एवं [[पद्म पुराण]] (5।47।262)-'मरणे या मति: पुंसां गतिर्भवति तादृशी।'&amp;lt;/ref&amp;gt; बहुत से वचनों के अनुसार उसे वैदिक पाठ सुनाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम-पितृमेधसूत्र 1|1-8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मरणासन्न व्यक्ति द्वारा स्मरण====&lt;br /&gt;
हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र 1|1&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से आहिताग्नि के मरते समय पुत्र या सम्बन्धी को उसके कान में (जब वह ब्रह्मज्ञानी हो) [[तैत्तिरीयोपनिषद]] के दो अनुवाक (2|1 एवं 3|1) कहने चाहिए। अन्त्यकर्मदीपक&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक  पृष्ठ 18&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जब मरणासन्न व्यक्ति जप न कर सके तो उसे [[विष्णु]] या शिव का रमणीय रूप मन में धारण कर विष्णु या शिव के सहस्र नाम सुनने चाहिए और भगवद्गीता, भागवत, [[रामायण]], ईशावास्य आदि [[उपनिषद|उपनिषदों]] एवं सामवेदीय मन्त्रों का पाठ सुनना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;जपेऽसमर्थश्चेद हृदये चतुर्भुजं शंखचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरकिरीटकेयूरकौस्तुभवनमालाधरं रमणीयरूपं विष्णुं त्रिशूलडमरुधरं त्रिनेत्रं गंगाधरं शिवं वा भावयन् सहस्रनामगीताभागवतभारतरामायणेशावास्याद्युपनिषद: पावमानादीनि सूक्तानि च यथासम्भवं शृणुयात्। अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 18)। विष्णुसहस्रनाम के लिए देखिए [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]] (149|14-120); शिव के 1008 नामों के लिए देखिए वही (17|31-153); और शिव सहस्रनाम के लिए देखिए शान्तिपर्व भी (285|74)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपनिषदों में भी मरणासन्न व्यक्ति की भावनाओं के विषय में संकेत मिलते हैं। [[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]] (शाण्डिल्य-विद्या, 314|1)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'सभी ब्रह्म है। व्यक्ति को आदि, अन्त एवं इसी स्थिति के रूप में इसका (ब्रह्म का) ध्यान करना चाहिए। इसी की इच्छा की सृष्टि मनुष्य है। इस विश्व में उसकी जो इच्छा (या भावना) होगी, उसी के अनुसार वह इहलोक से जाने के उपरान्त होगा।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वखल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीताथ खलु क्रतुमय: पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत: प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत। छान्दोग्योपनिषद् (3|14|1)। अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:।। यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावित:।। भगवद्गीता (8|5-6) देखिए और शंकरभाष्य, वेदान्तसूत्र (1|2|1 एवं 4|1|12)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार की भावना [[प्रश्नोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रश्नोपनिषद]] 3|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है। वहाँ ऐसा आया है कि विचार-शक्ति आत्मा को उच्चतर उठाती जाती है, जिससे मनुष्य-मन को ऐसा परिज्ञान होना चाहिए कि अखिल ब्रह्माण्ड में जितने भौतिक पदार्थ या अभिव्यक्तियाँ हैं, वे सब एक हैं और उनमें एक ही विभु रूप समाया हुआ है। भगवद्गीता ने यही भावना और अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त की है-'वह व्यक्ति, जो अन्तकाल में मुझे स्मरण करता हुआ इस जीवन से विदा होता है, वह मेरे पास आता है, इसमें संशय नहीं है'।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रश्नोपनिषद 8|5 &amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु एक बात स्मरणीय यह है कि अन्तकाल में ही केवल भगवान का स्मरण करने से कुछ न होगा, जब जीवन भर आत्मा ऐसी भावना से अभिभूत रहता है, तभी भगवत्प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है-'व्यक्ति मृत्यु के समय जो भी रूप (या वस्तु) सोचता है, उसी को वह प्राप्त होता है, और यह तभी सम्भव है, जबकि वह जीवन भर ऐसा करता आया हो।'&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता 8।6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के आधार पर कुछ निबन्धों का ऐसा कथन है कि अन्तकाल उपस्थित होने पर व्यक्ति को, यदि सम्भव हो तो, किसी तीर्थ-स्थान (यथा गंगा) में ले जाना चाहिए। शुद्धितत्त्व&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व पृष्ठ 299&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[कूर्मपुराण]] को उद्धृत किया है-'[[गंगा]] के जल में, [[वाराणसी]] के स्थल या जल में, गंगासागर में या उसकी भूमि, जल या अन्तरिक्ष में मरने से व्यक्ति मोक्ष (संसार से अन्तिम छुटकारा) पाता है।' इसी अर्थ में स्कन्दपुराण में आया है-'गंगा के तटों से एक गव्यूति (दो कोस) तक क्षेत्र (पवित्र स्थान) होता है, इतनी दूर तक दान, जप एवं होम करने से गंगा का ही फल प्राप्त होता है; जो इस क्षेत्र में मरता है, वह स्वर्ग जाता है और पुन: जन्म नहीं पाता'।&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 299-300; शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 155&amp;lt;/ref&amp;gt; पूजारत्नाकर में आया है-'जहाँ जहाँ शालग्रामशिला होती है, वहाँ हरि का निवास रहता है; जो शालग्रामशिला के पास मरता है, वह हरि का परमपद प्राप्त करता है।' ऐसा भी कहा गया है कि यदि कोई अनार्य देश (कीकट) में भी शालग्राम से एक कोस की दूरी पर मरता है, वह [[वैकुण्ठ]] (विष्णुलोक) पाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति [[तुलसी]] के वन में मरता है या मरते समय जिसके मुख में तुलसीदल रहता है, वह करोड़ों पाप करने पर भी मोक्षपद प्राप्त करता है। इस प्रकार की भावनाएँ आज भी लोकप्रसिद्ध हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;कूर्मपुराणम्। गंगायां च जले मोक्षो वाराणस्यां जले स्थले। जले स्थले चान्तरिक्षे गंगासागरसंगमे।। तथा स्कन्दे-तीराद् गव्यूतिमात्रं तु परित: क्षेत्रमुच्यते। अत्र दानं जपो होमो गंगायां नात्र संशय:।। अत्रस्थास्त्रिदिवं यान्ति ये मृता न पुनर्भवा:। शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299-300); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)। पूजारत्नाकरे-शालग्रामशिला यत्र तत्र संनिहितो हरि:। तत्सन्निघौ त्यजेत् प्राणान् याति विष्णो: परं पदम्।। लिंगपुराणे-शालग्रामसमीपे तु क्रोशमात्रं समन्तत:।। कीकटेपि मृतो याति वैकुण्ठभवनं नर:। वैष्णवामृते व्यास:-तुलसीकानने जन्तोर्यदि मृत्युर्भवेत् क्वचित्। स निर्भर्त्स्य नरं पापी लीलयैव हरिं विशेत्।। प्रयाणकाले यस्यास्ये दीयते तुलसीदलम्। निर्वाणं याति पक्षीन्द्र पापकोटियृतोपि स:।। शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)। कीकट मगध देश का नाम है, जिसे ऋग्वेद (3।53।14) में आर्यधर्म से बाहर की भूमि कहा गया है। और देखिए निरुक्त (6।32) जहाँ कीकट देश को अनार्य निवास कहा गया है। शुद्धिप्रकाश ‘कीकटेपि’ के स्थान पर ‘कीटकोऽपि’ लिखता है जो अधिक समीचीन है, किन्तु यह संशोधन भी हो सकता है।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृत्यु के उत्तम काल के विषय में भी कुछ धारणाएँ हैं। शान्तिपर्व (298।23, कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 254) में आया है-‘जो व्यक्ति सूर्य के उत्तर दिशा में जाने पर (उत्तरायण होने पर) मरता है या किसी अन्य शुभ नक्षत्र एवं मुहूर्त में मरता है, वह सचमुच पुण्यवान है।’ यह भावना उपनिषदों में व्यक्त उत्तरायण एवं दक्षिणायन में मरने की धारणा पर आधारित है। छान्दोग्योपनिषद् (4।15।5-6) में आया है-‘अब (यदि यह आत्मज्ञानी व्यक्ति मरता है) चाहे लोग उसकी अन्त्येष्टि क्रिया (श्राद्ध आदि) करें या न करें, वह अर्चि: अर्थात् प्रकाश को प्राप्त होता है, प्रकाश से दिन, दिन से चन्द्र के अर्ध प्रकाश (शुक्ल पक्ष), उससे उत्तरायण के छ: मास, उससे वर्ष, वर्ष से सूर्य, सूर्य से चन्द्र, चन्द्र से विद्युत को प्राप्त होता है। अमानव उसे ब्रह्म की ओर ले जाता है। यह देवों का मार्ग है; वह मार्ग, जिससे ब्रह्म की प्राप्ति होती है। जो लोग इस मार्ग से जाते हैं, वे मानव जीवन में पुन: नहीं लौटते। हाँ, वे नहीं लौटते।’ ऐसी ही बात छान्दोग्योपनिषद् (5।10।1-2) में आयी है, जहाँ कहा गया है कि पंचाग्नि-विद्या जानने वाले गृहस्थ तथा विश्वास (श्रद्धा) एवं तप करने वाले वानप्रस्थ एवं परिव्राजक (जो अभी ब्रह्म को नहीं जानते) भी देवयान (देवमार्ग) से जाते हैं। और (5।10।3-7) जो लोग ग्रामवासी हैं, यज्ञपरायण हैं, दान-दक्षिणायुक्त हैं, धूम को जाते हैं, वे धूम से रात्रि, रात्रि से चन्द्र के अर्ध अंधकार (कृष्ण पक्ष) में, उससे दक्षिणायन के छ: मास, उससे पितृलोक, उससे आकाश एवं चन्द्र को जाते हैं, जहाँ वे कर्मफल पाते हैं और पुन: उसी मार्ग से लौट आते हैं। छान्दोग्योपनिषद् (5|10।8) ने एक तीसरे स्थान की ओर संकेत किया है, जहाँ कीट-पतंग आदि लगातार आते-जाते रहते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् (6।2।115-16) ने भी देवलोग, पितृलोक एवं उस लोक का उल्लेख किया है, जहाँ कीट, पतंग आदि जाते हैं। भगवद्गीता (8।23-25) ने भी उपनिषदों के इन वचनों को सूक्ष्म रूप में कहा है-‘मैं उन कालों का वर्णन करूँगा, जब कि भक्तगण कभी न लौटने के लिए इस विश्व से विदा होते हैं। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण सूर्य के छ:; जब ब्रह्मज्ञानी इन कालों में मरते हैं, तो ब्रह्मलोक जाते हैं। धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष, दक्षिणायन सूर्य के छ: मासों में मरने वाले भक्तगण चन्द्रलोक में जाते हैं और पुन: लौट आते हैं। इस विषय में ये दो मार्ग, जो प्रकाशमान एवं अंधकारमय हैं, सनातन हैं। एक से जाने वाला कभी नहीं लौटता, किन्तु दूसरे से आने वाला लौट आता है। वेदान्तसूत्र (4।3।4-6) ने ‘प्रकाश’, ‘दिन’ आदि शब्दों को यथाश्रुत शाब्दिक अर्थ में लेने को नहीं कहा है; अर्थात् उसके मत से ये मार्गों के लक्षण या स्तर नहीं हैं, प्रत्युत ये उन देवताओं के प्रतीक हैं, जो मृतात्माओं को सहायता देते हैं और देवलोक एवं पितृलोक के मार्गों में उन्हें ले जाते हैं, अर्थात् वे आतिवाहिक एवं अभिमानी देवता हैं। शंकर ने वेदान्तसूत्र (4।2।20 अतश्चायनेपि दक्षिणे) की व्याख्या में बताया है कि जब भीष्म ने उत्तरायण की बाट जोही तो इससे यही समझना चाहिए कि वहाँ अर्चिरादि की प्रशस्ति मात्र है-जो ब्रह्मज्ञानी है, वह यदि दक्षिणायन में मर जाता है तो भी वह अपने ज्ञान का फल पाता है, अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त करता है। जब भीष्म ने उत्तरायण की बाट जोही तो ऐसा करके उन्होंने केवल लोकप्रसिद्ध प्रयोग या आचरण को मान्यता दी और उन्होंने यह भी प्रकट किया कि उनमें यह शक्ति भी थी कि वे अपनी इच्छाशक्ति से ही मर सकते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें ऐसा वर दे रखा था। और देखिए याज्ञवल्क्यस्मृति (3।9193-196)।&amp;lt;ref&amp;gt;‘देवयान’ एवं ‘पितृयान’ के विषय में देखिए ऋग्वेद में भी, यथा-3।58।5; 7।38।8; 7।76।2; 10।51।5; 10।98।11; 10।18।1; 10।2।7 और देखिए तैत्तिरीय ब्राह्मण (2।6।3।5); शतपथब्राह्मण (1।9।3।2); बृहदारण्यकोपनिषद् (1।5।16)।&amp;lt;/ref&amp;gt; शंकर एवं वेदान्तसूत्र के वचनों के रहते हुए भी लोकप्रसिद्ध बात यही रही है कि उत्तरायण में मरना उत्तम है (बौधायनपितृमेधसूत्र 2।7।21 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 2।7।1-2)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=231084</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=231084"/>
		<updated>2011-10-31T11:34:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&amp;lt;ref&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’ और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:........।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गधा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पृष्ठ 251&amp;lt;/ref&amp;gt; या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
==मरणासन्न  प्रथा==&lt;br /&gt;
[[भारत]] के अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं। यह प्रथा [[यूरोप]] में भी है।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रो. एडगर्टन का लेख; ‘दी आवर आव डेथ’, एनल्स आव दी भण्डारकर ओ. आर. इंस्टीट्यूट, जिल्द 8, पृष्ठ 219-249&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  80|3&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है; जब व्यक्ति शक्तिहीन होता है, अर्थात् मरने लगता है तो (पुत्र या सेवा करने वाला कोई सम्बन्धी) शाला में लगी हुई घास पर कुश बिछा देता है और उसे 'स्योनास्मै भव' मन्त्र के साथ (बिस्तर या खाट से) उठाकर उस पर रख देता है। &lt;br /&gt;
*बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3|1|18&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से जब यजमान के मरने का भय हो जाए तो यज्ञशाला में पृथिवी पर बालू बिछा देनी चाहिए और उस पर दर्भ फैला देने चाहिए, जिनकी नोंक दक्षिण की ओर होती है, मरणासन्न के दायें कान में 'आयुष: प्राणं सन्तनु' से आरम्भ होने वाले अनुवाक का पाठ (पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धी द्वारा) होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3।22), पितृदयिता आदि। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलीभवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोहयति। &lt;br /&gt;
मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते। यत्ते कृष्णेत्यवदीपयति। कौशिक. (80|3-5)। 'स्योनास्मै' मन्त्र के लिए देखिए [[अथर्ववेद]] (18-2-19), [[ऋग्वेद]] (1|22|15) एवं वाजसनेयीसंहिता (36|13), देखिए निरुक्त (9|32)।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पितृदयिता (पृष्ठ 74) में आया है-'यदा कण्ठस्थानगतजीवी विह्वलो देही भवति तदा बहिर्गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ कुशान्दक्षिणाग्रानास्तीर्य तदुपरि दक्षिणशिरसं स्थापयित्वा सुवर्णरजतगोभूमिदीपतिलपात्राणि दापयेत्। &lt;br /&gt;
गोभिलस्मृति (3।22)-‘दुर्बलं स्नापयित्वा तु शुद्धचैलाभिसंवृतम्। दक्षिणाशिरसं भूमौ बहिष्मत्यां निवेशयेत्।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश  पृष्ठ 151-152&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि जब कोई व्यक्ति मृतप्राय हो, उसकी आंखें आधी बन्द हो गई हों और वह खाट से नीचे उतार दिया गया हो, तो उसके पुत्र या किसी सम्बन्धी को चाहिए कि वह उससे निम्न प्रकार का कोई एक या सभी प्रकार के दस दान कराये-[[गौ]], भूमि, तिल, [[सोना]], घृत, [[वस्त्र]], धान्य, गुड़, रजत ([[चाँदी]]) एवं [[नमक]]।&amp;lt;ref&amp;gt;दानानि च जातूकर्ण्य आह। उत्क्रान्तिवैतरण्यौ च दश दानानि चैव हि। प्रेतेऽपि कृत्वा तं प्रेतं शवधर्मेण दाहयेत्।.....दश दानानि च तेनैवोक्तानि। गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च। रूप्यं लवणमित्याहुर्दश दानान्यनुक्रमात्।। शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 152)। और देखिए [[गरुड़ पुराण]] (प्रेतखण्ड, 4।4); एपिग्रैफ़िया इण्डिका (जिल्द 19, पृष्ठ 230)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये दान गयाश्राद्ध या सैकड़ों अश्वमेधों से बढ़कर हैं। संकल्प इस प्रकार का होता है-'अभ्युदय (स्वर्ग) की प्राप्ति या पापमोचन के लिए मैं दस दान करूँगा।' दस दानों के उपरान्त उत्क्रान्ति-धेनु (मृत्यु को ध्यान में रखकर बछड़े के साथ गौ) दी जाती है, और इसके उपरान्त वैतरणी गौ का दान किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;आसन्नमृत्युना देया गौ: सवत्सा तु पूर्ववत्। तदभावे तु गौरेव नरकोत्तरणाय च।। तदा यदि न शक्नोति दातुं वैतरणीं तु गाम। शक्तोऽन्योऽरुक् तदा दत्त्वा दद्याच्छ्रेयो मृतस्य च।। व्यास (शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 300; शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 153; अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 7)। गरुड़पुराण (प्रेतखण्ड, 4।6) में आया है-'नदीं वैतरणीं तर्तु दद्याद्वैतरणीं च गाम्। कृष्णस्तनी सकृष्णांगी सा वै वैतरणी स्मृता।।' ऐसा आया है कि यम के द्वार पर वैतरणी नाम की नदी है, जो रक्त एवं पैने अस्त्रों से परिपूर्ण है; जो लोग मरते समय गौदान करते हैं, वे उस नदी को गाय की पूँछ पकड़कर पार कर जाते हैं। [[स्कन्दपुराण]] 6|226|32-33 जहाँ वैतरणी की चर्चा है; ‘मृत्युकाले प्रचच्छन्ति ये धेनुं ब्राह्मणाय वै। तस्या: पुच्छं समाश्रित्य ते तरन्ति च तां नृप।।’&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 152-153&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन मन्त्रों का (जो वैदिक नहीं है) उल्लेख है जो दानों के समय कहे जाते हैं। अन्त्येष्टिपद्धति अन्त्यकर्मदीपक आदि ने व्यवस्था दी है कि जब व्यक्ति आसन्नमृत्यु हो, तो उसके पुत्र या सम्बन्धियों को चाहिए कि वे उससे व्रतोद्यापन, सर्वप्रायश्चित्त एवं दस दानों के कृत्य करायें, किन्तु यदि मरणासन्न इन कृत्यों को स्वयं करने में अशक्त हो तो पुत्र या सम्बन्धी को उसके लिए ऐसा कर देना चाहिए। जब व्यक्ति संकल्पित व्रत नहीं कर पाता तो मरते समय वह व्रतोद्यापन कृत्य करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====व्रतोद्यापन ====&lt;br /&gt;
संक्षेप में व्रतोद्यापन यों है-पुत्र या सम्बन्धी मरणासन्न व्यक्ति को स्नान द्वारा या पवित्र जल से मार्जन करके या गंगा जल पिलाकर पवित्र करता है, स्वयं स्नानसन्ध्या से पवित्र हो लेता है, दीप जलाता है, [[गणेश]] एवं [[विष्णु]] की पूजा-वन्दना करता है, पूजा की सामग्री रखकर संकल्प करता है&amp;lt;ref&amp;gt;संकल्प यह है-अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्वे.........अमुकतियौ अमुकगोत्र..........अमुकशमहिं ममात्मन: (मम पित्रादे:) व्रतग्रहणदिवसादारभ्य अद्य यावत्फलाभिलाषादिगृहीतानां निष्कामतया गृहीतानां च अमुकामुकव्रतानामकृतोद्यापनदोषपरिहारार्थ श्रुतिस्मृति-पुराणोक्ततत्तदव्रतजन्यसांगफलप्राप्त्यर्थ विष्ण्वादीनां तत्तद्देवानां प्रीपये इदं सुवर्णमग्निदैवतम् (तदभावे इदं रजतं चन्द्रदैवतम्) अमुकगोत्रायामुकशर्मण् ब्राह्मणाय दास्ये ओं तत्सत् न मम इति संकल्प........आदि-आदि (अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 4)’।&amp;lt;/ref&amp;gt; निमन्त्रित ब्राह्मण को सम्मानित करता है और पहले से संकल्पित सोना उसे देता है और ब्राह्मण घोषित करता है-'सभी व्रत पूर्ण हों। उद्यापन (व्रत-पूर्ति) के फल की प्राप्ति हो।' सर्वप्रायश्चित में पुत्र चार या तीन विद्वान ब्राह्मणों या एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण को 6, 3 या डेढ़ वर्ष वाले प्रायश्चित्तों के निष्क्रिय रूप में सोना आदि का दान देता है और इसकी घोषणा करता है और वह अशौच के उपरान्त प्रायश्चित करता है। मरणासन्न व्यक्ति को या पुत्र या सम्बन्धी को सर्वप्रायश्चित करना पड़ता है। वह क्षीरकर्म करके स्नान करता है, पंचगव्य पीता है, चन्दनलेप एवं अन्य पदार्थों से एक ब्राह्मण को सम्मानित करता है, गोपूजा करके या उसके स्थान पर धन का दान करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;देशकालौ संकीर्त्य मम (मत्पत्रादेर्वां) ज्ञाताज्ञातकामाकामसकृदसकृत्कायिकवाचिकमानसिकतांसर्गिक-स्पृष्टास्पृष्ट-भुक्ताभुक्त-पीतापीतसकलपातकानुपातकोपपातकलघुपातकसंकरीकरणमलिनीकरणपात्री- करणजातिभ्रंशकरप्रकीर्णकादिनानाविधपातकानां निरासेन देहावसानकाले देहशुद्धिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थमिमां सर्वप्रायश्चित्तप्रत्याम्नायभूतां यथाशक्त्यलंकृतां सवत्सां गां रुद्रदेवताममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ओं तत्सत् न मम। अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 5)।&amp;lt;/ref&amp;gt; सर्वप्रायश्चित के उपरान्त दश-दान होते हैं। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण  2|4|7-9&amp;lt;/ref&amp;gt; ने महादान संज्ञक अन्य दानों की व्यवस्था दी है, यथा-[[तिल]], [[लोहा]], सोना, रूई, नमक, सात प्रकार के अन्न, भूमि, गौ; कुछ अन्य दान भी हैं, यथा-छाता, [[चन्दन]], अँगूठी, जलपात्र, आसन, भोजन, जिन्हें पददान कहा जाता है। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2|4|47&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यदि मरणासन्न व्यक्ति आतुर-संन्यास नियमों के अनुसार संन्यास ग्रहण कर लेता है, तो वह आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा पा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदिकाल से ही ऐसा विश्वास रहा है कि मरते समय व्यक्ति जो विचार रखता है, उसी के अनुसार दैहिक जीवन के उपरान्त उसका जीवात्मा आक्रान्त होता है (अन्ते या मति: सा गति:), अत: मृत्यु के समय व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया छोड़कर हरि या [[शिव]] का स्मरण करना चाहिए और मन ही मन 'ऊँ नमो वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8।5-6) एवं [[पद्म पुराण]] (5।47।262)-'मरणे या मति: पुंसां गतिर्भवति तादृशी।'&amp;lt;/ref&amp;gt; बहुत से वचनों के अनुसार उसे वैदिक पाठ सुनाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम-पितृमेधसूत्र 1|1-8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मरणासन्न व्यक्ति द्वारा स्मरण====&lt;br /&gt;
हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;हिरण्यकेशिपितृमेधसूत्र 1|1&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से आहिताग्नि के मरते समय पुत्र या सम्बन्धी को उसके कान में (जब वह ब्रह्मज्ञानी हो) [[तैत्तिरीयोपनिषद]] के दो अनुवाक (2|1 एवं 3|1) कहने चाहिए। अन्त्यकर्मदीपक&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक  पृष्ठ 18&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि जब मरणासन्न व्यक्ति जप न कर सके तो उसे [[विष्णु]] या शिव का रमणीय रूप मन में धारण कर विष्णु या शिव के सहस्र नाम सुनने चाहिए और भगवद्गीता, भागवत, [[रामायण]], ईशावास्य आदि [[उपनिषद|उपनिषदों]] एवं सामवेदीय मन्त्रों का पाठ सुनना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;जपेऽसमर्थश्चेद हृदये चतुर्भुजं शंखचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरकिरीटकेयूरकौस्तुभवनमालाधरं रमणीयरूपं विष्णुं त्रिशूलडमरुधरं त्रिनेत्रं गंगाधरं शिवं वा भावयन् सहस्रनामगीताभागवतभारतरामायणेशावास्याद्युपनिषद: पावमानादीनि सूक्तानि च यथासम्भवं शृणुयात्। अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 18)। विष्णुसहस्रनाम के लिए देखिए [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]] (149|14-120); शिव के 1008 नामों के लिए देखिए वही (17|31-153); और शिव सहस्रनाम के लिए देखिए शान्तिपर्व भी (285|74)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपनिषदों में भी मरणासन्न व्यक्ति की भावनाओं के विषय में संकेत मिलते हैं। [[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्योपनिषद]] (शाण्डिल्य-विद्या, 314|1)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'सभी ब्रह्म है। व्यक्ति को आदि, अन्त एवं इसी स्थिति के रूप में इसका (ब्रह्म का) ध्यान करना चाहिए। इसी की इच्छा की सृष्टि मनुष्य है। इस विश्व में उसकी जो इच्छा (या भावना) होगी, उसी के अनुसार वह इहलोक से जाने के उपरान्त होगा।'&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वखल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीताथ खलु क्रतुमय: पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत: प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत। छान्दोग्योपनिषद् (3|14|1)। अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:।। यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावित:।। भगवद्गीता (8|5-6) देखिए और शंकरभाष्य, वेदान्तसूत्र (1|2|1 एवं 4|1|12)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार की भावना [[प्रश्नोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रश्नोपनिषद]] 3|10&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पायी जाती है। वहाँ ऐसा आया है कि विचार-शक्ति आत्मा को उच्चतर उठाती जाती है, जिससे मनुष्य-मन को ऐसा परिज्ञान होना चाहिए कि अखिल ब्रह्माण्ड में जितने भौतिक पदार्थ या अभिव्यक्तियाँ हैं, वे सब एक हैं और उनमें एक ही विभु रूप समाया हुआ है। भगवद्गीता ने यही भावना और अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त की है-'वह व्यक्ति, जो अन्तकाल में मुझे स्मरण करता हुआ इस जीवन से विदा होता है, वह मेरे पास आता है, इसमें संशय नहीं है'।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रश्नोपनिषद 8|5 &amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु एक बात स्मरणीय यह है कि अन्तकाल में ही केवल भगवान का स्मरण करने से कुछ न होगा, जब जीवन भर आत्मा ऐसी भावना से अभिभूत रहता है, तभी भगवत्प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है-'व्यक्ति मृत्यु के समय जो भी रूप (या वस्तु) सोचता है, उसी को वह प्राप्त होता है, और यह तभी सम्भव है, जबकि वह जीवन भर ऐसा करता आया हो।'&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता 8।6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों के आधार पर कुछ निबन्धों का ऐसा कथन है कि अन्तकाल उपस्थित होने पर व्यक्ति को, यदि सम्भव हो तो, किसी तीर्थ-स्थान (यथा गंगा) में ले जाना चाहिए। शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299) ने कूर्मपुराण को उद्धृत किया है-‘गंगा के जल में, वाराणसी के स्थल या जल में, गंगासागर में या उसकी भूमि, जल या अन्तरिक्ष में मरने से व्यक्ति मोक्ष (संसार से अन्तिम छुटकारा) पाता है।’ इसी अर्थ में स्कन्दपुराण में आया है-‘गंगा के तटों से एक गव्यूति (दो कोस) तक क्षेत्र (पवित्र स्थान) होता है, इतनी दूर तक दान, जप एवं होम करने से गंगा का ही फल प्राप्त होता है; जो इस क्षेत्र में मरता है, वह स्वर्ग जाता है और पुन: जन्म नहीं पाता’ (शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 299-300; शुद्धिप्रकाश, पृष्ठ 155)। पूजारत्नाकर में आया है-‘जहाँ जहाँ शालग्रामशिला होती है, वहाँ हरि का निवास रहता है; जो शालग्रामशिला के पास मरता है, वह हरि का परमपद प्राप्त करता है।’ ऐसा भी कहा गया है कि यदि कोई अनार्य देश (कीकट) में भी शालग्राम से एक कोस की दूरी पर मरता है, वह वैकुण्ठ (विष्णुलोक) पाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति तुलसी के वन में मरता है या मरते समय जिसके मुख में तुलसीदल रहता है, वह करोड़ों पाप करने पर भी मोक्षपद प्राप्त करता है। इस प्रकार की भावनाएँ आज भी लोकप्रसिद्ध हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;कूर्मपुराणम्। गंगायां च जले मोक्षो वाराणस्यां जले स्थले। जले स्थले चान्तरिक्षे गंगासागरसंगमे।। तथा स्कन्दे-तीराद् गव्यूतिमात्रं तु परित: क्षेत्रमुच्यते। अत्र दानं जपो होमो गंगायां नात्र संशय:।। अत्रस्थास्त्रिदिवं यान्ति ये मृता न पुनर्भवा:। शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299-300); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)। पूजारत्नाकरे-शालग्रामशिला यत्र तत्र संनिहितो हरि:। तत्सन्निघौ त्यजेत् प्राणान् याति विष्णो: परं पदम्।। लिंगपुराणे-शालग्रामसमीपे तु क्रोशमात्रं समन्तत:।। कीकटेपि मृतो याति वैकुण्ठभवनं नर:। वैष्णवामृते व्यास:-तुलसीकानने जन्तोर्यदि मृत्युर्भवेत् क्वचित्। स निर्भर्त्स्य नरं पापी लीलयैव हरिं विशेत्।। प्रयाणकाले यस्यास्ये दीयते तुलसीदलम्। निर्वाणं याति पक्षीन्द्र पापकोटियृतोपि स:।। शुद्धितत्त्व (पृष्ठ 299); शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 155)। कीकट मगध देश का नाम है, जिसे ऋग्वेद (3।53।14) में आर्यधर्म से बाहर की भूमि कहा गया है। और देखिए निरुक्त (6।32) जहाँ कीकट देश को अनार्य निवास कहा गया है। शुद्धिप्रकाश ‘कीकटेपि’ के स्थान पर ‘कीटकोऽपि’ लिखता है जो अधिक समीचीन है, किन्तु यह संशोधन भी हो सकता है।&amp;lt;/ref&amp;gt; मृत्यु के उत्तम काल के विषय में भी कुछ धारणाएँ हैं। शान्तिपर्व (298।23, कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 254) में आया है-‘जो व्यक्ति सूर्य के उत्तर दिशा में जाने पर (उत्तरायण होने पर) मरता है या किसी अन्य शुभ नक्षत्र एवं मुहूर्त में मरता है, वह सचमुच पुण्यवान है।’ यह भावना उपनिषदों में व्यक्त उत्तरायण एवं दक्षिणायन में मरने की धारणा पर आधारित है। छान्दोग्योपनिषद् (4।15।5-6) में आया है-‘अब (यदि यह आत्मज्ञानी व्यक्ति मरता है) चाहे लोग उसकी अन्त्येष्टि क्रिया (श्राद्ध आदि) करें या न करें, वह अर्चि: अर्थात् प्रकाश को प्राप्त होता है, प्रकाश से दिन, दिन से चन्द्र के अर्ध प्रकाश (शुक्ल पक्ष), उससे उत्तरायण के छ: मास, उससे वर्ष, वर्ष से सूर्य, सूर्य से चन्द्र, चन्द्र से विद्युत को प्राप्त होता है। अमानव उसे ब्रह्म की ओर ले जाता है। यह देवों का मार्ग है; वह मार्ग, जिससे ब्रह्म की प्राप्ति होती है। जो लोग इस मार्ग से जाते हैं, वे मानव जीवन में पुन: नहीं लौटते। हाँ, वे नहीं लौटते।’ ऐसी ही बात छान्दोग्योपनिषद् (5।10।1-2) में आयी है, जहाँ कहा गया है कि पंचाग्नि-विद्या जानने वाले गृहस्थ तथा विश्वास (श्रद्धा) एवं तप करने वाले वानप्रस्थ एवं परिव्राजक (जो अभी ब्रह्म को नहीं जानते) भी देवयान (देवमार्ग) से जाते हैं। और (5।10।3-7) जो लोग ग्रामवासी हैं, यज्ञपरायण हैं, दान-दक्षिणायुक्त हैं, धूम को जाते हैं, वे धूम से रात्रि, रात्रि से चन्द्र के अर्ध अंधकार (कृष्ण पक्ष) में, उससे दक्षिणायन के छ: मास, उससे पितृलोक, उससे आकाश एवं चन्द्र को जाते हैं, जहाँ वे कर्मफल पाते हैं और पुन: उसी मार्ग से लौट आते हैं। छान्दोग्योपनिषद् (5|10।8) ने एक तीसरे स्थान की ओर संकेत किया है, जहाँ कीट-पतंग आदि लगातार आते-जाते रहते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् (6।2।115-16) ने भी देवलोग, पितृलोक एवं उस लोक का उल्लेख किया है, जहाँ कीट, पतंग आदि जाते हैं। भगवद्गीता (8।23-25) ने भी उपनिषदों के इन वचनों को सूक्ष्म रूप में कहा है-‘मैं उन कालों का वर्णन करूँगा, जब कि भक्तगण कभी न लौटने के लिए इस विश्व से विदा होते हैं। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण सूर्य के छ:; जब ब्रह्मज्ञानी इन कालों में मरते हैं, तो ब्रह्मलोक जाते हैं। धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष, दक्षिणायन सूर्य के छ: मासों में मरने वाले भक्तगण चन्द्रलोक में जाते हैं और पुन: लौट आते हैं। इस विषय में ये दो मार्ग, जो प्रकाशमान एवं अंधकारमय हैं, सनातन हैं। एक से जाने वाला कभी नहीं लौटता, किन्तु दूसरे से आने वाला लौट आता है। वेदान्तसूत्र (4।3।4-6) ने ‘प्रकाश’, ‘दिन’ आदि शब्दों को यथाश्रुत शाब्दिक अर्थ में लेने को नहीं कहा है; अर्थात् उसके मत से ये मार्गों के लक्षण या स्तर नहीं हैं, प्रत्युत ये उन देवताओं के प्रतीक हैं, जो मृतात्माओं को सहायता देते हैं और देवलोक एवं पितृलोक के मार्गों में उन्हें ले जाते हैं, अर्थात् वे आतिवाहिक एवं अभिमानी देवता हैं। शंकर ने वेदान्तसूत्र (4।2।20 अतश्चायनेपि दक्षिणे) की व्याख्या में बताया है कि जब भीष्म ने उत्तरायण की बाट जोही तो इससे यही समझना चाहिए कि वहाँ अर्चिरादि की प्रशस्ति मात्र है-जो ब्रह्मज्ञानी है, वह यदि दक्षिणायन में मर जाता है तो भी वह अपने ज्ञान का फल पाता है, अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त करता है। जब भीष्म ने उत्तरायण की बाट जोही तो ऐसा करके उन्होंने केवल लोकप्रसिद्ध प्रयोग या आचरण को मान्यता दी और उन्होंने यह भी प्रकट किया कि उनमें यह शक्ति भी थी कि वे अपनी इच्छाशक्ति से ही मर सकते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें ऐसा वर दे रखा था। और देखिए याज्ञवल्क्यस्मृति (3।9193-196)।&amp;lt;ref&amp;gt;‘देवयान’ एवं ‘पितृयान’ के विषय में देखिए ऋग्वेद में भी, यथा-3।58।5; 7।38।8; 7।76।2; 10।51।5; 10।98।11; 10।18।1; 10।2।7 और देखिए तैत्तिरीय ब्राह्मण (2।6।3।5); शतपथब्राह्मण (1।9।3।2); बृहदारण्यकोपनिषद् (1।5।16)।&amp;lt;/ref&amp;gt; शंकर एवं वेदान्तसूत्र के वचनों के रहते हुए भी लोकप्रसिद्ध बात यही रही है कि उत्तरायण में मरना उत्तम है (बौधायनपितृमेधसूत्र 2।7।21 एवं गौतमपितृमेधसूत्र 2।7।1-2)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
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		<updated>2011-10-31T11:14:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: /* व्रतोद्यापन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&amp;lt;ref&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’ और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:........।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गधा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पृष्ठ 251&amp;lt;/ref&amp;gt; या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
==मरणासन्न  प्रथा==&lt;br /&gt;
[[भारत]] के अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं। यह प्रथा [[यूरोप]] में भी है।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रो. एडगर्टन का लेख; ‘दी आवर आव डेथ’, एनल्स आव दी भण्डारकर ओ. आर. इंस्टीट्यूट, जिल्द 8, पृष्ठ 219-249&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  80|3&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है; जब व्यक्ति शक्तिहीन होता है, अर्थात् मरने लगता है तो (पुत्र या सेवा करने वाला कोई सम्बन्धी) शाला में लगी हुई घास पर कुश बिछा देता है और उसे 'स्योनास्मै भव' मन्त्र के साथ (बिस्तर या खाट से) उठाकर उस पर रख देता है। &lt;br /&gt;
*बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3|1|18&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से जब यजमान के मरने का भय हो जाए तो यज्ञशाला में पृथिवी पर बालू बिछा देनी चाहिए और उस पर दर्भ फैला देने चाहिए, जिनकी नोंक दक्षिण की ओर होती है, मरणासन्न के दायें कान में 'आयुष: प्राणं सन्तनु' से आरम्भ होने वाले अनुवाक का पाठ (पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धी द्वारा) होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3।22), पितृदयिता आदि। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलीभवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोहयति। &lt;br /&gt;
मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते। यत्ते कृष्णेत्यवदीपयति। कौशिक. (80|3-5)। 'स्योनास्मै' मन्त्र के लिए देखिए [[अथर्ववेद]] (18-2-19), [[ऋग्वेद]] (1|22|15) एवं वाजसनेयीसंहिता (36|13), देखिए निरुक्त (9|32)।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पितृदयिता (पृष्ठ 74) में आया है-'यदा कण्ठस्थानगतजीवी विह्वलो देही भवति तदा बहिर्गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ कुशान्दक्षिणाग्रानास्तीर्य तदुपरि दक्षिणशिरसं स्थापयित्वा सुवर्णरजतगोभूमिदीपतिलपात्राणि दापयेत्। &lt;br /&gt;
गोभिलस्मृति (3।22)-‘दुर्बलं स्नापयित्वा तु शुद्धचैलाभिसंवृतम्। दक्षिणाशिरसं भूमौ बहिष्मत्यां निवेशयेत्।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश  पृष्ठ 151-152&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि जब कोई व्यक्ति मृतप्राय हो, उसकी आंखें आधी बन्द हो गई हों और वह खाट से नीचे उतार दिया गया हो, तो उसके पुत्र या किसी सम्बन्धी को चाहिए कि वह उससे निम्न प्रकार का कोई एक या सभी प्रकार के दस दान कराये-[[गौ]], भूमि, तिल, [[सोना]], घृत, [[वस्त्र]], धान्य, गुड़, रजत ([[चाँदी]]) एवं [[नमक]]।&amp;lt;ref&amp;gt;दानानि च जातूकर्ण्य आह। उत्क्रान्तिवैतरण्यौ च दश दानानि चैव हि। प्रेतेऽपि कृत्वा तं प्रेतं शवधर्मेण दाहयेत्।.....दश दानानि च तेनैवोक्तानि। गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च। रूप्यं लवणमित्याहुर्दश दानान्यनुक्रमात्।। शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 152)। और देखिए [[गरुड़ पुराण]] (प्रेतखण्ड, 4।4); एपिग्रैफ़िया इण्डिका (जिल्द 19, पृष्ठ 230)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये दान गयाश्राद्ध या सैकड़ों अश्वमेधों से बढ़कर हैं। संकल्प इस प्रकार का होता है-'अभ्युदय (स्वर्ग) की प्राप्ति या पापमोचन के लिए मैं दस दान करूँगा।' दस दानों के उपरान्त उत्क्रान्ति-धेनु (मृत्यु को ध्यान में रखकर बछड़े के साथ गौ) दी जाती है, और इसके उपरान्त वैतरणी गौ का दान किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;आसन्नमृत्युना देया गौ: सवत्सा तु पूर्ववत्। तदभावे तु गौरेव नरकोत्तरणाय च।। तदा यदि न शक्नोति दातुं वैतरणीं तु गाम। शक्तोऽन्योऽरुक् तदा दत्त्वा दद्याच्छ्रेयो मृतस्य च।। व्यास (शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 300; शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 153; अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 7)। गरुड़पुराण (प्रेतखण्ड, 4।6) में आया है-'नदीं वैतरणीं तर्तु दद्याद्वैतरणीं च गाम्। कृष्णस्तनी सकृष्णांगी सा वै वैतरणी स्मृता।।' ऐसा आया है कि यम के द्वार पर वैतरणी नाम की नदी है, जो रक्त एवं पैने अस्त्रों से परिपूर्ण है; जो लोग मरते समय गौदान करते हैं, वे उस नदी को गाय की पूँछ पकड़कर पार कर जाते हैं। [[स्कन्दपुराण]] 6|226|32-33 जहाँ वैतरणी की चर्चा है; ‘मृत्युकाले प्रचच्छन्ति ये धेनुं ब्राह्मणाय वै। तस्या: पुच्छं समाश्रित्य ते तरन्ति च तां नृप।।’&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 152-153&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन मन्त्रों का (जो वैदिक नहीं है) उल्लेख है जो दानों के समय कहे जाते हैं। अन्त्येष्टिपद्धति अन्त्यकर्मदीपक आदि ने व्यवस्था दी है कि जब व्यक्ति आसन्नमृत्यु हो, तो उसके पुत्र या सम्बन्धियों को चाहिए कि वे उससे व्रतोद्यापन, सर्वप्रायश्चित्त एवं दस दानों के कृत्य करायें, किन्तु यदि मरणासन्न इन कृत्यों को स्वयं करने में अशक्त हो तो पुत्र या सम्बन्धी को उसके लिए ऐसा कर देना चाहिए। जब व्यक्ति संकल्पित व्रत नहीं कर पाता तो मरते समय वह व्रतोद्यापन कृत्य करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====व्रतोद्यापन ====&lt;br /&gt;
संक्षेप में व्रतोद्यापन यों है-पुत्र या सम्बन्धी मरणासन्न व्यक्ति को स्नान द्वारा या पवित्र जल से मार्जन करके या गंगा जल पिलाकर पवित्र करता है, स्वयं स्नानसन्ध्या से पवित्र हो लेता है, दीप जलाता है, [[गणेश]] एवं [[विष्णु]] की पूजा-वन्दना करता है, पूजा की सामग्री रखकर संकल्प करता है&amp;lt;ref&amp;gt;संकल्प यह है-अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्वे.........अमुकतियौ अमुकगोत्र..........अमुकशमहिं ममात्मन: (मम पित्रादे:) व्रतग्रहणदिवसादारभ्य अद्य यावत्फलाभिलाषादिगृहीतानां निष्कामतया गृहीतानां च अमुकामुकव्रतानामकृतोद्यापनदोषपरिहारार्थ श्रुतिस्मृति-पुराणोक्ततत्तदव्रतजन्यसांगफलप्राप्त्यर्थ विष्ण्वादीनां तत्तद्देवानां प्रीपये इदं सुवर्णमग्निदैवतम् (तदभावे इदं रजतं चन्द्रदैवतम्) अमुकगोत्रायामुकशर्मण् ब्राह्मणाय दास्ये ओं तत्सत् न मम इति संकल्प........आदि-आदि (अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 4)’।&amp;lt;/ref&amp;gt; निमन्त्रित ब्राह्मण को सम्मानित करता है और पहले से संकल्पित सोना उसे देता है और ब्राह्मण घोषित करता है-'सभी व्रत पूर्ण हों। उद्यापन (व्रत-पूर्ति) के फल की प्राप्ति हो।' सर्वप्रायश्चित में पुत्र चार या तीन विद्वान ब्राह्मणों या एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण को 6, 3 या डेढ़ वर्ष वाले प्रायश्चित्तों के निष्क्रिय रूप में सोना आदि का दान देता है और इसकी घोषणा करता है और वह अशौच के उपरान्त प्रायश्चित करता है। मरणासन्न व्यक्ति को या पुत्र या सम्बन्धी को सर्वप्रायश्चित करना पड़ता है। वह क्षीरकर्म करके स्नान करता है, पंचगव्य पीता है, चन्दनलेप एवं अन्य पदार्थों से एक ब्राह्मण को सम्मानित करता है, गोपूजा करके या उसके स्थान पर धन का दान करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;देशकालौ संकीर्त्य मम (मत्पत्रादेर्वां) ज्ञाताज्ञातकामाकामसकृदसकृत्कायिकवाचिकमानसिकतांसर्गिक-स्पृष्टास्पृष्ट-भुक्ताभुक्त-पीतापीतसकलपातकानुपातकोपपातकलघुपातकसंकरीकरणमलिनीकरणपात्री- करणजातिभ्रंशकरप्रकीर्णकादिनानाविधपातकानां निरासेन देहावसानकाले देहशुद्धिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थमिमां सर्वप्रायश्चित्तप्रत्याम्नायभूतां यथाशक्त्यलंकृतां सवत्सां गां रुद्रदेवताममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ओं तत्सत् न मम। अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 5)।&amp;lt;/ref&amp;gt; सर्वप्रायश्चित के उपरान्त दश-दान होते हैं। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण  2|4|7-9&amp;lt;/ref&amp;gt; ने महादान संज्ञक अन्य दानों की व्यवस्था दी है, यथा-[[तिल]], [[लोहा]], सोना, रूई, नमक, सात प्रकार के अन्न, भूमि, गौ; कुछ अन्य दान भी हैं, यथा-छाता, [[चन्दन]], अँगूठी, जलपात्र, आसन, भोजन, जिन्हें पददान कहा जाता है। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2|4|47&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से यदि मरणासन्न व्यक्ति आतुर-संन्यास नियमों के अनुसार संन्यास ग्रहण कर लेता है, तो वह आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा पा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदिकाल से ही ऐसा विश्वास रहा है कि मरते समय व्यक्ति जो विचार रखता है, उसी के अनुसार दैहिक जीवन के उपरान्त उसका जीवात्मा आक्रान्त होता है (अन्ते या मति: सा गति:), अत: मृत्यु के समय व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया छोड़कर हरि या [[शिव]] का स्मरण करना चाहिए और मन ही मन 'ऊँ नमो वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8।5-6) एवं [[पद्म पुराण]] (5।47।262)-'मरणे या मति: पुंसां गतिर्भवति तादृशी।'&amp;lt;/ref&amp;gt; बहुत से वचनों के अनुसार उसे वैदिक पाठ सुनाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम-पितृमेधसूत्र 1|1-8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=231076</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=231076"/>
		<updated>2011-10-31T11:13:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&amp;lt;ref&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’ और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:........।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गधा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पृष्ठ 251&amp;lt;/ref&amp;gt; या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
==मरणासन्न  प्रथा==&lt;br /&gt;
[[भारत]] के अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं। यह प्रथा [[यूरोप]] में भी है।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रो. एडगर्टन का लेख; ‘दी आवर आव डेथ’, एनल्स आव दी भण्डारकर ओ. आर. इंस्टीट्यूट, जिल्द 8, पृष्ठ 219-249&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कौशिकसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;कौशिकसूत्र  80|3&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है; जब व्यक्ति शक्तिहीन होता है, अर्थात् मरने लगता है तो (पुत्र या सेवा करने वाला कोई सम्बन्धी) शाला में लगी हुई घास पर कुश बिछा देता है और उसे 'स्योनास्मै भव' मन्त्र के साथ (बिस्तर या खाट से) उठाकर उस पर रख देता है। &lt;br /&gt;
*बौधायनपितृमेधसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;बौधायनपितृमेधसूत्र 3|1|18&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से जब यजमान के मरने का भय हो जाए तो यज्ञशाला में पृथिवी पर बालू बिछा देनी चाहिए और उस पर दर्भ फैला देने चाहिए, जिनकी नोंक दक्षिण की ओर होती है, मरणासन्न के दायें कान में 'आयुष: प्राणं सन्तनु' से आरम्भ होने वाले अनुवाक का पाठ (पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धी द्वारा) होना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोभिलस्मृति (3।22), पितृदयिता आदि। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;दुर्बलीभवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोहयति। &lt;br /&gt;
मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते। यत्ते कृष्णेत्यवदीपयति। कौशिक. (80|3-5)। 'स्योनास्मै' मन्त्र के लिए देखिए [[अथर्ववेद]] (18-2-19), [[ऋग्वेद]] (1|22|15) एवं वाजसनेयीसंहिता (36|13), देखिए निरुक्त (9|32)।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पितृदयिता (पृष्ठ 74) में आया है-'यदा कण्ठस्थानगतजीवी विह्वलो देही भवति तदा बहिर्गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ कुशान्दक्षिणाग्रानास्तीर्य तदुपरि दक्षिणशिरसं स्थापयित्वा सुवर्णरजतगोभूमिदीपतिलपात्राणि दापयेत्। &lt;br /&gt;
गोभिलस्मृति (3।22)-‘दुर्बलं स्नापयित्वा तु शुद्धचैलाभिसंवृतम्। दक्षिणाशिरसं भूमौ बहिष्मत्यां निवेशयेत्।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;शुद्धिप्रकाश  पृष्ठ 151-152&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि जब कोई व्यक्ति मृतप्राय हो, उसकी आंखें आधी बन्द हो गई हों और वह खाट से नीचे उतार दिया गया हो, तो उसके पुत्र या किसी सम्बन्धी को चाहिए कि वह उससे निम्न प्रकार का कोई एक या सभी प्रकार के दस दान कराये-[[गौ]], भूमि, तिल, [[सोना]], घृत, [[वस्त्र]], धान्य, गुड़, रजत ([[चाँदी]]) एवं [[नमक]]।&amp;lt;ref&amp;gt;दानानि च जातूकर्ण्य आह। उत्क्रान्तिवैतरण्यौ च दश दानानि चैव हि। प्रेतेऽपि कृत्वा तं प्रेतं शवधर्मेण दाहयेत्।.....दश दानानि च तेनैवोक्तानि। गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडानि च। रूप्यं लवणमित्याहुर्दश दानान्यनुक्रमात्।। शुद्धिप्रकाश (पृष्ठ 152)। और देखिए [[गरुड़ पुराण]] (प्रेतखण्ड, 4।4); एपिग्रैफ़िया इण्डिका (जिल्द 19, पृष्ठ 230)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये दान गयाश्राद्ध या सैकड़ों अश्वमेधों से बढ़कर हैं। संकल्प इस प्रकार का होता है-'अभ्युदय (स्वर्ग) की प्राप्ति या पापमोचन के लिए मैं दस दान करूँगा।' दस दानों के उपरान्त उत्क्रान्ति-धेनु (मृत्यु को ध्यान में रखकर बछड़े के साथ गौ) दी जाती है, और इसके उपरान्त वैतरणी गौ का दान किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;आसन्नमृत्युना देया गौ: सवत्सा तु पूर्ववत्। तदभावे तु गौरेव नरकोत्तरणाय च।। तदा यदि न शक्नोति दातुं वैतरणीं तु गाम। शक्तोऽन्योऽरुक् तदा दत्त्वा दद्याच्छ्रेयो मृतस्य च।। व्यास (शुद्धितत्त्व, पृष्ठ 300; शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 153; अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 7)। गरुड़पुराण (प्रेतखण्ड, 4।6) में आया है-'नदीं वैतरणीं तर्तु दद्याद्वैतरणीं च गाम्। कृष्णस्तनी सकृष्णांगी सा वै वैतरणी स्मृता।।' ऐसा आया है कि यम के द्वार पर वैतरणी नाम की नदी है, जो रक्त एवं पैने अस्त्रों से परिपूर्ण है; जो लोग मरते समय गौदान करते हैं, वे उस नदी को गाय की पूँछ पकड़कर पार कर जाते हैं। [[स्कन्दपुराण]] 6|226|32-33 जहाँ वैतरणी की चर्चा है; ‘मृत्युकाले प्रचच्छन्ति ये धेनुं ब्राह्मणाय वै। तस्या: पुच्छं समाश्रित्य ते तरन्ति च तां नृप।।’&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्येष्टिपद्धति एवं शुद्धिप्रकाश पृष्ठ 152-153&amp;lt;/ref&amp;gt; में उन मन्त्रों का (जो वैदिक नहीं है) उल्लेख है जो दानों के समय कहे जाते हैं। अन्त्येष्टिपद्धति अन्त्यकर्मदीपक आदि ने व्यवस्था दी है कि जब व्यक्ति आसन्नमृत्यु हो, तो उसके पुत्र या सम्बन्धियों को चाहिए कि वे उससे व्रतोद्यापन, सर्वप्रायश्चित्त एवं दस दानों के कृत्य करायें, किन्तु यदि मरणासन्न इन कृत्यों को स्वयं करने में अशक्त हो तो पुत्र या सम्बन्धी को उसके लिए ऐसा कर देना चाहिए। जब व्यक्ति संकल्पित व्रत नहीं कर पाता तो मरते समय वह व्रतोद्यापन कृत्य करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====व्रतोद्यापन ====&lt;br /&gt;
संक्षेप में व्रतोद्यापन यों है-पुत्र या सम्बन्धी मरणासन्न व्यक्ति को स्नान द्वारा या पवित्र जल से मार्जन करके या गंगा जल पिलाकर पवित्र करता है, स्वयं स्नानसन्ध्या से पवित्र हो लेता है, दीप जलाता है, [[गणेश]] एवं [[विष्णु]] की पूजा-वन्दना करता है, पूजा की सामग्री रखकर संकल्प करता है&amp;lt;ref&amp;gt;संकल्प यह है-अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्वे.........अमुकतियौ अमुकगोत्र..........अमुकशमहिं ममात्मन: (मम पित्रादे:) व्रतग्रहणदिवसादारभ्य अद्य यावत्फलाभिलाषादिगृहीतानां निष्कामतया गृहीतानां च अमुकामुकव्रतानामकृतोद्यापनदोषपरिहारार्थ श्रुतिस्मृति-पुराणोक्ततत्तदव्रतजन्यसांगफलप्राप्त्यर्थ विष्ण्वादीनां तत्तद्देवानां प्रीपये इदं सुवर्णमग्निदैवतम् (तदभावे इदं रजतं चन्द्रदैवतम्) अमुकगोत्रायामुकशर्मण् ब्राह्मणाय दास्ये ओं तत्सत् न मम इति संकल्प........आदि-आदि (अन्त्यकर्मदीपक, पृष्ठ 4)’।&amp;lt;/ref&amp;gt; निमन्त्रित ब्राह्मण को सम्मानित करता है और पहले से संकल्पित सोना उसे देता है और ब्राह्मण घोषित करता है-'सभी व्रत पूर्ण हों। उद्यापन (व्रत-पूर्ति) के फल की प्राप्ति हो।' सर्वप्रायश्चित में पुत्र चार या तीन विद्वान ब्राह्मणों या एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण को 6, 3 या डेढ़ वर्ष वाले प्रायश्चित्तों के निष्क्रिय रूप में सोना आदि का दान देता है और इसकी घोषणा करता है और वह अशौच के उपरान्त प्रायश्चित करता है। मरणासन्न व्यक्ति को या पुत्र या सम्बन्धी को सर्वप्रायश्चित करना पड़ता है। वह क्षीरकर्म करके स्नान करता है, पंचगव्य पीता है, चन्दनलेप एवं अन्य पदार्थों से एक ब्राह्मण को सम्मानित करता है, गोपूजा करके या उसके स्थान पर धन का दान करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;देशकालौ संकीर्त्य मम (मत्पत्रादेर्वां) ज्ञाताज्ञातकामाकामसकृदसकृत्कायिकवाचिकमानसिकतांसर्गिक-स्पृष्टास्पृष्ट-भुक्ताभुक्त-पीतापीतसकलपातकानुपातकोपपातकलघुपातकसंकरीकरणमलिनीकरणपात्री- करणजातिभ्रंशकरप्रकीर्णकादिनानाविधपातकानां निरासेन देहावसानकाले देहशुद्धिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थमिमां सर्वप्रायश्चित्तप्रत्याम्नायभूतां यथाशक्त्यलंकृतां सवत्सां गां रुद्रदेवताममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे ओं तत्सत् न मम। अन्त्यकर्मदीपक (पृष्ठ 5)।&amp;lt;/ref&amp;gt; सर्वप्रायश्चित के उपरान्त दश-दान होते हैं। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण  2|4|7-9&amp;lt;/ref&amp;gt; ने महादान संज्ञक अन्य दानों की व्यवस्था दी है, यथा-[[तिल]], [[लोहा]], सोना, रूई, नमक, सात प्रकार के अन्न, भूमि, गौ; कुछ अन्य दान भी हैं, यथा-छाता, [[चन्दन]], अँगूठी, जलपात्र, आसन, भोजन, जिन्हें पददान कहा जाता है। गरुड़पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;गरुड़पुराण 2|4|47 के मत से यदि मरणासन्न व्यक्ति आतुर-संन्यास नियमों के अनुसार संन्यास ग्रहण कर लेता है, तो वह आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा पा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदिकाल से ही ऐसा विश्वास रहा है कि मरते समय व्यक्ति जो विचार रखता है, उसी के अनुसार दैहिक जीवन के उपरान्त उसका जीवात्मा आक्रान्त होता है (अन्ते या मति: सा गति:), अत: मृत्यु के समय व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया छोड़कर हरि या [[शिव]] का स्मरण करना चाहिए और मन ही मन 'ऊँ नमो वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;भगवद्गीता (8।5-6) एवं [[पद्म पुराण]] (5।47।262)-'मरणे या मति: पुंसां गतिर्भवति तादृशी।'&amp;lt;/ref&amp;gt; बहुत से वचनों के अनुसार उसे वैदिक पाठ सुनाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गौतम-पितृमेधसूत्र 1|1-8&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=230980</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=230980"/>
		<updated>2011-10-31T07:21:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&amp;lt;ref&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’ और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:........।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गधा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए&amp;lt;ref&amp;gt;पृष्ठ 251&amp;lt;/ref&amp;gt; या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=230950</id>
		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%81/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=230950"/>
		<updated>2011-10-31T06:55:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक [[धर्म]] में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में इश्चैटॉलॉजी (''Eschatology'')  कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (''Eschatos=Last'') एवं लोगिया (''Logia=Discourse'') से बना है, जिसका तात्पर्य है, '''अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान'''। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सृष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
==मृत्यु विलक्षण एवं भयावह==&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ 'इम्मार्टल मैन'&amp;lt;ref&amp;gt;इम्मार्टल मैन (पृष्ठ 2)&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा है-यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।&amp;lt;ref&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। &lt;br /&gt;
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’ और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:........।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु के सम्बन्ध में धारणाएँ==&lt;br /&gt;
मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। [[कठोपनिषद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[कठोपनिषद]] (1।1।20)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है-'जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।' [[नचिकेता]] ने इस सन्देह को दूर करने के लिए [[यम]] से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी का इम्मार्टल मैन पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ '''बच''' रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ग्रंथों के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]] 214।34-39&amp;lt;/ref&amp;gt; ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-'जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।' इसी प्रकार [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासनपर्व]]  104।11-12; 144।49-60&amp;lt;/ref&amp;gt; ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीर्घ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-नास्तिक, [[यज्ञ]] न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासनपर्व 104।11-12 एवं 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मृत्यु के आगमन के संकेत====&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शान्ति पर्व महाभारत|शान्तिपर्व]] 318।9-17&amp;lt;/ref&amp;gt;), देवल&amp;lt;ref&amp;gt;कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायु पुराण]] 19|1-32&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[मार्कण्डेय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मार्कण्डेय पुराण]] 43।1-33 या 40।1-33&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[लिंग पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण]] पूर्वार्ध, अध्याय 91&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि [[पुराण|पुराणों]] में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। &lt;br /&gt;
;शान्तिपर्व के अनुसार&lt;br /&gt;
शान्तिपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;शान्तिपर्व अध्याय 318&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार जो [[अरुन्धती]], ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। &lt;br /&gt;
;देवल के अनुसार &lt;br /&gt;
देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दिखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। &lt;br /&gt;
;वायुपुराण एवं लिंगपुराण के अनुसार &lt;br /&gt;
अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण  19|28&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[लिंग पुराण|लिंगपुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[लिंग पुराण|लिंगपुराण]] पूर्वार्ध, 91।24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ पृष्ठ 246-268&amp;lt;/ref&amp;gt; में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गदहा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए (पृष्ठ 251) या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
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		<title>सदस्य:रेणु/अभ्यास</title>
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		<updated>2011-10-31T06:21:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==₪ अभ्यास सम्पादन ==&lt;br /&gt;
== ╠ अभ्यास सम्पादन ╣==&lt;br /&gt;
------------------------&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मृत्यु के उपरान्त मानव का क्या होता है?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक ऐसा प्रश्न है जो आदिकाल से ज्यों-का-त्यों चला आया है; यह एक ऐसा रहस्य है, जिसका भेदन आज तक सम्भव नहीं हो सका है। आदिकालीन भारतीयों, मिस्रियों, चाल्डियनों, [[यूनानी|यूनानियों]] एवं [[पारसी|पारसियों]] के समक्ष यह प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा एवं समस्या के रूप में विद्यमान रहा है। मानव के भविष्य, इस पृथिवी के उपरान्त उसके स्वरूप एवं इस विश्व के अन्त के विषय में भाँति-भाँति के मत प्रकाशित किये जाते रहे हैं, जो महत्त्वपूर्ण एवं मनोरम हैं। प्रत्येक धर्म में इसके विषय में पृथक दृष्टिकोण रहा है। इस प्रश्न एवं रहस्य को लेकर एक नयी विद्या का निर्माण भी हो चुका है, जिसे अंग्रेज़ी में ‘Eschatology’ (इश्चैटॉलॉजी) कहते हैं। यह शब्द यूनानी शब्दों-इश्चैटॉस (Eschatos=Last) एवं लोगिया (Logia=Discourse) से बना है, जिसका तात्पर्य है, अन्तिम बातों, यथा-मृत्यु, न्याय (Judgment) एवं मृत्यु के उपरान्त की अवस्था से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान। इसके दो स्वरूप हैं, जिनमें एक का सम्बन्ध है मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की नियति, आत्मा की अमरता, पाप एवं दण्ड तथा स्वर्ग एवं नरक के विषय की चर्चा से, और दूसरे का सम्बन्ध है अखिल ब्रह्माण्ड, उसकी सष्टि, परिणति एवं उद्धार तथा सभी वस्तुओं के परम अन्त के विषय की चर्चा से। हम इस ग्रन्थ के इस प्रकरण में प्रथम स्वरूप का निरूपण करेंगे और दूसरे का विवेचन आगे के प्रकरण में। प्राचीन ग्रन्थों में प्रथम स्वरूप पर ही अधिक बल दिया गया है, किन्तु आजकल वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोग बहुधा दूसरे स्वरूप पर ही अधिक सोचते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामान्यत: मृत्यु विलक्षण एवं भयावह समझी जाती है, यद्यपि कुछ दार्शनिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति इसे मंगलप्रद एवं शरीररूपी बंदीगृह में बन्दी आत्मा की मुक्ति के रूप में ग्रहण करते रहे हैं। मृत्यु का भय बहुतों को होता है; किन्तु वह भय ऐसा नहीं है कि उस समय की अर्थात् मरण-काल की समय की सम्भावित पीड़ा से वे आक्रान्त होते हैं, प्रत्युत उनका भय उस रहस्य से है, जो मृत्यु के उपरान्त की घटनाओं से सम्बन्धित है तथा उनका भय उन भावनाओं से है, जिनका गम्भीर निर्देश जीवनोपरान्त सम्भावित एवं अचिन्त्य परिणामों के उपभोग की ओर है। सी.ई. वुल्लियामी ने अपने ग्रन्थ ‘इम्मार्टल मैन’ (पृष्ठ 2) में कहा है-‘यद्यपि (मृत्युपरान्त या प्रेत) जीवन के सम्बन्ध में अत्यन्त कठोर एवं भयानक कल्पनाओं से लेकर उच्च एवं सुन्दरतम कल्पनाएँ प्रकाशित की गयी हैं, तथापि तात्त्विक बात यही रही है कि शरीर मरता है न कि आत्मा।’ &amp;lt;ref&amp;gt;अंग्रेज़ी शब्द ‘स्पिरिट’ (Spirit) एवं भारतीय शब्द आत्मा में धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अर्थ-साम्य नहीं है। प्रथम शब्द जीवनोच्छ्वास का द्योतक है और दूसरे को भारतीय दर्शन में परमात्मा की अभिव्यक्ति का रूप दिया गया है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान्। गीता में आया भी है-‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’ और भी-‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराण:........।’&amp;lt;/ref&amp;gt; मृत्यु के विषय में आदिम काल से लेकर सभ्य अवस्था तक के लोगों में भाँति-भाँति की धारणाएँ रही हैं। कठोपनिषद् (1।1।20) में आया है-‘जब मनुष्य मरता है तो एक सन्देह उत्पन्न होता है, कुछ लोगों के मत से मृत्यूपरान्त जीवात्मा की सत्ता रहती है, किन्तु कुछ लोग ऐसा नहीं मानते हैं।’ नचिकेता ने इस सन्देह को दूर करने के लिए यम से प्रार्थना की है। मृत्यूपरान्त जीवात्मा का अस्तित्व मानने वालों में कई प्रकार की धारणाएँ पायी जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए सी.ई. वुल्लियामी (C.E. Vulliamy) का इम्मार्टल मैन (Immortol Man) पृष्ठ 11।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ लोगों का विश्वास है कि मृतों का एक लोक है, जहाँ मृत्यूपरान्त जो कुछ बच रहता है, वह जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि सुकृत्यों एवं दुष्कृत्यों के फलस्वरूप शरीर के अतिरिक्त प्राणी का विद्यमानांश क्रम से स्वर्ग एवं नरक में जाता है। कुछ लोग आवागमन एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं। देखिए यूनानी लेखक पिण्डार (द्वितीय आलिचिएन ओड), प्लेटो (पीड्रस एवं टिमीएस) एवं हेरोडोटस (2।123)।&lt;br /&gt;
ब्रह्मपुराण (214।34-39) ने ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, जिन्हें मृत्यु सुखद एवं सरल प्रतीत होती है; न कि पीड़ाजनक एवं चिन्तायुक्त। वह कुछ यों है-‘जो झूठ नहीं बोलता, जो मित्र या स्नेही के प्रति कृतघ्न नहीं है, जो आस्तिक है, जो देवपूजा परायण है और ब्राह्मणों का सम्मान करता है तथा जो किसी से ईर्ष्या नहीं करता-वह सुखद मृत्यु पाता है।’ इसी प्रकार अनुशासनपर्व (104।11-12; 144।49-60) ने विस्तार के साथ अकालमृत्यु एवं दीघ जीवन के कारणों का वर्णन किया है, वह कुछ यों है-‘नास्तिक, यज्ञ न करने वाले, गुरुओं एवं शास्त्रों की आज्ञा के उल्लंघनकर्ता, धर्म न जानने वाले एवं दुष्कर्मी लोग अल्पायु होते हैं। जो चरित्रवान् नहीं हैं, जो सदाचार के नियम तोड़ा करते हैं और जो कई प्रकार से सम्भोग क्रिया करते रहते हैं, वे अल्पायु होते हैं और नरक में जाते हैं। जो क्रोध नहीं करते, जो सत्यवादी होते हैं, जो किसी की हिंसा नहीं करते, जो किसी की ईर्ष्या नहीं करते और जो कपटी नहीं होते, वे शतायु होते हैं (104।11-12 एवं 14)।&lt;br /&gt;
बहुत से ग्रन्थ मृत्यु के आगमन के संकेतों का वर्णन करते हैं, यथा-शान्तिपर्व (318।9-17), देवल (कल्पतरु, मोक्षकाण्ड, पृष्ठ 248-250), वायुपुराण (19।1-32), मार्कण्डेय पुराण (43।1-33 या 40।1-33), लिंगपुराण (पूर्वार्ध, अध्याय 91) आदि पुराणों में मृत्यु के आगमन के संकेतों या चिह्नों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ मिलती हैं। स्थानाभाव से अधिक नहीं लिखा जा सकता, किन्तु उदाहरणार्थ कुछ बातें दी जा रही हैं। शान्तिपर्व (अध्याय 318) के अनुसार जो अरुन्धती, ध्रुव तारा एवं पूर्ण चन्द्र तथा दूसरे की आंखों में अपनी छाया नहीं देख सकते, उनका जीवन बस एक वर्ष का होता है; जो चन्द्रमण्डल में छिद्र देखते हैं, वे केवल छ: मास के शेष जीवन वाले होते हैं; जो सूर्यमण्डल में छिद्र देखते हैं या पास की सुगन्धित वस्तुओं में शव की गन्ध पाते हैं, उनके जीवन के केवल सात दिन बचे रहते हैं। आसन्न मृत्यु के लक्षण ये हैं-कानों एवं नाक का झुक जाना, आंखों एवं दाँतों का रंग परिवर्तन हो जाना, संज्ञाशून्यता, शरीरोष्णता का अभाव, कपाल से धूम निकलना एवं अचानक बायीं आंख से पानी गिरना। देवल ने 12, 11 या 10 मास से लेकर एक मास, 15 दिन या 2 दिनों तक की मृत्यु के लक्षणों का वर्णन किया है और कहा है कि जब अँगुलियों से बन्द करने पर कानों में स्वर की धमक नहीं ज्ञात होती या आंख में प्रकाश नहीं दीखता तो समझना चाहिए कि मृत्यु आने ही वाली है। अन्तिम दो लक्षणों को वायुपुराण (19।28) एवं लिंगपुराण (पूर्वार्ध, 91।24) ने सबसे बुरा माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;द्वे चात्र परमेऽरिष्टे एतद्रूपं परं भवेत्। घोषं न श्रृणुयात्कर्णे ज्योतिर्नेत्रे न पश्यति।। वायुपुराण (19।27); नग्नं वा श्रमणं दृष्ट्वा विद्यान्मृत्युमुपस्थितम्। लिंगपुराण (पूर्वभाग 91।19)।&amp;lt;/ref&amp;gt; ‘मुंशी हीरक जयन्ती ग्रन्थ’ (पृष्ठ 246-268) में डॉ. आर. जी. हर्षे ने कई ग्रन्थों के आधार पर लिखा है कि जब व्यक्ति स्वप्न में गदहा देखता है तो उसका मरण निश्चित-सा है, जब वह स्वप्न में बूढ़ी कुमारी स्त्री देखता है तो भय, रोग एवं मृत्यु का लक्षण समझना चाहिए (पृष्ठ 251) या जब त्रिशूल देखता है तो मृत्यु परिलक्षित होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के अधिकांश भागों में ऐसी प्रथा है कि जब व्यक्ति मरणासन्न रहता है या जब वह अब-तब रहता है, तो लोग उसे खाट से उतारकर पृथिवी पर लिटा देते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी</title>
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		<updated>2011-10-31T05:47:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी (जन्म- 1901 ई. में भड़गा ग्राम, [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]]; मृत्यु-[[17 दिसंबर]], 1927) एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे।  &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जन्म बंगाल के पाबना ज़िले के भड़गा नामक ग्राम में हुआ था। लेकिन इनका परिवार 1909 ई. [[वाराणसी]] चला आया था, अत: राजेन्द्रनाथ की शिक्षा-दीक्षा वाराणसी से ही हुई। जिस समय वे एम. ए. में पढ़ रहे थे, उनका संपर्क क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुआ। सान्याल बंगाल के क्रांतिकारी 'युगांतर' दल से संबद्ध थे। वहाँ एक दूसरा दल भी 'अनुशीलन' के नाम से काम करने लगे। राजेन्द्रनाथ इस संघ की प्रतीय समिति के सदस्य थे। अन्य सदस्यों में पंडित [[रामप्रसाद बिस्मिल]] भी सम्मिलित थे। [[काकोरी कांड|काकोरी ट्रेन कांड]] में जिन क्रांतिकारियों ने प्रत्यक्ष भाग लिया उनमें राजेन्द्रनाथ भी थे। बाद में वे बम बनाने की शिक्षा प्राप्त करने और बंगाल के क्रांतिकारी दलों से संपर्क बढाने के उद्देश्य से [[कोलकाता]] गए। वहाँ दक्षिणेश्वर बम फैक्ट्रीकांड में पकड़े गए और इस मामले में दस वर्ष की सजा हुई। &lt;br /&gt;
==मृत्यु== &lt;br /&gt;
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी की मृत्यु 17 दिसंबर, 1927 को [[उत्तर प्रदेश]] की गोंडा जेल में फांसी देने के कारण हुई। &lt;br /&gt;
==विचार==&lt;br /&gt;
फांसी के फंदे तक जाने से पूर्व लाहिड़ी ने स्नान और [[गीता]] पाठ किया और कुछ व्यायाम भी किया। [[अंग्रेज़]] मजिस्ट्रेट को उनके व्यायाम करने पर आश्चर्य हुआ। उसके पूछने पर लाहिड़ी ने उत्तर दिया- &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;मैं हिन्दू हूँ और मेरा विश्वास है कि मैं देश की आजादी के लिए पुन: दूसरा शरीर धारण करने जा रहा हूँ, वह शरीर स्वस्थ और बलिष्ठ हो, इसीलिए मैंने व्यायाम किया।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{cite book | last =लीलाधर | first =शर्मा  | title =भारतीय चरित कोश  | edition = | publisher =शिक्षा भारती | location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय  | language =[[हिन्दी]]  | pages =711 | chapter = }}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{स्वतन्त्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता_सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>बृजलाल वियाणी</title>
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		<updated>2011-10-30T11:00:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''बृजलाल वियाणी''' (जन्म- [[6 दिसंबर]], 1896; मृत्यु- [[27 सितंबर]], 1968) [[मध्य प्रदेश]] के प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता थे। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश के प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता बृजलाल वियाणी का जन्म 6 दिसंबर, 1896 ई. को [[बरार]] में [[अकोला]] के निकट एक संपन्न व्यवसायी परिवार में हुआ था। &lt;br /&gt;
====शिक्षा==== &lt;br /&gt;
बृजलाल वियाणी की शिक्षा [[नागपुर]] के मौसिस कॉलेज में हुई। इस शिक्षा के द्वारा वे पारिवारिक पुराने विचारों के स्थान पर नए विचारों के संपर्क में आए। वियाणी जी को सहपाठी भी पंडित रविशंकर शुक्ल, सेठ गोविन्द दास, द्वारका प्रसाद मिश्र जैसे प्रतिभावन व्यक्ति मिले। इस सबका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने विद्यालय के अध्ययन को तिलांजलि दे दी और [[असहयोग आंदोलन]] में कूद पड़े। &lt;br /&gt;
==सदस्यता==&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश वियाणी जी का मुख्य कार्य क्षेत्र था। पर उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ [[महाराष्ट्र]], [[राजपूताना]], [[गुजरात]] और [[दिल्ली]] तक फैली हुई थीं। वे स्वतंत्रता संग्राम में चार बार जेल गए। वे प्रदेश [[कांग्रेस]] के अध्यक्ष और प्रदेश विधान सभा तथा केन्द्रीय [[संसद]] के सदस्य रहे। संविधान सभा में भी उन्होंने अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 13 वर्ष की लम्बी अवधि तक वे विदर्भ कांग्रेस के सर्वेसर्वा थे। &lt;br /&gt;
==समाज सुधारक== &lt;br /&gt;
समाज सुधार के कामों में भी बृजलाल वियणी ने पूरे उत्साह से भाग लिया। दहेज, [[बाल विवाह|बाल-विवाह]] आदि का उन्होंने पूरी शक्ति से विरोध किया। अनेक शिक्षा संबंधी और स्वयं सेवी संस्थाओं के वे संस्थापक थे। उन्होंने 'माहेश्वरी सभा' और बरार चेम्बर ऑफ कॉमर्स की भी स्थापना की। वे [[गांधी जी]] के 'सर्वोदय सिद्धांत' को राष्ट्र की उन्नति का एकमात्र मार्ग मानते थे। वे इस बात पर बल देते थे कि मनुष्य के चरित्र में परिवर्तन से ही समाज में परिवर्तन आ सकता है। वे लघु और ग्रामीण उद्योगों के विकास के पक्षधर थे। गांधी जी द्वारा प्रतिपादित अहिंसा में उनका विश्वास था। इसलिए वे हिंसक कार्यों का कभी समर्थन नहीं करते थे।&lt;br /&gt;
==निधन==  &lt;br /&gt;
27 सितंबर, 1968 ई. को बृजलाल वियणी का निधन हो गया। समाज सुधार के क्षेत्र में लोग उन्हें जमना लाल बजाज के समकक्ष मानते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{cite book | last =शर्मा | first =लीलाधर  | title =भारतीय चरित कोश  | edition = | publisher =शिक्षा भारती, दिल्ली | location =भारत डिस्कवरी पुस्तकालय  | language =हिन्दी  | pages =पृष्ठ 554 | chapter =}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{स्वतन्त्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
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[[Category:समाज सुधारक]]&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>काव्या</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88&amp;diff=230815</id>
		<title>महादेव देसाई</title>
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		<updated>2011-10-30T10:56:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Mahadev-Desai-And-Gandhi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=महादेव देसाई और गांधी जी&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=महादेव हरिभाई देसाई&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[1 जनवरी]], 1892&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=सरस गाँव, [[सूरत ज़िला]] &lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[15 अगस्त]], 1942&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|अविभावक=हरिभाई देसाई &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=&lt;br /&gt;
|पद=&lt;br /&gt;
|भाषा=[[गुजराती भाषा|गुजराती]], [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]], [[बांग्ला भाषा]], [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]], [[मराठी भाषा|मराठी]] और [[अंग्रेज़ी भाषा]]&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान='महादेव भाई की डायरी'। 8 खंडों में प्रकाशित इस डायरी में उन्होंने गांधीजी के नित्य प्रति के क्रिया कलापों का अधिकारिक वर्णन प्रस्तुत किया है।&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=रचनाएँ&lt;br /&gt;
|पाठ 1='विद गांधी जी इन सीलोन'', ''द स्टोरी ऑफ बारदोली'', ''स्वदेशी टू एण्ड फाल्स'' आदि। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''महादेव देसाई अथवा महादेव हरिभाई देसाई''' ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: ''Mahadev Desai'' अथवा ''Haribhai Mahadev Desai'') (जन्म- [[1 जनवरी]], 1892; मृत्यु- [[15 अगस्त]], 1942) एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। महादेव देसाई ने [[चंपारन सत्याग्रह]], [[बारदोली सत्याग्रह]] और [[नमक सत्याग्रह]] में भाग लिया और इसी दौरान वह गिरफ्तार किए गए।   &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
[[गांधी जी]] के सचिव और स्वतंत्रता सेनानी महादेव हरिभाई देसाई का जन्म 1 जनवरी, 1892 ई. को सूरत ज़िले के सरस गाँव में हुआ था। इनके पिता हरिभाई देसाई अध्यापक थे। वे गणित और [[रामायण]], [[महाभारत]], [[गीता]] जैसे [[ग्रंथ|ग्रंथों]] के प्रेमी थे। बाद में वे [[अहमदाबाद]] के महिला प्रशिक्षण महाविद्यालय के प्राचार्य बने। पिता के गुणों का महादेव भाई पर पूरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने [[मुंबई]] में उच्च शिक्षा पाई और 1913 में कानून की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने कुछ दिन वकालत की, पर उसमें विशेष सफलता नहीं मिली। फिर कुछ समय तक सरकारी बैंक में काम करते रहे पर वहाँ की अनियमितताएं और भाग-दौड़ देखकर उसे भी छोड़ दिया। &lt;br /&gt;
==स्वतंत्रता संग्राम== &lt;br /&gt;
[[31 अगस्त]], 1917 का दिन महादेव देसाई के जीवन में दिशा निर्धारक सिद्ध हुआ। उसी दिन उनकी भेंट गांधीजी से हुई और फिर वे जीवनपर्यंत उन्हीं के साथ रहे। उन्होंने [[चंपारन सत्याग्रह]], [[बारदोली सत्याग्रह]] और [[नमक सत्याग्रह]] में भाग लिया और इसी दौरान गिरफ्तार किए गए। 1921 में महादेव भाई ने [[इलाहाबाद]] आकर [[पंडित मोतीलाल नेहरू]] के पत्र 'इंडिपेंडेंट' के संपादन में सहयोग दिया। यहाँ भी उन्हें जेल की सजा हुई थी। 1923 में वे अहमदाबाद वापस चले गए और गांधीजी को उनके पत्र 'नवजीवन' के संपादन में मदद करते रहे। &lt;br /&gt;
==रचना==&lt;br /&gt;
महादेव भाई बहुपठित व्यक्ति थे। उन्हें [[गुजराती भाषा|गुजराती]], [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]], [[बांग्ला भाषा]], [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]], [[मराठी भाषा|मराठी]] और [[अंग्रेज़ी भाषा]] का बहुत अच्छा ज्ञान था। गांधीजी के जीवन दर्शन के वे अधिकारी विद्वान थे। उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की जैसे- विद गांधी जी इन सीलोन, द स्टोरी ऑफ बारदोली, स्वदेशी टू एण्ड फाल्स, अनवर्दी ऑफ़ वर्धा, दि नेशंस वाइस, गांधी सेवा संघ, मौलाना अबुल कलाम आजाद, दि गीता एकार्डिंग टु गांधीजी, वीर वल्लभ भाई, खुदाई खिदमतगार, एक धर्मयुद्ध आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==योगदान==&lt;br /&gt;
महादेव भाई का सबसे बड़ा योगदान है- 'महादेव भाई की डायरी'। 8 खंडों में प्रकाशित इस डायरी में उन्होंने गांधीजी के नित्य प्रति के क्रिया कलापों का अधिकारिक वर्णन प्रस्तुत किया है। इसका प्रकाशन महादेव भाई की मृत्यु के बाद हुआ। महादेव देसाई के बारे में गांधी जी का कहना था कि जितना काम अकेले महादेव कर लेते हैं, आधे दर्जन सचिव होते, तब भी उतना काम नहीं कर सकते थे। &lt;br /&gt;
==निधन== &lt;br /&gt;
1924 से 1928 तक [[भारत]]-यात्रा में वे गांधीजी के साथ थे। 1931 के [[गोलमेज सम्मेलन]] में गांधीजी के साथ [[लंदन]] गए। 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन में उन्हें भी गांधीजी के साथ [[पूना]] के आग़ा ख़ा महल में नजरबंद कर दिया गया था। वहीं पर [[15 अगस्त]] 1942 को बंदी की दशा में ही उनका देहांत हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{cite book | last =शर्मा | first =लीलाधर  | title =भारतीय चरित कोश  | edition = | publisher =शिक्षा भारती, दिल्ली | location =भारत डिस्कवरी पुस्तकालय  | language =हिन्दी  | pages =पृष्ठ 611 | chapter =}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{स्वतन्त्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
[[Category: स्वतन्त्रता सेनानी]]  [[Category: प्रसिद्ध व्यक्तित्व]][[Category: प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]] [[Category: चरित कोश]] [[Category: महात्मा गाँधी]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]][[Category:लेखक]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97&amp;diff=230814</id>
		<title>कलंगा दुर्ग</title>
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		<updated>2011-10-30T10:50:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कलंगा दुर्ग''' [[देहरादून]] में स्थित एक ऐतिहासिक दुर्ग है। 1814 ई. में जब देहरादून पर गोरखों का राज था तो उन्होंने [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] से युद्ध छिड़ने पर उनका डट कर सामना किया था। &lt;br /&gt;
*अंग्रेज़ी सेना का नायक जनरल मार्टिग डेल था जिसने जनरल जिलेस्पी के मारे जाने पर फौज की कमान सम्हाली थी। &lt;br /&gt;
*उसने कलंगा के क़िले को तोपों की मार से भूमिसात कर दिया था। &lt;br /&gt;
*अब इस स्थान पर दुर्ग के खंडहरों के सिवा कुछ नहीं बचा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तराखण्ड के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{उत्तराखंड के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:देहरादून]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category: उत्तराखंड के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>कुंथलगिरि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A5%E0%A4%B2%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BF&amp;diff=230813"/>
		<updated>2011-10-30T10:49:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कुंथलगिरि''' [[महाराष्ट्र]] में वार्सी से 22 मील दूर प्राचीन [[जैन धर्म]] का तीर्थ स्थल है। &lt;br /&gt;
जैनग्रंथ निर्वाण-कांड में निम्न गाथा है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'वंसस्थ लवणणियरे पच्छिम भायंभि कुंथुगिरिसिहरे। कुलदेश भूषण मुणीणिब्बाणगयाणमो तेसि।'&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कुंथलगिरि की पहाड़ी पर मूलनायक का विशाल मंदिर है। जिसमें आदिनाथ की प्राचीन प्रतिमा प्रतिष्ठित है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
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		<title>करीमनगर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%B0&amp;diff=230812"/>
		<updated>2011-10-30T10:47:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''करीमनगर''' [[आंध्र प्रदेश]] में स्थित एक ऐतिहासिक स्थान है। यहाँ [[सातवाहन काल]] के लुहार की उपस्थिति के प्रमाण मिले है। &lt;br /&gt;
*सातवाहनो ने करीमनगर में [[लोहा|लौह अयस्कों]] का उपयोग किया होगा, इसकी जानकारी यहाँ मिली महापाषाण काल के लोहे की खदानों से मिलती है। &lt;br /&gt;
*करीमनगर में ज़मीन के अन्दर बनी ढकी हुई नालियाँ भी मिलती हैं जिनसे गंदा पानी गड्ढ़ों में जाता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक_स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category: सातवाहन साम्राज्य]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5&amp;diff=229473</id>
		<title>पदार्थ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5&amp;diff=229473"/>
		<updated>2011-10-24T08:07:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;दुनिया की कोई भी वस्तु जो स्थान घेरती हो, जिसका [[द्रव्यमान]] होता हो और जो अपनी संरचना में परिवर्तन का विरोध करती हो, पदार्थ कहलाते हैं। उदाहरण- [[जल]], हवा, बालू आदि। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[भारत]] के महान ॠषि [[कणाद]] के अनुसार सभी पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्मकणों से बने हैं, जिसे [[परमाणु]] कहा गया है। प्रारंभ में भारतीयों और [[यूनानी|यूनानियों]] का अनुमान था कि प्रकृति की सारी वस्तुएँ पाँच तत्वों के संयोग से बनी हैं, ये पाँच तत्त्व हैं- &lt;br /&gt;
*हवा &lt;br /&gt;
*[[जल]]&lt;br /&gt;
*[[अग्नि]] &lt;br /&gt;
*[[आकाश तत्व|आकाश]]&lt;br /&gt;
*[[पृथ्वी]]&lt;br /&gt;
==पदार्थों का वर्गीकरण==&lt;br /&gt;
====ठोस====&lt;br /&gt;
{{Main|ठोस पदार्थ}}&lt;br /&gt;
पदार्थ की वह भौतिक अवस्था जिसका आकार एवं आयतन दोनों निश्चित हो, ठोस कहलाता है।&lt;br /&gt;
====द्रव====&lt;br /&gt;
{{Main|द्रव पदार्थ}}&lt;br /&gt;
पदार्थ की वह भौतिक अवस्था जिसका आकार अनिश्चित एवं आयतन निश्चित हो 'द्रव' कहलाता है। &lt;br /&gt;
====गैस====&lt;br /&gt;
{{Main|गैस पदार्थ}}&lt;br /&gt;
पदार्थ की वह भौतिक अवस्था जिसका आकार एवं आयतन दोनों अनिश्चित हो 'गैस' कहलाता है।&lt;br /&gt;
=====विशेष टिप्पणी=====&lt;br /&gt;
*गैसों का कोई पृष्ठ नहीं होता है, इसका [[विसरण]] बहुत अधिक होता है तथा इसे आसानी से संपीड़ित (Compress) किया जा सकता है। &lt;br /&gt;
*[[ताप]] एवं [[दाब]] में परिवर्तन करके किसी भी पदार्थ को बदला जा सकता है। परन्तु इसके अपवाद भी हैं, जैसे- [[लकड़ी]], [[पत्थर]]। ये केवल ठोस अवस्था में ही रहते हैं। &lt;br /&gt;
*जल तीनों भौतिक अवस्था में रह सकता है।&lt;br /&gt;
*पदार्थ की तीनों भौतिक अवस्थाओं में निम्न रूप से साम्य होता है:- ठोस→द्रव→गैस। उदाहरण- जल।&lt;br /&gt;
*पदार्थ की चौथी अवस्था प्लाज़्मा एवं पाँचवी अवस्था '''बोस-आइंस्टाइन कंडनसेट''' है।&lt;br /&gt;
====तत्व====&lt;br /&gt;
{{Main|तत्व}}&lt;br /&gt;
तत्त्व वह शुद्ध पदार्थ है, जिसे किसी भी ज्ञात भौतिक एवं रासायनिक विधियों से न तो दो या दो से अधिक पदार्थो में विभाजित किया जा सकता है, और न ही अन्य सरल पदार्थों के योग से बनाया जा सकता है। &lt;br /&gt;
====यौगिक====&lt;br /&gt;
{{Main|यौगिक}}&lt;br /&gt;
वह शुद्ध पदार्थ जो रासायनिक रूप से दो या दो से अधिक तत्वों के एक निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से बने हैं, यौगिक कहलाते हैं। &lt;br /&gt;
====मिश्रण====&lt;br /&gt;
{{Main|मिश्रण}}&lt;br /&gt;
वह पदार्थ जो दो या दो से अधिक तत्वों या [[यौगिक|यौगिकों]] के किसी भी [[अनुपात]] में मिलाने से प्राप्त होता है, मिश्रण कहलाता है। इसे तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। मिश्रण के दो प्रकार होते है:-&lt;br /&gt;
*[[समांग मिश्रण]]&lt;br /&gt;
*[[विषमांग मिश्रण]]&lt;br /&gt;
==मिश्रणों का पृथक्करण==&lt;br /&gt;
मिश्रण में उपस्थित घटकों को विभिन्न विधियों द्वारा अलग-अलग किया जाता है। मिश्रणों के पृथक्करण की कुछ सामान्य विधियों निम्नलिखित हैं-&lt;br /&gt;
#[[रवाकरण]]: इस विधि के द्वारा अकार्बनिक ठोस मिश्रण को अलग किया जाता है। &lt;br /&gt;
#[[आसवन विधि]]: जब दो द्रवों के क़्वथनांकों में अन्तर अधिक होता है, तो उसके मिश्रण को आसवन विधि से पृथक् करते हैं। &lt;br /&gt;
#[[ऊर्ध्वपातन]]: इस विधि द्वारा दो ऐसे ठोसों के मिश्रण को अलग करते हैं, जिसमें एक ठोस ऊर्ध्वपातित हो, दूसरा नहीं। &lt;br /&gt;
#[[आंशिक आसवन]]: इस विधि से वैसे मिश्रित द्रवों को अलग करते हैं, जिसमें क़्वथनांकों में अन्तर बहुत कम होता है। &lt;br /&gt;
#[[प्रभाजी आसवन]]: विभिन्न [[क्वथनांक]] वाले  मिश्रित [[द्रव|द्रवों]] को भिन्न-भिन्न [[ताप|तापों]] पर आसुत करके उन्हें पृथक् करने की प्रकिया को प्रभाजी आसवन कहते है। &lt;br /&gt;
#[[वर्णलेखन]]: यह विधि इस तथ्य पर आधारित है कि किसी मिश्रण के विभिन्न घटकों की [[अवशोषण]] (absorption) क्षमता भिन्न-भिन्न होती है।&lt;br /&gt;
#[[भाप आसवन]]: इस विधि से कार्बनिक मिश्रण को शुद्ध किया जाता है।&lt;br /&gt;
==पदार्थ की अवस्था परिवर्तन==&lt;br /&gt;
====द्रवणांक====&lt;br /&gt;
{{Main|द्रवणांक}}&lt;br /&gt;
गर्म करने पर ठोस पदार्थ द्रव अवस्था में परिवर्तित होते हैं, तो उनमें से अधिकांश में यह परिवर्तन एक विशेष [[दाब]] पर तथा एक नियत [[ताप]] पर होता है। यह नियत ताप वस्तु का द्रवणांक कहलाता है। &lt;br /&gt;
====हिमांक====&lt;br /&gt;
{{Main|हिमांक}}&lt;br /&gt;
किसी विशेष दाब पर वह नियत ताप जिस पर कोई द्रव जमता है, हिमांक कहलाता है।&lt;br /&gt;
=====आयतन परिवर्तन=====&lt;br /&gt;
*क्रिस्टलीय पदार्थों में से अधिकांश पदार्थ गलने पर आयतन में बढ़ जाते हैं, ऐसी दशा में ठोस अपने ही गले हुए द्रव में डूब जाता है।&lt;br /&gt;
*ढला हुआ [[लोहा]], बर्फ, एण्टीमनी, [[बिस्मथ]], पीतल आदि गलने पर आयतन में सिकुड़ते हैं। अतः इस प्रकार के ठोस अपने ही गले द्रव में प्लवन करते रहते हैं। इसी विशेष गुण के कारण बर्फ़ का टुकड़ा गले हुए पानी में प्लवन करता है।&lt;br /&gt;
*साँचे में केवल वे पदार्थ ढ़ाले जा सकते हैं, जो ठोस बनने पर आयतन में बढ़ते हैं, क्योंकि तभी वे साँचे के आकार को पूर्णतया प्राप्त कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
*मुद्रण धातु ऐसे पदार्थ के बने होते हैं, जो जमने पर आयतन में बढ़ते हैं।&lt;br /&gt;
*[[चाँदी]] या [[सोना|सोने]] की मुद्राएँ ढाली नहीं जातीं, केवल मुहर लगाकर बनायी जाती हैं।&lt;br /&gt;
*मिश्र धातुओं का द्रवणांक उन्हें बनाने वाले पदार्थों के [[गलनांक]] से कम होता है क्योंकि अशुद्धियाँ डाल देने पर पदार्थ का गलनांक घट जाता है।&lt;br /&gt;
====हिमकारी मिश्रण====&lt;br /&gt;
{{Main|हिमकारी मिश्रण}}&lt;br /&gt;
किसी ठोस को उसके द्रवणांक पर गलने के लिए [[ऊष्मा]] की आवश्यकता होगी जो उसकी गुप्त ऊष्मा होगी। हिमकारी मिश्रण का बनना इसी सिद्धांत पर आधारित है।&lt;br /&gt;
====वाष्पीकरण====&lt;br /&gt;
{{Main|वाष्पीकरण}}&lt;br /&gt;
द्रव से वाष्प में परिणत होने कि क्रिया 'वाष्पीकरण' कहलाती है। यह दो प्रकार की होती है- &lt;br /&gt;
*[[वाष्पन]]&lt;br /&gt;
*[[क्वथन]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:विज्ञान_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रसायन विज्ञान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>परुष्णी नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=229300"/>
		<updated>2011-10-23T10:09:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''परुष्णी नदी''' [[पंजाब]] की प्रसिद्ध नदी [[रावी नदी]] या [[इरावती नदी]] का वैदिक नाम है। &lt;br /&gt;
*परुष्णी नदी का [[ऋग्वेद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऋग्वेद]], मंडल 10 सूक्त 75 नदी सूक्त&amp;lt;/ref&amp;gt; में उल्लेख है:- &lt;br /&gt;
:'इमं में गंगेयमुने सरस्वती शुतुद्रिस्तोमं समता परुष्णया असिकन्या मरुद्वृधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणृह्मा सुषोमया'। &lt;br /&gt;
*जान पड़ता है कि परुष्णी नाम वैदिक काल में ही प्रचलित था क्योंकि परवर्ती साहित्य में इस नदी का नाम इरावती मिलता है।&lt;br /&gt;
*[[अलक्षेंद्र]] के समय के इतिहास लेखकों ने भी इस नदी को ह्यारोटीज लिखा है जो इरावती का ग्रीक उच्चारण है। &lt;br /&gt;
*रावी इरावती का ही अपभ्रंश है। &lt;br /&gt;
*ऋग्वेद के अनुसार परुष्णी नदी के तट पर ही तृत्स गण के [[ सुदास|राजा सुदास]] ने इस राजाओं को सम्मिलित सेना को हराया था। &lt;br /&gt;
*सुदास ने, जिसका राज्य परुष्णी के पूर्वी तट पर था, पश्चिम से आक्रमण करने वाले नरेश-संघ की सेना को नदी पार करने से पहले ही परास्त कर पीछे ढकेल दिया था।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद 8,74 सत्यमित्वा महेनदि परुष्णयवदेदिशम् आदि&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*ऋग्वेद में परुष्णी के निकट अनु के वंशजों का निवास बताया गया है। अनु [[ययाति]] का पुत्र था। वैदिक काल के पश्चात इसी प्रदेश में मद्रक तथा केकय बस गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
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[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>पंचानन नदी</title>
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		<updated>2011-10-23T10:04:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''पंचानन नदी''' [[राजगृह]], [[बिहार]] के निकट प्रवाहित होने वाली नदी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]][[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>देवगढ़</title>
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		<updated>2011-10-23T09:58:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Dashavatara-Temple-Deogarh.jpg|thumb|दशावतार मन्दिर, देवगढ़]]&lt;br /&gt;
'''देवगढ़''' [[उत्तर प्रदेश]] [[राज्य]] के [[ललितपुर ज़िला|ललितपुर ज़िले]] से लगभग 37 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*देवगढ़ में [[दशावतार]] [[विष्णु]] भगवान का मध्ययुगीन मन्दिर है, जो स्थापत्य कला की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर_प्रदेश_के_ऐतिहासिक_स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक_स्थान_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>जल मंदिर</title>
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		<updated>2011-10-23T08:06:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Jal-Mandir-Pawapuri.jpg|thumb|250px|जल मंदिर, [[पावापुरी]]]]&lt;br /&gt;
'''जल मंदिर''' [[बिहार]] के [[पावापुरी]] शहर में स्थित है। &lt;br /&gt;
*जल मंदिर में मुख्‍य पूज्‍यनीय वस्‍तु भगवान [[महावीर]] की चरण पादुका है।&lt;br /&gt;
*जल मंदिर एक तालाब के बीचों-बीच बना हुआ है। &lt;br /&gt;
*कहा जाता है कि यहीं पर भगवान महावीर का अंतिम संस्‍कार किया गया था। &lt;br /&gt;
*ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण महावीर के बड़े भाई राजा नंदीवर्द्धन ने करवाया था। &lt;br /&gt;
*जल मंदिर विमान आकार में बना हुआ है। &lt;br /&gt;
*जल मंदिर तक पहुंचने के लिए 600 फीट लम्‍बा पुल बना हुआ है।    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बिहार के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:जैन धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:जैन धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>जिम कोर्बेट राष्ट्रीय पार्क</title>
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		<updated>2011-10-23T08:04:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Elephants-Jim-Corbett-National-Park.jpg|thumb|250px|जंगली [[हाथी|हाथियों]] का झुंड, जिम कोर्बेट राष्ट्रीय पार्क]]&lt;br /&gt;
'''जिम कोर्बेट राष्ट्रीय पार्क''' [[दिल्ली]] से 240 किमी. उत्तर-पूर्व में स्थित एक प्रमुख दर्शनीय स्थल है। &lt;br /&gt;
*जिम कोर्बेट राष्ट्रीय पार्क पहुँचने के लिए दो रेलवे स्टेशन, रामनगर और हलद्वानी हैं। &lt;br /&gt;
*रामनगर से धिकाला&amp;lt;ref&amp;gt;पार्क का मुख्य विश्राम गृह&amp;lt;/ref&amp;gt; के लिए 47 किमी. की पक्की सड़क है। &lt;br /&gt;
*जिम कोर्बेट राष्ट्रीय पार्क का प्राकृतिक सौंदर्य अपूर्व है। &lt;br /&gt;
*वनाच्छादित पहाड़ियों और घाटियों के मध्य से [[रामगंगा नदी|रामगंगा]] कल-कल निनाद करती हुई बहती है। &lt;br /&gt;
*कभी-कभी इसके [[तट]] पर घड़ियाल भी देखे जाते हैं। &lt;br /&gt;
*जंगलों में [[हाथी]], चीता, [[तेंदुआ]], साँभर और यदाकदा [[भालू|काल भालू]] भी देखे जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>त्रिमूर्ति</title>
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		<updated>2011-10-23T08:04:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Trimurti-Elephanta-Caves.jpg|thumb|त्रिमूर्ति, [[एलिफेंटा की गुफाएँ]], [[मुम्बई]]]]&lt;br /&gt;
*[[ब्रह्मा]], [[विष्णु]] एवं [[शिव]] तीनों को मिलाकर त्रिमूर्ति कहते हैं।&lt;br /&gt;
*ब्रह्मा सृष्टि करने वाले, विष्णु पालन करने वाले तथा शिव (रुद्र) संहार करने वाले कहे जाते हैं। &lt;br /&gt;
*वास्तव में एक ही शक्ति के ये तीन रूप हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारतीय संस्कृति के प्रतीक}}&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] &lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>दुंदुभी दैत्य</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%AD%E0%A5%80_%E0%A4%A6%E0%A5%88%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=229267"/>
		<updated>2011-10-23T08:02:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''दुंदुभी''' [[कैलास पर्वत]] के समान एक विशाल [[दैत्य]] था, जिसमें हज़ार [[हाथी|हाथियों]] का बल था। एक भयंकर युद्ध में दुंदुभी का वध [[बाली]] के हाथों हुआ, जिसने उसके शव को उठाकर एक योजन दूर फेंक दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*दुंदुभी को अपने बल पर बड़ा गर्व था, जिस कारण वह एक बार समुद्र के पास पहुँचा तथा उसे युद्ध के लिए ललकारा।&lt;br /&gt;
*समुद्र ने उससे लड़ने में असमर्थता व्यक्त की तथा कहा कि उसे हिमवान् से युद्ध करना चाहिए।&lt;br /&gt;
*दुंदुभी ने हिमवान् के पास पहुँचकर उसकी चट्टानों और शिखरों को तोड़ना प्रारम्भ कर दिया।&lt;br /&gt;
*हिमवान् [[ऋषि|ऋषियों]] का सहायक था तथा युद्ध आदि से दूर रहता था। उसने दुंदुभी को [[इंद्र]] के पुत्र बालि से युद्ध करने के लिए कहा।&lt;br /&gt;
*बालि से युद्ध होने पर बालि ने उसे मार डाला तथा रक्त से लथपथ उसके शव को एक योजन दूर उठा फेंका।&lt;br /&gt;
*मार्ग में उसके मुँह से निकली [[रक्त]] की बूंदें महर्षि मतंग के आश्रम पर जाकर गिरीं।&lt;br /&gt;
*महर्षि मतंग ने बालि को शाप दिया कि वह और उसके वानरों में से कोई यदि उनके आश्रम के पास एक योजन की दूरी तक जायेगा तो वह मर जायेगा।&lt;br /&gt;
*अत: बालि के समस्त वानरों को भी वह स्थान छोड़कर जाना पड़ा। &lt;br /&gt;
*मतंग का आश्रम [[ऋष्यमूक पर्वत]] पर स्थित था, अत: बालि और उसके वानर वहाँ नहीं जा सकते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;[[वाल्मीकि रामायण]], किष्किंधा कांड, सर्ग 11, श्लोक 7-63&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=भारतीय मिथक कोश|लेखक= डॉ. उषा पुरी विद्यावाचस्पति|अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली|संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या= 136|url=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
{{पौराणिक चरित्र}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक चरित्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AB%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BF&amp;diff=229264</id>
		<title>फेनगिरि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AB%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BF&amp;diff=229264"/>
		<updated>2011-10-23T08:00:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''फेनगिरि''' एक ऐतिहासिक स्थान है। &lt;br /&gt;
*जो [[सिन्धु नदी]] के मुहाने के निकट स्थित है। &lt;br /&gt;
*बृहत संहिता&amp;lt;ref&amp;gt;बृहत संहिता 14,5,18&amp;lt;/ref&amp;gt; में इसका उल्लेख है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना अक्टूबर-2011]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>वेलसाओ तट गोवा</title>
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		<updated>2011-10-23T05:52:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=&lt;br /&gt;
|विवरण=यह तट गोवा राज्‍य के दक्षिणी सिरे पर स्थित है और यह राजधानी [[पणजी]] से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
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|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल व सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, रिजॉर्ट, सरकारी रिजॉर्ट &lt;br /&gt;
|क्या खायें= &lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=9111&lt;br /&gt;
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|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=velsao+beach,+goa&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=15.351073,73.88649&amp;amp;spn=0.025534,0.045447&amp;amp;sll=15.484453,73.807526&amp;amp;sspn=0.0981,0.181789&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hnear=Goa+Beach+Private+Property+and+Picnic+spot&amp;amp;t=m&amp;amp;z=15 वेलसाओ तट का गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वेलसाओ तट''' गोवा राज्‍य के दक्षिणी सिरे पर स्थित है और यह राजधानी [[पणजी]] से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*यह तट हर वर्ष पर्यटकों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है। &lt;br /&gt;
*सूर्यास्‍त के तुरंत बाद वेलसाओ तट की सुंदरता पर्यटकों का मनमोह लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]][[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] [[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>वेलसाओ तट गोवा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
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|विवरण=यह तट गोवा राज्‍य के दक्षिणी सिरे पर स्थित है और यह राजधानी [[पणजी]] से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वेलसाओ तट''' गोवा राज्‍य के दक्षिणी सिरे पर स्थित है और यह राजधानी [[पणजी]] से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*यह तट हर वर्ष पर्यटकों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है। &lt;br /&gt;
*सूर्यास्‍त के तुरंत बाद वेलसाओ तट की सुंदरता पर्यटकों का मनमोह लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]][[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] [[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>मीरामर तट गोवा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मीरामर तट''' गोवा के सबसे अधिक लोकप्रिय तटों में से एक है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*[[पणजी]] से सूर्यास्‍त को देखने के लिए यह तट सबसे अधिक उपयुक्‍त स्‍थान है।&lt;br /&gt;
*यह तट दयानंद बंदोदकर मार्ग पर नदी के सामने वाले मार्ग से केवल 15 मिनट पैदल चलने की दूरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*यह तट एक शहरी तट है जहाँ मांडोवी नदी [[अरब सागर]] से मिलती है। &lt;br /&gt;
*यह तट तैरने के लिए सुरक्षित नहीं है क्‍यों‍कि यहाँ पर तेज़ समुद्री धाराएँ बहती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>अंजुना तट गोवा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%A4%E0%A4%9F_%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BE&amp;diff=229203"/>
		<updated>2011-10-23T05:46:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Anjuna-Beach-1.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=अंजुना बीच, गोवा&lt;br /&gt;
|विवरण=अंजुना तट के पास 1920 में निर्मित अल्‍बुक़र्क़ का महल है जो 8 स्‍तंभों से घिरा हुआ है। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[गोवा]] &lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[उत्तर गोवा ज़िला|उत्तर गोवा]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 15°42′; पूर्व- 73°42′ &lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=डबोलिम हवाई अड्डा से 61.9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[सितम्बर]] से [[अप्रैल]]&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल व सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=डबोलिम हवाई अड्डा, पणजी हवाई अड्डा &lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=वास्को रेलवे स्टेशन, मडगांव रेलवे स्टेशन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=&lt;br /&gt;
|यातायात=टैक्सी, रिक्शा&lt;br /&gt;
|क्या देखें=पिस्सू बाजार, अल्‍बुक़र्क़ का महल आदि।&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह &lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=9111&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=लगभग सभी &lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.com/maps?q=Anjuna+Beach,+Goa&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=15.578809,73.740063&amp;amp;spn=0.025506,0.045447&amp;amp;t=m&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hnear=Anjuna+Beach&amp;amp;z=15 अंजुना तट का गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|17:21, 24 सितम्बर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''अंजुना तट''' उत्तर गोवा में स्थित है। यह गोवा की राजधानी से [[पणजी]] से 18 किलोमीटर दूर है।&lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*अंजुना तट युवा पीढ़ी के बीच अधिक लोकप्रिय माना जाता है। &lt;br /&gt;
*अंजुना तट के पास [[1920]] में निर्मित अल्‍बुक़र्क़ का महल है जो 8 स्‍तंभों से घिरा हुआ है।&lt;br /&gt;
*इस तट पर आकर्षक मेंगलोर टाइल वाली छत है। &lt;br /&gt;
*इसे '''दुनिया की गोआनी राजधानी''' भी कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Anjuna-Beach-Goa.jpg|अंजुना बीच, गोवा&lt;br /&gt;
चित्र:Anjuna-Beach-Goa-1.jpg|अंजुना बीच, [[गोवा]] &lt;br /&gt;
चित्र:Anjuna-Beach-Goa-2.png|अंजुना बीच, [[गोवा]]  &lt;br /&gt;
चित्र:Anjuna-Beach.jpg|अंजुना तट, [[गोवा]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]][[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] [[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B2_%E0%A4%A4%E0%A4%9F_%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BE&amp;diff=229202</id>
		<title>अरामबोल तट गोवा</title>
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		<updated>2011-10-23T05:46:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Arambol-Beach-Goa.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=अरामबोल तट, गोवा&lt;br /&gt;
|विवरण=अरामबोल तट [[पणजी]] से 50 किलोमीटर की दूरी पर है और यह उत्तरी गोवा का एक अनोखा तट है। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[गोवा]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[उत्तर गोवा ज़िला]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 15°42′; पूर्व- 73°42′&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=डबोलिम हवाई अड्डा से 61.9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=ताजे पानी की झील जो समुद्र में मिल जाती है।&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[सितम्बर]] से [[अप्रैल]]&lt;br /&gt;
|यातायात=&lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=डबोलिम हवाई अड्डा, पणजी हवाई अड्डा&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=वास्को रेलवे स्टेशन, मडगांव रेलवे स्टेशन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल व सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, रिजॉर्ट, सरकारी रिजॉर्ट &lt;br /&gt;
|क्या खायें=चावल और मछली करी, मछली से बने व्यंजन, फेनी, काजू फेनी &lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=9111&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=लगभग सभी &lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=arambol+beach+goa+india&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=15.684526,73.703842&amp;amp;spn=0.203942,0.363579&amp;amp;sll=15.684692,73.703327&amp;amp;sspn=0.101971,0.181789&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;gl=in&amp;amp;hnear=Arambol+Beach&amp;amp;t=m&amp;amp;z=12 अरामबोल तट का गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|12:52, 28 अगस्त 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''अरामबोल तट''' [[पणजी]] से 50 किलोमीटर की दूरी पर है और यह उत्तरी गोवा का एक अनोखा तट है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*अरामबोल तट पथरीला और रेत से भरा हुआ है। &lt;br /&gt;
*अरामबोल तट के ठीक किनारे मीठे पानी का एक तालाब है। &lt;br /&gt;
*इस तट पर पर्याप्‍त रूप से घूमने का स्‍थान है।&lt;br /&gt;
*यहाँ चलने योग्‍य दूरी पर अनेक आकर्षक खाइयाँ हैं। &lt;br /&gt;
*अरामबोल तट उन व्‍यक्तियों के लिए अत्‍यंत सुखदायी है जो शांति और प्रकृति का आनंद लेना चाहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]][[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] [[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>मीरामर तट गोवा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Miramar-Beach-Goa.jpg&lt;br /&gt;
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|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल व सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मीरामर तट''' गोवा के सबसे अधिक लोकप्रिय तटों में से एक है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*[[पणजी]] से सूर्यास्‍त को देखने के लिए यह तट सबसे अधिक उपयुक्‍त स्‍थान है।&lt;br /&gt;
*यह तट दयानंद बंदोदकर मार्ग पर नदी के सामने वाले मार्ग से केवल 15 मिनट पैदल चलने की दूरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*यह तट एक शहरी तट है जहाँ मांडोवी नदी [[अरब सागर]] से मिलती है। &lt;br /&gt;
*यह तट तैरने के लिए सुरक्षित नहीं है क्‍यों‍कि यहाँ पर तेज़ समुद्री धाराएँ बहती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>मोजोर्डा तट गोवा</title>
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		<updated>2011-10-23T05:43:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Majorda-Beach-Goa.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=मोजोर्डा तट, गोवा&lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''मोजोर्डा तट''' मडगाव से जुड़ा है।&lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*यह तट गोवा के शानदार तटों में से एक है। &lt;br /&gt;
*जिस जगह पर बस, ऑटो रिक्‍शा, रिक्‍शा और टैक्‍सी सहित अच्‍छे सड़क मार्ग हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>वागाटोर तट गोवा</title>
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		<updated>2011-10-23T05:40:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Vagator-Beach-Goa-3.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=वागाटोर तट, गोवा&lt;br /&gt;
|विवरण=वागाटोर तट [[पणजी]] से 22 किलोमीटर की दूरी पर है और यह उत्तरी गोवा का एक अनोखा तट है। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[गोवा]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[उत्तर गोवा ज़िला]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 15°42′; पूर्व- 73°42′&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[सितम्बर]] से [[अप्रैल]]&lt;br /&gt;
|यातायात=&lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=डबोलिम हवाई अड्डा, पणजी हवाई अड्डा&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=वास्को रेलवे स्टेशन, मडगांव रेलवे स्टेशन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल व सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, रिजॉर्ट, सरकारी रिजॉर्ट &lt;br /&gt;
|क्या खायें= &lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=9111&lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वागाटोर तट''' [[पणजी]] से 22 किलोमीटर की दूरी पर है और यह उत्तरी गोवा का एक अनोखा तट है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ का समुद्र नीले से हरे रंग का दिखाई देता है। &lt;br /&gt;
*तट की मनमोहक सुंदरता आने वालों को बांध लेती है। &lt;br /&gt;
*वास्‍तव में वागाटोर तट एक ऐसा स्‍थान है जहाँ मछली पकड़ने की छोटी नावों में पर्यटक रोमांचक अनुभव कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>हरमल तट गोवा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Harmal-Beach-Goa.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=हरमल तट, [[गोवा]] &lt;br /&gt;
|विवरण=&lt;br /&gt;
|राज्य=[[गोवा]]&lt;br /&gt;
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|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=&lt;br /&gt;
|मौसम=&lt;br /&gt;
|तापमान=20° सेल्सियस (सर्दियों में) से 33° सेल्सियस (गर्मियों में) तक &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[सितम्बर]] से [[अप्रैल]] &lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल, बस, टैक्सी, स्टीमर आदि से पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=डबोलिम हवाई अड्डा, पणजी हवाई अड्डा&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=वास्को रेलवे स्टेशन, मडगांव रेलवे स्टेशन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=&lt;br /&gt;
|यातायात=टैक्सी, मीटर वाली टैक्सी, बस, नाव&lt;br /&gt;
|क्या देखें=&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, रिजॉर्ट, सरकारी रिजॉर्ट&lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=9111&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=लगभग सभी&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?hl=en&amp;amp;ll=15.646841,73.987427&amp;amp;spn=0.784175,1.454315&amp;amp;t=m&amp;amp;z=10&amp;amp;vpsrc=6 हरमल तट गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*पैराग्लाइडिंग नहीं आती है तो यहाँ सिखाने की भी व्यवस्था है। &lt;br /&gt;
*यहाँ हवा के रुख के अनुसार तीन टेक-ऑफ़ साइट्स हैं। &lt;br /&gt;
*ओम रॉक, कैरी और 100 फुट ऊँचा स्पॉट, जहाँ पर शुरुआती स्तर पर टेकऑफ़ करवाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]][[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] [[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>वागाटोर तट गोवा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Vagator-Beach-Goa-3.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=वागाटोर तट, गोवा&lt;br /&gt;
|विवरण=वागाटोर तट [[पणजी]] से 22 किलोमीटर की दूरी पर है और यह उत्तरी गोवा का एक अनोखा तट है। &lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
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|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|12:52, 28 अगस्त 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वागाटोर तट''' [[पणजी]] से 22 किलोमीटर की दूरी पर है और यह उत्तरी गोवा का एक अनोखा तट है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ का समुद्र नीले से हरे रंग का दिखाई देता है। &lt;br /&gt;
*तट की मनमोहक सुंदरता आने वालों को बांध लेती है। &lt;br /&gt;
*वास्‍तव में वागाटोर तट एक ऐसा स्‍थान है जहाँ मछली पकड़ने की छोटी नावों में पर्यटक रोमांचक अनुभव कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
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		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>मोजोर्डा तट गोवा</title>
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		<updated>2011-10-23T05:18:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Majorda-Beach-Goa.jpg&lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
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|पाठ 1=&lt;br /&gt;
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|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''मोजोर्डा तट''' मडगाव से जुड़ा है।&lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*यह तट गोवा के शानदार तटों में से एक है। &lt;br /&gt;
*जिस जगह पर बस, ऑटो रिक्‍शा, रिक्‍शा और टैक्‍सी सहित अच्‍छे सड़क मार्ग हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>वागाटोर तट गोवा</title>
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		<updated>2011-10-23T05:16:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Vagator-Beach-Goa-3.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=वागाटोर तट, गोवा&lt;br /&gt;
|विवरण=वागाटोर तट [[पणजी]] से 22 किलोमीटर की दूरी पर है और यह उत्तरी गोवा का एक अनोखा तट है। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[गोवा]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
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|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल व सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, रिजॉर्ट, सरकारी रिजॉर्ट &lt;br /&gt;
|क्या खायें= &lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
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|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|12:52, 28 अगस्त 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वागाटोर तट''' [[पणजी]] से 22 किलोमीटर की दूरी पर है और यह उत्तरी गोवा का एक अनोखा तट है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ का समुद्र नीले से हरे रंग का दिखाई देता है। &lt;br /&gt;
*तट की मनमोहक सुंदरता आने वालों को बांध लेती है। &lt;br /&gt;
*वास्‍तव में वागाटोर तट एक ऐसा स्‍थान है जहाँ मछली पकड़ने की छोटी नावों में पर्यटक रोमांचक अनुभव कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
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		<title>मोजोर्डा तट गोवा</title>
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		<updated>2011-10-23T05:12:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Majorda-Beach-Goa.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=मोजोर्डा तट, गोवा&lt;br /&gt;
|विवरण= &lt;br /&gt;
|राज्य=[[गोवा]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 15°42′; पूर्व- 73°42′&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[सितम्बर]] से [[अप्रैल]]&lt;br /&gt;
|यातायात=&lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=डबोलिम हवाई अड्डा, पणजी हवाई अड्डा&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=वास्को रेलवे स्टेशन, मडगांव रेलवे स्टेशन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल व सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, रिजॉर्ट, सरकारी रिजॉर्ट &lt;br /&gt;
|क्या खायें= &lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=9111&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=Majorda+Beach,+goa&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=15.313989,73.905029&amp;amp;spn=0.187421,0.363579&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=47.178555,93.076172&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hq=Majorda+Beach,+goa&amp;amp;radius=15000&amp;amp;t=m&amp;amp;z=12 मोजोर्डा तट का गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''मोजोर्डा तट''' मडगाव से जुड़ा है।&lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*यह तट गोवा के शानदार तटों में से एक है। &lt;br /&gt;
*जिस जगह पर बस, ऑटो रिक्‍शा, रिक्‍शा और टैक्‍सी सहित अच्‍छे सड़क मार्ग हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B0_%E0%A4%A4%E0%A4%9F_%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BE&amp;diff=229185</id>
		<title>मीरामर तट गोवा</title>
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		<updated>2011-10-23T05:07:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Miramar-Beach-Goa.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=मीरामर तट, गोवा&lt;br /&gt;
|विवरण=&lt;br /&gt;
|राज्य=[[गोवा]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 15°42′; पूर्व- 73°42′&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=&lt;br /&gt;
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|कब जाएँ=[[सितम्बर]] से [[अप्रैल]]&lt;br /&gt;
|यातायात=&lt;br /&gt;
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|रेलवे स्टेशन=वास्को रेलवे स्टेशन, मडगांव रेलवे स्टेशन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल व सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, रिजॉर्ट, सरकारी रिजॉर्ट &lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=9111&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=miramar+beach,+goa&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=15.482467,73.807526&amp;amp;spn=0.097605,0.181789&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=47.178555,93.076172&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hnear=Miramar+Beach&amp;amp;t=m&amp;amp;z=13 मीरामर तट का गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मीरामर तट''' गोवा के सबसे अधिक लोकप्रिय तटों में से एक है। &lt;br /&gt;
*[[गोवा]] को 'पर्यटकों का स्‍वर्ग' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*[[पणजी]] से सूर्यास्‍त को देखने के लिए यह तट सबसे अधिक उपयुक्‍त स्‍थान है।&lt;br /&gt;
*यह तट दयानंद बंदोदकर मार्ग पर नदी के सामने वाले मार्ग से केवल 15 मिनट पैदल चलने की दूरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*यह तट एक शहरी तट है जहाँ मांडोवी नदी [[अरब सागर]] से मिलती है। &lt;br /&gt;
*यह तट तैरने के लिए सुरक्षित नहीं है क्‍यों‍कि यहाँ पर तेज़ समुद्री धाराएँ बहती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गोवा के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा के पर्यटन स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AD_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%B8&amp;diff=227436</id>
		<title>वज्रनाभ राक्षस</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AD_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%B8&amp;diff=227436"/>
		<updated>2011-10-15T12:13:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''वज्रनाभ''' नामक [[असुर]] ने तपस्या से [[ब्रह्मा]] को प्रसन्न करके यह वर प्राप्त किया था कि वह अवध्य होगा तथा वज्रपुर में प्रवेश कर पाएगा अन्यथा वज्रपुर में वायु का भी स्वच्छंद प्रवेश नहीं होगा। वर प्राप्ति के मद से मस्त वज्रनाभ [[इन्द्र]] के पास गया और त्रिलोकी का [[राज्य]] प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। इन्द्र ने कहा कि [[देवता|देवताओं]] के [[पिता]] [[कश्यप]] [[यज्ञ]] का अनुष्ठान कर चुके हैं, अत: यज्ञ समाप्ति के उपरान्त वे कोई निर्णय ले पायेंगे। वज्रनाभ ने अपने पिता कश्यप से सब कह सुनाया।&lt;br /&gt;
==कृष्ण की चतुराई==&lt;br /&gt;
वसुदेव भी [[अश्वमेध यज्ञ]] में व्यस्त थे। उस अवसर पर इन्द्र और [[कृष्ण]] ने प्रस्तुत उलझन के विषय में विचार-विमर्श किया तथा उनकी प्रेरणा पर सुन्दर नृत्य करने के उपरान्त भद्रनामा नामक नट ने मुनियों से वर माँगा कि वह त्रिलोकी में कहीं पर भी पाये, किसी का भी रूप धारण करने में समर्थ हो, रोग इत्यादि से सुरक्षित रहे तथा सबके लिए अवध्य हो। तदुपरान्त इन्द्र ने देवलोक के हंसों से कहा, &amp;quot;तुम सर्वत्र जा सकते हो, अत: वज्रनाभ की कन्या प्रभावती को [[प्रद्युम्न]] की ओर आकृष्ट कर दो। उन दोनों को परस्पर प्रेम संदेश मिलता रहे, ताकि प्रभावती स्वयंवर में उसी का वरण करे।&amp;quot;&lt;br /&gt;
==प्रभावती तथा प्रद्युम्न की भेंट==&lt;br /&gt;
शुचिमुखी नाम वाली हंसी ने प्रभावती को तरह-तरह की कथाएँ सुनाकर प्रद्युम्न की ओर आकृष्ट किया तथा वज्रनाभ को भद्रनामा नट के कौशल के विषय में बताया। वज्रनाभ उस नट का कौशल देखने के लिए आतुर हो उठा। उसके आमंत्रित करने पर [[कृष्ण]] ने अनेक राजकुमारों सहित प्रद्युम्न को नटों की भूमिका निर्वाह करने के लिए वज्रपुर भेजा। वे चिरकाल तक वहाँ रहे। हंसी ने प्रभावती से प्रद्युम्न की भेंट करवा दी। पहली रात वह भ्रमर के रूप में रनिवास में पहुँचा। दोनों ने [[अग्नि]] को साक्षी मानकर [[गंधर्व]] विवाह कर लिया। दोनों प्रति रात्रि केलिक्रीड़ा में मग्न रहते। वज्रनाभ को इस सब का कुछ भी पता नहीं चला।&lt;br /&gt;
==युद्ध का प्रारम्भ==&lt;br /&gt;
कश्यप का यज्ञ चल रहा था, अत: देवासुर संग्राम भी प्रारम्भ नहीं हुआ। कश्यप ने [[यज्ञ]] समाप्ति के उपरान्त वज्रनाभ को युद्ध करने की सलाह दी। इंद्र तथा कृष्ण ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। वज्रपुर में रहने वाले यादवों ने कहलवाया कि वज्रनाभ तथा उसके भाई की तीनों कन्याएँ गर्भवती हो चुकी हैं, यादवों की भार्याएँ हैं तथा प्रसव काल शीघ्र ही आने वाला है। [[कृष्ण]] और [[इन्द्र]] ने उन्हें निश्चिंत रहने को कहा और कहा कि भावी पुत्र उत्पन्न होते ही सर्वज्ञाता, योद्धा युवक हो जायेंगे। प्रभावती, चंद्रावती ने पुत्रों को जन्म दिया। वज्रनाभ ने जन्म लेते ही युवकों के समान बालकों को देखा तो उन्हें अपने कुल का कलंक मानकर उन्हें मारने के लिए अपनी सेना सहित दौड़ा। इसी निमित्त युद्ध हुआ।&lt;br /&gt;
==वज्रनाभ की मृत्यु==&lt;br /&gt;
प्रद्युम्न मायावी युद्ध में निपुण था। वह हज़ारों रूप धारण करके आकाश और विभिन्न दिशाओं में प्रकट हुआ। अंततोगत्वा प्रद्युम्न ने वज्रनाभ का वध कर दिया। [[बृहस्पति ऋषि|देवगुरु बृहस्पति]] की सलाह से उसकी नगरी चार भागों में विभक्त की गई तथा जयंत, प्रद्युम्न, सांब और गद के पुत्रों में बराबर-बराबर बांट दी गई।&amp;lt;ref&amp;gt;[[हरिवंश पुराण]]., विष्णुपर्व, 91-97&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{cite book | last =विद्यावाचस्पति | first =डॉक्टर उषा पुरी | title =भारतीय मिथक कोश| edition = | publisher =नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली| location =भारत डिस्कवरी पुस्तकालय| language =[[हिन्दी]]| pages =274| chapter =}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पौराणिक चरित्र}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक चरित्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%81&amp;diff=227310</id>
		<title>अली वर्दी ख़ाँ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%81&amp;diff=227310"/>
		<updated>2011-10-15T07:51:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: /* योग्य प्रशासक और वीर योद्धा */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''अली वर्दी ख़ाँ''' (1740-1756 ई.) का मूल नाम 'मिर्ज़ा मुहम्मद ख़ाँ' था। उसको [[बंगाल]] के नवाब शुजाउद्दीन (1725-1739 ई.) ने मिट्टी से उठाकर आदमी बना दिया और वह अली वर्दी या अलह वर्दी ख़ाँ के नाम से मशहूर हुआ। नवाब [[शुजाउद्दौला]] की मृत्यु के समय अली वर्दी ख़ाँ [[बिहार]] में नायब नाज़िम (वित्त विभाग का मुख्य अधिकारी) था, जो उस समय बंगाल का एक हिस्सा था।&lt;br /&gt;
==बंगाल का नवाब==&lt;br /&gt;
नवाब शुजाउद्दीन के बाद उसका बेटा सरफराज ख़ाँ बंगाल का नवाब बना। इससे कुछ ही पहले [[नादिरशाह]] की चढ़ाई हुई थी और उसने [[दिल्ली]] को लूटा था, जिसके कारण पूरा [[मुग़ल]] प्रशासन हिल गया था। इस गड़बड़ी से लाभ उठाकर अली वर्दी ख़ाँ ने घूस देकर दिल्ली से एक फ़रमान प्राप्त कर लिया, जिसके द्वारा सरफराज ख़ाँ को हटाकर उसकी जगह अली वर्दी ख़ाँ को बंगाल का नवाब बनाया गया था। अपने भाई हाज़ी अहमद और [[जगत सेठ]] की सहायता से अली वर्दी ख़ाँ ने नवाब सरफराज ख़ाँ के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और 1740 ई. में राजमहल के निकट गिरिया की लड़ाई में उसे हराकर मार डाला और बंगाल के नवाब की मसनद (गद्दी) पर काबिज हो गया। बादशाह को नज़राने में क़ीमती चीज़ें भेजकर उसने दिल्ली दरबार से नवाब बंगाल के रूप में फिर से सनद प्राप्त कर ली।&lt;br /&gt;
==योग्य प्रशासक और वीर योद्धा==&lt;br /&gt;
इसके बाद उसने बंगाल पर 16 वर्ष (1740-56 ई.) तक लगभग एक स्वतंत्र शासक के रूप में राज्य किया। यद्यपि उसने नवाबी बेईमानी से प्राप्त की थी, तथापि उसमें कुछ अच्छे गुण भी थे। अपने प्रारम्भिक जीवन में वह योग्य प्रशासक और वीर योद्धा था। [[बंगाल]] में जो यूरोपीय कम्पनियाँ व्यापार करती थीं, उनके साथ उसका व्यवहार पक्षपातहीन था। उसने उनको आपस में लड़कर [[राज्य]] की शान्ति भंग करने की इजाज़त नहीं दी। लेकिन [[मराठा|मराठे]] उसे बराबर परेशान करते रहे। वे प्राय: प्रतिवर्ष बंगाल पर आक्रमण करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अली वर्दी ख़ाँ मराठा आक्रमण रोकने में असमर्थ रहा, हालाँकि उसने मराठा सरदार भास्कर पंडित की दग़ाबाज़ी से हत्या कर दी थी। अन्त में अली वर्दी ख़ाँ ने मराठों से 1751 ई. में सुलह करके उन्हें [[उड़ीसा]] के राजस्व का चौथ देना मंज़ूर कर लिया। उसके बाद उसने 6 वर्ष शान्ति से राज्य किया और 1756 ई. में 80 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई। उसकी मृत्यु के बाद उसका नाती [[सिराजुद्दौला]] नवाब बना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{cite book | last = भट्टाचार्य| first = सच्चिदानन्द | title = भारतीय इतिहास कोश | edition = द्वितीय संस्करण-1989| publisher = उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान| location =  भारत डिस्कवरी पुस्तकालय| language =  हिन्दी| pages = 23| chapter =}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मध्य काल}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य काल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=227303</id>
		<title>तितली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=227303"/>
		<updated>2011-10-15T07:44:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Butterflies.jpg|thumb|250px|विभिन्न प्रकार की तितली]]&lt;br /&gt;
'''तितली''' (अग्रेजी: ''Butterfly'') कीट वर्ग का सामान्य रूप से सभी जगह पाया जाने वाला प्राणी है। यह एक कीट है।&lt;br /&gt;
*तितली का जीवनकाल बहुत छोटा होता है। &lt;br /&gt;
*तितली ठोस भोजन नहीं खातीं, वे [[फूल|फूलों]] का रस पीती है। &lt;br /&gt;
*तितली का दिमाग़ बहुत तेज़ होता है।&lt;br /&gt;
*विश्व की सबसे तेज़ उड़ने वाली तितली ''मोनार्च'' (अग्रेजी:''Monarch'') है। &lt;br /&gt;
*मोनार्च एक घंटे में 17 मील की दूरी तय कर लेती है। &lt;br /&gt;
*कोस्टा रीका में तितलियों की 1300 से ज़्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं। &lt;br /&gt;
*दुनिया की सबसे बड़ी तितली ''जायंट बर्डविंग'' (अग्रेजी:''Giant Berdving'') है, जो सोलमन [[द्वीप|द्वीपों]] पर पाई जाती है। &lt;br /&gt;
*जायंट बर्डविंग तितली के पंखों का फैलाव 12 इंच से ज़्यादा होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पशु पक्षी}}&lt;br /&gt;
[[Category:प्राणि विज्ञान]]&lt;br /&gt;
[[Category:विज्ञान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कीट]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>काव्या</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=227300</id>
		<title>तितली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=227300"/>
		<updated>2011-10-15T07:41:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;काव्या: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Butterflies.jpg|thumb|250px|विभिन्न प्रकार की तितली]]&lt;br /&gt;
'''तितली''' (अग्रेजी: ''Butterfly'') कीट वर्ग का सामान्य रूप से सभी जगह पाया जाने वाला प्राणी है। यह एक कीट है।&lt;br /&gt;
*तितली का जीवनकाल बहुत छोटा होता है। &lt;br /&gt;
*तितली ठोस भोजन नहीं खातीं, वे [[फूल|फूलों]] का रस पीती है। &lt;br /&gt;
*तितली का दिमाग़ बहुत तेज़ होता है।&lt;br /&gt;
*विश्व की सबसे तेज़ उड़ने वाली तितली ''मोनार्च'' (अग्रेजी:''Monarch'') है। &lt;br /&gt;
*मोनार्च एक घंटे में 17 मील की दूरी तय कर लेती है। &lt;br /&gt;
*कोस्टा रीका में तितलियों की 1300 से ज़्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं। &lt;br /&gt;
*दुनिया की सबसे बड़ी तितली ''जायंट बर्डविंग'' (अग्रेजी:''Giant Berdving'') है, जो सोलमन [[द्वीप|द्वीपों]] पर पाई जाती है। &lt;br /&gt;
*जायंट बर्डविंग तितली के पंखों का फैलाव 12 इंच से ज्यादा होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पशु पक्षी}}&lt;br /&gt;
[[Category:प्राणि विज्ञान]]&lt;br /&gt;
[[Category:विज्ञान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कीट]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>काव्या</name></author>
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