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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>घण्टा</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Ghanta.jpg|thumb|180px|घण्टा]]&lt;br /&gt;
*घण्टा एक [[घन वाद्य]] है। &lt;br /&gt;
*घण्टा काँसा मिश्रित पीतल अथवा [[लोहा|लौह]] निर्मित प्रचलित है।&lt;br /&gt;
*घण्टे का व्यवहार कई प्रकार से होता है एवं आकृति भी कई प्रकार की है।&lt;br /&gt;
*भारतवर्ष में [[देवता|देव]] [[पूजा]] में जिस घण्टे का व्यवहार होता है, उसके साथ पीतल या काँसा निर्मित एक दण्ड भी रहता है, बायें हाथ में यह दण्ड रखकर घण्टा बजाया जाता है।&lt;br /&gt;
*मंदिरों में जंजीर की सहायता से घण्टा झूलता रहता है।&lt;br /&gt;
*देवदर्शनाकांक्षी व्यक्ति मंदिरों में प्रवेश करते समय यह घण्टा बजाते हैं।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत वाद्य]][[Category:संगीत कोश]][[Category:वादन]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[घण्टा]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/babasteve/ babasteve]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/babasteve/3919260841/ India Temple Bells]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
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|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/64749744@N00 babasteve's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=घण्टा एक [[घन वाद्य]] है। घण्टा काँसा मिश्रित पीतल अथवा लौह निर्मित प्रचलित है। घण्टे का व्यवहार कई प्रकार से होता है एवं आकृति भी कई प्रकार की है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
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|Share Alike=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*घण्टा एक [[घन वाद्य]] है। &lt;br /&gt;
*घण्टा काँसा मिश्रित पीतल अथवा [[लोहा|लौह]] निर्मित प्रचलित है।&lt;br /&gt;
*घण्टे का व्यवहार कई प्रकार से होता है एवं आकृति भी कई प्रकार की है।&lt;br /&gt;
*भारतवर्ष में [[देवता|देव]] [[पूजा]] में जिस घण्टे का व्यवहार होता है, उसके साथ पीतल या काँसा निर्मित एक दण्ड भी रहता है, बायें हाथ में यह दण्ड रखकर घण्टा बजाया जाता है।&lt;br /&gt;
*मंदिरों में जंजीर की सहायता से घण्टा झूलता रहता है।&lt;br /&gt;
*देवदर्शनाकांक्षी व्यक्ति मंदिरों में प्रवेश करते समय यह घण्टा बजाते हैं।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत वाद्य]][[Category:संगीत कोश]][[Category:वादन]]&lt;br /&gt;
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		<title>राष्ट्रपति</title>
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		<updated>2011-05-25T12:51:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Dr.Rajendra-Prasad.jpg|thumb|[[भारत]] के प्रथम राष्ट्रपति [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद]]]]&lt;br /&gt;
भारतीय संविधान पर ब्रिटेन के संविधान का व्यापक [[प्रभाव]] है। [[ब्रिटेन]] के संविधान का अनुकरण करते हुए [[भारत]] में संविधान द्वारा संसदीय शासन की स्थापना की गयी है। जिस तरह ब्रिटेन में शासन की प्रमुख वहाँ की साम्राज्ञी होती है, उसी प्रकार से भारत में राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति होता है। ब्रिटेन की साम्राज्ञी की तरह भारत का राष्ट्रपति राज्य का औपचारिक प्रमुख होता है और संघ की वास्तविक शक्ति संघ मन्त्रिमण्डल में निहित होती है। इन दोनों देशों के प्रमुखों में मूलभूत अन्तर यह है कि ब्रिटेन की साम्राज्ञी का पद वंशानुगत होता है, जबकि भारत का राष्ट्रपति एक निर्वाचित मण्डल द्वारा निर्वाचित किया जाता है। इसी अन्तर के कारण भारत को प्रजातांत्रिक गणतन्त्र कहा जाता है। भारत में राष्ट्रपति का पद संविधान के अनुच्छेद 52 द्वारा उपबंधित है।&lt;br /&gt;
==भारत के राष्ट्रपति==&lt;br /&gt;
{{Main|भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] के राष्ट्रपति राष्ट्रप्रमुख और भारत के प्रथम नागरिक हैं, साथ ही भारतीय सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख सेनापति भी हैं। राष्ट्रपति के पास पर्याप्त शक्ति होती है पर कुछ अपवादों के अलावा राष्ट्रपति के पद में निहित अधिकांश अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद के द्वारा उपयोग किए जाते हैं। भारत के राष्ट्रपति [[नई दिल्ली]] स्थित [[राष्ट्रपति भवन]] में रहते हैं, जिसे रायसीना हिल के नाम से भी जाना जाता है। राष्ट्रपति अधिकतम दो कार्यकाल तक हीं पद पर रह सकते हैं। अब तक केवल पहले राष्ट्रपति [[डा. राजेंद्र प्रसाद]] ने हीं इस पद पर दो कार्यकाल पूरा कियें है। महामहिम [[प्रतिभा पाटिल]] भारत की 12वीं तथा इस पद को सुशोभित करने वाली पहली महिला राष्ट्रपति हैं। उन्होंने [[25 जुलाई]], [[2007]] को पद व गोपनीयता की शपथ ली थी।&lt;br /&gt;
==पद की योग्यता==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति होने के योग्य तब होगा, जब वह–&lt;br /&gt;
#भारत का नागरिक हो।&lt;br /&gt;
#पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।&lt;br /&gt;
#लोक सभा का सदस्य निर्वाचित किये जाने के योग्य हो, तथा&lt;br /&gt;
#भारत सरकार के या किसी राज्य सरकार के अधीन अथवा इन दोनों सरकारों में से किसी के नियन्त्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन लाभ का पद न धारण करता हो। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति या [[उपराष्ट्रपति]] के पद पर या संघ अथवा किसी राज्य के मंत्रिपरिषद का सदस्य हो, तो यह नहीं माना जाएगा कि वह लाभ के पद पर है। &lt;br /&gt;
==निर्वाचन==&lt;br /&gt;
{{seealso|उपराष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति का चुनाव 'अप्रत्यक्ष निर्वाचन' के द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति पद के निर्वाचन में अभ्यर्थी होने के लिए आवश्यक है कि कोई व्यक्ति निर्वाचन के लिए अपना नामांकन करते समय 15,000 रुपये की धरोहर (ज़मानत धनराशि) निर्वाचन अधिकारी के समक्ष जमा करे और उसके नामांकन पत्र का प्रस्ताव कम से कम 50 मतदाताओं के द्वारा किया जाना चाहिए तथा कम से कम 50 मतदाताओं द्वारा उसके नामांकन पत्र का समर्थन भी किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निर्वाचक मण्डल==&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे निर्वाचक मण्डल के द्वारा किया जाएगा, जिसमें [[संसद]] (लोकसभा तथा राज्यसभा) तथा राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होंगे। राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में संसद के मनोनीत सदस्य, राज्य विधान सभाओं के मनोनीत सदस्य तथा राज्य विधान परिषदों के सदस्य (निर्वाचित एवं मनोनीत दोनों) शामिल नहीं किये जाते। संघ राज्य क्षेत्रों की विधानसभाओं के सदस्यों को भी 70वें संविधान संशोधन के पूर्व राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में शामिल नहीं किया जाता था। लेकिन 70वें संविधान संशोधन द्वारा यह व्यवस्था कर दी गयी है कि दो संघ राज्य क्षेत्रों, यथा [[पाण्डिचेरी]] तथा [[राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली|राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली]] की विधानसभाओं के सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में शामिल किये जायेंगे। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि केवल इन दोनों संघ राज्य क्षेत्रों में ही विधानसभा का गठन हुआ है।&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति के चुनाव पर प्रभाव==&lt;br /&gt;
संविधान सभा में राष्ट्रपति के निर्वाचन प्रक्रिया पर विचार करते समय यह ध्यान नहीं दिया गया था कि निर्वाचक मण्डल में से कोई स्थान रिक्त हो तो राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होगा? [[1957]] में जब राष्ट्रपति का चुनाव किया गया तो निर्वाचक मण्डल में कुछ स्थान ख़ाली थे। इसलिए राष्ट्रपति के चुनाव को इस आधार पर चुनौती दी गई की निर्वाचक मण्डल में स्थान रिक्त होने के कारण राष्ट्रपति का चुनाव अवैध है। बाद में [[1961]] में ग्याहरवाँ संविधान संशोधन के तहत यह व्यवस्था की गयी कि निर्वाचक मण्डल में स्थान रिक्त होते हुए भी राष्ट्रपति का चुनाव कैसे कराया जा सकता है।&lt;br /&gt;
==निर्वाचन की पद्धति==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति के निर्वाचन पद्धति के सम्बन्ध में संविधान के अनुच्छेद 55 में प्रावधान किया गया है, जिसके अनुसार राष्ट्रपति के निर्वाचन में दो सिद्धान्तों को अपनाया जाता है–&lt;br /&gt;
====समरूपता तथा समतुल्यता====&lt;br /&gt;
इस सिद्धान्त, जो अनुच्छेद 55 के खण्ड (1) तथा (2) वर्णित हैं, के अनुसार राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापमान में एकरूपता तथा सभी राज्यों और संघ के प्रतिनिधित्व में समतुल्यता होगी। इस सिद्धान्त का तात्पर्य यह है कि सभी राज्यों की विधानसभाओं का प्रतिनिधित्व का मान निकालने के लिए एक ही प्रक्रिया अपनायी जाएगी तथा सभी राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्य का योग संसद के सभी सदस्य के मत मूल्य के योग के समतुल्य अर्थात् समान होगा। राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मतमूल्य तथा संसद के सदस्यों के मतमूल्य को निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनायी जाएगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''विधानसभा के सदस्य के मत मूल्य का निर्धारण'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक राज्य की विधानसभा के सदस्य के मतों की संख्या निकालने के लिए उस राज्य की कुल जनसंख्या (जो पिछली जनगणना के अनुसार निर्धारित है) को राज्य विधानसभा की कुल निर्वाचित सदस्य संख्या से विभाजित करके भागफल को 1000 से विभाजित किया जाता है। इस प्रकार भजनफल को एक सदस्य का मत मूल्य मान लेते हैं। यदि उक्त विभाजन के परिणामस्वरूप शेष संख्या 500 से अधिक आये, तो प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या में एक और जोड़ दिया जाता है। राज्य विधान सभा के सदस्यों का मूल्य निम्न प्रकार निकाला जाता है–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्य की विधानसभा के एक सदस्य का मत मूल्य = राज्य की कुल जनसंख्या / राज्य विधानसभा के निर्वाचित X 1 / 1000 सदस्यों की कुल संख्या&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''संसद सदस्य के मत मूल्य का निर्धारण'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसद सदस्य का मत मूल्य निर्धारित करने के लिए राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्यों को जोड़कर संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के योग का भाग दिया जाता है। संसद सदस्य का मत मूल्य निम्न प्रकार निकाला जाता है–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसद सदस्य का मत मूल्य = कुल राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मत मूल्यों का योग / संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों का योग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार राष्ट्रपति के चुनाव में यह ध्यान रखा जाता है कि सभी राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मतों के मूल्य का योग संसद के निर्वाचित सदस्यों के मतों के मूल्य का योग बराबर रहे और सभी राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मत मूल्य का निर्धारण करने के लिए एक समान प्रक्रिया अपनायी जाए। इसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त भी कहते हैं।&lt;br /&gt;
====एकल संक्रमणीय सिद्धान्त====&lt;br /&gt;
इस सिद्धान्त का तात्पर्य है कि यदि निर्वाचन में एक से अधिक उम्मीदवार हों, तो मतदाताओं द्वारा मतदान वरीयता क्रम से दिया जाए। इसका आशय यह है कि मतदाता मतदान पत्र में उम्मीदवारों के नाम या चुनाव चिह्न के समक्ष अपना वरीयता क्रम लिखेगा। &lt;br /&gt;
==मतगणना==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति के चुनाव के बाद उसी व्यक्ति को निर्वाचित घोषित किया जाता है, जो डाले गये कुल वैध मतों में से आधे से अधिक मत प्राप्त करे। जब राष्ट्रपति के निर्वाचन के बाद मतों की गणना प्रारम्भ होती है, तो सर्वप्रथम अवैध मतपत्रों को निरस्त करके शेष वैध मत पत्रों का मत मूल्य निकाला जाता है और निकाले गए मत मूल्य में 2 का भाग देकर भागफल में एक जोड़कर निर्वाचित घोषित किये जाने वाले उम्मीदवार का कोटा निकाला जाता है। यदि मतगणना के प्रथम दौर में किसी उम्मीदवार को नियत किये गये कोटा के बराबर मत मूल्य प्राप्त हो जाता है, तो उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। यदि किसी उम्मीदवार को नियम कोटा के बराबर मत मूल्य नहीं प्राप्त होता है, तो मतगणना का दूसरा दौर प्रारम्भ होता है। दूसरे दौर के मतगणना में जिस उम्मीदवार को प्रथम वरीयता का सबसे कम मत मिला होता है, उसको गणना से बाहर करके उसके द्वितीय वरीयता के मत मूल्य को अन्य उम्मीदवारों को स्थानान्तरित कर दिया जाता है। यदि द्वितीय दौर की गणना में भी किसी उम्मीदवार को नियत किये गये कोटा के बराबर मत मूल्य नहीं प्राप्त होता है, तो तीसरे दौर की गणना होती है। तीसरे दौर की गणना में उस उम्मीदवार को गणना से बाहर कर दिया जाता है, जो कि दूसरे दौर की गणना में सबसे कम मूल्य पाता है और इस उम्मीदवार के तृतीय वरीयता मत मूल्य को शेष उम्मीदवारों के पक्ष में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया तब तक अपनायी जाती है, जब तक कि किसी उम्मीदवार को नियत किये गये कोटा के मत मूल्य के बराबर मत मूल्य प्राप्त नहीं हो जाता है।&lt;br /&gt;
==भारत में राष्ट्रपति का चुनाव==&lt;br /&gt;
[[चित्र:President-Selection.jpg|thumb|भारत में राष्ट्रपति चुनाव का तरीक़ा]]&lt;br /&gt;
भारत में अब तक 12 व्यक्ति राष्ट्रपति का पद ग्रहण कर चुके हैं, जिनमें से प्रथम राष्ट्रपति [[डॉ. राजेंद्र प्रसाद]] ने 2 बार इस पद को सुशोभित किया है। राष्ट्रपति की पदावधि 5 वर्ष की होती है। लेकिन राजेन्द्र प्रसाद 10 वर्ष से अधिक की अवधि तक राष्ट्रपति का पद धारण किये था। इसका कारण यह था कि [[1952]] में राष्ट्रपति के प्रथम चुनाव के पूर्व ही [[24 जनवरी]], [[1950]] को संविधान सभा के द्वारा राष्ट्रपति के रूप में डॉ. राजेंद्र प्रसाद का चुनाव कर लिया गया था। संविधान के प्रवर्तन की तिथि अर्थात् [[26 जनवरी]], 1950 से लेकर [[12 मई]], 1952 तक राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति के पद पर रहे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में अब तक 13 बार राष्ट्रपति के चुनाव हुए हैं, जिनमें से एक बार, अर्थात् [[1977]] में, श्री नीलम संजीव रेड्डी निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गये थे। शेष 12 बार राष्ट्रपति पद के चुनाव में एक से अधिक उम्मीदवार थे। अब तक केवल डॉ. राजेंद्र प्रसाद, [[फ़ख़रुद्दीन अली अहमद]], [[नीलम संजीव रेड्डी]] तथा [[ज्ञानी ज़ैल सिंह]] को छोड़कर अन्य सभी राष्ट्रपति पूर्व में उपराष्ट्रपति के पद को सुशोभित कर चुके थे। [[डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन|डॉ. एस. राधाकृष्णन]] लगातार दो बार उपराष्ट्रपति तथा एक बार राष्ट्रपति के पद पर आसीन हुए। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में [[वी.वी. गिरी]] ऐसे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे, जिन्होंने कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत होते हुए भी उसके उम्मीदवार को पराजित किया था। अब तक नीलम संजीव रेड्डी एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति हुए हैं, जो एक बार चुनाव में पराजित हुए तथा बाद में निर्विरोध निर्वाचित हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[19 जुलाई]], [[2007]] को सम्पन्न 13वें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए निर्वाचक मण्डल में 4,896 सदस्य थे, जिसमें 776 सांसद और 4,120 विधायक शामिल हैं। इन सबका कुल मत मूल्य 10,98,882 था। वर्तमान में प्रत्येक सांसद का मत मूल्य 708 है। सांसदों का कुल मत मूल्य 5,49,408 और विधायकों का कुल मत मूल्य 5,49,474 है। राज्यों में [[उत्तर प्रदेश]] विधानसभा का मत मूल्य सर्वाधिक 83,824 है। इसके बाद क्रमश: [[महाराष्ट्र]] विधानसभा का मत मूल्य 50,400, [[पश्चिम बंगाल]] का 44,394, [[आंध्र प्रदेश]] का 43,512 और [[बिहार]] विधानसभा का मत मूल्य 42,039 है। [[सिक्किम]] विधानसभा का मत मूल्य सबसे कम 224 है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मतदान स्थल==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति के चुनाव में राज्य विधान सभाओं के सदस्य अपने-अपने राज्यों की राजधानियों में मतदान करते हैं और संसद सदस्य [[दिल्ली]] में या अपने राज्य की राजधानी में मतदान कर सकते हैं। यदि कोई संसद सदस्य अपने राज्य की राजधानी में मतदान करना चाहता है तो उसे इसकी सूचना 10 दिन पूर्व ही चुनाव आयोग का देनी चाहिए।&lt;br /&gt;
==चुनाव का समय ==&lt;br /&gt;
संविधान के अनुच्छेद 62 में केवल यह अपेक्षा की गई है कि राष्ट्रपति का चुनाव निर्धारित समय के अन्दर सम्पन्न करा लिया जाना चाहिए। निर्वाचन की प्रक्रिया को पाँच वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने के बाद स्थगित नहीं रखा जा सकता है। राष्ट्रपति का चुनाव कब कराया जाएगा, इसके सम्बन्ध में संविधान में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। संविधान में अनुच्छेद 71 (3) में केवल यह प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बन्धित या संसक्त किसी विषय का विनियमन संसद विधि द्वारा कर सकेगी। इस शक्ति का प्रयोग करके संसद ने राष्ट्रपतीय तथा उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन अधिनियम, 1952 पारित करके यह प्रावधान किया है कि राष्ट्रपति का चुनाव निवर्तमान राष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति के पूर्व ही कराया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''किसी राज्य की विधानसभा भंग होने की स्थिति में राष्ट्रपति चुनाव '''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी राज्य की विधानसभा भंग होने की स्थिति में भी राष्ट्रपति का चुनाव सम्पन्न होता है। इस सन्दर्भ में 11वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1961 में यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रपति के चुनाव को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि निर्वाचक मण्डल में कोई स्थान रिक्त था। सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह निर्णय दिया है कि बिना किसी विधानसभा के ही राष्ट्रपति का चुनाव कराया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''राष्ट्रपति चुनाव में एक विधायक के मत का मूल्य'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक विधायक के मत के मूल्य का फार्मूला = राज्य की कुल जनसंख्या / राज्य विधानसभा के निर्वाचित विधायकों की संख्या X 1000&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! राज्य&lt;br /&gt;
! सीटों की संख्या&amp;lt;ref&amp;gt;विधानसभा&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
! जनसंख्या (1971)&lt;br /&gt;
! मत का मूल्य&amp;lt;ref&amp;gt;एक विधायक&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
! मतों का मूल्य&amp;lt;ref&amp;gt;राज्य के कुल निर्वाचित विधायक&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[आन्ध्र प्रदेश]]&lt;br /&gt;
| 294&lt;br /&gt;
| 43,502,708&lt;br /&gt;
| 148&lt;br /&gt;
| 148 x 294 = 43,512&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[अरुणाचल प्रदेश]]&lt;br /&gt;
| 60&lt;br /&gt;
| 467,511&lt;br /&gt;
| 08&lt;br /&gt;
| 08 x 60 = 480&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[असम]]&lt;br /&gt;
| 126 &lt;br /&gt;
| 14,625,152&lt;br /&gt;
| 116&lt;br /&gt;
| 116 x 126 = 14,616&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बिहार]]&lt;br /&gt;
| 243&lt;br /&gt;
| 42,126,239&lt;br /&gt;
| 173&lt;br /&gt;
| 173 x 243 = 42,039&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[छत्तीसगढ़]]&lt;br /&gt;
| 90&lt;br /&gt;
| 11,637,497&lt;br /&gt;
| 129&lt;br /&gt;
| 129 x 90 = 11,610&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[गोवा]]&lt;br /&gt;
| 40&lt;br /&gt;
| 795,120&lt;br /&gt;
| 20&lt;br /&gt;
| 20 x 40 = 800&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[गुजरात]]&lt;br /&gt;
| 182&lt;br /&gt;
| 26,697,475&lt;br /&gt;
| 147&lt;br /&gt;
| 147 x 182 = 26,754&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[हरियाणा]]&lt;br /&gt;
| 90&lt;br /&gt;
| 10,036,808&lt;br /&gt;
| 112&lt;br /&gt;
| 112 x 90 = 10,080&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[हिमाचल प्रदेश]]&lt;br /&gt;
| 68&lt;br /&gt;
| 3,460,434&lt;br /&gt;
| 51&lt;br /&gt;
| 51 x 68 = 3,468&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[जम्मू और कश्मीर]]&lt;br /&gt;
| 87&lt;br /&gt;
| 6,300,000&lt;br /&gt;
| 72&lt;br /&gt;
| 72 x 87 = 6,264&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[झारखण्ड]]&lt;br /&gt;
| 81&lt;br /&gt;
| 14,227,133&lt;br /&gt;
| 176&lt;br /&gt;
| 176 x 81 = 14,256&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[कर्नाटक]]&lt;br /&gt;
| 224&lt;br /&gt;
| 29,299,014&lt;br /&gt;
| 131&lt;br /&gt;
| 131 x 224 = 29,344&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[केरल]]&lt;br /&gt;
| 140&lt;br /&gt;
| 21,347,375&lt;br /&gt;
| 152&lt;br /&gt;
| 152 x 140 = 21,280&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
| 230&lt;br /&gt;
| 30,016,625&lt;br /&gt;
| 131&lt;br /&gt;
| 131 x 230 = 30,130&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
| 288&lt;br /&gt;
| 50,412,235&lt;br /&gt;
| 175&lt;br /&gt;
| 175 x 288 = 50,400&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मणिपुर]]&lt;br /&gt;
| 60&lt;br /&gt;
| 1,072,753&lt;br /&gt;
| 18&lt;br /&gt;
| 18 x 60 = 1,080&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मेघालय]]&lt;br /&gt;
| 60&lt;br /&gt;
| 1,011,699&lt;br /&gt;
| 17&lt;br /&gt;
| 17 x 60 = 1,020&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मिज़ोरम]]&lt;br /&gt;
| 40&lt;br /&gt;
| 332,390&lt;br /&gt;
| 8&lt;br /&gt;
| 8 x 40 = 320&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[नागालैण्ड]]&lt;br /&gt;
| 60&lt;br /&gt;
| 516,449&lt;br /&gt;
| 9&lt;br /&gt;
| 9 x 60 = 540&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[उड़ीसा]]&lt;br /&gt;
| 147&lt;br /&gt;
| 21,944,615&lt;br /&gt;
| 149&lt;br /&gt;
| 149 x 147 = 21,903&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[पंजाब]]&lt;br /&gt;
| 117&lt;br /&gt;
| 13,551,060&lt;br /&gt;
| 116&lt;br /&gt;
| 116 x 117 = 13,572&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
| 200&lt;br /&gt;
| 25,765,806&lt;br /&gt;
| 129&lt;br /&gt;
| 129 x 200 = 25,800&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सिक्किम]]&lt;br /&gt;
| 32&lt;br /&gt;
| 209,843&lt;br /&gt;
| 7&lt;br /&gt;
| 7 x 32 = 224&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[तमिलनाडु]]&lt;br /&gt;
| 234&lt;br /&gt;
| 41,199,168&lt;br /&gt;
| 176&lt;br /&gt;
| 176 x 234 = 41,184 &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[त्रिपुरा]]&lt;br /&gt;
| 60&lt;br /&gt;
| 1,556,342&lt;br /&gt;
| 26&lt;br /&gt;
| 26 x 60 = 1,560&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
| 403&lt;br /&gt;
| 83,849,905&lt;br /&gt;
| 208&lt;br /&gt;
| 208 x 403 = 83,824&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[उत्तराखण्ड]]&lt;br /&gt;
| 70&lt;br /&gt;
| 4,491,239&lt;br /&gt;
| 64&lt;br /&gt;
| 64 x 70 = 4,480&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[पश्चिम बंगाल]]&lt;br /&gt;
| 294&lt;br /&gt;
| 44,312,011&lt;br /&gt;
| 151&lt;br /&gt;
| 151 x 294 =44,394&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
| 70 &lt;br /&gt;
| 40,65,698&lt;br /&gt;
| 58&lt;br /&gt;
| 58 x 70 = 4,060&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[पुदुचेरी]]&lt;br /&gt;
| 30 &lt;br /&gt;
| 471,707&lt;br /&gt;
| 16&lt;br /&gt;
| 16 x 30 = 480&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कुल&lt;br /&gt;
|4120&lt;br /&gt;
| 549,302,005&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| =549,474&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक सांसद के मत का मूल्य==&lt;br /&gt;
*राज्य के कुल निर्वाचित विधायकों के मतों का मूल्य = 5,49,474&lt;br /&gt;
*लोकसभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या = 543&lt;br /&gt;
*राज्यसभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या = 233&lt;br /&gt;
*कुल सांसदों की संख्या = 543+233 = 776&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक सांसद के मत के मूल्य का फार्मूला = राज्य के कुल मतों का मूल्य यानी 5,49,474 / कुल सांसदों की संख्या यानी 778 = 708.085 यानी 708&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सांसदों के कुल मतों का मूल्य, 708×776 = 5,49,408&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
वर्ष [[2002]] के राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने वाले कुल मतदाताओं की संख्या = कुल विधायक (4120) + कुल सांसद (776) = 4896&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी मतदाताओं के कुल मतों का मूल्य = 5,49,474+5,49,408 = 10,98,882&amp;lt;ref&amp;gt;नोट - भारतीय संविधान के अनुसार वर्ष 2002 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी [[1971]] की जनगणना के आंकड़े ही मान्य थे, केवल [[झारखण्ड]], [[उत्तरांचल]] और [[छत्तीसगढ़]] जैसे नये बने तीन राज्यों के विधायकों के मतों का मूल्य अलग से तय किया गया है।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति के चुनाव को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि निर्वाचक मंडल में कोई रिक्त स्थान था। सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह निर्णय दिया है कि बिना किसी विधानसभा के ही राष्ट्रपति का चुनाव कराया जा सकता है।&lt;br /&gt;
==सम्बन्धित विवाद का विनिश्चय==&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 7 के अनुसार राष्ट्रपति के चुनाव से सम्बन्धित विवाद का विनिश्चय [[उच्चतम न्यायालय]] द्वारा किया जाएगा। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होकर पद ग्रहण कर लेता है और बाद में उसका चुनाव उच्चतम न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जाता है, तो राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए भी उसके द्वारा किया गया कार्य या की गयी घोषणा अविधिमान्य नहीं होगी।&lt;br /&gt;
==पुननिर्वाचन के लिए योग्यता==&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 57 के अनुसार [[भारत]] के राष्ट्रपति पद पर पदस्थ व्यक्ति दूसरे कार्यकाल के लिए भी चुनाव में उम्मीदवार बन सकता है। वैसे संविधान में यह व्यवस्था नहीं की गयी है कि राष्ट्रपति पद पर पदस्थ व्यक्ति दूसरे कार्यकाल के लिए निर्वाचन में भाग ले सकता है या नहीं, लेकिन सामान्यत: यह परम्परा बन गयी है कि राष्ट्रपति पद के लिए कोई व्यक्ति एक ही बार निर्वाचित किया जाता है। इसका अपवाद राजेन्द्र प्रसाद रहे हैं, जो दो बार राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे। इसके अतिरिक्त दो राष्ट्रपति [[ज़ाकिर हुसैन]] तथा फ़खरुद्दीन अहमद, जो कार्यकाल के दौरान ही मर गये थे, के सिवाय सभी राष्ट्रपति अपने एक कार्यकाल के बाद दूसरी बार राष्ट्रपति के चुनाव में उम्मीदवार नहीं बने।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+राष्ट्रपति पद का चुनाव तथा विजयी एवं द्वितीय स्थान प्राप्त उम्मीदवारों की सूची&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! क्र.सं.&lt;br /&gt;
! वर्ष&lt;br /&gt;
! निर्वाचित प्रत्याशी&lt;br /&gt;
! द्वितीय स्थान प्राप्त प्रत्याशी&lt;br /&gt;
! मत प्रतिशत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पहला&lt;br /&gt;
| [[1952]]&lt;br /&gt;
| [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉ. राजेन्द्र प्रसाद]]&lt;br /&gt;
| के. टी. शाह&lt;br /&gt;
| 83.80&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दूसरा                &lt;br /&gt;
| [[1957]]&lt;br /&gt;
| [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉ. राजेन्द्र प्रसाद]]&lt;br /&gt;
| एन. एन. दास&lt;br /&gt;
| 99.30&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तीसरा   &lt;br /&gt;
| [[1962]]&lt;br /&gt;
| [[सर्वपल्ली राधाकृष्णन|डॉ. राधाकृष्णन]]&lt;br /&gt;
| सी. एच. राम&lt;br /&gt;
| 98.30&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चौथा   &lt;br /&gt;
| [[1967]]&lt;br /&gt;
| [[डॉ. ज़ाकिर हुसैन]]&lt;br /&gt;
| के. सुब्बाराव&lt;br /&gt;
| 56.20&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पाँचवाँ   &lt;br /&gt;
| [[1969]]&lt;br /&gt;
| [[वाराहगिरि वेंकट गिरि]]&lt;br /&gt;
| [[नीलम संजीव रेड्डी]]&lt;br /&gt;
| 50.20&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| छठा &lt;br /&gt;
| [[1974]]&lt;br /&gt;
| [[फ़ख़रुद्दीन अली अहमद]]&lt;br /&gt;
| टी. चौधरी&lt;br /&gt;
| 80.20&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सातवाँ  &lt;br /&gt;
| [[1977]]&lt;br /&gt;
| [[नीलम संजीव रेड्डी]]&lt;br /&gt;
| निर्विरोध&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आठवाँ &lt;br /&gt;
| [[1982]]&lt;br /&gt;
| [[ज्ञानी ज़ैल सिंह]]&lt;br /&gt;
| एच. आर. खन्ना&lt;br /&gt;
| 72.70&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नवाँ &lt;br /&gt;
| [[1987]]&lt;br /&gt;
| आर. वेंकिटरमन अय्यर&lt;br /&gt;
| वी. आर. कृष्ण&lt;br /&gt;
| 72.30&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दसवाँ      &lt;br /&gt;
| [[1992]]&lt;br /&gt;
| डॉ. शंकरदयाल शर्मा&lt;br /&gt;
| जी. जी. स्वेल&lt;br /&gt;
| 64.78&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ग्यारहवाँ  &lt;br /&gt;
| [[1997]]&lt;br /&gt;
| के. आर. नारायणन &lt;br /&gt;
| टी. एन. शेषन&lt;br /&gt;
| 94.70&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बारहवाँ  &lt;br /&gt;
| [[2002]]&lt;br /&gt;
| [[डॉक्टर ए. पी. जे. अब्दुल कलाम]]&lt;br /&gt;
| कैप्टन लक्ष्मी सहगल&lt;br /&gt;
| 89.98&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरहवाँ  &lt;br /&gt;
| [[2007]]&lt;br /&gt;
| [[प्रतिभा देवी सिंह पाटिल]] &lt;br /&gt;
| भैरोसिंह शेखाबत&lt;br /&gt;
| 65.82&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति के द्वारा शपथ==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति या कोई व्यक्ति, जो किसी कारण से राष्ट्रपति के कृत्यों के निर्वहन के लिए नियुक्त होता है, अपना पद ग्रहण करने के पूर्व अनुच्छेद 60 के तहत भारत के मुख्य न्यायधीश या उसकी अनुपस्थिति में [[उच्चतम न्यायालय]] में उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायधीश के समक्ष अपने पद के कार्यपालन की शपथ लेता है। राष्ट्रपति के शपथ पत्र का प्रारूप निम्नलिखित रूप में होता है–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'''मैं, अमुक ईश्वर की शपथ लेता हूँ सत्य निष्ठा से प्रतिज्ञाण करता हूँ कि मैं श्रद्धापूर्वक भारत के राष्ट्रपति के पद का कार्यपालन (अथवा राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन) करूँगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूँगा और मैं भारत की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहूँगा।'''&amp;lt;/poem&amp;gt; राष्ट्रपति द्वारा लिया जाने वाला शपथ या प्रतिज्ञण उपराष्ट्रपति एवं [[प्रधानमंत्री]] के शपथ से इस मामले में भिन्न है कि राष्ट्रपति संविधान और विधि के परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण का शपथ लेता है।&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति की पदावधि==&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 56 के अनुसार राष्ट्रपति अपने पदग्रहण की तिथि से पाँच वर्ष की अवधि तक अपने पद पर बना रहता है, लेकिन इस पाँच वर्ष की अवधि के पूर्व भी वह उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है या उसे पाँच वर्ष की अवधि के पूर्व संविधान के उल्लंघन के लिए संसद द्वारा लगाये गये महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है। राष्ट्रपति द्वारा उपराष्ट्रपति को सम्बोधित त्यागपत्र की सूचना उसके द्वारा (उपराष्ट्रपति के द्वारा) लोकसभा के अध्यक्ष को अविलम्ब दी जाती है।&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति अपने पाँच वर्ष के कार्यकाल के पूरा करने के बाद भी तब तक राष्ट्रपति के पद पर बना रहता है, जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय संविधान में प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान या उसकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के पद के कार्यों का निर्वहन करेगा और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति दोनों के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान या दोनों की अनुपस्थिति में भारत का मुख्य न्यायधीश राष्ट्रपति के पद के कृत्यों का निर्वहन करेगा। इसी कारण जब [[3 मई]], [[1969]] को तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु हुई, तब तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी॰ वी॰ गिरि कार्यकारी राष्ट्रपति नियुक्त किये गये। लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार होने के लिए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। तब भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति मो॰ हिदायतुल्ला ने राष्ट्रपति के पद का निर्वहन तब तक किया, जब तक निर्वाचित होकर वी॰ वी॰ गिरि ने राष्ट्रपति पद का कार्यभार ग्रहण नहीं कर लिया। अब तक तीन उपराष्ट्रपति वी॰ वी॰ गिरि (राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के कारण), [[बी.डी. जत्ती]] (राष्ट्रपति फ़खरुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के कारण), तथा मोहम्मद हिदायतुल्ला (राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ेल सिंह की अनुपस्थिति के कारण) और एक मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ती मोहम्मद हिदायतुल्ला राष्ट्रपति के पद के कृत्यों का निर्वहन कर चुके हैं।&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:50%&amp;quot;|&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+भारत के राष्ट्रपति पद के कृत्यों का निर्वहन करने वाले व्यक्ति&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! नाम&lt;br /&gt;
! कार्यकाल&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;99%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉ. राजेन्द्र प्रसाद]]&lt;br /&gt;
| [[26 जनवरी]], [[1950]] से [[13 मई]], [[1962]] &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सर्वपल्ली राधाकृष्णन|डॉ. राधाकृष्णन]]&lt;br /&gt;
| [[13 मई]], [[1962]] से [[13 मई]], [[1967]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[डॉ. ज़ाकिर हुसैन]]&lt;br /&gt;
| [[15 मई]], [[1967]] से [[3 मई]], [[1969]] &lt;br /&gt;
(कार्यकाल में ही मृत्यु)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वाराहगिरि वेंकट गिरि]] &lt;br /&gt;
(उपराष्ट्रपति)&lt;br /&gt;
| [[3 मई]], [[1969]] से [[20 जुलाई]], [[1969]] &lt;br /&gt;
(कार्यवाहक)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| न्यायमूर्ति एम॰ हिदायतुल्ला &lt;br /&gt;
(भारत के मुख्य न्यायाधीश)&lt;br /&gt;
| [[20 जुलाई]], [[1969]] से [[24 अगस्त]], [[1969]] &lt;br /&gt;
(कार्यवाहक)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वाराहगिरि वेंकट गिरि]]&lt;br /&gt;
| [[24 अगस्त]], [[1969]] से [[24 अगस्त]], [[1974]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[फ़ख़रुद्दीन अली अहमद]]&lt;br /&gt;
| [[24 अगस्त]], [[1974]] से [[11 फ़रवरी]], [[1977]] &lt;br /&gt;
(कार्यकाल में ही मृत्यु)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बी.डी. जत्ती]] (उपराष्ट्रपति)  &lt;br /&gt;
| [[11 फ़रवरी]], [[1977]] से [[25 जुलाई]], [[1977]] &lt;br /&gt;
(कार्यवाहक) &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[नीलम संजीव रेड्डी]]&lt;br /&gt;
| [[25 जुलाई]], [[1977]] से [[25 जुलाई]], [[1982]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[ज्ञानी ज़ैल सिंह]]&lt;br /&gt;
| [[25 जुलाई]], [[1982]] से [[25 जुलाई]], [[1987]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| एम॰ हिदायतुल्ला (उपराष्ट्रपति) &lt;br /&gt;
| [[6 अक्टूबर]], [[1982]] से [[31 अक्टूबर]], [[1982]] &lt;br /&gt;
(जब राष्ट्रपति अनुपस्थित थे)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[रामस्वामी वेंकटरमण]]  &lt;br /&gt;
| [[25 जुलाई]], [[1987]] से [[25 जुलाई]], [[1992]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[शंकरदयाल शर्मा|डॉ. शंकर दयाल शर्मा]]&lt;br /&gt;
| [[25 जुलाई]], [[1992]] से [[25 जुलाई]], [[1997]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[के. आर. नारायणन]] &lt;br /&gt;
| [[25 जुलाई]], [[1997]] से [[25 जुलाई]], [[2002]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[अब्दुल कलाम|डॉ. ए॰ पी॰ जे॰ अब्दुल कलाम]]&lt;br /&gt;
| [[25 जुलाई]], [[2002]] से [[25 जुलाई]], [[2007]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[प्रतिभा पाटिल]]&lt;br /&gt;
| [[25 जुलाई]], [[2006]] से निरन्तर&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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| style=&amp;quot;width:50%&amp;quot;|&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+विभिन्न चुनावों में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को मिले मत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! उम्मीदवार&lt;br /&gt;
! चुनाव तिथि&lt;br /&gt;
! प्राप्त मत&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;99%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''प्रथम चुनाव, 1952'''  &lt;br /&gt;
| '''2 मई, 1952'''&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[डॉ. राजेन्द्र प्रसाद]]&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 5,07,400&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| के. टी. शाह  &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 92,827&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लक्ष्मण गणेश ठाते  &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 2,672&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चौधरी हरी राम  &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 1,954&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कृष्ण कुमार चटर्जी &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 533&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''द्वितीय चुनाव, 1957''' &lt;br /&gt;
| '''6 मई, 1957'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| डॉ. राजेन्द्र प्रसाद &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 4,59,698&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नागेन्द्र नारायण दास &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 2000&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चौधरी हरी राम &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 1498&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''तृतीय चुनाव, 1962'''&lt;br /&gt;
| '''7 मई, 1962'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन]] &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 5,53,067&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चौधरी हरी राम &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 6,341&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यमुना प्रसाद त्रिशुलिया &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 3,537&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''चौथा चुनाव, 1967'''&lt;br /&gt;
| '''6 मई, 1967'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[डॉ. जाकिर हुसैन]] &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 4,71,244&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कोका सुब्बाराय &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 3,63,971&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| खुबी राम &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 1369&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यमुना प्रसाद त्रिशुलिया &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 750&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| भाम्बुरकर श्रीनिवास गोपाल &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 232&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| ब्रह्म देव &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 232&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कृष्ण कुमार चटर्जी &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 125&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कुमार कमला सिंह &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 125&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''पाँचवाँ चुनाव, 1969''' &lt;br /&gt;
| '''16 अगस्त, 1969'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वी. वी. गिरि]] &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 4,01,515&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[नीलम संजीव रेड्डी]] &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 3,13,548&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सी. डी. देशमुख &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 1,12,769&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चन्द्रदत्त सेनानी &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 5,814&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गुरुचरण कौर &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 940&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| राजभोज पांडुरंग नाथूजी&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 831&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पं बाबूलाल भाग &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 576&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मनोबिहारी अनिरुद्ध शर्मा &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 125&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चौधरी हरी राम &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 125&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| खूबी राम &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 94&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''छठा चुनाव, 1974''' &lt;br /&gt;
| '''17 अगस्त, 1974'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[फ़खरुद्दीन अली अहमद]] &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 7,65,587&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| त्रिदिव चौधरी &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 1,89,196&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''सातवां चुनाव, 1977'''&lt;br /&gt;
| '''6 अगस्त, 1977'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[नीलम संजीव रेड्डी]]&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| निर्विरोध निर्वाचन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''आठवां चुनाव, 1982'''&lt;br /&gt;
| '''12 जुलाई, 1982'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[ज्ञानी जैल सिंह]] &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 7,54,113&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हंस राज खन्ना &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 2,82,685&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''नवां चुनाव, 1987'''&lt;br /&gt;
| '''13 जुलाई, 1987'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[रामास्वामी वेंकटरमण]] &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 7,40,148&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कृष्ण अय्यर रामा अय्यर &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 2,81,550&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मिथलेश कुमार &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 2,223&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''दसवां चुनाव, 1992'''&lt;br /&gt;
| '''13 जुलाई, 1992'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[डॉ. शंकर दयाल शर्मा]] &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 6,75,864&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रो. जी. जी. स्वेल &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 3,46,485&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| राम जेठमलानी &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 2,704&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जोगेन्द्र सिंह उर्फ धरती पकड़ &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 1,135&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''ग्याहरवां चुनाव, 1997'''&lt;br /&gt;
| '''14 जुलाई, 1997'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[के. आर. नारायणन]] &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 9,56,290&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| टी. एन. शेषन &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 50,631&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''बारहवां चुनाव, 2002'''&lt;br /&gt;
| '''15 जुलाई, 2002'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम]] &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 9,22,884&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कैप्टन लक्ष्मी सहगल &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 1,07,366&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| '''तेरहवां चुनाव, 2007'''&lt;br /&gt;
| '''19 जुलाई, 2007'''&lt;br /&gt;
| '''प्राप्त मत'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[प्रतिभा देवी सिंह पाटिल]] &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| 6,38,116&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| भैरोसिंह शेखावत &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
| 3,31,306&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वेतन और भत्ते==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति को नि:शुल्क शासकीय निवास उपलब्ध होता है। वह ऐसी परिलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का हक़दार होता है, जो संसद विधि के द्वारा अवधारित करें, और जब तक संसद ऐसी विधि पारित नहीं करती है उनकी परिलब्धियाँ या भत्ते वही होगें जो संविधान की दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं। [[1990]] में राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ बढ़ाकर 20,000 रुपये, [[4 अगस्त]], [[1998]] को इसे बढ़ाकर 50,000 रुपये और [[10 जनवरी]], [[2008]] को राष्ट्रपति की परिलब्धियों में एक बार फिर पुन: संशोधन करते हुए इसे बढ़ाकर 1.50 लाख रुपये प्रति माह कर दिया गया। यह वृद्धि जनवरी, [[2006]] से प्रभावी की गई है। राष्ट्रपति को पद त्याग देने के पश्चात् या पदावधि समाप्ति पर उनके वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन का प्रावधान है। इस प्रकार पद विमुक्ति के पश्चात् पूर्व राष्ट्रपति को 9,00,000 रुपये वार्षिक पेंशन देय है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्व राष्ट्रपति को एक अतिरिक्त निजी सचिव के अलावा एक कर्मचारी की भी सुविधा का प्रावधान है। उन्हें मोबाइल फ़ोन, इंटरनेट और ब्राडबैंड का कनेक्शन भी उपलब्ध कराया जाएगा। उनके कार्यालय के रख-रखाव पर पूर्व में 12 हज़ार रुपये वार्षिक ख़र्च का प्रावधान था, जिसे बढ़ाकर अब 60,000 रुपये कर दिया गया है। पदावधि के दौरान राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाने पर उसे पारिवारिक पेंशन, सुसज्जित आवास, कर्मचारी, कार, टेलीफ़ोन, यात्रा और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध हैं। संविधान के अनुच्छेद 59 के अनुसार राष्ट्रपति की परिलब्धियाँ और उसके भत्ते उसके कार्यकाल में घटाये नहीं जा सकते। राष्ट्रपति के वेतन एवं भत्ते को आयकर से छूट प्राप्त हैं।&lt;br /&gt;
==महाभियोग की प्रक्रिया==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति को उसके पद से अनुच्छेद 61 के तहत महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा हटाया जा सकता है। राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया तब संचालित की जा सकती है, जब उसने संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन किया हो। राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग चलाने का संकल्प संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है, लेकिन जिस सदन में महाभियोग का संकल्प पेश किया जाना हो, उसके एक चौथाई सदस्यों के द्वारा हस्ताक्षरित आरोप पत्र राष्ट्रपति को 14 दिन पूर्व दिया जाना आवश्यक है। राष्ट्रपति को आरोप पत्र दिये जाने के 14 दिन बाद ही सदन में महाभियोग का संकल्प पेश किया जा सकता है। जिस सदन में संकल्प पेश किया जाए, उसके सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से संकल्प पारित किया जाना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस सदन में संकल्प पेश किया गया है, उसके द्वारा पारित किये जाने के बाद संकल्प दूसरे सदन को भेजा जाएगा और दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाये गये आरोपों की जाँच करेगा। जब दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाये गये आरोपों की जाँच कर रहा हो, तब राष्ट्रपति या तो स्वयं या तो अपने वकील के माध्यम से लगाये गये आरोपों के सम्बन्ध में अपना पक्ष प्रस्तुत करेगा और स्पष्टीकरण देगा। यदि दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाये गये आरोपों को सही पाता है तथा अपनी संख्या के बहुमत से तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत पहले सदन द्वारा पारित संकल्प का अनुमोदन कर देता है, तो महाभियोग की कार्रवाई पूर्ण हो जाती है। इस प्रकार राष्ट्रपति अपना पद त्याग करने के लिए बाध्य हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति भवन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rashtrapati-Bhavan-1.jpg|thumb|200px|राष्ट्रपति भवन, [[दिल्ली]] &amp;lt;br /&amp;gt; Rashtrapati Bhavan, Delhi]]&lt;br /&gt;
{{main|राष्ट्रपति भवन}}&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति भवन वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इस भवन के निर्माण की सोच सर्वप्रथम [[1911]] में उस समय उत्पन्न हुई जब [[दिल्ली दरबार]] ने निर्णय किया कि भारत की राजधानी [[कोलकाता]] से [[दिल्ली]] स्थानान्तरित की जाएगी। इसी के साथ में यह भी निर्णय लिया गया कि [[नई दिल्ली]] में ब्रिटिश वायसराय के रहने के लिए एक आलीशान भवन का निर्माण किया जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति के अंगरक्षक==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए अंगरक्षकों की व्यवस्था है। इस अंगरक्षक दस्ते का गठन सर्वप्रथम 1773 में गवर्नर जनरल हेस्टिग्स ने [[बनारस]] में किया था। प्रारम्भ में इस दस्तें में 50 जवान और 50 घोड़े शामिल किये गये थे। बाद में बनारस के राजा चेत सिंह द्वारा इस दस्ते में 50 जवान और 50 घोड़े शामिल कर लिये जाने के बाद इनकी संख्या 100 हो गई। प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व यह संख्या 1845 थी, जो कालान्तर में बढ़कर 1929 हो गई। वर्तमान में राष्ट्रपति के अंगरक्षक दस्ते में 4 अधिकारी, 14 जूनियर कमीशंड अधिकारी और 161 जवानों की टुकड़ी शामिल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति के सुरक्षा बलों को 1784 तक गवर्नर जनरल का बाडीगार्ड कहा जाता था। [[1858]] में इसे वायसराय का बाडीगार्ड कहा जाने लगा। [[1944]] तक आते-आते इसका नाम '44वीं डिवीजन निगरानी स्कवॉड्रन' पड़ गया। [[1947]] में एक बार फिर इस दस्ते को 'गवर्नर जनरल बाडीगार्ड' कहा जाने लगा। लेकिन [[21 जनवरी]], [[1950]] को भारत को गणतंत्र घोषित किये जाने के साथ ही इस दस्ते को 'राष्ट्रपति का अंगरक्षक' के रूप में नामांकित कर दिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति के अंगरक्षक के दस्ते के रेजीमेंट का [[नीला रंग|रंग नीला]] और गाढ़ा लाल (मैरून) है। इस दस्ते का अमर वाक्य 'भारत माता की जय' है। वर्तमान में राष्ट्रपति के अंगरक्षक दस्तें में [[सिक्ख]], [[जाट]] और राजपूत सहित लगभग सभी रेजीमेंट के जवान और अधिकारी कार्यरत हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शक्तियाँ तथा अधिकार==&lt;br /&gt;
भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को निम्नलिखित शक्तियाँ तथा अधिकार प्रदान किये गये हैं–&lt;br /&gt;
====कार्यपालिका शक्तियाँ====&lt;br /&gt;
संविधान के अनुच्छेद 73 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है और वह अपनी इस शक्ति का प्रयोग अपने अधीनस्थ प्राधिकारियों के माध्यम से करता है। यहाँ अधीनस्थ प्राधिकारी का तात्पर्य केन्द्रीय मंत्रिमण्डल से है। राष्ट्रपति की कार्यपालिका शक्तियों को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''मंत्रिपरिषद का गठन'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका शक्ति के संचालन में सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद का गठन करता है, जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। सामान्यत: राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करता है जो कि लोकसभा में बहुमत दल का नेता हो। इस प्रकार नियुक्त किये गये प्रधानमंत्री की सलाह पर वह मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। साथ ही वह प्रधानमंत्री की सलाह पर मंत्रिपरिषद के किसी सदस्य को बर्ख़ास्त कर सकता है। सामान्यत: यह प्रथा रही है कि प्रधानमंत्री लोकसभा का सदस्य होता है, क्योंकि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होता है, लेकिन राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि यदि लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल किसी ऐसे व्यक्ति को अपना नेता चुनता है, जो लोकसभा का सदस्य नहीं है या राज्यसभा का सदस्य है, तो राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है, लेकिन इस प्रकार नियुक्त किये गये व्यक्ति को 6 माह के अंतर्गत संसद का सदस्य होना पड़ता है। इसी तरह प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को मंत्रिपरिषद में शामिल कर सकता है, जो कि संसद का सदस्य नहीं है। यदि ऐसा व्यक्ति मंत्रिपरिषद में शामिल किया जाता है तो उसे छ: माह के अंतर्गत संसद के किसी सदन का सदस्य बनना पड़ता है। &lt;br /&gt;
जब कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो कि लोकसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले या लोकसभा में पेश किये गये अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने के कारण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़े, तो राष्ट्रपति किस व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करेगा, इस सम्बन्ध में संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। यहाँ पर राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है, जिसके सम्बन्ध में उसे विश्वास हो कि वह लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करता है। इस सम्बन्ध में कुछ हद तक राष्ट्रपति को विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इसी विशेषाधिकार के प्रयोग में राष्ट्रपति ने [[1979]] में चरण सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। चरण सिंह की प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति को इस आधार पर न्यायालय में चुनौती दी गयी थी कि विश्वास मत प्राप्त करने पर ही उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए था, किन्तु न्यायालन ने अपने निर्णय में कहा कि प्रधानमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में यह पूर्ववर्ती शर्त नहीं है कि लोकसभा में विश्वास मत प्राप्त किया जाय। इसी तरह [[1989]] में [[वी. पी. सिंह]], [[1991]] में [[नरसिंह राव पी. वी.|पी. वी. नरसिंहराव]], [[1996]] में [[अटल बिहारी वाजपेयी]] और 1996 में ही [[एच डी देवगौड़ा]] तथा [[1997]] में [[इन्द्रकुमार गुजराल]] को प्रधानमंत्री पर पर नियुक्त किया गया था। बाद में [[1998]] में 12वीं लोकसभा के गठन के बाद राष्ट्रपति ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''नियुक्ति सम्बन्धी शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संविधान द्वारा राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई है कि वह संघ से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियाँ करें। राष्ट्रपति इस शक्ति के प्रयोग में कई पदाधिकारियों, जैसे-महान्यायवादी, नियंत्रक-महालेखा परीक्षक, वित्त आयोगों के सदस्यों, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों, संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, अन्य निर्वाचन आयुक्तों, [[उच्चतम न्यायालय]] तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधाशों, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों, राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्षों तथा सदस्यों, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों, राज्यों के राज्यपालों, संघ राज्यक्षेत्रों के उपराज्यपालों या प्रशासकों की नियुक्ति कर सकता है। राष्ट्रपति ये नियुक्तियाँ मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है। वह अपने द्वारा नियुक्त प्राधिकारियों तथा अधिकारियों को पदमुक्त कर सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''आयोगों का गठन'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति को आयोगों को गठित करने की शक्तियाँ भी प्रदान की गई हैं। यह भारत के राज्य क्षेत्र में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग की दशाओं का अन्वेषण करने के लिए आयोग, [[राजभाषा]] पर प्रतिवेदन देने के लिए आयोग, अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर रिपोर्ट देने के लिए तथा राज्यों में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण सम्बन्धी क्रियाकलापों पर रिपोर्ट देने के लिए आयोग का गठन कर सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====सैनिक शक्ति====&lt;br /&gt;
संघ के रक्षाबलों का समादेश राष्ट्रपति में निहित होता है। वह रक्षा बलों का प्रमुख होता है। राष्ट्रपति अपने में निहित रक्षा बलों का समादेश उस विधि के अनुसार प्रयुक्त करता है, जिसे संसद बनाये। वह रक्षा बलों के प्रमुखों को भी नियुक्त करता है। &lt;br /&gt;
====राजनयिक शक्तियाँ ====&lt;br /&gt;
अन्य देशों के साथ में भारत का संव्यवहार राष्ट्रपति के नाम से किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों में राष्ट्रपति भारत का प्रतिनिधित्व करता है। अन्य देशों में भेजे जाने वाले राजदूत तथा उच्चायुक्त राष्ट्रपति के द्वारा नियुक्त जाते हैं। साथ ही अन्य देशों से भारत में नियुक्ति पर आने वाले राजदूतों व उच्चायुक्तों का स्वागत भी राष्ट्रपति के द्वारा किया जाता है। जब अन्य देश के राजदूत या उच्चायुक्त भारत में नियुक्त होकर आते हैं, तो वे अपना 'प्रत्यय पत्र' राष्ट्रपति के समक्ष पेश करते हैं। समस्त अंतर्राष्ट्रीय क़रार और सन्धियाँ राष्ट्रपति के नाम से की जाती हैं, लेकिन राष्ट्रपति अपनी राजनयिक शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है।&lt;br /&gt;
====विधायी शक्तियाँ एवं कार्य====&lt;br /&gt;
संविधान द्वारा राष्ट्रपति को व्यापक विधायी शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं, जिन्हें निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''संसद से सम्बन्धित शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है, क्योंकि संसद का गठन राष्ट्रपति और लोकसभा तथा राज्यसभा से मिलकर होता है। संसद से सम्बन्धित राष्ट्रपति की शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-&lt;br /&gt;
#अनुच्छेद 331 के तहत वह लोकसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय के दो सदस्यों को नामजद कर सकता है, यदि उसके विचार में लोकसभा में उस समूदाय को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।&lt;br /&gt;
#वह राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकता है (अनुच्छेद 80, 1)।&lt;br /&gt;
#यदि संसद के किसी सदस्य की अयोग्यता के सम्बन्ध में, दल-बदल के आधार पर के सिवाय, सवाल उत्पन्न होता है, तो उसका निर्णय राष्ट्रपति करेगा, लेकिन राष्ट्रपति ऐसा निर्णय करने के लिए निर्वाचन आयोग की राय लेगा। &lt;br /&gt;
#राष्ट्रपति संसद के सत्र को आहूत करता है, लेकिन संसद के एक सत्र की अन्तित बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख़ के बीच छ: मास का अन्तर नहीं होना चाहिए। &lt;br /&gt;
#वह सदनों या किसी सदन का सत्रावसान कर सकता है तथा लोकसभा का विघटन कर सकता है। &lt;br /&gt;
#वह संसद के किसी एक सदन में या संसद के संयुक्त अधिवेशन में अभिभाषण कर सकता है। &lt;br /&gt;
#संसद में लम्बित किसी विधेयक के सम्बन्ध में संसद के दोनों सदनों या किसी सदन को संदेश भेज सकता है और उसके संदेश पर यथाशीघ्र विचारण किया जाता है। &lt;br /&gt;
#वह लोकसभा के प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात् प्रथम सत्र के आरम्भ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरम्भ में संसद के संयुक्त अधिवेशन में अभिभाषण कर सकता है। &lt;br /&gt;
#संसद द्वारा कोई विधेयक पारित किये जाने पर उसे राष्ट्रपति के समक्ष अनुमति के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति या तो उस पर अपनी अनुमति देता है या विधेयक पर पुन: विचार करने के लिए संसद को वापस भेजता है। यदि संसद द्वारा पुन: विधेयक पारित कर दिया जाता है तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति देने के लिए बाध्य होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''विधेयक को पेश करने की सिफ़ारिश करने की शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निम्नलिखित विधेयक राष्ट्रपति की सिफ़ारिश के बिना संसद में पेश नहीं किये जा सकते-&lt;br /&gt;
#धन विधेयक, लेकिन किसी कर को घटाने या समाप्त करने का प्रावधान करने वाले विधेयक राष्ट्रपति की सिफ़ारिश के बिना संसद में पेश किये जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
#राज्य का निर्माण करने या विद्यमान राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाले विधेयक।&lt;br /&gt;
#जिस कराधान में राज्य का हित हो, उस कराधान पर प्रभाव डालने वाले विधेयक।&lt;br /&gt;
#जिस विधेयक को अधिनियमित और प्रवर्तित करने से भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़ेगा, सम्बन्धी विधेयक।&lt;br /&gt;
#भूमि अधिग्रहण से सम्बन्धित विधेयक।&lt;br /&gt;
#व्यापार की स्वतंत्रता पर रोक लगाने वाले राज्य का कोई विधेयक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''राज्य विधान मण्डल के द्वारा बनायी जाने वाली विधि के सम्बन्ध में राष्ट्रपति की शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्य विधान मण्डल द्वारा बनायी जाने वाली विधि के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को निम्नलिखित शक्तियाँ प्राप्त हैं-&lt;br /&gt;
#यदि राज्य विधान मण्डल कोई ऐसा विधेयक पारित करता है, जिससे उच्च न्यायालय की अधिकारिता प्रभावित होती है, तो राज्यपाल उस विधेयक पर अनुमति नहीं देगा और उसे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित कर देगा।&lt;br /&gt;
#राज्य विधान मण्डल के द्वारा सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए पारित विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित रखा जाएगा। &lt;br /&gt;
#किसी राज्य के अन्दर या दूसरे राज्यों के साथ व्यापार आदि पर प्रतिबन्ध लगाने वाले विधेयकों को विधानसभा में पेश करने के पहले राष्ट्रपति की अनुमति लेनी होगी।&lt;br /&gt;
#वित्तीय आपात स्थिति के प्रवर्तन की स्थिति में राष्ट्रपति निर्देश दे सकता है कि सभी धन विधेयकों को राज्य विधान सभा में पेश करने के पहले उस पर राष्ट्रपति की अनुमति ली जाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''अध्यादेश जारी करने की शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गयी है। राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश का वही प्रभाव होता है, जो संसद द्वारा पारित तथा राष्ट्रपति के द्वारा अनुमोदित अधिनियम को होता है, लेकिन अन्तर यह होता है कि अधिनियम का प्रभाव तब तक स्थायी होता है, जब तक की संसद के द्वारा या राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा निरस्त न कर दिया जाए, इसके विपरीत अध्यादेश केवल 6 मास तक ही प्रवर्तन में रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति के द्वारा अध्यादेश संसद के विश्रान्तिकाल में उस समय जारी किया जाता है, जब राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है, जिसके अनुसार अविलम्ब कार्रवाई करना आवश्यक है। राष्ट्रपति के द्वारा जारी अध्यादेश का प्रभाव केवल 6 मास तक ही रहता है यदि 6 मास के अन्दर संसद द्वारा अनुमोदित न कर दिया जाए। संसद द्वारा अनुमोदित किये जाने पर वह राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करने के बाद अधिनियम हो जाता है। यदि संसद के अधिवेशन के प्रारम्भ के बाद पहले जारी किये गये अध्यादेश को संसद द्वारा अनुमोदित किये जाने के लिए 6 मास के अन्दर संसद में पेश नहीं किया जाता है, तो अध्यादेश प्रभावहीन हो जाता है। यदि संसद के एक सदन का सत्र चल रहा है और दूसरे सदन का सत्र स्थगित हो, तब भी अध्यादेश जारी किया जा सकता है, क्योंकि संसद का एक सदन कोई विधेयक पारित कर उसे क़ानून बनाने के लिए सक्षम नहीं है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''नियम बनाने की शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति को निम्नलिखित के सम्बन्ध में क़ानून बनाने की शक्ति है-&lt;br /&gt;
#राष्ट्रपति के नाम से किये जाने वाले और निष्पादित आदेशों तथा अन्य लिखतों को अधिप्रमाणित करने के ढंग के सम्बन्ध में।&lt;br /&gt;
#राज्यसभा के सभापति तथा लोकसभा के अध्यक्ष से परामर्श करके दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों से सम्बन्धित और उनमें परस्पर संचार से सम्बन्धित प्रक्रिया के नियम।&lt;br /&gt;
#संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तों को विनियमित करने वाले नियम।&lt;br /&gt;
#संयुक्त लोक सेवा आयोग तथा संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों कर्मचारियों की सेवा शर्तों को विनियमित करने वाले नियम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''राष्ट्रपति की वीटो शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संविधान द्वारा राष्ट्रपति को स्पष्टत: वीटो की शक्ति प्रदान नहीं की गयी है। लेकिन संविधान के अनुसार किये गये कार्यों तथा स्थापित परम्पराओं के अनुसार यह माना जाता है कि राष्ट्रपति को निम्नलिखित तीन प्रकार की वीटो शक्तियाँ प्राप्त हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''पूर्ण वीटो'''&amp;lt;/u&amp;gt;- जब राष्ट्रपति किसी विधेयक को अनुमति नहीं देता है तो यह कहा जाता है कि राष्ट्रपति ने पूर्ण वीटो की शक्ति का प्रयोग किया है। राष्ट्रपति इस वीटो की शक्ति का प्रयोग गैर सरकारी विधेयक पर अनुमति न प्रदान करके कर सकता है या ऐसे विधेयक पर अनुमति न प्रदान करके कर सकता है जो ऐसी सरकार के द्वारा पारित किया गया हो, जो विधेयक पर अनुमति देने के पूर्व ही त्यागपत्र दे दे और नयी सरकार विधेयक पर अनुमति न देने की सिफ़ारिश करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''निलम्बनकारी वीटो'''&amp;lt;/u&amp;gt;- जब राष्ट्रपति किसी विधेयक के प्रभाव को निलम्बित रखने के लिए अनुमति देने हेतु अपने पास प्रेषित विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेजता है, तो यह कहा जाता है कि उन्होंने निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''जेबी वीटो'''&amp;lt;/u&amp;gt;- इस पॉकेट वीटो भी कहा जाता है। जब राष्टपति संसद द्वारा पारित करके अनुमति के लिए भेजे गए विधेयक पर न तो अनुमति देता है और न ही उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजता है तो यह कहा जाता है कि राष्ट्रपति ने जेबी या पॉकेट वीटो का प्रयोग किया है। इस वीटो का प्रयोग राष्ट्रपति (ज्ञानी ज़ेल सिंह) ने [[1986]] में संसद द्वारा पारित भारतीय डाक (संशोधन) अधिनियम के सन्दर्भ में किया है। राष्ट्रपति ने न तो इस पर अपनी अनुमति दी है और न ही इसे संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेजा है। &lt;br /&gt;
====वित्तीय शक्तियाँ====&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति को संविधान द्वारा कई वित्तीय शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं। धन विधेयक तथा वित्त विधेयक को तभी लोकसभा में पेश किया जाता है जब राष्ट्रपति उसकी सिफ़ारिश करे। जिस विधेयक को प्रवर्तित किये जान पर भारत की संचित निधि में व्यय करना पड़े, उस विधेयक को संसद द्वारा तभी पारित किया जाएगा, जब राष्ट्रपति उस विधेयक पर विचार-विमर्श करने की सिफ़ारिश संसद से करें। जिस कराधान में राज्य का हित सम्बद्ध है, उस कराधान से सम्बन्धित विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति से ही लोकसभा में पेश किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति प्रत्येक वर्ष वित्तमंत्री के माध्यम से वर्ष का बजट लोकसभा में पेश करवाता है तथा प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर वित्त आयोग का गठन करता है। राष्ट्रपति वित्त आयोग द्वारा की गयी प्रत्येक सिफ़ारिश को, उस पर किये गये स्पष्टीकरण ज्ञापन सहित संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाता है। &lt;br /&gt;
====न्यायिक शक्तियाँ====&lt;br /&gt;
संविधान द्वारा राष्ट्रपति को तीन प्रकार की न्यायिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, जिनका विवरण निम्न प्रकार से है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 124 के अनुसार राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को नियुक्त करने की शक्ति है। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करने के लिए राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करेगा, जिनसे परामर्श करना वह आवश्यक समझे। मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के पूर्व वह मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करेगा। लेकिन संविधान में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान नहीं किया गया है कि राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से बाध्य होंगे या नहीं। लेकिन [[6 अक्टूबर]], [[1993]] को दिये गये एक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि &lt;br /&gt;
*उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही देश का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाना चाहिए, &lt;br /&gt;
*उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की राय मानने के लिए बाध्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों तथा अन्य न्यायाधीशों को नियुक्त करता है। उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को नियुक्त करते समय राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा राज्य के राज्यपाल से परामर्श करता है, जबकि अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय वह भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल तथा सम्बन्धित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करता है। 6 अक्टूबर, 1993 को दिये गये निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति ऐसी नियुक्तियाँ करते समय भारत के मुख्य न्यायाधीशों की राय को वरीयता देने के लिए बाध्य है। राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानान्तरण कर सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''क्षमादान की शक्ति'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमा तथा कुछ मामलों में दण्डादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्रदान की गयी है। राष्ट्रपति को निम्नलिखित मामले में क्षमा, तथा दोषसिद्धि के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्राप्त है-&lt;br /&gt;
#सेना न्यायालयों के द्वारा दिये गये दण्ड के मामले में।&lt;br /&gt;
#मृत्यु दण्डादेश के सभी मामलों में।&lt;br /&gt;
#उन सभी मामलों में, जिन्हें दण्ड या दण्डादेश ऐसे विषय सम्बन्धी किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया है, जिस विषय तक संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है।&lt;br /&gt;
क्षमा का तात्पर्य अपराध के दण्ड से मुक्ति प्रदान करना है। प्रतिलम्बन का तात्पर्य विधि द्वारा विहित दण्ड के स्थायी स्थगन से है। परिहार के अंतर्गत दण्ड की प्रकृति में परिवर्तन किए बिना दण्ड की मात्रा को कम किया जाना है। लघुकरण का अर्थ दण्ड की प्रकृति में परिवर्तन करना है। &lt;br /&gt;
राष्ट्रपति अपनी इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है और राष्ट्रपति द्वारा यदि इस शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो उसका न्यायिक पुनर्विलोकन न्यायालय द्वारा किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;'''उच्चतम न्यायालय से परामर्श लेने का अधिकार'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 143 के अनुसार जब राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत हो कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की सम्भावना है, जो ऐसी प्रकृति का और व्यापक महत्त्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है, तब वह उस प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय मांग सकता है।&lt;br /&gt;
====आपातकालीन शक्ति====&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति को निम्नलिखित आपातकालीन शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं-&lt;br /&gt;
#राष्ट्रीय आपात घोषित करने की (अनुच्छेद 352)।&lt;br /&gt;
#राज्यों में संवैधानिक तन्त्र की विफलता पर वहाँ आपातकाल घोषित करने की (अनुच्छेद 356)।&lt;br /&gt;
#वित्तीय आपात घोषित करने की (अनुच्छेद 360)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति का विशेषाधिकार==&lt;br /&gt;
संविधान द्वारा राष्ट्रपति को यह विशेषाधिकार प्रदान किया गया है कि वह अपने पद के किसी कर्तव्य के निर्वहन तथा शक्तियों के प्रयोग में किये जाने वाले किसी कार्य के लिए न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा। &lt;br /&gt;
==संवैधानिक स्थिति==&lt;br /&gt;
संविधान की भावना तथा संविधान सभा में इसके सदस्यों द्वारा किये गये विचारों के अनुसार राष्ट्रपति राष्ट्र का केवल औपचारिक प्रधान होगा, लेकिन मूल संविधान के अनुच्छेद 74 (1) में यह प्रावधान किया गया था कि राष्ट्रपति को उसके कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा। इसका यह अर्थ लगाया जाता था कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं है और वह अपने विवेक से भी संविधान के प्रावधानों के अनुसार अपने कृत्यों का निर्वहन कर सकता है। इसी प्रावधान के कारण प्रथम प्रधानमंत्री [[पंडित जवाहर लाल नेहरू]] तथा तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बीच हिन्दू कोड तथा चीन से सम्बन्ध आदि मामलों में काफ़ी मतभेद था, जिससे दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। इसके बावजूद 1976 तक संविधान के इस प्रावधान को क़ायम रखा गया, परन्तु 42वें संविधान संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 74 (1) में संशोधन करके यह व्यवस्था की गयी कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही कार्य करेगा और इस प्रकार राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य कर दिया गया, किन्तु 44वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 74 (1) में यह व्यवस्था कर दी गयी कि यदि राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद द्वारा कोई सलाह दी जाती है तो वह मंत्रिपरिषद की दी गयी सलाह पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकता है। इस प्रकार मंत्रिपरिषद द्वारा पुनर्विचार के बाद की गयी सलाह पर राष्ट्रपति कार्य करने के लिए बाध्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रपति और राज्यपाल]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>बी डी जत्ती</title>
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		<updated>2011-05-25T12:46:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:B-D-Jatti.jpg|thumb|बासप्पा दानप्पा जत्ती]]&lt;br /&gt;
'''श्री बासप्पा दानप्पा जत्ती''' को श्री [[फ़ख़रुद्दीन अली अहमद]] की मृत्यु के बाद कार्यवाहक [[राष्ट्रपति]] के रूप में नियुक्त किया गया था। यह [[भारत|भारतवर्ष]] के निर्वाचित राष्ट्रपति नहीं थे। अतः इन्हें कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में ही सम्बोधित किया जाता है। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार उपराष्ट्रपति को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाए जाने की व्यवस्था है, यदि किसी भी कारणवश राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाए। फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के समय श्री बी.डी जत्ती देश के [[उपराष्ट्रपति]] पद पर थे। कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में इनका कार्यकाल 11 फ़रवरी [[1977]] से 25 जुलाई तक रहा। इस दौरान इन्होंने अपना दायित्व संवैधानिक गरिमा के साथ पूर्ण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म एवं परिवार==&lt;br /&gt;
'''श्री बासप्पा दानप्पा जत्ती''' का जन्म 10 सितम्बर [[1912]] को [[बीजापुर]] ज़िले के [[सवालगी ग्राम]] में हुआ था। बीजापुर ज़िला [[कर्नाटक]] का विभाजित भाग भी बना। जब इनका जन्म हुआ, तो गाँव में मूलभूत सुविधाओं का सर्वथा अभाव था। इनका ग्राम मुंबई प्रेसिडेंसी की सीमा के निकट था। इस कारण वहाँ की भाषा [[मराठी भाषा|मराठी]] थी, [[कन्नड़ भाषा]] नहीं। श्री बासप्पा के दादाजी ने सवालगी ग्राम में एक छोटा घर तथा ज़मीन का एक टुकड़ा ख़रीद लिया था। लेकिन आर्थिक परेशानी के कारण घर और ज़मीन को गिरवी रखना पड़ा ताकि परिवार का जीवन निर्वाह किया जा सके।&lt;br /&gt;
====विद्यार्थी जीवन==== &lt;br /&gt;
'''उस समय सवालगी ग्राम में दो स्कूल थे''', जो प्राथमिक स्तर के थे। एक, लड़कों का स्कूल और दूसरा, लड़कियों का स्कूल। बासप्पा बचपन में काफ़ी शरारती थे। वह शरारत करने का मौक़ा तलाश करते थे। बासप्पा अपनी बड़ी बहन के बालिका स्कूल में पढ़ते जाते और वह इनकी सुरक्षा करती थीं। दूसरी कक्षा के बाद इन्हें लड़कों के स्कूल में दाखिला प्राप्त हो गया। चौथी कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्हें ए. वी. स्कूल में भर्ती कराया गया, जो उसी वर्ष खुला था। यह स्कूल काफ़ी अच्छा था।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''ए. वी. स्कूल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद''' बासप्पा सिद्धेश्वर हाई स्कूल [[बीजापुर]] गए ताकि मैट्रिक स्तर की परीक्षा दे सकें। [[1929]] में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास कर ली। तब यह स्कूल के छात्रावास में ही रहा करते थे। वह खेलकूद में भी रुचि रखते थे। इन्हें फुटबॉल एवं तैराकी के अलावा कुछ भारतीय परम्परागत खेलों में भी रुचि थी। [[खो-खो]], मलखम्भ, कुश्ती, सिंगल, बार एवं डबल बार पर कसरत करने का भी इन्हें शौक़ थ। उन्होंने लगातार दो वर्ष तक लाइट वेट वाली कुश्ती चैम्पियनशिप भी जीती थी। &lt;br /&gt;
====दाम्पत्य जीवन====&lt;br /&gt;
'''उस समय बाल विवाह की सामान्य प्रथा थी''' और इस प्रथा की चपेट में बासप्पा भी आए। [[1922]] में इनका विवाह [[भाभानगर]] की संगम्मा के साथ सम्पन्न हुआ जो रिश्ते में इनके [[पिता]] की बहन की पुत्री लगती थी। विवाह के समय बासप्पा की उम्र मात्र 10 वर्ष थी और वधू संगम्मा की आयु केवल 5 वर्ष। बाल विवाह की प्रथा के अंतर्गत विवाह छोटी उम्र में होते थे लेकिन कन्या को ससुराल कुछ वर्षों बाद भेजा जाता था। &lt;br /&gt;
==व्यावसायिक जीवन==&lt;br /&gt;
'''श्री बासप्पा की क़ानून की जो पढ़ाई''' अधूरी रह गई थी, वह इन्होंने टिक्केकर नामक तहसीलदार एवं प्रथम श्रेणी के दंडनायक रहे व्यक्ति की अभिप्रेरणा से पूरी की। तब वह क़ानून की शिक्षा के प्रति पूर्ण समर्पित भी हुए। इस दृष्टि से यह मानना उपयुक्त होगा कि टिक्केकर इनके परम मित्र, दार्शनिक एवं पथ-प्रदर्शक साबित हुए। अक्टूबर [[1940]] में बासप्पा ने कठोर श्रम द्वारा [[मुंबई]] विश्वविद्यालय से एल. एल. बी. की डिग्री कर ली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उपाधि प्राप्त करने के बाद''' [[1941]] से [[1945]] तक बासप्पा ने [[जमाखंडी]] में वकालत की। इस दौरान इनका उद्देश्य ग़रीबों की मदद करना रहा। अपने मुवक्किलों को न्याय दिलाने के लिए वह संबंधित क़ानूनी मामलों में काफ़ी मेहनत करते थे और पारिश्रमिक की कोई परवाह नहीं करते थे। इनके ज़्यादातर ग्राहक ग्रामीण समुदाय के होते थे। इनकी सह्रदयता पर ईश्वर का आशीर्वाद बरसा। उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण क़ानूनी मामलों में सफलता प्राप्त की। इससे इनका नाम जमाखंडी के प्रसिद्ध वकीलों में आ गया।&lt;br /&gt;
==राजनीतिक जीवन==&lt;br /&gt;
[[1952]] के [[भारत छोड़ों आंदोलन]] में बासप्पा ने प्रजा परिषद पार्टी की ओर से प्रतिनिधित्व किया। [[जमाखंडी]] की प्रजा परिषद पार्टी में इन्हें सेक्रेटरी का पद प्रदान किया गया। इन दिनों बासप्पा को यह पसंद नहीं था कि इन्हें काँग्रेसी कहकर सम्बोधित किया जाए। 18 अप्रॅल [[1945]] को वह जमाखंडी स्टेट के मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। 25 अगस्त [[1947]] को यह प्रजा परिषद पार्टी की ओर से जमाखंडी स्टेट के [[मुख्यमंत्री]] निर्वाचित हुए। लेकिन जब राज्यों के पुनर्गठन का समय आया तो जमाखंडी स्टेट स्वतंत्र [[भारत]] का एक अभिन्न हिस्सा बन गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[1952]] में भारतीय गणराज्य का प्रथम आम चुनाव हुआ। इसमें बासप्पा ने [[काँग्रेस]] के टिकट पर जमाखंडी सीट से विधायक का चुनाव लड़ा और शानदार अंतर के साथ जीत अर्जित की। [[मुंबई]] राज्य में पहली जन चयनित लोकप्रिय सरकार बनी और श्री [[मोरारजी देसाई]] प्रथम मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए। बासप्पा को उपमंत्री का दर्जा प्राप्त हुआ। यह [[शांतिलाल शाह]] के साथ कार्य करने लगे, जिनके पास स्वास्थ्य और श्रम के महकमे थे। श्री शांतिलाल शाह ने श्री बासप्पा जत्ती को कार्य हेतु पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की। इन्हें लगता था कि यह स्वयं कैबिनेट मिनिस्टर हैं। 1 नवम्बर [[1956]] को मुंबई प्रोविंस में जो हिस्सा [[कन्नड़ भाषा|कन्नड़ भाषी]] प्रदेश था, उसे अलग करके [[मैसूर]] में मिला दिया गया। इस प्रकार बासप्पा जमाखंडी की जिस सीट से विधायक निर्वाचित हुए थे, वह सीट मैसूर विधानसभा के अंतर्गत आ गई। 10 [[मई]] [[1957]] को इन्हें मैसूर राज्य की भूमि सुधार समिति का चेयरमैन बना दिया गया। उन्होंने यहाँ अवैतनिक रूप से पूर्ण निष्ठा के साथ कार्य किया।&lt;br /&gt;
==उपराष्ट्रपति पद==&lt;br /&gt;
'''27 अगस्त''' [[1974]] को बासप्पा [[उपराष्ट्रपति]] पद का चुनाव काफ़ी अंतर के साथ जीत गए। इन्हें 78.7 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। इनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी श्री एन. ई. होरो को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा, जो विपक्ष की कई पार्टियों के संयुक्त उम्मीदवार थे। 31 अगस्त 1974 को इन्हें राष्ट्रपति फ़खरुद्दीन अली अहमद ने उपराष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण कराई, जो [[राष्ट्रपति भवन]] के अशोक हॉल में प्रातः 8.30 बजे सम्पन्न हुई। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान प्रधानमंत्री [[इंदिरा गाँधी]], उनके कैबिनेट के सहयोगी, पूर्व उपराष्ट्रपति जी. एस. पाठक तथा बासप्पा की पत्नी संगम्मा भी मौजूद रहीं। यह 10 मिनट का संक्षिप्त समारोह था। इसके तुरंत बाद बी.डी. जत्ती [[राजघाट]] गए और [[महात्मा गाँधी]] की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित की। 31 अगस्त 1974 को बासप्पा द्वारा पदभार संभालने के साथ ही [[भारत]] सरकार के गजट में अधिसूचना प्रकाशित की गई, जिसका क्रमांक एस. ओ. 561 (ई) दिनांक 31 अगस्त 1974 था। उपराष्ट्रपति के रूप में उन्होंने अपना दायित्व बेहद कुशलता के साथ निभाया। [[राज्यसभा]] के सभापति के रूप में भी इन्होंने सदन का निष्पक्ष संचालन किया। &lt;br /&gt;
==कार्यवाहक राष्ट्रपति==&lt;br /&gt;
'''11 फ़रवरी''' [[1977]] को श्री [[फ़ख़रुद्दीन अली अहमद]] की मृत्यु [[राष्ट्रपति]] पद पर रहते हुए हो गई। एक ओर जहाँ दिवंगत राष्ट्रपति के अंतिम संस्कार की रूपरेखा तैयार की जा रही थी, वहीं दूसरी ओर संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार उपराष्ट्रपति बी.डी जत्ती को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाए जाने की औपचारिकताएँ भी पूर्ण की जा रही थीं। पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के दो घंटे बाद बी. डी. जत्ती को प्रातः 10.35 बजे कार्यवाहक राष्ट्रपति की शपथ ग्रहण कराई गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश''' श्री एम.एच. बेग ने श्री बासप्पा दानप्पा जत्ती को कार्यवाहक राष्टपति के रूप में [[राष्ट्रपति भवन]] के अशोक हॉल में साधारण समारोह के दौरान शपथ ग्रहण कराई। श्री बासप्पा ने यह पदभार 24 जुलाई [[1977]] तक संभाला। इस दौरान इन्होंने छठवीं [[लोकसभा]] के नए सत्र का शुभारंभ होने पर सदन को सम्बोधित भी किया। इसके बाद [[नीलम संजीव रेड्डी]] देश के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। इनके निर्वाचित होने के बाद भी बी.डी. जत्ती ने 4 सितम्बर 1977 से 24 सितम्बर 1977 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति का दायित्व निभाया क्योंकि श्री रेड्डी इस दौरान न्यूयार्क में चिकित्सा हेतु गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जब श्री नीलम संजीव रेड्डी''' राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हो गए तो श्री बी. डी. जत्ती ने कार्यवाहक राष्ट्रपति का पदभार त्याग दिया। 25 जुलाई 1977 को इन्होंने कार्यवाहक राष्ट्रपति का पदभार छोड़ा और 30 अगस्त [[1979]] को उनका उपराष्ट्रपति पद का कार्यकाल समाप्त हो गया। इसके पश्चात जस्टिस [[मुहम्मद हिदायतुल्लाह]] नए उपराष्ट्रपति बनाए गए। 1 सितम्बर 1979 को उपराष्ट्रपति पद की गरिमा के अनुकूल निर्णय लेते हुए इन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया और [[बंगलौर]] लौट गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
'''जीवन के अंतिम समय में बी.डी जत्ती''' बंगलौर में ही थे। उल्टी तथा पेट दर्द की शिकायत के कारण 7 जून [[2002]] को प्रातः काल इन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और उसी दोपहर को उनका निधन हो गया। इस प्रकार एक परम्परावादी युग का अंत हो गया, जिससे गाँधी दर्शन भी समाहित था। उस समय इनके परिवार में पत्नी, तीन पुत्र एवं एक पुत्री थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राष्ट्रपति]][[Category:राजनीतिज्ञ]][[Category:राजनीति कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>मुहम्मद हिदायतुल्लाह</title>
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		<updated>2011-05-25T12:46:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Muhammad-Hidayatullah.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=न्यायाधीश मुहम्मद हिदायतुल्लाह&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म= [[17 दिसम्बर]], [[1905]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[नागपुर]] ([[महाराष्ट्र]]) &lt;br /&gt;
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|मृत्यु स्थान=[[मुंबई]], [[भारत]]&lt;br /&gt;
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|अविभावक=ख़ान बहादुर हाफ़िज विलायतुल्लाह, मुहम्मदी बेगम&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=पुष्पा शाह&lt;br /&gt;
|संतान=अरशद, अवनि&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=&lt;br /&gt;
|पद=भारत के छठे उपराष्ट्रपति, कार्यवाहक राष्ट्रपति, 11वें मुख्य न्यायाधीश&lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिन्दी]], [[अंग्रेज़ी]]&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=मॉरिस कॉलेज, ट्रिनिटी कॉलेज कैम्ब्रिज&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=ख़ान बहादुर, केसरी हिन्द&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=रचनाएँ&lt;br /&gt;
|पाठ 1=दि साउथ वेस्ट अफ्रीका केस, डेमोक्रेसी इन इण्डिया एण्द द ज्यूडिशियन प्रोसेस, ए जज्स् मिसेलनि, ए जज्स् मिसेलनि सेकंड सीरिज, ए जज्स् मिसेलनि थर्ड सीरिज आदि  &lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''न्यायाधीश मुहम्मद हिदायतुल्लाह'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मुहम्मद हिदायतुल्लाह (जन्म- [[17 दिसम्बर]] [[1905]] - मृत्यु- [[18 सितम्बर]] [[1992]]) को [[भारत]] के प्रथम कार्यवाहक [[राष्ट्रपति]] कहना ज़्यादा उपयुक्त होगा, क्योंकि यह भारत की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार निर्वाचित राष्ट्रपति नहीं थे। मुहम्मद हिदायतुल्लाह, भारत के पहले मुस्लिम मुख्य न्यायाधीश थे। उन्होंने दो अवसरों पर भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्यभार संभाला था। इसके साथ ही वो एक पूरे कार्यकाल के लिए भारत के छठे [[उपराष्ट्रपति]] भी रहे। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
मुहम्मद हिदायतुल्लाह के पुरखे मूलत: [[बनारस]] के रहने वाले थे जिनकी गिनती शिक्षित विद्धानों में होती थी। मुहम्मद हिदायतुल्लाह का जन्म [[17 दिसम्बर]] [[1905]] को [[नागपुर]] ([[महाराष्ट्र]]) में हुआ था। '''इनके दादा श्री मुंशी कुदरतुल्लाह''' बनारस में वकील का पेशा सम्पादित करते थे जबकि '''इनके पिता ख़ान बहादुर हाफ़िज विलायतुल्लाह''' आई.एस.ओ. मजिस्ट्रेट मुख्यालय में तैनात थे। इनके पिता काफ़ी प्रतिभाशाली थे और प्रत्येक शैक्षिक इम्तहान में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते थे। इनके पिता हाफ़िज विलायतुल्लाह [[1928]] में भाण्डरा से डिप्टी कमिश्नर एवं डिस्ट्रिक्ट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। मुहम्मद हिदायतुल्लाह के दो भाई और एक बहन थी। उनमें सबसे छोटे यही थे। मुहम्मद हिदायतुल्लाह की माता का नाम मुहम्मदी बेगम था जिनका ताल्लुक [[मध्य प्रदेश]] के एक धार्मिक परिवार से था, जो हंदिया में निवास करता था। मुहम्मद हिदायतुल्लाह की माता का निधन [[31 जुलाई]], [[1937]] को हुआ था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरकारी सेवा में रहते हुए ब्रिटिश सरकार ने श्री हिदायतुल्लाह के पिता को '''ख़ान बहादुर''' की उपाधि, '''केसरी हिन्द''' पदक, '''भारतीय सेवा सम्मान''' और '''सेंट जोंस एम्बुलेंस''' का बैज प्रदान किया था। इनके पिता अखिल भारतीय स्तर के कवि भी थे और मात्र 9 वर्ष की उम्र में ही इन्हें विद्वत्ता की प्रतीक मुस्लिम पदवी '''हाफ़िज''' की प्राप्ति हो गई थी। उन्होंने [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] एवं [[उर्दू भाषा]] में कविताएँ लिखी। [[मुंबई]] के कुतुब प्रकाशन ने इनकी कविताओं का संग्रह 'सोज-ए-गुदाज' के नाम से प्रकाशित किया था। इनके पिता की दूसरी पुस्तक 'तामीर-ए-हयात' शीर्षक से प्रकाशित हुई, जो गंभीर दार्शनिक पद्य रूप में थी। हिदायतुल्लाह के पिता 6 वर्षों तक विधायिका परिषद के सदस्य भी रहे। मुहम्मद हिदायतुल्लाह के पिता का निधन [[नवम्बर]], [[1949]] को हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
हिदायतुल्लाह का परिवार शिक्षा से रोशन था और उसके महत्त्व को भी समझता था। इस कारण हिदायतुल्लाह एवं उनके दोनों भाई इकरामुल्लाह और अहमदुल्लाह को भी अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का मौक़ा शुरू से ही मिला। उस समय उच्च कोटि के स्कूलों में ही गणवेश पद्धति थी। हिदायतुल्लाह ने जीवन के 6 आरंभिक वर्ष [[नागपुर]] में ही व्यतीत किए। [[1921]] में यह मैट्रिक परीक्षा हेतु योग्यता अर्जित कर चुके थे। लेकिन इन्हें 1921 में मैट्रिक परीक्षा में बैठने का अवसर इस कारण नहीं प्राप्त हुआ, क्योंकि उस समय इनकी उम्र 16 वर्ष पूरी नहीं हुई थी। तब यह नियम था कि मैट्रिक की परीक्षा वही विद्यार्थी दे सकता है, जिसने 16 वर्ष की उम्र प्राप्त कर ली हो। इस कारण हिदायतुल्लाह ने [[1922]] में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। तब यह [[रायपुर]] के सरकारी स्कूल में थे और परीक्षा में प्रथम आने के कारण इन्हें 'फिलिप्स स्कॉलरशिप' प्राप्त हुई। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वर्ण पदक&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
हिदायतुल्लाह ने आगे की पढ़ाई के लिए मॉरिस कॉलेज में दाखिला लिया और कला की स्नातक स्तरीय परीक्षा दी। इस परीक्षा में इन्हें दूसरा स्थान प्राप्त हुआ। यह एक नम्बर से प्रथम स्थान पाने से वंचित रह गए तथापि इन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। सन [[1926]] में हिदायतुल्लाह अपने भाई अहमदुल्लाह के साथ [[लंदन]] गए। वहाँ उन्होंने कुछ इम्तहान दिए। उसके बाद [[1927]] में ट्रिनिटी कॉलेज कैम्ब्रिज में क़ानून विषय में दाखिला ले लिया। इन्हें पढ़ने का शौक़ था। इस कारण [[अंग्रेज़ी]] को भी इन्होंने अतिरिक्त विषय के रूप में लिया। फिर [[जून]], [[1930]] में भारत आने से पूर्व उन्होंने वकालत की परीक्षा 'लिंकंस इन्न' से उत्तीर्ण की। लेकिन वह वकालत की उच्च शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;हिदायतुल्लाह की इच्छा&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
भारत आने के बाद हिदायतुल्लाह ने [[1930]] से [[1936]] तक नागपुर हाई कोर्ट में प्राइवेट प्रैक्टिस की। इन छह वर्षों में बतौर एडवोकेट इन्होंने काफ़ी ख्याति अर्जित की। उनकी इच्छा थी कि वह जीवन में अध्यापन का कार्य करें। भाग्य ने एम. हिदायतुल्लाह को यह अवसर भी [[1934]] से [[1942]] तक प्रदान किया। वह पार्ट टाइम प्रोफ़ेसर के रूप में नागपुर विश्वविद्यालय में क़ानून विषय का अध्यापन करने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिदायतुल्लाह बेहद सरलता एवं मनोरंजकता के साथ कक्षा में लेक्चर्स देते थे। इनके विद्यार्थियों को इनके लेक्चर्स काफ़ी प्रभावित करते थे। इनके साथी व्याख्याता भी इन्हें काफ़ी पसंद करते थे। कुछ समय उपरांत वह नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा संचालित विधि संकाय के डीन भी बन गए। बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि हमारे पूर्व [[प्रधानमंत्री]] [[नरसिंह राव पी. वी.|पी.वी. नरसिम्हाराव]] भी वहाँ इनके विद्यार्थी थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए मुहम्मद हिदायतुल्लाह ने जीवन में ऊँचे मुकाम हासिल किए। वह नागपुर हाई कोर्ट में [[1936]] से [[1942]] तक एडवोकेट तथा 1942 से [[1943]] तक सरकारी वकील रहे। इस प्रकार तरक्की करते हुए यह ब्रिटिश सल्तनत के समय [[24 जून]] [[1946]] को नागपुर हाई कोर्ट के कार्यवाहक जज भी बने। इन्हें [[13 अगस्त]] 1946 को परम्परागत रूप से जज बनाया गया और [[1954]] तक यह इस पद पर रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दाम्पत्य जीवन==&lt;br /&gt;
[[5 मई]] [[1948]] को एम. हिदायतुल्लाह ने 43 वर्ष की उम्र में एक [[हिन्दू]] युवती पुष्पा के साथ अंतर्जातीय विवाह कर लिया। पुष्पा अच्छे खानदान से थीं और उनके पिता ए. एन. शाह (आई.सी.एस. चेयरमैन) अखिल भारतीय इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल थे। इस विवाह का नागपुर में तत्कालीन परिस्थितियों में काफ़ी सम्मान हुआ और समाज के सभी वर्गों ने दोनों के परिवारों को हार्दिक शुभकामनाएँ भी दीं।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
शादी के अगले ही वर्ष हिदायतुल्लाह को पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम अरशद रखा गया। दूसरी संतान के रूप में इन्हें पुत्री हुई, जिसका नाम अवनि रखा गया। लेकिन [[9 जून]] [[1960]] को पुत्री अवनि की मृत्यु हो गई। बाद में अरशद भी एक सफल एडवोकेट बने और उनका विवाह देशपंत की भांजी नयनतारा के साथ [[1977]] में सम्पन्न हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्यावसायिक जीवन==&lt;br /&gt;
[[1956]] तक एम. हिदायतुल्लाह नागपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पद पर थे। इसके पूर्व यह स्कूल कोड कमेटी और कोर्ट फी रिवीजन कमेटी के प्रभारी भी रहे। [[1 नवम्बर]] [[1956]] को जब राज्यों के पुनर्गठन का कार्य सम्पन्न हुआ तो उन्हें [[जबलपुर]] ([[मध्य प्रदेश]]) उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। वहाँ उन्होंने 25 माह तक उस पद पर कार्य किया। [[1958]] में यह उच्चतम न्यायालय की बैंच में आ गए और जज का ओहदा प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कम उम्र के मुख्य न्यायाधीश&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
इस प्रकार [[1942]] तक ही एम. हिदायतुल्लाह के व्यक्तितत्व के कई पहलू सामने आ गए थे। यह शिक्षाविद थे, ज्यूरिस्ट थे, सबसे कम उम्र के सरकारी वकील थे और एडवोकेट जनरल भी थे। [[1954]] में यह हाई कोर्ट के सबसे कम उम्र के मुख्य न्यायाधीश भी बने। लेकिन इनके जीवन को सर्वोच्चता प्रदान करने वाला सौभाग्यशाली दिन तो [[25 फ़रवरी]] [[1968]] का था, जब यह उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार उच्च पंक्ति के वकील से एस. हिदायतुल्लाह ने न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च पद प्राप्त किया। देश के विभाजन के बाद इन्हें [[पाकिस्तान]] ले जाने के लिए लुभाने की भी कोशिशें की गई थीं। इन्हें भारत में ज़िन्दगी खो देने का भय भी दिखाया गया था, लेकिन भारत का मुख्य न्यायाधीश बनकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि धार्मिक आधार पर मुस्लिमों के मन में जो आशंकाएँ थीं, वह सर्वथा निर्मूल थीं।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;न्यायाधीश के रूप में&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
एक जज के रूप में हिदायतुल्लाह के कार्यकाल का आरंभ [[24 जून]] 1946 से आरंभ हुआ जो [[16 दिसम्बर]] [[1970]] तक जारी रहा। भारत में इस पद पर रहते हुए किसी भी अन्य व्यक्ति ने इतना लम्बा कार्यकाल नहीं गुज़ारा। सेवानिवृत्त होने के दो दिन बाद यह [[मुंबई]] चले गए। [[1971]] में इन्होंने बेलग्रेड में विश्व के जजों की असेम्बली में शिरकत की। [[रवीन्द्रनाथ टैगोर]] और [[पण्डित नेहरू]] के बाद इन्हें ही '''नाइट ऑफ़ मार्क ट्वेन''' की उपाधि [[1972]] में [[अमेरिका]] की इंटरनेशनल मार्क ट्वेन सोसाइटी ने प्रदान की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कार्यवाहक राष्ट्रपति पद पर==&lt;br /&gt;
भारत के ज्ञानी संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति निर्वाचन के संबंध में तो आवश्यक नियम बनाए थे, लेकिन उन्होंने एक भूल कर दी थी। उन्होंने [[उपराष्ट्रपति]] को राष्ट्रपति पद का दावेदार मान लिया, यदि किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाता है तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति पद किसे और कैसे प्रदान किया जाए? यह स्थिति [[3 मई]], [[1969]] को [[डॉ. ज़ाकिर हुसैन]] के राष्ट्रपति पद पर रहते हुए मृत्यु होने से उत्पन्न हुई। तब [[वाराहगिरि वेंकट गिरि]] को आनन-फानन में कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया, जिसका संविधान में प्रावधान था। लेकिन भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति पद हेतु निर्वाचन किया जाता है। कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने के बाद भी श्री [[वी.वी गिरि]] राष्ट्रपति का चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन इसके लिए वह कार्यवाहक राष्ट्रपति अथवा उपराष्ट्रपति पद का त्याग करके ही उम्मीदवार बन सकते थे। ऐसी स्थिति में दो संवैधानिक प्रश्न उठ खड़े हुए जिसके बारे में संविधान में कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। प्रथम प्रश्न यह था कि कार्यवाहक राष्ट्रपति रहते हुए श्री वी.वी गिरि अपना त्यागपत्र किसके सुपुर्द करें और द्वितीय प्रश्न था कि वह किस पद का त्याग करें- उपराष्ट्रपति पद का अथवा कार्यवाहक राष्ट्रपति का? तब वी.वी. गिरि ने विशेषज्ञों से परामर्श करके उपराष्ट्रपति पद से [[20 जुलाई]] [[1969]] को दिन के 12 बजे के पूर्व अपना त्यागपत्र दे दिया। यह त्यागपत्र भारत के राष्ट्रपति को सम्बोंधित किया गया था। यहाँ यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि कार्यवाहक राष्ट्रपति पद पर वह [[20 जुलाई]], [[1969]] के प्रात: 10 बजे तक ही थे। यह सारा घटनाक्रम इस कारण सम्पादित हुआ क्योंकि [[28 मई]] 1969 को [[संसद]] की सभा आहूत की गई और अधिनियम 16 के अंतर्गत यह क़ानून बनाया गया कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों की अनुपस्थिति में भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा इनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण कराई जा सकती है। इसी परिप्रेक्ष्य में नई व्यवस्था के अंतर्गत यह सम्भव हो पाया कि राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति दोनों का पद रिक्त रहने की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया जा सकता है। इस व्यवस्था के पश्चात्त सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश मुहम्मद हिदायतुल्लाह भारत के नए कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण कर सके। इस प्रकार 1969 को पारित अधिनियम 16 के अनुसार रविवार [[20 जुलाई]] [[1969]] को प्रात:काल 10 बजे [[राष्ट्रपति भवन]] के अशोक कक्ष में इन्हें कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई गई। कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने से पूर्व एम. हिदायतुल्लाह को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद छोड़ना पड़ा था। तब उस पद पर जे. सी. शाह को नया कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। इन्हीं कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय ने एम. हिदायतुल्लाह को कार्यवाहक राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई। वह 35 दिन तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के पद पर रहे। 20 जुलाई 1969 के मध्याह्न से [[24 अगस्त]] 1969 के मध्याह्न तक का समय इनके कार्यवाहक राष्ट्रपति वाला समय था। इस प्रकार अप्रत्याशित परिस्थिति के चलते इन्हें कार्यवाहक राष्ट्रपति का पदभार संभालना पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपराष्ट्रपति==&lt;br /&gt;
[[31 अगस्त]] [[1979]] को श्री हिदायतुल्लाह को सर्वसम्मति से भारत का उपराष्ट्रपति चुना गया। इन्होंने अपना उपराष्ट्रपति कार्यकाल 31 अगस्त [[1984]] की अवधि तक पूर्ण किया। 1979 से 1984 तक उपराष्ट्रपति रहते हुए वह जामिया मिलिया इस्लामिया, [[दिल्ली]] और [[पंजाब]] विश्वविद्यालयों के कुलपति भी रहे। [[4 अक्टूबर]] [[1991]] को इन्हें भारतीय विद्या परिषद की मानद सदस्यता भी दी गई। इस प्रकार इन्होंने प्रत्येक पद को पूर्ण गरिमा प्रदान की। &lt;br /&gt;
उपराष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूर्ण करने के बाद एम. हिदायतुल्लाह ने आज़ाद पंछी जैसी खुशी महसूस की। उन्होंने एक बहुत बड़े दायित्व को निष्ठापूर्वक निभाया था। इस दौरान यह उपराष्ट्रपति  होने के कारण राज्यसभा के सभापति भी थे। लेकिन इन पर कभी भी पद के दुरुपयोग अथवा पक्षपात करने का आरोप नहीं लगा। राज्यसभा में यह सभी सदस्यों के चहेते मित्र की भांति रहे। अवकाश ग्रहण कर लेने के बाद जाने-माने राजनेताओं ने इनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की। जब यह उपराष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूर्ण करने के बाद मुंबई रवाना हुए तो [[नई दिल्ली]] रेलवे स्टेशन पर उन्हें भावभीनी विदाई देने वालों में प्रधानमंत्री [[इंदिरा गाँधी|श्रीमती इंदिरा गाँधी]], उपराष्ट्रपति [[आर. वेंकटरमण]], गृहमंत्री नरसिम्हाराव और उच्च अधिकारीगण सम्मिलित थे।&lt;br /&gt;
==उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
[[29 सितम्बर]] [[1984]] को [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] के विशेष दीक्षांत समारोह में हिदायतुल्लाह को '''डॉक्टर ऑफ़ सिविल लॉ''' की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। इन्होंने अपनी पैतृक परम्परा का निर्वाह करते हुए परदादा, दादा एवं पिता की भांति उपयोगी पुस्तकों का भी सृजन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
हिदायतुल्लाह ने अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं। &lt;br /&gt;
*'दि साउथ वेस्ट अफ्रीका केस', &lt;br /&gt;
*'डेमोक्रेसी इन इण्डिया एण्द द ज्यूडिशियन प्रोसेस', &lt;br /&gt;
*'ए जज्स् मिसेलनि' ([[1972]] में प्रकाशित) &lt;br /&gt;
*'ए जज्स् मिसेलनि सेकंड सीरिज' ([[1979]] में प्रकाशित), &lt;br /&gt;
*'ए जज्स् मिसेलनि थर्ड सीरिज' ([[1982]] में प्रकाशित), &lt;br /&gt;
*'कांसटिट्यूशनल लॉ ऑफ़ इण्डिया' (तीन खण्डों में) , &lt;br /&gt;
*'तहरीर-ओ-ताबीर' (उर्दू के भाषण), &lt;br /&gt;
*'राइट टू प्रॉपर्टी एण्ड द इण्डियन कांसटिट्यूशन', &lt;br /&gt;
*'नौबार-ए-सिकन्दरी', &lt;br /&gt;
*'यू एस. ए. एण्ड इण्डिया', &lt;br /&gt;
*'ज्यूडीशियनल मेथड्स', &lt;br /&gt;
*'मुल्लास मुहम्मडन लॉ' (16 वां, 17 वां तथा 18 वां संस्करण) और &lt;br /&gt;
*'द फिफ्थ एण्द द सिक्स्थ शिड्यूल्स टू द कांसटिट्यूशन ऑफ़ इण्डिया।'&lt;br /&gt;
हिदायतुल्लाह ने अपनी जीवनी 'माई ओन बॉसवैल' भी लिखी जो बेहद दिलचस्प भाषा में थी। यह पुस्तक एक सामान्य व्यक्ति से लेकर वकील तक के लिए मनोरंजन से परिपूर्ण थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
मानव जीवन की अंतिम त्रासदी यह है कि वह नश्वर है, शाश्वत नहीं। एम. हिदायतुल्लाह ने भी ईश्वर की नश्वरता के नियम का अनुपालन करते हुए [[18 सितम्बर]] [[1992]] को हृदयाघात के कारण अपना शरीर त्याग दिया। इनका निधन [[मुंबई]] में हुआ था। एक इंसान के रूप में इनका जीवन मानव जाति के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा। वह एक ऐसी शख़्सियत थे, जिसके सम्पर्क में आया व्यक्ति इन्हें कभी नहीं भूल सकता था। भारत माता के इस सच्चे सपूत को उसके मानवीय गुणों के कारण याद किया जाता रहेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार= &lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के विद्वान]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राष्ट्रपति]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>प्रतिभा पाटिल</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Pratibha-Patil.jpg|thumb|प्रतिभा पाटिल&amp;lt;br /&amp;gt;Pratibha Patil]]&lt;br /&gt;
'''कार्यकाल-[[25 जुलाई]] [[2007]] से'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*प्रतिभा देवीसिंह पाटिल स्वतंत्र [[भारत]] के 60 साल के इतिहास में पहली महिला राष्ट्रपति हैं।&lt;br /&gt;
*[[19 दिसंबर]] 1934 को [[महाराष्ट्र]] के जलगांव ज़िले में जन्मी प्रतिभा पाटिल ने [[मुंबई]] के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से क़ानून की पढाई की। &lt;br /&gt;
*वे टेबल टेनिस की अच्छी खिलाड़ी थीं। &lt;br /&gt;
*[[महाराष्ट्र]] सरकार में वे राज्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री रहीं। &lt;br /&gt;
*1986 में वे राज्यसभा की उपसभापति, 1989-1990 में महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस की प्रमुख तथा 2004 में [[राजस्थान]] की [[राज्यपाल]] बनीं। &lt;br /&gt;
*25 जुलाई 2007 को वे [[भारत]] की राष्ट्रपति चुनी गईं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
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[[Category:राजनेता]][[Category:राजनीति कोश]]&lt;br /&gt;
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		<title>अब्दुल कलाम</title>
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		<updated>2011-05-25T12:45:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Abdul-Kalam.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=अवुल पकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=अब्दुल कलाम&lt;br /&gt;
|जन्म=[[15 अक्तूबर]], [[1931]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[रामेश्वरम]], [[तमिलनाडु]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|मृत्यु=&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=&lt;br /&gt;
|पद=[[भारत]] के 11वें [[राष्ट्रपति]], वैज्ञानिक &lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=[[25 जुलाई]] [[2002]] से 25 जुलाई [[2007]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेकनालॉजी&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]] (1931), पद्म भूषण (1981)&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|15:49, 4 अक्टूबर 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवुल पकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''कार्यकाल- 25 जुलाई [[2002]] से 25 जुलाई [[2007]]'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
डॉक्टर ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारतीय गणतंत्र के ग्यारहवें निर्वाचित [[राष्ट्रपति]] के रूप में जाने जाते हैं। यह एक गैर राजनीतिक व्यक्ति रहे है। [[विज्ञान]] की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण ही [[राष्ट्रपति भवन]] के द्वार इनके लिए स्वत: खुल गए। जो व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है, उसके लिए सब सहज हो जाता है और कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। अब्दुल कलाम इस उद्धरण का प्रतिनिधित्व करते नज़र आते हैं। अब्दुल कलाम 77 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुके हैं। इन्होंने विवाह नहीं किया है। इनकी जीवन गाथा किसी रोचक उपन्यास के नायक की कहानी से कम नहीं है। चमत्कारिक प्रतिभा के धनी अब्दुल कलाम का व्यक्तित्व इतना उन्नत है कि वह सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों के व्यक्ति नज़र आते हैं। यह एक ऐसे स्वीकार्य भारतीय हैं, जो सभी के लिए एक महान आदर्श बन चुके हैं। विज्ञान की दुनिया से देश का प्रथम नागरिक बनना कपोल कल्पना मात्र नहीं है क्योंकि यह एक जीवित प्रणेता की सत्यकथा है।&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
अब्दूल कलाम का पूरा नाम डॉक्टर अवुल पाकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम है। इनका जन्म [[15 अक्टूबर]] [[1931]] को [[रामेश्वरम]] [[तमिलनाडु]] में हुआ। द्वीप जैसा छोटा सा शहर प्राकृतिक छटा से भरपूर था। शायद इसीलिए अब्दुल कलाम जी का प्रकृति से बहुत जुड़ाव रहा है। रामेश्वरम का प्राकृतिक सौन्दर्य समुद्र की निकटता के कारण सदैव बहुत दर्शनीय रहा है। इनके पिता जैनुलाब्दीन न तो ज़्यादा पढ़े-लिखे थे, न ही पैसे वाले थे। वे नाविक थे, और बहुत नियम के पक्के थे। इनके पिता मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते थे। इनके संबंध रामेश्वरम के हिन्दू नेताओं तथा अध्यापकों के साथ काफ़ी स्नेहपूर्ण थे। अब्दुल कलाम ने अपनी आरंभिक शिक्षा जारी रखने के लिए अख़बार वितरित करने का कार्य भी किया था। &lt;br /&gt;
==सयुंक्त परिवार==&lt;br /&gt;
अब्दुल कलाम सयुंक्त परिवार में रहते थे। परिवार की सदस्य संख्या का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह स्वयं पाँच भाई एवं पाँच बहन थे और घर में तीन परिवार रहा करते थे। इनका कहना था कि वह घर में तीन झूले (जिसमें बच्चों को रखा और सुलाया जाता है) देखने के अभ्यस्त थे। इनकी दादी माँ एवं माँ द्वारा ही पूरे परिवार की परवरिश की जाती थी। घर के वातावरण में प्रसन्नता और वेदना दोनों का वास था।&lt;br /&gt;
इनके घर में कितने लोग थे और इनकी मां कितने लोगों का खाना बनाती थीं। क्योंकि घर में तीन भरे-पूरे परिवारों के साथ-साथ बाहर के लोग भी हमारे साथ खाना खाते थे। इनके घर में खुशियाँ भी थीं, तो मुश्किलें भी थी। अब्दुल कलाम के जीवन पर इनके पिता का बहुत प्रभाव रहा। वे भले ही पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनकी लगन और उनके दिए संस्कार अब्दुल कलाम के बहुत काम आए। अब्दुल कलाम के पिता चारों वक़्त की नमाज़ पढ़ते थे और जीवन में एक सच्चे इंसान थे। &lt;br /&gt;
==जीवन की घटना==&lt;br /&gt;
अब्दुल कलाम के जीवन की एक घटना है, कि यह भाई-बहनों के साथ खाना खा रहे थे। इनके यहाँ चावल खूब होता था, इसलिए खाने में वही दिया जाता था, रोटियाँ कम मिलती थीं। जब इनकी मां ने इनको रोटियाँ ज़्यादा दे दीं, तो इनके भाई ने एक बड़े सच का खुलासा किया। इनके भाई ने अलग ले जाकर इनसे कहा कि मां के लिए एक-भी रोटी नहीं बची और तुम्हें उन्होंने ज़्यादा रोटियाँ दे दीं। वह बहुत कठिन समय था और उनके भाई चाहते थे कि अब्दुल कलाम ज़िम्मेदारी का व्यवहार करें। तब यह अपने जज़्बातों प काबू नहीं पा सके और दौड़कर माँ के गले से जा लगे। उन दिनों कलाम कक्षा पाँच के विद्यार्थी थे। इन्हें परिवार में सबसे अधिक स्नेह प्राप्त हुआ क्योंकि यह परिवार में सबसे छोटे थे। तब घरों में विद्युत नहीं थी और केरोसिन तेल के दीपक जला करते थे, जिनका समय रात्रि 7 से 9 तक नियत था। लेकिन यह अपनी माता के अतिरिक्त स्नेह के कारण पढ़ाई करने हेतु रात के 11 बजे तक दीपक का उपयोग करते थे। अब्दुल कलाम के जीवन में इनकी माता का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। इनकी माता ने 92 वर्ष की उम्र पाई। वह प्रेम, दया और स्नेह की प्रतिमूर्ति थीं। उनका स्वभाव बेहद शालीन था। इनकी माता पाँचों समय की नमाज़ अदा करती थीं। जब इन्हें नमाज़ करते हुए अब्दुल कलाम देखते थे तो इन्हें रूहानी सुकूल और प्रेरणा प्राप्त होती थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस घर अब्दुल कलाम का जन्म हुआ, वह आज भी रामेश्वरम में मस्जिद मार्ग पर स्थित है। इसके साथ ही इनके भाई की कलाकृतियों की दुकान भी संलग्न है। यहाँ पर्यटक इसी कारण खिंचे चले आते हैं, क्योंकि अब्दुल कलाम का आवास स्थित है। [[1964]] में 33 वर्ष की उम्र में डॉक्टर अब्दुल कलाम ने जल की भयानक विनाशलीला देखी और जल की शक्ति का वास्तविक अनुमान लगाया। चक्रवाती तूफ़ान में पायबन पुल और यात्रियों से भरी एक रेलगाड़ी के साथ-साथ अब्दुल कलाम का पुश्तैनी गाँव धनुषकोड़ी भी बह गया था। जब यह मात्र 19 वर्ष के थे, तब द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका को भी महसूस किया। युद्ध का दवानल रामेश्वरम के द्वार तक पहुँचा था। इन परिस्थितियों में भोजन सहित सभी आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विद्यार्थी जीवन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Abdul-Kalam-2.jpg|thumb|250px|अब्दुल कलाम&amp;lt;br /&amp;gt; Abdul Kalam]]&lt;br /&gt;
श्री अब्दुल कलाम जब आठ- नौ साल के थे, तब से सुबह चार बजे उठते थे और स्नान करने के बाद गणित के अध्यापक स्वामीयर के पास गणित पढ़ने चले जाते थे। स्वामीयर की यह विशेषता थी कि जो विद्यार्थी स्नान करके नहीं आता था, वह उसे नहीं पढ़ाते थे। स्वामीयर एक अनोखे अध्यापक थे और पाँच विद्यार्थियों को प्रतिवर्ष नि:शुल्क ट्यूशन पढ़ाते थे। इनकी माता इन्हें उठाकर स्नान कराती थीं और नाश्ता करवाकर ट्यूशन पढ़ने भेज देती थीं। अब्दुल कलाम ट्यू्शन पढ़कर साढ़े पाँच बजे वापस आते थे। उसके बाद अपने पिता के साथ नमाज़ पढ़ते थे। फिर क़ुरान शरीफ़ का अध्ययन करने के लिए वह अरेशिक स्कूल (मदरसा) चले जाते थे। इसके पश्चात्त अब्दुल कलाम रामेश्वरम के रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर जाकर समाचार पत्र एकत्र करते थे। इस प्रकार इन्हें तीन किलोमीटर जाना पढ़ता था। उन दिनों धनुषकोड़ी से मेल ट्रेन गुजरती थी, लेकिन वहाँ उसका ठहराव नहीं होता था। चलती ट्रेन से ही अख़बार के बण्डल रेलवे स्टेशन पर फेंक दिए जाते थे। अब्दुल कलाम अख़बार लेने के बाद रामेश्वरम शहर की सड़कों पर दौड़-दौड़कर सबसे पहले उसका वितरण करते थे। अब्दुल कलाम अपने भाइयों में छोटे थे, दूसरे घर के लिए थोड़ी कमाई भी कर लेता थे, इसलिए इनकी मां का प्यार इन पर कुछ ज़्यादा ही था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री अब्दुल कलाम अख़बार वितरण का कार्य करके प्रतिदिन प्रात: 8 बजे घर लौट आते थे। इनकी माता अन्य बच्चों की तुलना में इन्हें अच्छा नाश्ता देती थीं, क्योंकि यह पढ़ाई और धनार्जन दोनों कार्य कर रहे थे। शाम को स्कूल से लौटने के बाद यह पुन: रामेश्वरम जाते थे ताकि ग्राहकों से बकाया पैसा प्राप्त कर सकें। इस प्रकार वह एक किशोर के रूप में भाग-दौड़ करते हुए पढ़ाई और धनार्जन कर रहे थे। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;अब्दुल कलाम के शब्दों में&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
अध्यापकों के संबंध में अब्दुल कलाम काफ़ी खुशक़िस्मत थे। इन्हें शिक्षण काल में सदैव दो-एक अध्यापक ऐसे प्राप्त हुए, जो योग्य थे और उनकी कृपा भी इन पर रही। यह समय [[1936]] से [[1957]] के मध्य का था। ऐसे में इन्हें अनुभव हुआ कि वह अपने अध्यापकों द्वारा आगे बढ़ रहे हैं। अध्यापक की प्रतिष्ठा और सार्थकता अब्दुल कलाम के शब्दों में प्रस्तुत है:-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''&amp;lt;u&amp;gt;प्राथमिक स्कूल&amp;lt;/u&amp;gt;'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह 1936 का वर्ष था। मुझे याद है कि पाँच वर्ष कि अवस्था में रामेश्वरम के पंचायत प्राथमिक स्कूल में मेरा दीक्षा-संस्कार हुआ था। तब मेरे एक शिक्षक मुत्थु अय्यर मेरी ओर विशेष ध्यान देते थे क्योंकि मैं कक्षा में अपने कार्य में बहुत अच्छा था। वह मुझसे बहुत प्रभावित थे। एक दिन वह मेरे घर आए और मेरे पिता से कहा कि मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा हूँ। यह सुनकर मेरे घर के सभी लोग बहुत खुश हुए और मेरी पसंद की मिठाई मुझे खिलाई। एक विशिष्ठ घटना जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता, वह थी- कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने की। एक बार मैं स्कूल नहीं जा सका तो मुत्थु जी मेरे घर आए और उन्होंने पिताजी से पूछा कि कोई समस्या तो नहीं है और मैं आज स्कूल क्यों नहीं आया? साथ ही उन्होंने यह भी पूछा कि क्या वह कोई सहायता कर सकते हैं? उस दिन मुझे ज्वर हो गया था। तब मुत्थु जी ने मेरी हस्तलिपि के बारे में इंगित किया जो काफ़ी खराब थी। उन्होंने मुझे तीन पृष्ठ प्रतिदिन अभ्यास करने का निर्देश दिया। उन्होंने मेरे पिताजी से कहा कि मैं प्रतिदिन यह अभ्यास करूँ। मैंने यह अभ्यास नियमित रूप से किया। मुत्थु जी के कार्यों को देखते हुए बाद में मेरे पिताजी ने कहा था कि वह एक अच्छे व्यक्ति ही नहीं बल्कि हमारे परिवार के भी अच्छे मित्र हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''&amp;lt;u&amp;gt;प्रकृति&amp;lt;/u&amp;gt;'''&lt;br /&gt;
====प्रेरणा====&lt;br /&gt;
अब्दुल कलाम एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी में आए, तो इसके पीछे इनके पाँचवीं कक्षा के अध्यापक सुब्रहमण्यम अय्यर की प्रेरणा जरुर थी। वह हमारे स्कूल के अच्छे शिक्षकों में से एक थे। एक बार उन्होंने कक्षा में बताया कि पक्षी कैसे उड़ता है? मैं यह नहीं समझ पाया था, इस कारण मैनें इंकार कर दिया था। तब उन्होंने कक्षा के अन्य बच्चों से पूछा तो उन्होंने भी अधिकांशत: इंकार ही किया। लेकिन इस उत्तर से अय्यर जी विचलित नहीं हुए। अगले दिन अय्यर जी इस संदर्भ में हमें समुद्र के किनारे ले गए। उस प्राकृतिक दृश्य में कई प्रकार के पक्षी  थे, जो सागर के किनारे उतर रहे थे और उड़ रहे थे। तत्पश्चात्त उन्होंने समुद्री पक्षियों को दिखाया, जो 10-20 के झुण्ड में उड़ रहे थे। उन्होंने समुद्र के किनारे मौजूद पक्षियों के उड़ने के संबंध में प्रत्येक क्रिया को साक्षात अनुभव के आधार पर समझाया। हमने भी बड़ी बारीकी से पक्षियों के शरीर की बनावट के साथ उनके उड़ने का ढंग भी देखा। इस प्रकार हमने व्यावहारिक प्रयोग के माध्यम से यह सीखा कि पक्षी किस प्रकार उड़ पाने में सफल होता है। इसी कारण हमारे यह अध्यापक महान थे वह चाहते तो हमें मौखिक रूप से समझाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर सकते थे लेकिन उन्होंने हमें व्यावहारिक उदाहरण के माध्यम से समझाया और कक्षा के हम सभी बच्चे समझ भी गए। मेरे लिए यह मात्र पक्षी की उड़ान तक की ही बात नहीं थी। पक्षी की वह उड़ान मुझमें समा गई थी। मुझे महसूस होता था कि मैं रामेश्वरम के समुद्र तट पर हूँ। उस दिन के बाद मैंने सोच लिया था कि मेरी शिक्षा किसी न किसी प्रकार के उड़ान से संबंधित होगी। उस समय तक मैं नहीं समझा था कि मैं 'उड़ान विज्ञान' की दिशा में अग्रसर होने वाला हूँ। वैसे उस घटना ने मुझे प्रेरणा दी थी कि मैं अपनी ज़िंदगी का कोई लक्ष्य निर्धारित करूँ। उसी समय मैंने तय कर लिया था कि उड़ान में करियर बनाऊँगा। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Abdul-Kalam-3.jpg|thumb|left|अब्दुल कलाम&amp;lt;br /&amp;gt; Abdul Kalam]]&lt;br /&gt;
'''&amp;lt;u&amp;gt;उच्च शिक्षा&amp;lt;/u&amp;gt;'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन मैंने अपने अध्यापक श्री सिवा सुब्रहमण्यम अय्यर से पूछा कि श्रीमान! मुझे यह बताएं कि मेरी आगे की उन्नति उड़ान से संबंधित रहते हुए कैसे हो सकती है? तब उन्होंने धैर्यपूर्वक जवाब दिया कि मैं पहले आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करूँ, फिर हाई स्कूल। तत्पश्चात्त कॉलेज में मुझे उड़ान से संबंधित शिक्षा का अवसर प्राप्त हो सकता है। यदि मैं ऐसा करता हूँ तो उड़ान विज्ञान के साथ जुड़ सकता हूँ। इन सब बातों ने मुझे जीवन के लिए एक मंजिल और उद्देश्य भी प्रदान किया। जब मैं कॉलेज गया तो मैंने [[भौतिक विज्ञान]] विषय लिया। जब मैं अभियांत्रिकी की शिक्षा के लिए 'मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी' में गया तो मैंने '''एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग''' का चुनाव किया। इस प्रकार मेरी ज़िन्दगी एक 'रॉकेट इंजीनियर', 'एयरोस्पेस इंजीनियर' और 'तकनीकी कर्मी' की ओर उन्मुख हुई। वह एक घटना जिसके बारे में मेरे अध्यापक ने मुझे प्रत्यक्ष उदाहरण से समझाया था, मेरे जीवन का महत्त्वपूर्ण बिन्दु बन गई और अंतत: मैंने अपने व्यवसाय का चुनाव भी कर लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''&amp;lt;u&amp;gt;अद्वितीय व्याख्यान&amp;lt;/u&amp;gt;'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब मैं अपने गणित के अध्यापक प्रोफेसर दोदात्री आयंगर के विषय में चर्चा करना चाहूँगा। विज्ञान के छात्र के रूप में मुझे सेंट जोसेफ कॉलेज में देवता के समान एक व्यक्ति को प्रति सुबह देखने का अवसर प्राप्त होता था, जो विद्यार्थीयों को गणित पढ़ाया करते थे। बाद में मुझे उनसे गणित पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने मेरी प्रतिभा को बहुत हद तक निखारा। मैंने उनकी कक्षा में आधुनिक बीजगणित, सांख्यिकी और कॉंम्पलेक्स वेरिएबल्स का अध्ययन किया। [[1952]] में इन्होंने एक अद्वितीय व्याख्यान दिया, जो भारत के प्राचीन गणितज्ञों एवं खगोलविज्ञों के संबंध में था। इस व्याख्यान में इन्होंने भारत के चार गणितज्ञों एवं खगोलविज्ञों के बारे में बताया था, जो इस प्रकार थे- [[आर्यभट्ट]], [[श्रीनिवास रामानुजन]], [[ब्रह्मगुप्त]] और [[भास्कराचार्य]]। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके अलावा एम॰आई॰टी॰ प्रोफेसर श्रीनिवास (जो डायरेक्टर भी थे) का भी काफ़ी योगदान रहा अब्दुल कलाम की प्रतिभा निखारने में। इनके विषय में अब्दुल कलाम ने कहा था:- '''शिक्षक को एक प्रशिक्षक भी होना चाहिए- प्रोफेसर श्रीनिवासन की भाँति।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्यावसायिक जीवन==&lt;br /&gt;
[[1962]] में वे '[[भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन]]' में आये। डॉक्टर अब्दुल कलाम को प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह (एस.एल.वी. तृतीय) प्रक्षेपास्त्र बनाने का श्रेय हासिल है। जुलाई [[1980]] में इन्होंने [[रोहिणी उपग्रह]] को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित किया था। इस प्रकार भारत भी अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन गया। इसरो लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम को परवान चढ़ाने का श्रेय भी इन्हें प्रदान किया जाता है। डॉक्टर कलाम ने स्वदेशी लक्ष्य भेदी (गाइडेड मिसाइल्स) को डिजाइन किया। इन्होंने अग्नि एवं पृथ्वी जैसी मिसाइल्स को स्वदेशी तकनीक से बनाया था। डॉक्टर कलाम जुलाई [[1992]] से दिसम्बर [[1999]] तक रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा सुरक्षा शोध और विकास विभाग के सचिव थे। उन्होंने स्ट्रेटेजिक मिसाइल्स सिस्टम का उपयोग आग्नेयास्त्रों के रूप में किया। इसी प्रकार पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर विस्फोट भी परमाणु ऊर्जा के साथ मिलाकर किया। इस तरह भारत ने परमाणु हथियार के निर्माण की क्षमता प्राप्त करने में सफलता अर्जित की। डॉक्टर कलाम ने भारत के विकास स्तर को 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए एक विशिष्ट सोच प्रदान की। यह भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डॉक्टर कलाम ने साहित्यिक रूप से भी अपने शोध को चार उत्कृष्ट पुस्तकों में समाहित किया है, जो इस प्रकार हैं- 'विंग्स ऑफ़ फायर', 'इण्डिया 2020- ए विज़न फ़ॉर द न्यू मिलेनियम', 'माई जर्नी' तथा 'इग्नाटिड माइंड्स- अनलीशिंग द पॉवर विदिन इंडिया'। इन पुस्तकों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस प्रकार यह भारत के एक विशिष्ट वैज्ञानिक हैं, जिन्हें 30 विश्वविद्यालयों और संस्थानों से डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्राप्त हो चुकी है। इन्हें भारत के नागरिक सम्मान के रूप में [[1981]] में [[पद्म भूषण]], [[1990]] में [[पद्म विभूषण]], [[1997]] में [[भारत रत्न]] तथा अन्य सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजनीतिक जीवन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:A.P.J-Abdul-Kalam.jpg|thumb|250px|अब्दुल कलाम&amp;lt;br /&amp;gt; Abdul Kalam]]&lt;br /&gt;
यूं तो डॉक्टर अब्दुल कलाम राजनीतिक क्षेत्र के व्यक्ति नहीं हैं लेकिन राष्ट्रवादी सोच और राष्ट्रपति बनने के बाद भारत की कल्याण संबंधी नीतियों के कारण इन्हें कुछ हद तक राजनीतिक दृष्टि से सम्पन्न माना जा सकता है। इन्होंने अपनी पुस्तक 'इण्डिया 2020' में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया है। यह भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर राष्ट्र बनते देखना चाहते हैं और इसके लिए इनके पास एक कार्य योजना भी है। परमाणु हथियारों के क्षेत्र में यह भारत को सुपर पॉवर बनाने की बात सोचते रहे हैं। वह विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भी तकनीकी विकास चाहते हैं। डॉक्टर कलाम का कहना है कि 'सॉफ़्टवेयर' का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए ताकि अधिकाधिक लोग इसकी उपयोगिता से लाभांवित हो सकें। ऐसे में सूचना तकनीक का तीव्र गति से विकास हो सकेगा। वैसे इनके विचार शांति और हथियारों को लेकर विवादास्पद हैं। इस संबंध में इन्होंने कहा है- &amp;quot;2000 वर्षों के इतिहास में भारत पर 600 वर्षों तक अन्य लोगों ने शासन किया है। यदि आप विकास चाहते हैं तो देश में शांति की स्थिति होना आवश्यक है और शांति की स्थापना शक्ति से होती है। इसी कारण मिसाइलों को विकसित किया गया ताकि देश शक्ति सम्पन्न हो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति पद पर==&lt;br /&gt;
डॉक्टर अब्दुल कलाम भारत के ग्यारवें राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। इन्हें भारतीय जनता पार्टी समर्थित एन॰डी॰ए॰ घटक दलों ने अपना उम्मीदवार बनाया था जिसका वामदलों के अलावा समस्त दलों ने समर्थन किया। [[18 जुलाई]], 2002 को डॉक्टर कलाम को नब्बे प्रतिशत बहुमत द्वारा 'भारत का राष्ट्रपति' चुना गया था और इन्हें [[25 जुलाई]] [[2002]] को [[संसद भवन]] के अशोक कक्ष में राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई। इस संक्षिप्त समारोह में [[प्रधानमंत्री]] [[अटल बिहारी वाजपेयी]], उनके मंत्रिमंडल के सदस्य तथा अधिकारीगण उपस्थित थे। इनका कार्याकाल [[25 जुलाई]] [[2007]] को समाप्त हुआ। भारतीय जनता पार्टी में इनके नाम के प्रति सहमति न हो पाने के कारण यह दोबारा राष्ट्रपति नहीं बनाए जा सके। डॉक्टर अब्दुल कलाम व्यक्तिगत ज़िन्दगी में बेहद अनुशासनप्रिय हैं। यह शाकाहारी और मद्यत्यागी हैं। इन्होंने अपनी जीवनी 'विंग्स ऑफ़ फायद' भारतीय युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान करने वाले अंदाज में लिखी है। इनकी दूसरी पुस्तक 'गाइडिंग सोल्स- डायलॉग्स ऑफ़ द पर्पज ऑफ़ लाइफ' आत्मिक विचारों को उद्घाटित करती है इन्होंने [[तमिल भाषा]] में कविताऐं भी लिखी हैं। यह भी ज्ञात हुआ है कि दक्षिणी कोरिया में इनकी पुस्तकों की काफ़ी माँग है और वहाँ इन्हें बहुत अधिक पसंद किया जाता है।&lt;br /&gt;
==विशेषता==&lt;br /&gt;
*डॉक्टर अब्दुल कलाम ऐसे तीसरे राष्ट्रपति हैं जिन्हें '''भारत रत्न''' का सम्मान राष्ट्रपति बनने से पूर्व ही प्राप्त हुआ है, अन्य दो राष्ट्रपति [[सर्वपल्ली राधाकृष्णन]] और [[डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन]] हैं। &lt;br /&gt;
*यह प्रथम वैज्ञानिक हैं जो राष्ट्रपति बने हैं और प्रथम राष्ट्रपति भी हैं जो अविवाहित हैं। &lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त अब्दुल कलाम ही ऐसे एकमात्र व्यक्ति हैं जो राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद अभी जीवित हैं। इनके पूर्व के सभी राष्ट्रपति अब इस संसार में नहीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://books.google.co.in/books?id=4lkjP54x5_MC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false Karmyogi Kalaam]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
{{वैज्ञानिक}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:वैज्ञानिक]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत रत्न सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म विभूषण]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राष्ट्रपति]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म भूषण]]&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87._%E0%A4%86%E0%A4%B0._%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A3%E0%A4%A8&amp;diff=165848</id>
		<title>के. आर. नारायणन</title>
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		<updated>2011-05-25T12:45:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=K.R.Narayanan.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=कोच्चेरील रामन नारायणन&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[27 अक्टूबर]], [[1920]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[त्रावणकोर]], [[भारत]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=कोच्चेरिल रामन वेद्यार&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=उषा नारायणन&lt;br /&gt;
|संतान=चित्रा और अमृता&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[9 नवम्बर]], [[2005]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[नई दिल्ली]], [[भारत]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=&lt;br /&gt;
|पद=भारत के दसवें राष्ट्रपति, पत्रकार&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=[[25 जुलाई]], [[1997]] से 25 जुलाई, [[2002]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=प्राथमिक विद्यालय, सेंट मेरी हाई स्कूल, सी. एम. एस. स्कूल, त्रावणकोर विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातकोत्तर, बी. एस. सी. (इकोनामिक्स), एल. एस. ई.&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=वर्ल्ड स्टेट्समैन अवार्ड, 'डॉक्टर ऑफ़ साइंस, डॉक्टर ऑफ़ लॉस &lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=रचनाएँ&lt;br /&gt;
|पाठ 1='इण्डिया एण्ड अमेरिका एस्सेस इन अंडरस्टैडिंग', 'इमेजेस एण्ड इनसाइट्स' और 'नॉन अलाइमेंट इन कन्टैम्परेरी इंटरनेशनल निलेशंस'&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=राष्ट्रपति नियुक्त होने के बाद नारायणन ने एक नीति अथवा सिद्धान्त बना लिया था कि वह किसी भी पूजा स्थान या इबादतग़ाह पर नहीं जाएँगे-चाहे वह देवता का हो या देवी का। यह एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति रहे जिन्होंने अपने कार्यकाल में किसी भी पूजा स्थल का दौरा नहीं किया।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''कार्यकाल 25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
के. आर. नारायणन का पूरा नाम कोच्चेरील रामन नारायणन हैं। (जन्म- [[27 अक्टूबर]], [[1920]], [[त्रावणकोर]], [[भारत]], मृत्यु- [[9 नवम्बर]], [[2005]]) कोच्चेरील रामन नारायणन भारतीय गणराज्य के दसवें निर्वाचित राष्ट्रपति के रूप में जाने जाते हैं। यह प्रथम दलित [[राष्ट्रपति]] तथा प्रथम मलयाली व्यक्ति थे, जिन्हें देश का सर्वोच्च पद प्राप्त हुआ। इन्हें [[14 जुलाई]], [[1997]] को हुए राष्ट्रपति चुनाव में विजय प्राप्त हुई थी। श्री के. आर. नारायणन को कुल मतों का 95 प्रतिशत प्राप्त हुआ। मतगणना का कार्य [[17 जुलाई]], [[1997]] को सम्पन्न हुआ। भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त श्री टी. एन. शेषन इनके प्रतिद्वन्द्वी थे। [[25 जुलाई]], [[1997]] को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जे. एस. वर्मा ने श्री के. आर. नारायणन को राष्ट्रपति पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। इनका कार्यकाल [[25 जुलाई]], [[2002]] को समाप्त हुआ था।&lt;br /&gt;
==जन्म एवं परिवार==&lt;br /&gt;
श्री के. आर. नारायणन का जन्म 27 अक्टूबर, 1920 को हुआ था, जो सरकारी दस्तावेज़ों में उल्लिखित है। लेकिन सत्य यह है कि इनकी वास्तविक जन्मतिथि विवादों के घेरे में है। श्री नारायणन के चाचा इनके प्रथम दिन स्कूल गए थे और अनुमान से 27 अक्टूबर, 1920 इनकी जन्मतिथि लिखा दी थी। इनका जन्म पैतृक घर में हुआ था, जो कि एक कच्ची झोपड़ी की शक्ल में था। यह कच्ची झोपड़ी पेरुमथॉनम उझावूर ग्राम, त्रावणकोर में थी। वर्तमान में यह ग्राम ज़िला कोट्टायम ([[केरल]]) में विद्यमान है। श्री के. आर. नारायणन अपने पिता की सात सन्तानों में चौथे थे। इनके पिता का नाम कोच्चेरिल रामन वेद्यार था। यह भारतीय पद्धति के सिद्धहस्त आयुर्वेदाचार्य थे। इनके पूर्वज पारवान जाति से सम्बन्धित थे, जो कि नारियल तोड़ने का कार्य करता है। इनका परिवार काफ़ी ग़रीब था, लेकिन इनके पिता अपनी चिकित्सकीय प्रतिभा के कारण सम्मान के पात्र माने जाते थे। श्री नारायणन के चार भाई-बहन थे–के. आर. गौरी, के. आर. भार्गवी, के. आर. भारती और के. आर. भास्करन। इनके दो भाइयों की मृत्यु तब हुई जब के. आर. नारायणन 20 वर्ष के थे। इनकी बड़ी बहन गौरी एक होमियोपैथ हैं और इन्होंने शादी नहीं की। इनके छोटे भाई भास्करन ने भी विवाह नहीं किया, जो कि पेशे से अध्यापक हैं और उझावूर में ही रहते थे। उझावूर को आज श्री के. आर. नारायणन की जन्मभूमि के लिए जाना जाता है।&lt;br /&gt;
==विद्यार्थी जीवन==&lt;br /&gt;
श्री नारायणन का परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं था, लेकिन उनके पिता शिक्षा का महत्त्व समझते थे। इनकी आरम्भिक शिक्षा उझावूर के अवर प्राथमिक विद्यालय में हुई। यहाँ [[5 मई]], [[1927]] को यह स्कूल के छात्र के रूप में नामांकित हुए, जबकि उच्च प्राथमिक विद्यालय उझावूर में इन्होंने [[1931]] से [[1935]] तक अध्ययन किया। इन्हें 15 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था और चावल के खेतों से होकर गुज़रना पड़ता था। उस समय शिक्षा शुल्क बेहद साधारण था, लेकिन उसे देने में भी इन्हें कठिनाई होती थी। श्री नारायणन को प्राय: कक्षा के बाहर खड़े होकर कक्षा में पढ़ाये जा रहे पाठ को सुनना पड़ता था, क्योंकि शिक्षा शुल्क न देने के कारण इन्हें कक्षा से बाहर निकाल दिया जाता था। इनके पास पुस्तकें ख़रीदने के लिए भी धन नहीं होता था। तब अपने छोटे भाई की सहायता के लिए के. आर. नारायणन नीलकांतन छात्रों से पुस्तकें मांगकर उनकी नक़ल उतारकर नारायणन को देते थे। अस्थमा के कारण रुग्ण नीलकांतन घर पर ही रहते थे। नारायणन ने सेंट मेरी हाई स्कूल से 1936-37 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पूर्व 1935-36 में इन्होंने सेंट मेरी जोंस हाई स्कूल कूथाट्टुकुलम में भी अध्ययन किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छात्रवृत्ति का सहारा पाकर श्री नारायणन ने इंटरमीडिएट परीक्षा 1938-40 में कोट्टायम के सी. एम. एस. स्कूल से उत्तीर्ण की। इसके बाद इन्होंने कला (ऑनर्स) में स्नातक स्तर की परीक्षा पास की। फिर अंग्रेज़ी साहित्य में त्रावणकोर विश्वविद्यालय से [[1943]] में स्नातकोत्तर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की (वर्तमान में यह केरल विश्वविद्यालय है)। इसके पूर्व त्रावणकोर विश्वविद्यालय में किसी भी दलित छात्र ने प्रथम स्थान नहीं प्राप्त नहीं किया था। जब इनका परिवार विकट परेशानियों का सामना कर रहा था, तब 1944-45 में श्री नारायणन ने बतौर पत्रकार 'द हिन्दू' और 'द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' में कार्य किया। [[10 अप्रैल]], [[1945]] को पत्रकारिता का धर्म निभाते हुए इन्होंने [[मुम्बई]] में [[महात्मा गाँधी]] का साक्षात्कार लिया। इसके बाद वह [[1945]] में ही [[इंग्लैण्ड]] चले गए और 'लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनामिक्स' में राजनीति विज्ञान का अध्ययन किया। इन्होंने बी. एस. सी. इकोनामिक्स (ऑनर्स) की डिग्री और राजनीति विज्ञान में विशिष्टता हासिल की। इस दौरान जे. आर. डी. टाटा ने इन्हें छात्रवृत्ति प्रदान करके इनकी सहायता की। श्री नारायणन इण्डिया लीग में भी सक्रिय रहे। तब वी. के. कृष्णामेनन इण्डिया लीग के इंग्लैण्ड में प्रभारी थे। यह के. एन. मुंशी द्वारा प्रकाशित किए जाने वाले 'द सोशल वेलफेयर' वीकली समाचार पत्र के लंदन स्थित संवाददाता भी रहे। लंदन में इनके साथ आवास करने वाले वीरासामी रिंगाडू भी थे, जो बाद में मॉरिशस के राष्ट्रपति बने। इस समय इनके एक अन्य प्रगाढ़ मित्र ट्रुडयु भी थे, जो कि बाद में [[कनाडा]] के प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए।&lt;br /&gt;
==व्यावसायिक जीवन==&lt;br /&gt;
श्री नारयणन [[1984]] में जब [[भारत]] लौटे तो उनके पास लस्की का एक पत्र था, जिसके माध्यम से पण्डित नेहरू से परिचयात्मक मुलाकात सम्भव थी। इस सन्दर्भ में उन्होंने एक दिलचस्प क़िस्सा बयान किया- जब मैंने एल. एस. ई. का कोर्स समाप्त कर लिया तो लस्की ने मुझे पण्डित नेहरू के नाम का एक परिचयात्मक पत्र प्रदान किया। दिल्ली पहुँचने के बाद मैंने प्रधानमंत्री नेहरू से मुलाकात का समय ले लिया। मैंने सोचा था कि मैं एक भारतीय विद्यार्थी हूँ और लंदन से लौटा हूँ, इस कारण मुझे मुलाकात का समय मिल सकता है। पण्डित नेहरू ने संसद भवन में मुझसे मुलाकात की। हमने कुछ देर लंदन की बातें कीं और कुछ औपचारिक बातें भी कीं। उसके बाद मैंने आभास कर लिया कि मुलाकात का समय समाप्त हो गया है। अत: उन्हें अलविदा कहा और कमरे से बाहर जाने के पूर्व लस्की का पत्र पण्डित नेहरू को सौंप दिया। मैं बाहर घुमावदार आधे गलियारे तक ही पहुँच पाया था कि मुझे लगा कि मैं जिस दिशा से आया हूँ, उधर कोई ताली बजा रहा है। मैंने घूमकर देखा तो पण्डित नेहरू ने मुझे वापस आने का इशारा किया। दरअसल मेरे जाने के बाद [[पण्डित नेहरू]] ने वह पत्र खोलकर पढ़ लिया था।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&amp;quot;तुमने यह पत्र पहले मुझे क्यों नहीं दिया?&amp;quot; पण्डित जी ने पूछा।&lt;br /&gt;
&amp;quot;मैं क्षमा चाहता हूँ श्रीमान! मुझे बेहतर लगा कि मैं विदाई के समय ही आपको पत्र सौंपूँ।&amp;quot;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
फिर पण्डित नेहरू ने मुझसे कई सवाल किए। कुछ दिनों के बाद मैंने स्वयं को भारतीय विदेश सेवा में पाया। इस प्रकार [[1949]] में श्री नारायणन ने भारतीय विदेश सेवा में नेहरू जी की प्रार्थना पर नियुक्ति प्राप्त कर ली। एक राजनयिक के रूप में वह रंगून, टोकियो, लंदन, कैनसास और हेनोई दूतावास में रहे। 1967-69 में यह थाइलैण्ड के, 1973-75 में तुर्की के और 1976-78 में [[चीन]] गणराज्य के राजदूत बने। [[1954]] में इन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनामिक्स में अध्ययन भी किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1972-72 में श्री के. आर. नारायणन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सभासद और गृह मामलों के मंत्रालय के सचिव बने। [[1978]] से [[1980]] तक यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। इस समय के अनुभव को इन्होंने आगे चलकर सामान्य जन से जुड़ाव की आधार शिला माना। श्री नारायणन की प्रतिभा के कारण ही इंदिरा गांधी प्रशासन के द्वारा इन्हें सेवानिवृत्ति के बाद भी पुन: बुलाया गया और 1980 से 1984 तक संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय राजदूत बनाकर वांशिगटन भेजा गया। श्री नारायणन का चीन में राजदूत के रूप में जो कार्यकाल रहा, वह भारत-[[चीन]] के [[1962]] के युद्ध के बाद प्रथम कूटनीतिक नियुक्ति के रूप में रहा। [[अमेरिका]] के राजदूत रहते हुए उन्होंने अमेरिका तथा भारत के रिश्तों को सुधारने में प्रभावी भूमिका निभाई। इसका लाभ उस समय प्राप्त हुआ, जब श्रीमती [[इंदिरा गांधी]] ने [[1982]] में रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपतित्व में वांशिगटन की यात्रा की। पण्डित नेहरू ने 16 वर्षों तक देश का प्रतिनिधित्व किया था। उनका मानना था कि श्री नारायणन अब तक के सर्वश्रेष्ठ राजनयिक हैं।&lt;br /&gt;
==दाम्पत्य जीवन==&lt;br /&gt;
[[8 जून]], [[1951]] को श्री नारायणन ने 'मा टिंट टिंट' से विवाह किया। जब यह [[रंगून]] और बर्मा ([[म्यांमार]]) में कार्यरत थे, तब इनकी भेंट कुमारी मा टिंट टिंट से हुई थी। यह मित्रता शीघ्र ही प्रेम में बदल गई और दोनों ने विवाह करने का निर्णय कर लिया। तब मा टिंट टिंट वाई. डब्ल्यू. सी. ए. में कार्यरत थीं और नारायणन विद्यार्थी थे। लस्की ने नारायणन से कहा कि वह राजनीतिक आज़ादी के सम्बन्ध में व्याख्याद दें। तभी मा टिंट टिंट इनके सम्पर्क में आई थीं। इनके विवाह को तब विशिष्ट विधान की आवश्यकता पण्डित नेहरू से आशयित थी, क्योंकि भारतीय क़ानून के अनुसार नारायणन 'भारतीय विदेश सेवा' में कार्यरत थे और मा टिंट टिंट एक विदेशी महिला थीं। शादी के बाद मा टिंट टिंट का भारतीय नाम उषा रखा गया और वह भारतीय नागरिक भी बन गईं। श्रीमती उषा नारायणन ने भारत में महिलाओं तथा बच्चों के कल्याण के लिए कई कार्य किए। इन्होंने बर्मा की लघु कथाओं का अनुवाद करके प्रकाशित करवाया, जिसका शीर्षक था, 'थेइन पे मिंट'। इन्हें चित्रा और अमृता के रूप में दो पुत्रियों की प्राप्ति हुईं चित्रा भारतीय राजदूत के रूप में स्वीडन और तुर्की में अपनी सेवाएँ दे चुकी हैं।&lt;br /&gt;
==राजनीतिक जीवन==&lt;br /&gt;
श्री नारायणन का राजनीति में प्रवेश श्रीमती [[इंदिरा गाँधी]] के आग्रह से सम्भव हुआ। वह लगातार तीन [[लोकसभा]] चुनावों [[1984]], [[1989]] एवं [[1991]] में विजयी होकर [[संसद]] पहुँचे। यह ओट्टापलल (केरल) की लोकसभा सीट से निर्वाचित हुए। कांग्रेसी सांसद बनने के बाद वह [[राजीव गाँधी]] सरकार के केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में सम्मिलित किए गए। एक मंत्री के रूप में इन्होंने योजना ([[1985]]), विदेश मामले (1985-86) तथा विज्ञान एवं तकनीकी (1986-89) विभागों का कार्यभार सम्भाला। सांसद के रूप में इन्होंने अंतराष्ट्रीय पेटेण्ट क़ानून को भारत में नियंत्रित किया। 1989-91 में जब कांग्रेस सत्ता से बाहर थी, तब श्री नारायणन विपक्षी सांसद की भूमिका में रहे। [[1991]] में जब पुन: कांग्रेस सत्ता में लौटी तो इन्हें कैबिनेट में सम्मिलित नहीं किया गया। तब केरल के [[मुख्यमंत्री]] के. करुणाकरन जो कि इनके राजनीतिक प्रतिस्पर्धी थे, ने इन्हें सूचित किया कि केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में सम्मिलित न किए जाने का कारण उनकी कम्युनिस्ट समर्थक नीति है। तब उन्होंने जवाब दिया कि मैंने कम्युनिस्ट उम्मीदवारों (ए. के. बालन और लेनिन राजेन्द्रन) को ही तीनों बार चुनाव में पराजित किया था। अत: मैं कम्युनिस्ट विचारधारा का समर्थक कैसे हो सकता हूँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री नारायणन [[21 अगस्त]], [[1992]] को डॉ. शंकर दयाल शर्मा के राष्ट्रपतित्व काल में [[उपराष्ट्रपति]] निर्वाचित हुए। इनका नाम प्राथमिक रूप से वी. पी. सिंह ने अनुमोदित किया था। उसके बाद जनता पार्टी संसदीय नेतृत्व द्वारा वाम मोर्चे ने भी इन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। [[पी. वी. नरसिम्हा राव]] के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने भी इन्हें उम्मीदवार के रूप में हरी झण्डी दिखा दी। इस प्रकार उपराष्ट्रपति पद हेतु वह सर्वसम्मति से उम्मीदवार बने। वाम मोर्चे के बारे में नारायणन ने स्पष्टीकरण दिया कि वह कभी भी साम्यवादी के कट्टर समर्थक अथवा विरोधी नहीं रहे। वाम मोर्चा उनके वैचारिक अन्तर को समझता था? लेकिन इसके बाद भी उसने उपराष्ट्रपति चुनाव में उनका समर्थन किया और बाद में राष्ट्रपति चुनाव में भी। इस प्रकार वाम मोर्चे के समर्थन से नारायणन को लाभ पहुँचा और उनकी राजनीतिक स्थिति को स्वीकार्य किया गया। जब [[6 दिसम्बर]], [[1992]] को बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ, तब इस घटना को इन्होंने 'महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश में यह सबसे बड़ी दुखांतिका घटी है' कथन से निरूपित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति पद पर==&lt;br /&gt;
[[14 जुलाई]], [[1997]] को हुए राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा जब [[17 जुलाई]], 1997 को घोषित हुआ तो पता चला कि श्री नारायणन को कुल वैध मतों का 95 प्रतिशत प्राप्त हुआ था। यह एकमात्र ऐसा राष्ट्रपति चुनाव था जो कि केन्द्र में अल्पमत सरकार के रहते हुए भी समाप्त हुआ। इसमें पूर्व चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन प्रतिद्वन्द्वी उम्मीदवार थे। शिव सेना के अतिरिक्त सभी दलों ने नारायणन के पक्ष में मतदान किया, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह कहते हुए इनका विरोध किया कि उन्हें भारतीय संस्कृति की जीत का आधार उनका दलित होना है। इससे पूर्व कोई भी दलित राष्ट्रपति नहीं बना था। श्री नारायणन को [[25 जुलाई]], 1997 को [[संसद भवन]] के केन्द्रीय कक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री जे. एस. वर्मा ने राष्ट्रपति पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस अवसर पर अपने आरम्भिक सम्बोधन में इन्होंने कहा-&amp;quot;देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद एक ऐसे व्यक्ति को प्रदान किया गया है, जो समाज के धरातल से जुड़ा था, परन्तु धूल और गर्मी के मध्य चला। चह निर्वाचन साबित करता है कि एक सामान्य नागरिक भी सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में केन्द्रीय भूमिका का निर्वहन कर सकता है। मैं इसे अपनी व्यक्तिगत प्रसन्नता न मानकर एक सार्थक एवं प्रतिष्ठापूर्ण परम्परा का आरम्भ मानता हूँ।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वर्णिम वर्षगांठ&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
1997 में जब भारत की आज़ादी की स्वर्णिम वर्षगांठ मनाई गई तो भारतवर्ष के राष्ट्रपति श्री नारायणन ही थे। स्वर्णिम वर्षगांठ की पूर्व संध्या अर्थात् [[14 अगस्त]], [[1997]] को राष्ट्र के नाम अपना सम्बोधन देते हुए इन्होंने भारत की प्रजातांत्रिक व्यवस्था और सरकार की नीतियों को आज़ादी के बाद की सबसे बड़ी तथा महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताया। अगली सुबह लाल क़िले की प्राचीर से [[प्रधानमंत्री]] [[इन्द्रकुमार गुजराल]] ने देश को सम्बोधित करते हुए कहा था-&amp;quot;गांधी जी ने जब भारत के भविष्य को लेकर स्वप्न देखा था, तब उन्होंने कहा था कि भारत को सच्ची आज़ादी उस दिन प्राप्त होगी, जब एक दलित देश का राष्ट्रपति होगा। आज हमारा यह सौभाग्य है कि हम गांधी जी के स्वप्न को पूर्ण होता देख रहे हैं। हमारे राष्ट्रपति जिन पर समस्त देश को गर्व है, एक बेहद ग़रीब परिवार से सम्बन्ध रखते थे। इन्होंने [[राष्ट्रपति भवन]] को गर्व और सम्मान प्रदान किया है। यह हमारे प्रजातंत्र की शोभा है कि समाज के कमज़ोर वर्ग से निकले व्यक्ति को उसकी प्रतिभा के अनुकूल सही सम्मान प्राप्त हो रहा है। आज देश के सभी नागरिक चाहे वे अल्पसंख्यक समुदाय हों, दलित समुदाय से हों अथवा आदिवासी समुदाय से हों, देश के विकास के लिए एकजुट होकर कार्य कर रहे हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पोलिंग बूथ मतदान&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[1998]] के आम चुनावों में राष्ट्रपति रहते हुए भी श्री नारायणन ने [[16 फ़रवरी]], 1998 को एक स्कूल के पोलिंग बूथ में मतदान किया जो राष्ट्रपति भवन के कॉम्प्लेक्स में स्थित था। इन्होंने एक साधारण मतदान में भाग लेकर लोगों को मतदान के प्रति उत्साहित करने का कार्य किया। वह उस परम्परा को बदलना चाहते थे, जिसके अनुसार पूर्व भारतीय राष्ट्रपति चुनावों में मतदान नहीं करते थे। इन्होंने राष्ट्रपति के रूप में [[1999]] के आम चुनावों में भी अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इस प्रकार देश के प्रथम नागरिक अर्थात् राष्ट्रपति रहते हुए भी एक आम व्यक्ति बने रहे। अपने कार्यकाल के दौरान श्री नारायणन ने अपनी शक्तियों का विवेक सम्मत रूप से उपयोग किया और राष्ट्रपति की शक्तियों को पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत किया। इस प्रकार इन्होंने राष्ट्रपति की शक्तियों को व्यावहारिक रूप में अपनाकर दिखाया। फिर परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि इन्हें अपने क्षेत्राधिकार की शक्तियों का उपयोग करना आवश्यक हो गया।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;दो बार संसद भंग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
अपने राष्ट्रपति काल के दौरान श्री नारायणन ने दो बार संसद को भंग करने का कार्य किया। लेकिन ऐसा करने के पूर्व इन्होंने अपने अधिकार का उपयोग करते हुए राजनीतिक परिदृश्य को संचालित करने वाले लोगों से परामर्श भी किया था। तब यह नतीजा निकाला कि उन स्थितियों में कोई भी राजनीतिक दल बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में नहीं था। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई थी, जब कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने इन्द्रकुमार गुजराल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार के बहुमत में होने का दावा दांव पर लग गया। श्री इन्द्रकुमार गुजराल को [[28 नवम्बर]], [[1997]] तक सदन में अपने बहुमत का जादुई आंकड़ा साबित करना था। प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल बहुमत सिद्ध करने में असमर्थ थे, अत: उन्होंने राष्ट्रपति को परामर्श दिया कि लोकसभा भंग कर दी जाए। श्री नारायणन ने भी परिस्थितियों की समीक्षा करते हुए निर्णय लिया कि कोई भी दल बहुमत द्वारा सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। अत: श्री गुजराल का परामर्श स्वीकार करते हुए उन्होंने लोकसभा भंग कर दी। इसके बाद हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी सकल पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई, जिसके पास में सबसे ज़्यादा सांसद थे। भाजपा के नेता [[अटल बिहारी वाजपेयी]] को एन. डी. ए. का भी समर्थन प्राप्त था। अत: नारायणन ने वाजपेयी से कहा कि वह समर्थन करने वाली पार्टियों के समर्थन पत्र प्रदान करें, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि उनके पास सरकार बनाने के लायक़ बहुमत है। श्री अटल बिहारी वाजपेयी समर्थन जुटाने में समर्थ थे और इस आधार पर उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया। साथ ही यह शर्त भी थी कि 10 दिन में वाजपेयी अपना बहुमत सदन में साबित करें। [[14 अप्रैल]], [[1999]] को [[जयललिता]] ने राष्ट्रपति नारायणन को पत्र लिखा कि वह वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले रही हैं। तब श्री नारायणन ने वाजपेयी को सदन में बहुमत साबित करने को कहा। [[17 अप्रैल]] को वाजपेयी सदन में बहुमत साबित करने की स्थिति में नहीं थे। इस कारण वाजपेयी को हार का सामना करना पड़ा।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;लोकसभा चुनाव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा विपक्ष की नेता एवं कांग्रेस अध्यक्ष [[सोनिया गाँधी]] दोनों सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थे। अत: जब दोनों के द्वारा सार्थक संकेत प्राप्त नहीं हुए तो राष्ट्रपति श्री नारायणन ने प्रधानमंत्री को सूचित किया कि केन्द्र सरकार का संकट टालने का एक मात्र उपाय है कि नए लोकसभा चुनाव करवाएँ जाएँ। तब अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर श्री नारायणन ने लोकसभा भंग कर दी। इसके बाद हुए चुनावों में एन. डी. ए. को बहुमत प्राप्त हुआ और वाजपेयी पुन: प्रधानमंत्री बनाए गए। इन निर्णयों के द्वारा राष्ट्रपति श्री के. आर. नारायणन ने प्रधानमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में नया उदाहरण पेश किया। यदि किसी दल अथवा चुनाव पूर्व के गठबन्धन को बहुमत प्राप्त होता है तो किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री तभी बनाया जा सकता है, जब वह राष्ट्रपति को यह विश्वास दिलाने में सफल हो जाए कि उसके पास सदन में बहुमत है (गठबन्धन के दलों द्वारा समर्थन का पत्र प्रदान करे) और वह उसे साबित भी कर सकता है। इस प्रकार त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में राष्ट्रपति श्री नारायणन ने यह उदाहरण पेश किया कि किस प्रकार बहुमत साबित किया जाना चाहिए। इससे पूर्व के राष्ट्रपतियों-नीलम संजीव रेड्डी, आर. वेंकटरमण और डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने पूर्व परम्परा के अनुसार सबसे बड़ी एकल पार्टी अथवा चुनाव पूर्व उस गठबन्धन के मुखिया को सरकार बनाने का न्योता प्रदान किया था। लेकिन उन्होंने यह पड़ताल नहीं कि थी कि उनके पास सदन में बहुमत साबित करने की योग्यता है अथवा नहीं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;राष्ट्रपति शासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
आर्टिकल 356 के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमण्डल की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा किसी भी राज्य की क़ानून व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। ऐसे मौक़े दो बार आए। पहली बार इन्द्रकुमार गुजराल सरकार ने [[उत्तर प्रदेश]] में [[कल्याण सिंह]] की सरकार को बर्ख़ास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग [[22 अक्टूबर]], [[1999]] को की। दूसरी बार अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने [[बिहार]] में [[राबड़ी देवी]] की सरकार को [[25 सितम्बर]], [[1994]] को बर्ख़ास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की। इन दोनों मौकों पर राष्ट्रपति श्री नारायणन ने उच्चतम न्यायालय के [[1994]] के निर्णय का अवलोकन किया, जो एस. आर. बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ़ इण्डिया के मामले में दिया गया था। दोनों प्रकरणों में कैबिनेट द्वारा राष्ट्रपति के विशेषाधिकार का सम्मान किया गया था। इन मौकों पर राष्ट्रपति ने ऐसे आग्रह पुनर्विचार के लिए लौटाकर एक महत्त्वपूर्ण दृष्टान्त पेश किया, ताकि संघता में राज्य सरकारों के अधिकारों की भी सुरक्षा सम्भव हो सके।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कार्यवाहक सरकार द्वारा शासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
मई [[1999]] में [[पाकिस्तान]] के साथ कारगिल में युद्ध छिड़ गया। पाकिस्तानी सैनिकों ने आतंकवादियों के साथ में मिलकर युद्ध की स्थिति पैदा कर दी थी। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में सरकार चला रहे थे। वाजपेयी सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर हार चुकी थी और विपक्ष भी सरकार बनाने में असफल रहा। ऐसी स्थिति में लोकसभा भंग कर दी गई थी और कार्यवाहक सरकार द्वारा शासन चलाया जा रहा था। इस कारण प्रजातंत्रीय जवाबदेही की समस्या उत्पन्न हो गई थी। जिस प्रकार मुख्य सरकार के कार्यों की समीक्षा, विवेचना और परख संसद में की जाती है, उस प्रकार किया जाना सम्भव नहीं था। ऐसी विकट स्थिति में राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सलाह दी कि [[राज्यसभा]] में युद्ध को लेकर चर्चा की जाए। इसी प्रकार की मांग कई विपक्षी दलों के द्वारा भी उठाई गई (1962-के भारत-चीन युद्ध के दौरान ऐसी मांग वाजपेयी ने उठाई थी और नेहरू जी ने उसे स्वीकार कर लिया था)। यद्यपि इस प्रकार का कोई भी पूर्व उदाहरण नहीं था कि सरकार न रहने की स्थिति में राज्यसभा का सत्र अलग से बुलाया जाए। इसके अतिरिक्त श्री नारायणन ने तीनों सेनाओं के सेनाधिकारियों से युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रंद्धाजंलि भी दी थी। राष्ट्रपति के रूप में यह संवैधानिक मर्यादाओं से बंधे हुए थे। वह बहुत कुछ करना चाहते थे, लेकिन मर्यादाओं का कभी भी उल्लंघन नहीं किया।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति नियुक्त होने के बाद नारायणन ने एक नीति अथवा सिद्धान्त बना लिया था कि वह किसी भी पूजा स्थान या इबादतग़ाह पर नहीं जाएँगे-चाहे वह देवता का हो या देवी का। यह एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति रहे जिन्होंने अपने कार्यकाल में किसी भी पूजा स्थल का दौरा नहीं किया। राष्ट्रपति के रूप में जब श्री नारायणन की पदावधि के अवसान का समय निकट आया तो विभिन्न जनसमुदायों की राय थी कि इन्हें दूसरे सत्र के लिए भी राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। इस समय एन. डी. ए. के पास अपर्याप्त बहुमत था। लेकिन नारायणन ने स्पष्ट कर दिया कि वह सर्वसम्मति के आधार पर ही पुन: राष्ट्रपति बनना स्वीकार करेंगे। उस समय की विपक्षी पार्टियों-कांग्रेस, जनता दल, वाम मोर्चा तथा अन्य ने भी इनको दूसरी बार राष्ट्रपति बनाये जाने का समर्थन किया था। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति श्री नारायणन से मुलाक़ात करके यह प्रार्थना की कि वह अगले सत्र हेतु भी राष्ट्रपति बनें। लेकिन वाजपेयी ने इनसे भेंट करके यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी उम्मीदवारी को लेकर एन. डी. ए. में असहमति है। एन. डी. ए. ने उपराष्ट्रपति कृष्णकान्त को सर्वसम्मति से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का प्रयास किया। विपक्ष से इस बारे में सहयोग मांगा गया और कांग्रेस तक भी वाजपेयी का संदेश गया। लेकिन एक ही दिन में यह स्पष्ट हो गया कि कृष्णकान्त की उम्मीदवारी को लेकर एन. डी. ए. के घटक दल ही एकमत नहीं हैं। इसके बाद राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में डॉ. पी. सी. अलेक्जेण्डर के नाम पर विचार किया गया। लेकिन विपक्षी दलों ने इनकी उम्मीदवारी को नकार दिया। फिर विपक्षियों ने श्री नारायणन से पुन: सम्पर्क किया और राष्ट्रपति पद हेतु विचार करने का अनुरोध किया। तब एन. डी. ए. द्वारा [[डॉ. अब्दुल कलाम]] का नाम अधिकारिक उम्मीदवार के रूप में आगे आया। लेकिन इस बारे में सर्वसम्मति की परवाह नहीं की गई। [[मुलायम सिंह यादव]] के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने विपक्ष की एकजुटता की परवाह न करते हुए अब्दुल क़लाम के नाम पर सहमति व्यक्त कर दी। ऐसी स्थिति में श्री नारायणन ने स्वयं को राष्ट्रपति पद की पुन: उम्मीदवारी से अलग कर लिया। बाद में जब इस सन्दर्भ में श्री नारायणन से पूछा गया तो उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की नीति को ज़िम्मेदार ठहराया। जिसके कारण दूसरी बार राष्ट्रपति बनना मंज़ूर नहीं किया। इन्होंने आगे स्पष्ट करते हुए कहा कि भाजपा भारत की धर्मनिरपेक्ष नीति को आक्रामक हिन्दुत्ववादी नीति से नुक़सान पहुँचाने का काम कर रही है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;विदाई&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
श्री नारायणन ने विशेष रूप से मुरली मनोहर जोशी (जो एच. आर. डी. मंत्री थे) का उल्लेख किया, जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था में बी. जे. पी. की हिन्दुत्ववादी विचारधारा को सम्मिलित करने का प्रयास किया था। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने संवैधानिक रूप से ऐसे लोगों की नियुक्तियाँ की थीं, जो बी. जे. पी. की विचारधारा को स्थापित करने का कार्य कर सकते थे। श्री नारायणन प्रजातांत्रिक एवं संवैधानिक मूल्यों के अनुसार ही कार्य करना चाहते थे और बी. जे. पी. को इनकी यह कार्यशैली पसन्द नहीं थी। [[24 जुलाई]], [[2002]] को श्री नारायणन ने अपने विदाई सम्बोधन में युवा वर्ग से कहा कि वह सामाजिक कार्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करे। इन्होंने अपने अनुभवों पर आधारित संस्मरणों के माध्यम से भारतीय लोगों की अच्छाइयों एवं बुद्धिमत्ता को परिलक्षित किया। श्री नारायणन ने कहा कि जब वह उझावूर में विभिन्न धर्मावलम्बियों के साथ रहते हुए बड़े हो रहे थे, तब धार्मिक सहिष्णुता और एकता के साथ हिन्दू एवं क्रिश्चियन लोगों ने उनकी आरम्भिक शिक्षा में मदद की थी। इसी प्रकार ओट्टापासम में निर्वाचन के समय भी सभी जाति एवं धर्म के लोगों ने इनके चुनाव प्रचार में भाग लिया था। इन्होंने कहा कि भारत की एकता और प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए धार्मिक सहिष्णुता का भाव काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार रहा है। अत: हिन्दुओं को चाहिए कि वे बहुसंख्यक होने के कारण हिन्दुत्व के पारम्परिक मूल्यों के अनुसार सभी धर्मों का सम्मान करें।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;श्री नारायणन के शब्दों में&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
श्री नारायणन ने विशेष रूप से कहा-&amp;quot;[[भारत के राष्ट्रपति]] के रूप में मैंने बेहद दुख और स्वयं को असहाय महसूस किया। ऐसे कई अवसर आए जब मैं देश के नागरिकों के लिए कुछ नहीं कर सका। इन अनुभवों ने मुझे काफ़ी दुख पहुँचाया। सीमित शक्तियों के कारण मैं वेदना महसूस करता था। वस्तुत: शक्ति और असहायता के मिश्रण को दुखान्त ही कहना चाहिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
श्री के. आर. नारायणन का निधन [[9 नवम्बर]], [[2005]] को आर्मी रिसर्च एण्ड रैफरल हॉस्पिटल नई दिल्ली में हुआ। इन्हें न्यूमोनिया की शिकायत थी। फिर गुर्दों के काम न करने के कारण इनकी मृत्यु हो गई। [[10 नवम्बर]], [[2005]] को पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ सूर्यास्त के समय इनका अन्तिम संस्कार इनके भतीजे डॉ. पी. वी. रामचन्द्रन ने [[यमुना नदी]] के किनारे एकता स्थल पर किया। यह स्थान शान्ति वन के निकट है, जहाँ इनके मार्गदर्शक पण्डित नेहरू की स्मृतियाँ जीवित हैं। इनकी पुत्री चित्रा (तुर्की में भारतीय राजदूत), पत्नी उषा, दूसरी पुत्री अमृता तथा परिवार के अन्य सदस्यों को देश-विदेश से कई संवेदना संदेश प्राप्त हुए। पुत्री चित्रा ने कहा कि उनके पिता को राष्ट्र प्रेम, विशिष्ट नैतिक मनोबल तथा साहस के लिए सदैव याद किया जाएगा।&lt;br /&gt;
==सम्मान==&lt;br /&gt;
श्री के. आर. नारायणन ने कुछ पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें 'इण्डिया एण्ड अमेरिका एस्सेस इन अंडरस्टैडिंग', 'इमेजेस एण्ड इनसाइट्स' और 'नॉन अलाइमेंट इन कन्टैम्परेरी इंटरनेशनल निलेशंस' उल्लेखनीय हैं। इन्हें राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कई पुरस्कार प्राप्त हुए थे। [[1998]] में इन्हें द अपील ऑफ़ कॉनसाइंस फ़ाउंडेशन, न्यूयार्क द्वारा 'वर्ल्ड स्टेट्समैन अवार्ड' दिया गया। टोलेडो विश्वविद्यालय, अमेरिका ने इन्हें 'डॉक्टर ऑफ़ साइंस' की तथा आस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय ने 'डॉक्टर ऑफ़ लॉस' की उपाधि दी। इसी प्रकार से राजनीति विज्ञान में इन्हें डॉक्टरेट की उपाधि तुर्की और सेन कार्लोस विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई। भारत माता के इस सच्चे सपूत को सदैव याद किया जाएगा जो राष्ट्रपति से ज़्यादा एक बेहतर इंसान थे।&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
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[[Category:राजनीति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रपति और राज्यपाल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>शंकरदयाल शर्मा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[चित्र:Shankar-Dayal-Sharma.jpg|thumb|शंकरदयाल शर्मा]]&lt;br /&gt;
'''कार्यकाल- [[25 जुलाई]] [[1992]] से 25 जुलाई [[1997]]'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*शंकरदयाल शर्मा की उच्च शिक्षा कैंब्रिज विश्वविद्यालय में हुई। &lt;br /&gt;
*शंकरदयाल शर्मा प्रकांड विद्वान थे। &lt;br /&gt;
*[[आंध्र प्रदेश]], [[पंजाब]] तथा [[महाराष्ट्र]] के राज्यपाल के पद पर रहे। &lt;br /&gt;
*शंकरदयाल शर्मा के कार्यकाल में ही श्री [[अटलबिहारी वाजपेयी]] की 13 दिन की सरकार बनी थी। &lt;br /&gt;
*शंकरदयाल शर्मा ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया। &lt;br /&gt;
*विश्वविद्यालय ने शंकरदयाल शर्मा को 'डॉक्टर आफ लॉ' की मानद विभूति से अलंकृत किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<title>रामस्वामी वेंकटरमण</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[चित्र:R. Venkataraman.jpg|thumb|रामस्वामी वेंकटरमण]]&lt;br /&gt;
'''कार्यकाल 25 जुलाई 1987 से 25 जुलाई 1992'''&lt;br /&gt;
*क़ानून के प्रकांड पंडित श्री आर. वेंकटरमण दक्षिण भारतीय श्रमिक संघी थे। &lt;br /&gt;
*वे [[तमिलनाडु]] की राज्य सरकार में मंत्री रहे। &lt;br /&gt;
*1987 में राष्ट्रपति के पद पर आरूढ़ हुए। &lt;br /&gt;
*1989 के आम चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण इन्होंने प्रधानमंत्री के चुनाव में कठिन भूमिका का निर्वहन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
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		<title>ज्ञानी ज़ैल सिंह</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Giani-Zail-Singh.jpg|thumb|ज्ञानी ज़ैल सिंह]]&lt;br /&gt;
'''कार्यकाल 25 जुलाई 1982 से 25 जुलाई 1987'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*सिख धर्म के विद्वान [[पंजाब]] के मुख्यमंत्री रह चुके ज्ञानी जी अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति, सत्यनिष्ठा के राजनीतिक कठिन रास्तों को पार करते हुए [[भारत]] के राष्ट्रपति पद पर पहुँचे।&lt;br /&gt;
*1982 में [[भारत]] के गौरवमयी राष्ट्रपति के पद पर आसीन हुए। &lt;br /&gt;
*1987 तक के अपने कार्यकाल के दौरान इन्हें 'ब्लूस्टार ऑपरेशन' एवं [[इंदिरा गांधी]] की हत्या जैसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों से गुजरना पड़ा।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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		<title>नीलम संजीव रेड्डी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Neelam Sanjiva Reddy.jpg|thumb|नीलम संजीव रेड्डी]]&lt;br /&gt;
'''कार्यकाल 25 जुलाई 1977 से 25 जुलाई 1982'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[आंध्र प्रदेश]] के कृषक परिवार में जन्मे नीलम संजीव रेड्डी की छवि कवि, अनुभवी राजनेता एवं कुशल प्रशासक के रूप में थी। &lt;br /&gt;
*इनका सार्वजनिक जीवन उत्कृष्ट था। &lt;br /&gt;
*सन 1977 के आम चुनाव में जब [[इंदिरा गांधी]] की पराजय हुई, उस समय नव-गठित राजनीतिक दल जनता पार्टी ने इनको राष्ट्रपति का प्रत्याशी बनाया। &lt;br /&gt;
*वे [[भारत]] के पहले गैर काँग्रेसी राष्ट्रपति थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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		<title>फ़ख़रुद्दीन अली अहमद</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Fakhruddin-Ali-Ahmed.jpg|thumb|फ़ख़रुद्दीन अली अहमद]]&lt;br /&gt;
'''कार्यकाल -24 अगस्त 1974 से 11 फ़रवरी 1977'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*फ़ख़रूद्दीन अली अहमद का जन्म [[13 मई]] [[1905]] को [[दिल्ली]] के धनी परिवार में हुआ था। &lt;br /&gt;
*फ़ख़रूद्दीन अली अहमद की शिक्षा [[इंग्लैंड]] में हुई थी। &lt;br /&gt;
*इनकी गणना [[कांग्रेस]] के प्रमुख नेताओं में की जाती थी। &lt;br /&gt;
*सन 1974 में वे उस समय राष्ट्रपति बने, जब समूचा देश [[इंदिरा गांधी]] की नीतियों का विरोध कर रहा था। &lt;br /&gt;
*ऐसे समय में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सुझाव से 1975 में आंतरिक आपात स्थिति की घोषणा के कारण इनका कार्यकाल काफ़ी अलोकप्रिय रहा। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
[[11 फ़रवरी]] [[1977]] में अचानक हृदयगति रुक जाने के कारण इनका देहावसान हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
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{{चौथी लोकसभा सांसद}}&lt;br /&gt;
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[[Category:भारत के राष्ट्रपति]]&lt;br /&gt;
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[[Category:चौथी लोकसभा सांसद]]&lt;br /&gt;
[[Category:पाँचवीं लोकसभा सांसद]]&lt;br /&gt;
[[Category:असम के लोकसभा सांसद]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति_कोश]]&lt;br /&gt;
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		<title>वी. वी. गिरी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:V.V.Giri.jpg|thumb|वाराहगिरि वेंकट गिरि]]&lt;br /&gt;
'''कार्यकाल [[3 मई]] 1969 से [[24 अगस्त]] 1974'''&lt;br /&gt;
*वाराह गिरि वेंकट गिरि का जन्म [[उड़ीसा]] प्रान्त में 10 अगस्त 1894 को हुआ था।&lt;br /&gt;
*वह उच्च शिक्षा के लिए 'डबलिन विश्वविद्यालय' गए। &lt;br /&gt;
*वाराह गिरि वेंकट गिरि [[श्रीलंका]] में [[भारत]] के राजदूत तथा [[उत्तर प्रदेश]] (1957-1960), [[केरल]](1960-1965) और तत्कालीन [[मैसूर]](1965-1967) के [[राज्यपाल]] भी रहे। &lt;br /&gt;
*1967 में वह [[भारत]] के  उपराष्ट्रपति के रूप में चुने गए। &lt;br /&gt;
*प्रधानमंत्री श्रीमती [[इंदिरा गांधी]] अपनी राष्ट्रीयकरण की उदारवादी नीतियों के समर्थन के लिए उन्हें राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में लाईं।&lt;br /&gt;
*वह [[भारत]] के चौथे राष्ट्रपति थे।&lt;br /&gt;
*1975 में उन्हें [[भारत]] का सर्वोच्च नागरिक अलंकरण [[भारत रत्न]] दिया गया।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राष्ट्रपति]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>ज़ाकिर हुसैन</title>
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		<updated>2011-05-25T12:43:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=ज़ाकिर हुसैन|लेख का नाम=ज़ाकिर हुसैन (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dr.Zakir-Hussain.jpg|thumb|डॉ. ज़ाकिर हुसैन]] &lt;br /&gt;
'''कार्यकाल - 13 मई 1967 से 3 मई 1968'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*डा. ज़ाकिर हुसैन का जन्म [[हैदराबाद]], [[आंध्र प्रदेश]] के धनाढ्य पठान परिवार में हुआ था। &lt;br /&gt;
*कुछ समय बाद इनके पिता [[उत्तर प्रदेश]] में रहने आ गये थे।&lt;br /&gt;
*केवल 23 वर्ष की अवस्था में वे 'जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय' की स्थापना दल के सदस्य बने। &lt;br /&gt;
*वे अर्थशास्त्र में पीएच. डी की डिग्री के लिए [[जर्मनी]] के बर्लिन विश्वविद्यालय गए और लौट कर जामिया के उप कुलपति के पद पर भी आसीन हुए। &lt;br /&gt;
*यह [[भारत]] गणराज्य के तृतीय [[राष्ट्रपति]] थे।&lt;br /&gt;
*उन्हें वर्ष 1963 में [[भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
*1969 में असमय देहावसान के कारण वे अपना राष्ट्रपति कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राष्ट्रपति]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म विभूषण]] &lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध_व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>सर्वपल्ली राधाकृष्णन</title>
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		<updated>2011-05-25T12:42:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__ {{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Sarvepalli-Radhakrishnan.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[5 सितंबर]], [[1888]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=तिरूतनी, [[तमिलनाडु]] &lt;br /&gt;
|अविभावक=सर्वपल्ली वीरास्वामी, सीताम्मा&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=सिवाकामू&lt;br /&gt;
|संतान=पाँच पुत्र, एक पुत्री&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[17 अप्रैल]], [[1975]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[चेन्नई]], तमिलनाडु, [[भारत]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=स्वास्थ्य खराब&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=स्वतंत्र&lt;br /&gt;
|पद=भारत के दूसरे राष्ट्रपति&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=[[13 मई]], [[1962]] से 13 मई, [[1967]] &lt;br /&gt;
|विद्यालय=क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज &lt;br /&gt;
|शिक्षा=एम.ए.&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]]&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
*डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म [[तमिलनाडु]] के तिरूतनी ग्राम में, [[5 सितंबर]] [[1888]] को हुआ था। इनका जन्मदिवस 5 सितंबर आज भी पूरा राष्ट्र 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाता है।&lt;br /&gt;
*डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन स्वतंत्र [[भारत]] के प्रथम [[उपराष्ट्रपति]] और दूसरे [[राष्ट्रपति]] थे। इन्होंने [[डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद]] की गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाया। &lt;br /&gt;
*इनका कार्यकाल [[13 मई]], [[1962]] से 13 मई, [[1967]] तक रहा। इनका नाम भारत के महान राष्ट्रपतियों की प्रथम पंक्ति में सम्मिलित है। इनके व्यक्तित्व और कृतित्व के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र इनका सदैव ॠणी रहेगा। &lt;br /&gt;
*डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के ज्ञानी, एक महान शिक्षाविद, महान दार्शनिक, महान वक्ता होने के साथ ही साथ विज्ञानी हिन्दू विचारक थे। डॉक्टर राधाकृष्णन ने अपने जीवन के 40 वर्ष एक शिक्षक के रूप में व्ययतीत किए थे। वह एक आदर्श शिक्षक थे। सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन [[17 अप्रैल]], [[1975]] को हुआ था। &lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==जन्म एवं परिवार==&lt;br /&gt;
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म [[तमिलनाडु]] के तिरूतनी ग्राम में, जो मद्रास ,अब [[चेन्नई]] से लगभग 64 कि॰ मी॰ की दूरी पर स्थित है, [[5 सितंबर]] [[1888]] को हुआ था। यह एक ब्राह्मण परिवार से संबंधित थे। इनका जन्म स्थान एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात रहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;वैसे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना था कि उनका जन्म 20 सितंबर 1887 को हुआ था। लेकिन सरकारी काग़ज़ ातों में अंकित उनकी जन्मतिथि को ही अधिकारिक जन्मतिथि माना जाता है।&amp;lt;/ref&amp;gt; डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के पुरखे पहले 'सर्वपल्ली' नामक ग्राम में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में उन्होंने तिरूतनी ग्राम की ओर निष्क्रमण किया था। लेकिन इनके पुरखे चाहते थे कि उनके नाम  के साथ उनके जन्मस्थल के ग्राम का बोध भी सदैव रहना चाहिए। इसी कारण इनके परिजन अपने नाम के पूर्व 'सर्वपल्ली' धारण करने लगे थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक ग़रीब किन्तु विद्वान ब्राह्मण की दूसरी संतान के रूप में पैदा हुए। इनके पिता का नाम 'सर्वपल्ली वीरास्वामी' और माता का नाम 'सीताम्मा' था। इनके पिता राजस्व विभाग में वैकल्पिक कार्यालय में काम करते थे। इन पर बड़े परिवार के भरण-पोषण का दायित्व था। इनके पाँच पुत्र तथा एक पुत्री थी। राधाकृष्णन का स्थान इन संततियों में दूसरा था। इनके पिता काफ़ी कठिनाई के साथ परिवार का निर्वहन कर रहे थे। इस कारण बालक राधाकृष्णन को बचपन में कोई विशेष सुख नहीं प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==विद्यार्थी जीवन==&lt;br /&gt;
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का बाल्यकाल तिरूतनी एवं तिरूपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही व्यतीत हुआ। इन्होंने प्रथम आठ वर्ष तिरूतनी में ही गुजारे। यद्यपि इनके पिता पुराने विचारों के इंसान थे और उनमें धार्मिक भावनाएं भी थीं, इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन को क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरूपति में [[1896]]-[[1900]] के मध्य विद्याध्ययन के लिए भेजा। फिर अगले 4 वर्ष (1900 से [[1904]]) की शिक्षा वेल्लूर में हुई। इसके बाद इन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास में शिक्षा प्राप्त की। वह बचपन से ही मेधावी थे।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इन 12 वर्षों के अध्ययन काल में डॉक्टर राधाकृष्णन  ने बाइबिल के महत्त्वपूर्ण अंश भी याद कर लिए। इसके लिए इन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान प्रदान किया गया। इस उम्र में इन्होंने [[वीर सावरकर]] और [[स्वामी विवेकानन्द]] का भी अध्ययन किया। इन्होंने [[1902]] में मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और इन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई। इसके बाद इन्होंने 1904 में कला संकाय परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली। इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने इन्हें छात्रवृत्ति भी दी। उन्होंने दर्शन शास्त्र में एम.ए. किया और सन [[1916]] में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। वह प्राध्यापक भी रहे। डॉ. राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया। सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गई।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==दाम्पत्य जीवन==&lt;br /&gt;
उस समय मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही शादी सम्पन्न हो जाती थी और राधाकृष्णन भी उसके उपवाद नहीं रहे। 1903 में 16 वर्ष की आयु में ही उनके विवाह दूर के रिश्ते की बहन 'सिवाकामू' के साथ सम्पन्न हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी। अतः तीन वर्ष बाद उनकी पत्नी ने उनके साथ में रहना आरम्भ कर दिया। यद्यपि उनकी पत्नी सिवाकामू ने परम्परागत रूप से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन उनका [[तेलुगु भाषा]] पर अच्छा अधिकार था। वह [[अंग्रेज़ी भाषा]] भी लिख-पढ़ सकती थीं। 1908 में राधाकृष्णन दम्पति को संतान के रूप में पुत्री की प्राप्ति हुई। 1908 में ही उन्होंने कला स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और [[दर्शन शास्त्र]] में विशिष्ट योग्यता प्राप्त की। शादी के 6 वर्ष बाद ही 1909 में इन्होंने कला में स्नातकोत्तर परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। इनका विषय दर्शन शास्त्र ही रहा। उच्च अध्ययन के दौरान वह अपनी निजी आमदनी के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम भी करते रहे। 1908 में इन्होंने एम. ए. की उपाधि प्राप्त करने के लिए एक शोध लेखन किया। इस समय इनकी आयु मात्र बीस वर्ष की थी। इससे शास्त्रों के प्रति इनकी ज्ञान-पिपासा बढ़ी। शीघ्र ही इन्होंने [[वेद|वेदों]] और [[उपनिषद|उपनिषदों]] का भी गहन अध्ययन कर लिया। इन्होंने [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] और [[संस्कृत भाषा]] का भी रुचिपूर्वक अध्ययन किया। &lt;br /&gt;
====पत्नी का देहांत====&lt;br /&gt;
डॉक्टर राधाकृष्णन को बचपन से ही पुस्तकों से प्रेम था। इस कारण तभी स्पष्ट हो गया था कि यह बालक बड़ा होकर विद्वत्ता एवं महानता का वरण अवश्य करेगा। उनका स्वभाव संकोची था, अतः वह घर के सामाजिक समारोहों में उत्साह एवं उल्लास का अनुभव नहीं करते थे। यह इनके परिवार के गहरे संस्कारों का ही प्रभाव रहा कि जीवन भर शाकाहारी रहे। इन्होंने कभी भी धूम्रपान अथवा मद्यपान नहीं किया। परिवार में प्रथम पुत्री पैदा होने के बाद अगले पन्द्रह वर्षों में राधाकृष्णन दम्पति को छह अन्य सन्तानें हुई। इस दौरान इनकी पत्नी का जीवन परिवार तथा पति के लिए पूर्णतया समर्पित रहा। लेकिन [[26 नवम्बर]], [[1956]] को इनकी पत्नी का देहांत हो गया। इस प्रकार 53 वर्ष तक साथ निभाने वाली जीवन-संगिनी का इन्हें विछोह भी सहन करना पड़ा। पत्नी की अन्तिम क्रिया सम्पन्न करने के बाद जब वह लौटे तो उन्होंने एक टिप्पणी की- '''एक लम्बे अध्याय का अंत हो गया।''' जीवन के नाज़ुक रिश्तों को भी उन्होंने दर्शन शास्त्र की परिभाषाओं के अनुसार अनुभूत किया था। &lt;br /&gt;
====हिन्दूवादिता का गहरा अध्ययन====&lt;br /&gt;
शिक्षा का प्रभाव जहाँ प्रत्येक इन्सान पर निश्चित रूप से पड़ता है, वहीं शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है। क्रिश्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों में गहरे तक स्थापित किया जाता था। यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गए। लेकिन उनमें एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था। कुछ लोग हिन्दुत्ववादी विचारों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनकी आलोचना करते थे। उनकी आलोचना को डॉक्टर राधाकृष्णन ने चुनौती की तरह लिया और हिन्दूवादिता का गहरा अध्ययन करना आरम्भ कर दिया। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन यह जानना चाहते थे कि वस्तुतः किस संस्कृति के विचारों में चेतनता है और किस संस्कृति के विचारों में जड़ता है। तब स्वाभाविक अंतर्प्रज्ञा द्वारा इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करना आरम्भ कर दिया कि [[भारत]] के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे। इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय आध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं। इससे इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा संदेश देती है। &lt;br /&gt;
====भारतीय संस्कृति====&lt;br /&gt;
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह जान लिया था कि जीवन छोटा है और इसमें व्याप्त खुशियाँ अनिश्चित हैं। इस कारण व्यक्ति को सुख-दुख में समभाव से रहना चाहिए। वस्तुतः मृत्यु एक अटल सच्चाई है, जो कि अमीर-ग़रीब सभी को अपना ग्रास बनाती है तथा किसी भी प्रकार का वर्ग-विभेद नहीं करती है। सच्चा ज्ञान वही है जो आपके अन्दर के अज्ञान को समाप्त कर सकता है। सादगीपूर्ण संतोषवृत्ति का जीवन अमीरों के अहंकारी जीवन से बेहतर है, जिनमें असंतोष का निवास है। एक शांत मस्तिष्क बेहतर है, तालियों की उन गड़गड़ाहटों से जो संसदों एवं दरबारों में सुनाई देती हैं। इस कारण डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को समझ पाने में सफल रहे, क्योंकि वह मिशनरियों द्वारा की गई आलोचनाओं के सत्य को स्वयं परखना चाहते थे। इसीलिए कहा गया है कि आलोचनाएँ परिशुद्धि का कार्य करती हैं। सभी माताएँ अपने बच्चों में उच्च संस्कार देखना चाहती हैं। इस कारण वे बच्चों को ईश्वर पर विश्वास रखने, पाप से दूर रहने एवं मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने का पाठ पढ़ाती हैं। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह भी जाना कि भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों का आदर करना सिखाया गया है और सभी धर्मों के लिए समता का भाव भी हिन्दू संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस प्रकार उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान को समझा और उसके काफ़ी नज़दीक हो गए।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==जीवन दर्शन==&lt;br /&gt;
डॉक्टर राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में  दिये अपने भाषण में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि 'मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है। जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शांति की स्थापना का प्रयत्न  हो।' डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से पूर्ण व्याख्याओं, आनंददायक  अभिव्यक्ति और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से  छात्रों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वह अपने छात्रों को देते थे। वह जिस भी विषय को पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। [[दर्शन शास्त्र|दर्शन]] जैसे गंभीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==व्यावसायिक जीवन ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Radhakrishnan-Indira-Gandhi-Kamaraj.jpg|thumb|250px|डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, [[इंदिरा गाँधी]] एवं [[कुमारास्वामी कामराज]]]]&lt;br /&gt;
21 वर्ष की उम्र अर्थात 1909 में राधाकृष्णन ने मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में कनिष्ठ व्याख्याता के तौर पर दर्शन शास्त्र पढ़ाना आरम्भ किया। यह उनका परम सौभाग्य था कि उनको अपनी प्रकृति के अनुकूल आजीविका प्राप्त हुई थी। यहाँ उन्होंने 7 वर्ष तक न केवल अध्यापन कार्य किया बल्कि स्वयं भी भारतीय दर्शन और भारतीय धर्म का गहराई से अध्ययन किया। उन दिनों व्याख्याता के लिए यह आवश्यक था कि अध्यापन हेतु वह शिक्षण का प्रशिक्षण भी प्राप्त करे। इस कारण 1910 में राधाकृष्णन ने शिक्षण का प्रशिक्षण मद्रास में लेना आरम्भ कर दिया। इस समय इनका वेतन मात्र 37 रुपये था। दर्शन शास्त्र विभाग के तत्कालीन प्रोफ़ेसर राधाकृष्णन के दर्शन शास्त्रीय ज्ञान से काफ़ी अभिभूत हुए। उन्होंने उन्हें दर्शन शास्त्र की कक्षाओं से अनुपस्थित रहने की अनुमति प्रदान कर दी। लेकिन इसके बदले में यह शर्त रखी कि वह उनके स्थान पर दर्शन शास्त्र की कक्षाओं में पढ़ा दें। तब राधाकृष्ण ने अपने कक्षा साथियों को तेरह ऐसे प्रभावशाली व्याख्यान दिए, जिनसे वह शिक्षार्थी चकित रह गए। इनकी विषय पर गहरी पकड़ थी, दर्शन शास्त्र के सम्बन्ध में इनका दृष्टिकोण स्पष्ट था और इन्होंने उपयुक्त शब्दों का चयन भी किया था। 1912 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की 'मनोविज्ञान के आवश्यक तत्व' शीर्षक से प्रकाशित हुई जो कक्षा में दिए गए उनके व्याख्यानों का संग्रह था। इस पुस्तक के द्वारा इनकी यह योग्यता प्रमाणित हुई कि प्रत्येक पद की व्याख्या करने के लिए इनके पास शब्दों का अतुल भण्डार था और स्मरण शक्ति भी अत्यन्त विलक्षण थी। &lt;br /&gt;
====प्रथम भेंट====&lt;br /&gt;
राधाकृष्णन की [[महात्मा गांधी]] से प्रथम भेंट 1915 में हुई थी। उनके विचारों से प्रभावित होकर राधाकृष्णन ने राष्ट्रीय आन्दोलन के समर्थन में लेख भी लिखे। वह कभी भी किसी पार्टी से नहीं जुड़े, लेकिन निर्भय होकर राष्ट्रप्रेम को अभिव्यक्त करते थे। बाद में इन्होंने गांधी जी को अभिव्यक्त करते हुए कहा था – &amp;quot;मनुष्य के सर्वोत्तम प्रयासों में गांधी जी की आवाज़ सदैव अनश्वर रहेगी और संसार के सभी मानवों में श्रेष्तम भी होगी।&amp;quot; यहाँ पर आवाज़ का आशय गांधी जी की समग्र सोच से किया गया था। यद्यपि राधाकृष्णन ब्रिटिश सरकार की नौकरी कर रहे थे, तथापि देश की स्वतंत्रता के लिए वह ख़्वाहिशमंद थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उन्होंने अंग्रेज़ों से यह आशा रखी थी कि वे देश को स्वतंत्र कर देंगे। वह अंग्रेज़ों से यह आश्वासन भी चाहते थे कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वे भारत को ग़ुलामी से मुक्त कर देंगे। &lt;br /&gt;
====स्थानान्तरण====&lt;br /&gt;
1916 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का स्थानान्तरण अनन्तपुर हो गया। यहाँ यह छह माह तक रहे। इसके बाद पुनः प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर के रूप में लौटे। 1972 में वह दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर के रूप में 'कन्फर्म' किए गए और इनका स्थानान्तरण राजामुन्द्री में कर दिया गया। यहाँ पर इनके अध्यापन को काफ़ी प्रसिद्ध पाप्त हुई। इन्होंने दर्शन शास्त्र जैसे बोझिल विषय को मनोरंजन का स्वरूप प्रदान कर अपने छात्रों को मित्र की तरह पढ़ाया। वह प्रत्येक छात्र को एक विशिष्ट उपनाम से पुकारते थे। राधाकृष्णन ने अपने शिक्षार्थियों की अधिकतम मदद की। यही कारण है कि शिक्षार्थी उनका हृदय से आदर करते थे। 1918 में वह 'न्यू मैसूर यूनिवर्सिटी' में 'एडीशनल प्रोफ़ेसर' की हैसियत से नियुक्त हुए और वहाँ पर 13 वर्षों (1921) तक अध्यापन कार्य किया। &lt;br /&gt;
====रवीन्द्रनाथ टैगोर से भेंट====&lt;br /&gt;
दर्शन शास्त्र के मर्मज्ञ के तौर पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पहचान क़ायम हो चुकी थी। जुलाई, 1918 में मैसूर प्रवास के समय उनकी भेंट [[रवीन्द्रनाथ टैगोर]] से हुई। इस मुलाकात के बाद वह टैगोर से काफ़ी अभिभूत हुए। उनके विचारों की अभिव्यक्ति हेतु डॉक्टर राधाकृष्णन ने 1918 में 'रवीन्द्रनाथ टैगोर का दर्शन' शीर्षक से एक पुस्तक लिखी जो 'मैकमिलन प्रकाशन' द्वारा प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने दूसरी पुस्तक 'द रीन आफ रिलीजन इन कंटेंपॅररी फिलॉस्फी' लिखी। इस पुस्तक ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। इस पुस्तक को भारत के शिक्षार्थियों ने 'आत्मतत्त्व ज्ञान' की पुस्तक के रूप में स्वीकार किया। यही नहीं, इसे [[इंग्लैण्ड]] तथा [[अमेरिका]] के विश्वविद्यालयों में भी बेहद पसन्द किया गया। एक बार [[मैसूर]] में इनके शिक्षार्थियों ने इनसे पूछा था-'''क्या आप उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाना पसन्द करेंगे? तब इनका प्रेरक जवाब था - नहीं''', लेकिन वहाँ शिक्षा प्रदान करने के लिए अवश्य ही जाना चाहूँगा। &lt;br /&gt;
====मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध====&lt;br /&gt;
विद्यार्थियों के साथ राधाकृष्णन के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण रहते थे। जब वह अपने आवास पर शैक्षिक गतिविधियों का संचालन करते थे, तो घर पर आने वाले विद्यार्थियों का स्वागत हाथ मिलाकर करते थे। वह उन्हें पढ़ाई के दौरान स्वयं ही [[चाय]] देते थे और साथी की भाँति उन्हें घर के द्वार तक छोड़ने भी जाते थे। राधाकृष्णन में प्रोफेसर होने का रंचमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका मानना था कि जब गुरु और शिष्य के मध्य संकोच की दूरी न हो तो अध्यापन का कार्य अधिक श्रेष्ठतापूर्वक किया जा सकता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के ऐसे मैत्री सम्बन्धों के कारण एक मिसाल भी क़ायम हुई, जो कि बहुत ही अनोखी थी। दरअसल जब उनको [[कलकत्ता]] में स्थानान्तरित होना था, तब विदाई का कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। इसके लिए उन्होंने मना कर दिया। इनके विद्यार्थियों ने बग्घी के द्वारा इन्हें स्टेशन तक पहुँचाया था। इस बग्घी में घोड़े नहीं जुते थे, बल्कि विद्यार्थियों के द्वारा ही उस बग्घी को खींचकर रेलवे स्टेशन तक ले जाया गया। उनकी विदाई के समय मैसूर स्टेशन का प्लेटफार्म 'सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जय हो' के नारों से गूँज उठा था। वहाँ पर मौजूद लोगों की आँखों में अश्रु थे। राधाकृष्णन भी उस अदभुत प्रेम के वशीभूत होकर अपने आँसू रोक नहीं पाए थे। गुरु एवं विद्यार्थियों का ऐसा सम्बन्ध वर्तमान युग में कम ही देखने को प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
====आलोचनाओं का सामना====&lt;br /&gt;
इसके बाद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कोलकाता में 1921 से 1931 तक समय व्यतीत किया। इन्हें कोलकाता के 'किंग जॉर्ज पंचम विश्वविद्यालय' में मानसिक एवं नैतिक दर्शन शास्त्र का प्रोफेसर नियुक्त किया गया। इस दौरान उन्होंने [[भारत]] की शैक्षिक सेवा में अभिवृद्धि करने का भी कार्य किया। यहाँ पर वह गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के सम्पर्क में भी रहे। टैगोर के विचारों का काफ़ी प्रभाव राधाकृष्णन पर पड़ा। [[कलकत्ता विश्वविद्यालय]] के सभी संगठनों और विभागों को उन्नत करने के लिए इन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। [[यूरोप]] के विद्वान भी इनके दर्शन शास्त्रीय विचारों से काफ़ी प्रभावित हुए। इनके विचारों में विषय की स्पष्टता होती थी। यह सम्बोधन में क्लिष्टता का समावेश नहीं करते थे। इनकी भाषा में विद्यार्जित विद्वत्ता का ऐसा चमत्कार होता था कि श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनता रह जाता था। लेकिन वर्तमान युग में आलोचना तो संसार के रचयिता की भी होती है। इस कारण डॉक्टर राधाकृष्णन को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इनके आलोचकों का कहना था कि राधाकृष्णन ने दर्शन शास्त्र को नया कुछ भी नहीं दिया है, भारत के आध्यात्मिक दर्शन की प्राचीनता को ही उजागर किया है। पश्चिम के सम्मुख उन्होंने भारतीय आध्यात्म को मात्र [[अंग्रेज़ी भाषा]] में उदधृत करने का ही कार्य किया है, लेकिन राधाकृष्णन ने अपने आलोचकों को कभी भी स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता महसूस नहीं की। इसके बाद इनका एक लेख 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' के 14वें संस्करण में प्रकाशित हुआ जो एक बड़ी उपलब्धि थी। &lt;br /&gt;
====सम्मान====&lt;br /&gt;
अपने दर्शन शास्त्रीय विचारों के प्रकाशन द्वारा सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने पश्चिम का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। इन्हें 1922 में 'ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय' द्वारा 'दि हिन्दू व्यू ऑफ लाइफ' विषय पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। इन्होंने [[लंदन]] में ब्रिटिश एम्पायर के अंतर्गत आने वाली यूनिवर्सटियों के सम्मेलन में कलकत्ता यूनिवर्सटी का प्रतिनिधित्व भी किया। 1926 में राधाकृष्णन ने [[यूरोप]] और अमेरिका की यात्राएँ भी कीं। इनका सभी स्थानों पर शानदार स्वागत किया गया। इन्हें आक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, हार्वर्ड, प्रिंसटन और शिकागो विश्वविद्यालयों के द्वारा सम्मानित भी किया गया। डॉक्टर राधाकृष्णन को यूरोप एवं अमेरिका के प्रवास के प्रत्येक क्षणों की स्मृति थी। [[इंग्लैण्ड]] के समाचारों पत्रों ने इनके वक्तव्यों की आदर के साथ प्रशंसा की। उनकी टिप्पणियों से प्रकट होता था कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक ऐसी प्रतिभा हैं जो न केवल भारत के दर्शन शास्त्र की व्याख्या कर सकता है बल्कि पश्चिम का दर्शन शास्त्र भी उनकी प्रतिभा के दायरे में आ जाता है। एक शिक्षाविद् के रूप में उनको असीम प्रतिभा का धनी माना गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मानद उपाधियाँ====&lt;br /&gt;
जब डॉक्टर राधाकृष्णन यूरोप एवं अमेरिका प्रवास से पुनः भारत लौटे तो यहाँ के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें मानद उपाधियाँ प्रदान कर उनकी विद्वत्ता का सम्मान किया गया। 1928 की शीत ऋतु में इनकी प्रथम मुलाक़ात पंडित [[जवाहर लाल नेहरू]] से उस समय हुई, जब वह कांग्रेस पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए कोलकाता आए हुए थे। यद्यपि सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय शैक्षिक सेवा के सदस्य होने के कारण किसी भी राजनीतिक संभाषण में हिस्सेदारी नहीं कर सकते थे, तथापि उन्होंने इस वर्जना की कोई परवाह नहीं की और भाषण दिया। [[929]] में इन्हें व्याख्यान देने हेतु 'मेनेचेस्टर विश्वविद्यालय' द्वारा आमंत्रित किया गया। इन्होंने मेनचेस्टर एवं लंदन में कई व्याख्यान दिए। इनकी शिक्षा सम्बन्धी उपलब्धियों के दायरे में निम्नवत संस्थानिक सेवा कार्यों को देखा जाता है-&lt;br /&gt;
#डॉक्टर राधाकृष्णन वाल्टेयर विश्वविद्यालय, [[आंध्र प्रदेश]] के 1931 से 1936 तक वाइस चांसलर रहे।&lt;br /&gt;
#आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के 1936 से 1952 तक प्रोफेसर रहे।&lt;br /&gt;
#कलकत्ता विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में 1937 से 1941 तक कार्य किया।&lt;br /&gt;
#1939 से 1948 तक [[बनारस]] के हिन्दू विश्वविद्यालय के चांसलर रहे।&lt;br /&gt;
#[[1953]] से [[1962]] तक दिल्ली विश्वविद्यालय के चांसलर रहे। &lt;br /&gt;
#1940 में प्रथम भारतीय के रूप में ब्रिटिश अकादमी में चुने गए।&lt;br /&gt;
#1948 में यूनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sarvepalli-Radhakrishnan-Zakir-Hussain.jpg|thumb|250px|डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एवं डॉ. ज़ाकिर हुसैन ए.एम.यू. के विद्यार्थियों के साथ]]&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==राजनीतिक जीवन==&lt;br /&gt;
यह सर्वपल्ली राधाकृष्णन की ही प्रतिभा थी कि स्वतंत्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वह 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इस समय यह विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किए गए। अखिल भारतीय कांग्रेसजन यह चाहते थे कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन गैर राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी संविधान सभा के सदस्य बनाये जाएं। जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि राधाकृष्णन के संभाषण एवं वक्तृत्व प्रतिभा का उपयोग 14 - 15 अगस्त, 1947 की रात्रि को किया जाए, जब संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित हो। राधाकृष्णन को यह निर्देश दिया गया कि वह अपना सम्बोधन रात्रि के ठीक 12 बजे समाप्त करें। उसके पश्चात संवैधानिक [[संसद]] द्वारा शपथ ली जानी थी। &lt;br /&gt;
====राजनयिक कार्य====&lt;br /&gt;
सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ऐसा किया और ठीक रात्रि 12 बजे अपने सम्बोधन को विराम दिया। पंडित नेहरू और राधाकृष्णन के अलावा किसी अन्य को इसकी जानकारी नहीं थी। आज़ादी के बाद उनसे आग्रह किया गया कि वह मातृभूमि की सेवा के लिए विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें। इस प्रकार [[विजयलक्ष्मी पंडित]] का इन्हें नया उत्तराधिकारी चुना गया। पंडित नेहरू के इस चयन पर कई व्यक्तियों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि एक दर्शन शास्त्री को राजनयिक सेवाओं के लिए क्यों चुना गया? उन्हें यह संदेह था कि डॉक्टर राधाकृष्णन की योग्यताएँ सौंपी गई ज़िम्मेदारी के अनुकूल नहीं हैं। लेकिन बाद में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह साबित कर दिया कि मॉस्को में नियुक्त भारतीय राजनयिकों में वह बेहतरीन थे। वह एक गैर परम्परावादी राजनयिक थे। जो मंत्रणाएँ देर रात्रि होती थीं, वह उनमें रात्रि 10 बजे तक ही भाग लेते थे, क्योंकि उसके बाद उनके शयन का समय हो जाता था। जब राधाकृष्णन एक शिक्षक थे, तब वह नियमों के दायरों में नहीं बंधे थे। कक्षा में यह 20 मिनट देरी से आते थे और दस मिनट पूर्व ही चले जाते थे। इनका कहना था कि कक्षा में इन्हें जो व्याख्यान देना होता था, वह 20 मिनट के पर्याप्त समय में सम्पन्न हो जाता था। इसके उपरान्त भी यह विद्यार्थियों के प्रिय एवं आदरणीय शिक्षक बने रहे। &lt;br /&gt;
====सोवियत संघ से विदा====&lt;br /&gt;
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को स्टालिन से भेंट करने का दुर्लभ अवसर दो बार प्राप्त हुआ। [[14 जनवरी]], [[1945]] के दिन वह पहला अवसर आया, जब स्टालिन के निमंत्रण पर वह उनसे मिले। स्टालिन के हृदय में 'फिलास्फर राजदूत' के प्रति गहरा सम्मान था। इनकी दूसरी मुलाकात [[5 अप्रैल]], [[1952]] को हुई। जब भारतीय राजदूत सोवियत संघ से विदा होने वाले थे। विदा होते समय राधाकृष्णन ने स्टालिन के सिर और पीठ पर हाथ रखा। तब स्टालिन ने कहा था – '''तुम पहले व्यक्ति हो, जिसने मेरे साथ एक इंसान के रूप में व्यवहार किया हैं और मुझे अमानव अथवा दैत्य नहीं समझा है। तुम्हारे जाने से मैं दुख का अनुभव कर रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम दीर्घायु हो। मैं ज़्यादा नहीं जीना चाहता हूँ।''' इस समय स्टालिन की आँखों में नमी थी। फिर छह माह बाद ही स्टालिन की मृत्यु हो गई। &lt;br /&gt;
====उपराष्ट्रपति====&lt;br /&gt;
1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति निर्वाचित किए गए। संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का नया पद सृजित किया गया था। नेहरू जी ने इस पद हेतु राधाकृष्णन का चयन करके पुनः लोगों को चौंका दिया। उन्हें आश्चर्य था कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी के किसी राजनीतिज्ञ का चुनाव क्यों नहीं किया गया। उपराष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार भी सम्भाला। सन 1952 में वे भारत के [[उपराष्ट्रपति]] बनाए गए। बाद में पंडित नेहरू का यह चयन भी सार्थक सिद्ध हुआ, क्योंकि उपराष्ट्रपति के रूप में एक गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति ने सभी राजनीतिज्ञों को प्रभावित किया। संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिए काफ़ी सराहा। इनकी सदाशयता, दृढ़ता और विनोदी स्वभाव को लोग आज भी याद करते हैं। सितंबर, 1952 में इन्होंने यूरोप और मिडिल ईस्ट देशों की यात्रा की ताकि नए राष्ट्र हेतु मित्र राष्ट्रों का सहयोग मिल सके।&lt;br /&gt;
====यात्राएँ====&lt;br /&gt;
[[1956]] में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पत्नी का देहान्त हो गया। तब एक पुत्र और पांच पुत्रियों का दायित्व इन पर आ गया। इन ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए 1957 में यह दूसरी बार भी उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए। इस कार्यकाल के दौरान राधाकृष्णन ने [[चीन]], [[मंगोलिया]], [[हांगकांग]] और [[इंग्लैण्ड]] की यात्राएँ कीं। 1961 में इन्हें जर्मनी के पुस्तक प्रकाशन द्वारा दिया जाने वाला 'विश्व शान्ति पुरस्कार' भी प्राप्त हुआ। इस दौरान इन्होंने राज्यसभा का संचालन काफ़ी कुशलता के साथ किया। तब पंडित पंत को कहना पड़ा - '''राज्यसभा इनके हाथों का खिलौना मात्र है।'''&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==महत्त्वपूर्ण पद==&lt;br /&gt;
*डॉ. राधाकृष्णन ने अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे पेरिस में यूनेस्को नामक संस्था की कार्यसमि‍ति के अध्यक्ष भी रहे। यह संस्था 'संयुक्त राष्ट्र संघ' का एक अंग है और पूरे विश्व के लोगों की भलाई के लिए अनेक कार्य करती है। &lt;br /&gt;
*डॉ. राधाकृष्णन सन 1949 से सन 1952 तक रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत पद पर रहे। भारत रूस की मित्रता बढ़ाने में उनका भारी योगदान रहा था।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==शिक्षक दिवस==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dr.Radhakrishnan.jpg|thumb|सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में डाक टिकट]]&lt;br /&gt;
{{main|शिक्षक दिवस}}&lt;br /&gt;
हमारे देश में डॉक्टर राधाकृष्णन के जन्मदिन 5 सितंबर को प्रतिवर्ष 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन समस्त देश में भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार प्रदान किया जाता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन गैर राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी देश के राष्ट्रपति बने। इससे यह साबित होता है कि यदि व्यक्ति अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ कार्य करे तो भी दूसरे क्षेत्र उसकी प्रतिभा से अप्रभावित नहीं रहते। डॉक्टर राधाकृष्णन बहुआयामी प्रतिभा के धनी होने के साथ ही देश की संस्कृति को प्यार करने वाले व्यक्ति थे। उन्हें एक बेहतरीन शिक्षक, दार्शनिक, देशभक्त और निष्पक्ष एवं कुशल राष्ट्रपति के रूप में यह देश सदैव याद रखेगा।&lt;br /&gt;
[[राष्ट्रपति]] बनने के बाद कुछ शिष्य और प्रशंसक उनके पास गए और उन्होंने निवेदन किया था कि वे उनका जन्मदिन 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाना चाहते हैं। डॉक्टर राधाकृष्णन ने कहा, 'मेरा जन्मदिन 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाने के आपके निश्चय से मैं स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करूँगा।' तभी से 5 सितंबर देश भर में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। सन 1967 तक राष्ट्रपति के रूप में वह देश की सेवा करते रहे। एक बार विख्यात दार्शनिक प्लेटो ने कहा था- '''राजाओं का दार्शनिक होना चाहिए और दार्शनिकों को राजा।''' प्लेटो के इस कथन को 1962 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने तब सच कर दिखाया, जब वह भारत के दूसरे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। इस प्रकार एक दार्शनिक ने राजा की हैसियत प्राप्त की। [[13 मई]], [[1962]] को 31 तोपों की सलामी के साथ ही इनकी राष्ट्रपति के पद पर ताजपोशी हुई। इस संदर्भ में भारत सरकार के द्वारा गजट में एक अधिसूचना प्रकाशित हुई, जो विशिष्ट भाग द्वितीय, वर्ग 3 उपसर्ग द्वितीय दिनांक 17 मई, 1962 की एस. ओ. संख्या 1858 के अंतर्गत थी। &lt;br /&gt;
बर्टेड रसेल जो विश्व के जाने-माने दार्शनिक थे, वह राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बनने पर अपनी प्रतिक्रिया को रोक नहीं पाए। उन्होंने कहा था – '''यह विश्व के दर्शन शास्त्र का सम्मान है कि महान भारतीय गणराज्य ने डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति के रूप में चुना और एक दार्शनिक होने के नाते मैं विशेषत: खुश हूँ। प्लेटो ने कहा था कि दार्शनिकों को राजा होना चाहिए और महान भारतीय गणराज्य ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर प्लेटो को सच्ची श्रृद्धांजली अर्पित की है।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1962 में ग्रीस के राजा ने जब भारत का राजनयिक दौरा किया तो डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उनका स्वागत करते हुए कहा था – '''महाराज, आप ग्रीस के पहले राजा हैं, जो कि भारत में अतिथि की तरह आए हैं। [[सिकन्दर|अलेक्जेण्डर]] यहाँ अनिमंत्रित मेहमान बनकर आए थे।'''&amp;lt;ref&amp;gt;अलेक्जेण्डर ने भारत पर आक्रमण किया था और वह हमलावर की हैसियत से आया था&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====घोषणा====&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति बनने के बाद राधाकृष्णन ने भी पूर्व राष्ट्रपति [[डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद]] की भाँति स्वैच्छिक आधार पर राष्ट्रपति के वेतन से कटौती कराई थी। उन्होंने घोषणा की कि सप्ताह में दो दिन कोई भी व्यक्ति उनसे बिना पूर्व अनुमति के मिल सकता है। इस प्रकार राष्ट्रपति भवन को उन्होंने सर्वहारा वर्ग के लिए खोल दिया। राष्ट्रपति बनने के बाद वह [[ईरान]], [[अफ़ग़ानिस्तान]], [[इंग्लैण्ड]], [[अमेरिका]], [[नेपाल]], [[यूगोस्लाविया]], [[चेकोस्लोवाकिया]], [[रूमानिया]] तथा [[आयरलैण्ड]] भी गए। वह अमेरिका के राष्ट्रपति भवन 'व्हाइट हाउस' में हेलीकॉप्टर से अतिथि के रूप में पहुँचे थे। इससे पूर्व विश्व का कोई भी व्यक्ति व्हाइट हाउस में हेलीकॉप्टर द्वारा नहीं पहुँचा था। &lt;br /&gt;
====कार्यकाल====&lt;br /&gt;
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की तुलना में राधाकृष्णन का कार्यकाल काफ़ी कठिनाइयों से भरा था। इनके कार्यकाल में जहाँ [[चीन]] और [[पाकिस्तान]] से युद्ध हुए, वहीं पर दो प्रधानमंत्रियों की पद पर रहते हुए मृत्यु भी हुई। 1962 में जब [[चीन]] ने भारत पर आक्रमण किया था तो भारत की अपमानजनक पराजय हुई थी। उस समय [[वी. के. कृष्णामेनन]] भारत के [[रक्षामंत्री]] थे। तब पंडित नेहरू को डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ही मजबूर किया था कि कृष्णामेनन से इस्तीफ़ा तलब करें, जबकि नेहरू जी ऐसा नहीं चाहते थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीन के साथ युद्ध में पराजित होने के बाद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन पंडित नेहरू की भी आलोचना की थी। बेशक वह पंडित नेहरू के काफ़ी निकट थे, लेकिन उन्होंने आलोचना के स्थान पर आलोचना की और मार्गदर्शन की आवश्यकता होने पर मार्गदर्शन भी किया। यह राधाकृष्णन ही थे जिन्होंने पंडित नेहरू को मजबूर किया था कि वह [[लालबहादुर शास्त्री]] को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में स्थान प्रदान करें। उस समय कामराज योजना के अंतर्गत शास्त्री जी बिना विभाग के मंत्री थे। पंडित नेहरू के गम्भीर रूप से बीमार रहने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय शास्त्रीजी के परामर्श से ही चलता था।&lt;br /&gt;
====संवैधानिक व्यवस्था==== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Radha-Krishnan-1.jpg|thumb|सर्वपल्ली राधाकृष्णन&amp;lt;br /&amp;gt;Sarvepalli Radhakrishnan ]]&lt;br /&gt;
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कार्यकाल में ही पंडित नेहरू और शास्त्रीजी की [[प्रधानमंत्री]] के पद पर रहते हुए मृत्यु हुई थी। लेकिन दोनों बार नये प्रधानमंत्री का चयन सुगमतापूर्वक किया गया। जबकि दोनों बार उत्तराधिकारी घोषित नहीं था और न ही संवैधानिक व्यवस्था में कोई निर्देश था कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1967 के गणतंत्र दिवस पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने देश को सम्बोधित करते हुए यह स्पष्ट किया था कि वह अब किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति नहीं बनना चाहेंगे। यद्यपि कांग्रेस के नेताओं ने उनसे काफ़ी आग्रह किया कि वह अगले सत्र के लिए भी राष्ट्रपति का दायित्व ग्रहण करें, लेकिन राधाकृष्णन ने अपनी घोषणा पर पूरी तरह से अमल किया। &lt;br /&gt;
====अवकाशकालीन जीवन====&lt;br /&gt;
डॉक्टर राधाकृष्णन राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल पूर्ण करने के बाद गृहराज्य के शहर मद्रास चले गए। वहाँ उन्होंने पूर्ण अवकाशकालीन जीवन व्यतीत किया। 1968 में उन्हें भारतीय विद्या भवन के द्वारा सर्वश्रेष्ठ सम्मान देते हुए [[साहित्य अकादमी]] की सदस्यता प्रदान की गई। डॉक्टर राधाकृष्णन ने एक साधारण भारतीय इंसान की तरह अपना जीवन गुज़ारा था। वह परम्परागत वेशभूषा में रहते थे। वह सफ़ेद वस्त्र धारण करते थे और उस पर कोई भी दाग़ नहीं होता था। वह सिर पर दक्षिण भारतीय पगड़ी पहनते थे, जो कि भारतीय संस्कृति का प्रतीक बनकर सारे विश्व में जानी गई। राधाकृष्णन साधारण खाना खाते थे और जीवन पर्यन्त शाकाहारी रहे। उन्होंने एक बेहतरीन लेखक के रूप में 150 से अधिक रचनाएँ लिखीं। &lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==भारत रत्न==&lt;br /&gt;
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक डॉ. राधाकृष्णन को देश का सर्वोच्च अलंकरण [[भारत रत्न]] प्रदान किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==योगदान==&lt;br /&gt;
शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. राधाकृष्णन का अमूल्य योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वह एक विद्वान, शिक्षक, वक्ता, प्रशासक, राजनयिक, देशभक्त और शिक्षा शास्त्री थे। अपने जीवन में अनेक उच्च पदों पर रहते हुए भी वह शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान देते रहे। उनका कहना था कि यदि शिक्षा सही प्रकार से दी जाए तो समाज से अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन ने लम्बी बीमारी के बाद 17 अप्रैल, 1975 को प्रातःकाल अन्तिम साँस ली। वह अपने समय के एक महान दार्शनिक थे। देश के लिए यह अपूर्णीय क्षति थी।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==जीवनी का प्रकाशन==&lt;br /&gt;
डॉक्टर राधाकृष्णन के पुत्र डॉक्टर एस. गोपाल ने 1989 में उनकी जीवनी का प्रकाशन किया। इसके पूर्व डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के व्यक्तित्व तथा जीवन की घटनाओं के सम्बन्ध में किसी को भी अधिकाधिक जानकारी नहीं थी और न ही उनके रिश्तों के बारे में कुछ मालूम था। बाद में स्वयं उनके पुत्र ने भी माना कि उनके पिता की व्यक्तिगत ज़िदंगी के विषय में लिखना एक बड़ी चुनौती थी और एक नाज़ुक मामला भी। लेकिन डॉक्टर एस. गोपाल ने पिता के साथ अपने सम्बन्धों को भी जीवनी में रेखांकित किया। 1952 में न्यूयार्क में 'लाइब्रेरी ऑफ़ लिविंग फिलोसफर्स' के नाम से एक श्रृंखला दी गई जिसमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में अधिकारिक रूप से लिखा गया था। स्वयं राधाकृष्णन ने उसमें दर्ज सामग्री का कभी खंडन नहीं किया। मार्च [[1975]] में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
{{शिक्षक}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राष्ट्रपति]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीतिज्ञ]]&lt;br /&gt;
[[Category:शिक्षक]][[Category:शिक्षा कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>राजेन्द्र प्रसाद</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Dr.Rajendra-Prasad.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=डॉ. राजेन्द्र प्रसाद&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=राजेन बाबू&lt;br /&gt;
|जन्म=[[3 दिसम्बर]], [[1884]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[जीरादेयू]], [[बिहार]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=महादेव सहाय&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=राजवंशी देवी&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[28 फ़रवरी]], [[1963]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=सदाकत आश्रम, [[पटना]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]&lt;br /&gt;
|पद=भारत के प्रथम [[राष्ट्रपति]]&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=[[26 जनवरी]], [[1950]] से [[13 मई]], [[1962]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=[[कलकत्ता विश्वविद्यालय]], प्रेसीडेंसी कॉलेज (कलकत्ता)&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक, बी. एल., क़ानून में मास्टर डिग्री और डॉक्टरेट&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]]&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। (जन्म- [[3 दिसम्बर]], [[1884]], [[जीरादेयू]], [[बिहार]], मृत्यु- [[28 फ़रवरी]], [[1963]], सदाकत आश्रम, [[पटना]])। राजेन्द्र प्रसाद प्रतिभाशाली और विद्वान व्यक्ति थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मातृभूमि के लिए समर्पित== &lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद प्रतिभाशाली और विद्वान थे और कलकत्ता के एक योग्य वकील के यहाँ काम सीख रहे थे। राजेन्द्र प्रसाद का भविष्य एक सुंदर सपने की तरह था। राजेन्द्र प्रसाद का परिवार उनसे कई आशायें लगाये बैठा था। वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद के परिवार को उन पर गर्व था। लेकिन राजेन्द्र प्रसाद का मन इन सब में नहीं था। राजेन्द्र प्रसाद केवल धन और सुविधायें पाने के लिए आगे पढ़ना नहीं चाहते थे। एकाएक राजेन्द्र प्रसाद की दृष्टि में इन चीज़ों का कोई मूल्य नहीं रह गया था। राष्ट्रीय नेता [[गोपाल कृष्ण गोखले|गोखले]] के शब्द राजेन्द्र प्रसाद के कानों में बार-बार गूँज उठते थे।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8f5d31&amp;quot;&amp;gt;आज़ादी तो हमें तभी प्राप्त होगी, जबकि हम समाजवादी लड़ाई का मार्ग पकड़ें। '''नरेन्द्र देव'''&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद की मातृभूमि विदेशी शासन में जकड़ी हुई थी। राजेन्द्र प्रसाद उसकी पुकार को कैसे अनसुनी कर सकते थे। लेकिन राजेन्द्र प्रसाद यह भी जानते थे कि एक तरफ देश और दूसरी ओर परिवार की निष्ठा उन्हें भिन्न-भिन्न दिशाओं में खींच रही थी। राजेन्द्र प्रसाद का परिवार यह नहीं चाहता था कि वह अपना कार्य छोड़कर 'राष्ट्रीय आंदोलन' में भाग लें क्योंकि उसके लिए पूरे समर्पण की आवश्यकता होती है। राजेन्द्र प्रसाद को अपना रास्ता स्वयं चुनना पड़ेगा। यह उलझन मानों उनकी आत्मा को झकझोर रही थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद  ने रात खत्म होते-होते उन्होंने मन ही मन कुछ तय कर लिया था। राजेन्द्र प्रसाद  स्वार्थी बनकर अपने परिवार को सम्भालने का पूरा भार अपने बड़े भाई पर नहीं डाल सकते थे। राजेन्द्र प्रसाद के पिता का देहान्त हो चुका था। राजेन्द्र प्रसाद के बड़े भाई ने पिता का स्थान लेकर उनका मार्गदर्शन किया था और उच्च आदर्शों की प्रेरणा दी थी। राजेन्द्र प्रसाद  उन्हें अकेला कैसे छोड़ सकते थे? अगले दिन ही उन्होंने अपने भाई को पत्र लिखा, &amp;quot;मैंने सदा आपका कहना माना है-और यदि ईश्वर ने चाहा तो सदा ऐसा ही होगा।&amp;quot; दिल में यह शपथ लेते हुए कि अपने परिवार को और दुख नहीं देंगे उन्होंने लिखा, &amp;quot;मैं जितना कर सकता हूँ करूँगा और सब को प्रसन्न देख कर प्रसन्नता का अनुभव करूँगा।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन उनके दिल में उथल-पुथल मची रही। एक दिन वह अपनी आत्मा की पुकार सुनेंगे और स्वयं को पूर्णतया अपनी मातृभूमि के लिए समर्पित कर देंगे। यह युवक राजेन्द्र थे जो चार दशक पश्चात 'स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति' बने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म== &lt;br /&gt;
[[बिहार]] प्रान्त के एक छोटे से गाँव जीरादेयू में 3 दिसम्बर, 1884 में राजेन्द्र प्रसाद का जन्म हुआ था। एक बड़े संयुक्त परिवार के राजेन्द्र प्रसाद सबसे छोटे सदस्य थे, इसलिए वह सबके दुलारे थे। राजेन्द्र प्रसाद के परिवार के सदस्यों के सम्बन्ध गहरे और मृदु थे। राजेन्द्र प्रसाद को अपनी माता और बड़े भाई महेन्द्र प्रसाद से बहुत स्नेह था।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जीरादेयू गाँव की आबादी मिश्रित थी। मगर सब लोग इकट्ठे रहते थे। राजेन्द्र प्रसाद की सबसे पहली याद अपने हिन्दू और मुसलमान दोस्तों के साथ 'चिक्का और [[कबड्डी]]' खेलने की है। किशोरावस्था में उन्हें [[होली]] के त्योहार का इंतज़ार रहता था और उसमें उनके मुसलमान दोस्त भी शामिल रहते थे और [[मुहर्रम]] पर हिन्दू ताज़िये निकालते थे। &lt;br /&gt;
'राजेन बाबू' (राजेन्द्र प्रसाद) को गाँव के मठ में [[रामायण]] सुनना और स्थानीय [[रामलीला]] देखना बड़ा अच्छा लगता था। घर का वातावरण भी ईश्वर पर पूर्ण विश्वास का था। राजेन्द्र प्रसाद की माता बहुत बार उन्हें रामायण से कहानियाँ सुनातीं और भजन भी गाती थी। उनके चरित्र की दृढ़ता और उदार दृष्टिकोण की आधारशिला बचपन में ही रखी गई थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rajendra-Prasad-Stamp.jpg|thumb|राजेन्द्र प्रसाद के सम्मान में डाक टिकट]]&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
गाँव का जीवन पुरानी परम्पराओं से भरपूर था। इनमें से एक रिवाज़ था- बाल विवाह, और परम्परा के अनुसार राजेन्द्र प्रसाद का विवाह भी केवल बारह वर्ष की आयु में हो गया था। यह एक विस्तृत अनुष्ठान था जिसमें वधू के घर पहुँचने में घोड़ों, बैलगाड़ियों और हाथी के जुलूस को दो दिन लगे थे। वर एक चांदी की पालकी में, जिसे चार आदमी उठाते थे, सजे-धजे बैठे थे। रास्ते में उन्हें एक नदी भी पार करने थी। बरातियों को नदी पार कराने के लिए नाव का इस्तेमाल किया गया। घोड़े और बैलों ने तैरकर नदी पार की, मगर इकलौते हाथी ने पानी में उतरने से इंकार कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हाथी को पीछे ही छोड़ना पड़ा और राजेन्द्र प्रसाद के पिता जी 'महादेव सहाय' को इसका बड़ा दुख हुआ। अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने से दो मील पहले उन्होंने किसी अन्य विवाह से लौटते दो हाथी देखे। उनसे लेनदेन तय हुआ और परम्परा के अनुसार हाथी फिर विवाह के जुलूस में शामिल हो गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी तरह से यह जुलूस मध्य रात्रि को वधू के घर पहुँचा। लम्बी यात्रा और गर्मी से सब बेहाल हो रहे थे और वर तो पालकी में ही सो गये थे। बड़ी कठिनाई से उन्हें विवाह की रस्म के लिए उठाया गया। वधू, राजवंशी देवी, उन दिनों के रिवाज़ के अनुसार पर्दे में ही रहती थी। छुट्टियों में घर जाने पर अपनी पत्नी को देखने या उससे बोलने का राजेन्द्र प्रसाद को बहुत ही कम अवसर मिलता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद बाद में राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गए। तब वह पत्नी से और भी कम मिल पाते थे। वास्तव में विवाह के प्रथम पचास वर्षों में शायद पति-पत्नी पचास महीने ही साथ-साथ रहे होंगे। राजेन्द्र प्रसाद अपना सारा समय काम में बिताते और पत्नी बच्चों के साथ जीरादेयू गाँव में परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहती थीं।{{बाँयाबक्सा|पाठ=राजेन्द्र प्रसाद ने स्वीकार किया, &amp;quot;मैं ब्राह्मण के अलावा किसी का छुआ भोजन नहीं खाता था। चम्पारन में गांधीजी ने उन्हें अपने पुराने विचारों को छोड़ देने के लिये कहा। आख़िरकार उन्होंने समझाया कि जब वे साथ-साथ एक ध्येय के लेये कार्य करते हैं तो उन सबकी केवल एक जाति होती है अर्थात वे सब साथी कार्यकर्ता हैं।&amp;quot;- '''राजेन्द्र प्रसाद'''|विचारक=}} &lt;br /&gt;
==इंग्लैण्ड जाने का सपना==&lt;br /&gt;
बहुत बड़े परिवार में रहने के कारण शुरू से ही राजेन्द्र प्रसाद में अन्य सदस्यों का ध्यान रखने और निस्स्वार्थता का गुण आ गया था। छात्रकाल के दौरान उनके मन में आई. सी. एस. की परीक्षा देने के लिए [[इंग्लैण्ड]] जाने की बड़ी इच्छा थी। लेकिन उन्हें भय था कि परिवार के लोग इतनी दूर जाने की अनुमति कभी नहीं देंगे। इसलिए उन्होंने बहुत ही गुप्त रूप से जहाज़ में इंग्लैंण्ड जाने के लिए सीट का आरक्षण करवाया और अन्य सब प्रबन्ध किए। यहाँ तक की इंग्लैंण्ड में पहनने के लिए दो सूट भी सिलवा लिए। लेकिन जिसका उन्हें भय था वही हुआ। उनके पिताजी ने इस प्रस्ताव का बहुत जोर से विरोध किया। राजेन्द्र प्रसाद ने बहुत अनिच्छा से इंग्लैंण्ड जाने का विचार छोड़ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य लोगों के विचारों के प्रति सम्मान का गुण पूरा जीवन राजेन्द्र प्रसाद के साथ रहा। वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद के बचपन में विकसित सारे गुण जीवनभर उनके साथ रहे और उन्हें कठिनाइयों का सामना करने का साहस देते रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बचपन से ही परिश्रमी==&lt;br /&gt;
स्कूल के दिन परिश्रम और मौज-मस्ती का मिश्रण थे। उन दिनों में यह परम्परा थी कि शिक्षा का आरंभ [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] की शिक्षा से किया जाए। राजेन्द्र प्रसाद पाँच या छह वर्ष के रहे होंगे जब उन्हें और उनके दो चचेरे भाइयों को एक मौलवी साहब पढ़ाने के लिए आने लगे। शिक्षा आरंभ करने वाले दिन पैसे और मिठाई बांटी जाती है। लड़कों ने अपने अच्छे स्वभाव वाले मौलवी साहब के साथ शैतानियाँ भी की मगर मेहनत भी कस कर की। वे सुबह बड़ी जल्दी उठ कर कक्षा के कमरे में पढ़ने के लिए बैठ जाते। यह सिलसिला काफ़ी देर तक चलता और बीच में उन्हें खाने और आराम करने की छुट्टी मिलती। वास्तव में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि इतने छोटे बच्चे बहुत देर तक ध्यान लगा कर पढ़ाई कर सकें। ये विशेष गुण जीवनपर्यन्त राजेन्द्र प्रसाद में रहे और इन्हीं ने उन्हें विशिष्टता भी दिलाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विश्वविद्यालय की शिक्षा==&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद अपने नाज़ुक स्वास्थ्य के बावज़ूद भी एक गंभीर एवं प्रतिभाशाली छात्र थे और स्कूल व कॉलेज दोनों में ही उनका परिणाम बहुत ही अच्छा रहा। [[कलकत्ता विश्वविद्यालय]] की प्रवेश परीक्षा में राजेन्द्र प्रसाद प्रथम रहे और उन्हें तीस रुपये महीने की छात्रवृत्ति भी मिली। उन दिनों में तीस रुपये बहुत होते थे। लेकिन सबसे बड़ी बात थी कि पहली बार बिहार का एक छात्र परीक्षा में प्रथम आया था। उनके परिवार और उनके लिए यह एक गर्व का क्षण था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन [[1902]] ई. में राजेन्द्र प्रसाद ने [[कलकत्ता]] के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। यह सरल स्वभाव और निष्कपट युवक बिहार की सीमा से पहली बार बाहर निकल कर कलकत्ता जैसे बड़े शहर में आया था। अपनी कक्षा में जाने पर वह छात्रों को ताकता रह गया। सबके सिर नंगे थे और वह सब पश्चिमी वेषभूषा की पतलून और कमीज़ पहने थे। उन्होंने सोचा ये सब एंग्लो-इंडियन हैं लेकिन जब हाज़िरी बोली गई तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि सबके नाम हिन्दुस्तानी थे। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;राजेन्द्र प्रसाद का नाम हाज़िरी के समय नहीं पुकारा गया तो वह बहुत हिम्मत करके खड़े हुए और प्राध्यापक को बताया। प्राध्यापक उनके देहाती कपड़ों को घूरता ही रहा। वह सदा की तरह कुर्ता-पाजामा और टोपी पहने थे। &lt;br /&gt;
'ठहरो। मैंने अभी स्कूल के लड़कों की हाज़िरी नहीं ली,' प्राध्यापक ने तीखे स्वर में कहा। &lt;br /&gt;
वह शायद उन्हें एक स्कूल का लड़का समझ रहा था।&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद ने हठ किया कि वह प्रेसीडेंसी कॉलेज के छात्र हैं और अपना नाम भी बताया। &lt;br /&gt;
अब कक्षा के सब छात्र उन्हें घूरने लगे क्योंकि यह नाम तो उन दिनों सबकी ज़ुबान पर था। उस वर्ष राजेन्द्र प्रसाद नाम का लड़का विश्वविद्यालय में प्रथम आया था। ग़लती को तुरन्त सुधारा गया और इस तरह राजेन्द्र प्रसाद का कॉलेज जीवन आरम्भ हुआ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Nehru-bhulabhaidesai-rajendraprasd.png|thumb|220px|[[जवाहरलाल नेहरू|पंडित जवाहर लाल नेहरू]], [[राजेंद्र प्रसाद]] और [[भुलाभाई देसाई]]]]&lt;br /&gt;
==आत्मविश्वासी राजेन्द्र==&lt;br /&gt;
वर्ष के आख़िर में एक बार फिर ग़लती हुई। जब प्रिंसिपल ने एफ. ए. में उत्तीर्ण छात्रों के नाम लिए तो राजेन्द्र प्रसाद का नाम सूची में नहीं था। राजेन्द्र प्रसाद को अपने कानों पर विश्वास नहीं आया। क्योंकि इस परीक्षा के लिए उन्होंने बहुत ही परिश्रम किया था। आख़िर वह खड़े हुए और सम्भावित ग़लती की ओर संकेत किया। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;प्रिंसिपल ने तुरन्त उत्तर दिया कि वह फ़ेल हो गए होंगे। उन्हें इस मामले में तर्क नहीं करना चाहिए। &lt;br /&gt;
'लेकिन, लेकिन सर', राजेन्द्र प्रसाद ने हकलाकर, घबराते हुए कहा। इस समय उनका हृदय धक-धक कर रहा था। &lt;br /&gt;
'पाँच रुपया जुर्माना' क्रोधित प्रिंसिपल ने कहा। राजेन्द्र प्रसाद ने साहस कर फिर बोलना चाहा। &lt;br /&gt;
'दस रुपया जुर्माना', लाल-पीला होते हुए प्रिंसिपल चिल्लाया।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद बहुत घबरा गए। अगले कुछ क्षणों में जुर्माना बढ़कर 25 रुपये तक पहुँच गया। एकाएक हैड क्लर्क ने उन्हें पीछे से बैठ जाने का संकेत किया। एक ग़लती हो गई थी। पता चला कि वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद कक्षा में प्रथम आए थे। उनके नम्बर उनकी प्रवेश परीक्षा से भी इस बार बहुत अधिक थे। प्रिंसिपल नया था। इसलिए उसने इस प्रतिभाशाली छात्र को नहीं पहचाना था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद की छात्रवृत्ति दो वर्ष के लिए बढ़ाकर 50 रुपया प्रति मास कर दी गई। उसके बाद स्नातक की परीक्षा में भी उन्हें विशिष्ट स्थान मिला। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि राजेन्द्र प्रसाद सदा विनम्र बने रहे मगर उन्होंने यह महत्त्वपूर्ण पाठ पढ़ लिया था कि अपने संकोच को दूर कर स्वयं में आत्मविश्वास पैदा करना ही होगा। अपने कॉलेज के दिनों में राजेन्द्र प्रसाद को सदा योग्य अध्यापकों का समर्थन मिला, जिन्होंने अपने छात्रों को आगे बढ़ने की प्रेरणा एवं उच्च आचार-विचार की शिक्षा दी।{{दाँयाबक्सा|पाठ=राष्ट्रपति के पद पर राजेन्द्र प्रसाद ने सदभावना के लिए कई देशों की यात्रायें भी की। उन्होंने इस आण्विक युग में शान्ति की आवश्यकता पर जोर दिया। राजेन्द्र बाबू का यह विश्वास था कि अतीत और वर्तमान में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है।|विचारक=}}  &lt;br /&gt;
==जागरूकता==&lt;br /&gt;
उन दिनों [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] में सांस्कृतिक और सामाजिक जागृति हो रही थी। भारतीय इतिहास में यह संकट का समय था। सन [[1905]] में हुए बंगाल के विभाजन ने जनता में राजनीतिक जागरूकता का विकसित कर दिया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद एक बार की बात स्मरण करके कहते हैं, 'उन दिनों का वातावरण...नये जीवन और नई आंकाक्षाओं से भरा हुआ था। मैं उनके प्रभाव से बच नहीं पा रहा था।' &lt;br /&gt;
वह डॉन सोसाइटी के सदस्य बन गये जो छात्रों को अपनी भारतीय विरासत पर गर्व करना सिखाती थी। इसके बाद जल्दी ही राजेन्द्र प्रसाद सार्वजनिक और सामाजिक कार्यों की ओर आकर्षित हुए। राजेन्द्र प्रसाद ने कलकत्ता में एक 'बिहारी क्लब' बनाया जिसमें आरंभ में बिहार की स्थिति सुधारने और वहाँ के छात्रों की मदद करने का कार्य किया। बाद के वर्षों में यह क्लब कल्याण कार्यों का मंच बना। वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद के सार्वजनिक जीवन के लिए यह अच्छा प्रशिक्षण था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बंगाल का विभाजन लोगों में बढ़ती हुई राष्ट्रीयता की भावना को जानबूझकर दिया गया धक्का माना गया। इसने [[बाल गंगाधर तिलक|तिलक]], [[लाला लाजपत राय]] और [[विपिनचंद्र पाल]] जैसे नेताओं द्वारा आरंभ किये गए स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन (भारतीय चीज़ों का इस्तेमाल और ब्रिटिश चीज़ों का बहिष्कार) ने आग में घी का काम किया। उन्होंने इस आंदोलन को कुछ पाश्चात्य रंग में रंगे भारतीयों के हाथों से निकालकर जनता तक पहुँचाया। इस आंदोलन के कारण लोगों ने भारतीय वस्तुओं पर गर्व करना सीखा और लोग भारतीय उद्योग को प्रोत्साहन देने लगे।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rajagopalachari-Rajendra Prasad-Bose-Patel.jpg|thumb|250px|[[सी. राजगोपालाचारी]], डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, [[सुभाष चंद्र बोस]] और [[सरदार वल्लभ भाई पटेल]]]]&lt;br /&gt;
==स्वदेशी आंदोलन==&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद भी नये आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। अब पहली बार राजेन्द्र प्रसाद ने पुस्तकों की तरफ कम ध्यान देना शुरू किया। स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन ने राजेन्द्र प्रसाद के छात्रालय के छात्रों को बहुत प्रभावित किया। उन्होंने सब विदेशी कपड़ों को जलाने की क़सम खाई। एक दिन सबके बक्से खोल कर विदेशी कपड़े निकाले गये और उनकी होली जला दी गई। जब राजेन्द्र प्रसाद का बक्सा खोला गया तो एक भी कपड़ा विदेशी नहीं निकला। यह उनके देहाती पालन-पोषण के कारण नहीं था। बल्कि स्वतः ही उनका झुकाव देशी चीज़ों की ओर था। &lt;br /&gt;
[[गोपाल कृष्ण गोखले]] ने सन 1905 में 'सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी' आरम्भ की थी। उनका ध्येय था ऐसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक तैयार करना जो [[भारत]] में संवैधानिक सुधार करें। इस योग्य युवा छात्र से वह बहुत प्रभावित थे और उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद को इस सोसाइटी में शामिल होने के लिये प्रेरित किया। लेकिन परिवार की ओर से अपने कर्तव्य के कारण राजेन्द्र प्रसाद ने गोखले की पुकार को उस समय अनसुना कर दिया। लेकिन वह याद करते हैं,- 'मैं बहुत दुखी था।' और जीवन में पहली बार बी. एल. की परीक्षा में कठिनाई से पास हुए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==क़ानून में मास्टर डिग्री==&lt;br /&gt;
वह अब वक़ालत की दहलीज पर खड़े थे। उन्होंने जल्दी ही मुकदमों को अच्छी प्रकार और ईमानदारी से करने के लिये ख्याति पा ली। सन [[1915]] में क़ानून में मास्टर की डिग्री में विष्टिता पाने के लिए राजेन्द्र प्रसाद को सोने का मेडल मिला। इसके बाद उन्होंने क़ानून में डॉक्टरेट भी कर ली। अब वह डा. राजेन्द्र प्रसाद हो गये। इन वर्षों में राजेन्द्र प्रसाद कई प्रसिद्ध वक़ीलों, विद्वानों और लेखकों से मिले। राजेन्द्र प्रसाद भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी बन गये। राजेन्द्र प्रसाद के मस्तिष्क में राष्ट्रीयता ने जड़े जमा ली थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चम्पारन और ब्रिटिश दमन== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Champaran Satyagraha.jpg|thumb|220px|चंपारण सत्याग्रह आंदोलन के दौरान डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और अनुग्रह नारायण सिन्हा]]&lt;br /&gt;
ब्रिटिश शासक के अन्याय के प्रति हमारा दब्बूपन अब विरोध में बदल रहा था। सन [[1914]] में प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ होने पर लोगों के लिये नई कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई। जैसे- भारी कर, खाद्य पदार्थों की कमी कीमतों का बढ़ना और बेरोज़गारी। सुधार का कोई संकेत नहीं मिल रहा था। &lt;br /&gt;
जब कलकत्ता में सन [[1917]] के दिसम्बर माह में 'ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी' का अधिवेशन हुआ तो भारत में उथल-पुथल मची हुई थी। राजेन्द्र प्रसाद भी इस अधिवेशन में शामिल हुए। उनके साथ ही एक सांवले रंग का दुबला-पतला आदमी बैठा था मगर उसकी आँखें बड़ी तेज़ और चमकीली थी। राजेन्द्र प्रसाद ने सुना था कि वह [[अफ़्रीका]] से आया है लेकिन अपने स्वाभाविक संकोच के कारण वह उससे बातचीत न कर सके। यह व्यक्ति और कोई नहीं [[महात्मा गांधी]] ही थे। वह अभी-अभी [[दक्षिण अफ़्रीका]] में सरकारी दमन के विरूद्ध संघर्ष करके [[भारत]] लौटे थे। राजेन्द्र प्रसाद को उस समय पता नहीं था कि वह सांवला पैनी आँखों वाला व्यक्ति ही उनके भविष्य के जीवन को आकार देगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गांधी जी ने अपना प्रथम प्रयोग बिहार के चम्पारन ज़िले में किया जहाँ कृषकों की दशा बहुत ही दयनीय थी। ब्रिटिश लोगों ने बहुत सारी धरती पर नील की खेती आरम्भ कर दी थी जो उनके लिये लाभदायक थी। भूखे, नंगे, कृषक किरायेदार को नील उगाने के लिये ज़बरदस्ती की जाती। यदि वे उनकी आज्ञा नहीं मानते तो उन पर जुर्माना किया जाता और क्रूरता से यातनाएँ दी जाती एवं उनके खेत और घरों का नष्ट कर दिया जाता था। जब भी झगड़ा हाई कोर्ट में पेश हुआ, तब-तब वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद ने सदा बिना फ़ीस लिये इन कृषकों का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन फिर भी वह निरन्तर जानवरों जैसी स्थिति में रहते आ रहे थे। &lt;br /&gt;
गांधीजी को चम्पारन में हो रहे दमन पर विश्वास नहीं हुआ और वास्तविकता का पता लगाने वह कलकत्ता अधिवेशन के बाद स्वयं बिहार गये। महात्मा गांधी के साथ चम्पारन का एक कृषक नेता था। जो पहले उन्हें राजेन्द्र प्रसाद जी के घर [[पटना]] में ले आया। घर में केवल नौकर था। गांधीजी को एक किसान मुवक्किल समझकर उसने बड़ी रूखाई से उन्हें बाहर बैठने के लिये कहा। कुछ समय बाद गांधी जी अपनी चम्पारन की यात्रा पर चल दिये। नील कर साहब और यहाँ के सरकारी अधिकारियों को डर था कि गांधीजी के आने से गड़बड़ न हो जाये। इसलिये उन्हें सरकारी आदेश दिया गया कि तत्काल ज़िला छोड़ कर चलें जायें। &lt;br /&gt;
गांधीजी ने वहाँ से जाने से इंकार कर दिया और उत्तर दिया कि वह आंदोलन करने नहीं आये। केवल पूछताछ से जानना चाहते हैं। बहुत बड़ी संख्या में पीड़ित किसान उनके पास अपने दुख की कहानियां लेकर आने लगे। अब उन्हें कचहरी में पेश होने के लिये कहा गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गांधी जी से भेंट==&lt;br /&gt;
बाबू राजेन्द्र प्रसाद की ख़्याति कि वह बहुत समर्पित कार्यकर्ता हैं, गांधी जी के पास पहुँच चुकी थीं। गांधी जी ने राजेन्द्र प्रसाद को चम्पारन की स्थिति बताते हुए एक तार भेजा और कहा कि वह तुरन्त कुछ स्वयंसेवकों को साथ लेकर वहाँ आ जायें। बाबू राजेन्द्र प्रसाद का गांधी जी के साथ यह पहला सम्पर्क था। वह उनके अपने जीवन में ही नहीं बल्कि भारत की राष्ट्रीयता के इतिहास में भी, एक नया मोड़ था। &lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद तुरन्त चम्पारन पहुँचे और गांधी जी में उनकी दिलचस्पी जागी। पहली बार मिलने पर उन्हें गांधी जी की शक्ल या बातचीत किसी ने भी प्रभावित नहीं किया था। हां, वह अपने नौकर का गांधी जी से किये दुर्व्यवहार से जिसके बारे में उन्होंने सुना था, बहुत दुखी थे। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Gandhi-Rajendra-Prasad.jpg|thumb|220px|डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और [[महात्मा गांधी]]]]&lt;br /&gt;
उस रात गांधी जी ने जागकर वाइसरॉय और भारतीय नेताओं को पत्र लिखे और कचहरी में पेश करने के लिये अपना बयान भी लिखा। उन्होंने केवल एक बार रूक कर बाबू राजेन्द्र प्रसाद और उनके साथियों से पूछा कि यदि उन्हें जेल भेज दिया गया तो वे क्या करेंगे। एक स्वयंसेवक ने हंसते हुए कहा कि तब उनका काम भी खत्म हो जायेगा और वे सब अपने घर चले जायेंगे। &lt;br /&gt;
इस समय इस बात ने राजेन्द्र प्रसाद जी के दिल को छू लिया और उसमें हलचल मच गई। यह एक ऐसा आदमी है जो इस प्रान्त का निवासी नहीं है और किसानों के अधिकारों के लिये जी-जान से संघर्ष कर रहा है। वह न्याय के लिये जेल जाने को भी तैयार है। और यहाँ हमारे जैसे 'बिहारी' जो अपने क्षेत्र के किसानों की मदद करने पर गर्व करते हैं लेकिन फिर भी हम सब घर चले जायेंगे। &lt;br /&gt;
इस अजीबोग़रीब स्थिति ने उन्हें चौंका दिया। वह इस छोटे से आदमी को आश्चर्यचकित से ताकते रहे। जिन लोगों को वह जानते थे उनमें से किसी ने भी कभी जेल जाने तक का सपना नहीं देखा था। वकीलों के लिए जेल एक गन्दा शब्द था। जेल केवल अपराधियों के लिए था। अपराधी भी जेल की सख़्ती से बचने के लिए अधिकारियों को बड़ी-बड़ी रकमें देते थे, और यह आदमी जाने कहां से आकर जेल जाने की बात कर रहा था। उसका भी तो घर और परिवार होगा। &lt;br /&gt;
अगली सुबह तक गांधी जी के नि:स्वार्थ उदाहरण ने बाबू राजेन्द्र प्रसाद और उनके साथियों का दिल जीत लिया था। अब वे उनके साथ जेल जाने के लिए तैयार थे। &lt;br /&gt;
कचहरी में गांधी जी ने कहा कि उन्होंने चम्पारन छोड़ने का अधिकारियों का आदेश अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर ही नहीं माना था। वह जेल जाने को तैयार हैं। बाबू राजेन्द्र प्रसाद और उनके साथी जब तक गिरफ़्तार नहीं कर लिये जाते और उनका स्थान अन्य नेता नहीं ले लेते पूछताछ का काम जारी रखेंगे। उस दिन दूर-दूर के गाँवों से इतने लोग कचहरी में गांधीजी को सुनने आये कि वहाँ का दरवाज़ा ही टूट गया।&lt;br /&gt;
==सत्याग्रह की पहली विजय==&lt;br /&gt;
यह एक चमत्कार के समान था। गांधी जी का निडरता से होकर सत्य और न्याय पर अड़े रहने से सरकार बहुत प्रभावित हुई। मुकदमा वापस ले लिया गया और वह अब पूछताछ के लिए स्वतंत्र थे। यहाँ तक की अधिकारियों को भी उनकी मदद करने के लिये कहा गया। &lt;br /&gt;
यह सत्याग्रह की पहली विजय थी। स्वाधीनता संघर्ष में गांधी जी का यह महत्त्वपूर्ण योगदान था। सत्याग्रह ने हमें सिखाया कि निर्भय होकर दमनकारी के विरूद्ध अपने अधिकारों के लिए अहिंसात्मक तरीके से अड़े रहो।{{बाँयाबक्सा|पाठ=राष्ट्रपति बनने पर भी उनका राष्ट्र के प्रति समर्पित जीवन चलता रहा। वृद्ध और नाज़ुक स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने भारत की जनता के साथ अपना निजी सम्पर्क कायम रखा। वह वर्ष में से 150 दिन रेलगाड़ी द्वारा यात्रा करते और आमतौर पर छोटे-छोटे स्टेशनों पर रूककर सामान्य लोगों से मिलते।- '''राजेन्द्र प्रसाद'''|विचारक=}}  &lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद चम्पारन आंदोलन के दौरान गांधीजी के वफादार साथी बन गये। क़्ररीब 25,000 किसानों के बयान लिखे गये और अन्ततः यह काम उन्हें ही सौंप दिया गया। &lt;br /&gt;
[[बिहार]] और [[उड़ीसा]] की सरकारों ने अन्ततोगत्वा इन रिपोर्टों के आधार पर एक अधिनियम पास करके चम्पारन के किसानों को लम्बे वर्षों के अन्याय से छुटकारा दिलाया। &lt;br /&gt;
सत्याग्रह की वास्तविक सफलता लोगों के हृदय पर विजय थी। गांधीजी के आदर्शवाद, साहस और व्यावहारिक सक्रियता से प्रभावित होकर राजेन्द्र प्रसाद अपने पूरे जीवन के लिये उनके समर्पित अनुयायी बन गये। वह याद करते हैं, 'हमारे सारे दृष्टिकोण में परिवर्तन हो गया था...हम नये विचार, नया साहस और नया कार्यक्रम लेकर घर लौटे।'&lt;br /&gt;
बाबू राजेन्द्र प्रसाद के हृदय में मानवता के लिये असीम दया थी। 'स्वार्थ से पहले सेवा' शायद यही उनके जीवन का ध्येय था। &lt;br /&gt;
जब सन 1914 में बंगाल और बिहार के लोग बाढ़ से पीड़ित हुए तो उनकी दयालु प्रकृति लोगों की वेदना से बहुत प्रभावित हुई। उस समय वह स्वयंसेवक बन नाव में बैठकर दिन-रात पीड़ितों को भोजन और कपड़ा बांटते। रात को वह निकट के रेलवे स्टेशन पर सो जाते। इस मानवीय कार्य के लिये जैसे उनकी आत्मा भूखी थी और यहीं से उनके जीवन में निस्स्वार्थ सेवा का आरम्भ हुआ।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rajendra-Prasad-With-Eisenhower.jpg|thumb|250px|डॉ. राजेंद्र प्रसाद और 34 वें अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वैट ऐज़नहौवर, सन 1959]]&lt;br /&gt;
==अस्पृश्यता का त्याग==&lt;br /&gt;
गांधीजी के निकट संबंध के कारण उनके पुराने विचारों में एक क्रान्ति आई और वह सब चीजों को नये दृष्टिकोण से देखने लगे। उन्होंने महात्मा गांधी के मानवीय विकास और समाज सुधार कार्यों में भरसक सहायता की। उन्होंने महसूस किया, &amp;quot;विदेशी ताकतों का हम पर राज करने का मूल कारण हमारी कमज़ोरी और सामाजिक ढांचे में दरारें हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अस्पृश्यता का अभिशाप जो प्राचीन समय से चला आ रहा था भारतीय समाज की एक ऐसी कुरीति थी जिसके द्वारा नीची जातियों को ऐसे दूर रखा जाता था मानों वे कोई छूत की बीमारी हों। उन्हें मंदिर के भीतर जाने नहीं दिया जाता था। यहाँ तक की गांव में कुए से पानी भी नहीं भरने देते थे।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
लेकिन समाज के बदलने से पहले अपने को बदलने का साहस होना चाहिये। &amp;quot;यह बात सच थी,&amp;quot; राजेन्द्र प्रसाद ने स्वीकार किया, &amp;quot;मैं ब्राह्मण के अलावा किसी का छुआ भोजन नहीं खाता था। चम्पारन में गांधीजी ने उन्हें अपने पुराने विचारों को छोड़ देने के लिये कहा। आख़िरकार उन्होंने समझाया कि जब वे साथ-साथ एक ध्येय के लेये कार्य करते हैं तो उन सबकी केवल एक जाति होती है अर्थात वे सब साथी कार्यकर्ता हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गाँधी जी का हरिजन आंदोलन==&lt;br /&gt;
डा. राजेन्द्र प्रसाद जी ने सादा जीवन अपनाया और नौकरों की संख्या कम करके एक कर दी। वह स्मरण करते हैं, &amp;quot;सच तो यह है कि हम सब कुछ स्वयं ही करते थे। यहाँ तक की अपने कमरे में झाड़ू लगाना, रसोईघर साफ करना, अपना बर्तन मांजना-धोना, अपना सामान उठाना और अब गाड़ी में भी तीसरे दर्जे में यात्रा करना अपमानजनक नहीं लगता था।&amp;quot; &lt;br /&gt;
देश ने गांधी जी के हरिजन आंदोलन में बहुत उत्साह दिखाया। बिहार ने प्रतिज्ञा की कि वह इस कुरीति को और हरिजनों के कल्याण के लिये किये कार्य द्वारा हटायेंगे। दक्षिण भारत को उन्होंने &amp;quot;अस्पृश्यता का गढ़&amp;quot; कहा। राजेन्द्र प्रसाद वहां [[राजगोपालाचारी|सी. राजगोपालाचारी]] के साथ गये और बहुत प्रयास किया कि मंदिरों के द्वार हरिजनों के लिये खोल दिये जायें। उन्हें कुछ सफलता भी मिली। उन्होंने गांव के कुंए का उपयोग करने के अधिकार के लिए भी लड़ाई की। इस सुविधा को भी अन्य सुविधाओं के साथ स्वीकार कर लिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भूकम्प और राहत कार्य== &lt;br /&gt;
जनवरी सन 1934 में बिहार को एक भंयकर भूकम्प ने झिंझोड़ दिया। जीवन और सम्पत्ति की बहुत हानि हुई। राजेन्द्र प्रसाद अपनी अस्वस्थता के बाद भी राहत कार्य में जुट गये। वह उन लोगों के लिये जिनके घर नष्ट हो गये थे, भोजन, कपड़ा और दवाइयां इकट्ठी करते। भूकम्प के पश्चात बिहार में बाढ़ और मलेरिया का प्रकोप हुआ। जिससे जनता की तकलीफें और भी बढ़ गई। इस भूकम्प और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में काम करने में गांधी जी ने राजेन्द्र प्रसाद का साथ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ समय पश्चात उत्तर-पश्चिम में कोयटा नगर में, मई सन 1935 में भयंकर भूकम्प आया और उस क्षेत्र में भीषण विनाश लीला हुई। सरकारी प्रतिबन्धों के कारण राजेन्द्र प्रसाद तुरन्त वहां पहुंच न सके। उन्होंने [[पंजाब]] और सिंध में राहत कमेटियां बना दी जो भूकम्प द्वारा बेघर और वहां से आये लोगों को राहत देने का काम करने लगी। &lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद बड़ी हिम्मत से साम्प्रदायिक तनाव को कम करने, स्त्रियों की स्थिति में सुधार और गांवों में खादी और उद्योगों का विकास एवं राष्ट्र के अन्य निर्माण कार्य में लगे रहे। यह कार्य वह अपने जीवन के अंतिम दिनों तक करते रहे। उनकी मानवता आदमी के भीतर की अच्छाई को छू जाती थी।{{दाँयाबक्सा|पाठ=&amp;quot;अपने मन में मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम्हारा व्यक्तित्व घायल आत्माओं पर मरहम का काम करेगा और अविश्वास और गड़बड़ के वातावरण को शान्ति और एकता के वातावरण में बदल देगा।&amp;quot;- '''[[रवीन्द्रनाथ टैगोर]]'''|विचारक=}}  &lt;br /&gt;
==स्वाधीनता संग्राम में== &lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद ने अन्य नेताओं के साथ राष्ट्र निर्माण का अति विशाल कार्य ले लिया। उस समय उनके भीतर जल रही राष्ट्रीयता की ज्वाला को कोई नहीं बुझा सकता था। राजेन्द्र प्रसाद गांधी जी के बहुत निष्ठावान अनुयायी थे। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह स्वाधीनता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें और पूरे भारत को गांधी के रूप में आंदोलन के लिये नया नेता और सत्याग्रह व असहयोग के रूप में एक नया अस्त्र मिला। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्व इतिहास में ऐसा उदाहरण नहीं मिलेगा जहां इतने निरस्त्र लोग अहिंसा अपनाकर इतनी बहादुरी से लड़े हों। सत्य और न्याय के आदर्शों को धारण करके उनका ब्रिटिश शासन को हिलाने का निश्चय दृढ़ होता जा रहा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरकार ने अपने दमनकारी अस्त्रों से इस उत्साह को दबाने का प्रयास किया। मार्च सन 1919 में [[रॉलेट एक्ट]] पास किया गया। इसके द्वारा जज राजनीतिक मुकदमों को जूरी के बिना सुन सकते थे और संदेहास्पद राजनीतिक लोगों को बिना किसी प्रक्रिया के जेल में डाला जा सकता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोगों का असंतोष बढ़ता गया। गांधीजी ने पूरे देश में छ अप्रॅल सन 1919 को हड़ताल बुलाई। &amp;quot;सारा काम ठप्प हो गया...यहाँ तक की गांवों में भी किसानों ने हल एक ओर रख दिये&amp;quot;, राजेन्द्र प्रसाद ने टिप्पणी की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन सरकार का अत्याचार बढ़ता ही गया। [[अमृतसर]] के [[जलियाँवाला बाग़]] में 13 अप्रेल, 1919 में एक विरोध सभा में ढेर सारे निरस्त्र लोग मारे गये और कई घायल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==असहयोग आंदोलन==&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद इस बात से बहुत क्रोधित हो उठे और उन्होंने निर्भीकता से बिहार की जनता से गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन को स्वीकार करने की अपील की। यह ऐसा समय था जब देश के लिये कोई भी बलिदान बहुत बड़ा नहीं था। बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी फलती-फूलती वकालत छोड़कर पटना के निकट सनअ 1921 में एक नेशनल कॉलेज खोला। हज़ारों छात्र और प्रोफ़ेसर जिन्होंने सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार किया था यहाँ आ गये। फिर इस कॉलेज को [[गंगा नदी|गंगा]] किनारे सदाकत आश्रम में ले जाया गया। अगले 25 वर्षों के लिये यह राजेन्द्र प्रसाद जी का घर था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिहार में असहयोग आंदोलन 1921 में दावानल की तरह फैल गया। राजेन्द्र प्रसाद दूर-दूर की यात्रायें करते, सार्वजनिक सभायें बुलाते, जिससे सबसे सहायता ले सकें और धन इकट्ठा कर सकें। उनके लिये यह एक नया अनुभव था। &amp;quot;मुझे अब रोज़ सभाओं में बोलना पड़ता था इसलिये मेरा स्वाभाविक संकोच दूर हो गया...&amp;quot; साधारणतया क़्ररीब 20,000 लोग इन सभाओं में उपस्थित होते। उनके नेतृत्व में गांवों में सेवा समितियों और पंचायतों का संगठन किया गया। लोगों से अनुरोध किया गया कि विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करें और खादी पहनें व चर्खा कातना आरम्भ करें। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Maulana-Azad-Rajendra-Prasad.jpg|thumb|220px|राजेन्द्र प्रसाद और [[अबुलकलाम आज़ाद|मौलाना अबुल कलाम आज़ाद]]]]&lt;br /&gt;
यह अनिवार्य था कि राजनीति का दृश्य बदले। राजेन्द्र प्रसाद ने जागरूकता का वर्णन इस प्रकार किया है, &amp;quot;अब राजनीति शिक्षितों और व्यवसायी लोगों के कमरों से निकलकर देहात की झोपड़ियों में प्रवेश कर गई थी और इसमें हिस्सा लेने वाले थे किसान।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सरकार का दमन चक्र==&lt;br /&gt;
सरकार ने इसके उत्तर में अपना दमन चक्र चलाया। हज़ारों लोग जिनमें [[लाला लाजपत राय]], [[जवाहर लाल नेहरू]], [[देशबन्धु चितरंजन दास]] और [[अबुलकलाम आज़ाद|मौलाना अबुल कलाम आज़ाद]] जैसे प्रसिद्ध नेता गिरफ्तार कर लिये गये। &lt;br /&gt;
आंदोलन का अनोखापन था उसका अहिंसक होना। लेकिन फ़रवरी सन 1922 में गांधीजी ने 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' की पुकार दी किन्तु 'चौरी चौरा', [[उत्तर प्रदेश]] में हिंसक घटनायें होने पर गांधी जी ने सविनय सवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया। उन्हें लगा कि हिंसा न्यायसंगत नहीं है। और राजनीतिक सफलता को कुछ समय के लिये स्थगित किया जाना ही अच्छा है। जिससे नैतिक असफलता से बचा जा सके। कई नेताओं ने आंदोलन को स्थगित करने के लिये गांधी जी की कड़ी आलोचना की लेकिन राजेन्द्र प्रसाद ने दृढ़ता के साथ उनका साथ दिया। उन्हें गांधीजी की बुद्धिमत्ता पर पूर्ण विश्वास था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नमक सत्याग्रह==&lt;br /&gt;
नमक सत्याग्रह का आरम्भ गांधी जी ने समुद्र तट की ओर यात्रा करके डांडी में किया। जिससे नमक क़ानून का उल्लंघन वह कर सकें। डांडी, [[साबरमती आश्रम]] से 320 किलोमीटर दूर थी। नमक की ज़रूरत हवा और पानी की तरह सब को है और उन्होंने महसूस किया कि नमक पर कर लगाना अमानुषिक कार्य था। यह पूरे राष्ट्र को सक्रिय होने का संकेत था। बिहार में नमक सत्याग्रह का आरम्भ राजेन्द्र प्रसाद के नेतृत्व में हुआ। पुलिस आक्रामण के बावजूद नमक क़ानून के उल्लघंन के लिये पटना में नख़ास तालाब चुना गया। स्वयंसेवकों के दल उत्साहपूर्वक एक के बाद एक आते और नमक बनाने के लिये गिरफ्तार कर लिये जाते। राजेन्द्र प्रसाद ने अहिंसक रहने के लिये स्वयंसेवकों से अपील की। कई स्वयंसेवक गम्भीर रूप से घायल हुए।{{बाँयाबक्सा|पाठ=वह स्मरण करते हैं, &amp;quot;सच तो यह है कि हम सब कुछ स्वयं ही करते थे। यहाँ तक की अपने कमरे में झाड़ू लगाना, रसोईघर साफ करना, अपना बर्तन मांजना-धोना, अपना सामान उठाना और अब गाड़ी में भी तीसरे दर्जे में यात्रा करना अपमानजनक नहीं लगता था।&amp;quot;- '''राजेन्द्र प्रसाद'''|विचारक=}} &lt;br /&gt;
[[चित्र:Nehru-rajendraprasad.jpg|thumb|220px|[[जवाहरलाल नेहरू|पंडित जवाहर लाल नेहरू]] और राजेंद्र प्रसाद]]&lt;br /&gt;
==नमक सत्याग्रह और जेल यात्रा==&lt;br /&gt;
नमक सत्याग्रह के प्रति पुलिस के अत्याचार इतने बढ़ गये कि जनता में रोष उत्पन्न हो गया क्योंकि वह उलट कर पुलिस को मारती नहीं थी और सरकार को अंत में पुलिस को वहां से हटाना पड़ा। अब स्वयंसेवक नमक बना सकते थे। राजेन्द्र प्रसाद ने उस निर्मित नमक को बेचकर धन इकट्ठा किया। जिस क़ानून को वह न्यायसंगत नहीं समझते थे उसे तोड़ने से कोई भी चीज उन्हें रोक नहीं सकती थी। एक बार तो वह पुलिस की लाठियों द्वारा गम्भीर रूप से घायल हो गये थे। &lt;br /&gt;
उन्हें छः महीने की जेल हुई। यह उनकी पहली जेल यात्रा थी। &lt;br /&gt;
==कवि राजेन्द्र==&lt;br /&gt;
सन 1934 में भूकम्प पीड़ितों के लिये राहत कार्य करने के दौरान राजेन्द्र प्रसाद के भाई महेन्द्र प्रसाद का निधन हो गया। राजेन्द्र बाबू ने लिखा है, &amp;quot;इस संकट काल में मेरे भाई के देहान्त से मुझे भारी धक्का लगा और अपने मन को सांत्वना देने के लिए मैंने गीतों का सहारा लिया।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष==&lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद इंडियन नेशनल कांग्रेस के एक से अधिक बार अध्यक्ष रहे। अक्तूबर सन 1934 में बम्बई में हुए इंडियन नेशनल कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद ने की थी। उन्होंने गांधी जी की सलाह से अपने अध्यक्षीय भाषण को अन्तिम रूप दिया। सही बात का समर्थन करना सभा की कार्रवाई में प्रतिबिम्बित होता है। जब गांधीजी ने उनसे पूछा कि उन्होंने [[पंडित मदनमोहन मालवीय]] जैसे गणमान्य नेता को दूसरी बार बोलने से कैसे मना कर दिया तो उन्होंने उत्तर में कहा कि ऐसा निर्णय उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष होने के नाते लिया था न कि राजेन्द्र प्रसाद के रूप में। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने सक्रीय, गतिशील, अंहिसात्मक, सामूहिक कार्य और अंतहीन बलिदान को स्वाधीनता का मूल्य बताते हुए उन पर जोर दिया। अपनी बीमारी के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से उन्होंने बहुत दौरे किए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कांग्रेस की स्वर्ण जयन्ती (सन 1885-1935) मनाई गई और कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने संदेश में कहा, &amp;quot;यह दिन स्मरण करने और अपने निश्चय को दोहराने का है कि हम पूर्ण स्वराज्य लेंगे, जो स्वर्गीय तिलक के शब्दों में हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री [[सुभाषचंद्र बोस]] के अप्रैल सन 1939 में कांग्रेस अध्यक्षता (त्रिपुरी) से त्यागपत्र देने के बाद राजेन्द्र प्रसाद फिर अध्यक्ष चुने गये। वह अपना बहुत सारा समय कांग्रेस के भीतरी झगड़ों को निबटाने में लगाते। कवि [[रवीन्द्रनाथ टैगोर]] ने उन्हें लिखा, &amp;quot;अपने मन में मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम्हारा व्यक्तित्व घायल आत्माओं पर मरहम का काम करेगा और अविश्वास और गड़बड़ के वातावरण को शान्ति और एकता के वातावरण में बदल देगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वाधीनता की ओर== &lt;br /&gt;
हमारे स्वतंत्रता के इतिहास में सन 1939-47 तक के वर्ष बड़े महत्त्वपूर्ण थे। हम धीरे-घीरे स्व-प्रशासन की ओर बढ़ रहे थे। &lt;br /&gt;
इस समय साम्प्रदायिक दुर्भावनाओं के रूप में एक उपद्रवी तत्त्व उत्पन्न हो गया था। यह देखकर राजेन्द्र प्रसाद को बहुत निराशा हुई कि यह भावना बढ़ती जा रही है। जीरादेई में उन्होंने अपने संघर्ष के अन्तिम दौर के दौरान दोनों सम्प्रदायों को शान्त रहने की प्रार्थना करते हुए कहा, &amp;quot;यह तो अनिवार्य है कि दलों में विचारों की भिन्नता हो लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम एक-दूसरे का सिर फोड़ दें।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[मुहम्मद अली जिन्ना]] ने [[पाकिस्तान]] को अपनी पार्टी, [[मुस्लिम लीग]] का ध्येय घोषित कर दिया था। लेकिन विभाजन का विचार राजेन्द्र प्रसाद के सिद्धांतों और दृष्टिकोण के बिल्कुल विरूद्ध था। उन्हें इस विचार में कोई ऐसा व्यावहारिक हल नहीं मिला। जब भी बिहार में सम्प्रदायिक दंगे होते, राजेन्द्र प्रसाद तुरन्त वहां पहुंचते। उन्हें वहां के हृदय विदारक दृश्य देखकर बड़ा धक्का लगा। वह हमेशा विवेकपूर्ण बातें करते।&lt;br /&gt;
==शान्ति का स्वर==&lt;br /&gt;
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर ब्रिटेन ने महसूस किया कि अब भारत के साथ और अधिक समय चिपके रहना कठिन है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री [[क्लीमेंट एटली]] ने घोषणा की कि वह भारतीय नेताओं के साथ देश के विधान और सत्ता की तबदीली के बारे में विचार-विमर्श करेंगे। स्वाधीनता निकट ही दिखाई दे रही थी। &lt;br /&gt;
*सन 1946 में भारत आने वाले ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के प्रयास असफल रहे थे। यद्यपि केन्द्रीय और प्रांतीय विधान मंडलों के चुनाव और एक अंतरिम राष्ट्रीय सरकार बनाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया था। &lt;br /&gt;
*सन 1946 में [[जवाहर लाल नेहरू]] के नेतृत्व में बारह मंत्रियों के साथ एक अंतरिम सरकार बनी। राजेन्द्र प्रसाद कृषि और खाद्य मंत्री नियुक्त हुए। यह काम उन्हें पसन्द था और वह तुरन्त काम में जुट गये। देश में इस समय खाद्य पदार्थों की बहुत कमी थी और उन्होंने खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने के लिये एक योजना बनाई। &lt;br /&gt;
*लेकिन सांम्प्रदायिकता की समस्या को सुलझाया नहीं जा सका। सन 1946 में, कलकत्ता में साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हुये और फिर पूरे बंगाल और बिहार में फैल गये। राजेन्द्र प्रसाद ने जवाहर लाल नेहरू के साथ दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करते हुए, लोगों से अपना मानसिक संतुलन एवं विवेक बनाए रखने की अपील की, &amp;quot;मानवता की मांग है कि पागलपन, लूटमार व आगजनी और हत्याकांड को तुरन्त बन्द किया जाये...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वतंत्रता की प्राप्ति==&lt;br /&gt;
लम्बे वर्षों तक खून पसीना एक कर के और दुख उठाने के पश्चात 15 अगस्त, सन 1947 को आज़ादी मिली, यद्यपि राजेन्द्र प्रसाद के अखण्ड भारत का सपना विभाजन से खंडित हो गया था।&lt;br /&gt;
==संविधान सभा के अध्यक्ष==&lt;br /&gt;
हमने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी परन्तु अभी हमें नये क़ानून बनाने थे जिससे नये राष्ट्र का शासन चलाया जा सके। &lt;br /&gt;
*स्वाधीनता से पहले जुलाई सन 1946 में हमारा संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का संगठन किया गया। &lt;br /&gt;
*राजेन्द्र प्रसाद को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। यह उनकी निस्स्वार्थ राष्ट्र सेवा के प्रति श्रद्धांजली थी जिसके वह स्वयं मूर्तरूप थे। &lt;br /&gt;
*भारतीय संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर सन 1946 को हुआ। &lt;br /&gt;
*संविधान सभा के परिश्रम से 26 नवम्बर सन 1949 को भारत की जनता ने अपने को संविधान दिया जिसका आदर्श था न्याय, स्वाधीनता, बराबरी और बन्धुत्व और सबसे ऊपर राष्ट्र की एकता जिसमें कुछ मूलभूत अधिकार निहित हैं। भविष्य में भारत के विकास की दिशा, पिछड़े वर्ग, महिलाओं की उन्नति और विशेष क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान हैं। जिससे व्यक्ति की प्रतिष्ठा और अंतर्राष्ट्रीय शान्ति को बढ़ावा देना भी सम्मिलित है। &lt;br /&gt;
*भारत 26 जनवरी सन 1950 में गणतंत्र बना और राजेन्द्र प्रसाद उसके प्रथम राष्ट्रपति बने। &lt;br /&gt;
==जनता के निजी सम्पर्क==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति बनने पर भी उनका राष्ट्र के प्रति समर्पित जीवन चलता रहा। वृद्ध और नाज़ुक स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने भारत की जनता के साथ अपना निजी सम्पर्क कायम रखा। वह वर्ष में से 150 दिन रेलगाड़ी द्वारा यात्रा करते और आमतौर पर छोटे-छोटे स्टेशनों पर रूककर सामान्य लोगों से मिलते। &lt;br /&gt;
==शिक्षा का प्रसार और  रचनायें==&lt;br /&gt;
ज्ञान के प्रति लगाव होने के कारण राजेन्द्र प्रसाद &amp;quot;धनी और दरिद्र दोनों के घरों में प्रकाश लाना चाहते थे।&amp;quot; शिक्षा ही ऐसी चाबी थी जो महिलाओं को स्वतंत्रता दिला सकती थी। शिक्षा का अर्थ था व्यक्तित्व का पूर्ण विकास न कि कुछ पुस्तकों का रटना। वह मानते थे कि शिक्षा जनता की मातृभाषा में होनी चाहिए। यदि हमें आधुनिक विश्व के साथ अपनी गति बनाये रखनी है तो [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्होंने स्वयं भी कई विशिष्ट पुस्तकें लिखीं। जिनमें &lt;br /&gt;
*उनकी आत्मकथा (1946), &lt;br /&gt;
*चम्पारन में सत्याग्रह (1922), &lt;br /&gt;
*इंडिया डिवाइडेड (1946), &lt;br /&gt;
*महात्मा गांधी एंड बिहार, &lt;br /&gt;
*सम रेमिनिसन्सेज (1949), &lt;br /&gt;
*बापू के क़दमों में (1954) भी सम्मिलित हैं।{{दाँयाबक्सा|पाठ=बंगाल का विभाजन लोगों में बढ़ती हुई राष्ट्रीयता की भावना को जानबूझकर दिया गया धक्का माना गया। इसने तिलक, लाला लाजपत राय और विपिनचंद्र पाल जैसे नेताओं द्वारा आरंभ किये गए स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन (भारतीय चीज़ों का इस्तेमाल और ब्रिटिश चीज़ों का बहिष्कार) ने आग में घी का काम किया। उन्होंने इस आंदोलन को कुछ पाश्चात्य रंग में रंगे भारतीयों के हाथों से निकालकर जनता तक पहुँचाया। इस आंदोलन के कारण लोगों ने भारतीय वस्तुओं पर गर्व करना सीखा और लोग भारतीय उद्योग को प्रोत्साहन देने लगे।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति राजेन्द्र==&lt;br /&gt;
*वे भारत के एकमात्र राष्ट्रपति थे जिन्होंने दो कार्य-कालों तक राष्ट्रपति पद पर कार्य किया।&lt;br /&gt;
*राष्ट्रपति के पद पर राजेन्द्र प्रसाद ने सदभावना के लिए कई देशों की यात्रायें भी की। उन्होंने इस आण्विक युग में शान्ति की आवश्यकता पर जोर दिया। राजेन्द्र बाबू का यह विश्वास था कि अतीत और वर्तमान में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। &lt;br /&gt;
*प्राचीन सभ्यता विरासत में मिलने के कारण वह अतीत को हमारी वर्तमान समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रेरणा का स्रोत समझते थे। हमारी विरासत नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से परिपूर्ण हैं और हमें भविष्य में आधुनिक समय की चुनौतियों का सामना करने में सहायता कर सकती हैं। प्राचीन और नैतिक मूल्यों में सामंजस्य तो करना ही होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रपति भवन उनका घर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;बारह वर्षों के लिए राष्ट्रपति भवन उनका घर था। उसकी राजसी भव्यता और शान सुरूचिपूर्ण सादगी में बदल गई थी। &lt;br /&gt;
राष्ट्रपति का एक पुराना नौकर था, तुलसी। &lt;br /&gt;
एक दिन सुबह कमरे की झाड़पोंछ करते हुए उससे राजेन्द्र प्रसाद जी के डेस्क से एक हाथी दांत का पेन नीचे ज़मीन पर गिर गया। &lt;br /&gt;
पेन टूट गया और स्याही कालीन पर फैल गई। &lt;br /&gt;
राजेन्द्र प्रसाद बहुत गुस्सा हुए। &lt;br /&gt;
यह पेन किसी की भेंट थी और उन्हें बहुत ही पसन्द थी। &lt;br /&gt;
तुलसी आगे भी कई बार लापरवाही कर चुका था। &lt;br /&gt;
उन्होंने अपना गुस्सा दिखाने के लिये तुरन्त तुलसी को अपनी निजी सेवा से हटा दिया।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस दिन वह बहुत व्यस्त रहे। कई प्रतिष्ठित व्यक्ति और विदेशी पदाधिकारी उनसे मिलने आये। मगर सारा दिन काम करते हुए उनके दिल में एक कांटा सा चुभता रहा था। उन्हें लगता रहा कि उन्होंने तुलसी के साथ अन्याय किया है। जैसे ही उन्हें मिलने वालों से अवकाश मिला राजेन्द्र प्रसाद ने तुलसी को अपने कमरे में बुलाया। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पुराना सेवक अपनी ग़लती पर डरता हुआ कमरे के भीतर आया। &lt;br /&gt;
उसने देखा कि राष्ट्रपति सिर झुकाये और हाथ जोड़े उसके सामने खड़े हैं।&lt;br /&gt;
उन्होंने धीमे स्वर में कहा, &amp;quot;तुलसी मुझे माफ कर दो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तुलसी इतना चकित हुआ कि उससे कुछ बोला ही नहीं गया। &lt;br /&gt;
राष्ट्रपति ने फिर नम्र स्वर में दोहराया, &amp;quot;तुलसी, तुम क्षमा नहीं करोगे क्या?&amp;quot; &lt;br /&gt;
इस बार सेवक और स्वामी दोनों की आंखों में आंसू आ गये।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारत रत्न==&lt;br /&gt;
सन [[1962]] में अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें &amp;quot;[[भारत रत्‍न]]&amp;quot; की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया। यह उस पुत्र के लिये कृतज्ञता का प्रतीक था जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। यहाँ पर 28 फ़रवरी 1963 में उनके जीवन की कहानी समाप्त हुई। यह कहानी थी श्रेष्ठ भारतीय मूल्यों और परम्परा की चट्टान सदृश्य आदर्शों की। हमको इन पर गर्व है और ये सदा राष्ट्र को प्रेरणा देते रहेंगे। &lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राष्ट्रपति2}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
{{स्वतन्त्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध_व्यक्तित्व_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता संग्राम 1857]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता_सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राष्ट्रपति]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF2&amp;diff=165830</id>
		<title>साँचा:भारत के राष्ट्रपति2</title>
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		<updated>2011-05-25T12:41:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &amp;quot;साँचा:भारत के राष्ट्रपति2&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (बेमियादी) [move=sysop] (बेमियादी))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;'''सावधान''' इस प्रकार के दो साँचे हैं। यदि इस साँचे में कोई परिवर्तन हो तो [[साँचा:भारत के राष्ट्रपति]] में भी वही परिवर्तन करें।&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;sidebar&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{PageMenu}}&lt;br /&gt;
*भारत के राष्ट्रपति&lt;br /&gt;
**राजेन्द्र प्रसाद|डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद&lt;br /&gt;
**सर्वपल्ली राधाकृष्णन|डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन&lt;br /&gt;
**ज़ाकिर हुसैन|ज़ाकिर हुसैन&lt;br /&gt;
**वाराहगिरि वेंकट गिरि|वी.वी. गिरी&lt;br /&gt;
**फ़ख़रुद्दीन अली अहमद|फ़ख़रुद्दीन अली अहमद&lt;br /&gt;
**नीलम संजीव रेड्डी|नीलम संजीव रेड्डी&lt;br /&gt;
**ज्ञानी ज़ैल सिंह|ज्ञानी ज़ैल सिंह&lt;br /&gt;
**रामस्वामी वेंकटरमण|रामस्वामी वेंकटरमण&lt;br /&gt;
**शंकरदयाल शर्मा|डॉक्टर शंकरदयाल शर्मा&lt;br /&gt;
**के. आर. नारायणन|के. आर. नारायणन&lt;br /&gt;
**अब्दुल कलाम|अब्दुल कलाम&lt;br /&gt;
**प्रतिभा पाटिल|प्रतिभा पाटिल&lt;br /&gt;
*कार्यवाहक राष्ट्रपति&lt;br /&gt;
**वाराहगिरि वेंकट गिरि|वी.वी. गिरी&lt;br /&gt;
**मुहम्मद हिदायतुल्लाह|मुहम्मद हिदायतुल्लाह&lt;br /&gt;
**बी डी जत्ती|बी डी जत्ती&lt;br /&gt;
&amp;lt;/sidebar&amp;gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:राजनीति के साँचे]][[Category:गणराज्य संबंधित साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>प्रयोग:Priya2</title>
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&lt;hr /&gt;
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		<title>साँचा:भारत के राष्ट्रपति2</title>
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		<updated>2011-05-25T12:30:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: '&amp;lt;noinclude&amp;gt;'''सावधान''' इस प्रकार के दो साँचे हैं। यदि इस साँचे...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;'''सावधान''' इस प्रकार के दो साँचे हैं। यदि इस साँचे में कोई परिवर्तन हो तो [[साँचा:भारत के राष्ट्रपति]] में भी वही परिवर्तन करें।&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;sidebar&amp;gt;&lt;br /&gt;
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*भारत के राष्ट्रपति&lt;br /&gt;
**राजेन्द्र प्रसाद|डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद&lt;br /&gt;
**सर्वपल्ली राधाकृष्णन|डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन&lt;br /&gt;
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**वाराहगिरि वेंकट गिरि|वी.वी. गिरी&lt;br /&gt;
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&amp;lt;/sidebar&amp;gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:राजनीति के साँचे]][[Category:गणराज्य संबंधित साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>प्रयोग:Priya2</title>
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		<updated>2011-05-25T12:17:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;'''सावधान''' इस प्रकार के दो साँचे हैं। यदि इस साँचे में कोई परिवर्तन हो तो [[साँचा:भारत के राष्ट्रपति]] में भी वही परिवर्तन करें।&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
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*भारत के राष्ट्रपति&lt;br /&gt;
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&amp;lt;/sidebar&amp;gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:हिन्दू धर्म के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>फ़ीरोज़ गाँधी</title>
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		<updated>2011-05-25T11:27:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Feroze-Gandhi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=फ़ीरोज़ गाँधी&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=फ़ीरोज़ गाँधी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[12 सितम्बर]], [[1912]] ई.&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[मुम्बई]], [[महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु= [[8 सितम्बर]], [[1960]] ई.&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=दिल का दौरा&lt;br /&gt;
|अविभावक=जहाँगीर, रतिमाई&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=[[इंदिरा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|संतान=[[राजीव गाँधी]] और संजय गाँधी&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=&lt;br /&gt;
|पद=स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=[[1930]] से [[1932]] तक, भारत छोड़ो आन्दोलन (1942)&lt;br /&gt;
|कार्य काल=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक (अंतर्राष्ट्रीय क़ानून)&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
फ़ीरोज़ गाँधी (जन्म- [[12 सितम्बर]], [[1912]] ई., [[मुम्बई]]; मृत्यु- [[8 सितम्बर]], [[1960]] ई., [[दिल्ली]])  स्वतंत्रता सेनानी और [[लोकसभा]] के प्रभावशाली सदस्य थे। फ़ीरोज़ गाँधी [[भारत]] की  प्रथम महिला [[प्रधानमंत्री]] [[इंदिरा गाँधी]] के पति थे।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
स्वतंत्रता सेनानी फ़ीरोज़ गाँधी का जन्म 12 सितम्बर, 1912 ई. को मुम्बई के एक अस्पताल में पारसी परिवार में हुआ था। उनके [[पिता]] का नाम जहाँगीर एवं [[माता]] का नाम रतिमाई था। [[1915]] ई. में वे अपनी माँ के साथ [[इलाहाबाद]] में कार्यरत एक सम्बन्धी महिला के पास आ गए। इस प्रकार उनकी आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में हुई। इलाहाबाद उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों का केन्द्र था। युवक फ़ीरोज़ गाँधी इसके प्रभाव में आए और नेहरू परिवार से भी उनका सम्पर्क हुआ। उन्होंने [[1928]] ई. में [[साइमन कमीशन]] के बहिष्कार में भाग लिया तथा [[1930]]-[[1932]] के आन्दोलन में जेल की सज़ा काटी। फ़ीरोज़ गाँधी [[1935]] में  आगे के अध्ययन के लिए लंदन गए और उन्होंने ‘स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स’ से अंतर्राष्ट्रीय क़ानून में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। &lt;br /&gt;
====विवाह====&lt;br /&gt;
फ़ीरोज़ गाँधी ने क्षय रोग से पीड़ित अपनी पत्नी इंदिरा गाँधी की माँ [[कमला नेहरू]] की [[भारत]] और [[जर्मनी]] के चिकित्सालयों में बड़ी सेवा की। उसी समय उनका और इंदिरा का सम्पर्क हुआ और [[मार्च]], [[1942]] ई. में इलाहाबाद में दोनों का [[विवाह]] हो गया।&lt;br /&gt;
==राजनीति सफ़र==&lt;br /&gt;
अगस्त, 1942 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में फ़ीरोज़ गाँधी कुछ समय तक भूमिगत रहने के बाद गिरफ़्तार कर लिए गए। रिहा होने के बाद [[1946]] में उन्होंने [[लखनऊ]] के दैनिक पत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ के प्रबन्ध निर्देशक का पद सम्भाला। [[1952]] के प्रथम आम चुनाव में वे लोकसभा के सदस्य चुने गए। इसके बाद उन्होंने लखनऊ छोड़ दिया। कुछ वर्ष वे और इंदिरा, [[नेहरू जी]] के साथ रहे। इंदिरा जी का अधिकांश समय प्रधानमंत्री पिता की देख-रेख में बीतता था। [[1956]] में फ़िरोज़ गांधी ने प्रधानमंत्री निवास में रहना छोड़ दिया और वे सांसद के साधारण मकान में अकेले ही रहने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[1957]] में वे पुन: लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इस बार उन्होंने संसद में भ्रष्टाचार के कई मामले उठाए। इन्हीं के कारण वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी को अपने पद से हटना पड़ा। वे नेहरू परिवार से अपने सम्बन्धों की परवाह किए बिना प्रधानमंत्री की कई नीतियों, विशेषत: औद्योगिक नीतियों की कटु आलोचना करते थे। वे बड़े लोकप्रिय सांसद थे, पर निजी जीवन में अन्तिम वर्षों में बहुत एकाकी हो गए थे। उनके दोनों पुत्र [[राजीव गाँधी]] और संजय गाँधी भी अपनी माँ के साथ प्रधानमंत्री निवास में ही रहते थे।&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
फ़ीरोज़ गाँधी को [[1960]] में दिल का दौरा पड़ा। इंदिरा जी उस समय महिला सम्मेलन में भाग लेने के लिए [[केरल]] गई थीं। सूचना मिलते ही वे तुरन्त दिल्ली आई और 8 सितम्बर, 1960 ई. को फ़ीरोज़ गाँधी का देहान्त हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{स्वतन्त्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
{{नेहरू परिवार}}&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता सेनानी]][[Category:लोकसभा सांसद]][[Category:नेहरू परिवार]][[Category:राजनीति कोश]][[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%BC_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;diff=165779</id>
		<title>फ़ीरोज़ गाँधी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%BC_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;diff=165779"/>
		<updated>2011-05-25T11:26:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Feroze-Gandhi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=फ़ीरोज़ गाँधी&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=फ़ीरोज़ गाँधी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[12 सितम्बर]], [[1912]] ई.&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[मुम्बई]], [[महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु= [[8 सितम्बर]], [[1960]] ई.&lt;br /&gt;
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|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
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|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=&lt;br /&gt;
|पद=स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
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|जेल यात्रा=[[1930]] से [[1932]] तक, भारत छोड़ो आन्दोलन (1942)&lt;br /&gt;
|कार्य काल=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक (अंतर्राष्ट्रीय क़ानून)&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
फ़ीरोज़ गाँधी (जन्म- [[12 सितम्बर]], [[1912]] ई., [[मुम्बई]]; मृत्यु- [[8 सितम्बर]], [[1960]] ई., [[दिल्ली]])  स्वतंत्रता सेनानी और [[लोकसभा]] के प्रभावशाली सदस्य थे। फ़ीरोज़ गाँधी [[भारत]] की  प्रथम महिला [[प्रधानमंत्री]] [[इंदिरा गाँधी]] के पति थे।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
स्वतंत्रता सेनानी फ़ीरोज़ गाँधी का जन्म 12 सितम्बर, 1912 ई. को मुम्बई के एक अस्पताल में पारसी परिवार में हुआ था। उनके [[पिता]] का नाम जहाँगीर एवं [[माता]] का नाम रतिमाई था। [[1915]] ई. में वे अपनी माँ के साथ [[इलाहाबाद]] में कार्यरत एक सम्बन्धी महिला के पास आ गए। इस प्रकार उनकी आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में हुई। इलाहाबाद उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों का केन्द्र था। युवक फ़ीरोज़ गाँधी इसके प्रभाव में आए और नेहरू परिवार से भी उनका सम्पर्क हुआ। उन्होंने [[1928]] ई. में [[साइमन कमीशन]] के बहिष्कार में भाग लिया तथा [[1930]]-[[1932]] के आन्दोलन में जेल की सज़ा काटी। फ़ीरोज़ गाँधी [[1935]] में  आगे के अध्ययन के लिए लंदन गए और उन्होंने ‘स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स’ से अंतर्राष्ट्रीय क़ानून में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। &lt;br /&gt;
====विवाह====&lt;br /&gt;
फ़ीरोज़ गाँधी ने क्षय रोग से पीड़ित अपनी पत्नी इंदिरा गाँधी की माँ [[कमला नेहरू]] की [[भारत]] और [[जर्मनी]] के चिकित्सालयों में बड़ी सेवा की। उसी समय उनका और इंदिरा का सम्पर्क हुआ और [[मार्च]], [[1942]] ई. में इलाहाबाद में दोनों का [[विवाह]] हो गया।&lt;br /&gt;
==राजनीति सफ़र==&lt;br /&gt;
अगस्त, 1942 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में फ़ीरोज़ गाँधी कुछ समय तक भूमिगत रहने के बाद गिरफ़्तार कर लिए गए। रिहा होने के बाद [[1946]] में उन्होंने [[लखनऊ]] के दैनिक पत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ के प्रबन्ध निर्देशक का पद सम्भाला। [[1952]] के प्रथम आम चुनाव में वे लोकसभा के सदस्य चुने गए। इसके बाद उन्होंने लखनऊ छोड़ दिया। कुछ वर्ष वे और इंदिरा, [[नेहरू जी]] के साथ रहे। इंदिरा जी का अधिकांश समय प्रधानमंत्री पिता की देख-रेख में बीतता था। [[1956]] में फ़िरोज़ गांधी ने प्रधानमंत्री निवास में रहना छोड़ दिया और वे सांसद के साधारण मकान में अकेले ही रहने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[1957]] में वे पुन: लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इस बार उन्होंने संसद में भ्रष्टाचार के कई मामले उठाए। इन्हीं के कारण वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी को अपने पद से हटना पड़ा। वे नेहरू परिवार से अपने सम्बन्धों की परवाह किए बिना प्रधानमंत्री की कई नीतियों, विशेषत: औद्योगिक नीतियों की कटु आलोचना करते थे। वे बड़े लोकप्रिय सांसद थे, पर निजी जीवन में अन्तिम वर्षों में बहुत एकाकी हो गए थे। उनके दोनों पुत्र [[राजीव गाँधी]] और संजय गाँधी भी अपनी माँ के साथ प्रधानमंत्री निवास में ही रहते थे।&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
फ़ीरोज़ गाँधी को [[1960]] में दिल का दौरा पड़ा। इंदिरा जी उस समय महिला सम्मेलन में भाग लेने के लिए [[केरल]] गई थीं। सूचना मिलते ही वे तुरन्त दिल्ली आई और 8 सितम्बर, 1960 ई. को फ़ीरोज़ गाँधी का देहान्त हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{स्वतन्त्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
{{नेहरू परिवार}}&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता सेनानी]][[Category:लोकसभा सांसद]][[Category:नेहरू परिवार]][[Category:राजनीति कोश]][[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[फ़ीरोज़ गाँधी]]&amp;lt;br /&amp;gt;Feroze Gandhi&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Indira-Gandhi.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=इन्दु&lt;br /&gt;
|जन्म=[[19 नवम्बर]], [[1917]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=[[जवाहरलाल नेहरू]], [[कमला नेहरू]] &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=[[फ़ीरोज़ गाँधी]]&lt;br /&gt;
|संतान=[[राजीव गाँधी]] और संजय गाँधी&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[31 अक्टूबर]], [[1984]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=हत्या&lt;br /&gt;
|स्मारक=शक्ति स्थल, दिल्ली&lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=[[1971]] के [[भारत]] -[[पाकिस्तान]] युद्ध में भारत की विजय&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|काँग्रेस]]&lt;br /&gt;
|पद=[[:श्रेणी:भारत के प्रधानमंत्री|भारत की तृतीय प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिन्दी भाषा|हिन्दी]], [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=[[अक्टूबर]], [[1977]] और [[दिसम्बर]], [[1978]]&lt;br /&gt;
|कार्य काल=[[19 जनवरी]], [[1966]] से [[24 मार्च]], [[1977]], [[14 जनवरी]], [[1980]] से [[31 अक्टूबर]], [[1984]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=विश्वभारती विश्वविद्यालय बंगाल, इंग्लैंड की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, शांति निकेतन&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]] सम्मान&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=बैंको का राष्ट्रीयकरण&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी''' (जन्म- [[19 नवम्बर]], [[1917]] [[इलाहाबाद]] - मृत्यु- [[31 अक्टूबर]], [[1984]] [[दिल्ली]]) ने न केवल [[भारत|भारतीय]] राजनीति को नये आयाम दिये बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वे एक युग बनकर छाई रहीं। राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र की अखण्डता, राजनीति और लोक कल्याण, आदि उन्हें अपने दादा [[पं. मोतीलाल नेहरू|पं. मोतीलाल नेहरू]] और पिता [[जवाहरलाल नेहरू|पं. जवाहर लाल नेहरू]] से विरासत में मिले थे। उन दिनों भारत ब्रिटिश दासता के चंगुल से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमती इंदिरा गाँधी का जन्म नेहरु खानदान में हुआ था। इंदिरा गाँधी राष्ट्रनायक तथा देश के प्रथम [[प्रधानमंत्री]] पंडित जवाहरलाल नेहरु की इकलौती पुत्री थीं। लेकिन आज इंदिरा गाँधी को सिर्फ़ इस कारण नहीं जाना जाता कि वह पंडित जवाहरलाल नेहरु की बेटी थीं, बल्कि इंदिरा जी अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए 'विश्वराजनीति' के इतिहास में जानी जाती हैं और '''इंदिरा गाँधी जी को 'लौह-महिला' के नाम से संबोधित किया जाता है।''' [[लालबहादुर शास्त्री]] की असामयिक मृत्यु के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाया गया था। &lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==बचपन और शिक्षा==&lt;br /&gt;
[[एशिया]] की इस लौह-महिला का जन्म 19 नवम्बर, 1917 को [[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]] के आनंद भवन में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनका पूरा नाम है- 'इंदिरा प्रियदर्शनी गाँधी'। इनके पिता का नाम जवाहरलाल नेहरु और दादा का नाम मोतीलाल नेहरु था। पिता एवं दादा दोनों वकालत के पेशे से संबंधित थे और देश की स्वाधीनता में इनका प्रबल योगदान था। इनकी माता का नाम कमला नेहरु था जो दिल्ली के प्रतिष्ठित कौल परिवार की पुत्री थीं। इंदिराजी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जो आर्थिक एवं बौद्धिक दोनों दृष्टि से काफ़ी संपन्न था। अत:  इन्हें आनंद भवन के रूप में महलनुमा आवास प्राप्त हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा जी का नाम इनके दादा पंडित मोतीलाल नेहरु ने रखा था। यह संस्कृतनिष्ठ शब्द है जिसका आशय है कांति, लक्ष्मी, एवं शोभा। इनके दादाजी को लगता था कि पौत्री के रूप में उन्हें मां लक्ष्मी और दुर्गा की प्राप्ति हुई है। पंडित नेहरु ने अत्यंत प्रिय देखने के कारण अपनी पुत्री को प्रियदर्शिनी के नाम से संबोधित किया जाता था। चूंकि जवाहरलाल नेहरु और कमला नेहरु स्वयं बेहद सुंदर तथा आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे, इस कारण सुंदरता के मामले में यह गुणसूत्र उन्हें अपने माता-पिता से प्राप्त हुए थे। इन्हें एक घरेलू नाम भी मिला जो इंदिरा का संक्षिप्त रूप 'इंदु' था। इंदिरा गाँधी ने [[पश्चिम बंगाल]] में विश्वभारती विश्वविद्यालय और [[इंग्लैंड]] की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त की। 1942 में उनका विवाह फिरोज़ गाँधी से हुआ। उनके दो पुत्र हुए- [[राजीव गाँधी]] और संजय गाँधी। राजीव गाँधी भी भारत के प्रधानमंत्री रहे हैं।&lt;br /&gt;
====विद्यार्थी जीवन====  &lt;br /&gt;
इंदिरा जी को जन्म के कुछ वर्षों बाद भी शिक्षा का अनुकूल माहौल नहीं उपलब्ध हो पाया था। पाँच वर्ष की अवस्था हो जाने तक बालिका इंदिरा ने विद्यालय का मुख नहीं देखा था। पिता जवाहरलाल नेहरु देश की आज़ादी के आंदोलन में व्यस्त थे और माता कमला नेहरु उस समय बीमार रहती थीं। घर का वातावरण भी पढ़ाई के अनुकूल नहीं था। [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] के कार्यकर्ताओं का रात-दिन आनंद भवन में आना जाना लगा रहता था। तथापि पंडित नेहरु ने पुत्री की शिक्षा के लिए घर पर ही शिक्षकों का इंतजाम कर दिया था। बालिका इंदु को आनंद भवन में ही शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawahar-Lal-Nehru-Family-2.jpg|thumb|left|[[जवाहरलाल नेहरू]] अपनी पत्नी [[कमला नेहरू]] और बेटी इंदिरा गाँधी के साथ]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;माता-पिता का साथ&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
इंदिरा जी को बचपन में माता-पिता का ज़्यादा साथ नसीब नहीं हो पाया। पंडित नेहरु देश की स्वाधीनता को लेकर राजनीतिक क्रियाओं में व्यस्त रहते थे और माता कमला नेहरु का स्वास्थ्य उस समय काफ़ी खराब था। दादा मोतीलाल नेहरु से इंदिरा जी को काफ़ी स्नेह और प्यार-दुलार प्राप्त हुआ था। इंदिरा जी की परवरिश नौकर-चाकरों द्वारा ही संपन्न हुई थी। घर में इंदिरा जी इकलौती पुत्री थीं। इस कारण इन्हें बहन और भाई का भी कोई साथ प्राप्त नहीं हुआ। एकांत समय में वह अपने गुड्डे-गुड़ियों के साथ खेला करती थीं। घर पर शिक्षा का जो प्रबंध था, उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता था। लेकिन [[अंग्रेज़ी भाषा]] पर उन्होंने अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही कारण है कि इंदिरा जी ने बचपन में अंग्रेज़ी साहित्य की उत्कृष्ट पुस्तकों का भी अध्ययन किया उन पुस्तकों से उन्हें जीवन की गहराई और यथार्थ का बोध हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण पंडित नेहरु को अकसर अंग्रेज़ों द्वारा जेल की सजाएँ प्रदान की जाती थीं। तब वह अपनी पुत्री इंदिरा को काफ़ी लंबे-लंबे पत्र लिखते थे। उन पत्रों का महत्त्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि बाद में इन्हें पुस्तक के रूप में [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] तथा अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में प्रकाशित किया गया।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;प्राथमिक बचपन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
पंडित नेहरु अंग्रेज़ी भाषा के इतने अच्छे ज्ञाता थे कि लॉर्ड माउंटबेलन की अंग्रेज़ी भी उनके सामने फीकी लगती थी। इस प्रकार पिता द्वारा अंग्रेज़ी में लिखे गए पत्रों के कारण पुत्री इंदिरा की अंग्रेज़ी भाषा काफ़ी समृद्ध हो गई थी। इंदिरा का प्राथमिक बचपन एकाकी था। अंत: यह स्वीकार करना होगा कि बेहद संपन और शिक्षित परिवार में जन्म लेने के बावज़ूद इंदिरा जी को माता-पिता का स्वभाविक प्रेम और संरक्षण नहीं प्राप्त हो सका जो साधारण परिवार के बच्चों को सामान्य प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;विशेष प्रवीणता&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
पंडित जवाहरलाल नेहरु शिक्षा का महत्त्व काफ़ी अच्छी तरह समझते थे। यही कारण है कि उन्होंने पुत्री इंदिरा की प्राथमिक शिक्षा का प्रबंध घर पर ही कर दिया था। लेकिन अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अन्य विषयों में बालिका इंदिरा कोई विशेष दक्षता नहीं प्राप्त कर सकी। तब इंदिरा को शांति निकेतन स्कूल में पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ उसके बाद उन्होंने [[बैडमिंटन]] स्कूल तथा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अध्ययन किया। लेकिन इंदिरा ने पढ़ाई में कोई विशेष प्रवीणता नहीं दिखाई। वह औसत दर्जे की छात्रा रहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बहिष्कार का आंदोलन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
इंदिरा पर परिवार के वातावरण का काफ़ी प्रभाव पड़ा था। उन दिनों आनंद भवन स्वतंत्रता सेनानियों का अखाड़ा बना हुआ था। वहाँ देश की आज़ादी को लेकर विभिन्न प्रकार की मंत्रणाएँ की जाती थीं। और आज़ादी के लिए योजनाएँ बनाई जाती थीं ताकि अंग्रेज़ों के विरोध के साथ ही भारतीय जनता को भी संघर्ष के लिए जाग्रत किया जा सके। यह सब बालिका इंदिरा भी देख समझ रही थी। जब देश में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन चल रहा था और विदेशी वस्तुओं की होलियाँ जलाई जा रहीं थीं तब बालिका इंदिरा भी किसी से पीछे नहीं रही।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;संघर्ष की गवाह&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-1.jpg|thumb|250px|इंदिरा गाँधी &amp;lt;br /&amp;gt; Indira Gandhi]]&lt;br /&gt;
इंदिरा ने भी अपने तमाम विदेशी कपड़ों को अग्नि दिखा दी और खादी के वस्त्र धारण करने लगी। जब इंदु को टोका गया कि तुम्हारी गुड़ियाँ भी तो विदेशी हैं, तुम उनका क्या करोगी। तब इंदु ने बड़े प्यार से सहेजे गए उन खिलौनों को भी अग्नि दिखा दी। बेशक ऐसा करना कठिन था क्योंकि प्रत्येक खिलौने और गुड्डे गुड़िया से इंदिरा जी का एक भावनात्मक रिश्ता बन गया था जो एकाकी जीवन में उनका एकमात्र सहारा था। इंदु अपने परिवार के संघर्ष की भी गवाह बनीं। 1931 में जब इनकी माता कमला नेहरु को गिरफ़्तार कर लिया गया तब यह मात्र 14 वर्ष की बालिका थीं। पिता पहले से ही कारागार में थे। इससे समझा जा सकता है कि इंदु नामक बालिका अपने आपको किस हद तक अकेला महसूस करती रही होगी। बेशक आनंद भवन में नौकरों की कमी नहीं थी लेकिन माता-पिता की मौजूदगी से बच्चों को सुरक्षा की जो ढाल अनायास प्राप्त होती है, उसकी अपेक्षा नौकरों से कदापि नहीं की जा सकती। बच्चे अपनी जिन जिज्ञासाओं को माता-पिता के ज्ञान से अभिज्ञात करते हैं, उसकी पूर्ति नौकर नहीं कर सकते थे। माता-पिता का स्नेह बच्चों के खानपान में भी झलकता है और परवरिश के प्रत्येक तौर-तरीकों में भी जबकि नौकरों द्वारा तो केवल अपने कर्तव्यों की इतिश्री ही की जा सकती है। यही कारण है कि इंदिराजी को खानपान की अनियमितता का भी सामना करना पड़ा और उनकी पढ़ाई भी बाधित हुई यह अवश्य है कि दादा पंडित मोतीलाल नेहरु और पोती इंदिरा का काफ़ी वक़्त एक साथ गुजरता था। लेकिन दादा भी अपनी पोती को पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे। उन्हें कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त रहना पड़ता था। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब अंग्रेज़ों ने पंडित मोतीलाल नेहरु को भी गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया ऐसे में इंदु की मनोदशा की कल्पना सहज ही की जा सकती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब अकेली इंदु अपना समय किस प्रकार व्यतीत करती? समय बिताने के लिए वह अपने पिता की नकल करने लगी। उसने अपने पिता को कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए सुना था। इस कारण उसने भी हमउम्र बच्चों को एकत्र करके भाषण देने का कार्य आरंभ कर दिया। भाषण देते समय वह मेज पर खड़ी हो जाती थी और मेज द्वारा मंच का कार्य लिया जाता था। इस समय वह खादी के वस्त्र और गाँधी टोपी प्रयोग करती थी। इस प्रकार बचपन में ही संघर्षों की धूप ने इंदिरा गाँधी को यह समझा दिया था कि कोई भी चीज आसानी से उपलब्ध नहीं होती। उसकी प्राप्ति के लिए इंसान को दृढ़ प्रतिज्ञ होना चाहिए। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वानर सेना का गठन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
राजनेता और जनसाधारण, दोनों ही आज़ादी के आन्दोलनों में बराबर के भागीदार थे। नन्ही इंदिरा के दिल पर इन सभी घटनाओं का अमिट प्रभाव पड़ा और 13 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने 'वानर सेना' का गठन कर अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया। इस प्रकार इंदिरा का बचपन विषय परिस्थितियों से चारित्रिक गुणों को प्राप्त कर रहा था। भविष्य़ में इंदु ने जो फौलादी व्यक्तित्व प्राप्त किया था, वह प्रतिकूल परिस्थितियों से ही निर्मित हुआ था। इंदु ने अपने किशोरवय में स्वाधीनता संग्राम में विभिन्न प्रकार से सक्रिय सहयोग भी प्रदान किया था। उन्होंने बच्चों के सहयोग से वानर सेना का निर्माण भी किया था जिसका नेतृत्व वह स्वयं करती थीं। वानर सेना के सदस्यों ने देश सेवा की शपथ भी ली थी स्वतंत्रता आंदोलन में इस वानर सेना ने आंदोलनकारियों की कई प्रकार से मदद की थी। क्रांतिकारियों तक महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ भी इनके माध्यम से पहुँचाई जाती थीं। साथ ही सामान्य जनता के मध्य जरुरी संदेशों के पर्चे भी इनके द्वारा वितरित किए जाते थे। इंदिराजी की इस वानर सेना का महत्त्व इस बात से समझा जा सकता है कि मात्र [[इलाहाबाद]] में इसके सदस्यों की संख्या पाँच हजार थी। एक बार इंदु ने अपने पिता से जेल में भेंट करने के दौरान आवश्यक लिखित दस्तावेजों का संप्रेषण भी किया था। इस प्रकार बालिका इंदिरा ने बचपन में ही स्वाधीनता के लिए संधर्ष करते हुए यह समझ लिया था। कि किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी आज़ादी का कितना अधिक महत्त्व होता है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बोर्डिंग स्कूल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
नेहरु परिवार स्वाधीनता संग्राम में जुटा हुआ था, इस प्रकार इंदु की पढ़ाई उस प्रकार आरंभ नहीं हो सकी जिस प्रकार एक साधारण परिवार में होती है शिक्षा का प्रबंध घर  पर ही किया गया था। 1931 में इनके दादा पंडित मोतीलाल नेहरु की मृत्यु हो जाने के बाद यह आवश्यक समझा गया कि इंदिरा को किसी विद्यालय में दाखिल कराना चाहिए। इस समय इंदु की उम्र 14 वर्ष हो चुकी थी। अब तक इंदु को घर पर ही अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ था और पंडित नेहरु उससे संतुष्ट नहीं थे। वह यह भी समझ रहे थे कि इलाहाबाद में रहते हुए उनकी पुत्री की पढ़ाई हो पाना संभव नहीं है। अत: उन्होंने इंदु को बोर्डिंग स्कूल में डालने का फैसला कर लिया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-3.jpg|thumb|left|इंदिरा गाँधी की प्रतिमा &amp;lt;br /&amp;gt; Statue Of Indira Gandhi]] &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बौद्धिक क्षमता का परिचय&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
इनके बाद इंदिरा को पूना के 'पीपुल्स ऑन स्कूल' में दाखिला दिलवा दिया गया। उन्हें कक्षा सात में प्रवेश मिला था। इनकी सहपाठियों की उम्र इनसे काफ़ी कम थी। अत:  कक्षा की छात्राओं को लगता था कि एक बड़ी उम्र की छात्रा उनके बीच है। लेकिन उन छात्राओं को यह ज्ञात नहीं था कि उस बालिका ने जीवन की जिस पाठशाला में अब तक अधययन किया है, उसी के कारण उसकी विद्यालयी शिक्षा प्रभावित हुई है। इंदु ने शीघ्र ही अपनी बौद्धिक क्षमता का परिचय दिया और स्कूल में पढ़ाए जा रहे सभी विषयों को आत्मसात करने का प्रयास भी किया। इंदिरा को घर में रहते हुए भी पत्र पत्रिकाएं तथा पुस्तकें पढ़ने का शौक़ था जो यहाँ भी जारी रहा इसका एक फ़ायदा इंदु को यह मिला कि उसका सामान्य ज्ञान पाठ्य पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा। उसे देश दुनिया का काफ़ी ज्ञान था और वह अभिव्यक्ति की कला में भी उस्ताद हो गई थी। विद्यालय द्वारा आयोजित होने वाली वाद विवाद प्रतियोगिता में उसका कोई सानी नहीं था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;शांति निकेतन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
1934 में इंदिरा ने 10वीं कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली अब आगे की पढ़ाई करने के लिए उसे ऐसे विद्यालय में जाना पड़ सकता था जहाँ भारतीय संस्कृति से संबंधित पढ़ाई नहीं होती थी और सभी कॉलेज अंग्रेज़ों द्वारा संचालित होते थे। काफ़ी सोच-विचार के बाद पंडित नेहरु ने निश्चय किया कि वह अपनी बेटी इंदिरा को शांति निकेतन में पढ़ने के लिए भेजेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरुदेव [[रवींद्रनाथ टैगोर]] उन दिनों [[कोलकाता]] से कुछ दूरी पर प्राकृतिक वातावरण में 'शांति निकेतन' नामक एक शिक्षण संस्थान चला रहे थे। शांति निकेतन का संचालन गुरुदेव एवं प्राचीन आश्रम व्यवस्था के अनुकूल था। वहाँ का रहन-सहन एवं सामान्य जीवन सादगी से परिपूर्ण था। इंदिरा का स्वास्थ्य भी इन दिनों बहुत अच्छा नहीं था। अत: पंडित जवाहरलाल नेहरु ने अपनी बेटी का दाखिला शांति निकेतन में करवा दिया। यहाँ इंदु ने स्वयं को पूर्णतया आश्रम की व्यवस्था के अनुसार ढाल लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा प्रतिभाशाली थीं। और उनका सहज ज्ञान भी अन्य बच्चों से काफ़ी बेहतर था। इस कारण वह शीघ्र ही शांति निकेतन में सभी की प्रिय बन गई। शिक्षार्थी भी उनका सम्मान करने लगे। शांति निकेतन में रहते हुए इंदिरा को खादी की साड़ी पहननी पड़ती थी और वर्जित स्थलों पर नंगे पैर ही जाना होता था। शांति निकेतन का अनुशासन काफ़ी कड़ा था। सामान्य: अमीरी में पले बच्चों के लिए वहाँ टिक पाना कठिन था। लेकिन इंदिरा जी ने सख्त अनुशासन तथा अन्य नियमों का पूर्णतया पालन किया यहाँ आने के बाद उनके स्वास्थ्य में भी अपेक्षित सुधार के संकेत दिखने लगे। पंडित जवाहरलाल नेहरु की बेटी इंदिरा जी को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगौर भली-भाँति जानते थे। इसी कारण इंदिरा पर उनको विशेष कृपा दृष्टि रहती थी। गुरुदेव ने शीघ्र ही जान लिया कि इंदिरा नामक यह किशोरी बेहद प्रतिभावान है। यही कारण है कि वह गुरुदेव के प्रिय विद्यार्थियों में से एक बन गई। इंदिरा में अध्ययन से इतर लोक कला और [[भारत की संस्कृति|भारतीय संस्कृति]] में भी रुचि जाग्रत की गई। इंदु ने शीघ्र ही मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य में दक्षता हासिल कर ली। उसका नृत्य काफ़ी मनमोहक होता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शांति निकेतन की एक अतिरिक्त विशेषता यह थी कि वहाँ के सभी अध्यापक अपने विषयों के धुरंधर ज्ञाता थे। यह उनकी विद्वत्ता का ही परिमाण था कि इंदिरा ने ज्ञानार्जन करने में अच्छी गति दिखाई। लेकिन शांति निकेतन में रहते हुए इंदिरा अपनी पढ़ाई पूरी न कर सकीं जबकि वह वहाँ के वातावरण से काफ़ी प्रसन्न थीं। लेकिन इंसान का भाग्य भी काफ़ी प्रबल होता है और उसके आदेशों को स्वीकार करना ही पड़ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कमला नेहरु का निधन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-Museum.jpg|thumb|250px|इंदिरा गाँधी संग्रहालय &amp;lt;br /&amp;gt; Indira Gandhi Museum]]&lt;br /&gt;
दरसल कुछ समय बाद ही इलाहाबाद में इंदिरा की माता कमला नेहरु का स्वास्थ्य काफ़ी खराब हो गया। वह बीमारी में अपनी पुत्री को याद करती थीं। पंडित नेहरु नहीं चाहते थे कि बीमार माता को उसकी पुत्री की शिक्षा के कारण ज़्यादा समय तक दूर रखा जाए। उधर अंग्रेज़ों को भी कमला नेहरु के अस्वस्थ होने की जानकारी थी। अंग्रेज़  चाहते थे कि यदि ऐसे समय में पंडित नेहरु को जेल भेजने का भय दिखाया जाए तो वह आज़ाद रहकर पत्नी का इलाज कराने के लिए उनकी हर शर्त मानने को मजबूर  हो जाएंगे। इस प्रकार वे पंडित नेहरु का मनोबल तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पंडित नेहरु जब अंग्रेज़ों की शर्तों के अनुसार चलने को तैयार न हुए तो उन्हें गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। जब पंडित नेहरु ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगौर के नाम शांति निकेतन में तार भेजा गुरुदेव ने वह तार इंदिरा को दिया जिसमें लिखा था। इंदिरा की माता काफ़ी अस्वस्थ हैं और मैं जेल में हूँ। इस कारण इंदिरा को माता की देखरेख के लिए अविलंब इलाहाबाद भेज दिया जाए। माता की अस्वस्थता का समाचार मिलने के बाद इंदिरा ने गुरुदेव से जाने की इच्छा प्रकट की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इलाहाबाद पहुँचने पर इंदिरा ने अपनी माता की रुग्ण स्थिति देखी जो काफ़ी चिंतनीय थी। भारत में उस समय यक्ष्मा का माकूल इलाज नहीं था। उनका स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ता जा रहा था। यह 1935 का समय था। तब डॉक्टर मदन अटल के साथ इंदिरा जी अपनी माता को चिकित्सा हेतु [[जर्मनी]] के लिए प्रस्थान कर गईं। पंडित नेहरू उस समय जेल में थे। चार माह बाद जब पंडित नेहरू जेल से रिहा हुए तो वह भी जर्मनी पहुँच गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जर्मनी में कुछ समय तक कमला नेहरू का स्वास्थ्य ठीक रहा लेकिन यक्ष्मा ने फिर जोर पकड़ लिया। इस समय तक विश्व में कहीं भी यक्ष्मा का इलाज नहीं था। हां, यह अवश्य था कि पहाड़ी स्थानों पर बने सेनिटोरियम में रखकर मरीजों की जिंदगी को कुछ समय के लिए बढ़ा दिया जाता था। लेकिन यह कमला नेहरू के रोग की प्रारंभिक स्थिति नहीं थी। यक्ष्मा अपनी प्रचंड स्थिति में पहुँच चुका था लेकिन पिता- पुत्री ने हार नहीं मानी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पंडित नेहरू और इंदिरा कमलाजी को स्विट्जरलैंड ले गए। वहाँ उन्हें लगा कि कमला जी के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। लेकिन जिस प्रकार बुझने वाले दीपक की लौ में अंतिम समय प्रकाश तीव्र हो जाता है, उसी प्रकार स्वास्थ्य सुधार का यह संकेत भी भ्रमपूर्ण था। राजरोग को अपनी बलि लेनी थी और फ़रवरी 1936 में कमला नेहरू का निधन हो गया। &lt;br /&gt;
19 वर्षीया पुत्री इंदिरा के लिए यह भारी शोक के क्षण थे। माता की जुदाई का आघात सहन कर पाना इतना आसान नहीं था। उन पर माता की रुग्ण समय की स्मृतियाँ हावी थीं। पंडित नेहरू को भय था कि माता के निधन का दुख और एकांत में माता की यादों की पीड़ा कहीं इंदिरा को अवसाद का शिकार न बना दे। इंदिरा में अवसाद के आरंभिक लक्षण नज़र भी आने लगे थे। तब पंडित नेहरू ने यूरोप के कुछ दर्शनीय स्थलों पर अपनी पुत्री इंदिरा के साथ कुछ समय गुजारा ताकि बदले हुए परिवेश में वह अतीत की यादों से मुक्त रह सके। इसका माकूल असर भी हुआ। इंदिरा ने विधि के कर विधान को समझते हुए हालात से समझौता कर लिया। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
पंडित नेहरू अपनी प्रिय बेटी की शिक्षा को लेकर बहुत चिंतित थे। काफ़ी सोचने के पश्चात उन्होंने इंदिरा का दाखिला ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ([[इंग्लैंड]]) में करवा दिया। इंदिरा ने अपना ध्यान पढ़ाई की ओर लगा दिया। लेकिन इंग्लैंड में रहते हुए भी वह वहाँ रह रहे भारतीयों के संपर्क में थीं। उन दिनों इंग्लैंड में 'इंडिया लीग' नामक एक संस्था थी जो भारत की आज़ादी के लिए निरंतर प्रयासरत थी। इंदिरा जी में देशसेवा का प्रस्फुटन बरसों पूर्व ही हो चुका था, इस कारण वह भी इंडिया लीग की सदस्या बन गईं और उनके कार्यकलापों में अपना योगदान देने लगीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वहाँ इंदिरा जी का परिचय पंडित नेहरू के मित्र कृष्ण मेनन (जो बाद में भारत के रक्षा मंत्री भी बने) के साथ हुआ। कृष्ण मेनन एक विद्वान व्यक्ति थे। उनका संबंध विश्व के अनेक ख्यातनाम व्यक्तियों से था। श्री मेनन के सान्निध्य से इंदिरा जी को यह लाभ हुआ कि वह विश्व के महान राजनीतिज्ञों और उनकी विचारधाराओं को समझने में सक्षम हो गईं। लेकिन ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से इंदिरा जी को कोई भी उपाधि नहीं प्राप्त हो सकी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम विश्व युद्ध छिड़ चुका था। जर्मनी ने इंग्लैंड के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया था। मित्र देशों की सेनाएँ इंग्लैंड के साथ थीं लेकिन हिटलर का पलड़ा भारी था। ऐसे में इंदिरा का इंग्लैंड में रहना उचित नहीं था। समुद्री मार्ग पर भी खतरा था मगर समय पर भारत लौटना ज़रूरी था। अतः 1941 में इंदिरा भारत लौट आईं जबकि समुद्री मार्ग पर काफ़ी खतरा बना हुआ था। &lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==दाम्पत्य जीवन== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawahar-Lal-Nehru-Family.jpg|thumb|250px|[[नेहरू-गाँधी परिवार वृक्ष|नेहरू परिवार]]]] &lt;br /&gt;
मानव सभ्यता के विकास के साथ ही व्यक्ति ने प्रेम करना और उसे महसूस करना आरंभ कर दिया था। प्रेमी की भावना का उदय इंदिरा के हृदय में भी हुआ था। पारसी युवक फ़ीरोज़ गाँधी से इंदिरा का परिचय उस समय से था जब वह आनंद भवन में एक स्वतंत्रता सेनानी की तरह आते था। फ़ीरोज़ गाँधी ने कमला नेहरू को पुत्र का स्नेह और मान दिया था। जर्मनी में जब कमला नेहरू को चिकित्सा के लिए ले जाया गया तब फ़िरोज मित्रता का फर्ज पूरा करने के लिए जर्मनी पहुँच गए था। [[लंदन]] से भारत वापसी का प्रबंध भी फ़िरोज ने एक सैनिक जहाज़ के माध्यम से किया था दोनों की मित्रता इस हद तक परवान चढ़ी कि विवाह करने का निश्चय कर लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कमला नेहरू जीवित होतीं तो इस शादी को आसानी के साथ स्वीकृति मिल सकती थी। कमला जी अपने पति को शादी के लिए विवश कर सकती थीं। लेकिन कमला नेहरू उनकी मदद करने के लिए दुनिया में नहीं थीं। इंदिरा जी चाहती थीं कि उस शादी को पिता का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त हो लेकिन पंडित नेहरू को उस शादी के लिए मना पाना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य था। वैसे फ़ीरोज़ गाँधी को ही इंदिरा से शादी करने का प्रस्ताव पंडित नेहरू के सामने रखना चाहिए था लेकिन फ़िरोज यह हिम्मत नहीं कर पाए। उसने यह दायित्व इंदिरा को ही सौंप दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा ने फ़ीरोज़ गाँधी को शादी का वचन दे दिया था। इस कारण इंदिरा ने ही पिता के सामने यह बात रखी कि फ़िरोज से शादी करना चाहती हैं। यह सुनकर पंडित नेहरू अवाक् रह गए। वह सोच भी नहीं सकते थे कि उनकी बेटी इंदिरा फ़ीरोज़ गाँधी से शादी करना चाहती है जो उनके समाज-बिरादरी का नहीं है। यद्यपि पंडित नेहरू काफ़ी उदार हृदय के थे लेकिन उनका नज़रिया यह था कि शादी सजातीय परिवार में ही होनी चाहिए। स्वयं उन्होंने भी अपने पिता पंडित मोतीलाल नेहरू का आदेश माना था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन दिनों स्वयं पंडित नेहरू पुत्री के लिए योग्य सजातीय वर की तलाश कर रहे थे ताकि कन्यादान का उत्तरदायित्व पूर्ण कर सकें। पंडित नेहरू ने पुत्री से स्पष्ट कह दिया कि शादी को मंज़ूरी नहीं दी जा सकती। उन्होंने कई प्रकार से इंदिरा को समझाने का प्रयास किया लेकिन इंदिरा की जिद कायम रही। तब निरुपाय नेहरू जी ने कहा कि यदि महात्मा गाँधी उस शादी के लिए सहमत हो जाएँ तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन [[गाँधी जी]] से सहमति प्राप्त करना इंदिरा का ही उत्तरदायित्व था। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;महात्मा गाँधी से स्वीकृति&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
इंदिरा को लगा कि महात्मा गाँधी को मनाना उनके लिए कठिन नहीं होगा। लेकिन इंदिरा की सोच के विपरीत महात्मा गाँधी ने उस शादी के लिए इंकार कर दिया। उन्होंने शादी का विरोध किया। वह भारतीय वर्ण व्यवस्था के पक्षधर थे और चाहते थे कि विवाह संबंध समाज-बिरादरी में ही होना चाहिए। यह अलग बात थी कि वह सभी समाजों के साथ समानता की बात करते थे और उन्होंने अछूतों के उद्धार के लिए बहुत कुछ किया था। महात्मा गाँधी का मानना था कि यह विवाह आगे जाकर सफल नहीं होगा क्योंकि वह कई मायनों में असमानता रखता था। उन्होंने इंदिरा जी को समझाया कि जो विवाह संबंध धर्म, जाति, आयु और पारिवारिक स्तर में असमान हों, वे सफल नहीं होते। यदि एक-दो अंतर हों तो भी बात मानी जा सकती थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँधी की अंतर्दृष्टि कह रही थी कि इंदिरा और फ़िरोज का विवाह असफल साबित होगा लेकिन इंदिरा कुछ भी समझने को तैयार नहीं थीं। तब महात्मा गाँधी ने नेहरू को विवाह के लिए स्वीकृति प्रदान कर दी। वह हर प्रकार से इंदिरा को समझाकर अपना दायित्व पूर्ण कर चुके थे। महात्मा गाँधी की ही सलाह पर इंदिरा का विवाह बिना किसी आडंबर के अत्यंत सादगी के साथ संपन्न हुआ। इसमें केवल इलाहाबाद के ही शुभचिंतक और करीबी व्यक्ति सम्मिलित हुए थे। यह विवाह [[26 मार्च]], [[1942]] को हुआ। उस समय इंदिरा जी की उम्र 24 वर्ष, 4 माह और 7 दिन थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस समय किसी हिन्दू कश्मीरी युवती का 24 वर्ष की आयु के बाद भी अविवाहित रहना परंपरा के अनुसार सही नहीं माना जाता था। यहाँ पंडित नेहरू को असफल पिता माना जाएगा। उन्हें इंदिरा का विवाह 20 वर्ष की आयु तक कर देना चाहिए था। लेकिन पंडित नेहरू देशसेवा के कार्य में जुटे हुए थे। फिर पत्नी कमला की बीमारी के कारण भी वह समय पर पुत्री के विवाह का निर्णय नहीं कर पाए थे। लेकिन पंडित नेहरू का यह भी दायित्व था कि वह बीमार पत्नी के सामने ही एकमात्र पुत्री की शादी कर देते। लेकिन होनी को टाला नहीं जा सकता। इंदिरा की शादी हो गई। शादी के बाद दोनों कश्मीर के लिए रवाना हो गए। कश्मीर में कुछ समय गुजारने के बाद वे वापस इलाहाबाद लौटे। इंदिरा पुनः स्वाधीनता संग्राम के अपने कार्य में जुट गईं। फ़ीरोज़ गाँधी ने भी उनका पूरी तरह साथ दिया। [[10 दिसंबर]], [[1942]] को उन्हें एक सभा को संबोधित करना था। निषेधाज्ञा लगी होने के कारण दोनों को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया।  &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;राजीव गाँधी का जन्म&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|राजीव गाँधी}}&lt;br /&gt;
नैनी जेल में इंदिरा को 9 माह तक रखा गया। इस दौरान उनका स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित रहा। चिकित्सकों ने पौष्टिक भोजन और दवा के संबंध में उन्हें निर्देश भी दिए। लेकिन वह अंग्रेज़ों के सामने गिड़गिड़ाना नहीं चाहती थीं। उन्होंने किसी भी प्रकार का कोई विरोध प्रदर्शन भी नहीं किया। जेल के अधिकारियों का व्यवहार भी उनके साथ सदाशयतापूर्ण नहीं था। लेकिन उन्होंने बेहद धैर्य के साथ उस कठिन समय को पार किया। [[13 मई]], [[1943]] को इंदिरा जी को जेल से रिहा किया गया और वह आनंद भवन पहुँचीं। वहाँ गहन इलाज के बाद उनका स्वास्थ्य सुधर पाया। उधर फ़ीरोज़ गाँधी को भी जेल से मुक्त कर दिया गया था। फ़िरोज ने कुछ समय आनंद भवन में गुजारा। फिर इंदिरा अपनी बुआ के पास [[मुंबई]] चली गईं जहाँ [[20 अगस्त]], [[1944]] को उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र राजीव थे। इसके बाद इंदिरा जी अपने पुत्र राजीव के साथ इलाहाबाद लौट आईं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Harry-S-Truman-And-Indira-Gandhi.jpg|thumb|250px|left|हारि ट्रूमन, [[जवाहरलाल नेहरू|पंडित जवाहरलाल नेहरू]] और इंदिरा गाँधी &amp;lt;br /&amp;gt; Harry S Truman, Jawaharlal Nehru And Indira Gandhi]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वाभिमानी व्यक्ति&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
यहाँ यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि फ़ीरोज़ गाँधी बेहद स्वाभिमानी व्यक्ति थे। घर दामाद के रूप में आनंद भवन में रहना उन्हें स्वीकार नहीं था। वह चाहते थे कि उनकी अपनी व्यक्तिगत जिंदगी हो और वह नेहरू परिवार का दामाद होने के कारण न जाने जाएँ। यही कारण है कि फ़ीरोज़ गाँधी ने [[लखनऊ]] से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'नेशनल हेराल्ड' में मैनेजिंग डायरेक्टर जैसा महत्त्वपूर्ण पद संभाल लिया। इंदिरा गाँधी ने पत्नी धर्म निभाते हुए फ़िरोज का साथ दिया और पुत्र राजीव के साथ लखनऊ पहुँच गईं। इधर भारत में आज़ादी की सुगबुगाहट होने लगी थी। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अंतरिम सरकार के गठन की प्रस्तावना तैयार होने लगी थी। अंतरिम सरकार के गठन की ज़िम्मेदारी पंडित नेहरु पर ही थी। [[वाइसराय]] [[लॉर्ड माउंटबेटन]] से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा जारी थी ताकि सत्ता हस्तांतरण का कार्य सुगमता से संभव हो सके। इसीलिए नेहरूजी को इलाहाबाद छोड़कर नियमित रूप से [[दिल्ली]] में रहने की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में इंदिरा गाँधी काफ़ी उलझन में थीं। उन्हें एक तरफ अपने एकाकी विधुर पिता का ध्यान रखना था तो दूसरी तरह पति के लिए भी उनकी कुछ ज़िम्मेदारी थी। इस कारण उन्हें दिल्ली और लखनऊ के मध्य कई-कई फेरे लगाने पड़ते थे। पंडित नेहरू ने इंदिरा गाँधी के लिए दिल्ली में अलग फ्लैट की व्यवस्था कर दी। उन्हें दूसरी संतान के रूप में भी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। [[15 सितंबर]], [[1946]] को संजय गाँधी का जन्म हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी की जिम्मेदारियाँ अब काफ़ी बढ़ गई थीं। उन्हें मां के रूप में जहाँ दो बच्चों की परवरिश करनी थी और पति के प्रति उत्तरदायित्वों का निर्वाहन करना था, वहीं पुत्री के रूप में पिता की मुश्किलों में भी साथ देना था। इसके अलावा देशसेवा की जो भावना उनमें विद्यमान थी, उसे भी वह नहीं त्याग सकती थीं। इंदिरा जी के लिए यह समय अग्नि परीक्षा का था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;देश का विभाजन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
उस समय देश विभाजन के मुहाने पर था। [[मुहम्मद अली जिन्ना|जिन्ना]] के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की माँग की थी और अंग्रेज़ भी जिन्ना की माँग को स्पष्ट हवा दे रहे थे लेकिन गाँधीजी विभाजन के पक्ष में नहीं थे। लॉर्ड माउंटबेटन कूटनीति का गंदा खेल खेलने में लगे हुए थे। वह एक ओर महात्मा गाँधी को आश्वस्त कर रहे थे कि देश का विभाजन नहीं होगा तो दूसरी ओर पंडित नेहरू से कह रहे थे कि दो राष्ट्रों के विभाजन के फॉर्मूले पर ही आज़ादी प्रदान की जाएगी। पंडित नेहरू स्थिति की गंभीरता को समझ रहे थे जबकि महात्मा गाँधी इस मुगालते में थे कि अंग्रेज़ वायसराय विभाजन नहीं चाहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिन्ना की अनुचित माँग के कारण हिन्दू और मुसलमानों में वैमनस्य पसर गया था। महत्त्वाकांक्षी जिन्ना पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के लिए बहुत लालायित थे। महात्मा गाँधी ने जिन्ना को संपूर्ण और अखंड भारत का प्रधानमंत्री बनाने का आश्वासन दिया। लेकिन चालाक जिन्ना यह जानते थे कि पंडित नेहरू के कारण यह संभव नहीं है। हिन्दू किसी भी मुस्लिम को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसे में देश सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलसने लगा था। महात्मा गाँधी किसी तरह दंगों की आग शांत करना चाहते थे। दिल्ली में भी कई स्थानों पर इंसानियत शर्मसार हो रही थी। तब महात्मा गाँधी ने इंदिरा जी को यह मुहिम सौंपी कि वह दंगाग्रस्त क्षेत्रों में जाकर लोगों को समझाएँ और अमन लौटाने में मदद करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी ने फिर महात्मा गाँधी के आदेश को शिरोधार्य किया और दंगाग्रस्त क्षेत्रों में दोनों समुदायों के लोगों को समझाने का प्रयास करने लगीं। वस्तुतः यह अत्यंत जोखिम कार्य था। पंडित नेहरू की बेटी होने के कारण अतिवादी उन्हें नुक़सान पहुँचा सकते थे परंतु निर्भिक इंदिरा ने दंगों की आग शांत करने के लिए पुरजोर प्रयास किए। लेकिन 15 अगस्त के बाद सांप्रदायिकता अपने चरम पर पहुँच गई। दंगों में दोनों समुदायों के अनगिनत लोग मौत के घाट उतार दिए गए। [[पाकिस्तान]] से लाखों हिन्दू शरणार्थी दिल्ली आ गए थे। शरणार्थियों के पुनर्वास का सवाल भी उत्पन्न हो गया था। उन भूखे-प्यासे घर से भागे लोगों के लिए प्राथमिक आवश्यकताएँ भी जरूरी थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में दिल्ली के कई स्थानों पर शरणार्थी एवं दंगा पीड़ित शिविर लगाए गए थे। पंडित नेहरू ने 17, पार्क रोड के अपने बंगले पर भी शरणार्थी लगाए। शरणार्थियों के जीवन की बुनियादी सुविधाओं का ध्यान रखा जा रहा था। उस समय महात्मा गाँधी पश्चिम बंगाल के नोआखली ज़िले में जहाँ मुस्लिमों की कई बस्तियों को जला दिया गया था। पाकिस्तान से आने वाली ट्रेनों में हज़ारों हिन्दूओं की लाशें भी आ रही थीं। इस कारण हिन्दू आक्रोशित होकर मुसलमनों पर हमला कर रहे थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पंडित जवाहरलाल नेहरू के बंगले में जो शरणार्थी शिविर लगाए गए थे, उनकी देखरेख इंदिरा गाँधी ही कर रही थीं। सभी कमरे ख़ाली करके शरणार्थियों को उनमें ठहरा दिया गया था और लॉन में भी टेंट इत्यादि लगा दिए थे ताकि अधिकाधिक शरणार्थियों को वहाँ रखा जा सके। यहाँ की सभी व्यवस्था इंदिरा गाँधी द्वारा देखी जा रही थी। अंतरिम सरकार के गठन के साथ पंडित नेहरू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना दिए थे। [[26 जनवरी]], [[1950]] को भारत का संविधान भी लागू हो गया। भारत एक गणतांत्रिक देश बना और प्रधानमंत्री नेहरू की सक्रियता काफ़ी अधिक बढ़ गई। इस समय नेहरूजी का निवास त्रिमूर्ति भवन ही था। समय-समय पर विभिन्न देशों के आगंतुक त्रिमूर्ति भवन में ही नेहरूजी के पास आते थे। उनके स्वागत के सभी इंतजाम इंदिरा गाँधी द्वारा किए जाते थे। साथ ही साथ उम्रदराज हो रहे पिता की आवश्यकताओं को भी इंदिराजी देखती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;नेहरूजी की आलोचना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
यह स्वाभाविक था कि लखनऊ से ज़्यादा इंदिरा जी की आवश्यकता उस समय दिल्ली में पिता के पास रहने की थी। दोनों पुत्र राजीव और संजय भी त्रिमूर्ति भवन में अपने नाना के पास ही आ गए थे। फ़ीरोज़ गाँधी कुछ अंतराल पर बच्चों से भेंट करने के लिए आते रहे। लेकिन फ़िरोज के हृदय में इस बात की चुभन अवश्य थी कि इंदिरा को पत्नी के रूप में जिन कर्तव्यों की पूर्ति करनी चाहिए थी, वे बेटी के कर्तव्यों के सम्मुख दब गए हैं। इधर इंदिरा गाँधी ने व्यस्तता बढ़ जाने के बाद बच्चों की देखरेख के लिए ''अन्ना'' नामक एक अनुभवी महिला को बतौर गवर्नेस रख लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़ीरोज़ गाँधी के साथ इंदिराजी के संबंध पुनः सामान्य बने। 1952 के आम चुनाव में फ़िरोज को कांग्रेस का टिकट दिया गया और वह लोकसभा के लिए निर्वाचित भी हो गए। सांसद बनने के बाद कुछ समय तक वह त्रिमूर्ति भवन में ही रहे। लेकिन सांसद आवास मिलने के बाद फ़िरोज ने त्रिमूर्ति भवन छोड़ दिया। परंतु इंदिरा गाँधी चाहती थीं, फ़िरोज त्रिमूर्ति भवन में ही रहें। दोनों के दाम्पत्य जीवन में यहां से अलगाव आरंभ हो गया। फ़ीरोज़ गाँधी ने इस वास्तविकता को नहीं समझा कि नारी सिर्फ़ पत्नी ही नहीं होती है, स्वयं उसका भी निज अस्तित्व होता है। बेशक भारतीय नारी के नाम के साथ पति का उपनाम लगा रहता हो लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि वह पति की गुलामी को ही जीवन मान ले। इंदिरा गाँधी भी काफ़ी महत्त्वाकांक्षी थीं। उनके पास भी भविष्य के कुछ सपने थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़ीरोज़ गाँधी का अलग रहना उचित था अथवा नहीं- यह बहस का विषय है लेकिन वह पत्नी और बच्चों से दूर अवश्य होते चले गए। फ़ीरोज़ गाँधी के हृदय में पत्नी इंदिरा गाँधी से ज़्यादा अपने ससुर पंडित नेहरू के प्रति नाराजगी और कड़वाहट थी। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण उस समय देखने को प्राप्त हुआ जब फ़ीरोज़ गाँधी ने संसद में ही नेहरूजी की आलोचना आरंभ कर दी। फ़ीरोज़ गाँधी का यह गैरजिम्मेदाराना व्यवहार रिश्तों की डोर को कमज़ोर करने वाला साबित हो रहा था। राजनीतिक विचारधारा में मतभेद हो सकता है लेकिन यदि उसे व्यक्त करते समय व्यक्तिगत कड़वाहट भी शामिल हो तो उससे संबंधों में तल्खी ही आएगी। महात्मा गाँधी ने जिस कारण विवाह की खिलाफत की थी, वह सच होता नज़र आ रहा था। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बाल सहयोग की स्थापना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
लेकिन इंदिरा गाँधी ने सब कुछ भूलते हुए भी अपनी पारिवारिक जिंदगी को बचाए रखने का प्रयास किया। जब उन्होंने ''बाल सहयोग'' नामक संस्था की स्थापना की तो फ़ीरोज़ गाँधी से भी इसमें सहयोग प्राप्त किया। इस संस्था के माध्यम से बच्चों के उत्पादन को सहकारिता के आधार पर विक्रय किया जाता था। और अर्जित लाभ सब बच्चों में बांट दिया जाता था। बच्चों को प्रशिक्षण देने के लिए विशेषज्ञों की सहायता भी ली गई थी। इंदिरा गाँधीं ने ''इंडियन काउंसिल ऑफ चाइल्ड वेलफेयर'' ' इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ चाइल्ड वेलफेयर' तथा 'कमला नेहरू स्मृति अस्पताल' जैसी संस्थाओं में विभिन्न दायित्व स्वीकार करते हुए परोपकारी कार्यों को अंजाम दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन सबके साथ इंदिरा गाँधी अपने पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक कार्यों में भी उनकी सहयोगिनी बनी रहीं। 1952 में इंदिरा गाँधी को 'मदर्स अवार्ड' से सम्मानित किया गया। उनकी सामाजिक सेवाओं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। यह वह समय था जब इंदिरा गाँधी के दोनों पुत्र- राजीव और संजय देहरादून के प्रसिद्ध स्कूल 'दून' में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। मात्र छुट्टियों में ही उन्हें माता और नाना का प्रेम प्राप्त होता था। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;फ़ीरोज़ गाँधी का निधन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
उधर फ़ीरोज़ गाँधी भी अस्वस्थ रहने लगे थे। उन्हें हृदय रोग ने घेर लिया था। फिर 1960 में तीसरे हृदयाघात के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उस समय इंदिरा गाँधी की उम्र 43 वर्ष थी। अंतिम समय में वह अपने पति के निकट मौजूद थीं। इस प्रकार उनके वैवाहिक जीवन का असामयिक अंत हो गया। यह इंदिरा जी के लिए शोक का कठिन समय था। पंडित नेहरू ने इस समय अपनी पुत्री को धैर्य बंधाया और पूरा ख्याल रखा।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==राजनीति==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-4.jpg|thumb|250px|इंदिरा गाँधी की प्रतिमा, [[कोलकाता]]&amp;lt;br /&amp;gt; Statue Of Indira Gandhi, Kolkata]] &lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी जी में बचपन से ही राष्ट्र प्रेम के भाव मौजूद थे। इंदिरा प्रियदर्शिनी को परिवार के माहौल में राजनीतिक विचारधारा विरासत में प्राप्त हुई थी। यही कारण है कि पति फ़ीरोज़ गाँधी की मृत्यु से पूर्व ही इंदिरा गाँधी प्रमुख राजनीतिज्ञ बन गई थीं। कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी में इनका चयन 1955 में ही हो गया था। वह कांग्रेस संसदीय मंडल की भी सदस्या रहीं। पंडित नेहरू इनके साथ राजनीतिक परामर्श करते और उन परामर्शों पर अमल भी करते थे। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पार्टी में इंदिरा गाँधी का कद&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
1957 के आम चुनाव के समय पंडित नेहरू ने जहाँ श्री लालबहादुर शास्त्री को कांग्रेसी उम्मीदवारों के चयन की जिम्मेदारी दी थी, वहीं इंदिरा गाँधी का साथ शास्त्रीजी को प्राप्त हुआ था। शास्त्रीजी ने इंदिरा गाँधी के परामर्श का ध्यान रखते हुए प्रत्याशी तय किए थे। लोकसभा और विधानसभा के लिए जो उम्मीदवार इंदिरा गाँधी ने चुने थे, उनमें से लगभग सभी विजयी हुए और अच्छे राजनीतिज्ञ भी साबित हुए। इस कारण पार्टी में इंदिरा गाँधी का कद काफ़ी बढ़ गया था। लेकिन इसकी वजह इंदिरा गाँधी की व्यक्तिगत योग्यताएं थीं, न कि पिता पंडित नेहरू का प्रधानमंत्री होना। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कांग्रेस की अध्यक्ष&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के आरोप तब भी पंडित नेहरू पर लगे। 1959 में जब इंदिरा को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो कई आलोचकों ने दबी जुबान से पंडित नेहरू को पार्टी में परिवारवाद फैलाने का दोषी ठहराया था। लेकिन वे आलोचना इतने मुखर नहीं थे कि उनकी बातों पर तवज्जो दी जाती। कांग्रेस के सदस्य भी इतने मूर्ख नहीं थे कि वे इंदिरा गाँधी के कार्यों की समीक्षा न कर सकते हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वस्तुतः इंदिरा गाँधी ने समाज, पार्टी और देश के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए थे। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त थी। विदेशी राजनयिक भी उनकी प्रशंसा करते थे। इस कारण आलोचना दूध में उठे झाग की तरह बैठ गई। कांग्रेस अध्यक्षा के रूप में इंदिरा गाँधी ने अपने कौशल से कई समस्याओं का निदान किया। उन्होंने नारी शाक्ति को महत्त्व देते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी में महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किए। युवा शक्ति को लेकर भी उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लिए। इंदिरा गाँधी 42 वर्ष की उम्र में कांग्रेस अध्यक्षा बनी थीं। इस कारण यह नहीं माना जा सकता है कि उन्हें कम उम्र में कांग्रेस अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया। प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की बेटी होना कोई दोष या अयोग्यता नहीं थी कि उन्हें अध्यक्षा पद से वंचित रखा जाता। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पार्टी के सम्मुख समस्याएँ&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
श्रीमती इंदिरा गाँधी जब कांग्रेस की अध्यक्षा बनीं तो उस समय पार्टी के सम्मुख दो बड़ी समस्याएँ थीं, &lt;br /&gt;
;पहली समस्या&lt;br /&gt;
एक समस्या थी मुंबई की जहाँ मराठी और गुजराती काफ़ी संख्या में थे। मराठी और गुजराती भाषा के कारण ही दोनों समुदायों में परस्पर सौहार्द्र भाव नहीं था। इसका कारण यह था कि गुजराती लोग मुंबई को अपना मानते थे और मराठी लोग अपना जबकि उस समय की मुंबई देश की आर्थिक राजधानी कही जाती थी। यह मुद्दा अत्यंत संवेदनशील था। इसी कारण उसे सन 1959 तक नहीं सुलझाया जा सका।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सच तो यह है कि नेतागण भी इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाले रखना चाहते थे। भाषाई आधार पर पहले भी आंदोलन होते रहे जो हिंसक भी हो उठते थे। फिर मोरारजी देसाई गुजराती थे और कांग्रेस पार्टी में उनका कद बड़ा था। लेकिन इंदिरा गाँधी ने इस समस्या को जस का तस बनाए रखने के बजाय इसका निदान करना ही उचित समझा। उस समय मुंबई एक राज्य था और गुजरात तथा महाराष्ट्र दोनों इसमें आते थे। ऐसे में इंदिरा गाँधी ने राज्य सरकार पर दबाव बनाकर मुंबई राज्य का विभाजन कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुंबई राज्य के विभाजन के बाद दो राज्य अस्तित्व में आए। एक राज्य [[गुजरात]] बना जिसकी राजधानी [[अहमदाबाद]] हुई और दूसरा राज्य [[महाराष्ट्र]] बना जिसकी राजधानी [[मुंबई]] शहर को बनाया गया। विभाजन को लेकर जो नकारात्मक पूर्वाग्रह थे। वे सभी व्यर्थ साबित हुए। विभाजन के बाद गुजरात तथा महाराष्ट्र ने काफ़ी उन्नति भी की सबसे अच्छी बात तो यह थी कि विभाजन के बाद दोनों समुदायों के प्रेम में बहुत इजाफा हुआ। दोनों राज्यों ने देश की आर्थिक उन्नति में भी उल्लेखनीय योगदान देना आरंभ कर दिया। &lt;br /&gt;
;दूसरी समस्या&lt;br /&gt;
इसी प्रकार दूसरी समस्या थी [[केरल]] की जहाँ साम्यवादी सरकार जनता का शोषण करते हुए भेदभावपूर्ण आधार पर शासन कर रही थी। पार्टी अध्यक्षा इंदिरा गाँधी ने केरल की अन्यायी सरकार को बर्खास्त कर दिया। इसके उपरांत केरल की शासन व्यवस्था बेहतर होने लगी। इंदिरा गाँधी पार्टी अध्यक्षा के रूप में काफ़ी सफल रहीं। उन्हें पार्टी के अध्यक्ष का कार्यभार दो वर्षों के लिए पुन: सौंपा गया। लेकिन इंदिरा गाँधी ने एक वर्ष बाद ही कांग्रेस अध्यक्षा का पद छोड़ दिया। उस समय विपक्षी राजनीतिज्ञ अकसर कहा करते थे, '''पिता बनाए गए प्रधानमंत्री और बेटी को बना दिया पार्टी अध्यक्ष।''' इंदिरा जी को इस प्रकार की टीका-टिप्पणी अच्छी नहीं लगती थी। इंदिरा गाँधी का जो भी राजनीतिक जीवन पंडित नेहरु के समय में रहा, उसे एक प्रकार से पंडित नेहरु की प्रधानमंत्रित्व शक्ति का परिणाम माना गया। नेहरुजी की मृत्यु के पश्चात यह माना जा रहा था कि पार्टी के धुरंधर नेता इंदिरा गाँधी को हाशिये पर ढकेल देगें। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पंडित नेहरु की मृत्यु&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|जवाहरलाल नेहरू}}&lt;br /&gt;
पंडित जवाहरलाल नेहरू (14 नवम्बर, 1889 - 27 मई, 1964) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री (1947-1964) थे। 27 मई 1964 को जब पंडित नेहरु की मृत्यु हुई तब पहले की भाँति कांग्रेस पार्टी पर उनकी पकड़ मज़बूत नहीं रह गई थी। पार्टी में उनकी साख भी कमज़ोर हुई थी। [[चीन]] युद्ध में भारत की पराजय के कारण पंडित नेहरु की लोकप्रियता कम हुई थी और फालिज के कारण भी उन्हें शारीरिक रूप से अक्षम मान लिया गया था। लेकिन देशहित में किए गए उनके अभतपूर्व कार्यों की आभा ने पंडित नेहरु को प्रधानमंत्री बनाए रखा। जिस प्रकार कृष्ण मेनन को चीन से पराजय के बाद रक्षा मंत्री के पद से हटने के लिए विवश किया गया था, वैसा ही पंडित नेहरु के साथ भी किया जा सकता था। लेकिन यह पंडित नेहरु का आभामंडल था कि पार्टी ने उस पर निष्ठा भाव बनाए रखा। परंतु पार्टी पर उनकी पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई थी। इंदिरा गाँधी ने भी इस परिवर्तन को लक्ष्य कर लिया था। पंडित नेहरु के बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बनाए गए। उन्होंने कांग्रेस संगठन में इंदिरा जी के साथ मिलकर कार्य किया था। शास्त्रीजी ने उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंपा। अपने इस नए दायित्व का निर्वहन भी इंदिराजी ने कुशलता के साथ किया। यह ज़माना आकाशवाणी का था और दूरदर्शन उस समय भारत में नहीं आया था। इंदिरा गाँधी ने आकाशवाणी के कार्यक्रमों में फेरबदल करते हुए उसे मनोरंजन बनाया तथा उसमें गुणात्मक अभिवृद्धि की। 1965 में जब भारत- पाकिस्तान युद्ध हुआ तो आकाशवाणी का नेटवर्क इतना मुखर था कि समस्त भारत उसकी आवाज के कारण एकजुट हो गया। इस युद्ध के दौरान आकाशवाणी का ऐसा उपयोग हुआ कि लोग राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत हो उठे। भारत की जनता ने यह प्रदर्शित किया कि संकट के समय वे सब एकजुट हैं और राष्ट्र के लिए तन-मन धन अर्पण करने को तैयार हैं। राष्ट्रभक्ति का ऐसा जज्बा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी देखने को नहीं प्राप्त हुआ था। इंदिरा गाँधी ने युद्ध के समय सीमाओं पर जवानों के बीच रहते हुए उनके मनोबल को भी ऊंचा उठाया जबकि इसमें उनकी जिंदगी को भारी खतरा था। कश्मीर के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में जाकर जिस प्रकार उन्होंने भारतीय सैंनिकों का मनोबल ऊंचा किया, उससे यह जाहिर हो गया कि उनमें नेतृत्व के वही गुण हैं जो पंडित नेहरु में थे।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==प्रधानमंत्री पद पर== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Radhakrishnan-Indira-Gandhi-Kamaraj.jpg|thumb|250px|[[सर्वपल्ली राधाकृष्णन|डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन]], इंदिरा गाँधी एवं [[कुमारास्वामी कामराज]]]]&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी लगातार तीन बार (1-77) और फिर चौथी बार (1980-84) भारत की प्रधानमंत्री बनी।&lt;br /&gt;
*भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री [[लालबहादुर शास्त्री]] की मृत्यु के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी भारत की तृतीय और प्रथम महिला प्रधानमंत्री निर्वाचित हुई। &lt;br /&gt;
*1967 के चुनाव में वह बहुत ही कम बहुमत से जीत सकीं।&lt;br /&gt;
*1971 में पुनः भारी बहुमत से वे प्रधामंत्री बनी और [[1977]] तक निरन्तर इस गौरवशाली पद पर रहते हुए उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक नयी शक्ति के रूप में स्थापित किया।&lt;br /&gt;
*1977 के बाद ये 1980 में एक बार फिर प्रधानमंत्री बनी और [[1984]] तक प्रधानमंत्री के पद पर रही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[जनवरी]], [[1966]] में शास्त्रीजी की अचानक मृत्यु के बाद श्रीमती गाँधी पार्टी की दक्षिण और वाम शाखाओं के बीच सुलह के तौर पर कांग्रेस पार्टी की नेता (और इस तरह प्रधानमंत्री भी) बन गईं, लेकिन उनके नेतृत्व को भूतपूर्व वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पार्टी की दक्षिण शाखा से लगातार चुनौती मिलती रही। 1967 के चुनाव में वह बहुत ही कम बहुमत से जीत सकीं और उन्हें देसाई को उप-प्रधानमंत्री स्वीकार करना पड़ा। लेकिन 1971 में उन्होंने रूढ़िवादी पार्टियों के गठबंधन को भारी बहुमत से पराजित किया।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताशकंद में 11 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की असामयिक मृत्यु के बाद श्री गुलजारी लाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्हें तब तक इस अंतरिम पद पर रहना था जब तक कि नया प्रधानमंत्री नहीं चुन लिया जाता। तब कांग्रेस के अध्यक्ष कामराज थे। कामराज ने प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गाँधी के नाम का प्रस्ताव रखा। लेकिन मोरारजी देसाई ने भी प्रधानमंत्री पद के लिए स्वयं का नाम प्रस्तावित कर दिया। इस बार उन्हें समझाया नहीं जा सका। तब यह निश्चय किया गया कि कांग्रेस संसदीय पार्टी द्वारा मतदान के माध्यम से इस गतिरोध को सुलझाया जाए। लिहाजा मतदान हुआ इंदिरा गाँधी भारी मतों से विजयी हुई। मोरारजी देसाई को पराजय का मुँह देखना पड़ा। [[24 जनवरी]], [[1966]] को इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार श्री लालबहादुर शास्त्री के निधन के 13 दिन बाद तीसरे प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गाँधी ने पदभार संभालना आरंभ कर दिया। राष्ट्रपति [[डॉक्टर राधाकृष्णन]] ने इंदिरा गाँधी को पद और गोपनीय की शपथ ग्रहण कराई। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रधानमंत्री की प्रभारी भूमिका से इंदिरा जी भली-भाँति वाकिफ़ थीं। उनके पिता का लंबा कार्यक्रम उनके लिए अनुभव भरा साबित हुआ।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;अर्थव्यवस्था में गिरावट&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
उस समय देश में विभिन्न प्रकार की चुनौतियाँ और संकट थे। पिछले तीन वर्षों में भारत पर दो युद्ध थोपे गए थे। उनके कारण देश की आर्थिक स्थिति काफ़ी कमज़ोर हो चुकी थी। भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट का रुख था। औद्योगिक उत्पादन का ग्राफ भी गिरावट को प्रदर्शित कर रहा था। देश में खाद्यान्न संकट था और कृषि की स्थिति दयनीय थी। इंदिरा गाँधी ने खाद्यान्न संकट तथा सूखे की मार से निबटने के लिए जनता का प्रत्यक्ष सहयोग प्राप्त किया। उनके आह्रान पर देश की जनता ने दिल खोलकर राष्ट्रहित में अपना योगदान दिया। इस प्रकार सूखा राहत कोष के माध्यम से काफ़ी धन एकत्र हुआ और उससे खाद्यान्न संकट का मुक़ाबला किया गया। इंदिरा गाँधी ने खाद्यान्न वितरण प्रणाली की कमियों को भी दूर किया इससे गंभीर संकट का समय टल गया और भुखमरी से होने वाली मौतें नगण्य हो गई। बेशक यह इंदिरा गाँधी की एक बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन इंसान सदैव उपलब्धियाँ हासिल नहीं कर सकता और न ही उसके निर्णय सदैव सफल होते हैं। [[जून]], [[1966]] में इंदिरा गाँधी द्वारा डॉलर की तुलना में रुपये का अवमूल्यन करना ऐसी ही ग़लती थी। उन पर [[अमेरिका]] अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक का दबाव था कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए रुपये के मूल्य में कमी की जाए। लिहाजा अवमूल्यन से निर्यात में वृद्धि का अनुमान था। इसमें विदेशी मुद्रा कमाने का लक्ष्य प्रमुख था लेकिन यह अनुमान ग़लत साबित हुआ। दरसल भारत का आयात ज़्यादा था और निर्यात कम। ऐसे में आयात महँगा हो गया और निर्यात सस्ता हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस ग़लत निर्णय का खामियाजा देश को भुगतना पड़ा और भारतीय अर्थव्यवस्था रसातल में पहुँच गई। विदेशों में भी मुद्रा के अवमूल्यन से भारत की साख को काफ़ी बट्टा लगा। आर्थिक विश्लेषकों पर खेला गया यह दांव नुक़सान का सौदा साबित हुआ। अवमूल्यन के कारण जब आर्थिक स्थिति बिगड़ गई तो देश भर में इंदिरा गाँधी के विरुद्ध प्रदर्शन होने लगे। कांग्रेस पार्टी में भी इंदिरा गाँधी की आलोचना आरंभ हो गई। विपक्षी दलों को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया। उन्होंने कांग्रेस के विरुद्ध प्रदर्शन शुरू कर दिया। लेकिन इंदिरा गाँधी एक अलग मिट्टी की बनी हुई थीं। कठिन समय में वह अधिक सुदृढ़ हो जाती थीं। उन्होंने धैर्य कायम रखते हुए देश की खाद्यान्न स्थिति को संभालने के लिए शास्त्रीजी द्वारा आरंभ की गई 'हरित क्रांति योजना' का सहारा लिया। लेकिन भारत को तत्काल सहायता की आवश्यकता थी। वह सहायता अमेरिका प्रदान कर सकता था। अमेरिका उन दिनों उत्तरी वियतनाम पर सैनिक कार्रवाई कर रहा था।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==अमेरिका की चालाकी==&lt;br /&gt;
अप्रैल 1966 में इंदिरा गाँधी ने अमेरिका की सरकारी यात्रा की। इसका उद्देश्य यह था कि अमेरिका पी.एल. 480 के अंतर्गत भारत को गेहूँ एवं मौद्रिक सहायता प्रदान करे। अमेरिका ने 35 लाख टन गेहूँ और लगभग हज़ार मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता करने की पेशकश रखी। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉनसन चाहते थे कि इसके बदले में भारत अमेरिका के पक्ष में बयान जारी करके उत्तरी वियतनाम युद्ध को उचित ठहराए। उस समय उत्तरी वियतनाम पर  हुए अमेरिकी आक्रमण के कारण सारी दुनिया में अमेरिका की तीव्र भर्त्सना की जा रही थी। लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने इस प्रकार का कोई वक्तव्य भारत सरकार की ओर से नहीं दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति को पूरी उम्मीद थी कि कठिन समय से जूझते भारत द्वारा उसकी युद्ध नीति की वकालत अवश्य की जाएगी। लेकिन जब अमेरिका की यह उम्मीद पूरी नहीं हुई तो अमेरिका ने भी भारत की सहायता के लिए दिए गए अपने पूर्व वचन को ठंडे बस्ते में डाल दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब इंदिरा गाँधी को यह विश्वास हो गया कि अमेरिका सशर्त सहायता करना चाहता है तो उन्होंने अमेरिकी युद्ध नीति की काफ़ी भर्त्सना की और उत्तरी वियतनाम पर अमेरिकी हमले को संयुक्त राष्ट्र संघ की नीतियों के विरुद्ध बताया। अमेरिका को भारत से ऐसी तीखी आलोचना की उम्मीद नहीं थी। लिहाजा अमेरिका से मदद का रास्ता बंद हो गया। इंदिरा गाँधी ने भी समझदारी दिखाते हुए सोवियत संघ की ओर मैत्री का हाथ बढ़ा दिया। यही उस समय की विदेशी नीति और कूटनीति की माँग थी।&lt;br /&gt;
==सोवियत संघ से मैत्री==&lt;br /&gt;
समस्त विश्व दो महाशक्तियों के समर्थन में बँटा हुआ था। एक खेमा अमेरिका का था और दूसरा सोवियत संघ का। इस प्रकार पूरी दुनिया दो गुटों में बँट गई थी लेकिन भारत की विदेशी नीति का आधार गुटनिरपेक्षता था। अत: इंदिरा गाँधी ने इस नीति पर कायम रहते हुए सोवियत संघ से मित्रता की उम्मीद रखी। [[1966]] के [[जुलाई]] माह में इंदिरा गाँधी ने सोवियत संघ की यात्रा की। तब उन्होंने सोवियत संघ के साथ एक संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर किया जिसमें अमेरिका की निंदा करते हुए उत्तरी वियतनाम पर किए गए हमले को साम्राज्यवादी नीति का हिस्सा बताया गया था। इस वक्तव्य में यह भी माँग की गई थी कि अमेरिका अविलंब तथा बिना किसी शर्त के उत्तरी वियतनाम में युद्ध बंद करे। युद्ध विराम की वकालत करते हुए भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह अमेरिका के खेमे में रहने को कतई इच्छुक नहीं है। इस वक्तव्य के बाद भारत और सोवियत संघ की मैत्री को नया आयाम प्राप्त हुआ। एक विशाल जनसंख्या वाले बड़े देश भारत को अपना मित्र बनाकर सोवियत रुस भी काफ़ी प्रसन्न था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके अतिरिक्त इंदिरा गाँधी ने वक़्त की ज़रुरत को देखते हुए यह समझ लिया कि गुटनिरपेक्ष देशों के संगठन को अधिक मज़बूत बनाने की आवश्यकता है ताकि किसी भी संकट को आपसी सहयोग और राजनीतिक इच्छा शक्ति से उसे दूर किया जा सके। इस प्रकार किसी भी गुटनिरपेक्ष देश को शक्ति संपन्न देश का मुँह ताकने की आवश्यकता न रहें। इस दौरान [[मिस्र]] और यूगोस्लाविया के साथ भी भारत के मैत्री संबंध विकसित हुए। दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्ष क्रमश: अब्दुल नासिर और जोसेफ टीटो ने भी दिल्ली में आयोजित गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। इस प्रकार एक स्वतंत्र विदेश नीति द्वारा भारत ने अपनी विशिष्ट छवि बनाई।&lt;br /&gt;
==देश की आंतरिक चुनौतियाँ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-Memorial.jpg|thumb|250px|इंदिरा गाँधी की प्रतिमा, [[शिमला]]&amp;lt;br /&amp;gt;Statue Of Indira Gandhi, Shimla]]&lt;br /&gt;
यह कहा जाता है कि व्यक्ति घर से ही मात खाता है अर्थात उसके अपने ही उसे नीचा दिखाते हैं अथवा उसके आलोचक बन जाते हैं। इंदिरा गाँधी के साथ भी यही हुआ। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गाँधी का सम्मान काफ़ी बढ़ गया था लेकिन देश में उनकी स्थिति खराब हो रही थी। कांग्रेस के ही बड़े नेता नहीं चाहते थे कि इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री रहें और विपक्ष तो सत्ता का रसास्वादन करने को कब से आतुर था। इंदिरा गाँधी उन समस्याओं का निराकरण करना चाहती थीं। जो उन्हें विरासत से प्राप्त हुई थी। लेकिन उनके साथ किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं किया गया देश की कृषि मानसून पर आधारित थी और दो वर्ष अनावृष्टि के रूप में गुज़रे थे। कच्चा माल उपलब्ध न होने के कारण औद्योगिक माल का उत्पादन भी कम हो गया था। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्तरों पर असंतोष&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
देश में विभिन्न स्तरों पर असंतोष व्याप्त था। इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही लोगों में कई प्रकार का आक्रोश था। देश में बेरोजगारी अशिक्षा और महंगाई की समस्या थी। लोग आए दिन धरना एवं प्रदर्शन आदि कर रहे थे। पंडित नेहरु ने जिस समाजवादी समाज का स्वप्न देखा था, वह भी काफ़ी दूर होता नज़र आ रहा था क्योंकि देश में पूँजीवादी व्यवस्था मौजूद थी। यही कारण है कि भारत में अमीरी और ग़रीबी के मध्य की खाई गहरी होती जा रही थी। देश में धर्म, जाति, प्रांत, भाषा, और आर्थिक विषमता के कारण कई वर्ग बन गए थे जो तीखे तेवर प्रदर्शित कर रहे थे तथा विपक्ष उनके असंतोष को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा था। यह देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य रहा कि विपक्ष ने अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वहन कभी नहीं किया। विपक्ष की भूमिका यह होती है कि वह सरकार की ज्ञानेंद्रियाँ बनकर उसे उसकी ग़लतियों के विषय में बताए और देश की उन्नति के लिए सरकार के साथ सहयोग करे। लेकिन विपक्ष ने अपना पहला और अंतिम उद्देश्य यह रखा कि सत्ता पर किस प्रकार काबिज हुआ जा सकता है। ऐसी स्थिति में देश में होने वाले आंदोलनों में हिंसा का प्रयोग बढ़ने लगा। असामाजिक तत्वों द्वारा सार्वजनिक संपत्तियों को नुक़सान पहुँचना आए दिन की घटना हो गई थी। यहाँ तक कि पुलिस पर भी हमला करने में आंदोलनकारी पीछे नहीं रहते थे। सरकारी कर्मचारी भी वेतन बढ़ाए जाने की माँग लेकर देश को पंगु बनाने का कार्य कर रहे थे। उनके द्वारा राजकीय कार्यों का बहिष्कार किया जा रहा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इधर स्वयं कांग्रेस की स्थिति भी काफ़ी खराब थी। पार्टी में गुटबाजी और खेमाबंदी होने लगी थी। इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाते समय कई लोगों ने सोचा था कि वे उन्हें अपनी कठपुतली बनाकर रखेंगे। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वे लोग भी खेमे में शामिल हो गए जो असंतुष्ट थे। उधर संसद में भी मर्यादाओं का हनन हो रहा था। महिला प्रधानमंत्री के रूप में उन पर शर्मनाक कटाक्ष किए जाते थे। चूँकि [[1967]] में चुनाव होने थे, अत: विपक्ष ने हिंसक आंदोलन को जन्म देना आरंभ कर दिया। वह चाहता था कि देश में अराजकरता की स्थिति उत्पन्न हो जाए ताकि जनता को यह आभास हो कि देश में प्रशासन नाम की कई चीज नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी तरफ मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री न बनने से नाराज़ थे। तो गुलजारी लाल नंदा को यह दुख था कि पार्टी ने उनकी वफादारी की कोई कीमत नहीं समझी। यद्यपि गुलजारी लाल नंदा उस समय देश के गृह मंत्री थे। लेकिन वह उदासीय रवैया अपनाए हुए थे। और गृह मंत्री की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से मुँह फेरकर खड़े हो गये थे। उनका उदेश्य तो यह था कि एक नातजुर्बेकार महिला प्रधानमंत्री की नाकामयाबी सबके सामने आए। लेकिन [[गुलज़ारीलाल नन्दा]] की उदासीनता बाद में उनके लिए खतरा बन गई दरअसल उन दिनों जनसंघ द्वारा प्रेरित किए जाने पर साधुओं ने गौ-हत्या बंद करने के विरोध में दिल्ली में एक विशाल जुलूस निकाला इन साधुओं में नग्न रहने वाले साधुओं की मंडली भी शामिल थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने पुरातन व्यवस्था के पक्षधर की भूमिका निभाते हुए उस समय भी कोई कार्रवाई नहीं की जब वे साधू दिल्ली में हुड़दंग मचा रहे थे। इससे उन साधुओं की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सार्वजनिक संपत्ति, वाहनों और दुकानों में भी आग लगाना आरंभ कर दिया। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष कामराज के आवास में अनधिकृत तरीके से प्रविष्ट होने का प्रयास किया। जब पुलिस और कर्मचारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो हिंसक हो उठे साधुओं ने त्रिशूल, भाले और तलवारों का उपयोग करना आरंभ कर दिया। इससे कई पुलिस कर्मचारी घायल हुए और उनमें से एक की बाद में मृत्यु हो गई।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;विपक्ष की भूमिका&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
ऐसी स्थिति में विपक्ष ने इस घटना को उछाला और प्रधानमंत्री तथा केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेना आरंभ कर दिया। इस पर इंदिरा गाँधी ने गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा से इस्तीफा देने को कहा। इसी के साथ गुलजारी लाल नंदा का राजनीतिक भविष्य भी समाप्तप्राय हो गया। संसद में विपक्ष की भूमिका इंदिरा गाँधी को लेकर असंसदीय बनी रही। समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने इंदिरा गाँधी को 'गूंगी गुड़िया' के नाम से संबोधित किया। उस समय राममनोहर लोहिया बेहद सम्मानित नेता थे और पंडित नेहरु के साथ उनके मत भेद थे। वह अपनी नीतियों की सदा आलोचना भी करते थे। लेकिन श्री लोहिया इस संबंध में अपनी मर्यादा में नहीं रह पाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1967 के चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी में अंतर्कलह मची हुई थी। उस समय जनता के मध्य इंदिरा गाँधी जैसी लोकप्रियता वाली शाख्सियत कांग्रेस पार्टी में कोई दूसरी नहीं थी। उनका करिश्माई व्यक्तित्व ही पार्टी को जीत दिला सकता था।  लेकिन उस समय के कांग्रेसियों ने यह सोच लिया था कि कांग्रेस आज़ादी के बाद दो आम चुनाव जीत चुकी है और लोग कांग्रेस पार्टी को ही वोट देते हैं। परंतु यह कांग्रेस के असंतुष्टों की भारी भूल थी।पंडित नेहरु ने देश के लिए जो कुछ किया था, जनता उसकी गवाह थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय जनता यह भी जानती थी कि चीन से युद्ध हारने का कारण नेहरुजी नहीं थे। बल्कि देश की कमज़ोर स्थिति ही थी। नेहरुजी देश को मजबूत करना चाहते थे, न कि सेना को मजबूत बनाना। इस कारण शांति के प्रतीक नेहरुजी को भारतीय जनता ने दोष नहीं दिया। लेकिन करोड़ों की आबादी वाले देश में सभी उनके साथ नहीं हो सकते थे क्योंकि यह मानवीय स्वभाव है। यद्यपि विपक्ष को लगता था कि जनता नेहरुजी से नाराज़ थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसे में कांग्रेस पार्टी में असंतुष्ट हावी हो गए और इंदिरा गाँधी को उस समय हाशिये पर डाल दिया गया। जब आम चुनाव के लिए टिकट वितरण का कार्य किया जा रहा था तब कामराज ने कमान अपने हाथ में संभाल ली। इंदिरा गाँधी की छवि धूमिल करने के लिए विपक्ष ने भी कोई कसर नहीं उठा रखी थी। भुवनेश्वर की चुनावी सभा में इंदिरा गाँधी पर विपक्ष के गुंडों ने अचानक पत्थर बरसाने आरंभ कर दिए। इस कारण उनकी नाक की हड्डी टूट गई और होंठ फट गया। इंदिरा गाँधी रक्तरंजित हो उठीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह भुवनेश्वर के नाम पर कलंक था। देश के प्रथम पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की प्रधानमंत्री बेटी के साथ किया गया यह बर्ताव किसी भी नज़रिये से उचित नहीं था। इंदिरा गाँधी को अस्पताल में उपचार कराना पड़ा। तब पीत पत्रकारिता ने इस घटना को मनोविनोद का केंद्र बना दिया। लोकतंत्र के नाम पर  जिस घटना की भर्त्सना होनी चाहिए थी, उसे मीडिया ने मनोरंजन की तरह पेश किया। लोग कहने लगे- इंदिरा गाँधी की नाक टूट गई अथवा चुनाव के नतीजों से पूर्व ही उनकी नाक कट गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बहरहाल चुनाव संपन्न हुए और नतीजे भी आ गए। केंद्र में कांग्रेस बेशक सत्ता में आ गई लेकिन विभिन्न  कई राज्यों में उसकी स्थिति काफ़ी खराब हो गई थी। कई राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों ने बाजी मारी और कुछ राज्यों में गठबंधन सरकारें बनीं। राज्यों की यह हालत केंद्र में कांग्रेस पार्टी की कमज़ोरी के कारण हुई थी। जिन राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकारें थीं, वहां क्षेत्रीय कांग्रेसजनों ने सत्ता का सुख भोगा और अनेक लोगों ने काफ़ी धन-संपदा बनाई। इस कारण कांग्रेस के विरुद्ध ऐसा माहौल बना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विपक्ष ने भी मुद्दे की राजनीति करने के बजाय कांग्रेस और इंदिरा गाँधी को ही अपना निशाना बनाया। उस समय विपक्ष काफ़ी हद तक संगठित भी हो हया था। लेकिन जनता के सामने वह सकारात्मक बातें न रखने की भारी भूल कर बैठा। विपक्ष को लगा था कि कांग्रेस पर कीचड़ उछालने से उसे विजय का मार्ग मिल जाएगा अथवा उन्हें नीचा दिखाकर वह ऊंचा हो जाएगा। यही कारण है कि जनता ने विपक्ष पर विश्वास नहीं किया। बेशक कांग्रेस विजयी रही लेकिन उसे कई सीटों की हार का सामना करना पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्यों में कांग्रेस की हार का कारण अविवेकपूर्ण ढंग से किया गया टिकटों का वितरण भी था। अयोग्य उम्मीदवारों को टिकट प्रदान किए गए। इससे योग्य उम्मीदवारों में असंतोष फैल गया। वे बागी उम्मीदवारों के रूप में कांग्रेस प्रत्याशियों के विरुद्ध खड़े हो गए। इस कारण कांग्रेस की अंतर्कलह ने राज्यों में कांग्रेस का कबाड़ा कर दिया। क्षेत्रीय पार्टियों में भी गठबंधन हुए थे। उन्हें तो मात्र सत्ता प्राप्त करनी थी। इस कारण  पार्टियों ने गठबंधन करते हुए यह ध्यान रखा था कि कांग्रेस को हराना है। लोहिया की समाजवादी पार्टी ने तो हिन्दू संप्रदायवादी जनसंघ से हाथ मिला लिया। [[अनीश्वरवाद|अनीश्वरवादी]] साम्यवादियों ने धर्मांध दक्षिण पंथियों से हाथ मिलाने नें कोई हिचकिचाहट प्रदर्शित नहीं की। जिस मुस्लिम लीग के कारण देश का विभाजन हुआ था, कई पार्टियों ने उसके साथ मिलकर भी गठबंधन सरकार बनाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान के भूतपूर्व राजे-महाराजाओं ने मिलकर एक स्वतंत्र पार्टी का गठन किया। उन्होंने इंदिरा गाँधी की चुनाव सभाओं में शर्मनाक हुड़दंह मचाया। ये लोग विलासितापूर्ण प्रवृति के लिए जाने जाते थे और शोषण को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे। निरंकुशता इनकी विशिष्टता थी। वे लोग लोकतंत्र के माध्यम से सत्ता पर काबिज होने का प्रयत्न करने लगे। स्थानीय जनता का शोषण करने वाले इन राजे रजवाड़ों में से अनेक ने देश की आज़ादी के महासंग्राम के समय अंग्रेजों का साथ दिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केंद्र में कांग्रेस को बहुमत से 48 सीटें ही अधिक मिल पाईं। केंद्र तथा राज्य दोनों स्थानों पर कांग्रेस में गिरावट देखने को प्राप्त हुई। लेकिन 1967 के आम चुनावों के नतीजे इंदिरा गाँधी के ही पक्ष में गए। सिंडीकेट के मजबूत स्तंभ कहे जाने वाले नेताओं को जनता ने धूल में मिला दिया। कामराज को पराजय का मुख देखना पड़ा। तब इन्हें किंग मेकर की संज्ञा प्रदान की जाती थी। एस.के.पाटिल सहित सिंडीकेट के अनेक धुरंधरों को हार का सामना करना पड़ा। इंदिरा गाँधी विजयी रहीं। इस प्रकार कांग्रेस में उनका वर्चस्व स्वत: कायम हो गया क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वी चुनाव में हार गए थे। &lt;br /&gt;
सिंडीकेट के मजबूत सिपाहसालारों में से मोरारजी देसाई ही चुनाव जीत पाने में सफल हुए। लेकिन उनके साथियों का सफाया हो जाने के कारण वह कमज़ोर स्थिति में थे। फिर भी इंदिरा गाँधी ने उन्हें पुराने कांग्रेसी होने के कारण सम्मान के साथ उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री का पद प्रदान किया। इंदिरा गाँधी को उम्मीद थी कि वह संतुष्ट होकर कांग्रेस की बेहतरी के लिए कार्य करेंगे  लेकिन यह इंदिराजी की भूल थी। मोरारजी देसाई को निष्ठावान बनाए रखने में इंदिरा गाँधी आगे चलकर विफल रहीं।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==कांग्रेस का विभाजन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-Museum-Delhi.jpg|thumb|250px|इंदिरा गाँधी संग्रहालय, [[दिल्ली]]&amp;lt;br /&amp;gt;Indira Gandhi Museum, Delhi]] &lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी पुन: प्रधानमंत्री बन गई लेकिन सिंडीकेट का पराभव लंबे समय तक नहीं चला। कामराज और एस. के. पाटिल उप चुनावों के माध्यम से विजयी होकर सांसद बन गए। उन्होंने मोरारजी देसाई को अपने साथ मिलाकर सिंडीकेट को पुन: मज़बूत बना लिया। ऐसे में सिंडीकेट ने दावा किया कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री पार्टी से ऊपर नहीं है और पार्टी की नीतियों के अनुसार ही प्रधानमंत्री को शासन करने का अधिकार होता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी सर्वहारा वर्ग के लिए कार्य करना चाहती थीं। वह समाजवाद की विचार धारा को कार्यरुप में परिणत करना चाहती थीं। लेकिन सिंडीकेट पूँजीपतियों और बड़े उद्यमियों को प्रश्रय देना चाहती थी। इंदिरा गाँधी आम जनता के लिए जो प्रभावी कार्यक्रम लागू करना चाहती थीं। उसमें सिंडीकेट बाधाबनी हुई थी। [[1967]] के अंत में कामराज का अध्यक्षीय कार्यकाल समाप्त होना था। इंदिरा गाँधी को यह उम्मीद बंधी कि पार्टी का नया अध्यक्ष पद निजलिंगप्पा के सुपुर्द हो गया। वह अत्यंत अनुदारवादी और महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति थे। सिंडीकेट ने तय कर लिया कि इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री पद से हटाकर सिंडीकेट के किसी वफादार व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया जाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[मोरारजी देसाई]] ने प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी रजामंदी भी दे दी। इंदिरा गाँधी भी खतरे को भांप चुकी थी। लेकिन उपयुक्त अवसर का इंतज़ार करने लगीं। वह स्वयं पहला बार नहीं करना चाहती थीं। उन्हें यह अवसर मई 1967 में तब प्राप्त हुआ जब डॉक्टर [[ज़ाकिर हुसैन]] की राष्ट्रपति पद पर कार्यकाल के दौरान मृत्यु हो गई। नए राष्ट्रपति के चुनाव ने यह भूमिका बनाई कि इंदिरा गाँधी आर-पार की लड़ाई लड़ सकें। तब सिंडीकेट ने नए [[राष्ट्रपति]] के रूप में [[नीलम संजीव रेड्डी]] का नाम प्रस्तावित किया। फिर कांग्रेस की ओर से उनका नामांकन भी कर दिया गया। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सुधारवादी आर्थिक कार्यक्रम&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
सिंडीकेट चाहती थी कि रेड्डी के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री पद छोड़ने के लिए विवश कर दिया जाए। इंदिरा गाँधी को सिंडीकेट की इस चाल का पूर्वानुमान था। उन्होंने तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर दिया। इससे जनता के मध्य उनकी छवि खंडित हुई कि वह पार्टी के विरुद्ध जा रही हैं। लेकिन इंदिरा गाँधी को यह पता था कि उन्हें आगे क्या करना है। लिहाजा उन्होंने मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय वापस ले लिया क्योंकि वह सुधारवादी आर्थिक कार्यक्रमों को लागू करने में बाधा और पूँजीवादियों के प्रहरी बने हुए थे। अब इंदिरा गाँधी ने वित्त मंत्रालय अपने पास रखते हुए कई सुधारवादी आर्थिक कार्यक्रम चलाए। उन्होंने देश के महत्त्वपूर्ण 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया ताकि वे सरकार की आर्थिक नीति के अनुसार आचारण कर सकें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी ने दूसरा कदम यह उठाया कि भूतपूर्व राजा-महाराजाओं को जो बड़ी राशि प्रीविपर्स के रूप में मिलती आ रही थी, उसकी समाप्ति की घोषणा कर दी। इन बड़े दो कदमों के कारण जनता के मध्य इंदिरा गाँधी की एक सुधारवादी प्रधानमंत्री की छवि कायम हुई और उनकी लोकप्रियता का ग्राफ़ एकदम ही उछल गया। ग़रीब, दलित, मध्यम वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग सभी ने इंदिरा गाँधी के सुधारवादी कदमों की जमकर प्रशंसा की। इधर सिंडीकेट ने इंदिरा गाँधी पर जोर डाला कि वह नीलम संजीव रेड्डी के राष्ट्रपति चुनाव हेतु 'व्हिप' जारी करें। लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया और अंतरात्मा की आवाज पर योग्य उम्मीदवार को वोट देने की अपील की। इंदिरा गाँधी ने अपनी सुदृढ़ छवि बनाकर वी.वी गिरि के लिए मार्ग साफ कर दिया। वी. वी. गिरि राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए और सिंडीकेट को पुन: मुहँ की खानी पड़ी। अब सिंडीकेट के नेता बुरी तरह बौखला चुके थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[12 नवंबर]], [[1967]] को इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए पार्टी से निष्क़ासित कर दिया। इस प्रकार वे उन्हें प्रधानमंत्री पद से अपदस्थ करना चाहते थे। जो व्यक्ति पार्टी की सदस्यता से निष्कारित हो चुका हो, वह उस पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री कैसे रह सकता था? इसके जवाब में इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस पार्टी को विभाजित कर दिया। उन्होंने अपनी कांग्रेस को कांग्रेस-आर (रिक्विसिशनिस्ट) करार दिया जबकि सिंडीकेट की कांग्रेस को कांग्रेस-ओ(आर्गेनाइजेशन) नाम प्राप्त हो गया।{{दाँयाबक्सा|पाठ=आज तक भारत के जितने भी प्रधानमंत्री (कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा सहित) हुए हैं। उन सभी की अनेक विशेषताएँ हो सकती हैं। लेकिन इंदिरा गाँधी के रूप में जो प्रधानमंत्री भारत भूमि को प्राप्त हुआ, वैसा प्रधानमंत्री अभी तक दूसरा नहीं हुआ है क्योंकि एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने विभिन्न चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सफलता प्राप्त की। युद्ध हो, विपक्ष की ग़लत नीतियाँ हों, कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय मैदान हो अथवा देश की कोई समस्या हो- इंदिरा गाँधी ने स्वयं को सफल साबित किया।|विचारक=}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी की पार्टी में सिंडीकेट की पार्टी से ज़्यादा सदस्य संख्या थी। इस कारण वह प्रधानमंत्री, साथ ही अपनी पार्टी की अध्यक्ष भी बनी रहीं। लेकिन इंदिरा गाँधी अब सिंडीकेट से पूरी तरह मुक्त हो जाना चाहती थीं। इसके लिए यह आवश्यक था कि वह पुन: जनादेश लें और नई पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुनाव सभा में जाएँ। उन्होंने मध्यावधि चुनाव का मन बना लिया था। लेकिन इसकी घोषणा करने से पूर्व इंदिरा गाँधी ने कुछ ऐसे कार्यों को संपादित किया जिससे चुनावों के दौरान उन्हें लाभ मिल सके। उन्होंने मध्यावधि चुनाव की घोषणा से पूर्व निम्नवत कदम उठाए।&lt;br /&gt;
*बैंकों के राष्ट्रीयकरण का कार्य पूर्ण किया गया। संसद में बहुमत था और राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने अध्यादेश को स्वीकृत कर लिया। इसके पूर्व न्यायालय ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण को अवैध ठहराया था। बैकों के राष्ट्रीयकरण के बाद भारत सरकार की राष्ट्रीय आर्थिक नीति के अंतर्गत सामाजिक सरोकार के कार्य होने लगे। मध्यम वर्ग तथा अल्प मध्यम वर्ग के लोगों को रोजगारपरक ऋण मिलने का मार्ग साफ हो गया। इससे भी इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता काफ़ी बढ़ी और उन्हें सही मायनों में समाजवाद की दिशा में कार्य करने वाला उदार नेता माना गया।                                                                                                                             &lt;br /&gt;
*भूमि हदबंदी योजना को पूरी शक्ति के साथ लागू किया गया। इससे ग़रीब किसानों को अच्छा लाभ मिला। इंदिरा गाँधी की छवि में इजाफा हुआ। ग्रामीण लोग इंदिरा गाँधी को कल्याणकारी प्रधानमंत्री मानने लगे।&lt;br /&gt;
*अगस्त 1970 में राजा-महाराजाओं को दिया जाने वाला प्रीविपर्स समाप्त कर दिया गया। इस प्रकार करोड़ों रुपयों की बचत संभव हुई और यह धन देश के सर्वहारा वर्ग के काम आया। इंदिरा गाँधी के इस कदम का ग़रीबों और शोषित वर्ग के लोगों ने काफ़ी समर्थन किया।&lt;br /&gt;
*चौथी पंचवर्षीय योजना को लागू किया गया ताकि पंडित नेहरु ने राष्ट्र के विकास का जो माध्यम तैयार किया था, उसे क्रियांवित किया जा सके। चौथी पंचवर्षीय योजना बजट दुगना कर दिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार इंदिरा गाँधी ने लोक कल्याणकारी कार्यों के माध्यम से जनता के मध्य अपनी एक नई पहचान कायम की। लेकिन उनके विश्वस्त सांसदों की स्थिति पर्याप्त नहीं थी। वह चाहती थीं कि नए विधेयकों के लिए उन्हें दूसरी पार्टियों का मुँह न ताकना पड़े। इस प्रकार चुनाव से पूर्व इंदिरा गाँधी ने अपना आभामंडल तैयार किया और [[27 दिसंबर]], [[1970]] को लोकसभा भंग करके मध्यावधि चुनाव का मार्ग प्रशस्त कर दिया। एक वर्ष पूर्व लोकसभा भंग करने का उनका निर्णय साहसिक था। इससे इंदिरा गाँधी यह संदेश देना चाहती थीं कि उन्हें अधिक मात्रा में जनता का समर्थन चाहिए ताकि वह कल्याणकारी योजनाओं को मज़बूती से लागू कर सकें। जनता ने भी यह समझ लिया था कि उन्हें इंदिरा गाँधी के हाथ मज़बूत करने हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मध्यावधि चुनाव== &lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी मध्यावधि चुनाव भी करवा सकती हैं, विपक्ष को इसका अंदेशा नहीं था। लोकसभा भंग होने की घोषणा ने उन्हें भौचक्का कर दिया। उन्होंने न तो कोई तैयारी की थी और न ही कोई व्यूह रचना करने में सफल हुए थे। उनके पास पर्याप्त समय भी नहीं था जबकि जनता के पास जाने के लिए समुचित कार्य योजना की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में विपक्ष इस कसौटी पर खरा नहीं उतर सका और संगठनवादी कांग्रेस के पास भी कोई मुद्दा नहीं था। इस कारण विपक्ष ने जहाँ 'कांग्रेस हटाओं' का नारा दिया, वहीं संगठन कांग्रेस ने इंदिरा हटाओं को ही अपनी चुनावी मुहिम का मुख्य मुद्दा बना लिया लेकिन जनता ठोस कार्यों की कार्य योजना चाहती थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी ने 'ग़रीबी हटाओं' के नारे के साथ समाजवादी सिद्धांतों के अनुरुप चुनावी घोषणा पत्र तैयार कराया 'ग़रीबी हटाओं' का नारा लोकप्रिय साबित हुआ। उनके पूर्ववर्ती लोकहित कार्यों की पृष्ठभूमि ने भी चमत्कारी भूमिका निभाई। इंदिरा गाँधी के पक्ष में चुनावी माहौल बनने लगा जबकि हताश विपक्ष इंदिरा गाँधी के चारित्रिक हनन की तुच्छ राजनीति करके खुश हो रहा था। इन चुनावों में इंदिरा गाँधी पर मात्र भद्दी टिप्पणियाँ ही नहीं की गईं बल्कि अनर्गल भाषा का प्रयोग भी किया गया। भारतीय जनता एक नारी की अस्मिता पर होने वाले मौखिक हमलों की गवाह बह गई। लेकिन उस मूक गवाह ने मतदान के हथियार से जो जनादेश दिया, वह प्रजातंत्र की सही ताकत भी बना। ऐसे में विपक्ष को यह समझ में आ गया कि जनता के पास स्व-विवेक है। वह भेड़ों का झुंड नहीं है जिसे नेता रूपी गड़रिये यों ही हांककर ले जाएँ। इंदिरा गाँधी को बहुतमत प्राप्त हो गया। उन्हें 518 में से 352 सीटों की प्राप्ति हुई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चुनाव में विजय हासिल करने के लिए कांग्रेस (ओ), जनसंघ एवं स्वतंत्र पार्टी ने एक गठबंधन बनाया जिसका नाम 'ग्रैंड अलायंस' रखा गया था। ग्रैंड अलायंस को भारी क्षति हुई और जनता ने उन्हें नकार दिया। जनता ने संकीर्णतावादी विचारों को दर-किनार करके इंदिरा गाँधी को बहुमत प्रदान किया। केंद्र में इंदिरा गाँधी की स्थिति बेहद मज़बूत हो गई थी। अब वह स्वतंत्र फैसले करने में स्वतंत्र थीं। भारत का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ा। दुनिया भर के अन्य राष्ट्र भारत की ओर उत्सुक दृष्टि से देख रहे थे। क्योंकि राजनीतिक स्थिरता प्राप्त करने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि भारत विकास पथ पर बढ़ते हुए आर्थिक स्वावलंबन भी प्राप्त कर लेगा।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==पाकिस्तान युद्ध== &lt;br /&gt;
पाकिस्तान बनने के साथ ही वहाँ अप्रत्यक्ष रूप से एक बँटवारा हो गया था- पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान ने भाषा की श्रेष्ठता के आधार पर पूर्वी पाकिस्तान के साथ सौतेला व्यवहार करना आरंभ कर दिया। बंगला भाषी पाकिस्तानियों का शोषण होने लगा और उन्हें पाकिस्तान में दोयम दर्जे का नागरिक माना जाने लगा। पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों में श्रेष्ठता का दंभ था। इस कारण पाकिस्तान बनने के बाद जो विकास कार्य हुआ, वह पश्चिमी पाकिस्तान में ही हुआ। ऐसे में बंगला भाषी पाकिस्तानियों की आर्थिक स्थिति में भी निरंतर गिरावट रही। इस सौतेलेपन के विरुद्ध पूर्वी पाकिस्तान ने आवाज़ बुलंद की इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी आवाज़ को कुचलने के लिए कई बार सैनिक कार्रवाई भी की गई। अततः शेख़ मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में समस्त पूर्वी पाकिस्तान सौतेलेपन और शोषण के विरुद्ध एकजुट हो गया। पाकिस्तान के सैन्य शासक यहिया खान ने पूर्वी पाकिस्तान में सेना भेज दी। इन सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान में अमानवीयता की हदें पार करते हुए नृशंसता का जो नंगा नृत्य किया, उससे इंसानियत शर्मसार हो गई। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-2.jpg|thumb|250px|left|इंदिरा गाँधी स्टाम्प]]&lt;br /&gt;
इन सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान की बहू-बेटियों के साथ सामूहिक रूप से बलात्कार किए। लोगों का कत्ले-आम करते हुए दुग्धमुँहे बच्चों को भी संगीनों पर उछाला गया। पूर्वी पाकिस्तान के भयभीत लोग भारत के सीमावर्ती प्रांतों में शरण लेने के लिए मज़बूर हो गए। [[1971]] के नवंबर माह तक पूर्वी पाकिस्तान के एक करोड़ शरणार्थी भारत में प्रविष्ट हो चुके थे। इन शरणार्थियों की उदय पूर्ति करना तब भारत के लिए एक समस्या बन गई थी। ऐसी स्थिति में भारत ने पाकिस्तान के बर्बर रुख के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवता के हित में आवाज़ बुलंद की। इसे पाकिस्तान ने अपने देश का आंतरिक मामला बताते हुए पूर्वी पाकिस्तान में घिनौनी सैनिक कार्रवाई जारी रखी। छह माह तक वहाँ दमन चक्र चला। आठ साल से लेकर साठ साल तक की महिलाओं को बलात्कार के दंश झेलने पड़े। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान जो स्त्रियाँ गर्भवती हुई थीं, उनमें से सत्तर प्रतिशत स्त्रियों के साथ पाकिस्तानी सैनिकों ने बलात्कार किया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके पश्चात पाकिस्तान ने [[3 दिसंबर]], 1971 को भारत के वायु सेना ठिकानों पर हमला करते हुए उसे युद्ध का न्योता दे दिया। पश्चिमी भारत के सैनिक अड्डों पर किया गया हमला पाकिस्तान की ऐतिहासिक पराजय का कारण बना। इंदिरा जी ने चतुरतापूर्वक तीनों सेनाध्यक्षों के साथ मिलकर यह योजना बनाई कि उन्हें दो तरफ से आक्रमण करना है। एक आक्रमण पश्चिमी पाकिस्तान पर होगा और दूसरा आक्रमण तब किया जाएगा जब पूर्वी पाकिस्तान की मुक्तिवाहिनी सेनाओं को भी साथ मिला लिया जाएगा। जनरल जे.एस.अरोड़ा के नेतृत्व में भारतीय थल सेना मुक्तिवाहिनी की मदद के लिए मात्र ग्यारह दिनों में ढाका तक पहुँच गई। पाकिस्तान की छावनी को चारों ओर से घेर लिया गया। तब पाकिस्तान को लगा कि उसका मित्र अमेरिका उसकी मदद करेगा। उसने अमेरिका से मदद की गुहार लगाई। अमेरिका ने चौधराहट दिखाते हुए अपना सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया। तब इंदिरा गाँधी ने जनरल मॉनेक शॉ से परामर्श करके भारतीय सेना को अपना काम शीघ्रता से निपटाने का आदेश दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
13 दिसंबर को भारत की सेनाओं ने ढाका को सभी दिशाओं से घेर लिया। 16 दिसंबर को जनरल नियाजी ने 93 हजार पाक सैनिकों के साथ हथियार डाल दिए। उन्हें बंदी बनाकर भारत ले आया गया। शीघ्र ही पूर्वी पाकिस्तान के रूप में बांग्लादेश का जन्म हुआ और पाकिस्तान पराजित होने के साथ ही साथ दो भागों में विभाजित भी हो गया। भारत ने बांग्लादेश को अपनी ओर से सर्वप्रथम मान्यता भी प्रदान कर दी। भारत ने युद्ध विराम घोषित कर दिया क्योंकि उसका उद्देश्य पूर्ण हो चुका था। इसके बाद कई अन्य राष्ट्रों ने भी बांग्लादेश को एक नए राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार इंदिरा गाँधी ने अपार धैर्य, जीवट और बुद्धि कौशल से शत्रु का सिर कुचल दिया। लोगों ने इंदिरा गाँधी को उनके साहस के लिए मां [[दुर्गा]] का अवतार मान लिया। युद्ध द्वारा इतिहास बदल जाते हैं लेकिन इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान की भौगोलिक सीमाओं को बदल दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाकिस्तान के पास सेना नहीं बची थी, इसलिए युद्ध विराम स्वीकार करना उसकी अनिवार्य मज़बूरी थी। अमेरिका और पाकिस्तान के अन्य मित्र सेना रहित देश की क्या सहायता कर सकते थे। दक्षिण एशिया में भारत एक महाशक्ति के रूप में अवतरित हो चुका था। भारत पर किसी अन्य देश द्वारा हमला किए जाने की स्थिति में सोवियत संघ ने गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी जारी कर दी। ऐसे में अमेरिका भी चुप्पी लगाकर बैठ गया। भारत ने पाकिस्तान की सैकड़ों वर्ग मील भूमि पर अपना कब्ज़ा कर लिया था और उसके लगभग एक लाख सैनिक बंदी बना लिए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युद्ध में शर्मनाक हार झेलने के बाद यहिया ख़ान के स्थान पर ज़ुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति बनाए गए। उन्होंने भारत के समक्ष शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा जिसे इंदिरा गाँधी ने स्वीकार कर लिया। [[शिमला]] में हुई वार्ता के दौरान निम्नलिखित मुद्दों पर समझौता हुआ। &lt;br /&gt;
#भारत द्वारा पाकिस्तान के बंदी बनाए गए सैनिकों को रिहा कर दिया जाएगा और पाकिस्तान की भूमि भी लौटा दी जाएगी। &lt;br /&gt;
#[[कश्मीर]] के जिन महत्त्वपूर्ण सामरिक स्थानों को भारत ने हासिल किया है, वहाँ भारत का आधिपत्य बना रहेगा। &lt;br /&gt;
#यदि भविष्य में कोई विवाद पैदा होता है तो किसी भी अन्य देश की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं होगी तथा विवाद को शिमला समझौते की शर्त के अनुसार ही हल किया जाएगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही कारण है कि जब कभी राजनयिक स्तर पर वार्ताएँ होती हैं। तो पाकिस्तान शिमला समझौते की शर्तों को मानने के लिए बाध्य रहता है। इस प्रकार भारत की गरिमामयी प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने दुश्मन राष्ट्र को विखंडित करके उसकी शक्ति को सदैव के लिए कमज़ोर कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चहुँमुखी विकास==&lt;br /&gt;
पाकिस्तान से युद्ध के बाद इंदिरा गाँधी ने अपना सारा ध्यान देश के विकास की ओर केंद्रित कर दिया। संसद में उन्हें बहुमत प्राप्त था और निर्णय लेने में स्वतंत्रता थी। उन्होंने ऐसे उद्योगों को रेखांकित किया जिनका कुशल उपयोग नहीं हो रहा था। उनमें से एक बीमा उद्योग था और दूसरा कोयला उद्योग। बीमा कंपनियाँ भारी मुनाफा अर्जित कर रही थीं। लेकिन उनकी पूँजी से देश का विकास नहीं हो रहा था। वह पूँजी निजी हाथों में जा रही थी। बीमा कंपनियों के नियमों में पारदर्शिता का अभाव होने के कारण जनता को वैसे लाभ नहीं प्राप्त हो रहे थे, जैसे होने चाहिए थे। लिहाजा [[अगस्त]], [[1972]] में बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार कोयला उद्योग में भी श्रमिकों का शोषण किया जा रहा था। उस समय कोयला एक परंपरागत ऊर्जा का स्त्रोत था और उसकी बर्बादी की जा रही थी। कोयला खानों की खुदाई वैज्ञानिकतापूर्ण नहीं थी। इस कारण खान दुर्घटनाओं में सैकड़ों श्रमिक एक साथ काल-कवलित हो जाते थे। कोयला उद्योग एक माफिया गिरोह के हाथों में संचालित होता नज़र आ रहा था। सरकार को रेल एवं उद्योगों के लिए कोयला आपूर्ति हेतु इन पर आश्रित होना पड़ता था। अतः इंदिरा गाँधी ने कोयला उद्योग का भी जनवरी 1972 में राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनके इन दोनों कार्यों को अपार जनसमर्थन प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त इंदिरा गाँधी ने निम्नवत समाजोपयोगी कदम उठाए जिनकी उम्मीद लोक कल्याणकारी सरकार से की जा रही थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#हदबंदी क़ानून को पूरी तरह लागू किया गया। अतिरिक्त भूमि को लघु कृषकों एवं भूमिहीनों के मध्य वितरित किया गया। &lt;br /&gt;
#केंद्र की अनुशंसा पर राज्य सरकारों ने भी विधेयक पारित करके इन कानूनों को राज्य में लागू करने का कार्य किया।&lt;br /&gt;
#आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों को सस्ती दरों पर खाद्यान्न प्रदान करने की योजना का शुभारंभ किया गया। &lt;br /&gt;
#ग्रामीण बैंकों की स्थापना अनिवार्य की गई और उन्हें यह निर्देश दिया गया कि किसानों एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना करने वाले लोगों को सस्ती ब्याज दर पर पूँजी उपलब्ध करवाएँ।&lt;br /&gt;
#ज्वॉइट स्टॉक कंपनियों द्वारा जो राजनीतिक चंदा प्रदान किया जाता था, उस पर रोक लगा दी गई ताकि धन का नाजायज उपयोग रोका जा सके।&lt;br /&gt;
#परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल करने के लिए [[राजस्थान]] के पोकरण में परमाणु विस्फोट किया गया।&lt;br /&gt;
#इंदिरा गाँधी ने यह प्रस्ताव पारित करवाया कि संसद में पारित हुए विधेयकों को निरस्त करने का अधिकार उच्चतम न्यायालय को नहीं होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार इंदिरा गाँधी ने देश को विकास एवं प्रगति के पथ पर आरूढ़ किया। लेकिन विपक्ष इंदिरा गाँधी के विरुद्ध बेचैनी महसूस कर रहा था और पूँजीपति भी सरकार की नीतियों से संतुष्ट नहीं थे। इस कारण उनके विरुद्ध षड्यंत्र रचे जा रहे थे। लेकिन विदेशों में इंदिरा गाँधी का सम्मान बहुत बढ़ गया था और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर का नेता मान लिया गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आपातकाल के पूर्व की स्थितियाँ==&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी कल्याणकारी नीतियों के कारण निम्न वर्ग को फ़ायदा हो रहा था लेकिन पूँजीपतियों को सरकारी नीतियों से घोर निराशा हो रही थी। इसी प्रकार जिन राजे-रजवाड़ों के विरुद्ध कार्रवाई की गई थी, वे भी वर्ग सरकार की नीतियों का समर्थक नहीं रहा क्योंकि कीमतों में काफ़ी वृद्धि हो रही थी और लोग बढ़ती महँगाई के कारण जीवन स्तर बनाए रखने में सफल नहीं हो पा रहे थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश ने युद्ध का आर्थिक बोझ भी झेला था। एक करोड़ बांग्लादेश शरणार्थियों को शरण देने के कारण संकट तब बढ़ गया जब दो वर्षों से वर्षा नहीं हुई। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रोलियम के मूल्य में निरंतर वृद्धि होने से भी भारत में महँगाई बढ़ रही थी और देश का विदेशी मुद्रा भंडार पेट्रोलियम आयात करने के कारण तेजी से घटता जा रहा था। आर्थिक मंदी से उद्योग धंधे भी चौपट हो रहे थे। ऐसी स्थिति में बेरोजगारी काफ़ी बढ़ चुकी थी और सरकारी कर्मचारी महँगाई से त्रस्त होने के कारण वेतन में वृद्धि की माँग कर रहे थे। सरकारी कर्मियों के रूप में सबसे बड़ी हड़ताल रेल कर्मचारियों की थी। इनका आंदोलन 22 दिनों तक चला। इस कारण जहाँ यात्रियों को भारी परेशानी हुई, वहीं माल का परिवहन भी बाधित हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेल का चक्का रुकने से देश की प्रगति का चक्र भी थम गया था। रेल कर्मचारियों को चेतावनी दी गई लेकिन हड़ताल जारी रही। ऐसे में सरकार ने हड़ताल को गैरकानूनी करार देते हुए कठोर और दमनात्मक कार्रवाई की। हजारों कर्मचारियों के आवास ख़ाली करवाए गए और उन्हें नौकरी से भी बर्खास्त कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि कर्मचारी एवं श्रमिक वर्ग इंदिरा गाँधी से नाराज़ हो गया। समस्तीपुर की एक सभा में बम विस्फोट हुआ और ललित नारायण मिश्र की बम धमाके में मृत्यु हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इधर सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप भी लगने लगे। सरकार के ख़िलाफ़ देश भर में आंदोलन किए जा रहें थे। उधर इंदिरा गाँधी अपने छोटे पुत्र संजय गाँधी को राजनीति में ले आई थीं। युवा संजय गाँधी ने असंवैधानिक ढंग से सरकार चलाने का कार्य आरंभ कर दिया। संजय गाँधी के प्रति इंदिरा गाँधी की वैसी ही निष्ठा थी जैसी [[धृतराष्ट्र]] की [[दुर्योधन]] के प्रति थी। पुत्र मोह के कारण इंदिरा गाँधी ने संजय को 50,000 मारुति कार निर्माण का लाइसेंस भी प्रदान कर दिया। ऐसी स्थिति में विपक्षी दलों को सुनहरा अवसर मिल गया। उन्होंने भी आंदोलनकारियों की पीठ थपथपाना आरंभ कर दिया।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==गुजरात आंदोलन== &lt;br /&gt;
सर्वप्रथम विरोधी राजनीति और असंतोष से उत्पन्न हिंसक आंदोलन का सूत्रपात [[गुजरात]] से हुआ जो बेहद शांतिप्रिय राज्य माना जाता था। यहाँ छात्रों ने हिंसक आंदोलन किए और विपक्ष ने भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। [[1974]] में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। आगजनी और लूट की घटानाओं को सरेआम अंजाम दिया जा रहा था। कभी-कभी पुलिस को विवशता में लाठी चार्ज भी करना पड़ रहा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आंदोलनकारियों ने गुजरात विधानसभा को जबरन त्यागपत्र देने के लिए विवश कर दिया। गुजरात के हालात बद से बदतर हो रहे थे। ऐसी स्थिति में मोरारजी देसाई ने आमरण अनशत आरंभ कर दिया। इंदिरा गाँधी ने राज्य सरकार को बर्खास्त करके वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा दिया। [[जून]], [[1976]] में चुनाव करवाए जाने की घोषणा भी कर दी गई। इस प्रकार आंदोलनों के कारण गुजरात में निर्वाचित सरकार को भंग करना पड़ा। इससे दूसरे राज्यों तक भी ग़लत संदेश गया और इसकी प्रतिक्रिया [[बिहार]] में हुई।{{दाँयाबक्सा|पाठ=प्रत्येक इंसान अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व लेकर पैदा होता है। लेकिन वह अपने उन कार्यों से जाना जाता है जिनसे उसके गुण-अवगुण प्रदर्शित होते हैं। यदि इंदिरा गाँधी के कर्तृत्व की समीक्षा की जाए तो यह कहना उचित होगा कि ऐसी शख्सियतें शताब्दियों में ही पैदा होती हैं। जिन्होंने इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल को देखा है, वे लोग यह मानते हैं कि इंदिरा गाँधी में अपार साहस, निर्णय शाक्ति और धैर्य था। वह भी अपने पिता पंडित नेहरू की भांति स्वप्नद्रष्टा और महत्त्वाकांक्षी थीं।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बिहार आंदोलन== &lt;br /&gt;
बिहार में भी आंदोलन का सूत्रपात छात्र आंदोलन के रूप में हुआ। [[मार्च]], 1974 में छात्रों ने बिहार विधानसभा का घेराव किया। छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने लाठी तथा गोली का भी बेझिझक प्रयोग किया। इस आंदोलन में विपक्षी दलों ने छात्रों का साथ देना शुरू कर दिया। ऐसी स्थिति में हिंसक आंदोलन आरंभ हो गए तथा एक सप्ताह में ही दो दर्जन से अधिक लोग अपनी ज़िंदगी से हाथ धो बैठे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[जयप्रकाश नारायण]] जो राजनीति से सन्यास ले चुके थे, वह सक्रिय हो गए और उन्होंने आंदोलन की कमान संभाल ली। जिस प्रकार अंग्रेज़ों के विरुद्ध असहयोग आंदोलन चलाया गया था, उसी तर्ज पर जयप्रकाश नारायण ने लोगों को उकसाया कि राज्य की व्यवस्था चौपट कर दो। वह किसी जमाने में पंडित नेहरू के अनन्यतम विरोधी हुआ करते थे। उन्हें नेहरू खानदान की पुत्री से बदला लेने का सुअवसर प्राप्त हो गया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन इंदिरा जी ने गुजरात वाली ग़लती को बिहार में नहीं दोहराया। वह चाहतीं तो बिहार में भी राष्ट्रपति शासन लगा सकती थीं। लेकिन उन्होंने विचलित हुए बिना आंदोलनों का सामना करने का निर्णय किया। इंदिरा गाँधी की यह नीति सफल भी होने वाली थी। जे.पी. अर्थात जयप्रकाश नारायण का आंदोलन ठंडा पड़ने लगा था। लेकिन दुर्भाग्वश विपक्ष को इंदिरा गाँधी की ख़िलाफ़त करने का मौक़ा बैठे-बिठाए हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दरअसल इंदिरा गाँधी पर [[इलाहाबाद]] उच्च न्यायालय में एक मुक़दमा चल रहा था जो चुनाव में ग़लत साधन अपनाकर विजय हासिल करने से संबंधित था। [[12 जून]], [[1975]] को राजनारायण द्वारा दायर किए गए मुक़दमे का फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री सिंह ने सुनाया। उसके अनुसार इंदिरा गाँधी का न केवल चुनाव रद्द किया गया बल्कि उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने से भी प्रतिबंधित कर दिया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था और निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित राशि से अधिक राशि का व्यय चुनाव प्रचार में किया था। इस फैसले के विरुद्ध उन्हें अपील करने का समय दिया गया था। ऐसे में इंदिरा गाँधी ने फैसले के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की और वहाँ सुनवाई के लिए 14 जुलाई का दिन मुकर्रर कर दिया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन जे.पी. और विरोधी दल एकजुट होकर इंदिरा गाँधी से नैतिकता की दुराई देकर इस्तीफ़ा देने की माँग करने लगे। इस बीच [[24 जून]], [[1975]] को मामले की संवैधानिक व्यवस्था करते हुर अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति ने कहा कि सुनवाई होने तक इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री पद पर रह सकती हैं और संसद में बोल भी सकती हैं परंतु उन्हें मतदान का कोई अधिकार नहीं होगा। लेकिन विपक्ष यह मुद्दा हाथ से नहीं जाने देना चाहता था। उन्हें [[14 जुलाई]] तक का भी इंतज़ार गवारा नहीं था जब सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई होनी थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयप्रकाश नारायण की नेहरू परिवार से दुश्मनी के सुषुप्त प्रेत जाग गए। उन्होंने आंदोलन को पूरे देश में फैला दिया। इंदिरा गाँधी के विरुद्ध घृणित प्रचार किया जाने लगा। हज़ार बार कहा गया झूठ भी सच जैसा लगने लगता है। जनता ने भी घृणित प्रचार पर विश्वास करना आरंभ कर दिया। एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ इतने लोग ग़लत नहीं हो सकते- जनता इस मनोविज्ञान का शिकार होकर यह भूल गई कि जो मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है, उसके लिए हाय तौबा मचाने की क्या ज़रूरत।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==आपातकाल== &lt;br /&gt;
[[15 जून]], [[1975]] को जे.पी. और समर्थिक विपक्ष ने आंदोलन को उग्र रूप दे दिया। साथ ही यह तय किया गया कि पूरे देश में [[सविनय अवज्ञा आन्दोलन]] चलाया जाए और प्रधानमंत्री आवास को भी घेर लिया जाए। आवास में मौजूद लोगों को नजरबंद करके किसी को भी अंदर प्रविष्ट न होने दिया जाए। (बाद में मोरारजी देसाई ने एक साक्षात्कार में बताया कि हम तख्ता पलट करके इंदिरा को त्यागपत्र देने के लिए विवश करना चाहते थे।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विपक्ष की यह योजना अत्यंत खतरनाक थी। हज़ारों व्यक्तियों द्वारा प्रधानमंत्री आवास को घेरना था। ऐसे में किसी भी अनिष्ट की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता था। क्या प्रधानमंत्री को उनके आवास में परिवार सहित क़ैद करने की योजना संवैधानिक थी। क्या जयप्रकाश नारायण क़ानून का मजाक नहीं उड़ा रहे थे। तब यह सभी प्रश्न गौण हो गए थे। लेकिन निर्वाचित प्रधानमंत्री के साथ इस प्रकार का अवैधानिक अशोभनीय व्यवहार भविष्य में ग़लत प्रथा को जन्म देने वाला सिद्ध हो सकता था। परंतु देश को अस्थिर करने की इस खतरनाक योजना पर अमल किया जा रहा था। एक प्रधानमंत्री के जीवन पर संकट आने की स्थिति थी। ऐसे में सेना को भी प्रधानमंत्री आवास की सुरक्षा के लिए बुलाया जा सकता था। दोनों पक्षों में टकराव होने पर सैकड़ों व्यक्तियों की ज़िंदगी भी जा सकती थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्हीं परिस्थितियों के कारण प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने [[25 जून]], 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की हस्ताक्षरित स्वीकृति प्राप्त कर ली। इस प्रकार [[26 जून]], 1975 की प्रातः देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। आपातकाल लागू होने के बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य सैकड़ों छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। ऐसा माना जाता है कि आपातकाल के दौरान एक लाख व्यक्तियों को देश की विभिन्न जेलों में बंद किया गया था। इनमें मात्र राजनीतिक व्यक्ति ही नहीं, आपराधिक प्रवृत्ति के लोग भी थे जो ऐसे आंदोलनों के समय लूटपाट करते हैं। साथ ही भ्रष्ट कालाबाजारियों और हिस्ट्रीशीटर अपराधियों को बंद कर दिया गया। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;इमर्जेंसी&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी का यह उद्देश्य था कि आपातकाल के दौरान ढुलमुल प्रशासन को चाक-चौबंद किया जाए। ऐसे में कई सरकारी कर्मचारियों को निलंबित भी किया गया। इमर्जेंसी के दौरान सरकारी मशीनरी में सुधार हुआ। कर्मचारी समय पर आने-जाने लगे और रिश्वतखोरी की घटनाएँ काफ़ी कम हो गईं। ट्रेनें भी समय से चलने लगी थीं। लेकिन देश में इमर्जेंसी का आतंक व्याप्त था। इससे नुक़सान भी थे तो फायदे भी। यहाँ [[सरदार वल्लभभाई पटेल]] को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा। एक बार उन्होंने कहा था-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8f5d31&amp;quot;&amp;gt;हम सदियों से गुलाम रहे हैं, इस कारण हममें राष्ट्रीय चरित्र का भाव मृतप्राय हो गया है। अतः इस देश को चलाने के लिए आदर्श तानाशाह की आवश्यकता है ताकि हम आज़ादी की कीमत समझ सकें। '''सरदार वल्लभभाई पटेल'''&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपातकाल के दौरान सरदार पटेल का यह कथन अक्षरशः प्रमाणित भी हुआ। आपातकाल में इंदिरा गाँधी के छोटे पुत्र संजय गाँधी का व्यवहार भी काफ़ी अमर्यादित रहा। राष्ट्रहित के लिए देश की आबादी नियंत्रित करने हेतु नसबंदी किए जाने की भी योजना थी लेकिन उसका काफ़ी दुरुपयोग किया गया। जिन युवकों की शादी भी नहीं हुई थी, उनकी भी नसबंदी कर दी गई। इसी प्रकार राज्य स्तर पर राजनीतिज्ञों ने इमर्जेंसी के नाम पर व्यक्तिगत शत्रुता निकालते हुए विरोधियों को सींखचों के पीछे डाल दिया। बड़े अधिकारियों द्वारा जनता को नाजायज रूप से परेशान भी किया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपातकाल में सबसे ज़्यादा अखरने वाली बात थी- लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को सेंसरशिप लगाकर कमज़ोर कर देना। अखबार, रेडियो और टी.वी. पर सेंसर लगा दिया गया। सरकार के विरुद्ध कुछ भी प्रकाशित नहीं किया जा सकता था। मौलिक अधिकार लगभग समाप्त हो गए थे। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगाना एक बड़ी ग़लती थी। क्योंकि यदि प्रतिबंध नहीं होता तो जनता के सामने यह सत्य प्रकट होता कि आपातकाल लगाए जाने के पीछे कारण क्या थे। जनता की प्रतिक्रिया भी इंदिरा गाँधी तक नहीं पहुँच रही थी। इस काल के दौरान ऐसी घटनाएँ भी घटीं जो बहुत शर्मनाक थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी तक जो खबरें आ रही थीं, उनसे उन्हें यह लगा कि जनता आपातकाल की उपलब्धियों से खुश है। चाटुकारों ने उन्हें सूचित किया कि वह जनता में लोकप्रिय हैं और यदि चुनाव कराए जाएँ तो उन्हें विजयश्री अवश्य प्राप्त होगी। तब इंदिरा जी ने [[18 जनवरी]], [[1977]] में लोकसभा के चुनाव कराए जाएंगे। इसके साथ ही राजनीतिक क़ैदियों की रिहाई हो गई। मीडिया की स्वतंत्रता बहाल हो गई। राजनीतिक सभाओं और चुनाव प्रचार की आज़ादी दे दी गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन इंदिरा गाँधी ने स्थिति का सही मूल्याकंन नहीं किया था। जिन नेताओं को आपातकाल के दौरान बंदी बनाया गया था, उन्होंने रिहा होने के बाद जेल में भुगती ज्यादतियों और अत्याचारों का विवरण जनता को दिया। जनता ने भी आपातकाल की पीड़ा झेली थी। उधर विपक्ष अधिक सशक्त होकर सामने आ गया। जनसंघ, कांग्रेस-ओ, समाजवादी पार्टी और लोकदल ने मिलकर एक नई पार्टी का गठन किया जिसका नाम 'जनता पार्टी' रखा गया। इस पार्टी को अकाली दल, डी.एम.के. तथा साम्यवादी पार्टी (एम) का भी सहयोग प्राप्त हो गया। इंदिरा जी के सहयोगी जगजीवन राम विरोधियों से जा मिले। इनका दलित और हरिजन वर्ग पर काफ़ी प्रभाव था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दरअसल जगजीवन राम ने उस समय अति महत्त्वाकांक्षा दिखाई थी जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के विरुद्ध फैसला दिया था। जगजीवन राम ने जब स्वयं को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया था तब इंदिरा गाँधी ने उन्हें नजरबंद करवा दिया था। इस कारण जगजीवन राम भी जानते थे कि कांग्रेस में अब उनका कोई भविष्य नहीं रह गया है। नंदिनी सत्पथी और हेमवती नंदन बहुगुणा भी इंदिरा गाँधी का साथ छोड़ गए। 16 मार्च 1977 को लोकसभा के चुनाव संपन्न हुए। मतदान स्वच्छ एवं निष्पक्ष हुए और सरकारी तंत्र का किसी भी प्रकार से ग़लत उपयोग नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जनता पार्टी की सत्ता== &lt;br /&gt;
देश की जनता ने आपातकाल की ज्यादतियों के विरोध में इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ मतदान किया। विपक्ष ने उन्हें सब्जबाग दिखाए थे और सुशासन का प्रलोभन दिया था। जनता को भी यह उम्मीद थी कि परिवर्तन से सुधार अवश्य आएगा। उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। लेकिन भारतीय अवाम ने उस समय यह आकलन नहीं किया था कि जनता पार्टी में जिन दलों के लोग हैं, वे भिन्न नीतियों और विचारों से पोषित रहे हैं। इस कारण सैद्धांतिक रूप से उनमें मतभेद हैं। आपसी एकता का दिखावा महज सत्ता पर काबिज होना है तथा कांग्रेस और इंदिरा गाँधी का सफाया करना है। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;पार्टी सत्ता से बाहर&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
चुनाव प्रचार के दौरान इंदिरा गाँधी ने हवा का रुख पहचान लिया था। वह समझ गई थीं कि इस बार के चुनाव में उन्हें निश्चित रूप से हार का सामना करना होगा। उत्तरी भारत का दौरे करते हुए उन्होंने देख लिया था कि उनकी सभाओं में भीड़ काफ़ी कम है और लोगों में कोई उत्साह नहीं है। चुनाव परिणाम आए। इन परिणामों ने सभी लोगों को आश्चर्य में डाल दिया लेकिन इंदिरा गाँधी को कोई हैरत नहीं हुई। उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 542 में से 330 सीटें प्राप्त हुईं। इंदिरा गाँधी की पार्टी मात्र 154 स्थानों पर ही विजय प्राप्त कर सकी। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;निराशाजनक प्रदर्शन&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी ऐसी प्रधानमंत्री रहीं जो अपनी सीट तक नहीं बचा पाईं। इनके पुत्र संजय गाँधी को भी हार का सामना करना पड़ा। उत्तरी भारत में इंदिरा कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक था। सात राज्यों की 234 सीटों में से इंदिरा कांग्रेस को मात्र 2 सीटें ही प्राप्त हो सकीं। दक्षिण भारत की स्थिति इंदिरा गाँधी के अनुकूल थी। यहां आपातकाल में ज्यादतियाँ भी नहीं हुई थीं। दक्षिण भारत के राज्यों को आपातकाल के दौरान लागू हुए बीस सूत्रीय कार्यक्रमों से काफ़ी लाभ भी हुआ था। 1971 के चुनाव की तुलना में इस बार वहाँ 22 सीटें अधिक मिलीं और आंकड़ा 70 से बढ़कर 92 हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनता पार्टी में जश्न का माहौल था और इस बात को लेकर चिंतन हो रहा था कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। उस समय प्रधानमंत्री पद के तीन प्रबल दावेदार सामने आए थे- चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई और जगजीवन राम। तीनों नेता प्रधानमंत्री बनने को अत्यंत लालायित थे। वे जानते थे कि जो मौक़ा अब आया है, वह जीवन में फिर कभी नहीं आएगा। इस कारण प्रधानमंत्री पद को लेकर तीनों दृढ़ संकल्प थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ जयप्रकाश नारायण का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा जो जीवन के श्रेष्ठतम काल से गुज़र रहे थे। उनका आभमंडल जनता पार्टी के लिए चमत्कारी था। वह 'किंग मेकर' की स्थिति प्राप्त कर चुके थे। यह स्थिति कभी महात्मा गाँधी को प्राप्त हुई थी। जयप्रकाश नारायण की सहमति  से 23 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनाए गए। इस समय मोरारजी देसाई की उम्र 81 वर्ष हो चुकी थी। (जनता पार्टी के शासनकाल का अन्य विवरण उनके प्रधानमंत्रियों के अनुसार आगे दिया गया है। चूँकि यह अध्याय श्रीमती इंदिरा गाँधी से संबंधित है, अतः यहाँ उनके पराभव और पुनरुत्थान की घटनाओं को ही केवल प्रस्तुत किया जाएगा।) &lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==सत्ता में वापसी== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Articles-Of-Indira-Gandhi.jpg|thumb|250px|इंदिरा गाँधी की हत्या के समय की साड़ी, चप्पलें और बैग]]&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी सत्ता से बाहर हो चुकी थीं और जनता पार्टी सत्ता में थी। [[चौधरी चरण सिंह]] तथा राजनारायण, इंदिरा गाँधी के साथ व्यक्तिगत दुश्मनों जैसा व्यवहार करने पर आमादा थे। वे चाहते थे कि इंदिरा गाँधी को जेल भेज दिया जाए। लेकिन मोरारजी देसाई पुराने कांग्रेसी थे और एक जमाने में पंडित नेहरू के सहयोगी भी थे। इस कारण उन्होंने चौधरी चरण सिंह से स्पष्ट कह दिया कि वह जो कदम उठाएँ, गृह मंत्री के रूप में उठाएँ और ग़लत होने पर उसकी जवाबदेही के लिए तैयार रहें। मोरारजी देसाई राजनीतिक द्वेष को व्यक्तिगत द्वेष में परिवर्तित नहीं करना चाहते थे। ऐसी स्थिति में राजनारायण ज़रूरत से ज़्यादा तिलमिला रहे थे। लेकिन मोरारजी देसाई की सलाह से आगे जाकर कुछ भी करना उन्हें असंभव नज़र आ रहा था। जब बुरा समय आता है तो परछाईं भी साथ छोड़ देती है और चूहे ही सबसे पहले डूबते जहाज़ से किनारा करते हैं। इसीलिए जब इंदिरा गाँधी का पराभव हुआ तो उन्हें भी कई नसीहतें प्राप्त हुईं। ऐसे में कांग्रेस को एक अन्य विभाजन की त्रासदी भी भोगनी पड़ी। ब्रह्मानंद रेड्डी और वाई.वी. चौहान ने अपने खेमे के साथ इंदिरा गाँधी से किनारा कर लिया। उन्हें लगा कि इंदिरा गाँधी का करिश्मा समाप्त हो चुका है। कांग्रेस पार्टी में उनका कोई विशिष्ट स्थान नहीं रह गया है। &lt;br /&gt;
[[1978]] के आरम्भ में श्रीमती गाँधी के समर्थक कांग्रेस पार्टी से अलग हो गए और कांग्रेस—इ (इ से इंदिरा) पार्टी की स्थापना की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंदिरा गाँधी पर जनता पार्टी के शासनकाल में अनेक आरोप लगाए गए और कई कमीशन जाँच के लिए नियुक्त किए गए। इनमें 'शाह कमीशन' सबसे उल्लेखनीय माना जाता है। आपातकाल में तथाकथित आपराधिक कार्यों के लिए उन पर देश की कई अदालतों में मुक़दमे कायम किए गए। सरकारी भ्रष्टाचार के आरोप में श्रीमती गाँधी कुछ तक जेल (अक्टूबर [[1977]] और दिसम्बर 1978) में रहीं। इन झटकों के बावज़ूद नवम्बर 1978 में वह नई संसदीय सीट से चुनाव जीतने में क़ामयाब रहीं और उनकी कांग्रेस—इ पार्टी धीरे-धीरे फिर से मज़बूत होने लगी। सत्तारूढ़ जनता पार्टी में अंतर्कलह के कारण अगस्त [[1979]] में सरकार गिर गई। जब जनवरी [[1980]] में [[लोकसभा]] (संसद का निचला सदन) के लिए चुनाव हुए तो श्रीमती गाँधी और उनकी पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में लौट आई। उनके प्रमुख राजनीतिक सलाहकार, उनके पुत्र संजय गाँधी भी लोकसभा की सीट पर विजयी रहे। इंदिरा और उनके पुत्र के ख़िलाफ़ चल रहे सभी क़ानूनी मुक़दमे वापस ले लिए गए। भारतवर्ष में एक नारी के साथ जो व्यवहार हो रहा था, वह भारतीय परंपरा के अनुकूल नहीं था। इस कारण लोगों को इंदिरा गाँधी के साथ सहानुभूति हो रही थी। देश की जनता नेहरू खानदान की ऋणी थी और इंदिरा गाँधी पर होने वाले अत्याचारों को आँखें मूंदकर नहीं देख सकती थी। उधर जनता पार्टी से जनता का भी मोहभंग होने लगा था। जनता पार्टी सरकार प्रत्येक मोर्चे पर विफल साबित हो रही थी। देश को विकास के नाम पर जनता पार्टी के आंतरिक झगड़ों का उपहार प्राप्त हो रहा था। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कांग्रेस पार्टी की सरकार&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
अभी तीन वर्ष भी पूर्ण नहीं हुए थे कि जनता पार्टी में दरारें पड़ गईं और देश को मध्यावधि चुनाव का भार झेलना पड़ा। इंदिरा गाँधी ने देश में घूम-घूमकर चुनाव प्रचार के दौरान आपातकाल के लिए शर्मिंदगी का इजहार किया और काम करने वाली सुदृढ़ सरकार का नारा दिया। लोगों को यह नारा काफ़ी पसंद आया और चुनाव के बाद नतीजों ने यह प्रमाणित भी कर दिया। इंदिरा कांग्रेस को 592 में से 353 सीटें प्राप्त हुईं और स्पष्ट बहुमत के कारण केंद्र में इनकी सरकार बनी। इंदिरा गाँधी पुनः प्रधानमंत्री बन गईं। इस प्रकार 34 महीनों के बाद वह सत्ता पर दोबारा काबिज हुईं। जनता पार्टी ने 1977 में सत्ता में आने के बाद कई राज्यों की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया था। उस समय उसने यह तर्क दिया कि जनता का रुझान जनता पार्टी के साथ है, अतः नए चुनाव होने चाहिए। इंदिरा गाँधी ने सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी द्वारा आरंभ की गई परिपाटी पर चलकर उन प्रदेशों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया जहाँ जनता पार्टी तथा विपक्ष का शासन था। बाद में हुए इन राज्यों के चुनावों में कांग्रेस ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। 22 राज्यों में से 15 राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार बन गई। यह चुनाव जून 1980 में संपन्न हुए थे। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;संजय गाँधी की मृत्यु&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[23 जून]], 1980 को प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के छोटे पुत्र संजय गाँधी की वायुयान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। संजय की मृत्यु ने इंदिरा गाँधी को तोड़कर रख दिया। इस हादसे से वह स्वयं को संभाल नहीं पा रही थीं। तब [[राजीव गाँधी]] ने पायलेट की नौकरी छोड़कर संजय गाँधी की कमी पूरी करने का प्रयास किया। लेकिन राजीव गाँधी ने यह फैसला ह्रदय से नहीं किया था। इसका कारण यह था कि उन्हें राजनीति के दांवपेच नहीं आते थे। जब इंदिरा गाँधी की दोबारा वापसी हुई तब देश में अस्थिरता का माहौल उत्पन्न होने लगा। [[कश्मीर]], [[असम]] और [[पंजाब]] आतंकवाद की आग में झुलस रहे थे। दक्षिण भारत में भी सांप्रदायिक दंगों का माहौल पैदा होने लगा था। दक्षिण भारत जो कांग्रेस का गढ़ बन चुका था, [[1983]] में विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को [[आंध्र प्रदेश]] और [[कर्नाटक]] में हार का सामना करना पड़ा। वहाँ क्षेत्रीय स्तर की पार्टियाँ सत्ता पर काबिज हो गईं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पंजाब में भिंडरावाले के नेतृत्व में अलगाववादी ताकतें सिर उठाने लगीं और उन ताकतों को [[पाकिस्तान]] से हवा मिल रही थी। यहाँ यह बताना भी उचित होगा कि पंजाब में भिंडरावाले का उदय इंदिरा गाँधी की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के कारण हुआ था। अकालियों के विरुद्ध भिंडरावाले को स्वयं इंदिरा गाँधी ने ही खड़ा किया था। लेकिन भिंडरावाले की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं देश को तोड़ने की हद तक बढ़ गई थीं। जो भी लोग पंजाब में अलगाववादियों का विरोध करते थे, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता था। भिंडरावाले को ऐसा लग रहा था कि अपने नेतृत्व में पंजाब का अलग अस्तित्व बना लेगा। यह काम वह हथियारों के बल पर कर सकता है। यह इंदिरा गाँधी की ग़लती थी कि 1981 से लेकर 1984 तक उन्होंने पंजाब समस्या के समाधान के लिए कोई युक्तियुक्त कार्रवाई नहीं की। इस संबंध में कुछ राजनीतिज्ञों का कहना है कि इंदिरा गाँधी शाक्ति के बल पर समस्या का समाधान नहीं करना चाहती थीं।वह पंजाब के अलगाववादियों को वार्ता के माध्यम से समझाना चाहती थीं। लेकिन कुछ राजनीति विश्लेषक मानते हैं कि 1985 में होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले इंदिरा गाँधी इस समस्या को सुलझाना चाहती थीं ताकि उन्हें राजनीतिक लाभ प्राप्त हो सके। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा हो भी सकता है क्योंकि 3 जून 1984 को भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर पर घेरा डालकर भिंडरावाले और उसके आपराधिक समर्थकों के विरुद्ध निर्णायक जंग लड़ने का निश्चय कर लिया था। उनके द्वारा आत्मसमर्पण न किए जाने पर 5 जून 1984 को भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर में प्रवेश कर लिया। तब भिंडरावाले और उसके आपराधिक समर्थकों ने भारतीय सेना पर हमला किया। भारतीय सेना ने भी जवाब में कार्रवाई की इस मुहिम को ''ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार'' का नाम दिया गया था। यह ऑपरेशन कामयाब रहा। भिंडरावाले और उसके कट्टर समर्थकों की मौत हो गई। बाद में मालूम हुआ कि भिंडरावाले ने पवित्र स्वर्ण मंदिर को आतंक का गढ़ बना लिया था। वहां से आधुनिक हथियार प्राप्त हुए। फिर स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों से मुक्त करवा लिया गया। अंदर के वास्तविक हालात जानकर पंजाब के लोग भी अचंभित रह गए थे। लेकिन स्वर्ण मंदिर में फ़ौज का प्रवेश करना धर्मांध लोगों को स्वीकार्य नहीं था। आज प्रत्येक सिख का मानना है कि ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार उस वक़्त की अनिवार्य आवश्यकता थी। &lt;br /&gt;
बेशक इस ऑपरेशन के दौरान बेगुनाह व्यक्ति भी मारे गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन उस समय ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार से सिख समुदाय काफ़ी आक्रोशित था। उन्हें लगता था कि स्वर्ण मंदिर पर हमला करना उनके धर्म पर हमला करने के समान है। इंदिरा गाँधी को गुप्तचर संस्था ''रॉ'' ने आगाह कर दिया था कि सिखों में भारी रोष है और उन्हें अपनी सिक्योरिटी में सिखों को स्थान नहीं देना चाहिए। लेकिन इंदिरा गाँधी ने उस परामर्श पर कोई ध्यान नहीं दिया। उनका मानना था कि ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार उस समय की मांग थी और उनकी सिखों के साथ कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन सिख समुदाय में भारी रोष व्याप्त था। उस रोष की परिणति 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गाँधी की नृशंस हत्या के रूप में सामने आई। उसके ही सुरक्षा प्रहरियों ने उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया। इंदिरा गाँधी की मौके पर ही मृत्यु हो गई थी। लेकिन अपराह्न 3 बजे के आस-पास उनकी मृत्यु की सूचना प्रसारित की गई। यह सुनकर सारा देश सन्न रह गया। किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था। कि इंदिरा गाँधी की मृत्यु हो चुकी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार एक ऐसी महिला के स्वर्णिम युग का अंत हो गया जिसका बचपन देशसेवा के साथ आरंभ हुआ और अंत भी देश के लिए ही हुआ। वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह उसी सिख संप्रदाय से हैं और इंदिरा कांग्रेस से ही संबंध रखते हैं। इंदिरा गाँधी चाहती थीं कि वह अपने खून की अंतिम बूंद तक देश के लिए न्योछावर कर दें लेकिन देश सुरक्षित रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समग्र विश्लेषण== &lt;br /&gt;
आज तक भारत के जितने भी प्रधानमंत्री (कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा सहित) हुए हैं। उन सभी की अनेक विशेषताएँ हो सकती हैं। लेकिन इंदिरा गाँधी के रूप में जो प्रधानमंत्री भारत भूमि को प्राप्त हुआ, वैसा प्रधानमंत्री अभी तक दूसरा नहीं हुआ है क्योंकि एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने विभिन्न चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सफलता प्राप्त की। युद्ध हो, विपक्ष की ग़लत नीतियाँ हों, कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय मैदान हो अथवा देश की कोई समस्या हो- इंदिरा गाँधी ने स्वयं को सफल साबित किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक इंसान अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व लेकर पैदा होता है। लेकिन वह अपने उन कार्यों से जाना जाता है जिनसे उसके गुण-अवगुण प्रदर्शित होते हैं। यदि इंदिरा गाँधी के कर्तृत्व की समीक्षा की जाए तो यह कहना उचित होगा कि ऐसी शख्सियतें शताब्दियों में ही पैदा होती हैं। जिन्होंने इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल को देखा है, वे लोग यह मानते हैं कि इंदिरा गाँधी में अपार साहस, निर्णय शाक्ति और धैर्य था। वह भी अपने पिता पंडित नेहरू की भांति स्वप्नद्रष्टा और महत्त्वाकांक्षी थीं।    &lt;br /&gt;
==ऑपरेशन ब्लू स्टार और हत्या==&lt;br /&gt;
जून 1980 में एक वायुयान दुर्घटना में संजय गाँधी की मृत्यु ने भारत के राजनीतिक नेतृत्व के लिए इंदिरा गाँधी के चुने हुए उत्तराधिकारी को समाप्त कर दिया। संजय की मृत्यु के बाद इंदिरा ने अपने दूसरे पुत्र राजीव गाँधी को पार्टी के नेतृत्व के लिए तैयार किया। 1980 के दशक के आरम्भ में इंदिरा गाँधी को भारत की राजनीतिक अखंडता के ख़तरों से झूझना पड़ा। कई राज्य केन्द्र सरकार से अधिक स्वतंत्रता की माँग करने लगे तथा [[पंजाब]] में सिक्ख आतंकवादियों ने स्वायत्त राज्य की माँग पर ज़ोर देने के लिए हिंसा का रास्ता अपना लिया। जवाब में श्रीमती गाँधी ने जून 1984 में सिक्खों के पवित्रतम धर्मस्थल [[अमृतसर]] के [[स्वर्ण मन्दिर]] पर सेना के हमले के आदेश दिए, जिसके फलस्वरूप 450 से अधिक सिक्खों की मृत्यु हो गई। स्वर्ण मन्दिर पर हमले के प्रतिकार में पाँच महीने के बाद ही श्रीमती गाँधी के आवास पर तैनात उनके दो सिक्ख अंगरक्षकों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।  श्रीमती गाँधी के द्वारा शुरू की गई औद्योगिक विकास की अर्द्ध समाजवादी नीतियों पर क़ायम रहीं। उन्होंने सोवियत संघ के साथ नज़दीकी सम्बन्ध क़ायम किए और पाकिस्तान—भारत विवाद के दौरान समर्थन के लिए उसी पर आश्रित रहीं।&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
करोड़ों लोगों की प्रिय प्रधानमंत्री का जीवन-इतिहास उपलब्धियों से भरा पड़ा है। जिनमें प्रमुख हैं—&lt;br /&gt;
#बैंकों का राष्ट्रीयकरण, &lt;br /&gt;
#निर्धन लोगों के उत्थान के लिए आयोजित 20 सूत्रीय कार्यक्रम, &lt;br /&gt;
#गुट निरपेक्ष आन्दोलन की अध्यक्षा, इत्यादि। &lt;br /&gt;
*1980 में वे विपक्षी दलों को करारी पराजय देकन पुनः [[प्रधानमंत्री]] चुनी गईं। &lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
[[31 अक्टूबर]], [[1984]] की मनहूस सुबह को उन्हीं के अंगरक्षकों ने गोलियों से उन्हें शहादत की बलिवेदी पर चढ़ा दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक3&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[http://purvanchalnews.com/index.php?option=com_content&amp;amp;view=article&amp;amp;id=47:2010-01-01-11-56-48&amp;amp;catid=1:2010-01-02-10-56-47&amp;amp;Itemid=78 इंदिरा गाँधी के दो चेहरे]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रधानमंत्री}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
{{स्वतन्त्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
{{नेहरू परिवार}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता_सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध_व्यक्तित्व_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नेहरू परिवार]]&lt;br /&gt;
[[Category:लोकसभा सांसद]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
	</entry>
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		<title>Feroze Gandhi</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: फ़ीरोज़ गाँधी को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT[[फ़ीरोज़ गाँधी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>नादबिन्दुपनिषद</title>
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		<updated>2011-05-25T10:53:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
इस उपनिषद के प्रारम्भ में 'ॐकार' को हंस के रूप में अभिव्यक्त किया है और उसके विविध अंगों का विश्लेषण किया गया है। उसके बाद 'ॐ ' की बारह मात्राओं का उल्लेख करते हुए उनके साथ प्राण के विनियोग (सम्बन्ध) का फल स्थापित किया है। तदुपरान्त अनेक प्रकारों और साधना के द्वारा 'नाद' अनुभूति के स्वरूप को समझाया गया है। अन्त में मन के लय होने की स्थिति का वर्णन हैं। &lt;br /&gt;
==ॐकार प्रणव-रूप 'हंस' है==&lt;br /&gt;
हंस का दक्षिण पंख 'अकार' है और उत्तर पंख (बायां पंख) 'उकार' है तथा उसकी पूंछ 'मकार' है और अर्धमात्रा उसका शीर्षभाग है। ओंकाररूपी हंस के दोनों पैर 'रजोगुण' एवं 'तमोगुण' हैं और उसका शरीर 'सतोगुण' कहा गया है। उसकी दाईं आंख 'धर्म है और बाई आंख 'अधर्म' है। हंस के दोनों पैरों में भू-लोक (पृथिवी) स्थित है। उसकी जंघाओं में भुव:लोक (अन्तरिक्ष) केन्द्रित है। स्व:लोक (स्वर्ग-ऊर्ध्व) उसका कटि प्रदेश है और मह:लोक (आनन्दलोक) उसकी नाभि में स्थित है। उसके हृदयस्थल में जनलोक और कण्ठ में तपोलोक का वास है। ललाट और भौहों के मध्य में 'सत्यलोक' स्थित है। इस प्रकार विद्वान साधक [[प्रणव]]-रूपी हंस पर आसीन होकर, अर्थात ओंकार का ज्ञान प्राप्त कर कर्मानुष्ठान तथा ध्यान आदि के द्वारा 'ॐ' का चिन्तन-मनन करता हुआ, सहस्त्रों-करोंड़ों पापों से मुक्त होकर 'मोक्ष' को प्राप्त कर लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ॐकार की बारह मात्राएं==&lt;br /&gt;
ओंकार की प्रथम मात्रा आग्नेयी है, दूसरी मात्रा वायव्या (वायु की भांति) है, तीसरी मात्रा मकार [[सूर्य देवता|सूर्य]] मण्डल के समान है, चौथी मात्रा अर्धमात्रा है, जिसे वारूणी भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
इन चारों मात्राओं में से प्रत्येक मात्रा के तीन-तीन काल, अर्थात कला-रूप हैं। इसीलिए ॐकार को बारह कलाओं से युक्त कहा गया है। ॐकार की साधना मात्र मन्त्रों के उच्चारण करने से पूरी नहीं होती। इसे 'दिव्य प्राण-रूप' समझकर अपनी अनुभूति से जानने का प्रयास करना चाहिए। &lt;br /&gt;
==बारह कलाओं की मात्राएं==&lt;br /&gt;
इन बारह कलाओं की मात्राओं में प्रथम मात्रा को घोषिणी कहा गया है। दूसरी मात्रा को विद्युन्मात्रा, तीसरी को पातंगी, चौथी को वायुवेगिनी, पांचवीं को नामधेया, छठी से ऐन्द्री, सातवीं को वैष्णवी, आठवीं को शांकरी, नौवीं को महती, दसवीं को धृति, ग्यारहवीं को नारी और बारहवीं को ब्राह्मी के नाम से जाना जाता है। यदि साधक ॐकार की प्रथम मात्रा में अपने प्राणों का परित्याग कर देता है, तो वह भारतवर्ष का सार्वभौमिक चक्रवर्ती सम्राट हो सकता हैं। &amp;lt;ref&amp;gt;'प्रथमायां तु मात्रायां यदि प्राणैर्वियुज्यते। भरतवर्षराजासौ सार्वभौम: प्रजायते।12।।'&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
यदि साधक दूसरी मात्रा में प्राणों का उत्सर्ग करता है, तो वह महान महिमामण्डित 'यक्ष' के रूप में उत्पन्न होता है। तीसरी मात्रा में प्राण त्यागने पर 'विद्याधर' के रूप में जन्म लेता है, चौथी मात्रा में प्राण त्यागने पर वह 'गन्धर्व' के रूप में, पांचवीं मात्रा में 'तुषित' तथा छठी मात्रा में देवराज [[इन्द्र]] के 'सायुज्य पद' को प्राप्त करता है। इसी प्रकार सातवीं मात्रा में भगवान [[विष्णु]] के 'वैकुण्ठधाम' को, आठवीं मात्रा में पशुपति भगवान [[शिव]] के 'रुद्रलोक' को, नवीं मात्रा में 'आनन्दलोक' को, दसवीं मात्रा में 'जनलोक' को, ग्यारहवीं मात्रा में 'तपोलोक' को और बारहवीं मात्रा में प्राण त्यागने पर शाश्वत '[[ब्रह्मलोक]]' को प्राप्त करता है। इस परम 'ब्रह्मलोक' से ही [[अग्निदेव|अग्नि]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] और [[चन्द्र देवता|चन्द्र]] आदि ज्योतियों का प्रादुर्भाव हुआ है। जब कोई श्रेष्ठ साधक अपने मन को नियन्त्रित करके समस्त इन्द्रियों एवं 'सत', 'रज' और 'तम' आदि तीनों गुणों से परे होकर 'परमतत्त्व' में विलीन हो जाता है, तब वह उपमारहित, कल्याणकारी और शान्त-स्वरूप हो जाता है। 'योगी' साधक इन्हें ही कहा जाता है। &amp;lt;ref&amp;gt;'अतीन्द्रियं गुणातीतं मनोलीनं यदा भवेत्। अनुपमं शिवं शान्तं योगयुक्तं सदाविशेत्॥18॥'&amp;lt;/ref&amp;gt; ऐसा साधक अथवा योगी निर्मल कैवल्य पद को प्राप्त कर स्वयं ही परमात्म स्वरूप हो जाता है और ब्रह्म-भाव से असीम अनन्द की अनुभूति करता है। अत: कहा भी है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;'आत्मानं सततं ज्ञात्वा कालं नय महामते। प्रारब्धमखिलं भुंजन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि॥21॥'&amp;lt;/ref&amp;gt; हे ज्ञानवान पुरुष! तुम सतत प्रयत्न करते हुए 'आत्मा' के स्वरूप को पहचानने का प्रयास करो। उसी चिन्तन में अपने समय को लगाओं। प्रारब्ध और कर्मानुसार जो भी कष्ट अथवा कठिनाइयां सामने आयें, उन्हें भोगते हुए खिन्न अथवा दुखी नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परब्रह्म का 'नाद' स्वरूप==&lt;br /&gt;
'नाद' ध्वनि को कहते हैं। ॐकार-स्वरूप ब्रह्म का आत्मा के साथ तादात्म्य स्थापित होते ही, [[शिव]] के कल्याणकारी स्वयं प्रकाश 'नाद-रूप' की अनुभूति होने लगती है। अभ्यास द्वारा 'नाद' को अनुभूतिजन्य बनाने के लिए योगी अथवा साधक 'अकार' और 'मकार' को जीतकर सम्पूर्ण 'ॐकार' को शनै:-शनै: आत्मसात कर लेता है और 'तुर्यावस्था' को प्राप्त कर लेता है। अभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में यह 'महानाद' (अनाहत ध्वनि) विभिन्न स्वरों में सुनाई पड़ती है। शनै:-शनै: अभ्यास से इसके सूक्ष्म भेद स्पष्ट होने लगते हैं। प्रारम्भ में यह ध्वनि समुद्र, मेघ, भेरी तथा झरनों से उत्पन्न ध्वनियों के समान सुनाई पड़ती है। कुछ समय बाद यह ध्वनि [[मृदंग]], [[घण्टा|घण्टे]] और [[नगाड़ा|नगाड़े]] की भांति सुनाई पड़ती है। अन्त में यह किंकिणी, वंशी, वीणा एवं भ्रमर की मधुर ध्वनि के समान सुनाई पड़ती है। संयमी पुरुष को चाहिए कि नाद-श्रवण से भिन्न विषय-वासनाओं को उपेक्षित करके सतत अभ्यास द्वारा मन को उसी 'नाद' में लगाये और उसी में रमण करता रहे—&amp;lt;ref&amp;gt;'सर्वचिन्तां समुत्सृज्य सर्वचेष्टाविवर्जित:।  नादमेवानुसंदध्यान्नादे चित्तं विलीयते॥41॥'&amp;lt;/ref&amp;gt; अर्थात योगी साधक को सतत चिन्तन करते हुए समस्त चिन्ताओं का परित्याग कर, सभी तरह को चेष्टाओं से मन को तटस्थ कर, उस 'नाद' का ही अनुसन्धान करते रहना चाहिए, क्योंकि इससे चित्त सहज ही 'नाद' में लय हो जाता है। जिस प्रकार फूलों का रस ग्रहण करता हुआ भ्रमर, पुष्प-गन्ध की अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार सतत 'नाद-लय' में डूबा हुआ साधक विषय-वासनाओं की आकांक्षा नहीं करता। वह नि:शब्द हो जाता है और उसका मन परमब्रह्म के परमात्मततत्त्व का अनुभव करने लगता है। जब तक नाद है, तभी तक मन का अस्तित्त्व है। नाद के समापन होने पर मन भी 'अमन,'अर्थात 'शून्यवत' हो जाता है- &amp;lt;ref&amp;gt;'नि:शब्द तत्पंर ब्रह्म परमात्मा समीयते। नादो यावन्मनस्तावन्नादान्तेऽपि मनोन्मनी॥48॥'&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार सतत नाद का अभ्यासरत योगी जाग्रत, स्वप्न तथा सुषप्ति आदि अवस्थाओं से मुक्त होकर सभी प्रकार की चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है और मान-अपमान से परे होकर समाधि द्वारा समस्त जड़-संगम का परित्याग कर 'ब्रह्ममय' हो जाता है-&amp;lt;ref&amp;gt;'न मानं तावमानं च संत्यक्त्वा तु समाधिना। अवस्थात्रयमन्वेति न चित्तं योगिन: सदा॥54॥'&amp;lt;/ref&amp;gt; 'नादबिन्दूपनिषद' का यही रहस्यात्मक ज्ञान है, जिसे साधक को सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संस्कृत साहित्य}}&lt;br /&gt;
{{ॠग्वेदीय उपनिषद}}&lt;br /&gt;
[[Category:दर्शन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उपनिषद]]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%A8_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4&amp;diff=165726</id>
		<title>मौन व्रत</title>
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		<updated>2011-05-25T10:51:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[भारत]] में धार्मिक व्रतों का सर्वव्यापी प्रचार रहा है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित [[हिन्दू धर्म]] का एक व्रत संस्कार है। &lt;br /&gt;
*पूर्णिमान्त गणना से [[श्रावण माह|श्रावण]] के अन्त के उपरान्त [[भाद्रपद]] प्रतिपदा  से 16 दिनों तक कर्ता को दूर्वा की शाखाओं की 16 गाँठ बनाकर दाहिने हाथ में (स्त्रियों को बायें हाथ में) रखना चाहिए। &lt;br /&gt;
*सोलहवें दिन पानी लाने, [[गेहूँ]] को पीसने तथा उससे नैवेद्य बनाने तथा भोजन करते समय मौन रखना चाहिए। &lt;br /&gt;
*[[शिव]] प्रतिमा या लिंग को जल, दूध, घी, मधु एवं शक्कर से स्नान कराकर पूजा करना तथा 'शिव प्रसन्न हों' ऐसा कहना चाहिए। &lt;br /&gt;
*इससे सन्तति प्राप्ति एवं कामनाओं की पूर्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;हेमाद्रि (व्रतखण्ड 2, 482-492)&amp;lt;/ref&amp;gt;; &amp;lt;ref&amp;gt;निर्णयामृत (26-27)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*आठ, छ: या तीन मासों तक एक मास, अर्ध मास या बारह, छ: या तीन दिनों तक या एक दिन तक मौन रहना चाहिए। &lt;br /&gt;
*मौनव्रत से सर्वार्थ सिद्धि होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;('मौन सर्वार्थसाघकम्, पृ0 880)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कर्ता को भोजन करते समय 'हूँ' भी नहीं कहना चाहिए। &lt;br /&gt;
*मन, वचन एवं कर्म से हिंसा त्याग; व्रत समाप्ति पर चन्दन का लिंग निर्माण तथा गंध तथा अन्य उपचारों से उसकी पूजा, मन्दिर को विभिन्न दिशाओं में सोने एवं पीतल के [[घण्टा|घण्टों]] का अर्पण; शैव एवं ब्राह्मणों को भोज; सिर पर पीतल के पात्र में लिंग रखकर जनमार्ग से मौन रूप से मन्दिर को जाना तथा मन्दिर प्रतिमा के दाहिने पक्ष में लिंग स्थापना और उसकी बार-बार पूजा करना। &lt;br /&gt;
*कहा जाता है ऐसा करने से कर्ता शिव लोक में जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;हेमाद्रि (व्रत0 2, 879-883,&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;शिवधर्म0 से उद्धरण&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पर्व और त्योहार}}&lt;br /&gt;
{{व्रत और उत्सव}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:व्रत और उत्सव]][[Category:संस्कृति कोश]] [[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A0_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&amp;diff=165723</id>
		<title>चौंसठ कलाएँ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A0_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&amp;diff=165723"/>
		<updated>2011-05-25T10:50:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{seealso|चौंसठ कलाएँ जयमंगल के मतानुसार}}&lt;br /&gt;
*प्राचीन काल में भारतीय शिक्षा-क्रम का क्षेत्र बहुत व्यापक था। शिक्षा में कलाओं की शिक्षा भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती थीं कलाओं के सम्बन्ध में [[रामायण]], [[महाभारत]], [[पुराण]], काव्य आदि ग्रन्थों में जानने योग्य, सामग्री भरी पड़ी है; परंतु इनका थोड़े में, पर सुन्दर ढंग से विवरण [[शुक्राचार्य]] के 'नीतिसार' नामक ग्रन्थ के चौथे अध्याय के तीसरे प्रकरण में मिलता है। उनके कथनानुसार कलाएँ अनन्त हैं, उन सबके नाम भी नहीं गिनाये जा सकते; परंतु उनमें 64 कलाएँ मुख्य हैं। &lt;br /&gt;
*कला का लक्षण बतलाते हुए आचार्य लिखते हैं कि जिसको एक मूक (गूँगा) व्यक्ति भी, जो वर्णोच्चारण भी नहीं कर सकता, कर सके, वह 'कला' है।&amp;lt;ref&amp;gt; शक्तो मूकोऽपि यत् कर्तुं कलासंज्ञं तु तत् स्मृतम्।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
*केलदि श्रीबसवराजेन्द्रविरचित 'शिवतत्त्वरत्नाकर' में मुख्य-मुख्य 64 कलाओं का नामनिर्देश इस प्रकार किया हे-&lt;br /&gt;
#इतिहास&lt;br /&gt;
#आगम &lt;br /&gt;
#काव्य &lt;br /&gt;
#अलंकार &lt;br /&gt;
#नाटक&lt;br /&gt;
#गायकत्व &lt;br /&gt;
#कवित्व&lt;br /&gt;
#कामशास्त्र &lt;br /&gt;
#दुरोदर (द्यूत) &lt;br /&gt;
#देशभाषालिपिज्ञान &lt;br /&gt;
#लिपिकर्प&lt;br /&gt;
#वाचन&lt;br /&gt;
#गणक &lt;br /&gt;
#व्यवहार &lt;br /&gt;
#स्वरशास्त्र &lt;br /&gt;
#शाकुन&lt;br /&gt;
#सामुद्रिक &lt;br /&gt;
#रत्नशास्त्र &lt;br /&gt;
#गज-अश्व-रथकौशल &lt;br /&gt;
#मल्लशास्त्र&lt;br /&gt;
#सूपकर्म (रसोई पकाना) &lt;br /&gt;
#भूरूहदोहद (बागवानी)&lt;br /&gt;
#गन्धवाद&lt;br /&gt;
#धातुवाद &lt;br /&gt;
#रससम्बन्धी खनिवाद &lt;br /&gt;
#बिलवाद&lt;br /&gt;
#अग्निसंस्तम्भ &lt;br /&gt;
#जलसंस्तम्भ&lt;br /&gt;
#वाच:स्तम्भन &lt;br /&gt;
#वय:स्तम्भन &lt;br /&gt;
#वशीकरण&lt;br /&gt;
#आकर्षण &lt;br /&gt;
#मोहन&lt;br /&gt;
#विद्वेषण &lt;br /&gt;
#उच्चाटन &lt;br /&gt;
#मारण&lt;br /&gt;
#कालवंचन &lt;br /&gt;
#स्वर्णकार        &lt;br /&gt;
#परकायप्रवेश &lt;br /&gt;
#पादुका सिद्धि &lt;br /&gt;
#वाकसिद्धि&lt;br /&gt;
#गुटिकासिद्धि &lt;br /&gt;
#ऐन्द्रजालिक &lt;br /&gt;
#अंजन&lt;br /&gt;
#परदृष्टिवंचन &lt;br /&gt;
#स्वरवंचन&lt;br /&gt;
#मणि-मन्त्र औषधादिकी सिद्धि &lt;br /&gt;
#चोरकर्म&lt;br /&gt;
#चित्रक्रिया &lt;br /&gt;
#लोहक्रिया &lt;br /&gt;
#अश्मक्रिया &lt;br /&gt;
#मृत्क्रिया&lt;br /&gt;
#दारूक्रिया &lt;br /&gt;
#वेणुक्रिया &lt;br /&gt;
#चर्मक्रिया &lt;br /&gt;
#अम्बरक्रिया &lt;br /&gt;
#अदृश्यकरण &lt;br /&gt;
#दन्तिकरण &lt;br /&gt;
#मृगयाविधि &lt;br /&gt;
#वाणिज्य&lt;br /&gt;
#पाशुपाल्य &lt;br /&gt;
#कृषि&lt;br /&gt;
#आसवकर्म  &lt;br /&gt;
#लावकुक्कुट मेषादियुद्धकारक कौशल&lt;br /&gt;
*[[वात्स्यायन]] प्रणीत 'कामसूत्र' के टीकाकार जयमंगल ने दो प्रकार की कलाओं का उल्लेख किया है- &lt;br /&gt;
#पहली 'काम शास्त्रांगभूता' और &lt;br /&gt;
#दूसरी 'तन्त्रावापौपयिकी'। &lt;br /&gt;
*इन दोनों में से प्रत्येक में 64 कलाएँ हैं। इनमें कई कलाएँ समान ही हैं और बाकी पृथक। पहले प्रकार में 24 कर्माश्रया, 20 द्यूताश्रया, 16 शयनोपचारिका और 4 उत्तर कलाएँ,- इस तरह 64 मूल कलाएँ है; इनकी भी अवान्तर और कलाएँ हैं, जो सब मिलकर 518 होती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कर्माश्रया''' 24 कलाओं के नाम इस प्रकार हैं-&lt;br /&gt;
#गीत&lt;br /&gt;
#नृत्य &lt;br /&gt;
#वाद्य &lt;br /&gt;
#कौशल-लिपिज्ञान &lt;br /&gt;
#उदारवचन&lt;br /&gt;
#चित्रविधि &lt;br /&gt;
#पुस्तकर्म &lt;br /&gt;
#पत्रच्छेद्य &lt;br /&gt;
#माल्यविधि &lt;br /&gt;
#गन्धयुत्स्यास्वाद्यविधान &lt;br /&gt;
#रत्नपरीक्षा&lt;br /&gt;
#सीवन&lt;br /&gt;
#रंगपरिज्ञान &lt;br /&gt;
#उपकरणक्रिया &lt;br /&gt;
#मानविधि&lt;br /&gt;
#आजीवज्ञान &lt;br /&gt;
#तिर्यग्योनिचिकित्सित &lt;br /&gt;
#मायाकृतपाषण्डपरिज्ञान &lt;br /&gt;
#क्रीड़ाकौशल&lt;br /&gt;
#लोकज्ञान&lt;br /&gt;
#वैचक्षण्य &lt;br /&gt;
#संवाहन&lt;br /&gt;
#शरीरसंस्कार  &lt;br /&gt;
#विशेष कौशल &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''द्यूताश्रया''' 20 कलाओं में 15 निर्जीव और 5 सजीव हैं। निर्जीव कलाएँ ये हैं- &lt;br /&gt;
#आयु:प्राप्ति&lt;br /&gt;
#अक्षविधान &lt;br /&gt;
#रूप-संख्या &lt;br /&gt;
#क्रियामार्गण &lt;br /&gt;
#बीजग्रहण&lt;br /&gt;
#नयज्ञान &lt;br /&gt;
#करणादान &lt;br /&gt;
#चित्राचित्रविधि &lt;br /&gt;
#गूढ़राशि&lt;br /&gt;
#तुल्याभिहार &lt;br /&gt;
#क्षिप्रग्रहण&lt;br /&gt;
#अनुप्राप्तिलेखस्मृति &lt;br /&gt;
#अग्निक्रम&lt;br /&gt;
#छलव्यामोहन  &lt;br /&gt;
#ग्रहदान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सजीव''' 5 कलाएँ ये हैं- &lt;br /&gt;
#उपस्थानविधि &lt;br /&gt;
#युद्ध&lt;br /&gt;
#रूत &lt;br /&gt;
#गत  &lt;br /&gt;
#नृत्त &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शयनोपचारिका''' 16 कलाएँ ये हैं- &lt;br /&gt;
#पुरुष का भावग्रहण &lt;br /&gt;
#स्वरागप्रकाशन&lt;br /&gt;
#प्रत्यंगदान&lt;br /&gt;
#नख-दन्तविचार &lt;br /&gt;
#नीविस्त्रंसन&lt;br /&gt;
#गुह्यांगका संस्पर्शनानुलोम्य &lt;br /&gt;
#परमार्थ कौशल&lt;br /&gt;
#हर्षण&lt;br /&gt;
#समानार्थताकृतार्थता &lt;br /&gt;
#अनुप्रोत्साहन&lt;br /&gt;
#मृदुक्रोधप्रवर्तन &lt;br /&gt;
#सम्यक्क्रोधनिवर्तन &lt;br /&gt;
#क्रुद्धप्रसादन&lt;br /&gt;
#सुप्तपरित्याग&lt;br /&gt;
#चरमस्वापविधि  &lt;br /&gt;
#गुह्यगूहन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4 उत्तरकलाएँ''' ये हैं-&lt;br /&gt;
#साश्रुपात रमण को शापदान, &lt;br /&gt;
#स्वशपथक्रिया, &lt;br /&gt;
#प्रस्थितानुगमन और &lt;br /&gt;
#पुन:पुनर्निरीक्षण। इस प्रकार दूसरे प्रकार की भी सर्वसाधारण के लिये उपयोगिनी 64 कलाएँ हैं। &lt;br /&gt;
*[[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत]] के टीकाकार श्रीधरस्वामी ने भी 'भागवत' के दशम स्कन्ध के 45वें अध्याय के 64वें श्लोक की टीका में प्राय: दूसरे प्रकार की कलाओं का नामनिर्देश किया है; किंतु शुक्राचार्य ने अपने 'नीतिसार' में जिन कलाओं का विवरण दिया है, उनमें कुछ तो उपर्युक्त कलाओं से मिलती हैं, पर बाकी सभी भिन्न हैं। यहाँ पर जयमंगलटीकोक्त दूसरे प्रकार की कलाओं का केवल नाम ही पाठकों की जानकारी के लिये देकर उसके बाद 'शुक्रनीतिसार' के क्रमानुसार कलाओं का दिग्दर्शन कराया जायगा। &lt;br /&gt;
*[[चौंसठ कलाएँ जयमंगल के मतानुसार|जयमंगल के मातनुसार]] 64 कलाएँ ये हैं- &lt;br /&gt;
#गीत&lt;br /&gt;
#वाद्य &lt;br /&gt;
#नृत्य &lt;br /&gt;
#आलेख्य &lt;br /&gt;
#विशेषकच्छेद्य (मस्तक पर तिलक लगाने के लिये काग़ज़, पत्ती आदि काटकर आकार या साँचे बनाना)&lt;br /&gt;
#तण्डुल-कुसुमबलिविकार (देव-पूजनादि के अवसर पर तरह-तरह के रँगे हुए चावल, जौ आदि वस्तुओ तथा रंगविरंगे फूलों को विविध प्रकार से सजाना)&lt;br /&gt;
#पुष्पास्तरण &lt;br /&gt;
#दशनवसनांगराग (दाँत, वस्त्र तथा शरीर के अवयवों को रँगना)&lt;br /&gt;
#मणिभूमिका-कर्म (घर के फर्श के कुछ भागों को मोती, मणि आदि रत्नों से जड़ना) &lt;br /&gt;
#शयनरचन (पलंग लगाना)&lt;br /&gt;
#उदकवाद्य (जलतरंग)&lt;br /&gt;
#उदकाघात (दूसरों पर हाथों या पिचकारी से जल की चोट मारना) &lt;br /&gt;
#चित्राश्च योगा: (जड़ी-बूटियों के योग से विविध वस्तुएँ ऐसी तैयार करना या ऐसी औषधें तैयार करना अथवा ऐसे मन्त्रों का प्रयोग करना जिनसे शत्रु निर्बल हो या उसकी हानि हो), &lt;br /&gt;
#माल्यग्रंथनविकल्प (माला गूँथना) &lt;br /&gt;
#शेखरकापीड़योजन (स्त्रियों की चोटी पर पहनने के विविध अलंकारों के रूप में पुष्पों को गूँथना) &lt;br /&gt;
#नेपथ्यप्रयोग (शरीर को वस्त्र, आभूषण, पुष्प आदि से सुसज्जित करना)&lt;br /&gt;
#कर्णपत्रभंग (शंक्ख, हाथीदाँत आदि के अनेक तरह के कान के आभूषण बनाना) &lt;br /&gt;
#गन्धयुक्ति (सुगन्धित धूप बनाना)&lt;br /&gt;
#भूषणयोजन&lt;br /&gt;
#ऐन्द्रजाल (जादू के खेल) &lt;br /&gt;
#कौचुमारयोग (बल-वीर्य बढ़ाने वाली औषधियाँ बनाना) &lt;br /&gt;
#हस्तलाघव (हाथों की काम करने में फुर्ती और सफ़ाई) &lt;br /&gt;
#विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकार-क्रिया (तरह-तरह के शाक, कढ़ी, रस, मिठाई आदि बनाने की क्रिया)&lt;br /&gt;
#पानकरस-रागासव-योजन (विविध प्रकार के शर्बत, आसव आदि बनाना)&lt;br /&gt;
#सूचीवान कर्म (सुई का काम, जैसे सीना, रफू करना, कसीदा काढ़ना, मोजे-गंजी बुनना) &lt;br /&gt;
#सूत्रक्रीड़ा (तागे या डोरियों से खेलना, जैसे कठपुतली का खेल)&lt;br /&gt;
#वीणाडमरूकवाद्य&lt;br /&gt;
#प्रहेलिका (पहेलियाँ बूझना) &lt;br /&gt;
#प्रतिमाला (श्लोक आदि कविता पढ़ने की मनोरंजक रीति)&lt;br /&gt;
#दुर्वाचकयोग (ऐसे श्लोक आदि पढ़ना, जिनका अर्थ और उच्चारण दोनों कठिन हों)&lt;br /&gt;
#पुस्तक-वाचन&lt;br /&gt;
#नाटकाख्यायिका-दर्शन &lt;br /&gt;
#काव्य समस्यापूरण&lt;br /&gt;
#पट्टिकावेत्रवानविकल्प (पीढ़ा, आसन, कुर्सी, पलंग, मोढ़े आदि चीजें बेंत बगेरे वस्तुओं से बनाना)&lt;br /&gt;
#तक्षकर्म (लकड़ी, धातु आदि को अभष्टि विभिन्न आकारों में काटना)&lt;br /&gt;
#तक्षण (बढ़ई का काम)&lt;br /&gt;
#वास्तुविद्या&lt;br /&gt;
#रूप्यरत्नपरीक्षा (सिक्के, रत्न आदि की परीक्षा करना)&lt;br /&gt;
#धातुवाद (पीतल आदि धातुओं को मिलाना, शुद्ध करना आदि) &lt;br /&gt;
#मणिरागाकर ज्ञान (मणि आदि का रँगना, खान आदि के विषय का ज्ञान) &lt;br /&gt;
#वृक्षायुर्वेदयोग&lt;br /&gt;
#मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधि (मेंढे, मुर्गे, तीतर आदि को लड़ाना)&lt;br /&gt;
#शुकसारिका प्रलापन (तोता-मैना आदि को बोली सिखाना)&lt;br /&gt;
#उत्सादन संवाहन, केशमर्दनकौशल (हाथ-पैरों से शरीर दबाना, केशों का मलना, उनका मैल दूर करना आदि)&lt;br /&gt;
#अक्षरमुष्टि का कथन (अक्षरों को ऐसी युक्ति से कहना कि उस संकेत का जानने वाला ही उनका अर्थ समझे, दूसरा नहीं; मुष्टिसकेंत द्वारा वातचीत करना, जैसे दलाल आदि कर लेते हैं), &lt;br /&gt;
#म्लेच्छित विकल्प (ऐसे संकेत से लिखना, जिसे उस संकेत को जानने वाला ही समझे)&lt;br /&gt;
#देशभाषा-विज्ञान&lt;br /&gt;
#पुष्पशकटिका&lt;br /&gt;
#निमित्तज्ञान (शकुन जानना) &lt;br /&gt;
#यन्त्र मातृका (विविध प्रकार के मशीन, कल, पुर्जे आदि बनाना)&lt;br /&gt;
#धारणमातृका (सुनी हुई बातों का स्मरण रखना)&lt;br /&gt;
#संपाठय&lt;br /&gt;
#मानसी काव्य-क्रिया (किसी श्लोक में छोड़े हुए पद को मन से पूरा करना)&lt;br /&gt;
#अभिधानकोष&lt;br /&gt;
#छन्दोज्ञान&lt;br /&gt;
#क्रियाकल्प (काव्यालंकारों का ज्ञान)&lt;br /&gt;
#छलितक योग (रूप और बोली छिपाना) &lt;br /&gt;
#वस्त्रगोपन (शरीर के अंगों को छोटे या बड़े वस्त्रों से यथायोग्य ढँकना) &lt;br /&gt;
#द्यूतविशेष&lt;br /&gt;
#आकर्ष-क्रीडा (पासों से खेलना)&lt;br /&gt;
#बालक्रीडनक&lt;br /&gt;
#वैनयिकी ज्ञान (अपने और पराये से विनयपूर्वक शिष्टाचार करना)&lt;br /&gt;
#वैजयिकी-ज्ञान (विजय प्राप्त करने की विद्या अर्थात् शस्त्रविद्या)  &lt;br /&gt;
#व्यायामविद्या। इनका विशेष विवरण जयमंगल ने कामसूत्र की व्याख्या में किया है। &lt;br /&gt;
*शुक्राचार्य का कहना है कि कलाओं के भिन्न-भिन्न नाम नहीं हैं, अपितु केवल उनके लक्षण ही कहे जा सकते हैं; क्योंकि क्रिया के पार्थक्य से ही कलाओं में भेद होता है। जो व्यक्ति जिस कला का अवलम्बन करता है, उसकी जाति उसी कला के नाम से कही जाती है। &lt;br /&gt;
*पहली कला है नृत्य (नाचना)। हाव-भाव आदि के साथ गति नृत्य कहा जाता है। नृत्य में करण, अंगहार, विभाव, भाव, अनुभाव और रसों की अभिव्यक्ति की जाती है। नृत्य के दो प्रकार हैं- एक नाट्य, दूसरा अनाट्य। स्वर्ग-नरक या [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] के निवासियों की कृतिका अनुकरण 'नाटय' कहा जाता है और अनुकरण-विरहित नृत्य 'अनाटय'। यह कला अति प्राचीन काल से यहाँ बड़ी उन्नत दशा में थी। श्रीशंकर का ताण्डवनृत्य प्रसिद्ध है। आज तो इस कला का पेशा करने वाली एक जाति ही 'कत्थक' नाम से प्रसिद्ध है। वर्षाऋतु में घनगर्जना से आनन्दित मोर का नृत्य बहुतों ने देखा होगा। नृत्य एक स्वाभाविक वस्तु है, जो हृदय में प्रसन्नता का उद्रेक होते ही बाहर व्यक्त हो उठती है। कुछ कलाविद पुरुषों ने इसी स्वाभाविक नृत्य को अन्यान्य अभिनय-वेशषों से रँगकर कला का रूप दे दिया है। जंगली-से-जंगली और सभ्य-से-सभ्य समाज में नृत्य का अस्तित्व किसी-न-किसी रूप में देखा ही जाता है। आधुनिक पाश्चात्त्यों में नृत्यकला एक प्रधान सामाजिक वस्तु हो गयी है। प्राचीन काल में इस कला की शिक्षा राजकुमारों तक के लिये आवश्यक समझी जाती थीं। [[अर्जुन]] द्वारा [[अज्ञातवास]]काल में राजा [[विराट]] की कन्या [[उत्तरा]] को [[बृहन्नला]] रूप में इस कला की शिक्षा देने की बात '[[महाभारत]]' में प्रसिद्ध है। दक्षिण-[[भारत]] में यह कला अब भी थोड़ी-बहुत विद्यमान है। 'कथकली' में उसकी झलक मिलती है। श्री उदयशंकर आदि कुछ कला प्रेमी इस प्राचीन कला को फिर जाग्रत करने के प्रयत्न में लगे हुए हैं।&lt;br /&gt;
*अनेक प्रकार के वाद्यों का निर्माण करने और उनके बजाने का ज्ञान 'कला' है। वाद्यों के मुख्यतया चार भेद हैं- &lt;br /&gt;
#तत-तार अथवा ताँत का जिसमें उपयोग होता है, वे वाद्य '[[तत वाद्य|तत]]' कहे जाते हैं- जैसे वीणा, तम्बूरा, सारगीं, बेला, सरोद आदि। &lt;br /&gt;
#सुषिर-  जिसका भीतरी भाग सच्छिद्र (पोला) हो और जिसमें वायु का उपयोग होता हो, उसको '[[सुषिर वाद्य|सुषिर]]' कहते हैं- जैसे [[बांसुरी]], अलगोजा, [[शहनाई]], बैण्ड, [[हारमोनियम]], [[शंख]] आदि। &lt;br /&gt;
#आनद्ध -चमड़े से मढ़ा हुआ वाद्य '[[आनद्ध वाद्य|आनद्ध]]' कहा जाता है- जैसे ढोल, नगारा, तबला, मृदंग, [[डफ]], खँजड़ी आदि। &lt;br /&gt;
#घन- परस्पर आघात से बजाने योग्य वाद्य '[[घन वाद्य|घन]]' कहलाता है- जैसे [[झांझ]], [[मंझीरा]], [[करताल]] आदि। यह कला गाने से सम्बन्ध रखती हैं बिना वाद्य के गान में मधुरता नहीं आती। प्राचीन काल में भारत के वाद्यों में वीणा मुख्य थी। इसका उल्लेख प्राचीन [[संस्कृत]] ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। [[सरस्वती देवी|सरस्वती]] और [[नारद]] का वीणा वादन, श्री[[कृष्ण]] की [[वंशी]], [[महादेव]] का डमरू तो प्रसिद्ध ही है। वाद्य आदि विषयों के संस्कृत में अनेक ग्रन्थ हैं। उनमें अनेक वाद्यों के परिमाण, उनके बनाने और मरम्मत करने की विधियाँ मिलती हैं। राज्यभिषेक, यात्रा, उत्सव, विवाह, [[उपनयन]] आदि मांगलिक कार्यों के अवसरों पर भिन्न-भिन्न वाद्यों का उपयोग होता था। युद्ध में सैनिकों के उत्साह, शौर्य को बढ़ाने के लिये अनेक तरह के वाद्य बजाये जाते थे।&lt;br /&gt;
*स्त्री और पुरुषों को वस्त्र एवं अलंकार सुचारू रूप से पहनाना 'कला' है।&lt;br /&gt;
*अनेक प्रकार के रूपों का आविर्भाव करने का ज्ञान 'कला' है। इसी कला का उपयोग [[हनुमान]] जी ने श्री[[राम|रामचन्द्र]]जी के साथ पहली बार मिलने के समय ब्राह्मण-वेश धारण करने में किया था। &lt;br /&gt;
*शैय्या और आस्तरण (बिछौना) सुन्दर रीति से बिछाना और पुष्पों को अनेक प्रकार से गूँथना 'कला' है। &lt;br /&gt;
*द्यूत (जूआ) आदि अनेक क्रीड़ाओं से लोगों का मनोरंजन करना 'कला' है। प्राचीन काल में द्यूत के अनेक प्रकारों के प्रचलित होने का पता लगता है। उन सबमें अक्षक्रीड़ा (चौपड़ा) विशेष प्रसिद्ध थी। [[नल]], [[युधिष्ठिर]], [[शकुनि]] आदि इस कला में निपुण थे।&lt;br /&gt;
*अनेक प्रकार के आसनों द्वारा सुरत क्रीड़ा का ज्ञान 'कला' है। इन सात कलाओं का उल्लेख 'गान्धर्ववेद' में किया गया है।&lt;br /&gt;
*विविध प्रकार के मकरन्दों (पुष्परस) से आसव, मद्य आदि की कृति 'कला' है। &lt;br /&gt;
*शल्य (पादादि अंग में चुभे काँटे) की पीड़ा को [[अल्प]] कर देना या शल्य को अंग में से निकाल डालना, शिरा (नाड़ी) और फोड़े आदि की चीर-फाड़ करना 'कला' है। हकीमों की जर्राही और डाक्टरों की सर्जरी इसी कला के उदाहरण हैं। &lt;br /&gt;
*हींग आदि रस (मसाले) से युक्त अनेक प्रकार के अन्नों का पकाना 'कला' है। महाराज [[नल]] और [[भीम (पांडव)|भीमसेन]] जैसे पुरुष भी इस कला में निपुण थे। &lt;br /&gt;
*वृक्ष, गुल्म, लता आदि को लगाने, उनसे विविध प्रकार के फल, पुष्पों को उत्पन्न करने एवं उन वृक्षादि का अनेक उपद्रवों से संरक्षण करने की कृति 'कला' है। प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में सुरम्य उद्यान, उपवन आदि का बहुत उल्लेख प्राप्त होता है। विष्णुधर्मोत्तरपुराण, [[अग्नि पुराण]] तथा शुक्रनीतिंसार में इस विषय पर बहुत प्रकाश डाला गया है। इससे मालूम होता है कि बहुत प्राचीन काल में भी यह कला उन्नत दशा में थी। &lt;br /&gt;
*पत्थर, सोने-चाँदी आदि धातुओं को (खान में से) खोदना, उन धातुओं की भस्म बनाना 'कला' है। &lt;br /&gt;
*सभी प्रकार के इक्षु (ईख) से बनाये जा सकनेवाले पदार्थ- जैसे राव, गुड़, खाँड़, चीनी, मिश्री, कन्द आदि बनाने का ज्ञान 'कला' है। &lt;br /&gt;
*सुवर्ण आदि अनेक धातु और अनेक औषधियों को परस्पर मिश्रित करने का ज्ञान (सिनथेसिस) 'कला' है। &lt;br /&gt;
*मिश्रित धातुओं को उस मिश्रण से अलग-अलग कर देना (अनालिसिस) 'कला' है। &lt;br /&gt;
*धातु आदि के मिश्रण का अपूर्व (प्रथम) विज्ञान 'कला' है।&lt;br /&gt;
*लवण (नमक) आदि को समुद्र से या मिट्टी आदि पदार्थों से निकालने का विज्ञान 'कला' है। इन दस कलाओं का आयुर्वेद से सम्बन्ध है, इसलिये ये कलाएँ आयुर्वेद के अन्तर्भूत हैं। इनमें आधुनिक बाँटनी, गार्डनिंग, माइनिंग, मेटलर्जी, केमिस्ट्री आदि आ जाते हैं। &lt;br /&gt;
*पैर आदि अंगों के विशिष्ट संचालनपूर्वक (पैतरा बदलते हुए) शस्त्रों का लक्ष्य स्थिर करना और उनका चलाना 'कला' है। &lt;br /&gt;
*शरीर की सन्धियों (जोड़ों) पर आघात करते हुए या भिन्न-भिन्न अंगों को खींचते हुए दो मलों (पहलवानों) का युद्ध (कुश्ती) 'कला' है। इस कला में भी भारत प्राचीन काल से अब तक सर्वश्रेष्ठ रहा है। श्री[[कृष्ण]] ने [[कंस]] की सभा के चाणूर, मुष्टिक आदि प्रसिद्ध पहलवानों को इस कला में पछाड़ा था। [[भीम (पांडव)|भीमसेन]] और [[जरासन्ध]] की कुश्ती कई दिनों तक चलने का उल्लेख '[[महाभारत]]' में आया है। आज भी गामा आदि के नाम जगद्विजयी मल्लों में हैं। पंजाब, [[मथुरा]] आदि के मल्ल अभी भी इस कला में अच्छी निपुणता रखते हैं। इस युद्ध का एक भेद 'बाहुयुद्ध' है। इसमें मल्ललोग किसी शस्त्र का उपयोग न कर केवल मुष्टि से युद्ध करते हैं। इसे 'मुक्की', 'कुक्काबाजी' (बाकसिंग) कहते हैं। [[काशी]] के दुर्गा घाट पर कार्तिक में होने वाली मुक्की सुप्रसिद्ध है। बाहुयुद्ध में लड़कर मरने वाले की शुक्राचार्य ने निन्दा की है। वे लिखते हैं— 'बाहुयुद्ध में मरनेवाले को न तो इस लोक में यश मिलता है, न परलोक में स्वर्ग-सुख। किंतु मारनेवाले का यश अवश्य होता है; क्योंकि शत्रु के बल और दर्प (घमण्ड) का अन्त करना ही युद्ध का लक्ष्य होता है। इसलिये प्राणान्त (शत्रु के मर जाने तक) बाहुयुद्ध करना चाहिये।&amp;lt;ref&amp;gt;'मृतस्य तस्य न स्वर्गो यशो नेहापि विद्यते। बलदर्पविनाशान्तं नियुद्धं यश से रिपो:। न कस्यासीद्धि कुर्याद्वै प्राणान्तं बाहुयुद्धकम्॥&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
ऐसे युद्ध का उदाहरण [[मधु कैटभ|मधु-कैटभ]] के साथ [[विष्णु]] का युद्ध है, जो समुद्र में पाँच हज़ार वर्षों तक होता रहा था—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान हरि:॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पंचवर्षसहस्त्राणि बाहुप्रहरणो विभु:। (सप्तशती 1। 92-94)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
*कृत और प्रतिकृत आदि अनेक तरह के अति भयंकर बाहु (मुष्टि) प्रहारों से अकस्मात शत्रुपर झपट कर किये गये आघातों से एवं शत्रु को असावधान पाकर ऐसी दशा में उसको पकड़कर रगड़ देने आदि प्रकारों से जो युद्ध किया जाता है, उसे 'निपीड़न' कहते हैं और शत्रु द्वारा किये गये ऐसे 'निपीड़न' से अपने को बचा लेने का नाम 'प्रतिक्रिया' है अर्थात अपना बचाव करते हुए शत्रु पर केवल बाहुओं से भयंकर आघात करते हुए युद्ध करना 'कला' है। &lt;br /&gt;
*अभिलक्षित देश (निशाने) पर विविध यन्त्रों से अस्त्रों को फेंकना और किसी (बिगुल, तुरही आदि) वाद्य के संकेत से व्यूह रचना (किसी ख़ास तरीक़े से सैन्य को खड़ा करने की क्रिया) करना 'कला' है। इससे पता चलता है कि मन्त्रों से फेंके जाने वाले अस्त्र- आज कल के बन्दूक, तोप, मशीनगन, तारपीड़ों आदि की तरह-प्राचीन काल में भी उपयोग में लाये जाते रहे होंगे। किंतु उनसे होने वाली भारी क्षति को देखकर उनका उपयोग कम कर दिया गया होगा। [[स्वयंभुव मनु|मनु]] ने भी महायन्त्र-निर्माण का निषेध किया है। &lt;br /&gt;
*हाथी, घोड़े और रथों की विशिष्ट गतियों से युद्ध का आयोजन करना 'कला' है। 18 से 22 तक की पाँच कलाएँ 'धनुर्वेद' से सम्बन्ध रखती हैं। &lt;br /&gt;
*विविध प्रकार के आसन (बैठने का प्रकार) एवं मुद्रा (दोनों हाथों की अँगुलियों से बननेवाली अंकुश, पद्म, धेनु आदि की आकृतियों) से देवताओं को प्रसन्न करना 'कला' हैं इस कला पर आधुनिकों का विश्वास नहीं है, तो भी कही-कहीं इसके जानने वाले व्यक्ति पाये जाते हैं। इसका प्राचीन समय में ख़ूब प्रचार था। संस्कृत में तन्त्र एवं आगम के अनेक ग्रन्थों में मुद्रा आदि का वर्णन देखने में आता है। हिप्नोटिज्म जानने वालों में कुछ मुद्राओं का प्रयोग देखा जाता है। वे मुद्रा द्वारा अपनी शक्ति का संक्रमण अपने प्रयोज्य- विधेय में करते हैं। &lt;br /&gt;
*रथ हाँकने का काम (कोचवानी) एवं हाथी, घोड़ो को अनेक तरह की गतियों (चालों) की शिक्षा देना 'कला' है। इसकी शिक्षा किसी समय में सभी राजकुमारों के लिये आवश्यक समझी जाती थी। यदि विराट पुत्र उत्तर इस कला में निपुण न होते तो जब [[दुर्योधन]] आदि विराट की गौओं का अपहरण करने के लिये आये, उस समय [[अर्जुन]] का सारथ्य वे कैसे कर सकते थे। भारत-युद्ध में श्री कृष्ण अर्जुन का रथ कैसे हाँक सकते या [[कर्ण]] का सारथ्य शल्य कैसे कर सकते थे। आज भी शौक़ीन लोग सारथि (ड्राइवर) को पीछे बैठाकर स्वयं मोटर आदि हाँकते हुए देखे जाते हैं। &lt;br /&gt;
*मिट्टी, लकड़ी, पत्थर और पीतल आदि धातुओं से बर्तनों का बनाना 'कला' हैं यह कला भी इस देश में बहुत पुराने समय से अच्छी दशा में देखने में आती है। इसका अनुमान ज़मीन की खुदाई से निकले हुए प्राचीन बर्तनों को 'वस्तु-संग्रहालय' (म्यूजियम) में देखने से हो सकता है। &lt;br /&gt;
*चित्रों का आलेखन 'कला' है। प्राचीन चित्रों को देखने से प्रमाणित होता है कि यह कला भारत में किस उच्चकोटि तक पहुँची हुई थी। प्राचीन मन्दिर और [[बौद्ध]] विहारों की मूर्तियों और अजन्ता आदि गुफ़ाओं के चित्रों को देखकर आश्चर्य होता है। आज कई शताब्दियों के व्यतीत हो जाने पर भी वे ज्यों-के-ज्यों दिखलायी पड़ते हैं। उनके रंग ऐसे दिखलायी पड़ते हैं कि जैसे अभी कारीगर ने उनका निर्माणकार्य समाप्त किया हो। प्रत्येक वर्ष हज़ारों विदेशी यात्री उन्हें देखने के लिये दूर-दूर से आते रहते हैं। प्रयत्न करने पर भी वैसे रंगों का आविष्कार अब तक नहीं हो सका है। यह कला इतनी व्यापक थी कि देश के हर एक कोने में घर-घर में इसका प्रचार था। अब भी घरों के द्वार पर गणेश जी आदि के चित्र बनाने की चाल प्राय: सर्वत्र देखी जाती हैं कई सामाजिक उत्सवों के अवसरों पर स्त्रियाँ दीवाल और ज़मीन पर चित्र लिखती हैं। प्राचीन काल में भारत की स्त्रियाँ इस कला में बहुत निपुण होती थीं। [[बाणासुर]] की कन्या [[उषा]] की सखी चित्रलेखा इस कला में बड़ी सिद्धहस्त थी। वह एक बार देखे हुए व्यक्ति का बाद में हूबहू चित्र बना सकती थी। [[चित्रकला]] के 6 अंग हैं- &lt;br /&gt;
#रूपभेद (रंगों की मिलावट)&lt;br /&gt;
#प्रमाण (चित्र में दूरी, गहराई आदि का दिखलाना और चित्रगत वस्तु के अंगों का अनुपात)&lt;br /&gt;
#भाव और लावण्य की योजना&lt;br /&gt;
#सादृश्य&lt;br /&gt;
#वर्णिका (रंगों का सामंजस्य) &lt;br /&gt;
#भंग (रचना-कौशल)। 'समरागंणसूत्रधार' आदि प्राचीन शिल्पग्रन्थों में इस कला का विशदरूप से विवरण उपलब्ध होता है। &lt;br /&gt;
*तालाब, बावली, कूप, प्रासाद (महल और देव मन्दिर) आदि का बनाना और भूमि (ऊँची-नीची) का सम (बराबर) करना 'कला' है। 'सिविल इंजीनियरिंग' का इसमें भी समावेश किया जा सकता है। &lt;br /&gt;
*घटी (घड़ी) आदि समय का निर्देश करने वाले यन्त्रों का निर्माण करना 'कला' है। प्राचीन काल में समय का माप करने के लिये जलयन्त्र, वालुकायन्त्र, धूप-घड़ी आदि साधन थें अब घड़ी के बन जाने से यद्यपि उनका व्यवहार कम हो गया है, तथापि कई प्राचीन शैली के ज्योतिषी लोग अब भी विवाह आदि के अवसर पर जलयन्त्र द्वारा ही सूर्योदय से इष्ट काल का साधन करते हैं। एवं कई प्राचीन राजाओं की ड्योढ़ी पर अब भी जलयन्त्र वालुकायन्त्र  या धूप-घड़ी के अनुसार समय-निर्देशक [[घण्टा]] बजाने की प्रथा देखने में आती है। आश्चर्य है कि इन्हीं यन्त्रों की सहायता से प्राचीन ज्योतिषी लोग सूक्ष्मातिसूक्ष्म समय के विभाग का ज्ञान स्पष्टतया प्राप्त कर लिया करते थे। और उसी के आधार पर बनी जन्मपत्रिका से जीवन की घटनाओं का ठीक-ठीक पता लगा लिया जाता था। &lt;br /&gt;
*अनेक वाद्यों का निर्माण करना 'कला' है।&lt;br /&gt;
*कतिपय रंगों के अल्प, अधिक या सम संयोग (मिलावट) से बने विभिन्न रंगों से वस्त्र आदि वस्तुओं का रँगाना- यह भी 'कला' है। पहले यह कला घर-घर में थी; किंतु इसका भार, अब मालूम होता है, रंगरेजों के ऊपर ही छोड़ दिया गया है। यहाँ के रंग बड़े सुन्दर और टिकाऊ होते थे। यहाँ के रंगों से रँगे वस्त्रों का बाहर के देशों में बड़ा आदर था। अब भी राजपूताने के कई नगरों में ऐसे-ऐसे कुशल रँगरेज हैं कि जो महीन-से-महीन मलमल को दोनों ओर से दो विभिन्न रंगों में रँग देते हैं। जोधपुर में कपड़े को स्थान-स्थान पर बाँधकर इस तरह से रँग देते हैं कि उसमें अनेक रंग और बेल-बूटे बैठ जाते हैं। &lt;br /&gt;
*जल, [[वायु देव|वायु]] और [[अग्निदेव|अग्नि]] के संयोग से उत्पन्न वाष्प (भाप) के निरोध (रोकने) से अनेक क्रियाओं का सम्पादन करना 'कला' है— &amp;lt;ref&amp;gt;जलवाथ्वग्निसंयोगनिरोधैश्च क्रिया कला।&amp;lt;/ref&amp;gt;भोजदेव (वि0 सं0 1066-98) कृत 'समरांगण सूत्रधार' के 31वें अध्याय का नाम ही 'यन्त्रविधान' है। उस अध्याय में 223.5 श्लोक हैं, जिनमें विलक्षण प्रकार के विविध यन्त्रों के निर्माण की संक्षिप्त प्रक्रिया का दिग्दर्शन कराया गया है। इससे तो यह बात स्पष्ट रीति से जानी जा रही है कि प्राचीन भारत के लोगों को भाप के यन्त्रों का ज्ञान था और वे उन यन्त्रों से अपने व्यावहारिक कार्यों में आज की तरह सहायता लिया करते थे। &lt;br /&gt;
*नौका, रथ आदि जल-स्थल के आवागमन के साधनों का निर्माण करना 'कला' है। पहले के लोग स्थल और यातायात के साधनों का- अच्छे-से-अच्छे उपकरणों से सम्पन्न अश्व, रथ, गौ (बैलों) के रथ आदि का बनाना तो जानते ही थे; साथ ही अच्छे-से-अच्छे सुदृढ़ सुन्दर, उपयोगी, सर्वसाधनों से सम्पन्न बड़े-बड़े जहाजों का बनाना भी जानते थे। जहाजों के उपयोग का वर्णन [[वेद|वेदों]] में भी मिलता है। जहाजों पर दूर-दूर के देशों के साथ अच्छा व्यापार होता था। जलयानों से आने-जाने वाले माल पर कर आदि की व्यवस्था थीं पाश्चात्यों की तरह यहाँ के मल्लाह भी बड़े साहसी और यात्रा में निडर होते थे; किंतु पाश्चात्य शासकों की कृपा से अन्यान्य कलाओं की तरह भारत में यह कला भी बहुत क्षीण हो गयी है।&lt;br /&gt;
*सूत्र, सन आदि तन्तुओं से रस्सी का बनाना 'कला' है। &lt;br /&gt;
*अनेक तन्तुओं से पटबन्ध (वस्त्र की रचना) 'कला' है। यह कला भी बहुत प्राचीन समय से भारत में बड़ी उन्नत दशा में थी। भारत में 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' के शासन के पहले यहाँ ऐसे सुन्दर, मजबूत, बारीक वस्त्र बनाये जाते थे, जिनकी बराबरी आजतक कोई दूसरा देश नहीं कर सका है। 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' के समय में यहाँ के वस्त्र-निर्माण एवं वस्त्र-निर्यात के व्यवसाय को पाश्चात्य स्वार्थी व्यापारियों ने कई उपायों से नष्ट कर दिया।&lt;br /&gt;
*रत्नों की पहचान और उनमें वेध (छिद्र) करने की क्रिया का ज्ञान 'कला' है। प्राचीन समय से ही अच्छे बुरे रत्नों की पहचान तथा उनके धारण से होनेवाले शुभाशुभ फल का ज्ञान यहाँ के लोगों को था। ग्रहों के अनिष्ट फलों को रोकने के लिये विभिन्न रत्नों को धारण करने का शास्त्रों ने उपदेश किया है। उसके अनुसार रत्नों को धारण करने का फल आज भी प्रत्यक्ष दिखलायी देता है। पर आज तो भारतवर्ष की यह स्थिति है कि अधिकांश लोगों को उन रत्नों का धारण करना तो दूर रहा, दर्शन भी दुर्लभ है। &lt;br /&gt;
*सुवर्ण, रजत आदि के याथात्म्य (असलीपन) का जानना 'कला' है। &lt;br /&gt;
*नकली सोने-चाँदी और हीरे-मोती आदि रत्नों को निर्माण करने का विज्ञान 'कला' है। पुराने कारीगरों की बातें सुनने में आती हैं। वे कई वस्तुओं के योग से ठीक असली-जैसा सोना चाँदी आदि बना सकते थे। अब तो केवल उनकी बातें ही सुनने में आती हैं। रत्न भी प्राचीन काल में नकली बनाये जाते थे। मिश्री से ऐसा हीरा बनाते थे कि अच्छे जौहरी भी उसको जल्दी  नहीं पहचान सकते थे। इससे मालूम होता है कि 'इमिटेशन' हीरा आदि रत्न तथा 'कलचर' मोतियों का आविष्कार पाश्चात्यों ने कुछ नया निकाला हो- यह बात नहीं है। किंतु यह भी मानना ही पड़ेगा कि उस समय इन नकली वस्तुओं का व्यवसाय आजकल की तरह अधिक विस्तृत नहीं था। देश के सम्पन्न होने के कारण उन्हें नकली वस्तुओं से अपनी शोभा बढ़ाने की आवश्यकता ही क्या थी। पर आज की स्थिति कुछ और है, इसी से इन पदार्थों का व्यवहार अधिक बढ़ गया है। &lt;br /&gt;
*सोने-चाँदी के आभूषण बनाना एवं लेप (मुलम्मा) आदि (मीनाकारी) करना 'कला' है। &amp;lt;ref&amp;gt;स्वर्णाद्यलंकारकृति: कलालेपादिसत्कृति:।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*चमड़े को मुलायम करना और उससे आवश्यक उपयोगी समान तैयार करना और &lt;br /&gt;
*पशुओं के शरीर पर से चमड़ा निकालकर अलग करना 'कला' है। &amp;lt;ref&amp;gt;मार्दवादिक्रियाज्ञानं चर्मणां तु कला स्मृता। पशुचर्मांगनिर्हारक्रियाज्ञानं कला स्मृता ॥&amp;lt;/ref&amp;gt; आज तो यह कला भारत के लोगों के हाथ से निकलकर विदेशियों के हाथ में चली गयी हैं यहाँ केवल चर्मकारों के घरों में कुछ अवशिष्ट रही है; किंतु चमड़ों को कमाकर विदेशियों के मुक़ाबले में उन्हें मुलायम करना नहीं जानते। &lt;br /&gt;
*गौ, भैंस आदि को दुहने से लेकर दही ज़माना, मथना, मक्खन निकालना तथा उससे घी बनाने तक की सब क्रियाओं का जानना 'कला' है। इसे पढ़कर हृदय में दु:ख की एक टीस उठ जाती है। वह भारत का सौभाग्य काल कहाँ, जब घर-घर में अनेक गौओं का निवास था, प्रत्येक मनुष्य इस कला से अभिज्ञ होता था, दूध दही की मानो नदियाँ बहती थीं, दूध के पौसरे बैठाये जाते थे- जहाँ लोग पानी की तरह मुफ़्त में दूध पी सकते थें और कहाँ आज का हतभाग्य समय! घी-मक्खन का तो दर्शन दूर रहा, बच्चों को दूधी मिलना कठिन है। कहाँ वह श्रीकृष्ण के समय का व्रज वृन्दावन का दृश्य, और कहाँ आज बड़े-बड़े शहरों के पास बने बूचड़खानों में प्रतिदिन हज़ारों की संख्या मं वध किये जानेवाली गौ माता और उनके बच्चों का करुण क्रन्दन।&lt;br /&gt;
*कुर्ता आदि कपड़ों को सीना 'कला' है- सीवने कञ्चुकादीनां विज्ञानं तु कलात्मकम्।&lt;br /&gt;
*जल में हाथ, पैर आदि अंगों से विविध प्रकार से तैरना 'कला' है। तैरने के साथ-साथ डूबते हुए को कैसे बचाना चाहिये, थका या डूबता हुआ व्यक्ति यदि उसको बचाने के लिये आये व्यक्ति को पकड़ ले, तो वैसी स्थिति में किस तरह उससे  अपने को छुड़ाकर और उसे लेकर किनारे पर पहुँचना चाहिये-इत्यादि बातों का जानना भी बहुत आवश्यक है। &lt;br /&gt;
*घर के बर्तनों को माँजने का ज्ञान 'कला' है। पहले यह काम घर की स्त्रियाँ ही करती थीं, आज भी कई घरों में यही चाल है; परंतु अब बड़े घरानों की स्त्रियाँ इसमें अपना अपमान समझती हैं। &lt;br /&gt;
*वस्त्रों का संमार्जन (अच्छी तरह धोकर साफ करना) 'कला' है। &lt;br /&gt;
*क्षुरकर्म (हजामत बनाना) 'कला' है। आजकल यह बड़ी उन्नति पर है। गंगा-यमुना के घाटों, बाज़ारों में चले जाइये, आपको इस कला का उदाहरण प्रत्यक्ष देखने को मिल जायगा। कोई पढ़ा-लिखा आधुनिक सभ्य पुरुष प्राय: ऐसा न मिलेगा, जिसके आह्निक में अपना 'क्षुरकर्म' सम्मिलित न हो!-वस्त्रसम्मार्जनंचैव क्षुरकर्म ह्युभे कले। &lt;br /&gt;
*तिल, तीसी, रेंड़ी आदि तिलहन पदार्थ और मांसों में से तेल निकालने की कृति 'कला' है। &lt;br /&gt;
*हल चलाना जानना और 49-पेड़ों पर चढ़ना जानना भी 'कला' है। हल चलाना तो कृषि का प्रधान अंग ही है। पेड़ों पर चढ़ना भी एक कला ही है। सभी केवल चाहने मात्र से ही पेड़ों पर चढ़ नहीं सकते। खूजर, ताड़, नारियल, सुपारी आदि के पेड़ों पर चढ़ना कितना कठिन है- इसे देखने वाला ही जान सकता है। इसमें जरा-सी भी असावधानी होने पर मृत्यु यदि न हो तो भी अंग भंग होना मामूली बात है।&lt;br /&gt;
*मनोऽनुकूल (दूसरे की इच्छा के अनुसार उसकी) सेवा करने का ज्ञान 'कला' है। राजसेवक, नौकर, शिष्य आदि के लिये इस कला का जानना परमावश्यक है। इस कला को न जाननेवाला किसी को प्रसन्न नहीं कर सकता। &lt;br /&gt;
*बाँस, ताड़, खजूर, सन आदि से पात्र (टोकरी, झाँपी आदि) बनाना 'कला' है। &lt;br /&gt;
*काँच के बरतन आदि सामान बनाना 'कला' है। मालूम होता है कि यह कला भारत में प्राचीन समय से ही थी, किंतु मध्यकाल में यहाँ से विदेशियों के हाथ में चली गयी। स्त्रियों का सौभाग्य चिह्न चूड़ियाँ तक विदेशों से आने लगीं !&lt;br /&gt;
*जलों से संसेचन (अच्छी तरह खेतों को सींचना) और &lt;br /&gt;
*संहरण (अधिक जलवाली या दलदलवाली भूमि में से जल को बाहर निकाल डालना अथवा दूर से जल को आवश्यक स्थान पर ले आना) 'कला' है। &lt;br /&gt;
*लोहे के अस्त्र-शस्त्र बनाने का ज्ञान 'कला' है। 56-हाथी, घोड़े, बैल और ऊँटों की पीठ-सवारी के उपयुक्त पल्याण (जीन, काठी) बनाना 'कला' है। &lt;br /&gt;
*शिशुओं का संरक्षण (पालन) और 58-धारण (पोषण) करना एवं &lt;br /&gt;
*बच्चों के खेलने के लिये तरह-तरह खिलौने बनाना 'कला' है— शिशो: संरक्षणे ज्ञानं धारणे क्रीडने कला।&lt;br /&gt;
*अपराधियों को उनके अपराध के अनुसार ताड़न (दण्ड देने) का ज्ञान 'कला' है। &lt;br /&gt;
*भिन्न-भिन्न देशों की लिपि को सुन्दरता से लिखना 'कला' है। भारत इस कला में बहुत उन्नत था। ऐसे सुन्दर अक्षर लिखे जाते थे कि उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। लिखने के लिये स्याही भी ऐसी सुन्दर बनती थी कि सैकड़ों वर्षों की लिखी हुई पुस्तकें आज भी नयी-सी मालूम होती हैं। छापने के प्रेस, टाइपराइटर आदि साधनों का उपयोग होता जा रहा है, जिससे लोगों के अक्षर बिगड़ते जा रहे हैं। स्थिति यहाँ तक पहुँची है कि कभी-कभी अपना ही लिखा हुआ अपने से नहीं पढ़ा जाता। पहले यह कला इतनी उन्नत थी कि 'महाभारत-जैसा सवा लाख श्लोकों का बड़ा पोथा आदि से अन्त तक  एक ही साँचे के अक्षरों में लिखा हुआ देखने में आता है। कहीं एक अक्षर भी छोटा-बड़ा नहीं हो पाया है; स्याही भी एक-जैसी ही है- न कहीं गहरी न कहीं पतली। विशेष आश्चर्य तो यह है कि सारी पुस्तक में न तो एक अक्षर ग़लत लिखकर कहीं काटा हुआ है न कहीं कोई धब्बा ही है। &lt;br /&gt;
*पान की रक्षा करना— ऐसा उपाय करना कि जिससे पान बहुत दिनों तक न सूखने पाये, न गले-सड़े, 'कला' है। आज भी बहुत से ऐसे तमोली हैं, जो मगही पान को महीनों तक ज्यों-का-त्यों रखते हैं। इस तरह ये 62 कलाएँ अलग-अलग है; किन्तु दो कलाएँ ऐसी हैं, जिन्हें सब कलाओं का प्राण कहा जा सकता है। यही सब कलाओं के गुण भी कही जा सकती हैं इन दो में पहली है &lt;br /&gt;
*आदान और दूसरी &lt;br /&gt;
*प्रतिदानं किसी काम को करने में आशुकारित्व (जल्दी-फुर्ती से करना) 'आदान' कहा जाता है और उस काम को चिरकाल (बहुत समय) तक हकरते रहना 'प्रतिदान' है। बिना इन दो गुणों के कोई भी कला अधिक उपयुक्त नहीं हो सकती। इस तरह 64 कलाओं का यह संक्षिप्त विवरण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष== &lt;br /&gt;
यह पाठयक्रम कितना व्यापक है! इसमें प्राय: सभी विषयों का समावेश हो जाता है। इसी अंक में अन्यत्र प्रकाशित 'हिन्दू-संस्कृतिका आधार' शीर्षक लेख में जिन 32 विद्याओं का संक्षिप्त वर्णन किया गया है, उनका भी इसी पाठयक्रम में समावेश है। शिक्षा का यह उद्देश्य माना जाता है कि उससे ज्ञान की वृद्धि हो, सदाचार में प्रवृत्ति हो और जीविकोपार्जन में सहायता मिले। इस क्रम में इन तीनों का ध्यान रखा गया है। इतना ही नहीं, पारलौकिक कल्याण भी नहीं छोड़ा गया है। संक्षेप में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थो को ध्यान में रखकर ही शिक्षा का यह क्रम निश्चित किया गया है। इससे पता लगता है कि उस समय-की शिक्षा का आदर्श कितना उच्च तथा व्यावहारिक था। श्री[[कृष्ण]]चन्द्र को इन सभी विषयों की पूरी शिक्षा दी गयी थी और वे प्राय: सभी में प्रवीण थें। [[अर्जुन]] नृत्यकला और [[नल]], [[भीम (पांडव)|भीम]] आदि पाकविद्या में निपुण थें [[परशुराम]], [[द्रोणाचार्य]]-सरीखे ब्राह्मण धनुर्वेद में दक्ष थे। इससे जान पड़ता है कि [[गुरुकुल|गुरुकुलों]] में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों के बालकों को प्राय: इन सभी विषयों की थोड़ी-बहुत शिक्षा दी जाती रही होगी। परंतु इस शिक्षा से ऐसा न हो कि जो काम जिसके जी में आया करने लगा, जैसा कि आजकल होता है- इसका भी ध्यान रखा गया था। क्योंकि ऐसा होने से सारी समाज व्यवस्था ही बिगड़ जाती, श्रेणी-संघर्ष और बेकारी की उत्पत्ति होती, जैसा कि आजकल देखने में आ रहा है। सब मनुष्यों का स्वभाव एक-सा नहीं होता, किसी की प्रवृत्ति किसी ओर तो किसी की किसी ओर होती है। जिसकी जिस ओर प्रवृत्ति है, उसी में अभ्यास करने से कुशलता प्राप्त होती है। इसीलिये शुक्राचार्य ने लिखा है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
यां यां कलां समाश्रित्य निपुणो यो हि मानव:।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
नैपुण्यकरणे सम्यक् तां तां कुर्यात् स एव हि॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वंशागत कला==&lt;br /&gt;
वंशागत कला के सीखने में कितनी सुगमता होती है, यह प्रत्यक्ष है। एक बढ़ई का लड़का बढ़ईगिरी जितनी शीघ्रता और सुगमता के साथ सीखकर उसमें निपुण हो सकता है, उतना दूसरा नहीं, क्योंकि वंश-परम्परा और बालकपन से ही उसके उस कला के योग्य संस्कार बन जाने हैं। इन मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर प्राचीन शिक्षा क्रम की रचना हुई थी। उसमें आजकल की सी धाँधली न थी, जिसका दुष्परिणाम आज सर्वत्र दिखाई पड़ रहा है। प्राय: सभी विषयों में चञ्चुप्रवेश और किसी एक विषय की, जिसमें प्रवृत्ति हो, योग्यता प्राप्त करने से ही पूर्व शिक्षा और यथोचित ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। आज पाश्चात्य विद्वान भी प्रचलित शिक्षा-पद्धति की अनेक त्रुटियों का अनुभव कर रहे हैं; परंतु हम उस दूषित पद्धति की नकल करने की ही धुन में लगे हुए हैं। वर्तमान शिक्षा से लोगों को अपने वंशागत कार्यों से घृणा तथा अरूचि होती चली जा रही है और वे अपने बाप-दादा के व्यवसायों को बड़ी तेजी से छोड़ते चले जा रहे हैं। शिक्षित युवक ऑफिस में छोटी-छोटी नौकरियों के लिये दर-दर दौड़ते हैं, अपमान सहते हैं, दूसरों की ठोकर खाते हैं और जीवन से निराश होकर कई तो आत्मघात कर बैठते हैं। यदि यही क्रम जारी रहा तो पूरा विनाश सामने है। क्या ही अच्छा होता, यदि हमारे शिक्षा-आयोजकों का ध्यान एक बार हमारी प्राचीन शिक्षा-पद्धति की ओर भी जाता।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
* लेखक— पं. श्रीदुर्गादत्तजी त्रिपाठी&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;  &lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{चौंसठ कलाएँ जयमंगल}}{{भूले बिसरे शब्द}}&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:चौंसठ कलाएँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूला-बिसरा भारत]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>आरती पूजन</title>
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		<updated>2011-05-25T10:50:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* विधि */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__पूजा के अंत में हम सभी भगवान की आरती करते हैं। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-River-Aarti.jpg|thumb|250px|आरती, [[गंगा नदी]], [[वाराणसी]]]]&lt;br /&gt;
==अर्थ==&lt;br /&gt;
आरती पूजन के अन्त में इष्टदेवता की प्रसन्नता के हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। यह एक [[देवता]] के गुणों की प्रशंसा गीत है। आरती आम तौर पर एक पूजा या भजन सत्र के अंत में किया जाता है। यह पूजा समारोह के एक भाग के रूप में गाया जाता है। लगभग सभी हिन्दू समारोह और अवसरों पर आरती पूजन किया जाता है। एक ओर जहां आरती मंदिर में प्रदर्शन है वहीं भक्तों को भी यह व्यक्तिगत प्रदर्शन, अपने घर में है। हिन्दू धर्म आरती गाने की एक लंबी परंपरा है और विभिन्न हिन्दू देवताओं के लिए अलग आरतियाँ हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विधि== &lt;br /&gt;
*आरती में पहले मूलमन्त्र (जिस देवता का जिस मन्त्र से पूजन किया गया हो, उस मन्त्र)- के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और [[ढोल]], [[नगाड़े]], [[शंख]], [[घड़ियाल]] आदि महावाद्यों तथा जय-जयकार के शब्द के साथ शुभ पात्र में घृत से या कपूर से विषम संख्या की बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिये। &lt;br /&gt;
*साधारणत: पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे ‘पंचप्रदीप’ भी कहते हैं। एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है। कपूर से भी आरती होती है। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि हम अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह 'पंचारती' कहलाती है।  &lt;br /&gt;
*[[पद्म पुराण]] में आया है- ‘कुंकुम, अगर, कपूर, घृत और चन्दन की सात या पाँच बत्तियाँ बनाकर अथवा रुई और घी की बत्तियाँ बनाकर [[शंख]], [[घण्टा]] आदि बाजे बजाते हुए आरती करनी चाहिए।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अंग==&lt;br /&gt;
आरती के पाँच अंग होते हैं-&lt;br /&gt;
#प्रथम दीप माला के द्वारा, &lt;br /&gt;
#दूसरे जल युक्त शंख से, &lt;br /&gt;
#तीसरे धुले हुए वस्त्र से, &lt;br /&gt;
#चौथे आम और [[पीपल]] आदि के पत्तों से और &lt;br /&gt;
#पाँचवें साष्टांग दण्डवत से आरती करें। &lt;br /&gt;
*आरती उतारते समय सर्वप्रथम भगवान की प्रतिमा के चरणों में चार बार, नाभि देश में दो बार, मुखमण्डल पर एक बार और समस्त अंगों पर सात बार घुमाये।&lt;br /&gt;
==सामग्री का महत्त्व== &lt;br /&gt;
आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं।&lt;br /&gt;
==कलश==&lt;br /&gt;
*कलश एक ख़ास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल ख़ाली होता है। कहते हैं कि इस ख़ाली स्थान में [[शिव]] बसते हैं।&lt;br /&gt;
*यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंति है कि [[समुद्र मंथन]] के समय [[विष्णु]] भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Aarti.jpg|thumb|250px|आरती, [[यमुना नदी]], [[मथुरा]]]]&lt;br /&gt;
==जल==&lt;br /&gt;
जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्त्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।&lt;br /&gt;
==नारियल==&lt;br /&gt;
आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। हम जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफ़ी सूक्ष्म होती हैं।&lt;br /&gt;
==सोना==&lt;br /&gt;
ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। सोने को शुद्ध कहा जाता है। यही वजह है कि इसे भक्तों को भगवान से जोडने का माध्यम भी माना जाता है।&lt;br /&gt;
==तांबे का पैसा==&lt;br /&gt;
तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।&lt;br /&gt;
==सप्त नदियों का जल==&lt;br /&gt;
[[गंगा नदी|गंगा]], [[गोदावरी नदी|गोदावरी]],[[यमुना नदी|यमुना]], [[सिन्धु नदी|सिंधु]], [[सरस्वती नदी|सरस्वती]], [[कावेरी नदी|कावेरी]] और [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। क्योंकि ज़्यादातर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सुपारी और पान==&lt;br /&gt;
यदि हम जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देती हैं और हमारे भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है। पान की बेल को 'नागबेल' भी कहते हैं। नागबेल को भूलोक और ब्रह्मलोक को जोडने वाली कडी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही, इसे सात्विक भी कहा गया है। देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तुलसी==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद में [[तुलसी]] का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।&lt;br /&gt;
==आरती के भाव==&lt;br /&gt;
आरती के दो भाव है जो क्रमश: ‘नीराजन’ और ‘आरती’ शब्द से व्यक्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
#नीराजन (नि:शेषेण राजनं प्रकाशनम)- का अर्थ है- विशेषरूप से, नि:शेष रूप से प्रकाशित करना। अनेक दीप बत्तियाँ जलाकर विग्रह के चारों ओर घुमाने का अभिप्राय यही है कि पूरा-का-पूरा विग्रह एड़ी से चोटी तक प्रकाशित हो उठे-चमक उठे, अंग-प्रत्यंग स्पष्ट रूप से उद्भासित हो जाय, जिसमें दर्शक या उपासक भली-भाँति देवता की रूप-छटा को निहार सके, हृदयंग्म कर सके।&lt;br /&gt;
#दूसरा ‘आरती’ शब्द (जो संस्कृत) के आर्तिका प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है- अरिष्ट। विशेषत: माधुर्य उपासना से संबंधित है।&lt;br /&gt;
==महत्त्व==&lt;br /&gt;
*भगवान के पूजन के अन्त में आरती की जाती है। &lt;br /&gt;
*पूजन में जो त्रुटि रह जाती है, आरती से उसकी पूर्ति हो जाती है। &lt;br /&gt;
*शास्त्रों में आरती का विशेष महत्त्व बताया गया है। &lt;br /&gt;
*पूजन में यदि मन्त्र और क्रिया में किसी प्रकार की कमी रह जाती है तो भी आरती कर लेने पर उसकी पूर्ति हो जाती है। &lt;br /&gt;
*आरती करने का ही नहीं, आरती देखने का भी बहुत बड़ा पुण्य है। जो नित्य भगवान की आरती देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह अपनी करोड़ पीढ़ियों का उद्धार करता है तथा अन्त में भगवान के परम पद को प्राप्त हो जाता है। &lt;br /&gt;
*अत: अत्यन्त ही श्रद्धा-[[भक्ति]] से अपने इष्टदेव की नित्य आरती करनी चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आरती राग में गाने का कारण==&lt;br /&gt;
हमारी प्राचीन परंपरा के अनुसार भगवान को प्रसन्न करने के लिए आरती की जाती है और ये आरती राग में गाई जाती हैं। आरती [[राग]] में ही क्यों गाई जाती हैं? इसके पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही इसका वैज्ञानिक कारण भी है।&lt;br /&gt;
आरती राग में करने के पीछे धार्मिक कारण यही है कि संगीतमय आरती भगवान को भी प्रसन्न कर देती है। सही [[संगीत]] हर स्थिति में मन को सुकून देने वाला ही होता है। हमारे [[धर्म]] ग्रंथों में कई प्रसंग ऐसे आते हैं जहाँ भगवान की प्रार्थना में विभिन्न वाद्ययंत्रों के साथ-साथ उनकी स्तुति को सही [[सुर]] में गाया जाता है। ऐसे स्तुति गान से देवी-देवता तुरंत ही प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है।&lt;br /&gt;
प्रतिदिन प्रात: काल सही सुर-ताल के साथ आरती करना हमारे स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। सही सुर में गायन करने से हमारे शरीर का पूरा सिस्टम प्रभावित होता है। हमें [[ऊर्जा]] मिलती है, [[रक्त]] संचार बढ़ जाता है। आरती गान को [[योगा]] की तरह ही देखा जा सकता है। इससे हमारी आवाज साफ और सुरीली हो जाती है। नियमित आरती करने वाले लोगों की आवाज में अलग ही आकर्षण पैदा हो जाता है। साथ ही गले से संबंधित कई रोग हमेशा दूर ही रहते हैं। इनके अलावा भी कई अन्य स्वास्थ्य संबंधी लाभ हैं। लाभों को देखते हुए ही आरतियां राग में गाने की परंपरा शुरू की गई है। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://religion.bhaskar.com/article/good-effects-of-singing-prayers-1537774.html |title=आरती राग में ही क्यों गाई जाती हैं? |accessmonthday=[[16 फ़रवरी]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=दैनिक भास्कर |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-River-Varanasi-9.jpg|thumb|250px|आरती, [[गंगा नदी]], [[वाराणसी]]]]&lt;br /&gt;
==चरणामृत==&lt;br /&gt;
[[हिन्दू धर्म]] में भगवान की आरती के पश्चात भगवान का चरणामृत दिया जाता है। इस शब्द का अर्थ है भगवान के चरणों से प्राप्त अमृत। अर्थात वह पानी जिसे किसी देवता या महात्मा के चरण धोये गये हों और इसी लिए जो [[अमृत]] के समान पूज्य समझ कर पिया जाता हो। [[दूध]], [[दही]], [[घी]], [[चीनी]] और [[शहद]] का वह मिश्रण जिसमें [[लक्ष्मी]], शालिग्राम आदि को स्नान कराया जाता है। और जो उक्त [[जल]] की भाँति पवित्र समझकर पिया जाता है। हिन्दू धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;dnb&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://religion.bhaskar.com/article/charnamrit-1125357.html |title=चरणामृत सेवन का महत्त्व क्यों? |accessmonthday=[[16 फ़रवरी]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=दैनिक भास्कर |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt; [[गोस्वामी तुलसीदास]] ने श्री [[रामचरितमानस]] में लिखा है -&lt;br /&gt;
;पद पखारि जलुपान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।&amp;lt;ref name=&amp;quot;dnb&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थात भगवान [[श्रीराम]] के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
चरणामृत का महत्त्व सिर्फ़ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है। आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते। इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। ऐसा माना जाता है कि चरणामृत मेधा, बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाता है। रणवीर भक्तिरत्नाकर में चरणामृत की महत्ता प्रतिपादित की गई है -&lt;br /&gt;
;पापव्याधिविनाशार्थं विष्णुपादोदकौषधम्। तुलसीदलसम्मिश्रं जलं सर्षपमात्रकम्।।&amp;lt;ref name=&amp;quot;dnb&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थात पाप और रोग दूर करने के लिए भगवान का चरणामृत औषधि के समान है। यदि उसमें तुलसीपत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधिय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
चरणामृत सेवन करते समय निम्न श्लोक पढऩे का विधान है -&lt;br /&gt;
;अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णुपादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।।&amp;lt;ref name=&amp;quot;dnb&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थात चरणामृत अकाल मृत्यु को दूर रखता है। सभी प्रकार की बीमारियों का नाश करता है। इसके सेवन से पुनर्जन्म नहीं होता।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आरती स्तुति स्त्रोत}}&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्त्रोत]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू संस्कार]] &lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू_धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=165721</id>
		<title>लोकनृत्य</title>
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		<updated>2011-05-25T10:49:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: /* लोक नृत्य की शैलियाँ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Bihu-Dance-Assam.jpg|thumb|250px|[[बिहू नृत्य]], [[असम]] &amp;lt;br /&amp;gt;Bihu Dance, Assam]]&lt;br /&gt;
भारतीय लोकनृत्यों के अंतर्गत अनंत प्रकार के स्वरूप और ताल हैं। इनमें धर्म, व्यवसाय और जाति के आधार पर अन्तर पाया जाता है। मध्य और पूर्वी [[भारत]] की जनजातियाँ (मुरिया, भील, गोंड़, जुआंग और संथाल) सभी अवसरों पर नृत्य करती हैं। जीवन चक्र और ऋतुओं के वार्षिक चक्र के लिए अलग-अलग नृत्य हैं। नृत्य, दैनिक जीवन और धार्मिक अनुष्ठानों का अंग है। बदलती जीवन शैलियों के कारण नृत्यों की प्रासंगिकता विशिष्ट अवसरों से भी आगे पहुँच गई है। नृत्यों ने कलात्मक-नृत्य का दर्जा प्राप्त कर लिया है। प्रत्येक उत्सव या सार्वजनिक आयोजन में इन नृत्यों का दिखाई देना सामान्य बात है। प्रतिवर्ष 26 जनवरी, भारतीय गणतंत्र दिवस एक ऐसा महत्त्वपूर्ण अवसर है, जब नेशनल स्टेडियम के विशाल क्षेत्र और परेड के 8 किलोमीटर लम्बे मार्ग पर नृत्य करने के लिए देश के सभी भागों से नर्तक दिल्ली आते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय लोकनृत्यों का वर्गीकरण करना कठिन है, लेकिन सामान्य तौर पर इन्हें चार वर्गों में रखा जा सकता है। &lt;br /&gt;
*वृत्तिमूलक (जैसे जुताई, बुआई, मछली पकड़ना और शिकार), &lt;br /&gt;
*धार्मिक, &lt;br /&gt;
*आनुष्ठानिक (तांत्रिक अनुष्ठान द्वारा प्रसन्न कर देवी या दानव-प्रेतात्मा के कोप से मुक्ति के लिए) और &lt;br /&gt;
*सामाजिक (ऐसा प्रकार जो उपरोक्त सभी वर्गों में शामिल है)। &lt;br /&gt;
प्रसिद्ध सामाजिक लोकनृत्यों में कोलयाचा (कोलियों का नृत्य) शामिल है। पश्चिमी [[भारत]] के कोंकण तट के मछुआरों के मूल नृत्य कोलयाचा में नौकायन की भावभंगिमा दिखाई जाती है। महिलाएँ अपने पुरुष साथियों की ओर रुमाल लहराती हैं और पुरुष थिरकती चाल के साथ आगे बढ़ते हैं। विवाह के अवसर पर युवा कोली (मछुआरे) नवदंम्पति के स्वागम में घरेलू बर्तन हाथ में पकड़कर गलियों में नृत्य करते हैं और नृत्य के चरम पर पहुँचते ही नवदंम्पति भी नाचने लगते हैं। &lt;br /&gt;
==लोक नृत्य की तकनीक और इसके प्रकार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ghoomar-Dance.jpg|thumb|250px|[[घूमर नृत्य]], [[राजस्थान]] &amp;lt;br /&amp;gt;Ghoomar Dance, Rajasthan]]&lt;br /&gt;
घूमर [[राजस्थान]] का सामाजिक लोकनृत्य है। महिलाएँ लम्बे घाघरे और रंगीन चुनरी पहनकर नृत्य करती  हैं। इस क्षेत्र के कच्ची घोड़ी नर्तक विशेष तौर पर दर्शनीय है। ढाल और लम्बी तलवारों से लैस नर्तकों का ऊपरी भाग दूल्हे की पारम्परिक वेशभूषा में रहता है और निचले भाग को बाँस के ढाँचे पर काग़ज़  की लुगदी से बने घोड़े से ढका जाता है। नर्तक, शादियों और उत्सवों पर बरेछेबाज़ी का मुक़ाबला करते हैं। बावरी लोग लोकनृत्य की इस शैली के कुशल कलाकार हैं। पंजाब क्षेत्र में सबसे अधिक जोशीला लोकनृत्य फ़सल कटाई के अवसर पर भांगड़ा है, जो [[भारत]]-[[पाकिस्तान]] सीमा के दोनों ओर किया जाता है और लोकप्रिय भी है। इस नृत्य के साथ-साथ गीत गाया जाता है। प्रत्येक पंक्ति की समाप्ति पर ढोल गूँजता है और अन्तिम पंक्ति सभी नर्तक मिलकर गाते हैं। भांगड़ा के हर्षोन्माद का नृत्य है, जिसमें हर आयु के पुरुष नाचते हैं। वे मस्ती में चिल्लाते और गोलाई में घूमते हुए नृत्य करते हैं और उनके कंधे और कूल्हे ढोल की लय पर थिरकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;आंध्र प्रदेश का नृत्य&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[आंध्र प्रदेश]] की लंबाड़ी जनाजाति की ख़ानाबदोश महिलाएँ शीशों से जड़े शिरोवस्त्र और घाघरे पहनती हैं और अपनी बाजू चौड़े सफ़ेद हड्डियों के बने कंगनों से ढकती हैं। वे धीरे-धीरे झूमते हुए नृत्य करती हैं। जबकि पुरुष ढोल बजाने और गाने का काम करते हैं। उनका सामाजिकेनृत्य आवेगपूर्ण शोभा और गीतिमयता से ओतप्रोत होता है और यह विश्व के अन्य भागों के बंजारों के नृत्य से अपेक्षाकृत कम प्रचंड होता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kuchipudi-Dance.jpg|thumb|left|[[कुची पुडी नृत्य]], [[आंध्र प्रदेश]] &amp;lt;br /&amp;gt;Kuchipudi Dance, Andhra Pradesh]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;मध्य प्रदेश का नृत्य&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[मध्य प्रदेश]] में मुरिया जनजाति का गवल-सींग (पहाड़ी भैंसा) नृत्य पुरुषों और महिलाओं, दोनों के द्वारा किया जाता है। जो पारम्परिक तौर पर बराबरी का जीवन व्यतीत करते हैं। पुरुष सींग से जड़े शिरोवस्त्र गुच्छेदार पंख के साथ पहनते हैं और उनके चेहरों पर कौड़ी की झालर लटकती है। उनके गले में लकड़ी के लट्ठ जैसा ढोल लटकता है। महिलाओं के सिर चौड़ी ठोस पीतल की माला से और सीना भारी धातु के गहनों से ढके होते हैं और उनके हाथों में ढोल जैसे मंजीरे होते हैं। 50 से 100 की संख्या में स्त्री व पुरुष मिलकर नृत्य करते हैं। गवल (बाइसन) के वेश में पुरुष एक-दूसरे पर हमला करते व लड़ते हैं और सींगों से पत्तों को उड़ाते हुए वे प्रकृति के मिलन के मौसम की गतिशील अभिव्यक्ति करते हुए नृत्यांगनाओं का पीछा करते हैं। उड़ीसा में जुआंग जनजाति सशक्त पौरुषपूर्ण फुर्ती के साथ पक्षियों और पशुओं का नृत्य बड़े सजीव अभिनय के साथ करती हैं, धार्मिक लोकनृत्यों के कुछ प्रमुख उदाहरण हैः [[महाराष्ट्र]] के डिंडी और काला नृत्य, जो धार्मिक उल्लास की अभिव्यक्ति है। नर्तक गोल चक्कर में घूमते हैं और छोटी लाठियाँ (डिंडी) ज़मीन पर मारते हुए समूहगान के मुख्य गायक बीचों बीच खड़े ढोल वादक का साथ देते हैं। लय में तेज़ी आते ही नर्तक दो पक्तियाँ बना लेते हैं और दांय पाँव को झुकाकर बांए पाँव के साथ आगे बढ़ते हैं और इस प्रकार ज्यामिति के आकार बनाते हैं। काला नृत्य में एक बर्तन में दही होना ज़रूरी है, जो उर्वरता का प्रतीक है। नर्तकों का समूह दो वृत्त बनाता है। जिसमें एक नर्तक के ऊपर दूसरा नर्तक होता है। एक पुरुष इन दोनों वृत्तों के ऊपर चढ़कर ऊपर लटकी दही की मटकी फोड़ता है। जिसमें दही नर्तकों  के शरीर पर फैल जाता है। इस आनुष्ठानिक शुरूआत के बाद नर्तक जबरदस्त रण नृत्य की मुद्रा में अपनी लाठियाँ और तलवारें घुमाते हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;गुजरात का नृत्य&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Garba-Dance.jpg|thumb|250px|[[गरबा नृत्य]], [[गुजरात]] &amp;lt;br /&amp;gt;Garba Dance., Gujarat]]&lt;br /&gt;
गरबा, जो वास्तव में एक धार्मिक हंडिया को कहते हैं, गुजरात का सुप्रसिद्ध धार्मिक नृत्य है। यह नवरात्रि के नौ दिन के वार्षिक उत्सव के दौरान 50 से 100 महिलाओं के समूह द्वारा देवी अंबा के सम्मान में किया जाता है। जिन्हें [[भारत]] के अन्य भागों में दुर्गा या काली के नाम से जाना जाता है। महिलाएँ गोल चक्कर में घूमते हुए झुकती, मुड़ती, हाथों से तालियाँ और कभी-कभी अंगुलियों से चुटकी बजाती हैं। इस नृत्य के साथ देवी की स्तुति में गीत भी गाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;तमिलनाडु राज्य का नृत्य&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े लोकनृत्यों की अनंत शैलियों में कई का चमत्कारिक महत्त्व है और ये पुरातन उपासना से जुड़ी हैं। तमिलनाडु राज्य का काराकम नृत्य मुख्यतः मरियम्मई (महामारी की देवी) की प्रतिमा के समक्ष वार्षिक उत्सव पर देवी से महामारी का प्रकोप न फैलाने की प्रार्थना के साथ किया जाता है। नर्तक के सिर पर लम्बे बाँस के ढांचे से ढके कच्चे चावल का बर्तन रखा जाता है। जिसे नर्तक को नृत्य की उछल-कूद के दौरान बिना छुए सम्भाले रखना होता है। लोग इसे देवी की कृपा मानते हैं और कहते हैं कि नर्तक के शरीर में देवी प्रवेश करती है। जिसके कारण यह चमत्कार होता है। केरल में हिन्दुओं के पूज्य देवों तथा दानवों को प्रसन्न करने के लिए थेरयाट्टम उत्सव आयोजित किया जाता है। विस्मयकारी वेशभूषा और मुखौटों से लैस नर्तक गाँव के पूजा स्थल के सामने अनोखा अनुष्ठान करते हैं। एक श्रृद्धालु मुर्गे की भेंट चढ़ाता है। जिसे नर्तक झपट लेता है और एक ही झटके में उसका सिर अलग कर देता है व आशीर्वाद देते हुए उसे श्रृद्धालु का लौटा देता है। इस समारोह के साथ लम्बा और मंथर नृत्य चलता रहता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Manipuri-Dance.jpg|thumb|left|[[मणिपुरी नृत्य]], [[मणिपुर]] &amp;lt;br /&amp;gt;Manipuri Dance, Manipur]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;अरुणाचल प्रदेश का नृत्य&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[अरुणाचल प्रदेश]] (भूतपूर्व पूर्वोत्तर फ्रंटियर एजेंसी 'नेफा') में सबसे ज़्यादा मुखौटा नृत्य किए जाते हैं। यहाँ [[तिब्बत]] की नृत्य शैलियों का प्रभाव दिखाई देता है। याक नृत्य [[कश्मीर]] के [[लद्दाख]] क्षेत्र और असम के निकट [[हिमालय]] के दक्षिणी सीमावर्ती क्षेत्रों में किया जाता है। याक का रूप धारण किए नर्तक अपनी पीठ पर चढ़े आदमी को साथ लिए नृत्य करता है। मुखौटों के साथ किए जाने वाले लोकनृत्य सादा टोपोत्सेन में  पुरुष नर्तक भड़कीले ज़रीदार रेशम के लम्बे कुरते पहनते हैं। जिनकी चौड़ी झूलती बाहें होती हैं। वे अजीबो ग़रीब मुस्कान वाले लकड़ी के मुखौटे पहनते हैं। जिन पर खोपड़ियों का मुकुट होता है। जो परलोक की आत्माओं का प्रतिनिधित्व करती है। नर्तक बीच-बीच में कूदते हुए ताकतवर लेकिन धीमी चक्करदार मुद्राएँ बनाते हैं। मुखौटा नृत्य की एक अनूठी शैली छऊ को झारखंड (भूतपूर्व बिहार) के पूर्व—सरायकेला रियासत के एक शाही परिवार ने संरक्षित रखा है। नर्तक भगवान, पशु, पक्षी, शिकारी, इन्द्रधनुष, रात या फूल का रूप धारण करता है। वह एक छोटे प्रसंग का अभिनय करता है और अप्रैल में वार्षिक चैत्र उत्सव में कई भावचित्रों की एक लड़ी प्रस्तुत करता है। छऊ मुखौटे अधिकांशतः मानवीय लक्षणों से युक्त होते हैं। जिन्हें विविध भाव दिखाने के लिए थोड़ा-बहुत परावर्तित किया जाता है। साधारण सपाट रंगों में चित्रित मुखौटों की शान्त अभिव्यक्ति कथकली के व्यापक रूप श्रृंगार या कांडयान मुखौटों की ज़रूरत से ज़्यादा पिशाचीय आकृति और जापान के 'नो ड्रामा' से बहुत अलग दिखती है। चूंकि छऊ नर्तक का चेहरा भावहीन होता है, इसलिए उसका शरीर ही पात्र के सम्पूर्ण भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक तनावों को व्यक्त करता है। उसके पाँव भंगिमा-भाषा का प्रयोग करते हैं। उसके पंजे पशु के पंजों की तरह फुर्तीले, सक्रिय और भावाबोधक होते हैं। नृत्य के दौरान गायन नहीं होता, सिर्फ़ वाद्य संगीत होता है। उड़ीसा के मयूरभंज ज़िले में किए जाने वाले छऊ नृत्य की एक अन्य शैली में नर्तक मुखौटे नहीं पहनते, परन्तु जान-बूझकर सख़्त और अचल चेहरे बनाकर मुखौटे का भ्रम देते हैं। उनका नृत्य श्रम और करतब से भरा होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लोक नृत्य की शैलियाँ==&lt;br /&gt;
भारत की प्राचीन संस्कृति ने, लोक नृत्यों के विभिन्न स्वरूपों को जन्म दिया है। संस्कृति व परंपराओं की विविधता लोक नृत्यों में साफ झलकती है। विभिन्न राज्यों के इन नृत्यों  में जीवन का प्रतिबिंब है और नृत्यं की लगभग हर मुद्रा का विशिष्ट अर्थ होता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bhangra.jpg|thumb|250px|[[भांगड़ा नृत्य|भांगड़ा]], [[पंजाब]] &amp;lt;br /&amp;gt;Bhangra., Punjab]]&lt;br /&gt;
*[[भांगड़ा नृत्य|भांगड़ा]]&lt;br /&gt;
*[[भोरताल नृत्य|भोरताल]] &lt;br /&gt;
*[[भवई नृत्य|भवई]]&lt;br /&gt;
*[[बिहू नृत्य|बिहू]]&lt;br /&gt;
*[[गरबा नृत्य|गरबा]]&lt;br /&gt;
*[[कुम्मी नृत्य|कुम्मी]]&lt;br /&gt;
*[[पोइक्‍कल कुदीराई अट्टम नृत्य|पोइक्‍कल कुदीराई अट्टम]]&lt;br /&gt;
*[[देवरत्तनम नृत्य|देवरत्तनम]]&lt;br /&gt;
*[[थबल छोंगबा नृत्य|थबल छोंगबा]]&lt;br /&gt;
*[[छाऊ नृत्य|छाऊ]]&lt;br /&gt;
*[[जात्रा नृत्य|जात्रा]]&lt;br /&gt;
*[[चेरा नृत्य|चेरा]]&lt;br /&gt;
*[[नाटी नृत्य|नाटी]]&lt;br /&gt;
*[[लुड्डी नृत्य|लुड्डी]]&lt;br /&gt;
*[[गडबा नृत्य|गडबा]]&lt;br /&gt;
*[[घुरई नृत्य|घुरई]]&lt;br /&gt;
*[[झमाकड़ा नृत्य|झमाकड़ा]]&lt;br /&gt;
*[[सिंघी छम नृत्य|सिंघी छम]]&lt;br /&gt;
*[[रउफ नृत्य|रउफ]]&lt;br /&gt;
*[[घूमर नृत्य|घूमर]]&lt;br /&gt;
*[[पण्डवानी नृत्य|पण्डवानी]]&lt;br /&gt;
*[[विदेशिया नृत्य|विदेशिया]]&lt;br /&gt;
[[रासलीला]], लोकनृत्य की प्रमुख विधा के अलावा चैत्र तथा अश्विनी मास की नवरात्रियों में महिलाओं के लांगुरिया नृत्य होते हैं । इसके दौरान महिलायें लांगुरिया गाती हैं और मध्य में एक महिला द्वारा अनेक मुद्राजन नृत्य का प्रदर्शन होता है । ग्रामीण अंचल में होली के दूसरे दिन से बासोड़ा या संवत्सर प्रतिपदा तक हुरंगा नृत्य चलता है । इसमें ग्राम के थोकों के अनुसार स्त्री–पुरुष सायंकाल एकत्रित होकर होली गाते हुए नृत्य करते हैं । नृत्य में युवा स्त्री–पुरुष ही नाचते हैं । शेष सभी आयु के स्त्री–पुरुष गायन वादन करते हैं । वादन में [[नगाड़ा|नगाड़े]], [[ढप]], [[ढोल]], [[खंजरी]]' [[बांसुरी]], [[अलगोजा]], [[बम]], [[चंग]], [[उपंग]] [[मोचंग]], [[ढपली]] आदि वाद्यों का प्रयोग होता है । हुरंगा नृत्य में [[दाऊजी]] का हुरंगा प्रसिद्ध है । [[वल्लभ संप्रदाय|वल्लभ सम्प्रदाय]] के मंदिरों में [[बसंत पंचमी]] से चैत्र कृष्ण द्वितीया तक ढ़ाढा–ढाढ़ी नृत्य का आयोजन होता है । यह नृत्य सायंकाल के समय श्री ठाकुरजी के सामने शयन के दर्शनों में होता है । कलाविद् स्त्री–पुरुष वेष में रसिया और [[धमार]] पद गायन के साथ अलग–अलग अपना नृत्य प्रदर्शित कर दर्शकों को भावविभोर कर देते हैं । इस नृत्य की परम्परा में [[मथुरा]] का [[द्वारिकाधीश मन्दिर मथुरा|श्री द्वारिकाधीश मंदिर]] अग्रणी है ।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
नृसिंह नृत्य वैशाख शुक्ला चतुर्दशी को सूर्यास्त या पूर्णिमा की प्रात: बेला में होता है । नृसिंह बनने वाले कलाकार को उस दिन व्रत रखना पड़ता है और नर्तक नृसिंह वेश तथा चेहरे को पहनता है । अन्य सभी [[तबला]] [[घण्टा]], घड़ियाल, [[झांझ]] आदि बाजे एक विशिष्ट स्वर ताल में बजाते हैं , जिनके बोल 'जै नृसिंह, जै नृसिंह जै, जै, जै, जै, जै नृसिंह जै जै जै भई जै जै जै, हिरनाकुस मार्यो तुही तुही–नर्सिहा नरचै थेई थेई' है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसे नृसिंह नृत्य न कहकर नृसिंह लीला भी कहा जाता है , जिसका सम्बन्ध हिरण्यकश्यप द्वारा प्रहलाद जी को सताये जाने से लेकर हिरण्यकश्यप की पुरानी कथा से है । यह नृत्य विशेष कर मथुरा नगर के द्वारकाधीश मंदिर, नृसिंह बगीची भूतेश्वर, गोलपाड़ा, मानिक चौक, स्वामी घाट, कुआं गली, सतघड़ा में होता है । इनके अतिरिक्त विवाहों के दौरान विभिन्न जातियों के नृत्यों का भी जनपद में चलन है । इनमें 'माँढयौ जगानौ', 'ललमनिया भैरो' नृत्य सहित कुछ अन्य नृत्य भी शामिल हैं।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{नृत्य कला}}&lt;br /&gt;
[[Category:कला_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:लोक नृत्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:नृत्य कला]]&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>साँचा:नेहरू परिवार</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
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		<title>साँचा:स्वतन्त्रता सेनानी</title>
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		<updated>2011-05-25T10:45:18Z</updated>

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[[अबुलकलाम आज़ाद]]  &lt;br /&gt;
[[अम्बिका चक्रवर्ती]]&lt;br /&gt;
[[इंदिरा गाँधी]]  &lt;br /&gt;
[[कमला नेहरू]]  &lt;br /&gt;
[[अरबिंदो घोष]]  &lt;br /&gt;
[[कमलादेवी चट्टोपाध्याय]]  &lt;br /&gt;
[[कस्तूरबा गाँधी]]  &lt;br /&gt;
[[ख़ान अब्दुलगफ़्फ़ार ख़ान]]  &lt;br /&gt;
[[खुदीराम बोस]]  &lt;br /&gt;
[[गोविंद बल्लभ पंत]]  &lt;br /&gt;
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[[अमर शहीद ऊधम सिंह|ऊधम सिंह]]  &lt;br /&gt;
[[जवाहरलाल नेहरू]]  &lt;br /&gt;
[[बाल गंगाधर तिलक]]  &lt;br /&gt;
[[महात्मा गाँधी]]  &lt;br /&gt;
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[[राजेन्द्र प्रसाद]]  &lt;br /&gt;
[[वीर सावरकर]]  &lt;br /&gt;
[[विनोबा भावे]]  &lt;br /&gt;
[[दुर्गा भाभी]]  &lt;br /&gt;
[[सरोजिनी नायडू]]  &lt;br /&gt;
[[भगतसिंह]]  &lt;br /&gt;
[[सुखदेव]]  &lt;br /&gt;
[[सुभाष चंद्र बोस]]  &lt;br /&gt;
[[लाला लाजपत राय]]  &lt;br /&gt;
[[विपिन चन्द्र पाल]]  &lt;br /&gt;
[[जयप्रकाश नारायण]]  &lt;br /&gt;
[[सरदार पटेल|सरदार वल्लभ भाई पटेल]]  &lt;br /&gt;
[[मदनमोहन मालवीय]]  &lt;br /&gt;
[[विजयलक्ष्मी पण्डित]]  &lt;br /&gt;
[[सुशीला दीदी]]  &lt;br /&gt;
[[गणेशशंकर विद्यार्थी]]  &lt;br /&gt;
[[भगवान दास|भगवान दास]]  &lt;br /&gt;
[[चक्रवर्ती राजगोपालाचारी]]  &lt;br /&gt;
[[बिधान चंद्र राय]]  &lt;br /&gt;
[[एनी बेसेंट]]  &lt;br /&gt;
[[सुभद्रा कुमारी चौहान]]  &lt;br /&gt;
[[दादा भाई नौरोजी]]  &lt;br /&gt;
[[जगजीवन राम]]  &lt;br /&gt;
[[राम मनोहर लोहिया]]  &lt;br /&gt;
[[तिलका माँझी]]  &lt;br /&gt;
[[चौधरी देवी लाल]]  &lt;br /&gt;
[[अरुणा आसफ़ अली]]  &lt;br /&gt;
[[प्रफुल्लचंद चाकी]]  &lt;br /&gt;
[[चित्तरंजन दास]]  &lt;br /&gt;
[[बंसीलाल]]  &lt;br /&gt;
[[गोपाल कृष्ण गोखले]]  &lt;br /&gt;
[[जगतराम]]&lt;br /&gt;
[[लाला हरदयाल]]&lt;br /&gt;
[[हंसा मेहता]]&lt;br /&gt;
[[जगबंधु बख्शी]]&lt;br /&gt;
[[गणेश दामोदर सावरकर]]&lt;br /&gt;
[[बटुकेश्वर दत्त]]&lt;br /&gt;
[[चिदंबरम पिल्लई]]&lt;br /&gt;
[[गंगाधर अधिकारी]]&lt;br /&gt;
[[चन्द्रभानु गुप्त]]&lt;br /&gt;
[[कुलाधर चालिहा]]&lt;br /&gt;
[[जगत नारायण लाल]]&lt;br /&gt;
[[फ़ीरोज़ गाँधी]]&lt;br /&gt;
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}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:संगीत के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा</title>
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		<updated>2011-05-21T12:00:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: जे. आर. डी. टाटा को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT[[जे. आर. डी. टाटा]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>जे. आर. डी. टाटा</title>
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		<updated>2011-05-21T11:58:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: Adding category :Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:J.R.D-Tata.jpg|thumb|200px| जे. आर. डी. टाटा&amp;lt;br /&amp;gt;J. R. D-Tata]]&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा''' (जन्म- [[29 जुलाई]], [[1903]], पेरिस, [[फ़्राँस]]; मृत्यु- [[29 नवम्बर]], [[1993]], जिनेवा, स्विट्ज़रलैण्ड]] [[भारत]] के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाली औद्योगिक हस्तियों में जे. आर. डी. टाटा का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने ही देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेना टाटा एयरलाइंस शुरू की थी जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानसेवा एयर इंडिया बन गई। '''इस कारण जे. आर. डी. टाटा को भारत के नागरिक उड्डयन का पिता भी कहा जाता है।'''&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
कुशल विमान चालक जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 ई. में पेरिस में हुआ था। यह रतनजी दादाभाई टाटा व उनकी [[फ़्रांसीसी]] पत्नी सुजैन ब्रियरे की दूसरी संतान थे। उनके पिता भारत के अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई थे। जे. आर. डी. टाटा की माँ फ़्रांसीसी थीं इसलिए उनके बचपन का ज़्यादातर वक्त फ़्राँस में बीता, इसलिए फ्रेंच उनकी पहली [[भाषा]] थी। उन्होंने कैथेडरल और जॉन कोनोन स्कूल [[मुंबई]] में अपनी पढ़ाई पूरी की। जे. आर. डी. ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। मात्र 34 वर्ष की आयु में वे टाटा संस के चेयरमैन बने। दशकों तक उन्होंने विशालकाय टाटा समूह की कंपनियों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपनी पैतृक कम्पनी के अध्यक्ष पद पर पहुँचने से पहले सबसे नीचे स्तर से काम सम्भालना सीखा। इस प्रकार उन्हें अपने उद्योग के विभिन्न समूहों को समझने का अवसर मिला। इसी जानकारी से वे उद्योग को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने में सफल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा उसूलों के बेहद पक्के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार में सफलता के साथ-साथ उच्च नैतिक मानदंडों को भी कायम रखा। उनकी अध्यक्षता में टाटा समूह ने नई बुलंदियों को छुआ। उनके काल में टाटा समूह की कंपनियों की संख्या 15 से बढ़कर 100 से ज़्यादा हो गई। साथ ही टाटा समूह की परिसंपत्ति 62 करोड़ से बढ़कर 10 हज़ार करोड़ की हो गई।&lt;br /&gt;
==टाटा एयरलाइंस कम्पनी==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. पहले शख्स थे जिन्हें वर्ष [[1929]] में भारत में पहला पायलट लाइसेंस मिला। उड्डयन क्षेत्र की अग्रणी हस्ती लुईस ब्लेरियोट की प्रेरणा से उन्होंने [[1932]] में भारत की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की। कम्पनी के विमान की [[मुम्बई]] और कराची के बीच की पहली उड़ान के विमान चालक वे स्वयं ही थे। [[1953]] में विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने के बाद ये एयर इंडिया के अध्यक्ष बने। सरकार ने इन्हें अनेक उद्योगों की सलाहकार समितियों में रखा। &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा  को वर्ष [[1954]] में फ़्राँस सरकार ने 'लेजियन डी ऑनर' के खिताब से नवाजा गया। उन्हें उद्योग तथा राष्ट्र निर्माण में बेहतरीन योगदान के लिए वर्ष [[1992]] में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अनेक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित जे. आर. डी. टाटा का 89 वर्ष की आयु में वर्ष [[29 नवम्बर]], [[1993]] में जिनेवा (स्विट्ज़रलैण्ड) में निधन हो गया। मरणोपरांत उन्हें पेरिस में दफ़नाया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्न}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उद्योगपति और व्यापारी]]&lt;br /&gt;
[[Category:वाणिज्य व्यापार कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत रत्न सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>जे. आर. डी. टाटा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: Adding category :Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:J.R.D-Tata.jpg|thumb|200px| जे. आर. डी. टाटा&amp;lt;br /&amp;gt;J. R. D-Tata]]&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा''' (जन्म- [[29 जुलाई]], [[1903]], पेरिस, [[फ़्राँस]]; मृत्यु- [[29 नवम्बर]], [[1993]], जिनेवा, स्विट्ज़रलैण्ड]] [[भारत]] के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाली औद्योगिक हस्तियों में जे. आर. डी. टाटा का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने ही देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेना टाटा एयरलाइंस शुरू की थी जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानसेवा एयर इंडिया बन गई। '''इस कारण जे. आर. डी. टाटा को भारत के नागरिक उड्डयन का पिता भी कहा जाता है।'''&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
कुशल विमान चालक जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 ई. में पेरिस में हुआ था। यह रतनजी दादाभाई टाटा व उनकी [[फ़्रांसीसी]] पत्नी सुजैन ब्रियरे की दूसरी संतान थे। उनके पिता भारत के अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई थे। जे. आर. डी. टाटा की माँ फ़्रांसीसी थीं इसलिए उनके बचपन का ज़्यादातर वक्त फ़्राँस में बीता, इसलिए फ्रेंच उनकी पहली [[भाषा]] थी। उन्होंने कैथेडरल और जॉन कोनोन स्कूल [[मुंबई]] में अपनी पढ़ाई पूरी की। जे. आर. डी. ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। मात्र 34 वर्ष की आयु में वे टाटा संस के चेयरमैन बने। दशकों तक उन्होंने विशालकाय टाटा समूह की कंपनियों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपनी पैतृक कम्पनी के अध्यक्ष पद पर पहुँचने से पहले सबसे नीचे स्तर से काम सम्भालना सीखा। इस प्रकार उन्हें अपने उद्योग के विभिन्न समूहों को समझने का अवसर मिला। इसी जानकारी से वे उद्योग को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने में सफल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा उसूलों के बेहद पक्के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार में सफलता के साथ-साथ उच्च नैतिक मानदंडों को भी कायम रखा। उनकी अध्यक्षता में टाटा समूह ने नई बुलंदियों को छुआ। उनके काल में टाटा समूह की कंपनियों की संख्या 15 से बढ़कर 100 से ज़्यादा हो गई। साथ ही टाटा समूह की परिसंपत्ति 62 करोड़ से बढ़कर 10 हज़ार करोड़ की हो गई।&lt;br /&gt;
==टाटा एयरलाइंस कम्पनी==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. पहले शख्स थे जिन्हें वर्ष [[1929]] में भारत में पहला पायलट लाइसेंस मिला। उड्डयन क्षेत्र की अग्रणी हस्ती लुईस ब्लेरियोट की प्रेरणा से उन्होंने [[1932]] में भारत की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की। कम्पनी के विमान की [[मुम्बई]] और कराची के बीच की पहली उड़ान के विमान चालक वे स्वयं ही थे। [[1953]] में विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने के बाद ये एयर इंडिया के अध्यक्ष बने। सरकार ने इन्हें अनेक उद्योगों की सलाहकार समितियों में रखा। &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा  को वर्ष [[1954]] में फ़्राँस सरकार ने 'लेजियन डी ऑनर' के खिताब से नवाजा गया। उन्हें उद्योग तथा राष्ट्र निर्माण में बेहतरीन योगदान के लिए वर्ष [[1992]] में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अनेक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित जे. आर. डी. टाटा का 89 वर्ष की आयु में वर्ष [[29 नवम्बर]], [[1993]] में जिनेवा (स्विट्ज़रलैण्ड) में निधन हो गया। मरणोपरांत उन्हें पेरिस में दफ़नाया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्न}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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[[Category:उद्योगपति और व्यापारी]]&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: Adding category :Category:भारत रत्न सम्मान (Redirect :Category:भारत रत्न resolved) (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा''' (जन्म- [[29 जुलाई]], [[1903]], पेरिस, [[फ़्राँस]]; मृत्यु- [[29 नवम्बर]], [[1993]], जिनेवा, स्विट्ज़रलैण्ड]] [[भारत]] के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाली औद्योगिक हस्तियों में जे. आर. डी. टाटा का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने ही देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेना टाटा एयरलाइंस शुरू की थी जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानसेवा एयर इंडिया बन गई। '''इस कारण जे. आर. डी. टाटा को भारत के नागरिक उड्डयन का पिता भी कहा जाता है।'''&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
कुशल विमान चालक जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 ई. में पेरिस में हुआ था। यह रतनजी दादाभाई टाटा व उनकी [[फ़्रांसीसी]] पत्नी सुजैन ब्रियरे की दूसरी संतान थे। उनके पिता भारत के अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई थे। जे. आर. डी. टाटा की माँ फ़्रांसीसी थीं इसलिए उनके बचपन का ज़्यादातर वक्त फ़्राँस में बीता, इसलिए फ्रेंच उनकी पहली [[भाषा]] थी। उन्होंने कैथेडरल और जॉन कोनोन स्कूल [[मुंबई]] में अपनी पढ़ाई पूरी की। जे. आर. डी. ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। मात्र 34 वर्ष की आयु में वे टाटा संस के चेयरमैन बने। दशकों तक उन्होंने विशालकाय टाटा समूह की कंपनियों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपनी पैतृक कम्पनी के अध्यक्ष पद पर पहुँचने से पहले सबसे नीचे स्तर से काम सम्भालना सीखा। इस प्रकार उन्हें अपने उद्योग के विभिन्न समूहों को समझने का अवसर मिला। इसी जानकारी से वे उद्योग को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने में सफल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा उसूलों के बेहद पक्के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार में सफलता के साथ-साथ उच्च नैतिक मानदंडों को भी कायम रखा। उनकी अध्यक्षता में टाटा समूह ने नई बुलंदियों को छुआ। उनके काल में टाटा समूह की कंपनियों की संख्या 15 से बढ़कर 100 से ज़्यादा हो गई। साथ ही टाटा समूह की परिसंपत्ति 62 करोड़ से बढ़कर 10 हज़ार करोड़ की हो गई।&lt;br /&gt;
==टाटा एयरलाइंस कम्पनी==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. पहले शख्स थे जिन्हें वर्ष [[1929]] में भारत में पहला पायलट लाइसेंस मिला। उड्डयन क्षेत्र की अग्रणी हस्ती लुईस ब्लेरियोट की प्रेरणा से उन्होंने [[1932]] में भारत की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की। कम्पनी के विमान की [[मुम्बई]] और कराची के बीच की पहली उड़ान के विमान चालक वे स्वयं ही थे। [[1953]] में विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने के बाद ये एयर इंडिया के अध्यक्ष बने। सरकार ने इन्हें अनेक उद्योगों की सलाहकार समितियों में रखा। &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा  को वर्ष [[1954]] में फ़्राँस सरकार ने 'लेजियन डी ऑनर' के खिताब से नवाजा गया। उन्हें उद्योग तथा राष्ट्र निर्माण में बेहतरीन योगदान के लिए वर्ष [[1992]] में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अनेक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित जे. आर. डी. टाटा का 89 वर्ष की आयु में वर्ष [[29 नवम्बर]], [[1993]] में जिनेवा (स्विट्ज़रलैण्ड) में निधन हो गया। मरणोपरांत उन्हें पेरिस में दफ़नाया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:उद्योगपति और व्यापारी]]&lt;br /&gt;
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[[मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया]]   &lt;br /&gt;
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[[सरदार पटेल|सरदार वल्लभ भाई पटेल]]  &lt;br /&gt;
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		<title>जे. आर. डी. टाटा</title>
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{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा''' (जन्म- [[29 जुलाई]], [[1903]], पेरिस, [[फ़्राँस]]; मृत्यु- [[29 नवम्बर]], [[1993]], जिनेवा, स्विट्ज़रलैण्ड]] [[भारत]] के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाली औद्योगिक हस्तियों में जे. आर. डी. टाटा का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने ही देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेना टाटा एयरलाइंस शुरू की थी जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानसेवा एयर इंडिया बन गई। '''इस कारण जे. आर. डी. टाटा को भारत के नागरिक उड्डयन का पिता भी कहा जाता है।'''&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
कुशल विमान चालक जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 ई. में पेरिस में हुआ था। यह रतनजी दादाभाई टाटा व उनकी [[फ़्रांसीसी]] पत्नी सुजैन ब्रियरे की दूसरी संतान थे। उनके पिता भारत के अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई थे। जे. आर. डी. टाटा की माँ फ़्रांसीसी थीं इसलिए उनके बचपन का ज़्यादातर वक्त फ़्राँस में बीता, इसलिए फ्रेंच उनकी पहली [[भाषा]] थी। उन्होंने कैथेडरल और जॉन कोनोन स्कूल [[मुंबई]] में अपनी पढ़ाई पूरी की। जे. आर. डी. ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। मात्र 34 वर्ष की आयु में वे टाटा संस के चेयरमैन बने। दशकों तक उन्होंने विशालकाय टाटा समूह की कंपनियों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपनी पैतृक कम्पनी के अध्यक्ष पद पर पहुँचने से पहले सबसे नीचे स्तर से काम सम्भालना सीखा। इस प्रकार उन्हें अपने उद्योग के विभिन्न समूहों को समझने का अवसर मिला। इसी जानकारी से वे उद्योग को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने में सफल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा उसूलों के बेहद पक्के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार में सफलता के साथ-साथ उच्च नैतिक मानदंडों को भी कायम रखा। उनकी अध्यक्षता में टाटा समूह ने नई बुलंदियों को छुआ। उनके काल में टाटा समूह की कंपनियों की संख्या 15 से बढ़कर 100 से ज़्यादा हो गई। साथ ही टाटा समूह की परिसंपत्ति 62 करोड़ से बढ़कर 10 हज़ार करोड़ की हो गई।&lt;br /&gt;
==टाटा एयरलाइंस कम्पनी==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. पहले शख्स थे जिन्हें वर्ष [[1929]] में भारत में पहला पायलट लाइसेंस मिला। उड्डयन क्षेत्र की अग्रणी हस्ती लुईस ब्लेरियोट की प्रेरणा से उन्होंने [[1932]] में भारत की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की। कम्पनी के विमान की [[मुम्बई]] और कराची के बीच की पहली उड़ान के विमान चालक वे स्वयं ही थे। [[1953]] में विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने के बाद ये एयर इंडिया के अध्यक्ष बने। सरकार ने इन्हें अनेक उद्योगों की सलाहकार समितियों में रखा। &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा  को वर्ष [[1954]] में फ़्राँस सरकार ने 'लेजियन डी ऑनर' के खिताब से नवाजा गया। उन्हें उद्योग तथा राष्ट्र निर्माण में बेहतरीन योगदान के लिए वर्ष [[1992]] में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अनेक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित जे. आर. डी. टाटा का 89 वर्ष की आयु में वर्ष [[29 नवम्बर]], [[1993]] में जिनेवा (स्विट्ज़रलैण्ड) में निधन हो गया। मरणोपरांत उन्हें पेरिस में दफ़नाया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्न}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उद्योगपति और व्यापारी]]&lt;br /&gt;
[[Category:वाणिज्य व्यापार कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: Adding category :Category:उद्योगपति और व्यापारी (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:J.R.D-Tata.jpg|thumb|200px| जे. आर. डी. टाटा&amp;lt;br /&amp;gt;J. R. D-Tata]]&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा''' (जन्म- [[29 जुलाई]], [[1903]], पेरिस, [[फ़्राँस]]; मृत्यु- [[29 नवम्बर]], [[1993]], जिनेवा, स्विट्ज़रलैण्ड]] [[भारत]] के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाली औद्योगिक हस्तियों में जे. आर. डी. टाटा का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने ही देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेना टाटा एयरलाइंस शुरू की थी जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानसेवा एयर इंडिया बन गई। '''इस कारण जे. आर. डी. टाटा को भारत के नागरिक उड्डयन का पिता भी कहा जाता है।'''&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
कुशल विमान चालक जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 ई. में पेरिस में हुआ था। यह रतनजी दादाभाई टाटा व उनकी [[फ़्रांसीसी]] पत्नी सुजैन ब्रियरे की दूसरी संतान थे। उनके पिता भारत के अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई थे। जे. आर. डी. टाटा की माँ फ़्रांसीसी थीं इसलिए उनके बचपन का ज़्यादातर वक्त फ़्राँस में बीता, इसलिए फ्रेंच उनकी पहली [[भाषा]] थी। उन्होंने कैथेडरल और जॉन कोनोन स्कूल [[मुंबई]] में अपनी पढ़ाई पूरी की। जे. आर. डी. ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। मात्र 34 वर्ष की आयु में वे टाटा संस के चेयरमैन बने। दशकों तक उन्होंने विशालकाय टाटा समूह की कंपनियों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपनी पैतृक कम्पनी के अध्यक्ष पद पर पहुँचने से पहले सबसे नीचे स्तर से काम सम्भालना सीखा। इस प्रकार उन्हें अपने उद्योग के विभिन्न समूहों को समझने का अवसर मिला। इसी जानकारी से वे उद्योग को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने में सफल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा उसूलों के बेहद पक्के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार में सफलता के साथ-साथ उच्च नैतिक मानदंडों को भी कायम रखा। उनकी अध्यक्षता में टाटा समूह ने नई बुलंदियों को छुआ। उनके काल में टाटा समूह की कंपनियों की संख्या 15 से बढ़कर 100 से ज़्यादा हो गई। साथ ही टाटा समूह की परिसंपत्ति 62 करोड़ से बढ़कर 10 हज़ार करोड़ की हो गई।&lt;br /&gt;
==टाटा एयरलाइंस कम्पनी==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. पहले शख्स थे जिन्हें वर्ष [[1929]] में भारत में पहला पायलट लाइसेंस मिला। उड्डयन क्षेत्र की अग्रणी हस्ती लुईस ब्लेरियोट की प्रेरणा से उन्होंने [[1932]] में भारत की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की। कम्पनी के विमान की [[मुम्बई]] और कराची के बीच की पहली उड़ान के विमान चालक वे स्वयं ही थे। [[1953]] में विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने के बाद ये एयर इंडिया के अध्यक्ष बने। सरकार ने इन्हें अनेक उद्योगों की सलाहकार समितियों में रखा। &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा  को वर्ष [[1954]] में फ़्राँस सरकार ने 'लेजियन डी ऑनर' के खिताब से नवाजा गया। उन्हें उद्योग तथा राष्ट्र निर्माण में बेहतरीन योगदान के लिए वर्ष [[1992]] में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अनेक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित जे. आर. डी. टाटा का 89 वर्ष की आयु में वर्ष [[29 नवम्बर]], [[1993]] में जिनेवा (स्विट्ज़रलैण्ड) में निधन हो गया। मरणोपरांत उन्हें पेरिस में दफ़नाया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्न}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उद्योगपति और व्यापारी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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&lt;div&gt;[[चित्र:J.R.D-Tata.jpg|thumb|200px| जे. आर. डी. टाटा&amp;lt;br /&amp;gt;J. R. D-Tata]]&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा''' (जन्म- [[29 जुलाई]], [[1903]], पेरिस, [[फ़्राँस]]; मृत्यु- [[29 नवम्बर]], [[1993]], जिनेवा, स्विट्ज़रलैण्ड]] [[भारत]] के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाली औद्योगिक हस्तियों में जे. आर. डी. टाटा का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने ही देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेना टाटा एयरलाइंस शुरू की थी जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानसेवा एयर इंडिया बन गई। '''इस कारण जे. आर. डी. टाटा को भारत के नागरिक उड्डयन का पिता भी कहा जाता है।'''&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
कुशल विमान चालक जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 ई. में पेरिस में हुआ था। यह रतनजी दादाभाई टाटा व उनकी [[फ़्रांसीसी]] पत्नी सुजैन ब्रियरे की दूसरी संतान थे। उनके पिता भारत के अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई थे। जे. आर. डी. टाटा की माँ फ़्रांसीसी थीं इसलिए उनके बचपन का ज़्यादातर वक्त फ़्राँस में बीता, इसलिए फ्रेंच उनकी पहली [[भाषा]] थी। उन्होंने कैथेडरल और जॉन कोनोन स्कूल [[मुंबई]] में अपनी पढ़ाई पूरी की। जे. आर. डी. ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। मात्र 34 वर्ष की आयु में वे टाटा संस के चेयरमैन बने। दशकों तक उन्होंने विशालकाय टाटा समूह की कंपनियों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपनी पैतृक कम्पनी के अध्यक्ष पद पर पहुँचने से पहले सबसे नीचे स्तर से काम सम्भालना सीखा। इस प्रकार उन्हें अपने उद्योग के विभिन्न समूहों को समझने का अवसर मिला। इसी जानकारी से वे उद्योग को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने में सफल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा उसूलों के बेहद पक्के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार में सफलता के साथ-साथ उच्च नैतिक मानदंडों को भी कायम रखा। उनकी अध्यक्षता में टाटा समूह ने नई बुलंदियों को छुआ। उनके काल में टाटा समूह की कंपनियों की संख्या 15 से बढ़कर 100 से ज़्यादा हो गई। साथ ही टाटा समूह की परिसंपत्ति 62 करोड़ से बढ़कर 10 हज़ार करोड़ की हो गई।&lt;br /&gt;
==टाटा एयरलाइंस कम्पनी==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. पहले शख्स थे जिन्हें वर्ष [[1929]] में भारत में पहला पायलट लाइसेंस मिला। उड्डयन क्षेत्र की अग्रणी हस्ती लुईस ब्लेरियोट की प्रेरणा से उन्होंने [[1932]] में भारत की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की। कम्पनी के विमान की [[मुम्बई]] और कराची के बीच की पहली उड़ान के विमान चालक वे स्वयं ही थे। [[1953]] में विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने के बाद ये एयर इंडिया के अध्यक्ष बने। सरकार ने इन्हें अनेक उद्योगों की सलाहकार समितियों में रखा। &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा  को वर्ष [[1954]] में फ़्राँस सरकार ने 'लेजियन डी ऑनर' के खिताब से नवाजा गया। उन्हें उद्योग तथा राष्ट्र निर्माण में बेहतरीन योगदान के लिए वर्ष [[1992]] में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अनेक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित जे. आर. डी. टाटा का 89 वर्ष की आयु में वर्ष [[29 नवम्बर]], [[1993]] में जिनेवा (स्विट्ज़रलैण्ड) में निधन हो गया। मरणोपरांत उन्हें पेरिस में दफ़नाया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्न}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: ' जे. आर. डी. टाटा&amp;lt;br /&amp;gt;J. R. D-Tata {{tocright}} '''जहाँगी...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[चित्र:J.R.D-Tata.jpg|thumb|200px| जे. आर. डी. टाटा&amp;lt;br /&amp;gt;J. R. D-Tata]]&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा''' (जन्म- [[29 जुलाई]], [[1903]], पेरिस, [[फ़्राँस]]; मृत्यु- [[29 नवम्बर]], [[1993]], जिनेवा, स्विट्ज़रलैण्ड]] [[भारत]] के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाली औद्योगिक हस्तियों में जे. आर. डी. टाटा का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने ही देश की पहली वाणिज्यिक विमान सेना टाटा एयरलाइंस शुरू की थी जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय विमानसेवा एयर इंडिया बन गई। '''इस कारण जे. आर. डी. टाटा को भारत के नागरिक उड्डयन का पिता भी कहा जाता है।'''&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
कुशल विमान चालक जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 ई. में पेरिस में हुआ था। यह रतनजी दादाभाई टाटा व उनकी [[फ़्रांसीसी]] पत्नी सुजैन ब्रियरे की दूसरी संतान थे। उनके पिता भारत के अग्रणी उद्योगपति जमशेदजी टाटा के चचेरे भाई थे। जे. आर. डी. टाटा की माँ फ़्रांसीसी थीं इसलिए उनके बचपन का ज़्यादातर वक्त फ़्राँस में बीता, इसलिए फ्रेंच उनकी पहली [[भाषा]] थी। उन्होंने कैथेडरल और जॉन कोनोन स्कूल [[मुंबई]] में अपनी पढ़ाई पूरी की। जे. आर. डी. ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की। मात्र 34 वर्ष की आयु में वे टाटा संस के चेयरमैन बने। दशकों तक उन्होंने विशालकाय टाटा समूह की कंपनियों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपनी पैतृक कम्पनी के अध्यक्ष पद पर पहुँचने से पहले सबसे नीचे स्तर से काम सम्भालना सीखा। इस प्रकार उन्हें अपने उद्योग के विभिन्न समूहों को समझने का अवसर मिला। इसी जानकारी से वे उद्योग को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने में सफल हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा उसूलों के बेहद पक्के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार में सफलता के साथ-साथ उच्च नैतिक मानदंडों को भी कायम रखा। उनकी अध्यक्षता में टाटा समूह ने नई बुलंदियों को छुआ। उनके काल में टाटा समूह की कंपनियों की संख्या 15 से बढ़कर 100 से ज़्यादा हो गई। साथ ही टाटा समूह की परिसंपत्ति 62 करोड़ से बढ़कर 10 हज़ार करोड़ की हो गई।&lt;br /&gt;
==टाटा एयरलाइंस कम्पनी==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. पहले शख्स थे जिन्हें वर्ष [[1929]] में भारत में पहला पायलट लाइसेंस मिला। उड्डयन क्षेत्र की अग्रणी हस्ती लुईस ब्लेरियोट की प्रेरणा से उन्होंने [[1932]] में भारत की पहली वाणिज्यिक विमान सेवा टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की। कम्पनी के विमान की [[मुम्बई]] और कराची के बीच की पहली उड़ान के विमान चालक वे स्वयं ही थे। [[1953]] में विमान सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने के बाद ये एयर इंडिया के अध्यक्ष बने। सरकार ने इन्हें अनेक उद्योगों की सलाहकार समितियों में रखा। &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
जे. आर. डी. टाटा  को वर्ष [[1954]] में फ़्राँस सरकार ने 'लेजियन डी ऑनर' के खिताब से नवाजा गया। उन्हें उद्योग तथा राष्ट्र निर्माण में बेहतरीन योगदान के लिए वर्ष [[1992]] में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान [[भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अनेक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित जे. आर. डी. टाटा का 89 वर्ष की आयु में वर्ष [[29 नवम्बर]], [[1993]] में जिनेवा (स्विट्ज़रलैण्ड) में निधन हो गया। मरणोपरांत उन्हें पेरिस में दफ़नाया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत रत्न}}&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>सुनील दत्त</title>
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		<updated>2011-05-21T10:48:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Sunil-Dutt.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=बलराज रघुनाथ दत्त&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[6 जून]], [[1929]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=गाँव खुर्दी, पंजाब ([[पाकिस्तान]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[25 मई]], [[2005]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[मुंबई]], [[महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=नर्गिस दत्त&lt;br /&gt;
|संतान=संजय दत्त, प्रिया दत्त, नम्रता दत्त&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=मुम्बई&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=अभिनय, निर्माता, निर्देशक, राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=मदर इंडिया, वक्त, मिलन, मेहरबान, हमराज़, साधना, सुजाता, मुझे जीने दो,  खानदान, पड़ोसन, नागिन, जानी दुश्मन&lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|विद्यालय=जय हिंद कालेज&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि= फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (दो बार), [[पद्मश्री]], फ़िल्मफ़ेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार, फाल्के रत्न पुरस्कार &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=अभिनेता&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=पार्टी&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
सुनील दत्त (जन्म- [[6 जून]], [[1929]], गाँव खुर्दी, पंजाब ([[पाकिस्तान]]); मृत्यु- [[25 मई]], [[2005]], [[मुंबई]]) भारतीय सिनेमा में एक ऐसे अभिनेता थे जिनको परदे पर देख एक  आम हिन्दुस्तानी अपनी जिंदगी की झलक देखता था।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://bollywoodblogmagazine.com/PageDetails.aspx?id=67&amp;amp;cat=Life%20and%20Journey%20of%20Superstar |title=हिंदी सिनेमा के बिरजू सुनील दत्त  |accessmonthday=[[19 मई]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=बॉलीबुड ब्लॉग |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt; सुनील दत्त का वास्तविक नाम '''बलराज रघुनाथ दत्त''' था। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
[[हिन्दी]] सिनेमा जगत में सुनील दत्त को एक ऐसी शख्सियत के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने फ़िल्म निर्माण, निर्देशन और अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। उनके किरदार वास्तविक जीवन के बहुत करीब होते थे और उनका व्यक्तित्व भी उनके किरदार की तरह उज्जवल और प्रभावशाली रहा। सुनील दत्त का जन्म 6 जून, 1929 में झेलम ज़िले के खुर्दी गाँव में एक [[ब्राह्मण]] [[परिवार]] मे हुआ था। सुनील दत्त बचपन से ही अभिनय के क्षेत्र में जाना चाहते थे। बलराज साहनी फ़िल्म इंडस्ट्री में अभिनेता के रुप में उन दिनों स्थापित हो चुके थे, इसे देखते हुए उन्होंने अपना नाम बलराज दत्त से बदलकर सुनील दत्त रख लिया।  उनका बचपन [[यमुना नदी]] के किनारे मंदाली गाँव में बीता जो [[हरियाणा]] प्रदेश में है। सुनील दत्त इसके बाद [[लखनऊ]] चले गये और जहाँ पर वह '''अख्तर''' नाम से अमीनाबाद गली  में एक [[मुसलमान]] औरत के घर पर रहे। कुछ समय बाद अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह मुंबई चले गए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
====कार्यक्षेत्र====&lt;br /&gt;
मुम्बई आकर सुनील दत्त ने मुंबई परिवहन सेवा के बस डिपो में चेकिंग क्लर्क के रुप में कार्य किया, जहाँ उनको 120 रुपए महीने के मिलते थे। फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए [[1955]] से [[1957]] तक सुनील दत्त संघर्ष करते रहे। हिंदी सिनेमा जगत में अपने पैर जमाने के लिए वह जमीन की तलाश में एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भटकते रहे थे। उसके बाद सुनील दत्त ने जय हिंद कालेज में पढ़कर स्नातक किया। सुनील दत्त ने रेडियो सिलोन की हिन्दी सेवा के उद्घोषक के तौर पर अपना करियर शुरु किया था। जहाँ वह फ़िल्मी कलाकारों का इंटरव्यू लिया करते थे। एक इंटरव्यू के लिए उन्हें 25 रुपये मिलते थे। यह दक्षिण एशिया की पचास के दशक मे सबसे लोकप्रिय रेडियो सेवा थी।&lt;br /&gt;
====विवाह====&lt;br /&gt;
सुनील दत्त ने '[[मदर इंडिया]]' फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक आग की दुर्घटना में नर्गिस को अपनी जान की परवाह किये बिना बचाया। इस हादसे में सुनील दत्त काफ़ी जल गए थे तथा नर्गिस पर भी आग की लपटों का असर पड़ा था। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनके स्वस्थ होकर बाहर निकलने के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। नर्गिस [[11 मार्च]], [[1958]] में सुनील दत्त की जीवन संगिनी बन गई।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot; /&amp;gt; &lt;br /&gt;
==फ़िल्मी सफर की शुरुआत==&lt;br /&gt;
सुनील दत्त की पहली फ़िल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' [[1955]]  में प्रदर्शित हुई, जिसमें उन्होंने अभिनेता के रूप में कार्य किया। अपनी पहली फ़िल्म से उन्हें कुछ ख़ास पहचान नही मिली। उन्होंने इस फ़िल्म के बाद  'कुंदन', 'राजधानी', 'किस्मत का खेल' और 'पायल' जैसी कई छोटी फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से उनकी कोई भी फ़िल्म सफल नहीं हुई।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mother-India-2.jpg|thumb|left|नर्गिस (राधा), [[सुनील दत्त]] (बिरजू) और राजेन्द्र कुमार (रामू)]] &lt;br /&gt;
====मदर इंडिया====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|मदर इंडिया}}&lt;br /&gt;
[[1957]]  में प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'मदर इंडिया' से सुनील दत्त को अभिनेता के रूप में ख़ास पहचान और लोकप्रियता मिलीI उन्होंने इस फ़िल्म में एक ऐसे युवक 'बिरजू' की भूमिका निभाई जो गाँव में सामाजिक व्यवस्था से काफ़ी नाराज़ है और इसी की वजह से विद्रोह कर डाकू बन जाता है। साहूकार से बदला लेने के लिए वह उसकी पुत्री का अपहरण कर लेता है लेकिन इस कोशिश में अंत में वह अपनी मां के हाथों मारा जाता है। इस फ़िल्म में नकारात्मक  हीरो का किरदार निभाकर वह दर्शकों के दिल में जगह बनाने में सफल रहे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot; /&amp;gt;   &lt;br /&gt;
====वक्त====&lt;br /&gt;
सुनील दत्त की सुपरहिट फ़िल्म 'वक्त' 1965 में प्रदर्शित हुई। उनके सामने इस फ़िल्म में बलराज साहनी, राजकुमार, शशि कपूर और रहमान जैसे नामी सितारे थे, इसके बावज़ूद सुनील अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। सुनील दत्त के सिने करियर का 1967 सबसे महत्वपूर्ण साल साबित हुआ। उस साल उनकी 'मिलन', 'मेहरबान' और 'हमराज़' जैसी सुपरहिट फ़िल्में प्रदर्शित हुई, जिनमें उनके अभिनय के नए रूप देखने को मिले। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद वह अभिनेता के रुप में शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनील दत्त भारतीय सिनेमा के उन अभिनेताओं मे से एक है जिनकी फ़िल्मो ने पचास और साथ के दशक मे दर्शको पर अमित छाप छोड़ी। 'मदर  इंडिया' की सफलता के बाद उन्हें 'साधना' ([[1958]]), 'सुजाता' ([[1959]]), 'मुझे जीने दो' ([[1963]]),  'खानदान' ([[1965]] ), 'पड़ोसन' ([[1967]] ) जैसी सफल फ़िल्मों से भारतीय दर्शको के बीच एक सफल अभिनेता के रूप में पहचान मिली। सुनील दत्त को निर्देशक बी. आर. चोपड़ा के साथ 'गुमराह' (1963),  'वक़्त' (1965 ) और 'हमराज' (1967) जैसी फ़िल्मों में निभाई गई यादगार भूमिकाओं ने भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय किया।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{सुनील दत्त फ़िल्म सूची}}&lt;br /&gt;
====मल्टी स्टारर फ़िल्मों का अहम हिस्सा====&lt;br /&gt;
सुनील दत्त के सिने करियर पर नज़र डालने पर पता लगता है कि वह मल्टी स्टारर फ़िल्मों का अहम हिस्सा रहे है। फ़िल्म निर्माताओं को ऐसी फ़िल्मों में जब कभी अभिनेता की ज़रूरत होती थी वह उन्हें नज़र अंदाज़ नहीं कर पाते थे। सुनील दत्त की मल्टीस्टारर सुपरहिट फ़िल्मों में 'नागिन', 'जानी दुश्मन', 'शान', 'बदले की आग', 'राज तिलक', 'काला धंधा गोरे लोग', 'वतन के रखवाले', 'परंपरा', 'क्षत्रिय' आदि प्रमुख हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;पी7 न्यूज&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.p7news.com/HindiNews_yaadein_1161.java |title=सुनील दत्त  |accessmonthday=[[19 मई]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=पी7 न्यूज |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस====&lt;br /&gt;
1993 में प्रदर्शित फ़िल्म 'क्षत्रिय' के बाद सुनील दत्त लगभग 10 वर्ष तक फ़िल्म अभिनय से दूर रहे । विधु विनोद चोपड़ा के ज़ोर देने पर उन्होंने [[2007]] में प्रदर्शित फ़िल्म 'मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस' में अभिनय किया। फ़िल्म में उन्होंने अभिनेता संजय दत्त के पिता की भूमिका निभाई। पिता-पुत्र की इस जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया। इस फ़िल्म के माध्यम से पहली बार पिता पुत्र (सुनील दत्त और संजय दत्त) एक साथ पर्दे पर नजर आए थे। हालांकि फ़िल्म 'क्षत्रिय' और 'रॉकी' में भी सीनियर और जूनियर दत्त ने साथ काम किया मगर एक भी दृश्य में वे साथ में नहीं थे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==फ़िल्म निर्देशन==&lt;br /&gt;
फ़िल्म यादें (1964) के साथ सुनील दत्त ने फ़िल्म निर्देशन मे भी कदम रखा। इस पूरी फ़िल्म में सिर्फ एक युवक की भूमिका थी जो अपने संस्मरण को याद करता रहता है। इस किरदार को सुनील दत्त ने निभाया था। उनकी यह फ़िल्म बहुत सफल नहीं रही, लेकिन भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा गई।&lt;br /&gt;
==फ़िल्म निर्माण==&lt;br /&gt;
सुनील दत्त ने 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म 'यह रास्ते है प्यार के' के ज़रिए फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया।  यह फ़िल्म टिकट खिड़की पर ज़्यादा सफल नहीं रही। इस फ़िल्म के बाद सुनील दत्त ने फ़िल्म 'मुझे जीने दो' का निर्माण किया। यह फ़िल्म डाकुओं के जीवन पर आधारित थी। यह फ़िल्म  सुपरहिट साबित हुई। इसके बाद उन्होंने अपने भाई सोम दत्त को बतौर मुख्य अभिनेता फ़िल्म 'मन  का मीत'  मे लांच किया। सोम दत्त का फ़िल्मी सफर बहुत सफल नही रहा।  सुनील दत्त ने [[1971]] में अपनी महत्वकांक्षी फ़िल्म 'रेशमा और शेरा' का  निर्माण और निर्देशन किया। इस फ़िल्म में उन्होने भूमिका भी निभाई। यह एक पीरियड और बड़े बजट की फ़िल्म थी जिसे दर्शको ने नकार दिया। निर्माता और निर्देशक बनने के बाद भी सुनील दत्त अभिनय से कभी ज़्यादा समय के लिए दूर नही रहे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot; /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनील दत्त की सत्तर और अस्सी के दशक मे बनी फ़िल्में 'प्राण जाए पर वचन ना जाई' (1974), 'नागिन' (1976), 'जानी दुश्मन' (1979) और 'शान' ([[1980]]) में उनकी भूमिकाए पसंद की गयी। इस समय में सुनील दत्त धार्मिक पंजाबी फ़िल्मो से भी जुड़े रहे। जिन फ़िल्मों में 'मन जीते जाग जीते' (1973 ), 'धुख भजन तेरा नाम' (1974 ), 'सात श्री अकल' (1977 ) प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sunil-Dutt-1.jpg|left|thumb|200px|सुनील दत्त&amp;lt;br /&amp;gt;Sunil Dutt]]&lt;br /&gt;
==राजनीति==&lt;br /&gt;
सुनील दत्त ने फ़िल्मों में कई भूमिकाएँ निभाने के बाद समाज सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस के सहयोग से लोकसभा के सदस्य बने। साल [[1968]] में वह पदमश्री पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सुनील दत्त को [[1982]] में मुंबई का शेरिफ नियुक्त किया गया। हिंदी फ़िल्मों के अलावा सुनील दत्त ने कई [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]] फ़िल्मों में भी अपने अभिनय का जलवा दिखाया। इनमें 'मन जीत जग जीत' [[1973]], 'दुख भंजन तेरा नाम' [[1974]] और 'सत श्री अकाल' [[1977]] जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;पी7 न्यूज&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==नर्गिस की मृत्यु==&lt;br /&gt;
1980 मे सुनील दत्त ने अपने बेटे  संजय दत्त को फ़िल्म 'रॉकी' मे लांच किया। यह एक सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई लेकिन फ़िल्म के प्रदर्शित होने के थोड़े समय के बाद ही उनकी पत्नी नर्गिस का कैंसर बीमारी की वजह से देहांत हो गया। नर्गिस की कैंसर से हुई मृत्यु के कारण उन्हें इस बीमारी के प्रति सामाजिक जागरूकता के प्रति बढ़ने की प्रेरणा मिली। सुनील दत्त ने पत्नी की याद मे 'नर्गिस दत्त फाउंडेशन' की स्थापना की। यह वो समय था जब सुनील दत्त सामाजिक कार्यक्रमों  मे ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot; /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
[[चित्र:Sunil-Dutt-Family.jpg|thumb|250px|सुनील दत्त, पत्नी नर्गिस, पुत्र संजय और पुत्रियाँ प्रिया, नम्रता के साथ]] &lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
*[[1963]] - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार (मुझे जीने दो)&lt;br /&gt;
*[[1965]] - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार (खानदान)&lt;br /&gt;
*[[1968]] - [[पद्मश्री]]&lt;br /&gt;
*[[1995]] - फ़िल्मफ़ेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार&lt;br /&gt;
*[[1997]] - स्टार स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार&lt;br /&gt;
*[[2001]] -जी सिने लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार&lt;br /&gt;
*[[2005]] - फाल्के रत्न पुरस्कार &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
हिंदी फ़िल्मो के पहले एंग्री यंग मैन और राजनैतिक तौर पर एक आदर्श नेता सुनील दत्त का  [[25  मई]], [[2005]] को ह्रदय गति रुकने के कारण बांद्रा स्थित उनके निवास स्थान पर देहांत हो गया। सुनील दत्त 'मदर इंडिया' के 'बिरजू' के रूप में या एक आदर्श नेता के तौर पर आज भी हमारे बीच मौज़ूद हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;बॉलीबुड ब्लॉग&amp;quot; /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]][[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]][[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:कला कोश]][[Category:फ़िल्म निर्देशक]][[Category:फ़िल्म निर्माता]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीतिज्ञ]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म श्री]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
	</entry>
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		<title>साँचा:सुनील दत्त फ़िल्म सूची</title>
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		<updated>2011-05-21T10:41:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:35%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|+सुनील दत्त का फ़िल्मी सफ़र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;10%&amp;quot;| वर्ष&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;30%&amp;quot;| फ़िल्म&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;30%&amp;quot;| नायिका&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;30%&amp;quot;| निर्देशक&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:10%&amp;quot; | [[1965]]&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:30%&amp;quot; |खानदान        &lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:30%&amp;quot; |नूतन&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:30%&amp;quot; |ए.भीम. सिंह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1966]]&lt;br /&gt;
| गबन&lt;br /&gt;
| साधना&lt;br /&gt;
| ऋषिकेश मुखर्जी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मेरा साया&lt;br /&gt;
| साधना&lt;br /&gt;
| राज खोसला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आम्रपाली        &lt;br /&gt;
| वैजयंती माला&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| मेहरबान&lt;br /&gt;
| नूतन&lt;br /&gt;
| ए. भीम सिंह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1967]]&lt;br /&gt;
| हमराज&lt;br /&gt;
| विम्मी&lt;br /&gt;
| बी. आर.चोपड़ा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मिलन&lt;br /&gt;
| नूतन&lt;br /&gt;
| ए. सुब्बाराव&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1968]]&lt;br /&gt;
| पड़ोसन&lt;br /&gt;
| सायरा बानो&lt;br /&gt;
| ज्योति स्वरूप&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गौरी&lt;br /&gt;
| नूतन,मुमताज&lt;br /&gt;
| ए.भीम सिंह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1969]]&lt;br /&gt;
| चिराग &lt;br /&gt;
| आशा पारिख&lt;br /&gt;
| राज खोसला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्यासी शाम&lt;br /&gt;
| शर्मिला टैगौर&lt;br /&gt;
| अमर कुमार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मेरी भाभी&lt;br /&gt;
| वहीदा रहमान&lt;br /&gt;
| खालिद अख्तर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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| दर्पण&lt;br /&gt;
| वहीदा रहमान&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
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| आशा पारिख&lt;br /&gt;
| राजा नवाथे&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ज्वाला&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| [[1971]]  &lt;br /&gt;
| रेश्मा और शेरा&lt;br /&gt;
| राखी, वहीदा रहमान&lt;br /&gt;
| सुनील दत्त&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1972]]  &lt;br /&gt;
| जमीन-आसमान&lt;br /&gt;
| रेखा&lt;br /&gt;
| ए.वीरप्पा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जिंदगी जिंदगी&lt;br /&gt;
| वहीदा रहमान&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1973]]&lt;br /&gt;
| हीरा&lt;br /&gt;
| आशा पारिख&lt;br /&gt;
| सुल्तान अहमद&lt;br /&gt;
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| रेखा&lt;br /&gt;
| अली राजा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1974]]&lt;br /&gt;
| छतीस घंटे&lt;br /&gt;
| माला सिन्हा&lt;br /&gt;
| राज तिलक&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गीता मेरा नाम&lt;br /&gt;
| साधना&lt;br /&gt;
| साधना नैयर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कोरा बदन&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| बी.एस. शाद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1975]]&lt;br /&gt;
| हिमालय से ऊंचा&lt;br /&gt;
| मल्लिका साराभाई&lt;br /&gt;
| बी.एस.थापा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नीलिमा&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| पुष्पराज&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उम्रकैद&lt;br /&gt;
| रीना राय&lt;br /&gt;
| सिकंदर खन्ना&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जख्मी    &lt;br /&gt;
| आशा पारिख&lt;br /&gt;
| राजा ठाकुर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1976]]&lt;br /&gt;
| नागिन &lt;br /&gt;
| रेखा&lt;br /&gt;
| राजकुमार कोहली&lt;br /&gt;
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| नहले पे दहला&lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;5&amp;quot;| [[1952]]&lt;br /&gt;
| आखिरी गोली &lt;br /&gt;
| लीना चंद्रावरकर&lt;br /&gt;
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| परवीन बाबी&lt;br /&gt;
| कौशल भारती&lt;br /&gt;
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| ज्ञानी जी&lt;br /&gt;
| रीना राय&lt;br /&gt;
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| पापी &lt;br /&gt;
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| ओ.पी.रल्हन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1978]]&lt;br /&gt;
| डाकू और जवान &lt;br /&gt;
| लीना चंद्रावरकर&lt;br /&gt;
| सुनील दत्त&lt;br /&gt;
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| काला आदमी&lt;br /&gt;
| सायरा बानो&lt;br /&gt;
| रमेश लखनपाल&lt;br /&gt;
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| राम कसम&lt;br /&gt;
| रेखा&lt;br /&gt;
| चांद&lt;br /&gt;
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|rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1979]]&lt;br /&gt;
| जानी दुश्मन&lt;br /&gt;
| रीना राय&lt;br /&gt;
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| रेखा&lt;br /&gt;
| चांद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मुक़ाबला&lt;br /&gt;
| रीना राय&lt;br /&gt;
| राजकुमार कोहली&lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;5&amp;quot;| [[1980]]&lt;br /&gt;
| एक गुनाह और सही&lt;br /&gt;
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| रमेश सिप्पी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यारी दुश्मनी&lt;br /&gt;
| रीना राय&lt;br /&gt;
| सिकंदर खन्ना&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1981]]&lt;br /&gt;
| रॉकी&lt;br /&gt;
| राखी&lt;br /&gt;
| सुनील दत्त&lt;br /&gt;
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| [[1982]]&lt;br /&gt;
| बदले की आग &lt;br /&gt;
| रीना राय&lt;br /&gt;
| राजकुमार कोहली&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1983]]&lt;br /&gt;
| दर्द का रिश्ता&lt;br /&gt;
| स्मिता पाटिल&lt;br /&gt;
| सुनील दत्त&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:फ़िल्म संबंधित साँचे]]&amp;lt;references/&amp;gt;&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>प्रिया</name></author>
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		<title>साँचा:सुनील दत्त फ़िल्म सूची</title>
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		<updated>2011-05-21T10:38:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;प्रिया: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;width:35%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|+सुनील दत्त का फ़िल्मी सफ़र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;10%&amp;quot;| वर्ष&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;30%&amp;quot;| फ़िल्म&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;30%&amp;quot;| नायिका&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
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| style=&amp;quot;width:30%&amp;quot; |खानदान        &lt;br /&gt;
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| गबन&lt;br /&gt;
| साधना&lt;br /&gt;
| ऋषिकेश मुखर्जी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मेरा साया&lt;br /&gt;
| साधना&lt;br /&gt;
| राज खोसला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आम्रपाली        &lt;br /&gt;
| वैजयंती माला&lt;br /&gt;
| लेख टंडन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मेहरबान&lt;br /&gt;
| नूतन&lt;br /&gt;
| ए. भीम सिंह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1967]]&lt;br /&gt;
| हमराज&lt;br /&gt;
| विम्मी&lt;br /&gt;
| बी. आर.चोपड़ा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मिलन&lt;br /&gt;
| नूतन&lt;br /&gt;
| ए. सुब्बाराव&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1968]]&lt;br /&gt;
| पड़ोसन&lt;br /&gt;
| सायरा बानो&lt;br /&gt;
| ज्योति स्वरूप&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गौरी&lt;br /&gt;
| नूतन,मुमताज&lt;br /&gt;
| ए.भीम सिंह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1969]]&lt;br /&gt;
| चिराग &lt;br /&gt;
| आशा पारिख&lt;br /&gt;
| राज खोसला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्यासी शाम&lt;br /&gt;
| शर्मिला टैगौर&lt;br /&gt;
| अमर कुमार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मेरी भाभी&lt;br /&gt;
| वहीदा रहमान&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1970]]  &lt;br /&gt;
| दर्पण&lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1972]]  &lt;br /&gt;
| जमीन-आसमान&lt;br /&gt;
| रेखा&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1973]]&lt;br /&gt;
| हीरा&lt;br /&gt;
| आशा पारिख&lt;br /&gt;
| सुल्तान अहमद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्राण जाए पर वचन न जाए&lt;br /&gt;
| रेखा&lt;br /&gt;
| अली राजा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1974]]&lt;br /&gt;
| छतीस घंटे&lt;br /&gt;
| माला सिन्हा&lt;br /&gt;
| राज तिलक&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गीता मेरा नाम&lt;br /&gt;
| साधना&lt;br /&gt;
| साधना नैयर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कोरा बदन&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| बी.एस. शाद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1975]]&lt;br /&gt;
| हिमालय से ऊंचा&lt;br /&gt;
| मल्लिका साराभाई&lt;br /&gt;
| बी.एस.थापा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नीलिमा&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| पुष्पराज&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उम्रकैद&lt;br /&gt;
| रीना राय&lt;br /&gt;
| सिकंदर खन्ना&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जख्मी    &lt;br /&gt;
| आशा पारिख&lt;br /&gt;
| राजा ठाकुर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1976]]&lt;br /&gt;
| नागिन &lt;br /&gt;
| रेखा&lt;br /&gt;
| राजकुमार कोहली&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नहले पे दहला&lt;br /&gt;
| सायरा बानो&lt;br /&gt;
| राज खोसला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;5&amp;quot;| [[1952]]&lt;br /&gt;
| आखिरी गोली &lt;br /&gt;
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| चरणदास &lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
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