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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>विजयादशमी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''विजय दशमी / दशहरा '''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramlila-Mathura-6.jpg|thumb|250px|दशहरा, [[रामलीला]] मैदान, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Dussera, Ramlila Ground, Mathura]]&lt;br /&gt;
आश्विन शुक्ल दशमी को विजयदशमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है । यह  हमारा   राष्ट्रीय  पर्व  है। [[रामलीला]] में जगह–जगह [[रावण]] वध का प्रदर्शन होता है । क्षत्रियों के यहाँ शस्त्र की पूजा होती है । [[ब्रज]] मन्दिरों में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस  दिन  नीलकंठ  का   दर्शन   बहुत  शुभ  माना  जाता  है। यह  त्योहार  क्षत्रियों   का   माना  जाता  है। इसमें   अपराजिता  देवी  की  पूजा  होती  है। यह  पूजन  भी  सर्वसुख  देने  वाला  है। दशहरा या विजया दशमी [[नवरात्रि]] के बाद दसवें दिन मनाया जाता है। इस दिन [[राम]] ने रावण का वध किया था । रावण राम की पत्नी [[सीता]] का अपहरण कर  [[लंका]] ले गया था। भगवान राम युद्ध की देवी मां [[दुर्गा]] के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन दुष्ट रावण का वध किया। इसके बाद राम ने भाई [[लक्ष्मण]], भक्त [[हनुमान]], और बंदरों की सेना के साथ एक बड़ा युद्ध लड़कर  सीता को छुड़ाया। इसलिए विजयादशमी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण दिन है। इस दिन रावण, उसके भाई [[कुम्भकर्ण]] और पुत्र [[मेघनाद]] के पुतले खुली जगह में जलाए जाते हैं। कलाकार राम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण करते हैं और  आग के तीर से इन पुतलों को मारते हैं जो पटाखों से भरे होते हैं। पुतले में आग लगते ही वह धू धू कर जलने लगता है और इनमें लगे पटाखे फटने लगते हैं और जिससे  इनका अंत हो जाता है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विजयादशमी के दस सूत्र==&lt;br /&gt;
*दस इन्द्रियों पर विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
*असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
*बहिर्मुखता पर अंतर्मुखता की विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
*अन्याय पर न्याय की विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
*दुराचार पर सदाचार की विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
*तमोगुण पर दैवीगुण की विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
*दुष्कर्मों पर सत्कर्मों की विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
*भोग पर योग की विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
*असुरत्व पर देवत्व की विजय का पर्व है तथा,&lt;br /&gt;
*जीवत्व पर शिवत्व की विजय का पर्व है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-8.jpg|thumb|250px|left|[[रावण]] दहन, [[रामलीला]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ravana Dahan, Ramlila, Mathura]]&lt;br /&gt;
==वनस्पति पूजन==&lt;br /&gt;
विजयदशमी पर दो विशेष प्रकार की वनस्पतियों के पूजन का महत्त्व है- &lt;br /&gt;
*एक है शमी वृक्ष, जिसका पूजन रावण दहन के बाद करके इसकी पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान किया जाता है। इस परंपरा में विजय उल्लास पर्व की कामना के साथ समृद्धि की कामना करते हैं। &lt;br /&gt;
*दूसरा है अपराजिता (विष्णु-क्रांता)। यह पौधा अपने नाम के अनुरूप ही है। यह विष्णु को प्रिय है और प्रत्येक परिस्थिति में सहायक बनकर विजय प्रदान करने वाला है। नीले रंग के पुष्प का यह पौधा [[भारत]] में सुलभता से उपलब्ध है। घरों में समृद्धि के लिए तुलसी की भाँति इसकी नियमित सेवा की जाती है&lt;br /&gt;
==मेला==&lt;br /&gt;
दशहरा पर्व को मनाने के लिए जगह जगह बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। यहाँ लोग अपने परिवार, दोस्तों के साथ आते हैं और खुले आसमान के नीचे मेले का पूरा आनंद लेते हैं। मेले में तरह तरह की वस्तुएँ, चूड़ियों से लेकर खिलौने और कपड़े बेचे जाते हैं। इसके साथ ही मेले में व्यंजनों की भी भरमार रहती है। &lt;br /&gt;
==रामलीला== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-2.jpg|दशानन [[रावण]], [[रामलीला]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ravana, Ramlila, Mathura|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
दशहरा उत्सव में रामलीला भी महत्त्वपूर्ण  है। रामलीला में राम, सीता और लक्ष्मण की जीवन का वृत्तांत का वर्णन किया जाता है। रामलीला नाटक का मंचन देश के विभिन्न क्षेत्रों में होता है। यह देश में अलग अलग तरीक़े से मनाया जाता है। बंगाल और मध्य [[भारत]] के अलावा दशहरा पर्व देश के अन्य राज्यों में क्षेत्रीय विषमता के बावजूद एक समान उत्साह और शौक़ से मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नवदुर्गा==&lt;br /&gt;
शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्री रामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की।  तभी से असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाता है। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएँ अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा चाहते हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी [[देवता]], राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा के लिए उपासना रत रहते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-9.jpg|thumb|250px|left|[[रावण]] दहन, [[रामलीला]], [[मथुरा]]]]&lt;br /&gt;
==सावधानियाँ==  &lt;br /&gt;
*सावधान और सजग रहें। असावधानी और लापरवाही से मनुष्य बहुत कुछ खो बैठता है। विजयादशमी और दीपावली के आगमन पर इस त्योहार का आनंद, ख़ुशी और उत्साह बनाये रखने के लिए सावधानीपूर्वक रहें।&lt;br /&gt;
*पटाखों के साथ खिलवाड़ न करें। उचित दूरी से पटाखे चलाएँ।&lt;br /&gt;
*मिठाइयों और पकवानों की शुद्धता, पवित्रता का ध्यान रखें । &lt;br /&gt;
*भारतीय संस्कृति के अनुसार आदर्शों व सादगी से मनायें। पाश्चात्य जगत का अंधानुकरण ना करें।&lt;br /&gt;
*पटाखे घर से दूर चलायें और आस-पास के लोगों की असुविधा के प्रति सजग रहें।&lt;br /&gt;
*स्वच्छ्ता और पर्यावरण का ध्यान रखें।&lt;br /&gt;
*पटाखों से बच्चों को  उचित दूरी बनाये रखने और सावधानियों को प्रयोग करने का सहज ज्ञान दें।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Dussehra.jpg|[[रावण]], दशहरा&lt;br /&gt;
चित्र:Dussehra-1.jpg|[[रावण]] दहन, भगत सिंह पार्क, [[जयपुर]]&lt;br /&gt;
चित्र:Dussehra-2.jpg|दशहरा, [[जालंधर]], [[पंजाब]]&lt;br /&gt;
चित्र:Dussehra-3.jpg|[[रावण]] दहन, दशहरा&lt;br /&gt;
चित्र:Dussehra-4.jpg|[[रावण]] दहन, दशहरा&lt;br /&gt;
चित्र:Dussehra-5.jpg|दशहरा, [[पुणे]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पर्व और त्योहार}}&lt;br /&gt;
{{व्रत और उत्सव}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:व्रत और उत्सव]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
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|विवरण=[[रावण]] दहन, [[दशहरा]]&lt;br /&gt;
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|अन्य विवरण=आश्विन शुक्ल दशमी को विजयदशमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह हमारा  राष्ट्रीय पर्व है। [[रामलीला]] में जगह–जगह [[रावण]] वध का प्रदर्शन होता है। क्षत्रियों के यहाँ शस्त्र की पूजा होती है। [[ब्रज]] मन्दिरों में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[दशहरा]], [[जालंधर]], [[पंजाब]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/gopal1035/ गोपाल अग्रवाल]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/gopal1035/4177338096/ Dussehra Celebrations]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/gopal1035/ gopal1035's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=आश्विन शुक्ल दशमी को विजयदशमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह हमारा  राष्ट्रीय पर्व है। [[रामलीला]] में जगह–जगह [[रावण]] वध का प्रदर्शन होता है। क्षत्रियों के यहाँ शस्त्र की पूजा होती है। [[ब्रज]] मन्दिरों में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike= &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<updated>2011-10-03T12:22:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[रावण]] दहन, भगत सिंह पार्क, [[जयपुर]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/xclockwise/ counterclockwise]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/xclockwise/3968476161/ Ravana]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/xclockwise/ counterclockwise's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=आश्विन शुक्ल दशमी को विजयदशमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह हमारा  राष्ट्रीय पर्व है। [[रामलीला]] में जगह–जगह [[रावण]] वध का प्रदर्शन होता है। क्षत्रियों के यहाँ शस्त्र की पूजा होती है। [[ब्रज]] मन्दिरों में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[रावण]], दशहरा, भगत सिंह पार्क, [[जयपुर]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/xclockwise/ counterclockwise]&lt;br /&gt;
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|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
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|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/xclockwise/3969248502/ the big Ravana]&lt;br /&gt;
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|आभार=[http://www.flickr.com/photos/xclockwise/ counterclockwise's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=आश्विन शुक्ल दशमी को विजयदशमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह हमारा  राष्ट्रीय पर्व है। [[रामलीला]] में जगह–जगह [[रावण]] वध का प्रदर्शन होता है। क्षत्रियों के यहाँ शस्त्र की पूजा होती है। [[ब्रज]] मन्दिरों में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>रामोजी फ़िल्म सिटी</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Ramoji-Film-City-Hyderabad.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=रामोजी फ़िल्म सिटी, हैदराबाद&lt;br /&gt;
|विवरण=रामोजी फ़िल्म सिटी लगभग 2000 एकड़ में फैली हुई है।  &lt;br /&gt;
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|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज, रेल, बस, टैक्सी &lt;br /&gt;
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|रेलवे स्टेशन=सिंकदराबाद रेलवे स्टेशन, नामपल्ली रेलवे स्टेशन, काचीगुड़ा रेलवे स्टेशन &lt;br /&gt;
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|यातायात=टैक्सी, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा, बस, आदि&lt;br /&gt;
|क्या देखें=ड्रीम वैली, अंब्रेला गार्डन, एनिमल गार्डन, जापानी गार्ड&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, अतिथि ग्रह, धर्मशाला &lt;br /&gt;
|क्या खायें=[[हैदराबादी बिरयानी]], मिर्ची का सालन, भरवा बैंगन, हलीम, कबाब &lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=040&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=लगभग सभी &lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=Ramoji+Film+City,+Hyderabad,+Andhra+Prades&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=17.312396,78.682709&amp;amp;spn=0.010243,0.01929&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=42.120065,79.013672&amp;amp;vpsrc=0&amp;amp;hq=Ramoji+Film+City,&amp;amp;hnear=Hyderabad,+Ranga+Reddy,+Andhra+Pradesh&amp;amp;t=m&amp;amp;z=16&amp;amp;iwloc=A गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[चारमीनार]], [[गोलकुंडा|गोलकुंडा क़िला]], [[हुसैन सागर झील]], [[मक्का मस्जिद हैदराबाद|मक्का मस्जिद]], [[सालारजंग संग्रहालय]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|16:36, 30 सितम्बर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*रामोजी फ़िल्म सिटी हैदराबाद की एक आकर्षक पर्यटन स्थल है। &lt;br /&gt;
*रामोजी फ़िल्म सिटी हयातनगर में स्थित है। &lt;br /&gt;
*पर्यटकों की यात्रा [[हैदराबाद]] आने के बाद तब तक पूरी नहीं होती है, जब तक वह रामोजी फ़िल्म सिटी घूम न लें। &lt;br /&gt;
*रामोजी फ़िल्म सिटी लगभग 2000 एकड़ में फैली हुई है।  &lt;br /&gt;
*रामोजी फ़िल्म सिटी अद्भुत कल्पनालोक का बेजोड़ नमूना है। &lt;br /&gt;
*वैसे तो यह फ़िल्मों की शूटिंग का केंद्र है, लेकिन पर्यटकों को लुभाने के लिए यहाँ पर ड्रीम वैली, अंब्रेला गार्डन, एनिमल गार्डन, जापानी गार्डन वगैरह हैं। &lt;br /&gt;
*रामोजी फ़िल्म सिटी में फोटो खिंचवाने के लिए लुभावने सेट्स भी हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ बच्चों के लिए एक स्पेशल फन पार्क है, जहाँ की सैर बड़ों को भी बहुत लुभाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश]][[Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल]][[Category:हैदराबाद]][[Category:हैदराबाद के पर्यटन स्थल]][[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>सदस्य:प्रीति चौधरी/अभ्यास पन्ना</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Salarjung-Museum.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=सालारजंग संग्रहालय, हैदराबाद&lt;br /&gt;
|विवरण=सालारजंग संग्रहालय [[एशिया]] का सबसे बड़ा और पुराना संग्रहालय है। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[आंध्र प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[हैदराबाद ज़िला|हैदराबाद]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=[[16 दिसंबर]], 1951&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 17.371426°; पूर्व- 78.480347°&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=सालारजंग संग्रहालय [[हैदराबाद]] से 2.8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=सालारजंग संग्रहालय का एक मुख्य आकर्षण 19वीं [[सदी]] की ब्रिटिश संगीतमय घड़ी है, जिसे [[इंग्लैंड]] से लाया गया है। इस घड़ी को देखने के लिए घड़ी के सामने बाकायदा बेंच और कुसिर्यों का इंतज़ाम किया गया है। &lt;br /&gt;
|कब जाएँ=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज, रेल, बस, टैक्सी &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=राजीव गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, बेगमपेट हवाई अड्डा &lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=सिंकदराबाद रेलवे स्टेशन, नामपल्ली रेलवे स्टेशन, काचीगुड़ा रेलवे स्टेशन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=महात्मा गाँधी (इम्लिबन) बस अड्डा &lt;br /&gt;
|यातायात=टैक्सी, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा, बस आदि। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=औरंगज़ेब की तलवार, [[राजा रवि वर्मा]] द्वारा बनाई गई तसवीरे, [[टीपू सुल्तान]] का वस्त्रागार, [[सोना|सोने]] और [[हीरा|हीरे]] से बने टिफिन बॉक्स&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, अतिथि ग्रह, धर्मशाला &lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=040 &lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.com/maps?q=Salarjung+Museum+++&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=17.37161,78.480234&amp;amp;spn=0.019168,0.038581&amp;amp;sll=37.0625,-95.677068&amp;amp;sspn=32.610437,79.013672&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hq=Salarjung+Museum&amp;amp;radius=15000&amp;amp;t=m&amp;amp;z=15 गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[चारमीनार]], [[गोलकुंडा|गोलकुंडा क़िला]], [[हुसैन सागर झील]], [[मक्का मस्जिद हैदराबाद|मक्का मस्जिद]], [[रामोजी फ़िल्म सिटी]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=सालारजंग संग्रहालय की 38 गैलरियों में 43 हज़ार से ज़्यादा कलाकृतियाँ, 9 हज़ार पांडुलिपियाँ और 47 हज़ार मुद्रित पुस्तकें हैं। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.salarjungmuseum.in/home.asp सालारजंग संग्रहालय]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: विजय दशमी को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[विजय दशमी]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<updated>2011-10-03T11:40:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: विजय दशमी को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[विजय दशमी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>सदस्य:लक्ष्मी गोस्वामी/अभ्यास4</title>
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		<updated>2011-10-03T11:38:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Munnar-Hill-Station-Kerala.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=मुन्नार &lt;br /&gt;
|विवरण=मुन्नार [[केरल]] का एक ख़ूबसूरत हिल स्टेशन है। मुन्नार केरल के इडुक्की ज़िलें में 6000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।&lt;br /&gt;
|राज्य=[[केरल]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=इडुक्की&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 10°07, पूर्व 77°04&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=मुन्नार [[कोच्चि]] से 127 किलोमीटर, [[मदुरई]] से 156 किलोमीटर, [[कन्नूर]] से 365 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=मुन्नार की सुन्दरता के कारण मुन्नार को ईश्वर का देश भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[सितम्बर]] से [[मई]]&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल, बस आदि से पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=कोच्चि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा &lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=अलुवा रेलवे स्टेशन, एरनाकुलम जंक्शन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=&lt;br /&gt;
|यातायात=बस, टैक्सी आदि। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[चाय]] के बागान, राजमाला, चितीरापुरम और इकोपाइंट&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, धर्मशाला, रिसॉर्ट &lt;br /&gt;
|क्या खायें=मसालेदार काजू, फिश करी&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=[[चाय]], कॉफी, मसाले (दालचीनी, [[लौंग]], [[इलायची]] और [[काली मिर्च]]) &lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=04865&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=लगभग सभी &lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=Munnar&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=10.213571,77.078705&amp;amp;spn=0.63116,0.883026&amp;amp;sll=10.166264,77.121277&amp;amp;sspn=1.262486,1.766052&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hnear=Munnar,+Idukki,+Kerala&amp;amp;t=m&amp;amp;z=10&amp;amp;iwloc=A गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=मुन्नार में वनों की वनस्पति तथा हरे घास के मैदानों में 'नीलकुरंजी' नामक फूल पाया जाता है। यह फूल बारह वर्षों में केवल एक बार खिलता है जिससे पूरी पहाड़ी [[नीला रंग|नीली]] हो जाती है।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>ग्रंथ</title>
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		<updated>2011-10-03T11:14:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Guru-Granth-Sahib.jpg|thumb|गुरु ग्रंथ साहिब]]&lt;br /&gt;
*ग्रंथ वह किताब या पुस्तक जिसके पन्नें या पृष्ठ पहले गाँठ बाँधकर रखे जाते थे। &lt;br /&gt;
*ग्रंथ [[धर्म|धार्मिक]] या [[साहित्य|साहित्यिक]] दृष्टि से कोई महत्त्वपूर्ण बड़ी पुस्तक है। [[संस्कृत]] के ग्रंथ तथा [[अभिलेख]] लिखने के लिए जिस [[लिपि]] का दक्षिण भारत में उपयोग होता था, उसी को आगे चलकर ‘[[ग्रन्थ लिपि]]’ का नाम दिया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:शब्द संदर्भ कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=गुरु ग्रंथ साहिब&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/mrsikhnet/ Gurumustuk Singh]&lt;br /&gt;
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|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=[[सिख धर्म]] का प्रमुख [[ग्रंथ]] गुरु ग्रंथ साहिब है। गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: ग्रंथ को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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&lt;hr /&gt;
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		<title>तट</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Anjuna-Beach-1.jpg|thumb|[[अंजुना तट गोवा|अंजुना तट]], [[गोवा]]]]&lt;br /&gt;
*तट स्थल का वह भाग जो जलाशय के किसी पार्श्व से ठीक मिला या सटा हुआ हो। &lt;br /&gt;
*किसी नदी, [[सागर]], तालाब, [[झील]] के किनारे स्थित ज़मीन के सूखे भाग को तट कहा जाता हैं &lt;br /&gt;
*तट को ढलवाँ ज़मीन या ढाल, खेत, भूमिखंड, प्रांत, आदि नाम से भी जाना जाता है। &lt;br /&gt;
*तट [[शिव]] का एक नाम भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:सागर]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>पठार</title>
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		<updated>2011-10-03T10:48:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kaas-Plateau.jpg|thumb|कास पठार]]&lt;br /&gt;
*पठार ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: Plateau) परिवर्ती भूक्षेत्र की अपेक्षा अत्याधिक ऊंचाई वाली लगभग सपाट भूमि होती है।&lt;br /&gt;
*वह ऊँचा विस्तृत मैदान जो समीपवर्ती निचले प्रदेशों में ढालुएँ अंश से मिला रहता है तथा जिसका ऊपरी भाग बहुत अधिक चौड़ा और चपटा होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पहाड़ी और पठार]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=कास पठार&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/ankurp/ अंकुर]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
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|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/ankurp/6183919173/ Kaas plateau]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/ankurp/ Ankur P's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=[[पठार]] ([[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]: Plateau) परिवर्ती भूक्षेत्र की अपेक्षा अत्याधिक ऊंचाई वाली लगभग सपाट भूमि होती है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial= &lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>चित्र:Kaas-Plateau.jpg</title>
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		<updated>2011-10-03T10:39:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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		<title>शिलालेख</title>
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		<updated>2011-10-03T10:28:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Brahmi Lipi-3.jpg|thumb|[[अशोक के शिलालेख]]]]&lt;br /&gt;
वह पत्थर जिस पर लेख आदि खुदा हो, शिलालेख कहलाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|अशोक के शिलालेख|पुरालेख}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पुरातत्त्व}}&lt;br /&gt;
[[Category:पुरातत्त्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:पुरातत्व विज्ञान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>सदस्य:प्रीति चौधरी/अभ्यास पन्ना2</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%80/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE2&amp;diff=223013"/>
		<updated>2011-10-03T10:17:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Mecca-Masjid-Hyderabad.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=मक्का मस्जिद, [[हैदराबाद]] &lt;br /&gt;
|विवरण=ऐसा माना जाता है कि यह हैदराबाद और सिकंदराबाद की सबसे बड़ी मस्जिद है। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[आंध्र प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[हैदराबाद ज़िला|हैदराबाद]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=[[मुहम्मद कुली क़ुतुबशाह]]&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=1617-1684&lt;br /&gt;
|स्थापना=1694&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- ﻿17.360305° पूर्व- 78.473416°&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=मक्का मस्जिद, [[चारमीनार]] के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज, रेल, बस, टैक्सी &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=राजीव गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, बेगमपेट हवाई अड्डा &lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=सिंकदराबाद रेलवे स्टेशन, नामपल्ली रेलवे स्टेशन, काचीगुड़ा रेलवे स्टेशन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=महात्मा गाँधी (इम्लिबन) बस अड्डा &lt;br /&gt;
|यातायात=टैक्सी, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा, बस आदि। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[रामोजी फ़िल्म सिटी]], [[चारमीनार]], [[लुंबनी उद्यान हैदराबाद|लुंबनी उद्यान]], [[नेहरू जैविक उद्यान हैदराबाद|नेहरू जैविक उद्यान]], [[गोलकुंडा|गोलकुंडा क़िला]]&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, अतिथि ग्रह, धर्मशाला &lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=040 &lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=Mecca+Masjid,+Hyderabad,+Andhra+Pradesh&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=17.374887,78.481092&amp;amp;spn=0.03637,0.077162&amp;amp;sll=17.36155,78.47475&amp;amp;sspn=0.038339,0.077162&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hq=Mecca+Masjid,&amp;amp;hnear=Hyderabad,+Ranga+Reddy,+Andhra+Pradesh&amp;amp;t=m&amp;amp;z=14&amp;amp;iwloc=lyrftr:m,14672775358826719994,17.361616,78.474741 गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=यह कहा जाता है कि यहाँ के मुख्य मेहराब को [[मक्का (अरब)|मक्का]] से लाए गए पत्थरों से बनाया गया था, इसलिए इसका नाम मक्का मस्जिद रखा गया। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%81_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;diff=223003</id>
		<title>हुमायूँ का मक़बरा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%81_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;diff=223003"/>
		<updated>2011-10-03T09:45:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Humayun-Tomb-Delhi-23.jpg&lt;br /&gt;
|विवरण=हुमायूँ का मक़बरा [[नई दिल्ली]] के दीनापनाह अर्थात [[पुराना क़िला दिल्ली|पुराने क़िले]] के निकट संत [[निज़ामुद्दीन दरगाह|निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह]] के पास [[मथुरा]] मार्ग के निकट [[यमुना नदी]] के किनारे स्थित है। हुमायूँ का मक़बरा [[मुग़ल]] स्थापत्य कला या मुग़ल वास्तुकला से सम्बंधित है। &lt;br /&gt;
|राज्य=&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=[[राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|ज़िला=&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=1565-1572&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 28°36′36, पूर्व- 77°13′48&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि='''[[यूनेस्को]] की विश्व विरासत''' की सूची में शामिल हुमायूँ का मक़बरा [[भारत]] का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। &lt;br /&gt;
|कब जाएँ=&lt;br /&gt;
|यातायात=साईकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, लोकल रेल, मेट्रो रेल, बस&lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, हज़रत निज़ामुद्दीन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=&lt;br /&gt;
|क्या देखें=&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह&lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=011&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=लावारिस वस्तुओं को ना छुएं, शीत ऋतु में कोहरे से और ग्रीष्म ऋतु में लू से बचाव करें।&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?f=q&amp;amp;source=s_q&amp;amp;hl=en&amp;amp;geocode=&amp;amp;q=delhi&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=47.178555,93.076172&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;hq=&amp;amp;hnear=New+Delhi,+Delhi+110001&amp;amp;z=11 गूगल मानचित्र], [http://maps.google.co.in/maps?f=d&amp;amp;source=s_d&amp;amp;saddr=Indira+Gandhi+International+Airport,+Shahabad+Muhammadpur,+Dwarka,+New+Delhi,+Delhi&amp;amp;daddr=New+Delhi&amp;amp;geocode=FfHDswEdpVyYBClNTuzGhRsNOTH2SFQ6ajIXfg%3BFazwtAEdAFyaBCkttn40W_0MOTHOTSBOSbfCUg&amp;amp;hl=en&amp;amp;mra=ls&amp;amp;sll=28.638849,77.223673&amp;amp;sspn=0.032467,0.077162&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;z=12 इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[लाल क़िला दिल्ली|लाल क़िला]], [[इण्डिया गेट]], [[जामा मस्जिद दिल्ली|जामा मस्जिद]], [[राष्ट्रपति भवन]] ।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|12:38, 14 जुलाई 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
हुमायूँ का मक़बरा [[नई दिल्ली]] के दीनापनाह अर्थात [[पुराना क़िला दिल्ली|पुराने क़िले]] के निकट संत [[निज़ामुद्दीन दरगाह|निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह]] के पास [[मथुरा]] मार्ग के निकट [[यमुना नदी]] के किनारे स्थित है। हुमायूँ का मक़बरा [[मुग़ल]] स्थापत्य कला या मुग़ल वास्तुकला से सम्बंधित है। [[हुमायूँ]] एक महान मुग़ल बादशाह था जिसकी मृत्यु शेर मंडल पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिर कर हुई थी। हुमायूँ का मक़बरा उनकी पत्नी हाजी बेगम ने हुमायूँ की याद में हुमायूँ की मृत्यु के आठ साल बाद बनवाया था। [[ग़ुलाम वंश]] के समय में यह भूमि किलोकरी क़िले में स्थित थी, जो कि [[नसीरूद्दीन महमूद]] (शासन 1268-1287) के पुत्र सुल्तान केकूबाद की राजधानी थी। यह समूह [[विश्व धरोहर स्थल|विश्व धरोहर]] घोषित है, एवं [[भारत]] में मुग़ल वास्तुकला का प्रथम उदाहरण है। इस मक़बरे की शैली वही है, जिसने [[ताजमहल]] को जन्म दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1562 से 1572 के बीच बना यह मक़बरा [[दिल्ली]] के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है। वास्तुकार मिराक मिर्ज़ा ग़ियात की छाप साफ देखी जा सकती है। यहाँ बाद में मुग़लों के शाही परिवार के कई सदस्यों को दफ़नाया गया। इस जगह पर हमीदा बेगम ([[अकबर]] की मां), [[दारा शिकोह]] ([[शाहजहाँ]] का बेटा) और [[बहादुर शाह ज़फ़र|बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय]] (अंतिम मुग़ल शासक) का मक़बरा भी है। यही मक़बरा विश्व विख्यात ताजमहल के निर्माण की प्रेरणा बना। इस मक़बरे का प्रभाव ताजमहल पर भी देखा जा सकता है। यूनेस्‍को ने इसे विश्‍व धरोहर का दर्जा दिया है। इस मक़बरे की देखरेख भारतीय [[पुरातत्त्व]] विभाग करता है। यह पहली जगह है जहाँ मक़बरे के साथ-साथ पार्क भी स्थित हैं। यहाँ भारतीय परम्परा एवं पारसी शैली की वास्तुकला का अदभुत संगम देखने को मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निर्माण==&lt;br /&gt;
इस धरोहर का निर्माण 1565 से 1572 ईसवी के बीच [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] वास्तुविद् मिराक मिर्ज़ा ग़ियात के डिजाइन पर हुआ था। ताजमहल जैसी कलात्मक नजीर पेश करने वाला यह मक़बरा 12,000 वर्ग मीटर के चबूतरे पर बना है जिसकी उँचाई 47 मीटर है। हमायूँ मक़बरे के केन्द्रीय कक्ष की आंतरिक सज्जा बढ़िया कालीनों व गलीचों से परिपूर्ण है। मक़बरे में क़ब्रों के ऊपर एक शुद्ध श्वेत शामियाना लगा होता था और उनके सामने ही पवित्र ग्रंथ रखे रहते थे। इनके साथ ही हुमायूँ की पगड़ी, तलवार और जूते भी रखे रहते थे। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-11.jpg|thumb|250px|left|हुमायूँ का मक़बरा, [[दिल्ली]] &amp;lt;br /&amp;gt; Humayun's Tomb, Delhi]]&lt;br /&gt;
====मृत्य के उपरांत====&lt;br /&gt;
हुमायूँ को उसकी मृत्यु के बाद [[दिल्ली]] में ही दफ़नाया गया, और इसके बाद में हुमायूँ को 1558 में खंजरबेग द्वारा [[पंजाब]] के सरहिंद ले जाया गया। कालांतर में 1571 में मुग़ल सम्राट अकबर ने अपने पिता की समाधि के दर्शन किये थे। 1562 में हुमायूँ की मृत्यु के 9 वर्ष  बाद हुमायूँ के मक़बरे का निर्माण उसकी पत्नी हमीदा बानो बेगम के आदेश के अनुसार हुआ था। उस समय इस इमारत की लागत 15 लाख रुपये आयी थी। &lt;br /&gt;
====मक़बरे के निर्माण का स्थान====&lt;br /&gt;
हुमायूँ के मक़बरे के निर्माण के लिए [[यमुना]] नदी के किनारे के स्थान का चुनाव किया गया। इस स्थान का चुनाव मक़बरे के निकट स्थित [[निज़ामुद्दीन दरगाह|हजरत निजामुद्दीन की दरगाह]] से निकटता के कारण किया गया था। दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन का तत्कालीन आवास भी मक़बरे के स्थान से उत्तर-पूर्व दिशा में निकट ही चिल्ला-निजामुद्दीन औलिया में स्थित था।&amp;lt;ref name=&amp;quot;वेब वार्ता&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.webvarta.com/imp_detail.php?imp_id=1023&amp;amp;imp_category=11# |title=हुमायूँ का मक़बरा |accessmonthday=[[11 मई]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=वेब वार्ता |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
====फ़ारसी वास्तुकला से प्रभावित====&lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=इस धरोहर का निर्माण 1565 से 1572 ईसवी के बीच फ़ारसी वास्तुविद् मिराक मिर्ज़ा ग़ियात के डिजाइन पर हुआ था।|विचारक=}} &lt;br /&gt;
यह मक़बरा फ़ारसी वास्तुकला से प्रभावित  है, यह 47 मीटर ऊँचा और 200 फीट चौड़ा है। इस इमारत पर फ़ारसी बल्बुअस गुम्बद बना है, जो सर्वप्रथम [[सिकन्दर लोदी]] के मक़बरे में देखा गया था। गुम्बद दोहरी पर्त में बना है, बाहरी पर्त के बाहर श्वेत संगमरमर का आवरण लगा है, और अंदरूनी पर्त गुफ़ा रूपी बनी है। गुम्बद के शुद्ध और निर्मल श्वेत रूप से अलग शेष इमारत लाल बलुआ पत्थर की बनी है, जिस पर [[सफ़ेद रंग|श्वेत]] और [[काला रंग|काले]] संगमरमर तथा [[पीला रंग|पीले]] बलुआ पत्थर से पच्चीकारी का काम किया गया है। यह गुम्बद 42.5 मीटर के ऊँचे गर्दन रूपी बेलन पर बना है। गुम्बद के ऊपर 6 मीटर ऊँचा पीतल का किरीट कलश स्थापित है, और उसके ऊपर चंद्रमा लगा हुआ है, जो तैमूर वंश के मक़बरों में मिलता है। इन [[रंग|रंगों]] का संयोजन इमारत को एक ख़ूबसूरती देता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;वेब वार्ता&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
====वास्तुकार====&lt;br /&gt;
[[बदायूंनी, अब्दुल क़ादिर|अब्दुल क़ादिर बदायूंनी]] नाम के एक समकालीन इतिहासकार के अनुसार इस मक़बरे का स्थापत्य [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] वास्तुकार मिराक मिर्ज़ा ग़ियात ने किया था, जिन्हें इस इमारत के लिये [[अफ़ग़ानिस्तान]] के [[हेरात]] शहर से विशेष रूप से बुलवाया गया था। इन्होंने [[भारत]] की भी कई इमारतों की अभिकल्पना की थी। वे इस मक़बरे के पूरा होने से पहले ही चल बसे, किंतु उनके पुत्र ने अपने [[पिता]] का कार्य पूर्ण किया और हुमायूँ का मक़बरा 1571 में बनकर पूर्ण हुआ। यहाँ सर्वप्रथम लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ था। युनेस्को द्वारा [[1993]] में इस इमारत समूह को [[विश्व धरोहर स्थल]] घोषित किया गया। &lt;br /&gt;
====प्रेरणा====&lt;br /&gt;
हमायूँ के मक़बरे में [[मुग़ल]] स्थापत्य में चारबाग़ शैली के उद्यान प्रमुख अंग थे। इससे पूर्व ऐसे उद्यान भारत में कभी भी नहीं दिखे थे और इसके बाद अनेक इमारतों का अभिन्न अंग बनते गये। हुमायूँ का मक़बरा इसके के पिता [[बाबर]] के [[क़ाबुल]] स्थित मक़बरे &amp;quot;बाग़ ए बाबर&amp;quot; से बिल्कुल अलग था। मुग़ल सम्राटों को बाग़ में बने मक़बरों में दफ़न करने की परंपरा बाबर के साथ ही आरंभ हुई थी। तैमूर लंग के समरकंद में बने मक़बरे पर आधारित यह मक़बरा भारत में आगे आने वाली मुग़ल स्थापत्य के मक़बरों की प्रेरणा बना।&amp;lt;ref name=&amp;quot;वेब वार्ता&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==मक़बरे की संरचना==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-35.jpg|thumb|हुमायूँ का मक़बरा|250px]]&lt;br /&gt;
इस विशाल इमारत में प्रवेश करने के लिये पश्चिम और दक्षिण में दो दुमंजिले प्रवेशद्वार 16 मीटर ऊँचे बने हुए हैं। प्रवेशद्वारों में दोनों ओर कक्ष स्थित हैं और ऊपर के तल पर छोटे प्रांगण हैं। मक़बरे की बनावट मूलरूप से पत्थरों को गारे-चूने से जोड़कर की गई है और मक़बरे को लाल बलुआ पत्थर के द्वारा ढका हुआ है। सफ़ेद संगमरमर का  प्रयोग ऊपर की पच्चीकारी, फर्श की सतह, जालियाँ, द्वार-चौखटों और छज्जों के लिये किया गया है। इसका मुख्य गुम्बद भी श्वेत संगमरमर से ही ढका हुआ है। हमायूँ का मक़बरा 8 मीटर ऊँचे मूल चबूतरे पर खड़ा है, 12000 वर्ग मीटर की ऊपरी सतह को लाल जालीदार मुंडेर घेरे हुए है। इस वर्गाकार चबूतरे के कोनों को छांटकर अष्टकोणीय आभास दिया गया है। इस चबूतरे की नींव में 56 कोठरियां बनी हुई हैं, जिनमें 100 से अधिक क़ब्रें बनायी हुई हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;वेब वार्ता&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मक़बरे की आंतरिक संरचना====&lt;br /&gt;
इस इमारत का मुख्य कक्ष गुम्बददार एवं दुगुनी ऊँचाई का एक मंजिला है और इसमें गुम्बद के नीचे एकदम मध्य में आठ किनारे वाले एक जालीदार घेरे में द्वितीय मुग़ल सम्राट [[हुमायूँ]] की क़ब्र बनी है। हुमायूँ की क़ब्र इस इमारत की मुख्य क़ब्र है। इस इमारत में मुख्य केन्द्रीय कक्ष सहित नौ वर्गाकार कक्ष बने हैं। इनमें बीच में बने मुख्य कक्ष को घेरे हुए शेष आठ दुमंजिले कक्ष बीच में खुलते हैं। ठीक नीचे आंतरिक कक्ष में सम्राट हुमायूँ की असली समाधि बनी है, जिसका बाहर से रास्ता जाता है। इस पूरी इमारत में पीट्रा ड्यूरा नामक संगमरमर की पच्चीकारी का प्रयोग है और इस प्रकार के क़ब्र के नियोजन जो [[मुग़ल साम्राज्य]] के बाद के मक़बरों, जैसे [[ताजमहल]] आदि में खूब प्रयोग हुए हैं, यह भारतीय-इस्लामिक स्थापत्यकला का महत्त्वपूर्ण अंग हैं, &lt;br /&gt;
[[चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-7.jpg|thumb|हुमायूँ का मक़बरा|250px|left]]&lt;br /&gt;
पश्चिम में मक्का की ओर संगमरमर की जालीदार घेरे के ठीक ऊपर इमारत के मुख्य कक्ष में मेहराब भी बना है। प्रधान कक्ष के चार कोणों पर चार अष्टकोणीय कमरे हैं, जो मेहराबदार दीर्घा से जुड़े हैं। प्रधान कक्ष की भुजाओं के बीच-बीच में चार अन्य कक्ष भी बने हैं। ये आठ कमरे मुख्य क़ब्र की परिक्रमा बनाते हैं, जैसी सूफीवाद और कई अन्य मुग़ल मक़बरों में दिखती है, साथ ही [[इस्लाम धर्म]] में जन्नत का संकेत भी करते हैं। यहाँ आमतौर पर प्रवेशद्वारों पर खुदे [[क़ुरआन]] के सूरा 24 के बजाय सूरा- अन-नूर की एक रेखा बनी है, जिसके द्वारा प्रकाश किबला (मक्का की दिशा) से अंदर प्रवेश करता है। इस प्रकार सम्राट का स्तर उनके विरोधियों और प्रतिद्वंदियों से ऊँचा देवत्व के निकट हो जाता है। इन प्रत्येक कमरों के साथ 8-8 कमरे और बने हैं, जो कुल मिलाकर 124 कक्षीय योजना का अंग हैं। मुग़ल नवाबों और दरबारियों की क़ब्रों को इन छोटे कमरों में समय-समय पर बनाया हुआ है।  अतः इमारत को मुग़लों का क़ब्रिस्तान संज्ञा मिली हुई है। प्रथम तल को मिलाकर इस मुख्य इमारत में लगभग 100 से अधिक क़ब्रें बनी हैं, जिनमें से अधिकांश पर पहचान न खुदी होने के कारण दफ़न हुए व्यक्ति का पता नहीं है, किन्तु ये निश्चित है कि वे मुग़ल साम्राज्य के राज परिवार या दरबारियों में से ही थे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;वेब वार्ता&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==स्मारक==&lt;br /&gt;
====चारबाग़ उद्यान====&lt;br /&gt;
हुमायूँ के मक़बरे के केन्द्र से निकलती हुई चार जल नालिकाएं चारबाग़ के वर्गाकार खाके की रेखा बनाती हैं। मक़बरे की पूर्ण शोभा इसको घेरे हुए 30 एकड़ में फैले चारबाग़ शैली के [[मुग़ल]] उद्यानों से निखरती है। जन्नत रूपी उद्यान चहारदीवारी के भीतर बना है। ये उद्यान चार भागों में पैदल पथों (खियाबान) और दो विभाजक केन्द्रीय जल नालिकाओं द्वारा बंटा हुआ है। इस प्रकार बने चार बागों को फिर से पत्थर के बने रास्तों द्वारा चार-चार छोटे भागों में विभाजित किया गया है। इस प्रकार कुल मिलाकर 36 भाग बनते हैं। जिस प्रकार क़ुरआन की आयतों में ’जन्नत के बाग’ का वर्णन किया गया है, ठीक उस प्रकार केन्द्रीय जल नालिका मुख्य द्वार से मक़बरे तक जाती हुई उसके नीचे जाती है और दूसरी ओर से फिर निकलती हुई प्रतीत होती है। चारबाग़ मक़बरे को घेरे हुए है, चारबाग़ को तीन ओर ऊँची पत्थर की चहारदीवारी घेरे हुए है और कभी निकट ही [[यमुना नदी]] तीसरी ओर बहा करती थी, जो समय के साथ परिसर से दूर चली गई है।&lt;br /&gt;
====नाई का गुम्बद====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-36.jpg|thumb|हुमायूँ का मक़बरा|250px]]&lt;br /&gt;
मक़बरे परिसर में चारबाग़ के अंदर ही दक्षिण-पूर्वी दिशा में 1590 में बना नाई का गुम्बद है। इसकी मुख्य परिसर में उपस्थिति दफ़नाये गये व्यक्ति की महत्ता दर्शाती है। यह मक़बरा एक ऊँचे चबूतरे पर बना है जहाँ पहुंचने के लिये दक्षिणी ओर से सात सीढ़ियां बनी हैं। यह वर्गाकार है और इसके अकेले कक्ष के ऊपर एक दोहरा गुम्बद बना है। अंदर दो क़ब्रों पर क़ुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। इनमें से एक क़ब्र पर 999 अंक खुदे हैं, जिसका अर्थ हिजरी का वर्ष 999 है जो 1590-91 ई. बताता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;वेब वार्ता&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
====ईसा ख़ाँ नियाजी का मक़बरा====&lt;br /&gt;
हुमायूँ के मक़बरे के मुख्य पश्चिमी प्रवेशद्वार के रास्ते में प्रमुख स्मारक ईसा ख़ाँ नियाजी का मक़बरा है, जो मुख्य मक़बरे से भी 20 वर्ष पूर्व 1547 में बना था। ईसा ख़ाँ नियाजी मुग़लों के विरुद्ध लड़ने वाला [[सूर वंश]] के शासक [[शेरशाह सूरी]] के दरबार का एक [[अफ़ग़ान]] नवाब था। यह मक़बरा ईसा ख़ाँ के जीवनकाल में ही बना था और उसके बाद उसके पूरे परिवार के लिये ही काम आया। &amp;lt;ref name=&amp;quot;वेब वार्ता&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-14.jpg|thumb|350px|left|जाली की माया, हुमायूँ का मक़बरा]]&lt;br /&gt;
====अन्य स्मारक====&lt;br /&gt;
*इस मक़बरे में एक तीन आंगन चौड़ी लाल बलुआ पत्थर की मस्जिद स्थित है। &lt;br /&gt;
*हैरू बू हलीमा का मक़बरा और उसके बाग़ चहारदीवारी के बाहर स्थित हैं। ये मक़बरा अब ध्वंस हो चुका है और इसके अवशेषों से ज्ञात होता है कि ये केन्द्र में स्थित नहीं था। इससे आभास होता है कि संभवतः ये बाद में जोड़ा गया होगा। &lt;br /&gt;
*इस परिसर में अरब सराय स्थित है, जिसे हमीदा बेगम ने मुख्य मक़बरे के निर्माण में लगे कारीग़रों के लिये बनवाया था।&lt;br /&gt;
*इस परिसर में ही अफ़सरवाला मक़बरा भी बना है, जो [[अकबर]] के एक नवाब के लिये बना था। इसके साथ ही इसकी मस्जिद भी बनी है। &lt;br /&gt;
*नीला बुर्ज नामक मक़बरा पूरे परिसर के बाहर स्थित है । इस मक़बरे का नाम इसके गुम्बद के ऊपर लगी [[नीला रंग|नीली]] ग्लेज्ड टाइलों के कारण पड़ा है।&lt;br /&gt;
==जीर्णोद्धार==&lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=यह मक़बरा फ़ारसी वास्तुकला से प्रभावित है, यह 47 मीटर ऊँचा और 200 फीट चौड़ा है। इस इमारत पर फ़ारसी बल्बुअस गुम्बद बना है, जो सर्वप्रथम सिकन्दर लोदी के मक़बरे में देखा गया था। गुम्बद दोहरी पर्त में बना है, बाहरी पर्त के बाहर श्वेत संगमरमर का आवरण लगा है, और अंदरूनी पर्त गुफ़ा रूपी बनी है|विचारक=}}&lt;br /&gt;
हुमायूँ के मक़बरे के चारबाग़ 13 हेक्टेयर क्षेत्र में फ़ैले हुए थे। 18वीं शताब्दी तक यहाँ स्थानीय लोगों ने चारबागों में सब्जी आदि उगाना आरंभ कर दिया था। 1860 में [[चित्रकला मुग़ल शैली|मुग़ल शैली]] के चारबाग़ अंग्रेज़ी शैली में बदलते गये। इनमें चार केन्द्रीय सरोवर गोल चक्करों में बदल गये व क्यारियों में पेड़ उगने लगे। 20वीं शताब्दी में [[लॉर्ड कर्ज़न]] जब [[भारत]] के [[वाइसराय]] बने, तब उन्होंने इसे वापस सुधारा। [[1903]]-[[1909]] के बीच एक वृहत उद्यान जीर्णोद्धार परियोजना आरंभ हुई, जिसके अंतर्गत्त नालियों में भी बलुआ पत्थर लगाया गया। [[1915]] में पौधारोपण योजना के तहत केन्द्रीय और विकर्णीय अक्षों पर वृक्षारोपण हुआ। इसके साथ ही अन्य स्थानों पर [[भारत के पुष्प|फूलों]] की क्यारियाँ भी वापस बनायी गईं।&lt;br /&gt;
[[अगस्त]], [[1947]] में भारत के विभाजन के समय में [[पुराना क़िला दिल्ली|पुराना क़िला]] और हुमायूँ का मक़बरा भारत से नवीन स्थापित [[पाकिस्तान]] को लिये जाने वाले शरणार्थियों के लिये शरणार्थी कैम्प में बदल गये थे। बाद में इन्हें भारत सरकार द्वारा अपने नियंत्रण में ले लिया गया। ये कैम्प लगभग पाँच वर्षों तक रहे और इनसे स्मारकों को अत्यधिक क्षति पहुंची, ख़ासकर इनके बगीचों, पानी की सुंदर नालियों आदि को। इसके उपरांत इस ध्वंस को रोकने के लिए मक़बरे के अंदर के स्थान को ईंटों से ढंक दिया गया, जिसे आने वाले वर्षों में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने वापस अपने पुराने रूप में स्थापित किया। हालांकि [[1985]] तक मूल जलीय प्रणाली को सक्रिय करने के लिये चार बार असफल प्रयास किये गए।  [[मार्च]],  [[2003]] में आगा ख़ान सांस्कृतिक ट्रस्ट द्वारा इसका जीर्णोद्धार कार्य सम्पन्न हुआ था। इस जीर्णोद्धार के बाद यहाँ के बागों की जल-नालियों में एक बार फिर से जल प्रवाह आरंभ हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका== &lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-5.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-1.jpg|मुख्य द्वार, हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-2.jpg|हुमायूँ के मक़बरे का मॉडल, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-3.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-4.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-8.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-10.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun's-Tomb-Delhi-1.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-12.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-16.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-6.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-17.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-18.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-19.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-20.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-13.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-21.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
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चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-24.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
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चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-15.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-29.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-30.jpg|हुमायूँ के मक़बरे की क़ब्रें, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-9.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-31.jpg|हुमायूँ के मक़बरे की क़ब्रें, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-32.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-33.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-34.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
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चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-38.jpg|हुमायूँ का मक़बरा, [[नई दिल्ली]] &lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://bharat.gov.in/knowindia/humayunstomb.php हुमायूं का मक़बरा]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.webdunia.com/%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95/%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%9A%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%93%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE-1101107072_1.htm हुमायूं का मक़बरा एक चमत्कार:ओबामा]&lt;br /&gt;
*[http://www.bhaskar.com/article/DEL-humayuns-tomb-will-look-more-attractive-now-2028883.html हुमायूं का मक़बरा दिखेगा अब और भी आकर्षक]&lt;br /&gt;
*[http://www.delhi-tourism-india.com/forts-monuments/humayu-tomb.htm Humayun's Tomb, Delhi]&lt;br /&gt;
*[http://asi.nic.in/asi_monu_whs_humayuntomb.asp World Heritage Sites - Humayun's Tomb]&lt;br /&gt;
*[http://www.orientalarchitecture.com/india/delhi/humayun.php Humayun's Tomb (built 1605-1613)]&lt;br /&gt;
*[http://www.indiapicks.com/Heritage/Humayun/Humayun-E-Humayun_Tomb.htm Humayun's Tomb]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{विश्व विरासत स्थल2}}{{भारत के मुख्य पर्यटन स्थल}}{{दिल्ली}}{{मुग़ल साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=223002</id>
		<title>ब्रज का कृष्ण काल</title>
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		<updated>2011-10-03T09:45:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: /* कृष्ण का समय */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ब्रज का इतिहास}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;संसार में एक [[कृष्ण]] ही हुआ जिसने दर्शन को गीत बनाया -'''[[डॉ. राम मनोहर लोहिया]]'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
==कृष्ण काल==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के समय का निर्धारण विभिन्न विद्वानों ने किया है । अनेक इतिहासकार कृष्ण को ऐतिहासिक चरित्र नहीं मानते । यूँ भी आस्था के प्रश्नों का हल इतिहास में तलाशने का कोई अर्थ नहीं है । आपने जो इतिहास की सामग्री अक्सर खंगाली होगी वह संभवतया कृष्ण की ऐतिहासिता पर अनेक प्रश्नचिन्ह लगाती होगी । हमारा प्रयास है कि जो जैसा उपलब्ध है । आप तक पहुँचायें । कई विद्वान श्री कृष्ण को 3500 वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं मानते हैं। भारतीय मान्यता के अनुसार कृष्ण का काल 5000 वर्ष से भी कुछ अधिक पुराना लगता है । इसका वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार भी कुछ विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है । &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण का समय के संबंध में श्री कृष्ण दत्त वाजपेयी का मत- &amp;quot;वर्तमान ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म लगभग ई. पू. 1500 माना जाता है । ये सम्भवत: 100 वर्ष से कुछ ऊपर की आयु तक जीवित रहे । अपने इस दीर्घजीवन में उन्हें विविध प्रकार के कार्यो में व्यस्त रहना पड़ा । उनका प्रारंभिक जीवन तो [[ब्रज]] में कटा और शेष [[द्वारका]] में व्यतीत हुआ । बीच-बीच में उन्हें अन्य अनेक जनपदों में भी जाना पडा़ । जो अनेक घटनाएं उनके समय में घटी उनकी विस्तृत चर्चा [[पुराण|पुराणों]] तथा [[महाभारत]] में मिलती है । वैदिक साहित्य में तो कृष्ण का उल्लेख बहुत कम मिलता है और उसमें उन्हें मानव-रूप में ही दिखाया गया है, न कि नारायण का [[विष्णु]] के अवतार रूप में ।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता तथा तत्संबंधी अन्य समस्याओं के लिए देखिए- राय चौधरी-अर्ली हिस्ट्री आफ [[वैष्णव]] सेक्ट, पृ0 39, 52; आर0जी0 भंडारकार-ग्रंथमाला, जिल्द 2, पृ0 58-291; विंटरनीज-हिस्ट्री आफ इंडियन लिटरेचर, जिल्द 1, पृ0 456; मैकडॉनल तथा कीथ-वैदिक इंडेक्स, जि0 1, पृ0 184; ग्रियर्सन-एनसाइक्लोपीडिया आफ रिलीजंस (`भक्ति' पर निबंध); भगवानदास-कृष्ण; तदपत्रिकर-दि कृष्ण प्रायलम; पार्जीटर-ऎश्यंट इंडियन हिस्टारिकल ट्रेडीशन आदि।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;quot; -श्री कृष्ण दत्त वाजपेयी &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
डा प्रभुदयाल मीतल द्वारा प्रस्तुत प्रमाण कृष्ण काल को 5000 वर्ष पूर्व का प्रमाणित करते हैं उन्होंने [[छान्दोग्य उपनिषद |छांदोग्योपनिषद]] के [[श्लोक]] का हवाला दिया है । &amp;lt;ref&amp;gt;तध्दैत्दघोर आगिंरस कृष्ण्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रय प्रतिपद्ये ताक्षितमस्यच्युतमसि प्राण्सँशितमसीति तत्रैते द्वे ॠचौ भवत: ॥ [[छान्दोग्य उपनिषद#तेरहवें खण्ड से उन्नीसवें खण्ड तक|छांदोग्य उपनिषद (3,17,6)]], जिसमें [[देवकी]] पुत्र कृष्ण का उल्लेख है और उन्हें घोर आंगिरस का शिष्य कहा है। परवर्ती साहित्य में श्रीकृष्ण को देव या [[विष्णु]] रूप में प्रदर्शित करने का भाव मिलता है (दे0 तैत्तिरीय आरण्यक, 10, 1, 6; पाणिनि-अष्टाध्यायी, 4, 3, 98 आदि)। [[महाभारत]] तथा [[हरिवंश पुराण]], [[विष्णु पुराण]], [[ब्रह्म पुराण]], [[वायु पुराण]], [[भागवत पुराण]], [[पद्म पुराण]], [[देवी भागवत]] [[अग्नि पुराण]] तथा [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]] पुराणों में उन्हें प्राय: भागवान रूप में ही दिखाया गया है। इन ग्रंथो में यद्यपि कृष्ण के आलौकिक तत्त्व की प्रधानता है तो भी उनके मानव या ऐतिहासिक रूप के भी दर्शन यत्र-तत्र मिलते हैं। पुराणों में कृष्ण-संबंधी विभिन्न वर्णनों के आधार पर कुछ पाश्चात्य विद्वानों को यह कल्पना करने का अवसर मिला कि कृष्ण ऐतिहासिक पुरुष नहीं थे। इस कल्पना की पुष्टि में अनेक दलीलें दी गई हैं, जो ठीक नहीं सिद्ध होती। यदि महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त, ब्राह्मण-ग्रंथों तथा उपनिषदों के उल्लेख देखे जायें तो कृष्ण के ऐतिहासिक तत्त्व का पता चल जायगा। बौद्ध-ग्रंथ घट जातक तथा जैन-ग्रंथ उत्तराध्ययन सूत्र से भी श्रीकृष्ण का ऐतिहासिक होना सिद्ध है। यह मत भी भ्रामक है कि ब्रज के कृष्ण, द्वारका के कृष्ण तथा महाभारत के कृष्ण एक न होकर अलग-अलग व्यक्ति थे &amp;lt;/ref&amp;gt; ज्योतिष का प्रमाण देते हुए श्री मीतल लिखते हैं- &amp;quot;मैत्रायणी [[उपनिषद]] और [[शतपथ ब्राह्मण]] के “कृतिका स्वादधीत” उल्लेख से तत्कालीन खगोल-स्थिति की गणना कर ट्रेनिंग कॉलेज, पूना के गणित प्राध्यापक स्व. शंकर बालकृष्ण दीक्षित महोदय ने मैत्रायणी उपनिषद की ईसवी सन् ने 1600 पूर्व का और शतपथ ब्राह्मण को 3000 वर्ष का माना था । &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[मैत्रायणी उपनिषद]] सबसे पीछे का उपनिषद कहा जाता है और उसमें [[छान्दोग्य उपनिषद|छांदोग्य उपनिषद]] के अवतरण मिलते हैं, इसलिए छांदोग्य मैत्रीयणी से पूर्व का उपनिषद हुआ । शतपथ ब्राह्मण और उपनिषद आजकल के विद्वानों के मतानुसार एक ही काल की रचनाएं हैं, अत: छांदोग्य का काल भी ईसा से 3000 वर्ष पूर्व का हुआ । छांदोग्य उपनिषद में [[देवकी]] पुत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है  ( [[छान्दोग्य उपनिषद#तेरहवें खण्ड से उन्नीसवें खण्ड तक|छान्दोग्य उपनिषद,प्रथम भाग,खण्ड 17]]) “देवकी पुत्र” विशेषण के कारण उक्त उल्लेख के कृष्ण स्पष्ट रूप से [[वृष्णि संघ|वृष्णि]] वंश के कृष्ण हैं । इस प्रकार कृष्ण का समय प्राय: 5000 वर्ष पूर्व का ज्ञात होता है ।&amp;quot; - डा प्रभुदयाल मीतल &lt;br /&gt;
डा मीतल ने किस आधार पर छांदोग्योपनिषद  को 5000 वर्ष प्राचीन बताया है यह कहीं उल्लेख नहीं है । छांदोग्योपनिषद के ई पू 500 से 1000 वर्ष से अधिक प्राचीन होने के प्रमाण नहीं मिलते । ( यदि प्रमाण हों तो पाठकों से निवेदन है कि ब्रज डिस्कवरी को अवश्य भेजें । साथ ही ज्योतिष गणनाओं का कोई अन्य आधार जो प्रमाणिक हो अवश्य भेजें ।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृष्ण का समय==&lt;br /&gt;
डा. मीतल लिखते हैं -&amp;quot; परीक्षित के समय में [[सप्तर्षि]] (आकाश के सात तारे) मघा नक्षत्र पर थे, जैसा शुक्रदेव द्वारा परीक्षित से कहे हुए वाक्य से प्रमाणित है । ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सप्तर्षि एक नक्षत्र पर एक सौ वर्ष तक रहते हैं। आजकल सप्तर्षि [[कृतिका नक्षत्र]] पर है जो [[मघा]] से 21 वां नक्षत्र है । इस प्रकार मघा के कृतिक पर आने में 2100 वर्ष लगे हैं किंतु यह 2100 वर्ष की अवधि [[महाभारत]] काल कदापि नहीं है । इससे यह मानना होगा कि मघा से आरम्भ कर 27 नक्षत्रों का एक चक्र पूरा हो चुका था और दूसरे चक्र में ही सप्तर्षि उस काल में मघा पर आये थे । पहिले चक्र के 2700 वर्ष में दूसरे चक्र के 2100 वर्ष जोड़ने से 4800 वर्ष हुए । यह काल [[परीक्षित]] की विद्यमानता का हुआ । परीक्षित के पितामह [[अर्जुन]] थे, जो आयु में श्री[[कृष्ण]] से 18 वर्ष छोटे थे । इस प्रकार ज्योतिष की उक्त गणना के अनुसार कृष्ण-काल अब से प्राय: 5000 वर्ष पूर्व का सिद्ध होता है ।&amp;quot; &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
आजकल के [[चैत्र मास]] के वर्ष का आरम्भ माना जाता है, जब कि कृष्ण काल में वह [[मार्गशीर्ष]] से होता था । [[बसन्त ऋतु]] भी इस काल में मार्गशीर्ष माह में होती थी । [[महाभारत]] में मार्गशीर्ष मास से ही कई स्थलों पर महीनों की गणना की गयी है । [[गीता]] में जहाँ भगवान की विभूतियों का वर्णन हुआ हैं, वहाँ “मासानां मार्गशीर्षोऽहम” और “ऋतुनां कुसुमाकर” के उल्लेखों से भी उक्त कथन की पुष्टि होती है । [[ज्योतिष शास्त्र]] के विद्धानों ने सिद्ध किया है कि मार्गशीर्ष में वसन्त सम्पात अब से प्राय: 5000 वर्ष पूर्व होता था । (भारतीय ज्योतिषशाला,पृष्ठ 34) इस प्रकार भी श्रीकृष्ण काल के 5000 वर्ष प्राचीन होने की पुष्टि होती है । &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण [[द्वापर युग]] के अन्त और [[कलियुग]] के आरम्भ के सन्धि-काल में विद्यमान थे । भारतीय ज्योतिषियों के मतानुसार कलियुग का आरम्भ [[शक संवत]] से 3176 वर्ष पूर्व की चैत्र शु. 1 को हुआ था । आजकल 1887 शक [[संवत]] है । इस प्रकार कलियुग को आरम्भ हुए 5066 वर्ष हो गये है । कलियुग के आरम्भ होने से 6 माह पूर्व मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत का युद्ध का आरम्भ हुआ था, जो 18 दिनों तक चला था । उस समय श्रीकृष्ण की आयु 83 वर्ष की थी । उनका तिरोधान 119 वर्ष की आयु में हुआ था । इस प्रकार भारतीय मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण विद्यमानता या काल शक संवत पूर्व 3263 की भाद्रपद कृ. 8 बुधवार के शक संवत पूर्व 3144 तक है । [[भारत]] के विख्यात ज्योतिषी [[वराह मिहिर]], [[आर्यभट]], [[ब्रह्मगुप्त]] आदि के समय से ही यह मान्यता प्रचलित है । [[भारत]] का सर्वाधिक प्राचीन [[युधिष्ठिर संवत]] जिसकी गणना कलियुग से 40 वर्ष पूर्व से की जाती है, उक्त मान्यता को पुष्ट करता है ।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
पुरातत्त्ववेत्ताओं  का मत है कि अब से प्राय: 5000 वर्ष पूर्व एक प्रकार का प्रलय हुआ था । उस समय भयंकर भूकम्प और आंधी तूफ़ानों से समुद्र में बड़ा भारी उफान आया था । उस समय नदियों के प्रवाह परिवर्तित हो गये थे, विविध स्थानों पर ज्वालामुखी पर्वत फूट पड़े थे और पहाड़ के श्रृंग टूट-टूटकर गिर गये थे । वह भीषण दैवी दुर्घटना वर्तमान इराक में बग़दाद के पास और वर्तमान मैक्सिको के प्राचीन प्रदेशों में हुई थी, जिसका काल 5000 वर्ष पूर्व का माना जाता है। उसी प्रकार की दुर्घटनाओं का वर्णन महाभारत और [[भागवत]] आदि पुराणों भी मिलता है । इनसे ज्ञात होता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात उसी प्रकार के भीषण भूकम्प [[हस्तिनापुर]] और [[द्वारिका]] में भी हुए थे, जिनके कारण द्वारिका तो सर्वथा नष्ट ही हो गयी थी । &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[बग़दाद]] और [[हस्तिनापुर]] तथा प्राचीन मग प्रदेश और द्वारिका प्राय: एक से आक्षांशों पर स्थित हैं, अत: उनकी दुर्घटनाओं का पारिस्परिक सम्बन्ध विज्ञान सम्मत है । बग़दाद प्रलय के पश्चात वहाँ बताये गये “उर” नगर को तथा मैक्सिको स्थित मय प्रदेश के ध्वंस को जब 5000 वर्ष प्राचीन माना जा सकता है, जब महाभारत और भागवत में वर्णित वैसी ही घटनाओं, जो कृष्ण के समय में हुई थी, उसी काल का माना जायगा । ऐसी दशा में [[पुरातत्त्व]] के साक्ष्य से भी कृष्ण-काल 5000 वर्ष प्राचीन सिद्ध होता है । यह दूसरी बात है कि महाभारत और भागवत ग्रंथों की रचना बहुत बाद में हुई थी, किंतु उनमें वर्णित कथा 5000 वर्ष पुरानी ही है । &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
ज्योतिष और पुरातत्त्व के अतिरिक्त इतिहास के प्रमाण से भी कृष्ण-काल विषयक भारतीय मान्यता की पुष्टि होती है । यवन नरेश [[सेल्यूकस|सैल्युक्स]] ने [[मैगस्थनीज]] नामक अपना एक राजदूत भारतीय नरेश [[चन्द्रगुप्त]] के दरबार में भेजा था । मैगस्थनीज ने उस समय के अपने अनुभव लेखबद्ध किये थे । इस समय उस यूनान राजदूत का मूल ग्रंन्थ तो नहीं मिलता है, किंतु उसके जो अंश एरियन आदि अन्य [[यवन]] लेखकों ने उद्धृत किये थे, वे प्रकाशित हो चुके है । &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
मैगस्थनीज ने लिखा है कि मथुरा में शौरसेनी लोगों का निवास है । वे विशेष रूप से '''हरकुलीज''' (हरि कृष्ण) की पूजा करते हैं। उनका कथन है कि डायोनिसियस के हरकुलीज 15 पीढ़ी और सेण्ड्रकोटस (चन्द्रगुप्त) 153 पीढ़ी पहले हुए थे । इस प्रकार श्रीकृष्ण और चन्द्रगुप्त में 138 पीढ़ियों के 2760 वर्ष हुए । चन्द्रगुप्त का समय ईसा से 326 वर्ष पूर्व है । इस हिसाब से श्रीकृष्ण काल अब से (1965+326+2760) 5051 वर्ष पूर्व सिद्ध होता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कंस के समय मथुरा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[कंस]] के समय में मथुरा का क्या स्वरूप था, इसकी कुछ झलक पौराणिक वर्णनों में देखी जा सकती है। जब श्रीकृष्ण ने पहली बार इस नगरी को देखा तो भागवतकार के शब्दों में उसकी शोभा इस प्रकार थी।&amp;lt;ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* ददर्श तां स्फाटिकतुङ्गोपुर द्वारां वृहद्धेमकपाटतोरणाम् ।&lt;br /&gt;
* ताम्रारकोष्ठां परिखादुरासदामुद्यानरम्योपवनोपशोभिताम् ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* सौवर्ण श्रृंगाटक हर्म्यनिष्कुटै: श्रेणी सभाभिभवनैरुपस्कृताम् ।&lt;br /&gt;
* वैदूर्यबज्रामल, नीलविद्रुमैर्मुक्तहरिद्भिर्बलभीषुवेदिपु ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जुष्टेषु जालामुखरंध्रकुटि्टमेष्वाविष्ट पारावतवर्हिनादिताम् ।&lt;br /&gt;
* संसिक्तरथ्यापणमार्गचत्वरां प्रकीर्णमाल्यांकुरलाजतंडुजाम ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* आपूर्णकुभैर्दधिचंदनोक्षितै: प्रसूनदीपाबलिभि: सपल्लवै: ।&lt;br /&gt;
* सवृंदरंभाक्रमुकै: सकेतुभि: स्वलंकृतद्वार गृहां सपटि्टकै:। ।&lt;br /&gt;
(भागवत, 10, 41, 20-23&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'उस नगरी के प्रवेश-द्वार ऊँचे थे और स्फटिक पत्थर के बने हुए थे। उनके बड़े-बड़े सिरदल और किवाड़ सोने के थे। नगरी के चारों ओर की दीवाल (परकोटा) ताँबे और पीतल की बनी थी तथा उसके नीचे की खाई दुर्लभ थी। नगरी अनेक उद्यानों एक सुन्दर उपवनों से शोभित थी।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'सुवर्णमय चौराहों, महलों, बगीचियों, सार्वजनिक स्थानों एवं विविध भवनों से वह नगरी युक्त थी। वैदूर्य, बज्र, नीलम, मोती, हीरा आदि रत्नों से अलंकृत छज्जे, वेदियां तथा फर्श जगमगा रहे थे और उन पर बैठे हुए कबूतर और मोर अनेक प्रकार के मधुर शब्द कर रहे थे। गलियों और बाज़ारों में, सड़कों तथा चौराहों पर छिड़काव किया गया था। और उन पर जहाँ-तहाँ फूल-मालाएँ, दूर्वा-दल, लाई और चावल बिखरे हुए थे।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'मकानों के दरवाजों पर दही और [[चन्दन]] से अनुलेपित तथा जल से भरे हुए मङल-घट रखे हुए थे, फूलों, दीपावलियों, बन्दनवारों तथा फलयुक्त केले और सुपारी के वृक्षों से द्वार सजाये गये थे और उन पर पताके और झड़ियाँ फहरा रही थी।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त वर्णन कंस या कृष्ण कालीन [[मथुरा]] से कहाँ तक मेल खाता है, यह बताना कठिन है। परन्तु इससे तथा अन्य पुराणों में प्राप्त वर्णनों से इतना अवश्य ज्ञात होता है कि तत्कालीन मथुरा एक समृद्ध पुरी थी। उसके चारों ओर नगर-परकोटा थी तथा नगरी में उद्यानों का बाहुल्य था। मोर पक्षियों की शायद इस समय भी मथुरा में अधिकता थी। महलों, मकानों, सड़कों और बाज़ारों आदि के जो वर्णन मिलते है उनसे पता चलता है कि कंस के समय की मथुरा एक धन-धान्य सम्पन्न नगरी थी।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
इस प्रकार भारतीय विद्वानों के सैकड़ों हज़ारों वर्ष प्राचीन निष्कर्षों के फलस्वरूप कृष्ण-काल की जो भारतीय मान्यता ज्योतिष, पुरातत्त्व और इतिहास से भी परिपुष्ट होती है, उसे न मानने का कोई कारण नहीं है। आधुनिक काल के विद्वानों इतिहास और पुरातत्त्व के जिन अनुसन्धानों के आधार पर कृष्ण-काल की अवधि 3500 वर्ष मानते हैं, वे अभी अपूर्ण हैं ।  इस बात की पूरी सम्भावना है कि इन अनुसन्धानों के पूर्ण होने पर वे भी भारतीय मान्यता का समर्थन करने लगेंगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राचीनतम संस्कृत साहित्य==&lt;br /&gt;
[[वेद|वैदिक]] संहिताओं के अनंतर संस्कृत के प्राचीनतम साहित्य-आरण्यक, [[उपनिषद]], ब्राह्मण ग्रंथों और पाणिनीय सूत्रों में श्रीकृष्ण का थोड़ा बहुत उल्लेख मिलता है । [[जैन]] साहित्य में श्रीकृष्ण को तीर्थंकर [[नेमिनाथ]] जी का चचेरा भाई बतलाया गया है । इस प्रकार जैन धर्म के प्राचीनतम साहित्य में श्रीकृष्ण का उल्लेख हुआ है ।&lt;br /&gt;
[[बौद्ध]] साहित्य में [[जातक कथा|जातक कथाएं]] अत्यंत प्राचीन है । उनमें से “घट जातक” में कृष्ण कथा वर्णित है । यद्यपि उपर्युक्त साहित्य कृष्ण – चरित्र के स्रोत से संबंधित है, तथापि कृष्ण-चरित्र के प्रमुख ग्रंथ 1. [[महाभारत]] 2. [[हरिवंश पुराण|हरिवंश]], 3. विविध [[पुराण]], 4. गोपाल तापनी उपनिषद और 5. [[गर्ग संहिता]] हैं । यहाँ इन ग्रंथों में वर्णित श्रीकृष्ण के चरित्र पर प्रकाश डाला जाता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुराणेतर ग्रंथ==&lt;br /&gt;
जिन पुराणेतर ग्रंथों में श्रीकृष्ण का चरित्र वर्णित है, उसमें “गोपाल तापनी उपनिषद” और “गर्ग संहिता” प्रमुख है । यहाँ पर उनका विस्तृत विवरण दिया जाता है – &lt;br /&gt;
गोपाल तापनी उपनिषद : - यह कृष्णोपासना से संबंधित एक आध्यात्मिक रचना है । इसके पूर्व और उत्तर नामक दो भाग है । पूर्व भाग को “कृष्णोपनिषद” और उत्तर भाग को “अथर्वगोपनिषद” कहा गया है । यह रचना सूत्र शैली में है, अत: कृष्णोपासना के परवर्ती ग्रंथो की अपेक्षा यह प्राचीन जान पड़ती है । इसका पूर्व भाग उत्तर भाग से भी पहले का ज्ञात होता है । श्रीकृष्ण प्रिया [[राधा]] और उनके लीला-धाम [[ब्रज]] में से किसी का भी नामोल्लेख इसमें नहीं है । इससे भी इसकी प्राचीनता सिद्ध होती हैं । - डा प्रभुदयाल मीतल&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
'''डा. प्रभुदयाल मीतल, कृष्ण का समय 5000 वर्ष पूर्व मानते हैं । वे इसको अनेक तथ्य एवं उल्लेखों के आधार पर प्रमाणित भी करते हैं । श्री कृष्ण दत्त वाजपेयी का मत भिन्न है, वे कृष्ण काल को 3500 वर्ष से अधिक पुराना नहीं मानते ।''' अनेक भारतीय और विदेशी इतिहासकार [[महाभारत]] का काल निर्णय होने से यह नहीं मानते कि कृष्ण का समय भी सिद्ध हो गया । यही स्थिति [[गीता]] के समय निर्धारण की भी है, कुछ विद्वानों का मानना है कि गीता कहने वाले कृष्ण भिन्न हैं, यहीं एक विवाद द्वारका के कृष्ण को [[मथुरा]] के कृष्ण को भिन्न बताने का भी है । कुछ का मत है कि कृष्ण को महाभारत में काफ़ी बाद में जोड़ दिया गया । चाहे जो भी हो आज कृष्ण की ऐतिहासिकता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है । हो सकता है कालनिर्णय में मतैक्य न हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{ब्रज}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज का इतिहास]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%A8_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%80&amp;diff=223001</id>
		<title>राजघाट उत्खनन वाराणसी</title>
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		<updated>2011-10-03T09:45:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{लेख सूची|लेख का नाम=वाराणसी |पर्यटन=वाराणसी पर्यटन |ज़िला=वाराणसी ज़िला }}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Banaras-Hindu-University.jpg|thumb|[[काशी हिन्दू विश्वविद्यालय]]|250px]]&lt;br /&gt;
राजघाट की प्राचीनता और उसका सतत इतिहास किसी पुरातात्विक उत्खनन से 1940 ई. तक निश्चित नहीं था। इसकी प्राचीन स्थिति वर्तमान काशी स्टेशन के उत्तर-पूर्वी में गंगा और वरुणा के मध्य थी, जिसे राजघाट टीले के नाम से जाना जाता है। इसकी आकस्मिक खोज 1939 ई. में वर्तमान काशी स्टेशन के विस्तार के समय रेलवे ठीकेदारों द्वारा खुदाई कराते समय हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;विद्या प्रकाश एवं टी.एन. राय, बुलेटिन ऑफ़ द यू.पी. हिस्टारिकल सोसाइटी, संख्या 4 (साइट्स एंड मानुमेंट्स ऑफ़ यू.पी.) लखनऊ, 1965 पृष्ठ 33&amp;lt;/ref&amp;gt; खुदाई में इन ठेकेदारों को बहुत-सी प्राचीन वस्तुएँ मिलीं जिनमें मिट्टी की मुहरें एवं मुद्रायें भी थीं। इन वस्तुओं को अब भारत कला भवन और इलाहाबाद म्यूनिसिपल म्यूजियम में रखा गया है। इन मुद्राओं में मुख्यत: यूनानी देवी-देवताओं की आकृतियाँ तथा कुछ यूनानी राजाओं के सिर का अंकन है। यहाँ से मिली वस्तुओं से आकृष्ट होकर श्री कृष्णदेव के नेतृत्व में भारतीय [[पुरातत्त्व]] विभाग के एक दल ने यहाँ [[उत्खनन]] प्रारंभ किया। इस दल ने ऊपरी जमाव से 20 फुट नीचे तक खुदाई की। &lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
उत्खनन में 12 खंभों से युक्त एक मंदिर तथा ईंटों की कुछ अन्य संरचनाएँ, उत्तरी काली चमकीले मृण्भांड के टुकड़े तथा कुछ अन्य वस्तुएँ मिलीं।&amp;lt;ref&amp;gt;कृष्णदेव, एनुअल बिबलियोग्राफी ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री एंड इंडोलाजी (1947), पृष्ठ 49-51&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके अतिरिक्त उत्खनन में चौथे स्तर (दूसरी-तीसरी शताब्दी ई.) से अनेक यूनानी देवी-देवताओं की आकृतियों से युक्त मुद्राएँ भी मिली हैं। यहाँ बड़ी मात्रा में मुद्राओं के मिलने के कारण श्री कृष्णदेव इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ये मुद्राएँ [[वाराणसी]] व पश्चिमी देशों (यूनान एवं रोम) के बीच व्यापारिक संबंध की द्योतक हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;कृष्णदेव, क्वायंस डिवाइसेस फ्राम राजघाट सील्स, जर्नल ऑफ़ दि न्यूमिसमैटिक्स सोसायटी ऑफ़ इंडिया 3, (दिसंबर 1941), पृष्ठ 77&amp;lt;/ref&amp;gt; परंतु मोतीचंद्र वाराणसी और पश्चिम के देशों (यूनानी एवं रोम) के बीच व्यापारिक संबंध होने की बात को अस्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि उस समय पश्चिम देशों से व्यापार मुख्यत: जलमार्ग से ही होता था, जो कि अरब सागर व बंगाल की खाड़ी के बंदरगाहों तक ही सीमित था और वहाँ से भारतीय व्यापारियों द्वारा यह सामान देश के अन्य भागों में पहुँचाया जाता था, जबकि स्थलमार्ग से इन विदेशी व्यापारियों के मध्य देश तक पहुँचने के भी प्रमाण नहीं मिलते।&amp;lt;ref&amp;gt;मोतीचंद्र काशी का इतिहास, पृष्ठ 56&amp;lt;/ref&amp;gt; यदि इन व्यापारियों का व्यापारिक संबंध मध्य देश से मान भी लिया जाय तो इसका प्रमाण मध्यदेश के अन्य व्यापारिक नगरों (कौशांबी, सहजाति (आधुनिक भीटा) और श्रीवस्ती में क्यों नहीं मिलता? यह एक विचारणीय प्रश्न है। अत: यह तो निश्चित है कि ये मुद्रायँ व्यापारिक उद्देश्य से यहाँ नहीं आईं। संभव है कि ये मुद्राएँ हिंद-यवन शासक ड्रेमेट्रियस या मिलिंद (मिनांडर) के पाटलिपुत्र विजय अभियान के दौरान बनारस में पड़ाव के समय छूट गई हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह प्राचीन स्थल चारों ओर से सुरक्षित था। दक्षिण-पूर्व की ओर से गंगा, उत्तर और उत्तर-पूर्व में वरुणा नदी तथा पश्चिम तथा उत्तर-पश्चिम की ओर से यह एक परिखा द्वारा परिवेष्टित था। ग्रीब&amp;lt;ref&amp;gt;ई. ग्रीब्ज, काशी, पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; और शेरिंग&amp;lt;ref&amp;gt;एम.ए. शेरिंग, दि सेक्रेड सिटी ऑफ़ हिन्दूज, पृष्ठ 291&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी प्राचीन वाराणसी की स्थिति नगर के उत्तर में वरुणा और गंगा के मिलन-बिंदु पर मानी है। अत: यह तो निश्चित है कि यह स्थल वाराणसी की प्राचीनतम बस्ती को निश्चित करता है। समर्थन के लिए उत्खनन में 1940 में यहीं से प्राप्त एक गुप्तकालीन मुहर पर उल्लेखित लेख ‘वाराणस्याधिष्ठानिधकरणस्य’ का भी उल्लेख समीचीन होगा। इस क्षेत्र का सर्वप्रथम वैज्ञानिक उत्खनन [[काशी हिन्दू विश्वविद्यालय]] के प्रो. अवध किशोर नारायण ने 1957 में प्रारंभ किया। इस कार्य का पुन: आरंभ 1960-61 और बाद के वर्षों में भी चलता रहा।&amp;lt;ref&amp;gt;इंडियन आर्कियोलाजी, ए रिव्यू, 1957-58, पृष्ठ 64&amp;lt;/ref&amp;gt; उत्खनन से निम्नलिखित चरण प्रकाश में आए हैं।&lt;br /&gt;
==उत्खनन के विभिन्न चरण==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chet-Singh-Ghat-Varanasi.jpg|चेत सिंह घाट, वाराणसी|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;प्रथम काल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
राजघाट की खुदाई से प्राप्त अवशेषों से यह सिद्ध होता है कि मानव ने सर्वप्रथम 8वीं शती ई.पू. के आसपास इस दलदल वाले क्षेत्र को साफ करके निवास प्रारंभ किया। उस समय यहाँ के निवासियों का मुख्य पेशा कृषि था। यहाँ के निवासी मिट्टी के मकानों एवं फूस की झोपड़ियों में रहते थे। सीमित उत्खनन के कारण इस काल के आवासीय भवनों के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं मिल सकी, परंतु ऐसा आभास होता है कि इस काल में यह क्षेत्र नगरीकरण की प्रक्रिया से बिल्कुल अनभिज्ञा रहा होगा। इस काल के तीन चरण दृष्टिगत होते हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम चरण के निचले स्तरों की सीमित खुदाई से आवासीय भवनों एव स्मारकों के अवशेष नहीं मिले हैं। यहाँ से प्राप्त वस्तुओं में लोहे के उपकरण, अस्थिनिर्मित औजार, बड़ी संख्या में मृण्मूर्तियाँ, मिट्टी की तश्तरियाँ तथा आभूषण आदि मिले हैं। द्वितीय चरण से सरकण्डे (नरकुल) के टुकड़े तथा कमरों के फर्शों के उत्खनित अंश प्रकाश में आए हैं। इस चरण से एक प्रकार के अवशेष भी मिले है।&amp;lt;ref&amp;gt;ई. ग्रीब्ज, काशी, पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; जिसे बाद के उत्खननों में तटबंध से समीकृत किया गया है। संभवत: गंगा की बाढ़ से नगर की रक्षा के लिए उक्त तटबंध का निर्माण किया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;ए.के. नारायण एवं पुरुषोत्तम सिंह, एक्सकेवेशंस एट राजघाट, खंड 3, पृष्ठ 6। वीरेन्द्र प्रताप सिंह ने उपर्युक्त मत का खंडन करते हुए यह प्रमाणित किया है कि यह प्राकार ही रहे होंगे। अपने मत के समर्थन में उन्होंने उन खातों का उल्लेख किया है जहाँ प्राकार के अवशेष मिले हैं, जिसका उल्लेख उत्खननकर्ताओं ने भूलवशं नहीं किया है। देखें, वीरेन्द्र प्रताप सिंह, सम आसपेक्ट्स ऑफ़ लाइफ इन ऐंश्येंट वाराणसी एज रिविल्ड थ्रो दि आर्कियोलाजिकल सोर्सेज 1980, अध्याय 2&amp;lt;/ref&amp;gt;नगरीकरण के प्रारंभ में तटबंध के निर्माण का यह प्रथम प्रयास था। इस चरण से किसी प्रकार की संरचना के अवशेष नहीं मिले है। फिर भी फर्श के उत्खनित अंश के मिलने से इस काल में भवनों के होने की पुष्टि होती है। इसके अतिरिक्त लाला एवं भूरे रंग की मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं जिनमें हाथी और साँड़ की आकृतियाँ मुख्य है। इस चरण की समाप्ति तीसरी-चौथी शती ई.पू. के लगभग हुई। &lt;br /&gt;
तृतीय चरण में कच्ची मिट्टी की दीवाल तथा कच्चे फर्श के अवशेष मिले हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;ए.के. नारायण और टी.एन.राय, एक्सकेवेशंस ऐट राजघाट, भाग 1, पृष्ठ 22-25&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके अतिरिक्त कुछ मृण्मूर्तियाँ, ताँबे के सिक्के तथा मृतिका वलय कूप भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;द्वितीय काल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
द्वितीय काल का प्रारंभ तीसरी शती ई. पू. से प्रारंभ होता है। यह युग [[वाराणसी का इतिहास|वाराणसी के इतिहास]] में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। नगरीय सभ्यता के इतिहास में विकास का यह प्रथम काल था। इस काल में कृष्ण-लेपित परंपरा, कृष्ण लोहित पात्र एवं उत्तरी काले चमकीले मृण्भाण्डों का प्रयोग बहुतायत में मिलता है&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 2, पृष्ठ 10&amp;lt;/ref&amp;gt;, जो इस काल के आर्थिक और तकनीकी विकास के स्पष्ट प्रमाण है। &lt;br /&gt;
इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि भवनों के निर्माण में पकी ईंटों का प्रयोग था। यदा-कदा मकानों में कच्ची ईंटों का प्रयोग भी मिलता है। भवनों में पकी ईंटों के प्रयोग से जहाँ एक ओर इनकी तकनीकी प्रगति की जानकारी मिलती है, वहीं दूसरी ओर जनता की सुख-समृद्धि का भी ज्ञान होता है। भवनों की नींव में कंकड़ पत्थर एवं ईंटों के टुकड़ों को डाला जाता था। उत्खनन से एक स्थान पर कंकड़-पत्थर से युक्त कंकरीट की नींव भी मिली है।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 1, पृष्ठ 26&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवनों की छत के निर्माण में खपरैल (रुफटाइल्स) का प्रयोग मिलता है। इनको लोहे के कीलों से बाँधा जाता था। दीवालों में स्तंभ-गर्त (पोस्ट-होल्स) के अवशेष भी मिले हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि छत को टिकाने के लिए लकड़ी या बाँस के खंभों का प्रयोग किया जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;ए.के. नारायण और टी.एन. राय, एक्सकेवेशंस ऐट राजघाट, भाग 1, पृष्ठ 26, चित्र 5, प्लेट 4, 5&amp;lt;/ref&amp;gt; मकान एक सीध में बनाए जाते थे और दो मकानों के मध्य कुछ स्थान छोड़ दिया जाता था। स्पष्टत: शुद्ध वायु और नगर की स्वच्छता के लिए ही ऐसा किया जाता था। इन मकानों के मध्य गोलाकार कुएँ भी मिलें हैं। कभी-कभी ये कुएँ मकानों के अंदर भी स्थित होते थे। पूर्ण खुदाई के अभाव में कुछ निश्चित कहना कठिन है लेकिन कमरे के अंदर ऐसे कुओं के मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि इनका उपयोग शौच आदि के लिए किया जाता रहा होगा।&amp;lt;ref&amp;gt;वीरेन्द्र प्रताप सिंह, सम आसपेक्ट्स ऑफ़ लाइफ इन ऐंश्येंट वाराणसी एज रिविल्ड थ्रो दि आर्कियोलाजिकल सोर्सेज, पृष्ठ 88 और चित्र संख्या-2&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
उत्खनन से पता चलता है कि प्रावस्था 1 में कमरों का औसत आकार 2.56 मीटर x 2.26 तथा प्रावस्था 2 में 1.90 मीटर x 2.92 मीटर था। प्रत्येक परिवार के रहने के लिए दो कमरे थे। इन कमरों में दो दरवाजे, एक दालान (प्रकोष्ठ), एक कुआँ, स्नानार्थ चबूतरा तथा नाली सम्मिलित थी। यहाँ से सोख्ता घड़े और मृतिकावलय कूप के भी अवशेष मिले हैं। इसके अतिरिक्त पकी ईंटों से निर्मित एक नाली के अवशेष भी मिले हैं। यह नाली उत्तर से दक्षिण 2.75 मीटर लंबाई में विस्तृत थी, जो बड़े आकार की ईंटों से आवृत थी। सफाई की सुविधा के लिए नाली में लंबवत् ईंटों का प्रयोग मिलता है। &lt;br /&gt;
इस काल में कच्ची ईंटों का प्रयोग भी मिलता है। उत्खनन से चार रद्दों वाले एक भवन का भी पता चला है। इस भवन में प्रयुक्त ईंटों 39x30x7 सेंटीमीटर आकार की है। पकी ईंटों की माप दो वर्गों में दृष्टिगत होती है। एक वर्ग में प्रयुक्त ईंटों 50x31x5 सेंटीमीटर आकार की है। तथा दूसरे वर्ग में 48x28x5 सेंटीमीटर आकार की है। इस काल का अंत ईसवी सन के प्रारंभ में हुआ होगा। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;तृतीय काल&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
इस काल का प्रारंभ ईसवी शती से लेकर तीसरी शताब्दी ई. के मध्य माना जाता है। आवासीय संरचना की दृष्टि से यह काल सर्वाधिक समृद्ध था। इस काल के सभी भवन पकी ईंटों से निर्मित हैं। इनमें प्रयुक्त ईंटें मुख्यत: दो आकार की हैं- इस प्रकार की ईंटें जिनकी माप 40x25x5 सेंटीमीटर है तथा दूसरे प्रकार की ईंटें 39x29x5 सेंटीमीटर माप की है।&amp;lt;ref&amp;gt;अवधकिशोर नारायण और टी.एन. राय. एक्सकेवेशंस ऐट राजघाट, भाग 1, पृष्ठ 28, प्लेट 10 ।, 18&amp;lt;/ref&amp;gt; इस काल की उत्खनित संरचना को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से उत्खननकर्ताओं ने तीन संरचनात्मक प्रावस्थाओं में विभक्त किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संरचनात्मक प्रावस्था 1 में ऐसे भवनों की नींव मिलती है जिनमें कमरे का आकार 4x4.21 मीटर लंबा है और एक-दूसरे को पूर्व के छोर पर काटते हैं। इसकी नींव की मोटाई 20 सेंटीमीटर चौड़ी थी। इसके साथ दो मुड़ी हुई दीवालें भी थीं। इस संरचना से बड़े आकार के कमरे का पता चलता है, जिसका एक पार्श्व 6.06 मीटर लंबा था। यहीं से ईंटों के प्लेटफार्मयुक्त एक कुआँ भी मिला था। फर्श के कोने में वृत्ताकार धँसा हुआ एक स्थान था। संभवत: यहाँ सोख्ता घड़े (सोकेज जार्स) या कोई उपकरण रखा गया होगा।&amp;lt;ref&amp;gt;उल्लेखनीय है घरों में सोख्ता घड़ों को गढ्ढा खोदकर रखा जाता था। जिसमें घर की गंदगी आदि इकट्ठा की जाती थी।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संरचनात्मक प्रावस्था 3 में कंकरीट की एक 24 सेंटीमीटर मोटी फर्श और कुछ दीवालों के अवशेष मिलें हैं इसमें एक दीवाल 2.27 मीटर थी, जिसमें प्रयुक्त ईटों की 11 परतें हैं। इसके अतिरुक्त कई अन्य दीवालों के अवशेषों का भी पता चला है, लेकिन भग्नावस्था में होने के कारण इनसे किसी निश्चित योजना की जानकारी नहीं हो पाती। भवनों की निर्माण योजना से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि उनकी रचना दिशाओं को ध्यान में रखकर की जाती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;ए.के. नारायण एवं टी.एन. राय, एक्सकवेशंस ऐट राजाघाट, पृष्ठ 28&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस काल के उत्खनित सभी मृदभांड लाल रंग के हैं। रोचक है कि द्वितीय काल में इस प्रकार के मृदभांडों का प्रयोग अपेक्षाकृत कम मिलता है, जबकि इस काल में इनका प्रयोग आकार और पकाने की नई प्रक्रिया के रूप में दृष्टिगत होता है। अन्य महत्त्वपूर्ण वस्तुओं में सिक्कों एवं मुहरों का प्रयोग मुख्य है। यहाँ से 400 मुहरें एवं राजमुद्रांक (सीलिंग्स) परिष्कृत एवं अपरिष्कृत रूप में मिली हैं। उल्लेख्य है कि इसी प्रकार के राज्यमुद्रांक (सीलिंग्स) अगियाबीर से भी मिली हैं जिनका विवरण अध्याय 9 में दिया गया है। पुरालिपि संबंधी चिन्हों से ये मुहरें पहली शताब्दी और तीसरी शताब्दी के मध्य की प्रतीत होती हैं। इस काल में पहली बार डाईस्ट्रक सिक्कों का प्रयोग मिलता है। यहाँ से कौशांबी और अयोध्या के दो सिक्के भी मिले हैं, जिन पर लेख क्रमश: ‘नवस्’ और ‘शिवदत्तस’ अंकित हैं। इस काल से बड़ी संख्या में मुहरों एवं राजमुद्रांकों का मिलना तथा समर्थनस्वरूप सिक्कों का प्राप्त होना, इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण् है कि इस काल में व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव भाग 3, पृष्ठ 14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;चतुर्थ काल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
यह काल 300 से 700 ई. के बीच विकसित था। इस काल के निर्मित भवन पूर्व-युग के भवनों से भिन्न थे। इस काल के सभी अवशेष गुप्तयुगीन हैं। इस काल के मकान सभी सुविधाओं से युक्त थे। इन मकानों में स्नानगृह, पाकशाला एवं भंडारकक्ष इत्यादि मिलते हैं। इस काल की प्राप्त वस्तुओं में दो कुंड, बर्तन रखने के मर्तबान, एक कंकरीट की जाली मुख्य हैं कमरों में प्रयुक्त इटें 41.5x26.5x5 सेंटीमीटर आकार की हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त तथ्यों के विवेचन से यह स्पष्ट है कि विभिन्न युगों में भवन-निर्माण की प्रक्रिया में पर्याप्त अंतर मिलता है। निर्माण की प्रथम प्रक्रिया के पश्चात् उत्तरोत्तर परिवर्द्धन का क्रम परिलक्षित होता है। सर्वप्रथम 8वीं शती ईसवी पूर्व में मानव मुख्यत: कच्ची मिट्टी के मकानों एवं झोपड़ियों में निवास करता था। परंतु नगरीकरण की प्रक्रिया के प्रांरभ के फलस्वरूप दूसरी-तीसरी सदी ई.पू. में भवनों के निर्माण में पकी ईंटों का प्रयोग होने लगा। इस काल में कच्ची ईंटों का प्रयोग भी मिलता है। लोगों को लोहे का ज्ञान हो चुका था, इसलिए भवनों में लोहे की कीलों का उपयोग आवश्यकतानुसार होने लगा।&amp;lt;ref&amp;gt;उल्लेखनीय है कि लोहे की कीलों का प्रयोग खपरैलों को बाँधने के लिए किया जाता था।&amp;lt;/ref&amp;gt; ईसवी सन् के प्रारंभ से तीसरी शताब्दी तक इन भवनों में पकी ईंटों का प्रयोग बहुलता से मिलता है। इस काल के कमरे पूर्ववर्ती कमरों से बड़ें होते थे। भवनों की नींव कंकरीट एवं ईंटों के टुकड़ों से भरी जाती थी। तीसरी शताब्दी से सातवीं शताब्दी के भवनों में भी पकी ईंटों का प्रयोग मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:वाराणसी]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]][[Category:उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]] [[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%88%E0%A4%B8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0&amp;diff=222999</id>
		<title>ईसवाल उदयपुर</title>
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		<updated>2011-10-03T09:44:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*ईसवाल [[राजस्थान]] के दक्षिण में स्थित उदयपुर ज़िले की प्राचीन औद्योगिक बस्ती है, जो एक किमी लम्बे व आधा किमी चौड़े भू-भाग में फैली हुई है। &lt;br /&gt;
*संवत् 1242 का अभिलेख, जो मंदिर के जीर्णोद्धार अथवा प्रतिमा स्थापना के समय लगाया गया होगा। &lt;br /&gt;
*यह अभिलेख गुहिल शासक मथनसिंह का है तथा मंदिर के अधिष्ठातादेव 'वोहिगस्वामी' है।&lt;br /&gt;
*इस गर्भगृह में [[विष्णु]] की प्रतिमा प्रतिष्ठित है, जिसके चारों ओर चारों दिशाओं में क्रमशः [[गणेश]], [[काली|शक्ति]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] तथा [[शिव]] के गौण मंदिर स्थापित हैं। &lt;br /&gt;
*इन मूर्तियों की सौर पूजा में वैष्णव पूजा समावेश के स्पष्ट चिह्न दिखाई पड़ते हैं। &lt;br /&gt;
*गर्भगृह के पृष्ठभाग की प्रमुख ताख में सूर्य एवं विष्णु का संयुक्त विग्रह उत्कीर्ण है, जो विष्णु पूजा में सौर पूजा के समावेश को दर्शाता है।&lt;br /&gt;
*देश में अपने तरीक़े की इस अलग श्रमिक बस्ती की अब तक बारह मीटर तक राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर के [[पुरातत्त्व]] विभाग के तत्त्वावधान में खुदाई की जा रही है, अभी इसके तक निरंतम स्तर पर नहीं पहुँचा जा सका है। &lt;br /&gt;
*यहाँ इस क्षेत्र में दो हज़ार वर्ष तक निरंतर [[लोहा]] गलाने के प्रमाण मिले हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ पर प्रारम्भिक [[उत्खनन]] से पाँच प्रस्तरों में बस्तियों के प्रमाण मिले है, जो प्राक् ऐतिहासिक काल से मध्यकाल तक का प्रतिनिधित्व करते हैं। &lt;br /&gt;
*उत्खनन से प्राप्त भवनों के अवशेषों में रसोई के प्रमाणस्वरूप चूल्हे, संग्रह करने की चक्की तथा [[लाल रंग]] के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ मकान प्रस्तर खण्डों से निर्मित हैं, जिन्हें मिट्टी के गारे से जोड़ा गया है। &lt;br /&gt;
*इस उत्खनन के दौरान लौह मल, लौह अयस्क, मिट्टी में प्रयुक्त होने वाले पाइप भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*उत्खनन से प्राप्त मृद्भाण्डों के अवशेष यह प्रमाणित करते हैं कि पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास इस क्षेत्र में लोहा गलाने का कार्य आरम्भ हो गया था।&lt;br /&gt;
*इस समय भारतीय इतिहास में [[मगध]] [[बिहार]] साम्राज्य का निर्माण हो रहा था। &lt;br /&gt;
*इसके पश्चात् [[मौर्य साम्राज्य]] व वंश शुंग-[[कुषाण साम्राज्य|कुषाण काल]] में भी यहाँ लौहा गलाने की गतिविधियाँ संचालित थीं। &lt;br /&gt;
*इसकी पुष्टि यहाँ से मिले सिक्कों व मृद्भाण्डों से होती है। &lt;br /&gt;
*कुछ पुरातत्त्वज्ञों ने उत्खनन से प्राप्त सिक्कों को प्रारंभिक कुषाण काल का होना स्वीकार किया है। &lt;br /&gt;
*इस उत्खनन से कतिपय हड्डियाँ भी मिली हैं, जिनमें ऊँट का [[दाँत]] महत्त्वपूर्ण है, अभी इस क्षेत्र में उत्खनन जारी है। &lt;br /&gt;
*बस्ती में लौह प्रौद्योगिकी के उद्भव व विकास के और भी प्रमाण मिलने की सम्भावना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]][[Category:पर्यटन_कोश]][[Category:उदयपुर_के_धार्मिक_स्थल]][[Category:उदयपुर]]__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>सलीम चिश्ती</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[File:Buland-Darwaja-Fatehpur-Sikri-Agra.jpg|thumb|250px|[[बुलंद दरवाज़ा]], [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]]]] &lt;br /&gt;
सलीम चिश्ती अजमेर के ख़्वाजा मुईनुद्दीन् चिश्ती के पौत्र थे । जब बादशाह [[अकबर]] द्वारा संतान प्राप्ति की दिशा में किए गए सभी प्रयास निष्फल रहे तो वह स्वप्न में आए निर्देश के मुताबिक़ बाबा सलीम चिश्ती के पास आए । उन्हीं के आशीर्वाद से अकबर को महारानी जोधाबाई से पुत्र प्राप्ति हुई और बाबा के नाम पर उसका नाम भी सलीम रखा गया । बाबा सलीम चिश्ती के सम्मान में ही बादशाह अकबर ने  [[बुलंद दरवाज़ा]] बनवाया था । उसके बाद अकबर ने [[फ़तेहपुर सीकरी]] को अपनी राजधानी भी बनाया लेकिन केवल 15 वर्षों में ही उसे अपना यह निर्णय बदलना पड़ा ।  यहाँ पर बादशाह अकबर का महल भी है जो कि [[भारत]] सरकार के [[पुरातत्त्व]] संरक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है । यहाँ पर जोधाबाई महल, पंचमहल, अस्तबल, पचीसी दरबार, दीवान-ऐ-ख़ास, दीवान-ऐ-आम, बीरबल महल, अनूप तालाब भी है जहाँ पर सुरसम्राट [[तानसेन]] अपना संगीत सुनाते थे ।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-76.jpg|thumb|250px|left|सलीम चिश्ती की दरगाह, [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]]]]&lt;br /&gt;
सीकरी में एक सूफ़ी सन्त शेख़ सलीम चिश्ती रहा करते थे। उनकी शोहरत सुनकर अकबर, एक पुत्र की कामना लेकर उनके पास पहुंचा और जब अकबर को बेटा हुआ तो अकबर ने उसका नाम सलीम रखा। सीकरी में जहां सलीम चिश्ती रहते थे उसी के पास अकबर ने सन 1571 में एक क़िला बनवाना शुरू किया। अकबर की कई रानियाँ और बेगम थीं, किंतु उनमें से किसी से भी पुत्र नहीं हुआ था। अकबर पीरों एवं फ़कीरों से पुत्र प्राप्ति के लिए दुआएँ माँगता फिरता था। शेख सलीम चिश्ती ने अकबर को दुआ दी। दैवयोग से अकबर की बड़ी रानी जो कछवाहा राजा बिहारीमल की पुत्री और भगवानदास की बहिन थी, गर्भवती हो गई, और उसने पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम शेख के नाम पर सलीम रखा गया जो बाद में [[जहाँगीर]] के नाम से अकबर का उत्तराधिकारी हुआ। अकबर शेख से बहुत प्रभावित था। उसने अपनी राजधानी सीकरी में ही रखने का निश्चय किया। सन 1571 में राजधानी का स्थानांतरण किया गया। उसी साल अकबर ने गुजरात को फ़तह किया। इस कारण नई राजधानी का नाम फ़तेहपुर सीकरी रखा गया। सन 1584 तक लगभग 14 वर्ष तक फ़तेहपुर सीकरी ही मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रही। अकबर ने अनेक निर्माण कार्य कराये, जिससे वह आगरा के समान बड़ी नगरी बन गई थी। फ़तेहपुर सीकरी समस्त देश की प्रशासनिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र थी। सन 1584 में एक अंग्रेज़ व्यापारी अकबर की राजधानी आया, उसने लिखा है− 'आगरा और फतेहपुर दोनों बड़े शहर हैं। उनमें से हर एक लंदन से बड़ा और अधिक जनसंकुल है। सारे [[भारत]] और [[ईरान]] के व्यापारी यहाँ रेशमी तथा दूसरे कपड़े, बहुमूल्य रत्न, लाल, हीरा और मोती बेचने के लिए लाते हैं।'&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image =चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-2.jpg&lt;br /&gt;
|height =200&lt;br /&gt;
|alt =फ़तेहपुर सीकरी&lt;br /&gt;
|caption=शेख़ सलीम चिश्ती की दरगाह ([[फ़तेहपुर सीकरी]]) का विहंगम दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View Of Shekh Salim Chishti Shrine (Fatehpur Sikri)&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-81.jpg|[[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]] &lt;br /&gt;
चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-77.jpg|सलीम चिश्ती की दरगाह, [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-83.jpg|[[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]] &lt;br /&gt;
चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-78.jpg|सलीम चिश्ती की दरगाह, [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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		<title>महाराजा पैलेस मैसूर</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Mysore-Palace-2.jpg|thumb|250px|[[मैसूर]] का महाराजा पैलेस&amp;lt;br /&amp;gt; Mysore's Maharaja Palace]]&lt;br /&gt;
*महाराजा पैलेस [[कर्नाटक]] के [[मैसूर]] शहर में स्थित है। &lt;br /&gt;
*महाराजा पैलेस [[मैसूर]] में आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है। &lt;br /&gt;
*महाराजा पैलेस मिर्जा रोड पर स्थित [[भारत]] के सबसे बड़े महलों में से एक है। &lt;br /&gt;
*महाराजा पैलेस में मैसूर राज्य के वुडेयार महाराज रहते थे। &lt;br /&gt;
*महाराजा पैलेस की देखरेख अब [[पुरातत्त्व]] विभाग करता है।&lt;br /&gt;
*इस महल की ख़ासियत है इस महल की कल्याण मंडप की काँच से बनी छत, दीवारों पर लगी तस्वीरें और स्वर्णिम सिंहासन। &lt;br /&gt;
*जब लकड़ी का महल जल गया था, तब इस महल का निर्माण कराया गया। &lt;br /&gt;
*[[1912]] में बने इस महल का नक्शा ब्रिटिश के हेनरी इर्विन ने बनाया था। &lt;br /&gt;
*बहुमूल्य [[रत्न|रत्नों]] से सजे इस सिंहासन को [[दशहरा|दशहरे]] के दौरान जनता के देखने के लिए रखा जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==वीथिका==&lt;br /&gt;
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चित्र:Mysore-Palace-1.jpg|[[मैसूर]] का महाराजा पैलेस &lt;br /&gt;
चित्र:Mysore-Palace.jpg|महाराजा पैलेस, [[मैसूर]]&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कर्नाटक के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
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		<title>विक्रमशिला</title>
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&lt;div&gt;*प्राचीन [[भारत]] की एक नगरी जिसमें बहुत बड़ा [[बौद्ध]] विद्यालय था। [[बिहार]] राज्य के [[भागलपुर]] ज़िले में [[गंगा नदी|गंगा]] तट पर विक्रमशिला स्थित है। यहाँ बौद्ध महाविहार निर्मित था जो समकालीन विश्व में बौद्ध वज्रयान मत का प्रमुख केन्द्र था। &lt;br /&gt;
*[[विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय]] बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ न्याय, तत्वज्ञान एवं व्याकरण की शिक्षा दी जाती थी। &lt;br /&gt;
*ग्यारहवीं सदी में [[पाल वंश|पाल]] शासक धर्मपाल ने विक्रमशिला महाविहार का निमार्ण कराया था। विक्रमशिला महाविहार की विश्व प्रसिद्ध चर्चा से उत्साहित [[तिब्बत]] के सम्राट ने यहाँ के प्रसिद्ध विद्वान '[[दीपांकर श्रीज्ञान अतीश]]' को आमंत्रित किया था। उन्होंने तिब्बत से बौद्ध भिक्षुओं को [[चीन]], [[जापान]], मलेशिया, थाइलैंड से लेकर [[अफ़ग़ानिस्तान]] तक भेजकर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया। &lt;br /&gt;
*विक्रमशिला के बारे में सबसे पहले राहुल सांस्कृत्यायन ने [[सुल्तानगंज]] के क़रीब होने का अंदेशा प्रकट किया था। उसका मुख्य कारण था कि अंग्रेजों के जमाने में सुल्तानगंज के निकट एक गांव में [[बुद्ध]] की प्रतिमा मिली थी। बावजूद उसके अंग्रेजों ने विक्रमशिला के बारे में पता लगाने का प्रयास नहीं किया। इसके चलते विक्रमशिला की खुदाई [[पुरातत्त्व]] विभाग द्वारा 1986 के आसपास शुरू हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://bhagalpurmycity.blogspot.com/2010/03/blog-post_12.html|accessmonthday=[[14 अगस्त]]|accessyear=[[2010]] |last=|first= |authorlink=|title=विक्रमशिला विश्वविद्यालय को लेकर सरकार गंभीर पहल नहीं कर रही|format=एच.टी.एम.एल |publisher=bhagalpurmycity.blogspot.com|language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[बख़्तियार ख़िलजी]] ने 1202-1203 ई. में विक्रमशिला महाविहार को नष्ट कर दिया था। यहाँ के विशाल पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया था, उस समय यहाँ पर 160 विहार थे जहां विद्यार्थी अध्ययनरत&lt;br /&gt;
थे।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.kaverinews.com/article.php?id=371|accessmonthday=[[14 अगस्त]]|accessyear=[[2010]] |last=|first= |authorlink=|title= बिहार : प्रमुख ऎतिहासिक स्थल|format=एच.टी.एम.एल |publisher=kaverinews.com|language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
* [http://www.asi.nic.in/asi_museums_vikramshila_hn.asp संग्रहालय-विक्रमशिला]&lt;br /&gt;
* [http://www.biharsamaylive.com/NewsDetails.aspx?lNewsID=16976&amp;amp;lCategoryID=274 भागलपुर:एक परिचय]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बिहार के नगर}}&lt;br /&gt;
{{बिहार के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
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[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>सिंधु घाटी सभ्यता</title>
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		<updated>2011-10-03T09:43:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=सिन्धु|लेख का नाम=सिन्धु (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mohenjodaro-Sindh.jpg|thumb|सिन्ध में [[मोहनजोदाड़ो]] में [[हड़प्पा]] संस्कृति के अवशेष|250px]]&lt;br /&gt;
आज से लगभग 70 वर्ष पूर्व [[पाकिस्तान]] के 'पश्चिमी पंजाब प्रांत' के 'माण्टगोमरी ज़िले' में स्थित 'हरियाणा' के निवासियों को शायद इस बात का किंचित्मात्र भी आभास नहीं था कि वे अपने आस-पास की ज़मीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग इतने धड़ल्ले से अपने मकानों का निर्माण में कर रहे हैं, वह कोई साधारण ईटें नहीं, बल्कि लगभग 5,000 वर्ष पुरानी और पूरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष हैं। इसका आभास उन्हें तब हुआ जब 1856 ई. में 'जॉन विलियम ब्रन्टम' ने कराची से [[लाहौर]] तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता‘ का नाम दिया गया।&lt;br /&gt;
	&lt;br /&gt;
इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय 'रायबहादुर दयाराम साहनी' को जाता है। उन्होंने ही [[पुरातत्त्व]] सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक 'सर जॉन मार्शल' के निर्देशन में 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी। लगभग एक वर्ष बाद 1922 में 'श्री राखल दास बनर्जी' के नेतृत्व में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के 'लरकाना' ज़िले के [[मोहनजोदाड़ो]] में स्थित एक [[बौद्ध]] [[स्तूप]] की खुदाई के समय एक और स्थान का पता चला। इस नवीनतम स्थान के प्रकाश में आने क उपरान्त यह मान लिया गया कि संभवतः यह सभ्यता [[सिंधु नदी]] की घाटी तक ही सीमित है, अतः इस सभ्यता का नाम ‘सिधु घाटी की सभ्यता‘ (Indus Valley Civilization) रखा गया । सबसे पहले 1927 में 'हड़प्पा' नामक स्थल पर [[उत्खनन]] होने के कारण 'सिन्धु सभ्यता' का नाम 'हड़प्पा सभ्यता' पड़ा। पर कालान्तर में 'पिग्गट' ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों को ‘एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियां‘ बतलाया।    &lt;br /&gt;
{{tocright}}	&lt;br /&gt;
अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में इस सभ्यता के लगभग 1000 स्थानों का पता चला है जिनमें कुछ ही परिपक्व अवस्था में प्राप्त हुए हैं। इन स्थानों के केवल 6 को ही नगर की संज्ञा दी जाती है। ये हैं -&lt;br /&gt;
#[[हड़प्पा]], &lt;br /&gt;
#[[मोहनजोदाड़ो]], &lt;br /&gt;
#[[चन्हूदड़ों]], &lt;br /&gt;
#[[लोथल]], &lt;br /&gt;
#[[कालीबंगा]], &lt;br /&gt;
#[[हिसार]] &lt;br /&gt;
#[[बणावली (हरियाणा)|बणावली]]।&lt;br /&gt;
==सभ्यता का विस्तार==&lt;br /&gt;
अब तक इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान और भारत के [[पंजाब]], [[सिंध]], [[बलूचिस्तान]], [[गुजरात]], [[राजस्थान]], [[हरियाणा]], पश्यिमी उत्तर प्रदेश, [[जम्मू और कश्मीर|जम्मू-कश्मीर]] के भागों में पाये जा चुके हैं। इस सभ्यता का फैलाव उत्तर में 'जम्मू' के 'मांदा' से लेकर दक्षिण में [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] के मुहाने 'भगतराव' तक और पश्चिमी में 'मकरान' समुद्र तट पर 'सुत्कागेनडोर' से लेकर पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में [[मेरठ]] तक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल 'सुत्कागेनडोर', पूर्वी पुरास्थल 'आलमगीर', उत्तरी पुरास्थल 'मांडा' तथा दक्षिणी पुरास्थल 'दायमाबाद' है। लगभग त्रिभुजाकार वाला यह भाग कुल क़रीब 12,99,600 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सिन्धु सभ्यता का विस्तार का पूर्व से पश्चिमी तक 1600 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण तक 1400 किलोमीटर था। इस प्रकार सिंधु सभ्यता समकालीन [[मिस्र]] या 'सुमेरियन सभ्यता' से अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिंधु सभ्यता के स्थल अब निम्नलिखित क्षेत्रों में मिलते हैं -&lt;br /&gt;
====बलुचिस्तान==== &lt;br /&gt;
उत्तरी बलुचिस्तान में स्थित 'क्वेटा' तथा 'जांब' की धारियों में सैंधव सभ्यता से सम्बन्धित कोई भी स्थल नहीं है। किन्तु दक्षिणी बलूचिस्तान में सैंधव सभ्यता के कई पुरास्थल स्थित हैं जिसमें अति महत्त्वपूर्ण है 'मकरान तट'। मकरान तट प्रदेश पर मिलने वाले अनेक स्थलों में से पुरातात्विक दृष्टि से केवल तीन स्थल महत्त्वपूर्ण हैं- &lt;br /&gt;
#सुत्कागेनडोर (दश्क नदी के मुहाने पर), &lt;br /&gt;
#सुत्काकोह (शादीकौर के मुहाने पर) और &lt;br /&gt;
#बालाकोट (विंदार नदी के मुहाने पर), डावरकोट (सोन मियानी खाड़ी के पूर्व में विदर नदी के मुहाने पर)।&lt;br /&gt;
====उत्तर पश्चिमी सीमांत==== &lt;br /&gt;
यहाँ सारी सामग्री, 'गोमल घाटी' में केन्द्रित प्रतीत होती है जो [[अफ़ग़ानिस्तान]] जाने का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मार्ग है। 'गुमला' जैसे स्थलों पर सिंधु पूर्व सभ्यता के निक्षेपों के ऊपर सिंधु सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।&lt;br /&gt;
====सिंधु====&lt;br /&gt;
इनमें कुछ स्थल प्रसिद्ध हैं जैसे - 'मोहनजोदड़ों', 'चन्हूदड़ों', 'जूडीरोजोदड़ों', (कच्छी मैदान में जो कि सीबी और जैकोबाबाद के बीच सिंधु की बाढ़ की मिट्टी का विस्तार है) 'आमरी' (जिसमें सिंधु पूर्व सभ्यता के निक्षेप के ऊपर सिंधु सभ्यता के निक्षेप मिलते हैं) 'कोटदीजी', 'अलीमुराद', 'रहमानढेरी', 'राणाधुडई' इत्यादि।&lt;br /&gt;
====पश्चिमी पंजाब====&lt;br /&gt;
इस क्षेत्र में बहुत ज़्यादा स्थल नहीं है। इसका कारण समझ में नहीं आता। हो सकता है [[पंजाब]] की नदियों ने अपना मार्ग बदलते-बदलते कुछ स्थलों का नष्ट कर दिया हो। इसके अतिरिक्त 'डेरा इस्माइलखाना', 'जलीलपुर', 'रहमानढेरी', 'गुमला', 'चक-पुरवानस्याल' आदि महत्त्वपूर्ण पुरास्थल है।&lt;br /&gt;
====बहावलपुर====&lt;br /&gt;
यहाँ के स्थल सूखी हुई [[सरस्वती नदी]] के मार्ग पर स्थित हैं। इस मार्ग का स्थानीय नाम का ‘हकरा‘ है । 'घग्घर हमरा' अर्थात [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] [[दृषद्वती नदी|दृशद्वती]] नदियों की घाटियों में हड़प्पा संस्कृति के स्थलों का सर्वाधिक संकेन्द्रण (सर्वाधिक स्थल) प्राप्त हुआ है। किन्तु इस क्षेत्र में अभी तक किसी स्थल का उत्खनन नहीं हुआ है। इस स्थल का नाम 'कुडावाला थेर' है जो प्रकटतः बहुत बड़ा है।&lt;br /&gt;
====राजस्थान====&lt;br /&gt;
यहाँ के स्थल 'बहाबलपुर' के स्थलों के निरंतर क्रम में हैं जो प्राचीन सरस्वती नदी के सूखे हुए मार्ग पर स्थित है। इस क्षेत्र में सरस्वती नदी को 'घघ्घर' कहा जाता है। कुछ प्राचीन दृषद्वती नदी के सूखे हुए मार्ग के साथ- साथ भी है जिसे अब 'चैतग नदी' कहा जाता है। इस क्षेत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल 'कालीबंगा' है। कालीबंगा नामक पुरास्थल पर भी पश्चिमी से गढ़ी और पूर्व में नगर के दो टीले, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ों, की भांति विद्यमान है। राजस्थान के समस्त सिंधु सभ्यता के स्थल आधुनिक [[गंगानगर ज़िला|गंगानगर ज़िले]] में आते हैं।&lt;br /&gt;
====हरियाणा====&lt;br /&gt;
[[हरियाणा]] का महत्त्वपूर्ण सिंधु सभ्यता स्थल [[हिसार ज़िला|हिसार ज़िले]] में स्थित 'बनवाली' है। इसके अतिरिक्त 'मिथातल', 'सिसवल', 'वणावली', 'राखीगढ़', 'वाड़ा तथा 'वालू' नामक स्थलों का भी उत्खनन किया जा चुका है।&lt;br /&gt;
====पूर्वी पंजाब====&lt;br /&gt;
इस क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण स्थल 'रोपड़ संधोल' है। हाल ही में [[चंडीगढ़]] नगर में भी हड़प्पा संस्कृति के निक्षेप पाये गये हैं। इसके अतिरिक्त 'कोटलानिहंग ख़ान', 'चक 86 वाड़ा', 'ढेर-मजरा' आदि पुरास्थलों से सैंधव सभ्यता से सम्बद्ध पुरावशेष प्राप्त हुए है।&lt;br /&gt;
====गंगा-यमुना दोआब====&lt;br /&gt;
यहाँ के स्थल [[मेरठ ज़िला|मेरठ ज़िले]] के 'आलमगीर' तक फैले हुए हैं। एक अन्य स्थल [[सहारनपुर ज़िला|सहारनपुर ज़िले]] में स्थित 'हुलास' तथा 'बाड़गांव' है। हुलास तथा बाड़गांव की गणना पश्वर्ती सिन्धु सभ्यता के पुरास्थलों में की जाती है।&lt;br /&gt;
====जम्मू====&lt;br /&gt;
इस क्षेत्र के मात्र एक स्थल का पता लगा है, जो 'अखनूर' के निकट 'भांडा' में है। यह स्थल भी सिन्धु सभ्यता के परवर्ती चरण से सम्बन्घित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गुजरात====&lt;br /&gt;
1947 के बाद [[गुजरात]] में सैंधव स्थलों की खोज के लिए व्यापक स्तर पर उत्खनन किया गया । गुजरात के 'कच्छ', 'सौराष्ट्र' तथा गुजरात के मैदानी भागों में सैंधव सभ्यता से सम्बन्घित 22 पुरास्थल है, जिसमें से 14 कच्छ क्षेत्र में तथा शेष अन्य भागों में स्थित है। गुजरात प्रदेश में ये पाए गए प्रमुख पुरास्थलों में 'रंगपुर', 'लापेथल', 'पाडरी', 'प्रभास-पाटन', 'राझदी', '[[देशलपुर]]', 'मेघम', 'वेतेलोद', 'भगवतराव', 'सुरकोटदा', 'नागेश्वर', 'कुन्तासी', 'शिकारपुर' तथा 'धौलावीरा' आदि है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====महाराष्ट्र====&lt;br /&gt;
प्रदेश के 'दायमाबाद' नामक पुरास्थल से मिट्टी के ठीकरे प्राप्त हुए है जिन पर चिरपरिचित सैंधव लिपि में कुछ लिखा मिला है, किन्तु पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में सैंधव सभ्यता का विस्तार [[महाराष्ट्र]] तक नहीं माना जा सकता है। ताम्र मूर्तियों का एक निधान, जिसे प्रायः हडप्पा संस्कृति से सम्बद्ध किया जाता है, वह महाराष्ट्र और दायमादाबद नामक स्थान से प्राप्त हुआ है - इसमें 'रथ चलाते मनुष्य', 'सांड', 'गैंडा', और 'हाथी' की आकृति प्रमुख है। यह सभी ठोस धातु की है और वजन कई किलो है, इसकी तिथि के विषय में विद्धानों में मतभेद है।&lt;br /&gt;
====अफ़ग़ानिस्तान====&lt;br /&gt;
हिन्दुकश के उत्तर में [[अफ़ग़ानिस्तान]] में स्थित 'मुंडीगाक' और 'सोर्तगोई' दो पुरास्थल है। मुंडीगाक का उत्खनन 'जे.एम. कैसल' द्वारा किया गया था तथा सोर्तगोई की खोज एवं उत्खनन 'हेनरी फ्रैंकफर्ट' द्वारा कराया गया था। सोर्तगोई लाजवर्द की प्राप्ति के लिए बसायी गयी व्यापारिक बस्ती थी।&lt;br /&gt;
==काल निर्धारण== &lt;br /&gt;
सैंधव सभ्यता के काल को निर्धारित करना निःसंदेह बड़ा ही कठिन काम है, फिर भी विभिन्न विद्धानों ने इस विवादास्पद विषय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। 1920 ई.पू. के दशक में सर्वप्रथम हड़प्पाई सभ्यता का ज्ञान हुआ। &lt;br /&gt;
*हड़प्पाई सभ्यता का काल निर्धारण मुख्य रूप से 'मेसोपोटामिया' में 'उर' और 'किश' स्थलों पर पाए गए हड़प्पाई मुद्राओं के आधार पर किया गया। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम प्रयास 'जॉन मार्शल' का रहा। उन्होंने 1931 ई. में इस सभ्यता का काल 3250 ई.पू. 2750 ई.पू. निर्धारित किया। &lt;br /&gt;
*ह्वीलर ने इसका काल 2500 - 1500 ई.पू. माना है। बाद के समय में काल निर्धारण की रेडियो विधि का अविष्कार हुआ और इस विधि से इस सभ्यता का काल निर्धारण इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
#पूर्व हड़प्पाई चरण: लगभग 3500-2600 ई.पू.&lt;br /&gt;
#परिपक्व हड़प्पाई चरण - लगभग 2600-1900 ई.पू.&lt;br /&gt;
#उत्तर हड़प्पाई चरण: लगभग 1900-1300 ई.पू.&lt;br /&gt;
*रेडियो कार्बन ‘सी-14‘ जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता का सर्वमान्य काल 2500 ई.पू. से 1750 ई.पू. को माना गया है।&lt;br /&gt;
{| width=100% &lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+विभिन्न विद्धानों द्वारा सिंधु सभ्यता का काल निर्धारण &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!काल        &lt;br /&gt;
!विद्धान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1- 3,500 - 2,700 ई.पू.    &lt;br /&gt;
| माधोस्वरूप वत्स&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2- 3,250 - 2,750 ई.पू.    &lt;br /&gt;
| जॉन मार्शल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3- 2,900 - 1,900 ई.पू.    &lt;br /&gt;
| डेल्स &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4- 2,800 - 1,500 ई.पू.     .&lt;br /&gt;
| अर्नेस्ट मैके&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|5- 2,500 - 1,500 ई.पू.      &lt;br /&gt;
| मार्टीमर ह्यीलर  &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|6- 2,350 - 1,700 ई.पू.         &lt;br /&gt;
| सी.जे. गैड&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|7- 2,350 - 1,750 ई.पू.       &lt;br /&gt;
| डी.पी. अग्रवाल  &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|8- 2,000 - 1,500 ई.पू.           &lt;br /&gt;
| फेयर सर्विस&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+सिधु सभ्यता के प्रमुख स्थल एवं उसके खोजकर्ता &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!प्रमुख स्थल&lt;br /&gt;
!खोजकर्ता &lt;br /&gt;
!वर्ष&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1- [[हड़प्पा]]                          &lt;br /&gt;
| माधो स्वरूप वत्स, दयाराम साहनी&lt;br /&gt;
| 1921&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2- [[मोहनजोदाड़ो]]                                    &lt;br /&gt;
| राखाल दास बनर्जी&lt;br /&gt;
| 1922&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3- [[रोपड़]]                                            &lt;br /&gt;
|यज्ञदत्त शर्मा&lt;br /&gt;
|1953&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4- [[कालीबंगा]]                    &lt;br /&gt;
|ब्रजवासी लाल, अमलानन्द घोष&lt;br /&gt;
|1953&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|5- [[लोथल]]                                              &lt;br /&gt;
|ए. रंगनाथ राव&lt;br /&gt;
|1954&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|6- [[चन्हूदड़ों]]                                          &lt;br /&gt;
|एन.गोपाल मजूमदार&lt;br /&gt;
|1931 &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|7- [[सूरकोटदा]]                                       &lt;br /&gt;
|जगपति जोशी&lt;br /&gt;
|1964&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|8- [[बणावली (हरियाणा)|बणावली]]                                           &lt;br /&gt;
|रवीन्द्र सिंह विष्ट&lt;br /&gt;
|1973&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|9- [[आलमगीरपुर (मेरठ)|आलमगीरपुर]]                                                 &lt;br /&gt;
|यज्ञदत्त शर्मा&lt;br /&gt;
|1958&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|10- [[रंगपुर (गुजरात)|रंगपुर]]                                        &lt;br /&gt;
|माधोस्वरूप वत्स, रंगनाथ राव&lt;br /&gt;
|1931.-1953&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|10- [[कोटदीजी (सिंध प्रांत)|कोटदीजी]]                                                                   &lt;br /&gt;
|फज़ल अहमद&lt;br /&gt;
|1953 &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|11- [[सुत्कागेनडोर (दक्षिण बलूचिस्तान)|सुत्कागेनडोर]]                                                                   &lt;br /&gt;
|ऑरेल स्टाइन, जार्ज एफ. डेल्स&lt;br /&gt;
|1927&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+हड़प्पाकालीन नदियों के किनारे बसे नगर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!नगर&lt;br /&gt;
!नदी/सागर तट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1- [[मोहनजोदाड़ो]]         &lt;br /&gt;
| [[सिंधु नदी]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2- [[हड़प्पा]]         &lt;br /&gt;
|[[रावी नदी]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3- [[रोपड़]]           &lt;br /&gt;
|[[सतलुज नदी]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4- [[कालीबंगा]]        &lt;br /&gt;
|घग्घर नदी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|5- [[लोथल]]               &lt;br /&gt;
|भोगवा नदी  &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|6- सुत्कागेनडोर                &lt;br /&gt;
|दाश्त नदी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|7- वालाकोट              &lt;br /&gt;
|अरब सागर  &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|8- सोत्काकोह                 &lt;br /&gt;
|अरब सागर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|9- [[आलमगीरपुर (मेरठ)|आलमगीरपुर]]                   &lt;br /&gt;
|हिन्डन नदी  &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|10- [[रंगपुर (गुजरात)|रंगपुर]]                            &lt;br /&gt;
|मदर नदी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|10- कोटदीजी                                     &lt;br /&gt;
|[[सिंधु नदी]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; align=&amp;quot;right&amp;quot; style=&amp;quot;margin:10px;:&lt;br /&gt;
|+हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!पुरास्थल&lt;br /&gt;
!स्थान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1- हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल&lt;br /&gt;
| सत्कागेन्डोर (बलूचिस्तान)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2- सर्वाधिक पूर्वी पुरास्थल &lt;br /&gt;
| आलमगीरपुर (मेरठ)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3- सर्वाधिक उत्तर पूरास्थल  &lt;br /&gt;
| मांडा (जम्मू कश्मीर)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4- सर्वाधिक दक्षिणी पुरास्थल &lt;br /&gt;
| दायमाबाद (महाराष्ट्र)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सिधु सभ्यता के निर्माता और निवासी==&lt;br /&gt;
यह अत्यन्त ही विवादाग्रस्त विषय है। इस विवाद में कुछ विद्धानों के प्रकार हैं-&lt;br /&gt;
*'डॉ. लक्ष्मण स्वरूप' और 'रामचन्द्र' सिंधु सभ्यता एवं वैदिक सभ्यता दोनों के निर्माता के रूप में [[आर्य|आर्यो]] को मानते हैं।&lt;br /&gt;
*'गार्डन चाइल्ड' सिंधु सभ्यता के निर्माता के रूप में 'सुमेरियन' लोगों को मानते हैं।&lt;br /&gt;
*'राखाल दास बनर्जी' इस सभ्यता के निर्माता के रूप में [[द्रविड़|द्रविड़ों]] को मानते हैं&lt;br /&gt;
*ह्वीलर का मानना है कि [[ऋग्वेद]] में वर्णित दस्यु एवं ‘दास‘ सिंधु सभ्यता के निर्माता थे।&lt;br /&gt;
*इन समस्त विवादों का अवलोकन करके 'डॉ. रमा शंकर त्रिपाठी' का कहना है कि 'ऐतिहासिक ज्ञान की इस सीमा पर खड़े होकर अभी इस विषय पर हमारा मौन ही सराह्य और उचित है।'&lt;br /&gt;
==मुख्य स्थल==&lt;br /&gt;
====हड़प्पा====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा 6000-2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। [[मोहनजोदड़ो]], मेहरगढ़ और लोथल की ही श्रृंखला में हड़प्पा में भी पुर्रात्तव उत्खनन किया गया। यहाँ [[मिस्र]] और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है। इसकी खोज 1920 में की गई। वर्तमान में यह पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित है। सन 1857 में लाहौर मुल्तान रेलमार्ग बनाने में हड़प्पा नगर की ईटों का इस्तेमाल किया गया जिससे इसे बहुत नुक़सान पहुँचा।&lt;br /&gt;
====मोहनजोदड़ों====&lt;br /&gt;
[[चित्र:King-priest-mohenjo-daro.jpg|thumb|220px|प्रधान अनुष्ठानकर्ता मोहनजोदाड़ो 2000 ई.पू.]]&lt;br /&gt;
{{main|मोहनजोदाड़ो}}&lt;br /&gt;
*मोहन जोदड़ो, जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। &lt;br /&gt;
*[[हड़प्पा]], मेहरगढ़ और लोथल की ही श्रृंखला में मोहन जोदड़ो में भी पुर्रात्तव उत्खनन किया गया। &lt;br /&gt;
*यहाँ [[मिस्र]] और [[मैसोपोटामिया]] जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है। &lt;br /&gt;
इस सभ्यता के ध्वंसावशेष [[पाकिस्तान]] के सिन्ध प्रान्त के 'लरकाना ज़िले' में [[सिंधु नदी]] के दाहिने किनारे पर प्राप्त हुए हैं। यह नगर क़रीब 5 कि.मी. के क्षेत्र में फैला हुआ है। मोहनजोदड़ों के टीलो का 1922 ई. में खोजने का श्रेय 'राखालदास बनर्जी' को प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====चन्हूदड़ों====&lt;br /&gt;
{{main|चन्हूदड़ों}}&lt;br /&gt;
[[मोहनजोदाड़ो]] के दक्षिण में स्थित चन्हूदड़ों नामक स्थान पर मुहर एवं गुड़ियों के निर्माण के साथ-साथ हड्डियों से भी अनेक वस्तुओं का निर्माण होता था। इस नगर की खोज सर्वप्रथम 1931 में 'एन.गोपाल मजूमदार' ने किया तथा 1943 ई. में 'मैके' द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। सबसे निचले स्तर से 'सैंधव संस्कृति' के साक्ष्य मिलते हैं।&lt;br /&gt;
====लोथल====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{main|लोथल}}&lt;br /&gt;
यह [[गुजरात]] के [[अहमदाबाद ज़िला|अहमदाबाद ज़िले]] में 'भोगावा नदी' के किनारे 'सरगवाला' नामक ग्राम के समीप स्थित है। खुदाई 1954-55 ई. में 'रंगनाथ राव' के नेतृत्व में की गई। [[चित्र:Lothal-1.jpg|thumb|[[लोथल]]|250px|left]] इस स्थल से समकालीन सभ्यता के पांच स्तर पाए गए हैं। यहाँ पर दो भिन्न-भिन्न टीले नहीं मिले हैं, बल्कि पूरी बस्ती एक ही दीवार से घिरी थी।&lt;br /&gt;
====रोपड़==== &lt;br /&gt;
{{main|रोपड़}}&lt;br /&gt;
[[पंजाब]] प्रदेश के 'रोपड़ ज़िले' में [[सतलुज नदी]] के बांए तट पर स्थित है। यहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सर्वप्रथम उत्खनन किया गया था। इसका आधुनिक नाम 'रूप नगर' था। 1950 में इसकी खोज 'बी.बी.लाल' ने की थी। &lt;br /&gt;
====कालीबंगा (काले रंग की चूड़ियां)====&lt;br /&gt;
{{main|कालीबंगा}} &lt;br /&gt;
यह स्थल [[राजस्थान]] के [[गंगानगर ज़िला|गंगानगर ज़िले]] में [[घग्घर नदी]] के बाएं तट पर स्थित है। खुदाई 1953 में 'बी.बी. लाल' एवं 'बी. के. थापड़' द्वारा करायी गयी। यहाँ पर प्राक् हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Dancing-girl-mohenjo-daro.jpg|thumb|250px|नृत्यांगना मोहनजोदाड़ो 2500 ई.पू.]]&lt;br /&gt;
====सूरकोटदा====&lt;br /&gt;
{{main|सूरकोटदा}}  &lt;br /&gt;
*यह स्थल [[गुजरात]] के [[कच्छ ज़िला|कच्छ ज़िले]] में स्थित है। &lt;br /&gt;
*इसकी खोज 1964 में 'जगपति जोशी' ने की थी इस स्थल से 'सिंधु सभ्यता के पतन' के अवशेष परिलक्षित होते हैं। &lt;br /&gt;
====आलमगीरपुर (मेरठ)==== &lt;br /&gt;
{{main|आलमगीरपुर (मेरठ)}}  &lt;br /&gt;
पश्चिम [[उत्तर प्रदेश]] के [[मेरठ ज़िला|मेरठ ज़िले]] में [[यमुना नदी|यमुना]] की सहायक [[हिण्डन नदी]] पर स्थित इस पुरास्थल की खोज 1958 में 'यज्ञ दत्त शर्मा' द्वारा की गयी। &lt;br /&gt;
====रंगपुर (गुजरात)==== &lt;br /&gt;
*[[गुजरात]] के [[काठियावाड़]] प्राय:द्वीप में [[भादर नदी]] के समीप स्थित इस स्थल की खुदाई 1953-54 में 'ए. रंगनाथ राव' द्वारा की गई। &lt;br /&gt;
*यहाँ पर पूर्व हडप्पा कालीन सस्कृति के अवशेष मिले हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ मिले कच्ची ईटों के दुर्ग, नालियां, मृदभांड, बांट, पत्थर के फलक आदि महत्त्वपूर्ण हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ धान की भूसी के ढेर मिले हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ उत्तरोत्तर [[हड़प्पा समाज और संस्कृति|हड़प्पा संस्कृति]] के साक्ष्य मिलते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====बणावली (हरियाणा)==== &lt;br /&gt;
{{main|बणावली (हरियाणा)}} &lt;br /&gt;
*[[हरियाणा]] के [[हिसार ज़िला|हिसार ज़िले]] में स्थित दो सांस्कृतिक अवस्थाओं के अवषेश मिले हैं। &lt;br /&gt;
*हड़प्पा पूर्व एवं [[हड़प्पा]]कालीन इस स्थल की खुदाई 1973-74 ई. में 'रवीन्द्र सिंह विष्ट' के नेतृत्व में की गयी। &lt;br /&gt;
====अलीमुराद (सिंध प्रांत)====&lt;br /&gt;
{{main|अलीमुराद (सिंध प्रांत)}} &lt;br /&gt;
*सिंध प्रांत में स्थित इस नगर से कुआं, मिट्टी के बर्तन, कार्निलियन के मनके एवं पत्थरों से निर्मित एक विशाल दुर्ग के अवशेष मिले हैं। &lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त इस स्थल से बैल की लघु मृण्मूर्ति एवं कांसे की कुल्हाड़ी भी मिली है।&lt;br /&gt;
====सुत्कागेनडोर (दक्षिण बलूचिस्तान)==== &lt;br /&gt;
{{main|सुत्कागेनडोर (दक्षिण बलूचिस्तान)}} &lt;br /&gt;
*यह स्थल दक्षिण [[बलूचिस्तान]] में दाश्त नदी के किनारे स्थित है। &lt;br /&gt;
==हड़प्पाकालीन सभ्यता से सम्बन्धित कुछ नवीन क्षेत्र==&lt;br /&gt;
====खर्वी (अहमदाबाद)====&lt;br /&gt;
{{main|खर्वी (अहमदाबाद)}} &lt;br /&gt;
*अहमदाबाद से 114 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस स्थान से हड़प्पाकालीन मृदभांड एवं ताम्र आभूषण के अवशेष मिले है।&lt;br /&gt;
====कुनुतासी (गुजरात)====&lt;br /&gt;
{{main|कुनुतासी (गुजरात)}} &lt;br /&gt;
*[[गुजरात]] के [[राजकोट ज़िला|राजकोट ज़िले]] में स्थित इस स्थल की खुदाई 'एम.के. धावलिकर', 'एम.आर.आर. रावल' तथा 'वाई.एम. चितलवास' द्वारा करवाई गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====धौलावीरा====&lt;br /&gt;
{{main|धौलावीरा}}&lt;br /&gt;
*इस स्थल की खुदाई से विशाल सैन्धव कालीन नगर के अवशेष का पता चलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====कोटदीजी (सिंध प्रांत)====&lt;br /&gt;
{{main|कोटदीजी (सिंध प्रांत)}} &lt;br /&gt;
*[[सिंध प्रांत]] के 'खैरपुर' नामक स्थान पर यह स्थल स्थित है। &lt;br /&gt;
*सर्वप्रथम इसकी खोज 'धुर्ये' ने 1935 ई. में की । &lt;br /&gt;
*नियमित खुदाई 1953 ई. में फज़ल अहमद ख़ान द्वारा सम्पन्न करायी गयी। &lt;br /&gt;
====बालाकोट (बलूचिस्तान)====&lt;br /&gt;
{{main|बालाकोट (बलूचिस्तान)}} &lt;br /&gt;
*नालाकोट से लगभग 90 कि.मी. की दूरी पर [[बलूचिस्तान]] के दक्षिणी तटवर्ती पर बालाकोट स्थित था। &lt;br /&gt;
*इसका उत्खनन 1963-1970 के बीच 'जॉर्ज एफ.डेल्स' द्वारा किया गया । &lt;br /&gt;
====अल्लाहदीनों (अरब महासागर)====&lt;br /&gt;
{{main|अल्लाहदीनों (अरब महासागर)}}  &lt;br /&gt;
*अल्लाहदीनों [[सिंधु नदी|सिन्धु]] और [[अरब सागर|अरब महासागर]] के संगम से लगभग 16 किलोमीटर उत्तर-पूर्व तथा कराची से पूर्व में स्थित है। &lt;br /&gt;
*1982 में 'फेयर सर्विस' ने यहाँ पर उत्खनन करवाया था। &lt;br /&gt;
====माण्डा====&lt;br /&gt;
{{main|माण्डा}} &lt;br /&gt;
*[[चिनाब नदी|चेनाब नदी]] के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह विकसित [[हड़प्पा]] संस्कृति का सबसे उत्तरी स्थल है। &lt;br /&gt;
*इसका उत्खनन 1982 में 'जे.पी. जोशी' तथा 'मधुबाला' द्वारा करवाया गया था। &lt;br /&gt;
*उत्खनन से प्राप्त यहाँ से तीन सांस्कृतिक स्तर &lt;br /&gt;
#प्राक् सैन्धव, &lt;br /&gt;
#विकसित सैंधव, तथा &lt;br /&gt;
#उत्तर कालीन सैंधव प्रकाश में आए। &lt;br /&gt;
*यहाँ विशेष प्रकार के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन), गैर हड़प्पा से सम्बद्ध कुछ ठीकरा पक्की मिट्टी की पिण्डिकाएं (टेराकोटा केक) आदि प्राप्त हुए है।&lt;br /&gt;
====भगवानपुरा (हरियाणा)====&lt;br /&gt;
{{main|भगवानपुरा (हरियाणा)}}&lt;br /&gt;
*भगवानपुरा [[हरियाणा]] के [[कुरुक्षेत्र]] ज़िले में [[सरस्वती नदी]] के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*जी.पी. जोशी ने इसका उत्खनन करवाया था। &lt;br /&gt;
*यहाँ के प्रमुख अवशेषों में सफ़ेद, काले तथा आसमानी रंग की कांच की चूड़ियां, तांबे की चूड़ियां प्रमुख है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====देसलपुर (गुजरात)====&lt;br /&gt;
{{main|देसलपुर (गुजरात)}}&lt;br /&gt;
*[[गुजरात]] के भुज ज़िले में स्थित 'देसलपुर' की खुदाई 'पी.पी. पाण्ड्या' और 'एक. के. ढाके' द्वारा किया गया । &lt;br /&gt;
*बाद में 'सौनदरराजन' द्वारा भी उत्खनन किया गया। &lt;br /&gt;
====रोजदी (गुजरात)====&lt;br /&gt;
{{main|रोजदी (गुजरात)}} &lt;br /&gt;
*रोजदी [[गुजरात]] के [[सौराष्ट्र]] ज़िले में स्थित था। &lt;br /&gt;
==कांस्ययुगीन धौलावीरा==&lt;br /&gt;
{{main|धौलावीरा}}&lt;br /&gt;
[[हड़प्पा सभ्यता]]‘ के पुरास्थलों में एक नवीन कड़ी के रूप में जुड़ने वाला पुरास्थल [[धौलावीरा]] कच्छ के रण के मध्य स्थित द्वीप 'खडीर' में स्थित है। इस द्वीप के समीप ही 'सुर्खाव'- शहर स्थित है। धौलावीर गांव 'खडीर द्वीप' की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर बसा है। धौलावीरा पुरास्थल की खुदाई में मिले अवशेषों का प्रसार 'मनहर' एवं 'मानसर' नामक नालों के बीच में हुआ था। धौलावीरा नामक हड़प्पाई संस्कृति वाले इस नगर की योजना समानांतर चतुर्भुज के रूप में की गयी थी। इस नगर की लम्बाई पूरब से पश्चिम की ओर है। नगर के चारों तरफ एक मज़बूत दीवार के निर्माण के साक्ष्य मिले हैं। नगर के महाप्रसाद वाले भाग के उत्तर में एक विस्तृत सम्पूर्ण एवं व्यापक समतल मैदान के अवशेष मिले हैं। इसके उत्तर में नगर का मध्यम भाग है जिसे 'पुर' की संज्ञा दी गयी थी। इसके पूर्व में नगर का तीसरा महत्त्वपूर्ण भाग स्थित है जिसे 'निचला शहर' या फिर 'अवम नगर' कहा जाता है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{सिन्धु घाटी की सभ्यता}} &lt;br /&gt;
[[Category:हड़प्पा_संस्कृति]][[Category:इतिहास_कोश]][[Category:सिन्धु घाटी की सभ्यता]]__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:सिन्धु घाटी की सभ्यता]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5&amp;diff=222991</id>
		<title>सारनाथ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5&amp;diff=222991"/>
		<updated>2011-10-03T09:42:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Sarnath-Stupa.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=सारनाथ स्तूप&lt;br /&gt;
|विवरण=[[वाराणसी]] से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 25° 22' 52&amp;quot; - पूर्व- 83° 01' 17&amp;quot;  &lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=राष्ट्रीय राजमार्ग 28 सारनाथ को अनेक शहरों से जोड़ता है। &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=भगवान बुद्ध का मन्दिर&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[अक्टूबर]] से [[मार्च]]&lt;br /&gt;
|यातायात=विमान, रेल, बस, टैक्सी &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=सारनाथ का निकटतम हवाई अड्डा बाबातपुर, वाराणसी में है जो सारनाथ से 30 किलोमीटर की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=सारनाथ का निकटतम रेलवे स्टेशन वाराणसी केंट है जो लगभग 6 किलोमीटर दूर है। सारनाथ का भी एक रेलवे स्टेशन है लेकिन उस पर कम ही रेलगाड़ी रुकती हैं। &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=सारनाथ के आस-पास के अनेक शहरों से सारनाथ जाने के लिए नियमित बसों की सुविधा उपलब्ध है। &lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=टैक्सी, बस, रेल आदि &lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[अशोक]] का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, धमेख [[स्तूप]], चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर आदि।&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह &lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=0542&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?saddr=Railwayganj+Colony,+Varanasi,+Uttar+Pradesh+(Varanasi+Junction+Railway+Station)&amp;amp;daddr=sarnath&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=25.353799,83.006172&amp;amp;spn=0.106262,0.181789&amp;amp;sll=25.355196,82.951241&amp;amp;sspn=0.212521,0.363579&amp;amp;geocode=FTp1ggEde0TyBCF8SI3WydTYzA%3BFfdIgwEdTc7yBCnPKoRHwi6OOTGn3Tyh77PMww&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;mra=pd&amp;amp;t=m&amp;amp;z=13 गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=भाषा&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिन्दी]] और [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
सारनाथ [[काशी]] से सात मील पूर्वोत्तर में स्थित बौद्धों का प्राचीन तीर्थ है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान [[बुद्ध]] ने प्रथम उपदेश यहाँ दिया था, यहाँ से ही उन्होंने &amp;quot;धर्म चक्र प्रवर्तन&amp;quot; प्रारम्भ किया, यहाँ पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर है, यहाँ [[सावन]] के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है। यह [[जैन]] तीर्थ है और जैन ग्रन्थों में इसे सिंहपुर बताया है। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुयें-[[अशोक]] का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धमेख [[स्तूप]], चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, मूलंगधकुटी और नवीन विहार हैं, [[मुहम्मद ग़ोरी|मुहम्मद ग़ोरी]] ने इसे लगभग ख़त्म कर दिया था, '''सन 1905 में [[पुरातत्त्व]] विभाग ने यहाँ खुदाई का काम किया, उस समय [[बौद्ध]] धर्म के अनुयायियों और इतिहासवेत्ताओं का ध्यान इस पर गया।'''&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सम्राट [[अशोक]] के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। सिंहों की मूर्ति वाला [[अशोक चिह्न|भारत का राजचिह्न]] सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है।''' यहाँ का 'धमेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्त्व कम हो गया था। मृगदाय में सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Dhamekh-Stupa-Sarnath-2.jpg|thumb|left|धमेख स्तूप, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
====प्राचीन नाम====&lt;br /&gt;
इसका प्राचीन नाम ऋषिपतन (इसिपतन या मृगदाव) (हिरनों का जंगल) था। ऋषिपतन से तात्पर्य ‘ऋषि का पतन’ से है जिसका आशय है वह स्थान जहाँ किसी एक बुद्ध ने गौतम बुद्ध भावी संबोधि को जानकर निर्वाण प्राप्त किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;बी.सी. भट्टाचार्य, दि हिस्ट्री आफ़ सारनाथ, (बनारस, 1924), पृ. 47&amp;lt;/ref&amp;gt; मृगों के विचरण करने वाले स्थान के आधार पर इसका नाम मृगदाव पड़ा, जिसका वर्णन निग्रोधमृग जातक में भी आया है।&amp;lt;ref&amp;gt;निग्रोध मृग जातक, संख्या 12 (फाउसबोल संस्करण&amp;lt;/ref&amp;gt; आधुनिक नाम ‘सारनाथ’ की उत्पत्ति ‘सारंगनाथ’ (मृगों के नाथ) अर्थात् गौतम बुद्ध से हुई।&lt;br /&gt;
====बोधिसत्व की कथा से संबंध====&lt;br /&gt;
जिसका संबंध बोधिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। वोधिसत्व ने अपने किसी पूर्वजन्म में, जब वे मृगदाव में मृगों के राजा थे, अपने प्राणों की बलि देकर एक गर्भवती हरिणी की जान बचाई थी। इसी कारण इस वन को सार-या सारंग (मृग)- नाथ कहने लगे। रायबहादुर दयाराम साहनी के अनुसार [[शिव]] को भी पौराणिक साहित्य में सारंगनाथ कहा गया है और महादेव शिव की नगरी काशी की समीपता के कारण यह स्थान शिवोपासना की भी स्थली बन गया। इस तथ्य की पुष्टि सारनाथ में, सारनाथ नामक शिवमंदिर की वर्तमानता से होती है। &lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
'''[[बुद्ध]] के प्रथम उपदेश (लगभग 533 ई.पू.) से 300 वर्ष बाद तक का सारनाथ का इतिहास अज्ञात है: क्योंकि [[उत्खनन]] से इस काल का कोई भी अवशेष नहीं प्राप्त हुआ है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;चूँकि खुदाई उस समय हुई थी जब स्तरीकरण के सिद्धांत शोधकर्ताओं द्वारा प्रयुक्त नहीं किए जाते थे तथा तत्कालीन विद्वान् कच्ची ईंटों, फूस की झोपड़ियों आदि अवशेषों पर ध्यान नहीं देते थे, साथ ही भारतीय मृतिकापात्रों का विशेष अध्ययन, जो अब हो रहा है, उसका प्रचलन नहीं था। ऐसी स्थिति में संभव है उसके महत्त्व का उचित मूल्याँकन न कर सके हों।&amp;lt;/ref&amp;gt; सारनाथ की समृद्धि और बौद्ध धर्म का विकास सर्वप्रथम अशोक के शासनकाल में दृष्टिगत होता है। उसने सारनाथ में धर्मराजिका स्तूप, धमेख स्तूप एवं सिंह स्तंभ का निर्माण करवाया। अशोक के उत्तराधिकारियों के शासन-काल में पुन: सारनाथ अवनति की ओर अग्रसर होने लगा। ई.पू. दूसरी शती में शुंग राज्य की स्थापना हुई, लेकिन सारनाथ से इस काल का कोई लेख नहीं मिला। प्रथम शताब्दी ई. के लगभग उत्तर भारत के कुषाण राज्य की स्थापना के साथ ही एक बार पुन: बौद्ध धर्म की उन्नति हुई। कनिष्क के राज्यकाल के तीसरे वर्ष में भिक्षु बल ने यहाँ एक बोधिसत्व प्रतिमा की स्थापना की। कनिष्क ने अपने शासन-काल में न केवल सारनाथ में वरन् भारत के विभिन्न भागों में बहुत-से विहारों एवं स्तूपों का निर्माण करवाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''एक स्थानीय [[किंवदंती]] के अनुसार [[बौद्ध धर्म]] के प्रचार के पूर्व सारनाथ शिवोपासना का केंद्र था।''' किंतु , जैसे [[गया]] आदि और भी कई स्थानों के इतिहास से प्रमाणित होता है बात इसकी उल्टी भी हो सकती है, अर्थात बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात ही शिव की उपासना यहाँ प्रचलित हुई हो। जान पड़ता है कि जैसे कई प्राचीन विशाल नगरों के उपनगर या नगरोद्यान थे (जैसे प्राचीन [[विदिशा]] का साँची, [[अयोध्या]] का [[साकेत (अयोध्या)|साकेत]] आदि) उसी प्रकार सारनाथ में मूलत: ऋषियों या तपस्वियों के आश्रम स्थित थे जो उन्होंने काशी के कोलाहल से बचने के लिए, किंतु फिर भी महान नगरी के सान्निध्य में, रहने के लिए बनाए थे।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sarnath.jpg|thumb|250px|धमेख स्तूप, जैन मंदिर, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
'''सारनाथ के इतिहास में सबसे गौरवपूर्ण समय गुप्तकाल था। उस समय यह मथुरा के अतिरिक्त उत्तर भारत में कला का सबसे बड़ा केंद्र था।''' [[हर्षवर्धन|हर्ष]] के शासन-काल में [[ह्वेन त्सांग]] भारत आया था। उसने सारनाथ को अत्यंत खुशहाल बताया था। हर्ष के बाद कई सौ वर्ष तक सारनाथ विभिन्न शासकों के अधिकार में था लेकिन इनके शासनकाल में कोई विशेष उपलब्धि नहीं हो पाई। [[महमूद ग़ज़नवी]] (1017 ई.) के वाराणसी आक्रमण के समय सारनाथ को अत्यधिक क्षति पहुँची। पुन: 1026 ई. में सम्राट महीपाल के शासन काल में स्थिरपाल और बसन्तपाल नामक दो भाइयों ने सम्राट की प्रेरणा से काशी के देवालयों के उद्धार के साथ-साथ धर्मराजिका स्तूप एवं [[धर्मचक्र]] का भी उद्धार किया। गाहड़वाल वेश के शासन-काल में गोविंदचंद्र की रानी कुमार देवी ने सारनाथ में एक विहार बनवाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;इपिग्राफ़िया इंडिका, भाग 9, पृ. 325&amp;lt;/ref&amp;gt; उत्खनन से प्राप्त एक अभिलेख से भी इसकी पुष्टि होती है&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल् सर्वे ऑफ़ इंडिया, वार्षिक रिपोर्ट 1907-8, पृ. 78&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके पश्चात् सारनाथ की वैभव का अंत हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सारनाथ का उत्खनन==&lt;br /&gt;
सारनाथ के संदर्भ के ऐतिहासिक जानकारी पुरातत्त्वविदों को उस समय हुई जब काशीनरेश चेत सिंह के दीवान जगत सिंह ने धर्मराजिका स्तूप को अज्ञानवश खुदवा डाला। इस घटना से जनता का आकर्षण सारनाथ की ओर बढ़ा। इस क्षेत्र का सर्वप्रथम सीमित उत्खनन कर्नल कैकेंजी ने 1815 ई. में करवाया&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, 1904-5, पृ. 212&amp;lt;/ref&amp;gt; लेकिन उनको कोई महत्त्वपूर्ण सफलता नहीं मिली। इस उत्खनन से प्राप्त सामग्री अब कलकत्ता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित है। कैकेंजी के उत्खनन के 20 वर्ष पश्चात् 1835-36 में कनिंघम ने सारनाथ का विस्तृत उत्खनन करवाया। उत्खनन में उन्होंने मुख्य रूप से धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप एवं मध्यकालीन विहारों को खोद निकाला।&amp;lt;ref&amp;gt;[[कनिंघम]], आर्कियोलाजिकल् सर्वे रिपोर्ट्स भाग 1, पृ. 111&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कनिंघम]] का धमेख स्तूप से 3 फुट नीचे 600 ई. का एक अभिलिखित शिलापट्ट (28 ¾ इंच X 13 इंच X 43 इंच आकार का) मिला।&amp;lt;ref&amp;gt;दयाराम साहनी ने आभिलेखिक आधार पर इसे सातवीं या आठवीं शताब्दी का माना है। कैटलाग ऑफ़ दि म्यूजियम ऑफ़ आर्कियोलाजी एट सारनाथ, (कलकत्ता 1914), पृ. 11&amp;lt;/ref&amp;gt; [[चित्र:Buddha-Sarnath-1.jpg|left|बौद्ध भिक्षुओं को शिक्षा देते हुए भगवान बुद्ध|thumb|250px]] इसके अतिरिक्त यहाँ से बड़ीं संख्या में भवनों में प्रयुक्त पत्थरों के टुकड़े एवं मूर्तियाँ भी मिलीं, जो अब कलकत्ता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 1851-52 ई. में मेजर किटोई ने यहाँ उत्खनन करवाया जिसमें उन्हें धमेख स्तूप के आसपास अनेक स्तूपों एवं दो विहारों के अवशेष मिले, परंतु इस उत्खनन की रिपोर्ट प्रकाशित न हो सकी। किटोई के उपरांत एडवर्ड थामस&amp;lt;ref&amp;gt;बंगाल एशियाटिक सोसाइटी जर्नल, 1854, पृ. 469&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा प्रो. फिट्ज एडवर्ड हार्न&amp;lt;ref&amp;gt;एशियाटिक सोसाइटी रिसर्चेज्, 1856, पृ. 369&amp;lt;/ref&amp;gt; ने खोज कार्य जारी रखा। उनके द्वारा उत्खनित वस्तुएँ अब भारतीय संग्रहालय कलकत्ता में हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस क्षेत्र का सर्वप्रथम विस्तृत एवं वैज्ञानिक उत्खनन एच.बी. ओरटल ने करवाया।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल् सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-5, पृ. 59 और आगे।&amp;lt;/ref&amp;gt; उत्खनन 200 वर्ग फुट क्षेत्र में किया गया। यहाँ से मुख्य मंदिर तथा अशोक स्तंभ के अतिरिक्त बड़ी संख्या में मूर्तियाँ एवं शिलालेख मिले हैं। प्रमुख मूर्तियों में बोधिसत्व की विशाल अभिलिखित मूर्ति, आसनस्थ बुद्ध की मूर्ति, अवलोकितेश्वर, बोधिसत्व, मंजुश्री, नीलकंठ की मूर्तियाँ तथा तारा, वसुंधरा आदि की प्रतिमाएँ भी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरातत्त्व विभाग के डायरेक्टर जनरल जान मार्शल ने अपने सहयोगियों स्टेनकोनो और दयाराम साहनी के साथ 1907 में सारनाथ के उत्तर-दक्षिण क्षेत्रों में उत्खनन किया। उत्खनन से उत्तर क्षेत्र में तीन कुषाणकालीन मठों का पता चला। दक्षिण क्षेत्र से विशेषकर धर्मराजिका स्तूप के आसपास तथा धमेख स्तूप के उत्तर से उन्हें अनेक छोटे-छोटे स्तूपों एवं मंदिरों के अवशेष मिले। इनमें से कुमारदेवी के अभिलेखों से युक्त कुछ मूर्तियाँ विशेष महत्त्व की हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;बी. मजूमदार, ए गाइड टू सारनाथ, (दिल्ली, 1937), पृ. 25&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
उत्खनन का यह कार्य बाद के वर्षों में भी जारी रहा। 1914 से 1915 ई. में एच. हारग्रीव्स ने मुख्य मंदिर के पूर्व और पश्चिम में खुदाई करवाई। उत्खनन में मौर्यकाल से लेकर मध्यकाल तक की अनेक वस्तुएँ मिली।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल् सर्वे आफ् इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1914-15 (1920) पृ. 97 और आगे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस क्षेत्र का अंतिम उत्खनन दयाराम साहनी के निर्देशन में 5 सत्रों तक चलता रहा।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, 1919-20 (1922), पृ. 26 और आगे: तत्रैव, 1921-22, पृ.82 और आगे: तत्रैव 1927 (1931), पृ. 92&amp;lt;/ref&amp;gt; धमेख स्तूप से मुख्य मंदिर तक के संपूर्ण क्षेत्र का उत्खनन किया गया। इस उत्खनन से दयाराम साहनी को एक 1 फुट 9 ½ इंच लंबी, 2 फुट 7 इंच चौड़ी तथा 3 फुट गहरी एक नाली के अवशेष मिले।&amp;lt;ref&amp;gt;विद्वानों का पहले ऐसा मत था कि यह मंदिर से पानी निकालने के लिए एक नाली थी। उत्खनन से यह निश्चित हो गया कि यह एक सुरंग थी जो एक कमरे में जाती थी, जहाँ बौद्ध भिक्षु एकांत साधना करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त उत्खननों से निम्नलिखित स्मारक प्रकाश में आए हैं-&lt;br /&gt;
==चौखंडी स्तूप==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sarnath-Bell.jpg|thumb|250px|सारनाथ में [[घण्टा]]]]&lt;br /&gt;
धमेख स्तूप से आधा मील दक्षिण यह स्तूप स्थित है, जो सारनाथ के अवशिष्ट स्मारकों से अलग हैं। इस स्थान पर [[गौतम बुद्ध]] ने अपने पाँच शिष्यों को सबसे प्रथम उपदेश सुनाया था जिसके स्मारकस्वरूप इस स्तूप का निर्माण हुआ। ह्वेनसाँग ने इस स्तूप की स्थिति सारनाथ से 0.8 कि.मी. दक्षिण-पश्चिम में बताई है, जो 91.44 मी. ऊँचा था।&amp;lt;ref&amp;gt;सेमुअल बील, चाइनीज एकाउंट्स् आफ् इंडिया, भाग 3, पृ. 297&amp;lt;/ref&amp;gt; इसकी पहचान चौखंडी स्तूप से ठीक प्रतीत होती है। इस स्तूप के ऊपर एक अष्टपार्श्वीय बुर्जी बनी हुई है। इसके उत्तरी दरवाजे पर पड़े हुए पत्थर पर [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] में एक लेख उल्लिखित है, जिससे ज्ञात होता है कि [[टोडरमल]] के पुत्र गोवर्द्धन सन् 1589 ई. (996 हिजरी) में इसे बनवाया था। लेख में वर्णित है कि [[हुमायूँ]] ने इस स्थान पर एक रात व्यतीत की थी, जिसकी यादगार में इस बुर्ज का निर्माण संभव हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल् सर्वे आफ् इंडिया, (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-05, पृ. 74 जर्नल यू.पी.हि.सो., भाग 15, पृ. 55-64&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[कनिंघम|एलेक्जेंडर कनिंघम]] ने 1836 ई. में इस स्तूप में रखे समाधि चिन्हों की खोज में इसके केंद्रीय भाग में खुदाई की, इस खुदाई से उन्हें कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु नहीं मिली। सन् 1905 ई. में श्री ओरटेल ने इसकी फिर से खुदाई की। उत्खनन में इन्हें कुछ मूर्तियाँ, स्तूप की अठकोनी चौकी और चार गज ऊँचे चबूतरे मिले। चबूतरे में प्रयुक्त ऊपर की ईंटें 12 इंच X10 इंच X2 ¾ इंच और 14 ¾ X10 इंच X2 ¾ इंच आकार की थीं जबकि नीचे प्रयुक्त ईंटें 14 ½ इंच X 9 इंच X2 ½ इंच आकार की थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल् सर्वे आफ् इंडिया, (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-05, पृ. 78&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस स्तूप का ‘चौखंडी‘ नाम पुराना जान पड़ता है। इसके आकार-प्रकार से ज्ञात होता है कि एक चौकोर कुर्सी पर ठोस ईंटों की क्रमश: घटती हुई तीन मंज़िले बनाई गई थीं। सबसे ऊपर मंज़िल की खुली छत पर संभवत: कोई प्रतिमा स्थापित थी। गुप्तकाल में इस प्रकार के स्तूपों को ‘त्रिमेधि स्तूप’ कहते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;उल्लेखनीय है कि अहिच्छत्र की खुदाई में इसी प्रकार का एक ‘त्रिमेधि स्तूप’ या मंदिर मिला है जिसकी चोटी पर शिवलिंग प्रतिष्ठापित था।&amp;lt;/ref&amp;gt; उत्खनन से प्राप्त सामग्रियों के आधार पर यह निश्चित हो जाता है कि गुप्तकाल में इस स्तूप का निर्माण हो चुका था। &lt;br /&gt;
==धर्मराजिका स्तूप==&lt;br /&gt;
इस स्तूप का निर्माण अशोक ने करवाया था। '''दुर्भाग्यवश 1794 ई. में जगत सिंह के आदमियों ने काशी का प्रसिद्ध मुहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था।''' खुदाई के समय 8.23 मी. की गहराई पर एक प्रस्तर पात्र के भीतर संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डिया: एवं सुवर्णपात्र, मोती के दाने एवं रत्न मिले थे, जिसे उन्होंने विशेष महत्त्व का न मानकर गंगा में प्रवाहित कर दिया।&amp;lt;ref&amp;gt; एशियाटिक रिसर्चेज, 5, पृ. 131-132 देखें- मोतीचंद्र, काशी का इतिहास, पृ. 54&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ से प्राप्त महीपाल के समय के 1026 ई. के एक लेख में यह उल्लेख है कि स्थिरपाल और बसंतपाल नामक दो बंधुओं ने धर्मराजिका और धर्मचक्र का जीर्णोद्धार किया।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल् सर्वे आफ् इंडिया, वार्षिक रिपोर्ट, 1903-04, पृ. 221&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dhamekh-Stupa-Sarnath-6.jpg|thumb|250px|left|धमेख स्तूप पर नक़्क़ाशी, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
1907-08 ई. में मार्शल के निर्देशन में खुदाई से इस स्तूप के क्रमिक परिनिर्माणों के इतिहास का पता चला।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, 1907-08, पृ. 65&amp;lt;/ref&amp;gt; इस स्तूप का कई बार परिवर्द्धन एवं संस्कार हुआ। इस स्तूप के मूल भाग का निर्माण अशोक ने करवाया था। उस समय इसका व्यास 13.48 मी. (44 फुट 3 इंच) था। इसमें प्रयुक्त कीलाकार ईंटों की माप 19 ½ इंच X 14 ½ इंच X 2 ½ इंच और 16 ½ इंच X 12 ½ इंच X 3 ½ इंच थी। सर्वप्रथम परिवर्द्धन कुषाण-काल या आरंभिक गुप्त-काल में हुआ। इस समय स्तूप में प्रयुक्त ईंटों की माप 17 इंच X10 ½ इंच X 2 ¾ ईच थी। दूसरा परिवर्द्धन हूणों के आक्रमण के पश्चात् पाँचवी या छठी शताब्दी में हुआ। इस समय इसके चारों ओर 16 फुट (4.6 मीटर) चौड़ा एक प्रदक्षिणा पथ जोड़ा गया। तीसरी बार स्तूप का परिवर्द्धन हर्ष के शासन-काल (7वीं सदी) में हुआ। उस समय स्तूप के गिरने के डर से प्रदक्षिणा पथ को ईंटों से भर दिया गया और स्तूप तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ लगा दी गईं। चौथा परिवर्द्धन बंगाल नरेश महीपाल ने [[महमूद ग़ज़नवी]] के आक्रमण के दस वर्ष वाद कराया। अंतिम पुनरुद्धार लगभग 1114 ई. से 1154 ई. के मध्य हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;बुलेटिन ऑफ़ दि यू.पी. हिस्टारिकल सोसाइटी, संख्या 4, लखनऊ, (1965) पृ. 41&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके पश्चात् मुसलमानों के आक्रमण ने सारनाथ को नष्ट कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्खनन से इस स्तूप से दो मूर्तियाँ मिलीं। ये मूर्तियाँ सारनाथ से प्राप्त मूर्तियों में मुख्य हैं। पहली मूर्ति [[कनिष्क]] के राज्य संवत्सर 3 (81 ई.) में स्थापित विशाल बोधिसत्व प्रतिमा और दूसरी धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में भगवान बुद्ध की मूर्ति। ये मूर्तियाँ सारनाथ की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियाँ हैं। &lt;br /&gt;
==मूलगंध कुटी विहार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sarnath-Temple.jpg|thumb|250px|मूलगंध कुटी विहार, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
यह विहार धर्मराजिका स्तूप से उत्तर की ओर स्थित है। पूर्वाभिमुख इस विहार की कुर्सी चौकोर है जिसकी एक भुजा 18.29 मी. है। सातवीं शताब्दी में भारत-भ्रमण पर आए चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग]] ने इसका वर्णन 200 फुट ऊँचे मूलगंध कुटी विहार के नाम से किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;थामस वाटर्स, आन् युवान् च्वाँग्स् ट्रेवेल्स् इन इंडिया, भाग दो, पृ. 47&amp;lt;/ref&amp;gt; इस मंदिर पर बने हुए नक़्क़ाशीदार गोले और नतोदर ढलाई, छोटे-छोटे स्तंभों तथा सुदंर कलापूर्ण कटावों आदि से यह निश्चित हो जाता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल में हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ् इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1905-06, पृ. 68&amp;lt;/ref&amp;gt; परंतु इसके चारों ओर मिट्टी और चूने की बनी हुई पक्की फर्शों तथा दीवालों के बाहरी भाग में प्रयुक्त अस्त-व्यस्त नक़्क़ाशीदार पत्थरों के आधार पर कुछ विद्धानों ने इसे 8वीं शताब्दी के लगभग का माना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि इस मंदिर के बीच में बने मंडप के नीचे प्रारंभ में भगवान् बुद्ध की एक सोने की चमकीली आदमक़द मूर्ति स्थापित थी। मंदिर में प्रवेश के लिए तीनों दिशाओं में एक-एक द्वार और पूर्व दिशा में मुख्य प्रवेश द्वार (सिंह द्वार) था। कालांतर में जब मंदिर की छत कमज़ोर होने लगी तो उसकी सुरक्षा के लिए भीतरी दक्षिणापथ को दीवारें उठाकर बन्द कर दिया गया। अत: आने जाने का रास्ता केवल पूर्व के मुख्य द्वार से ही रह गया। तीनों दरवाजों के बंद हो जाने से ये कोठरियों जैसी हो गई, जिसे बाद में छोटे मंदिरों का रूप दे दिया गया। 1904 ई. में श्री ओरटल को खुदाई कराते समय दक्षिण वाली कोठरी में एकाश्मक पत्थर से निर्मित 9 ½ X 9 ½ फुट की [[मौर्य काल|मौर्यकालीन]] वेदिका मिली। इस वेदिका पर उस समय की चमकदार पालिश है। यह वेदिका प्रारम्भ में धर्मराजिका स्तूप के ऊपर हार्निका के चारों ओर लगी थीं। इस वेदिका पर कुषाणकालीन ब्राह्यी लिपि में दो लेख अंकित हैं- ‘आचाया (य्र्या) नाँ सर्वास्तिवादि नां परिग्रहेतावाम्’ और ‘आचार्यानां सर्वास्तिवादिनां परिग्राहे’। इन दोनों लेखों से यह ज्ञात होता है कि तीसरी शताब्दी ई. में यह वेदिका सर्वास्तिवादी संप्रदाय के आचार्यों को भेंट की गई थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ashoka-Pillar-Sarnath.jpg|thumb|250px|left|अशोक स्तंभ, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
==अशोक स्तंभ==&lt;br /&gt;
मुख्य मंदिर से पश्चिम की ओर एक अशोककालीन प्रस्तर-स्तंभ है जिसकी ऊँचाई प्रारंभ में 17.55 मी. (55 फुट) थी। वर्तमान समय में इसकी ऊँचाई केवल 2.03 मीटर (7 फुट 9 इंच) है। स्तंभ का ऊपरी सिरा अब सारनाथ संग्रहालय में है। नींव में खुदाई करते समय यह पता चला कि इसकी स्थापना 8 फुट X16 फुट X18 इंच आकार के बड़े पत्थर के चबूतरे पर हुई थी।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-5, पृ. 69&amp;lt;/ref&amp;gt; इस स्तंभ पर तीन लेख उल्लिखित हैं। पहला लेख [[ब्राह्मी लिपि अशोक-काल|अशोक कालीन ब्राह्मी लिपि]] में है जिसमें सम्राट ने आदेश दिया है कि जो भिछु या भिक्षुणी संघ में फूट डालेंगे और संघ की निंदा करेंगे: उन्हें सफ़ेद कपड़े पहनाकर संघ के बाहर निकाल दिया जाएगा। दूसरा लेख कुषाण-काल का है। तीसरा लेख [[गुप्त काल]] का है, जिसमें सम्मितिय शाखा के आचार्यों का उल्लेख किया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृ. 70&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संघारामों का क्षेत्र==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Entrance-Of-Sarnath.jpg|thumb|250px|सारनाथ का प्रवेश द्वार]]&lt;br /&gt;
भिक्षुओं के निवास के लिए कई संघारामों का निर्माण किया गया था। इन संघारामों में दो कुषाण काल के थे। इन सभी संघारामों में मुख्यत: एक प्रवेश द्वार, बीच में आँगन, आँगन के चारों ओर खंभों पर आश्रित बरामदा और कोठरियाँ बनीं थीं। &lt;br /&gt;
;संघाराम 1 (धर्मचक्रजिन विहार)&lt;br /&gt;
इस विहार का निर्माण [[कन्नौज]] के [[गहड़वाल वंश|गहड़वाल]] शासक गोविंदचंद (1114-1154 ई.) की पत्नी कुमारदेवी ने करवाया था। इस विहार की पूर्व से पश्चिम लंबाई 760 फुट थी।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, 1907-08, पृ. 45&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके आँगन की फर्श पकी ईंटों से ढकी थी जिसके तीन ओर कमरे निर्मित थे। विहार की कुर्सी 8 फुट ऊँची थी जिसमें प्रयुक्त ईंटों की चिनाई नियमित है, यद्यपि भिक्षुओं के रहने के कक्ष अब ढह चुके हैं। प्रवेश के लिए पूर्व की ओर दो सिंह द्वार थे जिनके बीच की दूरी 88.89 मी. (290 फुट) थी।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-08, पृ. 46&amp;lt;/ref&amp;gt; प्रवेश के दोनों ओर बड़े कक्ष थे। द्वार की बुर्जियों में जुड़ाई सुंदर एवं अलंकृत हैं। इस विहार के नीचे पूर्वकालीन तीन विहारों के अवशेष पाए गए हैं। पश्चिमी किनारे पर विहार संख्या-2, कुमारदेवी विहार के पूर्वी [[तोरण]] के सामने विहार-संख्या-3 और दो सिंह द्वारों के मध्य ज़मीन के नीचे विहार संख्या-4 हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस विहार के पश्चिम की ओर एक पटी हुई सुरंग (54.85 मी. लंबी) मिली है जिसकी चौड़ाई 1.83 मीं. है। इसकी दीवालों में पत्थर और ईंटों की चिनाई है। यह सुरंग एक कमरे में जाकर समाप्त हो जाती।&amp;lt;ref&amp;gt;जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि इन कमरों में बौद्ध भिक्षु एकांत साधना करते थे।&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ से प्राप्त सभी मूर्तियाँ मध्यकालीन हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Dhamekh-Stupa-Sarnath-5.jpg|thumb|left|धमेख स्तूप पर नक़्क़ाशी, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
;संघाराम 2, 3, 4&lt;br /&gt;
*'''संघाराम 2''' आरंभिक गुप्तकाल का है। इसके मध्य में 27.69 मीं. (90 फुट) का एक चौकोर आँगन था, जिसके चारों ओर 0.99 मीटर (3 फुट 3 इंच) आकार की छोटी दीवाल थी जिसके ऊपर बरामदे के खम्भे उठाए गए थे। बरामदे के पीछे कक्षों की पंक्तियाँ थीं जिनमें से अब केवल नौ कमरों के चिह्न बचे हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-08, पृ. 54&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''संघाराम 3''' की कुर्सी अत्यन्त नीची है और इसका तलपत्तन संघाराम 2 के सदृश्य था। उत्खनन से पश्चिम की ओर एक मन्दिर, दक्षिण की ओर चार कक्ष, बरामदे का कुछ भाग तथा आँगन के अवशेष मिले हैं। बाहरी दीवाल 5 फुट 6 इंच चौड़ी थी। खंभों पर बनी शैली से यह विहार कुषाणकालीन प्रतीत होता है। दीवालों की औसत ऊँचाई 3.04 (10 फुट) थी। इन्हें देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि यह इमारत दो मंज़िल की रही होगी। उत्खनन से आँगन के बीच में 10 इंच गहरी और 7 इंच चौड़ी एक ढकी नाली के भी अवशेष मिले हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-08, पृ. 56&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''संघाराम 4''' का आँगन भूमि से 4.42 मीटर (14 फुट 6 इंच) नीचे था। उत्खनन में आँगन और बरामदे का कुछ भाग तथा पूर्व की ओर दो कोठरियों के अवशेष प्रकाश में आए हैं। बरामदे के खंभों की पंक्ति संघाराम 3 की भाँति 2 फुट 2 इंच ऊँची दीवाल पर निर्मित थी। बरामदे की चौड़ई 7 फुट 10 इंच तक थी।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रेव, पृ. 59। रचना में ये तीनों संघाराम सारनाथ के अन्य विहारों से मिलते-जुलते हैं। संभवत: ये विहार कुषाण काल में निर्मित हुए और इनका वर्तमान स्वरूप गुप्तकाल में प्राप्त हुआ। अत: यह निश्चित है कि ये संघाराम पहले 5वीं शताब्दी में हूणों के आक्रमण से नष्ट हुआ। तदुपरांत छठी शताब्दी में पुन: इनका जीर्णोद्धार हुआ जो पुन: 11 वीं शताब्दी में मुसलमानों के आक्रमण से नष्ट हो गया।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====धमेख स्तूप (धर्मचक्र स्तूप)====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dhamekh-Stupa-Jain-temple-Sarnath.jpg|thumb|250px|धमेख स्तूप, जैन मंदिर, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
यह स्तूप एक ठोस गोलाकार बुर्ज की भाँति है। इसका व्यास 28.35 मीटर (93 फुट) और ऊँचाई 39.01 मीटर (143 फुट) 11.20 मीटर तक इसका घेरा सुंदर अलंकृत शिलापट्टों से आच्छादित है। इसका यह आच्छादन कला की दृष्टि से अत्यंत सुंदर एवं आकर्षक है। अलंकरणों में मुख्य रूप से [[स्वस्तिक]], [[नन्द्यावर्त]] सदृश विविध आकृतियाँ और फूल-पत्ती के कटाव की बेलें हैं। इस प्रकार के वल्लरी प्रधान अलंकरण बनाने में गुप्तकाल के शिल्पी पारंगत थे। इस स्तूप की नींव अशोक के समय में पड़ी। इसका विस्तार कुषाण-काल में हुआ, लेकिन गुप्तकाल में यह पूर्णत: तैयार हुआ। यह साक्ष्य पत्थरों की सजावट और उन पर गुप्त लिपि में अंकित चिन्हों से निश्चित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[कनिंघम]] ने सर्वप्रथम इस स्तूप के मध्य खुदाई कराकर 0.91 मीटर (3 फुट) नीचे एक शिलापट्ट प्राप्त किया था। इस शिलापट्ट पर सातवीं शताब्दी की लिपि में ‘ये धर्महेतु प्रभवा’ मंच अंकित था। इस स्तूप में प्रयुक्त ईंटें 14 ½ इंच X 8 ½ इंच X 2 ¼ इंच आकार की हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-05, पृ. 74&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''धमेक (धमेख) शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों का मत है कि यह संस्कृत के ‘धर्मेज्ञा’ शब्द से निकला है। किंतु 11 वीं शताब्दी की एक मुद्रा पर ‘धमाक जयतु’ शब्द मिलता है। जिससे उसकी उत्पत्ति का ऊपर लिखे शब्द से संबंधित होना संदेहास्पद लगता है।''' इस मुद्रा में इस स्तूप को धमाक कहा गया है। इसे लोग बड़ी आदर की दृष्टि से देखते थे और इसकी पूजा करते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नल ऑफ़ दि यू.पू. हिस्टोरिकल सोसाइटी, भाग 11 (2 दिसंबर 1938), पृ. 25-26।&amp;lt;/ref&amp;gt; कनिंघम ने ‘धमेख’ शब्द को संस्कृत शब्द ‘धर्मोपदेशक’ का संक्षिप्त रूप स्वीकार किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. कनिंघम, दि ऐंश्येंट् ज्योग्राफी आफ् इंडिया, पृ. 369&amp;lt;/ref&amp;gt; उल्लेखनीय है कि बुद्ध ने सर्वप्रथम यहाँ ‘धर्मचक्र’ प्रारंभ किया था। अत: ऐसा संभव है कि इस कारण ही इसका नाम धमेख पड़ा हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अकथा का उत्खनन==&lt;br /&gt;
अकथा नामक पुरास्थल (83°0’ पूर्वी अक्षाँश और 25°22’ उत्तरी देशांतर के मध्य) सारनाथ से 2 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित हैं। इस स्थल का उत्खनन प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. विदुला जायसवाल एवं डॉ. बीरेन्द्र प्रताप सिंह के संयुक्त निर्देशन में उनके विभागीय सहयोगी [[डॉ. अशोक कुमार सिंह]] द्वारा फ़रवरी-अप्रैल, 2002 के मध्य किया गया।&amp;lt;ref&amp;gt;वी. जायसवाल, अकथा : ए सैटेलाइअ सेटिलमेन्ट ऑफ़ सारनाथ, वाराणसी (रिपोर्ट ऑफ़ एक्सकैवेशन्स कन्डक्टेड इन द इयर 2002), भारती, अंक 26, 2000-2002, पृ. 61-180.&amp;lt;/ref&amp;gt; [[चित्र:Kagyu-Tibetan-Monastery.jpg|thumb|250px|left|कग्यू तिब्बती मठ, सारनाथ]] यह उत्खनन कार्य पुन: 2004 फ़रवरी-अप्रैल, के मध्य प्रो. विदुला जायसवाल एवं लेखक के संयुक्त निर्देशन में सम्पन्न हुआ। नरोखर नाला के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह पुरास्थल चार वर्गा किलोमीटर, में फैला हुआ है। उत्खनन कार्य मुख्य रूप से अकथा-1 और अकथा-2 में किया गया। उत्खनन में चार सांस्कृतिक कालों की सामग्री प्रकाश में आई।:&lt;br /&gt;
*'''प्रथम काल'''- पूर्व उत्तरी कृष्ण परिमार्जित संस्कृति (प्री एन. बी. पी. काल) &lt;br /&gt;
		(लगभग 1200 ई. पू. से 600 ई. पू. तक)&lt;br /&gt;
*'''द्वितीय काल'''- उत्तरी कृष्ण परिमार्जित संस्कृति (600 ई.पू. से 200 ई. पू. तक)&lt;br /&gt;
*'''तृतीय काल'''- शुंग कुषाण काल (200 ई. पू. से 300 ईसवी तक)&lt;br /&gt;
*'''चतुर्थ काल'''- गुप्तकालीन संस्कृति (300 ईसवी से 600 ईसवी तक)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पुरास्थल-1'''- वर्तमान अकथा गाँव के दक्षिण- पश्चिम किनारे पर स्थित है जहाँ बड़ी संख्या में प्रस्तर प्रतिमाएँ बिखरी पड़ी हैं। यह वही स्थान है जहाँ से कुछ वर्ष पूर्व एक यक्ष प्रतिमा मिली थी। यह अब सारनाथ संग्रहालय में सुरक्षित है। यह यक्ष प्रतिमा प्रथम-द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व की है। इस क्षेत्र के उत्खनन में ईंटों से निर्मित तीन संरचनाएँ (संरचना-1, संरचना-2, और संरचना-3) मिली है। संरचना-1 के निर्माण में खंउत ईंटों का प्रयोग किया गया है। बनावट के आधार पर यह संरचनाएँ गुप्तकालीन प्रतीत होती हैं। संरचना-2 और 3 एक दीवाल के क्षतिग्रस्त भाग हैं। इस दीवाल में प्रयुक्त ईंटों की माप 44 X27.5 X6 मेमी. और 44 X26 X6 सेमी. आकार की हैं यह संरचनाएँ कुषाणकालीन है। इन सरंचनाओं के नीचे शुंगकालीन तीन क्रमागत फ़र्शों (Successive floors) के प्रमाण मिले हैं। इन फ़र्शों को मृदभांड के टुकड़ों और मिट्टी को कूटकर बनाया गया है। हाल (2004) के उत्खनन में मुख्य स्थल पर कुछ कुषाणकालीन संरचनाओं के अवशेष मिले हैं जो आवासीय प्रमाण नहीं प्रतीत होते हैं। इसके अतिरिक्त दो मुहरें एवं बड़ी संख्या में तांबे के सिक्के भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Sarnath-8.jpg|thumb|250px|सारनाथ का एक दृश्य]]&lt;br /&gt;
'''अकथा- 1''' से प्राप्त मुख्य मृदभांड परंपराएँ कृष्ण लोहित, कृष्ण लेपित, उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृदभांड, भूरे रंग के मृत्पात्र एवं लाल रंग के मृत्पात्र हैं। कृष्ण लोहित (ब्लैक एंड रेड वेयर) मृदभांड के कटोरे, तसले, घड़े, कृष्ण लेपित मृदभांड (ब्लैक स्लिप्ड), उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृदभांड (एन.बी.पी. वेयर) एवं भूरे रंग (ग्रे वेयर) की थालियाँ एवं कटोरे मुख्य हैं। लाल मृदभांड (रेड वेयर) के कटोरे, घड़े, अवठ रहित हांड़ियां (कारिनेटेड) एवं गुलाबपाश (स्प्रिन्कलर) बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। अन्य वस्तुओं में ताम्र-शलाका, तांबे, मिट्टी और अर्द्धमूल्यवान पत्थरों के बने मनके, लोढ़े एवं खिलौने तथा पकी मिट्टी की मानव एवं पशु मूर्तियाँ हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अकथा-2''' मुख्य टीले से ½ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है जो ‘क़ब्रगाह’ के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र अपने में एकल संस्कृत का अस्तित्व छिपाए हुए हैं। आवासीय बस्तियों के निर्माण के लिए ठेकेदारों द्वारा इन टीलों को समतल किये जाने के कारण यहँ त्वरित निस्तारण कार्य (Salvage operation) करना पड़ा। यहाँ 3 मी X 3 मी. की 6 [[खत्ती|खत्तियों]] में उत्खनन कार्य किया गया। उत्खनन में यहाँ से पूर्व कृष्ण-परिमार्जित संस्कृति के अवशेष प्रकाश में आए हैं जो ताम्रपाषाण कालीन है। अकथा से अभी कोई कार्बन तिथि नहीं मिली है लेकिन अन्य स्थलों से प्राप्त मृदभांडों के साथ तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर इस एकल संस्कृति की तिथि 1200-1300 ई.पू. में निर्धारित की जा सकती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम काल की संस्कृति के लोग अपने मकानों के निर्माण में मिट्टी, लकड़ी एवं फूस का प्रयोग करते थे। उत्खनन में चार स्तंभ गर्तों ये युक्त एक फर्श मिला है। जिसे मिट्टी के बर्तनों के छोटे-टुकड़ों एंव मिट्टी को कूटकर सुदृढ़ बनाया गया है। फर्श पर एक चूल्हे के अवशेष भी मिले हैं। यह फर्श अकथा में आवासीय प्रमाण का सबसे प्राचीन साक्ष्य है। '''उत्खनन में पशुओं की जली हुई हड्डियाँ बड़ी संख्या में मिली हैं। इसमें से कुछ हड्डियाँ पर काटने के निशान भी हैं। जिससे ज्ञात होता है कि माँस-भक्षण के लिए इन पशुओं का वध किया गया था।''' इस काल के प्राप्त औज़ारों में पशु-अस्थियों से बने बाणाग्र उल्लेख्य हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अकथा-2 के उत्खनन से प्राप्त मृदभांड कृष्ण लोहित, कृष्ण लेपित एवं लाल प्रकार के हैं। लाल मृदभांडों पर लेप का प्रयोग भी मिलता है। यहाँ के निवासियों को मृदभांड अलंकरण का भी विशेष ज्ञान था। उत्खनन से डोरी छापित, चटाई की छाप युक्त एवं चिपकवा पद्धति से अलंकृत मृदभांगों के टुकड़े प्रथम काल के निचले स्तर से प्राप्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Buddha-Sarnath.jpg|thumb|left|[[बुद्ध]] प्रतिमा, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
अकथा उत्खनन का नवीनतम साक्ष्य वाराणसी की प्राचीनता को बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित करता है। इस परिप्रेक्ष्य में सारनाथ और राजघाट के प्रारंम्भिक स्तरों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। नगरीकरण के संदर्भ में यह नवीनतम साक्ष्य एक नई दिशा प्रदान करता है एवं काशी के एक जनपद के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रमाण==&lt;br /&gt;
*गौतमबुद्ध गया में संबुद्धि प्राप्त करने के अनंतर यहाँ आए थे और उन्होंने कौडिन्य आदि अपने पूर्व साथियों को प्रथम बार प्रवचन सुनाकर अपने नये मत में दीक्षित किया था।  इसी प्रथम प्रवचन को उन्होंने धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जो कालांतर में, भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में सारनाथ का प्रतीक माना गया।  बुद्ध ही के जीवनकाल में काशी के श्रेष्टी नंदी ने ऋषिपत्तन में एक बौद्ध विहार बनवाया था। &amp;lt;ref&amp;gt; पियवग्ग, बग्ग: 16, बुद्धघोष-रचित टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*तीसरी शती ई.पू. में [[अशोक]] ने सारनाथ की यात्रा की और यहाँ कई [[स्तूप]] और एक सुंदर प्रस्तरस्तंभ स्थापित किया जिस पर [[मौर्य वंश|मौर्य]] सम्राट की एक धर्मलिपि अंकित है। इसी स्तंभ का [[राजुबुल|सिंह शीर्ष]] तथा धर्मचक्र भारतीय गणराज्य का राजचिह्न बनाया गया है। चौथी शती ई. में चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फ़ाह्यान]] इस स्थान पर आया था। उसने सारनाथ में चार बड़े स्तूप और पांच विहार देखे थे।  &lt;br /&gt;
*6ठी शती ई. में [[हूण|हूणों]] ने इस स्थान पर आक्रमण करके यहाँ के प्राचीन स्मारकों को घोर क्षति पहुंचाई। इनका सेनानायक मिहिरकुल था।  &lt;br /&gt;
[[चित्र:Sarnath-9.jpg|thumb|250px|सारनाथ]]&lt;br /&gt;
*7वीं शती ई. के पूर्वार्ध में, प्रसिद्ध चीनी यात्री युवानच्वांग ने [[वाराणसी]] और सारनाथ की यात्रा की थी। उस समय यहाँ 30 बौद्ध विहार थे जिनमें 1500 थेरावादी भिक्षु निवास करते थे।  &lt;br /&gt;
*[[युवानच्वांग]] ने सारनाथ में 100 हिन्दू देवालय भी देखें थे जो बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे पतनोन्मुख होने तथा प्राचीन धर्म के पुनरोत्कर्ष के परिचायक थे। &lt;br /&gt;
*11वीं शती में [[महमूद ग़ज़नवी]] ने सारनाथ पर आक्रमण किया और यहाँ के स्मारकों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।  &lt;br /&gt;
*तत्पश्चात 1194 ई. में [[मुहम्मद ग़ोरी]] के सेनापति [[क़ुतुबुद्दीन ऐबक|क़ुतुबुद्दीन]] ने तो यहाँ की बचीखुची प्राय: सभी इमारतों तथा कलाकृतियों को लगभग समाप्त ही कर दिया। केवल दो विशाल स्तूप ही छ: शतियों तक अपने स्थान पर खड़े रहे।  &lt;br /&gt;
*1794 ई. में काशी-नरेश [[चेतसिंह]] के दीवान जगतसिंह ने जगतगंज नामक वाराणसी के मुहल्ले को बनवाने के लिए एक स्तूप की सामग्री काम में ले ली। यह स्तूप ईटों का बना था। इसका व्यास 110 फुट था। कुछ विद्वानों का कथन है कि यह अशोक द्वारा निर्मित धर्मराजिक नामक स्तूप था। जगतसिंह ने इस स्तूप का जो उत्खनन करवाया था उसमे इस विशाल स्तूप के अंदर से बलुवा पत्थर और संगमरमर के दो बर्तन मिले थे जिनमें बुद्ध के अस्थि-अवशेष पाए गए थे। इन्हें गंगा में प्रवाहित कर दिया गया।&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
पुरातत्तव विभाग द्वारा यहाँ जो उत्खनन किया गया उसमें 12वीं शती ई. में यहाँ होने वाले विनाश के अध्ययन से ज्ञात होता है कि '''यहाँ के निवासी मुसलमानों के आक्रमण के समय एकाएक ही भाग निकले थे क्योंकि विहारों की कई कोठरियों में मिट्टी के बर्तनों में पकी दाल और चावल के अवशेष मिले थे।''' &lt;br /&gt;
[[चित्र:Buddha-Sarnath-2.jpg|thumb|left|[[बुद्ध]], मूलागंध कुटी विहार, सारनाथ]]&lt;br /&gt;
1854 ई. में [[भारत]] सरकार ने सारनाथ को एक नील के व्यवसायी फ़र्ग्युसन से ख़रीद लिया। लंका के अनागरिक धर्मपाल के प्रयत्नों से यहाँ मूलगंध कुटी विहार नामक बौद्ध मंदिर बना था। सारनाथ के अवशिष्ट प्राचीन स्मारकों में निम्न स्तूप उल्लेखनीय हैं- चौखंडी स्तूप इस पर मुग़ल सम्राट् [[अकबर]] द्वारा अंकित 1588 ई. का एक फ़ारसी अभिलेख ख़ुदा है जिसमें [[हुमायूँ]] के इस स्थान पर आकर विश्राम करने का उल्लेख है। &amp;lt;ref&amp;gt;चौखंडी स्तूप के निर्माता का ठीक-ठीक पता नहीं है। [[कनिंघम]] ने इस स्तूप का उत्खनन द्वारा अनुसंधान किया भी था किंतु कोई अवशेष न मिले&amp;lt;/ref&amp;gt;; धमेख अथवा धर्ममुख स्तूप-पुरातत्त्व विद्वानों के मतानुसार यह स्तूप गुप्तकालीन है और भावी बुद्ध मैत्रेय के सम्मानार्थ बनवाया गया था। किंवदंती है कि यह वही स्थल है जहां मैत्रेय को गौतम बुद्ध ने उसके भावी बुद्ध बनने के विषय में भविष्यवाणी की थी। &amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियालोजिकल रिपोर्ट 1904-05&amp;lt;/ref&amp;gt; खुदाई में इसी स्तूप के पास अनेक खरल आदि मिले थे जिससे संभावना होती है कि किसी समय यहाँ औषधालय रहा होगा। इस स्तूप में से अनेक सुंदर पत्थर निकले थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कलाकृतियां तथा प्रतिमाएं==&lt;br /&gt;
सारनाथ के क्षेत्र की खुदाई से गुप्तकालीन अनेक कलाकृतियां तथा बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जो वर्तमान संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्तकाल में सारनाथ की मूर्तिकला की एक अलग ही शैली प्रचलित थी, जो बुद्ध की मूर्तियों के आत्मिक सौंदर्य तथा शारीरिक सौष्ठव की सम्मिश्रित भावयोजना के लिए भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में प्रसिद्ध है। सारनाथ में एक प्राचीन शिव मंदिर तथा एक जैन मंदिर भी स्थित हैं। जैन मंदिर 1824 ई. में बना था; इसमें श्रियांशदेव की प्रतिमा है। जैन किंवदंती है कि ये तीर्थंकर सारनाथ से लगभग दो मील दूर स्थित सिंह नामक ग्राम में [[तीर्थंकर]] भाव को प्राप्त हुए थे। सारनाथ से कई महत्त्वपूर्ण अभिलेख भी मिले हैं जिनमें प्रमुख काशीराज प्रकटादित्य का शिलालेख है। इसमें बालादित्य नरेश का उल्लेख है जो फ़्लीट के मत में वही बालादित्य है जो मिहिरकुल [[हूण]] के साथ वीरतापूर्वक लड़ा था। यह अभिलेख शायद 7वीं शती के पूर्व का है। दूसरे अभिलेख में हरिगुप्त नामक एक साधु द्वारा मूर्तिदान का उल्लेख है। यह अभिलेख 8वीं शती ई. का जान पड़ता है।  &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
बीच में लोग इसे भूल गए थे। यहाँ के ईंट-पत्थरों को निकालकर वाराणसी का एक मुहल्ला ही बस गया। 1905 ई. में जब पुरातत्त्व विभाग ने खुदाई आरंभ की तब सारनाथ का जीर्णोद्धार हुआ। अब यहाँ संग्रहालय है, 'मूलगंध कुटी विहार' नामक नया मंदिर बन चुका है, बोधिवृक्ष की शाखा लगाई गई है और प्राचीन काल के मृगदाय का स्मरण दिलाने के लिए हरे-भरे उद्यानों में कुछ हिरन भी छोड़ दिए गए हैं। संसार भर के बौद्ध तथा अन्य पर्यटक यहाँ आते रहते हैं।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 &lt;br /&gt;
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|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Chinese-Buddhist-Temple-1.jpg|सारनाथ में स्थित चीनी बौद्ध मंदिर&lt;br /&gt;
चित्र:Dhamekh-Stupa-Sarnath.jpg|धमेख स्तूप, सारनाथ&lt;br /&gt;
चित्र:Dhamekh-Stupa-Sarnath-1.jpg|धमेख स्तूप, सारनाथ&lt;br /&gt;
चित्र:Tibetan-Monastery-Sarnath.jpg|[[बुद्ध]], कग्यू तिब्बती मठ, सारनाथ&lt;br /&gt;
चित्र:Dhamekh-Stupa-Sarnath-3.jpg|धमेख स्तूप, सारनाथ&lt;br /&gt;
चित्र:Dhamekh-Stupa-Sarnath-7.jpg|धमेख स्तूप पर नक़्क़ाशी, सारनाथ&lt;br /&gt;
चित्र:Dhamekh-Stupa-Sarnath-4.jpg|धमेख स्तूप, सारनाथ&lt;br /&gt;
चित्र:Jain-Temple-Sarnath.jpg|जैन मन्दिर, सारनाथ&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Sarnath-3.jpg|बुद्ध प्रतिमा, सारनाथ&lt;br /&gt;
चित्र:Sarnath-1.jpg|धमेख स्तूप, जैन मंदिर, सारनाथ&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://asi.nic.in/asi_museums_sarnath_hn.asp पुरातत्‍वीय संग्रहालय, सारनाथ]&lt;br /&gt;
*[http://travelwithmanish.blogspot.com/2010/05/blog-post.html चलिए चलें सारनाथ जहाँ पड़ी बौद्ध धर्म की नींव!]&lt;br /&gt;
*[http://www.sacred-destinations.com/india/sarnath Sarnath]&lt;br /&gt;
*[http://yatrasalah.com/touristPlaces.aspx?id=583 सारनाथ]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बौद्ध धर्म}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म]][[Category:बौद्ध दर्शन]][[Category:पर्यटन कोश]] [[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
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[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक]]&lt;br /&gt;
[[Category:चयनित लेख]]&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<updated>2011-10-03T09:42:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Museum-Mathura-1.jpg|राजकीय जैन संग्रहालय, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt;Govt. Jain Museum, Mathura|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
प्रारम्भ में यह संग्रहालय स्थानीय तहसील के पास एक छोटे भवन में रखा गया था। कुछ परिवर्तनों के बाद सन् 1881 में उसे जनता के लिए खोल दिया गया। सन् 1900 में संग्रहालय का प्रबन्ध नगरपालिका के हाथ में दिया गया। इसके पांच वर्ष बाद तत्कालीन [[पुरातत्त्व]] अधिकारी डा. जे. पी. एच. फोगल के द्वारा इस संग्रहालय की मूर्तियों का वर्गीकरण किया गया और सन् 1910 में एक विस्तृत सूची प्रकाशित की गई। इस कार्य से संग्रहालय का महत्त्व शासन की दृष्टि  में बढ़ गया और सन् 1912 में इसका सारा प्रबन्ध राज्य सरकार ने अपने हाथ में ले लिया। सन् 1908 से रायबहादुर पं. राधाकृष्ण यहाँ के प्रथम सहायक संग्रहालय अध्यक्ष के रूप में नियुक्त हुए, बाद में वे अवैतनिक संग्रहाध्यक्ष हो गये। अब संग्रहालय की उन्नति होने लगी, जिसमें तत्कालीन पुरातत्त्व निदेशक सर जॉन मार्शल और रायबहादुर दयाराम साहनी का बहुत बड़ा हाथ था। सन् 1929 में प्रदेशीय शासन ने एक लाख छत्तीस हज़ार रुपया लगाकर स्थानीय डैम्पियर पार्क में संग्रहालय का सम्मुख भाग बनवाया और सन् 1930 में यह जनता के लिए खोला गया। इसके बाद ब्रिटिश शासन काल में यहाँ कोई नवीन परिर्वतन नहीं हुआ। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[भारत]] का शासन सत्र सन् 1947 में जब अपने हाथ में आया तब से अधिकारियों का ध्यान इस सांस्कृतिक तीर्थ की उन्नति की ओर भी गया। द्वितीय पंचवर्षीय योजना में इसकी उन्नति के लिए अलग धनराशि की व्यवस्था की गयी और कार्य भी प्रारम्भ हुआ। सन् 1958 से कार्य की गति तीव्र हुई। पुराने भवन की छत का नवीनीकरण हुआ और साथ ही साथ सन् 1930 का अधूरा बना हुआ भवन पूरा किया गया। वर्तमान स्थिति में अष्टकोण आकार का एक सुन्दर भवन उद्यान के बीच स्थित है । इनमें 34 फीट चौड़ी सुदीर्घ दरीची बनाई गई है और प्रत्येक कोण पर एक छोटा षट्कोण कक्ष भी बना है। शीघ्र ही मथुरा कला का यह विशाल संग्रह पूरे वैभव के साथ सुयोग्य वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से यहाँ प्रदर्शित होगा। शासन इससे आगे बढ़ने की इच्छा रखता है और परिस्थिति के अनुरूप इस संग्रहालय में व्याख्यान कक्ष, ग्रंथालय, दर्शकों का विश्राम स्थान आदि की स्वतंत्र व्यवस्था की जा रही है। इसके अतिरिक्त कला प्रेमियों की सुविधा के लिए मथुरा कला की प्रतिकृतियां और छायाचित्रों को लागत मूल्य पर देने की वर्तमान व्यवस्था में भी अधिक सुविधाएं देने की योजना है।&lt;br /&gt;
==जैन संग्रहालय मथुरा वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bust-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-2.jpg|जैन प्रतिमा का धड़&amp;lt;br /&amp;gt; Bust of Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-4.jpg|जैन मस्तक&amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-3.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Sarvato-Bhadrrika-Jain-Museum-Mathura-7.jpg|सर्वतोभद्रिका&amp;lt;br /&amp;gt; Sarvato Bhadrrika&lt;br /&gt;
चित्र:Thirthankara-Rishabhanath-Jain-Museum-Mathura-1.jpg|[[ॠषभनाथ तीर्थंकर|प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ]]&amp;lt;br /&amp;gt; 1st Tirthankara Rishabhanatha&lt;br /&gt;
चित्र:Headless-Jaina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-5.jpg|सिर विहीन जैन तीर्थंकर&amp;lt;br /&amp;gt; Headless Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Inscribed-Jaina-Tirthankara-Kayotsaf-Mudra-Jain-Museum-Mathura-6.jpg|तीर्थंकर प्रतिमा&amp;lt;br /&amp;gt;Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:23rd-Tirthankara-Parsvanatha-Jain-Museum-Mathura-9.jpg|तीर्थंकर पार्श्वनाथ &amp;lt;br /&amp;gt; Tirthankara Parsvanatha&lt;br /&gt;
चित्र:22-Tirthankara-Neminatha-Jain-Museum-Mathura-10.jpg|तीर्थंकर नेमिनाथ&amp;lt;br /&amp;gt; Tirthankara Neminatha&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-11.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर&amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-15.jpg|जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Yugaliya-Jain-Museum-Mathura-12.jpg|युगलिया &amp;lt;br /&amp;gt; Yugaliya&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-14.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-In-Meditation-Jain-Museum-Mathura-15.jpg|ध्यान मुद्रा में जैन तीर्थंकर&amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara In Meditation&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-16.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-17.jpg|जैन मस्तक &amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Upper-Half-Part-of-Tirthankara-18.jpg|तीर्थंकर प्रतिभा का ऊपरी भाग &amp;lt;br /&amp;gt; Upper Half Part of a Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-19.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Rishabhanatha-Jain-Museum-Mathura-20.jpg|ॠषभ नाथ &amp;lt;br /&amp;gt; Rishabhanatha&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-21.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-22.jpg|जैन मस्तक &amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-23.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Headless-Jaina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-24.jpg|सिर विहीन जैन तीर्थंकर&amp;lt;br /&amp;gt; Headless Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Jain-Tirthankara-Rishabhanatha-Jain-Museum-Mathura-25.jpg|[[ॠषभनाथ तीर्थंकर|जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaina Tirthankara Rishabhanatha&lt;br /&gt;
चित्र:Torso-of-Jina-Image-Jain-Museum-Mathura-26.jpg|जैन प्रतिमा का धड़ &amp;lt;br /&amp;gt; Torso of Jina Image&lt;br /&gt;
चित्र:Ayagapatta-with-Miniature-Tirthankara-and-Others-Sacred-Symbols-Jain-Museum-Mathura-27.jpg|जैन आयागपट्ट &amp;lt;br /&amp;gt; Jain Tablet&lt;br /&gt;
चित्र:Jaina-Tablet-Homage-Vasu-Daughter-Courtesan-Lavanasobhika-Jain-Museum-Mathura-28.jpg|जैन आयागपट्ट &amp;lt;br /&amp;gt; Jain Tablet&lt;br /&gt;
चित्र:Goat-Headed-Jaina-Mother-Goddess-Jain-Museum-Mathura-29.jpg|अजमुखी जैन मातृदेवी &amp;lt;br /&amp;gt; Goat Headed Jaina Mother Goddess&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-30.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Headless-Jaina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-31.jpg|सिर विहीन जैन प्रतिभा&amp;lt;br /&amp;gt; Headless Image of Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Lower-Part-Jaina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-32.jpg|जैन प्रतिमा का अधोभाग &amp;lt;br /&amp;gt; Lower Part of Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Bust-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-33.jpg|जैन प्रतिमा का धड़&amp;lt;br /&amp;gt; Bust of Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-34.jpg|जैन मस्तक&amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-35.jpg|जैन मस्तक&amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-36.jpg|जैन मस्तक&amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Headless-Jaina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-37.jpg|सिर विहीन जैन प्रतिभा&amp;lt;br /&amp;gt; Headless Jina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Rishabhanath-Jain-Museum-Mathura-38.jpg|[[ॠषभनाथ तीर्थंकर|आसनस्थ ऋषभनाथ]]&amp;lt;br /&amp;gt; Seated Rishabhanatha&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-39.jpg|जैन मस्तक&amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Jaina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-40.jpg|जैन प्रतिभा&amp;lt;br /&amp;gt;Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Torso-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-41.jpg|जैन प्रतिमा का धड़&amp;lt;br /&amp;gt; Torso of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jain-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-42.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-43.jpg|जैन मस्तक&amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Image-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-44.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर&amp;lt;br /&amp;gt; Seated Image of Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Upper-Part-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-45.jpg|जैन प्रतिमा का ऊपरी भाग&amp;lt;br /&amp;gt; Upper Part of a Jina&lt;br /&gt;
चित्र:Seated-Jaina-Tirthankara-Jain-Museum-Mathura-46.jpg|आसनस्थ जैन तीर्थंकर &amp;lt;br /&amp;gt; Seated Jaina Tirthankara&lt;br /&gt;
चित्र:Head-of-Jina-Jain-Museum-Mathura-47.jpg|जैन मस्तक&amp;lt;br /&amp;gt; Head of a Jina&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{जैन धर्म2}}&lt;br /&gt;
{{ब्रज के दर्शनीय स्थल}}&lt;br /&gt;
{{संग्रहालय}}&lt;br /&gt;
{{जैन धर्म}}&lt;br /&gt;
[[Category:जैन धर्म]][[Category:जैन धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:संग्रहालय]]&lt;br /&gt;
[[Category:संग्रहालय कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=बाज़ार पैमाना और वज़न [[मोहनजोदाड़ो]] &amp;lt;br /&amp;gt; Market Scale &amp;amp; Weights Mohenjodaro &lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/benny_lin/ Benny Lin]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/benny_lin/4557627446/ bennylin0724]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=2600 ई.पू&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/benny_lin/ bennylin0724's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=[[मोहनजोदाड़ो]], जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी।  [[हड़प्पा]], मेहरगढ़ और [[लोथल]] की ही श्रृंखला में मोहनजोदाड़ो में भी पुरातत्त्व [[उत्खनन]] किया गया। यहाँ [[मिस्र]] और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>कुषाण साम्राज्य</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: /* कुषाण */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कुषाण साम्राज्य''' तत्कालीन तीन महत्त्वपूर्ण साम्राज्य, पूर्व में [[चीन]], पश्चिम में पार्थियन ([[पहलव]]) एवं [[रोम]] साम्राज्य के मध्य में स्थित था। चूंकि पार्थियनों के रोम से सम्बन्ध अच्छे नहीं थे, इसलिए चीन से व्यापार करने के लिए रोम को [[कुषाण|कुषाणों]] से मधुर सम्बन्ध बनाने पड़े। यह व्यापार महान 'सिल्कमार्ग' तथा 'रेशममार्ग' से सम्पन्न होता था। यह मार्ग तीन हिस्सों में बंटा था -(1.) कैस्पीयन सागर होते हुए, (2.) मर्व से फरात नदी होते हुए नील सागर पर स्थित बन्दरगाह तथा (3.) लाल सागर तक जाता था।&lt;br /&gt;
==कुषाणकालीन व्यापार==&lt;br /&gt;
प्रथम शताब्दी में [[भारत]] और रोम के बीच मधुर सम्बन्ध का उल्लेख 'पेरिप्लस ऑफ़ दी इरीथ्रियन सी' नामक पुस्तक में मिलता है। इस पुस्तक में [[रोमन साम्राज्य]] को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में [[कालीमिर्च]], अदरक, रेशम, मलमल, सूती वस्त्र, [[रत्न]], [[मोती]] आदि का उल्लेख मिलता है। आयात की जाने वाली वस्तुओं में मूंगा, लोशन, कांच, [[चांदी]], [[सोना|सोने]] का बर्तन, रांगा, सीसा, तिप्तीया घास, गीत गाने वाले लड़के का उल्लेख मिलता है। प्रथम शताब्दी ई. में व्यापार मुख्यतः [[सिन्धु नदी]] के मुहाने पर स्थित बन्दरगाह 'बारवैरिकम' और [[भड़ौच]] से होता था। दक्षिण भारत में इस समय आरिकामेडु, मुजरिस, कावेरी, पत्तम जैसे प्रमुख बन्दरगाह थे। 'पेरिप्लस ऑफ़ द इसीथ्रियन सी' पुस्तक में आरिकामेडु बन्दरगाह का उल्लेख पेडोक नाम से किया गया है। बेरीगाजा (भड़ौच) अथवा भरूकच्छ पश्चिमी तट पर स्थित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह और प्रवेशद्वार था। रोम से भारत आ रहे लोगों की मात्रा पर ग्रीक इतिहासकार [[प्लिनी]] ने दुःख व्यक्त किया है।&lt;br /&gt;
====चौथी बौद्ध संगीति====&lt;br /&gt;
[[कनिष्क]] [[बौद्ध धर्म]] की '[[महायान]]' शाखा का अनुयायी था। उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए काफ़ी काम किया। कनिष्क के समय में ही बौद्ध धर्म की चौथी संगीति का आयोजन किया गया। यह संगीति [[कश्मीर]] के 'कुण्डल वन' में आयोजित की गई। इस संगीति के अध्यक्ष वसुमित्र एवं उपाध्यक्ष [[अश्वघोष]] थे। अश्वघोष, कनिष्क का राजकवि था। इसी संगीति में बौद्ध धर्म दो भागों-[[हीनयान]] और [[महायान]] में विभाजित हो गया। इस संगीति में [[नागार्जुन बौद्धाचार्य|नागार्जुन]] शामिल हुए थे। इसी संगीति में तीनों पिटकों पर टीकायें लिखी गईं, जिनको 'महाविभाषा' नाम की पुस्तक में संकलित किया गया। इस पुस्तक को बौद्ध धर्म का 'विश्वकोष' भी कहा जाता है। संगीति के निर्णयों को ताम्रपत्र पर लिखकर पत्थर की मंजूषाओं में रखकर [[स्तूप]] में स्थापित कर दिया गया। कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी होते हुए भी अन्य धर्मों के प्रति साहिष्णु था। इसके सिक्कों पर पार्थियन, [[यूनानी]] एवं भारतीय देवी-[[देवता|देवताओं]] की आकृतियाँ मिली हैं। कनिष्क के सिक्कों पर ग्रीक अक्षर में जिन देवताओं के नाम लिखे हैं वे इस प्रकार हैं- 'हिरैक्लीज', 'सिरापीज', ग्रीक नामधारी [[सूर्य]] और [[चन्द्र ग्रह|चन्द्र]], हेलिओस और सेलिनी, मीइरो (सूर्य), अर्थों ([[अग्नि]]), ननाइया, [[शिव]] आदि। सिक्कों पर [[महात्मा बुद्ध]] तथा भारतीय देवी देवताओं की आकृतियाँ यूनानी शैली में उकेरी गई हैं। [[कुषाण वंश]] के शासकों में [[विम कडफ़ाइसिस]], [[शैव]]; कनिष्क, बौद्ध; [[हुविष्क]] और [[वासुदेव कुषाण]], [[वैष्णव धर्म]] के अनुयायी थे। [[मथुरा]] से कनिष्क की एक ऐसी मूर्ति मिली है, जिसमें उसे सैनिक वेषभूषा में दिखाया गया है। कनिष्क के अब तक प्राप्त सिक्के यूनानी एवं ईरानी भाषा में मिले हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कनिष्क के [[ताम्र|तांबे]] के सिक्कों पर उसे 'बलिवेदी' पर बलिदान करते हुए दर्शाया गया है। कनिष्क के सोने के सिक्के [[रोम]] के सिक्कों से काफ़ी कुछ मिलते थे। बुद्ध के अवशेषों पर कनिष्क ने [[पेशावर]] के निकट एक [[स्तूप]] एवं मठ निर्माण करावाया। कनिष्क [[कला]] और विद्वता का आश्रयदाता था। इसके दरबार का सबसे महान साहित्यिक व्यक्ति अश्वघोष था। इसकी रचनाओं की तुलना महान मिल्टन, गेटे, काण्ट एवं वॉल्टेयर से की गई है। अश्वघोष ने 'बुद्धचरित्र' तथा 'सौन्दरनन्द', शारिपुत्रकरण एवं सूत्रालंकार की रचना की। इसमें बुद्धचरित तथा सौन्दरनन्द को महाकाव्य की संज्ञा प्राप्त है। सौन्दरनन्द में बुद्ध के सौतेले भाई सुन्दरनन्द के संन्यास ग्रहण करने का वर्णन है। अश्वघोष का ग्रंथ 'सरिपुत्रप्रकरण' नौ अंको का एक नाटक ग्रंथ है, जिसमें बुद्ध के शिष्य 'शरिपुत्र' के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने का नाटकीय उल्लेख है। इस ग्रंथ की तुलना [[वाल्मीकि]] के [[रामायण]] से की जाती है। कनिष्क के दरबार की ही एक अन्य विभूति [[नागार्जुन बौद्धाचार्य|नागार्जुन]] दार्शनिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक भी था। इसकी तुलना मार्टिन लूथर से की जाती है। इसे [[भारत]] का 'आईन्सटाइन' कहा गया है। नागार्जुन ने अपनी पुस्तक 'माध्यमिक सूत्र' में सापेक्षता के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। वसुमित्र ने चौथी बौद्ध संगीति में 'बौद्ध धर्म के विश्वकोष' 'महाविभाष्ज्ञसूत्र' की रचना की। इस ग्रंथ को 'बौद्ध धर्म का विश्वकोष'कहा जाता है। कनिष्क के दरबार के एक और रत्न चिकित्सक '[[चरक]]' ने औषधि पर 'चरकसंहिता' की रचना की। चरक, कनिष्क का राजवैद्य था। अन्य विद्धानों में पार्श्व, वसुमित्र, मतृवेट, संघरक्षक आदि के नाम उल्लेखनीय है। इसके संघरस कनिष्क के [[पुरोहित]] थे। विभाषाशास्त्र की रचना वसुमित्र ने की थी। कुषाणों ने भारत में बसकर यहाँ की संस्कृति को आत्मसात् किया। भारतीय संस्कृति यूनानी संस्कृति से प्रभावित थी। [[कुषाण]] शासकों ने 'देवपुत्र' उपाधि धारण की। कनिष्क के समय में ही 'वात्सायन का कामसूत्र', भारवि की स्वप्नवासवदत्ता की रचना हुई। 'स्वप्नवासवदत्ता' को संभवतः भारत का प्रथम सम्पूर्ण नाटक माना गया है।&lt;br /&gt;
==युइशि जाति का भारत प्रवेश==&lt;br /&gt;
{{tocright}} &lt;br /&gt;
[[हूण|हूणों]] के आक्रमण के कारण युइशि लोग अपने प्राचीन अभिजन को छोड़कर अन्यत्र जाने के लिए विवश हुए थे, और इसलिए मध्य एशिया के क्षेत्र में निवास करने वाली विविध जातियों में एक प्रकार की उथल-पुथल मच गई थी। युइशि जाति का मूल अभिजन [[तिब्बत]] के उत्तर-पश्चिम में 'तकला मक़ान' की मरुभूमि के सीमान्त क्षेत्र में था। उस समय हूण लोग उत्तरी चीन में निवास करते थे। जब [[चीन]] के शक्तिशाली सम्राट शी-हुआंग-ती (246—210 ई. पू.) ने उत्तरी चीन में विशाल दीवार बनवाकर हूणों के लिए अपने राज्य पर आक्रमण कर सकना असम्भव बना दिया, तो हूण लोग पश्चिम की ओर बढ़े, और उस प्रदेश पर टूट पड़े, जहाँ युइशि जाति का निवास था। युइशि लोगों के लिए यह सम्भव नहीं था कि वे बर्बर और प्रचण्ड हूण आक्रान्ताओं का मुक़ाबला कर सकते। वे अपने अभिजन को छोड़कर पश्चिम व दक्षिण की ओर जाने के लिए विवश हुए। उस समय सीर नदी की घाटी में [[शक]] जाति का निवास था। युइशि लोगों के आक्रमण के कारण वह अपने प्रदेश को छोड़ देने के लिए विवश हुई, और सीर नदी की घाटी पर युइशि जाति का अधिकार हो गया। युइशियों से धकेले जाकर ही शकों ने बैक्ट्रिया और पार्थिया पर आक्रमण किए और उनकी एक शाखा [[भारत]] में भी प्रविष्ट हुई। शकों के द्वारा बैक्ट्रिया के [[यवन]] राज्य का अन्त हुआ, और पार्थिया भी उनके अधिकार में आ जाता, यदि राजा मिथिदातस द्वितीय उनके आक्रमणों से अपने राज्य की रक्षा करने में समर्थ न होता। पार्थिया को जीत सकने में समर्थ न हो पाने के कारण ही शकों की एक शाखा सीस्तान होती हुई [[सिंधु नदी|सिन्ध नदी]] में प्रविष्ट हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==युइशि जाति का बैक्ट्रिया में प्रवेश== &lt;br /&gt;
सीर नदी की घाटी से शकों को निकालकर युइशि जाति के लोग वहाँ पर आबाद हो गए थे। पर वे वहाँ पर भी देर तक नहीं टिक सके। जिन हूणों के आक्रमण के कारण युइशि लोग अपने मूल अभिजन को छोड़ने के लिए विवश हुए थे, उन्होंने उन्हें सीर नदी की घाटी में भी चैन से नहीं रहने दिया। हूणों ने यहाँ पर भी उनका पीछा कया, जिससे की शकों के पीछे-पीछे वे बैक्ट्रिया में भी प्रविष्ट हुए। बैक्ट्रिया और उसके समीपवर्ती प्रदेशों पर उन्होंने क़ब्ज़ा कर लिया, और वहाँ अपने पाँच राज्य क़ायम किए। एक चीनी ऐतिहासिक के अनुसार - &lt;br /&gt;
#हिउ-मी &lt;br /&gt;
#शुआंग-मी&lt;br /&gt;
#कुएई-शुआंग &lt;br /&gt;
#ही-तू &lt;br /&gt;
#काओ-फ़ू। &lt;br /&gt;
पहली सदी ई. पू. से ही युइशि लोग अपने ये पाँच राज्य स्थापित कर चुके थे। इन राज्यों में परस्पर संघर्ष चलता रहता था। बैक्ट्रिया के यवन निवासियों के सम्पर्क में आकर युइशि लोग सभ्यता के मार्ग पर भी अग्रसर होने लगे थे, और वे उस दशा से उन्नति कर गए थे, जिसमें कि वे तक़लामक़ान की मरुभूमि के समीपवर्ती अपने मूल अभिजन में रहा करते थे।&lt;br /&gt;
==कुषाण==&lt;br /&gt;
युइशि लोगों के पाँच राज्यों में अन्यतम 'कुएई-शुआंगा' था। 25 ई. पू. के लगभग इस राज्य का स्वामी 'कुषाण' नाम का वीर पुरुष हुआ, जिसके शासन में इस राज्य की बहुत उन्नति हुई। उसने धीरे-धीरे अन्य युइशि राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया। वह केवल युइशि राज्यों को जीतकर ही संतुष्ट नहीं हुआ, अपितु उसने समीप के [[भारत के पार्थियन राज्य|पार्थियन]] और [[शक साम्राज्य|शक राज्यों]] पर भी आक्रमण किए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनेक इतिहासकारों का मत है, कि '''कुषाण''' किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं था। यह नाम युइशि जाति की उस शाखा का था, जिसने अन्य चारों युइशि राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। जिस राजा ने पाँचों युइशि राज्यों को मिलाकर अपनी शक्ति का उत्कर्ष किया, उसका अपना नाम [[कुजुल कडफ़ाइसिस]] था। पर्याप्त प्रमाण के अभाव में यह निश्चित कर सकना कठिन है कि जिस युइशि वीर ने अपनी जाति के विविध राज्यों को जीतकर एक सूत्र में संगठित किया, उसका वैयक्तिक नाम कुषाण था या कुजुल था। यह असंदिग्ध है, कि बाद के युइशि राजा भी [[कुषाण वंश|कुषाण वंशी]] थे। राजा कुषाण के वंशज होने के कारण वे कुषाण कहलाए, या युइशि जाति की कुषाण शाखा में उत्पन्न होने के कारण - यह निश्चित न होने पर भी इसमें सन्देह नहीं कि ये राजा कुषाण कहलाते थे और इन्हीं के द्वारा स्थापित साम्राज्य को '''कुषाण साम्राज्य''' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन भारत के सभी साम्राज्यों में कुषाण साम्राज्य की बड़ी ही महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय स्थिति थी। इस समय के अनेक साम्राज्यों के बीच स्थित था। पूर्व में [[चीन]] का 'स्वर्गिक साम्राज्य' था। इसके पश्चिम में [[पार्थिया|पार्थियन साम्राज्य]] था। [[रोमन साम्राज्य]] का उदय हो रहा था। रोमन तथा पार्थियन साम्राज्यों में परस्पर शत्रुता थी, और रोमन एक ऐसा मार्ग चाहते थे जहाँ से [[रोम]] और [[चीन]] के बीच व्यापार शत्रु देश पार्थिया से गुज़रे बिना हो सके। इसलिए वे कुषाण साम्राज्य से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखने के इच्छुक थे। महान '[[सिल्क मार्ग]]' की तीनों मुख्य शाखाओं पर कुषाण साम्राज्य का नियंत्रण था - &lt;br /&gt;
#कैस्पियन सागर से होकर जाने वाले मार्ग पर, &lt;br /&gt;
#मर्व से फ़रात (यूक्रेट्स) नदी होते हुए रूमसागर पर बने बंदरगाह तक जाने वाले मार्ग पर, &lt;br /&gt;
#भारत से लाल सागर तक जाने वाले मार्ग पर। &lt;br /&gt;
परिणामस्वरूप कुषाणों के समय में उत्तर पश्चिम भारत उस समय का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र बन गया था। आर्थिक दृष्टि से कुषाणकालीन भारत अत्यन्त समृद्ध प्रतीत होता है। केवल सम्पूर्ण गंगा घाटी ही नहीं अपितु मध्य एशिया तक विभिन्न [[उत्खनन|उत्खननों]] से पता चलता है कि ईसा की तीन शताब्दियों में शहरीकरण काफ़ी विकसित हो चुका था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरी भारत के सांस्कृतिक इतिहास में भी कुषाण काल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुषाण भी शकों की ही तरह मध्य एशिया से निकाले जाने पर [[क़ाबुल]]-[[कंधार]] की ओर यहाँ आ गये थे। उस काल में यहाँ के हिन्दी यूनानियों की शक्ति कम हो गई थी, उन्हें कुषाणों ने सरलता से पराजित कर दिया। उसके बाद उन्होंने क़ाबुल-कंधार पर अपना राज्याधिकार कायम किया। उनके प्रथम राजा का नाम कुजुल कडफाइसिस था। उसने क़ाबुल – कंधार के यवनों (हिन्दी यूनानियों) को हरा कर [[भारत]] की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बसे हुए पह्लवों को भी पराजित कर दिया। कुषाणों का शासन पश्चिमी [[पंजाब]] तक हो गया था। कुजुल के पश्चात उसके पुत्र विम तक्षम ने कुषाण राज्य का और भी अधिक विस्तार किया। [[भारत]] की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति का लाभ उठा कर ये लोग आगे बढ़े और उन्होंने हिंद यूनानी शासकों की शक्ति को कमज़ोर कर [[शुंग साम्राज्य]] के पश्चिमी भाग को अपने अधिकार में कर लिया। विजित प्रदेश का केन्द्र उन्होंने [[मथुरा]] को बनाया, जो उस समय उत्तर [[भारत]] के धर्म, कला तथा व्यापारिक यातायात का एक प्रमुख नगर था।&amp;lt;ref&amp;gt;संभवतः इसी समय से जनपद का नाम भी शूरसेन के स्थान पर 'मथुरा' प्रसिद्ध हो गया।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=आधार1&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.kushan.org/contents.htm कुषाण इतिहास]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कुषाण साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:शक_एवं_कुषाण_काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:कुषाण साम्राज्य]]__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%A5%E0%A4%B2&amp;diff=222985</id>
		<title>लोथल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%A5%E0%A4%B2&amp;diff=222985"/>
		<updated>2011-10-03T09:38:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: /* बन्दरगाह अथवा गोदी बाड़ा(Dock Yard) */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Lothal.jpg|thumb|400px|लोथल बस्ती और नगर का प्रसिद्ध जल संसाधन तंत्र, परिकल्पित चित्र]]&lt;br /&gt;
*यह [[गुजरात]] के [[अहमदाबाद ज़िला|अहमदाबाद ज़िले]] में 'भोगावा नदी' के किनारे 'सरगवाला' नामक ग्राम के समीप स्थित है। &lt;br /&gt;
*खुदाई 1954-55 ई. में 'रंगनाथ राव' के नेतृत्व में की गई। &lt;br /&gt;
*इस स्थल से समकालीन सभ्यता के पांच स्तर पाए गए हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ पर दो भिन्न-भिन्न टीले नहीं मिले हैं, बल्कि पूरी बस्ती एक ही दीवार से घिरी थी। यह छः खण्डों में विभक्त था। &lt;br /&gt;
==नगर दुर्ग==&lt;br /&gt;
लोथल का ऊपरी नगर था नगर दुर्ग विषय चतुर्भुजाकार था जो पूर्व से पश्चिम 117 मी. और उत्तर से दक्षिण की ओर 136 मी. तक फैला हुआ था।&lt;br /&gt;
==बाज़ार और औद्योगिक क्षेत्र==&lt;br /&gt;
लोथल नगर के उत्तर में एक बाज़ार और दक्षिण में एक औद्योगिक क्षेत्र था। मनके बनाने वालों, [[ताम्र|तांबे]] तथा [[सोना|सोने]] का काम करने वाले शिल्पियों की उद्योगशालाएं भी प्रकाश में आई हैं। यहाँ से एक घर के सोने के दाने, सेलखड़ी की चार मुहरें, सींप एवं तांबे की बनी चूड़ियों और बहुत ढंग से रंगा हुआ एक मिट्टी का जार मिला है। लोथल से [[शंख]] के कार्य करने वाले दस्तकारों और ताम्रकर्मियों के कारखाने भी मिले हैं। [[चित्र:Lothal-11.jpg|thumb|250px|left|लोथल नगर में जल पुनर्शोधित कर काम में लाया जाता था एक बूंद जल व्यर्थ नहीं जाता था]] नगर दुर्ग के पश्चिम की ओर विभिन्न आकार के 11 कमरें बने थे, जिनका प्रयोग मनके या दाना बनाने वाले फैक्ट्री के रूप में किया जाता था।  लोथल नगर क्षेत्र के बाहरी उत्तरी-पश्चिमी किनारे पर समाधि क्षेत्र का, जहां से बीस समाधियां मिली हैं। यहाँ की सर्वाधिक प्रसिद्व उपलब्धि हड़प्पाकालीन बन्दरगाह के अतिरिक्त विशिष्ट मृदभांड, उपकरण, मुहरें, बांट तथा माप एवं पाषाण उपकरण है। यहाँ तीन युग्मित समाधि के भी उदाहरण मिले हैं। स्त्री-पुरुष शवाधान के साक्ष्य भी लोथल से ही मिले है। लोथल की अधिकांश क़ब्रों में कंकाल के सिर उत्तर की ओर और पैर दक्षिण की ओर था। केवल अपवाद स्वरूप एक कंकाल का दिशा पूर्व-पश्चिम की ओर मिला है।&lt;br /&gt;
==बन्दरगाह अथवा गोदी बाड़ा(Dock Yard)==&lt;br /&gt;
*बन्दरगाह लोथल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से है। इस बन्दरगाह पर [[मिस्र]] तथा [[मेसोपोटामिया]] से जहाज़ आते जाते थे। इसका औसत आकार 214x36 मीटर एवं गहराई 3.3 मीटर है। &lt;br /&gt;
*इसके उत्तर में 12 मीटर चौड़ा एक प्रवेश द्वार निर्मित था। जिससे होकर जहाज़ आते-जाते थे और दक्षिण दीवार में अतिरिक्त जल के लिए निकास द्वार था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Lothal-1.jpg|thumb|250px|लोथल के पुरातत्त्व स्थल]]&lt;br /&gt;
*लोथल में गढ़ी और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं। &lt;br /&gt;
*अन्य अवशेषों में धान ([[चावल]]), फ़ारस की मुहरों एवं घोड़ों की लघु मृण्मूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त अन्य अवशेषों में लोथल से प्राप्त एक मृदभांड पर एक विशेष चित्र उकेरा गया है जिस पर एक कौआ तथा एक लोमड़ी उत्कीर्ण है। इससे इसका साम्य [[पंचतंत्र]] की कथा चालाक लोमड़ी से किया गया है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से उत्तर अवस्था की एक अग्निवेदी मिली है। नाव के आकार की दो मुहरें तथा लकड़ी का अन्नागार मिला है। अन्न पीसने की चक्की, हाथी दांत तथा पीस का पैमाना मिला है। यहाँ से एक छोटा सा दिशा मापक यंत्र भी मिला है। तांबे का पक्षी, बैल, खरगोश व कुत्ते की आकृतियां मिली है, जिसमें तांबे का कुत्ता उल्लेखनीय है। &lt;br /&gt;
*यहाँ बटन के आकार की एक मुद्रा मिली है। लोथल से 'मोसोपोटामिया' मूल की तीन बेलनाकार मुहरे मिली है। आटा पीसने के दो पाट मिले है जो पूरे सिन्धु का एक मात्र उदाहरण है।&lt;br /&gt;
*[[उत्खनन|उत्खननों]] से लोथल की जो नगर-योजना और अन्य भौतिक वस्तुए प्रकाश में आई है उनसे लोथल एक लघु [[हड़प्पा]] या [[मोहनजोदाड़ो]] नगर प्रतीत होता है। सम्भवतः समुद्र के तट पर स्थित [[सिन्धु घाटी की सभ्यता|सिंधु-सभ्यता]] का यह स्थल पश्चिम [[एशिया]] के साथ व्यापार के दृष्टिकोण से सर्वात्तम स्थल था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-2.jpg|प्राक् [[हड़प्पा]] और [[हड़प्पा सभ्यता]] के पुरास्थल &lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-3.jpg|लोथल बस्ती और नगर की विश्व प्रसिद्ध संरचना, परिकल्पित चित्र&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-4.jpg|लोथल बस्ती और नगर का प्रसिद्ध जल संसाधन तंत्र जो आज भी जस का तस है&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-5.jpg|लोथल का मुख्य कुआं &lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-6.jpg|लोथल के पुरातत्त्व स्थल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-7.jpg|लोथल के पुरातत्त्व स्थल&lt;br /&gt;
चित्र:Drainage-Channels-Lothal.jpg|जल निकासी, लोथल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-8.jpg|लोथल के पुरातत्त्व स्थल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-9.jpg|लोथल के पुरातत्त्व स्थल&lt;br /&gt;
चित्र:Furnace-Lothal.jpg|[[मोती]] बनाने की भट्ठी, लोथल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-10.jpg|लोथल के पुरातत्त्व स्थल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-12.jpg|लोथल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-13.jpg|लोथल के पुरातत्त्व स्थल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-14.jpg|लोथल का प्राचीन कुआं &lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-15.jpg|लोथल के पुरातत्त्व स्थल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-16.jpg|लोथल के पुरातत्त्व स्थल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-17.jpg|लोथल&lt;br /&gt;
चित्र:Lothal-17-a.jpg|लोथल के काल के अवशेष पानी के भीतर साफ़ देखे जा सकते हैं&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{सिन्धु घाटी की सभ्यता}} &lt;br /&gt;
[[Category:हड़प्पा_संस्कृति]][[Category:इतिहास_कोश]][[Category:सिन्धु घाटी की सभ्यता]]__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=222984</id>
		<title>बुंदेलखंड का इतिहास</title>
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		<updated>2011-10-03T09:38:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: /* मौर्यकाल */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
बुंदेलों का पूर्वज [[पंचम बुंदेला]] था। बुंदेलखंड बुंदेल राजपूतों के नाम पर प्रसिद्ध है जिनके राज्य की स्थापना 14वीं शती में हुई थी। इससे पूर्व यह प्रदेश जुझौती अथवा जेजाकभुक्ति नाम से जाना जाता था और [[चन्देल वंश|चन्देलों]] द्वारा नवीं से चौदहवीं शताब्दी तक शासित होता रहा। राज्य के प्रमुख नगर थे- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[खजुराहो]], [[छतरपुर ज़िला|ज़िला छतरपुर]]- खजुराहो में आज भी अनेक भव्य वास्तुकृतियाँ अवशिष्ट हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[महोबा उत्तर प्रदेश|महोबा]], [[हमीरपुर ज़िला|ज़िला हमीरपुर]] तथा [[कालिंजर]]- कालिंजर में राज्य की सुरक्षा के लिए एक मज़बूत क़िला था। शेरशाह इस क़िले की घेराबन्दी के समय 1545 ई. के समय यहीं मारा गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[बांदा ज़िला]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुंदेली माटी में जन्‍मी अनेक विभूतियों ने न केवल अपना बल्कि इस अंचल का नाम ख़ूब रोशन किया और इतिहास में अमर हो गए। [[आल्हाखण्ड|आल्हा-ऊदल]], [[ईसुरी]], [[पद्माकर|कवि पद्माकर]], [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई]], डॉ. हरिसिंह गौर आदि अनेक महान विभूतियाँ इसी क्षेत्र से संबद्ध हैं। अनेक इतिहास पुरुषों और आल्हा की बाबन लड़ाईयाँ बुंदेलखंड का प्रमाण हैं। यहाँ के वीर योद्धा [[बुन्देला]] कहलाए, बुन्देली यहाँ की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना की बोली रही है। यहाँ के लोग बुन्देली बोली बोलने के कारण ही बुन्देला कहलाए। बुन्देलखण्ड के रुपायन का गहरा सम्बन्ध महाराजा [[छत्रसाल]] के महत्त्वपूर्ण स्थान [[जेजाकभुक्ति]] से है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्यकाल से पहले बुंदेलखंड शब्द इस नाम से प्रयोग में नहीं आया है। आधुनिक युग में ही इसके अन्य नाम और उनके उपयोग हुए हैं। बीसवीं शती के प्रारंभिक दशक में  बुंदेलखंड का इतिहास महाराज रायबहादुर सिंह ने लिखा था। इसमें बुंदेलखंड के अन्तर्गत आने वाली जागीरों और उनके शासकों के नामों की गणना मुख्य थी। पन्ना दरबार के प्रसिद्ध कवि 'कृष्ण' तथा दीवान प्रतिपाल सिंह ने अपने स्रोतों से बुंदेलखंड का इतिहास लिखा परन्तु वे विद्वान भी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनाओं के प्रति उदासीन रहे।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पौराणिक इतिहास&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड पौराणिक इतिहास}}&lt;br /&gt;
*मनु मानव समाज के आदि पुरुष बुंदेलखंड के इतिहास और समस्त भारतीय इतिहासों में हैं। &lt;br /&gt;
*इनकी प्रसिद्धि उत्तम-शासन व्यवस्था को देने और कोसल देश में अयोध्या को राजधानी बनाने में है। &lt;br /&gt;
*महाभारत और रघुवंश के आधार पर माना जाता है कि इक्ष्वाकु के तीसरे पुत्र दण्डक ने [[विन्ध्याचल पर्वत]] पर अपनी राजधानी बनाई थी। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;मौर्यकाल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड मौर्यकाल}}&lt;br /&gt;
*वर्तमान खोजों तथा प्राचीन कलाओं के आधार पर कहा जाता है कि प्राचीन [[चेदि महाजनपद|चेदि जनपद]] बाद में [[पुलिन्द देश]] के साथ मिल गया था। &lt;br /&gt;
*एरण की पुरातात्विक खोजों और [[उत्खनन|उत्खननों]] से सबसे प्राचीन साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*ये साक्ष्य 300 ई. पू. के माने गए हैं। इस समय [[एरण]] का शासक धर्मपाल था जिसके संबंध में मिले सिक्कों पर &amp;quot;एरिकिण&amp;quot; मुद्रित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वाकाटक और गुप्तशासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड वाकाटक और गुप्तशासन}}&lt;br /&gt;
*[[वाकाटक वंश]] का सर्वश्रेष्ठ राजा विन्ध्यशक्ति का पुत्र प्रवरसेन था। &lt;br /&gt;
*इसने अपने साम्राजय का विस्तार उत्तर में [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] से आगे तक किया था। &lt;br /&gt;
*उसने [[पुरिका]] नामक नगरी पर अधिकार किया था जिसे नागराज दैहित्र शिशुक ने अपने अधीन कर रखा था। [[पुरिका]] प्रवरसेन के राज्य की राजधानी भी रही है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कलचुरियों का शासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड कलचुरियों का शासन}}&lt;br /&gt;
*सन 647 से 1200 ई. के आसपास तक [[कन्नौज]] में अनेक शासक हुए थे, मुस्लिम आक्रमण भी इसी समय देश पर हुए थे। &lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड का इतिहास|बुंदेलखंड के इतिहास]] में [[कलचुरी वंश|कलचुरियों]] और [[चन्देल वंश|चन्देलों]] का प्रभाव दीर्घकाल तक रहा था। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;चन्देलों का शासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड चन्देलों का शासन}}&lt;br /&gt;
[[महोबा उत्तर प्रदेश|महोबा]] [[चन्देल वंश|चन्देलों]] का केन्द्र था। गहरवारों ने इस पर [[हर्षवर्धन]] की मृत्यु के बाद अधिकार कर लिया था। गहरवारों को पराजित करने वाले [[परिहार]] थे। चन्देलों की उत्पति विवादास्पद है। किवदन्ती के अनुसार हेमावती के पुत्र का [[चंद्र देवता|चन्द्रमा]] से उत्पन्न होना चन्देल कहलाया है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बुंदेलों का शासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड बुंदेलों का शासन}}&lt;br /&gt;
बुंदेल क्षत्रीय जाति के शासक थे तथा सुदूर अतीत में [[सूर्यवंश|सूर्यवंशी]] राजा मनु से संबन्धित हैं। [[इक्ष्वाकु]] के बाद [[राम|रामचन्द्र]] जी के पुत्र [[लव कुश|लव]] से उनके वंशजो की परंपरा आगे बढ़ाई गई है और गहरवार शाखा के [[कृर्त्तराज]] को इसी में काशी के साथ जोड़ा गया है। लव के अलावा कृर्त्तराज के उत्तराधिकारियों में [[गगनसेन]], [[कनकसेन]], [[प्रद्युम्न]] आदि के नाम ही महत्त्वपूर्ण हैं।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;ओरछा के बुंदेला&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड ओरछा के बुंदेला}}&lt;br /&gt;
[[ओरछा]] के शासकों का युगारंभ रुद्रप्रताप के साथ ही होता है। रुद्रप्रताप सिकन्दर और [[इब्राहिम लोदी]] दोनों से लड़ा था। सन 1530 में ओरछा की स्थापना हुई थी। रुद्रप्रताप बड़ा नीतिज्ञ था, उसने मैत्री संधी [[ग्वालियर]] के [[तोमर वंश|तोमर]] नरेशों से की थी। उसकी मृत्यु के बाद भारतीचन्द्र (1531ई.-1554ई.) गद्दी पर बैठा था। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;मराठों का शासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड मराठों का शासन}}&lt;br /&gt;
*बुंदेलखंड के इतिहास में मराठों का शासन बुंदेलखंड पर छत्रसाल के समय से ही प्रारंभ हो गया था। &lt;br /&gt;
*उस समय [[मराठा साम्राज्य|मराठों]] को [[ओरछा]] का शासक भी चौथ देता था। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बुंदेलखंड में राजविद्रोह&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड राजविद्रोह}}&lt;br /&gt;
*सन 1847 में महाराज [[रणजीत सिंह]] के बाद उनके पुत्र को पंजाब का राजा बनाया गया था। &lt;br /&gt;
*इसीलिए यह वर्ष अंग्रेज़ों के लिए उत्तम सिद्ध हुआ था क्योंकि [[लॉर्ड डलहौज़ी]] इस समय गवर्नर जनरल थे और उन्होंने दिलीपसिंह को अयोग्य शासक बताकर [[पंजाब]] पर कब्ज़ा जमा लिया था।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;अंग्रेज़ी राज्य में विलयन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|बुंदेलखंड अंग्रेज़ी राज्य में विलयन}}&lt;br /&gt;
छत्रसाल के समय तक बुंदेलखंड की सीमायें अत्यंत व्यापक थीं। &lt;br /&gt;
*इस प्रदेश में उत्तर प्रदेश के [[झाँसी]], [[हमीरपुर उत्तर प्रदेश|हमीरपुर]], [[जालौन]], [[बांदा]]। &lt;br /&gt;
*[[मध्यप्रदेश]] के [[सागर]], [[जबलपुर]], [[नरसिंहपुर]], [[होशंगाबाद]], [[मण्डला]]।&lt;br /&gt;
*मालवा संघ के [[शिवपुरी]], [[कटेरा]], [[पिछोर]], [[कोलारस]], [[भिण्ड]], [[लहार]] और मोण्डेर के ज़िले और परगने शामिल थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बुंदेलखंड}}&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]][[Category:मध्य प्रदेश का इतिहास]]__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A4%82%E0%A4%98%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9C&amp;diff=222983</id>
		<title>लंघनाज</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A4%82%E0%A4%98%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9C&amp;diff=222983"/>
		<updated>2011-10-03T09:37:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[भारत]] में मध्य पाषाण युग (25000 ई.पू. से 5000 ई.पू.) की सबसे प्रसिद्ध स्थली [[गुजरात]] में लंघनाज स्थित है। &lt;br /&gt;
*इस बस्ती की उत्खनिज सामग्री से मध्यपाषाण तथा प्रारम्भिक [[पाषाण काल|नवपाषाण काल]] में आदि मानव की जीवन प्रणाली पर प्रकाश पड़ता है। &lt;br /&gt;
*[[उत्खनन|उत्खननों]] ने यह दिखलाया है कि उस समय प्रयुक्त मुख्य उपकरण पत्थर के फलक और नियमित ज्यामितीय आकार के सूक्ष्माश्म थे, जिनका बाणाग्रों की तरह प्रयोग किया जाता था। &lt;br /&gt;
*पुरातत्त्वज्ञों ने लंघनाज के [[इतिहास]] को दो पृथक् कालों में विभक्त किया है। &lt;br /&gt;
*पहले काल के मृद्भाण्ड हस्तनिर्मित हैं, जबकि दूसरे काल के पूर्व-नवपाषाण कालीन मृद्भाण्ड चाक पर बनाये गये हैं और अलंकृत हैं।&lt;br /&gt;
*पहले काल में शिकार और [[मछली]] पकड़ना लोगों के मुख्य उद्यम थे, जबकि दूसरे काल की विशेषता [[कृषि]] में संक्रमण थी। &lt;br /&gt;
*लंघनाज क्षेत्र में हरिणों, [[बारहसिंगा|बारहसिंगों]], गैण्डों, जंगली सुअरों और बैलों की हड्डियाँ मिली हैं। वे सम्भवतः इनका शिकार कर उन्हें खाते थे।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गुजरात के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{गुजरात के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=बौद्ध स्तूप, [[मोहनजोदाड़ो]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन= &lt;br /&gt;
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|अन्य विवरण=मोहनजोदाड़ो, जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी। [[हड़प्पा]], मेहरगढ़ और [[लोथल]] की ही श्रृंखला में मोहनजोदाड़ो में भी पुरातत्त्व [[उत्खनन]] किया गया। यहाँ [[मिस्र]] और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=पत्थर के औज़ार [[मोहनजोदाड़ो]] &amp;lt;br /&amp;gt; Stone Tools Mohenjodaro &lt;br /&gt;
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|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
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|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
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|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
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|अन्य विवरण=[[मोहनजोदाड़ो]], जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी।  [[हड़प्पा]], मेहरगढ़ और [[लोथल]] की ही श्रृंखला में मोहनजोदाड़ो में भी पुरातत्त्व [[उत्खनन]] किया गया। यहाँ [[मिस्र]] और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
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|Share Alike=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=प्रधान अनुष्ठानकर्ता [[मोहनजोदाड़ो]] 2000 ई.पू.&amp;lt;br /&amp;gt; King Priest Mohenjo Daro 2000 B.C.&lt;br /&gt;
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|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
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|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
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|आभार=[http://www.flickr.com/photos/benny_lin/ bennylin0724's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=[[मोहनजोदाड़ो]], जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी।  [[हड़प्पा]], मेहरगढ़ और [[लोथल]] की ही श्रृंखला में मोहनजोदाड़ो में भी पुरातत्त्व [[उत्खनन]] किया गया। यहाँ [[मिस्र]] और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=नृत्यांगना [[मोहनजोदाड़ो]] 2500 ई.पू.&amp;lt;br /&amp;gt; Dancing Girl Mohenjodaro 2500 B.C.&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/benny_lin/ Benny Lin]&lt;br /&gt;
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|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/benny_lin/4557601814/ Dancing Girl]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/benny_lin/ bennylin0724's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=[[मोहनजोदाड़ो]], जिसका कि अर्थ मुर्दो का टीला है 2600 ईसा पूर्व की एक सुव्यवस्थित नगरीय सभ्यता थी।  [[हड़प्पा]], मेहरगढ़ और [[लोथल]] की ही श्रृंखला में मोहनजोदाड़ो में भी पुरातत्त्व [[उत्खनन]] किया गया। यहाँ [[मिस्र]] और मैसोपोटामिया जैसी ही प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[राबाटक लेख]] &amp;lt;br /&amp;gt;Rabatak Inscription &lt;br /&gt;
|चित्रांकन=&lt;br /&gt;
|दिनांक=वर्ष - 1993 &lt;br /&gt;
|स्रोत=wikipedia.org&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति= &lt;br /&gt;
|चित्रकार= &lt;br /&gt;
|उपलब्ध= &lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=[[अफ़ग़ानिस्तान]] के राबाटक स्थान के [[उत्खनन]] में [[1993]] में मिला था &lt;br /&gt;
|समय-काल= द्वितीय शती ईसवी&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=wikipedia.org &lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=अफ़ग़ानिस्तान के राबाटक स्थान के उत्खनन में 1993 में मिला था। इससे कनिष्क के वंशावली की जानकारी मिलती है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सुहाना</name></author>
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		<title>भारत का इतिहास (तिथि क्रम)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8_(%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A5%E0%A4%BF_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE)&amp;diff=222976"/>
		<updated>2011-10-03T09:37:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सुहाना: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{see also|भारत का इतिहास}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; width=&amp;quot;99%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+इतिहास तिथि क्रम 1947 तक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! क्रम&lt;br /&gt;
! तिथि क्रम   &lt;br /&gt;
! विवरण&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:5%&amp;quot;| 1&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:10%&amp;quot;|7000 ई.पू.&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:83%&amp;quot;|[[राजस्थान]] (साम्भर) में पौधे बोने के प्रथम साक्ष्य।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|6000 ई.पू.&lt;br /&gt;
|मेहरगढ़ ([[सिंध प्रांत|सिंध]]-[[बलूचिस्तान]] सीमा), बुर्जहोम ([[कश्मीर]]) में भारत के प्राचीनतम आवास, कृषि तथा पशुपालन के अवशेष। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|5000–4000 ई.पू.&lt;br /&gt;
|बागोर (भीलवाड़ा) तथा आदमगढ़ (होशंगाबाद) के निकट आखेटकों द्वारा भेड़-बकरी पालन के प्रथम अवशेष।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4&lt;br /&gt;
|4000–3000 ई.पू.&lt;br /&gt;
|खेतिहारों-पशुपालकों की स्थानीय सभ्यताएँ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|5&lt;br /&gt;
|2500 ई.पू.&lt;br /&gt;
|सिंधु घाटी में पूर्व-[[हड़प्पा]] सभ्यता के नगरों का विकास, अस्थि एवं प्रस्तर उपकरण तथा मनकों के आभूषण के अवशेष।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|6&lt;br /&gt;
|2500–1750 ई.पू.&lt;br /&gt;
|रेडिया-कार्बन तिथि-निर्धारण के आधार पर हड़प्पा सभ्यता का काल-विस्तार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|7&lt;br /&gt;
|2250–2000 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[हड़प्पा]] सभ्यता का पूर्ण-विकसित दौर, विघटन तथा स्थानीय सभ्यताओं का उदय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|8&lt;br /&gt;
|1500 ई.पू.&lt;br /&gt;
|भारत में आर्यों का आगमन, ऋग्वेद की रचना, वैदिक काल (1500-1000) प्रारम्भ, गंगा मैदान में आर्योत्तर ताम्र सभ्यता।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|9&lt;br /&gt;
|1000 ई.पू.&lt;br /&gt;
|आर्यों का (गंगा मैदान) विस्तार, उत्तर वैदिक काल प्रारम्भ, '[[ब्राह्मण ग्रन्थ|ब्राह्मण ग्रन्थों]]' की रचना, वर्ण-व्यवस्था का बीजारोपण, लौह धातु का प्रयोग प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|10&lt;br /&gt;
|950 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[महाभारत]] का युद्ध।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|11&lt;br /&gt;
|800 ई.पू.&lt;br /&gt;
|महर्षि [[व्यास]] के द्वारा [[महाभारत]] महाकाव्य की रचना, आर्यों का दक्षिण-पूर्व ([[पश्चिम बंगाल|बंगाल]]) की ओर विस्तार, [[रामायण]] का प्रथम वृत्तान्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|12&lt;br /&gt;
|600–550 ई.पू.&lt;br /&gt;
|उपनिषदों की रचना, आर्यों का विदर्भ तथा [[गोदावरी नदी|गोदावरी]] तक दक्षिण-विस्तार। सोलह महाजनपदों की स्थापना, आर्य सभ्यता में कर्मकाण्डीय अनुष्ठान प्रतिष्ठित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|13&lt;br /&gt;
|563–483 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[बौद्ध धर्म]] के संस्थापक [[गौतम बुद्ध]] की जीवन काल, जन्म-[[लुम्बिनी]], मृत्यु-[[कुशीनगर]]।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|14&lt;br /&gt;
|599–257 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[जैन धर्म]] के पुनर्प्रतिष्ठापक वर्द्धमान महावीर का काल (जन्म-कुन्डग्राम, [[वैशाली]]), मृत्यु-[[पावापुरी]], [[कुशीनगर]]।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|15&lt;br /&gt;
|544–492 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[गौतम बुद्ध]] के समकालिक बिम्बिसार (हर्यक वंश) का राज्यकाल, [[मगध]] राज्य की श्रेष्ठता। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|16&lt;br /&gt;
|517–509 ई.पू.&lt;br /&gt;
|हखमनी वंश ([[ईरान]]) के सम्राट डेरियस प्रथम के साथ प्रथम विदेशी आक्रमण, आर्यों की पराजय, यूनानी नौसेनापति स्काइलैक्स द्वारा [[सिन्धु नदी]] पर गवेषण अभियान। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|17&lt;br /&gt;
|492–460 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[बिम्बिसार]] के पुत्र [[अजातशत्रु]] का राज्यकाल। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|18&lt;br /&gt;
|412–344 ई.पू.&lt;br /&gt;
|शिशुनाग वंश का शासनकाल, अवन्ति के प्रद्यौत वंश का [[मगध]] साम्राज्य में विलय। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|19&lt;br /&gt;
|400 ई.पू.&lt;br /&gt;
|सम्पूर्ण दक्षिण भारत में आर्यों का प्रभुत्व एवं सम्भवतः [[श्रीलंका]] तक विस्तार। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|20&lt;br /&gt;
|344 ई.पू.&lt;br /&gt;
|महापद्मनन्द द्वारा [[मगध]] में [[नंदवंश]] की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|21&lt;br /&gt;
|326 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[नंदवंश|नंद वंशी]] राजा [[घनानंद]] की सैन्य शक्ति से प्रभावित होकर [[सिकन्दर]] के सैनिकों का वापस लौटने का इरादा, वापसी मार्ग में बेबीलोन में सिकन्दर की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|22 &lt;br /&gt;
|322 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[चंद्रगुप्त मौर्य]] द्वारा (कौटिल्य की मदद से) नंद शासक [[घनानंद]] को पराजित कर [[मौर्य वंश]] की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|23&lt;br /&gt;
|315 ई.पू.&lt;br /&gt;
|इण्डिका के लेखक तथा [[सेल्युकस]] (यूनानी शासक) के दूत [[मेगस्थनीज]] का भारत में आगमन। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|24&lt;br /&gt;
|298–273 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[चन्द्रगुप्त मौर्य]] के पुत्र [[बिन्दुसार]] का राज्य काल। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|25&lt;br /&gt;
|273–232 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[अशोक]] का शासनकाल, [[मौर्यवंश]] का स्वर्णयुग, अशोक के द्वारा [[कलिंग]] विजय (262-61)। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|26&lt;br /&gt;
|185 ई.पू.&lt;br /&gt;
|अन्तिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या कर मौर्य सेनापति [[पुष्यमित्र शुंग]] द्वारा [[शुंग वंश]] की स्थापना। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|27&lt;br /&gt;
|190–171 ई.पू.&lt;br /&gt;
|यवन शासक डेमेट्रियस का राज्यकाल। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|28&lt;br /&gt;
|165 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[कलिंग]] शासक खारवेल द्वारा 'त्रमिरदेश संघटम' (पाण्ड्य, चोल) राज्य पर विजय। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|29&lt;br /&gt;
|155–130 ई.पू.&lt;br /&gt;
|सबसे प्रसिद्ध यवन शासक मिनान्डर (मिलिन्द) का राज्यकाल। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|30&lt;br /&gt;
|145 ई.पू.&lt;br /&gt;
|चोल राजा एलारा की [[श्रीलंका]] के शासक असेल पर विजय तथा लगभग 50 वर्षों तक शासन। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|31&lt;br /&gt;
|128 ई.पू.&lt;br /&gt;
|यूची आक्रमण के भय से शक क़बीलों का भारत में पंजाब से प्रवेश। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|32&lt;br /&gt;
|71 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[शुंग वंश]] के अन्तिम सम्राट देवभूति की हत्या, [[वसुदेव]] के द्वारा कण्व वंश की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|33&lt;br /&gt;
|60 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[आंध्र प्रदेश|आन्ध्र]] में सिमुक द्वारा [[सातवाहन वंश]] की स्थापना। &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|34&lt;br /&gt;
|58 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[उज्जैन]] के शासक विक्रमादित्य द्वारा विक्रम संवत् का प्रारम्भ। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|35&lt;br /&gt;
|50 ई.पू. &lt;br /&gt;
|'''दक्षिण भारत''' (दक्कन) में [[सातवाहन वंश]] शुरू।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|36&lt;br /&gt;
|22 ई.पू.&lt;br /&gt;
|[[रोम]] के शासक आगस्टस के दरबार में पाण्ड्य राजदूत पहुँचा, चोल, पाण्ड्यों का रोम में व्यापारिक सम्बन्ध। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|37&lt;br /&gt;
|14–13 ई.&lt;br /&gt;
|[[शक]] (हिन्द-पार्थियन) शासक गोंडोफर्नीज का शासन, ईसाई धर्म प्रचार हेतु रोमन संत सेंट टामस का भारत में आगमन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|38&lt;br /&gt;
|15 ई.&lt;br /&gt;
| [[कुषाण|कुषाणों]] (यू-ची का तोचारियन) का भारत में प्रवेश।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|39&lt;br /&gt;
|64 ई. &lt;br /&gt;
|उत्तर-पश्चिमी भारत में [[शक]] विम कडफिसस का राज्य।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|40&lt;br /&gt;
|78 ई.&lt;br /&gt;
|[[कुषाण वंश]] के महानतम शासक [[कनिष्क]] का राज्यारोहण, उसके द्वारा [[शक संवत]] का प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|41&lt;br /&gt;
|78–101 ई.&lt;br /&gt;
|[[कनिष्क]] का शासनकाल, चौथी [[बौद्ध]] संगति का ([[कश्मीर]] में) आयोजन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|42&lt;br /&gt;
|100 ई.&lt;br /&gt;
|[[अश्वघोष]] द्वारा 'सौन्दरानन्द' तथा '[[बुद्धचरित]]' एवं 'कुमारलाट' के द्वारा 'कल्पमंदितिका' की रचना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|43&lt;br /&gt;
|100–200 ई.&lt;br /&gt;
|संगम युग, करिकाल का शासन (त्रिचरापल्लि के निकट [[कावेरी नदी]] पर सिंचाई बाँध का निर्माण)। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|44&lt;br /&gt;
|109–132 ई.&lt;br /&gt;
|महानतम सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी द्वारा राज्य विस्तार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|45&lt;br /&gt;
|150 ई.&lt;br /&gt;
|बघेलखण्ड, [[वाराणसी]] तथा आगे चलकर [[मथुरा]] तक के क्षेत्र में भारशिव नागाओं की विभिन्न शाखाओं का राज्य।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|46&lt;br /&gt;
|200–250 ई.&lt;br /&gt;
| सातवाहनों का पतन, [[महाराष्ट्र]] में आभीर, उत्तरी कनारा तथा मैसूर ज़िलों में कुन्तल और कटु, [[आन्ध्र प्रदेश|आन्ध्र]] में [[इक्ष्वाकु]] तथा [[विदर्भ]] में वाकाटकों की सत्ता स्थापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|47&lt;br /&gt;
|300–888 ई.&lt;br /&gt;
|[[कांची]] में पल्लवों का शासनकाल। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|48&lt;br /&gt;
|225 ई.&lt;br /&gt;
|विंध्यशक्ति द्वारा वाकाटक शासन की स्थापना, अगले 272 वर्षों तक इस वंश का शासन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|49&lt;br /&gt;
|250 ई.&lt;br /&gt;
|[[नासिक]] में आभीरों द्वारा त्रैकुटकर वंश की स्थापना, अगले 250 वर्षों तक इस वंश का शान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|50&lt;br /&gt;
|320–335 ई.&lt;br /&gt;
|चन्द्रगुप्त प्रथम ने [[गुप्त वंश]] को स्थापित किया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|51&lt;br /&gt;
|325 ई. &lt;br /&gt;
|कृष्णा नदी के दक्षिण में पल्लव वंशी राज्य की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|52 &lt;br /&gt;
|335–376 ई. &lt;br /&gt;
|समुद्र गुप्त का शासनकाल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|53&lt;br /&gt;
|330–375 ई. &lt;br /&gt;
|सम्पूर्ण उत्तर भारत में [[समुद्रगुप्त]] का शासन। पूर्व में [[असम]], पश्चिम में [[काबुल]], उत्तर में [[नेपाल]] तथा दक्षिण में पल्लवों तक, केवल [[उज्जैन]] स्वतंत्र (शक वंश के अधीन)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|54&lt;br /&gt;
|350 ई. &lt;br /&gt;
|मयूरशर्मन द्वारा कदम्ब वंश की स्थापना जो अगले 200 वर्षों तक विद्यमान रहा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|55 &lt;br /&gt;
|375–413 ई.&lt;br /&gt;
|चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य द्वारा [[उज्जैन]], [[मालवा]] तथा [[गुजरात]] पर विजय, राजधानी [[पाटलिपुत्र]] से [[अयोध्या]] और तत्पश्चात कौशाम्बी स्थानान्तरित, चीनी यात्री [[फ़ाह्यान]] का [[भारत]] आगमन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|56&lt;br /&gt;
|415–454 ई.&lt;br /&gt;
|कुमारगुप्त प्रथम का शासनकाल, [[नालन्दा]] में बौद्ध विहार तथा विश्वविद्यालय की स्थापना,हुणों के आक्रमण का ख़तरा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|57&lt;br /&gt;
|455–467 ई.&lt;br /&gt;
|स्कन्दगुप्त का शासनकाल, हूणों का भारत पर प्रथम आक्रमण तथा उनकी पराजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|58&lt;br /&gt;
|477–496 ई.&lt;br /&gt;
|बुद्धगुप्त-[[गुप्तवंश]] का अन्तिम सम्राट, गुप्तवंश का विघटन प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|59&lt;br /&gt;
|490–766 ई.&lt;br /&gt;
|सौराष्ट्र के बल्लभी क्षेत्र में मैत्रक (सम्भवतः विदेशी मूल) आक्रामकों का शासन। (पश्चिम भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|60&lt;br /&gt;
|500–502 ई.&lt;br /&gt;
|हूणों के प्रथम शासक तोरमण द्वारा भारत में राज्य स्थापना तथा मध्यवर्ती भाग (मालवा में एरण) तक उसका विस्तार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|61&lt;br /&gt;
|500–757 ई.&lt;br /&gt;
|पश्चिम तथा मध्य दक्कन में [[वातापी कर्नाटक|वातापी]] का प्रथम [[चालुक्य वंश]]। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|62&lt;br /&gt;
|502–528 ई.&lt;br /&gt;
|तोरमण का उत्तराधिकारी मिहिरकुल भारत में गुप्त शासक भानुगुप्त द्वारा पराजित, एरन पर गुप्तवंश का पुनः अधिकार, (510)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|63&lt;br /&gt;
|533 ई.&lt;br /&gt;
|[[मंदसौर]] के यशोधर्मन की मिहिरकुल पर विजय।&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|64&lt;br /&gt;
|540 ई.&lt;br /&gt;
|परवर्ती गुप्त तथा गुप्त वंश की मुख्य शाखा का अन्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|65&lt;br /&gt;
|550–861 ई.&lt;br /&gt;
|मध्य राजपूताना में मध्य एशिया में आये हुए गुर्जर खानाबदोश दलों का शासन स्थापित। (पश्चिम भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|66&lt;br /&gt;
|600–1200 ई.&lt;br /&gt;
|[[मौखरि वंश]] के शासक यशोवर्मन की मृत्यु (752), उत्तर, मध्य, पश्चिम तथा दक्षिण भारत में अनेक सामंतों के द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा, अनेक छोटे-बड़े राज्यों का उदय, बंगाल में गौड़, खंग, वर्मन, [[पाल वंश|पाल]] तथा सेन वंश, [[उज्जैन]] में गुर्जर-प्रतिहार, [[कन्नौज]] में प्रतिहार, [[उड़ीसा]] में भौम, भंज, सोम तथा पूर्वी [[गंग वंश]], [[असम]] में भास्कर वर्मा, [[गुजरात]] में [[चालुक्य वंश|चालुक्य]], धारा में परमार, नर्मदा-त्रिपुरी तथा उत्तर प्रदेश में कलचुरी, [[राजस्थान]] में चाहमान (चौहान), [[बुंदेलखण्ड]] में चंदेल, [[कन्नौज]] में गहड़वाल, [[कश्मीर]] में कार्कोट, उत्पल तथा लोहार, [[अफ़ग़ानिस्तान]]- [[पंजाब]] में हिन्दूशाही वंश।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|67&lt;br /&gt;
|606–647 ई.&lt;br /&gt;
|हर्ष (पुष्यभुति या कान्यकुब्ज वंश) का शासनकाल। चीनी बौद्ध यात्री [[ह्वेन त्सांग]] का भारत आगमन (630-44), [[बाणभट्ट]] ने 'हर्षचरित' की रचना की।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|68&lt;br /&gt;
|630–970 ई. &lt;br /&gt;
|पूर्वी दक्कन में वेंगी के पूर्वी चालुक्यों का शासनकाल। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|69&lt;br /&gt;
|636–637 ई.&lt;br /&gt;
|ख़लीफ़ा उमर के समय में अरबों का भारत पर पहला अभिलिखित हमला। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|70&lt;br /&gt;
|643 ई.&lt;br /&gt;
|चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग|ह्वेनसांग]] की [[चीन]] वापसी। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|71&lt;br /&gt;
|647 ई.&lt;br /&gt;
|[[तिब्बत]] से [[कन्नौज]] आते हुए ह्वेनसांग पर किसी स्थानीय सामंत के द्वारा हमला। [[हर्षवर्धन]] की मृत्यु, [[ह्वेन त्सांग|ह्वेनसांग]] पर हमला। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|72&lt;br /&gt;
|674 ई.&lt;br /&gt;
|विक्रमादित्य प्रथम चालुक्य और परमेश्वर वर्मा प्रथम पल्लव शासक बने। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|73&lt;br /&gt;
|675–685 ई.&lt;br /&gt;
|तीसरे चीन यात्री इत्सिंग का [[नालन्दा]] आवास। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|74&lt;br /&gt;
|700 ई.&lt;br /&gt;
|[[कन्नौज]] में यशोवर्मन (मौखरी वंश) सिंहासनारूढ़, संस्कृत नाट्यकार भवभूति तथा प्राकृत कवि वाक्पतिराज को उसके राजदरबार में संरक्षण। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|75&lt;br /&gt;
|700–900 ई.&lt;br /&gt;
|दक्षिण भारत में [[आलवार|आलवारों]] ([[वैष्णव]]) का भक्ति आंदोलन, भक्ति संग्रह 'प्रबंधम्' की रचना। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|76&lt;br /&gt;
|712 ई.&lt;br /&gt;
|मुहम्मद बिन क़ासिम के नेतृत्व में भारत पर प्रथम अरब आक्रमण, मैत्रक राज्य का पतन। (पश्चिम भारत), मुहम्मद बिन क़ासिम का सिन्ध पर आक्रमण, देवलगढ़ विजय, निरुन की लड़ाई में हिन्दू राजा [[दाहिर]] की मृत्यु, क़ासिम की ब्राह्मणाबाद पर विजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|77&lt;br /&gt;
|730 ई.&lt;br /&gt;
|[[कन्नौज]] में मौखरी शासक यशोवर्मन सिंहासनरुढ़।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|78&lt;br /&gt;
|753–774 ई.&lt;br /&gt;
|ख़लीफ़ा मंसूर के काल में [[ब्रह्मगुप्त]] के 'ब्रह्म सिद्धान्त' तथा 'खण्डनखाड्य' का अल्फ़जारी द्वारा [[अरबी भाषा|अरबी]] में अनुवाद।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|79&lt;br /&gt;
|757–973 ई.&lt;br /&gt;
|मान्यखेत में राष्ट्रकूटों का शासनकाल। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|80&lt;br /&gt;
|740–1036 ई.&lt;br /&gt;
|उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहारों का आधिपत्य, अरबों का प्रतिरोध। (उत्तरी भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|81&lt;br /&gt;
|746–974 ई.&lt;br /&gt;
|छाप या छापौटकट्ट, गुर्जर क़बीले द्वारा 746 के आसपास अन्हिलपुर (आनन्दपुर) की स्थापना, जो 15वीं शती तक पश्चिम भारत का प्रमुख नगर रहा। (पश्चिम भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|82&lt;br /&gt;
|786–808 ई.&lt;br /&gt;
|ईरानी शासक ख़लीफ़ा हारून-अल-रशीद का शासनकाल, बरमस्क (एक मन्त्री) द्वारा भारत के अनेक वैद्यों, ज्योतिषियों, रसायनशास्त्रियों, विचारकों को बग़दाद बुलाकर उनसे इन विषयों के अनेक ग्रन्थों का [[अरबी भाषा|अरबी]] में अनुवाद करवाया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|83&lt;br /&gt;
|824–924 ई.&lt;br /&gt;
|[[वैष्णव]] भक्तिकाल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|84&lt;br /&gt;
|831–1310 ई.&lt;br /&gt;
|चन्देलों द्वारा [[बुंदेलखण्ड]] में स्वतंत्र राज्य की स्थापना, अनेक [[विष्णु]] मन्दिरों और खजुराहों के मन्दिरों का भी निर्माण। (पश्चिम भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|85&lt;br /&gt;
|840–890 ई.&lt;br /&gt;
|[[सतलुज नदी|सतलुज]] से [[नर्मदा नदी]] तक मिहिरभोज या भोज का शासन। (पश्चिम भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|86&lt;br /&gt;
|950–1200 ई.&lt;br /&gt;
|इंदौर के पास धारा में परमारों का राज्य, जिनमें मुंज (974-994) तथा भोज प्रसिद्ध राजा हुए, भोज ज्योतिष, काव्यशास्त्र, वास्तुकला तथा संस्कृति का विद्वान था। (पश्चिम भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|87&lt;br /&gt;
|973–1189 ई.&lt;br /&gt;
|[[कल्याणी कर्नाटक|कल्याणी]] का द्वितीय [[चालुक्य वंश]]। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|88&lt;br /&gt;
|974–1240 ई.&lt;br /&gt;
|चालुक्यों का अन्हिलपुर, सौराष्ट्र तथा [[माउंट आबू|आबू]] क्षेत्र में प्रभुत्व, चालुक्य शासक मूलराज का शासन काल (974-995)। (पश्चिम भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|89&lt;br /&gt;
|985–1014 ई.&lt;br /&gt;
|चोल शासक राजराज का शासनकाल, भूमि-सर्वेक्षण का प्रारम्भ (1000 ई.)। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|90&lt;br /&gt;
|986–87 ई.&lt;br /&gt;
|खुरासनी शासक अलप्तगीन के ग़ुलाम सुबुक्तगीन का [[काबुल]]-कंधार में हिन्दूशाही शासक जयपाल पर प्रथम आक्रमण, जयपाल पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|91&lt;br /&gt;
|997–998 ई.&lt;br /&gt;
|सुबुक्गीन की मृत्यु, [[महमूद गजनवी]] खुरासन की गद्दी पर बैठा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|92&lt;br /&gt;
|999 ई.&lt;br /&gt;
|बग़दाद के ख़लीफ़ा द्वारा [[महमूद गजनवी]] को स्वतुत्र शासक के रूप में मान्यता।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|93&lt;br /&gt;
|1000 ई.&lt;br /&gt;
|[[महमूद गजनवी]] का भारत पर ([[काबुल]] में) प्रथम आक्रमण, स्थानीय जनता पर लूट तथा धर्म परिवर्तन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|94&lt;br /&gt;
|1002 ई.&lt;br /&gt;
|[[महमूद गजनवी]] का तीसरा आक्रमण, [[आनन्दपाल]] से युद्ध तथा उसकी पराजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|95&lt;br /&gt;
|1010 ई.&lt;br /&gt;
|आनन्दपाल अपमानजनक शर्तों पर [[महमूद गजनवी]] का सामंत बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|96&lt;br /&gt;
|1011–1012 ई.&lt;br /&gt;
|महमूद का थानेश्वर पर हमला, उत्तर-पश्चिम भारत में हिन्दूशाही के छोटे-बड़े सभी राज्य ध्वस्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|97&lt;br /&gt;
|1013 ई.&lt;br /&gt;
|आनन्दपाल की मृत्यु, पुत्र त्रिलोचनपाल उत्तराधिकारी बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|98&lt;br /&gt;
|1014 ई.&lt;br /&gt;
|तोषी की लड़ाई में त्रिलोचनपाल परास्त, झेलम तक का क्षेत्र गजनवी के राज्य में सम्मिलित। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|99&lt;br /&gt;
|1014–1044 ई.&lt;br /&gt;
|चोल राजा राजेन्द्र का शासनकाल, [[श्रीलंका]] की विजय (1018), बंगाल पर आक्रमण (1021)। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|100&lt;br /&gt;
|1017 ई.&lt;br /&gt;
|[[शंकराचार्य]] के मायावाद का खंडन कर विशिष्टाद्वैतवाद मत की स्थापना करने वाले [[वैष्णव]] आचार्य [[रामानुज]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|101&lt;br /&gt;
|1018–1019 ई.&lt;br /&gt;
|गजनवी का [[गंगा नदी]]-[[यमुना नदी|यमुना]] दौआब क्षेत्र पर क़ब्ज़ा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|102&lt;br /&gt;
|1025–1026 ई.&lt;br /&gt;
|गजनवी के द्वारा सोमनाथ मन्दिर (गुजरात) की लूट।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|103&lt;br /&gt;
|1026 ई.&lt;br /&gt;
|अन्तिम हिन्दूशाही शासक भीमपाल की मृत्यु, [[काबुल]]-कंधार के हिन्दूशाही वंश का अन्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|104&lt;br /&gt;
|1027 ई.&lt;br /&gt;
|[[जाट|जाटों]] को कुचलने के लिए महमूद का भारत ([[गुजरात]]-सिंन्ध) पर 17वाँ व अन्तिम आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|105&lt;br /&gt;
|1030 ई.&lt;br /&gt;
|[[महमूद गजनवी]] की मृत्यु, मसूद गजनी का सुल्तान, किताब-उल-हिन्द के लेखक अलबरूनी का भारत आगमन। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|106&lt;br /&gt;
|1043 ई.&lt;br /&gt;
|स्थानीय हिन्दू राजाओं का [[लाहौर]] पर पुनः अधिकार कर स्वाधीन राज्य स्थापित करने का प्रयास विफल। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|107&lt;br /&gt;
|1044–52 ई.&lt;br /&gt;
|राजेन्द्र के उत्तराधिकारी राजाधिराज प्रथम का शासनकाल। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|108&lt;br /&gt;
|1052–64 ई.&lt;br /&gt;
|राजेन्द्र द्वितीय का शासनकाल। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|109&lt;br /&gt;
|1064–70 ई.&lt;br /&gt;
|वीर राजेन्द्र चोल का शासनकाल। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|110&lt;br /&gt;
|1070–1120 ई.&lt;br /&gt;
|कुलोत्तुंग प्रथम का शासनकाल, [[आन्ध्र प्रदेश|आन्ध्र]] का चोल राज्य में विलेय (1076)। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|111&lt;br /&gt;
|1120–1267 ई.&lt;br /&gt;
|परवर्ती चोल शासकों का काल। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|112&lt;br /&gt;
|1131 ई.&lt;br /&gt;
|[[कर्नाटक]] में लिंगायत सम्प्रदाय के संस्थापक संत बासवेश्वर या बासव का जन्म। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|113&lt;br /&gt;
|1137 ई.&lt;br /&gt;
|विशिष्टाद्वैतवाद मत के विचारक संत [[रामानुजाचार्य]] का देहान्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|114&lt;br /&gt;
|1162 ई.&lt;br /&gt;
|द्वैतवादी वैष्णव संत निम्वार्क स्वामी का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|115&lt;br /&gt;
|1163 ई.&lt;br /&gt;
|मुइजुद्दीन [[मोहम्मद गौरी]] गजनी का शासन बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|116&lt;br /&gt;
|1167 ई.&lt;br /&gt;
|संत बाससेश्वर का निधन।&lt;br /&gt;
|-  &lt;br /&gt;
|117&lt;br /&gt;
|1191 ई.&lt;br /&gt;
|तराईन के प्रथम युद्ध में राजपूत शासक [[पृथ्वीराज चौहान|पृथ्वीराज तृतीय]] के हाथों मुहम्मद गोरी पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|118&lt;br /&gt;
|1192 ई.&lt;br /&gt;
|तराईन का दूसरा युद्ध, [[मोहम्मद गौरी]] के हाथों [[पृथ्वीराज चौहान|पृथ्वीराज तृतीय]] की हार, गौरी का ग़ुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक भारत का सूबेदार नियुक्त, [[मेरठ]] एवं कौल ([[अलीगढ़]]) पर अधिकार। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|119&lt;br /&gt;
|1192–1193 ई.&lt;br /&gt;
|[[दिल्ली]] पर कुतुबुद्दीन ऐबक का आधिपत्य।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|120&lt;br /&gt;
|1197 ई.&lt;br /&gt;
|द्वैतवादी सम्प्रदाय के आचार्य महादेव मध्वाचार्य का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|121&lt;br /&gt;
|1200 ई.&lt;br /&gt;
|[[मोहम्मद गौरी]] की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|122&lt;br /&gt;
|1206 ई.&lt;br /&gt;
|कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा 'दिल्ली सल्तनत' की स्थापना; दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाले प्रथम वंश- 'इल्बरी वंश' की स्थापना; क़ुतुबमीनार का निर्माण आरम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|123&lt;br /&gt;
|1210 ई.&lt;br /&gt;
|ऐबक की मृत्यु, आरामशाह उत्तराधिकारी बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|124&lt;br /&gt;
|1211–1236 ई.&lt;br /&gt;
|[[इल्तुतमिश]] का शासनकाल, [[रणथम्भौर]] विजय (1226)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|125&lt;br /&gt;
|1221 ई.&lt;br /&gt;
|भारत पर [[चंगेज़ ख़ाँ]] का हमला।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|126&lt;br /&gt;
|1228 ई. &lt;br /&gt;
|बग़दाद के ख़लीफ़ा से इल्तुतमिश को खिल्लत अर्थात् इस्लामी शासक के रूप में मान्यता।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|127&lt;br /&gt;
|1229 ई.&lt;br /&gt;
|प्रथम यूरोपीय यात्री मान्टे कैर्बनो (इटली) का भारत आगमन। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|128&lt;br /&gt;
|1236 ई.&lt;br /&gt;
|[[इल्तुतमिश]] के उत्तराधिकारी रूकनुद्दीन फ़िरोज की मृत्यु, रजिया सुल्तान गद्दी पर बैठी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|129&lt;br /&gt;
|1239 ई.&lt;br /&gt;
|मलिक अल्तुनिया का विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|130&lt;br /&gt;
|1240 ई.&lt;br /&gt;
|रजिया सुल्तान की हत्या।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|131&lt;br /&gt;
|1241 ई.&lt;br /&gt;
|भारत पर मंगोलों का प्रथम आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|132&lt;br /&gt;
|1246 ई.&lt;br /&gt;
|सुल्तान नसीरुद्दीन गद्दी पर आसीन, 1265 में उसकी मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|133&lt;br /&gt;
|1253 ई. &lt;br /&gt;
|[[अमीर ख़ुसरो]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|134&lt;br /&gt;
|1266 ई.&lt;br /&gt;
|ग़यासुद्दीन बलबल गद्दी पर बैठा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|135&lt;br /&gt;
|1279 ई.&lt;br /&gt;
|[[महाराष्ट्र]] में संत सम्मेलन का आयोजन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|136&lt;br /&gt;
|1279 ई.&lt;br /&gt;
|बंगाल में तुगरिल ख़ाँ का विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|137&lt;br /&gt;
|1286 ई.&lt;br /&gt;
|बलबन की मृत्यु। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|138&lt;br /&gt;
|1288–1293 ई.&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध वेनिश यात्री मार्कोपोलो की भारत यात्रा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|139&lt;br /&gt;
|1290 ई.&lt;br /&gt;
|[[जलालुद्दीन ख़िलजी]] [[दिल्ली]] का सुल्तान, [[ख़िलजी वंश]] की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|140&lt;br /&gt;
|1294 ई.&lt;br /&gt;
|[[अलाउद्दीन ख़िलजी]] का देवगिरि अभियान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|141&lt;br /&gt;
|1295–1316 ई.&lt;br /&gt;
|[[अलाउद्दीन ख़िलजी]] [[दिल्ली]] का सुल्तान, राज्य-विस्तार अभियान प्रारम्भ; [[गुजरात]] (1299), रणथम्भौर (1301), [[चित्तौड़]] (1303), [[मालवा]] (1305), मलिक काफ़ूर क नेतृत्व में दक्कन अभियान, 1320-1325-अलाउद्दीन की मृत्यु &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|142 &lt;br /&gt;
|1320–1325 ई.&lt;br /&gt;
|ग़यासुद्दीन तुग़लक़ (गाज़ी मलिक) [[दिल्ली]] का सुल्तान बना, [[तुग़लक़ वंश]] की स्थापना, काकतीय तथा [[पाण्डव|पाण्ड्यों]] के राज्य का दिल्ली सल्तनत में विलय (1321-1323)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|143&lt;br /&gt;
|1325 ई. &lt;br /&gt;
|ग़यासुद्दीन की मृत्यु, [[मुहम्मद बिन तुग़लक़]] गद्दी पर आसीन, [[अमीर ख़ुसरो]] की मृत्यु, फैंसिस्कन पादरी आडोरिक आफ़ पोर्डेनॉन की भारत यात्रा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|144&lt;br /&gt;
|1326–1327 ई.&lt;br /&gt;
|[[मुहम्मद तुग़लक़]] द्वारा [[दिल्ली]] से [[दौलताबाद]] राजधानी का स्थानान्तरण। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|145&lt;br /&gt;
|1330 ई.&lt;br /&gt;
|[[मुहम्मद तुग़लक़]] द्वारा प्रयोग के तौर पर सोने के स्थान पर ताँबे के सिक्के जारी किए गए।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|146&lt;br /&gt;
|1333 ई.&lt;br /&gt;
|अफ़्रीकी यात्री इब्नबबूता की भारत यात्रा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|147&lt;br /&gt;
|1336 ई. &lt;br /&gt;
|हरिहर एवं बुक्का द्वारा विजयनगर राज्य की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|148&lt;br /&gt;
|1342&lt;br /&gt;
|इब्नबबूता का [[चीन]] को प्रस्थान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|149&lt;br /&gt;
|1347 ई.  &lt;br /&gt;
|बहमनशाह के द्वारा [[बहमनी राज्य]] की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|150&lt;br /&gt;
|1350 ई.&lt;br /&gt;
|विद्यापति का जन्म, संत नामदेव का निधन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|151&lt;br /&gt;
|1351 ई.&lt;br /&gt;
|[[मुहम्मद तुग़लक़]] की मृत्यु, [[फ़िरोज़ शाह तुग़लक]] उत्तराधिकारी बना।&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|152&lt;br /&gt;
|1351–1388 ई.&lt;br /&gt;
|सुल्तान [[फ़िरोज़ शाह तुग़लक]] का राज्यकाल, बंगाल अभियान (1353-54, 1359, 1369), कांगड़ा विजय (1360-61), [[थट्टा]] विजय (1371-72), फ़िरोज की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|153&lt;br /&gt;
|1388–1414 ई.&lt;br /&gt;
|परवर्ती तुग़लक़ शासकों का शासनकाल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|154&lt;br /&gt;
|1398 ई.&lt;br /&gt;
|[[तैमूर लंग]] का भारत पर आक्रमण, [[दिल्ली]] पर अधिकार, भारत में अराजकता।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|155&lt;br /&gt;
|1399 ई.&lt;br /&gt;
|दिल्ली सल्तनत का विघटन प्रारम्भ, सूबेदारों द्वारा स्वतंत्र राज्यों की स्थापना, दिल्ली-दोआब में इक़बाल ख़ाँ, [[गुजरात]] में जफ़र ख़ाँ, सिंध-मुल्तान में ख़िज़्र ख़ाँ, महोबा-काल्पी में महमूद ख़ाँ, [[कन्नौज]] अथवा [[बिहार]] में ख्वाजा जान, धारा ([[इन्दौर]]) में दिलावर ख़ाँ, समन में ग़ालिब ख़ाँ, बयाना में शख़्स ख़ाँ तथा [[ग्वालियर]] में भीमदेव द्वारा स्वतंत्र राज्य स्थापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|156&lt;br /&gt;
|1411–42 ई.&lt;br /&gt;
|अहमदशाह द्वारा [[अहमदाबाद]] की स्थापना एवं स्वतंत्रता की घोषणा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|157&lt;br /&gt;
|1412 ई.&lt;br /&gt;
|अन्तिम तुग़लक़ शासक [[महमूद तुग़लक|महमूद]] की मृत्यु, तुग़लक़ वंश का पतन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|158&lt;br /&gt;
|1414 ई.&lt;br /&gt;
|[[दिल्ली]] पर ख़िज़्र खाँ का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|159&lt;br /&gt;
|1420–1421 ई.&lt;br /&gt;
|[[इटली]] के यात्री निकोलो कोंटी की भारत यात्रा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|160&lt;br /&gt;
|1429 ई.&lt;br /&gt;
|[[बहमनी राज्य]] की राजधानी गुलबर्गा से [[बीदर]] स्थानान्तरित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|161&lt;br /&gt;
|1430–69 ई.&lt;br /&gt;
|मेंवाड़ में राणा कुम्भा का राज्यकाल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|162&lt;br /&gt;
|1442 ई.&lt;br /&gt;
|अब्दुर्रज्जाक़ की [[विजय नगर साम्राज्य|विजयनगर]] यात्रा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|163&lt;br /&gt;
|1447 ई.&lt;br /&gt;
|[[बहलोल लोदी]] का [[दिल्ली]] पर अधिकार, लोदी वंश की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|164&lt;br /&gt;
|1450 ई. &lt;br /&gt;
|गोरखनाथ की साखियों की रचना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|165&lt;br /&gt;
|1455 ई.&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध संत [[कबीर]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|166&lt;br /&gt;
|1469 ई.&lt;br /&gt;
|सिक्ख धर्म के संस्थापक [[नानक देव, गुरु|गुरुनानक देव]] का ननकाना ([[पंजाब]]) में जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|167&lt;br /&gt;
|1470 ई. &lt;br /&gt;
|रूसी यात्री निकितिन की भारत यात्रा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|168&lt;br /&gt;
|1472 ई.&lt;br /&gt;
|[[शेरशाह सूरी]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|169&lt;br /&gt;
|1479 ई.&lt;br /&gt;
|[[बल्लभाचार्य]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|170&lt;br /&gt;
|1483 ई.&lt;br /&gt;
|[[जहीरूद्दीन बाबर]] का फरगना में जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|171&lt;br /&gt;
|1485 ई. &lt;br /&gt;
|[[चैतन्य महाप्रभु]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|172&lt;br /&gt;
|1486 ई.&lt;br /&gt;
|पुर्तग़ाली नाविक सरदार बार्थोलोम्यो डिआज डेनोवेज ने केप आफ़ गुड होप (शुभ यात्रा अंतरीप) की खोज की, इसी मार्ग से बाद में वास्कोडिगामा ने भारत की यात्रा की।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|173&lt;br /&gt;
|1489 ई.&lt;br /&gt;
|सिकन्दर लोदी गद्दी पर आसीन, [[बीजापुर]] स्वाधीन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|174&lt;br /&gt;
|1490 ई.&lt;br /&gt;
|[[दिल्ली सल्तनत]] से [[अहमदनगर]] स्वाधीन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|175&lt;br /&gt;
|1494 ई.&lt;br /&gt;
|[[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] में हुसैनशाह गद्दी पर आसीन, [[बाबर]] फरगना का अमीर बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|176&lt;br /&gt;
|1498 ई.&lt;br /&gt;
|पुर्तग़ाली नाविक [[वास्कोडिगामा]] भारत में, कालीकट पहुँचा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|177&lt;br /&gt;
|1502 ई.&lt;br /&gt;
|पुर्तग़ाल के राजा जॉन द्वितीय को पोप अलेक्जेंडर षष्टम का 'बुल' प्रदान किया गया, जिससे पुर्तग़ालियों को भारत के साथ व्यापार करने का एकाधिकार तथा भारत में राज्य स्थापित करने का औपचारिक अधिकार मिला। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|178&lt;br /&gt;
|1503 ई. &lt;br /&gt;
|फरगना [[बाबर]] के अधिकार से मुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|179&lt;br /&gt;
|1504 ई.&lt;br /&gt;
|[[इटली]] के लुडोविको डी बार्थेमा की पश्चिम तथा दक्षिण भारत की यात्रा, काबुल पर अधिकार कर [[बाबर]] का मुल्तान की ओर प्रस्थान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|180&lt;br /&gt;
|1507 ई.&lt;br /&gt;
|[[गुजरात]] के शासक महमूद बेगड़ा का दीव ([[गोवा]]) में पुर्तग़ालियों के विरुद्ध अभियान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|181&lt;br /&gt;
|1508 ई.&lt;br /&gt;
|द्वितीय [[मुग़ल]] सम्राट [[हुमायूँ]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|182&lt;br /&gt;
|1509 ई.&lt;br /&gt;
|[[विजय नगर साम्राज्य|विजयनगर]] में कृष्णदेवराय सिंहासनरूढ़, पुर्तग़ाली गवर्नर [[फ़्रांसिस्को-द-अल्मेडा]] भारत आया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|183&lt;br /&gt;
|1509–1527 ई.&lt;br /&gt;
|[[मेवाड़]] में राणा सांगा का राज्यकाल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|184&lt;br /&gt;
|1510 ई.&lt;br /&gt;
|[[गोवा]] पर पुर्तग़ालियों का अधिकार, अलबुकर्क गवर्नर बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|185&lt;br /&gt;
|1512–1518 ई.&lt;br /&gt;
|[[गोलकुण्डा]] [[बहमनी राज्य]] से मुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|186&lt;br /&gt;
|1517 ई.&lt;br /&gt;
|सिकन्दर लोदी की मृत्यु के पश्चात् इब्राहिम लोदी गद्दी पर बैठा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|187&lt;br /&gt;
|1519 ई.&lt;br /&gt;
|[[बाबर]] का भारत आगमन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|188&lt;br /&gt;
|1520 ई.&lt;br /&gt;
|[[बाबर]] का भीरा, सियालकोट पर आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|189&lt;br /&gt;
|1522 ई.&lt;br /&gt;
|[[बाबर]] का कंधार पर अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|190&lt;br /&gt;
|1523 ई.&lt;br /&gt;
|[[लाहौर]] और [[सरहिन्द]] पर [[बाबर]] का आक्रमण, लाहौर पर अधिकार (1524)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|191&lt;br /&gt;
|1526 ई.&lt;br /&gt;
|([[21 अप्रैल]]) [[बाबर]] तथा इब्राहिम लोदी के मध्य पानीपत का प्रथम युद्ध, इब्राहीम लोदी की पराजय तथा मृत्यु, [[दिल्ली]] पर क़ब्ज़े के साथ ही मुग़ल साम्राज्य की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|192&lt;br /&gt;
|1527 ई.&lt;br /&gt;
|राणा संग्राम सिंह तथा [[बाबर]] के मध्य खांडवा का युद्ध ([[16 मार्च]]), संग्राम सिंह पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|193&lt;br /&gt;
|1528 ई.&lt;br /&gt;
|राणा संग्राम सिंह की मृत्यु, [[बाबर]] ने सहयोग के बदले [[शेरशाह]] को [[सासाराम]] ([[बिहार]]) की पैतृक जाग़ीर वापस की। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|194&lt;br /&gt;
|1530 ई.&lt;br /&gt;
|[[बाबर]] की मृत्यु ([[29 मई]]), [[विजय नगर साम्राज्य|विजयनगर]] के राजा कृष्णदेव राय की मृत्यु ([[26 दिसम्बर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|195&lt;br /&gt;
|1531 ई.&lt;br /&gt;
|[[गुजरात]] के बहादुरशाह का मालवा तथा [[उज्जैन]] पर अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|196&lt;br /&gt;
|1532 ई.&lt;br /&gt;
|रायसेन, चंदेरी एवं [[मंदसौर]] पर बहादुरशाह का अधिकार तथा [[चित्तौड़]] पर पहला हमला।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|197&lt;br /&gt;
|1533 ई.&lt;br /&gt;
|बहादुरशाह ने [[चित्तौड़]] का घेरा उठाया, रणथम्भौर तथा [[अजमेर]] पर अधिकार, वैष्णव संत चैतन्य का निधन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|198&lt;br /&gt;
|1534 ई.&lt;br /&gt;
|[[हुमायूँ]] का मालवा को प्रस्थान, [[शेरशाह]] ने सूरजगढ़ की लड़ाई में [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] के शासक महमूद ख़ाँ को परास्त किया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|199&lt;br /&gt;
|1535 ई.&lt;br /&gt;
|पुर्तग़ालियों की सहायता से बहादुरशाह का [[चित्तौड़]] पर अधिकार, [[हुमायूँ]] से बहादुरशाह पराजित, हुमायूँ की [[गुजरात]] तथा मालवा पर विजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|200&lt;br /&gt;
|1536 ई.&lt;br /&gt;
|[[हुमायूँ]] ने अस्करी को [[गुजरात]] का शासक नियुक्त किया, गुजरात में [[मुग़ल|मुग़लों]] के विरुद्ध विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|201&lt;br /&gt;
|1537 ई.&lt;br /&gt;
|[[गुजरात]] के शासक बहादुरशाह की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|202&lt;br /&gt;
|1538 ई.&lt;br /&gt;
|[[शेरशाह]] के हाथों [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] का शासक महमूदशह परास्त, [[हुमायूँ]] का बंगाल पर आक्रमण, सिक्ख गुरु [[नानक देव, गुरु|नानक देव]] का निधन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|203&lt;br /&gt;
|1539 ई.&lt;br /&gt;
|चौसा के युद्ध में [[हुमायूँ]] [[शेरशाह]] से पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|204&lt;br /&gt;
|1540 ई.&lt;br /&gt;
|[[शेरशाह]] [[दिल्ली]] की गद्दी पर बैठा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|205&lt;br /&gt;
|1542 ई.&lt;br /&gt;
|मारवाड़ के राजा मालदेव के आमंत्रण पर [[हुमायूँ]] [[जोधपुर]] पहुँचा, अमरकोट में ([[15 अक्टूबर]]) [[अकबर]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|206&lt;br /&gt;
|1544 ई.&lt;br /&gt;
|[[हुमायूँ]] फ़ारस के शाह तहमस्य की शरण में।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|207&lt;br /&gt;
|1545 ई.&lt;br /&gt;
|शाह तहमस्य की मदद से कंधार-[[काबुल]] पर पुनः [[हुमायूँ]] का अधिकार, [[शेरशाह]] की मृत्यु, इस्लाम शाह गद्दी पर बैठा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|208&lt;br /&gt;
|1553 ई.&lt;br /&gt;
|[[सूर वंश|सूर वंशी]] शासक इस्लाम शाह की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|209&lt;br /&gt;
|1555 ई.&lt;br /&gt;
|[[लाहौर]] पर [[हुमायूँ]] का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|210&lt;br /&gt;
|1556 ई.&lt;br /&gt;
|[[हुमायूँ]] की मृत्यु ([[24 जनवरी]]), बैरम ख़ाँ के संरक्षण में [[अकबर]] [[मुग़ल]] सम्राट बना, पानीपत के दूसरे युद्ध ([[5 नवम्बर]]) में अकबर के द्वारा आदिलशाह का दीवान हेमू पराजित, पुर्तग़ाल से पहला प्रेस भारत पहुँचा, जिसे जेसुइट पादरी [[गोवा]] लेकर आए थे।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|211&lt;br /&gt;
|1557 ई.&lt;br /&gt;
|ख़िज़्र ख़ाँ के साथ लड़ाई में आदिलशाह मारा गया, सिकन्दर सूर को हराकर मानकोट के क़िले पर [[अकबर]] का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|212&lt;br /&gt;
|1560 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] के द्वारा बैरम ख़ाँ का निष्कासन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|213&lt;br /&gt;
|1561 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] की मालवा पर विजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|214&lt;br /&gt;
|1562 ई.&lt;br /&gt;
|आमेर की राजकुमारी (राजा भारमल की पुत्री) से [[अकबर]] का विवाह, युद्ध-बंन्दियों को दास बनाने की प्रथा का उन्मूलन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|215&lt;br /&gt;
|1563 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] द्वारा तीर्थयात्रा-कर की समाप्ति।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|216&lt;br /&gt;
|1564 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] द्वारा [[जज़िया]] कर की उगाही बन्द, रानी [[दुर्गावती]] को परास्त कर गोंडवाना [[मुग़ल]] राज्य में सम्मिलित, रानी द्वारा आत्महत्या।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|217&lt;br /&gt;
|1564–1567 ई.&lt;br /&gt;
|उजबेकों का विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|218&lt;br /&gt;
|1565 ई.&lt;br /&gt;
|[[विजय नगर साम्राज्य|विजयनगर]] के शासक रामराय और बहमनी सुल्तानों के बीच तालिकोटा का युद्ध, विजयनगर पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|219&lt;br /&gt;
|1567 ई.&lt;br /&gt;
|राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्री हरिवंश का [[देवबन्द]] ([[सहारनपुर]]) में जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|220&lt;br /&gt;
|1568 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] की [[चित्तौड़]] पर विजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|221&lt;br /&gt;
|1569 &lt;br /&gt;
|रणथम्भौर और कालिंजर पर अकबर का अधिकार, युवराज [[सलीम]] ([[जहाँगीर]]) का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|222&lt;br /&gt;
|1571 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] द्वारा [[फ़तेहपुर सीकरी]] का निर्माण तथा राजधानी बनाने का निर्णय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|223&lt;br /&gt;
|1572 ई.&lt;br /&gt;
|[[महाराणा उदयसिंह]] की मृत्यु, जालौर के राजा और मेवाड़ सेनापतियों के द्वारा [[राणा प्रताप]] को गद्दी पर बैठाया गया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|224&lt;br /&gt;
|1573 ई.&lt;br /&gt;
|[[कबीर]] का निधन, [[गुजरात]] पर अकबर का आधिपत्य।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|225&lt;br /&gt;
|1574–76 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] की [[बिहार]]-[[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] पर विजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|226&lt;br /&gt;
|1575 ई.&lt;br /&gt;
|ठुकरोई ([[उड़ीसा]]) का युद्ध, [[अकबर]] द्वारा दाऊद ख़ाँ पराजित [[फ़तेहपुर सीकरी]] में इबादतख़ाना की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|227&lt;br /&gt;
|1576 ई.&lt;br /&gt;
|हल्दीघाटी का युद्ध, [[अकबर]] द्वारा [[राणा प्रताप]] पराजित, अकबर का [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] पर अधिकार, दाऊद ख़ाँ की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|228&lt;br /&gt;
|1578 ई.&lt;br /&gt;
|भारतीय भाषा की पहली पुस्तक &amp;quot;डुट्रिना क्रिस्टा' ([[तमिल भाषा]] में) मुद्रित व प्रकाशित, इस पुस्तक के लिए टाइप जुआबों गुंजाल्बेज नाम के स्पेनी लुहार ने क्किलोन ([[केरल]]) में ढाले थे। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|229&lt;br /&gt;
|1579–1580 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] ने 'महजरनामा' (इन्फैलिबिलिटी डिक्री) जारी किया, [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]]-[[बिहार]] में विद्रोह, [[अकबर]] के दरबार में [[गोवा]] से प्रथम जेसुइट मिशन आया (1580)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|230&lt;br /&gt;
|1580–1611 ई.&lt;br /&gt;
|[[गोलकुण्डा]] में सुल्तान कुली कुतुबशाह द्वितीय के आश्रय में रेख्ता (हिन्दुस्तानी के आदि रूप) के कवियों को प्रोत्साहन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|231&lt;br /&gt;
|1611–1656&lt;br /&gt;
| आदिलशाह [[बीजापुर]] की गद्दी पर आसीन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|232&lt;br /&gt;
|1582 ई.&lt;br /&gt;
| [[अकबर]] के द्वारा [[दीन-ए-इलाही]] की घोषणा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|233&lt;br /&gt;
|1583 ई.&lt;br /&gt;
|पहले पाँच अंग्रेज़ व्यापारी (जॉन न्यूबरी, रिचर्ड स्टेपर, राल्फ़, जेम्स स्टोरी तथा विलियम लीड्स) [[अकबर]] के नाम महारानी एलिजाबेथ का पत्र लेकर भारत पहुँचे, अकबर से इनकी मुलाक़ात नहीं हो पाई लेकिन लीड्स को अकबर के यहाँ झवेरी की नौकरी मिल गई, फिंच आठ साल तक भारत-[[बर्मा]] की यात्रा करने के बाद 26 अप्रैल, 1591 को लन्दन पहुँचा, फिंच के विवरण से ही अंग्रेज़ व्यापारियों की भारत से व्यापार करने की लालसा बलवती हुई।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|234&lt;br /&gt;
|1585 ई.&lt;br /&gt;
|[[कश्मीर]] पर [[अकबर]] का आधिपत्य।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|235&lt;br /&gt;
|1589 ई.&lt;br /&gt;
|राजा [[टोडरमल]] की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|236&lt;br /&gt;
|1590–1592 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] की सिंध पर विजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|237&lt;br /&gt;
|1591 ई.&lt;br /&gt;
| फ़ैजी को मुग़ल राजदूत बनाकर दक्कन के राज्यों में भेजा गया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|238&lt;br /&gt;
|1592 ई.&lt;br /&gt;
|[[उड़ीसा]] पर [[अकबर]] का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|239&lt;br /&gt;
|1595 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] की कंधार विजय, बलूचिस्तान मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|240&lt;br /&gt;
|1597 ई.&lt;br /&gt;
|[[राणा प्रताप]] की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|241&lt;br /&gt;
|1600 ई.&lt;br /&gt;
|[[अहमदनगर]] का पतन, लन्दन में महारानी एलिजाबेथ द्वारा अपने भाई जार्ज, अर्ल ऑफ़ कम्बरलैंड तथा सर जॉन हॉर्ट की ईस्ट इंडिया कम्पनी (द गवर्नर एंड कम्पनी ऑफ़ लन्दन ट्रेडिंग इन टु द ईस्ट इंडीज) को भारत से व्यापार करने के लिए अधिकार पत्र प्रदान किया गया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|242&lt;br /&gt;
|1601 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] का असीरगढ़ पर अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|243&lt;br /&gt;
|1602 ई.&lt;br /&gt;
|अबुल फ़जल की मृत्यु, डच यूनिवर्सल यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना, 13 वर्षों में ही हालैण्ड के [[एशिया]] व्यापार में असाधारण वृद्धि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|244&lt;br /&gt;
|1601–1603 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] के पुत्र [[सलीम]] का विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|245&lt;br /&gt;
|1605 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] की मृत्यु ([[16 अक्टूबर]]), [[जहाँगीर]] गद्दी पर बैठा ([[24 अक्टूबर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|246&lt;br /&gt;
|1606 ई.&lt;br /&gt;
|शहजादा ख़ुसरो का विद्रोह, [[जहाँगीर]] के आदेशानुसार पाँचवें सिक्ख गुरु अर्जुनदेव को प्राणदण्ड, ईरानियों द्वारा कंधार का घेराव, जहाँगीर की मेवाड़ पर चढ़ाई।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|247&lt;br /&gt;
|1607 ई.&lt;br /&gt;
|[[मुग़ल|मुग़लों]] के द्वारा कंधार मुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|248&lt;br /&gt;
|1608 ई.&lt;br /&gt;
|[[अहमद नगर]] पर मलिक अम्बर का पुनः अधिकार, [[इंग्लैण्ड]] के राजा जेम्स प्रथम का पत्र लेकर विलियम हाकिंस [[जहाँगीर]] के दरबार में भारत आया तथा तीन साल तक उसके दरबार में रहा, 1612 में वापस इंग्लैण्ड लौटकर भारत यात्रा का विवरण लिखा, संत तुकाराम का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|249&lt;br /&gt;
|1609 ई.&lt;br /&gt;
|पुलिकट में डच फैक्टरी स्थापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|250&lt;br /&gt;
|1611 ई.&lt;br /&gt;
|मसुलीपत्तम में अंग्रेज़ फैक्टरी स्थापित, [[जहाँगीर]] का नूरजहाँ से विवाह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|251&lt;br /&gt;
|1611-1625 ई.&lt;br /&gt;
|[[गोलकुण्डा]] में सुल्तान मुहम्मद कुतुबशाह का शासनकाल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|252&lt;br /&gt;
|1612 ई.&lt;br /&gt;
|शाहजादा ख़ुर्रम ([[शाहजहाँ]]) का मुमताज़ महल से विवाह, बंगाल की राजधानी राजमहल से ढाका स्थानान्तरित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|253&lt;br /&gt;
|1614 ई.&lt;br /&gt;
|[[मेवाड़]] के [[राणा अमर सिंह]] से [[जहाँगीर]] की संधि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|254&lt;br /&gt;
|1615 ई.&lt;br /&gt;
|मेवाड़ पर [[जहाँगीर]] का अधिकार, इंग्लैण्ड के शासक जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप में सर टामस रो जहाँगीर के दरबार में आया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|255&lt;br /&gt;
|1620 ई.&lt;br /&gt;
|कांगड़ा पर [[मुग़ल|मुग़लों]] का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|256&lt;br /&gt;
|1622 ई.&lt;br /&gt;
|कंधार पर फ़ारस का पुनः अधिकार, [[शाहजहाँ]] का विद्रोह, गोस्वामी [[तुलसीदास]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|257&lt;br /&gt;
|1625-1674 ई.&lt;br /&gt;
|[[गोलकुण्डा]] की गद्दी पर सुल्तान अब्दुल्ला कुत्बशाह बैठा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|258&lt;br /&gt;
|1624 ई.&lt;br /&gt;
|[[अहमदनगर]] के मलिक अम्बर के हाथों मुग़ल सेना पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|259&lt;br /&gt;
|1626 ई.&lt;br /&gt;
|महावत ख़ाँ का विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|260&lt;br /&gt;
|1627 ई.&lt;br /&gt;
|[[जहाँगीर]] की मृत्यु ([[29 अक्टूबर]]), जुन्नार ([[पुणे|पूना]]) के निकट शिवनेर के क़िले में [[शिवाजी]] का जन्म ([[20 अप्रैल]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|261&lt;br /&gt;
|1628 ई.&lt;br /&gt;
|[[शाहजहाँ]] [[मुग़ल]] सम्राट बना ([[6 फ़रवरी]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|262&lt;br /&gt;
|1631 ई.&lt;br /&gt;
|मुमताज़ महल की मृत्यु ([[7 जून]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|263&lt;br /&gt;
|1632 ई.&lt;br /&gt;
|[[बीजापुर]] पर [[मुग़ल]] आक्रमण, [[पुर्तग़ाली|पुर्तग़ालियों]] के विरुद्ध सैन्य अभियन, हुगली में उनकी बस्ती नष्ट।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|264&lt;br /&gt;
|1633 ई.&lt;br /&gt;
|[[अहमदनगर]] के [[निज़ामशाही वंश]] का अन्त, अहमदनगर [[मुग़ल]] साम्राज्य में सम्मिलित, दौलताबाद के क़िले पर अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|265&lt;br /&gt;
|1634 ई.&lt;br /&gt;
|अंग्रेज़ों को बंगाल में व्यापार करने का फ़रमान मिला, महावत ख़ाँ की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|266&lt;br /&gt;
|1636 ई.&lt;br /&gt;
|[[बीजापुर]] और [[गोलकुण्डा]] से [[मुग़ल|मुग़लों]] की संधि, [[औरंगज़ेब]] दक्कन का सूबेदार नियुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|267&lt;br /&gt;
|1638 ई.&lt;br /&gt;
|अली मर्दान द्वारा कंधार [[मुग़ल|मुग़लों]] को समर्पित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|268&lt;br /&gt;
|1638 ई.&lt;br /&gt;
|[[शाहजहाँ]] द्वारा नए राजधानी शहर शाहजंहानाबाद का निर्माण प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|269&lt;br /&gt;
|1639 ई.&lt;br /&gt;
|अंग्रेज़ों द्वारा मद्रास में सेंट जार्ज क़िले की आधारशिला रखी गई। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|270&lt;br /&gt;
|1646 ई.&lt;br /&gt;
|बल्ख पर [[मुग़ल|मुग़लों]] का अधिकार, तोरण पर [[शिवाजी]] का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|271&lt;br /&gt;
|1649 ई.&lt;br /&gt;
|कंधार पर पर पुनः फ़ारस का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|272&lt;br /&gt;
|1650 ई.&lt;br /&gt;
|मराठी संत तुकाराम का निधन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|273&lt;br /&gt;
|1656 ई.&lt;br /&gt;
|[[शिवाजी]] का जाबली पर आधिपत्य।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|274&lt;br /&gt;
|1657 ई.&lt;br /&gt;
|[[बीदर]] का पतन और मुग़लों द्वारा [[बीजापुर]] की घेराबन्दी, [[शाहजहाँ]] के अस्वस्थ होने पर 'उत्तराधिकारी का युद्ध' प्रारम्भ, बीजापुर के साथ द्वितीय सन्धि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|275&lt;br /&gt;
|1658 ई.&lt;br /&gt;
|धरमत के युद्ध ([[5 मई]]) तथा सामूगढ़ के युद्ध ([[8 जून]]) में दारा की [[औरंगज़ेब]] के हाथों पराजय, [[शाहजहाँ]] [[आगरा]] में बन्दी ([[5 जून]]), औरंगज़ेब का राज्याभिषेक (31 जुलाई)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|276 &lt;br /&gt;
|1659 ई.&lt;br /&gt;
|दारा को मृत्युदण्ड, [[शिवाजी]] के हाथों [[अफ़ज़ल ख़ाँ]] की मृत्यु।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|277&lt;br /&gt;
|1660 ई.&lt;br /&gt;
|मीर जुमला बंगाल का सूबेदार नियुक्त, [[शिवाजी]] के द्वारा दक्षिण कर्नाटक क्षेत्र में चारों ओर हमले।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|278&lt;br /&gt;
|1661 ई.&lt;br /&gt;
|मुराद  की हत्या, [[पुर्तग़ाली|पुर्तग़ालियों]] द्वारा इस शर्त पर [[बम्बई]] अंग्रेज़ों को हस्तांतरित की गयी कि वे डचों को इस क्षेत्र में व्यापार से बाहर खदेड़ने में इनका साथ देंगे।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|279&lt;br /&gt;
|1662 ई.&lt;br /&gt;
|मीर जुमला का [[असम]] अभियान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|280&lt;br /&gt;
|1663 ई.&lt;br /&gt;
|मीर जुमला की मृत्यु, [[शाइस्ता ख़ाँ]] बंगाल का सूबेदार नियुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|281&lt;br /&gt;
|1664 ई.&lt;br /&gt;
|[[शिवाजी]] का [[सूरत]] पर आक्रमण, स्थानीय [[पुर्तग़ाली]] उपनिवेश द्वारा शिवाजी को वार्षिक नज़राना देना स्वीकार, फ़्राँसीसी [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|282&lt;br /&gt;
|1665 ई. &lt;br /&gt;
|राजा [[जयसिंह]] के हाथों [[शिवाजी]] की पराजय, मुग़लों के साथ शिवाजी की पुरन्दर सन्धि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|283&lt;br /&gt;
|1666 ई.&lt;br /&gt;
|[[शाहजहाँ]] की मृत्यु, मुग़ल दरबार में [[शिवाजी]] बन्दी (मई), नज़रबन्दी से मुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|284&lt;br /&gt;
|1668 ई.&lt;br /&gt;
|[[औरंगज़ेब]] द्वारा हिन्दुओं के विरुद्ध नये आदेश, [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] का पूर्ण अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|285&lt;br /&gt;
|1669 ई.&lt;br /&gt;
|[[मथुरा]] में जाट सरदार गोकुल का विद्रोह, [[बम्बई]] पर अंग्रेज़ कम्पनी का पूर्ण अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|286&lt;br /&gt;
|1670 ई.&lt;br /&gt;
|[[शिवाजी]] का [[सूरत]] पर दूसरा आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|287&lt;br /&gt;
|1671 ई.&lt;br /&gt;
|छत्रसाल के नेतृत्व में बुंदेलों का विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|288&lt;br /&gt;
|1672 ई. &lt;br /&gt;
|अफ्रीदी तथा सतनामी विद्रोह, दम लौहेम के नेतृत्व में फ़्राँसीसियों ने श्रीलंका में त्रिंकोमाली तथा [[चेन्नई]] के निकट सेंट टोम पर अधिकार, कुछ समय के पश्चात् डचों ने फ़्राँसीसियों से दोनों स्थानों को छीन लिया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|289&lt;br /&gt;
|1673 ई.&lt;br /&gt;
|[[शिवाजी]] का [[सूरत]] पर तीसरा आक्रमण, हिन्दी कवि धनानंद का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|290&lt;br /&gt;
|1674 ई.&lt;br /&gt;
|फ़्राँसीसी कप्तान फ़्राँसिस मार्टिन के द्वारा [[पांण्डिचेरी]] की स्थापना, [[शिवाजी]] द्वारा राज्याभिषेक (रायगढ़ में) तथा 'छत्रपति' की उपाधि धारण, 'स्वराज' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|291&lt;br /&gt;
|1675 ई.&lt;br /&gt;
|सिक्ख [[गुरु तेगबहादुर सिंह]] को [[औरंगज़ेब]] द्वारा मृत्युदण्ड।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|292&lt;br /&gt;
|1677 ई.&lt;br /&gt;
|[[कर्नाटक]] में [[शिवाजी]] की विजय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|293&lt;br /&gt;
|1679 ई.&lt;br /&gt;
|[[औरंगज़ेब]] द्वारा [[जज़िया]] कर पुनः आरोपित, मारवाड़ अभियान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|294&lt;br /&gt;
|1680 ई.&lt;br /&gt;
|[[शिवाजी]] की मृत्यु, शंभाजी [[पेशवा]] बना, अलंकारवादी हिन्दी कवि केशवदास का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|295&lt;br /&gt;
|1681 ई.  &lt;br /&gt;
|[[असम]] पुनः स्वतंत्र, [[औरंगज़ेब]] का दक्षिण में अभियान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|296&lt;br /&gt;
|1685 ई. &lt;br /&gt;
|अंग्रेज़ कम्पनी का मुख्य व्यापार कार्यालय सूरत से बम्बई स्थानान्तरित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|297 &lt;br /&gt;
|1686 ई.&lt;br /&gt;
|[[औरंगज़ेब]] का [[बीजापुर]] पर अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|298 &lt;br /&gt;
|1687 ई.&lt;br /&gt;
|[[गोलकुण्डा]] मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित, अंग्रेज़ कम्पनी द्वारा [[औरंगज़ेब]] के विरुद्ध युद्ध की घोषणा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|299&lt;br /&gt;
|1689 ई.&lt;br /&gt;
|[[औरंगज़ेब]] द्वारा शंभाजी को प्राणदण्ड, [[राजाराम]] सत्तारूढ़, शाहू बन्दी बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|300&lt;br /&gt;
|1699 ई.&lt;br /&gt;
|[[मालवा]] पर [[मराठा|मराठों]] का प्रथम आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|301&lt;br /&gt;
|1700 ई.  &lt;br /&gt;
|शंभाजी के छोटे भाई [[राजाराम]] की मृत्यु, ताराबाई के संरक्षण में [[शिवाजी]] द्वितीय (राजाराम का पुत्र) गद्दी पर बैठा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|302&lt;br /&gt;
|1702 ई.&lt;br /&gt;
|[[इंग्लैंण्ड]] में रानी ऐन गद्दी पर बैठीं, गोडोल्फिन के हस्तक्षेप से पुरानी और नयी कम्पनियों को एकीकरण कर नयी [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] का उदय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|303&lt;br /&gt;
|1703 ई.&lt;br /&gt;
|[[मराठा|मराठों]] का बरार पर आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|304 &lt;br /&gt;
|1706 ई.&lt;br /&gt;
|[[मराठा|मराठों]] का [[गुजरात]] पर आक्रमण, बड़ौंदा ध्वस्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|305 &lt;br /&gt;
|1707 ई.&lt;br /&gt;
|[[औरंगज़ेब]] की मृत्यु, बहादुरशाह प्रथम (राजकुमार मुहम्मद मुअज्जम) मुग़ल सम्राट बना, शाहु मुक्त, ताराबाई तथा शाहू समर्थकों के मध्य खेड़ा का युद्ध, [[मराठा साम्राज्य|मराठा राज्य]] दो भागों में विभक्त, सतारा में शाहू का राज्य तथा कोल्हापुर में ताराबाई (या शिवाजी द्वितीय) का राज्य, पेशवा बालाजी विश्वनाथ शाहू के साथ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|306 &lt;br /&gt;
|1708 ई.&lt;br /&gt;
|शाहू का राज्याभिषेक छत्रपति के रूप में, बालाजी विश्वनाथ को 'सेनाकर्ते' की उपाधि, सिखों के अन्तिम [[गुरु गोविंद सिंह]] का निधन (नादेड़ में)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|307 &lt;br /&gt;
|1712 ई.&lt;br /&gt;
|बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु, जहाँदारशाह उत्तराधिकारी बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|308&lt;br /&gt;
|1713 ई.&lt;br /&gt;
|जहाँदारशाह की हत्या, बंधुओं की मदद से फ़र्रुख़सियार सिंहासनारूढ़।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|309 &lt;br /&gt;
|1714 ई.&lt;br /&gt;
|बालाजी विश्वनाथ की 'पेशवा' के पद पर पदोन्नति, हुसैन अली दक्षिण का सूबेदार, हुसैन अली की [[मराठा|मराठों]] से सन्धि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|310 &lt;br /&gt;
|1715 ई. &lt;br /&gt;
|सिख नेता [[बन्दा बहादुर]] को प्राणदण्ड।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|311 &lt;br /&gt;
|1717 ई.&lt;br /&gt;
|[[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] को बादशाह फ़र्रुख़सियर का स्वतंत्र व्यापार (ड्यूटी-फ़्री) फ़रमान, [[कलकत्ता]] के निकट 37 गावों को ख़रीदने का अधिकार भी मिला।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|312 &lt;br /&gt;
|1719 ई. &lt;br /&gt;
|फ़र्रुख़सियर की हत्या, मुहम्मदशाह (रोशन अख़्तर) गद्दी पर आसीन (दो अल्पकालिक शासकों रफ़ी-उद-दौला तथा रफ़ी-उद-दरजात की मृत्यु के उपरान्त), मुग़ल सम्राट द्वारा सनद प्रदान कर चौथ तथा सदरेशमुखी वसूलने का अधिकार तथा दक्कन के 6 सूबों को स्वराज्य प्रदान किया गया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|313 &lt;br /&gt;
|1720 ई. &lt;br /&gt;
|बाजीराव प्रथम पेशवा बने, सैय्यद बन्धुओं का अन्त, [[मराठा|मराठों]] का उत्तरी अभियान प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|314 &lt;br /&gt;
|1723 ई.&lt;br /&gt;
|[[शिवाजी]] के गुरु समर्थ रामदास की मृत्यु, पेशवा का [[मालवा]] पर आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|315 &lt;br /&gt;
|1724 ई.&lt;br /&gt;
|सआदत ख़ाँ अवध का सूबेदार नियुक्त, दक्षिण में निज़ाम स्वतंत्र।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|316 &lt;br /&gt;
|1725 ई.&lt;br /&gt;
|शुजाउद्दीन बंगाल का सूबेदार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|317 &lt;br /&gt;
|1731 ई.&lt;br /&gt;
|गॉटनबर्ग में सम्राट फ़्रेडरिक द्वारा 'स्वीडिश ईस्ट इंडिया' का गठन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|318 &lt;br /&gt;
|1735 ई. &lt;br /&gt;
|मुग़ल बादशाह द्वारा पेशवा बाजीराव प्रथम को [[मालवा]] के शासक के रूप में स्वीकृति।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|319 &lt;br /&gt;
|1738 ई.&lt;br /&gt;
|गोस्वामी [[तुलसीदास]] ([[रामचरितमानस]] क रचयिता) का निधन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|320 &lt;br /&gt;
|1739–40 ई.&lt;br /&gt;
|[[दिल्ली]] पर [[नादिरशाह का आक्रमण]], [[कोहिनूर हीरा]] एवं तख़्तेताऊस नादिरशाह के क़ब्ज़े में, खुरासान में नादिरशाह की उसके ही सेनापतियों के द्वारा हत्या।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|321 &lt;br /&gt;
|1740 ई.&lt;br /&gt;
|सरफ़राज ख़ाँ की हत्या कर अलीवर्दी ख़ाँ बंगाल का नवाब बना, बालाजी बाजीराव पेशवा बने, अरकाट पर [[मराठा|मराठों]] का आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|322&lt;br /&gt;
|1742 ई.&lt;br /&gt;
|बंगाल पर [[मराठा|मराठों]] का आक्रमण, [[डूप्ले]] [[पांण्डिचेरी]] का गवर्नर नियुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|323&lt;br /&gt;
|1744 ई.&lt;br /&gt;
|[[यूरोप]] में [[फ्राँस]] तथा [[इंग्लैण्ड]] के बीच युद्ध आरम्भ, दोनों के विभिन्न उपनिवेशों में तनाव तथा संघर्ष।&lt;br /&gt;
|-  &lt;br /&gt;
|324&lt;br /&gt;
|1746–48 ई.&lt;br /&gt;
|प्रथम [[कर्नाटक]] (आंग्ल-फ़्राँसीसी) युद्ध।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|325&lt;br /&gt;
|1745 ई.&lt;br /&gt;
|रूहेलखण्ड रुहिल्लों के अधिकार में।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|326&lt;br /&gt;
|1746 ई.&lt;br /&gt;
|ला बूर्डोने के नेतृत्व में फ़्राँसीसियों का [[चेन्नई]] पर अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|327&lt;br /&gt;
|1747 ई.&lt;br /&gt;
|[[अहमदशाह अब्दाली]] का भारत पर आक्रमण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|328&lt;br /&gt;
|1748 ई.&lt;br /&gt;
|[[हैदराबाद]] के निज़ाम आसफ़जाह की मृत्यु, पुत्र नासिर जंग तथा मुजफ़्फ़र जंग में सत्ता के लिए संघर्ष, संघर्ष के कारण निज़ाम का प्रभाव क्षीण तथा गद्दी के लिए [[कर्नाटक]] के नवाब [[चंदा साहब]] तथा नवाब [[अनवरुद्दीन]] के बीच संघर्ष।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|329&lt;br /&gt;
|1748–51 ई. &lt;br /&gt;
|[[अहमदशाह अब्दाली]] का [[अफ़ग़ानिस्तान]] और [[पंजाब]] पर अधिकार, मुहम्मदशाह की मृत्यु के पश्चात् अहमदशाह मुग़ल बादशाह बना (1748)। &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|330 &lt;br /&gt;
|1749 ई. &lt;br /&gt;
|[[यूरोप]] में ब्रिटिश और फ़्राँसीसियों के बीच 'एक्स-ला-शापेल' की सन्धि, भारत में अंग्रेज़ी और फ़्राँसीसी कम्पनियों में भी युद्ध विराम, फ़्राँसीसियों द्वारा [[चेन्नई]] अंग्रेज़ों को वापस, शाहू की मृत्यु तथा रामराज का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|331 &lt;br /&gt;
|1750–1754 ई. &lt;br /&gt;
|द्वितीय कर्नाटक युद्ध, [[डूप्ले]] की सहायता से [[चंदा साहब]] की अनवरूद्दीन पर विजय, [[हैदराबाद]] की निज़ामत मुजफ़्फ़र जंग को दिलाने के लिए चंदा साहिब तथा डुप्ले का नासिर जंग पर सम्मिलित हमला, नासिर जंग को 600 सैनिकों की सहायता, [[कर्नाटक]] की गद्दी के लिए मुहम्मद अली को भी अंग्रेज़ी मदद।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|332 &lt;br /&gt;
|1751 ई.  &lt;br /&gt;
|अरकाट के क़िले पर राबर्ट क्लाइब का अधिकार, जिससे फ़्राँसीसी त्रिचरापल्ली से हटे, मुजफ़्फ़रजंग की मृत्यु, सलावत जंग निज़ाम बना, अलीवर्दी ख़ाँ की [[मराठा|मराठों]] से सन्धि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|333 &lt;br /&gt;
|1754 ई.  &lt;br /&gt;
|डूप्ले फ़्राँस वापस, गोडेहू नया फ़्राँसीसी डायरेक्टर जनरल, गोडेहू तथा अंग्रेज़ गवर्नर सांडर्स के बीच सन्धि, दोनों का भारतीय रियासतों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का निर्णय, फ़्राँसीसियों द्वारा अंग्रेज़ समर्थित मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब स्वीकृत, आलमगीर द्वितीय मुग़ल बादशाह बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|334 &lt;br /&gt;
|1756 ई.   &lt;br /&gt;
|अलीवर्दी ख़ाँ की मृत्यु, सिराजुद्दौला बंगाल की गद्दी पर आसीन तथा [[कलकत्ता]] पर अधिकार, तीसरा कर्नाटक युद्ध।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|335 &lt;br /&gt;
|1757 ई.  &lt;br /&gt;
|प्लासी की लड़ाई ([[23 जून]]) में अंग्रेज़ों द्वारा सिराजुद्दौला पराजित, मीरजाफ़र नवाब बनाया गया ([[28 जून]]), अंग्रेज़ों का [[कलकत्ता]] पर पुनः अधिकार, सिराजुद्दौला को मृत्युदण्ड ([[2 जुलाई]]), अंग्रेज़ों का राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|336 &lt;br /&gt;
|1758 ई.  &lt;br /&gt;
|फ़्राँसीसी गवर्नर लाली का भारत आगमन, अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान आरम्भ, फोर्ट सेंट डेविड पर क़ब्ज़ा, [[पंजाब]] पर [[मराठा|मराठों]] का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|337 &lt;br /&gt;
|1759  &lt;br /&gt;
|बंगाल में अंग्रेज़ों द्वारा डच पराजित, [[बीदर]] का युद्ध, गजीउद्दीन द्वारा आलमगीर द्वितीय की हत्या, शाहआलम द्वितीय बादशाह बना (1759-1806)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|338 &lt;br /&gt;
|1760 ई. &lt;br /&gt;
|वांडीवास के युद्ध में अंग्रेज़ों के हाथों फ़्राँसीसी पराजित, क्लाइब [[इंग्लैण्ड]] वापस, मीर क़ासिम बंगाल का नवाब बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|339 &lt;br /&gt;
|1761 ई.  &lt;br /&gt;
|[[अहमदशाह अब्दाली]] तथा [[मराठा|मराठों]] के बीच पानीपत का तीसरा युद्ध (14 जनवरी), मराठे पराजित, फ़्राँसीसियों द्वारा [[पांण्डिचेरी]] अंग्रेज़ों को समर्पित, [[पेशवा]] बाजीराव का निधन, माधवराज सिंहासनारूढ़, हैदर अली [[मैसूर]] का नवाब, [[अवध]] का नवाब शुजाउद्दौला वज़ीर बना।&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|340 &lt;br /&gt;
|1762 ई. &lt;br /&gt;
|माधवराव के सिंहासनारूढ़ होने के उपरान्त रघुनाथ राव द्वारा निज़ाम से मदद की माँग।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|341 &lt;br /&gt;
|1763 ई.  &lt;br /&gt;
|अंग्रेज़ों द्वारा [[पांण्डिचेरी]] फ़्राँसीसियों को वापस, बंगाल एवं [[बिहार]] पर मीर क़ासिम का अधिकार समाप्त, मीर क़ासिम निष्कासित, मीरजाफ़र पुनः नबाब बना, रघुनाथ राव का सत्ता पर क़ब्ज़ा, माधवराव बन्दी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|342 &lt;br /&gt;
|1764 ई.  &lt;br /&gt;
|बक्सर का युद्ध, शाह आलम, शुजाउद्दौला तथा क़ासिम की संयुक्त सेनायें अंग्रेज़ों से पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|343&lt;br /&gt;
|1765 ई.   &lt;br /&gt;
|क्लाइब द्वारा दूसरी बार पुनः बंगाल का गवर्नर बनकर वापस आया, शुजाउद्दौला शाहआलम तथा [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] के मध्य [[इलाहाबाद]] की सन्धि, शाहआलम ने [[बिहार]], बंगाल तथा [[उड़ीसा]] की दीवानी कम्पनी को सौंपी, मीरजाफ़र की मृत्यु। &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|344 &lt;br /&gt;
|1766 ई.  &lt;br /&gt;
|निज़ाम ने उत्तरी सरकार (Northern Sarkars) क्षेत्र अंग्रेज़ों को दिया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|345 &lt;br /&gt;
|1767 ई.  &lt;br /&gt;
|क्लाइब [[इंग्लैण्ड]] वापस, वेरेलस्ट बंगाल का गवर्नर बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|346 &lt;br /&gt;
|1767–69 ई.  &lt;br /&gt;
|[[मैसूर युद्ध|प्रथम मैसूर युद्ध]], अंग्रेज़ों ने अपमानजनक शर्तों पर हैदर अली से सन्धि की, हैदर अली का [[चेन्नई]] अभियान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|347 &lt;br /&gt;
|1769 ई.  &lt;br /&gt;
| निज़ाम और [[मराठा|मराठों]] के साथ अंग्रेज़ों की [[चेन्नई]] सन्धि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|348 &lt;br /&gt;
|1770 ई.  &lt;br /&gt;
|बंगाल में भीषण दुर्भिक्ष, पेरिस में दिवालिया हो जाने के कारण फ़्राँसीसी [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] भंग।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|349 &lt;br /&gt;
|1771 ई.   &lt;br /&gt;
|[[मराठा|मराठों]] का हैदर अली पर आक्रमण, [[दिल्ली]] पर [[मराठा|मराठों]] का क़ब्ज़ा, शाहआलम को अंग्रेज़ों के बन्धन से मुक्ति।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|350&lt;br /&gt;
|1772 ई.  &lt;br /&gt;
|वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का गवर्न नियुक्त, [[मराठा|मराठों]] का रुहेलखण्ड पर आक्रमण, भारतीय मामलों के लिए ब्रिटिश संसद की दो संसदीय समितियों का गठन, पेशवा माधवराव की मृत्यु, नारायण राव पेशवा बना पर ही शीघ्र मृत्यु, [[अवध]] के नवाब और रुहिल्लों का [[मराठा|मराठों]] के विरुद्ध समझौता, कम्पनी द्वारा द्वैध शासन के समाप्ति की तथा खुद दीवान का कार्य अपने हाथों में लेने की घोषणा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|351 &lt;br /&gt;
|1772–1833 ई.  &lt;br /&gt;
|[[राजा राममोहन राय]] का जीवनकाल। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|352 &lt;br /&gt;
|1773 ई.  &lt;br /&gt;
|ब्रिटिश संसद द्वारा रेग्युलेटिंग एक्ट पारित, कम्पनी पर संसद का आंशिक नियंत्रण, [[चेन्नई]] तथा [[बम्बई]] प्रेसीडेन्सियों पर [[कलकत्ता]] प्रेसीडेन्सी का आंशिक नियंत्रण, रघुनाथ राव पेशवा बना, अंग्रेज़ों और [[अवध]] के नवाब के बीच रुहेलखण्ड पर संयुक्त रूप से चढ़ाई का समझौता।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|353 &lt;br /&gt;
|1774 ई.   &lt;br /&gt;
|वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का गवर्नर जनरल बना, [[कलकत्ता]] में पहले उच्चतम न्यायालय की स्थापना, नारायण राव पेशवा बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|354 &lt;br /&gt;
|1775 ई.  &lt;br /&gt;
|कम्पनी और [[अवध]] के वज़ीर आसफ़ुद्दौला के बीच (एक-दूसरे के विरुद्ध कार्रवाई न करने की) मैत्री सन्धि, नवाब ने अंग्रेज़ों से सैन्य सहायता लेने के बदले 2,60,000 रुपये प्रतिमाह देना स्वीकार किया, नन्द कुमार पर मुक़दमा तथा मृत्युदण्ड (6 मई), रघुनाथ राव तथा अंग्रेज़ों के बीच [[सूरत]] की सन्धि। &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|355 &lt;br /&gt;
|1775–1782 ई.  &lt;br /&gt;
|प्रथम आंग्ल [[मराठा]] युद्ध।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|356 &lt;br /&gt;
|1776 ई.  &lt;br /&gt;
|अंग्रेज़ों (कर्नल आप्टन) तथा [[मराठा|मराठों]] (रघुनाथ राव के विरोधियों) के बीच [[पुरन्दर की सन्धि]]।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|357 &lt;br /&gt;
|1777 ई.  &lt;br /&gt;
|सन् 1857 के विद्रोही वीर कुँवर सिंह का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|358 &lt;br /&gt;
|1778 ई. &lt;br /&gt;
|[[यूरोप]] में अंग्रेज़-फ़्राँस युद्ध, भारत में फ़्राँसीसी उपनिवेशों पर अंग्रेज़ों का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|359 &lt;br /&gt;
|1779 ई.   &lt;br /&gt;
|[[मराठा|मराठों]] तथा अंग्रेज़ों के बीच [[बड़गाँव समझौता]] (Convention of Wadgaon) [[मराठा|मराठों]] ने 1773 में खोए हुए क्षेत्र पुनः प्राप्त किए, हैदर अली, [[हैदराबाद]] के निज़ाम तथा [[मराठा|मराठों]] अंग्रेज़ों का विरोध करने को एकजुट।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|360 &lt;br /&gt;
|1780 ई.  &lt;br /&gt;
|कैप्टन पोफम के नेतृत्व में कम्पनी का [[ग्वालियर]] पर अधिकार, [[मैसूर युद्ध|द्वितीय मैसूर युद्ध]] प्रारम्भ, हैदर अली द्वारा [[कर्नाटक]] ध्वस्त, महाराजा रणजीत सिंह का जन्म, जेम्स हिक्की द्वारा 'बंगाल गजट' का प्रकाशन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|361&lt;br /&gt;
|1781 ई.  &lt;br /&gt;
|कम्पनी ने [[बनारस]] के राजा चेतसिंह को गद्दी से हटाया, पोर्टोनोवा में हैदर अली पराजित, रेग्युलेंटिग एक्ट में संशोधन, वारेन हेस्टिंग्स द्वारा 'कलकत्ता मदरसा' की स्थापना, बंगाल में 'बोर्ड आफ़ रेवेन्यू' की स्थापना। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|362 &lt;br /&gt;
|1782 ई.   &lt;br /&gt;
|अंग्रेज़, [[मराठा]] और हैदर अली के बीच 'सल्बाई की सन्धि' हैदर अली की मृत्यु, बंगाल की खाड़ी में अंग्रेज़ों तथा फ़्राँसीसियों के बीच नौसेनिक युद्ध, अंग्रेज़ों की मदद से आसफ़ुद्दौला द्वारा [[अवध]] की बेगमों से धन उगाही।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|363 &lt;br /&gt;
|1782–99 ई.   &lt;br /&gt;
|[[टीपू सुल्तान]] [[मैसूर]] का शासक बना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|364&lt;br /&gt;
|1783 ई.  &lt;br /&gt;
|फाक्स का इंडिया बिल ब्रिटिश संसद में अस्वीकृत।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|365&lt;br /&gt;
|1784 ई.  &lt;br /&gt;
|[[टीपू सुल्तान]] के साथ 'मंगलौर की सन्धि', द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की समाप्ति, भारतीय मामलों के लिए 'बोर्ड आफ़ कंट्रोल' की स्थापना हेतु पिट का इंडिया एक्ट ब्रिटिश संसद में पारित, 'एसियाटिक सोसाइटी आफ़ बंगाल' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|366&lt;br /&gt;
|1785 ई.  &lt;br /&gt;
|वारेन हेस्टिंग्स का त्यागपत्र, [[पंजाब]] में सिखों का आधिपत्य, [[दिल्ली]] पर महादजी सिंधिया का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|367&lt;br /&gt;
|1786–1793 ई. &lt;br /&gt;
|लॉर्ड कार्नवालिस बंगाल का गवर्नर जनरल, गवर्नर जनरल को अपने परिषद् के निर्णय को निरस्त करने की व्यवस्था।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|368 &lt;br /&gt;
|1787 ई.  &lt;br /&gt;
|[[टीपू सुल्तान]] ने पेरिस और कुस्तुनतुनिया में दूत भेजा, [[मराठा]], निज़ाम तथा टीपू के बीच सन्धि, मराठा लाभान्वित, विलियम विलबरफ़ोर्स द्वारा 'दासता-विरोधी (Anti-slavery) लीग' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|369 &lt;br /&gt;
|1788 ई.  &lt;br /&gt;
|ग़ुलाम क़ादिर रुहिल्ला का [[दिल्ली]] पर क़ब्ज़ा, ग़ुलाम क़ादिर ख़ान द्वारा शाहआलम द्वितीय को नेत्रहीन बनाया गया, बेदार बख़्त दिल्ली की गद्दी पर आसीन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|370 &lt;br /&gt;
|1788–1795 ई.  &lt;br /&gt;
|वारेन हेस्टिंग्स पर महाभियोग।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|371 &lt;br /&gt;
|1789–90 ई. &lt;br /&gt;
|[[टीपू सुल्तान]] का श्रावणकोर पर अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|372 &lt;br /&gt;
|1789–1802 ई. &lt;br /&gt;
|[[मराठा|मराठों]] का दिल्ली पर अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|373 &lt;br /&gt;
|1790–92 ई.  &lt;br /&gt;
|[[मैसूर युद्ध|तृतीय मैसूर युद्ध]] ([[टीपू सुल्तान]] और अंग्रेज़, [[मराठा]] की संयुक्त सेना के बीच)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|374 &lt;br /&gt;
|1792 ई.  &lt;br /&gt;
|श्रीरंगपट्टम की सन्धि के साथ [[मैसूर युद्ध|तृतीय मैसूर युद्ध]] समाप्त, [[पंजाब]] में रणजीत सिंह सुकरचकिया-मिसल के मुखिया, [[डंकन जोनाथन|जोनाथन डंकन]] द्वारा [[वाराणसी]] में राजकीय संस्कृत महाविद्यालय (बाद में संस्कृत विश्वविद्यालय) की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|375 &lt;br /&gt;
|1793–1798 ई.  &lt;br /&gt;
|बंगाल के गवर्नर जनरल सर जॉन शोर का कार्यकाल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|376 &lt;br /&gt;
|1793 ई. &lt;br /&gt;
|बंगाल में भू-राजस्व का स्थायी बंदोबस्त, ब्रिटिश संसद द्वारा भारत में युद्ध नियंत्रण विधेयक पारित। [[पांण्डिचेरी]] पर अंग्रेज़ों का अधिकार, कम्पनी के चार्टर का नवीनीकरण। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|377 &lt;br /&gt;
|1794 ई.  &lt;br /&gt;
|[[पूना]] में महादजी सिंधिया (शिंदे) का निधन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|378 &lt;br /&gt;
|1795 ई.   &lt;br /&gt;
|ख़र्दा के युद्ध में निज़ाम का [[मराठा|मराठों]] के समक्ष समर्पण, इन्दौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर का निधन, जोनाथन डंकन [[बम्बई]] का गवर्नर नियुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|379 &lt;br /&gt;
|1796 ई.   &lt;br /&gt;
|पेशवा माधवराव नारायण की मृत्यु, बाजीराव द्वितीय पेशवा नियुक्त, अंग्रेज़ों द्वारा [[श्रीलंका]] को डचों से मुक्त कराया गया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|380 &lt;br /&gt;
|1797 ई.  &lt;br /&gt;
|[[अहमद शाह अब्दाली]] के पोते जमान शाह का [[पंजाब]] पर आक्रमण। [[लाहौर]] पर अधिकार। [[अवध]] में नवाब आसफ़ुद्दौला की मृत्यु। वज़ीर अली नये नवाब (अवध), श्रीरंगपट्टम में 60 फ़्राँसीसियों द्वारा 'जैकोबिन क्लब' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|381 &lt;br /&gt;
|1798–1805 ई.   &lt;br /&gt;
|लॉर्ड वेलेजली बंगाल का गवर्नर-जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|382 &lt;br /&gt;
|1798 ई.  &lt;br /&gt;
|आजिद अली को हटाकर सआदत अली [[अवध]] का नवाब बना, निज़ाम द्वारा आश्रम-सन्धि पर हस्ताक्षर, [[टीपू सुल्तान]] के विरुद्ध अंग्रेज़, पेशवा और निज़ाम में एकता, टीपू ने फ़्राँसीसी उपनिवेश मारिशस को दूत भेजा, नेपोलियन बोनापार्ट का [[मिस्र]] अभियान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|383 &lt;br /&gt;
|1799 ई.  &lt;br /&gt;
|नेपोलियन के काहिरा से लिखे पत्र में [[टीपू सुल्तान]] को अंग्रेज़ों से मुक्ति दिलाने का आश्वासन। [[मैसूर युद्ध|चौथे मैसूर युद्ध]] में टीपू की मृत्यु। [[मैसूर]] विभाजन। मैसूर राजवंशज कृष्णराज गद्दी पर आसीन। जमान शाह द्वारा रणजीत सिंह [[लाहौर]] का सूबेदार नियुक्त। मैल्कम के नेतृत्व में अंग्रेज़ दूतमंण्डल [[ईरान]] पहुँचा। विलियम केरी द्वारा सेरामपुर में बैप्टिस्ट मिशन स्थापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|384&lt;br /&gt;
|1800 ई.&lt;br /&gt;
|पेशवा और अंग्रेज़ों के बीच [[बसीन]] की सन्धि, अंग्रेज़ों द्वारा पेशवा पुनः पूना की गद्दी पर अधिष्ठापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|385&lt;br /&gt;
|1803 ई.&lt;br /&gt;
|द्वितीय आंग्ला मराठा युद्ध (1803-05) में [[मराठा|मराठों]] की पराजय। [[अलीगढ़]] पर अंग्रेज़ों का अधिकार। भोंसले के साथ कम्पनी की 'देवगाँव की सन्धि' तथा सिंधिया के साथ 'सुर्जी-अर्जनगाँव की सन्धि'।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|386&lt;br /&gt;
|1804 ई.&lt;br /&gt;
|होल्कर के साथ युद्ध में कर्नल मोन्सन पराजित। बादशाह शाहआलम द्वितीय ब्रिटिश संरक्षण के अधीन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|387&lt;br /&gt;
|1805 ई.&lt;br /&gt;
|अंग्रेज़ों का [[भरतपुर]] का घेरा असफल, लॉर्ड वेलेजली को [[इंग्लैंण्ड]] वापस बुलाया गया, कार्नवालिस की मृत्यु, होल्कर के साथ सन्धि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|388&lt;br /&gt;
|1805–1807 ई.&lt;br /&gt;
|सर जॉर्ज बार्लो [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] का गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|389&lt;br /&gt;
|1806 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] द्वितीय शाहआलम द्वितीय का उत्तराधिकारी बना, वेल्लोर सैनिक विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|390&lt;br /&gt;
|1807–1813 ई.&lt;br /&gt;
|[[लॉर्ड मिण्टो प्रथम]] बंगाल का गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|391&lt;br /&gt;
|1807–1808 ई.&lt;br /&gt;
|नेपोलियन की भारत पर संयुक्त फ़्राँसीसी-रूसी अभियान योजना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|392&lt;br /&gt;
|1808 ई.&lt;br /&gt;
|मैल्कम के नेतृत्व में फ़ारस तथा एल्फिन्स्टन के नेतृत्व में काबुल के लिए अंग्रेज़ दूतमण्डल भेजा गया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|393&lt;br /&gt;
|1809 ई.&lt;br /&gt;
|अंग्रेज़ों और रणजीत सिंह के बीच '[[अमृतसर की सन्धि]]' ([[25 अप्रैल]])। सतलज पूर्व की पंजाबी रियासत अंग्रेज़ों के संरक्षण में। रणजीत सिंह शासक स्वीकृत।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|394&lt;br /&gt;
|1809–1811 ई.&lt;br /&gt;
|रणजीत सिंह का कांगड़ा पर क़ब्ज़ा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|395&lt;br /&gt;
|1813–1823 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड हेस्टिंग्स बंगाल का गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|396&lt;br /&gt;
|1813 ई.&lt;br /&gt;
|कम्पनी का चार्टर नवीनीकृत, शिक्षा पर सालाना एक लाख रुपये ख़र्च करने का प्रावधान।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|397&lt;br /&gt;
|1814–1816 ई.&lt;br /&gt;
|[[नेपाल]] के साथ युद्ध। गोरखा तथा कम्पनी के बीच 'संगौली की सन्धि' (1816) में।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|398&lt;br /&gt;
|1815 ई.&lt;br /&gt;
|[[राममोहन राय राजा|राममोहन राय]] द्वारा 'आत्मीय सभा' की स्थापना। वाटरलू का युद्ध।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|399&lt;br /&gt;
|1817 ई.&lt;br /&gt;
|[[कलकत्ता]] में हिन्दू कॉलेज की स्थापना (डेविड हेयर तथा [[राममोहन राय राजा|राममोहन राय]] द्वारा)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|400&lt;br /&gt;
|1817–1818 ई.&lt;br /&gt;
|सेरामपुर ईसाई मिशनरी संस्था द्वारा भारतीय भाषा ([[बांग्ला]]) में 'समाचार दर्पण' नाम का पहला साप्ताहिक प्रकाशित। पेशवा बाजीराब द्वितीय का समर्पण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|401&lt;br /&gt;
|1819–1827 ई.&lt;br /&gt;
|एलफिंस्टन [[बम्बई]] के गवर्नर।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|402&lt;br /&gt;
|1819 ई.&lt;br /&gt;
|पेशवा पद की समाप्ति। ब्रिटिश वृत्तिभोगी की हैसियत से पेशवा बाजीराव द्वितीय को [[बिठूर]] निवास, राजपूताना के राजाओं के साथ सुरक्षात्मक सन्धि। [[तात्या टोपे]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|403&lt;br /&gt;
|1820 ई.&lt;br /&gt;
|मुनरो मद्रास का गवर्नर बना। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|404&lt;br /&gt;
|1821 ई.&lt;br /&gt;
|[[पूना]] में [[संस्कृत]] कॉलेज की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|405&lt;br /&gt;
|1822 ई.&lt;br /&gt;
|[[बम्बई]] में 'नेटिव एजुकेशन सोसाइटी' की स्थापना। 'बम्बई समाचार' प्रकाशित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|406&lt;br /&gt;
|1823–1828 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड एमहर्स्ट बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|407&lt;br /&gt;
|1823 ई.&lt;br /&gt;
|प्रेस आर्डिनेन्स के विरुद्ध [[राममोहन राय राजा|राजाराममोहन राय]] का ज्ञापन। (इसके बाद कार्यवाहक गवर्नर-जनरल एडम्स ने मुद्रणालयों के लिए लाइसेंस अनिवार्य किया था)। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|408&lt;br /&gt;
|1824 ई.&lt;br /&gt;
|बैरकपुर में सैनिक विद्रोह (अधिक भत्ते की मांग पर)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|409&lt;br /&gt;
|1824–26 ई.&lt;br /&gt;
|प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध। याण्डबू की सन्धि। [[अराकान]] तथा तेनासरीम ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|410&lt;br /&gt;
|1824–1883 ई.&lt;br /&gt;
|स्वामी [[दयानन्द सरस्वती]] का जीवनकाल, आर्यसमाज की स्थापना (1875 में)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|411&lt;br /&gt;
|1825 ई.&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी दादाभाई नौरोजी का जन्म ([[4 सितंबर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|412&lt;br /&gt;
|1826 ई.&lt;br /&gt;
|[[भरतपुर]] पर अंग्रेज़ों का अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|413&lt;br /&gt;
|1827 ई.&lt;br /&gt;
|पहला वाष्पचालित युद्धपोत 'इंटरप्राइज' मद्रास पहुँचा। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|414&lt;br /&gt;
|1828–1833 ई.&lt;br /&gt;
|विलियम बैंटिक बंगाल का गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|415&lt;br /&gt;
|1828 ई.&lt;br /&gt;
|[[राममोहन राय राजा|राममोहन राय]] द्वारा 'ब्रह्म समाज की स्थापना'। ऐकेडमिक एसोसिएशन स्थापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|416&lt;br /&gt;
|1829 ई.&lt;br /&gt;
|विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा ग़ैरक़ानूनी घोषित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|417&lt;br /&gt;
|1829–1837 ई.&lt;br /&gt;
|बैंटिक द्वारा ठगों का दमन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|418&lt;br /&gt;
|1830 ई.&lt;br /&gt;
|[[राजा राममोहन राय]] द्वारा [[इंग्लैंण्ड]] भ्रमण। धर्मसभा द्वारा [[कलकत्ता]] में सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाने के विरोध में सभा। ईश्वरचन्द्र गुप्ता द्वारा बंगाल मासिक 'संवाद प्रभाकर' प्रकाशित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|419&lt;br /&gt;
|1831 ई.&lt;br /&gt;
|[[मैसूर]] का राजा पदच्युत। शासन ब्रिटिश सरकार के हाथ में, रोपड़ में विलियम बैंटिक और रणजीत सिंह की भेंट।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|420&lt;br /&gt;
|1832 ई.&lt;br /&gt;
|[[असम]] के जैतिया क्षेत्र पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|421&lt;br /&gt;
|1833 ई.&lt;br /&gt;
|कम्पनी के चार्टर का नवीनीकरण, वैधानिक शक्ति का केन्द्रीयकरण। बंगाल का गवर्नर जनरल पहली बार भारत के गवर्नर जनरल के नाम से जाने लगा, भारतीय विधि आयोग की नियुक्ति, [[ब्रिटेन]] में दास-प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|422&lt;br /&gt;
|1833–1835 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत का गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|423&lt;br /&gt;
|1834 ई.&lt;br /&gt;
|कुर्ग पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य। लॉर्ड मैकाले सुप्रीम कौंसिल में पहला विधि सदस्य नियुक्त। सरकार द्वारा [[चाय]] बाग़ानों की स्थापना। [[आगरा]] प्रान्त की स्थापना। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|424&lt;br /&gt;
|1835–1836 ई.&lt;br /&gt;
|सर चार्ल्स मेटकाफ कार्यकारी गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|425&lt;br /&gt;
|1835 ई.&lt;br /&gt;
|सर मेटकाफ द्वारा समाचार पत्रों पर से प्रतिबन्ध समाप्त। मैकाले का शिक्षा नीति पर प्रस्ताव। अंग्रेज़ी ([[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] के स्थान पर) पहली बार सरकारी भाषा बनी। कम्पनी ने पहली बार अपने सिक्के जारी किए (बिना [[मुग़ल]] सम्राट के नाम के)। [[कलकत्ता]] मेडिकल कॉलेज की स्थापना। कलकत्ता के हिन्दू कॉलेज में धर्मसभा के तत्वाधान में पश्चिमी ढंग की पहली सार्वजनिक सभा ([[30 जनवरी]]) जिसमें रामकमल सेन ने मांग की थी कि सभी ज़मीदारों तथा रैय्यतों के जीवन के मूलभूत सामाजिक आर्थिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श करे।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|426&lt;br /&gt;
|1836–1842 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड आकलैंण्ड गवर्नर-जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|427&lt;br /&gt;
|1837 ई.&lt;br /&gt;
|[[अकबर]] द्वितीय का उत्तराधिकारी बहादुरशाह द्वितीय 'जफ़र' गद्दी पर आसीन, महारानी विक्टोरिया गद्दी पर आसीन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|428&lt;br /&gt;
|1838 ई.&lt;br /&gt;
|[[अफ़ग़ानिस्तान]] के भू. पू. शासक शाहशुजा, रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ों के बीच 'त्रिपक्षीय सन्धि'। [[काबुल]]-कंधार पर अंग्रेज़ों का अधिकार। '[[कलकत्ता]] सोसाइटी फॉर द एक्यूजीशन आफ़ जनरल नालेज' नाम की साहित्यिक वैचारिक संस्था की स्थापना, केशवचन्द्र सेन का जन्म ([[19 नवम्बर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|429&lt;br /&gt;
|1839 ई.&lt;br /&gt;
|महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु। [[कलकत्ता]] तथा [[दिल्ली]] के बीच जी. टी. रोड का कार्य आरम्भ। अंग्रेज़ों द्वारा शाहशुजा को [[काबुल]] का अमीर (बाद में यूनाइटेड इंडिया एसोसियशन) की स्थापना ([[9 फ़रवरी]])। लन्दन में ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|430&lt;br /&gt;
|1839–1842 ई.&lt;br /&gt;
|प्रथम आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|431&lt;br /&gt;
|1840 ई.&lt;br /&gt;
|अफ़ग़ान कबाइलियों का विद्रोह, दोस्त मुहम्मद पदच्युत, मैन्चेस्टर में 'नार्दन सेंट्रल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|432&lt;br /&gt;
|1841 ई.&lt;br /&gt;
|[[कलकत्ता]] में 'देश हितेषणी सभा' की स्थापना ([[3 अक्टूबर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|433&lt;br /&gt;
|1841–1844 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड एलनबरो गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|434&lt;br /&gt;
|1842 ई.&lt;br /&gt;
|[[अफ़ग़ानिस्तान]] में अंग्रेज़ी सेना का संहार। [[काबुल]] पर पुनः आधिपत्य। दोस्त मुहम्मद पुनः अमीर बना। एलनबरो की शिमला घोषणा। अफ़ग़ानिस्तान से अंग्रेज़ी सैनिक वापस।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|435&lt;br /&gt;
|1843 ई.&lt;br /&gt;
|सिन्ध पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य। दासप्रथा पर प्रतिबन्ध। 'बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|436&lt;br /&gt;
|1844–1848 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड हार्डिंग गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|437&lt;br /&gt;
|1844 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड हार्डिंग द्वारा सरकारी नौकरियों में अंग्रेज़ी शिक्षित भारतीयों को नियुक्ति देने का निर्णय। कांग्रेसी नेता [[दिनशा एदुलजी वाचा]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|438&lt;br /&gt;
|1845–46 ई.&lt;br /&gt;
|प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध में सिख पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|439&lt;br /&gt;
|1846 &lt;br /&gt;
|अंग्रेज़ों तथा सिखों के बीच [[लाहौर]] की सन्धि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|440&lt;br /&gt;
|1847 ई.&lt;br /&gt;
|रुड़की में प्रथम इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|441&lt;br /&gt;
|1848–1856 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड डलहौज़ी गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|442&lt;br /&gt;
|1848 ई.&lt;br /&gt;
|सतारा ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित। गोद लेने की प्रथा पर प्रतिबन्ध। [[बम्बई]] में 'स्टूडेंट्स लिटरेरी एंड साइंटिफिक सोसाइटी' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|443&lt;br /&gt;
|1848–1849 ई.&lt;br /&gt;
|दूसरे आंग्ल सिख युद्ध में सिख पराजित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|444&lt;br /&gt;
|1849 ई.&lt;br /&gt;
|[[पंजाब]], जैतपुरा तथा संभलपुर का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय। [[कलकत्ता]] में बेथुन द्वारा पहली कन्या पाठशाला की स्थापना। डलहौज़ी द्वारा [[मुग़ल]] राजवंश की समाप्ति पर विचार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|445&lt;br /&gt;
|1850 ई.&lt;br /&gt;
|[[सिक्किम]] का एक भाग अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े में।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|446&lt;br /&gt;
|1851 ई.&lt;br /&gt;
|[[कलकत्ता]] में 'ब्रिटिश इंडियन एसोसियशन' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|447&lt;br /&gt;
|1852 ई.&lt;br /&gt;
|द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध। रंगून तथा पेगू पर आधिपत्य। भूतपूर्व पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु तथा उसकी पेंशन समाप्त। [[पूना]] में 'दक्कन एजुकेशन सोसायटी' की स्थापना। निज़ाम द्वारा बरार अंग्रेज़ों का समर्पित। कम्पनी के चार्टर का नवीनीकरण तथा पहली बार आई. सी. एस. परीक्षा प्रारम्भ। सस्ती डाक सेवा प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|448&lt;br /&gt;
|1854 ई.&lt;br /&gt;
|बंगाल में नील विद्रोह।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|449&lt;br /&gt;
|1855 ई.&lt;br /&gt;
|संथाल विद्रोह। पटसन उद्योग की शुरुआत। [[कलकत्ता]] में 'अंजुमने इस्लामी' (या मोहम्मडन एसोसिएशन) की स्थापना (मई 6)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|450&lt;br /&gt;
|1856 ई.&lt;br /&gt;
|[[अवध]] ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित। भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम। बंगाल विधान परिषद् द्वारा हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित। यूरोप में क्रीमिया युद्ध समाप्त। भारतीय सैनिकों को इनफील्ड रायफल और चर्बीयुक्त कारतूस प्रयोग के लिए दिये गये। [[कलकत्ता]] में इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|451&lt;br /&gt;
|1856–62 ई.&lt;br /&gt;
|[[लॉर्ड कैनिंग]] गवर्नर जनरल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|452&lt;br /&gt;
|1857 ई.&lt;br /&gt;
|[[कलकत्ता]], [[बम्बई]] तथा मद्रास विश्वविद्यालयों की स्थापना। 1857 का विद्रोह, केशवचन्द्र सेन ब्रह्म समाज में शामिल, मंगल पाण्डे द्वारा लेफ्टिनेंट बाग़ की गोली मारकर हत्या।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|453&lt;br /&gt;
|1858 ई.&lt;br /&gt;
|भारत का शासन [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] से ब्रिटिश सरकार के हाथों में। महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र। लॉर्ड कैनिंग को वायसराय की एक अतिरिक्त उपाधि (तत्पश्चात् गवर्नर जनरल के साथ वायसराय का भी प्रयोग प्रारम्भ)। समाज सुधारक डी. के. कर्वे का जन्म ([[18 अप्रैल]])। जगदीश चन्द्र बोस का जन्म ([[30 नवम्बर]]), [[लखनऊ]] पर अंग्रेज़ों का पुनः अधिकार।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|454&lt;br /&gt;
|1859 ई.&lt;br /&gt;
|गोद-प्रथा की समाप्ति की घोषणा रद्द। बंगाल में नील विद्रोह। कस्तूरी रंगा आयंगर का जन्म ([[15 दिसम्बर]])। जेम्स विल्सन (सुप्रीम कौंसिल का प्रथम वित्त सदस्य) द्वारा आयकर लागू। [[काग़ज़]] के नोट जारी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|455&lt;br /&gt;
|1861 ई.&lt;br /&gt;
|भारतीय परिषद् अधिनियम तथा भारतीय हाईकोर्ट्स अधिनियम लागू। आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ़ इंडिया (ए. एस. आई.) का गठन। दीनबंधु मित्र का नाटक 'नील-दर्पण' प्रकाशित। [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|456&lt;br /&gt;
|1862 ई.&lt;br /&gt;
|सदर न्यायालय उच्च न्यायालयों के साथ एकीकृत। भारतीय दंड संहिता लागू।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|457&lt;br /&gt;
|1862–63 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड एल्गिन प्रथम का [[वायसराय]] काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|458&lt;br /&gt;
|1863 ई.&lt;br /&gt;
|[[कलकत्ता]] में अब्दुल लतीफ़ की प्रेरणा से 'मोहम्मडन एसोसिएशन' की स्थापना। [[पटना]] कॉलेज की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|459&lt;br /&gt;
|1863–1902 ई.&lt;br /&gt;
|[[स्वामी विवेकानन्द]]।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|460&lt;br /&gt;
|1864–69 ई.&lt;br /&gt;
|सर जॉन लॉरेंस वायसराय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|461&lt;br /&gt;
|1864 ई.&lt;br /&gt;
|सैय्यद अहमद द्वारा 'मोहम्मडन साइंटिफिक सोसायटी' की स्थापना। मद्रास में ब्रह्मसमाज की प्रेरणा से समान उद्देश्यों वाली संस्था स्थापित। बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा 'दुर्गेश नन्दनी' उपन्यास की रचना। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|462&lt;br /&gt;
|1865 ई.&lt;br /&gt;
|[[यूरोप]] के साथ दूर संचार व्यवस्था का उदघाटन। [[उड़ीसा]] में दुर्भिक्ष।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|463&lt;br /&gt;
|1866 ई.&lt;br /&gt;
|केशवचन्द्र सेन द्वारा 'भारतीय ब्रह्म समाज' की स्थापना। गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म। 'ईस्ट इंडिया एसोसिएशन' की स्थापना तथा बाद में 'लन्दन इंडिया सोसाइटी' का इसमें विलेय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|464&lt;br /&gt;
|1867 ई.&lt;br /&gt;
|ब्रह्मसमाज की प्रेरणा से [[बम्बई]] में प्रार्थना समाज की स्थापना। नवगोपाल मित्र द्वारा [[कलकत्ता]] में स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार के लिए वार्षिक मेले का उदघाटन। आयकर पुनः लागू किए जाने का विरोध। 'पूना सार्वजनिक सभा: स्थापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|465&lt;br /&gt;
|1868 ई.&lt;br /&gt;
|अम्बाला से [[दिल्ली]] तक रेलवे लाइन का उदघाटन। शिशिर कुमार घोष द्वारा 'अमृत बाज़ार पत्रिका' प्रकाशित। भारत का प्रथम संध्या समाचार पत्र 'मद्रास-मेल' प्रकाशित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|467&lt;br /&gt;
|1869–72 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड मेयो का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|468&lt;br /&gt;
|1869 ई.&lt;br /&gt;
|ड्यूक आफ़ एडिनबरा की भारत यात्रा। स्वेज नहर का उदघाटन। [[महात्मा गांधी]] का जन्म। ठक्कर बापा का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|469&lt;br /&gt;
|1870 ई.&lt;br /&gt;
|मेयो का प्रान्तीय बंदोबस्त। लाल सागर टेलीग्राफ़ की शुरुआत। देशबन्धु चितरंजनदास का जन्म ([[5 नवम्बर]])। एम. जी. रानाडे प्रार्थना सभा में शामिल। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|470&lt;br /&gt;
|1872 ई.&lt;br /&gt;
|कूका विद्रोह। लॉर्ड मेयो की हत्या (पोर्ट ब्लेयर में)। [[आनन्द मोहन बोस]] द्वारा लन्दन में 'इंडियन सोसायटी' की स्थापना। जनगणना प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|471&lt;br /&gt;
|1872–76 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड नार्थब्रुक वायसराय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|472&lt;br /&gt;
|1873 ई.&lt;br /&gt;
|[[लाहौर]] में स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार के लिए 'स्वदेशी सभा' स्थापित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|473&lt;br /&gt;
|1874 ई.&lt;br /&gt;
|[[बिहार]] में दुर्भिक्ष।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|474&lt;br /&gt;
|1875 ई.&lt;br /&gt;
|स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा 'आर्य समाज' की स्थापना। प्रिंस आफ़ वेल्स एडवर्ड की भारत यात्रा। सैय्यद अहमद द्वारा 'मोहम्मडन ऐंग्लो-ओरिएन्टल कॉलेज' ([[अलीगढ़]]) की स्थापना। [[अजमेर]] में 'मेयो कॉलेज' की स्थापना। अमेरिका में थियोसीफिकल सोसायटी की स्थापना। [[कलकत्ता]] में 'इंडिया लीग' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|475&lt;br /&gt;
|1876–80 ई.&lt;br /&gt;
|[[लॉर्ड लिटन प्रथम]] का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|476&lt;br /&gt;
|1876 ई.&lt;br /&gt;
|क्केटा पर अंग्रेज़ी सेना का अधिकार। [[कलकत्ता]] में 'इंडियन एसोसिएशन' की स्थापना। आई. सी. एस. परीक्षा में शामिल होने के लिए आयु सीमा में कटौती। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|477&lt;br /&gt;
|1877 ई.&lt;br /&gt;
|लिटन का [[दिल्ली]] दरबार। महारानी विक्टोरिया भारत की साम्राज्ञी घोषित। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा दिल्ली में '[[दिल्ली दरबार]]' के अवसर पर पहली 'नेटिव प्रेस ऐसोसिएशन' की स्थापना (वे स्वयं इसके सचिव बने)। आई. सी. एस. की परीक्षा लन्दन के साथ-साथ भारत में भी आयोजित किए जाने की मांग। सैय्यद अमीर अली ने 'नेशनल मोहम्मडन एसोसिएशन' की स्थापना की।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|478&lt;br /&gt;
|1878 ई.&lt;br /&gt;
|लिटन का वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू, दूसरा अफ़ग़ान युद्ध आरम्भ। कलकत्ता में भारतीय पत्रकारों की 'नेटिव प्रेस कांफ्रेंस' का पहला सम्मेलन। 'साधारण ब्रह्म समाज' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|479&lt;br /&gt;
|1879 ई.&lt;br /&gt;
|अडयार (मद्रास) में मैडम ब्लावत्सकी (रूसी) तथा कर्नल अल्कॉट ([[अमेरिका]]) द्वारा 'थियोसोफिकल सोसाइटी' की स्थापना। [[चक्रवर्ती राजगोपालाचारी]] का जन्म ([[10 दिसम्बर]])। लिटन द्वारा [[इंग्लैंण्ड]] से आयातित सूती माल पर आयात कर हटाया गया। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|480&lt;br /&gt;
|1880–84 ई.&lt;br /&gt;
|दुर्भिक्ष आयोग की स्थापना। [[अफ़ग़ानिस्तान]] के प्रति ब्रिटिश नीति में परिवर्तन। डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या का जन्म ([[24 दिसम्बर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|481&lt;br /&gt;
|1881 ई.&lt;br /&gt;
|पहला फैक्ट्री अधिनियम। [[मैसूर]] राज्य उसके मूल शासकों को सौंपा गया। 'ट्रबियून', 'केसरी' तथा '[[मराठा]]' का प्रकाशन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|482&lt;br /&gt;
|1882 ई.&lt;br /&gt;
|वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट निरस्त। हंटर आयोग, भारतीय शिक्षा आयोग, [[पंजाब]] विश्वविद्यालय की स्थापना। [[सूरत]] में 'प्रजाहितवर्धक सभा' का गठन, पुरुषोत्तम दास टंडन का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|483&lt;br /&gt;
|1883 ई.&lt;br /&gt;
|[[इल्बर्ट बिल]] गवर्नर जनरल की विधान परिषद् में प्रस्तुत। भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|484&lt;br /&gt;
|1884–88 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड डफ़रिन वायसराय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|485&lt;br /&gt;
|1884 ई.&lt;br /&gt;
|केशवचन्द्र सेन की मृत्यु ([[8 जनवरी]])। [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉ. राजेन्द्र प्रसाद]] का जन्म ([[3 दिसम्बर]])। मद्रास में 'महाजन सभा' स्थापित। (दक्षिण भारत)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|486&lt;br /&gt;
|1885 ई.&lt;br /&gt;
|[[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] की स्थापना तथा पहला अधिवेशन [[बम्बई]] के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत स्कूल में। बंगाल टेनेंसी एक्ट पारित, बंगाल स्थानीय स्वशासन। अधिनियम पारित, आंग्ल-बर्मा युद्ध। बम्बई प्रेसीडेन्सी एसोसिएशन की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|487&lt;br /&gt;
|1886 ई.&lt;br /&gt;
|उत्तरी बर्मा का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय। [[अफ़ग़ानिस्तान]] की उत्तरी सीमा का निर्धारण। [[रामकृष्ण परमहंस]] की मृत्यु। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में [[पंजाब]] के प्रतिनिधि लाला मुरलीधर का [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] में भाषण। कांग्रेस के मंच से हिन्दी में यह पहला भाषण था।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|488&lt;br /&gt;
|1887 ई.&lt;br /&gt;
|महारानी विक्टोरिया के शासनकाल की स्वर्ण जयन्ती। [[इलाहाबाद]] विश्वविद्यालय की स्थापना। शिवनारायण अग्निहोत्री द्वारा 'देव समाज' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|489&lt;br /&gt;
|1888 ई.&lt;br /&gt;
|कर्नल थियोडोर बैंक द्वारा 'यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|490&lt;br /&gt;
|1888–94 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड लैंसडाउन वायसराय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|491&lt;br /&gt;
|1889 ई.&lt;br /&gt;
|प्रिंस आफ़ वेल्स की भारत की दूसरी यात्रा। जमनालाल बजाज, [[खुदीराम बोस]] तथा [[जवाहरलाल नेहरू]] का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|492&lt;br /&gt;
|1891 ई.&lt;br /&gt;
|द्वितीय फैक्ट्री अधिनियम। सहवास वर्ष अधिनियम (एज ऑफ़ कॉनसेन्ट एक्ट), [[मणिपुर]] में विद्रोह, [[भीमराव आम्बेडकर|डॉ. भीमराव अम्बेडकर]] का जन्म ([[14 अप्रैल]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|493&lt;br /&gt;
|1892 ई.&lt;br /&gt;
|भारतीय परिषद् अधिनियम, चुनाव की प्रणाली निर्धारत।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|494&lt;br /&gt;
|1893 ई.&lt;br /&gt;
|एनी बेसेन्ट का भारत आगमन, [[स्वामी विवेकानन्द]] शिकांगो सम्मेलन के लिए [[अमेरिका]] रवाना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|495&lt;br /&gt;
|1894 ई.&lt;br /&gt;
|नटाल ([[दक्षिण अफ़्रीका]]) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (कांग्रेस के [[लाहौर]] (1893) अधिवेशन से प्रभावित होकर)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|496&lt;br /&gt;
|1894–99 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड एल्गिन द्वितीय का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|497&lt;br /&gt;
|1896 ई.&lt;br /&gt;
|[[बम्बई]] में प्लेग।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|498&lt;br /&gt;
|1897 ई.&lt;br /&gt;
|भारतीय शिक्षा सेवा का गठन। [[सुभाषचन्द्र बोस]] का जन्म। [[लोकमान्य तिलक]] को [[शिवाजी]] से सम्बोधित देश के भक्ति के पद्य लिखने के आरोप में 18 माह की कड़ी क़ैद।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|499&lt;br /&gt;
|1898 ई.&lt;br /&gt;
|'प्रार्थना समाज' ([[बम्बई]]) द्वारा एक दलित वर्ग मिशन प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|500&lt;br /&gt;
|1899–1905 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड कर्ज़न वायसराय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|501&lt;br /&gt;
|1900 ई.&lt;br /&gt;
|भूमि स्वामित्व-परिषद् अधिनियम, दुर्भिक्ष आयोग, कांग्रेस के मंच से पहली महिला श्रीमती कादम्बिनी गांगुली का भाषण।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|502&lt;br /&gt;
|1901 ई.&lt;br /&gt;
|महारानी विक्टोरिया की मृत्यु, एडवर्ड सप्तम सिंहासनारूढ़, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त का गठन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|503&lt;br /&gt;
|1904 ई.&lt;br /&gt;
|कोआपरेटिव सोसायटी अधिनियम, पुरातत्त्व विभाग की स्थापना, भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, जतीन्द्रदास का जन्म।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|504&lt;br /&gt;
|1905 ई.&lt;br /&gt;
|बंगाल विभाजन, लॉर्ड मार्ले भारतीय मामलों के सचिव नियुक्त।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|505&lt;br /&gt;
|1905–10 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड मिण्टो द्वितीय का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|506&lt;br /&gt;
|1906 ई.&lt;br /&gt;
|कांगेस ([[कलकत्ता]] अधिवेशन) मंच से दादाभाई नौरोजी द्वारा 'स्वराज' शब्द का पहली बार प्रयोग। ढाका में 'मुस्लिम लीग' की स्थापना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|507&lt;br /&gt;
|1907 ई.&lt;br /&gt;
|[[सूरत]] अधिवेशन में कांग्रेस विभाजित। एनी बेसेन्ट थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्ष बनी। टाटा इस्पात कारखाने से इस्पात का उत्पादन प्रारम्भ।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|508&lt;br /&gt;
|1908 ई.&lt;br /&gt;
|समाचार पत्र अधिनियम। [[खुदीराम बोस]] को फाँसी। [[लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक|तिलक]] पर राजद्रोह का मुकदमा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|509&lt;br /&gt;
|1909 ई.&lt;br /&gt;
|[[मॉर्ले मिण्टो सुधार|मार्ले-मिण्टो सुधार]]। भारतीय परिषद् अधिनियम पारित। वायसराय के कार्यकारी परिषद् में प्रथम भारतीय (एच. पी. सिन्हा) की नियुक्ती। मदन लाल धींगरा द्वारा लन्दन में कर्ज़न वाइली की हत्या। [[दक्षिण अफ़्रीका]] जाते हुए जहाज़ पर [[गाँधी जी]] ने 30 हज़ार शब्दों की 'हिन्दी स्वराज' नामक पुस्तक लिखी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|510&lt;br /&gt;
|1910–16 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड हार्डग द्वितीय का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|511&lt;br /&gt;
|1910 ई.&lt;br /&gt;
|एडवर्ड तृतीय की मृत्यु, जार्ज पंचम सिंहासनारूढ़।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|512&lt;br /&gt;
|1911 ई.&lt;br /&gt;
|द्वितीय [[दिल्ली]] दरबार। सम्राट जार्ज पंचम की भारत यात्रा। बंगाल विभाजन रद्द। राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरित करने की घोषणा। जनगणना।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|513&lt;br /&gt;
|1912 ई.&lt;br /&gt;
|राजधानी [[कलकत्ता]] से [[दिल्ली]] स्थानान्तरित। दिल्ली प्रान्त का गठन। लॉर्ड हार्डिंग दिल्ली में बम विस्फोट में घायल। [[जवाहर लाल नेहरू]] पहली बार कांग्रेस अधिवेशन (बांकीपुर) में उपस्थित। [[इस्लिंग्टन कमीशन]] का गठन। [[अबुलकलाम आज़ाद]] द्वारा 'अल-हिलाल' अख़बार प्रकाशित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|514&lt;br /&gt;
|1913 ई.&lt;br /&gt;
|[[रवीन्द्रनाथ टैगोर]] को नोबेल पुरस्कार। फ़िरोजशाह मेहता द्वारा 'द बम्बई क्रॉनिकल' की शुरुआत। सैन फ़्राँसिस्को में गदर पार्टी का गठन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|515&lt;br /&gt;
|1914 ई.&lt;br /&gt;
|[[लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक|तिलक]] मांडले जेल से रिहा। 'फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट' की स्थापना। पनामा नहर की शुरुआत। एनी बेसेन्ट द्वारा 'न्यू इंडिया' प्रकाशित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|516&lt;br /&gt;
|1914–18 ई.&lt;br /&gt;
|प्रथम विश्व युद्ध। ब्रिटेन द्वारा तुर्की के विरुद्ध हमला।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|517&lt;br /&gt;
|1915 ई.&lt;br /&gt;
|भारतीय सुरक्षा अधिनियम। [[गाँधी जी]] [[दक्षिण अफ़्रीका]] से लौटे। [[अहमदाबाद]] में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना। गोखले का निधन। एनी बेसेन्ट द्वारा 'होमरूल लीग' के गठन की घोषणा ([[25 सितंबर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|518&lt;br /&gt;
|1916 ई.&lt;br /&gt;
|तिलक द्वारा 'होमरूल लीग' की स्थापना ([[26 अप्रैल]])। कांग्रेस-मुस्लिम लीग के बीच '[[लखनऊ]]-समझौता'। [[पूना]] में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना। [[बनारस]] हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना। दादाभाई नौरोजी का निधन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|519&lt;br /&gt;
|1916–1921 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड चेम्सफोर्ड का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|520&lt;br /&gt;
|1917 ई.&lt;br /&gt;
|मांटेग्यू भारत-मंत्री नियुक्त तथा इनकी भारत यात्रा। कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग की [[बम्बई]] में पहली संयुक्त बैठक। 'मांटेग्यू घोषणा'। भारत में स्वायत्तशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास तथा उत्तरदायी सरकार की स्थापना। [[गाँधी जी]] द्वारा चम्पारन सत्याग्रह आरम्भ। होमरूल आंदोलन के सिलसिले में एनी बेसेन्ट बंदी। शिक्षा से सम्बन्धित सैडलर आयोग की नियुक्ति। रौलट एक्ट कमेटी का गठन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|521&lt;br /&gt;
|1918 ई.&lt;br /&gt;
|रौलट एक्ट रिपोर्ट तथा मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित। सेनामें अफ़सरों के पद पर नियुक्ति के लिए भारतीय अर्ह घोषित। रासबिहारी बोस की अध्यक्षता में 'बंगीय जनसभा' की स्थापना। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की अध्यक्षता में [[बम्बई]] में आल इंडिया मॉडरेट कांफ्रेंस आयोजित। [[गाँधी जी]] के द्वारा [[अहमदाबाद]] कपड़ा मजदूरों की मांग के समर्थन में सत्याग्रह के रूप में पहली बार भूख हड़ताल का प्रयोग किया गया। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी नेशनल लिबरल लीग के अध्यक्ष निर्वाचित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|522&lt;br /&gt;
|1919 ई.&lt;br /&gt;
|मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार पारित। रौलट एक्ट पारित। [[जलियांवाला बाग़]] नरसंहार। ख़िलाफत कमेटी की स्थापना। [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] द्वारा सर की उपाधि वापस। [[बम्बई]] में मिल मजदूरों का पहला सम्मेलन। एनी बेसेन्ट की अध्यक्षता में [[दिल्ली]] में पहला अखिल भारतीय महिला सम्मेलन आयोजित। [[इलाहाबाद]] में 'लीडर समाचार पत्र' के कार्यालय में '[[उत्तर प्रदेश]] लिबरेशन एसोसिएशन' की स्थापना। तृतीय अफ़ग़ान युद्ध। भारतीय सरकार अधिनियम 1919 पारित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|523&lt;br /&gt;
|1920 ई.&lt;br /&gt;
|ख़िलाफत तथा असहयोग आंदोलन आरम्भ। [[गाँधी जी]] द्वारा बोअर युद्ध में मिला 'केसर-ए-हिन्द' पदक सरकार को वापस। लॉर्ड सिन्हा [[बिहार]]-[[उड़ीसा]] के गवर्नर। कांग्रेस का नेतृत्व गांधीजी के हाथ में। 'अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस' की स्थापना। [[अलीगढ़]] मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना। [[लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक|तिलक]] की मृत्यु। हण्टर कमेटी की रिपोर्ट प्रकाशित। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|524&lt;br /&gt;
|1921–1926 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड रीडिंग का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|525&lt;br /&gt;
|1921 ई.&lt;br /&gt;
|प्रिंस आफ़ वेल्स एडवर्ड की भारत यात्रा। 'चेम्बर आफ़ प्रिंसेस' की स्थापना। [[विजयवाड़ा]] अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी सम्मेलन में तिलक स्वराज कोष के लिए एक करोड़ रुपये एकत्रित करने का निर्णय ([[1 अप्रैल]])। [[दिल्ली]] अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में [[गाँधी जी]] का सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रस्ताप पारित ([[4 नवम्बर]])। मोपला विद्रोह ([[20 नवम्बर]])। गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, बोलपुर ([[पश्चिम बंगाल]) में 'विश्वभारती शान्ति निकेतन विश्वविद्यालय' की स्थापना। [[हड़प्पा]] में [[उत्खनन]] प्रारम्भ। भारत सरकार अधिनियम 1919 लागू।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|526&lt;br /&gt;
|1922 ई.&lt;br /&gt;
|[[कलकत्ता]] में सविनय अवज्ञा आंदोलन आरम्भ ([[15 जून]])। चौरी-चौरा कांड ([[5 फ़रवरी]])। बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने का निर्णय ([[12 फ़रवरी]])। कांग्रेस द्वारा सामूहिक सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित ([[31 दिसम्बर]])। [[मोतीलाल नेहरू]] तथा चितरंजन दास द्वारा 'स्वराज पार्टी' की स्थापना। मांटेग्यू का इस्तीफ़ा।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|527&lt;br /&gt;
|1923 ई.&lt;br /&gt;
|मदन मोहन मालवीय द्वारा 'इंडियन पार्टी' की स्थापना। [[बम्बई]] में कपड़ा मजदूरों की 'गिरनी कामग़ार यूनियन' स्थापित। 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएसन' की स्थापना। नमक-कर क़ानून पारित। सेना की कुछ बटालियनों की क़मान का भारतीयकरण। प्रफुल्ल चन्द्र द्वारा [[अहमदाबाद]] में [[गुजरात]] विद्यापीठ की आधारशिला, कमाल पाशा द्वारा तुर्की को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित करने से ख़िलाफ़त आंदोलन स्वतः समाप्त। स्वराजियों का परिषदों में प्रवेश।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|528&lt;br /&gt;
|1924 ई.&lt;br /&gt;
|[[कानपुर]] कॉन्सिपिरेसी केस। [[गाँधी जी]] पहली बार एवं अन्तिम बार कांग्रेस अध्यक्ष (बेलगाँव)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|529&lt;br /&gt;
|1925 ई.&lt;br /&gt;
|अखिल भारतीय दलित वर्ग एसोसिएशन की स्थापना। अंतरविद्यालय बोर्ड गठित। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की कार्यवाहियों के लिए हिन्दुस्तानी भाषा की स्वीकृति ([[26 दिसम्बर]])। सिख गुरुद्वारा पारित। चितरंजन दास का निधन। विट्ठलभाई पटेल विधानसभा में प्रथम भारतीय अध्यक्ष नियुक्त। शान्ति निकेतन में [[गाँधी जी]] तथा [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] में सामाजिक समस्याओं पर बातचीत ([[30 मई]])। लॉर्ड लिटन द्वितीय स्थानापन्न वायसराय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|530&lt;br /&gt;
|1926–31 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड इरविन वायसराय।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|531&lt;br /&gt;
|1926 ई.&lt;br /&gt;
|ट्रेड यूनियन एक्ट पारित। रुपये का अवमूल्यन। [[दिल्ली]] में 'आल इंडिया प्रोहिबेशन लीग' (अखिल भारतीय नशाबन्दी लीग) की स्थापना ([[31 जनवरी]])। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा स्वराज पार्टी के सदस्यों को केन्द्रीय विधानसभा से त्यागपत्र देने का प्रस्ताव पारित ([[6 मार्च]])। [[गाँधी जी]] द्वारा गुवाहाटी अधिवेशन में स्वाधीनता प्रस्ताव का विरोध ([[26 दिसम्बर]])। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|532&lt;br /&gt;
|1927 ई.&lt;br /&gt;
|साइमन कमीशन की नियुक्ति। भारतीय नौसेना अधिनियम। कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा। [[पूना]] में बड़ौदा की महारानी की अध्यक्षता में 'अखिल भारतीय सम्मेलन' आयोजित ([[5 जून]])। [[इलाहाबाद]] में पंडित मदन मोहन मालवीय की अध्यक्षता में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन द्वारा साइमन कमीशन का बहिष्कार करने का निर्णय ([[11 दिसम्बर]])। मुस्लिम लीग का विभाजन ([[29 दिसम्बर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|533&lt;br /&gt;
|1928 ई.&lt;br /&gt;
|डॉ. अंसारी की अध्यक्षता में सर्वदलीय बहिष्कार सम्मेलन बनारस में आयोजित। साइमन कमीशन के भारत आगमन पर [[3 फ़रवरी]] को हड़ताल का आह्वान ([[15 जनवरी]])। साइमन कमीशन भारत में आया ([[3 फ़रवरी]])। नेहरू रिपोर्ट, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन की विभिन्न शाखाओं को संगठित कर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक' की स्थापना (8-9 दिसम्बर) (इसका निर्णय [[सुखदेव]], शिववर्मा, फणीन्द्रनाथ बोस, [[भगत सिंह]], विजय कुमार सिन्हा तथा कुंदनलाल विद्यार्थी द्वारा [[फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम]], [[दिल्ली]] में एक गुप्त बैठक में लिया गया। [[चन्द्रशेखर आज़ाद]] बैठक में नहीं थे, परन्तु उन्हें एसोसिएशन के सशस्त्र विभाग का प्रधान नियुक्त किया गया।) साइमन कमीशन का विरोध करते समय पुलिस लाठीचार्ज में [[लाला लाजपत राय]] घायल ([[17 नवम्बर]])। [[कलकत्ता]] में [[जवाहर लाल नेहरू]] की अध्यक्षता में 'अखिल भारतीय समाजवादी युवा कांगेस' का पहला सम्मेलन ([[27 दिसम्बर]])। कांग्रेस अधिवेशन में गांधीजी की घोषणा—&amp;quot;यदि आप मेरे साथ सहयोग करें और ईमानदारी तथा बुद्धिमता से काम करें तो साल भर में स्वराज मिल जाएगा&amp;quot; ([[31 दिसम्बर]])। कांग्रेस अधिवेशन में डोमिनियन स्टेट्स के पक्ष में प्रस्ताव पारित तथा [[सुभाषचन्द्र बोस]] का पूर्ण स्वाधीनता प्रस्ताव अस्वीकृत। 'इंडिपेन्डेंस लीग' की स्थापना। कृषि के लिए शाही आयोग की नियुक्ति।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|534&lt;br /&gt;
|1929 ई.&lt;br /&gt;
|[[इलाहाबाद]] में [[अबुलकलाम आज़ाद]] की अध्यक्षता में 'अखिल भारतीय मुस्लिम सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना (इससे पहले राष्ट्रवादी मुसलमान नेता सैय्यद अहमद बरेलवी तथा युसूफ़ मुहर अली द्वारा 'कांगेस मुस्लिम पार्टी की स्थापना) (27-28 जुलाई)। केन्द्रीय असेम्बली में [[भगतसिंह]] व बटुकेश्वर दत्त द्वारा बम फेंका गया ([[8 अप्रैल]])। कृषि शोध परिषद् का गठन। [[मेरठ]] षड़यंत्र के अभियुक्तों पर मुकदमा आरम्भ। लाहौर षड़यंत्र के अभियुक्त जतिन दास की 64 दिनों की भूख हड़ताल के बाद मृत्यु। 166 दिन की भूख हड़ताल के बाद रंगून जेल में फूंजी विजाजा की मृत्यु। लॉर्ड इरविन की घोषणा। भारत का संवैधानिक प्रगति का लक्ष्य औपचारिक राज्य की स्थापना ([[31 अक्टूबर]])। [[लाहौर]] में कांगेस के 44वें अधिवेशन में [[जवाहर लाल नेहरू]] की अध्यक्षता में स्वराज्य का प्रस्ताव पारित ([[29 दिसम्बर]])। [[31 दिसम्बर]] की मध्यरात्रि के समय पंडित नेहरू ने रावी तट पर तिरंगा फहराया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|535&lt;br /&gt;
|1930 ई.&lt;br /&gt;
|[[जवाहर लाल नेहरू]] द्वारा [[26 जनवरी]] को स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने का आह्वान ([[7 जनवरी]])। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोसायटी द्वारा 'बम का दर्शन' नामक पर्ची प्रकाशित ([[2 फ़रवरी]])। अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी द्वारा सविनय अवज्ञा (नमक) आंदोलन का कार्यक्रम स्वीकृत ([[19 फ़रवरी]])। डांडी यात्रा आरम्भ ([[12 मार्च]])। नमक क़ानून तोड़ा गया ([[6 अप्रैल]])। [[28 मार्च]] को 'आनन्द भवन' देश को समर्पित तथा [[11 अप्रैल]] को 'स्वराज भवन' के रूप में नामकरण। [[सुभाषचन्द्र बोस]] [[कलकत्ता]] नगर निगम के मेयर निर्वाचित ([[22 अगस्त]])। सी. वी. रमन को भौतिकी का [[नोबेल पुरस्कार]] ([[14 नवम्बर]])। प्रथम गोलमेज सम्मेलन लन्दन में। कांग्रेस कार्यसमिति ग़ैरक़ानूनी घोषित ([[25 अगस्त]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|536&lt;br /&gt;
|1931–1936 ई.&lt;br /&gt;
|वायसराय लॉर्ड विलिगंटन का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|537&lt;br /&gt;
|1931 ई.&lt;br /&gt;
|कांग्रेस कार्यसमिति पर से प्रतिबंध हटा ([[26 जनवरी]])। [[लखनऊ]] में [[मोतीलाल नेहरू]] का निधन ([[5 फ़रवरी]])। [[इलाहाबाद]] में पुलिस मुठभेड़ में [[चन्द्रशेखर आज़ाद]] की मृत्यु ([[27 फ़रवरी]])। गांधी-इरविन समझौता (मार्च)। [[लाहौर]] में रावी तट पर [[भगत सिंह]], [[राजगुरु]] तथा [[सुखदेव]] को फाँसी ([[23 मार्च]])। शोक स्वरूप [[गाँधी जी]] को कराची अधिवेशन में युवा क्रान्तिकारियों द्वारा काले फूल भेंट ([[31 मार्च]])। [[बम्बई]] कांग्रेस हाउस में [[सरोजिनी नायडू]] द्वारा राष्ट्रीय झंडा दिवस का उदघाटन ([[26 अप्रैल]])। कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से गांधीजी को गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया ([[10 जून]])। गांधीजी द्वारा प्रस्तावित चरखा युक्त झंडा राष्ट्रीय कांग्रेस का ध्वज बना ([[1 अगस्त]])। संयुक्त प्रान्त में लगान-रोको आंदोलन ([[11 दिसम्बर]])। रॉयल लेबर कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|538&lt;br /&gt;
|1932 ई.&lt;br /&gt;
|सरकार द्वारा प्रस्तावित संवैधानिक शासन सुधारों पर श्वेतपत्र प्रकाशित। मेरठ षड़यंत्र केस के 27 अभियुक्तों को सज़ा ([[16 जनवरी]])। [[गाँधी जी]] द्वारा व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ ([[26 जून]])। एनी बेसेन्ट का देहान्त ([[20 सितंबर]])। पहली बार '[[पाकिस्तान]]' शब्द का प्रयोग। गांधीजी द्वारा साप्ताहिक 'हरिजन' की शुरुआत। रैम्जे मैक्डोनल्ड द्वारा [[16 अगस्त]] को साम्प्रदायिक निर्णय की घोषणा। [[24 सितंबर]] को गांधीजी और [[भीमराव आम्बेडकर|अम्बेडकर]] के मध्य [[पूना समझौता]] सम्पन्न।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|539&lt;br /&gt;
|1934 ई.&lt;br /&gt;
|सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस। [[पटना]] में आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में 'कांग्रेस समाजवादी पार्टी' के गठन की घोषणा ([[17 मई]])। कांग्रेस चुनाव घोषणा पत्र प्रकाशित ([[14 जून]])। [[गाँधी जी]] कुछ समय के लिए कांग्रेस से अलग ([[17 सितंबर]])। [[बम्बई]] में सम्पूर्णानन्द की अध्यक्षता में 'अखिल भारतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' का औपचारिक उदघाटन ([[21 अक्टूबर]])। उत्तरी भारत में भारी भूकम्प। [[बिहार]] में भीषण तबाही।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|540&lt;br /&gt;
|1935 ई.&lt;br /&gt;
|भारत सरकार अधिनियम 1935 पारित (अगस्त)। भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौता। [[गाँधी जी]] के साथी तथा सत्याग्रह आंदोलन में जेल जाने वाले प्रथम व्यक्ति मोहन लाल पाण्ड्या का निधन ([[18 मई]])। गाँधी जी द्वारा मीरा बेन के लिए वर्धा के पास सेवा गाँव के आश्रम (सेवाश्रम) की स्थापना ([[22 अक्टूबर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|541&lt;br /&gt;
|1936–44 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड लिनलिथगो का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|542&lt;br /&gt;
|1936 ई.&lt;br /&gt;
|सम्राट जॉर्ज पंचम का निधन ([[21 जनवरी]])। जॉर्ज षष्टम सम्राट बने। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी अधिवेशन में कांग्रेस कार्रवाई की [[हिन्दी भाषा|भाषा हिन्दी]] बनाए जाने सम्बन्धी प्रस्ताव अस्वीकृत ([[23 अगस्त]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|543&lt;br /&gt;
|1937 ई.&lt;br /&gt;
|संघीय न्यायालय की स्थापना। प्रान्तीय स्वशासन का उदघाटन (अप्रैल)। 11 में से 7 प्रान्तों में कांग्रेस मंत्रिमण्डल गठित। मध्य प्रान्त में डॉ. एन.0 जी. खरे द्वारा देश का पहला मंत्रिमण्डल गठित ([[9 जून]])। केन्द्रीय विधानसभी में चिंतामणि देशमुख द्वारा प्रस्तुत पति की सम्पत्ति में विधवाओं को उत्तराधिकार दिलाने वाला विधेयक पारित ([[5 फ़रवरी]])। [[गाँधी जी]] के नेतृत्व में अखिल भारतीय शिक्षा कांफ़्रेंस द्वारा नई शिक्षा नीति का नियोजन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|544&lt;br /&gt;
|1938 ई.&lt;br /&gt;
|[[सुभाषचन्द्र बोस]] कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित। बी. डी. [[सावरकर]] हिन्दू महासभा के अध्यक्ष निर्वाचित। शरतचन्द्र चटर्जी तथा [[मोहम्मद इक़बाल]] की मृत्यु। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|545&lt;br /&gt;
|1939 ई.&lt;br /&gt;
|त्रिपुरी अधिवेशन में [[सुभाषचन्द्र बोस]] कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर दुबारा निर्वाचित तथा बाद में त्यागपत्र ([[28 अप्रैल]])। बोस द्वारा 'फारवर्ड ब्लाक' की स्थापना ([[3 मई]])। द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ ([[3 सितंबर]])। विश्वयुद्ध में भारत को बिना इजाज़त शामिल करने के विरोधस्वरूप प्रान्तीय कांग्रेस मंत्रिमण्डलों का त्यागपत्र। [[मुहम्मद अली जिन्ना|जिन्ना]] द्वारा कांग्रेस शासन से मुक्ति के लिए [[22 दिसम्बर]] को 'मुक्ति दिवस' के रूप में मनाने का आह्वान ([[8 अक्टूबर]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|546&lt;br /&gt;
|1940 ई.&lt;br /&gt;
|मौलान [[अबुलकलाम आज़ाद]] कांग्रेस अध्यक्ष। मुस्लिम लीग के [[लाहौर]] अधिवेशन में जिन्ना द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक देश की मांग ([[22 मार्च]])। कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा [[गाँधी जी]] का व्यक्तिगत सत्याग्रह स्वीकृत ([[13 अक्टूबर]])। विनाबा भावे पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|547&lt;br /&gt;
|1941 ई.&lt;br /&gt;
|[[जापान]] द्वारा युद्ध की घोषणा। जिन्ना द्वारा [[पाकिस्तान]] की परिकल्पना पर कांग्रेस की स्वीकृति की मांग ([[17 अप्रैल]])। [[सुभाषचन्द्र बोस]] नज़रबन्दी से भागकर [[कलकत्ता]] से जर्मनी पहुँचे। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|548&lt;br /&gt;
|1942 ई.&lt;br /&gt;
|बर्मा में अंग्रेज़ों का आत्मसमर्पण। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के [[बम्बई]] अधिवेशन में 'अंग्रेज़ों, भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित तथा देशव्यापी आंदोलन शुरू ([[8 अगस्त]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|549&lt;br /&gt;
|1943 ई.&lt;br /&gt;
|मुस्लिम लीग ने अपने कराची अधिवेशन में 'डिवाइड एंड क्किट' (बाँटों और छोड़ो) स्लोगन को पारित किया।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|550&lt;br /&gt;
|1944–47 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड वेवेल का वायसराय काल।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|551&lt;br /&gt;
|1944 ई.&lt;br /&gt;
|[[असम]] पर जापानी आक्रमण। [[लाहौर]] में प्रमुख [[अकाली]] नेता शेरसिंह की घोषणा कि देश विभाजन या [[पाकिस्तान]] की मांग को स्वीकृति दी गई तो सिख भी अलग स्वतंत्र राष्ट्र की मांग करेंगे ([[1 सितंबर]])। राजगोपाचारी के सुझावों पर संवैधानिक अड़चन के लिए गांधी-जिन्ना वार्ता (9 सितंबर)। आज़ाद हिन्द फ़ौज भारत के निकट पहुँची। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|552&lt;br /&gt;
|1945 ई.&lt;br /&gt;
|[[ब्रिटेन]] में लेबर पार्टी की सरकार। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति। लॉर्ड वेवेल की घोषणा। आज़ाद हिन्द फ़ौज का आत्मसमर्पण तथा उन पर पहली बार मुकदमा। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|553&lt;br /&gt;
|1946 ई.&lt;br /&gt;
|कैबिनेट मिशन भारत में। नौसेना विद्रोह ([[18 फ़रवरी]])। मुस्लिम लीग ने [[16 अगस्त]] को 'सीधी कार्रवाई' दिवस मनाया। अंतरिम सरकार का गठन ([[2 सितंबर]])। [[जवाहर लाल नेहरू]] प्रधानमंत्री नियुक्त। मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में शामिल ([[26 अक्टूबर]])। संविधान सभा की पहली बैठक (दिसम्बर)। कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा ([[16 जून]])।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|554&lt;br /&gt;
|1947–48 ई.&lt;br /&gt;
|लॉर्ड माउण्ट बेटन का वायसराय काल ([[24 मार्च]] से)।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|555&lt;br /&gt;
|1947 ई.&lt;br /&gt;
|ब्रिटिश संसद में प्रधानमंत्री क्लीमेंट रिचर्ड हेडली द्वारा जून, 1948 तक अंग्रेज़ों के भारत छोड़ने के निर्णय की घोषणा ([[20 फ़रवरी]])। माउण्ट बेटन द्वारा जून, 1948 के स्थान पर [[15 अगस्त]], 1947 को सत्ता हस्तांतरण करने का निर्णय ([[3 जून]])। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति द्वारा विभाजन प्रस्ताव पारित ([[15 जून]])। ब्रिटिश संसद में भारत-[[पाकिस्तान]] विभाजन पारित तथा [[15 अगस्त]], 1947 को सत्ता हस्तांतरण सम्बन्धी 'भारतीय स्वाधीनता अधिनियम' [[4 जुलाई]], 1947 को संसद में पेश किया गया। भारतीय स्वाधीनता अधिनियम को ब्रिटिश सम्प्रभु (सम्राट) की स्वीकृति ([[18 जुलाई]])। [[14 अगस्त]] को पाकिस्तान बना तथा [[15 अगस्त]] को भारत स्वाधीन। [[जवाहर लाल नेहरू]] प्रधानमंत्री तथा लॉर्ड माउण्ट बेटन गवर्नर जनरल बने।&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>सुहाना</name></author>
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