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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
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		<title>सीता</title>
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		<updated>2011-04-22T13:23:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पात्र परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Ramayana.jpg&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=[[जानकी]], वैदेही&lt;br /&gt;
|अवतार=लक्ष्मीवतार&lt;br /&gt;
|वंश-गोत्र=निमि&lt;br /&gt;
|कुल=&lt;br /&gt;
|पिता=&lt;br /&gt;
|माता=पृथ्वी माँ&lt;br /&gt;
|धर्म पिता=[[जनक]]&lt;br /&gt;
|धर्म माता=विदेही&lt;br /&gt;
|पालक पिता=&lt;br /&gt;
|पालक माता=&lt;br /&gt;
|जन्म विवरण=अकाल पड़ने के कारण हल जोतने से पृथ्वी को फोड़कर सीता का जन्म&lt;br /&gt;
|समय-काल=रामायण काल&lt;br /&gt;
|धर्म-संप्रदाय=&lt;br /&gt;
|परिजन=पिता=जनक, बहन=[[उर्मिला]]&lt;br /&gt;
|गुरु=&lt;br /&gt;
|विवाह=[[राम]]&lt;br /&gt;
|संतान=[[लव कुश|लव]], [[लव कुश|कुश]]&lt;br /&gt;
|विद्या पारंगत=&lt;br /&gt;
|रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|महाजनपद=&lt;br /&gt;
|शासन-राज्य=&lt;br /&gt;
|संदर्भ ग्रंथ=[[रामायण]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध घटनाएँ=वनवास, हरण, अग्नि-परिक्षा, धरती में समाना&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=&lt;br /&gt;
|मृत्यु=&lt;br /&gt;
|यशकीर्ति=पतिव्रता, स्वाभिमानी&lt;br /&gt;
|अपकीर्ति=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
राजा [[जनक]] की पुत्री का नाम सीता इसलिए था कि वे जनक को हल कर्षित रेखाभूमि से प्राप्त हुई थीं। बाद में उनका विवाह भगवान [[राम]] से हुआ। [[वाल्मीकि रामायण]]&amp;lt;ref&amp;gt; वाल्मीकि रामायण,1.66.13-14&amp;lt;/ref&amp;gt; में जनक जी सीता की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार कहते हैं:&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;अथ मे कृषत: क्षेत्रं लांगलादुत्थिता तत:।&lt;br /&gt;
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता॥&lt;br /&gt;
भूतकादुत्त्थिता सा तु व्यवर्द्धत ममात्मजा।&lt;br /&gt;
दीर्यशुक्लेति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
यही कथा [[पद्म पुराण]] तथा [[भविष्य पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;भविष्य पुराण, सीतानवमी व्रत माहात्म्य&amp;lt;/ref&amp;gt; में विस्तार के साथ कही गयी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मान्यतायें==&lt;br /&gt;
{{इन्हें भी देखें |सीता उपनिषद}}&lt;br /&gt;
*सीता एक नदी का नाम है। &lt;br /&gt;
*[[भागवत]] &amp;lt;ref&amp;gt;(भागवत, पंचमस्कन्ध)&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार वह भद्राश्व वर्ष की गंगा है:&lt;br /&gt;
सीता तु ब्रह्मसदनात् केशवाचलादि गिरशिखरेभ्योऽधोऽध: प्रस्त्रवन्ती गन्धमादनमूर्द्धसु पतित्वाऽन्तरेण भद्राश्वं वर्ष प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्रं अभिप्रविशति।&lt;br /&gt;
*'शब्दमाला' में सीता के सम्बन्ध में निम्नांकित कथन है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;गंगायान्तु भद्रसोमा महाभद्राथ पाटला।&lt;br /&gt;
तस्या: स्त्रोतसि सीता च वड्क्षुर्भद्रा च कीर्तिता॥&lt;br /&gt;
तद्भेदेऽलकनन्दापि शारिणी त्वल्पनिम्नगा ॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सीता का जन्म==&lt;br /&gt;
[[मिथिला]] प्रदेश के राजा जनक के राज्य में एक बार अकाल पड़ने लगा। वे स्वयं हल जोतने लगे। तभी [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] को फोड़कर सीता निकल आयी। जब राजा बीज बो रहे थे तब सीता को धूल में पड़ी पाकर उन्होंने उठा लिया। उन्होंने आकाशवाणी सुनी - 'यह तुम्हारी धर्मकन्या है।'  तब तक राजा की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने उसे पुत्रीवत पाला और अपनी बड़ी रानी को सौंप दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;लांगल पद्वति (हल के फल से खेत में बनी हुई रेखा)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सीता का स्वयंवर==&lt;br /&gt;
किशोरी सीता के लिए योग्य वर प्राप्त करना कठिन हो गया, क्योंकि सीता ने मानव-योनि से जन्म नहीं लिया था। अंत में राजा जनक ने सीता का [[स्वयंवर]] रचा। एक बार दक्ष यक्ष के अवसर पर [[वरुण देवता|वरुण देव]] ने जनक को एक धनुष और बाणों से आपूरित दो तरकश दिये थे। वह धनुष अनेक लोग मिलकर भी हिला नहीं पाते थे। जनक ने घोषणा की कि जो मनुष्य धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा देगा, उससे वे सीता का विवाह कर देंगे।&amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड, 118।26-118&amp;lt;/ref&amp;gt; राजा इस कसौटी पर असफल रहे तो उन्होंने अपना अपमान जानकर [[मिथिला|जनकपुरी]] को तहस-नहस कर डाला। राजा जनक ने तपस्या से [[देवता|देवताओं]] को प्रसन्न किया तथा उनकी [[चतुरंगिणी सेना]] से उन राजाओं को परास्त किया। राजा जनक से यह वृत्तांत जानकर [[विश्वामित्र]] ने [[राम]]-[[लक्ष्मण]] को वह धनुष दिखलाने की इच्छा प्रकट की। जनक की आज्ञा से आठ पहियों वाले संदूक में बंद उस धनुष को पांच हज़ार वीर ठेल कर लाये। जनक ने कहा कि जिस धनुष को उठाने, प्रत्यंचा चढ़ाने और टंकार करने में देवता, दानव, दैत्य, राक्षस, गंधर्व और किन्नर भी समर्थ नहीं हैं, उसे मनुष्य भला कैसे उठा सकता है! संदूक खोलकर, राजा जनक की अनुमति से, राम ने अत्यंत सहजता से वह धनुष उठाकर चढ़ाया और मध्य से तोड़ डाला। राम, लक्ष्मण, विश्वामित्र और जनक के अतिरिक्त शेष समस्त उपस्थित गण तत्काल बेहोश हो गये। जनक ने प्रसन्नचित्त सीता का विवाह राम से करने की ठानी और राजा [[दशरथ]] को सादर लाने के लिए मन्त्रियों को [[अयोध्या]] भेजा। राजा [[दशरथ]] ने [[वसिष्ठ]], वामदेव तथा अपने मन्त्रियों से सलाह की और विदेह के नगर की ओर प्रस्थान किया। राजा जनक ने अपने भाई कुशध्वज को भी सांकाश्या नगरी से बुला भेजा। राजा दशरथ और जनक ने अपनी वंशावली का पूर्ण परिचय देकर सीता और [[उर्मिला]] का विवाह राम और लक्ष्मण से तय कर दिया तथा विश्वामित्र के प्रस्ताव से कुशध्वज की दो सुंदरी कन्याओं [[मांडवी]]-[[श्रुतकीर्ति]] का विवाह [[भरत (दशरथ पुत्र)|भरत]] तथा [[शत्रुघ्न]] के साथ निश्चित कर दिया। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में चारों भाइयों का विवाह हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राम का रावण से युद्ध==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
कालांतर में [[कैकेयी]] के वर मांग लेने पर सीता और लक्ष्मण सहित राम चौदह वर्ष के वनवास के लिए चले गये। वन में [[रावण]] ने सीता का हरण किया। फलस्वरूप राम - रावण युद्ध हुआ। &amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, बाल कांड, 66।12-26 67।1-27, 68, 69, 70, 71, 72, 73, 75, 76, 77 (संपूर्ण)&amp;lt;/ref&amp;gt; रणक्षेत्र में वानर-सेना तथा राम - लक्ष्मण को व्यग्र करने के निमित्त [[मेघनाद]] ने माया का विस्तार किया। एक मायावी सीता की रचना की, जो सीता की भांति ही कृशकाय तथा अस्त-व्यस्त वेशभूषा धारण किये थी। मेघनाद ने उस मायावी सीता को अपने रथ के सामने बैठा कर रणक्षेत्र में घूमना प्रारंभ किया। वानरों ने उसे सीता समझकर प्रहार नहीं किया। मेघनाद ने मायावी सीता के बाल पकड़कर खींचे तथा उसके दो टुकड़े करके मार डाला। चारों ओर फैला ख़ून देखकर सब लोग शोकाकुल हो उठे। [[हनुमान]] ने सीता को मरा जानकर वानरों को युद्ध न करने की व्यवस्था दी क्योंकि जिस सीता के लिए युद्ध कर रहे थे, वही नहीं रही तो युद्ध करना व्यर्थ है। यह देखकर मेघनाद निकुंभिला देवी के स्थान पर जाकर हवन करने लगा। राम ने सीता के निधन के विषय में जाना तो अचेत हो गये। जब राम की चेतना लौटी तो लक्ष्मण ने अनेक प्रकार से उनको समझाया तथा [[विभीषण]] ने कहा कि 'रावण कभी भी सीता को मारने की आज्ञा नहीं दे सकता, अत: यह निश्चय ही माया का प्रदर्शन किया गया होगा&amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, 81।84&amp;lt;/ref&amp;gt;।'&lt;br /&gt;
==अग्नि परीक्षा==&lt;br /&gt;
[[लंका]]-विजय के उपरांत राम ने सीता से कहा- 'तुम रावण के पास बहुत रही हो, अत: मुझे तुम्हारे चरित्र पर संदेह है। तुम स्वेच्छा से लक्ष्मण, भरत अथवा विभीषण किसी के भी पास जाकर रहो, मैं तुम्हें ग्रहण नहीं करूंगा।' सीता ने ग्लानि, अपमान और दु:ख से विगलित होकर चिता तैयार करने की आज्ञा दी। लक्ष्मण ने चिता तैयार की। सीता ने यह कहा - 'यदि मन - वचन - कर्म से मैंने सदैव राम को ही स्मरण किया है तथा रावण जिस शरीर को उठाकर ले गया था, वह अवश था, तब [[अग्निदेव]] मेरी रक्षा करें।' और जलती हुई चिता में प्रवेश किया। अग्निदेव ने प्रत्यक्ष रूप धारण करके सीता को गोद में उठाकर राम के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए कहा कि वह हर प्रकार से पवित्र हैं। तदुपरांत राम ने प्रसन्न भाव से सीता को ग्रहण किया और उपस्थित समुदाय को बतलाया कि उन्होंने लोक निन्दा के भय से सीता को ग्रहण नहीं किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, 118-121&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सीता का त्याग==&lt;br /&gt;
कुछ समय बाद मन्त्रियों के मुंह से राम ने जाना कि प्रजाजन सीता की पवित्रता के विषय में संदिग्ध हैं। अत: सीता और राम को लेकर अनेक बातें कहते हैं। सीता गर्भवती थीं और उन्होंने राम से एक बार तपोवन की शोभा देखने की इच्छा प्रकट की थी। [[रघु वंश]] को कलंक से बचाने के लिए राम ने सीता को तपोवन की शोभा देखने के बहाने से लक्ष्मण के साथ भेजा। लक्ष्मण को अलग बुलाकर राम ने कहा कि वह सीता को वहीं छोड़ आये। लक्ष्मण ने तपोवन में पहुंचकर अत्यंत उद्विग्न मन से सीता से सब कुछ कह सुनाया और लौट आया। सीता का रूदन सुनकर [[वाल्मीकि]] ने दिव्य दृष्टि से सब बातें जान लीं तथा सीता को अपने आश्रम में स्थान दिया। उसी आश्रम में सीता ने [[लव कुश|लव]] और [[लव कुश|कुश]] नामक पुत्रों को जन्म दिया। बालकों का लालन-पालन भी आश्रम में ही हुआ। राम इस सबके विषय में कुछ नहीं जानते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, उत्तर कांड, 45-49।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अश्वमेध यज्ञ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sita.jpg|thumb|सीता]]&lt;br /&gt;
जब राम ने [[अश्वमेध यज्ञ]] किया, उस समय लव और कुश नामक शिष्यों को वाल्मीकि ने [[रामायण]] सुनाने के लिए भेजा। राम ने मोद भाव से वह चरित्र सुना। प्रतिदिन वे दोनों बीस सर्ग सुनाते थे। उत्तर कांड तक पहुंचने पर राम ने जाना कि वे दोनों राम के ही बालक हैं। राम ने सीता को कहलाया कि यदि वे निष्पाप हैं तो सभा में आकर अपनी पवित्रता प्रकट करें। वाल्मीकि सीता को लेकर गये । वसिष्ठ ने कहा- 'हे राम, मैं [[वरुण देवता|वरुण]] का दसवां पुत्र हूं। जीवन में मैंने कभी झूठ नहीं बोला। ये दोनों तुम्हारे पुत्र हैं। यदि मैंने झूठ बोला हो तो मेरी तपस्या का फल मुझे न मिले। मैंने दिव्य-दृष्टि से उसकी पवित्रता देख ली है।' सीता हाथ जोड़कर नीचे मुख करके बोली- 'हे धरती मां, यदि मैं पवित्र हूँ तो धरती फट जाये और मैं उसमें समा जाऊ।' जब सीता ने यह कहा तब नागों पर रखा एक सिंहासन पृथ्वी फाड़कर बाहर निकला। सिंहासन पर पृथ्वी देवी बैठी थीं। उन्होंने सीता को गोद में बैठा लिया। सीता के बैठते ही वह सिंहासन धरती में धंसने लगा।&amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण उत्तर कांड, 93-97&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य कथाएँ==&lt;br /&gt;
*राम ने अग्नि-परीक्षा के उपरांत सीता को ग्रहण किया। इस बात का [[हनुमान]] और [[अंगद]] ने विरोध किया। उनके अनुसार समस्त कुटुंब और प्रजाजनों के सम्मुख सीता की पवित्रता प्रमाणित करके ही उसे ग्रहण करना चाहिए। राम-लक्ष्मण नहीं माने। राज्य में पहुंचकर कुछ समय बाद लोकापवाद सुनकर राम ने पुन: सीता को निर्वासित कर दिया। [[अश्वमेध यज्ञ]] के समय अंगद और हनुमान को ज्ञात हुआ तो वे रुष्ट और दुखी होकर [[गंगा नदी|गंगा]] - स्नान से पापों का [[शमन]] करने गये।&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्मवैवर्त पुराण, 154।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*जनक की पटरानी का नाम विदेही था। उसके गर्भिणी होने पर प्रभावशाली देव (जो पूर्वजन्म में पिंगल साधु था) ने अपने पूर्वजन्म का स्मरण किया तथा जाना कि उसके उदर से एक अन्य जीव के साथ उसका भूतपूर्व शत्रु भी जन्म ले रहा है। एक जुड़वां पुत्र और कन्या का जन्म होने पर उस देव ने पुत्र का अपहरण कर लिया। वह उसे शिला पर पटककर मार डालना चाहता था किंतु उसे अपने पुण्यों का नाश करने की इच्छा नहीं हुई। अत: उसने उद्यान में ही बालक को रख दिया। गवाक्ष से चंद्रगति खेचर ने उसे देखा तो उठाकर अपनी पत्नी अंशुमता के पास लिटा दिया। वे दोनों पुत्रहीन थे। उसे पुत्र मानकर उन्होंने लालन - पालन किया। उसका नाम भांमडल रखा गया। लोग उसको ही पुत्र का जनक समझे। विदेही अपना पुत्र खोकर बहुत दुखी हुई। बहुत ढूंढ़ने पर भी वह नहीं मिला। कन्या का नाम सीता रखा गया। बड़े होने पर एक दिन पृथ्वी पर घूमते हुए [[नारद]] ने सीता के विषय में सुना तो वह आकाश मार्ग से उसे देखने गया। नारद के भयंकर रूप को देखकर वह भयातुरा महल के अंदर चली गयी। नारद को द्वारपालों ने रोक लिया। नारद वहां से तो चला गया, पर सीता से वैर ठान लिया। उसने रथनूपुर नगर में पट पर सीता का चित्र खींचा, जिसे देखकर [[भामंडल]] उस पर मुग्ध हो गया। नारद ने प्रकट होकर उसका परिचय दिया और स्वयं आकाश-मार्ग से चला गया। पुत्र की इच्छा जानकर चंद्रगति ने कहा- 'हम लोग आकाश में रहने वाले विद्याधर हैं। मनुष्यों के पास हमारा जाना शोभा नहीं देता।' उसने चपलगति नामक एक दूत को पृथ्वी पर भेजा कि वह जनक को ले आये। चपलगति अश्व का रूप धारण करके जनक के पास गया। नये अश्व को देख जनक ने उसे अश्वशाला में बांध लिया। एक दिन राजा उस घोड़े पर बैठा तो वह तुरंत राजा सहित उड़कर वृक्ष की एक शाखा से जा लगा। अश्व अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुआ। चंद्रगति ने अपने पुत्र के लिए सीता को मांगा। जनक ने कहा कि वह पहले ही राम को समर्पित करने का निश्चय कर चुका है। चंद्रगति ने विद्याधरों के हाथ जनक के साथ एक महाधनुष भेजा और कहा- 'यदि राम इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा देंगे तो वह सीता को प्राप्त कर ले। यदि वह ऐसा न कर पाया तो भामंडल उसका अपहरण कर लेगा।' राम ने धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा दी। अत: उसने सीता को प्राप्त कर लिया। तदनंतर लक्ष्मण ने धनुष मोड़कर चंद्राकार कर दिया। भरत सोचने लगा- 'उसी पिता का पुत्र होकर मैं अभागा रह गया।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*राम-लक्ष्मण के साथ सीता ने भी राज्य का परित्याग कर वन की ओर प्रस्थान किया। दुर्भाग्य से रावण ने उसे हर लिया। रावण पूर्वसंकल्प के कारण पर नारी की इच्छा के बिना उसका उपभोग नहीं कर रहा था किंतु राम से बिछुड़कर सीता निराहार रहने लगी। उसे रावण ने अनेक प्रकार से मायावी कृत्यों द्वारा डराया भी किंतु उसका मन राम में ही रमा रहा। सीता को प्राप्त करके राम [[साकेत (अयोध्या)|साकेत]] पहुंचा। लक्ष्मण का राज्याभिषेक हुआ तथा सीता के गर्भ की घोषणा हुई। सीता गर्भकाल में जिन मंदिरों के दर्शन करना चाहती थी। राम ने राज्य में सीता के चरित्र-विषयक अपवाद सुने, क्योंकि उसे रावण ने हरा था। राम ने लोकापवाद से बचने के लिए निरपराधिनी सीता को जैन-मंदिरों के दर्शन करवाने के बहाने से जंगल में भेज दिया। भयानक जंगल में उसे छोड़ते हुए सेनापति कृतांतवदन का दिल भी दहल उठां रथ लौटाते हुए उसने सीता को उसके निर्वासन और उसका कारण भी बता दिया। संयोग से उस दिन हाथियों को पकड़ने के लिए राजा वज्रजंघ भी उसी जंगल में गया था। उसने सीता की बात सुनी तो उसे आश्वासन प्रदान करके अपने राज्य में शरण दी। कालांतर में उसने दो पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम अनंगलवण तथा मदनांकुश थे।&amp;lt;ref&amp;gt;पउम चरित, 26।-, 28।-, 45-46।-, 92-95।-, 97।–&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*रावण ने [[खर दूषण]] और सेना के साथ दंडकारण्य में पहुंचकर पुष्पक विमान से ही सीता को देखा तो मुग्ध हो गया। लक्ष्मण ने राम और सीता को ठहरने के लिए कहा और स्वयं युद्ध के लिए प्रस्थान किया। थोड़े समय उपरांत रावण ने लक्ष्मण जैसी आवाज में जोर से सिंहनाद किया। राम उस आवाज को सुनकर आकुल हो गये। वे सीता को [[जटायु]] के संरक्षण में छोड़कर युद्ध के लिए चले गये। सुअवसर जानकर [[रावण]] ने विमान नीचा किया तथा सीता को बलात उसमें बैठा लिया। जटायु के रोकने पर उसे घायल करके पृथ्वी पर धकेल दिया और सीता सहित विमान में उड़ चला। सीता रोने लगी। रावण ने सोचा, जब तक वह स्वेच्छा से उसके निकट नहीं आयेगी, वह उसका उपभोग नहीं करेगा। उधर राम लक्ष्मण के पास पहुंचे तो वह ठीक था और उसने अनुरोधपूर्वक राम को वापस भेज दिया। लौटने पर सीता नहीं मिली। घायल जटायु ने समस्त वृत्तांत कह सुनाया। लक्ष्मण विराधित की सहायता से उन सबको परास्त करके लौटा तो देखा कि सीता का अपहरण हो चुका है। राजा विराधित की सहायता करते हुए लक्ष्मण ने खरदूषण को मार डाला था, अत: सीता को खोजने के लिए विराधित ने अपने समस्त सेवकों का प्रयोग किया।&amp;lt;ref&amp;gt;पउम चरित, 44-45।–&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*अनंगलवण तथा मदनांकुश से राम-लक्ष्मण का युद्ध होने के उपरांत सीता अनेक नारियों से घिरी हुई राम के पास पहुंची। अपवाद के शमन के लिए उसने अग्नि-परीक्षा का अंगीकरण किया। सीता ने कहा- 'हे अग्नि! यदि मेरे मन में कभी भी राम से इतर कोई पुरुष नहीं आया है तो तू मुझे न जलाना।' जिस जगह लकड़ियां लगाकर अग्नि प्रज्वलित की गयी थी, वह सीता के प्रवेश करते ही पानी की बावड़ी के रूप में परिणत हो गया। धीरे-धीरे जल बढ़ता गया-लोग डूबने लगे। सीता का स्पर्श पाकर जल पुन: सीमित हो गया। राम ने सीता से क्षमा-याचना की। सीता ने उसे अपना कर्मजन्य प्रारब्ध ही माना। उसने अपने बाल उखाड़ डाले तथा दीक्षा ले ली। सकल भूषण मुनि ने राम के पूर्वभव के विषय में बताया सीता ने 'प्रव्रज्या' ग्रहण की।&amp;lt;ref&amp;gt;पउम चरित, 101।21-63, 102-103&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}} &lt;br /&gt;
{{रामायण}} {{हनुमान2}}&lt;br /&gt;
{{हनुमान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] [[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]] [[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>विदर्भ</title>
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		<updated>2011-04-22T12:31:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*विंध्याचल के दक्षिण में अवस्थित प्रदेश जिसकी स्थिति वर्तमान बरार के परिवर्ती क्षेत्र में मानी गई है। विदर्भ अतिप्राचीन समय से दक्षिण के जनपदों में प्रसिद्ध रहा है। [[बृहदारण्यकोपनिषद|वृहदारण्यकोपनिषत]] में विदर्भी-कौडिन्य नामक ॠषि का उल्लेख है जो विदर्भ के निवासी रहे होंगे। &lt;br /&gt;
*पौराणिक अनुश्रुति में कहा गया है कि किसी ॠषि के श्राप से इस देश में घास या दर्भ उगनी बंद हो गई थी जिसके कारण यह विदर्भ कहलाया। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] में विदर्भ देश के राजा भीम का उल्लेख है जिसकी राजधानी कुण्डिनपुर में थी। इसकी पुत्री [[दमयंती]] निषध नरेश की महारानी थी &amp;lt;ref&amp;gt;(ततो विदर्भान् संप्राप्तं सायाह्ने सत्यविक्रमम्, ॠतुपर्णं जना राज्ञेभीमाय प्रत्यवेदयन् --[[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]] 73,1 )&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*विदर्भ नरेश भोज की कन्या [[रुक्मिणी]] के हरण तथा [[कृष्ण]] के साथ उसके विवाह का वर्णन भी [[भागवत पुराण|श्रीमद्भावगत]] में है। श्री कृष्ण रुक्मिणी की प्रणय याचाना के फलस्वरूप [[द्वारका|आनर्त देश]] से विदर्भ पहुँचे थे &amp;lt;ref&amp;gt;(आनर्तादेकरात्रेण विदर्भानगमध्दयै - श्रीमद्भागवत 10,53,6)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*महाभारत में भीष्मक को, जो रुक्मिणी का पिता था, विदर्भ देश का राजा कहा गया है। भोजकट में उसकी राजधानी थी। &lt;br /&gt;
*[[हरिवंश पुराण]] &amp;lt;ref&amp;gt;हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व 60,32&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी विदर्भ की राजधानी भोजकट में बतायी गयी है।&lt;br /&gt;
*[[कालिदास]] के समय में विदर्भ का विस्तार [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] के दक्षिण से लेकर &amp;lt;ref&amp;gt;([[रघुवंश]] सर्ग 5 के वर्णन के अनुसार [[अज]] ने जिसकी राजधानी [[अयोध्या]] में थी। विदर्भराज भोज की कन्या [[इंदुमती]] के स्वयंवर में जाते समय नर्मदा को पार किया था)&amp;lt;/ref&amp;gt; कृष्णा के उत्तरी तट तक था। &lt;br /&gt;
*[[रघुवंश]] 5,41 में अज का इंदुमती स्वयंवर के लिए विदर्भदेश की राजधानी जाने का उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt; प्रस्थापयामास ससैन्यमेनमृध्दां विदर्भाधिपराजधानीम्।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*विदर्भ उत्तरी और दक्षिणी भागों में विभक्त था। उत्तरी विदर्भ की राजधानी [[अमरावती]] और दक्षिणी विदर्भ की [[प्रतिष्ठानपुर]] थी। &lt;br /&gt;
*[[मालविकाग्निमित्र]], अकं 5 के निम्न वर्णन से सूचित होता है कि [[शुंग काल]] में विदर्भ-विषय नामक एक स्वतन्त्र राज्य था। &amp;lt;ref&amp;gt; विदर्भविषयाद् भ्रात्रा वीरसेनेन प्रेषितं लेखं लेखकरैः&lt;br /&gt;
वाच्यमानं श्रृणोति'।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
*मालविकाग्निमित्र में विदर्भराज और [[विदिशा]] के शासक [[अग्निमित्र]] (पुष्पमित्र शुंग का पुत्र)का परस्पर वैमनस्य और युद्ध का वर्णन है। &lt;br /&gt;
*[[विष्णु पुराण]] 4,4, में विदर्भ तनया केशिनी का उल्लेख है जो [[सगर]] की पत्नी थीं। &lt;br /&gt;
*[[मुग़ल]] सम्राट [[अकबर]] के समकालीन [[अबुल फज़ल]] ने [[आइना-ए-अकबरी]] में विदर्भ का नाम वरदातट लिखा है। संभवतः वरदा नदी(वर्धा) के निकट स्थित होने के कारण ही मुग़लकाल में विदर्भ का यह नाम प्रचलित हो गया था। &lt;br /&gt;
*'बरार' तथा 'बीदर' नामों की व्युत्पत्ति भी विदर्भ से ही मानी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]] &lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]][[Category:ऐतिहासिक स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>विदर्भ</title>
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		<updated>2011-04-22T12:24:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*विंध्याचल के दक्षिण में अवस्थित प्रदेश जिसकी स्थिति वर्तमान बरार के परिवर्ती क्षेत्र में मानी गई है। विदर्भ अतिप्राचीन समय से दक्षिण के जनपदों में प्रसिद्ध रहा है। [[बृहदारण्यकोपनिषद|वृहदारण्यकोपनिषत]] में विदर्भी-कौडिन्य नामक ॠषि का उल्लेख है जो विदर्भ के निवासी रहे होंगे। &lt;br /&gt;
*पौराणिक अनुश्रुति में कहा गया है कि किसी ॠषि के श्राप से इस देश में घास या दर्भ उगनी बंद हो गई थी जिसके कारण यह विदर्भ कहलाया। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] में विदर्भ देश के राजा भीम का उल्लेख है जिसकी राजधानी कुण्डिनपुर में थी। इसकी पुत्री [[दमयंती]] निषध नरेश की महारानी थी &amp;lt;ref&amp;gt;(ततो विदर्भान् संप्राप्तं सायाह्ने सत्यविक्रमम्, ॠतुपर्णं जना राज्ञेभीमाय प्रत्यवेदयन् --[[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]] 73,1 )&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*विदर्भ नरेश भोज की कन्या [[रुक्मिणी]] के हरण तथा [[कृष्ण]] के साथ उसके विवाह का वर्णन भी [[भागवत पुराण|श्रीमद्भावगत]] में है। श्री कृष्ण रुक्मिणी की प्रणय याचाना के फलस्वरूप [[द्वारका|आनर्त देश]] से विदर्भ पहुँचे थे &amp;lt;ref&amp;gt;(आनर्तादेकरात्रेण विदर्भानगमध्दयै - श्रीमद्भागवत 10,53,6)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*महाभारत में भीष्मक को, जो रुक्मिणी का पिता था, विदर्भ देश का राजा कहा गया है। भोजकट में उसकी राजधानी थी। &lt;br /&gt;
*[[हरिवंश पुराण]] &amp;lt;ref&amp;gt;हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व 60,32&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी विदर्भ की राजधानी भोजकट में बतायी गयी है।&lt;br /&gt;
*[[कालिदास]] के समय में विदर्भ का विस्तार [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] के दक्षिण से लेकर &amp;lt;ref&amp;gt;([[रघुवंश]] सर्ग 5 के वर्णन के अनुसार [[अज]] ने जिसकी राजधानी [[अयोध्या]] में थी&lt;br /&gt;
विदर्भराज भोज की कन्या [[इंदुमती]] के [[स्वयंवर]]में जाते समय नर्मदा को पार किया था)&amp;lt;/ref&amp;gt; कृष्णा के उत्तरी तट तक था। &lt;br /&gt;
*[[रघुवंश]] 5,41 में अज का इंदुमती स्वयंवर के लिए विदर्भदेश की राजधानी जाने का उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt; प्रस्थापयामास ससैन्यमेनमृध्दां विदर्भाधिपराजधानीम्।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*विदर्भ उत्तरी और दक्षिणी भागों में विभक्त था। उत्तरी विदर्भ की राजधानी [[अमरावती]] और दक्षिणी विदर्भ की [[प्रतिष्ठानपुर]] थी। &lt;br /&gt;
*[[मालविकाग्निमित्र]], अकं 5 के निम्न वर्णन से सूचित होता है कि [[शुंग काल]] में विदर्भ-विषय नामक एक स्वतन्त्र राज्य था। &amp;lt;ref&amp;gt; विदर्भविषयाद् भ्रात्रा वीरसेनेन प्रेषितं लेखं लेखकरैः&lt;br /&gt;
वाच्यमानं श्रृणोति'।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
*मालविकाग्निमित्र में विदर्भराज और [[विदिशा]] के शासक [[अग्निमित्र]] (पुष्पमित्र शुंग का पुत्र)का परस्पर वैमनस्य और युद्ध का वर्णन है। &lt;br /&gt;
*[[विष्णु पुराण]] 4,4, में विदर्भ तनया केशिनी का उल्लेख है जो [[सगर]] की पत्नी थीं। &lt;br /&gt;
*[[मुग़ल]] सम्राट [[अकबर]] के समकालीन [[अबुल फज़ल]] ने [[आइना-ए-अकबरी]] में विदर्भ का नाम वरदातट लिखा है। संभवतः वरदा नदी(वर्धा) के निकट स्थित होने के कारण ही मुग़लकाल में विदर्भ का यह नाम प्रचलित हो गया था। &lt;br /&gt;
*'बरार' तथा 'बीदर' नामों की व्युत्पत्ति भी विदर्भ से ही मानी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]] &lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]][[Category:ऐतिहासिक स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>विदर्भ</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*विंध्याचल के दक्षिण में अवस्थित प्रदेश जिसकी स्थिति वर्तमान बरार के परिवर्ती क्षेत्र में मानी गई है। विदर्भ अतिप्राचीन समय से दक्षिण के जनपदों में प्रसिद्ध रहा है। [[बृहदारण्यकोपनिषद|वृहदारण्यकोपनिषत]] में विदर्भी-कौडिन्य नामक ॠषि का उल्लेख है जो विदर्भ के निवासी रहे होंगे। &lt;br /&gt;
*पौराणिक अनुश्रुति में कहा गया है कि किसी ॠषि के श्राप से इस देश में घास या दर्भ उगनी बंद हो गई थी जिसके कारण यह विदर्भ कहलाया। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] में विदर्भ देश के राजा भीम का उल्लेख है जिसकी राजधानी कुण्डिनपुर में थी। इसकी पुत्री [[दमयंती]] निषध नरेश की महारानी थी &amp;lt;ref&amp;gt;(ततो विदर्भान् संप्राप्तं सायाह्ने सत्यविक्रमम्, ॠतुपर्णं जना राज्ञेभीमाय प्रत्यवेदयन् --[[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]] 73,1 )&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*विदर्भ नरेश भोज की कन्या [[रुक्मिणी]] के हरण तथा [[कृष्ण]] के साथ उसके विवाह का वर्णन भी [[भागवत पुराण|श्रीमद्भावगत]] में है। श्री कृष्ण रुक्मिणी की प्रणय याचाना के फलस्वरूप [[द्वारका|आनर्त देश]] से विदर्भ पहुँचे थे &amp;lt;ref&amp;gt;(आनर्तादेकरात्रेण विदर्भानगमध्दयै - श्रीमद्भागवत 10,53,6)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*महाभारत में भीष्मक को, जो रुक्मिणी का पिता था, विदर्भ देश का राजा कहा गया है। भोजकट में उसकी राजधानी थी। &lt;br /&gt;
*[[हरिवंश पुराण]] &amp;lt;ref&amp;gt;हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व 60,32&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी विदर्भ की राजधानी भोजकट में बतायी गयी है।&lt;br /&gt;
*[[कालिदास]] के समय में विदर्भ का विस्तार [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] के दक्षिण से लेकर &amp;lt;ref&amp;gt;([[रघुवंश]] सर्ग 5 के वर्णन के अनुसार [[अज]] ने जिसकी राजधानी [[अयोध्या]] में थी&lt;br /&gt;
विदर्भराज भोज की कन्या [[इंदुमती]] के [[स्वयंवर]] में जाते समय नर्मदा को पार किया था)&amp;lt;/ref&amp;gt; कृष्णा के उत्तरी तट तक था। &lt;br /&gt;
*[[रघुवंश]] 5,41 में अज का इंदुमती स्वयंवर के लिए विदर्भदेश की राजधानी जाने का उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt; प्रस्थापयामास ससैन्यमेनमृध्दां विदर्भाधिपराजधानीम्।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*विदर्भ उत्तरी और दक्षिणी भागों में विभक्त था। उत्तरी विदर्भ की राजधानी [[अमरावती]] और दक्षिणी विदर्भ की [[प्रतिष्ठानपुर]] थी। &lt;br /&gt;
*[[मालविकाग्निमित्र]], अकं 5 के निम्न वर्णन से सूचित होता है कि [[शुंग काल]] में विदर्भ-विषय नामक एक स्वतन्त्र राज्य था। &amp;lt;ref&amp;gt; विदर्भविषयाद् भ्रात्रा वीरसेनेन प्रेषितं लेखं लेखकरैः&lt;br /&gt;
वाच्यमानं श्रृणोति'।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
*मालविकाग्निमित्र में विदर्भराज और [[विदिशा]] के शासक [[अग्निमित्र]] (पुष्पमित्र शुंग का पुत्र)का परस्पर वैमनस्य और युद्ध का वर्णन है। &lt;br /&gt;
*[[विष्णु पुराण]] 4,4, में विदर्भ तनया केशिनी का उल्लेख है जो [[सगर]] की पत्नी थीं। &lt;br /&gt;
*[[मुग़ल]] सम्राट [[अकबर]] के समकालीन [[अबुल फज़ल]] ने [[आइना-ए-अकबरी]] में विदर्भ का नाम वरदातट लिखा है। संभवतः वरदा नदी(वर्धा) के निकट स्थित होने के कारण ही मुग़लकाल में विदर्भ का यह नाम प्रचलित हो गया था। &lt;br /&gt;
*'बरार' तथा 'बीदर' नामों की व्युत्पत्ति भी विदर्भ से ही मानी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]] &lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]][[Category:ऐतिहासिक स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पाण्डु</title>
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		<updated>2011-04-22T12:20:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
[[सत्यवती]] के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये। जब चित्रांगद और विचित्रवीर्य के छोटे ही थे तभी [[शान्तनु]] का स्वर्गवास हो गया था इसलिये उनका पालन पोषण [[भीष्म]] ने किया। भीष्म ने चित्रांगद के बड़े होने पर उसे राजगद्दी पर बिठा दिया किन्तु कुछ समय बाद ही वह गन्धर्वों से युद्ध करते हुये मारा गया। भीष्म ने उसके भाई विचित्रवीर्य को राज्य सौंपने के बाद भीष्म को विचित्रवीर्य के विवाह की चिन्ता हुई। उसी समय काशीराज की तीन कन्याओं, [[अम्बा]], [[अम्बिका]] और [[अम्बालिका]] का [[स्वयंवर]] होने वाला था। भीष्म ने वहाँ जाकर अकेले ही सभी राजाओं को हरा दिया और तीनों कन्याओं का हरण करके[[ हस्तिनापुर]] ले आये। बड़ी कन्या अम्बा ने भीष्म को बताया कि वह राजा [[शाल्व]] को प्रेम करती है। यह सुन कर भीष्म ने उसे राजा शाल्व के पास भिजवाया और अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ करवा दिया।&lt;br /&gt;
==अम्बा की व्यथा==&lt;br /&gt;
राजा शाल्व ने अम्बा को स्वीकार नहीं किया अतः वह हस्तिनापुर वापिस लौट आयी और भीष्म से बोली, 'हे आर्य! आप मुझे लाये हैं अतः आप मुझसे विवाह करें।' किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसका अनुरोध अस्वीकार कर दिया। अम्बा नाराज़ हो कर [[परशुराम]] के पास गई और अपनी व्यथा सुना कर मदद माँगी। परशुराम ने कहा, 'हे देवि! मैं आपका विवाह भीष्म के साथ करवाउँगा।' परशुराम ने भीष्म को बुलवाया किन्तु भीष्म उनके पास नहीं गये। परशुराम क्रोधित होकर भीष्म के पास पहुँचे और दोनों में युद्ध छिड़ गया। दोनों कुशल योद्धा थे, अतः हार-जीत का फैसला ना हो पाया । अंत में देवताओं ने हस्तक्षेप कर इस युद्ध को बन्द करवाया। अम्बा वन में तपस्या करने चली गई।&lt;br /&gt;
==सत्यवती का दुःख==&lt;br /&gt;
विचित्रवीर्य की कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। कुल का नाश होने के भय से माता सत्यवती ने भीष्म से कहा, 'पुत्र! इस वंश को नष्ट होने से बचाने के लिये मेरी आज्ञा है कि तुम इन दोनों रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।' माता का आदेश सुन कर भीष्म ने कहा, 'माता! मैं अपनी प्रतिज्ञा भंग नहीं कर सकता।' माता सत्यवती को अत्यन्त दुःख हुआ। अचानक उन्हें अपने पुत्र [[वेदव्यास]] की याद आयी। याद करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गये। सत्यवती ने उन्हें देख करकहा, 'पुत्र! तुम्हारे सभी भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गये। अतः वंश का नाश होने से बचाने के लिये मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम उनकी पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो।' वेदव्यास उनकी आज्ञा मान कर बोले, 'माता! आप उन दोनों रानियों से कह दें कि वे एक वर्ष तक नियम व्रत का पालन करते रहें तभी उनको गर्भ धारण होगा।' &lt;br /&gt;
==धृतराष्ट्र का जन्म==&lt;br /&gt;
एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर वेदव्यास सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका के पास गये। अम्बिका ने उनके तेज़ से डर कर अपने नेत्र बन्द कर लिये। वेदव्यास लौट कर माता से बोले, 'माता अम्बिका का बड़ा ही तेजस्वी पुत्र होगा किन्तु नेत्र बन्द करने के दोष के कारण वह अंधा होगा।; सत्यवती को यह सुन कर अत्यन्त दुःख हुआ। &lt;br /&gt;
==पाण्डु का जन्म==&lt;br /&gt;
उन्होंने वेदव्यास को छोटी रानी अम्बालिका के पास भेजा। अम्बालिका वेदव्यास को देख कर भय से पीली पड़ गई। उसके कक्ष से लौटने पर वेदव्यास ने सत्यवती से कहा,'माता! अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र होगा।&amp;quot; इससे माता सत्यवती को और भी दुःख हुआ। उन्होंने बड़ी रानी अम्बालिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। &lt;br /&gt;
==विदुर का जन्म==&lt;br /&gt;
इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी ने आनन्दपूर्वक वेदव्यास से भोग कराया। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, 'माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।' इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये।&lt;br /&gt;
==पाण्डु को राजपाट==&lt;br /&gt;
समय आने पर अम्बा के गर्भ से जन्मांध धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के लालन पालन का भार भीष्म के ऊपर था। तीनों पुत्र बड़े होने पर विद्या पढ़ने भेजे गये। धृतराष्ट्र बल विद्या में, पाण्डु धनुर्विद्या में तथा विदुर धर्म और नीति में निपुण हुये। युवा होने पर धृतराष्ट्र अन्धे होने के कारण राज्य के उत्तराधिकारी न बन सके। विदुर दासीपुत्र थे इसलिये पाण्डु को ही हस्तिनापुर का राजा घोषित किया गया। भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से कर दिया। गांधारी को जब ज्ञात हुआ कि उसका पति अन्धा है तो उसने स्वयं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाभारत}}{{महाभारत2}}{{पौराणिक चरित्र}} &lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक चरित्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]][[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AD&amp;diff=154977</id>
		<title>कृष्ण संदर्भ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AD&amp;diff=154977"/>
		<updated>2011-04-22T12:19:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Krishna-2.jpg|thumb|बंसी बजाते हुए  [[कृष्ण]]|250px]]&lt;br /&gt;
==छान्दोग्य उपनिषद==&lt;br /&gt;
कृष्ण- एक बार आंगिरस ऋषि ने देवकी के पुत्र [[कृष्ण]] को यज्ञदर्शन सुनाया था। फलस्वरूप कृष्ण शेष समस्त विधाओं के प्रति तृष्णाहीन हो गये थे।(छा.उ., अध्याय 3,खंड 17, श्लोक 6)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृष्ण का मातृपरक नाम 'देवकीपुत्र' [[छान्दोग्य उपनिषद#तेरहवें खण्ड से उन्नीसवें खण्ड तक|छान्दोग्य उप निषद् (3,17,6)]] में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विभिन्न प्रसंग== &lt;br /&gt;
{{Tocright}} &lt;br /&gt;
वे अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त ब्रह्म थे।  मूलत: वे नारायण थे।  वे स्वयंभू तथा संपूर्ण जगत के प्रपितामह थे।  द्युलोक उनका मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी रचण, [[अश्विनीकुमार]] नासिकास्थान, [[चंद्र देवता|चंद्र]] और [[सूर्य देवता|सूर्य]] नेत्र तथा विभिन्न [[देवता]] विभिन्न देहयष्टियां हैं।  वे (ब्रह्म रूप) ही प्रलयकाल के अंत में [[ब्रह्मा]] के रूप में स्वयं प्रकट हुए तथा सृष्टि का विस्तार किया।  [[रुद्र]] इत्यादि की सृष्टि करने के उपरांत वे लोकहित के लिए अनेक रूप धारण करके प्रकट होते रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के रूप में वही अव्यक्त नारायण व्यक्त रूप धारण करके अवतरित हुए।  वे [[वसुदेव]] के पुत्र हुए।  [[कंस]] के भय से वसुदेव उन्हें [[नंद]] गोप के यहाँ छोड़ आये।  वहीं पलकर वे बड़े हुए।  [[यशोदा]] (नंद की पत्नी) से उन्हें अद्भुत वात्सल्य की उपलब्धि हुई।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(1) शिशुरूप में वे एक बार छकड़े  नीचे सो रहे थे।  यशोदा उन्हें वहां छोड़ यमुना तट गयी थी।  बाल-लीला का प्रदर्शन करते हुए रोते हुए कृष्ण ने अपने पांव के अंगूठे से छकड़े को धक्का दिया तो वह उलट गया। उस पर रखे समस्त मटके चूर-चूर हो गये।&amp;lt;br /&amp;gt;   &lt;br /&gt;
(2) देवताओं के देखते-देखते उन्होंने [[पूतना-वध|पूतना]] को मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(3) वे अपने बड़े भाई संकर्षण ([[बलराम|बलदेव]]) के साथ खेलते-कूदते बड़े हुए।  सात वर्ष की अवस्था में गोचारण के लिए जाया करते थे।  एक बार मक्खन चुराकर खाने के दंडस्वरूप मां (यशोदा) ने उन्हें ऊखल में बांध दिया।  कृष्ण ने उस ऊखल को [[यमल तथा अर्जुन]] नामक दो वृक्षों के बीच में फंसाकर इतने जोर से खींचा कि वे दोनों वृक्ष भूमिसात हो गये।  इस प्रकार उन वृक्षो पर रहनेवाले दो राक्षसों को उन्होंने मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(4) वे दोनों भाई ग्वालोचित वेशधारी वन में पिपिहरी तथा [[बांसुरी]] बजाकर आमोद-प्रमोद के साथ गायों को चराते थे।  कृष्ण पीले और बलराम नीले वस्त्र धारण करते थे।  वे पत्तों के मुकुट पहन लेते।  कभी-कभी रस्सी का [[यज्ञोपवीत]] भी धारण कर लेते थे।  वे गोप बालकों के आकर्षण का केंद्रबिंदु थे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(5) उन्होंने [[कदम्ब]]वन के पास हृद (कुण्ड) में रहने वाले [[कालिय नाग|कालिया नाग]] के मस्तक पर नृत्यक्रीड़ा की थी तथा अन्यत्रा जाने का आदेश दिया था।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(6) गोपाल बालकों द्वारा किये सर्वभूत स्त्रष्ट ईश्वर स्वरूप को प्रकट किया तथा [[गिरिराज]] को समर्पित होने वाली खीर वे स्वयं खा गये। तब से [[गोपगण]] उनकी पूजा करने लगे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(7) जब [[इन्द्र]] ने वर्षा की थी तब श्रीकृष्ण ने गौओं की रक्षा के निमित्त एक सप्ताह तक [[गोवर्धन]] पर्वत को अपने हाथ पर उठाए रखा था।  इन्द्र ने प्रसन्न होकर उन्हें गोविंद नाम दिया।&amp;lt;br /&amp;gt;   &lt;br /&gt;
(8) श्रीकृष्ण ने पशुओं की हितकामना से वृक्ष रूप-धारी [[अरिष्ट नामक दैत्य]] का संहार किया।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(9) ब्रजनिवासी [[केशी नामक दैत्य]] का संहार किया।  उस दैत्य का शरीर घोड़े जैसा और बल दस हज़ार हाथियों के समान था।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(10) [[कंस]] के दरबार में रहने वाले चाणूर नामक मल्ल को उन्होंने मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(11) कंस के भाई तथा सेनापति शत्रुनाशक का भी उन्होंने नाश कर डाला।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(12) कंस के [[कुवलयापीड़]] नामक हाथी को भी उन्होंने मार गिराया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(13) कंस को मारकर उन्होंने [[उग्रसेन राजा|उग्रसेन]] का राज्याभिषेक कर दिया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(14) [[उज्जयिनी]] में दोनों भाइयों ने वेद विद्याध्ययन किया। धनुर्विद्या सीखने वे सांदीपनि के पास गये।  [[सांदीपनि]] ने गुरु-दक्षिणा में अपने पुत्र को वापस मांगा, जिसे कोई समुद्री जंतु खा गया था।  श्रीकृष्ण ने समुद्र में रहने वाले उस दैत्य का संहार कर दिया तथा गुरुपुत्र को पुनर्जीवनदान दिया जो कि वर्षों पूर्व यमलोक में जा चुका था। कृष्ण के कृपाप्रसाद से उसने पूर्ववत् अपना शरीर धारण किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(15)श्रीकृष्ण ने [[नरकासुर]] (भौमासुर) को मार डाला।&lt;br /&gt;
(16) श्रीकृष्ण ने [[उषा अनिरुद्ध]] का मिलन करवाया, [[बाणासुर]] को मारा।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(17) उन्होंने रूक्मी को पराजित करके [[रुक्मिणी]] का हरण किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(18) इन्द्र को परास्त करके [[परिजात वृक्ष]] का अपहरण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाभारत- उद्योगपर्व, द्रोणपर्व==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[स्वयंवर]] में गांधारराज की राजकुमारी को प्राप्त किया था।  विवाहोपरांत उनके रथ में अच्छी नस्ल के घोड़ो की तरह से राजाओं को जोता गया था।  द्यूतक्रीड़ा के उपरांत [[पांडव|पांडवों]] के वनवास काल में [[कौरव|कौरवों]]-पांडवों के [[महाभारत|युद्ध]] की संभावना देख श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए उनकी सभा में गये।  कृष्ण के साथ [[धृतराष्ट्र]], [[गांधारी]], [[विदुर]], [[सात्यकि]] इत्यादि सभी इस मत के थे कि पांडवों का राज्य उन्हें लौटा देना चाहिए तथा उनसे संधि कर, शांति स्थापित करनी चाहिए; किंतु [[दुर्योधन]] उसके लिए तैयार न था।  उसने [[शकुनि]] तथा [[कर्ण]] से सलाह करके कृष्ण को बंदी बना लेने का निश्चय किया।  सात्यकि को विदित हुआ तो उसने सभासदों के सम्मुख ही कृष्ण को इस तथ्य की सूचना दी।  &lt;br /&gt;
[[चित्र:krishna-arjun1.jpg|thumb|250px|कृष्ण और [[अर्जुन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Krishna And Arjuna|left]]&lt;br /&gt;
कृष्ण ने क्रुद्ध होकर अपना विश्व रूप (विराट् रूप) प्रदर्शित किया।  कृष्ण की दाहिनी बांह पर [[अर्जुन]], वायीं बांह पर [[बलराम|हलधर]], वक्ष पर [[शिव]] तथा अंग-प्रत्यंग पर विभिन्न देवी-देवता साक्षात् दिखलायी दिए।  कृष्ण के अट्टहास से भूमंडल कांप उठा।  शरीर से ज्वाला प्रस्फुटित हुई तथा सब ओर अनेक देवता और योद्धाओं के दर्शन होने लगे। ऐसे रूप के दर्शन दे, कृष्ण ने वहां से प्रस्थान किया।  [[महाभारत]] युद्ध में कृष्ण ने अर्जुन के सारथी का कार्यभार संभाला था।  [[अभिमन्यु]] की मृत्यु के उपरांत कृष्ण ने अपने-आप स्वीकार किया कि अर्जुन (नर) नारायण (श्रीकृष्ण) का आधा शरीर है। युद्ध में पांडवों की विजय के उपरांत वे लोग कृष्ण सहित [[कुरुक्षेत्र]] में रहे।  जब तक [[सूर्य देवता|सूर्य]] उत्तरायण नहीं हो गया, [[भीष्म]] पितामह नित्य ही उन्हें दान, धर्म, कर्तव्य का उपदेश देते रहे। उनके स्वर्गारोहण उपरांत पांडवों को [[हस्तिनापुर]] छोड़ते हुए कृष्ण अपने माता-पिता के दर्शन करने [[द्वारका|द्वारकापुरी]] चले गये।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(म0भा0, उद्योगपर्व, 130-131, [[द्रोण पर्व महाभारत|द्रोणपर्व]] 79)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण इस प्रकार क्रीड़ा करते हैं जैसे मनुष्य खिलौनें से क्रीड़ा करता है।  संपूर्ण चराचर भूत नारायण से उद्भूत है। पानी के बुद्बुद्वत् उसी में लीन हो जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(म0भा0, सभापर्व, अध्याय 38)&lt;br /&gt;
==हरिवंश पुराण==&lt;br /&gt;
कृष्ण और बलराम ने अनुभव किया कि [[ब्रज]]भूमि की वनश्री बच्चों की क्रीड़ा , गोपों की फल-सब्जी बेचने के लिए उपज तथा गौओं के क्षारयुक्त मल इत्यादि से नष्ट हो गयी है। इस कारण से उन्होंने निश्चय किया कि [[गोवर्धन]] पर्वत से युक्त [[कदम्ब]] इत्यादि वृक्षों से अपूरित [[वृन्दावन]] में जाकर रहना चाहिए।  कृष्ण ने अपने रोम-रोम से भयानक भेड़ियों को उत्पन्न किया।  उनको देखकर गोप-[[गोपी|गोपांगनाएं]] तथा गायें अत्यंत त्रस्त होकर ब्रजभूमि छोड़ने के लिए तुरंत तैयार हो गये।  लोग वृन्दावन में जा बसे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(हरिवंश [[पुराण]], विष्णुपर्व ।8-9)&lt;br /&gt;
==श्रीमद भागवत==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gita-Krishna-1.jpg|thumb|250px|[[कृष्ण]] और [[अर्जुन]]]]&lt;br /&gt;
कंस की कारागार में वसुदेव के यहाँ भगवान ने कृष्ण-रूप में अवतार लिया।  दस वर्ष तक बलराम के साथ ऐसे रहे कि उनकी कीर्ति वृन्दावन से बाहर नहीं गयी।  वे गाय चराते तथा बांसुरी बजाकर सबको रिझाते थे।  खेल-खेल में उन्होंने अनेक असुरों का संहार किया, कंस को उठाकर पटक दिया।  कृष्ण ने अपनी शक्ति योगमाया से भौमासुर की लाई राजकन्याओं से एक ही मुहूर्त में अलग-अलग महलों में विधिवत् पाणिग्रहण संस्कार संपादित किया।  एक बार नंद ने कार्तिक शुक्ल एकादशी का उपवास किया तथा रात्रि में [[यमुना नदी|यमुना]] में स्नान करने लगे। वह असुरों की वेला थी।  अत: एक असुर उन्हें पकड़कर वरुण के पास ले गया।  कृष्ण वरुण के पास गये तथा नंद बाबा को वापस ले आये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारद ने कंस को जाकर बताया कि कृष्ण वसुदेव का बेटा है तथा बलराम [[रोहिणी]] का।  वे दोनों छिपाकर नंद के यहाँ रखे गये हैं।  कंस ने कृष्ण को अपनी भावी मृत्यु का कारण मानकर वसुदेव तथा देवकी को पुन: कैद कर लिया।  श्रीकृष्ण ने कंस को मारकर उन्हें कैद से छुड़ाया। [[यदु]]वंशियों को [[ययाति]] का शाप था कि वे कभी शासन नहीं कर पायेंगे। अत: कृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन से शासन ग्रहण करने का अनुरोध किया।  कृष्ण और बलराम ने नंद से कहा-&amp;quot;पिताजी, आपका वात्सल्य अपूर्व है।  आपने तथा यशोदा ने अपने बालकों के समान ही हमें स्नेह दिया।  आप ब्रज जाइए। हम लोग भी यहाँ का काम निपटाकर आपसे मिलने आयेंगे।&amp;quot; वे दोनों [[अवंती]]पुर (उज्जैन) निवासी गुरुवर संदीपनि के [[गुरुकुल]] में रहकर उनकी सेवा करने लगे।  चौंसठ दिन में उन दोनों ने [[चौंसठ कलाएँ|चौंसठ कलाओं]] में निपुणता प्राप्त की तथा संदीपनि को गुरु-दक्षिणास्वरूप उसका मृत पुत्र पुन: लौटाकर वे दोनों मथुरा लौट गये।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 3।3।-,10।28।-,10।44।–)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के अनेक विवाह हुए थे। (कुछ को विशेष प्रसिद्धि नहीं प्राप्त हुई, वे यहाँ उल्लिखित हैं।) उनकी श्रुतकीर्ति नामक बूआ का विवाह केकय देश में हुआ था।  उनकी कन्या का नाम था भद्रा जिसका विवाह उसके भाई सन्तर्दन आदि ने कृष्ण से कर दिया था।  मद्र देश की राजकुमारी सुलक्षणा को कृष्ण ने स्वयंवर में हर लिया था।  इनके अतिरिक्त [[भौमासुर]] को मारकर अनेक सुंदरियों को वे कैद से छुड़ा लाये थे।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 10।56, 57, 58)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार सूर्य-ग्रहण के अवसर पर [[भारत]] के विभिन्न प्रांतों की जनता कुरुक्षेत्र पहुंची। वहां वसुदेव, कृष्ण और बलराम से नंद, यशोदा, गोप-गोपियों आदि का सम्मिलन हुआ।  कृष्ण ने [[गोपी|गोपियों]] आदि को अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दियां  उन्हीं दिनों वसुदेव के यज्ञोत्सव का आयोजन था।  उस संदर्भ में नंद बाबा, यशोदा तथा पांडव-परिवार के अधिकांश सदस्य तीन माह तक द्वारका में ठहरे।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 10 । 82-84)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार कृष्ण अपने दो भक्तों पर विशेष प्रसन्न हुए। उनमें से एक तो मिथिला निवासी गृहस्थी ब्राह्मण श्रुतदेव था और दूसरा मिथिला का राजा बहुलाश्व था।  श्रीकृष्ण ने दो रूप धारण करके एक ही समय में दोनों को दर्शन दिए तथा दोनों भक्तों ने भगवत्स्वरूप प्राप्त किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0, ।10।86।13-)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मा]] की प्रार्थना पर [[विष्णु]] ने हंस का रूप धारण करके सनकादि के चित्त तथा गुणों के अनैक्य के विषय में उपदेश दिया था।  यदुवंशियों के संहार के उपरांत जरा नामक व्याध को निमिंत्त बनाकर श्रीकृष्ण ने स्वधाम में प्रवेश कियां  उन्हें अपने धाम में प्रवेश करते कोई भी देवता देख नहीं पाया।  श्रीकृष्ण की कृपा से उनके शरीर पर प्रहार करने वाला व्याध सदेह स्वर्ग चला गया। &lt;br /&gt;
नश्वर शरीर के त्यागोपरांत वसुदेव, अर्जुन आदि बहुत दुखी हुए।  सब उनकी अलौकिक लीलाओं को स्मरण करते रहे।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0, 11।13।15-42/- 11 । 30/-)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी भागवत==&lt;br /&gt;
कृष्ण-कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्मे थे।  कश्यप ने वरुण से [[कामधेनु]] मांगी थी फिर लौटायी नहीं, अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए। देवी भागवत में [[दिति]] और [[अदिति]] को [[दक्ष]] कन्या माना गया है।  अदिति का पुत्र [[इन्द्र]] था जिसने मां की प्रेरणा से दिति के गर्भ के 49 भाग कर दिए थे जो मरूत हुए।  अदिति से रुष्ट होकर दिति ने शाप दिया था-'जिस प्रकार गुप्त रूप से तूने मेरा गर्भ नष्ट करने का प्रयत्न करवाया है उसी प्रकार पृथ्वी पर जन्म लेकर तू बार-बार मृतवत्सा होगी।' फलत: उसने [[देवकी]] के रूप में जन्म लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विष्णु ने देवताओं की रक्षा करने के निमित्त [[भृगु]] की पत्नी ([[शुकदेव|शुक]] की मां) का हनन किया था अत: भृगु के शापवश उन्होंने पृथ्वी पर बार-बार जन्म लिया।  [[नर-नारायण]] अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए।  अप्सराएं राजकुमारियों के रूप में जन्मीं तथा कृष्ण की पत्नियां हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दैत्य [[मधु दैत्य|मधु]] का पुत्र [[लवणासुर|लवण]] ब्राह्मणों को अनेक प्रकार से पीड़ित कर रहा था।  [[लक्ष्मण]] के भाई [[शत्रुघ्न]] ने उस दैत्य को मारकर [[मथुरा]] नामक नगरी की स्थापना की।  कालांतर में [[सूर्यवंश]] क्षीण हो गया।  [[ययाति]] कुलोत्पन्न यादवों ने मथुरा पर अधिकार कर लिया।  यादवराज [[शूरसेन]] के पुत्र का नाम वसुदेव था।  वह वरुण के शाप तथा कश्यप के अंश से उत्पन्न हुआ था।  शूरसेन की मृत्यु के उपरांत [[उग्रसेन राजा|उग्रसेन]] को राज्य की प्राप्ति हुई।  उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था।  देवक राजा की कन्या का नाम [[देवकी]] था।  उसका जन्म वरुण के शाप तथा अदिति के अंश से हुआ था।  देवक ने उसका विवाह [[वसुदेव]] से कर दिया।  विवाह होते ही आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस को मार डालेगी।  कंस ने देवकी के बाल पकड़कर उसे मारने के लिए खड्ग उठा लिया।  वसुदेव के वीर साथियों से [[कंस]] का युद्ध होने लगा।  यादवों ने कंस को समझा-बुझाकर शांत किया कि अपनी बहन पर हाथ उठाना उचित नहीं है।  हो सकता है, किसी शत्रु ने ही यह आकाशवाणी रची हो।  वसुदेव ने कहा कि वह अपनी प्रत्येक संतान कंस को अर्पित कर देगा।  इस शर्त पर कंस ने उसे छोड़ दिया।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वसुदेव देवकी को लेकर अपने घर चला गया।  प्रथम पुत्र उत्पन्न होने पर वसुदेव पुत्र सहित कंस के पास पहुंचा। कंस ने 'प्रथम बालक से नहीं, अष्टम बालक से भय है' कहकर बालक उसे लौटा दिया, किंतु तभी [[नारद]] ने वहां पहुंचकर कंस को समझाया कि गिनती कहां से शुरू करके किस बालक को अष्टम माना जायेगा, नहीं कहा जा सकता।  यह सुनकर कंस ने बालक को शिला पर पटककर मार डाला।  इसी प्रकार देवकी के छह पुत्र मारे गये। वे छहों शापवश जन्मते ही नष्ट हो गये।  पूर्वकाल में ब्रह्मा अपनी कन्या के प्रति कामुक हो उठे थे। रमण करते हुए ब्रह्मा को देख महर्षि मरीचि के (उर्णा नामक पत्नी के गर्भ से उत्पन्न) छह पुत्रों ने उनका परिहास किया था।  इससे रुष्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें असुर योनि में जन्म लेने का शाप दिया था।  फलत: पहले वे [[कालनेमि]] के पुत्र हुए, फिर हिरण्यकशिपु के पुत्र हुए।  दूसरे जन्म में ज्ञान विच्युत न होने के कारण ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा था कि हवे मनवांछित देवता अथवा [[गंधर्व]] हो जायें ! वर पाकर वे लोग तो प्रसन्न हुए।  हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्रों को ब्रह्मा का प्रिय  जान क्रोधावेश में कहा-&amp;quot;तुम पाताल में जाकर निद्रा में पड़े रहोगे। पृथ्वी पर षड्गर्क नाम से प्रसिद्ध होगे।  देवकी के गर्भ से जन्म लेकर कालनेमि के वंश से उत्पन्न कंस के हाथों मारे जाओगे।&amp;quot; देवकी के सातवें गर्भ में अनंत देव आये।  योगमाया ने योग-बल से इस गर्भ का आकर्षण करके उसे [[रोहिणी]] के गर्भ में स्थापित किया।  भौतिक दृष्टि से देवकी का गर्भपात मान लिया गया।  तदनंतर विष्णु के अंशावतार कृष्ण ने अष्टम् पुत्र के रूप में जन्म लिया।  योगमाया ने स्वेच्छा से यशोदा के गर्भ में प्रवेश किया। अन्य पात्रों के जन्म के मूलांश की &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jarasandh1.jpg|[[भीम (पांडव)|भीम]]-जरासंध युद्ध|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
'''तालिका निम्नलिखित है:'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| border=&amp;quot;1&amp;quot; cellpadding=&amp;quot;10&amp;quot;&lt;br /&gt;
! मूलांश	&lt;br /&gt;
! कृष्ण-कथा के पात्र &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[हिरण्यकशिपु]]&lt;br /&gt;
|[[शिशुपाल]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|विप्रचित्त	&lt;br /&gt;
|[[जरासंध]] &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[प्रह्लाद]]	&lt;br /&gt;
|[[शल्य]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|खर&lt;br /&gt;
|[[लंबक तथा धेनुक]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वाराह और किशोर&lt;br /&gt;
|[[चाणूर और मुष्टिक]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|दिति पुत्र अरिष्ट&lt;br /&gt;
|कुवलय नामक&amp;lt;br /&amp;gt;कंस का हाथी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[युधिष्ठर|यम]], [[रुद्र]], काम और क्रोध-चारों के अंश से [[अश्वत्थामा]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूमि का भार-हरण करने की प्रार्थना सुनकर हरि ने देवताओं को दो बाल दिये थे; एक काला-कृष्ण, दूसरा सफ़ेद-[[बलराम]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(दे0 भा0, 4 । 20-25) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण परमात्मा है। उनके सोलहवें अंश का एक अंश, सौ करोड़ सूर्यों के प्रकाश से युक्त एक बालक होकर, मूलशक्ति प्रसूत डिंब में स्थापित था डिंब के दो भागों में विभक्त होने पर भूखा-प्यासा वह बालक रोने लगा।  कालांतर में पूर्व संस्कार के बल से वह परम पुरुष श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न होकर हंसने लगा।  श्रीकृष्ण उस बालक को आशीर्वाद देकर त्रैलोक्य चले गये।  कृष्ण के आशीर्वाद से वह ज्ञानयुक्त हुआ।  उसने विराट रूप धारण किया, उसी के नाभिकमल से ब्रह्मा ने जन्म लिया तथा सृष्टि की रचना की।  सृष्टि के संहार के लिए ब्रह्मा के ललाट से एकादश रुद्र उत्पन्न हुए।  उस बालक के क्षुद्रांश से ही विष्णु ने उत्पन्न होकर सृष्टि का पालन किया ।  श्रीकृष्ण को चतुर्भुज नारायण से भिन्न माना गया है।  कृष्ण ही ब्रह्मा, विष्णु , [[शिव|महेश]] के कारणभूत हैं।  [[राधा]] सर्वशक्तिमति देवी हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(दे0भा0, 8/3)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिव पुराण==&lt;br /&gt;
[[दुर्वासा]] कृष्ण की परीक्षा लेने गये।  पर्याप्त आतिथ्य पाकर उन्होंने अपने रथ को कृष्ण तथा उनकी पत्नी [[रुक्मिणी]] से खिंचवाने की इच्छा प्रकट की।  कृष्ण और रुक्मिणी के सहर्ष रथ खींचने से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कृष्ण को 'पायस' दी और कहा कि वे अपने बदन पर लगा लें। जहां-जहां यह लगेगी, वहां किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं लग पायेगा।  कृष्ण ने वैसा ही किया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(शि0पु0, 44 ।7। 26) &lt;br /&gt;
==महाभारत के प्रमुख पात्र श्रीकृष्ण==&lt;br /&gt;
===मंगलाचरण===&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकों प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष है। यह विविध कथारूपी रत्नों का रत्नाकर तथा अज्ञान के अन्धकारको विनष्ट करने वाला सूर्य है। इस ग्रन्थके मुख्य विषय तथा इस महायुद्ध के महानायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं।  नि:शस्त्र होते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण ही महाभारत के प्रधान योद्धा हैं।  इसलिये सम्पूर्ण महाभारत भगवान् वासुदेव के ही नाम, रूप लीला और धामका संकीर्तन है। नारायण के नाम से इस ग्रन्थ के मंगलाचरण में व्यासजी ने सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्ण की ही वन्दना की है।&lt;br /&gt;
===द्रौपदी स्वयंवर===&lt;br /&gt;
महाभारत के [[आदि पर्व महाभारत|आदिपर्व]] में भगवान् श्रीकृष्ण का प्रथम दर्शन [[द्रौपदी]]-स्वयंवर के अवसर पर होता है।  अब [[अर्जुन]] के लक्ष्यवेध करने पर द्रौपदी उनके गले में जयमाला डालती है। तब [[कौरव]]पक्ष के लोग तथा अन्य राजा मिलकर द्रौपदी को पाने के लिये युद्धकी योजना बनाते हैं उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने उनको समझाते हुए कहा कि 'इन लोगों ने द्रौपदी को धर्मपूर्वक प्राप्त किया है, अत: आप लोगों को अकारण उत्तेजित नहीं होना चाहिये।' भगवान् श्रीकृष्ण को धर्म का पक्ष लेते हुए देखकर सभी लोग शान्त हो गये और द्रौपदी के साथ [[पाण्डव]] सकुशल अपने निवास पर चले गये।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bhishma1.jpg|[[महाभारत]] युद्ध में [[भीष्म]] [[कृष्ण]] की प्रतिज्ञा भंग करवाते हुए|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
===प्रथम पूजनीय===&lt;br /&gt;
धर्मराज [[युधिष्ठर]] के [[राजसूययज्ञ]] में जब यह प्रश्र उपस्थित हुआ कि यहाँ सर्वप्रथम किसकी पूजा की जाय तो उस समय महात्मा [[भीष्म]] ने कहा कि 'वासुदेव ही इस विश्व के उत्पत्ति एवं प्रलयस्वरूप हैं और इस चराचर जगत् का अस्तित्व उन्हीं से है।  वासुदेव ही अव्यक्त प्रकृति, सनातन कर्ता और समस्त प्राणियों के अधीश्वर हैं, अतएव वे ही प्रथम पूजनीय हैं।' भीष्म के इस कथन पर चेदिराज शिशुपाल ने श्रीकृष्ण की प्रथम पूजा का विरोध करते हुए उनकी कठोर निन्दा की और भीष्म पितामह को भी खरी-खोटी सुनायी।  भगवान् श्री कृष्ण धैर्यपूर्वक उसकी कठोर बातों को सहते रहे और जब वह सीमा पार करने लगा, तब उन्होंने सुदर्शन चक्र के द्वारा उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।  सबके देखते-देखते शिशुपाल के शरी रसे एक दिव्य तेज़ निकला और भगवान् श्रीकृष्ण में समा गया।  इस अलौकिक घटना से यह सिद्ध होता है। कि कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, भगवान् के हाथों मरकर वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;
===द्रौपदी===&lt;br /&gt;
पाण्डवों के एकमात्र रक्षक तो भगवान् श्रीकृष्ण ही थे, उन्हीं की कृपा और युक्ति से ही [[भीम (पांडव)|भीमसेन]] के द्वारा जरासन्ध मारा गया और युधिष्ठिर का राजसूययज्ञ सम्पन्न हुआ।  राजसूय यज्ञ का दिव्य सभागार भी मय दानव ने भगवान् श्रीकृष्ण के आदेश से ही बनाया।  द्यूत में पराजित हुए पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी जब भरी सभा में [[दु:शासन]] के द्वारा नग्न की जा रही थी, तब उसकी करुण पुकार सुनकर उस वनमाली ने वस्त्रावतार धारण किया।  शाक का एक पत्ता खाकर भक्तभयहारी भगवान् ने दुर्वासा के कोप से पाण्डवों की रक्षा की।&lt;br /&gt;
===शान्तिदूत===&lt;br /&gt;
युद्ध को रोकने के लिये श्रीकृष्ण शान्तिदूत बने, किंतु [[दुर्योधन]] के अहंकार के कारण युद्धारम्भ हुआ और राजसूययज्ञके अग्रपूज्य भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बने।  संग्राम भूमि में उन्होंने अर्जु नके माध्यम से विश्व को [[गीता]] रूपी दुर्लभ रत्न प्रदान किया।  भीष्म, [[द्रोणाचार्य|द्रोण]], [[कर्ण]] और अश्वत्थामा-जैसे महारथियों के दिव्यास्त्रों से उन्होंने पाण्डवों की रक्षा की।  युद्धका अन्त हुआ और युधिष्ठिर का धर्मराज्य स्थापित हुआ।  पाण्डवों का एकमात्र वंशधर उत्तरा का पुत्र [[परीक्षित]] अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से मृत उत्पन्न हुआ, किंतु भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से ही उसे जीवनदान मिला।  अन्त में [[गांधारी|गान्धारी]] के शाप को स्वीकार करके महाभारत के महानायक भगवान श्रीकृष्णने उद्दण्ड यादवकुल के परस्पर गृहयुद्ध में संहा रके साथ अपनी मानवी लीला का संवरण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऋग्वेद में कृष्ण==&lt;br /&gt;
[[वेद|ऋग्वेद]] में कृष्ण नाम का उल्लेख दो रूपों में मिलता है—एक कृष्ण आंगिरस, जो सोमपान के लिए अश्विनी कुमारों का आवाहन करते हैं (ऋग्वेद 8।85।1-9) और दूसरे कृष्ण नाम का एक असुर, जो अपनी दस सहस्र सेनाओं के साथ अंशुमती तटवर्ती प्रदेश में रहता था और इन्द्र द्वारा पराभूत हुआ था। कृष्ण सम्बन्धी इन दोनों सन्दर्भो में परस्पर सम्बन्ध है अथवा नहीं, इस विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों की स्तुति में कक्षिवान ऋषि द्वारा उन्हें कृष्ण के पौत्र विष्णापु के ज़िलाने का श्रेय दिया गया है(ऋग्वेद 1।116।7,23)।  कृष्ण के पुत्र विश्वक (विश्वकाय) ने भी एक सूक्त में सनतान के लिए अश्विनीकुमारों का आवाहन किया है और दूरस्थ विष्णापु को लाने की प्रार्थना की है (ऋग्वेद 8।86।1-5)। ऐसा जान पड़ता है कि कदाचित विष्णापु किसी प्रकार आहत हो गया था और कृष्ण आंगिरस और उनके पुत्र ने उसके जीवन के लिए आरोग्य के देवता [[अश्विनीकुमार|अश्विनीकुमारों]] से प्रार्थना की थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृष्णासुर के सम्बन्ध में भी उल्लेख है कि उसकी गर्भवती स्त्रियों का [[इन्द्र]] ने वध किया था (ऋग्वेद 1।101।1) ऋग्वेद के एक छंद में गायों के उद्धारकर्ता और स्वामी का उल्लेख है और विष्णु को उस लोक का अधिपति कहा गया है। परन्तु भागवत धर्म के उपास्य कृष्ण की कथा से इन सन्दर्भों का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं जान पड़ता।  [[छान्दोग्य उपनिषद]] में देवकीपुत्र कृष्ण को घोर [[आंगिरस]] का शिष्य कहा गया है और बताया गया है कि गुरु ने उन्हें यज्ञ की एक ऐसी सरल रीति बतायी थी जिसकी दक्षिणा, तप, दान, [[आर्जव]], अहिंसा, और सत्य थी। गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के बाद कृष्ण की ज्ञान-पिपासा सदा के लिए शान्त हो गयी।(छान्दोग्य उपनिषद 3।17।4-6)।  कृष्ण आंगिरस का उल्लेख कौशीतकी ब्राह्मण में भी मिलता है (30।9)।  कृष्ण-सम्बन्धी यह सन्दर्भ उन्हें गीता के उपदेष्टा और भागवत धर्म के पूज्य कृष्ण के निकट ले जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध साहित्य==&lt;br /&gt;
[[बौद्ध]] साहित्य में कृष्ण का उल्लेख दो स्थलों पर मिलता है-एक घत [[जातक कथा|जातक]] में वर्णित देवगब्भा और उपसागर के बलवान, पराक्रमी, उद्धत और क्रीड़ाप्रिय पुत्र वासुदेव कण्ह की कथा के रूप में और दूसरा महाउमग्ग जातक के कामासक्त वासुदेव कण्ह के सन्दर्भ में। घत जातक के वासुदेव कण्ह पुत्रशोक में दुखी चित्रित किये  गये हैं जिससे ऋग्वेद के आंगिरस कृष्ण के सन्दर्भ से उनका सूत्र जोड़ा जा सकता है।  महाउमग्ग, जातक में वासुदेव कण्ह द्वारा कामासक्त होकर चाण्डाल कन्या जाम्बवती को महिषी बनाने का उल्लेख हुआ है।&lt;br /&gt;
==अनेक वृत्तान्त==&lt;br /&gt;
===निपुण बलवान योद्धा=== &lt;br /&gt;
महाभारत में कृष्ण सम्बन्धी अनेक वृत्तान्त मिलते हैं।  भारत युद्ध में उनके पराक्रम, ऐश्वर्य और नीतिनैपुण्य के साथ उनके देवत्व का भी समन्वय पाया जाता है। सभापर्व में भीष्म द्वारा उनकी प्रशंसा समस्त [[वेद]]-[[वेदान्त]] के ज्ञाता तथा राजनीति में निपुण बलवान योद्धा के रूप में की गयी है।  [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योग पर्व]] में कहा गया है कि अर्जुन वज्रपाणि इन्द्र की अपेक्षा कृष्ण को अधिक पराक्रमी समझकर उन्हें युद्ध में अपनी ओर मिलाने में अपना सौभाग्य मानते हैं।  इसी स्थल पर कृष्ण के पराक्रम का वर्णन करते हुए उनके द्वारा दस्युओं के संहार, दुर्धर्ष राजाओं के विनाश, रुक्मिणी के हरण, नगजित के पुत्रों की पराजय, सुदर्शनराजा की मुक्ति, पाण्डय के संहार, [[काशी]] नगरी के उद्धार, निषादों के राजा एकलव्य के वध, उग्रसेन के पुत्र सुनाम की मृत्यु आदि कार्यो का वर्णन किया गया है। देवताओं के द्वारा उन्हें अवध्यता का वरदान मिला था। उन्होंने बाल्यावस्था में ही इन्द्र के घोड़े उच्चै:श्रवा के समान बली, [[यमुना नदी|यमुना]] के वन में रहने वाले हयराज को मार डाला था तथा वृष [[प्रलंब]], नरग, जृम्भ, मुर, [[कंस]] आदि का संहार किया था, जल देवता [[वरुण देवता|वरुण]] को पराजित किया था तथा पाताल वासी पंचजन को मारकर [[पान्चजन्य]] प्राप्त किया था। अपनी प्रिय पत्नी [[सत्यभामा]] की प्रसन्नता के लिए वे अमरावती से [[पारिजात]] लाये थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===वासुदेव===&lt;br /&gt;
महाभारत में प्राप्त कृष्ण सम्बन्धी इन सन्दर्भों से उनके ऐतिहासिक व्यक्तित्व की सूचना मिलती है और ज्ञात होता है कि वे [[वृष्णि संघ|वृष्णि]] वंशीय [[सात्वत]] जाति के पूज्य पुरुष थे। यह भी संकेत मिलता है कि महाभारत और पुराणों में वर्णित कृष्ण के चरित्र और किन्हीं ऐतिहासिक वासुदेव कृष्ण सम्बन्धी कथा में कुछ अन्तर अवश्य रहा होगा, क्योंकि महाभारत और [[पुराण|पुराणों]] में अनेक स्थलों पर इस बात पर बल दिया गया है कि यही कृष्ण वास्तविक वासुदेव हैं, यही द्वितीय वासुदेव हैं। द्वितीय वासुदेव कहने का अभिप्राय यह था कि कुछ अन्य राजा भी अपने को द्वितीय वासुदेव के नाम से प्रसिद्ध करने का यत्न करते थे।  पौण्ड्र राजा पुरुषोत्तम और करवीरपुर के राजा श्रृगाल इसी प्रकार के व्यक्ति थे, जिन्हें मारकर कृष्ण ने सिद्ध किया कि उनका वासुदेवत्व मिथ्या है तथा वे ही स्चयं एकमात्र वासुदेव हैं।&lt;br /&gt;
===पुराणों में कृष्ण===&lt;br /&gt;
[[चित्र:Cover-Vishnu-Purana.jpg|thumb|[[विष्णु पुराण]], गीताप्रेस गोरखपुर का आवरण पृष्ठ]]&lt;br /&gt;
[[महाभारत]], [[हरिवंश पुराण]] तथा [[विष्णु पुराण]], [[वायु पुराण]], [[वामन पुराण]], [[भागवत पुराण]] आदि पुराणों में कृष्ण की तुलना में इन्द्र की हीनता सिद्ध करने के लिए अनेक कथाएँ दी गयी हैं; परन्तु फिर भी [[गोवर्धन]] धारण के प्रसंग में उनके इन्द्र द्वारा अभिषिक्त होने और 'उपेन्द्र' नाम से स्वीकृत होने का उल्लेख हुआ है। पुराणों में विविध कथाओं के माध्यम से उत्तरोत्तर कृष्ण की महत्ता और उसी अनुपात में इन्द्र की हीनता प्रमाणित की गयी है। महाभारत में कृष्ण के ऐश्वर्य और देवत्व का प्रचुर वर्णन है परन्तु उनके लालित्य और माधुर्य का कोई संकेत नहीं मिलता। महाभारत उनके गोप जीवन और [[गोपी]] प्रेम के सम्बन्ध में सर्वथा मौन है। [[सभा पर्व महाभारत|सभा पर्व]] के उस प्रसंग में भी, जिसे प्रक्षिप्त कहा जाता है और जिसमें शिशुपाल कृष्ण की निन्दा करते हुए उनके द्वारा पूतना, बकासुर, केशी, वत्सासुर और कंस के वध तथा गोवर्द्धन धारण किये जाने का उल्लेख करता है, गोपियों से उनके प्रेम का कोई संकेत नहीं किया गया है।  इससे यह स्पष्ट सूचित होता है कि गोपाल कृष्ण का ललित और मधुर चरित मूलत: महाभारत के कृष्ण के चरित से भिन्न था।  पुराणों में वर्णित कृष्ण सम्बन्धी ललित कथाएँ उनमें उत्तरोत्तर वृद्धि पाती गयी हैं।  उदाहरण के लिए हरिवंश में जिसे 'वास्तव में महाभारत का परिशिष्ट कहा जाता है, उनके गोपाल रूप सम्बन्धी सन्दर्भ अतयन्त संक्षिप्त है।  उनकी तुलना में उनके ऐश्वर्य रूप की भोग-विलास सम्बन्धी अनेक कथाएँ कहीं अधिक विस्तार से वर्णित हैं।  विष्णु पुराण में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। किन्तु भागवत, [[पद्म पुराण]] , [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]] तथा कुछ अन्य पुराणों में, जिन्हें परवर्ती कहा जा सकता है, गोपालकृष्ण सम्बन्धी कथन अधिक विस्तृत होने लगे हैं। पुराणों के भोग-ऐश्वर्य सम्बन्धी आख्यानों और गोप-गोपी लीला सम्बन्धी मधुर कथाओं में वातावरण का बहुत अन्तर पाया जाता है। यदि एक में घोर भौतिकता, विलासिता और नग्न ऐन्द्रियता है तो दूसरे में भावात्मक कोमलता, हार्दिक उत्फुल्लता, सूक्ष्म अनुभूति और अलौकिकता की ओर उन्मुख उदात्तता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===शूरसेन प्रदेश===&lt;br /&gt;
[[चित्र:Shursen-Map.jpg|thumb|300px|[[शूरसेन]] महाजनपद&amp;lt;br /&amp;gt; Shursen Great Realm]]&lt;br /&gt;
अनुमान है कि गोपाल कृष्ण मूलत: [[शूरसेन]] प्रदेश के सात्वत वृष्णिवंशी पशुपालक क्षत्रियों के कुल देवता थे और उनके क्रीड़ा कौतुक की मनोरंजक कथाएँ मौखिक रूप में लोक-प्रचलित थीं। इन कथाओं के लोक-प्रचलित होने के प्रमाण कुछ पाषाण मूर्तियों और शिलापट्टों पर उत्कीर्ण चित्रों में मिले है।  मथुरा में प्राप्त एक खण्डित शिलापट्ट में वसुदेव नवजात कृष्ण को एक सूप में सिर पर रखकर यमुना पार करते हुए दिखाये गये हैं। 5वीं शताब्दी ईसवी के एक दूसरे खण्डित शिलापट्ट में [[कालिय नाग|कालिय-दमन]] का दृश्य दिखाया गया है।  यह छठी शताब्दी ईस्वी की अनुमान की गयी है। बंगाल के पहाड़पुर नामक स्थान में छठी शताब्दी की कुछ मृण्मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें [[धेनुकासुर वध]], [[यमलार्जुन उद्धार]] तथा [[मृष्टिक चाणूर]] के साथ मल्ल-युद्ध के दृश्य दिखाये गये हैं।  यहीं पर एक अन्य मूर्ति मिली है जिसमें कृष्ण को किसी गोपी के साथ प्रसिद्ध मुद्रा में खड़े दिखाया गया है।  अनुमान किया गया है कि यह गोपी सम्भवत: [[राधा]] का सबसे प्राचीन मूर्तिगत प्रमाण प्रस्तुत करती है। राजस्थान के मण्डोर तथा बीकानेर के पास सूरतगढ़ में क्रमश: द्वारपाटों पर उत्कीर्ण गोवर्द्धन –धारण, नवनीत-चौर्य, [[शकटभंजन]] और कालिय-दमन के चित्र उत्कीर्ण मिले हैं तथा गोवर्द्धन-धारण और दान-लीला का दृश्यांकन प्रस्तुत करने वाले कुछ सुन्दर मिट्टी के खिलौने प्राप्त हुए हैं। मण्डोर के चित्र चौथी-पाँचवी शताब्दी ईस्वी के अनुमान किये गये हैं।  दक्षिण भारत के बादामी के पहाड़ी क़िले पर कृष्ण-जन्म, पूतना-वध, शकट-भंजन, कंस-वध आदि के अनेक दृश्य गुफ़ाओं में उत्कीर्ण मिले हैं। जो छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी के माने जाते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;(दे0 आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्ट 1926-27, 1905-6 तथा 1928-29 ई.)&amp;lt;/ref&amp;gt;।&lt;br /&gt;
==काव्य में कृष्ण==&lt;br /&gt;
काव्य में गोपाल कृष्ण की लीला का पहला सन्दर्भ प्रथम शताब्दी ईसवी में रचित [[अश्वघोष]] के बुद्धिचरित' (1-5) में मिलता है। अनुमानत: प्रथम शताब्दी ईस्वी में हाल [[सातवाहन]] द्वारा संगृहीत 'गाहासत्तसई' (गाथा सप्तशती) में कई गाथाएँ कृष्ण, राधा, गोपी, [[यशोदा]] आदि से सम्बद्ध मिलती हैं &amp;lt;ref&amp;gt;(दे0 'गाहासत्तसई' 1।29, 5।47, 2।12, 2।14)&amp;lt;/ref&amp;gt;। इन गाथाओं में कृष्ण द्वारा नारियों के गौरवहरण, मुखमारूत से राधिका के गोरज के अपनयन आदि के उल्लेख हुए हैं।  इन उल्लेखों से सूचित होता है कि कृष्ण के गोपी-प्रेमसम्बन्धी प्रसंग कम से कम पहली शताब्दी ईस्वी के पहले से ही लोक-प्रचलित थे।  यह अवश्य द्रष्टव्य है कि'गाहासत्तसई' में भक्ति भावना का कोई संकेत नहीं मिलता, उसका वातावरण सर्वथा लौकिक श्रृंगार का ही है परन्तु इससे भिन्न दक्षिण के [[आलवार]] सन्तों द्वारा रचित गीत पूर्णतया भक्ति भावना से प्रेरित और अनुप्राणित हैं।  इन सन्तों का समय पाँचवीं से नवीं शताब्दी ईसवी अनुमान किया गया है।  आलवार सन्तों के इन गीतों में विष्णु , नारायण अथवा वासुदेव तथा उनके अवतारों-[[राम]] और कृष्ण के प्रति अपूर्व भक्ति –भाव प्रकट किया गया है।  इनमें गोपाल-कृष्ण की ललित लीला के ऐसे अनेक प्रसंग वर्णित हैं जो उत्तर भारत के मध्यकालीन कृष्ण भक्ति- काव्य के प्रिय विषय रहे हैं।  इन गीतों में कृष्ण की प्रेम-लीलाओं से सम्बद्ध एक नाप्पित्राय नामक गोपी का प्रमुख रूप समें वर्णन है। उसे कृष्ण की प्रियतमा और विष्णु की अर्द्धागिनी [[महालक्ष्मी देवी|लक्ष्मी]] का अवतार कहा गया है। अनुमान है कि यह गोपी उत्तर भारत की कृष्णकथा में प्रयुक्त राधा ही है। राधाकृष्ण कथा की प्राचीनता की दृष्टि से तमिल साहित्य का यह प्रमाण महत्त्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
===राधा के प्रेम सन्दर्भ===&lt;br /&gt;
[[चित्र:Krishna-Radha-1.jpg|thumb|250px|[[राधा]]-[[कृष्ण]]]]&lt;br /&gt;
आठवीं शंताब्दी में रचित भट्टानारायण के 'वेणीसंहार' नामक-नाटक में नांदीश्लोक में तथा वाकपति राज द्वारा लिखित प्राकृत महाकाव्य 'गउडवहो' के मंगलाचरण में कृष्ण की स्तुति उनके राधा और गोपी-प्रेम तथा यशोदा के वात्सल्यभाजन होने की स्पष्ट सूचना देती है। 'गउडवहो' में उन्हें 'विष्णुस्वरूप' और 'लक्ष्मीपति' भी कहा गया है। नवीं शताब्दी ईसवी के 'ध्वन्यालोक' में उद्धृत दो [[श्लोक|श्लोकों]] में कृष्ण और राधा के मधुर प्रेम के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं।  दसवीं शताब्दी के त्रिविक्रम भट्ट रचित 'नलचम्पू' के एक श्लोक में परम पुरुष कृष्ण के साथ राधा के अनुराग का संकेत प्राप्त होता है। दसवीं शताब्दी की ही बल्लभदेव द्वारा रचित 'शिशुपालवध' की टीका तथा सोमदेवपूरि के 'यशस्यतिलकचम्पू' में भी राधा के प्रिय कृष्ण का जिस रूप में उल्लेख मिलता है उससे कृष्ण के गोपीवल्लभ रूप की सूचना प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;
===प्रेम क्रीड़ाओं का सन्दर्भ===&lt;br /&gt;
'कवीन्द्रवचन समुच्चय' नामक कवितासंग्रह भी दसवीं शताब्दी का माना गया है।  इसमें संकलित अनेक श्लोकों में कृष्ण की गोपी और राधा सम्बन्धी प्रेम क्रीड़ाओं का सन्दर्भ मिलता है जिनसे कृष्ण के यशोदा के वात्सल्य-भाजन, गोपियों के कान्त, गोपों के सृहृद् तथा राधा के अनन्य प्रेमभाजन व्यक्तित्व की सूचना मिलती है। इन सभी सन्दर्भो में कृष्ण के दक्षिण और धृष्ट नायकत्व के भी स्पष्ट संकेत हैं। दशवीं शताब्दी तक राधा और कृष्ण के प्रति पूज्यभाव भी विकसित हो चुका था। इसका प्रमाण मालवाधीश वाक्पति मुंजपरमार के एक अभिलेख से भी मिलता है जिसमें श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए उनका विष्णु रूप में वर्णन है और साथ ही उन्हें राधा के विरह में पीड़ित कहा गया है। दशवीं शताब्दी के आसपास रचित श्रीमद्भागवत में कृष्णचरित का व्यापक वर्णन है इसमें उनके सभी स्वरूपों का वर्णन और संकेत है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
कृष्ण के व्यक्तित्व के लालित्य और माधुर्य के साथ उनके दैवत रूप की प्रतिष्ठा 12वीं शताब्दी तक और अधिक दृढ़ता के साथ हो गयी थी। इसका प्रमाण लीलाशुक द्वारा रचित 'कृष्णकर्णामृतस्तोत्र' ईश्वरपुरी द्वारा रचित 'श्रीकृष्णलीलामृत ' का श्रृगांर रस निश्चित रूप से माधुर्य भक्ति है। इसी प्रकार 'गीतगोविन्द' में राधा-माधव के जिस उद्दाम श्रृंगार का वर्णन किया गया है, उसकी मूल प्रेरणा भी धार्मिक है। कृष्ण के व्यक्तित्व में इस प्रकार जिस लोकरंजनकारी लालित्य का उदात्तीकरण वैष्णव भक्ति के विकास में होता गया उसी की चरम परिणति हम परवर्ती साहित्य में पाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===असंख्य कथा प्रसंग===&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी के बाद कृष्ण-काव्य मृक्तकों के अतिरिक्त प्रबन्धों के रूप में भी प्राप्त होता है। 'सदुक्तिकर्णामृत' नामक एक मुक्तक संग्रह 13वीं शताब्दी के प्रारम्भ का हैं। जिसमें गोपाल कृष्ण की लीला से सम्बद्ध साठ श्लोक हैं। इन श्लोकों में गोपाल कृष्ण के शैशव, कैशोर और यौवन की ललित लीलाओं का ही वर्णन मिलता है। 13वी-14वी शताब्दी में रचित बोपदेव की 'हरिलीला' तथा वेदान्तदेशिककी 'यादवाभ्युदय' नामक रचनाएँ तथा पन्द्रहवीं शताब्दी की 'ब्रजबिहारी' (श्रीधरस्वामी), 'गोपलीला' (रामचन्द्र भट्ट), ' हरिचरित'-काव्य (चतुर्भुज), 'हरिविलास'-काव्य (ब्रजलोलिम्बराज), 'गोपालचरित' (पद्मनाभ), 'मुरारिविजय'- नाटक (कृष्ण भट्ट) और 'कंस-निधन' महाकाव्य (श्रीराम) आदि अनेक काव्य और नाटक गोपालकृष्ण के मधुर, ललित और पूज्य चरित का चित्रण करते हैं। 16वीं शताब्दी से कृष्णभक्ति आन्दोलन सम्पूर्ण उत्तर भारत में व्याप्त हो गया और कृष्ण-काव्य आधुनिक भाषाओं में रचा जाने लगा।  इस काव्य का मूलाधार श्रीमद्भागवत था, परन्तु साथ ही कवियों ने लोक में प्रचलित कृष्णसम्बन्धी उन असंख्य कथा प्रसंगों का भरपूर उपयोग किया जिनमें कृष्ण का चरित वात्सल्य, सख्य और माधुर्यव्यंजक लीलाओं से समन्वित रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सूरदास==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-19.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra|thumb|300px]]&lt;br /&gt;
हिन्दी का कृष्ण-भक्ति काव्य यद्यपि [[सूरदास]] से प्रारम्भ होता है परन्तु इससे पहले 15वीं शताब्दी में [[विद्यापति]] ने अपने पदों में कृष्ण के श्रृंगारी रूप का जो वर्णन किया था उसकी प्रकृति भले ही लौकिक श्रृंगार की रही हो, उसका उपयोग भक्तों ने माधुर्य भक्ति के सन्दर्भों में ही किया। विद्यापति और हिन्दी के रीतिकालीन राधाकृष्ण सम्बन्धी श्रृंगार –काव्य के बीच हिन्दी भक्तिकाव्य का एक लम्बा व्यवधान है जिसमें कृष्ण का व्यक्तित्व कवियों ने अत्यन्त कुशलता के साथ् मानव और अतिमानव के परस्पर विरोधी तत्त्वों से निर्मित कर चित्रित किया है। कृष्ण के इस चरित-चित्रण में बड़ी विलक्षणता है। एक ओर उन्हें विष्णु का अवतार, ब्रह्मा-विष्णु और महेश से परे तथा साक्षात् सच्चिदानन्द ब्रह्म कहा गया है, तो दूसरी ओर उनकी शैशव, बाल्य और किशोरकाल की अत्यन्त मानवीय और स्वाभाविक लीला का मनोहर वर्णन किया गया है। हिन्दी कृष्ण-काव्य के रचयिताओं में कृष्ण का सम्यक् चरित्र-चित्रण वास्तव में सूरदास ने ही किया किन्तु सूरदास का चरित्र-चित्रण वस्तुत: भावांत्मक है। प्रधान रूप से उन्होंने कृष्ण को वात्सल्य, सख्य और माधुर्य का आलम्बन बनाया है और इन भावों का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण करते हुए दैन्य और विस्मय के भावों के सहारे उनके प्रति पूज्य भावना व्यक्त की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृष्ण के चरित्र-चित्रण में सूर की अन्य विशेषता यह है कि यद्यपि वे नन्द-यशोदा, गोप-गोपी, आदि के साथ राग-रंग में आचूल मग्न रहते हैं, फिर भी उनके व्यवहार से व्यंजित होता है कि वास्तव में वे भावातीत और वीतराग हैं। कृष्ण के मथुरा और द्वारका-प्रवास तथा उनके प्रति ब्रजवासियों और विशेषकर गोपियों के विरह-भाव का वर्णन करते हुए सूरदास ने कृष्ण के इस विलक्षण व्यक्तित्व का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है।  इसके द्वारा हमें गीता के योगिराज कृष्ण की अनासक्ति का व्यावहारिक परिचय मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूरदास के अतिरिक्त अन्य कृष्ण-भक्त कवियों ने कृष्ण के सम्पूर्ण चरित का चित्रण नहीं किया।  बहुत थोड़े से कवियों ने कृष्ण के बाल्य और किशोरकाल के जीवन का परिचय दिया। अधिकांश कवि उनके माधुर्यपूर्ण चरित की ओर ही झुके और राधा और गोपियों के साथ उनके प्रेम सम्बन्धों के चित्रण में ही निमग्न रहें कृष्ण के प्रेमी और प्रेमपात्र दोनों रूपों के चित्रण में अनेक कवियों ने तन्मयता प्रदर्शित की, परन्तु सूरदास ने उनमें वीतरागत्व और अनासक्ति के संकेतों तथा अन्य उपायों द्वारा जिस आध्यात्मिकता की उच्च काव्यमयी व्यंजना की थी, वह कोई अन्य कवि नहीं कर सका।  सूरदास ने कृष्ण के असुर-संहारी रूप का भी विशद वर्णन किया था।  यद्यपि उनके वर्णन में कृष्ण की वीरता और पराक्रम के स्थान पर उनके विस्मयकारी क्रीडा-कौतक की ही प्रधानता है, परन्तु उनका उद्देश्य जिस अलौकिक की व्यंजना करना था उसे परवर्ती कवि नहीं समझ सके। इस कारण उन्होंने कृष्ण-चरित के इस पक्ष की प्राय: उपेक्षा ही की।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के सहज मानवीय श्रृंगारी रूप को सूरदास ने उनके प्रति दैन्य भावना व्यक्त करके तथा उनके अलौकिक कृत्यों के वर्णयन द्वारा विस्मय की व्यंजना करके उनके चरित में जिस उदात्तता का सन्निवेश किया था, परवर्ती कवियों ने उसे विस्मृत कर दिया और श्रीकृष्ण का चरित लगभग पूर्ण रूप में इहलौकिक हो गया और उसमें मानव व्यक्तित्व की संकुचित एकांगिता ही शेष रह गयी।  फलत: जीवन की व्याख्या की कसौटी पर कसने पर वह अत्यन्त कल्पित और अयथार्थ लगता है, जैसे राग-रंग और आनन्द-विहार में लिप्त जीवन का कोई उद्देश्य ही न हो। वास्तव में तथ्य यही है कि कृष्ण-चरित जीवन के वास्तविक चित्रण अथवा आदर्श चित्रण के रूप में रचा ही नहीं गया, उनका चरित वास्तव में परब्रह्म की लीलामात्र हैं जिसका प्रयोजन लीलानन्द के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं। उसका उद्देश्य अखण्ड आनन्द में जीवन की आध्यात्मिक परिपूर्णता की व्यंजना करना ही हैं भक्त कवियों ने उस आनन्द का रूप स्त्री-आनन्द रूप में परम पुरुष हैं और उनकी परा शक्ति रूप प्रकृति स्वरूपा राधा हैं जिनके संयोग से ही परम आनंद की परिपूर्णता सिद्ध होती है।&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कृष्ण2}}&lt;br /&gt;
{{कृष्ण}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कृष्ण काल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>धृतराष्ट्र</title>
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		<updated>2011-04-22T12:16:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Sanjaya-Dhritarashtra.jpg|thumb|250px|धृतराष्ट्र को [[महाभारत]] की घटनाओं का आँखों देखा हाल बताते हुये [[संजय]]]]&lt;br /&gt;
[[सत्यवती]] के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये। जब चित्रांगद और विचित्रवीर्य छोटे ही थे तभी [[शान्तनु]] का स्वर्गवास हो गया था इसलिये उनका पालन पोषण [[भीष्म]] ने किया। भीष्म ने चित्रांगद के बड़े होने पर उसे राजगद्दी पर बिठा दिया किन्तु कुछ समय बाद ही वह गन्धर्वों से युद्ध करते हुये मारा गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीष्म ने उसके भाई विचित्रवीर्य को राज्य सौंपने के बाद भीष्म को विचित्रवीर्य के विवाह की चिन्ता हुई। उसी समय काशीराज की तीन कन्याओं, [[अम्बा]], [[अम्बिका]] और [[अम्बालिका]] का [[स्वयंवर]] होने वाला था। भीष्म ने वहाँ जाकर अकेले ही सभी राजाओं को हरा दिया और तीनों कन्याओं का हरण करके[[ हस्तिनापुर]] ले आये। बड़ी कन्या अम्बा ने भीष्म को बताया कि वह राजा [[शाल्व]] को प्रेम करती है। यह सुन कर भीष्म ने उसे राजा शाल्व के पास भिजवाया और अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ करवा दिया। राजा शाल्व ने अम्बा को स्वीकार नहीं किया अतः वह हस्तिनापुर वापिस लौट आयी और भीष्म से बोली, 'हे आर्य! आप मुझे लाये हैं अतः आप मुझसे विवाह करें।' किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसका अनुरोध अस्वीकार कर दिया। अम्बा नाराज़ हो कर [[परशुराम]] के पास गई और अपनी व्यथा सुना कर मदद माँगी। परशुराम ने कहा, 'हे देवि! मैं आपका विवाह भीष्म के साथ करवाउँगा।' परशुराम ने भीष्म को बुलवाया किन्तु भीष्म उनके पास नहीं गये। परशुराम क्रोधित होकर भीष्म के पास पहुँचे और दोनों में युद्ध छिड़ गया। दोनों कुशल योद्धा थे, अतः हार-जीत का फैसला ना हो पाया । अंत में देवताओं ने हस्तक्षेप कर इस युद्ध को बन्द करवाया। अम्बा वन में तपस्या करने चली गई। विचित्रवीर्य की कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। कुल का नाश होने के भय से माता सत्यवती ने भीष्म से कहा, 'पुत्र! इस वंश को नष्ट होने से बचाने के लिये मेरी आज्ञा है कि तुम इन दोनों रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।' माता का आदेश सुन कर भीष्म ने कहा, 'माता! मैं अपनी प्रतिज्ञा भंग नहीं कर सकता।' माता सत्यवती को अत्यन्त दुःख हुआ। अचानक उन्हें अपने पुत्र [[वेदव्यास]] की याद आयी। याद करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गये। सत्यवती ने उन्हें देख कर कहा, 'पुत्र! तुम्हारे सभी भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गये। अतः वंश का नाश होने से बचाने के लिये मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम उनकी पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो।' वेदव्यास उनकी आज्ञा मान कर बोले, 'माता! आप उन दोनों रानियों से कह दें कि वे एक वर्ष तक नियम व्रत का पालन करते रहें तभी उनको गर्भ धारण होगा।'&lt;br /&gt;
==धृतराष्ट्र का जन्म==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर वेदव्यास सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका के पास गये। अम्बिका ने उनके तेज़ से डर कर अपने नेत्र बन्द कर लिये। वेदव्यास लौट कर माता से बोले, 'माता अम्बिका का बड़ा ही तेजस्वी पुत्र होगा किन्तु नेत्र बन्द करने के दोष के कारण वह अंधा होगा। सत्यवती को यह सुन कर अत्यन्त दुःख हुआ। उन्होंने वेदव्यास को छोटी रानी अम्बालिका के पास भेजा। अम्बालिका वेदव्यास को देख कर भय से पीली पड़ गई। उसके कक्ष से लौटने पर वेदव्यास ने सत्यवती से कहा,'माता! अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र होगा।&amp;quot; इससे माता सत्यवती को और भी दुःख हुआ। उन्होंने बड़ी रानी अम्बालिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी ने आनन्दपूर्वक वेदव्यास से भोग कराया। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, 'माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।' इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये। समय आने पर अम्बा के गर्भ से जन्मांध धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के लालन पालन का भार भीष्म के ऊपर था। तीनों पुत्र बड़े होने पर विद्या पढ़ने भेजे गये। धृतराष्ट्र बल विद्या में, पाण्डु धनुर्विद्या में तथा विदुर धर्म और नीति में निपुण हुये। युवा होने पर धृतराष्ट्र अन्धे होने के कारण राज्य के उत्तराधिकारी न बन सके। विदुर दासीपुत्र थे इसलिये पाण्डु को ही हस्तिनापुर का राजा घोषित किया गया। भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से कर दिया। गांधारी को जब ज्ञात हुआ कि उसका पति अन्धा है तो उसने स्वयं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली।&lt;br /&gt;
==महाभारत से==&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र [[पाण्डु]] का बड़ा भाई था। उसके सौ पुत्र [[कौरव]] नाम से विख्यात हुए । [[महाभारत]] जैसे वृहत युद्ध में यद्यपि कौरवों की ओर से अन्याय हुआ था तथापि धृतराष्ट्र की सहानुभूति अपने पुत्रों की ओर ही रही। वयोवृद्ध होने पर भी न्यायसंगत बात उसके मुंह से नहीं निकली। उसने [[संजय]] के द्वारा पांडवों के पास यह संदेश भिजवाया था कि कौरवों के पास अपरिमित सैन्य बल है अत: वे लोग कौरवों से युद्ध न करें। [[युधिष्ठिर]] ने संजय से पूछा कि उसने पांडवों के किस कर्म से यह अनुभव किया है कि वे लोग युद्ध के लिए उद्यत हैं? श्री[[कृष्ण]] ने कहा-'यदि पांडवों के अधिकार की हानि नहीं हो तो दोनों में संधि कराना श्रेयस्कर है अन्यथा क्षत्रिय का धर्म स्वराज्य-प्राप्ति के लिए युद्ध में प्राणों का स्वाहा कर देना है।' जैसा संदेश उसने पांडवों के पास भेजा था, वैसा कुछ कौरवों को समझाने का प्रयास उसने नहीं किया। [[विदुर]] (धृतराष्ट्र के छोटे भाई) ने भी धृतराष्ट्र को बहुत समझाया कि पांडवों का सर्वस्वहरण करने के उपरांत वे सब उनसे शांति की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? अन्याय से [[पांडव]] तो लड़ेंगे ही। भावी आंशका से ग्रस्त होकर धृतराष्ट्र अपने पुत्रों को युद्ध से नहीं रोक पाया। हुआ भी ऐसा ही। संभावित महाभारत युद्ध में सभी कौरवों का नाश हो गया। पांडवों के अधिकांश सैनिक तथा पांचाल नष्ट हो गये। [[दुर्योधन]] की मृत्यु के उपरांत धृतराष्ट्र अपने प्राण त्यागने को उद्यत हो उठा। [[व्यास]] तथा [[विदुर]] ने अपने पुराने कथनों का स्मरण दिलाकर और इस दुर्घटना को अनिवार्य  बतलाकर धृतराष्ट्र को शांत किया तथा आदेश दिया कि वह पांडवों से मैत्रीभाव रखने का प्रयास करे। धृतराष्ट्र ने ऐसा ही करने का आश्वासन दिया किंतु वह पांडवों पर बहुत क्रुद्ध रहा। तदनंतर वह स्त्रियों तथा प्रजाजनों सहित मृत वीरों के अंत्येष्टिकर्म आदि के लिए रणभूमि की ओर चल पड़ा। मार्ग में [[कृपाचार्य]], [[अश्वत्थामा]] तथा [[कृतवर्मा]] से भेंट हुई। उन तीनों वीरों ने पांचालों से लिए प्रतिशोध के विषय में सविस्तार वृत्तांत धृतराष्ट्र को सुनाया और यह बताकर कि वे पांडवों से छिपकर भाग रहे हैं- अश्वत्थामा व्यास मुनि के आश्रम की ओर, कृपाचार्य [[हस्तिनापुर]] तथा कृतवर्मा अपने देश की ओर बढ़े। हस्तिनापुर में रूदन करती हुई महिलाओं के मध्य रोती हुई [[द्रौपदी]], [[पांडव]], [[सात्यकि]] तथा [[कृष्ण]] भी थे। धृतराष्ट्र उनसे भी मिले। [[भीम (पांडव)|भीम]] की लौह-प्रतिमा को उन्होंने गले लगाकर चूर-चूर कर दिया।  कृष्ण ने उनके क्रोध को शांत किया, फटकारा भी, तब वे पांडवों को हृदय से लगा पाये।&lt;br /&gt;
==धृतराष्ट्र- वनगमन==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|धृतराष्ट्र का वनगमन}}&lt;br /&gt;
पांडवों ने विजयी होने के उपरांत धृतराष्ट्र तथा गांधारी की पूर्ण तन्मयता से सेवा की। पांडवों में से भीमसेन ऐसे थे जो सबकी चोरी से धृतराष्ट्र को अप्रिय लगने वाले काम करते रहते थे, कभी-कभी सेवकों से भी धृष्टतापूर्ण मंत्रणाएँ करवाते थे। धृतराष्ट्र धीरे-धीरे दो दिन या चार दिन में एक बार भोजन करने लगे। पंद्रह वर्ष बाद उन्हें इतना वैराग्य हुआ कि वे वन जाने के लिए छटपटाने लगे। वे और गांधारी युधिष्ठिर तथा व्यास मुनि से आज्ञा लेकर वन में चले गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाभारत}}{{महाभारत2}}{{पौराणिक चरित्र}} &lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक चरित्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4&amp;diff=154974</id>
		<title>आदि पर्व महाभारत</title>
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		<updated>2011-04-22T12:16:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;आदि पर्व के अन्तर्गत कुल उन्नीस (उप) पर्व और 233 अध्याय हैं। इन 19 (उप) पर्वों के नाम हैं-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*अनुक्रमणिका पर्व,&lt;br /&gt;
*पर्वसंग्रह पर्व,&lt;br /&gt;
*पौष्य पर्व,&lt;br /&gt;
*पौलोम पर्व,&lt;br /&gt;
*आस्तीक पर्व,&lt;br /&gt;
*अंशावतार पर्व,&lt;br /&gt;
*सम्भाव पर्व,&lt;br /&gt;
*जतुगृह पर्व,&lt;br /&gt;
*हिडिम्बवध पर्व,&lt;br /&gt;
*बकवध पर्व,&lt;br /&gt;
*चैत्ररथ पर्व,&lt;br /&gt;
*[[स्वयंवर]] पर्व,&lt;br /&gt;
*वैवाहिक पर्व, &lt;br /&gt;
*विदुरागमनराज्यलम्भ पर्व,&lt;br /&gt;
*अर्जुनवनवास पर्व, &lt;br /&gt;
*सुभद्राहरण पर्व,&lt;br /&gt;
*हरणाहरण पर्व,&lt;br /&gt;
*खाण्डवदाह पर्व,&lt;br /&gt;
*मयदर्शन पर्व।&lt;br /&gt;
आदि पर्व की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है- जैसा कि नाम से ही विदित होता है, यह [[महाभारत]] जैसे विशाल ग्रन्थ की मूल प्रस्तावना है। प्रारम्भ में महाभारत के पर्वों और उनके विषयों का संक्षिप्त संग्रह है। कथा-प्रवेश के बाद [[च्यवन]] का जन्म, पुलोमा दानव का भस्म होना, [[जनमेजय]] के सर्पसत्र की सूचना, नागों का वंश, कद्रू और विनता की कथा, [[देवता|देवों]]-दानवों द्वारा [[समुद्र मंथन]], [[परीक्षित]] का आख्यान, सर्पसत्र, राजा उपरिचर का वृत्तान्त, [[व्यास]] आदि की उत्पत्ति, [[दुष्यन्त]]-[[शकुन्तला]] की कथा, [[पुरूरवा]], [[नहुष]] और [[ययाति]] के चरित्र का वर्णन, [[भीष्म]] का जन्म और [[कौरव|कौरवों]]-[[पाण्डव|पाण्डवों]] की उत्पत्ति, [[कर्ण]]-[[द्रोण]] आदि का वृत्तान्त, [[द्रुपद]] की कथा, [[लाक्षागृह]] का वृत्तान्त, [[हिडिम्ब]] का वध और [[हिडिम्बा]] का विवाह, [[बकासुर]] का वध, [[धृष्टद्युम्न]] और [[द्रौपदी]] की उत्पत्ति, द्रौपदी-स्वयंवर और विवाह, पाण्डव का [[हस्तिनापुर]] में आगमन, सुन्द-उपसुन्द की कथा, नियम भंग के कारण [[अर्जुन]] का वनवास, [[सुभद्रा]]हरण और विवाह, [[खांडव वन|खाण्डव]]-दहन और मयासुर रक्षण की कथा वर्णित है।&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
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		<title>सुभद्रा</title>
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		<updated>2011-04-22T12:14:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*एक बार [[वृष्णि संघ]], भोज और [[अंधक]] वंश के लोगों ने रैवतक पर्वत पर बहुत बड़ा उत्सव मनाया। इस अवसर पर हज़ारों रत्नों और अपार संपत्ति का दान किया गया। बालक, वृद्ध और स्त्रियां सज-धजकर घूम रही थीं। [[अक्रूर]], सारण, गद, वभ्रु, विदूरथ, निशठ, चारुदेष्ण, पृथु, विपृथु, सत्यक, [[सात्यकि]], हार्दिक्य, [[उद्धव]], [[बलराम]] तथा अन्य प्रमुख यदुवंशी अपनी-अपनी पत्नियों के साथ उत्सव की शोभा बढ़ा रहे थे। गंधर्व और बंदीजन उनका विरद बखान रहे थे। गाजे-बाजे, नाच तमाशे की भीड़ सब ओर लगी हुई थी। &lt;br /&gt;
*इस उत्सव में [[कृष्ण]] और [[अर्जुन]] भी बडे़ प्रेम से साथ-साथ घूम रहे थे। वहीं कृष्ण की बहन सुभद्रा भी थीं। उनकी रूप राशि से मोहित होकर अर्जुन एकटक उनकी ओर देखने लगे। कृष्ण ने अर्जुन के अभिप्राय को जानकर कहा, तुम्हारे यहाँ [[स्वयंवर]] की चाल (प्रचलन) है। परंतु यह निश्चय नहीं कि सुभद्रा तुम्हें स्वयंवर में वरेगी या नहीं, क्योंकि सबकी रुचि अलग-अलग होती है। लेकिन राजकुलों में बलपूर्वक हर कर ब्याह करने की भी रीति है। इसलिए तुम्हारे लिए वही मार्ग प्रशस्त होगा। &lt;br /&gt;
*एक दिन सुभद्रा रैवतक पर्वत पर देवपूजा करने गईं। पूजा के बाद पर्वत की प्रदक्षिणा की। ब्राह्मणों ने मंगल वाचन किया। जब सुभद्रा की सवारी [[द्वारका]] के लिए रवाना हुई, तब अवसर पाकर अर्जुन ने बलपूर्वक उसे उठाकर अपने रथ में बिठा लिया और अपने नगर की ओर चल दिए। &lt;br /&gt;
*सैनिक सुभद्रा हरण का यह दृश्य देखकर चिल्लाते हुए द्वारका की सुधर्मा सभा में गए और वहां सब हाल कहा। सुनते ही सभापाल ने युद्ध का डंका बजाने का आदेश दे दिया। वह आवाज सुनकर भोज, अंधक और वृष्णि वंशों के योद्धा अपने ज़रूरी कामकाज छोड़ कर वहां इकट्ठे होने लगे। सुभद्रा हरण का वृतांत सुनकर उनकी आंखें चढ़ गईं। उन्होंने सुभद्रा का हरण करने वाले को उचित दंड देने का निश्चय किया। कोई रथ जोतने लगा, कोई कवच बांधने लगा, कोई ताव के मारे ख़ुद घोड़ा जोतने लगा, युद्ध की सामग्री इकट्ठा होने लगी। &lt;br /&gt;
*तब बलराम ने कहा, हे वीर योद्धाओ! कृष्ण की राय सुने बिना ऐसा क्यों कर रहे हो? फिर उन्होंने कृष्ण से कहा, जनार्दन! तुम्हारी इस चुप्पी का क्या अभिप्राय है? तुम्हारा मित्र समझकर अर्जुन का यहाँ इतना सत्कार किया गया और उसने जिस पत्तल में खाया, उसी में छेद किया। यह दुस्साहस करके उसने हमें अपमानित किया है। मैं यह नहीं सह सकता। &lt;br /&gt;
*तब कृष्ण बोले, अर्जुन ने हमारे कुल का अपमान नहीं, सम्मान किया है। उन्होंने हमारे वंश की महत्ता समझकर ही हमारी बहन का हरण किया है। क्योंकि उन्हें स्वयंवर के द्वारा उसके मिलने में संदेह था। वह उत्तम वंश का होनहार युवक है। उसके साथ संबंध करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सुभद्रा और अर्जुन की जोड़ी बहुत ही सुंदर होगी। &lt;br /&gt;
*कृष्ण की यह बात सुन कर कुछ लोग कसमसाए। तब कृष्ण ने आगे कहा, इसके अलावा अर्जुन को जीतना भी दुष्कर है। यहाँ चाहे जितनी जोशीली बातें कर लें, वहां उसके हाथों पराजय भी हो सकती है। मैं समझता हूं कि इस समय लड़ाई का उद्योग न करके अर्जुन के के पास जाकर मित्रभाव से कन्या सौंप देना ही उत्तम है। कहीं अर्जुन ने अकेले ही तुम लोगों को जीत लिया और कन्या को हस्तिनापुर ले गया तो और बदनामी होगी। यदि उससे मित्रता कर ली जाए तो हमारा यश बढे़गा। &lt;br /&gt;
*आख़िर लोगों ने कृष्ण की बात मान ली। सम्मान के साथ अर्जुन लौटा कर लाए गए। द्वारका में सुभद्रा के साथ उनका विधिपूर्वक विवाह संस्कार संपन्न हुआ। विवाह के बाद वे एक वर्ष तक द्वारका में रहे और शेष समय [[पुष्कर]] क्षेत्र में व्यतीत किया। बनवास के बारह वर्ष समाप्त होने के उपरांत श्री[[कृष्ण]], [[बलराम]], सुभद्रा तथा दहेज के साथ [[अर्जुन]] [[इन्द्रप्रस्थ]] वापस चले गये। कालांतर में सुभद्रा की कोख से [[अभिमन्यु]] का जन्म हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, आदिपर्व, अ0 217-220&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==श्रीमद् भागवत में==&lt;br /&gt;
अर्जुन तीर्थ-यात्रा करता हुआ प्रभास-क्षेत्र पहुंचा। वहां उसने सुना कि बलराम अपनी बहन सुभद्रा का विवाह [[दुर्योधन]] से करना चाहता है किंतु [[कृष्ण]], [[वसुदेव]] तथा [[देवकी]] सहमत नहीं हैं। अर्जुन एक त्रिदंडी वैष्णव का रूप धारण करके [[द्वारका]] पहुंचा। बलराम ने उसका विशेष स्वागत किया। भोजन करते समय उसने और सुभद्रा ने एक-दूसरे को देखा तथा परस्पर विवाह करने के लिए इच्छुक हो उठे। एक बार सुभद्रा देव-दर्शन के लिए रथ पर सवार होकर द्वारका दुर्ग से बाहर निकली। सुअवसर देखकर अर्जुन ने उसका हरण कर लिया। उसे कृष्ण, वसुदेव तथा [[देवकी]] की सहमति पहले से ही प्राप्त थी। बलराम को उनके संबंधियों ने बाद में समझा-बुझाकर शांत कर दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद् भागवत, 10।86।1-12&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाभारत}}{{महाभारत2}}{{पौराणिक चरित्र}} &lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक चरित्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]   &lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>नल दमयन्ती</title>
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		<updated>2011-04-22T12:13:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
निषध के राजा वीरसेन के पुत्र का नाम नल था। उन्हीं दिनों विदर्भ देश पर भीम नामक राजा राज्य करता थां उनके प्रयत्नों के उपरांत दमन नामक ब्रह्मर्षि को प्रसन्न कर उसे तीन पुत्र (दम, दान्त तथा दमन) और एक कन्या (दमयंती) की प्राप्ति हुई। [[दमयंती]] तथा नल अतीव सुंदर थे। एक-दूसरे की प्रशंसा सुनकर बिना देखे ही वे परस्पर प्रेम करने लगे। नल ने एक हंस से अपना प्रेम-संदेश दमयंती तक पहुंचाया, प्रत्युत्तर में दमयंती ने भी नल के प्रति वैसे ही उद्गार भिजवाए। कालांतर में दमयंती के [[स्वयंवर]] का आयोजन हुआ। [[इन्द्र]], [[वरुण देवता|वरुण]], [[अग्निदेव|अग्नि]] तथा [[यमराज|यम]], ये चारों भी उसे प्राप्त करने के लिए इच्छुक थे। इन्होंने भूलोक में नल को अपना दूत बनाया। नल के यह बताने पर भी कि वह दमयंती से प्रेम करता है, उन्होंने उसे दूत बनने के लिए बाध्य कर दिया। दमयंती ने जब नल का परिचय प्राप्त किया तो स्पष्ट कहा-'आप उन चारों देवताओं को मेरा प्रणाम कहिएगा, किंतु स्वयंवर में वरण तो मैं आपका ही करूंगी।' स्वयंवर के समय उन चारों लोकपालों ने नल का ही रूप धारण कर लिया। दमयंती विचित्र परिस्थिति में फंस गयी। उसके लिए नल को पहचानना असंभव हो गया। देवताओं को मन-ही-मन प्रणाम कर उसने नल को पहचानने की शक्ति मांगी। दमयंती ने देखा कि एक ही रूप के पांच युवकों में से चार को पसीना नहीं आ रहा, उनकी पुष्प मालाएं एक दम खिली हुई दिखलायी पड़ रही हैं, वे धूल-कणों से रहित हैं तथा उनके पांव [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] का स्पर्श नहीं कर रहे। दमयंती ने पांचवें व्यक्ति को राजा नल पहचान कर उसका वरण कर लिया। &lt;br /&gt;
==लोकपालों द्वारा दिए वरदान==&lt;br /&gt;
लोकपालों ने प्रसन्न होकर नल को आठ वरदान दिये- &lt;br /&gt;
#[[इन्द्र]] ने वर दिया कि नल को यज्ञ में प्रत्यक्ष दर्शन देंगे, तथा &lt;br /&gt;
#सर्वोत्तम गति प्रदान करेंगे। [[अग्निदेव|अग्नि]] ने वर दिये कि &lt;br /&gt;
#वे नल को अपने समान तेजस्वी लोक प्रदान करेंगे तथा &lt;br /&gt;
#नल जहां चाहे, वे प्रकट हो जायेंगे। [[यमराज]] ने &lt;br /&gt;
#पाकशास्त्र में निपुणता तथा &lt;br /&gt;
#धर्म में निष्ठा के वर दिये। [[वरुण देवता|वरुण]] ने &lt;br /&gt;
#नल की इच्छानुसार जल के प्रकट होने तथा &lt;br /&gt;
#उसकी मालाओं में उत्तम गंध-संपन्नता के वर दिये। &lt;br /&gt;
देवतागण जब देवलोक की ओर जा रहे थे तब मार्ग में उन्हें कलि और द्वापर साथ-साथ जाते हुए मिले। वे लोग भी दमयंती के स्वयंवर में सम्मिलित होना चाहते थे। इन्द्र से स्वयंवर में नल के वरण की बात सुनकर [[कलि युग]] क्रुद्ध हो उठा, उसने नल को दंड देने के विचार से उसमें प्रवेश करने का निश्चय किया। उसने [[द्वापर युग]] से कहा कि वह जुए के पासे में निवास करके उसकी सहायता करे।&lt;br /&gt;
==नल की जुए में हार==&lt;br /&gt;
कालांतर में नल दमयंती की दो संतानें हुईं। पुत्र का नाम इन्द्रसेन था तथा पुत्री का इन्द्रसेनीं। कलि ने सुअवसर देखकर नल के शरीर में प्रवेश किया तथा दूसरा रूप धारण करके वह [[पुष्कर]] के पास गया। पुष्कर नल का भाई लगता थां उसे कलि ने उकसाया कि वह जुए में नल को हराकर समस्त राज्य प्राप्त कर ले। पुष्कर नल के महल में उससे जुआ खेलने लगा। नल ने अपना समस्त वैभव, राज्य इत्यादि जुए पर लगाकर हार दिया। दमयंती ने अपने सारथी को बुलाकर दोनों बच्चों को अपने भाई-बंधुओं के पास कुण्डिनपुर (विदर्भ देश में) भेज दिया। नल और दमयंती एक-एक वस्त्र में राज्य की सीमा से बाहर चले गये। वे एक जंगल में पहुंचे। वहां बहुत-सी सुंदर चिड़ियां बैठी थीं, जिनकी आंखें सोने की थीं। नल ने अपना वस्त्र उतारकर उन चिड़ियों पर डाल दिया ताकि उन्हें पकड़कर उदराग्नि को तृप्त कर सके और उनकी आंखों के स्वर्ण से धनराशि का संचय करे, किंतु चिड़िया उस धोती को ले उड़ीं तथा यह भी कहती गयीं कि वे जुए के पासे थे जिन्होंने चिड़ियों का रूप धारण कर रखा था तथा वे धोती लेने की इच्छा से ही वहां पहुंची थीं। नग्न नल अत्यंत व्याकुल हो उठा। बहुत थक जाने के कारण जब दमयंती को नींद आ गयी तब नल ने उसकी साड़ी का आधा भाग काटकर धारण कर लिया और उसे जंगल में छोड़कर चला गया। &lt;br /&gt;
==जंगल में अकेली दमयंती== &lt;br /&gt;
भटकती हुई दमयंती को एक अजगर ने पकड़ लिया। उसका विलाप सुनकर किसी व्याध ने अजगर से तो उसकी प्राणरक्षा कर दी किंतु कामुकता से उसकी ओर बढ़ा। दमयंती ने देवताओं का स्मरण कर कहा, कि यदि वह पतिव्रता है तो उसकी सुरक्षा हो जाय। वह व्याध तत्काल भस्म होकर निष्प्राण हो गया। थोड़ी दूर चलने पर दमयंती को एक आश्रम दिखलायी पड़ा। दमयंती ने वहां के तपस्वियों से अपनी दु:खगाथा कह सुनायी और उनसे पूछा कि उन्होंने नल को कहीं देखा तो नहीं है। वे तपस्वी ज्ञानवृद्ध थे। उन्होंने उसके भावी सुनहरे भविष्य के विषय में बताते हुए कहा कि नल अवश्य ही अपना राज्य फिर से प्राप्त कर लेगा और दमयंती भी उससे शीघ्र ही मिल जायेगी। भविष्यवाणी के उपरांत दमयंती देखती ही रह गयी कि वह आश्रम, तपस्वी, नदी, पेड़, सभी अंतर्धान हो गये। तदनंतर उसे शुचि नामक व्यापारी के नेतृत्व में जाती हुई एक व्यापार मंडली मिली। वे लोग [[चेदि]]राज [[सुबाहु (चेदिराज)|सुबाहु]] के जनपद की ओर जा रहे थे। कृपाकांक्षिणी दमयंती को भी वे लोग अपने साथ ले चले। मार्ग में जंगली हाथियों ने उन पर आक्रमण कर दिया। धन, वैभव, जन आदि सभी प्रकार का नाश हुआ। कई लोगों का मत था कि दमयंती नारी के रूप में कोई मायावी राक्षसी अथवा यक्षिणी रही होगी, उसी की माया से यह सब हुआ। उनके मन्तव्य को जानकर दमयंती का दु:ख द्विगुणित हो गया। सुबाहु की राजधानी में भी लोगों ने उसे अन्मत्त समझा क्योंकि वह कितने ही दिनों से बिखरे बाल, धूल से मंडित तन तथा आधी साड़ी में लिपटी देह लिए धूम रही थीं अपने पति की खोज में उसकी दयनीय स्थिति जानकर राजमाता ने उसे आश्रय दिया। दमयंती ने राजमाता से कहा कि वह उनके आश्रय में किन्हीं शर्तों पर रह सकेगी: वह जूठन नहीं खायेंगी, किसी के पैर नहीं धोयेगी, ब्राह्मण से इतर पुरुषों से बात नहीं करेगी, कोई उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करे तो वह दंडनीय होगा। दमयंती ने अपना तथा नल का नामोल्लेख नहीं किया। वहां की राजकुमारी सुनंदा की सखी के रूप में वह वहां रहने लगी। दमयंती के माता-पिता तथा बंधु-बांधव उसे तथा नल को ढूंढ़ निकालने के लिए आतुर थे। उन्होंने अनेक ब्राह्मणों को यह कार्य सौंपा हुआ था। दमयंती के भाई के मित्र सुदैव नामक ब्राह्मण ने उसे खोज निकाला। सुदैव ने उसके पिता आदि के विषय में बताकर राजमाता उसकी मौसी थी किंतु वे परस्पर पहचान नहीं पायी थीं। दमयंती मौसी की आज्ञा लेकर विदर्भ निवासी बंधु-बांधवों, माता-पिता तथा अपने बच्चों के पास चली गयी। उसके पिता नल की खोज के लिए आकुल हो उठे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जंगल में नल==&lt;br /&gt;
दमयंती को छोड़कर जाते हुए नल ने दावालन में घिरे हुए किसी प्राणी का आर्तनाद सुना वह निर्भीकतापूर्वक अग्नि में घुस गया। अग्नि के मध्य [[कर्कोटक]] नामक नाग बैठा था, जिसे [[नारद]] ने तब तक जड़वत निश्चेष्ट पड़े रहने का शाप दिया था जब तक राजा नल उसका उद्धार न करे। नाग ने एक अंगूठे के बराबर रूप धारण कर लिया और [[अग्निदेव|अग्नि]] से बाहर निकालने का अनुरोध किया। नल ने उसकी रक्षा की, तदुपरांत कर्कोटक ने नल को डंस लिया, जिससे उसका रंग काला पड़ गया। उसने राजा को बताया कि उसके शरीर में कलि निवास कर रहा है, उसके दु:ख का अंत कर्कोटक के विष से ही संभव है। दु:ख के दिनों में श्यामवर्ण प्राप्त राजा को लोग पहचान नहीं पायेंगे। अत: उसने आदेश दिया कि नल बाहुक नाम धर कर [[इक्ष्वाकु]]कुल के ऋतुपर्ण नामक [[अयोध्या]] के राजा के पास जाये। राजा को अश्वविद्या का रहस्य सिखाकर उससे द्यूतक्रीड़ा का रहस्य सीख ले। राजा नल को सर्प ने यह वर दिया कि उसे कोई भी दाढ़ी वाला जंतु तथा वेदवेत्ताओं का शाप त्रस्त नहीं कर पायेगा। सर्प ने उसे दो दिव्य वस्त्र भी दिये जिन्हें ओढ़कर वह पूर्व रूप धारण कर सकता था। तदनंतर कर्कोंटक अंतर्धान हो गया। नल ऋतुपर्ण के यहाँ गया तथा उसने राजा से निवेदन किया कि उसका नाम बाहुक है और वह पाकशास्त्र, अश्वविद्या तथा विभिन्न शिल्पों का ज्ञाता हे। राजा ने उसे अश्वाध्यक्ष के पद पर नियुक्त कर लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नल की खोज==&lt;br /&gt;
[[विदर्भ]]राज का पर्णाद नामक ब्राह्मण नल को खोजता हुआ अयोध्या में पहुंचा। विदर्भ देश में लौटकर उसने बताया कि वाहुक नामक सारथी का क्रियाकलाप संदेहास्पद है। वह नल से बहुत मिलता है। दमयंती ने पिता से गोपन रखते हुए मां की अनुमति से सुदेव नामक ब्राह्मण के द्वारा ऋतुपर्ण को कहलाया कि अगले दिन दमयंती का दूसरा स्वयंवर है। अत: वह पहुंचे। ऋतुपर्ण ने बाहुक से सलाह करके विदर्भ देश के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में राजा ने बाहुक से कहा कि अमुक पेड़ पर अमुक संख्यक फल हैं। बाहुक वचन की शुद्धता जानने के लिए पेड़ के पास रूक गया तथा उसके समस्त फल गिनकर उसने देखा कि वस्तुत: उतने ही फल हैं। राजा ने बताया कि वह गणित और द्यूत-विद्या के रहस्य को जानता है। ऋतुपर्ण ने बाहुक को द्यूत विद्या सिखा दी तथा उसके बदले में अश्व-विद्या उसी के पास धरोहर रूप में रहने दी। बाहुक के द्यूत विद्या सीखते ही उसके शरीर से [[कलि युग]] निकलकर बहेड़े के पेड़ में छिप गया, फिर क्षमा मांगता हुआ अपने घर चला गया। विदर्भ देश में स्वयंवर के कोई चिह्न नहीं थे। ऋतुपर्ण तो विश्राम करने चला गया किंतु दमयंती ने केशिनी के माध्यम से बाहुक की परीक्षा ली। वह स्वेच्छा से जल तथा [[अग्निदेव|अग्नि]] को प्रकट कर सकता था। उसके चलाये रथ की गति वैसी ही थी जैसे राजा नल की हुआ करती थी। बाहुक अपने बच्चों से मिलकर ख़ूब रोया भी था। दमयंती को रूप के अतिरिक्त किसी भी वस्तु में बाहुक तथा नल में विषमता नहीं दीख पड़ रही थी। उसने गुरुजनों की आज्ञा लेकर उसे अपने कक्ष में बुलाया। नल को भली भांति पहचानकर दमयंती ने उसे बताया कि नल को ढूंढ़ने के लिए ही दूसरे स्वयंवर की चर्चा की गयी थी। ऋतुपर्ण को अश्व-विद्या देकर नल ने [[पुष्कर]] से पुन: जुआ खेला। उसने दमयंती तथा धन की बाजी लगा दीं पुष्कर संपूर्ण धन धान्य और राज्य हारकर अपने नगर चला गया। नल ने पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।  &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, [[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]], अध्याय 53 से 78 तक&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>शिखंडी</title>
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		<updated>2011-04-22T12:12:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*काशीराज की तीन कन्याओं में [[अंबा]] सबसे बड़ी थी। [[भीष्म]] ने [[स्वयंवर]] में अपनी शक्ति से उन तीनों का अपहरण कर अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य से विवाह के निमित्त माता सत्यवती को सौंपना चाहा, तब अंबा ने बताया कि वह शाल्वराज से विवाह करना चाहती है। उसे वयोवृद्ध ब्राह्मणों के साथ राजा शाल्व के पास भेज दिया गया। [[शाल्व]] ने अंबा को ग्रहण नहीं किया। अत: उसने वन में तपस्वियों की शरण ग्रहण की।&lt;br /&gt;
*तपस्वियों के मध्य उसका साक्षात्कार अपने नाना महात्मा राजर्षि होत्रवाहन से हुआ। होत्रवाहन ने उसे पहचानकर गले से लगा लिया। संयोगवश वहां [[परशुराम]] के प्रिय सखा अकृतव्रण भी उपस्थित थे। उनसे सलाह कर नाना ने अंबा को परशुराम की शरण में भेज दिया। परशुराम ने समस्त कथा सुनकर पूछा कि वह किससे अधिक रुष्ट है- भीष्म से अथवा शाल्वराज से? अंबा ने कहा कि यदि भीष्म उसका अपहरण न करते तो उसे यह कष्ट नहीं उठाना पड़ता। अत: परशुराम भीष्म को मार डालें। परशुराम ने उसे अभयदान दिया तथा [[कुरुक्षेत्र]] में जाकर भीष्म को ललकारा।&lt;br /&gt;
*परशुराम भीष्म के गुरु रहे थे। आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम कर दोनों का युद्ध प्रांरभ हुआ। कभी परशुराम मूर्च्छित हो जाते, कभी भीष्म। एक बार मूर्च्छा में भीष्म रथ से गिरने लगे तो उन्हें आठ ब्राह्मणों ने अधर में अपनी भुजाओं पर रोक लिया कि वे भूमि पर न गिरें। उनकी माता [[गंगा नदी|गंगा]] ने रथ को थाम लिया। ब्राह्मणों ने पानी के छींटे देकर उन्हें निर्भय रहने का आदेश दिया। उस रात आठों ब्राह्मणों (अष्ट वसुओं) ने स्वप्न में दर्शन देकर भीष्म से अभय रहने के लिए कहा तथा युद्ध में प्रयुक्त करने के लिए स्वाप नामक अस्त्र भी प्रदान किया। वसुओं ने कहा कि पूर्वजन्म में भीष्म उसकी प्रयोग-विधि जानते थे, अत: अनायास ही 'स्वाप' का प्रयोग कर लेंगे तथा परशुराम इससे अनभिज्ञ हैं। अगले दिन रणक्षेत्र में पहुंचकर गत अनेक दिवसों के क्रमानुसार दोनों का युद्ध प्रारंभ हुआ। भीष्म ने 'स्वाप' नामक अस्त्र का प्रयोग करना चाहा, किंतु [[नारद]] आदि देवताओं ने तथा माता गंगा ने बीच में पड़कर दोनों का युद्ध रुकवा दिया। उन्होंने कहा कि युद्ध व्यर्थ है, क्योंकि दोनों परस्पर अवध्य हैं। परशुराम ने अंबा से उसकी प्रथम इच्छा पूरी न कर पाने के कारण क्षमा-याचना की तथा दूसरी कोई इच्छा जाननी चाही। अंबा ने इस आकांक्षा से कि वह स्वयं ही भीष्म को मारने योग्य शक्ति संचय कर पाये, घोर तपस्या की। गंगा ने दर्शन देकर कहा-'तेरी यह इच्छा कभी पूर्ण नहीं होगी। यदि तू तपस्या करती हुई ही प्राण त्याग करेगी, तब भी तू मात्र बरसाती नदी बन पायेगी।' तीर्थ करने के निमित्त वह वत्स देश में भटकती रहती थी।&lt;br /&gt;
*अत: मृत्यु के उपरांत तपस्या के प्रभाव से उसके आधे अंग वत्स देश स्थित अंबा नामक बरसाती नदी बन गये तथा शेष आधे अंग वत्सदेश की राजकन्या के रूप में प्रकट हुए। उस जन्म में भी उसने तपस्या करने की ठान लीं उसे नारी-रूप से विरक्ति हो गयी थीं वह पुरुष-रूप धारण कर भीष्म को मारना चाहती थी। [[शिव]] ने उसे दर्शन दिये। उन्होंने वरदान दिया कि वह [[द्रुपद]] के यहाँ कन्या-रूप में जन्म लेगी, कालांतर में युद्ध-क्षेत्र में जाने के लिए उसे पुरुषत्व प्राप्त हो जायेगा तथा वह भीष्म की हत्या करेगी। अंबा ने संतुष्ट होकर, भीष्म को मारने के संकल्प के साथ चिता में प्रवेश कर आत्मदाह किया।&lt;br /&gt;
*उधर द्रुपद की पटरानी के कोई पुत्र नहीं था। [[कौरव|कौरवों]] के वध के लिए पुत्र-प्राप्ति के हेतु द्रुपद ने घोर तपस्या की और शिव ने उन्हें भी दर्शन देकर कहा कि वे कन्या को प्राप्त करेंगे जो बाद में पुत्र में परिणत हो जायेगी। अत: जब शिखंडिनी का जन्म हुआ तब उसका लालन-पालन पुत्रवत किया गया। उसका नाम शिखंडी बताकर सबपर उसका लड़का होना ही प्रकट किया गया।&lt;br /&gt;
*कालांतर में हिरण्यवर्मा की पुत्री से उसका विवाह कर दिया गया। पुत्री ने पिता के पास शिखंडी के नारी होने का समाचार भेजा तो वह अत्यंत क्रुद्ध हुआ तथा द्रुपद से युद्ध करने की तैयारी करने लगा। इधर सब लोग बहुत व्याकुल थे। शिखंडिनी ने वन में जाकर तपस्या की। यक्षस्थूलाकर्ण ने भावी युद्ध के संकट का विमोचन करने के निमित्त कुछ समय के लिए अपना पुरुषत्व उसके स्त्रीत्व से बदल लिया।&lt;br /&gt;
*शिखंडी ने यह समाचार माता-पिता को दिया। हिरण्यवर्मा को जब यह विदित हुआ कि शिखंडी पुरुष है-युद्ध-विद्या में [[द्रोणाचार्य]] का शिष्य है, तब उसने शिखंडी की निरीक्षण-परीक्षण कर द्रुपद के प्रति पुन: मित्रता का हाथ बढ़ाया तथा अपनी कन्या को मिथ्या वाचन के लिए डांटकर राजा द्रुपद के घर से ससम्मान प्रस्थान किया। इन्हीं दिनों स्थूलाकर्ण यक्ष के आवास पर [[कुबेर]] गये किंतु स्त्रीरूप में होने के कारण लज्जावश स्थूलकर्ण ने प्रत्यक्ष उपस्थित होकर उनका सत्कार नहीं किया। अत: कुबेर ने कुपित होकर यज्ञ को शिखंडी के जीवित रहने तक स्त्री-रूप में रहने का शाप दिया। अत: शिखंडी जब पुरुषत्व लौटाने वहां पहुंचा तो स्थूलाकर्ण पुरुषत्व वापस नहीं ले पाया।&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, उद्योगपर्व, 173-192&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<title>स्वयंवर</title>
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		<updated>2011-04-22T12:05:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: Adding category :Category:हिन्दू धर्म कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&amp;lt;!-- कृपया इस साँचे को हटाएँ नहीं (डिलीट न करें)। इसके नीचे से ही सम्पादन कार्य करें। --&amp;gt;&lt;br /&gt;
*स्वयंवर का [[हिंदू धर्म|हिंदू]] समाज में एक विशिष्ट सामाजिक स्थान था। &lt;br /&gt;
*इस बात के प्रमाण हैं कि वैदिक काल में यह प्रथा समाज के चारों वर्णों में प्रचलित थी और यह विवाह का प्रारूप था। &lt;br /&gt;
*[[रामायण]] और [[महाभारत]] काल में भी यह प्रथा राजन्य वर्ग में प्रचलित थी। पर इसका रूप कुछ संकुचित हो गया था। &lt;br /&gt;
*राजन्य कन्या पति का वरण स्वयंवर में करती थी परंतु यह समाज द्वारा मान्यता प्रदान करने के हेतु थी। &lt;br /&gt;
*कन्या को पति के वरण में स्वतंत्रता न थी। &lt;br /&gt;
*पिता की शर्तों के अनुसार पूर्ण योग्यता प्राप्त व्यक्ति ही चुना जा सकता था। &lt;br /&gt;
*पूर्व मध्यकाल में भी इस प्रथा के प्रचलित रहने के प्रमाण मिले हैं, जैसा संयोगिता के स्वयंवर से स्पष्ट है। &lt;br /&gt;
*[[आर्य|आर्यों]] के आदर्श ज्यों-ज्यों विरमत होते गए, इस प्रथा में कमी होती गई और आज तो स्वयंवर को उपहास का विषय ही माना जाता है। &lt;br /&gt;
*आर्यों ने स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार मान्य किया था और उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता दी थी। &lt;br /&gt;
*इसी पृष्ठभूमि में स्वयंवर प्रथा की प्रतिस्थापना हुई पर धीरे-धीरे यह संकुचित और फिर विलुप्त हो गई।&lt;br /&gt;
(रामस्वरूप)&lt;br /&gt;
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		<title>स्वयंवर</title>
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		<updated>2011-04-22T12:04:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: '{{पुनरीक्षण}}&amp;lt;!-- कृपया इस साँचे को हटाएँ नहीं (डिलीट न क...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&amp;lt;!-- कृपया इस साँचे को हटाएँ नहीं (डिलीट न करें)। इसके नीचे से ही सम्पादन कार्य करें। --&amp;gt;&lt;br /&gt;
*स्वयंवर का [[हिंदू धर्म|हिंदू]] समाज में एक विशिष्ट सामाजिक स्थान था। &lt;br /&gt;
*इस बात के प्रमाण हैं कि वैदिक काल में यह प्रथा समाज के चारों वर्णों में प्रचलित थी और यह विवाह का प्रारूप था। &lt;br /&gt;
*[[रामायण]] और [[महाभारत]] काल में भी यह प्रथा राजन्य वर्ग में प्रचलित थी। पर इसका रूप कुछ संकुचित हो गया था। &lt;br /&gt;
*राजन्य कन्या पति का वरण स्वयंवर में करती थी परंतु यह समाज द्वारा मान्यता प्रदान करने के हेतु थी। &lt;br /&gt;
*कन्या को पति के वरण में स्वतंत्रता न थी। &lt;br /&gt;
*पिता की शर्तों के अनुसार पूर्ण योग्यता प्राप्त व्यक्ति ही चुना जा सकता था। &lt;br /&gt;
*पूर्व मध्यकाल में भी इस प्रथा के प्रचलित रहने के प्रमाण मिले हैं, जैसा संयोगिता के स्वयंवर से स्पष्ट है। &lt;br /&gt;
*[[आर्य|आर्यों]] के आदर्श ज्यों-ज्यों विरमत होते गए, इस प्रथा में कमी होती गई और आज तो स्वयंवर को उपहास का विषय ही माना जाता है। &lt;br /&gt;
*आर्यों ने स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार मान्य किया था और उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता दी थी। &lt;br /&gt;
*इसी पृष्ठभूमि में स्वयंवर प्रथा की प्रतिस्थापना हुई पर धीरे-धीरे यह संकुचित और फिर विलुप्त हो गई।&lt;br /&gt;
(रामस्वरूप)&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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{{हिन्दू धर्म}}&lt;br /&gt;
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		<title>सदस्य वार्ता:प्रिया</title>
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		<updated>2011-04-19T09:42:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: /* पन्ना देखें। */ नया विभाग&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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फ़ॉज़िया और शिल्पी के साथ आप भी नये पन्नों पर काम शुरू कर दें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आदित्य चौधरी]]&amp;lt;span style=&amp;quot;background:white; border:1px solid #a7d7f9; border-left:none; padding-left:5px; padding-right:5px;&amp;quot; &amp;gt; [[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;amp;nbsp;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:28, 30 अप्रॅल 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== शब्द संदर्भ ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया शब्द संदर्भ पन्नों को बनाना प्रारम्भ करें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आदित्य चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 09:17, 3 मई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
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== गुरु गोविंद सिंह  ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== साँचा:Panorama ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पन्ना जाचे ==&lt;br /&gt;
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कृपया [[प्रयोग:fozia2]] को जाचे। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:05, 15 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
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== ॠषिकेश ==&lt;br /&gt;
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कृपया [[प्रयोग:Shilpi2]], [[प्रयोग:Shilpi3]] में ॠषिकेश के पन्ने को जाँचें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:41, 18 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
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== नीलकंठ महादेव ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== साँचा:लेख सूची ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[साँचा:लेख सूची]] बना दिया गया है कृपा आप इस साँचे के उदाहरण के लिय [[उदयपुर]] का पन्ना देखें । जैसे कि उदयपुर के सम्बंधित लेख उदयपुर के पन्ने में लगा दियें गये है । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:53, 28 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[देहरादून]] के पेज को देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:43, 8 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:प्रतीक्षा ==&lt;br /&gt;
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कृपया [[साँचा:प्रतीक्षा]] को देखें ।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:20, 28 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[हीनयान]] का पेज देखें प्रिया जी हम आपके आभारी रहेंगे। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:27, 29 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[सावित्री देवी]] का पेज देखें प्रिया जी हम आपके आभारी रहेंगे। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:13, 30 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:लेख प्रगति ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[साँचा:लेख प्रगति]] में अब &amp;lt;nowiki&amp;gt;==पन्ने की प्रगति अवस्था==&amp;lt;/nowiki&amp;gt; heading ना लगायें वो heading साँचे में ही डाल दी गई है । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:11, 31 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कोलकाता और ब्रज ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वार्ता:कोलकाता]] और [[वार्ता:ब्रज]] पन्ने को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:05, 8 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया पन्ना देखें [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:34, 17 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिल्पी गोयल महमूद ख़ान का पेज बना रही हूँ।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:03, 28 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पड़वा ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पड़वा को '''प्रतिपदा''' कहते हैं [[चित्र:nib4.png|35px|top]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 19:50, 5 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==साँचा और श्रेणी==&lt;br /&gt;
व्रत और उत्सव वाले पन्नों में [[साँचा:व्रत और उत्सव]] लगाना है और [[:श्रेणी:संस्कृति कोश]] भी लगानी है।  जैसे- [[अम्बुवाची]] के पन्ने में देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:Govind Ram]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:Govind Ram|गोविंद राम]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:Govind Ram|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 20:23, 5 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:व्रत और उत्सव2 ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[साँचा:व्रत और उत्सव2]] को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:30, 10 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==शिवाजी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वार्ता:शिवाजी]] पन्ने को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:12, 12 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[लता मंगेशकर]], [[आशा भोंसले]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:07, 23 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज जाँचें	 ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास]] पेज जाँचें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:27, 26 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== रबीन्द्रनाथ ठाकुर ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== रबीन्द्रनाथ ठाकुर ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==2011==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==अपभ्रंश भाषा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== सूचना बक्सा ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिया जी [[इंदौर]] के पेज पर सूचना बक्सा लगायें। मैं उसके पर्यटन बनाती हूँ 10 जनवरी तक वो पेज तैयार करना है। ‍‍‍&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें व बनायें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रिया आप [[गोवा]] का पेज जाँचे।&lt;br /&gt;
*मेट्रो सिटीज के पेज बनाने है जैसे बेगलरू, हैदराबाद, पुणे इत्यादि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*जो पेज बनाये गये है उनकी जाँच।&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==व्यवस्था==&lt;br /&gt;
कृपया बतायें क्या नये पन्ने क्रमवार जाँचे जा रहे हैं? नहीं तो क्या व्यवस्था चल रही है?[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:14, 7 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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[[नाटी नृत्य]], [[लुड्डी नृत्य]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 09:58, 22 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[मेवाड़]] का पन्ना देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:51, 26 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==गणतंत्र दिवस==&lt;br /&gt;
भारतकोश परिवार की ओर से आपको गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:21, 26 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[ब्यावर]], ‎[[जालंधर]], ‎[[विशाखापत्तनम]], [[लुधियाना]], ‎[[हम्पी]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 10:55, 27 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[सदस्य:लक्ष्मी गोस्वामी/अभ्यास5 ]] एक बार देख लेना। वो आज ही लगना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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कृपया [[मुहम्मद हिदायतुल्लाह]] और [[लेह]] के पन्ने देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:14, 1 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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== पन्ना देखें। ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==पन्ने देखे ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[भारतीय थल सेना]] और [[भारतीय नौसेना]] के पन्ने देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:42, 4 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==सामान्य ज्ञान==&lt;br /&gt;
[[प्रयोग:Fozia5]] चैक हो गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पेज देखें। ==&lt;br /&gt;
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==सामान्य ज्ञान==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[शिवनेरी]] और [[बाजीराव प्रथम]] के पन्ने देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:09, 14 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
[[नरेन्द्र मण्डल]], [[जफ़र खाँ]], [[सत्यवान मुनि]], [[नंदकुमार]], [[पीस डैमिनगोस]], [[रंभा]], [[रंगलाल बनर्जी]] पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:लक्ष्मी गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:लक्ष्मी गोस्वामी|लक्ष्मी गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:लक्ष्मी गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:01, 15 अप्रॅल 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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== पन्ना देखें। ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>नागौर</title>
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		<updated>2011-04-18T13:19:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}{{tocright}}&lt;br /&gt;
नागौर [[राजस्थान]] राज्य, [[जयपुर]] से उत्तर-पश्चिम में स्थित है। यह क्षेत्र प्राकऐतिहासिक है, किंतु नागौर की प्रसिद्धि मध्ययुगीन है। सपादलक्ष अर्थात सांभर एवं नागौर चौहानों के मूल स्थान थे। &lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
[[भारत]] में तुर्को के आगमन के साथ ही नागौर उनकी शाक्ति का केन्द्र बन गया। नागौर महाराणा कुम्भा के अधीन भी रहा। पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में [[गुजरात]] के मुस्लिम शासकों की नागौर की राजनीति में दिलचस्पी रही। सन 1534 ई. में गुजरात के शासक [[बहादुरशाह द्वितीय]] ने नागौर पर थोड़े समय के लिए अधिकार कर लिया था। &lt;br /&gt;
सम्राट [[अकबर]] के समय में नागौर मुग़ल साम्राज्य का अंग था। 1570 ई. में अकबर ने नागौर में दरबार लगाया था, जिसमें अनेक राजपूत राजाओं ने अकबर से मिलकर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। &lt;br /&gt;
==प्रसिद्ध केन्द्र==&lt;br /&gt;
राजस्थान में [[अजमेर]] के बाद नागौर ही सूफी मत का प्रसिद्ध केन्द्र रहा। यहाँ पर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य शेख हमीदुद्दीन नागौरी (1192-1274 ई.) ने अपने गुरु के आदेशानुसार सूफी मत का प्रचार-प्रसार किया। यद्यपि इनका जन्म [[दिल्ली]] में हुआ था लेकिन इनका अधिकांश समय नागौर में ही बीता। इन्होंने अपना जीवन एक आत्मनिर्भर किसान की तरह गुजारा और नागौर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थिति सुवाल नामक गाँव में खेती की। वे पूर्णतः शाकाहारी थे एवं अपने शिष्यों से भी शाकाहारी रहने को कहते थे। इनकी गरीबी को देखकर नागौर के प्रशासक ने इन्हें कुछ नकद एवं ज़मीन देने की पेशकश की, जिसको इन्होंने अस्वीकार कर दिया। &lt;br /&gt;
==गुम्बद का निर्माण==&lt;br /&gt;
हमीदुद्दीन नागौरी समंवयवादी थे इन्होंने भारतीय वातावरण के अनुरूप सूफी आन्दोलन को आगे को आगे बढ़ाया। नागौर में चिश्ती सम्प्रदाय के इस सूफी संत की मजार आज भी याद दिला रही है। इस मजार पर [[मुहम्मद बिन तुग़लक़]] ने एक गुम्बद का निर्माण करवाया था जो 1330 ई. में बनकर पूर्ण हुआ। &lt;br /&gt;
==सम्प्रदाय का केन्द्र==&lt;br /&gt;
नागौर को सूफी मत के केन्द्र के रूप में पुनर्स्थापित करने की दिशा में यहाँ के सूफी संत ख्वाजा मखदूम हुसैन नागौरी (15वीं शताब्दी) का नाम उल्लेखनीय है। 16 वीं शताब्दी में नागौर में राजपूत शाक्ति के उदय के बावजूद भी नागौर सूफी सम्प्रदाय का केन्द्र बना रहा। अकबर के दरबारी शेख मुबारक के पिता एवं [[अबुल फ़जल]] के दादा शेख खिज्र नागौर में ही आकर बस गये थे। &lt;br /&gt;
नागौर की प्राचीन इमारतों में अतारिकिन का विशाल दरवाजा प्रसिद्ध है, जिसे 1230 ई. में [[इल्तुतमिश]] ने बनवाया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0&amp;diff=153328</id>
		<title>नागौर</title>
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		<updated>2011-04-18T13:16:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: '{{पुनरीक्षण}}{{tocright}} नागौर राजस्थान का एक ज़िला, जो [[जय...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}{{tocright}}&lt;br /&gt;
नागौर [[राजस्थान]] का एक ज़िला, जो [[जयपुर]] से उत्तर-पश्चिम में स्थित है। यह क्षेत्र प्राकऐतिहासिक है, किंतु नागौर की प्रसिद्धि मध्ययुगीन है। सपादलक्ष अर्थात सांभर एवं नागौर चौहानों के मूल स्थान थे। &lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
[[भारत]] में तुर्को के आगमन के साथ ही नागौर उनकी शाक्ति का केन्द्र बन गया। नागौर महाराणा कुम्भा के अधीन भी रहा। पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में [[गुजरात]] के मुस्लिम शासकों की नागौर की राजनीति में दिलचस्पी रही। सन 1534 ई. में गुजरात के शासक [[बहादुरशाह द्वितीय]] ने नागौर पर थोड़े समय के लिए अधिकार कर लिया था। &lt;br /&gt;
सम्राट [[अकबर]] के समय में नागौर मुग़ल साम्राज्य का अंग था। 1570 ई. में अकबर ने नागौर में दरबार लगाया था, जिसमें अनेक राजपूत राजाओं ने अकबर से मिलकर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;प्रसिद्ध केन्द्र&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
राजस्थान में [[अजमेर]] के बाद नागौर ही सूफी मत का प्रसिद्ध केन्द्र रहा। यहाँ पर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य शेख हमीदुद्दीन नागौरी (1192-1274 ई.) ने अपने गुरु के आदेशानुसार सूफी मत का प्रचार-प्रसार किया। यद्यपि इनका जन्म [[दिल्ली]] में हुआ था लेकिन इनका अधिकांश समय नागौर में ही बीता। इन्होंने अपना जीवन एक आत्मनिर्भर किसान की तरह गुजारा और नागौर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थिति सुवाल नामक गाँव में खेती की। वे पूर्णतः शाकाहारी थे एवं अपने शिष्यों से भी शाकाहारी रहने को कहते थे। इनकी गरीबी को देखकर नागौर के प्रशासक ने इन्हें कुछ नकद एवं ज़मीन देने की पेशकश की, जिसको इन्होंने अस्वीकार कर दिया। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;गुम्बद का निर्माण&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
हमीदुद्दीन नागौरी समंवयवादी थे इन्होंने भारतीय वातावरण के अनुरूप सूफी आन्दोलन को आगे को आगे बढ़ाया। नागौर में चिश्ती सम्प्रदाय के इस सूफी संत की मजार आज भी याद दिला रही है। इस मजार पर [[मुहम्मद बिन तुग़लक़]] ने एक गुम्बद का निर्माण करवाया था जो 1330 ई. में बनकर पूर्ण हुआ। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सम्प्रदाय का केन्द्र&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
नागौर को सूफी मत के केन्द्र के रूप में पुनर्स्थापित करने की दिशा में यहाँ के सूफी संत ख्वाजा मखदूम हुसैन नागौरी (15वीं शताब्दी) का नाम उल्लेखनीय है। 16 वीं शताब्दी में नागौर में राजपूत शाक्ति के उदय के बावजूद भी नागौर सूफी सम्प्रदाय का केन्द्र बना रहा। अकबर के दरबारी शेख मुबारक के पिता एवं [[अबुल फ़जल]] के दादा शेख खिज्र नागौर में ही आकर बस गये थे। &lt;br /&gt;
नागौर की प्राचीन इमारतों में अतारिकिन का विशाल दरवाजा प्रसिद्ध है, जिसे 1230 ई. में [[इल्तुतमिश]] ने बनवाया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>परखम</title>
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		<updated>2011-04-16T10:39:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:yaksha-1.jpg|यक्ष&amp;lt;br /&amp;gt;Yaksha&amp;lt;br /&amp;gt;[[मथुरा संग्रहालय|राजकीय संग्रहालय]], [[मथुरा]]|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से [[यक्ष]] की एक विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी, जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे [[आभूषण|गहने]], जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] [[ब्राह्मी लिपि]] में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है, जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह मौर्यकालीन है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर [[मूर्ति कला मथुरा|मथुरा मूर्ति-कला]] की परम्परा में [[शुंग वंश|शुंगकाल]] में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पद्मावती (स्थान)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80_(%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8)&amp;diff=152588"/>
		<updated>2011-04-16T10:25:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[मध्य प्रदेश]] के [[ग्वालियर]] के समीप वर्तमान पद्मपवैया नामक स्थान ही प्राचीन काल का पद्मावती नगर था। &lt;br /&gt;
*कुछ विद्वानों के अनुसार यह नगर [[विदर्भ]] में [[सिन्धु नदी|सिन्धु]] एवं पारा (पार्वती) नामक दो नदियों के संगम पर स्थित था। &lt;br /&gt;
*इसकी पहचान आधुनिक [[विजयनगर साम्राज्य|विजयनगर]] से की गई है, जो नलपुर या [[नरवर]] से 25 मील आगे विद्यानगर का एक भ्रष्ट रूप है। &lt;br /&gt;
*[[भवभूति]] ने (मालवी माधव, प्रथम अंक में) इस नगरी के सौंदर्य तथा वैभव विलास का वर्णन किया है। &lt;br /&gt;
*इस स्थान को उनकी जन्मस्थली माना जाता *यह भवन कई खण्डों का था। &lt;br /&gt;
*यह भवन राजप्रासाद प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;
*गुप्त सम्राट [[समुद्रगुप्त]] की प्रयाग-प्रशास्ति में राजा गणपति नाग का उल्लेख है, जिसे समुद्रगुप्त ने हराकर अपने अधीन कर लिया था। &lt;br /&gt;
*विसेंट स्मिथ के अनुसार पद्मावती गणपतिनाग की राजधानी थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*पद्मावती तृतीय-चतुर्थ शती में नाग राजाओं की राजधानी थी। &lt;br /&gt;
*यहाँ के लोग [[शिव]] के अनन्य भक्त थे, वे अपने कन्धों पर शिवलिंग वहन करते थे, अतः उन्हें भारशिव कहा गया। &lt;br /&gt;
*नाग राजाओं के अनेक सिक्के यहाँ से प्राप्त हुए हैं तथा प्रथम शताब्दी से आठवीं शताब्दी तक के अनेक ऐतिहासिक अवशेष भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें प्रमुख अवशेष ईंटों से बना एक विशाल भवन है। &lt;br /&gt;
*यह भवन कई खण्डों का था। &lt;br /&gt;
*यह भवन राजप्रासाद प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;
*भारत में इस स्थान के अतिरिक्त केवल [[अहिच्छत्र]] में ही इस प्रकार के विशालकाय भवनों के अवशेष मिले हैं।&lt;br /&gt;
*लगता है कि ये भवन नाग वास्तुकला के उदाहरण हैं, क्योंकि दोनों ही स्थानों पर नाग नरेशों का आधिपत्य था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>सदस्य वार्ता:रेणु</title>
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		<updated>2011-04-16T08:56:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: /* पन्ना देखें। */ नया विभाग&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__NOTOC__&lt;br /&gt;
कृपया [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर]] के पन्ने को बेहतर करें इस संबंध में आशा जी से भी संपर्क करें [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आदित्य चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 09:15, 3 मई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया बीदर के पेज़ में वन नोट में रवीन्द्र की टाइपिंग का मैटर भी जोड़ें[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:57, 29 मई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बालकाण्ड ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[भागीरथी नदी]] के पेज में बाल॰ का मतलब ढ़ूंढे। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:57, 15 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भागीरथी नदी ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[भागीरथी नदी]] के पेज को देखे। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:33, 15 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उत्तराखंड की झीलें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[उत्तराखंड की झीलें]] पेज देखे। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:03, 16 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== नीलकंठ महादेव ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==जवाहरलाल नेहरू ==&lt;br /&gt;
कृपया जवाहरलाल नेहरू पृष्ठ में प्रतापगढ़ जिला जाँचें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:लेख सूची ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[साँचा:लेख सूची]] बना दिया गया है कृपा आप इस साँचे के उदाहरण के लिय [[उदयपुर]] का पन्ना देखें । जैसे कि उदयपुर के सम्बंधित लेख उदयपुर के पन्ने में लगा दियें गये है । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:56, 28 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
*कृपया कोलकाता की नगर योजना दोबारा देखें[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 19:26, 30 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[देहरादून]] के पेज को देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:43, 8 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== वारंगल आन्ध्र प्रदेश और वेल्लूर चेन्नई का पेज ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देख लिए इन पन्नों को अपनी ध्यान सूची में डाल कर रखें। जिससे बाद में पाठ बढ़ा सकें। [[चित्र:nib4.png|35px|top]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:17, 25 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:प्रतीक्षा ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[साँचा:प्रतीक्षा]] को देखें ।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:20, 28 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:लेख प्रगति ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[साँचा:लेख प्रगति]] में अब &amp;lt;nowiki&amp;gt;==पन्ने की प्रगति अवस्था==&amp;lt;/nowiki&amp;gt; heading ना लगायें वो heading साँचे में ही डाल दी गई है । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:12, 31 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कोलकाता और ब्रज ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वार्ता:कोलकाता]] और [[वार्ता:ब्रज]] पन्ने को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:09, 8 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==मूल मात्रक==&lt;br /&gt;
Table, SI पद्धति में मूल मात्रक [[प्रयोग:Govind]] में। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:Govind Ram]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:Govind Ram|गोविंद राम]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:Govind Ram|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:51, 8 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं बहादुर शाह ज़फ़र का पेज बना रही हूँ। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:52, 20 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बहा उल्ला ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
में बहा उल्ला का पेज बना रही हूँ। कृपया बताइए कि पेज इसी नाम से बनेगा।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:प्रिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:प्रिया|प्रियंका चतुर्वेदी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:प्रिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:16, 20 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:व्रत और उत्सव2 ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[साँचा:व्रत और उत्सव2]] को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:32, 10 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==शिवाजी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वार्ता:शिवाजी]] पन्ने को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:36, 12 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[लता मंगेशकर]], [[आशा भोंसले]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:07, 23 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हरिवंश राय बच्चन==&lt;br /&gt;
कृपया हरिवंश राय बच्चन के पेज को देखें उसमें काफी ग़लतियाँ हैं। &amp;lt;big&amp;gt;'मधुशाला', 'मधुशाला' और 'मधुकलश'-एक के बाद एक&amp;lt;/big&amp;gt; [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:51, 22 नवंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==2011==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नववर्ष आपके लिए मंगलमय हो। शुभकामनाएँ...[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:13, 1 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==पेज देखें==&lt;br /&gt;
कृपया [[सदस्य:शिल्पी गोयल]] देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:04, 7 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==व्यवस्था==&lt;br /&gt;
कृपया बतायें क्या नये पन्ने क्रमवार जाँचे जा रहे हैं? नहीं तो क्या व्यवस्था चल रही है?[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:17, 7 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ने देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[क्षार धातु]], [[लेन्थेनाइड]], [[ऐक्टिनाइड]], [[संक्रमण धातु]], [[हैलोजन]] और [[क्षारीय पार्थिव धातु]] के पन्ने देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:47, 10 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[अर्थशास्त्र सामान्य ज्ञान 4]], [[अर्थशास्त्र सामान्य ज्ञान 5]] देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:00, 10 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ने देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[समूह (आवर्त सारणी)]] और [[अवधि (आवर्त सारणी)]] के पन्ने देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 20:33, 10 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==1 अक्टूबर==&lt;br /&gt;
मजरुँ सुल्तानपुरी, सही शब्द 'मजरुह' है। कृपया मजरुँ सुल्तानपुरी से प्रेक्षित कर मुख्य पन्ना 'मजरुह सुल्तानपुरी' के नाम से बनायें[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 04:47, 11 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेणु दीदी। कृपया इन पन्नों को देखें।&lt;br /&gt;
*[[क्षिप्र]], [[क्षिप्रकारी]], [[गुरु अंगद देव]], [[अग्रमहिषी]], [[अकाल संहिता]], [[अकाल आयोग]], [[अकबर द्वितीय]], [[नज़ीबाबाद]], [[नचना कुठार]], [[नरवर]], [[नवद्वीप]], [[रस]] [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:प्रिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:प्रिया|प्रियंका चतुर्वेदी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:प्रिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:09, 13 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सिंह==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिंह का बहुविकल्पी शब्द बनना चाहिए- सिंह राशि और जंगल का राजा शेर या जंतु, वार्ता कर लें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 03:24, 14 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[भारतीय प्रशासनिक सेवा]], [[सिपाही स्वतंत्रता संग्राम]], [[~]] का पेज देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:01, 16 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखे ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[भुज]] का पन्ना देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:08, 17 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें	 ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[प्रयोग:Shilpi2]] में भूगोल सामान्य ज्ञान एक बार देख लीजिए। इसके अलावा [[गुवाहाटी]], [[कोणार्क]], [[गांधीनगर]], [[विशाखापत्तनम]], [[~]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 09:59, 22 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[राष्ट्रीय बालिका दिवस]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:14, 24 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==गणतंत्र दिवस==&lt;br /&gt;
भारतकोश परिवार की ओर से आपको गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:21, 26 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[ब्यावर]], ‎[[जालंधर]], ‎[[विशाखापत्तनम]], [[लुधियाना]], ‎[[हम्पी]], [[नाटी नृत्य]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 10:55, 27 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कृपया [[जूनागढ़]], [[मेवाड़]], [[भावनगर]], [[इटावा]], [[काठियावाड़]], [[रायपुर]], [[कोहिमा]], [[शिमला]], [[मनाली हिमाचल प्रदेश|मनाली]], [[बीबी का मक़बरा]] के पन्ने देखें।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
*[[चित्रकला]] और चित्रकला के संबंधित लेख भी देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 10:58, 27 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==पन्ना देखें==&lt;br /&gt;
रेणु दीदी! कृपया इन पन्नों को देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[प्राचीन भारत लेखन सामग्री]]&lt;br /&gt;
*[[पाषाणीय शिलालेख (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[ईंट (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[स्वर्ण (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[रजत (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[काष्ठ (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[कपड़ा (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[धातु (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[ताड़पत्र (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[भूर्जपत्र (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[अगरुपत्र (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[काग़ज़]]&lt;br /&gt;
*[[कलम (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[स्याही (लेखन सामग्री)]]&lt;br /&gt;
*[[रसगुल्ला]]&lt;br /&gt;
*[[पायल]]&lt;br /&gt;
*[[चूड़ी]]&lt;br /&gt;
*[[लूनी नदी]]&lt;br /&gt;
*[[पोर्ट ब्लेयर]]&lt;br /&gt;
*[[इम्फाल]]&lt;br /&gt;
*[[आईजोल]]&lt;br /&gt;
*[[गंगटोक]]&lt;br /&gt;
*[[तिरुपति]]&lt;br /&gt;
*[[पुरी]]&lt;br /&gt;
*[[कुल्लू]]&lt;br /&gt;
*[[रणथम्भौर]][[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:प्रिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:प्रिया|प्रियंका चतुर्वेदी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:प्रिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:45, 27 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[प्रयोग:Shilpi2]] देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:14, 27 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[प्रयोग:Fozia4]] में विज्ञान सामान्य ज्ञान का पन्ना देखे लीजिए। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:30, 27 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ने देखें  ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेणु दीदी! कृपया इन पन्नों को देखें। &lt;br /&gt;
*[[भारतीय पुरालिपियों का अन्वेषण]]&lt;br /&gt;
*[[वट्टेळुत्तु लिपि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[तमिल लिपि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[ग्रन्थ लिपि]]&lt;br /&gt;
*[[कन्नड़ एवं तेलुगु लिपि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[बांग्ला लिपि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[कलिंग लिपि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[शारदा लिपि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[चार्वी]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[अगह]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[अंगद]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[काशी हिन्दू विश्वविद्यालय]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:प्रिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:प्रिया|प्रियंका चतुर्वेदी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:प्रिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:29, 2 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें  ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया आप [[मूली]] का पन्ना देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[मुहम्मद हिदायतुल्लाह]] और [[लेह]] का पन्ना देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:25, 2 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[गेहूँ]] और [[तरबूज़]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:लक्ष्मी गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:लक्ष्मी गोस्वामी|लक्ष्मी गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:लक्ष्मी गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:35, 2 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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कृपया [[तेंदुआ]] और [[जालौर]] का पन्ना देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिना गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:हिना गोस्वामी|हिना गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिना गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:38, 2 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेणु दीदी कृपया पन्ने देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[प्रणव]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[प्रणववाद]]&lt;br /&gt;
*[[पंचर्विश ब्राह्मण]]&lt;br /&gt;
*[[प्रजापति]]&lt;br /&gt;
*[[पंक्तिदूषण ब्राह्मण]]&lt;br /&gt;
*[[पंक्तिपावन ब्राह्मण]]&lt;br /&gt;
*[[पंजासाहब]]&lt;br /&gt;
*[[पण्ढरपुर]]&lt;br /&gt;
*[[पम्पासर]]&lt;br /&gt;
*[[उद्वाह]]&lt;br /&gt;
*[[उत्तराडो साधु]]&lt;br /&gt;
*[[उदककर्म]]&lt;br /&gt;
*[[और्वशेय]]&lt;br /&gt;
*[[और्व]][[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:प्रिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:प्रिया|प्रियंका चतुर्वेदी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:प्रिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:08, 5 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया आप [[विजय वाड़ा]] [[ईसवाल उदयपुर]] [[चोपनी माण्डो]] [[सालीम अली]] [[संकिसा]] [[सम्भल]] ये पेंज देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिना गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:हिना गोस्वामी|हिना गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिना गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:56, 6 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[सिंघी छम नृत्य]], [[झमाकड़ा नृत्य]], [[घुरई नृत्य]], [[लाल बाग़ महल इन्दौर]], [[कुट्टी अट्टम नृत्य]], [[कूडियाट्टम नृत्य]], [[ओट्टनतुल्ललू नृत्य]], [[चाक्यारकूंतु नृत्य]], [[चावल]] के पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:26, 7 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[संगीत]], [[वाद्य यंत्र]], [[भारतीय सेना]], [[भारतीय थल सेना]], [[भारतीय नौसेना]] और [[भारतीय वायु सेना]] के पन्ने देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:48, 9 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[रामनरेश त्रिपाठी]], [[विदेशिया नृत्य]], [[पण्डवानी नृत्य]], [[घूमर नृत्य]], [[रउफ नृत्य]], [[गडबा नृत्य]], [[दावलेश्वरम]], [[दिंडिगल]], [[वड़ोदरा]], [[सिन्धु सभ्यता लिपि]], [[चावल]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:06, 10 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया आप [[बरोर|बरोर]] [[तालीकोटा|तालीकोटा]] [[ तुग़लकाबाद| तुग़लकाबाद]] [[छाछ|छाछ]] का पन्ना देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिना गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:हिना गोस्वामी|हिना गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिना गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:17, 10 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[इन्दौर पर्यटन]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 10:30, 15 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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कृपया आप [[भरहुत]], [[वेंगुरला]], [[वैकटपुर]], [[रत्नागिरि]], [[बाडोली]], [[वैजयंती]], [[बागोर]], [[दभोल]], [[गंगैकोंडचोलपुरम]], [[क्लोरीन]], [[अमोनिया]], [[चाँदी]], [[लोहा]], [[एल्युमिनियम]], [[ताम्र]], के पेज देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिना गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:हिना गोस्वामी|हिना गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिना गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:44, 18 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[राहुल सांकृत्यायन]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:37, 20 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[रावी, रामप्रसाद विद्यार्थी]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:52, 21 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया आप [[बरन]], [[भट्टिप्रोलू]], [[ब्रह्मगिरि]], [[ब्रह्मपुर]] के पेज देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिना गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:हिना गोस्वामी|हिना गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिना गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:00, 22 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया आप [[चन्द्रकेतुगढ़]], [[जोगलथेम्बी]], [[चन्दवार]], [[टेक्कलकोट]] के पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिना गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:हिना गोस्वामी|हिना गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिना गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:43, 25 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया आप [[हलेबिड]], [[भाब्रू]], [[लंगुड़ी]], के पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिना गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:हिना गोस्वामी|हिना गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिना गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:01, 28 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[वृंदावनलाल वर्मा]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:20, 2 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें  ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[लाड मलिका]], [[ला बोर्दने]], [[बिहारीमल]], [[बीबीगढ़]], [[कृष्णदास कविराज]], [[कृष्णदास कविराज]], [[बसई]], [[गुरुकुल जीवन]], [[बर्मी युद्ध]], [[विंध्‍याचल मंदिर वाराणसी]], [[सीता मंदिर वाराणसी]], [[भैरव मंदिर वाराणसी]], [[विष्‍णु चरणपादुका वाराणसी]], [[काशी विशालाक्षी मंदिर वाराणसी]], [[केदारेश्‍वर मंदिर वाराणसी]], [[साक्षी गणेश मंदिर वाराणसी]], [[अन्‍नपूर्णा मंदिर वाराणसी]], [[दूध का कर्ज मंदिर वाराणसी]] इन पन्नों को देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:प्रिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:प्रिया|प्रियंका चतुर्वेदी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:प्रिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:11, 4 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[गंधक]], [[मानव शरीर]], [[चित्तरंजन दास]], [[अनवरुद्दीन]], [[ब्रिगेडियर नील जेम्स]], [[अकबर हैदरी]], [[डॉक्टर अंसारी]], [[शाहजादा अजीमुश्शान]], [[अजीमुद्दौला]], [[अकविवा, फादर रिदांल्फ़ो]], [[अजीम उल्ला ख़ाँ]], [[अज़ारी शेख]], [[अकाल प्रतिवेदन]], [[अकाल]], [[अपोलोडोटस]], [[अनुरुद्ध]], [[अंत्तिकिन]], [[अंकोरवाट]], [[शाहजादा अकबर]] के पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:12, 8 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
[[कोलार]], [[खेड़ा]], [[कुचाई]], [[वामदेव (ऋषि)]], [[अजा]], [[अनंत व्रत]], [[पुरुषार्थ]], [[कामव्रत]], [[कुरुख भाषा]], [[मंकणक मुनि]],[[पंचमढ़ी]], [[श्रीरामपुर]], [[श्रीरंगम]], [[भंवर]], [[भवभूति]] पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:लक्ष्मी गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:लक्ष्मी गोस्वामी|लक्ष्मी गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:लक्ष्मी गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:08, 8 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==पेज देखें==&lt;br /&gt;
कृपया [[भीष्म साहनी]], [[क़ुरआन]], [[अम्बष्ठ]], [[आजीवक]], [[अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस]], [[लालकोट]], [[बालकृष्ण शर्मा नवीन]], [[ख़ूनी दरवाज़ा]], [[अराकान]], [[अनाई शिखर]], [[मलय]], [[भगवतीचरण वर्मा]], [[फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम]], [[यशपाल]], [[इंशा अल्ला खाँ]], [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] इन पन्नों को देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:प्रिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:प्रिया|प्रियंका चतुर्वेदी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:प्रिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:08, 9 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
[[डंडास हेनरी]], [[डंकन जोनाथन]], [[दाहिर]], [[दलीप सिंह]], [[एल्युमिनियम]], [[गंधक]] के पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:39, 14 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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कृपया [[ग़ज़नी ]], [[दुर्गावती]], [[पोर्टो नोवो युद्ध]], [[गंडमक की संधि]], [[काउंत डी एक]], [[मार्टीमेर डुरंड]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिमानी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:हिमानी|हिमानी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिमानी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:50, 8 अप्रॅल 2011 (IST)  ‎ ‎ ‎&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[हज]], [[सुन्नी]], [[सिंह]], [[हारमोनियम]], [[मुहम्मद अली जिन्ना]], [[सप्तक]], [[मध्य सप्तक]], [[मन्द्र सप्तक]], [[तार सप्तक]], [[स्वर (संगीत)]], [[शुद्ध स्वर]], [[शुद्ध तीव्र स्वर]], [[ठाट]], [[राग]] के पन्नों को देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:31, 9 अप्रॅल 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[सासाराम]], [[जुन्नर]], के पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:पायल ]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:पायल |पायल ]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:पायल |वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:44, 9 अप्रॅल 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
कृपया [[गहड़वाल वंश]], [[ग़ज़नी ]], [[दुर्गावती]], [[पोर्टो नोवो युद्ध]], [[गंडमक की संधि]], [[काउंत डी एक]], [[मार्टीमेर डुरंड]], [[गिरमिट प्रथा]], [[गाज़ीउद्दीन इमामुलमुल्क]] देखें व उसे बनायें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:37, 11 अप्रॅल 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पन्ना देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया आप [[पत्तनम]], [[परखम]], [[नाल]], [[पद्मावती]], [[पडरी]], [[पनगोरारिया]], [[नानाघाट]], [[नवदाटोली]], [[चौसा]], [[चिरांद]], [[जाजनगर]], [[गुफकराल]], [[गुजर्रा]], [[गिलूंड]], [[गिहलौट]], [[कोरकाई]], [[कायल]], [[खैराडीह]], [[खोह]], [[कुवांशी]], [[जुन्नर]], [[शिवनेरी]], [[कौलवी]], [[केसरपल्ली]], [[केशवरायपाटन]], [[बिलहरी]], [[आदिचनल्लूर]], [[पद्मदुर्ग]], के पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:पायल ]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:पायल |पायल ]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:पायल |वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:26, 16 अप्रॅल 2011 (IST)&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>केसरपल्ली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=152524"/>
		<updated>2011-04-16T08:21:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*केसरपल्ली [[आन्ध्र प्रदेश]] के कृष्णा ज़िलांतर्गत [[मद्रास]]-[[कलकत्ता]] ट्रंक रोड पर [[विजयवाड़ा]] से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। &lt;br /&gt;
*यहाँ ताम्र-पाषाण, [[संस्कृति]] के साथ आबादी शुरु हुई जिसके बाद महाश्भ संस्कृति का आगमन हुआ। &lt;br /&gt;
*इसका ऐतिहासिक काल दांतेदार चक्रित मृद्भाण्ड (रौलटेड वेयर) की उपलब्धि के साथ आरम्भ होता है जिससे रोम के प्रभाव का संकेत मिलता है। &lt;br /&gt;
*यह मृद्भाण्ड अत्यंत मूल्यवान समझा गया, क्योंकि ऊपरी सतह से प्राप्त इसका एक ठीकरा [[लोहा|लोहे]] के पिनों से बंधा था। &lt;br /&gt;
*इस स्थल के उत्खनन में [[इक्ष्वाकु|इक्ष्वाकुओं]] के समय के [[सीसा|सीसे]] के सिक्के तथा शीशे, पत्थर और मिट्टी के मनके मिले हैं। &lt;br /&gt;
*ऐसा अनुमान है कि चौथी शताब्दी के मध्य यह स्थान निर्जन हो गया। &lt;br /&gt;
*सम्भवतः मध्यकाल में पुनः आबाद हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A5%80&amp;diff=152523</id>
		<title>कौलवी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A5%80&amp;diff=152523"/>
		<updated>2011-04-16T08:21:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*कौलवी [[राजस्थान]] के झालावाड़ ज़िले के निकट एक ग्राम के रूप में विद्यमान है,जो बौद्ध विहार के लिए प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
*इन विहारों के निर्माण काल के बारे में मतैक्य नहीं है। &lt;br /&gt;
*सम्भवतः इनका निर्माण काल [[विक्रम सम्वत]] 500 से 700 के मध्य माना गया है। &lt;br /&gt;
*कौलवी की गुफ़ाएँ पहाड़ी पर स्थित हैं। &lt;br /&gt;
*पहाड़ी पर जाने के लिए चट्टानें काटकर सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ पर एक दैत्याकार चट्टान को काटकर गुम्बद बनाया गया है, जिसके नीचे तराशी हुई प्रतिमा उत्कीर्ण की गई है। &lt;br /&gt;
*इस प्रतिमा का [[मस्तिष्क|मस्तक]] नहीं हैं। &lt;br /&gt;
*पास में चट्टान काटकर ही दो स्तम्भों पर एक छोटा-सा मण्डप स्थापित किया गया है। &lt;br /&gt;
*द्वार से प्रविष्ट होते समय बायीं ओर लगभग छः फुट लम्बा, चार फुट ऊँचा, ढाई फुट चौड़ा दीवार से सटा हुआ एक चबूतरा बना हुआ है। &lt;br /&gt;
*यहाँ मिले मन्दिर के गर्भगृह में एक पद्मासन प्रतिमा उत्कीर्ण की गई है, जिसके मस्तक के अतिरिक्त मुँह, [[कान]], [[नाक]] आदि का पता नहीं लगता। &lt;br /&gt;
*मुद्रा से यह भगवान [[बुद्ध]] की प्रतिमा लगती है। &lt;br /&gt;
*एक शिलाखण्ड को गुम्बदाकार मन्दिर की तरह तराशा गया है और उसमें एक बुद्ध प्रतिमा उत्कीर्ण की गई प्रतीत होती है, जो पद्मासीन है और अन्य प्रतिमाओं की भाँति अस्पष्ट है। &lt;br /&gt;
*पास में एक अन्य शिलाखण्ड को काटकर 35-40 स्तम्भ तराशे गये हैं। &lt;br /&gt;
*इस विहार के बारे में अभी यह निश्चित नहीं किया गया है कि इसका निर्माण किस [[धर्म]] के लोगों ने किया था। &lt;br /&gt;
*कौलवी स्थान से अब तक प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर इन्हें [[बौद्ध धर्म]] की तांत्रिक शाखा द्वारा निर्मित माना गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>कौलवी</title>
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		<updated>2011-04-16T08:16:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*कौलवी [[राजस्थान]] के झालावाड़ ज़िले के निकट एक ग्राम के रूप में विद्यमान है,जो बौद्ध विहार के लिए प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
*इन विहारों के निर्माण काल के बारे में मतैक्य नहीं है। &lt;br /&gt;
*सम्भवतः इनका निर्माण काल [[विक्रम सम्वत]] 500 से 700 के मध्य माना गया है। &lt;br /&gt;
*कौलवी की गुफ़ाएँ पहाड़ी पर स्थित हैं। &lt;br /&gt;
*पहाड़ी पर जाने के लिए चट्टानें काटकर सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ पर एक दैत्याकार चट्टान को काटकर गुम्बद बनाया गया है, जिसके नीचे तराशी हुई प्रतिमा उत्कीर्ण की गई है। &lt;br /&gt;
*इस प्रतिमा का [[मस्तिष्क|मस्तक]] नहीं हैं। &lt;br /&gt;
*पास में चट्टान काटकर ही दो स्तम्भों पर एक छोटा-सा मण्डप स्थापित किया गया है। &lt;br /&gt;
*द्वार से प्रविष्ट होते समय बायीं ओर लगभग छः फुट लम्बा, चार फुट ऊँचा, ढाई फुट चौड़ा दीवार से सटा हुआ एक चबूतरा बना हुआ है। &lt;br /&gt;
*यहाँ मिले मन्दिर के गर्भगृह में एक पद्मासन प्रतिमा उत्कीर्ण की गई है, जिसके मस्तक के अतिरिक्त मुँह, [[कान]], [[नाक]] आदि का पता नहीं लगता। &lt;br /&gt;
*मुद्रा से यह भगवान [[बुद्ध]] की प्रतिमा लगती है। &lt;br /&gt;
*एक शिलाखण्ड को गुम्बदाकार मन्दिर की तरह तराशा गया है और उसमें एक बुद्ध प्रतिमा उत्कीर्ण की गई प्रतीत होती है, जो पद्मासीन है और अन्य प्रतिमाओं की भाँति अस्पष्ट है। &lt;br /&gt;
*पास में एक अन्य शिलाखण्ड को काटकर 35-40 स्तम्भ तराशे गये हैं। &lt;br /&gt;
*इस विहार के बारे में अभी यह निश्चित नहीं किया गया है कि इसका निर्माण किस [[धर्म]] के लोगों ने किया था। &lt;br /&gt;
*कौलवी स्थान से अब तक प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर इन्हें [[बौद्ध धर्म]] की तांत्रिक शाखा द्वारा निर्मित माना गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>केशवरायपाटन</title>
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		<updated>2011-04-16T08:15:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
केशवरायपाटन प्राचीन नगर [[राजस्थान]] के कोटा शहर से 22 किलोमीटर दूर [[चम्बल नदी]] के तट पर अवस्थित है। वर्तमान पाटन ही प्राचीन आश्रम पट्टन है। &lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
कुछ प्राचीन मतों के अनुसार चन्द्रवंशी राजा हस्ती (जिन्होंने [[हस्तिनापुर]] बसाया) के चचेरे भाई रितदेव ने इसे बसाया था। यहाँ [[पाण्डव|पाण्डवों]] के द्वारा अज्ञातवास में कुछ समय शरण लेने का उल्लेख भी मिला है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वास्तुकला&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
हम्मीर महाकाव्य से ज्ञात होता है कि [[रणथम्भौर]] के [[चौहान वंश|चौहान]] राजा जेत्रसिंह वृद्धावस्था में अपने पुत्र हम्मीर को राज्य देकर पत्नी सहित यहाँ मंदिर की पूजा हेतु आये थे। यहाँ के प्राचीन मंदिर के गिर जाने पर [[बूँदी]] नरेश राजा शत्रुसाल हाड़ा ने एक बड़ा मंदिर 1641 ई. में फिर बनवाया था। इस मंदिर में केशवराय ([[विष्णु]]) की चतुर्भुजी सफ़ेद पाषाण की मूर्ति प्रतिष्ठित है, जिसको शत्रुसाल [[मथुरा]] से लाये थे। यह मंदिर वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;धार्मिक स्थल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
पत्थर की बारीक कटाई, तक्षणकला का श्रेष्ठ नमूना मण्डोवर व शिखर पर उकेरी आकृतियाँ मनमोहक हैं। मंदिर के गर्भगृह में, बड़ी संख्या में मंदिर से भी प्राचीन प्रतिमाओं का संकलन है। इसकी बाहरी दीवारों पर प्राचीन प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। यह चम्बल नदी का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। यहाँ [[कार्तिक|कार्तिक माह]] में प्रसिद्ध मेला लगता है। केशवराय का यह मंदिर बाहर से देखने पर अलौकिक दिखाई देता है। मंदिर निर्माण की शैली उत्कृष्ट एवं तक्षण कला बेजोड़ है। यहाँ राजराजेश्वर मंदिर (शैव) भी प्राचीनकालीन महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;चमत्कारिक शिला&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
इस नगर में [[जैन]] मुनि सुव्रतनाथ की 2500 वर्ष प्राचीन एक चमत्कारिक प्रतिमा है, जो सम्वत 336 में प्रतिष्ठित की गई थी। यह एक शिला फलक पर है। इसकी पॉलिश [[मौर्य]] व मध्यवर्ती [[कुषाण काल]] की सिद्ध होती है। इसके आलावा यहाँ तेरहवीं शताब्दी की और भी प्रतिमायें हैं। यह मंदिर भूमिदेवरा नामक जैन मंदिर भी कहलाता है। इसमें स्थित मूर्ति को [[मोहम्मद गौरी]] द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया था। जिसकी पुष्टि कर्नल टॉड, दशरथ शर्मा इत्यादि विद्वान करते हैं। एक अन्य श्वेत शिला फलक पर पद्मप्रभु की खड़गासन मूर्ति है, जो मूर्तिकला की दृष्टि से बहुत आकर्षक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%B9&amp;diff=152511</id>
		<title>खोह</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%B9&amp;diff=152511"/>
		<updated>2011-04-16T08:11:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*खोह [[मध्य प्रदेश]] में नागदा के निकट स्थित है। &lt;br /&gt;
*इस स्थान से गुप्तकालीन ताम्रपत्रों, दानपत्रों पर लिखे अभिलेख प्राप्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*इन दानपत्र अभिलेखों में [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] एवं मन्दिरों के नाम दान में दिये जाने आदि का उल्लेख है। &lt;br /&gt;
*इन अभिलेखों में महाराज हस्तिवर्मन द्वारा गोपस्वामिन व अन्य ब्राह्मणों को ग्राम दान का उल्लेख है। &lt;br /&gt;
*इसकी तिथि 475 ई. है। &lt;br /&gt;
*दूसरे दानपत्र में महाराज हस्तिन द्वारा कोर्पाजन ग्राम के दान का उल्लेख 482 ई.का है। &lt;br /&gt;
*तीसरे दानपत्र में 528 ई. में संक्षोभ द्वारा ओपानी ग्राम के पिष्ठपुरी देवी ([[लक्ष्मी]]) के मन्दिर को दान का उल्लेख है। &lt;br /&gt;
*इसी लेख में महाराज हस्तिन को डाभाल प्रदेश का शासक बताया है। &lt;br /&gt;
*जे.एफ.फ्लीट नामक पुरा वैज्ञानिक दानपत्र में उल्लिखित डाभाल को [[बुन्देलखण्ड]] से समीकृत करता है। &lt;br /&gt;
*खोह से ही अन्य कई दानपत्र प्राप्त हुए हैं।&lt;br /&gt;
*महाराज जयनाथ और सर्वनाथ के दानपत्र उल्लेखनीय हैं। &lt;br /&gt;
*इन दानपत्रों से गुप्तकालीन स्थानीय शासन एवं तत्कालीन सामाजिक स्थिति एवं धार्मिक विश्वास पर प्रकाश पड़ता है।&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<title>खैराडीह</title>
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		<updated>2011-04-16T08:10:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*खैराडीह, [[उत्तर प्रदेश]] के बलिया ज़िले में स्थित है। &lt;br /&gt;
*खैराडीह में 800 ई.पू. में आबादी शुरू हुई और ईसा की पहली तीन शताब्दियों में नगरीकरण चरम सीमा पर था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से [[कुषाण काल|कुषाणकालीन]] शहरी आबादी के आकर्षक आँकड़े मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ दो चरणों में बनी हुई सड़क मिली है। जिसके दोनों तरफ रिहायशी इमारतों की कतारे हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ से लाल मृद्भाण्ड मिले हैं, जो अलंकृत हैं। एक कमरे में मिट्टी में खोदी गई दो भट्टियाँ और 23 किलोग्राम धातुमल मिला है। &lt;br /&gt;
*लोहे के उपकरणों में कुल्हाड़ी और छैनी मिली है।&lt;br /&gt;
*यहाँ से अनेक कुषाणकालीन सिक्के मिले हैं।&lt;br /&gt;
*ईसा की तीसरी-चौथी सदी का अभिलिखित मोहर छापा भी मिला है।&lt;br /&gt;
*यह उल्लेखनीय है कि अब तक इस स्थल से किसी सुस्पष्ट रूप से गुप्तकालीन पुरावशेष के मिलने की सूचना नहीं मिली है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>खैराडीह</title>
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		<updated>2011-04-16T08:10:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*खैराडीह, [[उत्तर प्रदेश]] के बलिया ज़िले में स्थित है। &lt;br /&gt;
*खैराडीह में 800 ई.पू. में आबादी शुरू हुई और ईसा की पहली तीन शताब्दियों में नगरीकरण चरम सीमा पर था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से [[कुषाण काल|कुषाणकालीन]] शहरी आबादी के आकर्षक आँकड़े मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ दो चरणों में बनी हुई सड़क मिली है। जिसके दोनों तरफ रिहायशी इमारतों की कतारे हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ से लाल मृद्भाण्ड मिले हैं, जो अलंकृत हैं। एक कमरे में मिट्टी में खोदी गई दो भट्टियाँ और 23 किलोग्राम धातुमल मिला है। &lt;br /&gt;
*लोहे के उपकरणों में कुल्हाड़ी और छैनी मिली है।&lt;br /&gt;
*यहाँ से अनेक कुषाणकालीन सिक्के मिले हैं।&lt;br /&gt;
*ईसा की तीसरी-चौथी सदी का अभिलिखित मोहर छापा भी मिला है।&lt;br /&gt;
*यह उल्लेखनीय है कि अब तक इस स्थल से किसी सुस्पष्ट रूप से गुप्तकालीन पुरावशेष के मिलने की सूचना नहीं मिली है। &lt;br /&gt;
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		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पत्तनम</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%AE&amp;diff=152505"/>
		<updated>2011-04-16T08:04:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*दक्षिण [[भारत]] में स्थित [[केरल]] के एर्नाकुलम ज़िले में पत्तनम नामक गाँव स्थित है। &lt;br /&gt;
*उत्खनन में यहाँ से मिट्टी के जार के टुकड़े मिले हैं, जिनके बारे में अनुमान है कि ये प्रसिद्ध इतालवी सुराही शिल्पकला के नमूने हैं। &lt;br /&gt;
*करीब 2000 साल पहले ऐसी सुराहियों में रोमन लोग शराब और जैतून का तेल रखा करते थे। &lt;br /&gt;
*वर्ष [[2003]]-[[2004]] में केरल [[इतिहास]] व अनुसंधान परिषद् और इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेरिटेज के नेतृत्व की यह पुरातात्विक खोज भारत के पश्चिमी तट के नगरों का सबूत उपलब्ध कराती है। &lt;br /&gt;
*इस खोज से मालाबार तट के पास पहली सदी के विख्यात नदी बंदरगाह मुजरिस के [[पेरियार नदी]] के किनारे कोडुंगालुर में स्थित होने की अवधारणा को चुनौती मिलती है। &lt;br /&gt;
*मुजरिस से यूनानी रोमन व्यापारियों के [[काली मिर्च]] और दालचीनी के व्यापार का जिक्र रोमन नौ सैनिक अधिकारी प्लिनी द एल्डर, अलेक्जेंड्रिया के भूगोलविद् टॉलेमी के दस्तावेजों के साथ-साथ तमिल संगम साहित्य में भी मिलता है। &lt;br /&gt;
*इस स्थल की खुदाई के दौरान बहुमूल्य नग इत्यादि मिले हैं। &lt;br /&gt;
*रोमन जार लाल-काली मिट्टी से ई.पू. पहली सदी से 78 ई.तक बनते थे। &lt;br /&gt;
*विसुवियत पर्वत से लावा निकलने के बाद ये कभी नहीं बने। &lt;br /&gt;
*ऐसा माना जाता है कि ये बर्तन खाड़ी देशों से भारत पहुँचे होंगे,जो पहली बार भारत में पत्तनम में पाये गए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पद्मावती (स्थान)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80_(%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8)&amp;diff=152503"/>
		<updated>2011-04-16T08:04:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[मध्य प्रदेश]] के [[ग्वालियर]] के समीप वर्तमान पद्मपवैया नामक स्थान ही प्राचीन काल का पद्मावती नगर था। &lt;br /&gt;
*कुछ विद्वानों के अनुसार यह नगर [[विदर्भ]] में [[सिन्धु नदी|सिन्धु]] एवं पारा (पार्वती) नामक दो नदियों के संगम पर स्थित था। &lt;br /&gt;
*इसकी पहचान आधुनिक [[विजयनगर साम्राज्य|विजयनगर]] से की गई है, जो नलपुर या [[नरवर]] से 25 मील आगे विद्यानगर का एक भ्रष्ट रूप है। &lt;br /&gt;
*[[भवभूति]] ने (मालवी माधव, प्रथम अंक में) इस नगरी के सौंदर्य तथा वैभव विलास का वर्णन किया है। &lt;br /&gt;
*इस स्थान को उनकी जन्मस्थली माना जाता है। &lt;br /&gt;
*यह भवन कई खण्डों का था। &lt;br /&gt;
*यह भवन राजप्रासाद प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;
*गुप्त सम्राट [[समुद्रगुप्त]] की प्रयाग-प्रशास्ति में राजा गणपति नाग का उल्लेख है, जिसे समुद्रगुप्त ने हराकर अपने अधीन कर लिया था। &lt;br /&gt;
*विसेंट स्मिथ के अनुसार पद्मावती गणपतिनाग की राजधानी थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*पद्मावती तृतीय-चतुर्थ शती में नाग राजाओं की राजधानी थी। &lt;br /&gt;
*यहाँ के लोग [[शिव]] के अनन्य भक्त थे, वे अपने कन्धों पर शिवलिंग वहन करते थे, अतः उन्हें भारशिव कहा गया। &lt;br /&gt;
*नाग राजाओं के अनेक सिक्के यहाँ से प्राप्त हुए हैं तथा प्रथम शताब्दी से आठवीं शताब्दी तक के अनेक ऐतिहासिक अवशेष भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें प्रमुख अवशेष ईंटों से बना एक विशाल भवन है। &lt;br /&gt;
*भारत में इस स्थान के अतिरिक्त केवल [[अहिच्छत्र]] में ही इस प्रकार के विशालकाय भवनों के अवशेष मिले हैं।&lt;br /&gt;
*लगता है कि ये भवन नाग वास्तुकला के उदाहरण हैं, क्योंकि दोनों ही स्थानों पर नाग नरेशों का आधिपत्य था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पडरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=152502"/>
		<updated>2011-04-16T08:04:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*पडरी [[गुजरात]] के भावनगर ज़िले में स्थित है। &lt;br /&gt;
*पडरी से [[हड़प्पा|हड़प्पाई]] नगर, हड़प्पा पूर्व व विकसित हड़प्पा काल के दो [[संस्कृति|सांस्कृतिक]] चरणों को स्पष्ट करता है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से प्राप्त एक दूसरे से अंदर से जुड़े हुए नौ कमरों का परिसर विशेष महत्त्व का है, जो सामूहिकता के साथ-साथ सहयोग का भी प्रतीत है। &lt;br /&gt;
*यहाँ के बर्तन के ठीकरों पर [[हड़प्पा लिपि|हड़प्पाई लिपि]] प्राप्त हुई है, साथ ही तीन विशिष्ट चित्रित भाण्ड व [[ताँबा|ताँबे]] की कलात्मक वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पनगोरारिया</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE&amp;diff=152501"/>
		<updated>2011-04-16T08:02:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*पनगोरारिया [[मध्य प्रदेश]] के सेहोर ज़िले की पहाड़ियों में स्थित है। &lt;br /&gt;
*पनगोरारिया स्थान से खोज के दौरान प्राकृतिक गुफ़ाएँ मिली हैं, जिनको काटकर आवास के योग्य बानाया गया था।&lt;br /&gt;
*इन गुफ़ाओं को [[1975]] ई. में के.डी.बनर्जी एवं भोपर्दिकर ने खोजा था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से अशोक का गुहालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें उल्लेख है कि प्रियदर्शी ([[अशोक]]) उस समय यहाँ भिक्षुओं से मिलने आया था, जब वह '''महाराजकुमार''' था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>परखम</title>
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		<updated>2011-04-16T08:01:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से [[यक्ष]] की  एक विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी,जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे [[आभूषण|गहने]], जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] [[ब्राह्मी लिपि]] में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है, जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह मौर्यकालीन है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर [[मूर्ति कला मथुरा|मथुरा मूर्ति-कला]] की परम्परा में [[शुंग वंश|शुंगकाल]] में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>नाल, बलूचिस्तान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B2,_%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A5%82%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=152497"/>
		<updated>2011-04-16T07:58:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*नाल [[सिंधु घाटी सभ्यता|प्राक् सैन्धव]] स्थल तथा एक [[संस्कृति|सांस्कृतिक]] परम्परा के रूप में जाना जाने वाला यह नगर दक्षिणी [[बलूचिस्तान]] में स्थित है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से प्राप्त मृद्भाण्ड परम्परागत पाण्डु [[रंग]] के हैं किंतु उनमें [[सफ़ेद रंग|सफ़ेद]] पट्टी मिलती है। &lt;br /&gt;
*नाल में आवास निर्माण के लिए अनगढ़ पत्थर तथा मिट्टी की ईंटों का प्रयोग किया गया है। &lt;br /&gt;
*शवाधान मकानों के अन्दर ही निर्मित किए जाते थे तथा शवाधानों के साथ अनेक दैनिक जीवन की वस्तुएँ, यथा-मृद्भाण्ड, छैनी, [[ताँबा|ताँबे]] की कुल्हाड़ी आदि रख दी जाती थी, जो सम्भवत पारलौकिक जीवन में विश्वास का प्रतीक है। &lt;br /&gt;
*नाल के विशिष्ट पुरावशेषों में सेलखड़ी की मुहर,ताँबे की मुहर, छिद्रित प्रस्तर बाट,ताँबे के विभिन्न उपकरण तथा अर्द्ध बहुमूल्य पत्थरों के मनके उल्लेखनीय हैं। &lt;br /&gt;
*नाल महत्व इस बात में है कि यहाँ से मिलते-जुलते मृद्भाण्ड आभरी (सिन्ध) तथा मुण्डीगाक ([[अफगानिस्तान]]) से भी प्राप्त हुए हैं, जो इस बात का साक्ष्य है कि विभिन्न स्थानीय संस्कृतियाँ एक दूसरे को प्रभावित कर रही थी और यह लम्बे समय से चले आ रहे सम्पर्कों के कारण ही सम्भव था। &lt;br /&gt;
*यहाँ मिट्टी के बर्तनों पर कूबड़दार बैल एवं [[पीपल]] के चिह्नों का प्रयोग किया गया है,जो विकसित [[हड़प्पा|हड़प्पा काल]] में भी जारी रहा। &lt;br /&gt;
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		<title>बलूचिस्तान</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बलूचिस्तान [[पाकिस्तान]] का पश्चिमी प्रांत है। बलूचिस्तान नाम का क्षेत्र बड़ा है और यह [[ईरान]] (सिस्तान व बलूचिस्तान प्रांत) तथा [[अफ़ग़ानिस्तान]] के सटे हुए क्षेत्रों में बँटा हुआ है। यहाँ की राजधानी [[क्वेटा]] है। यहाँ के लोगों की प्रमुख भाषा बलूच या बलूची के नाम से जानी जाती है। [[1944]] में बलूचिस्तान के स्वतंत्रता का विचार जनरल मनी के विचार में आया था पर 1947 में ब्रिटिश इशारे पर इसे पाकिस्तान में शामिल कर लिया गया। [[1970]] के दशक में एक बलोच राष्ट्रवाद का उदय हुआ जिसमें बलोचिस्तान को पाकिस्तान से स्वतंत्र करने की माँग उठी। यह प्रदेश पाकिस्तान के सबसे कम आबाद इलाकों में से एक है। &lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;नाल&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{मुख्य|नाल}}&lt;br /&gt;
*नाल [[सिंधु घाटी सभ्यता|प्राक् सैन्धव]] स्थल तथा एक [[संस्कृति|सांस्कृतिक]] परम्परा के रूप में जाना जाने वाला यह नगर दक्षिणी बलूचिस्तान में स्थित है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से प्राप्त मृद्भाण्ड परम्परागत पाण्डु [[रंग]] के हैं किंतु उनमें [[सफ़ेद रंग|सफ़ेद]] पट्टी मिलती है। &lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार= &lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{विदेशी स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:विदेशी स्थान]] [[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>नाल, बलूचिस्तान</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: '*नाल प्राक् सैन्धव स्थल तथा एक [[स...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*नाल [[सिंधु घाटी सभ्यता|प्राक् सैन्धव]] स्थल तथा एक [[संस्कृति|सांस्कृतिक]] परम्परा के रूप में जाना जाने वाला यह नगर दक्षिणी [[बलूचिस्तान]] में स्थित है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से प्राप्त मृद्भाण्ड परम्परागत पाण्डु [[रंग]] के हैं किंतु उनमें सफ़ेद पट्टी मिलती है। &lt;br /&gt;
*नाल में आवास निर्माण के लिए अनगढ़ पत्थर तथा मिट्टी की ईंटों का प्रयोग किया गया है। &lt;br /&gt;
*शवाधान मकानों के अन्दर ही निर्मित किए जाते थे तथा शवाधानों के साथ अनेक दैनिक जीवन की वस्तुएँ, यथा-मृद्भाण्ड, छैनी, [[ताँबा|ताँबे]] की कुल्हाड़ी आदि रख दी जाती थी, जो सम्भवत पारलौकिक जीवन में विश्वास का प्रतीक है। &lt;br /&gt;
*नाल के विशिष्ट पुरावशेषों में सेलखड़ी की मुहर,ताँबे की मुहर, छिद्रित प्रस्तर बाट,ताँबे के विभिन्न उपकरण तथा अर्द्ध बहुमूल्य पत्थरों के मनके उल्लेखनीय हैं। &lt;br /&gt;
*नाल महत्व इस बात में है कि यहाँ से मिलते-जुलते मृद्भाण्ड आभरी (सिन्ध) तथा मुण्डीगाक ([[अफगानिस्तान]]) से भी प्राप्त हुए हैं, जो इस बात का साक्ष्य है कि विभिन्न स्थानीय संस्कृतियाँ एक दूसरे को प्रभावित कर रही थी और यह लम्बे समय से चले आ रहे सम्पर्कों के कारण ही सम्भव था। &lt;br /&gt;
*यहाँ मिट्टी के बर्तनों पर कूबड़दार बैल एवं [[पीपल]] के चिह्नों का प्रयोग किया गया है,जो विकसित [[हड़प्पा|हड़प्पा काल]] में भी जारी रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>परखम</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से [[यक्ष]] की  एक विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी,जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे [[आभूषण|गहने]], जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] [[ब्राह्मी लिपि]] में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है, जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह मौर्यकालीन है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर [[मूर्ति कला मथुरा|मथुरा मूर्ति-कला]] की परम्परा में [[शुंग वंश|शुंगकाल]] में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
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&lt;div&gt;*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से [[यक्ष]] की  एक विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी,जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे [[आभूषण|गहने]], जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] [[ब्राह्मी लिपि]] में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है। &lt;br /&gt;
*जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह मौर्यकालीन है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर [[मूर्ति कला मथुरा|मथुरा मूर्ति-कला]] की परम्परा में [[शुंग वंश|शुंगकाल]] में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से [[यक्ष]] की  एक विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी,जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे [[आभूषण|गहने]], जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] ब्राह्मी लिपि में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है। &lt;br /&gt;
*जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह मौर्यकालीन है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर [[मूर्ति कला मथुरा|मथुरा मूर्ति-कला]] की परम्परा में [[शुंग वंश|शुंगकाल]] में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से [[यक्ष]] की  एक विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी,जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे [[आभूषण|गहने]], जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है। &lt;br /&gt;
*जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर [[मूर्ति कला मथुरा|मथुरा मूर्ति-कला]] की परम्परा में शुंगकाल में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
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&lt;div&gt;*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से एक [[यक्ष]] की विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी, जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे [[आभूषण|गहने]], जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है। &lt;br /&gt;
*जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर मथुरा मूर्ति-कला की परम्परा में शुंगकाल में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से एक [[यक्ष]] की विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी, जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे गहने, जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है। &lt;br /&gt;
*जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर मथुरा मूर्ति-कला की परम्परा में शुंगकाल में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>उत्तर प्रदेश</title>
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		<updated>2011-04-16T06:48:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: /* पर्यटन स्थल */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Uttar Pradesh Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[लखनऊ]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=166,052,859&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=689&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=240928 km²&lt;br /&gt;
|मंडल=18&lt;br /&gt;
|ज़िले=71&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=[[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|महानगर=[[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=[[लखनऊ]], [[इलाहाबाद]], [[आगरा]], [[मेरठ]], [[वाराणसी]], [[ग़ाज़ियाबाद]], [[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=[[हिन्दी भाषा]], [[उर्दू भाषा]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1950/01/12&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=[[वाराणसी]], [[आगरा]], [[इलाहाबाद]], [[कन्नौज]], [[कुशीनगर]], [[कौशाम्बी]], [[चित्रकूट]], झांसी, फ़ैज़ाबाद, [[मेरठ]], [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=[[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[आगरा]], [[वाराणसी]], [[अयोध्या]], [[चित्रकूट]], [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[सारनाथ]], [[श्रावस्ती]], [[कुशीनगर]]&lt;br /&gt;
|मुख्य धर्म-सम्प्रदाय=[[हिन्दू धर्म|हिन्दू]], [[इस्लाम धर्म|इस्लाम]], [[ईसाई धर्म|ईसाई]], [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]], [[जैन धर्म|जैन]]&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:898&lt;br /&gt;
|साक्षरता=57.36&lt;br /&gt;
|स्त्री=42.97&lt;br /&gt;
|पुरुष=70.22&lt;br /&gt;
|जलवायु=उष्णदेशीय मानसून&lt;br /&gt;
|तापमान=31 °C&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=5°C&lt;br /&gt;
|उच्च न्यायालय=[[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[बी. एल. जोशी]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[मायावती]]&lt;br /&gt;
|नेता विरोधी दल=[[शिवपाल सिंह यादव]]&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=404&lt;br /&gt;
|विधान परिषद सदस्य संख्या=100&lt;br /&gt;
|लोकसभा क्षेत्र=80&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://upgov.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|15:56, 25 मार्च 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Uttar Pradesh Logo.gif&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश''' [[भारत]]  का  जनसंख्या के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। [[लखनऊ]] प्रदेश की प्रशासनिक राजधानी और [[इलाहाबाद]] न्यायिक राजधानी है। उत्तर प्रदेश के दूसरे महत्त्वपूर्ण नगर- [[आगरा]], [[अलीगढ़]], [[अयोध्या]], [[बरेली]], [[मेरठ]], [[वाराणसी]] (बनारस), [[गोरखपुर]], [[ग़ाज़ियाबाद]], [[मुरादाबाद]], [[सहारनपुर]], फ़ैज़ाबाद, [[कानपुर]]  हैं। इस राज्य के पड़ोसी राज्य हैं - [[उत्तराखंड|उत्तरांचल]], [[हिमाचल प्रदेश]], [[हरियाणा]], [[दिल्ली]], [[राजस्थान]], [[मध्य प्रदेश]], [[छत्तीसगढ़]], [[झारखण्ड]], [[बिहार]]। उत्तर प्रदेश की पूर्वोत्तर दिशा में [[नेपाल]] देश है। उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल 2,40,927 वर्ग किमी. है। यह भारत का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है। 9 नवम्बर, 2000 को इसमें से अलग कर उत्तरांचल राज्य का गठन किया गया।&lt;br /&gt;
26 जनवरी, 1950 को भारत के गणतंत्र बनने पर राज्य को अपना वर्तमान नाम उत्तर प्रदेश मिला था।&lt;br /&gt;
==सघन आबादी वाला राज्य==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश सघन आबादी वाले''' [[गंगा नदी]] और [[यमुना नदी]] के मैदान में बसा है। लगभग 16 करोड़ की जनसंख्या के साथ उत्तर प्रदेश केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला उपराष्ट्रीय प्रदेश है। समूचे विश्व के सिर्फ़ पांच राष्ट्रों [[चीन]], भारत, [[संयुक्त राज्य अमरीका|संयुक्त अमरीका]], इंडोनिशिया और ब्राज़ील की जनसंख्या ही उत्तर-प्रदेश की जनसंख्या से अधिक है। उत्तर प्रदेश का भारतीय एवं [[हिन्दू धर्म]] के इतिहास में बहुत योगदान है। उत्तर प्रदेश आधुनिक इतिहास और राजनीति का सदैव से केन्द्र बिन्दु रहा है। यहाँ के निवासियों ने [[सिपाही स्वतंत्रता संग्राम|स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन]] में प्रमुख भूमिका निभायी थी। [[इलाहाबाद]] शहर में विख्यात नेताओं- [[मोतीलाल नेहरू]], पुरुषोत्तमदास टन्डन और [[लालबहादुर शास्त्री]] आदि प्रमुख नेताओं का घर था। यह शहर देश के आठ प्रधानमन्त्रियों- [[जवाहरलाल नेहरू]], [[इंदिरा गाँधी]], [[लालबहादुर शास्त्री]], [[चौधरी चरण सिंह]], [[विश्वनाथ प्रताप सिंह]], [[चन्द्रशेखर सिंह|चन्द्रशेखर सिंह]], [[राजीव गांधी]] और [[अटल बिहारी वाजपेयी]] का चुनाव क्षेत्र भी रहा है। इंदिरा गांधी के पुत्र स्वर्गीय संजय गांधी का चुनाव-क्षेत्र भी यही था और आजकल भू.पू. प्रधानमंत्री स्व. राजीव गाँधी की पत्नी श्रीमती [[सोनिया गांधी]] भी [[रायबरेली]] से चुनाव लड़तीं हैं और उनके पुत्र [[राहुल गाँधी]] भी अमेठी से चुनाव लड़ते हैं।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश का इतिहास बहुत प्राचीन है'''। उत्तर प्रदेश के इतिहास को पाँच कालों में बाँटा जा सकता है-प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक काल (लगभग 600 ई.पू. तक), [[बौद्ध]]-[[हिन्दू]] ([[ब्राह्मण]]) काल (लगभग 600 ई.पू. से लगभग 1200 ई.), मुस्लिम काल (लगभग 1200 से 1775 ई.), ब्रिटिश काल (लगभग 1775 से 1947 ई.), स्वतंत्रता पश्चात का काल (1947 से वर्तमान तक)। गंगा के मैदान के बीचोंबीच की अपनी स्थिति के कारण उत्तर प्रदेश समूचे उत्तरी भारत के इतिहास का केन्द्र बिन्दु रहा है। उत्तर वैदिक काल में इसे 'ब्रहर्षि देश' या 'मध्य देश' के नाम से जाना जाता था। उत्तर प्रदेश वैदिक काल में कई महान [[ऋषि]]-[[मुनि|मुनियों]], जैसे - [[भारद्वाज]], [[गौतम]], [[याज्ञवल्क्य]], [[वसिष्ठ]], [[विश्वामित्र]] और [[वाल्मीकि]] आदि की तपोभूमि रहा है। कई पवित्र पुस्तकों की रचना भी यहीं हुई। भारत के दो मुख्य महाकाव्य [[रामायण]] और [[महाभारत]] की कथा भी यहीं की है। [[चित्र:Vishwanath-Temple-Varanasi.jpg|thumb|left|[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ मन्दिर]], [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Vishwanath Temple, Varanasi]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर प्रदेश में दो नए धर्मों - [[जैन]] और [[बौद्ध]]  का विकास हुआ। [[बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश [[सारनाथ]] में दिया और [[बौद्ध धर्म]] की शुरूआत की। उत्तर प्रदेश के ही [[कुशीनगर]] में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। उत्तर प्रदेश के कई नगर जैसे- [[अयोध्या]], [[प्रयाग]], [[वाराणसी]] और [[मथुरा]] विद्या अध्ययन के लिए प्रसिद्ध केंद्र थे। मध्य काल में उत्तर प्रदेश मुस्लिम शासकों के अधीन हो गया था, जिससे [[हिन्दू]] और [[इस्लाम धर्म]] के पास आने से एक नई मिली-जुली संस्कृति का विकास हुआ। [[तुलसीदास]], [[सूरदास]], [[रामानंद]] और उनके मुस्लिम शिष्य [[कबीर]] के अतिरिक्त अन्य कई संत पुरुषों ने [[हिन्दी]] और अन्य भाषाओं के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश का इतिहास लगभग 4000 वर्ष पुराना है, जब [[आर्य]] यहाँ आये और वैदिक सभ्यता का आरम्भ हुआ, तभी से यहाँ का इतिहास मिलता है। आर्य [[सिन्धु नदी|सिन्धु]] और [[सतलुज नदी|सतलुज]] के मैदानी भागों से यमुना और गंगा के मैदानी भाग की ओर बढ़े। इन्होंने यमुना और गंगा के मैदानी भाग और [[घाघरा नदी|घाघरा]] क्षेत्र को अपना घर बनाया। इन्हीं आर्यों के नाम पर भारत देश का नाम '[[आर्यावर्त]]' अथवा 'भारतवर्ष' (भरत आर्यों के एक चक्रवर्ती राजा थे, जिनके नाम और ख्याति से यह देश भारतवर्ष के नाम से जाना गया) पड़ा।&lt;br /&gt;
====प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक काल====&lt;br /&gt;
'''पुरातत्व ने उत्तर प्रदेश की आरम्भिक सभ्यता''' पर नई रौशनी डाली है। दक्षिणी ज़िले प्रतापगढ़ में पाई गई मानव खोपड़ियों के अवशेष लगभग 10,000 ई. पू. के बताए गए हैं। वैदिक साहित्य और दो महाकाव्यों, [[रामायण]] व [[महाभारत]] से इस क्षेत्र के सातवीं शताब्दी ई. पू. के पहले की जानकारी मिलती है। जिसमें गंगा के मैदानों का वर्णन उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत किया गया है। महाभारत की पृष्ठभूमि राज्य के पश्चिमी हिस्से [[हस्तिनापुर]] के आसपास है, जबकि रामायण की पृष्ठभूमि पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्य में भगवान [[राम]] का जन्मस्थान [[अयोध्या]] है। राज्य में दे अन्य पौराणिक स्रोत हैं-[[वृन्दावन]] व [[मथुरा]] के आसपास के क्षेत्र जहाँ [[कृष्ण]] का जन्म हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामायण में हिन्दुओं के भगवान राम का प्राचीन राज्य [[कौशल]] इसी क्षेत्र में था, अयोध्या कौशल राज्य की राजधानी थी। [[हिन्दू धर्म]] के अनुसार भगवान [[विष्णु]] के आठवें अवतार भगवान कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में हुआ था। विश्व के प्राचीनतम नगरों में से एक माना जाने वाला वाराणसी शहर भी इसी प्रदेश में है। वाराणसी के समीप सारनाथ का [[स्तूप]] भगवान [[बुद्ध]] के लिए प्रसिद्ध है। समय के साथ साथ यह विशाल क्षेत्र छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया और [[गुप्त]], [[मौर्य]] और [[कुषाण]] साम्राज्यों का भाग बन गया। 7वीं शताब्दी में [[कन्नौज]] गुप्त साम्राज्य का प्रमुख केन्द्र बन गया था।&lt;br /&gt;
====बौद्ध-हिन्दू (ब्राह्मण) काल====&lt;br /&gt;
'''सातवीं शताब्दी ई. पू. के अन्त से भारत और उत्तर प्रदेश''' का व्यवस्थित इतिहास आरम्भ होता है, जब उत्तरी भारत में 16 महाजनपद श्रेष्ठता की दौड़ में शामिल थे, इनमें से सात वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के अंतर्गत थे। [[बुद्ध]] ने अपना पहला उपदेश वाराणसी (बनारस) के निकट [[सारनाथ]] में दिया और एक ऐसे धर्म की नींव रखी, जो न केवल भारत में, बल्कि [[चीन]] व [[जापान]] जैसे सुदूर देशों तक भी फैला। कहा जाता है कि, बुद्ध को [[कुशीनगर]] में परिनिर्वाण (शरीर से मुक्त होने पर [[आत्मा]] की मुक्ति) प्राप्त हुआ था, जो पूर्वी ज़िले देवरिया में स्थित है। पाँचवीं शताब्दी ई. पू. से छठी शताब्दी ई. तक उत्तर प्रदेश अपनी वर्तमान सीमा से बाहर केन्द्रित शक्तियों के नियंत्रण में रहा, पहले [[मगध]], जो वर्तमान [[बिहार]] राज्य में स्थित था, और बाद में [[उज्जैन]], जो वर्तमान [[मध्य प्रदेश]] राज्य में स्थित है। इस राज्य पर शासन कर चुके इस काल के महान शासकों में [[चन्द्रगुप्त प्रथम]] (शासनकाल लगभग 330-380 ई.) व [[अशोक]] (शासनकाल लगभग 268 या 265-238), जो मौर्य सम्राट थे और [[समुद्रगुप्त]] (लगभग 330-380 ई.) और [[चन्द्रगुप्त द्वितीय]] हैं (लगभग 380-415 ई., जिन्हें कुछ विद्वान विक्रमादित्य मानते हैं)। एक अन्य प्रसिद्ध शासक [[हर्षवर्धन]] (शासनकाल 606-647) थे। जिन्होंने कान्यकुब्ज (आधुनिक [[कन्नौज]] के निकट) स्थित अपनी राजधानी से समूचे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, [[पंजाब]] और [[राजस्थान]] के कुछ हिस्सों पर शासन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस काल के दौरान बौद्ध और हिन्दू (ब्राह्मण) संस्कृति, दोनों का उत्कर्ष हुआ। अशोक के शासनकाल के दौरान बौद्ध कला के स्थापत्य व वास्तुशिल्प प्रतीक अपने चरम पर पहुँचे। गुप्त काल (लगभग 320-550) के दौरान हिन्दू कला का भी अधिकतम विकास हुआ। लगभग 647 ई. में हर्ष की मृत्यु के बाद हिन्दूवाद के पुनरुत्थान के साथ ही बौद्ध धर्म का धीरे-धीरे पतन हो गया। इस पुनरुत्थान के प्रमुख रचयिता दक्षिण [[भारत]] में जन्मे शंकर थे, जो वाराणसी पहुँचे, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मैदानों की यात्रा की और [[हिमालय]] में [[बद्रीनाथ]] में प्रसिद्ध मन्दिर की स्थापना की। इसे हिन्दू मतावलम्बी चौथा एवं अन्तिम मठ (हिन्दू संस्कृति का केन्द्र) मानते हैं।&lt;br /&gt;
====मुस्लिम काल====&lt;br /&gt;
'''इस क्षेत्र में हालांकि 1000-1030 ई. तक''' मुसलमानों का आगमन हो चुका था, लेकिन उत्तरी भारत में 12वीं शताब्दी के अन्तिम दशक के बाद ही मुस्लिम शासन स्थापित हुआ, जब [[मुहम्मद ग़ोरी]] ने गहड़वालों (जिनका उत्तर प्रदेश पर शासन था) और अन्य प्रतिस्पर्धी वंशों को हराया था। लगभग 600 वर्षों तक अधिकांश भारत की तरह उत्तर प्रदेश पर भी किसी न किसी मुस्लिम वंश का शासन रहा, जिनका केन्द्र [[दिल्ली]] या उसके आसपास था। 1526 ई. में [[बाबर]] ने दिल्ली के सुल्तान [[इब्राहीम लोदी]] को हराया और सर्वाधिक सफल मुस्लिम वंश, [[मुग़ल]] वंश की नींव रखी। इस साम्राज्य ने 200 वर्षों से भी अधिक समय तक उपमहाद्वीप पर शासन किया। इस साम्राज्य का महानतम काल [[अकबर]] (शासनकाल 1556-1605 ई.) का काल था, जिन्होंने [[आगरा]] के पास नई शाही राजधानी [[फ़तेहपुर सीकरी]] का निर्माण किया। उनके पोते [[शाहजहाँ]] (शासनकाल 1628-1658 ई.) ने आगरा में [[ताजमहल]] (अपनी बेगम की याद में बनवाया गया मक़बरा, जो प्रसव के दौरान चल बसी थीं) बनवाया, जो विश्व के महानतम वास्तु शिल्पीय नमूनों में से एक है। शाहजहाँ ने आगरा व दिल्ली में भी वास्तुशिल्प की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण इमारतें बनवाईं थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में केन्द्रित मुग़ल साम्राज्य ने एक नई मिश्रित संस्कृति के विकास को प्रोत्साहित किया। अकबर इसके महानतम प्रतिपादक थे, जिन्होंने बिना किसी भेदभाव के अपने दरबार में वास्तुशिल्प, [[साहित्य]], चित्रकला और [[संगीत]] विशेषज्ञों को नियुक्त किया था। हिन्दुत्व और इस्लाम के टकराव ने कई नए मतों का विकास किया, जो इन दोनों और [[भारत]] की विभिन्न जातियों के बीच आम सहमति क़ायम करना चाहते थे। [[भक्ति आन्दोलन]] के संस्थापक रामानन्द (लगभग 1400-1470 ई.), जिनका दावा था कि, मुक्ति लिंग या जाति पर आश्रित नहीं है और सभी धर्मों के बीच अनिवार्य एकता की शिक्षा देने वाले [[कबीर]] ने उत्तर प्रदेश में मौजूद धार्मिक सहिष्णुता के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई केन्द्रित की। 18वीं शताब्दी में मुग़लों के पतन के साथ ही इस मिश्रित संस्कृति का केन्द्र दिल्ली से लखनऊ चला गया, जो अवध (औध, वर्तमान अयोध्या) के नवाब के अन्तर्गत था और जहाँ साम्प्रदायिक सदभाव के माहौल में [[कला]], साहित्य, संगीत और काव्य का उत्कर्ष हुआ।&lt;br /&gt;
====ब्रिटिश काल====&lt;br /&gt;
'''लगभग 75 वर्ष की अवधि में वर्तमान उत्तर प्रदेश''' के क्षेत्र का [[ईस्ट इण्डिया कम्पनी]] (ब्रिटिश व्यापारिक कम्पनी) ने धीरे-धीरे अधिग्रहण किया। विभिन्न उत्तर भारतीय वंशों 1775, 1798 और 1801 में नवाबों, 1803 में सिंधिया और 1816 में [[गोरखा|गोरखों]] से छीने गए प्रदेशों को पहले बंगाल प्रेज़िडेन्सी के अन्तर्गत रखा गया, लेकिन 1833 में इन्हें अलग करके पश्चिमोत्तर प्रान्त (आरम्भ में आगरा प्रेज़िडेन्सी कहलाता था) गठित किया गया। 1856 ई. में कम्पनी ने [[अवध]] पर अधिकार कर लिया और आगरा एवं अवध संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के समरूप) के नाम से इसे 1877 ई. में पश्चिमोत्तर प्रान्त में मिला लिया गया। 1902 ई. में इसका नाम बदलकर संयुक्त प्रान्त कर दिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1857-1859 ई. के बीच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध हुआ विद्रोह मुख्यत: पश्चिमोत्तर प्रान्त तक सीमित था। 10 मई, 1857 ई. को [[मेरठ]] में सैनिकों के बीच भड़का विद्रोह कुछ ही महीनों में 25 से भी अधिक शहरों में फैल गया। 1858 ई. में विद्रोह के दमन के बाद पश्चिमोत्तर और शेष ब्रिटिश भारत का प्रशासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी से ब्रिटिश ताज को हस्तान्तरित कर दिया गया। 1880 ई. के उत्तरार्द्ध में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के साथ संयुक्त प्रान्त स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी रहा। प्रदेश ने भारत को [[मोतीलाल नेहरू]], [[मदन मोहन मालवीय]], [[जवाहरलाल नेहरू]] और पुरुषोत्तमदास टंडन जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी राजनीतिक नेता दिए। 1922 में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने के लिए किया गया [[महात्मा गांधी]] का [[असहयोग आन्दोलन]] पूरे संयुक्त प्रान्त में फैल गया, लेकिन चौरी चौरा गाँव (प्रान्त के पूर्वी भाग में) में हुई हिंसा के कारण महात्मा गांधी ने अस्थायी तौरर पर आन्दोलन को रोक दिया। संयुक्त प्रान्त [[मुस्लिम लीग]] की राजनीति का भी केन्द्र रहा। ब्रिटिश काल के दौरान रेलवे, नहर और प्रान्त के भीतर ही संचार के साधनों का व्यापक विकास हुआ। अंग्रेज़ों ने यहाँ आधुनिक शिक्षा को भी बढ़ावा दिया और यहाँ पर लखनऊ विश्वविद्यालय (1921 में स्थापित) जैसे विश्वविद्यालय व कई महाविद्यालय स्थापित किए।&lt;br /&gt;
====स्वतंत्रता पश्चात का काल====&lt;br /&gt;
'''1947 में संयुक्त प्रान्त नव स्वतंत्र भारतीय गणराज्य की एक''' प्रशासनिक इकाई बना। दो साल बाद इसकी सीमा के अन्तर्गत स्थित, टिहरी गढ़वाल और रामपुर के स्वायत्त राज्यों को संयुक्त प्रान्त में शामिल कर लिया गया। 1950 में नए संविधान के लागू होने के साथ ही संयुक्त प्रान्त का नाम उत्तर प्रदेश रखा गया और यह भारतीय संघ का राज्य बना। स्वतंत्रता के बाद से [[भारत]] में इस राज्य की प्रमुख भूमिका रही है। इसने देश को जवाहर लाल नेहरू और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी सहित कई [[प्रधानमंत्री]], सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक आचार्य नरेन्द्र देव, जैसे प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी (अल्पसंख्यक) दलों के नेता और भारतीय जनसंघ, बाद में भारतीय जनता पार्टी व प्रधानमंत्री [[अटल बिहारी वाजपेयी]] जैसे नेता दिए हैं। राज्य की राजनीति, हालांकि विभाजनकारी रही है और कम ही मुख्यमंत्रियों ने पाँच वर्ष की अवधि पूरी की है।&lt;br /&gt;
====राज्य का विभाजन====&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश के गठन के तुरन्त बाद''' [[उत्तराखण्ड]] क्षेत्र (गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र द्वारा निर्मित) में समस्याएँ उठ खड़ी हुईं। इस क्षेत्र के लोगों को लगा कि, विशाल जनसंख्या और वृहद भौगोलिक विस्तार के कारण लखनऊ में बैठी सरकार के लिए उनके हितों की देखरेख करना सम्भव नहीं है। बेरोज़गारी, ग़रीबों और सामान्य व्यवस्था व पीने के पानी जैसी आधारभूत सुविधाओं की कमी और क्षेत्र के अपेक्षाकृत कम विकास ने लोगों को एक अलग राज्य की माँग करने पर विवश कर दिया। शुरू-शुरू में विरोध कमज़ोर था, लेकिन 1990 के दशक में इसने ज़ोर पकड़ा व आन्दोलन तब और भी उग्र हो गया, जब 2 अक्टूबर 1994 को मुज़फ़्फ़रनगर में इस आन्दोलन के एक प्रदर्शन में पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में 40 लोग मारे गए। अन्तत: नवम्बर, 2000 में उत्तर प्रदेश के पश्चिमोत्तर हिस्से से उत्तरांचल के नए राज्य का, जिसमें कुमाऊं और गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्र शामिल थे, गठन किया गया।&lt;br /&gt;
====प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम====&lt;br /&gt;
'''सन 1857 में अंग्रेज़ी फ़ौज के भारतीय सिपाहियों ने''' बग़ावत कर दी थी। यह बग़ावत लगभग एक वर्ष तक चली और धीरे धीरे यह बग़ावत पूरे उत्तर भारत में फ़ैल गयी। इसी बग़ावत को [[भारत]] का [[सिपाही स्वतंत्रता संग्राम|प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] नाम दिया गया। यह बग़ावत [[मेरठ]] शहर से शुरू हुई। जिसका कारण [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] द्वारा [[गाय]] और सुअर की चर्बी से बने कारतूस थे। इस बग़ावत की वज़ह लॉर्ड डलहौज़ी की राज्य हड़पने की नीति भी थी। यह संग्राम मुख्यतः [[दिल्ली]], [[लखनऊ]], [[कानपुर]], [[झाँसी]] और [[बरेली]] में लड़ा गया। इस संग्राम में [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई]], [[अवध]] की [[बेगम हज़रत महल]], बख़्त खान, [[नाना साहब|नाना साहेब]], [[तात्या टोपे]] आदि अनेक देशभक्तों ने भाग लिया। [[चित्र:Ganga-River-Aarti.jpg|thumb|250px|आरती, [[गंगा नदी]], [[इलाहाबाद]]&amp;lt;br /&amp;gt; Aarti, Ganga River, Allahabad]] उत्तर प्रदेश राज्य की बौद्धिक श्रेष्ठता ब्रिटिश शासन काल में भी बनी रही। सन [[1902]] में 'नार्थ वेस्ट प्रोविन्स' का नाम बदल कर 'यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध' कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे 'यू. पी.' कहा गया। सन [[1920]] में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद के स्थान पर लखनऊ बना दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक न्यायपीठ शाखा (हाईकोर्ट बैंच) स्थापित की गयी। बाद में 1935 में इसका संक्षिप्त नाम 'संयुक्त प्रांत' प्रचलित हो गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 12 जनवरी [[1950]] में 'संयुक्त प्रांत' का नाम बदल कर ‘उत्तर प्रदेश’ रखा गया। [[गोविंद बल्लभ पंत]] इस प्रदेश के प्रथम मुख्य मन्त्री बने। अक्टूबर [[1963]] में सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश और भारत की 'प्रथम महिला मुख्यमन्त्री' बनीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन [[2000]] में भारतीय [[संसद]] ने उत्तर-प्रदेश के उत्तर पश्चिमी, पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश के मुख्यतः पहाड़ी भाग गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डल को मिला कर उत्तर प्रदेश को विभाजित कर उत्तरांचल राज्य का निर्माण किया, जिसका नाम बाद में बदल कर [[उत्तराखंड]] कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश की अधिकांश [[उत्तर प्रदेश की झीलें|झीलें]] कुमाऊँ क्षेत्र में हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भूगोल==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के प्रमुख भूगोलीय तत्व इस प्रकार से हैं-&lt;br /&gt;
====भूमि====&lt;br /&gt;
*'''भू-आकृति''' - उत्तर प्रदेश को दो विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों, गंगा के मध्यवर्ती मैदान और दक्षिणी उच्चभूमि में बाँटा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा गंगा के मैदान में है। मैदान अधिकांशत: गंगा व उसकी सहायक नदियों के द्वारा लाए गए जलोढ़ अवसादों से बने हैं। इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में उतार-चढ़ाव नहीं है, यद्यपि मैदान बहुत उपजाऊ है, लेकिन इनकी ऊँचाई में कुछ भिन्नता है, जो पश्चिमोत्तर में 305 मीटर और सुदूर पूर्व में 58 मीटर है। गंगा के मैदान की दक्षिणी उच्चभूमि अत्यधिक विच्छेदित और विषम [[विंध्य पर्वतमाला]] का एक भाग है, जो सामान्यत: दक्षिण-पूर्व की ओर उठती चली जाती है। यहाँ ऊँचाई कहीं-कहीं ही 305 से अधिक होती है।&lt;br /&gt;
====नदियाँ====&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में अनेक नदियाँ है जिनमें गंगा, घाघरा, गोमती, यमुना, चम्बल, सोन आदि मुख्य है। प्रदेश के विभिन्न भागों में प्रवाहित होने वाली इन नदियों के उदगम स्थान भी भिन्न-भिन्न है, अतः इनके उदगम स्थलों के आधार पर इन्हें निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
#हिमालय पर्वत से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
#गंगा के मैदानी भाग से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
#दक्षिणी पठार से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
====झील====&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की झीलें}}&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में झीलों का अभाव है। यहाँ की अधिकांश झीलें [[कुमाऊँ]] क्षेत्र में हैं जो कि प्रमुखतः भूगर्भीय शक्तियों के द्वारा भूमि के धरातल में परिवर्तन हो जाने के परिणामस्वरूप निर्मित हुई हैं। &lt;br /&gt;
====नहर====&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की नहरें}}&lt;br /&gt;
नहरों के वितरण एवं विस्तार क दृष्टि से उत्तर प्रदेश का अग्रणीय स्थान है। यहाँ की कुल सिंचित भूमि का लगभग 30 प्रतिशत भाग नहरों के द्वारा सिंचित होता है। यहाँ की नहरें भारत की प्राचीनतम नहरों में से एक हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====अपवाह====&lt;br /&gt;
यह राज्य उत्तर में [[हिमालय]] और दक्षिण में विंध्य पर्वतमाला से उदगमित नदियों के द्वारा भली-भाँति अपवाहित है। [[गंगा]] एवं उसकी सहायक नदियों, [[यमुना नदी]], [[रामगंगा नदी]], [[गोमती नदी]], [[घाघरा नदी]] और [[गंडक नदी]] को हिमालय के हिम से लगातार पानी मिलता रहता है। विंध्य श्रेणी से निकलने वाली [[चंबल नदी]], [[बेतवा नदी]] और [[केन नदी]] [[यमुना नदी]] में मिलने से पहले राज्य के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में बहती है। विंध्य श्रेणी से ही निकलने वाली [[सोन नदी]] राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग में बहती है और राज्य की सीमा से बाहर [[बिहार]] में गंगा नदी से मिलती है।&lt;br /&gt;
====मृदा====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के क्षेत्रफल का लगभग दो-तिहाई भाग गंगा तंत्र की धीमी गति से बहने वाली नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी की गहरी परत से ढंका है। अत्यधिक उपजाऊ यह जलोढ़ मिट्टी कहीं रेतीली है, तो कहीं चिकनी दोमट। राज्य के दक्षिणी भाग की मिट्टी सामान्यतया मिश्रित [[लाल रंग|लाल]] और [[काला रंग|काली]] या लाल से लेकर [[पीला रंग|पीली]] है। राज्य के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में मृदा कंकरीली से लेकर उर्वर दोमट तक है, जो महीन रेत और ह्यूमस मिश्रित है, जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में घने जंगल हैं।&lt;br /&gt;
====जलवायु====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है। राज्य में औसत तापमान जनवरी में 12.50 से 17.50 से. रहता है, जबकि मई-जून में यह 27.50 से 32.50 से. के बीच रहता है। पूर्व से (1,000 मिमी से 2,000 मिमी) पश्चिम (610 मिमी से 1,000 मिमी) की ओर वर्षा कम होती जाती है। राज्य में लगभग 90 प्रतिशत वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होती है, जो जून से सितम्बर तक होती है। वर्षा के इन चार महीनों में होने के कारण बाढ़ एक आवर्ती समस्या है, जिससे ख़ासकर राज्य के पूर्वी हिस्से में फ़सल, जनजीवन व सम्पत्ति को भारी नुक़सान पहुँचता है। मानसून की लगातार विफलता के परिणामस्वरूप सूखा पड़ता है व फ़सल का नुक़सान होता है।&lt;br /&gt;
====वनस्पति एवं प्राणी जीवन====&lt;br /&gt;
राज्य में वन मुख्यत: दक्षिणी उच्चभूमि पर केन्द्रित हैं, जो ज़्यादातर झाड़ीदार हैं। विविध स्थलाकृति एवं जलवायु के कारण इस क्षेत्र का प्राणी जीवन समृद्ध है। इस क्षेत्र में शेर, तेंदुआ, [[हाथी]], जंगली सूअर, घड़ियाल के साथ-साथ कबूतर, फ़ाख्ता, जंगली बत्तख़, तीतर, मोर कठफोड़वा, नीलकंठ और बटेर पाए जाते हैं। कई प्रजातियाँ, जैसे-गंगा के मैदान से सिंह और तराई क्षेत्र से गैंडे अब विलुप्त हो चुके हैं। वन्य जीवन के संरक्षण के लिए सरकार ने 'चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य' और 'दुधवा अभयारण्य' सहित कई अभयारण्य स्थापित किए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जनजीवन==&lt;br /&gt;
'''इससे एक अलग राज्य के गठन होने के बावजूद''' उत्तर प्रदेश अभी भी जनसंख्या के मामले में सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों से काफ़ी आगे है। 2001 की जनगणना के अनुसार, राज्य की जनसंख्या 25.80 प्रतिशत बढ़ी। जनसंख्या का लौकिक अनुपात (प्रति 1000 पुरुष पर महिलाओं की संख्या) 898 दर्ज किया गया है, जो 1991 के 876 के मुक़ाबले बेहतर है। गंगा का मैदान, जहाँ जनसंख्या का घनत्व सबसे अधिक है, राज्य की 80 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करता है। इसकी तुलना में हिमालय क्षेत्र व दक्षिणी उच्चभूमि में जनसंख्या का घनत्व बहुत कम है।&lt;br /&gt;
==जातीय एवं भाषाई संघटन==&lt;br /&gt;
'''राज्य की अधिकांश जनसंख्या''' [[आर्य]]-[[द्रविड़]] जातीय समूह से सम्बद्ध है। यहाँ की जनसंख्या का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा [[हिन्दू]], लगभग 20 प्रतिशत [[मुसलमान]] व एक प्रतिशत से भी कम अन्य धार्मिक समुदायों, [[सिक्ख]], [[बौद्ध]], [[ईसाई धर्म|ईसाई]] व [[जैन]] मतावलम्बियों का है। [[हिन्दी]] (राज्य की राजकीय भाषा) 85 प्रतिशत व [[उर्दू]] 15 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा है। लोगों द्वारा बोले जाने वाली हिन्दुस्तानी भाषा में दोनों ही भाषाओं के सामान्य शब्द हैं, जिसे राज्य भर में समझा जाता है।&lt;br /&gt;
==आवासीन रचना==&lt;br /&gt;
'''राज्य की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या''' ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण आवासों की विशेषताएँ हैं-राज्य के पश्चिमी हिस्से में पाए जाने वाले घने बसे हुए गाँव, पूर्वी क्षेत्र में पाए जाने वाले छोटे गाँव और मध्य क्षेत्र में दोनों का समूह होता है, जिसकी छत फूस या मिट्टी के खपड़ों से बनी होती है। [[चित्र:Tajmahal-1.jpg|thumb|250px|[[ताजमहल]], [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Tajmahal, Agra]]  इन मकानों में हालांकि आधुनिक जीवन की बहुत कम सुविधाएँ हैं, लेकिन शहरों के पास बसे कुछ गाँवों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। सीमेंट से बने घर, पक्की सड़कें, बिजली, रेडियो, टेलीविजन जैसी उपभोक्ता वस्तुएँ पारम्परिक ग्रामीण जीवन को बदल रही हैं। शहरी जनसंख्या का आधे से अधिक हिस्सा एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में रहता है। [[कानपुर]] [[लखनऊ]], [[वाराणसी]] (बनारस), [[आगरा]] और [[इलाहाबाद]] उत्तर प्रदेश के पाँच सबसे बड़े नगर हैं। कानपुर उत्तर प्रदेश के मध्य क्षेत्र में स्थित प्रमुख औद्योगिक शहर है। कानपुर के पूर्वोत्तर में 48 किमी. की दूरी पर राज्य की राजधानी लखनऊ स्थित है। हिन्दुओं का सर्वाधिक पवित्र शहर वाराणसी विश्व के प्राचीनतम सतत आवासीय शहरों में से एक है। एक अन्य पवित्र शहर [[इलाहाबाद]] गंगा, यमुना और पौराणिक [[सरस्वती नदी]] के संगम पर स्थित है। राज्य के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित आगरा में [[मुग़ल]] बादशाह [[शाहजहाँ]] द्वारा अपनी बेगम की याद में बनवाया गया मक़बरा [[ताजमहल]] स्थित है। यह [[भारत]] के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है।&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के निम्न साधन हैं-&lt;br /&gt;
====संसाधन====&lt;br /&gt;
आर्थिक तौर पर उत्तर प्रदेश देश के अत्यधिक अल्पविकसित राज्यों में से एक है। यह मुख्यत: [[कृषि]] प्रधान राज्य है और यहाँ की तीन-चौथाई (75 प्रतिशत) से अधिक जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है। राज्य में औद्योगिकीकरण के लिए महत्वपूर्ण खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों की कमी है। यहाँ पर केवल सिलिका, चूना पत्थर व कोयले जैसे खनिज पदार्थ ही उल्लेखनीय मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा यहाँ जिप्सम, मैग्नेटाइट, फ़ॉस्फ़ोराइट और बॉक्साइट के अल्प भण्डार भी पाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
====कृषि एवं वानिकी====&lt;br /&gt;
राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। [[चावल]], [[गेहूँ]], [[ज्वार]], [[बाजरा]], [[जौ]] और [[गन्ना]] राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। 1960 के दशक से गेहूँ व चावल की उच्च पैदावार वाले बीजों के प्रयोग, उर्वरकों की अधिक उपलब्धता और सिंचाई के अधिक इस्तेमाल से उत्तर प्रदेश खाद्यान्न का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बन गया है। यद्यपि किसान दो प्रमुख समस्याओं से ग्रस्त हैं: आर्थिक रूप से अलाभकारी छोटे खेत और बेहतर उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी में निवेश करने के लिए अपर्याप्त संसाधन, राज्य की अधिकतम कृषि भूमि किसानों को मुश्किल से ही भरण-पोषण कर पाती है। पशुधन व डेयरी उद्योग आय के अतिरिक्त स्रोत हैं, हालांकि प्रति [[गाय]] [[दूध]] का उत्पादन कम है।&lt;br /&gt;
====उद्योग====&lt;br /&gt;
राज्य में काफ़ी समय से मौजूद वस्त्र उद्योग व चीनी प्रसंस्करण उद्योग में राज्य के कुल मिलकर्मियों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा लगा है। राज्य की अधिकांश मिलें पुरानी व अक्षम हैं। अन्य संसाधन आधारित उद्योगों में वनस्पति तेल, जूट व सीमेंट उद्योग शामिल हैं। केन्द्र सरकार ने यहाँ पर भारी उपकरण, मशीनें, इस्पात, वायुयान, टेलीफ़ोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और उर्वरकों के उत्पादन वाले बहुत से बड़े कारख़ाने स्थापित किए हैं। यहाँ [[मथुरा]] में एक तेल परिष्करणशाला और राज्य के दक्षिण-पूर्वी [[मिर्ज़ापुर]] ज़िले में कोयला क्षेत्र का विकास केन्द्र सरकार की दो प्रमुख परियोजनाएँ हैं। राज्य सरकार ने मध्यम और लघु स्तर के उद्योगों को प्रोत्साहन दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हस्तशिल्प, क़ालीन, पीतल की वस्तुएँ, जूते-चप्पल, चमड़े व खेल का सामान राज्य के निर्यात में प्रमुखता के साथ योगदान देते हैं। भदोई व मिर्ज़ापुर के क़ालीन दुनिया भर में सराहे जाते हैं। [[वाराणसी]] का रेशम व ज़री का काम, [[मुरादाबाद]] की पीतल की खूबसूरत वस्तुएँ, [[लखनऊ]] की चिकनकारी, नागुआ का आबनूस की लकड़ी का काम, [[फ़िरोज़ाबाद]] की काँच की वस्तुएँ और [[सहारनपुर]] का नक़क़ाशीदार लकड़ी का काम भी उल्लेखनीय है। उत्तर प्रदेश बिजली की भीषण कमी का शिकार है। 1951 से स्थापित अन्य विद्युत उत्पादन केन्द्रों से क्षमता बढ़ी है, लेकिन माँग और आपूर्ति के बीच अन्तर बढ़ता ही जा रहा है। भारत के अधिकतम तापविद्युत केन्द्रों में से एक ओबरा-रिहंद (दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश), राज्य के कई अन्य हिस्सों में स्थित विभिन्न पनबिजली संयंत्रों और बुलंदशहर के [[परमाणु]] बिजलीघर में बिजली का उत्पादन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 2004-05 में उत्तर प्रदेश में कुल 5,21,835 लघु उद्योग इकाइयाँ थीं, जिनमें लगभग 5,131 करोड़ रुपये की पूंजी का निवेश था और लगभग 20,01,000  लोग काम कर रहे थे। वर्ष 2004-05 में राज्य में लगभग 45.51 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ। उत्तर प्रदेश राज्य में 68 कपड़ा मिलें और 32 आटोमोबाइल के कारखाने हैं, जिनमें 5,740 करोड़ रुपये की पूंजी का निवेश है। [[चित्र:Krishna Birth Place Mathura-13.jpg|thumb|250px|left|[[कृष्ण जन्मभूमि]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Shri Krishna's Janm Bhumi, Mathura]] सन [[2011]] तक 'नोएडा प्राधिकरण' के अंतर्गत 102 सेक्टर विकसित करने की योजना चल रही है। इस प्राधिकरण में औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र, ग्रुप हाउसिंग क्षेत्र, आवासीय भवन, व्यावसायिक परिसंपत्तियां और संस्थागत शिक्षा क्षेत्र शामिल हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा की भांति ही राज्य में अन्य स्थानों पर औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करने के लिए कार्य किये जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
[[File:Buland-Darwaja-Fatehpur-Sikri-Agra.jpg|thumb|300px|[[बुलंद दरवाज़ा]], [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Buland Darwaja, Fatehpur Sikri, Agra]] &lt;br /&gt;
*[[14 जनवरी]], 2000 को 'उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड' का पुनर्गठन करके 'उत्तर प्रदेश विद्युत निगम', 'उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन' तथा 'उत्तर प्रदेश पनबिजली निगम' को स्थापित किया गया है।&lt;br /&gt;
*2004 - 05 में राज्य की सिंचाई क्षमता बढ़ाकर 319.17 लाख हेक्टेयरतक करने के लिए 98,715 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। &lt;br /&gt;
*'उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड' की स्थापना के समय पन बिजलीघरों और ताप बिजलीघरों की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 2,635 मेगावाट थी जो आज बढ़कर 4,621 मेगावाट तक हो गई है।&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
'''राज्य के प्रमुख शहर व नगर''' सड़कों व रेल सम्पर्क से जुड़े हैं, फिर भी आमतौर पर सड़कों की स्थिति ख़राब है और रेल की पटरियों की भिन्न लाइनों (बड़ी और छोटी) के बीच सामंजस्य न होने के कारण रेल प्रणाली भी प्रभावित हुई है। [[लखनऊ]] उत्तरी नेटवर्क का मुख्य जंक्शन है। उत्तर प्रदेश के मुख्य नगर वायुमार्ग द्वारा [[दिल्ली]] व भारत के अन्य शहरों से जुड़े हुए हैं। राज्य के भीतर के परिवहन तंत्र में गंगा, यमुना और घाघरा नदियों की अंतर्देशीय जल परिवहन व्यवस्था भी शामिल है। [[चित्र:Uttar-Pradesh-Map-1.jpg|thumb|250px|उत्तर प्रदेश का मानचित्र&amp;lt;br /&amp;gt; Map Of Uttar Pradesh]]&lt;br /&gt;
====सड़कें====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित सड़कों की कुल लंबाई 1,18,946 किलोमीटर है। इसमें 3,869 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग, 9,097 किलोमीटर प्रांतीय राजमार्ग, 1,05,980 किलोमीटर अन्य ज़िला सड़कें और 72,931 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें हैं।&lt;br /&gt;
====रेलवे मार्ग====&lt;br /&gt;
रेलवे का उत्तरी नेटवर्क का मुख्य जंक्शन राजधानी [[लखनऊ]] है। अन्य महत्त्वपूर्ण रेल जंक्शन- [[आगरा]], [[कानपुर]], [[इलाहाबाद]], मुग़लसराय, [[झाँसी]], [[मुरादाबाद]], [[वाराणसी]], टूंडला, [[गोरखपुर]], गोंडा, फ़ैज़ाबाद, [[बरेली]] और सीतापुर हैं।&lt;br /&gt;
====उड्डयन विभाग====&lt;br /&gt;
प्रदेश में लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, आगरा, झांसी, बरेली, [[ग़ाज़ियाबाद]], गोरखपुर, [[सहारनपुर]] और रायबरेली में हवाई अड्डे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रशासन एवं सामाज==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के प्रशासन एवं समाज की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-&lt;br /&gt;
====सरकार====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में सरकार का संसदीय स्वरूप है, जिसमें कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका शामिल है। कार्यपालिका में [[राज्यपाल]] होता है, जिसकी सहायता एवं सलाह के लिए [[मुख्यमंत्री]] के नेतृत्व में एक मंत्रिमण्डल होता है। विधायिका द्विसदनीय है: एक स्थायी निकाय विधान परिषद, जिसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं। [[विधान सभा]], जिसके सदस्य पाँच वर्ष के लिए चुने जाते हैं। न्यायपालिका में [[उच्च न्यायालय]] शामिल है, जिसका प्रमुख मुख्य न्यायाधीश होता है। राज्य का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में है, राजधानी लखनऊ में भी इसकी एक पीठ है। राज्य स्तर के नीचे स्थानीय प्रशासन के लिए 70 ज़िले हैं।&lt;br /&gt;
====शिक्षा====&lt;br /&gt;
राज्य में 16 विश्वविद्यालय, 400 से अधिक सम्बद्ध महाविद्यालय, कई चिकित्सा महाविद्यालय और विशिष्ट अध्ययनों व शोध के लिए कई संस्थान हैं। 1950 के दशक के बाद से राज्य में विद्यालयों व सभी स्तरों पर विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के बावजूद राज्य की जनसंख्या का 75.36 प्रतिशत हिस्सा ही साक्षर है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम [[हिन्दी]] (कुछ निजी विद्यालयों में माध्यम अंग्रेज़ी) है, उच्चतर विद्यालय के विद्यार्थी हिन्दी व अंग्रेज़ी में पढ़ाई करते हैं। जबकि विश्वविद्यालय स्तर पर आमतौर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी है। 1991 के 40.71 प्रतिशत के मुक़ाबले 2001 में राज्य की कुल साक्षरता दर बढ़कर 57.36 प्रतिशत हो गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्य में एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (कानपुर), एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (लखनऊ), एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और काफ़ी संख्या में पॉलीटेक्निक, इंजीनियरिंग व औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान हैं।&lt;br /&gt;
====स्वास्थ्य एवं जन कल्याण====&lt;br /&gt;
राज्य में स्वास्थ्य सेवाएँ विभिन्न सरकारी अस्पतालों व चिकित्सालयों, निजी एलोपैथिक, होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सों के द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। कुछ प्रमुख अस्पतालों को छोड़कर राज्य के अस्पतालों व चिकित्सालयों में प्रदान की जा रही स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर आमतौर पर ख़राब है। राज्य की जनसंख्या का एक बड़ा अनुपात अनुसूचित जाति व जनजाति का है। आज़ादी के बाद बहुत से केन्द्रीय व राज्य स्तर के कल्याणकारी कार्यक्रमों ने शिक्षा, रोज़गार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में इन लोगों को बेहतर अवसर प्रदान किए हैं।&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक जीवन==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश हिन्दुओं की प्राचीन सभ्यता का उदगम स्थल है'''। वैदिक साहित्य महाकाव्य [[रामायण]] और [[महाभारत]] (जिसमें [[श्रीमद्भागवदगीता]] शामिल है) के उल्लेखनीय हिस्सों का मूल यहाँ के कई आश्रमों में है। [[बौद्ध]]-[[हिन्दू]] काल (लगभग 600 ई. पू.-1200 ई.) के ग्रन्थों व वास्तुशिल्प ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत में बड़ा योगदान दिया है। 1947 के बाद से भारत सरकार का चिह्न मौर्य सम्राट [[अशोक]] के द्वारा बनवाए गए चार सिंह युक्त स्तम्भ ([[वाराणसी]] के निकट [[सारनाथ]] में स्थित) पर आधारित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तुशिल्प, चित्रकारी, [[संगीत]], [[नृत्यकला]] और दो भाषाएँ ([[हिन्दी]] व [[उर्दू]]) [[मुग़ल]] काल के दौरान यहाँ पर फली-फूली। इस काल के चित्रों में सामान्यतया धार्मिक व ऐतिहासिक ग्रन्थों का चित्रण है। यद्यपि [[साहित्य]] व संगीत का उल्लेख प्राचीन [[संस्कृत]] ग्रन्थों में किया गया है और माना जाता है कि [[गुप्त काल]] (लगभग 320-540) में संगीत समृद्ध हुआ। संगीत परम्परा का अधिकांश हिस्सा इस काल के दौरान उत्तर प्रदेश में विकसित हुआ। [[तानसेन]] व [[बैजू बावरा]] जैसे संगीतज्ञ मुग़ल शहंशाह [[अकबर]] के दरबार में थे, जो राज्य व समूचे देश में आज भी विख्यात हैं। भारतीय संगीत के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध वाद्य, [[सितार]] (वीणा परिवार का तंतु वाद्य) और [[तबला|तबले]] का विकास इसी काल के दौरान इस क्षेत्र में हुआ। 18वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश में [[वृन्दावन]] व [[मथुरा]] के मन्दिरों में भक्तिपूर्ण नृत्य के तौर पर विकसित शास्त्रीय नृत्य शैली कथक उत्तरी भारत की शास्त्रीय नृत्य शैलियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय गीत व नृत्य भी हैं। सबसे प्रसिद्ध लोकगीत मौसमों पर आधारित हैं।&lt;br /&gt;
==हिन्दी भाषा का जन्मस्थल==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश भारत की राजकीय भाषा हिन्दी''' की जन्मस्थली है। शताब्दियों के दौरान हिन्दी के कई स्थानीय स्वरूप विकसित हुए हैं। साहित्यिक हिन्दी ने 19वीं शताब्दी तक खड़ी बोली का वर्तमान स्वरूप (हिन्दुस्तानी) धारण नहीं किया था। वाराणसी के [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] (1850-1885 ई.) उन अग्रणी लेखकों में से थे, जिन्होंने हिन्दी के इस स्वरूप का इस्तेमाल साहित्यिक माध्यम के तौर पर किया था।&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक संस्थान==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश के कला संग्रहालयों में''' [[लखनऊ]] स्थित राज्य संग्रहालय, मथुरा स्थित पुरातात्विक संग्रहालय, बौद्ध पुरातात्विक संग्रहालय, सारनाथ संग्रहालय प्रमुख हैं। लखनऊ स्थित [[कला]] एवं हिन्दुस्तानी संगीत के महाविद्यालय और इलाहाबाद स्थित प्रयाग संगीत समिति ने देश में कला व शास्त्रीय संगीत के विकास में बहुत योगदान दिया है। नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन और हिन्दुस्तानी अकादमी हिन्दी साहित्य के विकास में सहायक रही हैं। हाल ही में उर्दू साहित्य के संरक्षण व समृद्धि के लिए राज्य सरकार ने उर्दू अकादमी की स्थापना की है।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
समय समय पर सभी धर्मों के त्योहार मनाये जाते हैं-&lt;br /&gt;
*इलाहाबाद में प्रत्येक बारहवें वर्ष में कुंभ का मेला आयोजित किया जाता है जो कि संभवत: दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। &lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त इलाहाबाद में प्रत्येक 6 साल बाद अर्द्ध कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kumbh mela.jpg|thumb|250px|left|[[इलाहाबाद]] में [[कुम्भ मेला]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kumbh Mela, Allahabad]]&lt;br /&gt;
*इलाहाबाद में ही प्रत्येक वर्ष जनवरी माह में [[माघ मेला]] भी आयोजित किया जाता है, जहां बडी संख्या में लोग [[संगम इलाहाबाद|संगम]] में नहाते हैं। &lt;br /&gt;
*अन्य मेलों में [[मथुरा]], [[वृन्दावन]] व [[अयोध्या]] में अनेक पर्वों के मेले और झूला मेले लगते हैं, जिनमें प्रभु की प्रतिमाओं को सोने एवं चांदी के झूलों में रखकर झुलाया जाता है। ये झूला मेले लगभग एक पखवाडे तक चलते हैं।  &lt;br /&gt;
*कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर [[गंगा नदी]] में डुबकी लगाना अत्यंत आस्था से परिपूर्ण है और बहुत ही पवित्र माना जाता है और इसके लिए [[गढ़मुक्तेश्वर]], [[सोरों]], [[राजघाट]], काकोरा, बिठूर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, और अयोध्या में बडी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। &lt;br /&gt;
*आगरा ज़िले के [[बटेश्वर उत्तर प्रदेश|बटेश्वर]] कस्बे में पशुओं का प्रसिद्ध मेला लगता है। &lt;br /&gt;
*[[बाराबंकी]] ज़िले का [[देवा मेला]] मुस्लिम संत वारिस अली शाह के कारण काफ़ी प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त यहाँ हिन्दू तथा मुस्लिमों के सभी प्रमुख त्योहारों को पूरे राज्य में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-Varanasi.jpg|thumb|250px|[[वाराणसी]] में [[गंगा नदी]] के घाट &amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Varanasi]]&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में सभी के लिए आकर्षण की कई चीजें हैं। &lt;br /&gt;
*[[ताजमहल]], [[आगरा]],&lt;br /&gt;
*प्राचीन तीर्थ स्थानों में [[वाराणसी]], विंध्याचल, [[अयोध्या]], [[चित्रकूट]], [[प्रयाग]], [[नैमिषारण्य]], [[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[देवा शरीफ]] आदि है।&lt;br /&gt;
*[[फ़तेहपुर सीकरी]] में [[सलीम चिश्ती|शेख़ सलीम चिश्ती]] की दरगाह, &lt;br /&gt;
*[[सारनाथ]], [[श्रावस्ती]], [[कुशीनगर]], संकिसा / बसंतपुर (ज़िला एटा, उत्तर प्रदेश), कांपिल/ वर्तमान फ़र्रूख़ाबाद, [[पिपरावा]] और [[कौशांबी]] प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
*आगरा, अयोध्या, सारनाथ, वाराणसी, लखनऊ, झांसी, गोरखपुर, [[जौनपुर]], कन्नौज, [[महोबा उत्तर प्रदेश|महोबा]] , देवगढ, बिठूर और विंध्याचल  हिन्दू एवं मुस्लिम वास्तुशिल्प और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण खजाने से भरा हैं।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;खैराडीह&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{मुख्य|खैराडीह }}&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले स्थित खैराडीह में 800 ई.पू. में आबादी शुरू हुई और ईसा की पहली तीन शताब्दियों में नगरीकरण चरम सीमा पर था।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;परखम &amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{मुख्य|परखम }}&lt;br /&gt;
*परखम ग्राम उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है।&lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से एक यक्ष की विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी, जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आँकड़े==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+जनगणना 2011 का उत्तर प्रदेश में ज़िलावार पुरुष, महिला संख्या का आँकड़ा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! ज़िला &lt;br /&gt;
! कुल आबादी&lt;br /&gt;
! पुरुष&lt;br /&gt;
! महिला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सहारनपुर]]&lt;br /&gt;
| 34,64,228&lt;br /&gt;
| 18,35,740&lt;br /&gt;
| 16,28,488&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मुजफ़्फ़रनगर&lt;br /&gt;
| 41,38,605&lt;br /&gt;
| 21,94,540&lt;br /&gt;
| 19,44,065&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बिजनौर]]&lt;br /&gt;
| 36,83,896&lt;br /&gt;
| 19,25,787&lt;br /&gt;
| 17,58,109&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मुरादाबाद]]&lt;br /&gt;
| 47,73,138&lt;br /&gt;
|25,08,299&lt;br /&gt;
|22,864,839&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रामपुर&lt;br /&gt;
|23,35,398&lt;br /&gt;
|12,26,175&lt;br /&gt;
|11,09,223&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ज्योतिबाफुलेनगर&lt;br /&gt;
|18,38,771&lt;br /&gt;
|09,64,319&lt;br /&gt;
|08,74,452&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मेरठ]]&lt;br /&gt;
|34,47,405&lt;br /&gt;
|18,29,192&lt;br /&gt;
|16,18,223&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बागपत&lt;br /&gt;
|13,02,156&lt;br /&gt;
|07,00,724&lt;br /&gt;
|06,01,432&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[गाजियाबाद]]&lt;br /&gt;
|46,61,452&lt;br /&gt;
|24,81,803&lt;br /&gt;
|21,69,649&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गौतमबुद्धनगर&lt;br /&gt;
|16,74,714&lt;br /&gt;
|09,04,505&lt;br /&gt;
|07,70,209&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बुलंदशहर&lt;br /&gt;
|34,98,507&lt;br /&gt;
|18,48,643&lt;br /&gt;
|16,49,864&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[अलीगढ़]]&lt;br /&gt;
|36,73,849&lt;br /&gt;
|19,58,536&lt;br /&gt;
|17,15,313&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महामायानगर&lt;br /&gt;
|15,65,678&lt;br /&gt;
|08,37,746&lt;br /&gt;
|07,28,232&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
|25,41,894&lt;br /&gt;
|13,68,445&lt;br /&gt;
|11,73,449&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[आगरा]]&lt;br /&gt;
|43,80,793&lt;br /&gt;
|23,56,104&lt;br /&gt;
|20,24,689&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[फ़िरोज़ाबाद]]&lt;br /&gt;
|24,96,761&lt;br /&gt;
|13,37,141&lt;br /&gt;
|11,59,620&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मैनपुरी&lt;br /&gt;
|18,47,194&lt;br /&gt;
|09,84,892&lt;br /&gt;
|08,62,302&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बदायूँ]]&lt;br /&gt;
|37,12,738&lt;br /&gt;
|19,97,242&lt;br /&gt;
|17,15,496&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बरेली]]&lt;br /&gt;
|44,65,344&lt;br /&gt;
|23,71,454&lt;br /&gt;
|20,93,890&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पीलीभीत&lt;br /&gt;
|20,37,225&lt;br /&gt;
|10,78,525&lt;br /&gt;
|09,58,700&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[शाहजहाँपुर]]&lt;br /&gt;
|30,02,376&lt;br /&gt;
|16,10,182&lt;br /&gt;
|13,92,194&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| खीरी&lt;br /&gt;
|40,13,634&lt;br /&gt;
|21,26,782&lt;br /&gt;
|18,86,852&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सीतापुर&lt;br /&gt;
|44,74,446&lt;br /&gt;
|23,80,666&lt;br /&gt;
|20,93,780&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरदोई&lt;br /&gt;
|40,91,380&lt;br /&gt;
|22,04,264&lt;br /&gt;
|18,87,116&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उन्नाव&lt;br /&gt;
|31,10,595&lt;br /&gt;
|16,36,295&lt;br /&gt;
|14,74,300&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[लखनऊ]]&lt;br /&gt;
|45,88,455&lt;br /&gt;
|24,07,897&lt;br /&gt;
|21,80,558&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[रायबरेली]]&lt;br /&gt;
|34,04,004&lt;br /&gt;
|17,53,344&lt;br /&gt;
|16,50,660&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फरुखाबाद&lt;br /&gt;
|18,87,577&lt;br /&gt;
|10,07,479&lt;br /&gt;
|08,80,098&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[कन्नौज]]&lt;br /&gt;
|16,58,005&lt;br /&gt;
|08,82,546&lt;br /&gt;
|07,75,459&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[इटावा]]&lt;br /&gt;
|15,79,160&lt;br /&gt;
|08,45,893&lt;br /&gt;
|07,75,459&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ओरैया&lt;br /&gt;
|13,72,287&lt;br /&gt;
|07,36,144&lt;br /&gt;
|06,36,143&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कानपुर देहात&lt;br /&gt;
|17,95,092&lt;br /&gt;
|09,64,284&lt;br /&gt;
|08,30,808&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[कानपुर|कानपुर नगर]]&lt;br /&gt;
|45,72,951&lt;br /&gt;
|24,69,114&lt;br /&gt;
|21,03,837&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जालौन &lt;br /&gt;
|16,70,718&lt;br /&gt;
|08,95,804&lt;br /&gt;
|07,74,914&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[झाँसी]]&lt;br /&gt;
|20,00,755&lt;br /&gt;
|10,61,310&lt;br /&gt;
|09,39,445&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ललितपुर&lt;br /&gt;
|12,18,002&lt;br /&gt;
|06,39,392&lt;br /&gt;
|05,78,610&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हमीरपुर &lt;br /&gt;
|11,04,021&lt;br /&gt;
|05,93,576&lt;br /&gt;
|05,10,445&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[महोबा उत्तर प्रदेश|महोबा]]&lt;br /&gt;
|08,76,055&lt;br /&gt;
|04,65,437&lt;br /&gt;
|04,10,118&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बांदा]]&lt;br /&gt;
|17,99,541&lt;br /&gt;
|09,66,123&lt;br /&gt;
|08,33,418&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[चित्रकूट]]&lt;br /&gt;
|09,90,626&lt;br /&gt;
|05,27,101&lt;br /&gt;
|04,63,525&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फतेहपुर&lt;br /&gt;
|26,32,684&lt;br /&gt;
|13,85,556&lt;br /&gt;
|12,47,128&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रतापगढ़&lt;br /&gt;
|31,73,752&lt;br /&gt;
|15,91,480&lt;br /&gt;
|15,82,272&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[कौशांबी]]&lt;br /&gt;
|51,96,909&lt;br /&gt;
|08,38,095&lt;br /&gt;
|07,58,814&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
|59,59,798&lt;br /&gt;
|31,33,479&lt;br /&gt;
|28,26,319&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बाराबंकी&lt;br /&gt;
|32,57,983&lt;br /&gt;
|17,07,951&lt;br /&gt;
|15,50,032&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फैजाबाद&lt;br /&gt;
|24,68,371&lt;br /&gt;
|12,58,455&lt;br /&gt;
|12,09,916&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अम्बेडकरनगर&lt;br /&gt;
|23,98,909&lt;br /&gt;
|12,14,225&lt;br /&gt;
|11,84,484&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सुल्तानपुर&lt;br /&gt;
|37,90,922&lt;br /&gt;
|190,16,297&lt;br /&gt;
|18,74,625&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बहराइच]]&lt;br /&gt;
|34,78,257&lt;br /&gt;
|18,38,988&lt;br /&gt;
|16,39,269&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
|11,14,615&lt;br /&gt;
|05,94,318&lt;br /&gt;
|05,20,297&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बलरामपुर&lt;br /&gt;
|21,49,066&lt;br /&gt;
|11,17,984&lt;br /&gt;
|10,31,082&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गोण्डा&lt;br /&gt;
|34,31,386&lt;br /&gt;
|17,85,629&lt;br /&gt;
|16,45,757&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सिद्धार्थनगर&lt;br /&gt;
|25,53,526&lt;br /&gt;
|12,96,046&lt;br /&gt;
|12,57,480&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बस्ती&lt;br /&gt;
|24,61,056&lt;br /&gt;
|12,56,158&lt;br /&gt;
|12,04,898&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| संतकबीरनगर&lt;br /&gt;
|17,14,300&lt;br /&gt;
|08,70,547&lt;br /&gt;
|08,43,753&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महाराजगंज&lt;br /&gt;
|26,65,292&lt;br /&gt;
|13,75,367&lt;br /&gt;
|12,89,925&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[गोरखपुर]]&lt;br /&gt;
|44,36,275&lt;br /&gt;
|22,81,763&lt;br /&gt;
|21,54,512&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[कुशीनगर]]&lt;br /&gt;
|35,60,830&lt;br /&gt;
|18,21,242&lt;br /&gt;
|17,39,588&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| देवरिया&lt;br /&gt;
|30,98,637&lt;br /&gt;
|15,39,608&lt;br /&gt;
|15,59,029&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आजमगढ़&lt;br /&gt;
|46,16,509&lt;br /&gt;
|22,89,336&lt;br /&gt;
|23,27,173&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मऊ&lt;br /&gt;
|22,05,170&lt;br /&gt;
|11,14,888&lt;br /&gt;
|10,90,282&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बलिया&lt;br /&gt;
|32,23,642&lt;br /&gt;
|16,67,557&lt;br /&gt;
|15,56,085&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[जौनपुर]]&lt;br /&gt;
|44,76,072&lt;br /&gt;
|22,17,635&lt;br /&gt;
|22,58,437&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गाजीपुर&lt;br /&gt;
|36,22,727&lt;br /&gt;
|18,56,584&lt;br /&gt;
|17,66,143&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चंदौली &lt;br /&gt;
|19,52,713&lt;br /&gt;
|10,20,789&lt;br /&gt;
|09,31,924&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
|36,82194&lt;br /&gt;
|19,28,641&lt;br /&gt;
|17,53,553&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| संत रविदास नगर&lt;br /&gt;
|15,54,203&lt;br /&gt;
|07,97,164&lt;br /&gt;
|07,57,039&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मिर्ज़ापुर]]&lt;br /&gt;
|24,94,533&lt;br /&gt;
|13,12,822&lt;br /&gt;
|11,81,711&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सोनभद्र&lt;br /&gt;
|18,62,612&lt;br /&gt;
|09,73,480&lt;br /&gt;
|08,89,132&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[एटा]]&lt;br /&gt;
|17,61,152&lt;br /&gt;
|09,45,157&lt;br /&gt;
|08,15,995&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कांशीरामनगर&lt;br /&gt;
|14,38,156&lt;br /&gt;
|07,65,529&lt;br /&gt;
|06,72,627&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
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{{Panorama&lt;br /&gt;
|image =चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-2.jpg&lt;br /&gt;
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|alt =फ़तेहपुर सीकरी&lt;br /&gt;
|caption=शेख़ [[सलीम चिश्ती]] की दरगाह ([[फ़तेहपुर सीकरी]]) का विहंगम दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View Of Shekh Salim Chishti Shrine (Fatehpur Sikri)&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery perrow=&amp;quot;3&amp;quot; widths=&amp;quot;200&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के नगर}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}{{राज्य और के. शा. प्र.2}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%96%E0%A4%AE&amp;diff=152457</id>
		<title>परखम</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%96%E0%A4%AE&amp;diff=152457"/>
		<updated>2011-04-16T06:45:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: '*परखम ग्राम उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*परखम ग्राम [[उत्तर प्रदेश]] के मथुरा ज़िले से 14 मील दूर [[आगरा]]-[[दिल्ली]] मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*परखम ग्राम से एक यक्ष की विशालकाय मूर्ति प्राप्त हुई थी, जो अब [[मथुरा संग्रहालय]] में है। &lt;br /&gt;
*मूर्ति में यक्ष को सुन्दर ढंग से [[धोती]], दुपट्टा तथा कुछ सादे गहने, जैसे- कर्णफूल, गुलूबंद, ग्रैवेयक आदि पहनाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*मूर्ति की चरण-चौकी पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में तीन पंक्तियों का एक लेख खुदा है। &lt;br /&gt;
*जिससे ज्ञात होता है कि कुणिक के शिष्य गोमित्र ने इस मूर्ति को बनाया था। &lt;br /&gt;
*परखम से प्राप्त यह मूर्ति मथुरा की प्राचीनतम मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*यह [[मौर्यकाल|मौर्यकालीन]] है किंतु फिर भी इस पर प्रमार्जन नहीं है जो तत्कालीन स्थापत्य की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*इस मूर्ति के आधार पर मथुरा मूर्ति-कला की परम्परा में शुंगकाल में यक्षों की तथा [[कुषाण काल]] में बोधिसत्वों की मूर्तियों का निर्माण हुआ था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>उत्तर प्रदेश</title>
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		<updated>2011-04-16T06:45:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: /* इतिहास */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Uttar Pradesh Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[लखनऊ]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=166,052,859&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=689&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=240928 km²&lt;br /&gt;
|मंडल=18&lt;br /&gt;
|ज़िले=71&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=[[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|महानगर=[[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=[[लखनऊ]], [[इलाहाबाद]], [[आगरा]], [[मेरठ]], [[वाराणसी]], [[ग़ाज़ियाबाद]], [[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=[[हिन्दी भाषा]], [[उर्दू भाषा]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1950/01/12&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=[[वाराणसी]], [[आगरा]], [[इलाहाबाद]], [[कन्नौज]], [[कुशीनगर]], [[कौशाम्बी]], [[चित्रकूट]], झांसी, फ़ैज़ाबाद, [[मेरठ]], [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=[[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[आगरा]], [[वाराणसी]], [[अयोध्या]], [[चित्रकूट]], [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[सारनाथ]], [[श्रावस्ती]], [[कुशीनगर]]&lt;br /&gt;
|मुख्य धर्म-सम्प्रदाय=[[हिन्दू धर्म|हिन्दू]], [[इस्लाम धर्म|इस्लाम]], [[ईसाई धर्म|ईसाई]], [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]], [[जैन धर्म|जैन]]&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:898&lt;br /&gt;
|साक्षरता=57.36&lt;br /&gt;
|स्त्री=42.97&lt;br /&gt;
|पुरुष=70.22&lt;br /&gt;
|जलवायु=उष्णदेशीय मानसून&lt;br /&gt;
|तापमान=31 °C&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=5°C&lt;br /&gt;
|उच्च न्यायालय=[[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[बी. एल. जोशी]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[मायावती]]&lt;br /&gt;
|नेता विरोधी दल=[[शिवपाल सिंह यादव]]&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=404&lt;br /&gt;
|विधान परिषद सदस्य संख्या=100&lt;br /&gt;
|लोकसभा क्षेत्र=80&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://upgov.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|15:56, 25 मार्च 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Uttar Pradesh Logo.gif&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश''' [[भारत]]  का  जनसंख्या के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। [[लखनऊ]] प्रदेश की प्रशासनिक राजधानी और [[इलाहाबाद]] न्यायिक राजधानी है। उत्तर प्रदेश के दूसरे महत्त्वपूर्ण नगर- [[आगरा]], [[अलीगढ़]], [[अयोध्या]], [[बरेली]], [[मेरठ]], [[वाराणसी]] (बनारस), [[गोरखपुर]], [[ग़ाज़ियाबाद]], [[मुरादाबाद]], [[सहारनपुर]], फ़ैज़ाबाद, [[कानपुर]]  हैं। इस राज्य के पड़ोसी राज्य हैं - [[उत्तराखंड|उत्तरांचल]], [[हिमाचल प्रदेश]], [[हरियाणा]], [[दिल्ली]], [[राजस्थान]], [[मध्य प्रदेश]], [[छत्तीसगढ़]], [[झारखण्ड]], [[बिहार]]। उत्तर प्रदेश की पूर्वोत्तर दिशा में [[नेपाल]] देश है। उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल 2,40,927 वर्ग किमी. है। यह भारत का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है। 9 नवम्बर, 2000 को इसमें से अलग कर उत्तरांचल राज्य का गठन किया गया।&lt;br /&gt;
26 जनवरी, 1950 को भारत के गणतंत्र बनने पर राज्य को अपना वर्तमान नाम उत्तर प्रदेश मिला था।&lt;br /&gt;
==सघन आबादी वाला राज्य==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश सघन आबादी वाले''' [[गंगा नदी]] और [[यमुना नदी]] के मैदान में बसा है। लगभग 16 करोड़ की जनसंख्या के साथ उत्तर प्रदेश केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला उपराष्ट्रीय प्रदेश है। समूचे विश्व के सिर्फ़ पांच राष्ट्रों [[चीन]], भारत, [[संयुक्त राज्य अमरीका|संयुक्त अमरीका]], इंडोनिशिया और ब्राज़ील की जनसंख्या ही उत्तर-प्रदेश की जनसंख्या से अधिक है। उत्तर प्रदेश का भारतीय एवं [[हिन्दू धर्म]] के इतिहास में बहुत योगदान है। उत्तर प्रदेश आधुनिक इतिहास और राजनीति का सदैव से केन्द्र बिन्दु रहा है। यहाँ के निवासियों ने [[सिपाही स्वतंत्रता संग्राम|स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन]] में प्रमुख भूमिका निभायी थी। [[इलाहाबाद]] शहर में विख्यात नेताओं- [[मोतीलाल नेहरू]], पुरुषोत्तमदास टन्डन और [[लालबहादुर शास्त्री]] आदि प्रमुख नेताओं का घर था। यह शहर देश के आठ प्रधानमन्त्रियों- [[जवाहरलाल नेहरू]], [[इंदिरा गाँधी]], [[लालबहादुर शास्त्री]], [[चौधरी चरण सिंह]], [[विश्वनाथ प्रताप सिंह]], [[चन्द्रशेखर सिंह|चन्द्रशेखर सिंह]], [[राजीव गांधी]] और [[अटल बिहारी वाजपेयी]] का चुनाव क्षेत्र भी रहा है। इंदिरा गांधी के पुत्र स्वर्गीय संजय गांधी का चुनाव-क्षेत्र भी यही था और आजकल भू.पू. प्रधानमंत्री स्व. राजीव गाँधी की पत्नी श्रीमती [[सोनिया गांधी]] भी [[रायबरेली]] से चुनाव लड़तीं हैं और उनके पुत्र [[राहुल गाँधी]] भी अमेठी से चुनाव लड़ते हैं।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश का इतिहास बहुत प्राचीन है'''। उत्तर प्रदेश के इतिहास को पाँच कालों में बाँटा जा सकता है-प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक काल (लगभग 600 ई.पू. तक), [[बौद्ध]]-[[हिन्दू]] ([[ब्राह्मण]]) काल (लगभग 600 ई.पू. से लगभग 1200 ई.), मुस्लिम काल (लगभग 1200 से 1775 ई.), ब्रिटिश काल (लगभग 1775 से 1947 ई.), स्वतंत्रता पश्चात का काल (1947 से वर्तमान तक)। गंगा के मैदान के बीचोंबीच की अपनी स्थिति के कारण उत्तर प्रदेश समूचे उत्तरी भारत के इतिहास का केन्द्र बिन्दु रहा है। उत्तर वैदिक काल में इसे 'ब्रहर्षि देश' या 'मध्य देश' के नाम से जाना जाता था। उत्तर प्रदेश वैदिक काल में कई महान [[ऋषि]]-[[मुनि|मुनियों]], जैसे - [[भारद्वाज]], [[गौतम]], [[याज्ञवल्क्य]], [[वसिष्ठ]], [[विश्वामित्र]] और [[वाल्मीकि]] आदि की तपोभूमि रहा है। कई पवित्र पुस्तकों की रचना भी यहीं हुई। भारत के दो मुख्य महाकाव्य [[रामायण]] और [[महाभारत]] की कथा भी यहीं की है। [[चित्र:Vishwanath-Temple-Varanasi.jpg|thumb|left|[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ मन्दिर]], [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Vishwanath Temple, Varanasi]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर प्रदेश में दो नए धर्मों - [[जैन]] और [[बौद्ध]]  का विकास हुआ। [[बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश [[सारनाथ]] में दिया और [[बौद्ध धर्म]] की शुरूआत की। उत्तर प्रदेश के ही [[कुशीनगर]] में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। उत्तर प्रदेश के कई नगर जैसे- [[अयोध्या]], [[प्रयाग]], [[वाराणसी]] और [[मथुरा]] विद्या अध्ययन के लिए प्रसिद्ध केंद्र थे। मध्य काल में उत्तर प्रदेश मुस्लिम शासकों के अधीन हो गया था, जिससे [[हिन्दू]] और [[इस्लाम धर्म]] के पास आने से एक नई मिली-जुली संस्कृति का विकास हुआ। [[तुलसीदास]], [[सूरदास]], [[रामानंद]] और उनके मुस्लिम शिष्य [[कबीर]] के अतिरिक्त अन्य कई संत पुरुषों ने [[हिन्दी]] और अन्य भाषाओं के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश का इतिहास लगभग 4000 वर्ष पुराना है, जब [[आर्य]] यहाँ आये और वैदिक सभ्यता का आरम्भ हुआ, तभी से यहाँ का इतिहास मिलता है। आर्य [[सिन्धु नदी|सिन्धु]] और [[सतलुज नदी|सतलुज]] के मैदानी भागों से यमुना और गंगा के मैदानी भाग की ओर बढ़े। इन्होंने यमुना और गंगा के मैदानी भाग और [[घाघरा नदी|घाघरा]] क्षेत्र को अपना घर बनाया। इन्हीं आर्यों के नाम पर भारत देश का नाम '[[आर्यावर्त]]' अथवा 'भारतवर्ष' (भरत आर्यों के एक चक्रवर्ती राजा थे, जिनके नाम और ख्याति से यह देश भारतवर्ष के नाम से जाना गया) पड़ा।&lt;br /&gt;
====प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक काल====&lt;br /&gt;
'''पुरातत्व ने उत्तर प्रदेश की आरम्भिक सभ्यता''' पर नई रौशनी डाली है। दक्षिणी ज़िले प्रतापगढ़ में पाई गई मानव खोपड़ियों के अवशेष लगभग 10,000 ई. पू. के बताए गए हैं। वैदिक साहित्य और दो महाकाव्यों, [[रामायण]] व [[महाभारत]] से इस क्षेत्र के सातवीं शताब्दी ई. पू. के पहले की जानकारी मिलती है। जिसमें गंगा के मैदानों का वर्णन उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत किया गया है। महाभारत की पृष्ठभूमि राज्य के पश्चिमी हिस्से [[हस्तिनापुर]] के आसपास है, जबकि रामायण की पृष्ठभूमि पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्य में भगवान [[राम]] का जन्मस्थान [[अयोध्या]] है। राज्य में दे अन्य पौराणिक स्रोत हैं-[[वृन्दावन]] व [[मथुरा]] के आसपास के क्षेत्र जहाँ [[कृष्ण]] का जन्म हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामायण में हिन्दुओं के भगवान राम का प्राचीन राज्य [[कौशल]] इसी क्षेत्र में था, अयोध्या कौशल राज्य की राजधानी थी। [[हिन्दू धर्म]] के अनुसार भगवान [[विष्णु]] के आठवें अवतार भगवान कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में हुआ था। विश्व के प्राचीनतम नगरों में से एक माना जाने वाला वाराणसी शहर भी इसी प्रदेश में है। वाराणसी के समीप सारनाथ का [[स्तूप]] भगवान [[बुद्ध]] के लिए प्रसिद्ध है। समय के साथ साथ यह विशाल क्षेत्र छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया और [[गुप्त]], [[मौर्य]] और [[कुषाण]] साम्राज्यों का भाग बन गया। 7वीं शताब्दी में [[कन्नौज]] गुप्त साम्राज्य का प्रमुख केन्द्र बन गया था।&lt;br /&gt;
====बौद्ध-हिन्दू (ब्राह्मण) काल====&lt;br /&gt;
'''सातवीं शताब्दी ई. पू. के अन्त से भारत और उत्तर प्रदेश''' का व्यवस्थित इतिहास आरम्भ होता है, जब उत्तरी भारत में 16 महाजनपद श्रेष्ठता की दौड़ में शामिल थे, इनमें से सात वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के अंतर्गत थे। [[बुद्ध]] ने अपना पहला उपदेश वाराणसी (बनारस) के निकट [[सारनाथ]] में दिया और एक ऐसे धर्म की नींव रखी, जो न केवल भारत में, बल्कि [[चीन]] व [[जापान]] जैसे सुदूर देशों तक भी फैला। कहा जाता है कि, बुद्ध को [[कुशीनगर]] में परिनिर्वाण (शरीर से मुक्त होने पर [[आत्मा]] की मुक्ति) प्राप्त हुआ था, जो पूर्वी ज़िले देवरिया में स्थित है। पाँचवीं शताब्दी ई. पू. से छठी शताब्दी ई. तक उत्तर प्रदेश अपनी वर्तमान सीमा से बाहर केन्द्रित शक्तियों के नियंत्रण में रहा, पहले [[मगध]], जो वर्तमान [[बिहार]] राज्य में स्थित था, और बाद में [[उज्जैन]], जो वर्तमान [[मध्य प्रदेश]] राज्य में स्थित है। इस राज्य पर शासन कर चुके इस काल के महान शासकों में [[चन्द्रगुप्त प्रथम]] (शासनकाल लगभग 330-380 ई.) व [[अशोक]] (शासनकाल लगभग 268 या 265-238), जो मौर्य सम्राट थे और [[समुद्रगुप्त]] (लगभग 330-380 ई.) और [[चन्द्रगुप्त द्वितीय]] हैं (लगभग 380-415 ई., जिन्हें कुछ विद्वान विक्रमादित्य मानते हैं)। एक अन्य प्रसिद्ध शासक [[हर्षवर्धन]] (शासनकाल 606-647) थे। जिन्होंने कान्यकुब्ज (आधुनिक [[कन्नौज]] के निकट) स्थित अपनी राजधानी से समूचे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, [[पंजाब]] और [[राजस्थान]] के कुछ हिस्सों पर शासन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस काल के दौरान बौद्ध और हिन्दू (ब्राह्मण) संस्कृति, दोनों का उत्कर्ष हुआ। अशोक के शासनकाल के दौरान बौद्ध कला के स्थापत्य व वास्तुशिल्प प्रतीक अपने चरम पर पहुँचे। गुप्त काल (लगभग 320-550) के दौरान हिन्दू कला का भी अधिकतम विकास हुआ। लगभग 647 ई. में हर्ष की मृत्यु के बाद हिन्दूवाद के पुनरुत्थान के साथ ही बौद्ध धर्म का धीरे-धीरे पतन हो गया। इस पुनरुत्थान के प्रमुख रचयिता दक्षिण [[भारत]] में जन्मे शंकर थे, जो वाराणसी पहुँचे, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मैदानों की यात्रा की और [[हिमालय]] में [[बद्रीनाथ]] में प्रसिद्ध मन्दिर की स्थापना की। इसे हिन्दू मतावलम्बी चौथा एवं अन्तिम मठ (हिन्दू संस्कृति का केन्द्र) मानते हैं।&lt;br /&gt;
====मुस्लिम काल====&lt;br /&gt;
'''इस क्षेत्र में हालांकि 1000-1030 ई. तक''' मुसलमानों का आगमन हो चुका था, लेकिन उत्तरी भारत में 12वीं शताब्दी के अन्तिम दशक के बाद ही मुस्लिम शासन स्थापित हुआ, जब [[मुहम्मद ग़ोरी]] ने गहड़वालों (जिनका उत्तर प्रदेश पर शासन था) और अन्य प्रतिस्पर्धी वंशों को हराया था। लगभग 600 वर्षों तक अधिकांश भारत की तरह उत्तर प्रदेश पर भी किसी न किसी मुस्लिम वंश का शासन रहा, जिनका केन्द्र [[दिल्ली]] या उसके आसपास था। 1526 ई. में [[बाबर]] ने दिल्ली के सुल्तान [[इब्राहीम लोदी]] को हराया और सर्वाधिक सफल मुस्लिम वंश, [[मुग़ल]] वंश की नींव रखी। इस साम्राज्य ने 200 वर्षों से भी अधिक समय तक उपमहाद्वीप पर शासन किया। इस साम्राज्य का महानतम काल [[अकबर]] (शासनकाल 1556-1605 ई.) का काल था, जिन्होंने [[आगरा]] के पास नई शाही राजधानी [[फ़तेहपुर सीकरी]] का निर्माण किया। उनके पोते [[शाहजहाँ]] (शासनकाल 1628-1658 ई.) ने आगरा में [[ताजमहल]] (अपनी बेगम की याद में बनवाया गया मक़बरा, जो प्रसव के दौरान चल बसी थीं) बनवाया, जो विश्व के महानतम वास्तु शिल्पीय नमूनों में से एक है। शाहजहाँ ने आगरा व दिल्ली में भी वास्तुशिल्प की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण इमारतें बनवाईं थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में केन्द्रित मुग़ल साम्राज्य ने एक नई मिश्रित संस्कृति के विकास को प्रोत्साहित किया। अकबर इसके महानतम प्रतिपादक थे, जिन्होंने बिना किसी भेदभाव के अपने दरबार में वास्तुशिल्प, [[साहित्य]], चित्रकला और [[संगीत]] विशेषज्ञों को नियुक्त किया था। हिन्दुत्व और इस्लाम के टकराव ने कई नए मतों का विकास किया, जो इन दोनों और [[भारत]] की विभिन्न जातियों के बीच आम सहमति क़ायम करना चाहते थे। [[भक्ति आन्दोलन]] के संस्थापक रामानन्द (लगभग 1400-1470 ई.), जिनका दावा था कि, मुक्ति लिंग या जाति पर आश्रित नहीं है और सभी धर्मों के बीच अनिवार्य एकता की शिक्षा देने वाले [[कबीर]] ने उत्तर प्रदेश में मौजूद धार्मिक सहिष्णुता के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई केन्द्रित की। 18वीं शताब्दी में मुग़लों के पतन के साथ ही इस मिश्रित संस्कृति का केन्द्र दिल्ली से लखनऊ चला गया, जो अवध (औध, वर्तमान अयोध्या) के नवाब के अन्तर्गत था और जहाँ साम्प्रदायिक सदभाव के माहौल में [[कला]], साहित्य, संगीत और काव्य का उत्कर्ष हुआ।&lt;br /&gt;
====ब्रिटिश काल====&lt;br /&gt;
'''लगभग 75 वर्ष की अवधि में वर्तमान उत्तर प्रदेश''' के क्षेत्र का [[ईस्ट इण्डिया कम्पनी]] (ब्रिटिश व्यापारिक कम्पनी) ने धीरे-धीरे अधिग्रहण किया। विभिन्न उत्तर भारतीय वंशों 1775, 1798 और 1801 में नवाबों, 1803 में सिंधिया और 1816 में [[गोरखा|गोरखों]] से छीने गए प्रदेशों को पहले बंगाल प्रेज़िडेन्सी के अन्तर्गत रखा गया, लेकिन 1833 में इन्हें अलग करके पश्चिमोत्तर प्रान्त (आरम्भ में आगरा प्रेज़िडेन्सी कहलाता था) गठित किया गया। 1856 ई. में कम्पनी ने [[अवध]] पर अधिकार कर लिया और आगरा एवं अवध संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के समरूप) के नाम से इसे 1877 ई. में पश्चिमोत्तर प्रान्त में मिला लिया गया। 1902 ई. में इसका नाम बदलकर संयुक्त प्रान्त कर दिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1857-1859 ई. के बीच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध हुआ विद्रोह मुख्यत: पश्चिमोत्तर प्रान्त तक सीमित था। 10 मई, 1857 ई. को [[मेरठ]] में सैनिकों के बीच भड़का विद्रोह कुछ ही महीनों में 25 से भी अधिक शहरों में फैल गया। 1858 ई. में विद्रोह के दमन के बाद पश्चिमोत्तर और शेष ब्रिटिश भारत का प्रशासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी से ब्रिटिश ताज को हस्तान्तरित कर दिया गया। 1880 ई. के उत्तरार्द्ध में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के साथ संयुक्त प्रान्त स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी रहा। प्रदेश ने भारत को [[मोतीलाल नेहरू]], [[मदन मोहन मालवीय]], [[जवाहरलाल नेहरू]] और पुरुषोत्तमदास टंडन जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी राजनीतिक नेता दिए। 1922 में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने के लिए किया गया [[महात्मा गांधी]] का [[असहयोग आन्दोलन]] पूरे संयुक्त प्रान्त में फैल गया, लेकिन चौरी चौरा गाँव (प्रान्त के पूर्वी भाग में) में हुई हिंसा के कारण महात्मा गांधी ने अस्थायी तौरर पर आन्दोलन को रोक दिया। संयुक्त प्रान्त [[मुस्लिम लीग]] की राजनीति का भी केन्द्र रहा। ब्रिटिश काल के दौरान रेलवे, नहर और प्रान्त के भीतर ही संचार के साधनों का व्यापक विकास हुआ। अंग्रेज़ों ने यहाँ आधुनिक शिक्षा को भी बढ़ावा दिया और यहाँ पर लखनऊ विश्वविद्यालय (1921 में स्थापित) जैसे विश्वविद्यालय व कई महाविद्यालय स्थापित किए।&lt;br /&gt;
====स्वतंत्रता पश्चात का काल====&lt;br /&gt;
'''1947 में संयुक्त प्रान्त नव स्वतंत्र भारतीय गणराज्य की एक''' प्रशासनिक इकाई बना। दो साल बाद इसकी सीमा के अन्तर्गत स्थित, टिहरी गढ़वाल और रामपुर के स्वायत्त राज्यों को संयुक्त प्रान्त में शामिल कर लिया गया। 1950 में नए संविधान के लागू होने के साथ ही संयुक्त प्रान्त का नाम उत्तर प्रदेश रखा गया और यह भारतीय संघ का राज्य बना। स्वतंत्रता के बाद से [[भारत]] में इस राज्य की प्रमुख भूमिका रही है। इसने देश को जवाहर लाल नेहरू और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी सहित कई [[प्रधानमंत्री]], सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक आचार्य नरेन्द्र देव, जैसे प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी (अल्पसंख्यक) दलों के नेता और भारतीय जनसंघ, बाद में भारतीय जनता पार्टी व प्रधानमंत्री [[अटल बिहारी वाजपेयी]] जैसे नेता दिए हैं। राज्य की राजनीति, हालांकि विभाजनकारी रही है और कम ही मुख्यमंत्रियों ने पाँच वर्ष की अवधि पूरी की है।&lt;br /&gt;
====राज्य का विभाजन====&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश के गठन के तुरन्त बाद''' [[उत्तराखण्ड]] क्षेत्र (गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र द्वारा निर्मित) में समस्याएँ उठ खड़ी हुईं। इस क्षेत्र के लोगों को लगा कि, विशाल जनसंख्या और वृहद भौगोलिक विस्तार के कारण लखनऊ में बैठी सरकार के लिए उनके हितों की देखरेख करना सम्भव नहीं है। बेरोज़गारी, ग़रीबों और सामान्य व्यवस्था व पीने के पानी जैसी आधारभूत सुविधाओं की कमी और क्षेत्र के अपेक्षाकृत कम विकास ने लोगों को एक अलग राज्य की माँग करने पर विवश कर दिया। शुरू-शुरू में विरोध कमज़ोर था, लेकिन 1990 के दशक में इसने ज़ोर पकड़ा व आन्दोलन तब और भी उग्र हो गया, जब 2 अक्टूबर 1994 को मुज़फ़्फ़रनगर में इस आन्दोलन के एक प्रदर्शन में पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में 40 लोग मारे गए। अन्तत: नवम्बर, 2000 में उत्तर प्रदेश के पश्चिमोत्तर हिस्से से उत्तरांचल के नए राज्य का, जिसमें कुमाऊं और गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्र शामिल थे, गठन किया गया।&lt;br /&gt;
====प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम====&lt;br /&gt;
'''सन 1857 में अंग्रेज़ी फ़ौज के भारतीय सिपाहियों ने''' बग़ावत कर दी थी। यह बग़ावत लगभग एक वर्ष तक चली और धीरे धीरे यह बग़ावत पूरे उत्तर भारत में फ़ैल गयी। इसी बग़ावत को [[भारत]] का [[सिपाही स्वतंत्रता संग्राम|प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] नाम दिया गया। यह बग़ावत [[मेरठ]] शहर से शुरू हुई। जिसका कारण [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] द्वारा [[गाय]] और सुअर की चर्बी से बने कारतूस थे। इस बग़ावत की वज़ह लॉर्ड डलहौज़ी की राज्य हड़पने की नीति भी थी। यह संग्राम मुख्यतः [[दिल्ली]], [[लखनऊ]], [[कानपुर]], [[झाँसी]] और [[बरेली]] में लड़ा गया। इस संग्राम में [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई]], [[अवध]] की [[बेगम हज़रत महल]], बख़्त खान, [[नाना साहब|नाना साहेब]], [[तात्या टोपे]] आदि अनेक देशभक्तों ने भाग लिया। [[चित्र:Ganga-River-Aarti.jpg|thumb|250px|आरती, [[गंगा नदी]], [[इलाहाबाद]]&amp;lt;br /&amp;gt; Aarti, Ganga River, Allahabad]] उत्तर प्रदेश राज्य की बौद्धिक श्रेष्ठता ब्रिटिश शासन काल में भी बनी रही। सन [[1902]] में 'नार्थ वेस्ट प्रोविन्स' का नाम बदल कर 'यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध' कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे 'यू. पी.' कहा गया। सन [[1920]] में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद के स्थान पर लखनऊ बना दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक न्यायपीठ शाखा (हाईकोर्ट बैंच) स्थापित की गयी। बाद में 1935 में इसका संक्षिप्त नाम 'संयुक्त प्रांत' प्रचलित हो गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 12 जनवरी [[1950]] में 'संयुक्त प्रांत' का नाम बदल कर ‘उत्तर प्रदेश’ रखा गया। [[गोविंद बल्लभ पंत]] इस प्रदेश के प्रथम मुख्य मन्त्री बने। अक्टूबर [[1963]] में सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश और भारत की 'प्रथम महिला मुख्यमन्त्री' बनीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन [[2000]] में भारतीय [[संसद]] ने उत्तर-प्रदेश के उत्तर पश्चिमी, पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश के मुख्यतः पहाड़ी भाग गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डल को मिला कर उत्तर प्रदेश को विभाजित कर उत्तरांचल राज्य का निर्माण किया, जिसका नाम बाद में बदल कर [[उत्तराखंड]] कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश की अधिकांश [[उत्तर प्रदेश की झीलें|झीलें]] कुमाऊँ क्षेत्र में हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भूगोल==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के प्रमुख भूगोलीय तत्व इस प्रकार से हैं-&lt;br /&gt;
====भूमि====&lt;br /&gt;
*'''भू-आकृति''' - उत्तर प्रदेश को दो विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों, गंगा के मध्यवर्ती मैदान और दक्षिणी उच्चभूमि में बाँटा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा गंगा के मैदान में है। मैदान अधिकांशत: गंगा व उसकी सहायक नदियों के द्वारा लाए गए जलोढ़ अवसादों से बने हैं। इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में उतार-चढ़ाव नहीं है, यद्यपि मैदान बहुत उपजाऊ है, लेकिन इनकी ऊँचाई में कुछ भिन्नता है, जो पश्चिमोत्तर में 305 मीटर और सुदूर पूर्व में 58 मीटर है। गंगा के मैदान की दक्षिणी उच्चभूमि अत्यधिक विच्छेदित और विषम [[विंध्य पर्वतमाला]] का एक भाग है, जो सामान्यत: दक्षिण-पूर्व की ओर उठती चली जाती है। यहाँ ऊँचाई कहीं-कहीं ही 305 से अधिक होती है।&lt;br /&gt;
====नदियाँ====&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में अनेक नदियाँ है जिनमें गंगा, घाघरा, गोमती, यमुना, चम्बल, सोन आदि मुख्य है। प्रदेश के विभिन्न भागों में प्रवाहित होने वाली इन नदियों के उदगम स्थान भी भिन्न-भिन्न है, अतः इनके उदगम स्थलों के आधार पर इन्हें निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
#हिमालय पर्वत से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
#गंगा के मैदानी भाग से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
#दक्षिणी पठार से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
====झील====&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की झीलें}}&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में झीलों का अभाव है। यहाँ की अधिकांश झीलें [[कुमाऊँ]] क्षेत्र में हैं जो कि प्रमुखतः भूगर्भीय शक्तियों के द्वारा भूमि के धरातल में परिवर्तन हो जाने के परिणामस्वरूप निर्मित हुई हैं। &lt;br /&gt;
====नहर====&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की नहरें}}&lt;br /&gt;
नहरों के वितरण एवं विस्तार क दृष्टि से उत्तर प्रदेश का अग्रणीय स्थान है। यहाँ की कुल सिंचित भूमि का लगभग 30 प्रतिशत भाग नहरों के द्वारा सिंचित होता है। यहाँ की नहरें भारत की प्राचीनतम नहरों में से एक हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====अपवाह====&lt;br /&gt;
यह राज्य उत्तर में [[हिमालय]] और दक्षिण में विंध्य पर्वतमाला से उदगमित नदियों के द्वारा भली-भाँति अपवाहित है। [[गंगा]] एवं उसकी सहायक नदियों, [[यमुना नदी]], [[रामगंगा नदी]], [[गोमती नदी]], [[घाघरा नदी]] और [[गंडक नदी]] को हिमालय के हिम से लगातार पानी मिलता रहता है। विंध्य श्रेणी से निकलने वाली [[चंबल नदी]], [[बेतवा नदी]] और [[केन नदी]] [[यमुना नदी]] में मिलने से पहले राज्य के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में बहती है। विंध्य श्रेणी से ही निकलने वाली [[सोन नदी]] राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग में बहती है और राज्य की सीमा से बाहर [[बिहार]] में गंगा नदी से मिलती है।&lt;br /&gt;
====मृदा====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के क्षेत्रफल का लगभग दो-तिहाई भाग गंगा तंत्र की धीमी गति से बहने वाली नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी की गहरी परत से ढंका है। अत्यधिक उपजाऊ यह जलोढ़ मिट्टी कहीं रेतीली है, तो कहीं चिकनी दोमट। राज्य के दक्षिणी भाग की मिट्टी सामान्यतया मिश्रित [[लाल रंग|लाल]] और [[काला रंग|काली]] या लाल से लेकर [[पीला रंग|पीली]] है। राज्य के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में मृदा कंकरीली से लेकर उर्वर दोमट तक है, जो महीन रेत और ह्यूमस मिश्रित है, जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में घने जंगल हैं।&lt;br /&gt;
====जलवायु====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है। राज्य में औसत तापमान जनवरी में 12.50 से 17.50 से. रहता है, जबकि मई-जून में यह 27.50 से 32.50 से. के बीच रहता है। पूर्व से (1,000 मिमी से 2,000 मिमी) पश्चिम (610 मिमी से 1,000 मिमी) की ओर वर्षा कम होती जाती है। राज्य में लगभग 90 प्रतिशत वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होती है, जो जून से सितम्बर तक होती है। वर्षा के इन चार महीनों में होने के कारण बाढ़ एक आवर्ती समस्या है, जिससे ख़ासकर राज्य के पूर्वी हिस्से में फ़सल, जनजीवन व सम्पत्ति को भारी नुक़सान पहुँचता है। मानसून की लगातार विफलता के परिणामस्वरूप सूखा पड़ता है व फ़सल का नुक़सान होता है।&lt;br /&gt;
====वनस्पति एवं प्राणी जीवन====&lt;br /&gt;
राज्य में वन मुख्यत: दक्षिणी उच्चभूमि पर केन्द्रित हैं, जो ज़्यादातर झाड़ीदार हैं। विविध स्थलाकृति एवं जलवायु के कारण इस क्षेत्र का प्राणी जीवन समृद्ध है। इस क्षेत्र में शेर, तेंदुआ, [[हाथी]], जंगली सूअर, घड़ियाल के साथ-साथ कबूतर, फ़ाख्ता, जंगली बत्तख़, तीतर, मोर कठफोड़वा, नीलकंठ और बटेर पाए जाते हैं। कई प्रजातियाँ, जैसे-गंगा के मैदान से सिंह और तराई क्षेत्र से गैंडे अब विलुप्त हो चुके हैं। वन्य जीवन के संरक्षण के लिए सरकार ने 'चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य' और 'दुधवा अभयारण्य' सहित कई अभयारण्य स्थापित किए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जनजीवन==&lt;br /&gt;
'''इससे एक अलग राज्य के गठन होने के बावजूद''' उत्तर प्रदेश अभी भी जनसंख्या के मामले में सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों से काफ़ी आगे है। 2001 की जनगणना के अनुसार, राज्य की जनसंख्या 25.80 प्रतिशत बढ़ी। जनसंख्या का लौकिक अनुपात (प्रति 1000 पुरुष पर महिलाओं की संख्या) 898 दर्ज किया गया है, जो 1991 के 876 के मुक़ाबले बेहतर है। गंगा का मैदान, जहाँ जनसंख्या का घनत्व सबसे अधिक है, राज्य की 80 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करता है। इसकी तुलना में हिमालय क्षेत्र व दक्षिणी उच्चभूमि में जनसंख्या का घनत्व बहुत कम है।&lt;br /&gt;
==जातीय एवं भाषाई संघटन==&lt;br /&gt;
'''राज्य की अधिकांश जनसंख्या''' [[आर्य]]-[[द्रविड़]] जातीय समूह से सम्बद्ध है। यहाँ की जनसंख्या का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा [[हिन्दू]], लगभग 20 प्रतिशत [[मुसलमान]] व एक प्रतिशत से भी कम अन्य धार्मिक समुदायों, [[सिक्ख]], [[बौद्ध]], [[ईसाई धर्म|ईसाई]] व [[जैन]] मतावलम्बियों का है। [[हिन्दी]] (राज्य की राजकीय भाषा) 85 प्रतिशत व [[उर्दू]] 15 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा है। लोगों द्वारा बोले जाने वाली हिन्दुस्तानी भाषा में दोनों ही भाषाओं के सामान्य शब्द हैं, जिसे राज्य भर में समझा जाता है।&lt;br /&gt;
==आवासीन रचना==&lt;br /&gt;
'''राज्य की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या''' ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण आवासों की विशेषताएँ हैं-राज्य के पश्चिमी हिस्से में पाए जाने वाले घने बसे हुए गाँव, पूर्वी क्षेत्र में पाए जाने वाले छोटे गाँव और मध्य क्षेत्र में दोनों का समूह होता है, जिसकी छत फूस या मिट्टी के खपड़ों से बनी होती है। [[चित्र:Tajmahal-1.jpg|thumb|250px|[[ताजमहल]], [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Tajmahal, Agra]]  इन मकानों में हालांकि आधुनिक जीवन की बहुत कम सुविधाएँ हैं, लेकिन शहरों के पास बसे कुछ गाँवों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। सीमेंट से बने घर, पक्की सड़कें, बिजली, रेडियो, टेलीविजन जैसी उपभोक्ता वस्तुएँ पारम्परिक ग्रामीण जीवन को बदल रही हैं। शहरी जनसंख्या का आधे से अधिक हिस्सा एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में रहता है। [[कानपुर]] [[लखनऊ]], [[वाराणसी]] (बनारस), [[आगरा]] और [[इलाहाबाद]] उत्तर प्रदेश के पाँच सबसे बड़े नगर हैं। कानपुर उत्तर प्रदेश के मध्य क्षेत्र में स्थित प्रमुख औद्योगिक शहर है। कानपुर के पूर्वोत्तर में 48 किमी. की दूरी पर राज्य की राजधानी लखनऊ स्थित है। हिन्दुओं का सर्वाधिक पवित्र शहर वाराणसी विश्व के प्राचीनतम सतत आवासीय शहरों में से एक है। एक अन्य पवित्र शहर [[इलाहाबाद]] गंगा, यमुना और पौराणिक [[सरस्वती नदी]] के संगम पर स्थित है। राज्य के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित आगरा में [[मुग़ल]] बादशाह [[शाहजहाँ]] द्वारा अपनी बेगम की याद में बनवाया गया मक़बरा [[ताजमहल]] स्थित है। यह [[भारत]] के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है।&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के निम्न साधन हैं-&lt;br /&gt;
====संसाधन====&lt;br /&gt;
आर्थिक तौर पर उत्तर प्रदेश देश के अत्यधिक अल्पविकसित राज्यों में से एक है। यह मुख्यत: [[कृषि]] प्रधान राज्य है और यहाँ की तीन-चौथाई (75 प्रतिशत) से अधिक जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है। राज्य में औद्योगिकीकरण के लिए महत्वपूर्ण खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों की कमी है। यहाँ पर केवल सिलिका, चूना पत्थर व कोयले जैसे खनिज पदार्थ ही उल्लेखनीय मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा यहाँ जिप्सम, मैग्नेटाइट, फ़ॉस्फ़ोराइट और बॉक्साइट के अल्प भण्डार भी पाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
====कृषि एवं वानिकी====&lt;br /&gt;
राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। [[चावल]], [[गेहूँ]], [[ज्वार]], [[बाजरा]], [[जौ]] और [[गन्ना]] राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। 1960 के दशक से गेहूँ व चावल की उच्च पैदावार वाले बीजों के प्रयोग, उर्वरकों की अधिक उपलब्धता और सिंचाई के अधिक इस्तेमाल से उत्तर प्रदेश खाद्यान्न का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बन गया है। यद्यपि किसान दो प्रमुख समस्याओं से ग्रस्त हैं: आर्थिक रूप से अलाभकारी छोटे खेत और बेहतर उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी में निवेश करने के लिए अपर्याप्त संसाधन, राज्य की अधिकतम कृषि भूमि किसानों को मुश्किल से ही भरण-पोषण कर पाती है। पशुधन व डेयरी उद्योग आय के अतिरिक्त स्रोत हैं, हालांकि प्रति [[गाय]] [[दूध]] का उत्पादन कम है।&lt;br /&gt;
====उद्योग====&lt;br /&gt;
राज्य में काफ़ी समय से मौजूद वस्त्र उद्योग व चीनी प्रसंस्करण उद्योग में राज्य के कुल मिलकर्मियों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा लगा है। राज्य की अधिकांश मिलें पुरानी व अक्षम हैं। अन्य संसाधन आधारित उद्योगों में वनस्पति तेल, जूट व सीमेंट उद्योग शामिल हैं। केन्द्र सरकार ने यहाँ पर भारी उपकरण, मशीनें, इस्पात, वायुयान, टेलीफ़ोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और उर्वरकों के उत्पादन वाले बहुत से बड़े कारख़ाने स्थापित किए हैं। यहाँ [[मथुरा]] में एक तेल परिष्करणशाला और राज्य के दक्षिण-पूर्वी [[मिर्ज़ापुर]] ज़िले में कोयला क्षेत्र का विकास केन्द्र सरकार की दो प्रमुख परियोजनाएँ हैं। राज्य सरकार ने मध्यम और लघु स्तर के उद्योगों को प्रोत्साहन दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हस्तशिल्प, क़ालीन, पीतल की वस्तुएँ, जूते-चप्पल, चमड़े व खेल का सामान राज्य के निर्यात में प्रमुखता के साथ योगदान देते हैं। भदोई व मिर्ज़ापुर के क़ालीन दुनिया भर में सराहे जाते हैं। [[वाराणसी]] का रेशम व ज़री का काम, [[मुरादाबाद]] की पीतल की खूबसूरत वस्तुएँ, [[लखनऊ]] की चिकनकारी, नागुआ का आबनूस की लकड़ी का काम, [[फ़िरोज़ाबाद]] की काँच की वस्तुएँ और [[सहारनपुर]] का नक़क़ाशीदार लकड़ी का काम भी उल्लेखनीय है। उत्तर प्रदेश बिजली की भीषण कमी का शिकार है। 1951 से स्थापित अन्य विद्युत उत्पादन केन्द्रों से क्षमता बढ़ी है, लेकिन माँग और आपूर्ति के बीच अन्तर बढ़ता ही जा रहा है। भारत के अधिकतम तापविद्युत केन्द्रों में से एक ओबरा-रिहंद (दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश), राज्य के कई अन्य हिस्सों में स्थित विभिन्न पनबिजली संयंत्रों और बुलंदशहर के [[परमाणु]] बिजलीघर में बिजली का उत्पादन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 2004-05 में उत्तर प्रदेश में कुल 5,21,835 लघु उद्योग इकाइयाँ थीं, जिनमें लगभग 5,131 करोड़ रुपये की पूंजी का निवेश था और लगभग 20,01,000  लोग काम कर रहे थे। वर्ष 2004-05 में राज्य में लगभग 45.51 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ। उत्तर प्रदेश राज्य में 68 कपड़ा मिलें और 32 आटोमोबाइल के कारखाने हैं, जिनमें 5,740 करोड़ रुपये की पूंजी का निवेश है। [[चित्र:Krishna Birth Place Mathura-13.jpg|thumb|250px|left|[[कृष्ण जन्मभूमि]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Shri Krishna's Janm Bhumi, Mathura]] सन [[2011]] तक 'नोएडा प्राधिकरण' के अंतर्गत 102 सेक्टर विकसित करने की योजना चल रही है। इस प्राधिकरण में औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र, ग्रुप हाउसिंग क्षेत्र, आवासीय भवन, व्यावसायिक परिसंपत्तियां और संस्थागत शिक्षा क्षेत्र शामिल हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा की भांति ही राज्य में अन्य स्थानों पर औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करने के लिए कार्य किये जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
[[File:Buland-Darwaja-Fatehpur-Sikri-Agra.jpg|thumb|300px|[[बुलंद दरवाज़ा]], [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Buland Darwaja, Fatehpur Sikri, Agra]] &lt;br /&gt;
*[[14 जनवरी]], 2000 को 'उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड' का पुनर्गठन करके 'उत्तर प्रदेश विद्युत निगम', 'उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन' तथा 'उत्तर प्रदेश पनबिजली निगम' को स्थापित किया गया है।&lt;br /&gt;
*2004 - 05 में राज्य की सिंचाई क्षमता बढ़ाकर 319.17 लाख हेक्टेयरतक करने के लिए 98,715 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। &lt;br /&gt;
*'उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड' की स्थापना के समय पन बिजलीघरों और ताप बिजलीघरों की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 2,635 मेगावाट थी जो आज बढ़कर 4,621 मेगावाट तक हो गई है।&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
'''राज्य के प्रमुख शहर व नगर''' सड़कों व रेल सम्पर्क से जुड़े हैं, फिर भी आमतौर पर सड़कों की स्थिति ख़राब है और रेल की पटरियों की भिन्न लाइनों (बड़ी और छोटी) के बीच सामंजस्य न होने के कारण रेल प्रणाली भी प्रभावित हुई है। [[लखनऊ]] उत्तरी नेटवर्क का मुख्य जंक्शन है। उत्तर प्रदेश के मुख्य नगर वायुमार्ग द्वारा [[दिल्ली]] व भारत के अन्य शहरों से जुड़े हुए हैं। राज्य के भीतर के परिवहन तंत्र में गंगा, यमुना और घाघरा नदियों की अंतर्देशीय जल परिवहन व्यवस्था भी शामिल है। [[चित्र:Uttar-Pradesh-Map-1.jpg|thumb|250px|उत्तर प्रदेश का मानचित्र&amp;lt;br /&amp;gt; Map Of Uttar Pradesh]]&lt;br /&gt;
====सड़कें====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित सड़कों की कुल लंबाई 1,18,946 किलोमीटर है। इसमें 3,869 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग, 9,097 किलोमीटर प्रांतीय राजमार्ग, 1,05,980 किलोमीटर अन्य ज़िला सड़कें और 72,931 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें हैं।&lt;br /&gt;
====रेलवे मार्ग====&lt;br /&gt;
रेलवे का उत्तरी नेटवर्क का मुख्य जंक्शन राजधानी [[लखनऊ]] है। अन्य महत्त्वपूर्ण रेल जंक्शन- [[आगरा]], [[कानपुर]], [[इलाहाबाद]], मुग़लसराय, [[झाँसी]], [[मुरादाबाद]], [[वाराणसी]], टूंडला, [[गोरखपुर]], गोंडा, फ़ैज़ाबाद, [[बरेली]] और सीतापुर हैं।&lt;br /&gt;
====उड्डयन विभाग====&lt;br /&gt;
प्रदेश में लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, आगरा, झांसी, बरेली, [[ग़ाज़ियाबाद]], गोरखपुर, [[सहारनपुर]] और रायबरेली में हवाई अड्डे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रशासन एवं सामाज==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के प्रशासन एवं समाज की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-&lt;br /&gt;
====सरकार====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में सरकार का संसदीय स्वरूप है, जिसमें कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका शामिल है। कार्यपालिका में [[राज्यपाल]] होता है, जिसकी सहायता एवं सलाह के लिए [[मुख्यमंत्री]] के नेतृत्व में एक मंत्रिमण्डल होता है। विधायिका द्विसदनीय है: एक स्थायी निकाय विधान परिषद, जिसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं। [[विधान सभा]], जिसके सदस्य पाँच वर्ष के लिए चुने जाते हैं। न्यायपालिका में [[उच्च न्यायालय]] शामिल है, जिसका प्रमुख मुख्य न्यायाधीश होता है। राज्य का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में है, राजधानी लखनऊ में भी इसकी एक पीठ है। राज्य स्तर के नीचे स्थानीय प्रशासन के लिए 70 ज़िले हैं।&lt;br /&gt;
====शिक्षा====&lt;br /&gt;
राज्य में 16 विश्वविद्यालय, 400 से अधिक सम्बद्ध महाविद्यालय, कई चिकित्सा महाविद्यालय और विशिष्ट अध्ययनों व शोध के लिए कई संस्थान हैं। 1950 के दशक के बाद से राज्य में विद्यालयों व सभी स्तरों पर विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के बावजूद राज्य की जनसंख्या का 75.36 प्रतिशत हिस्सा ही साक्षर है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम [[हिन्दी]] (कुछ निजी विद्यालयों में माध्यम अंग्रेज़ी) है, उच्चतर विद्यालय के विद्यार्थी हिन्दी व अंग्रेज़ी में पढ़ाई करते हैं। जबकि विश्वविद्यालय स्तर पर आमतौर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी है। 1991 के 40.71 प्रतिशत के मुक़ाबले 2001 में राज्य की कुल साक्षरता दर बढ़कर 57.36 प्रतिशत हो गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्य में एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (कानपुर), एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (लखनऊ), एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और काफ़ी संख्या में पॉलीटेक्निक, इंजीनियरिंग व औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान हैं।&lt;br /&gt;
====स्वास्थ्य एवं जन कल्याण====&lt;br /&gt;
राज्य में स्वास्थ्य सेवाएँ विभिन्न सरकारी अस्पतालों व चिकित्सालयों, निजी एलोपैथिक, होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सों के द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। कुछ प्रमुख अस्पतालों को छोड़कर राज्य के अस्पतालों व चिकित्सालयों में प्रदान की जा रही स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर आमतौर पर ख़राब है। राज्य की जनसंख्या का एक बड़ा अनुपात अनुसूचित जाति व जनजाति का है। आज़ादी के बाद बहुत से केन्द्रीय व राज्य स्तर के कल्याणकारी कार्यक्रमों ने शिक्षा, रोज़गार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में इन लोगों को बेहतर अवसर प्रदान किए हैं।&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक जीवन==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश हिन्दुओं की प्राचीन सभ्यता का उदगम स्थल है'''। वैदिक साहित्य महाकाव्य [[रामायण]] और [[महाभारत]] (जिसमें [[श्रीमद्भागवदगीता]] शामिल है) के उल्लेखनीय हिस्सों का मूल यहाँ के कई आश्रमों में है। [[बौद्ध]]-[[हिन्दू]] काल (लगभग 600 ई. पू.-1200 ई.) के ग्रन्थों व वास्तुशिल्प ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत में बड़ा योगदान दिया है। 1947 के बाद से भारत सरकार का चिह्न मौर्य सम्राट [[अशोक]] के द्वारा बनवाए गए चार सिंह युक्त स्तम्भ ([[वाराणसी]] के निकट [[सारनाथ]] में स्थित) पर आधारित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तुशिल्प, चित्रकारी, [[संगीत]], [[नृत्यकला]] और दो भाषाएँ ([[हिन्दी]] व [[उर्दू]]) [[मुग़ल]] काल के दौरान यहाँ पर फली-फूली। इस काल के चित्रों में सामान्यतया धार्मिक व ऐतिहासिक ग्रन्थों का चित्रण है। यद्यपि [[साहित्य]] व संगीत का उल्लेख प्राचीन [[संस्कृत]] ग्रन्थों में किया गया है और माना जाता है कि [[गुप्त काल]] (लगभग 320-540) में संगीत समृद्ध हुआ। संगीत परम्परा का अधिकांश हिस्सा इस काल के दौरान उत्तर प्रदेश में विकसित हुआ। [[तानसेन]] व [[बैजू बावरा]] जैसे संगीतज्ञ मुग़ल शहंशाह [[अकबर]] के दरबार में थे, जो राज्य व समूचे देश में आज भी विख्यात हैं। भारतीय संगीत के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध वाद्य, [[सितार]] (वीणा परिवार का तंतु वाद्य) और [[तबला|तबले]] का विकास इसी काल के दौरान इस क्षेत्र में हुआ। 18वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश में [[वृन्दावन]] व [[मथुरा]] के मन्दिरों में भक्तिपूर्ण नृत्य के तौर पर विकसित शास्त्रीय नृत्य शैली कथक उत्तरी भारत की शास्त्रीय नृत्य शैलियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय गीत व नृत्य भी हैं। सबसे प्रसिद्ध लोकगीत मौसमों पर आधारित हैं।&lt;br /&gt;
==हिन्दी भाषा का जन्मस्थल==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश भारत की राजकीय भाषा हिन्दी''' की जन्मस्थली है। शताब्दियों के दौरान हिन्दी के कई स्थानीय स्वरूप विकसित हुए हैं। साहित्यिक हिन्दी ने 19वीं शताब्दी तक खड़ी बोली का वर्तमान स्वरूप (हिन्दुस्तानी) धारण नहीं किया था। वाराणसी के [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] (1850-1885 ई.) उन अग्रणी लेखकों में से थे, जिन्होंने हिन्दी के इस स्वरूप का इस्तेमाल साहित्यिक माध्यम के तौर पर किया था।&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक संस्थान==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश के कला संग्रहालयों में''' [[लखनऊ]] स्थित राज्य संग्रहालय, मथुरा स्थित पुरातात्विक संग्रहालय, बौद्ध पुरातात्विक संग्रहालय, सारनाथ संग्रहालय प्रमुख हैं। लखनऊ स्थित [[कला]] एवं हिन्दुस्तानी संगीत के महाविद्यालय और इलाहाबाद स्थित प्रयाग संगीत समिति ने देश में कला व शास्त्रीय संगीत के विकास में बहुत योगदान दिया है। नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन और हिन्दुस्तानी अकादमी हिन्दी साहित्य के विकास में सहायक रही हैं। हाल ही में उर्दू साहित्य के संरक्षण व समृद्धि के लिए राज्य सरकार ने उर्दू अकादमी की स्थापना की है।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
समय समय पर सभी धर्मों के त्योहार मनाये जाते हैं-&lt;br /&gt;
*इलाहाबाद में प्रत्येक बारहवें वर्ष में कुंभ का मेला आयोजित किया जाता है जो कि संभवत: दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। &lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त इलाहाबाद में प्रत्येक 6 साल बाद अर्द्ध कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kumbh mela.jpg|thumb|250px|left|[[इलाहाबाद]] में [[कुम्भ मेला]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kumbh Mela, Allahabad]]&lt;br /&gt;
*इलाहाबाद में ही प्रत्येक वर्ष जनवरी माह में [[माघ मेला]] भी आयोजित किया जाता है, जहां बडी संख्या में लोग [[संगम इलाहाबाद|संगम]] में नहाते हैं। &lt;br /&gt;
*अन्य मेलों में [[मथुरा]], [[वृन्दावन]] व [[अयोध्या]] में अनेक पर्वों के मेले और झूला मेले लगते हैं, जिनमें प्रभु की प्रतिमाओं को सोने एवं चांदी के झूलों में रखकर झुलाया जाता है। ये झूला मेले लगभग एक पखवाडे तक चलते हैं।  &lt;br /&gt;
*कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर [[गंगा नदी]] में डुबकी लगाना अत्यंत आस्था से परिपूर्ण है और बहुत ही पवित्र माना जाता है और इसके लिए [[गढ़मुक्तेश्वर]], [[सोरों]], [[राजघाट]], काकोरा, बिठूर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, और अयोध्या में बडी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। &lt;br /&gt;
*आगरा ज़िले के [[बटेश्वर उत्तर प्रदेश|बटेश्वर]] कस्बे में पशुओं का प्रसिद्ध मेला लगता है। &lt;br /&gt;
*[[बाराबंकी]] ज़िले का [[देवा मेला]] मुस्लिम संत वारिस अली शाह के कारण काफ़ी प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त यहाँ हिन्दू तथा मुस्लिमों के सभी प्रमुख त्योहारों को पूरे राज्य में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-Varanasi.jpg|thumb|250px|[[वाराणसी]] में [[गंगा नदी]] के घाट &amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Varanasi]]&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में सभी के लिए आकर्षण की कई चीजें हैं। &lt;br /&gt;
*[[ताजमहल]], [[आगरा]],&lt;br /&gt;
*प्राचीन तीर्थ स्थानों में [[वाराणसी]], विंध्याचल, [[अयोध्या]], [[चित्रकूट]], [[प्रयाग]], [[नैमिषारण्य]], [[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[देवा शरीफ]] आदि है।&lt;br /&gt;
*[[फ़तेहपुर सीकरी]] में [[सलीम चिश्ती|शेख़ सलीम चिश्ती]] की दरगाह, &lt;br /&gt;
*[[सारनाथ]], [[श्रावस्ती]], [[कुशीनगर]], संकिसा / बसंतपुर (ज़िला एटा, उत्तर प्रदेश), कांपिल/ वर्तमान फ़र्रूख़ाबाद, [[पिपरावा]] और [[कौशांबी]] प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
*आगरा, अयोध्या, सारनाथ, वाराणसी, लखनऊ, झांसी, गोरखपुर, [[जौनपुर]], कन्नौज, [[महोबा उत्तर प्रदेश|महोबा]] , देवगढ, बिठूर और विंध्याचल  हिन्दू एवं मुस्लिम वास्तुशिल्प और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण खजाने से भरा हैं।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;खैराडीह&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{मुख्य|खैराडीह }}&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले स्थित खैराडीह में 800 ई.पू. में आबादी शुरू हुई और ईसा की पहली तीन शताब्दियों में नगरीकरण चरम सीमा पर था। &lt;br /&gt;
==आँकड़े==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+जनगणना 2011 का उत्तर प्रदेश में ज़िलावार पुरुष, महिला संख्या का आँकड़ा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! ज़िला &lt;br /&gt;
! कुल आबादी&lt;br /&gt;
! पुरुष&lt;br /&gt;
! महिला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सहारनपुर]]&lt;br /&gt;
| 34,64,228&lt;br /&gt;
| 18,35,740&lt;br /&gt;
| 16,28,488&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मुजफ़्फ़रनगर&lt;br /&gt;
| 41,38,605&lt;br /&gt;
| 21,94,540&lt;br /&gt;
| 19,44,065&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बिजनौर]]&lt;br /&gt;
| 36,83,896&lt;br /&gt;
| 19,25,787&lt;br /&gt;
| 17,58,109&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मुरादाबाद]]&lt;br /&gt;
| 47,73,138&lt;br /&gt;
|25,08,299&lt;br /&gt;
|22,864,839&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रामपुर&lt;br /&gt;
|23,35,398&lt;br /&gt;
|12,26,175&lt;br /&gt;
|11,09,223&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ज्योतिबाफुलेनगर&lt;br /&gt;
|18,38,771&lt;br /&gt;
|09,64,319&lt;br /&gt;
|08,74,452&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मेरठ]]&lt;br /&gt;
|34,47,405&lt;br /&gt;
|18,29,192&lt;br /&gt;
|16,18,223&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बागपत&lt;br /&gt;
|13,02,156&lt;br /&gt;
|07,00,724&lt;br /&gt;
|06,01,432&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[गाजियाबाद]]&lt;br /&gt;
|46,61,452&lt;br /&gt;
|24,81,803&lt;br /&gt;
|21,69,649&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गौतमबुद्धनगर&lt;br /&gt;
|16,74,714&lt;br /&gt;
|09,04,505&lt;br /&gt;
|07,70,209&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बुलंदशहर&lt;br /&gt;
|34,98,507&lt;br /&gt;
|18,48,643&lt;br /&gt;
|16,49,864&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[अलीगढ़]]&lt;br /&gt;
|36,73,849&lt;br /&gt;
|19,58,536&lt;br /&gt;
|17,15,313&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महामायानगर&lt;br /&gt;
|15,65,678&lt;br /&gt;
|08,37,746&lt;br /&gt;
|07,28,232&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
|25,41,894&lt;br /&gt;
|13,68,445&lt;br /&gt;
|11,73,449&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[आगरा]]&lt;br /&gt;
|43,80,793&lt;br /&gt;
|23,56,104&lt;br /&gt;
|20,24,689&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[फ़िरोज़ाबाद]]&lt;br /&gt;
|24,96,761&lt;br /&gt;
|13,37,141&lt;br /&gt;
|11,59,620&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मैनपुरी&lt;br /&gt;
|18,47,194&lt;br /&gt;
|09,84,892&lt;br /&gt;
|08,62,302&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बदायूँ]]&lt;br /&gt;
|37,12,738&lt;br /&gt;
|19,97,242&lt;br /&gt;
|17,15,496&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बरेली]]&lt;br /&gt;
|44,65,344&lt;br /&gt;
|23,71,454&lt;br /&gt;
|20,93,890&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पीलीभीत&lt;br /&gt;
|20,37,225&lt;br /&gt;
|10,78,525&lt;br /&gt;
|09,58,700&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[शाहजहाँपुर]]&lt;br /&gt;
|30,02,376&lt;br /&gt;
|16,10,182&lt;br /&gt;
|13,92,194&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| खीरी&lt;br /&gt;
|40,13,634&lt;br /&gt;
|21,26,782&lt;br /&gt;
|18,86,852&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सीतापुर&lt;br /&gt;
|44,74,446&lt;br /&gt;
|23,80,666&lt;br /&gt;
|20,93,780&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरदोई&lt;br /&gt;
|40,91,380&lt;br /&gt;
|22,04,264&lt;br /&gt;
|18,87,116&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उन्नाव&lt;br /&gt;
|31,10,595&lt;br /&gt;
|16,36,295&lt;br /&gt;
|14,74,300&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[लखनऊ]]&lt;br /&gt;
|45,88,455&lt;br /&gt;
|24,07,897&lt;br /&gt;
|21,80,558&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[रायबरेली]]&lt;br /&gt;
|34,04,004&lt;br /&gt;
|17,53,344&lt;br /&gt;
|16,50,660&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फरुखाबाद&lt;br /&gt;
|18,87,577&lt;br /&gt;
|10,07,479&lt;br /&gt;
|08,80,098&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[कन्नौज]]&lt;br /&gt;
|16,58,005&lt;br /&gt;
|08,82,546&lt;br /&gt;
|07,75,459&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[इटावा]]&lt;br /&gt;
|15,79,160&lt;br /&gt;
|08,45,893&lt;br /&gt;
|07,75,459&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ओरैया&lt;br /&gt;
|13,72,287&lt;br /&gt;
|07,36,144&lt;br /&gt;
|06,36,143&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कानपुर देहात&lt;br /&gt;
|17,95,092&lt;br /&gt;
|09,64,284&lt;br /&gt;
|08,30,808&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[कानपुर|कानपुर नगर]]&lt;br /&gt;
|45,72,951&lt;br /&gt;
|24,69,114&lt;br /&gt;
|21,03,837&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जालौन &lt;br /&gt;
|16,70,718&lt;br /&gt;
|08,95,804&lt;br /&gt;
|07,74,914&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[झाँसी]]&lt;br /&gt;
|20,00,755&lt;br /&gt;
|10,61,310&lt;br /&gt;
|09,39,445&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ललितपुर&lt;br /&gt;
|12,18,002&lt;br /&gt;
|06,39,392&lt;br /&gt;
|05,78,610&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हमीरपुर &lt;br /&gt;
|11,04,021&lt;br /&gt;
|05,93,576&lt;br /&gt;
|05,10,445&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[महोबा उत्तर प्रदेश|महोबा]]&lt;br /&gt;
|08,76,055&lt;br /&gt;
|04,65,437&lt;br /&gt;
|04,10,118&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बांदा]]&lt;br /&gt;
|17,99,541&lt;br /&gt;
|09,66,123&lt;br /&gt;
|08,33,418&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[चित्रकूट]]&lt;br /&gt;
|09,90,626&lt;br /&gt;
|05,27,101&lt;br /&gt;
|04,63,525&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फतेहपुर&lt;br /&gt;
|26,32,684&lt;br /&gt;
|13,85,556&lt;br /&gt;
|12,47,128&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रतापगढ़&lt;br /&gt;
|31,73,752&lt;br /&gt;
|15,91,480&lt;br /&gt;
|15,82,272&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[कौशांबी]]&lt;br /&gt;
|51,96,909&lt;br /&gt;
|08,38,095&lt;br /&gt;
|07,58,814&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
|59,59,798&lt;br /&gt;
|31,33,479&lt;br /&gt;
|28,26,319&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बाराबंकी&lt;br /&gt;
|32,57,983&lt;br /&gt;
|17,07,951&lt;br /&gt;
|15,50,032&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फैजाबाद&lt;br /&gt;
|24,68,371&lt;br /&gt;
|12,58,455&lt;br /&gt;
|12,09,916&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अम्बेडकरनगर&lt;br /&gt;
|23,98,909&lt;br /&gt;
|12,14,225&lt;br /&gt;
|11,84,484&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सुल्तानपुर&lt;br /&gt;
|37,90,922&lt;br /&gt;
|190,16,297&lt;br /&gt;
|18,74,625&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बहराइच]]&lt;br /&gt;
|34,78,257&lt;br /&gt;
|18,38,988&lt;br /&gt;
|16,39,269&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
|11,14,615&lt;br /&gt;
|05,94,318&lt;br /&gt;
|05,20,297&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बलरामपुर&lt;br /&gt;
|21,49,066&lt;br /&gt;
|11,17,984&lt;br /&gt;
|10,31,082&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गोण्डा&lt;br /&gt;
|34,31,386&lt;br /&gt;
|17,85,629&lt;br /&gt;
|16,45,757&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सिद्धार्थनगर&lt;br /&gt;
|25,53,526&lt;br /&gt;
|12,96,046&lt;br /&gt;
|12,57,480&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बस्ती&lt;br /&gt;
|24,61,056&lt;br /&gt;
|12,56,158&lt;br /&gt;
|12,04,898&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| संतकबीरनगर&lt;br /&gt;
|17,14,300&lt;br /&gt;
|08,70,547&lt;br /&gt;
|08,43,753&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महाराजगंज&lt;br /&gt;
|26,65,292&lt;br /&gt;
|13,75,367&lt;br /&gt;
|12,89,925&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[गोरखपुर]]&lt;br /&gt;
|44,36,275&lt;br /&gt;
|22,81,763&lt;br /&gt;
|21,54,512&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[कुशीनगर]]&lt;br /&gt;
|35,60,830&lt;br /&gt;
|18,21,242&lt;br /&gt;
|17,39,588&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| देवरिया&lt;br /&gt;
|30,98,637&lt;br /&gt;
|15,39,608&lt;br /&gt;
|15,59,029&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आजमगढ़&lt;br /&gt;
|46,16,509&lt;br /&gt;
|22,89,336&lt;br /&gt;
|23,27,173&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मऊ&lt;br /&gt;
|22,05,170&lt;br /&gt;
|11,14,888&lt;br /&gt;
|10,90,282&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बलिया&lt;br /&gt;
|32,23,642&lt;br /&gt;
|16,67,557&lt;br /&gt;
|15,56,085&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[जौनपुर]]&lt;br /&gt;
|44,76,072&lt;br /&gt;
|22,17,635&lt;br /&gt;
|22,58,437&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गाजीपुर&lt;br /&gt;
|36,22,727&lt;br /&gt;
|18,56,584&lt;br /&gt;
|17,66,143&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चंदौली &lt;br /&gt;
|19,52,713&lt;br /&gt;
|10,20,789&lt;br /&gt;
|09,31,924&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
|36,82194&lt;br /&gt;
|19,28,641&lt;br /&gt;
|17,53,553&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| संत रविदास नगर&lt;br /&gt;
|15,54,203&lt;br /&gt;
|07,97,164&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| [[मिर्ज़ापुर]]&lt;br /&gt;
|24,94,533&lt;br /&gt;
|13,12,822&lt;br /&gt;
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| सोनभद्र&lt;br /&gt;
|18,62,612&lt;br /&gt;
|09,73,480&lt;br /&gt;
|08,89,132&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[एटा]]&lt;br /&gt;
|17,61,152&lt;br /&gt;
|09,45,157&lt;br /&gt;
|08,15,995&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कांशीरामनगर&lt;br /&gt;
|14,38,156&lt;br /&gt;
|07,65,529&lt;br /&gt;
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|}&lt;br /&gt;
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{{Panorama&lt;br /&gt;
|image =चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-2.jpg&lt;br /&gt;
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|alt =फ़तेहपुर सीकरी&lt;br /&gt;
|caption=शेख़ [[सलीम चिश्ती]] की दरगाह ([[फ़तेहपुर सीकरी]]) का विहंगम दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View Of Shekh Salim Chishti Shrine (Fatehpur Sikri)&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery perrow=&amp;quot;3&amp;quot; widths=&amp;quot;200&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के नगर}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}{{राज्य और के. शा. प्र.2}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पनगोरारिया</title>
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		<updated>2011-04-16T06:21:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*पनगोरारिया [[मध्य प्रदेश]] के सेहोर ज़िले की पहाड़ियों में स्थित है। &lt;br /&gt;
*पनगोरारिया स्थान से खोज के दौरान प्राकृतिक गुफ़ाएँ मिली हैं, जिनको काटकर आवास के योग्य बानाया गया था।&lt;br /&gt;
*इन गुफ़ाओं को [[1975]] ई. में के.डी.बनर्जी एवं भोपर्दिकर ने खोजा था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से अशोक का गुहालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें उल्लेख है कि प्रियदर्शी ([[अशोक]]) उस समय यहाँ भिक्षुओं से मिलने आया था, जब वह '''महाराजकुमार''' था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पनगोरारिया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*पनगोरारिया [[मध्य प्रदेश]] के सेहोर ज़िले की पहाड़ियों में स्थित है। &lt;br /&gt;
*पनगोरारिया स्थान से खोज के दौरान प्राकृतिक गुफ़ाएँ मिली हैं, जिनको काटकर आवास के योग्य बानाया गया था।&lt;br /&gt;
*इन गुफ़ाओं को [[1975]] ई. में के.डी.बनर्जी एवं भोपर्दिकर ने खोजा था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से अशोक का गुहालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें उल्लेख है कि प्रियदर्शी ([[अशोक]]) उस समय यहाँ भिक्षुओं से मिलने आया था, जब वह 'महाराजकुमार' था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>मध्य प्रदेश</title>
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		<updated>2011-04-16T06:16:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Madhya-Pradesh-Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[भोपाल]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=60348&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=196&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=308,000&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=23.17°N 77.21°E&lt;br /&gt;
|ज़िले=50&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=[[इंदौर]], [[जबलपुर]], [[ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=920:933&lt;br /&gt;
|साक्षरता=64.1&lt;br /&gt;
|स्त्री=50.6&lt;br /&gt;
|पुरुष=76.5&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[बलराम जाखड़]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[शिवराज सिंह चौहान]]&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.mp.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|15:51, 12 जून 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Madhya-Pradesh-Seal.gif&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश दूसरा सबसे बड़ा भारतीय राज्‍य है। भौगोलिक दृष्टि से यह देश में केन्‍द्रीय स्‍थान रखता है। इसकी राजधानी [[भोपाल]] है । मध्य का अर्थ बीच में है, मध्य प्रदेश की भौगोलिक स्थिति [[भारत|भारतवर्ष]] के मध्य अर्थात बीच में होने के कारण इस प्रदेश का नाम मध्य प्रदेश दिया गया, जो कभी 'मध्य भारत' के नाम से जाना जाता था। मध्य प्रदेश हृदय की तरह देश के ठीक बीचोंबीच में स्थित है। यह भारत का सबसे विशाल राज्य है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 10 प्रतिशत, 3,08,000 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक में फैला हुआ है। छत्तीसगढ़ के निर्माण के लिए इसके उत्तरी ज़िलों को अलग करने के बाद मध्य प्रदेश की राजनीतिक सीमा का वर्ष 2000 में पुननिर्धारण किया गया। यह प्रदेश चारों तरफ से [[उत्तर प्रदेश]],  [[झारखण्ड]],  [[महाराष्ट्र]], [[राजस्थान]], [[गुजरात]], [[बिहार]] और  [[छत्तीसगढ़]] की सीमाओं से घिरा हुआ है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Udaygiri-Caves-Vidisha-1.jpg|left|उदयगिरि की गुफाएँ, [[विदिशा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Udaygiri Caves, Vidisha|thumb]]&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक संस्कृति के अनेक अवशेष, जिनमें पाषाण चित्र और पत्थर व धातु के औज़ार शामिल हैं, नदियों, घाटियों और अन्य इलाक़ों में मिले हैं। वर्तमान मध्य प्रदेश का सबसे प्रारम्भिक अस्तित्वमान राज्य अवंति था, जिसकी राजधानी उज्जैन थी। मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित यह राज्य मौर्य साम्राज्य (चौथी से तीसरी शताब्दी ई. पू.) का अंग था, जो बाद में मालवा के नाम से जाना गया।&lt;br /&gt;
दूसरी शताब्दी ई. पू. से सोलहवीं शताब्दी तक मध्य प्रदेश पर पूर्वी मालवा के शासक शुंग (185 से 73 ई. पू.), आंध्र के सातवाहन, पहली या तीसरी शताब्दी ई. पू. से तीसरी शताब्दी तक, क्षत्रप दूसरी से चौथी शताब्दी तक, नाग दूसरी से चौथी शताब्दी ने राज्य किया। मध्य प्रदेश की [[नर्मदा नदी]] के उत्तर में गुप्त साम्राज्य का शासन था। यह  हूणों और कलचुरियों के सत्ता संघर्ष का स्थल रहा, बाद में मालवा पर कलचुरियों ने कुछ समय के लिए अधिकार किया। छठी शताब्दी के में उत्तरी भारत के शासक [[हर्षवर्द्धन|हर्ष]] ने मालवा पर अधिकार कर लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
10वीं शताब्दी में कलचुरी फिर शक्तिशाली हो गए। उनके समकालीन थे - धार के परमार, ग्वालियर में कछवाहा और झाँसी से 160 किलोमीटर दक्षिण—पश्चिम में खजुराहो में चंदेल। बाद में तोमरों ने ग्वालियर और जनजातीय गोंडों ने शासन किया। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Buddha-Stupas.jpg|thumb|left|[[बुद्ध]] [[स्तूप]], सांची&amp;lt;br /&amp;gt; Buddha Stupa, Sanchi]]&lt;br /&gt;
11वीं शताब्दी में मुसलमानों के आक्रमण  शुरू हुए। ग्वालियर की हिन्दू रियासत को 1231 में सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने [[दिल्ली]] में मिला लिया। 14वीं शताब्दी में ख़िलजी सुल्तानों ने मालवा को बरबाद किया। इसके बाद मुग़ल शासक [[अकबर]] (1556—1605) ने इसे मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया। 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मराठा शक्ति ने मालवा पर अधिकार किया और 1760 तक एक बड़ा भूभाग, जो अब मध्य प्रदेश है, मराठों के शासन में आ गया। 1761 में [[पेशवा]] की पराजय के साथ ही ग्वालियर में सिंधिया और दक्षिण—पश्चिम में इंदौर में होल्कर राजवंश का शासन स्थापित हुआ। &lt;br /&gt;
*[[इंदौर]] की रानी [[अहिल्याबाई होल्कर]], गोंड की महारानी कमलापति और रानी [[दुर्गावती]] आदि कुछ महान महिला शासकों ने अपने उत्‍कृष्‍ट शासन के लिए भारतीय इतिहास में अपना नाम स्‍वर्णाक्षरों में लिखवा लिया। &lt;br /&gt;
*मध्‍य प्रदेश की स्‍थापना 1 नवंबर, 1956 को हुई थी। &lt;br /&gt;
*नया राज्‍य [[छत्तीसगढ़]] बनाने के लिए हुए विभाजन के बाद यह अपने वर्तमान स्‍वरूप में 1 नवंबर, 2000 को अस्तित्‍व में आया। &lt;br /&gt;
*मध्‍य प्रदेश के उत्तर में [[उत्तर प्रदेश]], पूर्व में [[छत्तीसगढ़]] तथा पश्चिम में [[राजस्थान]] और [[गुजरात]], दक्षिण में [[महाराष्ट्र]] है।&lt;br /&gt;
*मध्य प्रदेश में नर्मदा की घाटी में [[नवदाटोली]] की खुदाई [[1957]]-[[1958]] में की गयी थी। नवदाटोली [[इन्दौर]] से दक्षिण की ओर 60 मील की दूरी पर स्थित है। यहाँ के निवासी गोल, आयताकार या वर्गाकार झोंपड़ियाँ बनाते थे। व उनमें निवास किया करते थे। &lt;br /&gt;
==क्षेत्रफल==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश 30, 8,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल के साथ भारत का दूसरा बड़ा राज्य है।  &lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
राज्य की कुल जनसंख्या 60,385,118 और औसत जनसंख्या घनत्व भारत के किसी भी राज्य की तुलना में सबसे कम है।&lt;br /&gt;
1 मार्च 2001 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश की जनसंख्या लगभग 60,385,118 है। पिछली जनगणना की तुलना में 24.34 प्रतिशत की वृद्धि है। मध्य प्रदेश देश के राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में जनसंख्या की दृष्टि से सातवाँ स्थान रखता है। 1991 के लिंग अनुपात (प्रति हज़ार पुरुषों में महिलाओं की संख्या) 912 की अपेक्षा आजकललिंग अनुपात 920 हो गया है। &lt;br /&gt;
अधिकांश लोग हिन्दू हैं, हालाँकि मुसलमानों, जैनियों, ईसाईयों और बौद्धों की आबादी भी संख्या के हिसाब से महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पर सिक्ख भी जनसंख्या का छोटा सा हिस्सा हैं।&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
हिन्दी राजकीय और सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। पूर्वी [[हिन्दी]], [[अवधी भाषा|अवधी]] व बघेली बोलियों का प्रतिनिधित्व करती है और बघेलखंड, सतपुड़ा व नर्मदा घाटी में बोली जाती है। बुंदेली पश्चिमी हिन्दी की बोली है और मध्य प्रदेश के मध्यवर्ती व पश्चिमोत्तर ज़िलों में बोली जाती है। भील, भीली और गोंड, गोंडी बोलते हैं। बोलने वालों की संख्या के हिसाब से दूसरी सबसे बड़ी महत्त्वपूर्ण भाषा [[मराठी भाषा|मराठी]] है। [[उर्दू भाषा|उर्दू]], [[उड़िया भाषा|उड़िया]], [[गुजराती भाषा|गुजराती]] और [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]] बोलने वाले लोग भी यहाँ पर काफ़ी संख्या में हैं। इसके अलावा [[तेलुगु भाषा|तेलुगु]], [[बांग्ला भाषा|बांग्ला]], [[तमिल भाषा|तमिल]] और [[मलयालम भाषा|मलयालम]] भी बोली जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
2001 की गणना के अनुसार राज्य में साक्षरता बढ़ी है। 1991 के 44.67 प्रतिशत की तुलना में साक्षरता दर बढ़कर 64.11 प्रतिशत हो गई है। यहाँ प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा के विद्यालय और साथ ही पालिटेक्निक, औद्योगिक कला तथा शिल्प विद्यालय हैं। मध्य प्रदेश में कई विश्वविद्यालय हैं। इनमें सबसे पुराने और विख्यात सागर और उज्जैन हैं। जबलपुर में एक कृषि विश्वविद्यालय भी है। भोपाल में पत्रकारिता और जन—सम्पर्क शिक्षा संस्थान भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जलवायु==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश की जलवायु मानसून पर निर्भर करती है। ग्रीष्म ऋतु गर्म व शुष्क होती है और गर्म हवाएँ चलती हैं। राज्य का औसत तापमान 29 डिग्री से. रहता है। कुछ भागों में तापमान 48 डिग्री से. तक पहुँच जाता है। &lt;br /&gt;
सर्दियाँ खुशनुमा और शुष्क होती हैं। दिसम्बर और जनवरी में समुचित वर्षा होती है, जिसका सम्बन्ध राज्य के पश्चिमोत्तर भाग में होने वाले उष्णकटिबंधीय विक्षोभ से है। औसत वर्षिक वर्षा 1,117 मिमी होती है। सामान्यतः पश्चिम और उत्तर की ओर वर्षा की मात्रा 60 इंच, पूर्व में इससे अधिक और पश्चिम में 32 इंच तक घटती जाती है। चंबल घाटी में हर साल वर्षा का औसत 30 इंच से कम रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भूसंरचना==&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश 100 से 1200 मीटर की ऊँचाई पर है। राज्य के उत्तरी भाग की भूमि उत्तर की ओर उठती है। दक्षिणी भाग पश्चिम की ओर ऊपर उठता है। पर्वत श्रृंखलाओं में पश्चिम व उत्तर में 457 मीटर तक ऊँची विंध्य व कैमूर पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में 914 मीटर से भी अधिक ऊँची [[सतपुड़ा पर्वतश्रेणी|सतपुड़ा]] व महादेव पर्वत श्रृंखलाएँ हैं। दक्षिण-मध्य प्रदेश में [[पंचमढ़ी]] के समीप स्थित धूपगढ़ शिखर (1350 मीटर) राज्य का सबसे ऊँचा शिखर है। विंध्य पर्वत श्रृंखला के पश्चिमोत्तर में मालवा का पठार (लगभग 457 से 609 मीटर) है। मालवा का पठार विध्य पर्वत श्रृंखला से उत्तर की ओर है। मालवा के पठार के पूर्व में बुंदेलखंड का पठार स्थित है, जो [[उत्तर प्रदेश]] के [[गंगा नदी|गंगा]] के मैदान में जाकर मिल जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Khajuraho-Madhya-Pradesh.jpg|[[खजुराहो]], मध्य प्रदेश&amp;lt;br /&amp;gt;  Khajuraho, Madhya Pradesh|thumb]]&lt;br /&gt;
[[राजस्थान]] और [[उत्तर प्रदेश]] के साथ मिलकर 'चंबल' राज्य की उत्तरी सीमा बनाता है। इसकी घाटी की भूमि  ऊबड़ - खाबड़ है। मध्य प्रदेश की मिट्टी को दो भागों में बाँटा जा सकता है-&lt;br /&gt;
#काली मिट्टी- यह मालवा के पठार के दक्षिणी भाग, नर्मदा घाटी और सतपुड़ा के कुछ भागों में मिलती है। इसमें चिकनी मिट्टी का कुछ अंश रहता है, भारी वर्षा या बाढ़ के पानी से सिंचाई से काली मिट्टी जलावरुद्ध हो जाती है। &lt;br /&gt;
#लाल-पीली मिट्टी- इसमें कुछ मात्रा बालू की रहती है। यह शेष मध्य प्रदेश में पाई जाती है।&lt;br /&gt;
कृषि राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था का मुख्य आधार है। राज्‍य की 74.73 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और खेती पर ही निर्भर है। राज्‍य की लगभग 49 प्रतिशत ज़मीन खेती योग्‍य है। 2004-2005 में शुद्ध बुवाई क्षेत्र 1247 लाख हेक्‍टेयर के लगभग था और अनाज का कुल उत्‍पादन 14.10 करोड़ मीट्रिक टन रहा। [[गेहूँ]], चावल, दलहन जैसी प्रमुख फ़सलों का उत्‍पादन भी अच्‍छा रहा। 20 ज़िलों में 'राष्‍ट्रीय बागवानी मिशन' क्रियान्वित किया गया है। बाग़वानी और खाद्य प्रसंस्‍करण विभाग नाम से अलग विभाग का गठन किया गया है।&lt;br /&gt;
कृषि योग्य भूमि चंबल, मालवा का पठार और रेवा के पठार में मिलती हैं। नदी द्वारा बहाकर लाई गई जलोढ़ मिट्टी से ढकी नर्मदा घाटी उपजाऊ इलाक़ा है। मध्य प्रदेश की कृषि की विशेषता कृषि की परम्परागत पद्धति का उपयोग है। कृषि योग्य भूमि का केवल 15 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, राज्य की कृषि वर्षा पर निर्भर है और बहुधा कृषकों को सूखे व लाल-पीली मिट्टी के कारण नमी की कम मात्रा का सामना करना पड़ता है। मध्य प्रदेश में होने वाली सिंचाई मुख्यतः नहरों, कुओं, गाँवों के तालाबों और झीलों से होती है। &lt;br /&gt;
प्रमुख फ़सलें चावल, गेहूँ, ज्वार, दलहन (चना, सेम और मसूर जैसी फलियाँ) और [[मूँगफली]] हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में मुख्यतः चावल उगाया जाता है। पश्चिमी मध्य प्रदेश में गेहूँ और ज्वार अधिक होता है। अन्य फ़सलों में अलसी, तिल, गन्ना और पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जाने वाला ज्वार-बाजरा प्रमुख है। राज्य अफ़ीम, मंदसौर ज़िले में और मारिजुआना, दक्षिणी-पश्चिमी खांडवा ज़िले में, का उत्पादक राज्य है। &lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश में पशु पालन और कुक्कुट पालन महत्त्वपूर्ण हैं। देश के कुल पशुधन (गाय, भैंस और भेड़ और सूअर) का लगभग सातवां भाग इस राज्य में है। &lt;br /&gt;
==वन संपदा==&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश  के कुछ ही प्रतिशत हिस्से में स्थायी चारागाह या घास के मैदान हैं। प्रमुख वन क्षेत्रों में विंध्य पर्वत श्रृंखला, [[कैमूर पहाड़ियाँ|कैमूर की पहाड़ियाँ]], सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला, बघेलखंड का पठार और दंडकारण्य क्षेत्र शामिल है। महत्त्वपूर्ण वृक्ष सागौन, साल, बाँस, सलाई एवं तेंदूपत्ता हैं। सलाई से निकलने वाला लीसा अगरबत्ती और औषधि बनाने के काम आता है। तेंदू के पत्ते बीड़ी बनाने के काम आते हैं, जिसके प्रसिद्ध केन्द्र जबलपुर और सागर हैं। &lt;br /&gt;
जंगलों में जंगली पशु भरे पड़े हैं। जैसे बाघ, तेंदुआ, जंगली साँड़, [[चीतल]], भालू, जंगली भैंसा, सांभर और काला हिरन। पक्षियों की भी बहुत सी प्रजातियाँ यहाँ पर हैं। &lt;br /&gt;
==राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Narmada-River-1.jpg|[[नर्मदा नदी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Narmada River|thumb]]&lt;br /&gt;
राज्य में अनेक राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य है।&lt;br /&gt;
#[[कान्हा राष्ट्रीय उद्यान]]&lt;br /&gt;
#[[माधव नेशनल उद्यान]]&lt;br /&gt;
#[[पन्‍ना नेशनल उद्यान]]&lt;br /&gt;
#[[करेरा पक्षी अभयारण्‍य]]&lt;br /&gt;
#[[बोरी वन्‍य जीवन अभयारण्‍य]]&lt;br /&gt;
#[[चंबल अभयारण्य]]&lt;br /&gt;
*वनों की सुरक्षा और विकास के लिए, राज्य सरकार ने बहुत सी वन समितियाँ आसपास के ग्रामीणों को साझेदारों के तौर पर जोड़ने के लिए गठित की है। &lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश ने इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, दूरसंचार, मोटरवाहनों, सूचना प्रौद्योगिकी आदि उच्‍च तकनीकी उद्योगों के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। दूरसंचार प्रणालियों के लिए यह राज्‍य ऑप्टिकल फाइबर का उत्‍पादन कर रहा है। इंदौर के पास पीठमपुर में बडी संख्‍या में मोटर वाहन उद्योग स्‍थापित हुए है। राज्‍य में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख उद्योग है - [[भोपाल]] में 'भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्‍स लि.', [[होशंगाबाद]] में 'सिक्‍योरिटी पेपर मिल', [[देवास]] में नोट छापने की प्रेस, [[नेपानगर]] में अख़बारी [[काग़ज़]] की मिल और [[नीमच]] की अल्‍कालॉयड फैक्‍ट्री।&lt;br /&gt;
*गत वर्ष राज्‍य में सीमेंट का उत्‍पादन 12.49 लाख मीट्रिक टन हुआ। &lt;br /&gt;
*पीठमपुर में जल्‍दी ही एक मालवाहक विमान परिसर स्‍थापित किया जा रहा है। &lt;br /&gt;
*भारत सरकार इंदौर में विशेष आर्थिक क्षेत्र स्‍थापित कर रही है। समग्र आर्थिक विकास नीति लागू कर प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्‍साहित किया जा रहा है। राज्‍य ने निवेश को आकर्षित करने के लिए आकर्षक छूट देने के लिए औद्योगिक प्रोत्‍सा‍हन नीति की घोषणा की है। अब तक उद्योग लगाने की इच्‍छा जाहिर करने वाले 5200 करोड रुपये के निवेश प्रस्‍ताव प्राप्‍त हुए है। &lt;br /&gt;
*सागर ज़िले के [[बीना]] में काफ़ी समय से लंबित 10,300 करोड़ रुपये की लागत वाली ओमान बीना तेलशोधक परियोजना तैयार है। &lt;br /&gt;
*भारत सरकार ने धार ज़िले के पीठमपुर में एक राष्‍ट्रीय ऑटोमोटिव परीक्षण, अनुसंधान तथा विकास परियोजना को मंजूरी दे दी है।&lt;br /&gt;
*राज्‍य सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक नई सूचना प्रौद्योगिकी नीति लागू की है।&lt;br /&gt;
खनिज उत्‍पादन के क्षेत्र में राज्‍य का विशिष्‍ट स्‍थान है। वर्ष 2005-06 में 5312.65 करोड़ रुपये के खनिजों का उत्‍पादन हुआ। राज्‍य में 21 तरह के खनिज निकाले जाते हैं। 2006 में डोलोमाइट का उत्‍पादन 128 हज़ार मीट्रिक टन, हीरे का उत्‍पादन 44149 हज़ार कैरेट और चूना पत्‍थर का 25865 हज़ार मीट्रिक टन, बॉक्‍साइट का उत्‍पादन 87 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन, ताम्र अयस्‍क का उत्‍पादन 1706 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन और कोयले का उत्‍पादन 54000 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन रहा। यह राज्‍य चंदेरी और माहेश्‍वर के पारंपरिक हस्‍तशिल्‍प और हथकरघे से बने कपड़ों के लिए प्रसिद्ध है। मध्यप्रदेश के मंदसौर ज़िले में अवस्थित [[हिंगलाजगढ़]] परमार मूर्तिकला के विशिष्ट केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gwalior-Fort-Gwalior.jpg|[[ग्वालियर का क़िला]], [[ग्वालियर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Gwalior Fort, Gwalior|thumb]]&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश में कुछ महत्त्वपूर्ण नदियों का उद्गम होता है- &lt;br /&gt;
#[[नर्मदा नदी|नर्मदा]], &lt;br /&gt;
#[[ताप्ती नदी|ताप्ती]] (तापी), &lt;br /&gt;
#[[महानदी|महानदी]] और &lt;br /&gt;
#[[वेनगंगा नदी|वेनगंगा]] ([[गोदावरी नदी|गोदावरी]] की सहायक नदी), &lt;br /&gt;
#बहुत सी जलधाराएँ [[यमुना नदी|यमुना]] और [[गंगा नदी|गंगा]] की सहायक नदियों के रूप में उत्तर की ओर बहती हैं। &lt;br /&gt;
#अन्य नदियों में यमुना की सहायक नदियाँ—[[बनास नदी|बनास]], [[बेतवा नदी|बेतवा]] व [[केन नदी|केन]] और [[सोन नदी|सोन]] (गंगा की सहायक नदी) आती हैं। &lt;br /&gt;
2004-2005 में कुल 61.9 लाख हेक्‍टेयर इलाके में सिंचाई सुविधा उपलब्‍ध थी। सिंचाई सुविधाओं में 39 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक वृद्धि का लक्ष्‍य है। 30 ज़िलों की विद्यमान सिंचाई प्रणालियों का नवीकरण करके 5 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं की फिर से बहाली के लिए 1919 करोड़ रुपये की जल क्षेत्र पुनर्निर्माण परियोजना पर काम चल रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश में निम्‍न स्‍तर का कोयला प्रचुर मात्रा में होता है, जो बिजली उत्‍पादन के अनुकूल है। पनबिजली उत्‍पादन की भी यहाँ अपार क्षमता है। यहाँ राज्‍य में वर्ष 2005-2006 में विद्युत उत्‍पादन की कुल स्‍थापित क्षमता 7934.85 मेगावाट थी। यहाँ 902.5 मेगावाट बिजली उत्‍पादन क्षमता के आठ पनबिजली केंद्र है। राज्‍य के 51,806 में से 50,475 गांवों में बिजली पहुंच चुकी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विकास की पहल==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश ग्रामीण रोजगार योजना 18 ज़िलों में लागू की गई है। इस योजना को लागू करने में मध्‍य प्रदेश प्रथम पर है। राज्‍य बाग़वानी उत्‍पादन और उत्‍पादकता को बढ़ाने के लिए राष्‍ट्रीय बाग़वानी मिशन शुरू किया गया है।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pachmarhi-Lake.jpg|पचमढ़ी की झील&amp;lt;br /&amp;gt; Pachmarhi Lake|thumb]]&lt;br /&gt;
'''सड़कें''' मध्‍य प्रदेश में सड़कों की कुल लंबाई 73311 किलोमीटर है। राष्‍ट्रीय राजमार्गो की लंबाई 4280 कि.मी और प्रांतीय राजमार्गो की लंबाई 8729 कि.मी. है। राज्‍य में सड़कों के निर्माण तथा सुधार का कार्य बडे पैमाने पर किया जा रहा है तथा लगभग 60 हज़ार कि.मी. सड़कों का निर्माण तथा सुधार का कार्य किया जाएगा। वर्ष 2005 को ‘सडकों का वर्ष’ के रूप में मनाया गया। इस दौरान प्रत्‍येक माह एक महत्‍वपूर्ण सड़क का निर्माण कार्य पूरा किया गया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रेलवे''' उत्‍तर भारत को दक्षिण भारत से जोडने वाला प्रमुख रेलमार्ग मध्‍य प्रदेश से होकर गुजरता हैं। राज्‍य में [[भोपाल]], [[बीना]], [[ग्वालियर]], [[इंदौर]], [[इटारसी]], [[जबलपुर]], [[कटनी]], [[रतलाम]] और [[उज्जैन]] मुख्‍य जंक्‍शन है। रेलवे के क्षेत्रीय मुख्‍यालय भोपाल, रतलाम और [[जबलपुर]] में है। राज्य से गुज़रने वाला प्रमुख रेलमार्ग मूलतः चेन्नई , मुंबई, और कोलकाता बंदरगाहों को राज्य के भीतरी प्रदेश से जोड़ने के लिए बनाया गया था। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वायुमार्ग'''&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश राज्य भारत के अन्य भागों से भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर, रीवा और खजुराहो में स्थित हवाई अड्डों व बहुत से राष्ट्रीय राजमार्गों द्वारा भी जुड़ा हुआ है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==त्‍योहार==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश में कई त्‍योहार और उत्‍सव मनाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*आदिवासियों का एक महत्‍वपूर्ण त्‍योहार 'भगोरिया' है, जो पंरपरागत हर्षोल्‍लास से मनाया जाता है। &lt;br /&gt;
*खजुराहो, भोजपुर, [[पंचमढ़ी]] और उज्जैन में शिवरात्रि के पर्व के दौरान स्‍थानीय परंपराओं का रंग दिखाई देता है। &lt;br /&gt;
*[[चित्रकूट]] और [[ओरछा]] में रामनवमी पर्व के आयोजन की अनोखी परंपरा है। ओरछा, मालवा और पचमढ़ी के उत्‍सवों में कला और संस्‍कृति का बडा सुंदर मेल दिखाई देता है। &lt;br /&gt;
*[[ग्वालियर]] के 'तानसेन संगीत समारोह', मैहर के 'उस्‍ताद अलाउद्दीन ख़ाँ संगीत समारोह', उज्जैन के 'कालिदास समारोह' और 'खजुराहों के नृत्‍य समारोह' मध्‍य प्रदेश के कुछ प्रसिद्ध कला उत्‍सव हैं। &lt;br /&gt;
*जबलपुर में संगमरमर की चट्टानों के लिए मशहूर [[भेड़ाघाट]] में इस वर्ष से वार्षिक 'नर्मदा उत्‍सव' की शुरूआत की गई है। *शिवपुरी में इस वर्ष से शिवपुरी उत्‍सव शुरू किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्‍थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Madhya-Pradesh-Map-1.jpg|thumb|मध्य प्रदेश का मानचित्र&amp;lt;br /&amp;gt; Map of Madhya Pradesh]]&lt;br /&gt;
#[[पचमढ़ी]] का अद्भुत सौंदर्य, मध्य प्रदेश का एकमात्र हिल स्टेशन है।&lt;br /&gt;
#भेडाघाट की चमचमाती संगमरमरी चट्टाने और धुआंधार जलप्रपातों का शोर, &lt;br /&gt;
#कान्‍हा राष्‍ट्रीय उद्यान, जहां अनूठे बारसिंगे रहते हैं, &lt;br /&gt;
#बांधवगढ़ राष्‍ट्रीय उद्यान जहां प्रागैतिहासिक गुफाएं और वन्‍य जीवन है। &lt;br /&gt;
ये सब राज्‍य के प्रमुख आकर्षण हैं। ग्वालियर, [[मांडू मध्यप्रदेश|मांडू]], दतिया, चंदेरी, जबलपुर, ओरछा, रायसेन, सांची, विदिशा, उदयगिरि, भीमबेटका, इंदौर और भोपाल ऐतिहासिक महत्‍व के स्‍थल हैं। माहेश्‍वर, ओंकारेश्‍वर, उज्जैन, चित्रकूट और [[अमरकंटक]] ऐसे स्‍थान हैं, जहां आकर तीर्थयात्रियों के मन को शांति मिलती है। खजुराहो के मंदिर विश्‍व में अनूठे हैं। इसके अलावा ओरछा, [[भोजपुर मध्य प्रदेश|भोजपुर]] और उदयपुर के मंदिर इतिहास में रूचि रखने वाले लोगों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। सतना, सांची, [[विदिशा]], ग्वालियर, इंदौर, मंदसौर, उज्जैन, राजगढ़, भोपाल, जबलपुर, रीवां और अन्‍य अनेक स्‍थानों के संग्रहालयों में पुरातत्‍वीय महत्‍व के भंडारों को संरक्षित रखा गया है। माहेश्‍वर, [[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारेश्‍वर]] तथा अमरकंटक को उनके धार्मिक महत्‍व के अनुसार समग्र विकास के लिए पवित्र शहर घोषित किया गया है। बुरहानपुर को नए पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
*[[खोह]] मध्य प्रदेश में नागदा के निकट स्थित है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;नरवर&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|नरवर}}&lt;br /&gt;
यह ऐतिहासिक नगर [[मध्य प्रदेश]] के [[ग्वालियर]] के समीप है। [[महाभारत]] में वर्णित यह नगर राजा [[नल]] की राजधानी बताया गया है। 12वीं शताब्दी तक इस नगर को नलपुर कहा जाता था। यहाँ स्थित क़िला जो [[विंध्य पर्वतमाला|विंध्य पर्वतश्रेणी]] की एक खड़ी चट्टान पर स्थित है, मध्यकालीन भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पद्मावती&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|पद्मावती}}&lt;br /&gt;
*मध्य प्रदेश के [[ग्वालियर]] के समीप वर्तमान पद्मपवैया नामक स्थान ही प्राचीन काल का पद्मावती नगर था।&lt;br /&gt;
*कुछ विद्वानों के अनुसार यह नगर [[विदर्भ]] में [[सिन्धु नदी|सिन्धु]] एवं पारा (पार्वती) नामक दो नदियों के संगम पर स्थित था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जोगीमारा गुफ़ाएं==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|जोगीमारा गुफ़ाएं}}&lt;br /&gt;
*मध्य प्रदेश की पूर्व रियासत सरगुजा में लक्ष्मणपुर से 12 मील की दूरी पर रामगढ़ की पहाड़ी में जोगीमारा नामक शैलकृत गुफ़ाएँ हैं। &lt;br /&gt;
*जिनमें 300 ई,पू. के कुछ रंगीन भित्तिचित्र यहाँ विद्यमान हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पनगोरारिया&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|पनगोरारिया}}&lt;br /&gt;
*पनगोरारिया मध्य प्रदेश के सेहोर ज़िले की पहाड़ियों में स्थित है।&lt;br /&gt;
*पनगोरारिया स्थान से खोज के दौरान प्राकृतिक गुफ़ाएँ मिली हैं, जिनको काटकर आवास के योग्य बानाया गया था। &lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-7.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-4.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-5.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-1.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-2.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-3.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-6.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-15.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
* [http://www.mp.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के नगर}}{{मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}{{राज्य और के. शा. प्र.2}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__NOTOC__ __INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
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		<title>पनगोरारिया</title>
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		<updated>2011-04-16T06:12:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: :श्रेणी:नया पन्ना (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*पनगोरारिया [[मध्य प्रदेश]] के सेहोर ज़िले की पहाड़ियों में स्थित है। &lt;br /&gt;
*पनगोरारिया स्थान से खोज के दौरान प्राकृतिक गुफ़ाएँ मिली हैं, जिनको काटकर आवास के योग्य बानाया गया था।&lt;br /&gt;
*इन गुफ़ाओं को [[1975]] ई. में के.डी.बनर्जी एवं भोपर्दिकर ने खोजा था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से अशोक का गुहालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें उल्लेख है कि प्रियदर्शी ([[अशोक]]) उस समय यहाँ भिक्षुओं से मिलने आया था, जब वह ''महाराजकुमार'' था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>पनगोरारिया</title>
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		<updated>2011-04-16T06:11:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: '*पनगोरारिया मध्य प्रदेश के सेहोर ज़िले की पहाड़िय...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*पनगोरारिया [[मध्य प्रदेश]] के सेहोर ज़िले की पहाड़ियों में स्थित है। &lt;br /&gt;
*पनगोरारिया स्थान से खोज के दौरान प्राकृतिक गुफ़ाएँ मिली हैं, जिनको काटकर आवास के योग्य बानाया गया था।&lt;br /&gt;
*इन गुफ़ाओं को [[1975]] ई. में के.डी.बनर्जी एवं भोपर्दिकर ने खोजा था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से अशोक का गुहालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें उल्लेख है कि प्रियदर्शी ([[अशोक]]) उस समय यहाँ भिक्षुओं से मिलने आया था, जब वह ''महाराजकुमार'' था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
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		<title>केशवरायपाटन</title>
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		<updated>2011-04-15T13:17:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
केशवरायपाटन प्राचीन नगर [[राजस्थान]] के कोटा शहर से 22 किलोमीटर दूर [[चम्बल नदी]] के तट पर अवस्थित है। वर्तमान पाटन ही प्राचीन आश्रम पट्टन है। &lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
कुछ प्राचीन मतों के अनुसार चन्द्रवंशी राजा हस्ती (जिन्होंने [[हस्तिनापुर]] बसाया) के चचेरे भाई रितदेव ने इसे बसाया था। यहाँ [[पाण्डव|पाण्डवों]] के द्वारा अज्ञातवास में कुछ समय शरण लेने का उल्लेख भी मिला है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वास्तुकला&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
हम्मीर महाकाव्य से ज्ञात होता है कि [[रणथम्भौर]] के [[चौहान वंश|चौहान]] राजा जेत्रसिंह वृद्धावस्था में अपने पुत्र हम्मीर को राज्य देकर पत्नी सहित यहाँ मंदिर की पूजा हेतु आये थे। यहाँ के प्राचीन मंदिर के गिर जाने पर [[बूँदी]] नरेश राजा शत्रुसाल हाड़ा ने एक बड़ा मंदिर 1641 ई. में फिर बनवाया था। इस मंदिर में केशवराय ([[विष्णु]]) की चतुर्भुजी सफ़ेद पाषाण की मूर्ति प्रतिष्ठित है, जिसको शत्रुसाल [[मथुरा]] से लाये थे। यह मंदिर वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;धार्मिक स्थल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
पत्थर की बारीक कटाई, तक्षणकला का श्रेष्ठ नमूना मण्डोवर व शिखर पर उकेरी आकृतियाँ मनमोहक हैं। मंदिर के गर्भगृह में, बड़ी संख्या में मंदिर से भी प्राचीन प्रतिमाओं का संकलन है। इसकी बाहरी दीवारों पर प्राचीन प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। यह चम्बल नदी का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। यहाँ [[कार्तिक|कार्तिक माह]] में प्रसिद्ध मेला लगता है। केशवराय का यह मंदिर बाहर से देखने पर अलौकिक दिखाई देता है। मंदिर निर्माण की शैली उत्कृष्ट एवं तक्षण कला बेजोड़ है। यहाँ राजराजेश्वर मंदिर (शैव) भी प्राचीनकालीन महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;चमत्कारिक शिला&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
इस नगर में [[जैन]] मुनि सुव्रतनाथ की 2500 वर्ष प्राचीन एक चमत्कारिक प्रतिमा है, जो सम्वत 336 में प्रतिष्ठित की गई थी। यह एक शिला फलक पर है। इसकी पॉलिश [[मौर्य]] व मध्यवर्ती [[कुषाण काल]] की सिद्ध होती है। इसके आलावा यहाँ तेरहवीं शताब्दी की और भी प्रतिमायें हैं। यह मंदिर भूमिदेवरा नामक जैन मंदिर भी कहलाता है। इसमें स्थित मूर्ति को [[मोहम्मद गौरी]] द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया था। जिसकी पुष्टि कर्नल टॉड, दशरथ शर्मा इत्यादि विद्वान करते हैं। एक अन्य श्वेत शिला फलक पर पद्मप्रभु की खड़गासन मूर्ति है, जो मूर्तिकला की दृष्टि से बहुत आकर्षक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>पायल</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%B2&amp;diff=152217</id>
		<title>केरल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%B2&amp;diff=152217"/>
		<updated>2011-04-15T10:49:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;पायल: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Kerala-Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[तिरुवनन्तपुरम]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=31,838,619&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=819&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=38863 कि.मी&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=8.5074°N 76.972 °E&lt;br /&gt;
|ज़िले=14&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=[[मलयालम भाषा]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=[[मुन्नार]]&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=[[कोवलम]], [[वारकला]], [[कप्पड़]], [[बेकल]], [[मुन्नार]], [[पीरमेड]], [[कन्नूर]]&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:1058&lt;br /&gt;
|साक्षरता=90.92&lt;br /&gt;
|स्त्री=87.86&lt;br /&gt;
|पुरुष=94.20&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=36.7 °C&lt;br /&gt;
|शरद=19.8 °C&lt;br /&gt;
|वर्षा=3017&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[आर एस गवई]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[वी एस अच्चुतानंदन]]&lt;br /&gt;
|लोकसभा क्षेत्र=20&lt;br /&gt;
|राज्यसभा सदस्य=9&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.kerala.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|17:26, 20 मई 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Kerala-Seal.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
केरल भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण-पश्चिमी सिरे पर स्थित है। स्‍वतंत्र [[भारत]] में जब छोटी छोटी रियासतों का विलय हुआ तब त्रावनकोरे तथा कोचीन रियासतों को मिलाकर 1 जुलाई, 1949 को 'त्रावनकोर कोचीन' राज्‍य बना दिया गया, लेकिन मालाबार मद्रास प्रांत के अधीन ही रहा। राज्‍य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अंतर्गत 'त्रावनकोर-कोचीन राज्‍य तथा मालाबार' को मिलाकर 1 नवंबर, 1956 को 'केरल राज्‍य' का निर्माण किया गया। हिन्दुओं और मुसलमानों के अतिरिक्त यहाँ ईसाई भी बड़ी संख्या में रहते हैं।  इस राज्य का क्षेत्रफल 38863 हज़ार वर्ग किलोमीटर है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Neyyar-Dam-Thiruvananthapuram.jpg|thumb|250px|left|नेय्यर बांध, [[तिरुअनंतपुरम]]&amp;lt;br /&amp;gt;Neyyar Dam, Thiruvananthapuram]]&lt;br /&gt;
पूर्व में ऊंचे पश्चिमी घाट और पश्चिम में [[अरब सागर]] के मध्य में स्थित इस प्रदेश की चौड़ाई 35 कि. मी. से 120 कि. मी.तक है। भौगोलिक दृष्टि से केरल पर्वतीय क्षेत्रों, घाटियों, मध्‍यवर्ती मैदानों तथा समुद्र का तटवर्ती क्षेत्र हैं। केरल नदियों और तालाबों के सम्बंध में बहुत ही समृद्ध है। केरल में 44 नदियां बहती हैं जिनमें 41 नदियाँ पश्चिम की ओर और तीन पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ हैं। ये नदियाँ अपनी सहायक नदियों और उपधाराओं के साथ केरल की प्राकृतिक संपदा को बढ़ाती हैं। समुद्री झीलें केरल का मुख्य आकर्षण हैं। आर्थिक दृष्टि से भी प्राकृतिक संसाधन बहुत म‍हत्‍वपूर्ण हैं। उत्तरी केरल राज्य के एक अंत:क्षेत्र दक्षिण [[भारत]] में [[माहि]] नगर स्थित है। केरल की राजधानी [[तिरुवनन्तपुरम]] (त्रिवेन्द्रम) है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;अनाई शिखर&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|अनाई शिखर}}&lt;br /&gt;
*अनाई शिखर, पूर्वी [[केरल]] राज्य में स्थित है।&lt;br /&gt;
*यह शिखर, पश्चिमी घाट, दक्षिणी-पश्चिमी भारत में है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पत्तनम&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|पत्तनम}}&lt;br /&gt;
*दक्षिण [[भारत]] में स्थित केरल के एर्नाकुलम ज़िले में पत्तनम नामक गाँव स्थित है।&lt;br /&gt;
*उत्खनन में यहाँ से मिट्टी के जार के टुकड़े मिले हैं, जिनके बारे में अनुमान है कि ये प्रसिद्ध इतालवी सुराही शिल्पकला के नमूने हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
यहाँ की मुख्य भाषा [[मलयालम भाषा|मलयालम]] है।  यहाँ मलयालम भाषा बोली जाती है । अपनी संस्कृति और भाषा-वैशिष्ट्य के कारण [[भारत]] के दक्षिण में स्थित चार राज्यों में केरल का प्रमुख स्थान है । इसके पड़ोसी राज्य [[तमिलनाडु]] और [[कर्नाटक]] हैं। केरल राज्य में अंग्रेज़ी भाषा को प्रमुख स्थान प्राप्त है । मलयालम भाषा की भांति अंग्रेज़ी भाषा भी शिक्षा का प्रमुख माध्यम है । [[तमिल भाषा|तमिल]] और [[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]] भाषाओं को अल्पसंख्यक भाषा कहा जाता है। केरल प्रदेश की भाषा मलयालम है। मलयालम द्रविड़ परिवार की भाषाओं में से एक है। मलयालम भाषा की उत्पत्ति के विषय में अनेक मत हैं -&lt;br /&gt;
#एक मत है कि किसी आदि द्रविड़ भाषा से विकसित होकर मलयालम एक स्वतंत्र भाषा हुई । &lt;br /&gt;
#दूसरा मत है कि मलयालम तमिल से उत्पन्न भाषा है। &lt;br /&gt;
*सभी विद्वान मानते हैं कि भाषा के परिवर्तन के कारण मलयालम भाषा का उदय हुआ। तमिल और [[संस्कृत]] दोनों ही भाषाओं के साथ मलयालम का बहुत ही गहन सम्बन्ध है।  साहित्यिक भाषा के रूप में मलयालम भाषा का विकास 13 वीं शताब्दी से ही प्रारम्भ हुआ। 13 वीं शताब्दी में लिखित 'रामचरितम्' को मलयालम भाषा का आदि काव्य माना जाता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जलवायु==&lt;br /&gt;
केरल राज्य में गर्म मौसम है क्योंकि यह भूमध्यरेखा से मात्र 8 डिग्री के अंतराल पर स्थित है। केरल राज्य की जलवायु की मुख्य विशेषता है- शीतल मन्द हवा और भारी वर्षा । पश्चिमी मानसून से प्रमुख वर्षा काल प्रारम्भ होता है। दूसरा वर्षाकाल उत्तरी-पश्चिमी मानसून है । प्रत्येक वर्ष लगभग 120 से लेकर 140 दिन तक वर्षा होती रहती है । केरल की औसत वार्षिक वर्षा 3017 मिली मीटर मानी जाती है । केरल में भारी वर्षा से बाढ़ भी आती हैं जिससे जन और धन की भी बहुत हानि होती है ।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vizhinjam-Port-Site.jpg|thumb|220px|left|[[विज़िंजम पत्तन]], [[तिरुअनंतपुरम]]&amp;lt;br /&amp;gt;Vizhinjam Port, Tiruvananthapuram]]  &lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
केरल राज्य में कृषि की विशेषता है कि यहाँ व्‍यापारिक फ़सलें अधिक उगाई जाती हैं। राज्‍य के लगभग 50 प्रतिशत नागरिक कृषि पर निर्भर है। नारियल, रबड, काली मिर्च, अदरक, [[चाय]], [[इलायची]], काजू तथा कॉफी आदि का उत्पादन केरल में प्रमुख रूप से होता है। दूसरी फ़सलों में सुपारी, केला, अदरक तथा हल्‍दी आदि हैं। केरल राज्‍य में जायफल, दालचीनी, लौंग आदि मसालों के वृक्ष भी उगाए जाते हैं। चावल तथा टैपियोका केरल की मुख्‍य खाद्य फ़सलें हैं।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;कृषि उत्पादन आँकड़े&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Muzhappilangad-Beach-Kannur.jpg|thumb|250px|[[मुजुपिलंगड बीच कन्नूर|मुजुपिलंगड बीच]], [[कन्नूर]]]] &lt;br /&gt;
*आठवीं पंचवर्षीय योजना  में चावल के क्षेत्र में वार्षिक कमी 22,000 हेक्‍टेयर थी। &lt;br /&gt;
*नौवीं योजना में यह घटकर 13000 हेक्‍टेयर रह गई। &lt;br /&gt;
*2003 - 04 के 2.87 लाख हेक्‍टेयर की तुलना में यह बढकर 2004 - 05 में 2.90 लाख हेक्‍टेयर हो गई। यह वृद्वि 2,634 हेक्‍टेयर थी। चावल का उत्‍पादन 5.70 मीट्रिक टन से बढकर 6.67 लाख टन हो गया। यह वृद्धि 17 प्रतिशत थी।&lt;br /&gt;
*सूखे की वजह से धान उत्‍पादन में 2003 से 2004 में कमी आई किंतु 2004 से 05 में उत्‍पादन में वृद्वि हुई। 2004 से 05 में चावल के उत्‍पादन में वृद्धि अल्‍लपुज्‍जा (75 प्रतिशत), पलक्‍कड (37 प्रतिशत) में दर्ज की गई।&lt;br /&gt;
*आय और रोजगार में नारियल केरल की ग्रामीण अर्थव्यवस्‍था का मुख्‍य आधार है। नारियल का फ़सल क्षेत्र नौ लाख हेक्‍टेयर तक है, जो कुल फ़सल क्षेत्र का लगभग 41 प्रतिशत है। केरल में नारियल 35 लाख लोगों की आय का साधन है।&lt;br /&gt;
*मुख्‍य निर्यात [[काली मिर्च]] का है जिसमें केरल अन्‍य राज्‍यों में सदैव से ही सर्वश्रेष्‍ठ  है। देश भर में काली मिर्च के उत्‍पादन का 98 प्रतिशत केरल में होता है और इस प्रकार काली मिर्च के क्षेत्र में केरल का एकाधिकार बना हुआ है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Boat-Race-Kerala.jpg|left|thumb|250px|नौका दौड़, केरल&amp;lt;br /&amp;gt;Boat Race, Kerala]]&lt;br /&gt;
*केरल की अर्थ्व्यवस्था में चाय बागानी फ़सलों, रबड, कॉफी, चाय और इलायची का विशेष योगदान है। इन चार फ़सलों की लगभग 6.53 लाख हेक्‍टेयर में खेती होती है। यह राज्‍य के कुल कृषि क्षेत्र का 29 प्रतिशत है और राज्‍य में इन फ़सलों के अधीन क्षेत्र का 43 प्रतिशत है।&lt;br /&gt;
*केरल में कुल रबड़ क्षेत्र (देश भर) का 83 प्रतिशत क्षेत्र  है। वर्ष 2004 - 05 में रबड़ का कुल फ़सल क्षेत्र लगभग 4.81 लाख हेक्‍टेयर था, जो पिछले वर्ष से 2141 हेक्‍टेयर अधिक रहा। केरल में रबड़ का उत्‍पादन 6.91 लाख टन रहा जो पिछले वर्ष से 5 प्रतिशत अधिक था। उत्‍पादकता में वृद्धि 2004 - 05 में भी बनी रही।&lt;br /&gt;
*वर्ष 2004 - 05 में देश में कॉफी का उत्‍पादन क्षेत्र 3.28 लाख हेक्‍टेयर था जिसमें से 0.846 लाख हेक्‍टेयर केरल में है जो कुल क्षेत्र का 26 प्रतिशत है। वर्ष 2004 - 05 में केरल की हिस्‍सेदारी 19.7 प्रतिशत रही। देश के कुल 2.75 लाख मीट्रिक टन कॉफी उत्‍पादन के मुक़ाबले केरल का उत्‍पादन 0.54 लाख मीट्रिक टन था, देश में 5.11 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्रफल में चाय के कुल बागानों की तुलना में केरल में केवल 0.37 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र में चाय की खेती की गई। चाय उत्‍पादन में केरल की हिस्‍सेदारी 2004 में पिछले वर्ष के 7 प्रतिशत से गिरकर  6 प्रतिशत रह गई। पिछले तीन वर्षों से उत्‍पादन में गिरावट चल रही है। बड़ी कंपनियों के चाय बागानों में संगठित क्षेत्र के 84,000 से ज्‍यादा मजदूर काम करते हैं।&lt;br /&gt;
*इलायची एक अन्‍य बागानी फ़सल है जिसका उत्‍पादन 2004 - 05 में 28 प्रतिशत से बढ़कर 76 प्रतिशत हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्योग==&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
केरल में औद्योगिक विकास की अपार संभावनाएं है। यहाँ पर पनबिजली, घने वन, दुर्लभ खनिज, परिवहन और अच्छी संचार प्रणाली, सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। यहाँ के परंपरागत उद्योग हैं- हथकरघा, काजू, नारियल जटा तथा हस्‍तशिल्‍प। अन्‍य महत्‍वपूर्ण उद्योगों में रबड, चाय, चीनी मिट्टी के बर्तन, बिजली तथा इलेक्‍ट्रॉनिक उपकरण, टेलीफ़ोन के तार, ट्रांसफार्मर, ईंट और टाइल्स, औषधियां और रसायन, सामान्‍य इंजीनियरी वस्‍तुएं, प्‍लाईवुड, रंगरोगन, बीड़ी और सिगार, साबुन, तेल, उर्वरक तथा खादी और ग्रामोद्योग उत्‍पाद शामिल हैं। इसके अलावा महीन उपकरण, मशीनी औज़ार, पेट्रोलियम पदार्थ, पेंट, लुगदी, काग़ज़, अखबारी काग़ज़, कांच तथा अलौह धातुओं के उत्‍पादन के लिए राज्‍य में कई कारखाने हैं। निर्यात की जाने वाली वस्‍तुओं में प्रमुख हैं- काजू, चाय, मसाले, लेमन ग्रास ऑयल, समुद्री खाद्य उत्‍पाद, शीशम और नारियल रेशा। राज्‍य में इल्‍मेनाइट, रटल, मोनाजाइट, जिरकोन, सिलीमेनाइट, चिकनी मिट्टी तथा स्‍फटिक युक्‍त बालू जैसे महत्‍वपूर्ण खनिज भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
लगभग सभी मुख्‍य उत्‍पादों में औद्योगिक निर्यात में लगातार वृद्धि हुई है।- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*सॉफ्टवेयर का निर्यात 2003 - 04 के दौरान 240 करोड़ रुपए का था, जो 2004 - 05 में 400 करोड़ रुपए का हो गया। यह वृद्धि 66 प्रतिशत थी। 2004 - 05 में निपटारे के लिए 2658 औद्योगिक विवाद थे जो 2003 - 04 की तुलना में काफ़ी कम थे। इसी तरह 2004 - 05 में हड़तालें और तालाबंदी भी 2003-04 की तुलना में कम रहे।&lt;br /&gt;
*31 मार्च 2005 तक केरल में 14655 जॉइंट स्‍टॉक कंपनियां थीं जिनमें से 13210 प्राइवेट लिमिटेड और 1445 पब्लिक लिमिटेड थी। केरल में सर्वाधिक संख्‍या में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हैं (1071 में से 113) जिनमें 115697 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इनमें से 63 उपक्रमों में इंजीनियरिंग, बिजली का सामान, वस्‍त्र, इलेक्‍ट्रॉनिक, चीन-मिट्टी, कृषि तथा लकड़ी के सामान का काम किया जाता है। &lt;br /&gt;
*केरल सरकार औद्योगिक इकाइयों को वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण / परामर्श सेवाएं प्रदान करती है। औद्योगिक प्रोत्‍साहन के कार्य में लगी महत्‍वपूर्ण एजेंसियां और विभाग हैं- के. एफ. सी., के. एस. आई. डी. सी., सिडबी किनफरा, उद्योग और वाणिज्‍य निदेशालय, एस.आई.डी.सी., एस.आई.एस.आई., किटको और सी.एम.डी.।&lt;br /&gt;
*उद्योग और वाणिज्‍य निदेशालय भूमि अधिग्रहण करके, उसे विकसित करके, सड़क, जलापूर्ति, बिजली तथा आवश्‍यक इमारतें बनाकर, सारी सुविधाएं लघु उद्योगों को उपलब्‍ध कराता है। लघु उद्योग विकास निगम अपनी बड़ी औद्योगिक संपदाओं व लघु औद्योगिक संपदाओं के जरिए लघु उद्योगों को मूल संरचनात्‍मक सुविधाएं उपलब्‍ध कराता है।&lt;br /&gt;
*निर्यात संवर्द्धन के लिए मुख्‍यत:  विशेष ध्यान आर्थिक क्षेत्र पर दिया जा रहा है। इस योजना का उद्देश्‍य निर्यात के लिए मुक्‍त वातावरण और अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर का प्रतिस्‍पर्धी माहौल उपलब्‍ध कराने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र स्‍थापित करना है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Munnar-Hill-Station-Kerala.jpg|thumb|250px|left|[[मुन्नार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Munnar]]&lt;br /&gt;
*[[कोच्चि]] में तीन विशेष आर्थिक क्षेत्र हैं-&lt;br /&gt;
#कलमसरी के किनफरा में इलेक्‍ट्रानिक पार्क, &lt;br /&gt;
#कोचीन विशेष आर्थिक क्षेत्र, &lt;br /&gt;
#बंदरगाह आधारित विशेष आर्थिक क्षेत्र। &lt;br /&gt;
*इसके अलावा अन्‍य हैं - &lt;br /&gt;
#मल्‍लपुरम फूड पार्क, &lt;br /&gt;
#टैक्‍नोपार्क, &lt;br /&gt;
#तिरुवनंतपुरम में एप‍रल पार्क, फिल्‍म और वीडियो पार्क, एनिमेशन विशेष आर्थिक क्षेत्र।&lt;br /&gt;
*भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में लघु उद्योग एक बहुत गतिशील और जीवंत क्षेत्र है। 31 मार्च 2005 तक केरल में 2,80,584 लघु औद्योगिक इकाइयां पंजीकृत थीं जिसमें 4230.03 करोड़ रुपए का निवेश था और 12,60,007 लोगों को रोजगार मिला था। 2004 - 05 में 4935 इकाइयां पंजीकृत हुईं जिनमें 198.63 करोड़ रुपए का निवेश हुआ है और 22585 लोग काम कर रहे हैं।&lt;br /&gt;
*केरल सरकार ने 'ज़िला औद्योगिक केंद्रों' के माद्यम से  'प्रत्‍याशा' शीर्षक के अंतर्गत केरल स्‍थानीय उद्योग संवर्द्धन कार्यक्रम प्रारम्भ किया है। इस योजना का उद्देश्‍य 25,00 लघु उद्योग स्‍थापित करना है जिनमें वर्ष 2005 - 06 में 1,00,000 लोगों को रोजगार मिलेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सूचना प्रौद्योगिकी==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Fort-Cochin-Kochi.jpg|thumb|250px|फ़ोर्ट कोचीन, [[कोच्चि]]&amp;lt;br /&amp;gt; Fort Cochin, Kochi]]&lt;br /&gt;
सूचना प्रौद्योगिकी और इसका अधिकाधिक उपयोग करने की क्षमता एक महत्‍वपूर्ण पहलू है। केरल सरकार ने राज्‍य में सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के लिए अनेक क़दम उठाए हैं। जिनमें से प्रमुख हैं-&lt;br /&gt;
#टेक्‍नोपार्क, तिरुवनंतपुरम। यह भारत का पहला अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर का सूचना प्रौद्योगिकी केंद्र है।&lt;br /&gt;
#कोच्चि में किनफरा स्थित सूचना प्रौद्योगिकी पार्क,&lt;br /&gt;
#केरल सूचना प्रौद्योगिकी मिशन का अक्षय कार्यक्रम&lt;br /&gt;
#राज्‍य सरकार की ई-शासन पहल, जैसे - फ्रैंड्स&lt;br /&gt;
*टेक्‍नोपार्क की समन्वित सूचना के साथ प्रौद्योगिकी वातावरण के रूप की अवधारणा की गई है जिसमें उद्योग की आवश्‍यकता की सभी मूलभूत और आधुनिक सुविधाएं उपलबध हैं। सरकार ने इस परिसर को सभी व्‍यवधानों से मुक्‍त कर दिया है, केवल बिजली की सुरक्षा के लिए मुख्‍य विद्युत निरीक्षक से प्रमाणपत्र लेना होता है। भारत सरकार की अधिकांश स्‍वीकृतियों के लिए टेक्‍नोपार्क एकमात्र संपर्क की भूमिका निभाता है। टेक्‍नोपार्क ने 2004 में सूचना प्रौद्योगिकी परिसर के लिए मूल संरचनात्‍मक और अन्‍य सेवाओं के सृजन और विपणन की अच्‍छी प्रणाली कायम करने और उसके रख-रखाव के लिए प्रमाणपत्र प्राप्‍त किया। टेक्‍नोपार्क ऐसी पहली सेवा संस्‍था है जिसे 2004 में अमेरिका की 'कारनेगी मैल्‍टन यूनिवर्सिटी' से सी.एम.एम.आई. लेवल 4 प्रमाणपत्र मिला।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kerala.jpg|left|thumb|250px|केरल का एक दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt;A View of Kerala]]&lt;br /&gt;
*वर्तमान समय में इस परिसर में 84 अंतर्राष्‍ट्रीय और स्‍वदेशी कंपनियां हैं, जिनमें 634.25 करोड़ रुपए का निवेश है। पिछले वर्ष टेक्‍नोपार्क से 350 करोड़ रुपए का निर्यात हुआ। 2004-05 में परिसर के विस्‍तार के लिए और भूमि अधिग्रहीत की गई। 86 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की गई और इस पर कब्‍ज़ा लिया जा रहा है। केंद्र सरकार ने इस नए परिसर (86 एकड़) को विशेष आर्थिक क्षेत्र घोषित किया है।&lt;br /&gt;
*कोच्चि में 92 एकड़ के क्षेत्रफल में एक इंफो पार्क है जिसमें 3.5 लाख वर्ग फीट का निर्मित हिस्‍सा है। बड़ी कंपनियों जैसे विप्रो, ओ.पी.आई, ए.सी.एस., आई.बी.एस. और टी.सी.एस ने इंफो पार्क में कार्य आरंभ कर दिया है। यहाँ इंफो पार्क सुविधाओं में 1400 कर्मचारी कार्यरत हैं। कंपनी का कुल निवेश 80.43 करोड़ रु. है। इंफो पार्क कंपनियों का कुल निर्यात 32 करोड़ रु है।&lt;br /&gt;
*केरल को ई-शासन के मामले में भारत का दूसरा सर्वश्रेष्‍ठ राज्‍य होने का गौरव प्राप्‍त है। फ्रैंड्स (फास्‍ट रिलायबिल इंस्‍टैंट एफिशिएंट नेटवर्क फार डिस्‍बर्समेंट सर्विस) एक ही स्‍थान पर निपटान प्रणाली है जहां नागरिक सभी कर और अन्‍य वित्तीय देय सरकार को देते हैं।&lt;br /&gt;
*अगस्‍त 2004 में मल्‍लपुरम ज़िले में 'फ्रैंड्स परियोजना' के विस्‍तार के रूप में अक्षय ई-केंद्रों के माध्यम से केरल सरकार ने बिलों के भुगतान की सुविधा शुरू की है।&lt;br /&gt;
*देश में अपनी तरह का पहला कॉल सेंटर राज्‍य की राजधानी में स्‍थापित किया गया है। इससे आम नागरिक टेलीफ़ोन के माध्यम से विभिन्‍न सरकारी विभागों में हुए लेन-देन के बारे में ज्ञान प्राप्‍त कर सकेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सिंचाई==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chirayinkeezhu-Thiruvananthapuram.jpg|thumb|250px|चिरयिनकीज़ू, [[तिरुअनंतपुरम]]&amp;lt;br /&amp;gt;Chirayinkeezhu, Thiruvananthapuram]]&lt;br /&gt;
*केरल भी जलापूर्ति के लिए भूतल जल सिंचाई प्रणाली पर निर्भर है, जो गुरुत्‍वाकर्षण बल के द्वारा संचालित होती है। बहुत बड़ा भूखंड बड़ी और मंझोली सिंचाई परियोजनाओं के लिए नियत है। मार्च [[2005]] तक कुल 3572.40 करोड़ के निवेश में से 2,462.51 करोड़ रुपए का निवेश (69 प्रतिशत) बड़ी और मंझोली सिंचाई परियोजनाओं के लिए था।&lt;br /&gt;
*केरल में सिंचाई व्‍यवस्‍था बड़ी, मंझोली और लघु सिंचाई परियोजनाओं का भूजल विकास कार्यक्रमों के माध्‍यम से होती है। पूरी की गई प्रमुख परियोजनाएं- मलमपूजहा, चलाकुड्डी, पीची, पंपा, पेरियार, चित्तूरपूजा, कुट्टियाडी, नेय्यर और चिम्‍मनी, पझारी, कांजरापूजा तथा कल्‍लाड हैं। पोथुड़ी, गायत्री, वलयार वज़ानी, मंगलम और चीरा कुझी मंझोली परियोजनाएं हैं। चार बड़ी परियोजनाओं- मुवात्तुपूजा, इदमलयार, करापूज़ा तथा कुटियार कुट्टी - कारापारा तथा कारापूजा तथा वाणासुर सागर, तिरथाला में पुल तथा जल नियामक तथा चामारावत्तोम में मंझोली योजनाओं पर काम चल रहा है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Lighthouse-Beach-Kovalam.jpg|thumb|250px|left|लाइट हाउस, [[कोवलम तट तिरुअनंतपुरम|कोवलम तट]]&amp;lt;br /&amp;gt;Lighthouse, Kovalam Beach]] &lt;br /&gt;
*दसवीं योजना में सिंचाई पर निवेश 930 करोड़ रुपए निर्धारित था। इसमें से प्रमुख निवेश बड़ी तथा मध्‍यम सिंचाई योजनाओं पर 600 करोड़ रुपए तथा उसके बाद लघु सिंचाई योजनाओं पर 205 करोड़ रुपए तथा बाढ़ नियंत्रण और समुद्र क्षरण अवरोधी योजनाओं पर 50 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए। पहले तीन वर्षों में 435.95 करोड़ रुपए बजट में आवंटित थे और 494.63 करोड़ रुपए व्‍यय हुए। इसमें से अधिकांश बड़ी और मंझोली सिंचाई के लिए था।&lt;br /&gt;
*'कमांड क्षेत्र विकास कार्यक्रम' मुख्‍य रूप से इस उद्देश्‍य से शुरू किया गया था कि अर्जित सिंचाई क्षमता और उपयोग में लाई गई क्षमता के अंतराल को कम किया जा सके। 2003 - 04 में कार्यक्रम की पुनर्रचना की गई और इसे एक नया नाम दिया गया - 'कमान क्षेत्र विकास और जल प्रबंधन कार्यक्रम'।&lt;br /&gt;
*कमांड क्षेत्र विकास कार्यक्रम प्राधिकरण का मुख्‍य कार्य नालियां, नाले बनवाना और बाड़ाबंदी लागू करना है। प्राधिकरण की प्रमुख गति‍विधियां 16 पूरी हो चुकी सिंचाई परियोजनओं में हुई, जैसे- 2.03 लाख हेक्‍टेयर के कुल क्षेत्रफल में मलमपुझा, मंगलम, पोथुंडी, वालयार, चीराकुझी, वाझानी, पीची, चालाकुडी, नैयार, गायत्री, पंपा, पेरियार घाटी, चित्तरपुझा, कुट्टीयाडी, पझाची और कांजिरपुझा। कमांड क्षेत्र विकास के कार्यक्रम भारत सरकार की वित्तीय सहायता से चलाए जाते हैं। *2004-05 की उपलब्धियों में 1998 हेक्‍टेयर में नहरें, 6156 हेक्‍टेयर क्षेत्र के लिए नालियां, 10 हेक्‍टेयर में इस प्रणाली की परख करना तथा 2302 हेक्‍टेयर में 83 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना शामिल है। पानी को, रोके गए क्षेत्रों के पुन: उद्धार के लिए 1033 हेक्‍टेयर संचित जल को उपयोगी बनाया गया और 3 मूल्‍यांकन रिपोर्ट प्रकाशित की गईं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बिजली==&lt;br /&gt;
केरल में पिछले दो दशकों से विद्युत प्रणाली में उल्‍लेखनीय प्रगति हुई है। विकास के आरंभिक चरणों में राज्‍य की पनबिजली क्षमता पर ध्‍यान केंद्रित किया गया। केरल विद्युत प्रणाली में 30 बिजली उत्‍पादन केंद्र है, जिनमें से 24 मेगावाट पनबिजली की, 5 तापबिजली के और 1 पवनचक्‍की है। इनमें से भी केरल राज्‍य विद्युत बोर्ड के पास 24 पनबिजली, दो तापबिजली और 1 पवनचक्‍की है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Napier-Museum-Thiruvananthapuram.jpg|thumb|250px|[[नेपियर संग्रहालय तिरुअनंतपुरम|नेपियर संग्रहालय]], [[तिरुअनंतपुरम]]&amp;lt;br /&amp;gt; Napier Museum, Thiruvananthapuram]] &lt;br /&gt;
31.3.05 तक केरल में कुल स्‍थापित क्षमता 2,671.22 मेगावाट थी, जिसमें से केरल राज्‍य विद्युत बोर्ड की 1,820.60 मेगावाट पनबिजली की, कोझीकोड की 2.0 मेगावाट पवन चक्‍की की और 234.60 मेगावाट तापबिजली संयंत्रों की थी।&lt;br /&gt;
मलनकारा पनबिजली परियोजना 23 अक्‍तूबर 2005 को शुरू की गई, जिससे स्‍थापित क्षमता में 10.5 मेगावॉट की वृद्धि हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माइक्रो-जलविद्युत कार्यक्रम के तहत बहुत छोटी पनबिजली परियोजनाओं को दो ज़िला पंचायतों-कासरगोड में कम्‍माडी और कोझिकोड ज़िले में चक्रकुंडु में लागू करने का काम ए.एन.ई.आर.टी. ने अपने हाथ में लिया है। यूनिडो ने बिजली प्रबंधन केंद्र में लघु पनबिजली का एक क्षेत्रीय केंद्र स्‍थापित किया है। केंद्र ने राज्‍य में 30 छोटी पनबिजली परियोजनाओं के बारे में विस्‍तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की है। इनमें से 13 छोटी पनबिजली परियोजनाएं प्रतिबंधित बिजली परियोजनाओं तथा स्‍वतंत्र बिजली परियोजनाओं के अंतर्गत निवेदकों को बूट आधार पर आवंटित की गई हैं। 100 किलोवॉट की छोटी बिजली योजनाओं में से पहली इदुक्‍की ज़िले के मनिकुलम में चालू हो गई है। राष्‍ट्रीय पवन ऊर्जा संसाधन आकलन के अंतर्गत अध्‍ययन के लिए दो क्षेत्रों - कसरगोड में पसवाई कुंब तथा इदुक्‍की ज़िले में कल्‍याणाथांडु को चुना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत सरकार द्वारा शुरू की गई 'राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना' के परिप्रेक्ष्‍य में केरल के 14 ज़िलों के 9.30 गांवों के 3578 घरों को बिजली पहुंचाने के लिए 348.79 करोड़ रुपए के परिव्‍यय का प्रस्‍ताव भारत सरकार को प्रस्‍तुत किया गया। भारत सरकार ने पहले चरण के लिए 221.75 करोड़ रुपए की स्‍वीकृति दी, जिसमें सात ज़िलों में बिजली पहुंचाने का काम होगा। ये ज़िले है- कसरगौड़ वायनाड, कन्‍नूर, कोझिकोड, मलप्‍पुरम, इदुक्‍की और पलक्‍कड़।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable sortable&amp;quot; cellspacing=&amp;quot;2&amp;quot; cellpadding=&amp;quot;4&amp;quot; border=&amp;quot;0&amp;quot; width=&amp;quot;40%&amp;quot; align=&amp;quot;right&amp;quot; style=&amp;quot;margin-left:5px&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!   नाम&lt;br /&gt;
!  लम्‍बाई (कि.मी) &lt;br /&gt;
|- bgcolor=#edf3fe&lt;br /&gt;
|एन.एच. 17 – राष्‍ट्रीय राजमार्ग||  420.777 &lt;br /&gt;
|- bgcolor=#edf3fe&lt;br /&gt;
|एन.एच. 47 – वालयार कलिमकविला||  416.800 &lt;br /&gt;
|- bgcolor=#edf3fe&lt;br /&gt;
|एन.एच. 47 A – वैलिंगटन द्वीप से कोच्चि बाईपास||  5.920 &lt;br /&gt;
|- bgcolor=#edf3fe&lt;br /&gt;
|एन.एच. 49 – बोडीमेट्टू मुवात्‍तपुझा कोच्चि||  167.593 &lt;br /&gt;
|- bgcolor=#edf3fe&lt;br /&gt;
|एन.एच. 208 – कोल्‍लम आयनिकवू मुवात्‍तपुझा||  81.280 &lt;br /&gt;
|- bgcolor=#edf3fe&lt;br /&gt;
|एन.एच. 212 – कोझीकोड कल्‍लेगड||  117.600 &lt;br /&gt;
|- bgcolor=#edf3fe&lt;br /&gt;
|एन.एच. 213 – कोझीकोड कलपलक्‍कड||  125.300 &lt;br /&gt;
|- bgcolor=#edf3fe&lt;br /&gt;
|एन.एच. 220 –कोल्‍लम कोट्टयम कुमिनी||  190.300 &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
*केरल राज्‍य की यातायात प्रणाली में 1.61 लाख कि.मी. सडकें, &lt;br /&gt;
*1,148 कि.मी. रेल लाइनें, &lt;br /&gt;
*1,687 कि.मी. जलमार्ग और *18 हवाई अड्डों के 111 स्‍टेचू मील वायुमार्ग हैं।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;केरल में राष्‍ट्रीय राजमार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
*केरल राज्‍य परिवहन परियोजना ने जून 2002 में विश्‍व बैंक की सहायता से 584 कि. मी. लंबी विद्यमान सड़कों को सुधारने तथा चौडा करने, 993 कि. मी. सड़कों की भारी मरम्‍मत करने तथा 150 कि. मी. के निष्‍पादन से संबंधित रखरखाव के लिए कार्यक्रम आरंभ किया है। इसमें 93 किलोमीटर लंबी अंतर्वर्ती जल नहर की योजना भी शामिल है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सड़कें'''- केरल देश का पहला राज्‍य है जहां इसके दूरदराज के गांवों तक शत प्रतिशत सड़कें मौजूद हैं। राज्‍य सड़कों की कुल लंबाई 138196.471 कि.मी. है, जिसमें से 21467.492 कि.मी. लोक निर्माण विभाग के पास, 1523.954 कि.मी. राष्‍ट्रीय राजमार्ग के पास और 95515.888 कि.मी. पंचायत के अधीन है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रेलवे'''- राज्‍य में 1,148 किलोमीटर लंबी रेल लाइनों के अंतर्गत 13 रेलवे मार्ग हैं। बड़ी रेल लाइन 1,053.86 किलोमीटर ओर छोटी लाइन 94;14 किलोमीटर लंबी है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उड्डयन'''- राज्‍य में तीन प्रमुख हवाई अड्डे 'तिरूवनंतपुरम', 'कोच्चि' (नेदुंबसेरी) और 'कोझीकोड' में हैं। उनमें से प्रथम दो अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डे हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Payyambalam-Beach-Kannur.jpg||thumb|250px|left|[[पयमबल्लम बीच कन्नूर|पयमबल्लम बीच]], [[कन्नूर]]]]&lt;br /&gt;
'''बंदरगाह'''- 585 कि. मी; लंबी तटवर्ती पंक्ति में केरल में एक बडा बंदगाह कोच्चि में है और 17 छोटे मध्‍यवर्ती बंदरगाह है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रधानमंत्री ने 16.12.2005 को वल्‍लारपदम अंतर्राष्‍ट्रीय मालवाहक पोत टर्मिनल का शिलान्‍यास किया। इसके पूरा हो जाने पर कोच्चि बंदरगाह हिंद महासागर का एक विशल बंदरगाह बन जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
*केरल में अखिल भारतीय 65.38 प्रतिशत की तुलना में 90.92 प्रतिशत (2001 की जनगणना), की उच्‍च साक्षरता दर  है। केरल में ज़िलों के बीच कोट्टायम ज़िले में 95.90 प्रतिशत की उच्‍चतम साक्षरता दर और पल्‍लकड़ में 84.31 प्रतिशत निम्‍नतम साक्षरता दर है। साक्षरता दरों में क्षेत्रीय और लैंगिक भेदभाव केरल में सबसे कम है।&lt;br /&gt;
*जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, सर्वशिक्षा अभियान के तहत सृजित मूल संरचना और स्‍थानीय सरकारों के योगदान से सुविधाओं के सुधार में योगदान मिला है।&lt;br /&gt;
*केरल में सात विश्‍वविद्यालय और दो मानद विश्‍वविद्यालय हैं। पिछले 5 वर्षों में केरल में तकनीकी शिक्षा संस्‍थानों की संख्‍या में अपार वृद्धि हुई है।&lt;br /&gt;
==प्रारम्भिक शिक्षा==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Peppara-Dam-Thiruvananthapuram.jpg|thumb|250px|पीप्पारा बांध, [[तिरुअनंतपुरम]]&amp;lt;br /&amp;gt;Peppara Dam, Thiruvananthapuram]]&lt;br /&gt;
*केरल में 2005 में कुल 12650 स्‍कूल थे, जिनमें से 6827 लोअर प्राइमरी, 3042 अपर प्राइमरी और 2781 हाईस्‍कूल थे। इसके अलावा 483 सीबीएसई स्‍कूल, 78 आईसीएसई स्‍कूल, 27 केंद्रीय विद्यालय और 13 जवाहर नवोदय विद्यालय थे।&lt;br /&gt;
*केरल में अनुदान प्राप्‍त स्‍कूल प्रणाली भी अभी तक विद्यमान है। कुल 12650 स्‍कूलों में से 7287 सहायता प्राप्‍त निजी स्‍कूल (57.60 प्रतिशत) हैं। कुल 3042 अपर प्राइमरी स्‍कूलों में से 31.36 प्रतिशत सरकारी, 61.47 प्रतिशत सहायता प्राप्‍त निजी स्‍कूल और 7.17 प्रतिशत गैर सहायता प्राप्‍त निजी स्‍कूल हैं। कुल 2781 हाईस्‍कूलों में से 35.78 प्रतिशत सरकारी, 51.17 प्रतिशत सहायता प्राप्‍त निजी तथा 13.05 प्रतिशत गैर सहायता प्राप्‍त निजी स्‍कूल हैं।&lt;br /&gt;
*स्‍वतंत्रता प्राप्ति से अब तक की सर्वाधिक महत्‍वाकांक्षी शैक्षिक परियोजना सर्व शिक्षा अभियान का उद्देश्‍य 2010 तक 6 से 14 साल तक के आयु-वर्ग के समस्‍त बच्‍चों को उपयोगी और प्रासंगिक मूलभूत शिक्षा प्रदान करना है।&lt;br /&gt;
*2004-05 में सरकारी और सहायता प्राप्‍त दोनों तरह के स्‍कूलों में संरक्षित अध्‍यापकों की संख्‍या 3148 थी। इसमें 524 हाईस्‍कूल अध्‍यापक, 1904 पीडी अध्‍यापक और 720 विशेष अध्‍यापक थे।&lt;br /&gt;
*राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार माध्‍यमिक स्‍तर की शिक्षा को मान्‍यता देने के लिए राज्‍य में उच्‍चतर माध्‍यमिक पाठ्यक्रम शुरू किया गया। प्रथम चरण में, 1990-91 के दौरान 31 सरकारी स्कूलों का दर्जा बढ़ाकर उच्‍चतर माध्‍यमिक स्‍कूल बना दिया गया। 2005-06 के अकादमिक वर्ष से उच्‍चतर माध्‍यमिक स्‍तर पर ग्रेडिंग प्रणाली शुरू कर दी गई है।&lt;br /&gt;
*अधिक कुशल और रोजगारोन्‍मुख जनशक्ति तैयार करके रोजगार के अधिकाधिक अवसर जुटाने के उद्देश्‍य से राज्‍य में व्‍यावसायिक उच्‍चतर माध्‍य‍मिक शिक्षा शुरू की गई। शुरूआत में यह पाठ्यक्रम 1983-84 में 19 सरकारी स्‍कूलों में शुरू किया गया। 2004-05 में स्‍वीकृत छात्र संख्‍या 26874 थी और वास्‍तविक छात्रों की संख्‍या 25382 थी।&lt;br /&gt;
*केरल में राज्‍य के गठन के समय की तुलना में 'उच्‍च शिक्षा प्रणाली' में कॉलेजों और विश्‍वविद्यालयों की संख्‍या के मामले में काफ़ी वृद्धि हुई है। इस प्रणाली में 7 वि‍श्‍वविद्यालय और 2 मानद विद्यालय हैं। केरल के विश्‍वविद्यालय की आमदनी का मुख्‍य स्रोत राज्‍य सरकार से मिलने वाला योजनागत और गैर योजनागत अनुदान हैं। विश्‍वविद्यालय का योजनागत व्‍यय 2003-04 में 11014.6 लाख रूपए था जो 2004-05 में बढ़कर 12858.1 लाख रुपए हो गया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kerala-Food.jpg|thumb|250px|left|केरल का खाना&amp;lt;br /&amp;gt;Kerala Food]] &lt;br /&gt;
==स्‍वास्‍थ्‍य==&lt;br /&gt;
*केरल ने जन्‍मदर, मृत्‍युदर, शिशु मृत्‍यु दर, प्रसूति मृत्‍यु, जन्‍म पर औसत आयु तथा टीकाकरण के क्षेत्र में बहुत ही अच्‍छा स्‍वास्‍थ्‍य स्‍तर प्राप्‍त कर लिया है। केरल में प्रति हज़ार जनसंख्‍या पर जन्‍म दर 16.90, मृत्‍यु दर 6.40, शिशु मृत्‍यु दर 10, प्रसूति मृत्‍युदर 0.87 थी। यद्यपि केरल ने बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल संकेतक प्राप्‍त कर लिए हैं, फिर भी लोग संक्रामक और गैर संक्रामक दोनों तरह की बीमारियों से अस्‍वस्‍थ होते जा रहे हैं।&lt;br /&gt;
*केरल की स्‍वास्‍थ प्रणाली में एलोपैथी, आयुर्वेद और होम्‍योपैथी शामिल हैं। इन तीनों प्रणालियों के सरकारी क्षेत्र में 2696 संस्‍थान हैं और 48834 बिस्‍तर हैं। केरल के टीकाकरण का सार्वजनिक स्‍तर प्राप्‍त कर लिया है। 2004-05 में बीसीजी की कवरेज 104.3 प्रतिशत थी। एकत्रित आंकडों के अनुसार कैंसर का इलाज कराने वाले ज्‍यादा लोग 55 से 64 वर्ष के आयु वर्ग के थे।&lt;br /&gt;
==पेय जलापूर्ति==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kannur-Fort-Kerala.jpg|thumb|250px|[[कन्नूर क़िला]], केरल &amp;lt;br /&amp;gt;Kannur Fort, Kerala]]&lt;br /&gt;
*केरल में 2004 - 05 तक 82.59 प्रतिशत शहरी तथा 62.24 प्रतिशत ग्रामीण लोगों को नलों का पानी उपलब्‍ध करा दिया गया। कुल मिलाकर 67.52 प्रतिशत लोगों को पानी उपलब्‍ध कराया गया। जबकि 2003 - 04 में यह 65.2 प्रतिशत के लिए था। 2003-04 में ग्रामीण और शहरी लोगों को जलापूर्ति क्रमश: 60 और 80 प्रतिशत थी। 2004 - 05 में 7.43 लाख अतिरिक्‍त लोगों को संरक्षित जल उपलब्‍ध कराया गया। इसमें से 66887 (9 प्रतिशत) अनुसूचित जाति के और 8175 (1 प्रतिशत) अनुसूचित जनजाति के थे।&lt;br /&gt;
*केरल जल आपूर्ति प्राधिकरण की 1 अप्रैल 2005 तक 1895 जल आपूर्ति योजनाएं कार्यरत थीं। इनमें 65 शहरी योजनाएं, 952 ग्रामीण बहु पंचायत योजनाएं और 878 ग्रामीण एकल पंचायत योजनाएं थीं। 2004-05 में 40 योजनाएं शुरू की गईं जिनमें 6 शहरी और 34 ग्रामीण थीं। केरल सरकार ने बाहरी सहायता से 2 जलापूर्ति योजनाएं शुरू की हैं, वे हैं-&lt;br /&gt;
#जेबीआईसी से सहायता प्राप्‍त केरल जल आपूर्ति परियोजना, और&lt;br /&gt;
#विश्‍व बैंक से सहायता प्राप्‍त केरल ग्रामीण जलापूर्ति और सफाई योजना (जलनिधि)&lt;br /&gt;
==ग़रीबी उन्‍मूलन==&lt;br /&gt;
ग़रीबी दूर करने के लिए ग़रीबी उन्‍मूलन कार्यक्रम बनाया गया है। केरल स्‍थानीय प्रशासन और राज्‍य ग़रीबी उन्‍मूलन मिशन द्वारा लागू 'कुटुंबश्री' में भाग लेकर महत्‍वूपर्ण काम कर रहा है। एनएसएसओ के 55 वें चरण (1999 - 2000) के अनुसार केरल में 9.35 प्रतिशत ग़रीबी ग्रामीण इलाकों में और 20.27 प्रतिशत ग़रीबी शहरी इलाकों में है। 1999 - 2000 के आंकड़े दर्शाते हैं कि केरल में 12.72 प्रतिशत ग़रीबी थी, जब कि पूरे देश में 26.36 प्रतिशत। 'कुटुंबश्री' प्रणाली ग़रीबी दूर करने और इसके लिए उठाए गए क़दमों की निगरानी करता है। इसी कार्यक्रम के विस्‍तार के रूप में आश्रय नामक कार्यक्रम केरल के एक तिहाई भाग में लागू किया गया है जो अत्‍यंत ग़रीब लोगों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है।&lt;br /&gt;
==त्‍योहार==&lt;br /&gt;
केरल में अनेक रंगारंग त्‍योहार मनाए जाते हैं। इनमें से अधिकतर त्‍योहार धार्मिक हैं जो हिंदू [[पुराण|पुराणों]] से प्रेरित हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Onam.jpg|thumb|250px|left|[[ओणम]]&amp;lt;br /&amp;gt;Onam]]&lt;br /&gt;
*[[ओणम]] केरल का विशिष्‍ट त्‍योहार है, जो फ़सल कटाई के मौसम में मनाया जाता है। यह त्‍योहार खगोलशास्‍त्रीय नववर्ष के अवसर पर आयोजित किया जाता है। &lt;br /&gt;
*केरल में नवरात्रि पर्व सरस्‍वती पूजा के रूप में मनाया जाता है। &lt;br /&gt;
*[[शिवरात्रि|महाशिवरात्रि]] का त्‍योहार [[पेरियार नदी]] के तट पर भव्‍य तरीके से मनाया जाता है और इसकी तुलना [[कुम्भ मेला]] से की जाती है। &lt;br /&gt;
*सबरीमाला के अय्यप्‍पा मंदिर में इसी दौरान मकरविलक्‍कु भी आयोजित होता है। 41 दिन के इस उत्‍सव में देश-विदेश के लाखों लोग सम्मिलित होते हैं। वलमकली या नौका दौड़ केरल का अपने ढंग का अनोखा आयोजन है। पुन्‍नमदा झील में आयोजित होने वाली नेहरू ट्रॉफी नौका दौड़ को छोड़कर शेष सभी नौका दौड़ उत्‍सवों का कोई न कोई धार्मिक महत्‍व है। *त्रिचूर के बडक्‍कुमनाथ मंदिर में हर वर्ष अप्रैल में [[पूरम]] त्‍योहार मनाया जाता है, जिसमें सजे-धजे हाथियों की भव्‍य शोभायात्रा निकलती है और आतिशबाजी का प्रदर्शन किया जाता हैं। &lt;br /&gt;
*क्रिसमस और ईस्‍टर ईसाइयों का सबसे बड़ा त्‍योहार हैं। पुम्‍बा नदी के तट पर हर वर्ष मरामोन सम्‍मेलन होता है, जहां एशिया में ईसाइयों का सबसे बड़ा जमावड़ा लगता है। &lt;br /&gt;
*मुसलमान मिलादे शरीफ, रमज़ान रोज़े, बकरीद और ईद-उल-फितर का त्‍योहार मनाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kathakali-Dance.jpg|thumb|250px|[[कथकली नृत्य]], केरल&amp;lt;br /&amp;gt;Kathakali Dance, Kerala]] &lt;br /&gt;
*पर्यटन गतिविधियों के लिए केरल में स्‍थायी और सफल वृद्धि के लिए अपेक्षित वातावरण पहले से विद्यमान है। पर्यटन क्षेत्र  के लिए महत्‍वपूर्ण तत्‍व है - प्राकृतिक सौंदर्य, सामान्‍य जलवायु, स्‍वच्‍छ पर्यावरण, मैत्री भाव वाले शांतिप्रिय लोग हैं जो सांस्‍कृतिक विविधता के प्रति बेहद सहिष्‍णु हैं और अनूठे पर्यावरण को निर्मित करने की क्षमता रखते हैं। केरल देश में सर्वप्रिय पर्यटन स्‍थल के रूप में उभरा है। समुद्र तट, गर्म मौसम, समुद्री झीलें, पर्वतीय स्‍थल, जल प्रपात, वन्‍य जीवन, आयुर्वेद, वर्ष भर त्‍योहार तथा विविध पेड़ पौधे केरल को पर्यटकों के लिए एक अनूठा गंतव्‍य स्‍थल बनाते हैं।&lt;br /&gt;
*पर्यटन विभाग, केरल पर्यटन विकास निगम, ज़िला पर्यटन संवर्द्धन परिषद, बेकल पर्यटन विकास निगम, स्‍थानीय प्रशासनों तथा निजी क्षेत्र की पर्यटन में महत्‍वपूर्ण भूमिका है। वर्तमान में जो मुख्‍य क्षेत्र विकास के लिए देखे जा रहे है: वे हैं ग्रामीण पर्यटन, माइस पर्यटन (एम.आई.सी.ई - मीटिंग, इंसेंटिव, कन्‍वेंशस तथा इवेंट्स/एक्‍सीबीशन ट्रेड शोज़) यानी - बैठक, प्रोत्‍साहन, सम्‍मेलन और प्रदर्शनियां/व्‍यापार प्रदर्शनियां, सांस्‍कृतिक पर्यटन, विरासत पर्यटन, पर्यावरण पर्यटन तथा चिकित्‍सा पर्यटन।&lt;br /&gt;
*थेणमाला पर्यटन सुविधा केन्‍द्र के साथ पर्यटन परियोजना है, जिसमें शॉप कोर्ट गार्डन, प्‍लाजा, पिकनिक क्षेत्र, चट्टान पर चढाई, नदी पार का मुक्‍त प्रेक्षागृह, रेस्‍तरां, झूलते पुल, कमल के तालाब, संगीतमय नृत्‍य, फव्‍वारे, शिल्‍पमूर्ति वाले बाग, हिरण पुनर्वास केंद्र, नौकायन, बैटरी चालित वाहन आदि हैं। वन विभाग के समन्‍वय से पकरूवी में ढांचागत सुविधाएं उपलब्‍ध कराई जा रही हैं। वर्ष 2004-05 में, 104622 पर्यटक थेणमाला पर्यावरण (इको) पर्यटन स्‍थल देखने गए और 3563820 लाख रुपए की राजस्‍व प्राप्ति हुई।&lt;br /&gt;
*राज्‍य में 2004 में विदेशी पर्यटकों से विदेशी मुद्रा में 1266.77 करोड़ रुपए की आय हुई और घरेलू पर्यटकों से 3881.92 करोड़ रुपए की आय हुई। पर्यटन से प्रत्‍यक्ष और परोक्ष रूप से कुल आय लगभग 6829 करोड़ रुपए हुई। पर्यटन में 8 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है और प्रतिवर्ष 500 करोड़ रुपए का निवेश किया जाता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kovalam.jpg|thumb|250px|left|[[कोवलम तट तिरुअनंतपुरम|कोवलम]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kovalam]]&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;कोवलम&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल है। कोवलम में तीन अ‌र्द्धचंद्राकार समुद्र तट हैं। इन तीनों समुद्र तटों में से सर्वाधिक प्रसिद्ध किनारा 'लाइटहाउस' है। इस समुद्री तट पर पहुंचना भी सरल है। यह केरल की राजधानी [[तिरुवनंतपुरम]] से सोलह किलोमीटर की दूरी पर है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;वारकला&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
यहाँ का शांत समुद्री तट , रेत का विस्तार, स्वच्छ झरनों तथा चट्टानी पहाडि़याँ हैं। श्री जनार्दन स्वामी मंदिर और नेचर केयर सेंटर भी आकर्षण का केंद्र है। यह तिरुवनंतपुरम से 40 कि.मी. की दूरी पर है और तिरुवनंतपुरम से यहाँ के लिए नियमित बस सेवा हैं। यहाँ के लिए रेल सुविधा भी उपलब्ध है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;कप्पड़&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
इसी स्थान पर 1498 ई. में [[वास्को द गामा]] आया था। ऐतिहासिक दंत कथाएं और रीति-रिवाज से भरा है यह स्थान। कप्पड़ में आयुर्वेदिक स्वास्थ्य केंद्र सुविधाओं की भी प्रसिद्धी है। कप्पड़  [[कोझीकोड]] से 14 कि.मी. की दूरी है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;बेकल&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
केरल का एक अन्य समुद्री तट है, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है, जहां बेकल का क़िला लंबे सुंदर नारियल के पेड़ों से घिरे दो द्वीपों के बीच में है। केरल में यह सबसे बड़ा व संरक्षित क़िला है। यह क़िला विभिन्न ताकतों जैसे [[विजयनगर साम्राज्य]], [[टीपू सुल्तान]] तथा अंग्रेज़ी हुकूमत की कहानी कहता है। यह कोझीकोड से 160 किलोमीटर दूर है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पर्वतीय स्थल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vellayani-Lake-Thiruvananthapuram.jpg|thumb|250px|वेललाइनी झील, [[तिरुअनंतपुरम]]&amp;lt;br /&amp;gt;Vellayani Lake, Thiruvananthapuram]]&lt;br /&gt;
अपने समुद्री तटों के अतिरिक्त केरल पर्वतीय पर्यटक स्थलों के लिए भी जाना जाता है। इन पर्वतीय स्थलों का अधिकांश आकर्षण पूर्वी घाटों के ऊपरी क्षेत्रों में बसा हुआ है। 1520 मीटर औसत ऊंचाई वाले इन घाटों में उष्ण कटिबंधीय वन, वनस्पति तथा जीव-जंतुओं से युक्त हैं। चाय, कॉफी, रबर तथा खुशबूदार इलायची के बागान हैं।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;मुन्नार&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{main|मुन्नार}} &lt;br /&gt;
केरल का मुख्य पर्वतीय स्थल मुन्नार है। समुद्री तल से लगभग 1600 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। दक्षिण भारत का यह स्थान अंग्रेज़ी सरकार का ग्रीष्मकालीन आवास होता था। चाय बागान, दर्शनीय शहर, घुमावदार रास्ते तथा आवास-गृह से यह लोकप्रिय पर्वतीय स्थल है। वनों की वनस्पति तथा हरे घास के मैदानों में यहाँ 'नीलकुरंजी' नामक फूल पाया जाता है। यह फूल बारह वर्षों में केवल एक बार पूरी पहाड़ी को नीला कर देता है। मुन्नार में दक्षिणी भारत की सबसे ऊंची चोटी अनाइमुड़ी भी है जिसकी ऊंचाई लगभग 2695 मीटर है। ट्रेकिंग के रास्ते में 'इराविकुलम नेशनल पार्क' है। यह अभयारण्य नीलगिरी की जाति को बचाने के लिए स्थापित किया गया था। मुन्नार का अन्य आकर्षण 'मेडूपट्टी' बांध है। विशाल पानी का भंडार चारों तरफ की ख़ूबसूरत पहाडि़यों से घिरा हुआ है। यहाँ  नौका विहार और स्पीड मोटर बोट की सुविधा है। मुन्नार [[कोच्चि]] से लगभग 130 कि.मी. की दूरी पर है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;पीरमेड&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
केरल का यह सुंदर पर्वतीय स्थल समुद्री तल से 915 मीटर की ऊंचाई पर है। पेरियार वन्यप्राणी उद्यान के रास्ते में पड़ता है। किसी समय में ट्रावनकोर के महाराजाओं का ग्रीष्मकालीन आवास गृह हुआ करता था। सड़क किनारे यहाँ चाय, कॉफी, इलायची, रबर व यूक्लिप्टस के बागान और साथ में प्राकृतिक घास के मैदान व घने जंगल मिलते हैं। यह स्थान कोट्टयम से 75 कि.मी. दूर है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;विथीरी&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह पर्वतीय स्थल केरल के उत्तर-पूर्वी भाग में समुद्र तल से 1300 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। विथीरी कॉफी, चाय, इलायची, काली मिर्च व रबर के लिए प्रसिद्ध है। कोहरे से ढकी पहाडि़यां तथा विस्मयकारी दृश्य पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कोझीकोड से 100 कि.मी. दूर है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Coconut-1.jpg|thumb|left|250px|नारियल से भरा ट्रक]]&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;पोनमुडी&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
समुद्र स्तर से 915 मीटर ऊंचाई पर स्थित पोनमुडी एक संकीर्ण, घुमावदार रास्तों वाला पर्वतीय स्थल है। सुंदर पहाड़ी फूलों, विलक्षण तितलियों, छोटी-छोटी नदियों तथा झरनों के लिए प्रसिद्ध यह स्थान ट्रेकिंग के लिए भी प्रसिद्ध है। यह स्थल तिरुवनंतपुरम से 61 कि.मी. की दूरी पर है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;पेरियार&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह वन्यप्राणी उद्यान भारत के बड़े वन्य प्राणी उद्यानों में से एक है। पेरियार वन्यप्राणी उद्यान बाघ संरक्षण के लिए है। 777 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अभयारण्य की सुंदरता यहाँ के घने जंगल और 20 वर्ग किलोमीटर में फैली झील है। नौका विहार द्वारा इस वन्यप्राणी उद्यान को देख सकते हैं। हाथियों के झुंड यहाँ का आकर्षण हैं जो झील के पानी में उतर आते हैं। बाघ, सांभर, जंगली भैंसा, धब्बेदार हिरन, चीता, मालाबार गिलहरियां तथा धारीदार गर्दन वाला नेवला आदि भी यहाँ दिख्तें हैं। एक महत्त्वपूर्ण मसाला व्यापार केंद्र, कुमली भी पास में है। यह स्थान कोच्चि से 190 किलोमीटर की दूरी पर है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;जलक्रीड़ा कोलाम&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
मालाबार तट का प्राचीनतम बंदरगाह कोलाम कभी अंतर्राष्ट्रीय मसाला व्यापार केंद्र था। तिरुअनंतपुरम के उत्तर में इस ऐतिहासिक शहर का 30 प्रतिशत हिस्सा अस्थमुडी झील से घिरा है। कोलाम तथा अलाप्पुजा के बीच यह 8 घंटे का सफर सबसे लंबा तथा केरल के जलप्रपातों का मोहक अनुभव है। कोलाम तिरुअनंतपुरम से लगभग 72 किलोमीटर दूर है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;अलाप्पुजा&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kerala-Houseboat.jpg|thumb|250px|हाउसबोट, केरल&amp;lt;br /&amp;gt;Houseboat, Kerala]]&lt;br /&gt;
नौका दौड़, हाउसबोट, समुद्री किनारों, समुद्री उत्पाद तथा जूट उद्योगों के लिए प्रसिद्ध अलाप्पुजा को 'पूरब का वेनिस' भी कहा जाता है। केरल में कट्टानड़ ही शायद विश्व का ऐसा स्थान है जहां समुद्र तल से नीचे खेती की जाती है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;कुमाराकम&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
कोट्टयम से 12 किलोमीटर दूर यह तंबानड़ स्थल झील के किनारे स्थित है। इसे कट्टानड़ के जलप्रपातों का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। 'कुमाराकम पक्षी उद्यान' विश्व के प्रवासी पक्षियों का मनपसंद बसेरा है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;कोच्चि&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{main|कोच्चि}}&lt;br /&gt;
केरल की व्यावसायिक तथा औद्योगिक राजधानी कोच्चि विश्व के बेहतरीन प्राकृतिक बंदरगाहों में से एक है। इस शहर में राष्ट्रमंडल का प्राचीनतम यहूदी प्रार्थना भवन तथा अनेक प्राचीन चर्च व मंदिर भी हैं। इस यहूदी प्रार्थना भवन के आस-पास जीउ टाऊन है जो मसाला व्यापार तथा कलाकृतियों की दुकानों का केंद्र है। इस सुंदर टापुओं वाले शहर में अरब, चीन, हालैंड, ब्रिटेन तथा पुर्तग़ाल के अनेक समुद्री यात्रियों का प्रभाव देखने को मिलता है। कोच्चि में घूमने का पूरा आनंद साधारण नौकाओं में बैठकर ही लिया जा सकता है। कोच्चि भारत के सभी शहरों से वायु, समुद्र तथा रेलवे लाइनों से पूरी तरह जुड़ा हुआ है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;कायल&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{मुख्य|कायल }}&lt;br /&gt;
कायल केरल के ज़िला तिन्नेवली में ताम्रपर्णी नदी के तट पर स्थित है। कायल जो पाण्ड्य राज्य का मुख्य द्वार था&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;आदिचनल्लूर&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{मुख्य|आदिचनल्लूर }}&lt;br /&gt;
*आदिचनल्लूर केरल के तिन्नेवली ज़िले में स्थित है।&lt;br /&gt;
*आदिचनल्लूर से प्राप्त शव-कलश [[पाषाण काल|महापाषाण]] काल से कुछ पहले का माना जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक3&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery perrow=&amp;quot;3&amp;quot; widths=&amp;quot;200&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Thalasseri-Fort-Kannur.jpg|[[थलस्सरी क़िला कन्नूर|थलस्सरी क़िला]], [[कन्नूर]]&lt;br /&gt;
चित्र:Chandrasekharan-Nair-Football-Stadium.jpg|चंद्रशेखर नैयर फुटबॉल स्टेडियम, [[तिरुअनंतपुरम]]&lt;br /&gt;
चित्र:South-Indian-Saree.jpg|साऊथ सिल्‍क साड़ी &lt;br /&gt;
चित्र:South-Indian-Mundu.jpg|मुंड (धोती)&lt;br /&gt;
चित्र:Legislative-Assembly-Of-Kerala.jpg|केरल की विधान सभा &lt;br /&gt;
चित्र:Kowdiar-Palace-Tiruvananthapuram.jpg|[[विज़िंजम पत्तन]], [[तिरुअनंतपुरम]] &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{केरल के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{केरल के नगर}}&lt;br /&gt;
{{केरल प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}{{राज्य और के. शा. प्र.2}}&lt;br /&gt;
[[Category:केरल]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>पायल</name></author>
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