<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A5%80</id>
	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A5%80"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A5%80"/>
	<updated>2026-05-24T17:45:21Z</updated>
	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B2_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9&amp;diff=201256</id>
		<title>नवल सिंह</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B2_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9&amp;diff=201256"/>
		<updated>2011-08-10T10:52:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: नवलसिंह को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[नवलसिंह]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201255</id>
		<title>राम सहाय दास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201255"/>
		<updated>2011-08-10T10:51:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: रामसहाय दास को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[रामसहाय दास]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201254</id>
		<title>रामसहायदास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201254"/>
		<updated>2011-08-10T10:50:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: रामसहाय दास को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[रामसहाय दास]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201253</id>
		<title>रामसहाय दास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201253"/>
		<updated>2011-08-10T10:49:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रामसहाय दास चौबेपुर ज़िला, बनारस के रहने वाले लाला भवानीदास कायस्थ के पुत्र थे और काशी नरेश 'महाराज उदितनारायण सिंह' के आश्रय में रहते थे। 'बिहारी सतसई' के अनुकरण पर इन्होंने 'रामसतसईं' बनाई। [[बिहारी]] के अनुकरण पर बनी हुई पुस्तकों में इसी को प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इसके बहुत से दोहे सरस उद्भावना में बिहारी के दोहों के पास तक पहुँचते हैं, पर यह कहना कि ये दोहे बिहारी के दोहों में मिलाए जा सकते हैं, रसज्ञता और भावुकता से ही पुरानी दुश्मनी निकालना ही नहीं, बिहारी को भी कुछ नीचे गिराने का प्रयत्न समझा जाएगा। जहाँ तक शब्दों की कारीगरी और वाग्वैदग्ध्य से संबंध है वहीं तक अनुकरण करने का प्रयत्न किया गया है और सफलता भी हुई है। पर हावों का वह सुंदर व्यंजना विधान, चेष्टाओं का वह मनोहर चित्रण, [[भाषा]] का वह सौष्ठव, संचारियों की वह सुंदर व्यंजना इस सतसई में नहीं है। इस बड़े भारी भेद के होते हुए भी 'रामसतसईं' [[श्रृंगार रस]] का उत्तम ग्रंथ है इस सतसई के अतिरिक्त इन्होंने तीन पुस्तकें और लिखी हैं - &lt;br /&gt;
#वाणीभूषण, &lt;br /&gt;
#वृत्ततरंगिणी (संवत्र् 1873) और &lt;br /&gt;
#ककहरा।&lt;br /&gt;
*'वाणीभूषण' [[अलंकार]] का ग्रंथ है।  &lt;br /&gt;
*'वृत्ततरंगिणी' पिंगल का ग्रंथ है। &lt;br /&gt;
*'ककहरा' [[जायसी]] की '[[अखरावट]]' के ढंग की छोटी सी पुस्तक है और शायद सबसे बाद की रचना है, क्योंकि इसमें धर्म और नीति के उपदेश हैं। &lt;br /&gt;
*रामसहाय का कविता काल [[संवत्]] 1760से 1880 तक माना जा सकता है। - &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;गड़े नुकीले लाल के नैन रहैं दिन रैनि।&lt;br /&gt;
तब नाजुक ठोढ़ी न क्यों गाड़ परै मृदुबैनि?&lt;br /&gt;
भटक न, झटपट चटक कै अटक सुनट के संग।&lt;br /&gt;
लटक पीतपट की निपट हटकति कटक अनंग॥&lt;br /&gt;
लागे नैना नैन में कियो कहा धौ मैन।&lt;br /&gt;
नहिं लागै नैना रहैं लागे नैना नैन॥&lt;br /&gt;
गुलुफनि लगि ज्यों त्यों गयो, करि करि साहस जोर।&lt;br /&gt;
फिर न फिरयो मुरवान चपि, चित अति खात मरोर॥&lt;br /&gt;
यौ बिभाति दसनावली ललना बदन मँझार।&lt;br /&gt;
पति को नातो मानि कै मनु आई उडुमार॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 266-67| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201252</id>
		<title>रामसहाय दास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201252"/>
		<updated>2011-08-10T10:48:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: 'रामसहाय दास चौबेपुर ज़िला, बनारस के रहने वाले लाला भ...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रामसहाय दास चौबेपुर ज़िला, बनारस के रहने वाले लाला भवानीदास कायस्थ के पुत्र थे और काशी नरेश 'महाराज उदितनारायण सिंह' के आश्रय में रहते थे। 'बिहारी सतसई' के अनुकरण पर इन्होंने 'रामसतसईं' बनाई। [[बिहारी]] के अनुकरण पर बनी हुई पुस्तकों में इसी को प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इसके बहुत से दोहे सरस उद्भावना में बिहारी के दोहों के पास तक पहुँचते हैं, पर यह कहना कि ये दोहे बिहारी के दोहों में मिलाए जा सकते हैं, रसज्ञता और भावुकता से ही पुरानी दुश्मनी निकालना ही नहीं, बिहारी को भी कुछ नीचे गिराने का प्रयत्न समझा जाएगा। जहाँ तक शब्दों की कारीगरी और वाग्वैदग्ध्य से संबंध है वहीं तक अनुकरण करने का प्रयत्न किया गया है और सफलता भी हुई है। पर हावों का वह सुंदर व्यंजना विधान, चेष्टाओं का वह मनोहर चित्रण, [[भाषा]] का वह सौष्ठव, संचारियों की वह सुंदर व्यंजना इस सतसई में नहीं है। इस बड़े भारी भेद के होते हुए भी 'रामसतसईं' [[श्रृंगार रस]] का उत्तम ग्रंथ है इस सतसई के अतिरिक्त इन्होंने तीन पुस्तकें और लिखी हैं - &lt;br /&gt;
#वाणीभूषण, &lt;br /&gt;
#वृत्ततरंगिणी (संवत्र् 1873) और &lt;br /&gt;
#ककहरा।&lt;br /&gt;
*'वाणीभूषण' [[अलंकार]] का ग्रंथ है।  &lt;br /&gt;
*'वृत्ततरंगिणी' पिंगल का ग्रंथ है। &lt;br /&gt;
*'ककहरा' [[जायसी]] की '[[अखरावट]]' के ढंग की छोटी सी पुस्तक है और शायद सबसे बाद की रचना है, क्योंकि इसमें धर्म और नीति के उपदेश हैं। &lt;br /&gt;
*रामसहाय का कविता काल [[संवत्]] 1760से 1880 तक माना जा सकता है। - &lt;br /&gt;
गड़े नुकीले लाल के नैन रहैं दिन रैनि।&lt;br /&gt;
तब नाजुक ठोढ़ी न क्यों गाड़ परै मृदुबैनि?&lt;br /&gt;
भटक न, झटपट चटक कै अटक सुनट के संग।&lt;br /&gt;
लटक पीतपट की निपट हटकति कटक अनंग॥&lt;br /&gt;
लागे नैना नैन में कियो कहा धौ मैन।&lt;br /&gt;
नहिं लागै नैना रहैं लागे नैना नैन॥&lt;br /&gt;
गुलुफनि लगि ज्यों त्यों गयो, करि करि साहस जोर।&lt;br /&gt;
फिर न फिरयो मुरवान चपि, चित अति खात मरोर॥&lt;br /&gt;
यौ बिभाति दसनावली ललना बदन मँझार।&lt;br /&gt;
पति को नातो मानि कै मनु आई उडुमार॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 266-67| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9&amp;diff=201244</id>
		<title>नवलसिंह</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9&amp;diff=201244"/>
		<updated>2011-08-10T10:34:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: 'नवलसिंह जाति से कायस्थ थे और ये झाँसी के रहने वाले ...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;नवलसिंह जाति से कायस्थ थे और ये [[झाँसी]] के रहने वाले थे और 'समथर' नरेश 'राजा हिंदूपति' की सेवा में रहते थे। इन्होंने बहुत से ग्रंथों की रचना की है जो भिन्न भिन्न विषयों पर और भिन्न भिन्न शैली के हैं। नवलसिंह अच्छे चित्रकार भी थे। नवलसिंह का झुकाव भक्ति और ज्ञान की ओर विशेष था। इनके लिखे ग्रंथों के नाम ये हैं , &lt;br /&gt;
#रासपंचाध्यायी, &lt;br /&gt;
#रामचंद्रविलास, &lt;br /&gt;
#शंकामोचन (संवत् 1873), &lt;br /&gt;
#जौहरिनतरंग (1875), &lt;br /&gt;
#रसिकरंजनी (1877), &lt;br /&gt;
#विज्ञान भास्कर (1878), &lt;br /&gt;
#ब्रजदीपिका (1883), &lt;br /&gt;
#शुकरंभासंवाद (1888), &lt;br /&gt;
#नामचिंतामणि (1903), &lt;br /&gt;
#मूलभारत (1911), &lt;br /&gt;
#भारतसावित्री (1912), &lt;br /&gt;
#भारत कवितावली (1913), &lt;br /&gt;
#भाषा सप्तशती (1917), &lt;br /&gt;
#कवि जीवन (1918), &lt;br /&gt;
#आल्हा रामायण (1922), &lt;br /&gt;
#रुक्मिणीमंगल (1925), &lt;br /&gt;
#मूल ढोला (1925), &lt;br /&gt;
#रहस लावनी (1926), &lt;br /&gt;
#अध्यात्मरामायण, &lt;br /&gt;
#रूपक रामायण, &lt;br /&gt;
#नारी प्रकरण, &lt;br /&gt;
#सीतास्वयंबर, &lt;br /&gt;
#रामविवाहखंड, &lt;br /&gt;
#भारत वार्तिक, &lt;br /&gt;
#रामायण सुमिरनी, &lt;br /&gt;
#पूर्व श्रृंगारखंड, &lt;br /&gt;
#मिथिलाखंड, &lt;br /&gt;
#दानलोभसंवाद, &lt;br /&gt;
#जन्म खंड।&lt;br /&gt;
:अप्रकाशित&lt;br /&gt;
उक्त पुस्तकों में यद्यपि अधिकांश बहुत छोटी हैं फिर भी इनकी रचना बहुरूपता का आभास देती है। इनकी पुस्तकें प्रकाशित नहीं हुई हैं। अत: इनकी रचना के संबंध में विस्तृत और निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। खोज की रिपोर्टों में उद्धृत उदाहरणों के देखने से रचना इनकी पुष्ट और अभ्यस्त प्रतीत होती है। [[ब्रजभाषा]] में कुछ वार्तिक या गद्य भी इन्होंने लिखा है। -&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;अभव अनादि अनंत अपारा । अमन, अप्रान, अमर, अविकारा॥&lt;br /&gt;
अग अनीह आतम अबिनासी । अगम अगोचर अबिरल वासी॥&lt;br /&gt;
अकथनीय अद्वैत अरामा । अमल असेष अकर्म अकामा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सगुन सरूप सदा सुषमा निधान मंजु, &lt;br /&gt;
बुद्धि गुन गुनन अगाधा बनपति से। &lt;br /&gt;
भनै नवलेस फैल्यो बिशद मही में यस, &lt;br /&gt;
बरनि न पावै पार झार फनपति से।&lt;br /&gt;
जक्त निज भक्तन के कलषु प्रभंजै रंजै, &lt;br /&gt;
सुमति बढ़ावै धान धान धानपति से। &lt;br /&gt;
अवर न दूजो देव सहस प्रसिद्ध यह, &lt;br /&gt;
सिद्धि बरदैन सिद्ध ईस गनपति से।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 265-266| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=201243</id>
		<title>खुमान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=201243"/>
		<updated>2011-08-10T10:27:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: 'खुमान बंदीजन थे और चरखारी, बुंदेलखंड के 'महाराज विक...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;खुमान बंदीजन थे और चरखारी, [[बुंदेलखंड]] के 'महाराज विक्रमसाहि' के यहाँ रहते थे। इनके बनाए इन ग्रंथों का पता है - &lt;br /&gt;
#अमरप्रकाश (संवत् 1836), &lt;br /&gt;
#अष्टयाम (संवत् 1852), &lt;br /&gt;
#लक्ष्मणशतक (संवत् 1855), &lt;br /&gt;
#हनुमान नखशिख, &lt;br /&gt;
#हनुमान पंचक, &lt;br /&gt;
#हनुमान पचीसी, &lt;br /&gt;
#नीतिविधान, &lt;br /&gt;
#समरसार&amp;lt;ref&amp;gt; युद्ध यात्रा के मुहूर्त आदि का विचार&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#नृसिंह चरित्र (संवत् 1879), &lt;br /&gt;
#नृसिंह पचीसी।&lt;br /&gt;
इस सूची के अनुसार खुमान का कविताकाल [[संवत्]] 1830 से 1880 तक माना जा सकता है। 'लक्ष्मणशतक' में [[लक्ष्मण]] और [[मेघनाद]] का युद्ध बड़े फड़कते हुए शब्दों में कहा गया है। खुमान कविता में अपना उपनाम 'मान' रखते थे। - &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;आयो इंद्रजीत दसकंधा को निबंध बंधा,&lt;br /&gt;
बोल्यो रामबंधु सों प्रबंध किरवान को। &lt;br /&gt;
को है अंसुमाल, को है काल विकराल, &lt;br /&gt;
मेरे सामुहें भए न रहै मान महेसान को।&lt;br /&gt;
तू तौ सुकुमार यार लखन कुमार! मेरी&lt;br /&gt;
मार बेसुमार को सहैया घमासान को।&lt;br /&gt;
बीर न चितैया, रनमंडल रितैया, काल &lt;br /&gt;
कहर बितैया हौं जितैया मघवान को। &amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 265| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF&amp;diff=201239</id>
		<title>गणेश कवि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%A3%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF&amp;diff=201239"/>
		<updated>2011-08-10T10:22:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;गणेश 'नरहरि बंदीजन' के वंश में [[लाल कवि]] के पौत्र और गुलाब कवि के पुत्र थे। [[संवत्]] 1850 से लेकर 1910 तक वर्तमान थे। ये काशिराज महाराज उदितनारायण सिंह के दरबार में थे और महाराज ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह के समय तक जीवित रहे। इन्होंने तीन ग्रंथ लिखे #वाल्मीकि रामायण श्लोकार्थ प्रकाश &amp;lt;ref&amp;gt;बालकांड समग्र और किष्किंधा के पाँच अध्याय&amp;lt;/ref&amp;gt;, &lt;br /&gt;
#प्रद्युम्न विजय नाटक, &lt;br /&gt;
#हनुमत पचीसी।&lt;br /&gt;
प्रद्युम्नविजय नाटक समग्र पद्यबद्ध है और अनेक प्रकार के छंदों में सात अंकों में समाप्त हुआ है। इसमें दैत्यों के वज्रनाभपुर नामक नगर में प्रद्युम्न के जाने और प्रभावती से गंधर्व विवाह होने की कथा है। यद्यपि इसमें पात्रप्रवेश, विष्कंभक, प्रवेशक आदि नाटक के अंग रखे गए हैं पर इतिवृत्त का भी वर्णन पद्य में होने के कारण नाटकत्व नहीं आया है। -&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;ताही के उपरांत, कृष्ण इंद्र आवत भए। &lt;br /&gt;
भेंटि परस्पर कांत, बैठ सभासद मध्य तहँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोले हरि इंद्र सों बिनै कै कर जोरि दोऊ, &lt;br /&gt;
आजु दिगबिजय हमारे हाथ आयो है। &lt;br /&gt;
मेरे गुरु लोग सब तोषित भए हैं आजु,&lt;br /&gt;
पूरो तप, दान, भाग्य सफल सुहायो है&lt;br /&gt;
कारज समस्त सरे, मंदिर में आए आप, &lt;br /&gt;
देवन के देव मोहि धान्य ठहरायो है।&lt;br /&gt;
सो सुन पुरंदर उपेंद्र लखि आदर सों, &lt;br /&gt;
बोले सुनौ बंधु! दानवीर नाम पायो है&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 259-60| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=201238</id>
		<title>कृष्णदास रीतिकाल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=201238"/>
		<updated>2011-08-10T10:22:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;कृष्णदास (रीतिकाल) [[मिरज़ापुर]] के रहने वाले कोई [[कृष्ण]] भक्त जान पड़ते हैं। इन्होंने [[संवत्]] 1853 में 'माधुर्य लहरी' नाम की एक बड़ी पुस्तक 420 पृष्ठों की बनाई जिसमें विविध [[छंद|छंदों]] में 'कृष्णचरित' का वर्णन किया गया है। कविता इनकी साधारणत: अच्छी है। -&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;कौन काज लाज ऐसी करै जो अकाज अहो,&lt;br /&gt;
बार बार कहो नरदेव कहाँ पाइए।&lt;br /&gt;
दुर्लभ समाज मिल्यो सकल सिध्दांत जानि, &lt;br /&gt;
लीला गुन नाम धाम रूप सेवा गाइए।&lt;br /&gt;
बानी की सयानी सब पानी में बहाय दीजै, &lt;br /&gt;
जानी, सो न रीति जासों दंपति रिझाइए।&lt;br /&gt;
जैसी जैसी गही जिन लही तैसी नैननहू, &lt;br /&gt;
धान्य धान्य राधाकृष्ण नित ही गनाइए&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 259| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A8&amp;diff=201237</id>
		<title>सम्मन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A8&amp;diff=201237"/>
		<updated>2011-08-10T10:22:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;सम्मन मल्लावाँ (ज़िला हरदोई) के रहने वाले [[ब्राह्मण]] थे और [[संवत्]] 1834 में उत्पन्न हुए थे। इनके नीति के दोहे 'गिरधर की कुंडलिया' के समान गाँवों तक में प्रसिद्ध हैं। इनके कहने के ढंग में कुछ मार्मिकता है। 'दिनों के फेर' आदि के संबंध में इनके मर्मस्पर्शी दोहे स्त्रियों के मुँह से बहुत सुने जाते हैं। इन्होंने संवत् 1879 में 'पिंगल काव्यभूषण' नामक एक रीतिग्रंथ भी बनाया। पर ये अधिकतर अपने दोहों के लिए ही प्रसिद्ध हैं। इनका रचनाकाल संवत् 1860 से 1880 तक माना जा सकता है। -  &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;निकट रहे आदर घटे, दूरि रहे दुख होय।&lt;br /&gt;
सम्मन या संसार में, प्रीति करौ जनि कोय&lt;br /&gt;
सम्मन चहौ सुख देह कौ तौ छाँड़ौ ये चारि।&lt;br /&gt;
चोरी, चुगली, जामिनी और पराई नारि&lt;br /&gt;
सम्मन मीठी बात सों होत सबै सुख पूर।&lt;br /&gt;
जेहि नहिं सीखो बोलिबो, तेहि सीखो सब धूर&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 260| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201236</id>
		<title>ललकदास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201236"/>
		<updated>2011-08-10T10:21:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बेनी कवि के भँड़ौवा से ललकदास [[लखनऊ]] के कोई कंठीधारी महंत जान पड़ते हैं जो अपनी शिष्यमंडली के साथ इधर उधर फिरा करते थे। अत: [[संवत्]] 1860 और 1880 के बीच इनका वर्तमान रहना अनुमान किया जा सकता है। इन्होंने 'सत्योपाख्यान' नामक एक बड़ा वर्णनात्मक ग्रंथ लिखा है जिसमें [[राम|रामचंद्र]] के जन्म से लेकर विवाह तक की कथा बड़े विस्तार के साथ वर्णित है। इस ग्रंथ का उद्देश्य कौशल के साथ कथा चलाने का नहीं बल्कि जन्म की बधाई, बाललीला, [[होली]], जलक्रीड़ा, झूला, विवाहोत्सव आदि का बड़े ब्योरे और विस्तार के साथ वर्णन करने का है। जो उद्देश्य 'महाराज रघुराज सिंह' के 'रामस्वयंवर' का है वही इसका भी समझिए। पर इसमें सादगी है और यह केवल दोहों चौपाइयों में लिखा गया है। वर्णन करने में ललकदास जी ने [[भाषा]] के कवियों के भाव तो इकट्ठे ही किए हैं; [[संस्कृत]] कवियों के भाव भी कहीं कहीं रखे हैं। रचना अच्छी जान पड़ती है। - &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;धारि निज अंक राम को माता। लह्यो मोद लखि मुख मृदुगाता॥&lt;br /&gt;
दंतकुंद मुकुता सम सोहै। बंधुजीव सम जीभ बिमोहे॥ &lt;br /&gt;
किसलय सधार अधार छबि छाजैं। इंद्रनील सम गंड बिराजै॥ &lt;br /&gt;
सुंदर चिबुक नासिका सौहै। कुंकुम तिलक चिलक मन मोहे॥ &lt;br /&gt;
कामचाप सम भ्रुकुटि बिराजै। अलककलित मुख अति मुख अति छबि छाजै॥&lt;br /&gt;
यहि बिधि सकल राम के अंगा। लखि चूमति जननी सुख संगा॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 264-65| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9&amp;diff=201235</id>
		<title>मनियार सिंह</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9&amp;diff=201235"/>
		<updated>2011-08-10T10:20:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;मनियार सिंह [[काशी]] के रहने वाले क्षत्रिय थे। इन्होंने देवपक्ष में ही कविता की है और अच्छी की है। इनके निम्नलिखित ग्रंथों का पता है - &lt;br /&gt;
#भाषा महिम्न, &lt;br /&gt;
#सौंदर्यलहरी&amp;lt;ref&amp;gt; [[पार्वती]] या देवी की स्तुति&amp;lt;/ref&amp;gt;, &lt;br /&gt;
#हनुमतछबीसी, &lt;br /&gt;
#सुंदरकांड। &lt;br /&gt;
'भाषा महिम्न' इन्होंने संवत् 1841 में लिखा। इनकी [[भाषा]] सानुप्रास, शिष्ट और परिमार्जित है और उसमें ओज भी पूरा है। ये अच्छे कवि हो गए हैं। - &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;मेरो चित्त कहाँ दीनता में अति दूबरो है,&lt;br /&gt;
अधरम धूमरो न सुधि के सँभारे पै। &lt;br /&gt;
कहाँ तेरी ऋद्धि कवि बुद्धि धारा ध्वनि तें, &lt;br /&gt;
त्रिगुण तें परे ह्वै दरसात निरधारे पै&lt;br /&gt;
मनियार यातें मति थकित जकित ह्वै कै, &lt;br /&gt;
भक्तिबस धारि उर धीरज बिचारे पै।&lt;br /&gt;
बिरची कृपाल वाक्यमाला या पुहुपदंत, &lt;br /&gt;
पूजन करन काज करन तिहारे पै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेरे पद पंकज पराग राजै राजेश्वरी!&lt;br /&gt;
वेद बंदनीय बिरुदावली बढ़ी रहै।&lt;br /&gt;
जाकी किनुकाई पाय धाता ने धारित्री रची, &lt;br /&gt;
जापे लोक लोकन की रचना कढ़ी रहै।&lt;br /&gt;
मनियार जाहि विष्णु सेवैं सर्व पोषत में, &lt;br /&gt;
सेस ह्नै के सदा सीस सहस मढ़ी रहै।&lt;br /&gt;
सोई सुरासुर के सिरोमनि सदाशिव के, &lt;br /&gt;
भसम के रूप ह्वै सरीर पै चढ़ी रहै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभय कठोर बानी सुनि लछमन जू की, &lt;br /&gt;
मारिबे को चाहि जो सुधारी खल तरवारि।&lt;br /&gt;
वीर हनुमंत तेहि गरजि सुहास करि, &lt;br /&gt;
उपटि पकरि ग्रीव भूमि लै परे पछारि।&lt;br /&gt;
पुच्छ तें लपेटि फेरि दंतन दरदराइ, &lt;br /&gt;
नखन बकोटि चोंथि देत महि डारि टारि।&lt;br /&gt;
उदर बिदारि मारि लुत्थन को टारि बीर, &lt;br /&gt;
जैसे मृगराज गजराज डारे फारि-फारि&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 258-59| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201234</id>
		<title>मधुसूदन दास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=201234"/>
		<updated>2011-08-10T10:20:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;मधुसूदन दास माथुर चौबे थे। इन्होंने गोविंददास नामक किसी व्यक्ति के अनुरोध से [[संवत्]] 1839 में 'रामाश्वमेधा' नामक एक बड़ा और मनोहर [[प्रबंध काव्य]] बनाया, जो सब प्रकार से [[तुलसीदास|गोस्वामी]] जी के [[रामचरितमानस]] का परिशिष्ट ग्रंथ होने के योग्य है। इसमें [[राम|श्रीरामचंद्र]] द्वारा [[अश्वमेध यज्ञ]] का अनुष्ठान, घोड़े के साथ गई हुई सेना के साथ सुबाहु, दमन, विद्युन्माली राक्षस, वीरमणि, शिव, सुरथ आदि का घोर युद्ध, अंत में [[राम]] के पुत्र [[लव कुश|लव और कुश]] के साथ भयंकर संग्राम, श्रीरामचंद्र द्वारा युद्ध का निवारण और पुत्रों सहित [[सीता]] का [[अयोध्या]] में आगमन, इन सब प्रसंगों का [[पद्मपुराण]] के आधार पर बहुत ही विस्तृत और रोचक वर्णन है। ग्रंथ की रचना बिल्कुल [[रामचरितमानस]] की शैली पर हुई है। प्रधानता दोहों के साथ चौपाइयों की है, पर बीच बीच में गीतिका आदि और [[छंद]] भी हैं। &lt;br /&gt;
;भाषा सौष्ठव&lt;br /&gt;
पदविन्यास और [[भाषा]] सौष्ठव रामचरितमानस का सा ही है। प्रत्यय और रूप भी बहुत कुछ अवधी के रखे गए हैं। गोस्वामी जी की प्रणाली के अनुसरण में मधुसूदन दास जी को पूरी सफलता हुई है। इनकी प्रबंधकुशलता, कवित्वशक्ति और भाषा की शिष्टता तीनों उच्चकोटि की हैं। इनकी चौपाइयाँ अलबत्ता गोस्वामी जी चौपाइयों में बेखटक मिलाई जा सकती हैं। सूक्ष्म दृष्टिवाले भाषा मर्मज्ञों को केवल थोड़े ही से ऐसे स्थलों में भेद लक्षित हो सकता है जहाँ बोलचाल की भाषा होने के कारण भाषा का असली रूप अधिक स्फुटित है। ऐसे स्थलों पर गोस्वामी जी के अवधी के रूप और प्रत्यय न देखकर भेद का अनुभव हो सकता है। पर जैसा कहा जा चुका है, पदविन्यास की प्रौढ़ता और भाषा का सौष्ठव गोस्वामी जी के मेल का है। - &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;सिय रघुपति पद कंज पुनीता। प्रथमहिं बंदन करौं सप्रीता॥&lt;br /&gt;
मृदु मंजुल सुंदर सब भाँती। ससि कर सरिस सुभग नख पाँती॥&lt;br /&gt;
प्रणत कल्पतरु तर सब ओरा। दहन अज्ञ तम जन चित चोरा॥&lt;br /&gt;
त्रिविधा कलुष कुंजर घनघोरा। जगप्रसिद्ध केहरि बरजोरा॥&lt;br /&gt;
चिंतामणि पारस सुरधेनू। अधिक कोटि गुन अभिमत देनू॥&lt;br /&gt;
जन-मन मानस रसिक मराला। सुमिरत भंजन बिपति बिसाला॥&lt;br /&gt;
निरखि कालजित कोपि अपारा। विदित होय करि गदा प्रहारा॥&lt;br /&gt;
महावेगयुत आवै सोई। अष्टधातुमय जाय न जोई॥&lt;br /&gt;
अयुत भार भरि भार प्रमाना। देखिय जमपति दंड समाना॥&lt;br /&gt;
देखि ताहि लव हनि इषु चंडा। कीन्ही तुरत गदा त्रय खंडा॥&lt;br /&gt;
जिमि नभ माँह मेघ समुदाई। बरषहिं बारि महा झरि लाई॥&lt;br /&gt;
तिमि प्रचंड सायक जनु ब्याला। हने कीस तन लव तेहि काला॥&lt;br /&gt;
भए विकल अति पवन कुमारा। लगे करन तब हृदय बिचारा॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 257-58| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4&amp;diff=201233</id>
		<title>मंचित</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4&amp;diff=201233"/>
		<updated>2011-08-10T10:19:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;मंचित मऊ (बुंदेलखंड) के रहने वाले [[ब्राह्मण]] थे और [[संवत्]] 1836 में वर्तमान थे। इन्होंने [[कृष्ण|कृष्णचरित]] संबंधी दो पुस्तकें लिखी हैं, 'सुरभी दानलीला' और 'कृष्णायन'। &lt;br /&gt;
;सुरभी दानलीला&lt;br /&gt;
'सुरभी दानलीला' में बाललीला, यमलार्जुन पतन और दानलीला का विस्तृत वर्णन सार [[छंद]] में किया गया है। इसमें [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] का नखशिख भी बहुत अच्छा कहा गया है। &lt;br /&gt;
;कृष्णायन&lt;br /&gt;
'कृष्णायन' [[तुलसीदास]] जी की '[[रामायण]]' के अनुकरण पर दोहों चौपाइयों में लिखी गई है। इन्होंने [[तुलसीदास|गोस्वामी]] जी की पदावली तक का अनुकरण किया है। स्थान स्थान पर [[भाषा]] अनुप्रासयुक्त और [[संस्कृत]] गर्भित है, इससे ब्रजवासीदास की चौपाइयों की अपेक्षा इनकी चौपाइयाँ गोस्वामी जी की चौपाइयों से कुछ अधिक मेल खाती हैं। पर यह मेल केवल कहीं कहीं दिखाई पड़ जाता है। [[भाषा]] मर्मज्ञ को दोनों का भेद बहुत जल्दी स्पष्ट हो जाता है। इनकी [[भाषा]] [[ब्रजभाषा|ब्रज]] है, [[अवधी]] नहीं। उसमें वह सफाई और व्यवस्था कहाँ? कृष्णायन की अपेक्षा इनकी सुरभी दानलीला की रचना अधिक सरस है। - &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;कुंडल लोल अमोल कान के छुवत कपोलन आवैं।&lt;br /&gt;
डुलै आपसे खुलैं जोर छबि बरबस मनहिं चुरावैं&lt;br /&gt;
खौर बिसाल भाल पर सोभित केसर की चित्तभावैं।&lt;br /&gt;
ताके बीच बिंदु रोरी के, ऐसो बेस बनावैं&lt;br /&gt;
भ्रुकुटी बंक नैन खंजन से कंजन गंजनवारे।&lt;br /&gt;
मदभंजन खग मीन सदा जे मनरंजन अनियारे।&amp;lt;ref&amp;gt; सुरभी - दानलीला&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अचरज अमित भयो लखि सरिता। दुतिय न उपमा कहि सम चरिता॥ &lt;br /&gt;
कृष्णदेव कहँ प्रिय जमुना सी। जिमि गोकुल गोलोक प्रकासी॥&lt;br /&gt;
अति विस्तार पार पद पावन। उभय करार घाट मनभावन॥&lt;br /&gt;
बनचर बनज बिपुल बहु पच्छी। अलि अवली धुनि सुनि अति अच्छी॥&lt;br /&gt;
नाना जिनिस जीव सरि सेवैं। हिंसाहीन असन सुचि जैवैं॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 257| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=201232</id>
		<title>रामचंद्र</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=201232"/>
		<updated>2011-08-10T10:18:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रामचंद्र ने अपना कुछ भी परिचय नहीं दिया है। 'भाषा महिम्न' के कर्ता काशीवासी मनियारसिंह ने अपने को 'चाकर अखंडित श्री रामचंद्र पंडित के' लिखा है। मनियारसिंह ने अपना 'भाषा महिम्न' [[संवत्]] 1841 में लिखा। अत: इनका समय संवत् 1840 माना जा सकता है। इनकी एक पुस्तक 'चरणचंद्रिका' ज्ञात है। जिस पर इनका सारा यश स्थिर है। यह भक्तिरसात्मक ग्रंथ केवल 62 कवित्तों का है। इसमें [[पार्वती]] जी के चरणों का वर्णन अत्यंत रुचिकर और अनूठे ढंग से किया गया है। इस वर्णन से अलौकिक सुषमा, विभूति, शक्ति और शांति फूटी पड़ती है। उपास्य के एक अंग में अनंत ऐश्वर्य की भावना भक्ति की चरम भावुकता के भीतर ही संभव है। [[भाषा]] लाक्षणिक और पांडित्यपूर्ण है। - &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;नूपुर बजत मानि मृग से अधीन होत, &lt;br /&gt;
मीन होत जानि चरनामृत झरनि को। &lt;br /&gt;
खंजन से नचैं देखि सुषमा सरद की सी, &lt;br /&gt;
सचैं मधुकर से पराग केसरनि को &lt;br /&gt;
रीझि रीझि तेरी पदछबि पै तिलोचन के&lt;br /&gt;
लोचन ये, अंब! धारैं केतिक धारनि को।&lt;br /&gt;
फूलत कुमुद से मयंक से निरखि नख;&lt;br /&gt;
पंकज से खिलै लखि तरवा तरनि को&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानिए करींद्र जो हरींद्र को सरोष हरै, &lt;br /&gt;
मानिए तिमिर घेरै भानु किरनन को। &lt;br /&gt;
मानिए चटक बाज जुर्रा को पटकि मारै, &lt;br /&gt;
मानिए झटकि डारै भेक भुजगन को &lt;br /&gt;
मानिए कहै जो वारिधार पै दवारि औ&lt;br /&gt;
अंगार बरसाइबो बतावै बारिदन को। &lt;br /&gt;
मानिए अनेक विपरीत की प्रतीति, पै न&lt;br /&gt;
भीति आई मानिए भवानी - सेवकनको&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 256| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A4%BE&amp;diff=201231</id>
		<title>बोधा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A4%BE&amp;diff=201231"/>
		<updated>2011-08-10T10:18:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बोधा 'राजापुर' ज़िला , बाँदा  के रहनेवाले सरयूपारी [[ब्राह्मण]] थे। [[पन्ना]] के दरबार में इनके संबंधियों की अच्छी प्रतिष्ठा थी। उसी संबंध से ये बाल्यकाल ही में पन्ना चले गए। इनका नाम 'बुद्धिसेन' था, पर महाराज इन्हें प्यार से 'बोधा' कहने लगे और वही नाम इनका प्रसिद्ध हो गया। [[भाषा]] काव्य के अतिरिक्त इन्हें [[संस्कृत]] और [[फ़ारसी भाषा|फारसी]] का भी अच्छा बोध था। 'शिवसिंह सरोज' में इनका जन्म [[संवत्]] 1804 दिया हुआ है। इनका कविताकाल संवत् 1830 से 1860 तक माना जा सकता है।&lt;br /&gt;
;प्रेम&lt;br /&gt;
बोधा एक बड़े रसिक जीव थे। कहते हैं कि पन्ना के दरबार में सुभान (सुबहान) नाम की एक वेश्या थी जिस पर इनका प्रेम हो गया। इस पर रुष्ट होकर महाराज ने इन्हें छह [[मास|महीने]] देश निकाले का दंड दिया। सुभान के वियोग में छह महीने इन्होंने बड़े कष्ट से बिताए और उसी बीच में 'विरहवारीश' नामक एक पुस्तक लिखकर तैयार की। छह महीने पीछे जब ये फिर दरबार में लौटकर आए तब अपने 'विरहवारीश' के कुछ कवित्त सुनाए। महाराज ने प्रसन्न होकर उनसे कुछ माँगने को कहा। इन्होंने कहा 'सुभान अल्लाह'। महाराज ने प्रसन्न होकर सुभान को इन्हें दे दिया और इनकी मुराद पूरी हुई।&lt;br /&gt;
;प्रसिद्ध रचनाएँ&lt;br /&gt;
'विरहवारीश' के अतिरिक्त 'इश्कनामा' भी इनकी एक प्रसिद्ध पुस्तक है। इनके बहुत से फुटकल कवित्त, सवैये, इधर उधर पाए जाते हैं। बोधा एक रसोन्मत्त कवि थे, इससे इन्होंने कोई रीतिग्रंथ न लिखकर अपनी मौज के अनुसार फुटकल पद्यों की रचना की है। ये अपने समय के एक प्रसिद्ध कवि थे। प्रेममार्ग के निरूपण में इन्होंने बहुत से पद्य कहे हैं। 'प्रेम की पीर' की व्यंजना भी इन्होंने बड़े मर्मस्पर्शिनी युक्ति से की है। यत्र तत्र व्याकरण दोष रहने पर भी इनकी [[भाषा]] चलती और मुहावरेदार होती थी। उससे प्रेम की उमंग छलकी पड़ती है। इनके स्वभाव में फक्कड़पन भी कम नहीं था। 'नेजे', 'कटारी' और 'कुरबान' वाली बाजारू ढंग की रचना भी इन्होंने कहीं कहीं की है। जो कुछ हो, ये भावुक और रसज्ञ कवि थे, इसमें कोई संदेह नहीं। -&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;अति खीन मृनाल के तारहु तें तेहि ऊपर पाँव दै आवनो है। &lt;br /&gt;
सुई बेह कै द्वार सकै न तहाँ परतीति को टाँड़ो लदावनो है&lt;br /&gt;
कवि बोधा अनी घनी नेजहु तें चढ़ि तापै न चित्त डरावनो है। &lt;br /&gt;
यह प्रेम को पंथ कराल महा तरवारि की धार पै धाावनो है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक सुभान के आनन पै कुरबान जहाँ लगि रूप जहाँ को। &lt;br /&gt;
कैयो सतक्रतु की पदवी लुटिए लखि कै मुसकाहट ताको&lt;br /&gt;
सोक जरा गुजरा न जहाँ कवि बोधा जहाँ उजरा न तहाँ को।&lt;br /&gt;
जान मिलै तो जहान मिलै, नहिं जान मिलै तौ जहान कहाँ को&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबहूँ मिलिबो, कबहूँ मिलिबो, वह धीरज ही में धारैबो करै।&lt;br /&gt;
उर ते कढ़ि आवै, गरे ते फिरै, मन की मन ही में सिरैबो करै&lt;br /&gt;
कवि बोधा न चाँड़ सरी कबहूँ, नितही हरवा सो हिरैबो करै।&lt;br /&gt;
सहते ही बनै, कहते न बनै, मन ही मन पीर पिरैबो करै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिलि मिलि जानै तासों मिलि कै जनावै हेत,&lt;br /&gt;
हित को न जानै ताकौ हितू न विसाहिए।&lt;br /&gt;
होय मगरूर तापै दूनी मगरूरी कीजै, &lt;br /&gt;
लघु ह्वै चलै जो तासों लघुता निबाहिए&lt;br /&gt;
बोधा कवि नीति को निबेरो यही भाँति अहै, &lt;br /&gt;
आपको सराहै ताहि आपहू सराहिए।&lt;br /&gt;
दाता कहा, सूर कहा, सुंदर सुजान कहा, &lt;br /&gt;
आपको न चाहै ताके बाप को न चाहिए&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 255| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5&amp;diff=201230</id>
		<title>मणिदेव</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5&amp;diff=201230"/>
		<updated>2011-08-10T10:18:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;मणिदेव बंदीजन [[भरतपुर]] राज्य के 'जहानपुर' नामक गाँव के रहनेवाले थे और अपनी विमाता के दुर्व्यवहार से रुष्ट होकर [[काशी]] चले आए थे। काशी में वे [[गोकुलनाथ]] जी के यहाँ ही रहते थे। और स्थानों पर भी उनका बहुत मान हुआ था। जीवन के अंतिम दिनों में वे कभी कभी विक्षिप्त भी हो जाया करते थे। उनका परलोकवास [[संवत्]] 1920 में हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[गोकुलनाथ]],  [[गोपीनाथ]] और मणिदेव, इन तीनों महानुभावों ने मिलकर [[हिन्दी]] [[साहित्य]] में बड़ा भारी काम किया है। इन्होंने समग्र [[महाभारत]] और [[हरिवंश पुराण|हरिवंश]] &amp;lt;ref&amp;gt;जो महाभारत का ही परिशिष्ट माना जाता है&amp;lt;/ref&amp;gt; का अनुवाद अत्यंत मनोहर विविध छंदों में पूर्ण कवित्त के साथ किया है। कथा प्रबंध का इतना बड़ा काव्य हिन्दी साहित्य में दूसरा नहीं बना। यह लगभग दो हजार पृष्ठों में समाप्त हुआ है। इतना बड़ा ग्रंथ होने पर भी न तो इसमें कहीं शिथिलता आई है और न ही रोचकता और काव्यगुण में कमी हुई है। [[छंद|छंदों]] का विधान इन्होंने ठीक उसी रीति से किया है जिस रीति से इतने बड़े ग्रंथ में होना चाहिए। जो छंद उठाया है उसका कुछ दूर तक निर्वाह किया है। &lt;br /&gt;
[[केशवदास]] की तरह छंदों का तमाशा नहीं दिखाया है। छंदों का चुनाव भी बहुत उत्तम हुआ है। रूपमाला, घनाक्षरी, सवैया आदि मधुर छंद अधिक रखे गए हैं, बीच बीच में दोहे और चौपाइयाँ भी हैं। [[भाषा]] प्रांजल और सुव्यवस्थित है। अनुप्रास का अधिक आग्रह न होने पर भी आवश्यक विधान है। रचना सब प्रकार से साहित्यिक और मनोहर है और लेखकों की काव्यकुशलता का परिचय देती है। इस ग्रंथ के बनने में भी पचास वर्ष से ऊपर लगे हैं। अनुमानत: इसका आरंभ संवत् 1830 में हो चुका था और संवत् 1884 में जाकर समाप्त हुआ है। इसकी रचना काशी नरेश महाराज उदितनारायण सिंह की आज्ञा से हुई जिन्होंने इसके लिए लाखों रुपये व्यय किए। इस बड़े भारी साहित्यिक [[यज्ञ]] के अनुष्ठान के लिए हिन्दी प्रेमी उक्त महाराज के सदा कृतज्ञ रहेंगे।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;बचन यह सुनि कहत भो चक्रांग हंस उदार।&lt;br /&gt;
उड़ौगे मम संग किमि तुम कहहु सो उपचार&lt;br /&gt;
खाय जूठो पुष्ट, गर्वित काग सुनि ये बैन।&lt;br /&gt;
कह्यौ जानत उड़न की शत रीति हम बल ऐन&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last =आचार्य| first =रामचंद्र शुक्ल| title =हिन्दी साहित्य का इतिहास| edition =| publisher =कमल प्रकाशन, नई दिल्ली| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =हिन्दी | pages =पृष्ठ सं. 254-55| chapter =प्रकरण 3}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]] &lt;br /&gt;
[[Category:रीति_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%B0_%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=201221</id>
		<title>चन्द्रधर शर्मा गुलेरी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%B0_%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=201221"/>
		<updated>2011-08-10T09:46:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सखी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
चन्द्रधर शर्मा गुलेरी (जन्म-[[1883]] गुलेर ज़िला [[कांगड़ा]], मृत्यु- [[12 सितम्बर]], [[1922]] काशी) हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार थे।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म 1883 ई. गुलेर ज़िला कांगड़ा में हुआ था। उनके पिता [[संस्कृत]] के प्रसिद्ध पंडित शिवराम [[जयपुर]] नरेश के राजदरबार में थे। जब गुलेरी जी दस वर्ष के ही थे कि इन्होंने एक बार संस्कृत में भाषण देकर [[भारत]] [[धर्म]] महामंडल के विद्वानों को आश्चर्य चकित कर दिया था। पंडित कीर्तिधर शर्मा गुलेरी का यहाँ तक कहना था कि वे पाँच वर्ष में [[अंग्रेज़ी]] का टैलीग्राम अच्छी तरह पढ़ लेते थे। चन्द्रधर ने सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। चन्द्रधर बी.ए. की परीक्षा में सर्वप्रथम रहे। सन [[1904]] ई. में गुलेरी जी मेयो कॉलेज [[अजमेर]] में अध्यापक के रूप में कार्य करने लगे। चन्द्रधर का अध्यापक के रूप में उनका बड़ा मान-सम्मान था। अपने शिष्यों में चन्द्रधर लोकप्रिय तो थे ही इसके साथ अनुशासन और नियमों का वे सख्ती से अनुपालन करते थे। उनकी आसाधारण योग्यता से प्रभावित होकर [[पंडित मदनमोहन मालवीय]] ने उन्हें [[बनारस]] बुला भेजा और हिंन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद दिलाया।&amp;lt;ref name=&amp;quot;चन्द्रधर शर्मा गुलेरी&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://hindipatal.com/%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81/%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%B0-%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80/ |title=चन्द्रधर शर्मा गुलेरी |accessmonthday=[[20 जून]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=हिन्दी पटल – हिन्दी की उत्कृष्ट रचनाओं का उत्तम संग्रह |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==भाषा विशेषज्ञ==&lt;br /&gt;
प्रतिभा के धनी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने अपने अभ्यास से [[संस्कृत]], [[हिन्दी]], [[अंग्रेज़ी]], [[पालि भाषा|पालि]], [[प्राकृत]] और [[अपभ्रंश]] भाषाओं पर असाधारण अधिकार प्राप्त किया। उन्हें [[मराठी भाषा|मराठी]], [[बांग्ला भाषा|बंगला]], लैटिन, फ़्रैंच, [[जर्मनी|जर्मन]] आदि भाषाओं की भी अच्छी जानकारी थी। उनके अध्ययन का क्षेत्र बहुत विस्तृत था। [[साहित्य]], [[दर्शन शास्त्र|दर्शन]], भाषाविज्ञान, प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्त्व ज्योतिष सभी विषयों के वे विद्वान थे। इनमें से कोई विषय ऐसा नहीं था, जिस पर गुलेरी जी ने साधिकार लिखा न हो। वे अपनी रचनाओं में स्थल-स्थल पर [[वेद]], [[उपनिषद]], सूत्र, [[पुराण]], [[रामायण]], [[महाभारत]] के संदर्भों का संकेत दिया करते थे। इसीलिए इन ग्रन्थों से परिचित पाठक ही उनकी रचनाओं को भली-भाँति समझ सकता था। ग्रन्थ रचना की अपेक्षा स्फुट के रूप में ही उन्होंने अधिक साहित्य सृजन किया।&amp;lt;ref name=&amp;quot;भारतीय चरित कोश&amp;quot;&amp;gt;{{cite book | last =लीलाधर | first =शर्मा | title =भारतीय चरित कोश | edition = | publisher =शिक्षा भारती | location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय | language =[[हिन्दी]] | pages =264| chapter = }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==कृतियाँ==&lt;br /&gt;
;निबंध&lt;br /&gt;
निबंधकार के रूप में भी चंद्रधर जी बडे प्रसिद्ध रहे हैं। इन्होंने सौ से अधिक निबंध लिखे हैं। सन [[1903]] ई. में [[जयपुर]] से [[जैन]] वैद्य के माध्यम से समालोचक पत्र प्रकाशित होना शुरू हुआ था जिसके वे संपादक रहे। इन्होंने पूरे मनोयोग से समालोचक में अपने निबंध और टिप्पणियाँ देकर जीवंत बनाए रखा। चंद्रधर के निबंध विषय अधिकतर - इतिहास, [[दर्शन शास्त्र|दर्शन]], [[धर्म]], मनोविज्ञान और पुरातत्व संबंधी ही हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*शैशुनाक की मूर्तियाँ &lt;br /&gt;
*देवकुल&lt;br /&gt;
*पुरानी हिन्दी &lt;br /&gt;
*संगीत&lt;br /&gt;
*कच्छुआ धर्म&lt;br /&gt;
*आँख&lt;br /&gt;
*मोरेसि मोहिं कुठाऊँ &lt;br /&gt;
*सोहम आदि जैसे निबंधों पर उनकी विद्वता की अमिट छाप मौजूद है। &lt;br /&gt;
;कविताएँ&lt;br /&gt;
*एशिया की विजय दशमी &lt;br /&gt;
*भारत की जय &lt;br /&gt;
*वेनॉक बर्न &lt;br /&gt;
*आहिताग्नि&lt;br /&gt;
*झुकी कमान&lt;br /&gt;
*स्वागत &lt;br /&gt;
*रवि&lt;br /&gt;
*ईश्वर से प्रार्थना &lt;br /&gt;
*सुनीति आदि इनकी कतिपय श्रेष्ठ कविताएँ हैं। ये कविताएँ गुलेरी विषयक संपादित गंथों में संकलित हैं। &lt;br /&gt;
;कहानी संग्रह &lt;br /&gt;
*उसने कहा था&lt;br /&gt;
*सुखमय जीवन&lt;br /&gt;
*बुद्धु का काँटा&amp;lt;ref name=&amp;quot;चन्द्रधर शर्मा गुलेरी&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==ख्याति ==&lt;br /&gt;
चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की [[हिन्दी साहित्य]] में सबसे अधिक ख्याति [[1915]] में ‘सरस्वती’ मासिक में प्रकाशित कहानी ‘उसने कहा था’ के कारण हुई। यह कहानी शिल्प और विषय-वस्तु की [[दृष्टि]] से आज भी ‘मील का पत्थर’ मानी जाती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;भारतीय चरित कोश&amp;quot; /&amp;gt; &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की मृत्यु [[12 सितम्बर]] [[1922]] ई. में [[काशी]] में हुई।&amp;lt;ref name=&amp;quot;चन्द्रधर शर्मा गुलेरी&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध=}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{साहित्यकार}}&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्यकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सखी</name></author>
	</entry>
</feed>