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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>हिन्दी सामान्य ज्ञान</title>
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		<updated>2011-01-08T15:16:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दी सामान्य ज्ञान}}&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-green&amp;quot; width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| valign=&amp;quot;top&amp;quot;|&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;quiz display=simple&amp;gt;&lt;br /&gt;
{खड़ीबोली का अरबी-फ़ारसीमय रूप है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- [[फ़ारसी भाषा]]&lt;br /&gt;
- [[अरबी भाषा]]&lt;br /&gt;
+ [[उर्दू भाषा]]&lt;br /&gt;
- अदालती भाषा&lt;br /&gt;
|| [[उर्दू भाषा]] भारतीय-आर्य भाषा है, जो भारतीय संघ की 18 राष्ट्रीय भाषाओं में से एक व [[पाकिस्तान]] की राष्ट्रभाषा है। हालाँकि यह [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] और [[अरबी भाषा|अरबी]] से प्रभावित है, लेकिन यह [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] के निकट है और इसकी उत्पत्ति और विकास भारतीय उपमहाद्वीप में ही हुआ है। दोनों भाषाएँ एक ही भारतीय आधार से उत्पन्न हुई हैं। हिन्दी के लिए [[देवनागरी लिपि|देवनागरी]] का उपयोग होता है और उर्दू के लिए फ़ारसी-अरबी लिपि प्रयुक्त होती है, जिसे आवश्यकतानुसार स्थानीय रूप में परिवर्तित कर लिया गया है। {{point}}अधिक जानकारी के लिए देखें:- [[उर्दू भाषा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{[[हिन्दी भाषा]] का पहला समाचार-पत्र 'उदंत मार्ताण्ड' किस सन में प्रकाशित हुआ था?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- 1821&lt;br /&gt;
+ 1826 &lt;br /&gt;
- 1828&lt;br /&gt;
- 1830&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{हिन्दी के किस समाचार-पत्र में 'खड़ीबोली' को 'मध्यदेशीय भाषा' कहा गया है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
+ बनारस अखबार &lt;br /&gt;
- सुधाकर &lt;br /&gt;
- बुद्धिप्रकाश &lt;br /&gt;
- उदंत मार्तण्ड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{'गाथा' (गाहा) कहने से किस लोक प्रचलित काव्यभाषा का बोध होता है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- [[पालि भाषा|पालि]]&lt;br /&gt;
+ [[प्राकृत]]&lt;br /&gt;
- [[अपभ्रंश भाषा|अपभ्रंश]] &lt;br /&gt;
- [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]]&lt;br /&gt;
|| प्राकृत भाषा भारतीय आर्यभाषा का एक प्राचीन रूप है। इसके प्रयोग का समय 500 ई.पू. से 1000 ई. सन तक माना जाता है। धार्मिक कारणों से जब [[संस्कृत]] का महत्व कम होने लगा तो प्राकृत भाषा अधिक व्यवहार में आने लगी। इसके चार रूप विशेषत: उल्लेखनीय हैं।{{point}}अधिक जानकारी के लिए देखें:- [[प्राकृत|प्राकृत भाषा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{सिद्धों की उद्धृत रचनाओं की काव्य भाषा है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
+ देशभाषा मिश्रित अपभ्रंश अर्थात् पुरानी हिन्दी &lt;br /&gt;
- [[प्राकृत भाषा]] &lt;br /&gt;
- अवहट्ठ भाषा &lt;br /&gt;
- [[पालि भाषा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{अपभ्रंश भाषा के प्रथम व्याकरणाचार्य थे?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- [[पाणिनि]]&lt;br /&gt;
- [[कात्यायन]] &lt;br /&gt;
+ [[हेमचन्द्र]]&lt;br /&gt;
- [[पतंजलि]]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
{'जो जिण सासण भाषियउ सो मई कहियउ सार। जो पालइ सइ भाउ करि सो तरि पावइ पारु॥' इस दोहे के रचनाकार का नाम है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- स्वयंभू&lt;br /&gt;
+ [[देवसेन]] &lt;br /&gt;
- पुष्यदन्त&lt;br /&gt;
- कनकामर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{प्रादेशिक बोलियों के साथ [[ब्रज]] या मध्य देश की भाषा का आश्रय लेकर एक सामान्य साहित्यिक भाषा स्वीकृत हुई, जिसे चारणों ने नाम दिया?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- डिंगल भाषा &lt;br /&gt;
- मेवाड़ी भाषा &lt;br /&gt;
- मारवाड़ी भाषा&lt;br /&gt;
+ पिंगल भाषा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{अपभ्रंश के योग से [[राजस्थानी भाषा]] का जो साहित्यिक रुप बना, उसे कहा जाता है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- पिंगल भाषा&lt;br /&gt;
+ डिंगल भाषा &lt;br /&gt;
- मेवाड़ी भाषा &lt;br /&gt;
- बाँगरु भाषा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{[[अमीर ख़ुसरो]] ने जिन मुकरियों, पहेलियों और दो सुखनों की रचना की है, उसकी मुख्य भाषा है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- दक्खिनी&lt;br /&gt;
+ खड़ीबोली&lt;br /&gt;
- बुन्देली &lt;br /&gt;
- बघेली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{'एक नगर पिया को भानी। तन वाको सगरा ज्यों पानी।' यह पंक्ति किस भाषा की है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
+ [[ब्रजभाषा]]&lt;br /&gt;
- खड़ीबोली भाषा&lt;br /&gt;
- अपभ्रंश भाषा&lt;br /&gt;
- कन्नौजी भाषा&lt;br /&gt;
||[[ब्रजभाषा]] मूलत: ब्रजक्षेत्र की बोली है। विक्रम की 13वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी तक [[भारत]] में साहित्यिक भाषा रहने के कारण [[ब्रज]] की इस जनपदीय बोली ने अपने विकास के साथ भाषा नाम प्राप्त किया और ब्रजभाषा नाम से जानी जाने लगी। शुद्ध रूप में यह आज भी [[मथुरा]], [[आगरा]], [[धौलपुर]] और अलीगढ़ ज़िलों में बोली जाती है। इसे हम केंद्रीय ब्रजभाषा भी कह सकते हैं। आधुनिक ब्रजभाषा 1 करोड़ 23 लाख जनता के द्वारा बोली जाती है और लगभग 38,000 वर्गमील के क्षेत्र में फैली हुई है। {{point}}अधिक जानकारी के लिए देखें:- [[ब्रजभाषा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{[[देवनागरी लिपि]] को राष्ट्रलिपि के रूप में कब स्वीकार किया गया था?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
+ [[14 सितम्बर]], [[1949]]&lt;br /&gt;
- [[21 सितम्बर]], 1949&lt;br /&gt;
- [[23 सितम्बर]], 1949&lt;br /&gt;
- [[25 सितम्बर]], 1949&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{'रानी केतकी की कहानी' की भाषा को कहा जाता है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- हिन्दुस्तानी&lt;br /&gt;
+ खड़ीबोली&lt;br /&gt;
- [[उर्दू भाषा|उर्दू]]&lt;br /&gt;
- अपभ्रंश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{[[देवनागरी लिपि]] का विकास किस लिपि से हुआ है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- [[खरोष्ठी लिपि]]&lt;br /&gt;
- कुटिल लिपि&lt;br /&gt;
+ [[ब्राह्मी लिपि]]&lt;br /&gt;
- गुप्तकाल की लिपि&lt;br /&gt;
||[[चित्र:Devnagari-Lipi.jpg|thumb|200px|[[अशोक]] की [[ब्राह्मी लिपि]] के अक्षर]] प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट [[अशोक]] (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते है। नये अनुसंधानों के आधार पर 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है। ब्राह्मी भी [[खरोष्ठी]] की तरह ही पूरे [[एशिया]] में फैली हुई थी।{{point}}अधिक जानकारी के लिए देखें:- [[ब्राह्मी लिपि]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{'बाँगरू' बोली का किस बोली से निकट सम्बन्ध है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- कन्नौजी&lt;br /&gt;
- बुन्देली&lt;br /&gt;
- [[ब्रजभाषा]]&lt;br /&gt;
+खड़ीबोली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाओं का स्थिति काल रहा है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- 1500 ई.पू. से 500 ई.पू.&lt;br /&gt;
- 1000 ई.पू. से 500 ई.पू.&lt;br /&gt;
- 500 ई.पू. से 600 ई.पू.&lt;br /&gt;
+ 500 ई.पू. से 1000 ई.पू.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{'प्राचीन देशभाषा' (पूर्व अपभ्रंश) को 'अपभ्रंश' तथा परवर्ती अर्थात् अग्रसरीभूत अपभ्रंश को 'अवहट्ठ' किस भाषा वैज्ञानिक ने कहा है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- ग्रियर्सन&lt;br /&gt;
- भोलानाथ तिवारी&lt;br /&gt;
+सुनीतिकुमार चटर्जी एवं सुकुमार सेन&lt;br /&gt;
-उदयनारायण तिवारी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{अर्द्धमागधी अपभ्रंश से इनमें से किस बोली का विकास हुआ है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- पश्चिमी &lt;br /&gt;
- [[बिहारी भाषाएँ|बिहारी]]&lt;br /&gt;
- [[अवधी भाषा|अवधी भाषा]]&lt;br /&gt;
+ [[बांग्ला भाषा|बंगाली]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{कामताप्रसाद गुरु का हिन्दी [[व्याकरण (व्यावहारिक)|व्याकरण]] विषयक ग्रंथ, जो नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से प्रकाशित हुआ था, उसका नाम था?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- [[हिन्दी]] का सरल व्याकरण&lt;br /&gt;
- हिन्दी का प्रामाणिक व्याकरण&lt;br /&gt;
+ हिन्दी व्याकरण&lt;br /&gt;
- हिन्दी का व्यावहारिक व्याकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{[[देवनागरी लिपि]] है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- वर्णात्मक&lt;br /&gt;
- वर्णात्मक और अक्षरात्मक दोनों&lt;br /&gt;
+ अक्षरात्मक&lt;br /&gt;
-इनमें से कोई नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{विद्यापति की उस प्रमुख रचना का नाम बताइए, जिसमें 'अवहट्ठ' भाषा का बहुतायत प्रयोग हुआ है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- कीर्तिपताका&lt;br /&gt;
+ कीर्तिलता&lt;br /&gt;
- विद्यापति पदावली&lt;br /&gt;
-पुरुष परीक्षा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{जॉर्ज ग्रियर्सन ने पश्चिमोत्तर समुदाय की भाषा को आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की किस उपशाखा में रखा है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- भीतरी उपशाखा&lt;br /&gt;
+ बाहरी उपशाखा&lt;br /&gt;
- मध्यवर्गीय उपशाखा&lt;br /&gt;
- इनमें से कोई नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{[[उर्दू भाषा|उर्दू]] किस भाषा का मूल शब्द है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
+ तुर्की भाषा&lt;br /&gt;
- ईरानी भाषा&lt;br /&gt;
- [[अरबी भाषा]]&lt;br /&gt;
- [[फ़ारसी भाषा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{'साहित्य का इतिहास दर्शन' ग्रंथ के लेखक का नाम है?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
- [[श्यामसुन्दर दास|डॉ. श्यामसुन्दर दास]]&lt;br /&gt;
- [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]]&lt;br /&gt;
+ डॉ. नलिन विलोचन शर्मा&lt;br /&gt;
- डॉ. गुलाब राय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{'वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे' के रचयिता हैं?&lt;br /&gt;
|type=&amp;quot;()&amp;quot;}&lt;br /&gt;
-जगदीश गुप्त&lt;br /&gt;
-बाल मुकुन्द&lt;br /&gt;
-सियाराम शरण&lt;br /&gt;
+[[मैथिलीशरण गुप्त]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/quiz&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{{Social bookmarks}}&lt;br /&gt;
[[Category:सामान्य ज्ञान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;diff=28237</id>
		<title>इंदिरा गाँधी</title>
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		<updated>2010-05-31T13:22:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''इंदिरा गाँधी- भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जन्म-1917, मृत्यु-1984&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Indira-Gandhi.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=इंदिरा प्रियदर्शनी गांधी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=इन्दु&lt;br /&gt;
|जन्म=19 नवम्बर, 1917&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=[[जवाहरलाल नेहरू]], [[कमला नेहरू]] &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=[[फ़िरोज़ गाँधी]]&lt;br /&gt;
|संतान=[[राजीव गाँधी]] और [[संजय गाँधी]] &lt;br /&gt;
|मृत्यु=31 अक्टूबर, 1984&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[दिल्ली]], [[भारत]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=हत्या&lt;br /&gt;
|स्मारक=शक्ति स्थल, दिल्ली&lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=1971 के भारत-[[पाकिस्तान]] युद्ध में भारत की विजय&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[काँग्रेस]]&lt;br /&gt;
|पद=[[:श्रेणी:भारत के प्रधानमंत्री|भारत की तृतीय प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
|भाषा=हिन्दी, अग्रेज़ी&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=19 जनवरी 1966-24 मार्च 1977, 14 जनवरी 1980-31 अक्टूबर 1984&lt;br /&gt;
|विद्यालय=विश्वभारती विश्वविद्यालय बंगाल, इंग्लैंड की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, शांति निकेतन&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]] सम्मान&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा गांधी ने न केवल [[भारत|भारतीय]] राजनीति को नये आयाम दिये बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वे एक युग बनकर छाई रहीं। राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र की अखण्डता, राजनीति और लोक कल्याण, आदि उन्हें अपने दादा [[पं॰ मोतीलाल नेहरू|पं मोतीलाल नेहरू]] और पिता [[जवाहरलाल नेहरू|पं जवाहर लाल नेहरू]] से विरासत में मिले थे। उन दिनों भारत ब्रिटिश दासता के चंगुल से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा था। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
[[एशिया]] की इस लौह-महिला का जन्म 19 नवम्बर, 1917 को [[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]] के एक सम्पन्न परिवार में हुआ। इनका पूरा नाम है- 'इन्दिरा प्रियदर्शनी गांधी'। वे राष्ट्रनायक तथा भारत के प्रथम पंधानमंत्री पं0 जवाहर नेहरू की इकलौती सन्तान थीं। 1942 में उनका विवाह [[फिरोज़ गांधी]] से हुआ। उनके दो पुत्र हुए- [[राजीव गाँधी]] और [[संजय गाँधी]]। राजीव गांधी भी भारत के प्रधानमंत्री रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वानर सेना का गठन==&lt;br /&gt;
राजनेता और जनसाधारण, दोनों ही आज़ादी के आन्दोलनों में बराबर के भागीदार थे। नन्ही इन्दिरा के दिल पर इन सभी घटनाओं का अमिट प्रभाव पड़ा और 13 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने 'वानर सेना' का गठन कर अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया।&lt;br /&gt;
==प्रथम महिला प्रधानमंत्री==&lt;br /&gt;
*भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री [[लालबहादुर शास्त्री]] की मृत्यु के बाद श्रीमती इन्दिरा गांधी भारत की तृतीय और प्रथम महिला प्रधानमंत्री निर्वाचित हुई। &lt;br /&gt;
*1971 में पुनः भारी बहुमत से वे प्रधामंत्री बनी और 1977 तक निरन्तर इस गौरवशाली पद पर रहते हुए उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक नयी शक्ति के रूप में स्थापित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
करोड़ों लोगों की प्रिय प्रधानमंत्री का जीवन-इतिहास उपलब्धियों से भरा पड़ा है। जिनमें प्रमुख हैं—&lt;br /&gt;
#बैंकों का राष्ट्रीयकरण, &lt;br /&gt;
#निर्धन लोगों के उत्थान के लिए आयोजित 20 सूत्रीय कार्यक्रम, &lt;br /&gt;
#गुट निरपेक्ष आन्दोलन की अध्यक्षा, इत्यादि। &lt;br /&gt;
*1980 में वे विपक्षी दलों को करारी पराजय देकन पुनः प्रधानमंत्री चुनी गईं। &lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
31 अक्टूबर, 1984 की मनहूस सुबह को उन्हीं के अंगरक्षकों ने गोलियों से उन्हें शहादत की बलिवेदी पर चढ़ा दिया। &lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रधानमंत्री}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता_सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध_व्यक्तित्व_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;diff=28236</id>
		<title>इंदिरा गाँधी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;diff=28236"/>
		<updated>2010-05-31T13:22:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''इंदिरा गाँधी- भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जन्म-1917, मृत्यु-1984&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Indira-Gandhi.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=इंदिरा प्रियदर्शनी गांधी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=इन्दु&lt;br /&gt;
|जन्म=19 नवम्बर, 1917&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=[[जवाहरलाल नेहरू]], [[कमला नेहरू]] &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=[[फ़िरोज़ गाँधी]]&lt;br /&gt;
|संतान=[[राजीव गाँधी]] और [[संजय गाँधी]] &lt;br /&gt;
|मृत्यु=31 अक्टूबर, 1984&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[दिल्ली]], [[भारत]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=हत्या&lt;br /&gt;
|स्मारक=शक्ति स्थल, दिल्ली&lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=1971 के भारत-[[पाकिस्तान]] युद्ध में भारत की विजय&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[काँग्रेस]]&lt;br /&gt;
|पद=[[:श्रेणी:भारत के प्रधानमंत्री|भारत की तृतीय प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
|भाषा=हिन्दी, अग्रेज़ी&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=19 जनवरी 1966-24 मार्च 1977, 14 जनवरी 1980-31 अक्टूबर 1984&lt;br /&gt;
|विद्यालय=विश्वभारती विश्वविद्यालय बंगाल, इंग्लैंड की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, शांति निकेतन&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]] सम्मान&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा गांधी ने न केवल [[भारत|भारतीय]] राजनीति को नये आयाम दिये बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वे एक युग बनकर छाई रहीं। राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र की अखण्डता, राजनीति और लोक कल्याण, आदि उन्हें अपने दादा [[पं॰ मोतीलाल नेहरू|पं मोतीलाल नेहरू]] और पिता [[जवाहरलाल नेहरू|पं जवाहर लाल नेहरू]] से विरासत में मिले थे। उन दिनों भारत ब्रिटिश दासता के चंगुल से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा था। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
[[एशिया]] की इस लौह-महिला का जन्म 19 नवम्बर, 1917 को [[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]] के एक सम्पन्न परिवार में हुआ। इनका पूरा नाम है- 'इन्दिरा प्रियदर्शनी गांधी'। वे राष्ट्रनायक तथा भारत के प्रथम पंधानमंत्री पं0 जवाहर नेहरू की इकलौती सन्तान थीं। 1942 में उनका विवाह [[फिरोज़ गांधी]] से हुआ। उनके दो पुत्र हुए- [[राजीव गाँधी]] और [[संजय गाँधी]]। राजीव गांधी भी भारत के प्रधानमंत्री रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वानर सेना का गठन==&lt;br /&gt;
राजनेता और जनसाधारण, दोनों ही आज़ादी के आन्दोलनों में बराबर के भागीदार थे। नन्ही इन्दिरा के दिल पर इन सभी घटनाओं का अमिट प्रभाव पड़ा और 13 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने 'वानर सेना' का गठन कर अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया।&lt;br /&gt;
==प्रथम महिला प्रधानमंत्री==&lt;br /&gt;
*भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री [[लालबहादुर शास्त्री]] की मृत्यु के बाद श्रीमती इन्दिरा गांधी भारत की तृतीय और प्रथम महिला प्रधानमंत्री निर्वाचित हुई। &lt;br /&gt;
*1971 में पुनः भारी बहुमत से वे प्रधामंत्री बनी और 1977 तक निरन्तर इस गौरवशाली पद पर रहते हुए उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक नयी शक्ति के रूप में स्थापित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
करोड़ों लोगों की प्रिय प्रधानमंत्री का जीवन-इतिहास उपलब्धियों से भरा पड़ा है। जिनमें प्रमुख हैं—&lt;br /&gt;
#बैंकों का राष्ट्रीयकरण, &lt;br /&gt;
#निर्धन लोगों के उत्थान के लिए आयोजित 20 सूत्रीय कार्यक्रम, &lt;br /&gt;
#गुट निरपेक्ष आन्दोलन की अध्यक्षा, इत्यादि। &lt;br /&gt;
*1980 में वे विपक्षी दलों को करारी पराजय देकन पुनः प्रधानमंत्री चुनी गईं। &lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
31 अक्टूबर, 1984 की मनहूस सुबह को उन्हीं के अंगरक्षकों ने गोलियों से उन्हें शहादत की बलिवेदी पर चढ़ा दिया। &lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रधानमंत्री}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता_सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध_व्यक्तित्व_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
_NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=28235</id>
		<title>साँचा:सूचना बक्सा राज्य</title>
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		<updated>2010-05-31T13:21:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==उदाहरण==&lt;br /&gt;
&amp;lt;pre&amp;gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=&lt;br /&gt;
|स्थानीय भाषाओं में नाम=&lt;br /&gt;
|राजधानी=&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=&lt;br /&gt;
|जलवायु=&lt;br /&gt;
|तापमान=&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=&lt;br /&gt;
|शरद=&lt;br /&gt;
|वर्षा=&lt;br /&gt;
|मंडल=&lt;br /&gt;
|ज़िले=&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=&lt;br /&gt;
|महानगर=&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=&lt;br /&gt;
|मुख्य धर्म-सम्प्रदाय=&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=&lt;br /&gt;
|साक्षरता=&lt;br /&gt;
|स्त्री=&lt;br /&gt;
|पुरुष=&lt;br /&gt;
|उच्च न्यायालय=&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=&lt;br /&gt;
|नेता विरोधी दल=&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=&lt;br /&gt;
|विधान परिषद सदस्य संख्या=&lt;br /&gt;
|लोकसभा क्षेत्र=&lt;br /&gt;
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|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=&lt;br /&gt;
|पाठ 3=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
|emblem=&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/pre&amp;gt;&lt;br /&gt;
===परिणाम===&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Uttar Pradesh Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=लखनऊ&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=166,052,859&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=689&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=240928 km²&lt;br /&gt;
|मंडल=18&lt;br /&gt;
|ज़िले=71&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=कानपुर&lt;br /&gt;
|महानगर=कानपुर&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=लखनऊ, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ, वाराणसी(बनारस), ग़ाज़ियाबाद, कानपुर&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=हिन्दी, उर्दू&lt;br /&gt;
|स्थापना=1950/01/12&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=वाराणसी, आगरा, इलाहाबाद, कन्नौज, कुशीनगर, कौशाम्बी, चित्रकूट, झांसी, फ़ैज़ाबाद, मेरठ,&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=मथुरा, वृन्दावन, आगरा, वाराणसी, अयोध्या, चित्रकूट, फ़तेहपुर सीकरी, सारनाथ, श्रावस्ती, कुशीनगर&lt;br /&gt;
|मुख्य धर्म-सम्प्रदाय=हि्न्दू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:898&lt;br /&gt;
|साक्षरता=57.36&lt;br /&gt;
|स्त्री=42.97&lt;br /&gt;
|पुरुष=70.22&lt;br /&gt;
|जलवायु=उष्णदेशीय मानसून&lt;br /&gt;
|तापमान=31 °C&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=5°C&lt;br /&gt;
|उच्च न्यायालय=इलाहाबाद&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=बी. एल. जोशी&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=मायावती&lt;br /&gt;
|नेता विरोधी दल=शिवपाल सिंह यादव&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=404&lt;br /&gt;
|विधान परिषद सदस्य संख्या=100&lt;br /&gt;
|लोकसभा क्षेत्र=80&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://bharat.gov.in अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/03/25&lt;br /&gt;
|emblem=Uttar Pradesh Logo.gif&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;includeonly&amp;gt;{| align=&amp;quot;right&amp;quot; class=&amp;quot;infobox states&amp;quot; style=&amp;quot;padding:0.3em; float:right; margin: 0 0 1em 1em; width: 20em; font-size: 90%; line-height: 1.4em; border:#C1E0FF thin solid;&amp;quot; cellspacing=&amp;quot;3&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|colspan=&amp;quot;2&amp;quot;| &amp;lt;div align=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;[[चित्र:India-flag.gif|40px]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|colspan=&amp;quot;2&amp;quot;|&amp;lt;div align=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;'''{{PAGENAME}}'''&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|colspan=&amp;quot;2&amp;quot;|&lt;br /&gt;
&amp;lt;div id=&amp;quot;imagepad&amp;quot;&amp;gt;[[चित्र:{{{Image|}}}|160px|center]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
{{#if: {{{स्थानीय भाषाओं में नाम|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''नाम'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} {{{स्थानीय भाषाओं में नाम|}}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
{{#if: {{{राजधानी|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''राजधानी'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Capital::{{{राजधानी|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{राजभाषा(एँ)|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''राजभाषा(एँ)'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} {{#arraymap:{{{राजभाषा(एँ)|}}}|,|x|[[Language::x]]}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{स्थापना|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''स्थापना'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Date Of Formation::{{{स्थापना|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
{{#if: {{{जनसंख्या|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''जनसंख्या'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Population::{{{जनसंख्या|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{जनसंख्या घनत्व|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''·''' घनत्व&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Population Density::{{{जनसंख्या घनत्व|}}}]] /sqkm&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
{{#if: {{{क्षेत्रफल|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''क्षेत्रफल'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Area::{{{क्षेत्रफल|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{भौगोलिक निर्देशांक|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''भौगोलिक निर्देशांक'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Geographic Coordinate::{{{भौगोलिक निर्देशांक|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
{{#if: {{{जलवायु|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''जलवायु'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Climate::{{{जलवायु|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{तापमान|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''तापमान'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Temperature::{{{तापमान|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{ग्रीष्म|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''·''' ग्रीष्म&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Summer Temperature::{{{ग्रीष्म|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{शरद|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''·''' शरद&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Winter Temperature::{{{शरद|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{वर्षा|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''वर्षा'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Rainfall::{{{वर्षा|}}}]] मिमि&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
{{#if: {{{मंडल|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''मंडल'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[No Of Comissionaries::{{{मंडल|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{ज़िले|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''ज़िले'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[No Of Districts::{{{ज़िले|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{सबसे बड़ा नगर|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''सबसे बड़ा नगर'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Largest City::{{{सबसे बड़ा नगर|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
{{#if: {{{महानगर|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''महानगर'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} {{#arraymap:{{{महानगर|}}}|,|x|[[Metropolitan Cities::x]]}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
{{#if: {{{बड़े नगर|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''बड़े नगर'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} {{#arraymap:{{{बड़े नगर|}}}|,|x|[[Major Cities::x]]}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
{{#if: {{{मुख्य ऐतिहासिक स्थल|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''मुख्य ऐतिहासिक स्थल'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} {{#arraymap:{{{मुख्य ऐतिहासिक स्थल|}}}|,|x|[[Historical Places::x]]}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
{{#if: {{{मुख्य पर्यटन स्थल|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''मुख्य पर्यटन स्थल'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} {{#arraymap:{{{मुख्य पर्यटन स्थल|}}}|,|x|[[Tourist Places::x]]}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
{{#if: {{{मुख्य धर्म-सम्प्रदाय|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''मुख्य धर्म-सम्प्रदाय'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} {{#arraymap:{{{मुख्य धर्म-सम्प्रदाय|}}}|,|x|[[Religion::x]]}} एवं अन्य&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
{{#if: {{{लिंग अनुपात|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''लिंग अनुपात'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Sex Ratio::{{{लिंग अनुपात|}}}]]  ♂/♀&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
{{#if: {{{साक्षरता|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''साक्षरता'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Literacy::{{{साक्षरता|}}}]] %&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{स्त्री|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''·''' स्त्री &lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Female Literacy::{{{स्त्री|}}}]] %&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{पुरुष|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''·''' पुरुष&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Male Literacy::{{{पुरुष|}}}]] %&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
{{#if: {{{उच्च न्यायालय|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''उच्च न्यायालय'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[High Court::{{{उच्च न्यायालय|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{राज्यपाल|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''राज्यपाल'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Governor::{{{राज्यपाल|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
{{#if: {{{मुख्यमंत्री|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''मुख्यमंत्री'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Chief Minister::{{{मुख्यमंत्री|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{नेता विरोधी दल|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''नेता विरोधी दल'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Leader - Opposition Party::{{{नेता विरोधी दल|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
{{#if: {{{विधान सभा सदस्य संख्या|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''विधान सभा सदस्य संख्या'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Assembly Member Count::{{{विधान सभा सदस्य संख्या|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
{{#if: {{{विधान परिषद सदस्य संख्या|}}}|&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} '''विधान परिषद सदस्य संख्या'''&lt;br /&gt;
{{!}} {{!}} [[Council Member Count::{{{विधान परिषद सदस्य संख्या|}}}]]&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|- class=mergedrow&lt;br /&gt;
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|}[[Category:सूचना बक्सा राज्य]]&amp;lt;/includeonly&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>मोर</title>
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		<updated>2010-05-31T13:15:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''मोर, राष्‍ट्रीय पक्षी'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Peacock-1.jpg|मोर, राष्‍ट्रीय पक्षी&amp;lt;br /&amp;gt; Peacock, National Bird|thumb]]&lt;br /&gt;
मोर के अद्भुत सौंदर्य के कारण ही [[भारत]] सरकार ने 26 जनवरी,1963 को इसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया। भारतीय जनमानस के मन में बसा और आस्थाओं से रचाबसा पक्षी मोर, पावों क्रिस्‍तातुस, भारत का राष्‍ट्रीय पक्षी है। इसकी दो प्रजातियां हैं- &lt;br /&gt;
*नीला या भारतीय मोर (पैवो क्रिस्टेटस), जो भारत और [[श्रीलंका]] (भूतपूर्व सीलोन) में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
*हरा या जावा का मोर (पि. म्यूटिकस), जो [[म्यामांर]] (भूरपूर्व बर्मा) से जावा तक पाया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1913 में एक पंख मिलने से शुरू हुई खोज के बाद 1936 में कांगो मोर (अफ़्रो पैवो कॉनजेनेसिस) का पता चला। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मोर के अन्य नाम==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*‘फैसियानिडाई’ परिवार के सदस्य मोर का वैज्ञानिक नाम ‘पावो क्रिस्टेटस’ है। &lt;br /&gt;
*अग्रेजी भाषा में इसे ‘ब्ल्यू पीफॉउल’ अथवा ‘पीकॉक’ कहते हैं। &lt;br /&gt;
*संस्कृत भाषा में यह मयूर के नाम से जाना जाता है। &lt;br /&gt;
*अरबी भाषा में मोर को ‘ताऊस’ कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लक्षण==&lt;br /&gt;
भारत का राष्‍ट्रीय पक्षी एक रंगीन, हंस के आकार का पक्षी, पंखे की आकृति जैसी पंखों की कलगी, आँख के नीचे सफेद रंग और लंबी पतली गर्दन वाला होता है। इसकी आवाज़ अति प्रिय होती है। इस प्रजाति का नर मादा से अधिक रंगों से भरा  होता है जिसका चमकीला नीला सीना और गर्दन होती है और अत्यधिक मनमोहक कांस्‍य गहरे हरे रंग के 200 लम्‍बे पंखों का गुच्‍छा होता है। मोर के इन पंखों की संख्या 150 के लगभग होती है। मादा (मोरनी) भूरे रंग की होती है, नर से थोड़ा छोटा और इसके पास रंग भरे पंखों का गुच्‍छा नहीं होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्यतः मोर नीले रंग में पाया जाता है, परंतु यह सफेद, हरे, व जामनी रंग का भी होता है। इसकी उम्र 25 से 30 वर्ष तक होती है। नर मोर की लंबाई लगभग 215 सेंटीमीटर तथा मादा मोर की लंबाई लगभग 50 सेंटीमीटर ही होती है। नर और मादा मोर की पहचान करना बहुत आसान है। नर के सिर पर बड़ी कलगी तथा मादा के सिर पर छोटी कलगी होती है। नर मोर की छोटी-सी पूंछ पर लंबे व सजावटी पंखों का एक गुच्छा होता है। मादा पक्षी के ये सजावटी पंख नहीं होते। [[वर्षा ऋतु]] में मोर जब पूरी मस्ती में नाचता है तो उसके कुछ पंख टूट जाते हैं। वैसे भी वर्ष में एक बार अगस्त के महीने में मोर के सभी पंख झड़ जाते हैं। ग्रीष्म-काल के आने से पहले ये पंख फिर से निकल आते हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
कांगो मोर [[अफ़्रीका]] में पाया जाने वाला एकमात्र फैसिएनिड है। इनमें नर मुख्यतः नीले और हरे रंग का होता है और इसकी पूंछ छोटी और गोल होती है; मादा लाल या हरे रंग की होती है और उसके ऊपरी हिस्से में भूरा रंग होता है। यह बहुत ऊँचा तथा देर तक नहीं उड़ पाता। परंतु इसकी दृष्टि व सूंघने की शक्ति बहुत तेज होती है। अपने इन्हीं गुणों के कारण यह अपने मुख्य दुश्मनों कुत्तों तथा सियारों की पकड़ में कम ही आता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===नीला मोर===&lt;br /&gt;
पैवो की दोनो प्रजातियों में नर का शरीर 90-130 सेमी का और चमकीले धातुई हरे रंग के पंखों की लंबाई 150 सेमी तक होती है। ये पंख मुख्यतः ऊपरी पूंछ के हिस्सों से बने होते हैं, जो काफ़ी लंबे होते हैं। हर पंख के छोर पर आंख के समान एक सतरंगी निशान होता है, जिस पर नीले और तांबई रंग के छल्ले बने होते है। मादा को रिझाने के लिए नर अपने पंखों को ऊपर उठाकर फैला लेता है और उन्हें कंपित करता है, जिससे चमकीली झलक और सरसराहट की आवाज़ पैदा होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीले मोर के पंखो का रंग अधिकांशतः धातुई नीले-हरे रंग का होता है। हरे मोर के पंख नीले मोर के समान ही होते है और इसके शरीर के पंखों का रंग हरा और तांबई होता है। दोनों प्रजातियों की मादाओं का रंग हरा और भूरा होता है और आकार लगभग नर जितना ही होता है, लेकिन इनके लंबे पंख और क़लगी नहीं होती। प्राकृतिक रूप से दोनों प्रजातिया खुले निचले जंगलों में दिन के समय झुंड में रहती है और रात में पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर विश्राम करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मोर का महत्व==&lt;br /&gt;
भगवान [[कृष्ण]] के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्व को दर्शाता है। महाकवि [[कालिदास]] ने महाकाव्य [[‘मेघदूत’]] में मोर को राष्ट्रीय पक्षी से भी अधिक ऊँचा स्थान दिया है। राजा-महाराजाओं को भी मोर बहुत पसंद रहा है। प्रसिद्ध सम्राट [[चंद्रगुप्त मौर्य]] के राज्य में जो सिक्के चलते थे, उनमें एक तरफ मोर बना होता था। मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] जिस तख्त पर बैठता था, उसकी शक्ल मोर की थी। दो मोरों के मध्य बादशाह की गद्दी थी तथा पीछे पंख फैलाए मोर। हीरों-पन्नों से जड़े इस तख्त का नाम 'तख्त-ए-ताऊस’ रखा गया। जनमानस में अनेक कहावतें और लोकोक्तियां मोर को लेकर प्रचलित हैं।  &lt;br /&gt;
[[चित्र:Peacock-Mathura-3.jpg|मोर&amp;lt;br /&amp;gt; Peacock|thumb]]&lt;br /&gt;
==पक्षियों का राजा==&lt;br /&gt;
मोर एक बहुत ही सुन्दर, आकर्षक तथा शान वाला पक्षी है। बरसात के मौसम में काली घटा छाने पर जब यह पक्षी पंख फैला कर नाचता है तो ऐसा लगता मानो इसने हीरों-जड़ी शाही पोशाक पहनी हो। इसलिए इसे पक्षियों का राजा कहा जाता है। पक्षियों का राजा होने के कारण ही सृष्टि के रचयिता ने इसके सिर पर ताज जैसी कलगी लगाई है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===आकर्षण का केंद्र===&lt;br /&gt;
मोर प्रारंभ से ही मनुष्य के आकर्षण का केंद्र रहा है। अनेक धार्मिक कथाओं में मोर को बहुत ऊँचा दर्जा दिया गया है। हिन्दू धर्म में मोर को मार कर खाना महापाप समझा जाता है।&lt;br /&gt;
===सजावटी पक्षी===&lt;br /&gt;
सजावटी पक्षी के रूप में दुनिया के कई चिड़ियाघारों में मोर एक प्रमुख पक्षी है और यह पुरानी दुनिया में लंबे समय से प्रख्यात रहा है। बंदी अवस्था में हरे मोरों को अन्य पक्षियों से अलग रखना पड़ता है, क्योंकि इनका स्वभाव आक्रामक होता है। नीले मोर हालांकि गर्म और नम क्षेत्र के निवासी हैं, लेकिन ये उत्तरी क्षेत्र की ठंड में भी जीवित रह सकते हैं; हरे मोर ज़्यादा ठंड नहीं झेल सकते।&lt;br /&gt;
===मोर का नृत्य===&lt;br /&gt;
वर्षा ऋतु में मोर पूरी मस्ती में नाचता है। बरसात के मौसम में काली घटा छाने पर जब यह पक्षी पंख फैला कर नाचता है तो ऐसा लगता मानो इसने हीरों-जड़ी शाही पोशाक पहनी हो। मोर का ध्यान आते ही कई लोगों के पाँव थिरकने लगते हैं। कहते हैं मनुष्य ने नाचना मोर से ही सीखा है। नर के दरबारी नाच में पंखों को घुमाना और पंखों को संवारना एक सुंदर दृश्‍य उपस्थित करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भोजन==&lt;br /&gt;
मोर एक सर्वाहारी पक्षी है। इसकी मुख्य खुराक घास, पत्ते, ज्वार, बाजरा, चने, गेहूं व मकई है। इसके अतिरिक्त यह बैंगन, टमाटर, घीया तथा प्याज जैसी सब्जियाँ भी स्वाद से खाता है। अनार, केला व अमरूद जैसे फल भी यह चाव से खाता है। मोर मुख्य रूप से किसानों का मित्र-पक्षी है। यह खेतों में से कीड़े-मकोड़े, चूहे, छिपकलियां, दीमक वसांपों को खा जाता है। खेतों में खड़ी लाल मिर्च को खाकर यह किसान को थोड़ी हानि भी पहुँचाता है। मोर मूलतः वन्य पक्षी है, लेकिन भोजन की तलाश इसे कई बार मानव-आबादी तक ले आती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पारिवारिक इकाई==&lt;br /&gt;
प्रजनन काल में नर दो से पांच मादाओं का हरम बनाता है, जिनमें से प्रत्येक ज़मीन में बने गड्ढे में चार से आठ सफ़ेद रंग के अंडे देती है। मादा मोर साल में दो बार अंडे देती है, जिनकी संख्या 6 से 8 तक रहती है। अंडों में से बच्चे 25 से 30 दिनों में निकल आते हैं। बच्चे तीन-चार साल में बड़े होते हैं। मोर के बच्चे कम संख्या में ही बच पाते हैं। इनमें से अधिकांश को कुत्ते तथा सियार खा जाते है। ये जानवर मोर के अंडे भी खा जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राष्ट्रीय चिन्ह और प्रतीक}}&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय_चिन्ह_और_प्रतीक]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%AE&amp;diff=28223</id>
		<title>आम</title>
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		<updated>2010-05-31T13:13:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Mango.jpg|आम&amp;lt;br /&amp;gt; Mango|thumb]]&lt;br /&gt;
'''आम, राष्‍ट्रीय फल'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p align=&amp;quot;justify&amp;quot;&amp;gt;आम फलों का राजा कहलाता है। आम (मेनिगिफेरा इंडिका) [[भारत]] का राष्ट्रीय फल है। काजू परिवार (एनाकार्डिएसी) का सदस्य, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण फल है। ऊष्णकटिबंधीय देशों में आम बड़े पैमाने पर पैदा होते है। आम को पूर्वी [[एशिया]], [[म्यांमार]] (भूतपूर्व बर्मा) और भारत के [[असम]] राज्य का स्थानीय फल माना जाता है। आम एक गूदे दार फल है, जिसे पकाकर खाया जाता है या कच्‍चा होने पर इसे अचार आदि में इस्‍तेमाल किया जाता है। यह मेग्‍नीफेरा इंडिका का फल अर्थात आम है जो उष्‍ण कटिबंधी हिस्‍से का सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण और व्‍यापक रूप से उगाया जाने वाला फल है। फलों का राजा आम के बारे में लोगों की अलग- अलग धारणाएं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इस फल में बेहद कैलरीज होती हैं, तो वहीं कुछ इसे सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद बताते हैं। गर्मियों में यही एक ऐसा फल है, जो रसीला व मीठा है और हर उम्र के लोगों को भाता है। भारत में अन्य प्रकार के आम पाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आम का इतिहास==&lt;br /&gt;
पुर्तग़ाली व्यापारी भारत में आम लेकर आए थे। इसके बीजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में कठिनाई (यह ज़्यादा समय तक सुरक्षित नहीं रह पाते) के कारण संभवतः 1700 ई. में [[ब्राज़ील]] में इसे लगाए जाने से पहले पश्चिमी गोलार्द्ध इससे लगभग अपरिचित ही था, 1740 में यह [[वेस्ट इंडीज़]] पहुंचा। कई नवाबों और राजाओं के नामों पर भी इसका नामकरण हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आम के अन्य नाम==&lt;br /&gt;
*इस फल का नाम मैंगो, जिससे यह अंग्रेज़ी तथा स्पेनिशभाषी देशों में पहचाना जाता है।&lt;br /&gt;
*तमिल भाषा में मैन-के या मैन-गे से उत्पन्न हुआ है।&lt;br /&gt;
*पुर्तग़ालियों ने पश्चिम भारत में बसने पर मैंगा के रूप में अपनाया था।&lt;br /&gt;
*आम को अलग-अलग नाम दिए गए जैसे लंगड़ा, दशहरी, अलफॉंसो और चौंसा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारत में आम==&lt;br /&gt;
भारत में, पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़ कर आम लगभग सभी स्थानों पर पैदा होता है। हमारे यहां आम की सैंकड़ों किस्में है। यह आकार और रंगों में अलग-अलग होते हैं। भारत में आम की फसल अति प्राचीनकाल से उगाई जाती रही है। आम को अनंत समय से भारत में उगाया जाता रहा है। विश्व के अनेक देशों में आम की अलग-अलग जाति होती है। फिर भी हिंदुस्तान का प्रसिद्ध फल आम ही है। आँकड़ों के मुताबिक इस समय भारत में प्रतिवर्ष एक करोड़ टन आम पैदा होता है जो दुनिया के कुल उत्पादन का 52 फ़ीसदी है। स्वाद, स्वास्थ्य एवं बल संवर्धन की दृष्टि से आम सभी फलों में आगे है। आम भिन्न-भिन्न जाति के होते हैं। किन्तु सभी आमों के गुण प्रायः एक से ही होते हैं। &lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
आम भारत के लोकगीतों और धार्मिक अनुष्ठानों से अनिवार्य रूप से जुड़ा है। कवि [[कालिदास]] ने इसकी प्रशंसा में गीत लिखे हैं। अलेक्‍सेंडर ने इसका स्‍वाद चखा है और साथ ही चीनी धर्म यात्री [[हुएन-सांग]] ने भी। मुग़ल बादशाह [[अकबर]] ने [[बिहार]] के दरभंगा में 1,00,000 से अधिक आम के पौधे रोपे थे, जिसे अब लाखी बाग के नाम से जाना जाता है। स्वयं बुद्ध को एक आम्रकुंज भेंट किया गया था, ताकि वह उसकी छाँव में विश्राम कर सकें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आम का वृक्ष==&lt;br /&gt;
*आम का वृक्ष एक सदाबहार वृक्ष है। &lt;br /&gt;
*इसकी लंबाई 15-18 मीटर तक होती है और इसकी आयु काफ़ी लंबी होती है। &lt;br /&gt;
*इसके कुंताकार पत्ते 30 सेमी तक लंबे होते हैं; फूल छोटे, गुलाबी और ख़ुशबूदार होते हैं। लंबी डंडियों के छोर पर छोटे गुच्छों में होते हैं। &lt;br /&gt;
*यह उभयलिंगी होते हैं, अर्थात कुछ में पुंकेसर व स्त्रीकेसर, दोनों होते हैं और कुछ में सिर्फ़ पुंकेसर होते है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आम की फ़सल==&lt;br /&gt;
आम के लिए किसी विशेष मिट्टी की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन अच्छी क़िस्में सिर्फ़ उन्हीं जगहों पर अच्छी फ़सल देती है, जहाँ फलों की पैदावार बढ़ाने लायक बढ़िया शुष्क मौसम रहता हो। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में फफूंद के कारण होने वाला रोग एंथ्रकनोज़ फूलों और कच्चे फलों को नष्ट कर देता है तथा इस पर नियंत्रण भी मुश्किल होता है। ग्राफ़्टिंग या बडिंग के ज़रिये इसका संजनन किया जाता है। दो वृक्षों को बिना काटे क़लम लगाने (जिसमें एक अंकुर तथा एक स्वतंत्र रूप से लगाए गए पौधे के मूलवृंत को जोड़ दिया जाता है और बाद में अंकुर को उसके तने से काटकर हटा दिया जाता है) की प्रक्रिया एशिया के कई इलाक़ों में काफ़ी लोकप्रिय है, लेकिन यह बहुत मेहनत वाली और ख़र्चीली प्रक्रिया है। फ़्लोरिडा में ज़्यादा सक्षम तरीक़ों, पतली परत के आरोपण और काटकर अंकुर लगाने, का विकास किया गया है और इनका वाणिज्यिक उपयोग भी किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आकार और लक्षण==&lt;br /&gt;
*इसके फल आकार और लक्षणों में भिन्नता लिए होते है; सबसे छोटे फल आलूबुखारा जितना बड़ा होता है। जबकि बड़े फल 1.8 से 2.3 किग्रा तक होते हैं। &lt;br /&gt;
*इसका आकार अंडाकार, गोल, हृदयाकार, गुर्दे के आकार का या लंबा और पतला होता है। &lt;br /&gt;
*इसकी कुछ क़िस्में चटकीली लाल और पीली रंगत वाली होती हैं, जबकि अन्य फीके हरे रंग की होती हैं। &lt;br /&gt;
*फल में पाया जाने वाला एकमात्र बड़ा बीज चपटा होता है और इसके चारों ओर मौजूद गूदा पीले से नारंगी रंग का रसदार होता है और इसका स्वाद विशेष मीठी गंध के साथ मज़ेदार होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आम के विभिन्न प्रयोग==&lt;br /&gt;
*यह अपने सभी रूपों में आकर्षण का केंद्र है। &lt;br /&gt;
*आम को चूसकर, काटकर जूस निकालकर, केक, पेस्ट्री में डाल कर या फिर चटनी और अचार में डालकर खाया जा सकता है। &lt;br /&gt;
*बौर, कैरी यानी कच्ची अंबिया और पूरा पका आम को भी खाया जाता है। &lt;br /&gt;
*आम का इस्तेमाल पना बनाने, अचार, मुरब्बे और जैम बनाने में किया जाता है। &lt;br /&gt;
*आम से अमचूर यानी आम की खटाई भी बनती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आम के फायदे==&lt;br /&gt;
*आम में सभी फलों से अधिक विटामिन ‘ए’ होता है। इसके अतिरिक्त विटामिन ‘बी’ भी अधिक होते है। इसमें 'आयरन' भी बेहद तादाद में पाया जाता है, &lt;br /&gt;
*इसमें विटामिन 'सी' और 'ई' भरपूर तादाद में पाया जाता है। जो आँखों के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं।&lt;br /&gt;
*आम और जामुन का रस समान भाग में मिलाकर कुछ दिनों तक पीने से मधुमेह रोग ठीक हो जाता है। &lt;br /&gt;
*आम खाने से गुर्दे की दुर्बलता दूर होती है।  &lt;br /&gt;
*आम उन लोगों के लिए भी पोषण युक्त है, जो कमज़ोर, कम ऊर्जा और कम ऊर्जस्विता की दिक्कत से गुजर रहे है। यह फल शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है। यहां तक कि हरा आम और कैरी विटामिन 'सी' का अच्छा स्रोत हैं और इसमें चीनी की मात्रा भी न के बराबर होती है।&lt;br /&gt;
*आम एंटी ऑक्सिडेंट का अच्छा स्रोत है। यह एंटी ऑक्सिडेंट न केवल उम्र बढ़ने की प्रगति को कम कर देते हैं, बल्कि त्वचा से जुड़ी कई बीमारियों मसलन, सरवाइकल और कोलन कैंसर से भी बचाता है। &lt;br /&gt;
*आम शरीर से हानिकारक विशेली पदार्थ और फ्री रेडिकल्स को बाहर करने में भी सहायक है। &lt;br /&gt;
*वहीं दूसरी और आम रेशो से भरपूर होता है और कब्ज होने से रोकता है। यह पित्त को कम करता है और पाचन तन्त्र को ठीक बनाए रखता है।&lt;br /&gt;
*अगर चेहरे का सौंदर्य बढ़ाना हो, तो आम के रस में शहद मिलाकर चेहरे पर लगाएं।&lt;br /&gt;
*अगर बाल झड़ते हों, तो आम के कोमल पत्ते तथा डंठल को पानी में उबाल कर सिर धोएं। &lt;br /&gt;
*कान सुन्न होने की समस्या पर आम का पत्ता पीसकर बिना पानी के हल्का गरम कर कान में दो चार बूंद डालें। आँखों के चारों ओर काले घेरे या झाई हों, तो आम के रस को रुई से चेहरे पर लगाएं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आम से होने वाले नुकसान==&lt;br /&gt;
*आम में चीनी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, इसलिए इसे कम मात्रा में लें। &lt;br /&gt;
*जो लोग मोटे हैं, वे इसे कम खाया करें। नहीं तो, यह शरीर में हारमोनल बदलाव की वजह बन सकता है। &lt;br /&gt;
*आम को एक साथ बहुत मात्रा में खाना नुकसानदेह होता है। &lt;br /&gt;
*आम खाने के बाद मुँहासे हो जाते हैं। इसलिए इसे दही या सूखे फलों के साथ खाएंगे, तो यह ज्यादा फायदेमंद रहेगा। &lt;br /&gt;
*आम के अधिक मात्रा में खाने से मधुमेह व मोटापा बढ़ने की दिक्कत से गुज़रना पड़ सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राष्ट्रीय चिन्ह और प्रतीक}}&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय_चिन्ह_और_प्रतीक]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
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		<title>ग़ालिब</title>
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		<updated>2010-05-31T13:12:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Blank-1.gif&lt;br /&gt;
|जन्म=27 दिसम्बर 1797&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[आगरा]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=अब्दुल्लाबेग ग़ालिब&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=उमरो बेगम&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=[[शायर]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=15 फरवरी, 1869&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=दीवाने-ग़ालिब, उर्दू-ए-हिन्दी, उर्दू-ए-मुअल्ला, नाम-ए-ग़ालिब, लतायफे गैबी, दुवपशे कावेयानी &lt;br /&gt;
|विषय=उर्दू शायरी&lt;br /&gt;
|भाषा=[[उर्दू]] और [[फ़ारसी भाषा]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब''''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म-1797 -  मृत्यु-1869&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
ग़ालिब का जन्म [[आगरा]], [[उत्तर प्रदेश]] में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम 'मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब' था। बाद में वे [[दिल्ली]] में बस गए थे। 13 वर्ष की उम्र में उनका विवाह उमरो बेगम से हुआ था। ग़ालिब ऐशो-आराम की ज़िंदग़ी व्यतीत करते थे। अपव्ययी होने के कारण वे कर्ज में डूबे रहते थे। उनके जीवन का उत्तरार्ध बड़ी विपन्नता में बीता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
उर्दू एवं फ़ारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे शायर हो गये।&lt;br /&gt;
==बेहतरीन शायर==&lt;br /&gt;
मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब' का स्थान उर्दू के चोटी के शायर के रूप में सदैव अक्षुण्ण रहेगा। उन्होंने उर्दू साहित्य को एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। उर्दू और फ़ारसी के बेहतरीन शायर के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली तथा अरब एवं अन्य राष्ट्रों में भी वे अत्यन्त लोकप्रिय हुए। ग़ालिब की शायरी में एक तड़प, एक चाहत और एक आशिक़ाना अंदाज़ पाया जाता है। जो सहज ही पाठक के मन को छू लेता है। &lt;br /&gt;
==ग़ालिब का दीवान==&lt;br /&gt;
उनकी ख़ूबसूरत शायरी का संग्रह 'दीवान-ए-ग़ालिब' के रूप में 10 भागों में प्रकाशित हुआ है। जिसका अनेक स्वदेशी तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। &lt;br /&gt;
==रचनाएं==&lt;br /&gt;
ग़ालिब ने अपनी रचनाओं में सरल शब्दों का प्रयोग किया है। उर्दू गद्य-लेखन की नींव रखने के कारण इन्हें वर्तमान उर्दू गद्य का जन्मदाता भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
#उर्दू-ए-हिन्दी तथा &lt;br /&gt;
#उर्दू-ए-मुअल्ला पत्र संग्रह के इनके दो प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। इनके अलावा ग़ालिब की अन्य गद्य रचनाएँ &lt;br /&gt;
#नाम-ए-ग़ालिब, &lt;br /&gt;
#लतायफे गैबी, &lt;br /&gt;
#दुवपशे कावेयानी आदि हैं। &lt;br /&gt;
इनकी रचनाओं में देश की तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति का वर्णन हुआ है। &lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
ग़ालिब 72 वर्ष की आयु में परलोक सिधारे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ghalib/ghazal_index.html?nagari दीवान ए ग़ालिब]&lt;br /&gt;
*[http://divan-e-ghalib.blogspot.com/ मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी]&lt;br /&gt;
*[http://www.ghalibinstitute.com/ Ghalib Institute]&lt;br /&gt;
*[http://gdhar.com/2005/06/26/an-ode-to-mirza-ghalibs-haveli/ Mirza Ghalib’s Haveli]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:उर्दू शायर]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>ग़ालिब</title>
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		<updated>2010-05-31T13:05:10Z</updated>

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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Blank-1.gif&lt;br /&gt;
|जन्म=27 दिसम्बर 1797&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[आगरा]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=अब्दुल्लाबेग ग़ालिब&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=उमरो बेगम&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=[[शायर]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=15 फरवरी, 1869&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=दीवाने-ग़ालिब, उर्दू-ए-हिन्दी, उर्दू-ए-मुअल्ला, नाम-ए-ग़ालिब, लतायफे गैबी, दुवपशे कावेयानी &lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब''''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म-1797 -  मृत्यु-1869&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
ग़ालिब का जन्म [[आगरा]], [[उत्तर प्रदेश]] में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम 'मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब' था। बाद में वे [[दिल्ली]] में बस गए थे। 13 वर्ष की उम्र में उनका विवाह उमरो बेगम से हुआ था। ग़ालिब ऐशो-आराम की ज़िंदग़ी व्यतीत करते थे। अपव्ययी होने के कारण वे कर्ज में डूबे रहते थे। उनके जीवन का उत्तरार्ध बड़ी विपन्नता में बीता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
उर्दू एवं फ़ारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे शायर हो गये।&lt;br /&gt;
==बेहतरीन शायर==&lt;br /&gt;
मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब' का स्थान उर्दू के चोटी के शायर के रूप में सदैव अक्षुण्ण रहेगा। उन्होंने उर्दू साहित्य को एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। उर्दू और फ़ारसी के बेहतरीन शायर के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली तथा अरब एवं अन्य राष्ट्रों में भी वे अत्यन्त लोकप्रिय हुए। ग़ालिब की शायरी में एक तड़प, एक चाहत और एक आशिक़ाना अंदाज़ पाया जाता है। जो सहज ही पाठक के मन को छू लेता है। &lt;br /&gt;
==ग़ालिब का दीवान==&lt;br /&gt;
उनकी ख़ूबसूरत शायरी का संग्रह 'दीवान-ए-ग़ालिब' के रूप में 10 भागों में प्रकाशित हुआ है। जिसका अनेक स्वदेशी तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। &lt;br /&gt;
==रचनाएं==&lt;br /&gt;
ग़ालिब ने अपनी रचनाओं में सरल शब्दों का प्रयोग किया है। उर्दू गद्य-लेखन की नींव रखने के कारण इन्हें वर्तमान उर्दू गद्य का जन्मदाता भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
#उर्दू-ए-हिन्दी तथा &lt;br /&gt;
#उर्दू-ए-मुअल्ला पत्र संग्रह के इनके दो प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। इनके अलावा ग़ालिब की अन्य गद्य रचनाएँ &lt;br /&gt;
#नाम-ए-ग़ालिब, &lt;br /&gt;
#लतायफे गैबी, &lt;br /&gt;
#दुवपशे कावेयानी आदि हैं। &lt;br /&gt;
इनकी रचनाओं में देश की तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति का वर्णन हुआ है। &lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
ग़ालिब 72 वर्ष की आयु में परलोक सिधारे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ghalib/ghazal_index.html?nagari दीवान ए ग़ालिब]&lt;br /&gt;
*[http://divan-e-ghalib.blogspot.com/ मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी]&lt;br /&gt;
*[http://www.ghalibinstitute.com/ Ghalib Institute]&lt;br /&gt;
*[http://gdhar.com/2005/06/26/an-ode-to-mirza-ghalibs-haveli/ Mirza Ghalib’s Haveli]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:उर्दू शायर]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>ग़ालिब</title>
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		<updated>2010-05-31T13:02:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Blank-1.gif&lt;br /&gt;
|जन्म=27 दिसम्बर 1797&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[आगरा]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=अब्दुल्लाबेग ग़ालिब&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=उमरो बेगम&lt;br /&gt;
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|मुख्य रचनाएँ=दीवाने-ग़ालिब, उर्दू-ए-हिन्दी, उर्दू-ए-मुअल्ला, नाम-ए-ग़ालिब, लतायफे गैबी, दुवपशे कावेयानी &lt;br /&gt;
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|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
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|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब''''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म-1797 -  मृत्यु-1869&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
ग़ालिब का जन्म [[आगरा]], [[उत्तर प्रदेश]] में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम 'मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब' था। बाद में वे [[दिल्ली]] में बस गए थे। 13 वर्ष की उम्र में उनका विवाह उमरो बेगम से हुआ था। ग़ालिब ऐशो-आराम की ज़िंदग़ी व्यतीत करते थे। अपव्ययी होने के कारण वे कर्ज में डूबे रहते थे। उनके जीवन का उत्तरार्ध बड़ी विपन्नता में बीता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
उर्दू एवं फ़ारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे शायर हो गये।&lt;br /&gt;
==बेहतरीन शायर==&lt;br /&gt;
मिर्ज़ा असदुल्ला बेग़ ख़ान 'ग़ालिब' का स्थान उर्दू के चोटी के शायर के रूप में सदैव अक्षुण्ण रहेगा। उन्होंने उर्दू साहित्य को एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। उर्दू और फ़ारसी के बेहतरीन शायर के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली तथा अरब एवं अन्य राष्ट्रों में भी वे अत्यन्त लोकप्रिय हुए। ग़ालिब की शायरी में एक तड़प, एक चाहत और एक आशिक़ाना अंदाज़ पाया जाता है। जो सहज ही पाठक के मन को छू लेता है। &lt;br /&gt;
==ग़ालिब का दीवान==&lt;br /&gt;
उनकी ख़ूबसूरत शायरी का संग्रह 'दीवान-ए-ग़ालिब' के रूप में 10 भागों में प्रकाशित हुआ है। जिसका अनेक स्वदेशी तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। &lt;br /&gt;
==रचनाएं==&lt;br /&gt;
ग़ालिब ने अपनी रचनाओं में सरल शब्दों का प्रयोग किया है। उर्दू गद्य-लेखन की नींव रखने के कारण इन्हें वर्तमान उर्दू गद्य का जन्मदाता भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
#उर्दू-ए-हिन्दी तथा &lt;br /&gt;
#उर्दू-ए-मुअल्ला पत्र संग्रह के इनके दो प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। इनके अलावा ग़ालिब की अन्य गद्य रचनाएँ &lt;br /&gt;
#नाम-ए-ग़ालिब, &lt;br /&gt;
#लतायफे गैबी, &lt;br /&gt;
#दुवपशे कावेयानी आदि हैं। &lt;br /&gt;
इनकी रचनाओं में देश की तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति का वर्णन हुआ है। &lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
ग़ालिब 72 वर्ष की आयु में परलोक सिधारे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ghalib/ghazal_index.html?nagari दीवान ए ग़ालिब]&lt;br /&gt;
*[http://divan-e-ghalib.blogspot.com/ मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी]&lt;br /&gt;
*[http://www.ghalibinstitute.com/ Ghalib Institute]&lt;br /&gt;
*[http://gdhar.com/2005/06/26/an-ode-to-mirza-ghalibs-haveli/ Mirza Ghalib’s Haveli]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:उर्दू शायर]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>कबीर</title>
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		<updated>2010-05-31T13:01:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Kabirdas.jpg&lt;br /&gt;
|जन्म=&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=लहरतारा ताल, [[काशी]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=नीरु और नीमा&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=लोई&lt;br /&gt;
|संतान=कमाल, कमाली&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=काशी, [[बनारस]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=समाज सुधारक कवि&lt;br /&gt;
|मृत्यु=मगहर में 120 वर्ष की आयु में&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=साखी, सबद और रमैनी&lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|भाषा=[[अवधी भाषा|अवधी]], सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महात्मा कबीरदास के जन्म के समय में भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा शोचनीय थी। एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांन्धता से जनता परेशान थी और दूसरी तरफ हिन्दू धर्म के कर्मकांड, विधान और पाखंड से धर्म का ह्रास हो रहा था। जनता में भक्ति- भावनाओं का सर्वथा अभाव था। पंडितों के पाखंडपूर्ण वचन समाज में फैले थे। ऐसे संघर्ष के समय में, कबीरदास का प्रार्दुभाव हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से [[काशी]] की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उनकी माता का नाम 'नीमा' था। उसी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। एक जगह कबीरदास ने कहा है :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
जाति जुलाहा नाम कबीरा&lt;br /&gt;
बनि बनि फिरो उदासी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी [[रामानंद]] के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी [[गंगा नदी|गंगा]] स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हम कासी में प्रकट भये हैं, &lt;br /&gt;
रामानन्द चेताये।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महात्मा कबीर के जन्म के विषय में भिन्न- भिन्न मत हैं। कबीरदास ने स्वयं को [[काशी]] का जुलाहा कहा है। कबीरपंथ के अनुसार उनका निवासस्थान काशी था। बाद में कबीरदास काशी छोड़कर मगहर चले गए थे। ऐसा उन्होंने स्वयं कहा हैं :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सकल जनम शिवपुरी गंवाया।&lt;br /&gt;
मरती बार मगहर उठि आया।।&lt;br /&gt;
ऐसा कहा जाता है कि कबीरदास का सम्पूर्ण जीवन काशी में ही बीता, किन्तु वह अन्त समय मगहर चले गए थे। &lt;br /&gt;
अब कहु राम कवन गति मोरी। &lt;br /&gt;
तजीले बनारस मति भई मोरी।।&lt;br /&gt;
कबीर का विवाह कन्या &amp;quot;लोई' के साथ हुआ था। जनश्रुति के अनुसार उन्हें एक पुत्र कमाल तथा पुत्री कमाली थी। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- &lt;br /&gt;
मसि कागद छूवो नहीं, क़लम गही नहिं हाथ।    &lt;br /&gt;
कबीर का पुत्र कमाल उनके मत का विरोधी था। &lt;br /&gt;
बूड़ा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल। &lt;br /&gt;
हरि का सिमरन छोडि के, घर ले आया माल।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रचनायें==&lt;br /&gt;
{| id=&amp;quot;textboxrt&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
यह  ऐसा  संसार  है,  जैसा  सेंबल  फूल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिन दस के व्यौहार को, झूठे रंग न भूलि ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 21)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
काजल  केरी  कोठरी,  काजल ही का कोट ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलिहारी ता दास की, जे रहै राम की ओट ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 50)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
हम देखत जग जात हैं, जब देखत हम जांह ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा  कोई  ना  मिलै,  पकड़ि  छुड़ावै  बांह ॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 67)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कबीरदास ने हिन्दू-मुसलमान का भेद मिटा कर हिन्दू-भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयांगम कर लिया। संत कबीर ने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से बोले और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। कबीरदास अनपढ़ थे। कबीरदास के समस्त विचारों में राम-नाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, [[ईद-उल-फ़ितर|ईद]], मस्ज़िद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- &lt;br /&gt;
#रमैनी &lt;br /&gt;
#सबद &lt;br /&gt;
#साखी&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
बीजक पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, [[अवधी भाषा|अवधी]], पूरबी, [[ब्रजभाषा]] आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन दर्शन==&lt;br /&gt;
कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं- &lt;br /&gt;
'''हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया ।''' तो कभी कहते हैं-&lt;br /&gt;
'''हरि जननी मैं बालक तोरा।''' उस समय हिंदु जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका आदर होता है। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने [[बनारस]] छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं। इसी क्रम में वे कालिंजर ज़िले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान गोस्वामी जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।&lt;br /&gt;
करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।&lt;br /&gt;
मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए कबीरदास ने कहा है- &lt;br /&gt;
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।&lt;br /&gt;
या ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।&lt;br /&gt;
119 वर्ष की अवस्था में उन्होंने मगहर में देह त्याग किया।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्य साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:निर्गुण भक्ति]]&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%B0&amp;diff=28213</id>
		<title>कबीर</title>
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		<updated>2010-05-31T13:00:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Kabirdas.jpg&lt;br /&gt;
|जन्म=&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=लहरतारा ताल, [[काशी]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=नीरु और नीमा&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=लोई&lt;br /&gt;
|संतान=कमाल, कमाली&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=काशी, [[बनारस]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=समाज सुधारक कवि&lt;br /&gt;
|मृत्यु=मगहर में 120 वर्ष की आयु में&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=साखी, सबद और रमैनी&lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|भाषा=[[अवधी भाषा|अवधी]], सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महात्मा कबीरदास के जन्म के समय में भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा शोचनीय थी। एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांन्धता से जनता परेशान थी और दूसरी तरफ हिन्दू धर्म के कर्मकांड, विधान और पाखंड से धर्म का ह्रास हो रहा था। जनता में भक्ति- भावनाओं का सर्वथा अभाव था। पंडितों के पाखंडपूर्ण वचन समाज में फैले थे। ऐसे संघर्ष के समय में, कबीरदास का प्रार्दुभाव हुआ।&lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से [[काशी]] की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उनकी माता का नाम 'नीमा' था। उसी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। एक जगह कबीरदास ने कहा है :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
जाति जुलाहा नाम कबीरा&lt;br /&gt;
बनि बनि फिरो उदासी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी [[रामानंद]] के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी [[गंगा नदी|गंगा]] स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हम कासी में प्रकट भये हैं, &lt;br /&gt;
रामानन्द चेताये।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महात्मा कबीर के जन्म के विषय में भिन्न- भिन्न मत हैं। कबीरदास ने स्वयं को [[काशी]] का जुलाहा कहा है। कबीरपंथ के अनुसार उनका निवासस्थान काशी था। बाद में कबीरदास काशी छोड़कर मगहर चले गए थे। ऐसा उन्होंने स्वयं कहा हैं :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सकल जनम शिवपुरी गंवाया।&lt;br /&gt;
मरती बार मगहर उठि आया।।&lt;br /&gt;
ऐसा कहा जाता है कि कबीरदास का सम्पूर्ण जीवन काशी में ही बीता, किन्तु वह अन्त समय मगहर चले गए थे। &lt;br /&gt;
अब कहु राम कवन गति मोरी। &lt;br /&gt;
तजीले बनारस मति भई मोरी।।&lt;br /&gt;
कबीर का विवाह कन्या &amp;quot;लोई' के साथ हुआ था। जनश्रुति के अनुसार उन्हें एक पुत्र कमाल तथा पुत्री कमाली थी। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- &lt;br /&gt;
मसि कागद छूवो नहीं, क़लम गही नहिं हाथ।    &lt;br /&gt;
कबीर का पुत्र कमाल उनके मत का विरोधी था। &lt;br /&gt;
बूड़ा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल। &lt;br /&gt;
हरि का सिमरन छोडि के, घर ले आया माल।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रचनायें==&lt;br /&gt;
{| id=&amp;quot;textboxrt&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
यह  ऐसा  संसार  है,  जैसा  सेंबल  फूल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिन दस के व्यौहार को, झूठे रंग न भूलि ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 21)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
काजल  केरी  कोठरी,  काजल ही का कोट ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलिहारी ता दास की, जे रहै राम की ओट ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 50)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
हम देखत जग जात हैं, जब देखत हम जांह ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा  कोई  ना  मिलै,  पकड़ि  छुड़ावै  बांह ॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 67)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कबीरदास ने हिन्दू-मुसलमान का भेद मिटा कर हिन्दू-भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयांगम कर लिया। संत कबीर ने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से बोले और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। कबीरदास अनपढ़ थे। कबीरदास के समस्त विचारों में राम-नाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, [[ईद-उल-फ़ितर|ईद]], मस्ज़िद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- &lt;br /&gt;
#रमैनी &lt;br /&gt;
#सबद &lt;br /&gt;
#साखी&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
बीजक पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, [[अवधी भाषा|अवधी]], पूरबी, [[ब्रजभाषा]] आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन दर्शन==&lt;br /&gt;
कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं- &lt;br /&gt;
'''हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया ।''' तो कभी कहते हैं-&lt;br /&gt;
'''हरि जननी मैं बालक तोरा।''' उस समय हिंदु जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका आदर होता है। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने [[बनारस]] छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं। इसी क्रम में वे कालिंजर ज़िले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान गोस्वामी जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।&lt;br /&gt;
करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।&lt;br /&gt;
मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए कबीरदास ने कहा है- &lt;br /&gt;
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।&lt;br /&gt;
या ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।&lt;br /&gt;
119 वर्ष की अवस्था में उन्होंने मगहर में देह त्याग किया।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्य साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:निर्गुण भक्ति]]&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>कबीर</title>
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		<updated>2010-05-31T12:59:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Kabirdas.jpg&lt;br /&gt;
|जन्म=&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=लहरतारा ताल, [[काशी]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=नीरु और नीमा&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=लोई&lt;br /&gt;
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|कर्म-क्षेत्र=समाज सुधारक कवि&lt;br /&gt;
|मृत्यु=मगहर में 120 वर्ष की आयु में&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=साखी, सबद और रमैनी&lt;br /&gt;
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|भाषा=[[अवधी भाषा|अवधी]], सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महात्मा कबीरदास के जन्म के समय में भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा शोचनीय थी। एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांन्धता से जनता परेशान थी और दूसरी तरफ हिन्दू धर्म के कर्मकांड, विधान और पाखंड से धर्म का ह्रास हो रहा था। जनता में भक्ति- भावनाओं का सर्वथा अभाव था। पंडितों के पाखंडपूर्ण वचन समाज में फैले थे। ऐसे संघर्ष के समय में, कबीरदास का प्रार्दुभाव हुआ।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से [[काशी]] की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उनकी माता का नाम 'नीमा' था। उसी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। एक जगह कबीरदास ने कहा है :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
जाति जुलाहा नाम कबीरा&lt;br /&gt;
बनि बनि फिरो उदासी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी [[रामानंद]] के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी [[गंगा नदी|गंगा]] स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हम कासी में प्रकट भये हैं, &lt;br /&gt;
रामानन्द चेताये।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
महात्मा कबीर के जन्म के विषय में भिन्न- भिन्न मत हैं। कबीरदास ने स्वयं को [[काशी]] का जुलाहा कहा है। कबीरपंथ के अनुसार उनका निवासस्थान काशी था। बाद में कबीरदास काशी छोड़कर मगहर चले गए थे। ऐसा उन्होंने स्वयं कहा हैं :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सकल जनम शिवपुरी गंवाया।&lt;br /&gt;
मरती बार मगहर उठि आया।।&lt;br /&gt;
ऐसा कहा जाता है कि कबीरदास का सम्पूर्ण जीवन काशी में ही बीता, किन्तु वह अन्त समय मगहर चले गए थे। &lt;br /&gt;
अब कहु राम कवन गति मोरी। &lt;br /&gt;
तजीले बनारस मति भई मोरी।।&lt;br /&gt;
कबीर का विवाह कन्या &amp;quot;लोई' के साथ हुआ था। जनश्रुति के अनुसार उन्हें एक पुत्र कमाल तथा पुत्री कमाली थी। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- &lt;br /&gt;
मसि कागद छूवो नहीं, क़लम गही नहिं हाथ।    &lt;br /&gt;
कबीर का पुत्र कमाल उनके मत का विरोधी था। &lt;br /&gt;
बूड़ा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल। &lt;br /&gt;
हरि का सिमरन छोडि के, घर ले आया माल।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रचनायें==&lt;br /&gt;
{| id=&amp;quot;textboxrt&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
यह  ऐसा  संसार  है,  जैसा  सेंबल  फूल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिन दस के व्यौहार को, झूठे रंग न भूलि ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 21)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
काजल  केरी  कोठरी,  काजल ही का कोट ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलिहारी ता दास की, जे रहै राम की ओट ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 50)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
हम देखत जग जात हैं, जब देखत हम जांह ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा  कोई  ना  मिलै,  पकड़ि  छुड़ावै  बांह ॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 67)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कबीरदास ने हिन्दू-मुसलमान का भेद मिटा कर हिन्दू-भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयांगम कर लिया। संत कबीर ने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से बोले और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। कबीरदास अनपढ़ थे। कबीरदास के समस्त विचारों में राम-नाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, [[ईद-उल-फ़ितर|ईद]], मस्ज़िद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- &lt;br /&gt;
#रमैनी &lt;br /&gt;
#सबद &lt;br /&gt;
#साखी&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
बीजक पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, [[अवधी भाषा|अवधी]], पूरबी, [[ब्रजभाषा]] आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन दर्शन==&lt;br /&gt;
कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं- &lt;br /&gt;
'''हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया ।''' तो कभी कहते हैं-&lt;br /&gt;
'''हरि जननी मैं बालक तोरा।''' उस समय हिंदु जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका आदर होता है। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने [[बनारस]] छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं। इसी क्रम में वे कालिंजर ज़िले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान गोस्वामी जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।&lt;br /&gt;
करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।&lt;br /&gt;
मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए कबीरदास ने कहा है- &lt;br /&gt;
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।&lt;br /&gt;
या ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।&lt;br /&gt;
119 वर्ष की अवस्था में उन्होंने मगहर में देह त्याग किया।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्य साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:निर्गुण भक्ति]]&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%B0&amp;diff=28211</id>
		<title>कबीर</title>
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		<updated>2010-05-31T12:59:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Kabirdas.jpg&lt;br /&gt;
|जन्म=&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=लहरतारा ताल, [[काशी]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=नीरु और नीमा&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=लोई&lt;br /&gt;
|संतान=कमाल, कमाली&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=काशी, [[बनारस]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=समाज सुधारक कवि&lt;br /&gt;
|मृत्यु=मगहर में 120 वर्ष की आयु में&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=साखी, सबद और रमैनी&lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|भाषा=[[अवधी भाषा|अवधी]], सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महात्मा कबीरदास के जन्म के समय में भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा शोचनीय थी। एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांन्धता से जनता परेशान थी और दूसरी तरफ हिन्दू धर्म के कर्मकांड, विधान और पाखंड से धर्म का ह्रास हो रहा था। जनता में भक्ति- भावनाओं का सर्वथा अभाव था। पंडितों के पाखंडपूर्ण वचन समाज में फैले थे। ऐसे संघर्ष के समय में, कबीरदास का प्रार्दुभाव हुआ।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से [[काशी]] की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उनकी माता का नाम 'नीमा' था। उसी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। एक जगह कबीरदास ने कहा है :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
जाति जुलाहा नाम कबीरा&lt;br /&gt;
बनि बनि फिरो उदासी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी [[रामानंद]] के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी [[गंगा नदी|गंगा]] स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हम कासी में प्रकट भये हैं, &lt;br /&gt;
रामानन्द चेताये।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
महात्मा कबीर के जन्म के विषय में भिन्न- भिन्न मत हैं। कबीरदास ने स्वयं को [[काशी]] का जुलाहा कहा है। कबीरपंथ के अनुसार उनका निवासस्थान काशी था। बाद में कबीरदास काशी छोड़कर मगहर चले गए थे। ऐसा उन्होंने स्वयं कहा हैं :-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सकल जनम शिवपुरी गंवाया।&lt;br /&gt;
मरती बार मगहर उठि आया।।&lt;br /&gt;
ऐसा कहा जाता है कि कबीरदास का सम्पूर्ण जीवन काशी में ही बीता, किन्तु वह अन्त समय मगहर चले गए थे। &lt;br /&gt;
अब कहु राम कवन गति मोरी। &lt;br /&gt;
तजीले बनारस मति भई मोरी।।&lt;br /&gt;
कबीर का विवाह कन्या &amp;quot;लोई' के साथ हुआ था। जनश्रुति के अनुसार उन्हें एक पुत्र कमाल तथा पुत्री कमाली थी। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- &lt;br /&gt;
मसि कागद छूवो नहीं, क़लम गही नहिं हाथ।    &lt;br /&gt;
कबीर का पुत्र कमाल उनके मत का विरोधी था। &lt;br /&gt;
बूड़ा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल। &lt;br /&gt;
हरि का सिमरन छोडि के, घर ले आया माल।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रचनायें==&lt;br /&gt;
{| id=&amp;quot;textboxrt&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
यह  ऐसा  संसार  है,  जैसा  सेंबल  फूल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिन दस के व्यौहार को, झूठे रंग न भूलि ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 21)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
काजल  केरी  कोठरी,  काजल ही का कोट ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलिहारी ता दास की, जे रहै राम की ओट ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 50)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
हम देखत जग जात हैं, जब देखत हम जांह ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा  कोई  ना  मिलै,  पकड़ि  छुड़ावै  बांह ॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- '''कबीर''' (कबीर ग्रथावली, पृ. 67)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कबीरदास ने हिन्दू-मुसलमान का भेद मिटा कर हिन्दू-भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयांगम कर लिया। संत कबीर ने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से बोले और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। कबीरदास अनपढ़ थे। कबीरदास के समस्त विचारों में राम-नाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, [[ईद-उल-फ़ितर|ईद]], मस्ज़िद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- &lt;br /&gt;
#रमैनी &lt;br /&gt;
#सबद &lt;br /&gt;
#साखी&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
बीजक पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, [[अवधी भाषा|अवधी]], पूरबी, [[ब्रजभाषा]] आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन दर्शन==&lt;br /&gt;
कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं- &lt;br /&gt;
'''हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया ।''' तो कभी कहते हैं-&lt;br /&gt;
'''हरि जननी मैं बालक तोरा।''' उस समय हिंदु जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका आदर होता है। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने [[बनारस]] छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं। इसी क्रम में वे कालिंजर ज़िले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान गोस्वामी जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।&lt;br /&gt;
करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।&lt;br /&gt;
मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए कबीरदास ने कहा है- &lt;br /&gt;
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।&lt;br /&gt;
या ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।&lt;br /&gt;
119 वर्ष की अवस्था में उन्होंने मगहर में देह त्याग किया।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्य साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:निर्गुण भक्ति]]&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>रसखान</title>
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		<updated>2010-05-31T12:59:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Raskhan-1.jpg&lt;br /&gt;
|जन्म=सन् 1533 से 1558 बीच (लगभग) &lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[पिहानी]] ([[उत्तर प्रदेश]])&lt;br /&gt;
|अविभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[महावन]] ([[मथुरा]])&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=कृष्ण भक्ति काव्य&lt;br /&gt;
|मृत्य=प्रामाणिक तथ्य अनुपलब्ध&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|विषय=सगुण कृष्णभक्ति&lt;br /&gt;
|भाषा=साधारण [[ब्रज भाषा]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=प्रकृति वर्णन, कृष्णभक्ति&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:raskhan-2.jpg|रसखान के दोहे [[महावन]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Raskhan Couplets, Mahavan, Mathura|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिन्दी साहित्य में [[कृष्ण]] भक्त तथा रीतिकालीन कवियों में रसखान का महत्वपूर्ण स्थान है। 'रसखान' को रस की ख़ान कहा जाता है। इनके काव्य में भक्ति, श्रृगांर रस दोनों प्रधानता से मिलते हैं। रसखान कृष्ण भक्त हैं और प्रभु के सगुण और निर्गुण निराकार रूप के प्रति श्रद्धालु हैं। रसखान के सगुण कृष्ण लीलाएं करते हैं। यथा- बाललीला, रासलीला, फागलीला, कुंजलीला आदि। उन्होंने अपने काव्य की सीमित परिधी में इन असीमित लीलाओं का बहुत सूक्ष्म वर्णन किया है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था, &amp;quot;इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए&amp;quot; उनमें &amp;quot;रसखान&amp;quot; का नाम सर्वोपरि है। सैय्यद इब्राहीम &amp;quot;रसखान&amp;quot; का जन्म उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् 1533 से 1558 के बीच कभी हुआ होगा। [[अकबर]] का राज्यकाल 1556-1605 है, ये लगभग अकबर के समकालीन हैं। जन्मस्थान 'पिहानी' कुछ लोगों के मतानुसार [[दिल्ली]] के समीप है। कुछ और लोगों के मतानुसार यह 'पिहानी' [[उत्तर प्रदेश|उत्तरप्रदेश]] के हरदोई ज़िले में है। मृत्यु के बारे में कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं मिलते हैं। रसखान ने [[भागवत पुराण|भागवत]] का अनुवाद फ़ारसी में भी किया।&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|जो खग हौं बसेरो करौं मिल [[कालिन्दी]]-कूल-कदम्ब की डारन।।&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
===बाल्य वर्णन===&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
==व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
अब्राहम जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा है सैयद इब्राहीम उपनाम रसखान कवि, हरदोई ज़िले के अंतर्गत पिहानी के रहने वाले, जन्म काल 1573 ई॰। यह पहले मुसलमान थे। बाद में वैष्णव होकर ब्रज में रहने लगे थे। इनका वर्णन 'भक्तमाल' में है। इनके एक शिष्य कादिर बख्श हुए। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान व्यक्तित्व और कृतित्व]]&lt;br /&gt;
==कला पक्ष==&lt;br /&gt;
कवि ने कहीं चमत्कार लाने के लिए अलंकारों को बरबस ठूंसने की चेष्टा नहीं की है। भाव और रस के प्रवाह पर भी उसकी दृष्टि केन्द्रित रही है। भावों और रसों की अभिव्यक्ति को उत्कृष्ट बनाने के लिए ही अलंकारों की योजना की गई है। उचित स्थान पर अलंकारों का ग्रहण किया गया है। उन्हें दूर तक खींचने का व्यर्थ प्रयास नहीं किया गया है। औचित्य के अनुसार ठीक स्थान पर उनका त्याग कर दिया गया है। रसखान द्वारा प्रयुक्त अलंकार अपने 'अलंकार' नाम को सार्थक करते हैं। शब्दालंकारों में अनुप्रास और अर्थालंकारों में उपमा, उत्प्रेक्षा एवं रूपक की निबंधना में कवि ने विशेष रूचि दिखाई है। बड़ी कुशलता के साथ उनका सन्निवेश किया है, उन्हें इस विधान में पूर्ण सफलता मिली है। अलंकारों की सुन्दर योजना से उनकी कविता का कला-पक्ष निस्सन्देह निखर आया है। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का कला-पक्ष]]&lt;br /&gt;
==भाव पक्ष==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
इस प्रकार रसखान के काव्य में छ: स्थायी भावों की निबंधना मिलती है- रति, निर्वेद, उत्साह, हास, वात्सल्य और भक्ति। यह बात ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने परंपराप्रथिता चार स्थायी भावों को ही गौरव दिया है, जिनमें अन्यतम भाव रति का है। क्रोध, जुगुप्ता, विस्मय, शोक और भय की उपेक्षा का मूल कारण यह प्रतीत होता है कि इन भावों का रति से मेल नहीं है। रसखान प्रेमी जीव थे, अतएव उन्होंने अपनी कविता में तीन प्रकार के रति भावों की रति, वात्सल्य और भक्ति की व्यंजना की; जो भाव इनमें विशेष सहायक हो सकते थे उन्हें यथास्थान अभिव्यक्ति किया। दूसरा कारण यह भी है कि उनकी रचना मुक्तक है; अतएव प्रबन्ध काव्य की भांति उसमें सभी प्रकार के भावों का सन्निवेश आवश्यक भी नहीं है। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का भाव-पक्ष]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रस संयोजन==&lt;br /&gt;
रसखान ने भक्तिरस के अनेक पद लिखे हैं, तथापि उनके काव्यों में भक्तिरस की प्रधानता नहीं है। वे प्रमुख रूप से श्रृंगार के कवि हैं। उनका श्रृंगार कृष्ण की लीलाओं पर आश्रित है। अतएव सामान्य पाठक को यह भ्रांति हो सकती है कि उनके अधिकांश पद भक्ति रस की अभिव्यक्ति करते हैं। शास्त्रीय दृष्टि से जिन पदों के द्वारा पाठक के मन में स्थित ईश्वर विषयक-रतिभाव रसता नहीं प्राप्त करता, उन पदों को भक्ति रस व्यंजक मानना तर्क संगत नहीं है। इसमें संदेह नहीं कि रसखान भक्त थे और उन्होंने अपनी रचनाओं में भजनीय कृष्ण का सरस रूप से निरूपण किया है। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का रस संयोजन]]&lt;br /&gt;
==भक्ति भावना==&lt;br /&gt;
हिन्दी-साहित्य का भक्ति-युग (संवत् 1375 से 1700 वि0 तक) हिन्दी का स्वर्ण युग माना जाता है। इस युग में हिन्दी के अनेक महाकवियों –विद्यापति, [[कबीरदास]], मलिक मुहम्मद जायसी, [[सूरदास]], [[नंददास]], [[तुलसीदास]], [[केशवदास]], रसखान आदि ने अपनी अनूठी काव्य-रचनाओं से साहित्य के भण्डार को सम्पन्न किया। इस युग में सत्रहवीं शताब्दी का स्थान भक्ति-काव्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। सूरदास, [[मीरां|मीराबाई]], तुलसीदास, रसखान आदि की रचनाओं ने इस शताब्दी के गौरव को बढ़ा दिया है। भक्ति का जो आंदोलन दक्षिण से चला वह हिन्दी-साहित्य के भक्तिकाल तक सारे भारत में व्याप्त हो चुका था। उसकी विभिन्न धाराएं उत्तर भारत में फैल चुकी थीं। दर्शन, धर्म तथा साहित्य के सभी क्षेत्रों में उसका गहरा प्रभाव था। एक ओर सांप्रदायिक भक्ति का जोर था, अनेक तीर्थस्थान, मंदिर, मठ और अखाड़े उसके केन्द्र थे। दूसरी ओर ऐसे भी भक्त थे जो किसी भी तरह की सांप्रदायिक हलचल से दूर रह कर भक्ति में लीन रहना पसंद करते थे। रसखान इसी प्रकार के भक्त थे। वे स्वच्छंद भक्ति के प्रेमी थे। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान की भक्ति-भावना]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
सोलहवीं शताब्दी में ब्रजभाषा साहित्यिक आसन पर प्रतिष्ठित हो चुकी थी। भक्त-कवि सूरदास इसे सार्वदेशिक काव्य भाषा बना चुके थे। किन्तु उनकी शक्ति भाषा सौष्ठव की अपेक्षा भाव द्योतन में अधिक रमी। इसीलिए बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर ब्रजभाषा का व्याकरण बनाते समय रसखान, [[बिहारी लाल]] और [[घनानन्द कवि|घनानन्द]] के काव्याध्ययन को सूरदास से अधिक महत्त्व देते हैं। बिहारी की व्यवस्था कुछ कड़ी तथा भाषा परिमार्जित एवं साहित्यिक है। घनानन्द में भाषा-सौन्दर्य उनकी 'लक्षणा' के कारण माना जाता है। रसखान की भाषा की विशेषता उसकी स्वाभाविकता है। उन्होंने ब्रजभाषा के साथ खिलवाड़ न कर उसके मधुर, सहज एवं स्वाभाविक रूप को अपनाया। साथ ही बोलचाल के शब्दों को साहित्यिक शब्दावली के विकट लाने का सफल प्रयास किया। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान की भाषा]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:raskhan-3.jpg|रसखान की समाधि [[महावन]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Raskhan's Grave, Mahavan, Mathura|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
==दर्शन==&lt;br /&gt;
अब प्रश्न यह उठता है कि जब वे भक्त थे और उनकी रचना भक्ति प्रधान है तो उसका कोई दर्शन भी अवश्य होगा। जहां आलोचक की जानकारी के लिए नियमों की श्रृंखला में कोई वस्तु नहीं बंधती, वहां उसे स्वच्छंद कह दिया जाता है। पर वास्तव में ऐसी बात नहीं। प्रत्येक कार्य का मूल कारण अवश्य रहता है। मिश्र जी ने एक बात बार-बार कही है कि रसखान में विदेशीपन की झलक अवश्य दिखाइर पड़ती है। यह प्रेममार्गी भक्त थे। लौकिक पक्ष में इनका विरह फ़ारसी काव्य की वंदना से प्रभावित है, अलौकिक पक्ष में सूफियों की प्रेमपीर से। आगे कहते हैं स्वच्छंद कवियों ने प्रेम की पीर सूफी कवियों से ही ली है इसमें कोई संदेह नहीं। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का दर्शन]]&lt;br /&gt;
==प्रकृति वर्णन==&lt;br /&gt;
मनस और उसको धारण करने वाले शरीर को तथा मनुष्य के निर्माण भाग को छोडकर अन्य समस्त चेतन और अचेतन सृष्टि-प्रसार को प्रकृति स्वीकार किया जाता है। व्यावहारिक रूप से तो जितनी मानवेतर सृष्टि है उसको हम प्रकृति कहते हैं किन्तु दार्शनिक दृष्टि से हमारा शरीर और मन उसकी ज्ञानेन्द्रियां, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सूक्ष्म तत्त्व प्रकृति के अंतर्भूत हैं। काव्य में प्रकृति चित्रण हर काल में मिलता है। संस्कृत काव्य से लेकर आधुनिक काव्य तक में प्रकृति के दर्शन होते हैं। यह स्वाभाविक भी है। मानव अध्ययन भले ही काव्य का मुख्य विषय माना गया हो किन्तु प्रकृति के साहचर्य बिना मानव की चेष्टाएं और मनोदशाएं भावहीन-सी होने लगती हैं। यमुना तट, वंशीवट, कदंब के वृक्ष और ब्रज के वन बाग-तड़ाग-बिना नट नागर कृष्ण की समस्त लीलाएं शून्य एवं नीरस-सी प्रतीत होती हैं। अत: प्रकृति के अभाव में किसी सुंदर काव्य की कल्पना कुछ अधूरी-सी ही प्रतीत होती है। काव्य में प्रकृति चित्रण भिन्न-भिन्न रूपों में मिलता है। रसखान के काव्य में प्रकृति की छटा तीन रूपों में दृष्टिगोचर होती है। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का प्रकृति वर्णन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
{{रसखान}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि ]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category: प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=28209</id>
		<title>रसखान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=28209"/>
		<updated>2010-05-31T12:58:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Raskhan-1.jpg&lt;br /&gt;
|जन्म=सन् 1533 से 1558 बीच (लगभग) &lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[पिहानी]] ([[उत्तर प्रदेश]])&lt;br /&gt;
|अविभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[महावन]] ([[मथुरा]])&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=कृष्ण भक्ति काव्य&lt;br /&gt;
|मृत्य=प्रामाणिक तथ्य अनुपलब्ध&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|विषय=सगुण कृष्णभक्ति&lt;br /&gt;
|भाषा=साधारण [[ब्रज भाषा]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=प्रकृति वर्णन, कृष्णभक्ति&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:raskhan-2.jpg|रसखान के दोहे [[महावन]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Raskhan Couplets, Mahavan, Mathura|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिन्दी साहित्य में [[कृष्ण]] भक्त तथा रीतिकालीन कवियों में रसखान का महत्वपूर्ण स्थान है। 'रसखान' को रस की ख़ान कहा जाता है। इनके काव्य में भक्ति, श्रृगांर रस दोनों प्रधानता से मिलते हैं। रसखान कृष्ण भक्त हैं और प्रभु के सगुण और निर्गुण निराकार रूप के प्रति श्रद्धालु हैं। रसखान के सगुण कृष्ण लीलाएं करते हैं। यथा- बाललीला, रासलीला, फागलीला, कुंजलीला आदि। उन्होंने अपने काव्य की सीमित परिधी में इन असीमित लीलाओं का बहुत सूक्ष्म वर्णन किया है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था, &amp;quot;इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए&amp;quot; उनमें &amp;quot;रसखान&amp;quot; का नाम सर्वोपरि है। सैय्यद इब्राहीम &amp;quot;रसखान&amp;quot; का जन्म उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् 1533 से 1558 के बीच कभी हुआ होगा। [[अकबर]] का राज्यकाल 1556-1605 है, ये लगभग अकबर के समकालीन हैं। जन्मस्थान 'पिहानी' कुछ लोगों के मतानुसार [[दिल्ली]] के समीप है। कुछ और लोगों के मतानुसार यह 'पिहानी' [[उत्तर प्रदेश|उत्तरप्रदेश]] के हरदोई ज़िले में है। मृत्यु के बारे में कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं मिलते हैं। रसखान ने [[भागवत पुराण|भागवत]] का अनुवाद फ़ारसी में भी किया।&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन। &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|जो खग हौं बसेरो करौं मिल [[कालिन्दी]]-कूल-कदम्ब की डारन।।&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
===बाल्य वर्णन===&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
==व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
अब्राहम जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा है सैयद इब्राहीम उपनाम रसखान कवि, हरदोई ज़िले के अंतर्गत पिहानी के रहने वाले, जन्म काल 1573 ई॰। यह पहले मुसलमान थे। बाद में वैष्णव होकर ब्रज में रहने लगे थे। इनका वर्णन 'भक्तमाल' में है। इनके एक शिष्य कादिर बख्श हुए। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान व्यक्तित्व और कृतित्व]]&lt;br /&gt;
==कला पक्ष==&lt;br /&gt;
कवि ने कहीं चमत्कार लाने के लिए अलंकारों को बरबस ठूंसने की चेष्टा नहीं की है। भाव और रस के प्रवाह पर भी उसकी दृष्टि केन्द्रित रही है। भावों और रसों की अभिव्यक्ति को उत्कृष्ट बनाने के लिए ही अलंकारों की योजना की गई है। उचित स्थान पर अलंकारों का ग्रहण किया गया है। उन्हें दूर तक खींचने का व्यर्थ प्रयास नहीं किया गया है। औचित्य के अनुसार ठीक स्थान पर उनका त्याग कर दिया गया है। रसखान द्वारा प्रयुक्त अलंकार अपने 'अलंकार' नाम को सार्थक करते हैं। शब्दालंकारों में अनुप्रास और अर्थालंकारों में उपमा, उत्प्रेक्षा एवं रूपक की निबंधना में कवि ने विशेष रूचि दिखाई है। बड़ी कुशलता के साथ उनका सन्निवेश किया है, उन्हें इस विधान में पूर्ण सफलता मिली है। अलंकारों की सुन्दर योजना से उनकी कविता का कला-पक्ष निस्सन्देह निखर आया है। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का कला-पक्ष]]&lt;br /&gt;
==भाव पक्ष==&lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
इस प्रकार रसखान के काव्य में छ: स्थायी भावों की निबंधना मिलती है- रति, निर्वेद, उत्साह, हास, वात्सल्य और भक्ति। यह बात ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने परंपराप्रथिता चार स्थायी भावों को ही गौरव दिया है, जिनमें अन्यतम भाव रति का है। क्रोध, जुगुप्ता, विस्मय, शोक और भय की उपेक्षा का मूल कारण यह प्रतीत होता है कि इन भावों का रति से मेल नहीं है। रसखान प्रेमी जीव थे, अतएव उन्होंने अपनी कविता में तीन प्रकार के रति भावों की रति, वात्सल्य और भक्ति की व्यंजना की; जो भाव इनमें विशेष सहायक हो सकते थे उन्हें यथास्थान अभिव्यक्ति किया। दूसरा कारण यह भी है कि उनकी रचना मुक्तक है; अतएव प्रबन्ध काव्य की भांति उसमें सभी प्रकार के भावों का सन्निवेश आवश्यक भी नहीं है। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का भाव-पक्ष]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:raskhan-3.jpg|रसखान की समाधि [[महावन]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Raskhan's Grave, Mahavan, Mathura|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
==रस संयोजन==&lt;br /&gt;
रसखान ने भक्तिरस के अनेक पद लिखे हैं, तथापि उनके काव्यों में भक्तिरस की प्रधानता नहीं है। वे प्रमुख रूप से श्रृंगार के कवि हैं। उनका श्रृंगार कृष्ण की लीलाओं पर आश्रित है। अतएव सामान्य पाठक को यह भ्रांति हो सकती है कि उनके अधिकांश पद भक्ति रस की अभिव्यक्ति करते हैं। शास्त्रीय दृष्टि से जिन पदों के द्वारा पाठक के मन में स्थित ईश्वर विषयक-रतिभाव रसता नहीं प्राप्त करता, उन पदों को भक्ति रस व्यंजक मानना तर्क संगत नहीं है। इसमें संदेह नहीं कि रसखान भक्त थे और उन्होंने अपनी रचनाओं में भजनीय कृष्ण का सरस रूप से निरूपण किया है। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का रस संयोजन]]&lt;br /&gt;
==भक्ति भावना==&lt;br /&gt;
हिन्दी-साहित्य का भक्ति-युग (संवत् 1375 से 1700 वि0 तक) हिन्दी का स्वर्ण युग माना जाता है। इस युग में हिन्दी के अनेक महाकवियों –विद्यापति, [[कबीरदास]], मलिक मुहम्मद जायसी, [[सूरदास]], [[नंददास]], [[तुलसीदास]], [[केशवदास]], रसखान आदि ने अपनी अनूठी काव्य-रचनाओं से साहित्य के भण्डार को सम्पन्न किया। इस युग में सत्रहवीं शताब्दी का स्थान भक्ति-काव्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। सूरदास, [[मीरां|मीराबाई]], तुलसीदास, रसखान आदि की रचनाओं ने इस शताब्दी के गौरव को बढ़ा दिया है। भक्ति का जो आंदोलन दक्षिण से चला वह हिन्दी-साहित्य के भक्तिकाल तक सारे भारत में व्याप्त हो चुका था। उसकी विभिन्न धाराएं उत्तर भारत में फैल चुकी थीं। दर्शन, धर्म तथा साहित्य के सभी क्षेत्रों में उसका गहरा प्रभाव था। एक ओर सांप्रदायिक भक्ति का जोर था, अनेक तीर्थस्थान, मंदिर, मठ और अखाड़े उसके केन्द्र थे। दूसरी ओर ऐसे भी भक्त थे जो किसी भी तरह की सांप्रदायिक हलचल से दूर रह कर भक्ति में लीन रहना पसंद करते थे। रसखान इसी प्रकार के भक्त थे। वे स्वच्छंद भक्ति के प्रेमी थे। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान की भक्ति-भावना]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
सोलहवीं शताब्दी में ब्रजभाषा साहित्यिक आसन पर प्रतिष्ठित हो चुकी थी। भक्त-कवि सूरदास इसे सार्वदेशिक काव्य भाषा बना चुके थे। किन्तु उनकी शक्ति भाषा सौष्ठव की अपेक्षा भाव द्योतन में अधिक रमी। इसीलिए बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर ब्रजभाषा का व्याकरण बनाते समय रसखान, [[बिहारी लाल]] और [[घनानन्द कवि|घनानन्द]] के काव्याध्ययन को सूरदास से अधिक महत्त्व देते हैं। बिहारी की व्यवस्था कुछ कड़ी तथा भाषा परिमार्जित एवं साहित्यिक है। घनानन्द में भाषा-सौन्दर्य उनकी 'लक्षणा' के कारण माना जाता है। रसखान की भाषा की विशेषता उसकी स्वाभाविकता है। उन्होंने ब्रजभाषा के साथ खिलवाड़ न कर उसके मधुर, सहज एवं स्वाभाविक रूप को अपनाया। साथ ही बोलचाल के शब्दों को साहित्यिक शब्दावली के विकट लाने का सफल प्रयास किया। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान की भाषा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दर्शन==&lt;br /&gt;
अब प्रश्न यह उठता है कि जब वे भक्त थे और उनकी रचना भक्ति प्रधान है तो उसका कोई दर्शन भी अवश्य होगा। जहां आलोचक की जानकारी के लिए नियमों की श्रृंखला में कोई वस्तु नहीं बंधती, वहां उसे स्वच्छंद कह दिया जाता है। पर वास्तव में ऐसी बात नहीं। प्रत्येक कार्य का मूल कारण अवश्य रहता है। मिश्र जी ने एक बात बार-बार कही है कि रसखान में विदेशीपन की झलक अवश्य दिखाइर पड़ती है। यह प्रेममार्गी भक्त थे। लौकिक पक्ष में इनका विरह फ़ारसी काव्य की वंदना से प्रभावित है, अलौकिक पक्ष में सूफियों की प्रेमपीर से। आगे कहते हैं स्वच्छंद कवियों ने प्रेम की पीर सूफी कवियों से ही ली है इसमें कोई संदेह नहीं। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का दर्शन]]&lt;br /&gt;
==प्रकृति वर्णन==&lt;br /&gt;
मनस और उसको धारण करने वाले शरीर को तथा मनुष्य के निर्माण भाग को छोडकर अन्य समस्त चेतन और अचेतन सृष्टि-प्रसार को प्रकृति स्वीकार किया जाता है। व्यावहारिक रूप से तो जितनी मानवेतर सृष्टि है उसको हम प्रकृति कहते हैं किन्तु दार्शनिक दृष्टि से हमारा शरीर और मन उसकी ज्ञानेन्द्रियां, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सूक्ष्म तत्त्व प्रकृति के अंतर्भूत हैं। काव्य में प्रकृति चित्रण हर काल में मिलता है। संस्कृत काव्य से लेकर आधुनिक काव्य तक में प्रकृति के दर्शन होते हैं। यह स्वाभाविक भी है। मानव अध्ययन भले ही काव्य का मुख्य विषय माना गया हो किन्तु प्रकृति के साहचर्य बिना मानव की चेष्टाएं और मनोदशाएं भावहीन-सी होने लगती हैं। यमुना तट, वंशीवट, कदंब के वृक्ष और ब्रज के वन बाग-तड़ाग-बिना नट नागर कृष्ण की समस्त लीलाएं शून्य एवं नीरस-सी प्रतीत होती हैं। अत: प्रकृति के अभाव में किसी सुंदर काव्य की कल्पना कुछ अधूरी-सी ही प्रतीत होती है। काव्य में प्रकृति चित्रण भिन्न-भिन्न रूपों में मिलता है। रसखान के काव्य में प्रकृति की छटा तीन रूपों में दृष्टिगोचर होती है। विस्तार से पढ़ने के लिए जाएं-&lt;br /&gt;
*[[रसखान का प्रकृति वर्णन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
{{रसखान}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि ]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category: प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>जवाहरलाल नेहरू</title>
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		<updated>2010-05-31T12:52:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#999900 size=5&amp;gt;पंडित जवाहरलाल नेहरू&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Jawahar-Lal-Nehru.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=चाचा नेहरू, पंडित जी&lt;br /&gt;
|जन्म=14 नवम्बर 1889&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=[[पं॰ मोतीलाल नेहरू]], श्रीमती [[स्वरूप रानी]]&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=[[कमला नेहरू]]&lt;br /&gt;
|संतान=[[इंदिरा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=27 मई 1964&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=दिल का दौरा&lt;br /&gt;
|स्मारक=शांतिवन, दिल्ली &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[काँग्रेस]]&lt;br /&gt;
|पद=[[:श्रेणी:भारत के प्रधानमंत्री|भारत के प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
|भाषा=हिन्दी, अंग्रेज़ी&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=नौ बार जेल यात्रा की&lt;br /&gt;
|कार्य काल=15 अगस्त 1947-27 मई 1964&lt;br /&gt;
|विद्यालय=इंग्लैण्ड के हैरो स्कूल, केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज&lt;br /&gt;
|शिक्षा=बैरिस्टर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]] सम्मान&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=लेखन, स्वाधीनता सग्राम, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[जलियाँवाला बाग़]], [[इंदिरा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
जवाहरलाल नेहरू भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं स्वतन्त्र [[भारत]] के प्रथम प्रधान मंत्री (1947-640) थे। जवाहर लाल नेहरू, संसदीय सरकार की स्थापना और विदेशी मामलों में 'गुटनिरपेक्ष' नीतियों के लिए विख्यात हुए। 1930 और 1940 के दशक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से वह एक थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Teen Murti Bhavan.jpg|तीन मूर्ति भवन, जवाहरलाल नेहरू का निवास, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Teen Murti Bhavan, Nehru's Residence |thumb|left]]&lt;br /&gt;
नेहरू कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के थे, जो अपनी प्रशासनिक क्षमताओं तथा विद्वत्ता के लिए विख्यात थे और जो 18वीं शताब्दी के आरंभ में इलाहाबाद आ गये थे। इनका जन्म [[इलाहाबाद]] में 14 नवम्बर 1889 ई॰ को हुआ। वे [[पं॰ मोतीलाल नेहरू]] और श्रीमती स्वरूप रानी के एकमात्र पुत्र थे। अपने सभी भाई-बहनों में, जिनमें दो बहनें थीं, जवाहरलाल सबसे बड़े थे। उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई 14 वर्ष की आयु में नेहरू ने घर पर ही कई अंग्रेज़ अध्यापिकाओं और शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त कि। इनमें से सिर्फ़ एक, फ़र्डिनैंड ब्रुक्स का, जो आधे आयरिश और आधे बेल्जियन अध्यात्मज्ञानी थे, उन पर कुछ प्रभाव पड़ा। जवाहरलाल के एक समादृत भारतीय शिक्षक भी थे, जो उन्हें हिंदी और संस्कृत पढ़ाते थे। 15 वर्ष की उम्र में 1905 में नेहरू एक अग्रणी इंग्लिश विद्यालय [[इंग्लैण्ड]] के हैरो स्कूल में भेजे गये। हैरो में दाख़िल हुए, जहाँ वह दो वर्ष तक रहे। नेहरू का शिक्षा काल किसी तरह से असाधारण नहीं था। और हैरो से वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, जहाँ उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और उनके अपने ही शब्दों में परीक्षा उत्तीर्ण करने में उन्हें 'न कीर्ति, न अपकीर्ति' मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवार==&lt;br /&gt;
भारत लौटने के चार वर्ष बाद मार्च 1916 में नेहरू का विवाह [[कमला नेहरू|कमला कौल]] के साथ हुआ, जो [[दिल्ली]] में बसे कश्मीरी परिवार की थीं। उनकी अकेली संतान [[इंदिरा गाँधी|इंदिरा प्रियदर्शिनी]] का जन्म 1917 में हुआ; बाद में वह, विवाहोपरांत नाम 'इंदिरा गांधी', भारत की प्रधानमंत्री बनीं। तथा एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बैरिस्टर के रूप में==&lt;br /&gt;
1912 ई॰ में वे बैरिस्टर बने और उसी वर्ष [[भारत]] लौटकर उन्होंने इलाहाबाद में वकालत प्रारम्भ की। वकालत में उनकी विशेष रूचि न थी और शीघ्र ही वे भारतीय राजनीति में भाग लेने लगे। 1912 ई॰ में उन्होंने बाँकीपुर ([[बिहार]]) में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजनीतिक प्रशिक्षण==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawaharlal-Nehru-And-Mahatma-Gandhi.jpg|thumb|जवाहरलाल नेहरू और [[महात्मा गाँधी]] &amp;lt;br /&amp;gt; Jawaharlal Nehru and Mahatma Gandhi|left]]&lt;br /&gt;
भारत लौटने के बाद नेहरू ने पहले वकील के रूप में स्थापित होने का प्रयास किया लेकिन अपने पिता के विपरीत उनकी इस पेशे में कोई ख़ास रुची नहीं थी और उन्हें वकालत और वकीलों का साथ, दोनों ही नापसंद थे। उस समय वह अपनी पीढ़ी के कई अन्य लोगों की भांति भीतर से एक ऐसे राष्ट्रवादी थे, जो अपने देश की आज़ादी के लिए बेताब हो, लेकिन अपने अधिकांश समकालीनों की तरह उसे हासिल करने की ठोस योजनाएं न बना पाया हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गाँधी जी से मुलाकात====&lt;br /&gt;
1916 ई॰ के [[लखनऊ]] अधिवेशन में वे सर्वप्रथम [[महात्मा गाँधी]] के सम्पर्क में आये। गांधी उनसे 20 साल बड़े थे। दोनों में से किसी ने भी आरंभ में एक-दूसरे को बहुत प्रभावित नहीं किया। बहरहाल, 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे। इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई। उससे पहले मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक स्थिति की माँग था। नेहरू जी के शब्दों में:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;कुटिलता की नीति अन्त में चलकर फायदेमन्द नहीं होती। हो सकता है कि अस्थायी तौर पर इससे कुछ फायदा हो जाए।&lt;br /&gt;
अगर हम इस देश की गरीबी को दूर करेंगे, तो कानूनों से नहीं, शोरगुल मचाके नहीं, शिकायत करके नहीं, बल्कि मेहनत करके। एक-एक आदमी बूढ़ा और छोटा, मर्द , औरत और बच्चा मेहनत करेगा। हमारे सामने आराम नहीं है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
समय के साथ-साथ पं॰ नेहरू की रुचि भारतीय राजनीति में बढ़ती गयी। [[जलियाँवाला बाग़]] हत्याकाण्ड की जाँच में देशबन्धु चितरंजनदास एवं महात्मा गाँधी के सहयोगी रहे और 1921 के असहयोग आन्दोलन में तो महात्मा गाँधी के अत्यधिक निकट सम्पर्क में आ गये। यह सम्बन्ध समय की गति के साथ-साथ दृढ़तर होता गया और उसकी समाप्ति केवल महात्मा गाँधी जी की मृत्यु से ही हुई।&lt;br /&gt;
====गाँधी जी के अनुयायी के रूप में====&lt;br /&gt;
नेहरू की आत्मकथा से भारतीय राजनीति में उनकी गहरी रुचि का पता चलता है। उन्हीं दिनों अपने पिता को लिखे गए पत्रों से भारत की स्वतंत्रता में उन दोनों की समान रुचि दिखाई देती है। लेकिन गांधी से मुलाक़ात होने तक पिता और पुत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए निश्चित योजनाओं का विकास नहीं हुआ था। गांधी ने उन्हें राजनीति में अपना अनुयायी बना लिया। गांधी द्वारा कर्म पर बल दिए जाने के गुण से वह दोनों प्रभावित हुए। महात्मा गांधी का तर्क था कि ग़लती की सिर्फ़ निंदा ही नहीं, बल्कि प्रतिरोध भी किया जाना चाहिए। इससे पहले नेहरू और उनके पिता समकालीन भारतीय राजनीतिज्ञों का तिरस्कार करते थे, जिनका राष्ट्रवाद, कुछ अपवादों को छोड़कर लंबे भाषणों और प्रस्तावों तक सीमित था। गांधी द्वारा ग्रेट ब्रिटेन के ख़िलाफ़ बिना भय या घृणा के लड़ने पर ज़ोर देने से भी जवाहरलाल बहुत प्रभावित हुए।&lt;br /&gt;
====जेल यात्रा====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी के साथ नेहरू का जुड़ाव 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद आरंभ हुआ। इस काल में राष्ट्रवादी गतिविधियों की लहर ज़ोरों पर थी और अप्रैल 1919 को अमृतसर के नरसंहार के रूप में सरकारी दमन खुलकर सामने आया; स्थानीय ब्रिटिश सेना कमांडर ने अपनी टुकड़ियों को निहत्थे भारतीयों की एक सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया, जिसमें 379 लोग मारे गये और कम से कम 1,200 घायल हुए। नेहरू जी के शब्दों में:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;भारत की सेवा का अर्थ, करोड़ों पीड़ितों की सेवा है। इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान, और अवसर की विषमता का अन्त करना है। हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े आदमी की यह आकांक्षा रही है-कि प्रत्येक आँख के प्रत्येक आँसू को पोंछ दिया जाए। ऐसा करना हमारी शक्ति से बाहर हो सकता है, लेकिन जब तक आँसू हैं और पीड़ा है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1921 के आख़िर में जब कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को कुछ प्रांतों में ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया, तब पहली बार नेहरू जेल गये। अगले 24 वर्ष में उन्हें आठ बार बंदी बनाया गया, जिनमें से अंतिम और सबसे लंबा बंदीकाल, लगभग तीन वर्ष का कारावास जून 1945 में समाप्त हुआ। नेहरू ने कुल मिलाकर नौ वर्ष से ज़्यादा समय जेलों में बिताया। अपने स्वभाव के अनुरूप ही उन्होंने अपनी जेल-यात्राओं को असामान्य राजनीतिक गतिविधि वाले जीवन के अंतरालों के रूप में वर्णित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====व्यापक क्षेत्रों की यात्रा====&lt;br /&gt;
कांग्रेस के साथ उनका राजनीतिक प्रशिक्षण 1919 से 1929 तक चला। 1923 में और फ़िर 1927 में वह दो-दो वर्ष के लिए पार्टी के महासचिव बने। उनकी रुचियों और ज़िम्मेदारियों ने उन्हें भारत के व्यापक क्षेत्रों की यात्रा का अवसर प्रदान किया, विशेषकर उनके गृह प्रदेश संयुक्त प्रांत का, जहाँ उन्हें घोर ग़रीबी और किसानों की बदहाली की पहली झलक मिली और जिसने इन महत्त्वपूर्ण समस्याओं को दूर करने की उनकी मूल योजनाओं को प्रभावित किया। यद्यपि उनका कुछ-कुछ झुकाव समाजवाद की ओर था, लेकिन उनका सुधारवाद किसी निश्चित ढांचे में ढला हुआ नहीं था। 1926-27 में उनकी यूरोप तथा सोवियत संघ की यात्रा ने उनके आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि से, आज का बड़ा सवाल विश्वशान्ति का है। आज हमारे लिए यही विकल्प है कि हम दुनिया को उसके अपने रूप में ही स्वीकार करें। हम देश को इस बात की स्वतन्त्रता देते रहे कि वह अपने ढंग से अपना विकास करे और दूसरों से सीखे, लेकिन दूसरे उस पर अपनी कोई चीज नहीं थोपें। निश्चय ही इसके लिए एक नई मानसिक विधा चाहिए। पंचशील या पाँच सिद्धान्त यही विधा बताते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्क्सवाद और समाजवादी विचारधारा में नेहरू की वास्तविक रुचि इसी यात्रा से पैदा हुई, यद्यपि इससे उनके साम्यवादी सिद्धांतों और व्यवहार के ज्ञान में कोई ख़ास वृद्धि नहीं हुई। बाद में जेल यात्राओं के दौरान उन्हें अधिक गहराई से मार्क्सवाद के अध्ययन का मौक़ा मिला। इसके सिद्धांतों में उनकी रुचि थी, लेकिन इसके कुछ तरीक़ों से विकर्षित होने के कारण वह कार्ल मार्क्स की कृतियों को सारे प्रश्नों का उत्तर देने वाले शास्त्रों के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए। फ़िर भी मार्क्सवाद ही उनकी आर्थिक विचारधारा का मानदंड रहा, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर भारतीय परिस्थितियों के अनुसार फेरबदल किया गया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawaharlal-Nehru-1.jpg|thumb|चाचा नेहरू बच्चों के साथ &amp;lt;br /&amp;gt; Jawaharlal Nehru with Childrens]]&lt;br /&gt;
====चाचा नेहरू====&lt;br /&gt;
देशभर में जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन 14 नवंबर बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे और यही कारण था कि उन्हें प्यार से चाचा नेहरू बुलाया जाता था।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''राधाकृष्णन के शब्दों में'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'जवाहर लाल नेहरू हमारी पीढ़ी के एक महानतम व्यक्ति थे। वह एक ऐसे अद्वितीय राजनीतिज्ञ थे, जिनकी मानव-मुक्ति के प्रति सेवाएं चिरस्मरणीय रहेंगी। स्वाधीनता-संग्राम के योद्धा के रूप में वह यशस्वी थे और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका अंशदान अभूतपूर्व था।'&lt;br /&gt;
==अखिल भारतीय कांग्रेस समिति==&lt;br /&gt;
वह महात्मा गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़े। चाहे असहयोग आंदोलन की बात हो या फिर नमक सत्याग्रह या फिर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की बात हो उन्होंने गांधी जी के हर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। मलिक ने बताया कि नेहरू की विश्व के बारे में जानकारी से गांधी जी काफी प्रभावित थे और इसीलिए आजादी के बाद वह उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते थे। सन् 1920 में उन्होंने [[उत्तर प्रदेश]] के [[प्रतापगढ़ जिला|प्रतापगढ़ जिले]] में पहले किसान मार्च का आयोजन किया। 1923 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव चुने गए।&lt;br /&gt;
==पहला चुनाव प्रचार==&lt;br /&gt;
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पहला चुनाव प्रचार भी यादगार है। एक कमेंटेटर के मुताबिक कांग्रेस का चुनाव प्रचार केवल नेहरू पर केन्द्रित था। चुनाव में नेहरू ने सड़क, रेल, पानी और हवाई जहाज सभी का सहारा लिया। उन्होंने 25,000 मील की दूरी तय की। 18,000 मील हवाई जहाज से, 5200 मील कार से, 1600 मील ट्रेन से और 90 मील नाव से। चुनाव आयोग के लिए राहत की बात ये थी कि निरक्षरता के बावजूद पूरे देश में 60 प्रतिशत वोटिंग हुई। जबकि पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सबसे ज्यादा 364 सीटें मिली थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; align=&amp;quot;right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! वर्ष &lt;br /&gt;
! घटना क्रम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1889 &lt;br /&gt;
|14 नवंबर जन्म इलाहाबाद उत्तर प्रदेश&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1912&lt;br /&gt;
|इलाहाबाद उच्च न्यायालय की बार की सदस्यता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1916&lt;br /&gt;
|8 फ़रवरी  श्रीमती कमला नेहरू से विवाह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1917&lt;br /&gt;
|19 नवंबर इंदिरा गांधी का जन्म&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1921&lt;br /&gt;
|पहली बार जेल गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1923&lt;br /&gt;
|पिता मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस छोड़ दी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1924&lt;br /&gt;
|इलाहाबाद महानगर पालिका के अध्यक्ष बने&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1926&lt;br /&gt;
|यूरोप की यात्रा की&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1929&lt;br /&gt;
|कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1929&lt;br /&gt;
|कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1931&lt;br /&gt;
|मोतीलाल नेहरू की मृत्यु&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1944&lt;br /&gt;
|भारत एक खोज पुस्तक लिखी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1947&lt;br /&gt;
|भारत के प्रथम प्रधान मंत्री बन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1948&lt;br /&gt;
|गांधी जी की हत्या।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1951&lt;br /&gt;
|पहली पंचवर्षीय योजना लागू की।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1964&lt;br /&gt;
|27 मई निधन&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
साइमन कमीशन के विरुद्ध लखनऊ के प्रदर्शन में उन्होंने भाग लिया। एक अहिंसात्मक सत्याग्रही होने पर भी उन्हें पुलिस की लाठियों की गहरी मार सहनी पड़ी। 1928 ई॰ में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महामंत्री बने 1929 के लाहौर अधिवेशन के बाद नेहरू देश के बुद्धिजीवियों और युवाओं के नेता के रूप में उभरे। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;मेरे विचार में, हम भारतवासियों के लिए- एक विदेशी भाषा को अपनी सरकारी भाषा के रूप में स्वीकारना सरासर अशोभनीय होगा। मैं आपको कह सकता हूँ कि बहुत बार जब हम लोग विदेशों में जाते हैं, और हमें अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बातचीत करनी पड़ती है, तो मुझे कितना बुरा लगता है। लोगों को बहुत ताज्जुब होता है, और वे हमसे पूछते हैं कि हमारी कोई भाषा नहीं है? हमें विदेशी भाषा में क्यों बोलना पड़ता हैं?&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सोचकर कि उस समय अतिवादी वामपंथी धारा की ओर आकर्षित हो रहे युवाओं को नेहरू कांग्रेस आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल कर सकेंगे, गांधी ने बुद्धिमानीपूर्वक कुछ वरिष्ठ नेताओं को अनदेखा करते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। महात्मा का यह आकलन भी सही था कि इस अतिरिक्त ज़िम्मेदारी के साथ नेहरू भी मध्यम मार्ग पर क़ायम रहेंगे।&lt;br /&gt;
====राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में====&lt;br /&gt;
1931 में पिता की मृत्यु के बाद जवाहरलाल कांग्रेस की केंद्रीय परिषद में शामिल हो गए और महात्मा के अंतरंग बन गए। यद्यपि 1942 तक गांधी ने आधिकारिक रूप से उन्हें अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था, पर 1930 के दशक के मध्य में ही देश को गांधी जी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में नेहरू दिखाई देने लगे थे। मार्च 1931 में महात्मा और ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड इरविन (बाद में लॉर्ड हैलिफ़ैक्स) के बीच हुए गांधी-इरविन समझौते से भारत के दो प्रमुख नेताओं के बीच समझौते का आभास मिलने लगा। इसने एक साल पहले शुरू किए गए गांधी के प्रभावशाली सविनय अवज्ञा आंदोलन को तेज़ी प्रदान की, जिसके दौरान नेहरू को गिरफ़्तार किया गया।&lt;br /&gt;
====गोलमेज़ सम्मेलन====&lt;br /&gt;
यह आशा कि गांधी-इरविन समझौता भारत और ब्रिटेन के संबंधों में शांति का पूर्वाभास साबित होगा, साकार नहीं हुई; लॉर्ड वैलिंगडन (जिन्होंने वाइसरॉय के रूप में 1931 में लॉर्ड इरविन का स्थान लिया) ने दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन के बाद लंदन से स्वदेश लौटने के कुछ ही समय बाद जनवरी 1932 में गांधी को जेल भेज दिया। उन पर फिर से [[सविनय अवज्ञा आंदोलन]] शुरू करने के प्रयास का आरोप लगाया गया। नेहरू को भी गितफ़्तार करके दो साल के कारावास की सज़ा दी गई।&lt;br /&gt;
====प्रांतीय स्वशासन====&lt;br /&gt;
भारत में स्वशासन की स्थापना की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए लंदन में हुए गोलमेज़ सम्मेलनों की परिणति अंततः 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट के रूप में हुई, जिसके तहत भारतीय प्रांतों के लोकप्रिय स्वशासी सरकार की प्रणाली प्रदान की गई। आख़िरकार इससे एक संघीय प्रणाली का जन्म हुआ, जिसमें स्वायत्तशासी प्रांत और रजवाड़े शामिल थे। संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया, लेकिन प्रांतीय स्वशासन लागू हो गया। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;आप में जितना अधिक अनुशासन होगा, आप में उतनी ही आगे बढ़ने की शक्ति होगी। कोई भी देश-जिसमें न तो थोपा गया अनुशासन है, और न आत्मा-अनुशासन-बहुत समय तक नहीं टिक सकता।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{highright}}&lt;br /&gt;
जवाहर लाल नेहरू हमारी पीढ़ी के एक महानतम व्यक्ति थे। वह एक ऐसे अद्वितीय राजनीतिज्ञ थे, जिनकी मानव-मुक्ति के प्रति सेवाएं चिरस्मरणीय रहेंगी। स्वाधीनता-संग्राम के योद्धा के रूप में वह यशस्वी थे और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका अंशदान अभूतपूर्व था। &lt;br /&gt;
{{highclose}}&lt;br /&gt;
1930 के दशक के मध्य में नेहरू यूरोप के घटनाक्रम के प्रति ज़्यादा चिंतित थे, जो एक अन्य विश्व युद्ध की ओर बढ़ता प्रतीत हो रहा था। 1936 के आरंभ में वह अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए यूरोप में थे। इसके कुछ ही समय बाद स्विट्ज़रलैंड के एक सेनीटोरियम में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। उस समय भी उन्होंने इस बात पर बल दिया कि युद्ध की स्थिति में भारत का स्थान लोकतांत्रिक देशों के साथ होगा, हालांकि वह इस बात पर भी ज़ोर देते थे कि भारत एक स्वतंत्र देशों के रूप में ही ग्रेट ब्रिटेन और फ़्रांस के समर्थन में युद्ध कर सकता है।&lt;br /&gt;
====कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विवाद====&lt;br /&gt;
प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद हुए चुनाव में अधिकांश प्रांतों में कांग्रेस पार्टी सत्तारूढ़ हुई, तो नेहरू दुविधा में पड़ गए। चुनावों में मुहम्मद अली जिन्ना (जो पाकिस्तान के जनक बने) के नेतृत्व में मुस्लिम लीग का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। इसलिए कांग्रेस ने अदूरदर्शिता दिखाते हुए कुछ प्रांतों में मुस्लिम लीग और कांग्रेस की गठबंधन सरकार बनाने के जिन्ना के अनुरोध को ठुकरा दिया। इस निर्णय में नेहरू की कोई भूमिका नहीं थी। इसके फलस्वरूप कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच के विवाद ने अंततः हिंदूओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष का रूप ले लिया, जिसकी परिणति भारत के विभाजन और पाकिस्तान के गठन के रूप में हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कारावास==&lt;br /&gt;
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के बाद जब वाइसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने स्वायत्तशासी प्रांतीय मंत्रिमंडलों से परामर्श किए बिना भारत को युद्ध में झोंक दिया, तो इसके विरोध में कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने अपने प्रांतीय मंत्रिमंडल वापस ले लिए। कांग्रेस की इस कार्यवाही से राजनीति का अखाड़ा जिन्ना और मुस्लिम लीग के लिए साफ़ हो गया। &lt;br /&gt;
====विचारों में मतभेद====&lt;br /&gt;
युद्ध के बारे में नेहरू के विचार गांधी से भिन्न थे। &lt;br /&gt;
*आरंभ में महात्मा का विचार था कि अंग्रेज़ों को बिना शर्त समर्थन दिया जाए और यह समर्थन अहिंसक होना चाहिए। &lt;br /&gt;
*नेहरू का विचार था कि आक्रमण से प्रतिरक्षा में अहिंसा का कोई स्थान नहीं है और सिर्फ़ एक स्वतंत्र देश के रूप में ही भारत को नाज़ियों के ख़िलाफ़ युद्ध में ग्रेट ब्रिटेन का साथ देना चाहिए। अगर भारत मदद नहीं कर सकता, तो अड़चन भी न डाले।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;'हिन्दी' का मज़हब से कोई सम्बन्ध नहीं, और हिन्दूस्तानी मुसलमान और ईसाई उसी तरह से जिन्दा हैं-जिस तरह कि एक हिन्दू मत का मानने वाला। अमरीका के लोग, जो सभी हिन्दुस्तानियों को 'हिन्दू' कहते हैं, बहुत गलती नहीं करते अगर वे 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग करें, तो उनका प्रयोग बिल्कुल ठीक होगा। '''जवाहर लाल नेहरू'''&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अक्तूबर 1940 में महात्मा गाँधी ने अपने मूल विचार से हटकर एक सीमित नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का फ़ैसला किया, जिसमें भारत की आज़ादी के अग्रणी पक्षधरों को क्रमानुसार हिस्सा लेने के लिए चुना गया था। नेहरू को गिरफ़्तार करके चार वर्ष के कारावास की सज़ा दी गई। एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक ज़ेल में रहने के बाद उन्हें अन्य कांग्रेसी क़ैदियों के साथ रिहा कर दिया गया। इसके तीन दिन बाद हवाई में पर्ल हारबर पर बमबारी हुई। 1942 की बसंत ॠतु में, जब जापान ने बर्मा (वर्तमान म्यांमार) के रास्ते भारत की सीमाओं पर हमला किया, तो इस नए सैनिक ख़तरे के मद्देनज़र ब्रिटिश सरकार ने भारत की तरफ़ थोड़ा हाथ बढ़ाने का फ़ैसला किया। प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने सर स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स, जो युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य और राजनीतिक रूप से नेहरू के नज़दीकी तथा जिन्ना के परिचित थे, को संवैधानिक समस्याओं को सुलझाने के प्रस्तावों के साथ भेजा। क्रिप्स का यह अभिमान असफल रहा, क्योंकि गाँधी स्वतंत्रता से कम कुछ भी स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====भारत छोड़ो प्रस्ताव====&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी में अब नेतृव्य गाँधी के हाथों में था, जिन्होंने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ देने का आह्वान किया, नेहरू हालांकि युद्ध- प्रयत्नों पर प्रश्न उठाने में संकोच कर रहे थे, लेकिन गाँधी का साथ देने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। 8 अगस्त 1942 को [[मुंबई]] में कांग्रेस पार्टी द्वारा 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित करने के बाद गाँधी जी और नेहरू समेत समूची कांग्रेस कार्यकारिणी समिति को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया। अपने नौवें और अंतिम कारावास से नेहरू 15 जून 1945 को रिहा हुए।&lt;br /&gt;
====भारत और पाकिस्तान का विभाजन====&lt;br /&gt;
दो वर्ष के भीतर भारत को स्वतन्त्र और विभाजित होना था। वाइसरॉय लॉर्ड वेवेल द्वारा कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग को साथ लाने की अंतिम कोशिश भी नाक़ाम रही। इस बीच लंदन में युद्ध के दौरान सत्तारूढ़ चर्चिल प्रशासन का स्थान लेबर पार्टी की सरकार ने ले लिया था। उसने अपने पहले कार्य के रूप में भारत में एक कैबिनेट मिशन भेजा और बाद में लॉर्ड वेवेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को नियुक्त कर दिया। अब प्रश्न भारत की स्वतन्त्रता का नहीं, बल्कि यह था कि इसमें एक ही स्वतंत्र राज्य होगा या एक से अधिक होंगे। जहाँ गाँधी ने विभाजन को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। वहीं नेहरू ने अनिच्छा, लेकिन यथार्थवादिता से मौन सहमति दे दी। 15 अगस्त 1947 को भारत और [[पाकिस्तान]] दो अलग-अलग स्वतंत्र देश बने। नेहरू स्वाधीन भारत के पहले प्रधानमंत्री हो गए।&lt;br /&gt;
==आज़ाद भारत के मुख्य पड़ाव==&lt;br /&gt;
ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को आधार मान कर बनाए गए भारतीय संविधान के तहत हुआ यह पहला चुनाव था जिसमें जनता ने मतदान के अधिकार का प्रयोग किया। इस चुनाव के समय मतदाताओं की कुल संख्या 17 करोड़ 60 लाख थी जिनमें से 15 फ़ीसदी साक्षर थे। 1952 में पहले आमचुनाव हुए जिसमें कांग्रेस पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। इससे पहले वह 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से अंतरिम प्रधानमंत्री थे। संसद की 497 सीटों के साथ-साथ राज्यों कि विधानसभाओं के लिए भी चुनाव हुए। लेकिन जहाँ संसद में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ वहीं कुछ राज्यों में इसे दूसरे दलों से ज़बर्दस्त टक्कर मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी बहुमत हासिल करने में इस शहरों [[मद्रास]], [[हैदराबाद]] और त्रावणकोर में विफल रही जहाँ उसे कम्युनिस्ट पार्टी ने कड़ी टक्कर दी। हालाँकि इन चुनावों में हिंदू महासभा और अलगाववादी सिक्ख अकाली पार्टी को मुँह की खानी पड़ी। पहले चुनाव के बाद से ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) ने दक्षिणी राज्यों में जनसमर्थन बढ़ाना शुरू कर दिया जिसके नतीजे 1957 में हुए चुनाव में उसे मिले। त्रावणकोर-कोचिन और मालाबार को मिला कर बने [[केरल]] में कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई। &lt;br /&gt;
==राज्यों का पुनर्गठन==&lt;br /&gt;
नेहरू के समय में एक और अहम फ़ैसला भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का था। इसके लिए राज्य पुनर्गठन क़ानून (1956) पास किया गया। आज़ादी के बाद भारत में राज्यों की सीमाओं में हुआ यह सबसे बड़ा बदलाव था। इसके तहत 14 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना हुई। इसी क़ानून के तहत केरल और बॉम्बे को राज्य का दर्जा मिला। संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया जिसके तहत भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रधानमंत्री के रूप में उपलब्धियाँ== &lt;br /&gt;
1929 में जब लाहौर अधिवेशन में गांधी ने नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना था, तब से 35 वर्षों तक- 1964 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए मृत्यु तक, 1962 में चीन से हारने के बावजूद, नेहरू अपने देशवासियों के आदर्श बने रहे। राजनीति के प्रति उनका धर्मनिरपेक्ष रवैया गांधी के धार्मिक और पारंपरिक दृष्टिकोण से भिन्न था। गांधी के विचारों ने उनके जीवनकाल में भारतीय राजनीति को भ्रामक रूप से एक धार्मिक स्वरूप दे दिया था। गांधी धार्मिक रुढ़िवादी प्रतीत होते थे, किन्तु वस्तुतः वह सामाजिक उदारवादी थे, जो हिन्दू धर्म को धर्मनिरपेक्ष बनाने की चेष्ठा कर रहे थे। गांधी और नेहरू के बीच असली विरोध धर्म के प्रति उनके रवैये के कारण नहीं, बल्कि सभ्यता के प्रति रवैये के कारण था। जहाँ नेहरु लगातार आधुनिक संदर्भ में बात करते थे। वहीं गांधी प्राचीन भारत के गौरव पर बल देते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश के इतिहास में एक ऐसा मौका भी आया था, जब महात्मा गांधी को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त और बागी तेवर के सामने नेहरू का विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा और वह न सिर्फ इस पद पर चुने गए, बल्कि उन्हें सबसे लंबे समय तक विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र की बागडोर संभालने का गौरव हासिल भी हुआ।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;हिन्दुस्तान एक खूबसूरत औरत नहीं है। नंगे किसान हिन्दुस्तान हैं। वे न तो खूबसूरत हैं, न देखने में अच्छे हैं- क्योंकि गरीबी अच्छी चीज नहीं है, वह बुरी चीज है। इसलिए जब आप 'भारतमाता' की जय कहते हैं- तो याद रखिए कि भारत क्या है, और भारत के लोग निहायत बुरी हालत में हैं- चाहे वे किसान हों, मजदूर हों, खुदरा माल बेचने वाले दूकानदार हों, और चाहे हमारे कुछ नौजवान हों। '''जवाहर लाल नेहरू'''&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में नेहरु का महत्व उनके द्वारा आधुनिक जीवन मूल्यों और भारतीय परिस्थतियों के लिए अनुकूलित विचारधाराओं के आयात और प्रसार के कारण है। धर्मनिरपेक्षता और भारत की जातीय तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बावजूद देश की मौलिक एकता पर ज़ोर देने के अलावा नेहरु भारत को वैज्ञानिक खोजों और तकनीकी विकास के आधुनिक युग में ले जाने के प्रति भी सचेत थे। साथ ही उन्होंने अपने देशवासियों में निर्धनों तथा अछूतों के प्रति सामाजिक चेतना की ज़रूरत के प्रति जागरुकता पैदा करने और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान पैदा करने का भी कार्य किया। उन्हें अपनी एक उपलब्धि पर विशेष गर्व था कि उन्होंने प्राचीन हिन्दू सिविल कोड में सुधार करके अंततः उत्तराधिकार तथा संपत्ति के मामले में विधवाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार प्रदान करवाया।&lt;br /&gt;
====गुटनिरपेक्ष आंदोलन====&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेहरू का सितारा अक्टूबर 1956 तक बुलंदी पर था। 1956 में सोवियत संघ के खिलाफ़ हंगरी के विद्रोह के दौरान भारत के रवैये के कारण उनके गुटनिरपेक्ष नीति की जमकर आलोचना हुई। संयुक्त राष्ट्र में भारत अकेला ऐसा गुटनिरपेक्ष देश था, जिसने हंगरी पर आक्रमण के मामले में सोवियत संघ के पक्ष में मत दिया। इसके बाद नेहरू को गुटनिरपेक्ष आंदोलन के आह्वान की विश्वनियता साबित करने में काफ़ी मुश्किल हुई। स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में उपनिवेशवाद का विरोध उनकी विदेश- नीति का मूल आधार था, लेकिन 1961 के गुटनिरपेक्ष देशों के बेलग्रेड सम्मेलन तक नेहरू ने प्रतिउपनिवेशवाद की जगह गुटनिरपेक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था। 1962 में लंबे समय से चले आ रहे सीमा-विवाद के फलस्वरुप चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर हमले की चेतावनी दी। नेहरू ने अपनी गुटनिरपेक्ष नीति को ताक पर रखते हुए पश्चिमी देशों से सहायता की मांग की और चीन को पीछे हटाना पड़ा। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;संस्कृति का मतलब है- मन और आत्मा की विशालता और व्यापकता। इसका मतलब दिमाग को तंग रखना, या आदमी या मुल्क की भावना को सीमित करना कभी नहीं होता।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कश्मीर, जिस पर भारत और पाकिस्तान, दोनों दावा कर रहे थे, नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में लगातार एक समस्या बना रहा। संघर्ष विराम रेखा को समायोजित करके इस विवाद को निपटाने की उनकी प्रारंभिक कोशिशें नाकाम रहीं और 1948 में पाकिस्तान ने बलपूर्वक कश्मीर पर क़ब्ज़ा का असफल प्रयास किया। भारत में बचे अंतिम उपनिवेश, पुर्तग़ाली [[गोवा]] की समस्या को सुलझाने में नेहरू अधिक भाग्यशाली रहे। यद्यपि दिसंबर 1961 में भारतीय सेनाओं द्वारा इस पर क़ब्ज़ा किए जाने से कई पश्चिमी देशों में नराज़गी पैदा हुई। लेकिन नेहरू की कार्यवाही न्यायसंगत थी। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के मन को मुक्त करना है, न कि उसे बाँधे हुए चौखटों में बंद करना है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेज़ों और फ़्रांसीसियों के वापस चले जाने के बाद भारत में पुर्तग़ाली उपनिवेश की उपस्थिती एक कालदोष बनकर रह गई थी। अंग्रेज़ और फ़ांसीसी दोनों शांतिपूर्वक वापस चले गए थे। अगर पुर्तग़ाली जाने के लिए तैयार नहीं थे, तो नेहरू को उन्हें वहाँ से हटाने का तरीक़ा ढूंढ़ना ही था। पहले समझाने-बुझाने की कोशिशें की गईं, फिर अगस्त 1955 में उन्होंने निहत्थे भारतीयों के एक समूह को पुर्तग़ाली क्षेत्र में जाकर अहिंसक प्रदर्शन की अनुमति दी। पुर्तग़ालियों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाकर 30 लोगों को मार डाला, लेकिन नेहरू ने छह वर्षों तक कोई क़दम नहीं उठाया और इस बीच पुर्तग़ाल के पश्चिमी मित्रों से यह अपील करते रहे कि वे पुर्तग़ाली सरकार से यह उपनिवेश वापस दिला दें। अंतत: जब भारत ने हमला किया, तो नेहरू का दावा था कि उन्होंने और भारत सरकार ने कभी भी नीति के रूप में अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता नहीं जताई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मंत्रिमंडल का पुनर्गठन====&lt;br /&gt;
पंडित नेहरू पहले राष्ट्राध्यक्ष थे, जिन्होंने  1963 ई॰ में रूस, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका के बीच आंशिक परमाणविक परीक्षण-निषेध संधि पर हस्ताक्षर किये जाने का स्वागत किया। उपरान्त लोकसभा के कुछ उपचुनावों में कांग्रेसी उम्मीदवारों की विफलता के कारण कांग्रेस दल ने उन्हें सुझाव दिया कि वे अपने मंत्रिमंडल का पुनर्गठन करें, ताकि कांग्रेस के कुछ गण्यमान्य नेता दल को पुनर्गठित करने में अपना पूर्ण समय दे सकें। पंडित नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों की संख्या कम कर दी और श्री मोरार जी देसाई तथा श्री पाटिल सरीखे अपने पुराने सहयोगियों का त्यागपतत्र स्वीकार कर लिया। साथ ही उन्होंने एक छोटे तथा ठोस मंत्रीमंडल का गठन किया। जनवरी 1964 ई॰ में जब वे [[भुवनेश्वर]] कांग्रेस अधिवेशन में भाग ले रहे थे, तभी वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गये। यद्यपि कुछ दिनों के लिए उनके स्वास्थ्य में थोड़ा सुधार अवश्य हुआ।&lt;br /&gt;
====भारत-चीन युद्ध====&lt;br /&gt;
हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा उस समय बेमानी साबित हो गया जब सीमा विवाद को लेकर 10 अक्तूबर 1962 को चीनी सेना ने लद्दाख़ और नेफ़ा में भारतीय चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया। नेहरू ने इसे जानबूझ कर की गई कारवाई बताया। नवंबर में एक बार फिर चीन की ओर से हमले शुरू हुए। हालाँकि चीन ने एकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा कर दी। तब तक 1300 से ज़्यादा भारतीय सैनिक मारे जा चुके थे। पंडित नेहरू के करियर का यह सबसे बुरा दौर साबित हुआ। उनकी सरकार के ख़िलाफ़ संसद में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मृत्यु====&lt;br /&gt;
चीन के साथ संघर्ष के कुछ ही समय बाद नेहरू के स्वास्थ्य में गिरावट के लक्षण दिखाई देने लगे। उन्हें 1963 में दिल का हल्का दौरा पड़ा, जनवरी 1964 में उन्हें और दुर्बल बना देने वाला दौरा पड़ा। कुछ ही महीनों के बाद तीसरे दौरे में 27 मई 1964 में उनकी मृत्यु हो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ख्यातिलब्ध लेखक==&lt;br /&gt;
पंडित नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली वक्ता ही नहीं, ख्यातिलब्ध लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा 1936 ई॰ में प्रकाशित हुई और संसार के सभी देशों में उसका आदर हुआ। उनकी अन्य रचनाओं में भारत और विश्व, सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता और उसके बाद विशेष उल्लेखनीय हैं।  इनमें से अन्तिम दो पुस्तकें उनके फुटकर लेखों और भाषणों के संग्रह हैं।&lt;br /&gt;
==मूल्यांकन==&lt;br /&gt;
अपनी भारतीयता पर ज़ोर देने वाले नेहरू में वह हिन्दू प्रभामंडल और छवि कभी नहीं उभरी, जो गाँधी के व्यक्तितत्व का अंग थी। अपने आधुनिक राजनीतिक और आर्थिक विचारों के कारण वह भारत के युवा बुद्धिजीवियों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ गाँधी के अहिंसक आन्दोलन कि ओर आकर्षित करने में और स्वतन्त्रता के बाद उन्हें अपने आसपास बनाए रखने में सफल रहे। पश्चिम में पले-बढ़े होने और स्वतन्त्रता के पहले यूरोपीय यात्राओं के कारण उनके सोचने का ढंग पश्चिमी साँचे में ढल चुका था। 17 वर्षों तक सत्ता में रहने के दौरान उन्होंने लोकतांत्रिक समाजवाद को दिशा-निर्देशक माना। उनके कार्यकाल में संसद में कांग्रेस पार्टी के ज़बरदस्त बहुमत के कारण वह अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर होते रहे। लोकतन्त्र, समाजवाद, एकता और धर्मनिरपेक्षता उनकी घरेलू नीति के चार स्तंभ थे। वह जीवन भर इन चार स्तंभों से सुदृढ़ अपनी इमारत को काफ़ी हद तक बचाए रखने में कामयाब रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेहरू की इकलौती संतान [[इंदिरा गाँधी]] 1966 से 1977 तक और फिर 1980 से 1984 तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। इंदिरा गाँधी के बेटे [[राजीव गाँधी]] 1984 से 1989 तक प्रधानमंत्री रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://ritbansal.blogspot.com/2008/11/blog-post.html ritbansal.blogspot]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[http://www.culturalindia.net/leaders/jawaharlal-nehru.html  culturalindia.net]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[http://www.indianchild.com/jawaharlal_nehru.htm indianchild.com]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[http://www.biographyonline.net/politicians/indian/nehru.html biographyonline.net]&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रधानमंत्री}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत रत्न सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध_व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
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[[Category:राजनेता]]&lt;br /&gt;
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[[Category:स्वतन्त्रता सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>जवाहरलाल नेहरू</title>
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		<updated>2010-05-31T12:49:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#999900 size=5&amp;gt;पंडित जवाहरलाल नेहरू&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Jawahar-Lal-Nehru.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=चाचा नेहरू, पंडित जी&lt;br /&gt;
|जन्म=14 नवम्बर 1889&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
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|पति/पत्नी=[[कमला नेहरू]]&lt;br /&gt;
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|मृत्यु=27 मई 1964&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=दिल का दौरा&lt;br /&gt;
|स्मारक=शांतिवन, दिल्ली &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[काँग्रेस]]&lt;br /&gt;
|पद=[[:श्रेणी:भारत के प्रधानमंत्री|भारत के प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
|भाषा=हिन्दी, अंग्रेज़ी&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=नौ बार जेल यात्रा की&lt;br /&gt;
|कार्य काल=15 अगस्त 1947-27 मई 1964&lt;br /&gt;
|विद्यालय=इंग्लैण्ड के हैरो स्कूल, केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज&lt;br /&gt;
|शिक्षा=बैरिस्टर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]] सम्मान&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=लेखन, स्वाधीनता सग्राम, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[जलियाँवाला बाग़]], [[इंदिरा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
जवाहरलाल नेहरू भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं स्वतन्त्र [[भारत]] के प्रथम प्रधान मंत्री (1947-640) थे। जवाहर लाल नेहरू, संसदीय सरकार की स्थापना और विदेशी मामलों में 'गुटनिरपेक्ष' नीतियों के लिए विख्यात हुए। 1930 और 1940 के दशक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से वह एक थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
नेहरू कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के थे, जो अपनी प्रशासनिक क्षमताओं तथा विद्वत्ता के लिए विख्यात थे और जो 18वीं शताब्दी के आरंभ में इलाहाबाद आ गये थे। इनका जन्म [[इलाहाबाद]] में 14 नवम्बर 1889 ई॰ को हुआ। वे [[पं॰ मोतीलाल नेहरू]] और श्रीमती स्वरूप रानी के एकमात्र पुत्र थे। अपने सभी भाई-बहनों में, जिनमें दो बहनें थीं, जवाहरलाल सबसे बड़े थे। उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई 14 वर्ष की आयु में नेहरू ने घर पर ही कई अंग्रेज़ अध्यापिकाओं और शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त कि। इनमें से सिर्फ़ एक, फ़र्डिनैंड ब्रुक्स का, जो आधे आयरिश और आधे बेल्जियन अध्यात्मज्ञानी थे, उन पर कुछ प्रभाव पड़ा। जवाहरलाल के एक समादृत भारतीय शिक्षक भी थे, जो उन्हें हिंदी और संस्कृत पढ़ाते थे। 15 वर्ष की उम्र में 1905 में नेहरू एक अग्रणी इंग्लिश विद्यालय [[इंग्लैण्ड]] के हैरो स्कूल में भेजे गये। हैरो में दाख़िल हुए, जहाँ वह दो वर्ष तक रहे। नेहरू का शिक्षा काल किसी तरह से असाधारण नहीं था। और हैरो से वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, जहाँ उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और उनके अपने ही शब्दों में परीक्षा उत्तीर्ण करने में उन्हें 'न कीर्ति, न अपकीर्ति' मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Teen Murti Bhavan.jpg|तीन मूर्ति भवन, जवाहरलाल नेहरू का निवास, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Teen Murti Bhavan, Nehru's Residence |thumb|left]]&lt;br /&gt;
भारत लौटने के चार वर्ष बाद मार्च 1916 में नेहरू का विवाह [[कमला नेहरू|कमला कौल]] के साथ हुआ, जो [[दिल्ली]] में बसे कश्मीरी परिवार की थीं। उनकी अकेली संतान [[इंदिरा गाँधी|इंदिरा प्रियदर्शिनी]] का जन्म 1917 में हुआ; बाद में वह, विवाहोपरांत नाम 'इंदिरा गांधी', भारत की प्रधानमंत्री बनीं। तथा एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बैरिस्टर के रूप में==&lt;br /&gt;
1912 ई॰ में वे बैरिस्टर बने और उसी वर्ष [[भारत]] लौटकर उन्होंने इलाहाबाद में वकालत प्रारम्भ की। वकालत में उनकी विशेष रूचि न थी और शीघ्र ही वे भारतीय राजनीति में भाग लेने लगे। 1912 ई॰ में उन्होंने बाँकीपुर ([[बिहार]]) में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजनीतिक प्रशिक्षण==&lt;br /&gt;
भारत लौटने के बाद नेहरू ने पहले वकील के रूप में स्थापित होने का प्रयास किया लेकिन अपने पिता के विपरीत उनकी इस पेशे में कोई ख़ास रुची नहीं थी और उन्हें वकालत और वकीलों का साथ, दोनों ही नापसंद थे। उस समय वह अपनी पीढ़ी के कई अन्य लोगों की भांति भीतर से एक ऐसे राष्ट्रवादी थे, जो अपने देश की आज़ादी के लिए बेताब हो, लेकिन अपने अधिकांश समकालीनों की तरह उसे हासिल करने की ठोस योजनाएं न बना पाया हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गाँधी जी से मुलाकात====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawaharlal-Nehru-And-Mahatma-Gandhi.jpg|thumb|जवाहरलाल नेहरू और [[महात्मा गाँधी]] &amp;lt;br /&amp;gt; Jawaharlal Nehru and Mahatma Gandhi|left]]&lt;br /&gt;
1916 ई॰ के [[लखनऊ]] अधिवेशन में वे सर्वप्रथम [[महात्मा गाँधी]] के सम्पर्क में आये। गांधी उनसे 20 साल बड़े थे। दोनों में से किसी ने भी आरंभ में एक-दूसरे को बहुत प्रभावित नहीं किया। बहरहाल, 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे। इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई। उससे पहले मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक स्थिति की माँग था। नेहरू जी के शब्दों में:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;कुटिलता की नीति अन्त में चलकर फायदेमन्द नहीं होती। हो सकता है कि अस्थायी तौर पर इससे कुछ फायदा हो जाए।&lt;br /&gt;
अगर हम इस देश की गरीबी को दूर करेंगे, तो कानूनों से नहीं, शोरगुल मचाके नहीं, शिकायत करके नहीं, बल्कि मेहनत करके। एक-एक आदमी बूढ़ा और छोटा, मर्द , औरत और बच्चा मेहनत करेगा। हमारे सामने आराम नहीं है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
समय के साथ-साथ पं॰ नेहरू की रुचि भारतीय राजनीति में बढ़ती गयी। [[जलियाँवाला बाग़]] हत्याकाण्ड की जाँच में देशबन्धु चितरंजनदास एवं महात्मा गाँधी के सहयोगी रहे और 1921 के असहयोग आन्दोलन में तो महात्मा गाँधी के अत्यधिक निकट सम्पर्क में आ गये। यह सम्बन्ध समय की गति के साथ-साथ दृढ़तर होता गया और उसकी समाप्ति केवल महात्मा गाँधी जी की मृत्यु से ही हुई।&lt;br /&gt;
====गाँधी जी के अनुयायी के रूप में====&lt;br /&gt;
नेहरू की आत्मकथा से भारतीय राजनीति में उनकी गहरी रुचि का पता चलता है। उन्हीं दिनों अपने पिता को लिखे गए पत्रों से भारत की स्वतंत्रता में उन दोनों की समान रुचि दिखाई देती है। लेकिन गांधी से मुलाक़ात होने तक पिता और पुत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए निश्चित योजनाओं का विकास नहीं हुआ था। गांधी ने उन्हें राजनीति में अपना अनुयायी बना लिया। गांधी द्वारा कर्म पर बल दिए जाने के गुण से वह दोनों प्रभावित हुए। महात्मा गांधी का तर्क था कि ग़लती की सिर्फ़ निंदा ही नहीं, बल्कि प्रतिरोध भी किया जाना चाहिए। इससे पहले नेहरू और उनके पिता समकालीन भारतीय राजनीतिज्ञों का तिरस्कार करते थे, जिनका राष्ट्रवाद, कुछ अपवादों को छोड़कर लंबे भाषणों और प्रस्तावों तक सीमित था। गांधी द्वारा ग्रेट ब्रिटेन के ख़िलाफ़ बिना भय या घृणा के लड़ने पर ज़ोर देने से भी जवाहरलाल बहुत प्रभावित हुए।&lt;br /&gt;
====जेल यात्रा====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी के साथ नेहरू का जुड़ाव 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद आरंभ हुआ। इस काल में राष्ट्रवादी गतिविधियों की लहर ज़ोरों पर थी और अप्रैल 1919 को अमृतसर के नरसंहार के रूप में सरकारी दमन खुलकर सामने आया; स्थानीय ब्रिटिश सेना कमांडर ने अपनी टुकड़ियों को निहत्थे भारतीयों की एक सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया, जिसमें 379 लोग मारे गये और कम से कम 1,200 घायल हुए। नेहरू जी के शब्दों में:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;भारत की सेवा का अर्थ, करोड़ों पीड़ितों की सेवा है। इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान, और अवसर की विषमता का अन्त करना है। हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े आदमी की यह आकांक्षा रही है-कि प्रत्येक आँख के प्रत्येक आँसू को पोंछ दिया जाए। ऐसा करना हमारी शक्ति से बाहर हो सकता है, लेकिन जब तक आँसू हैं और पीड़ा है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1921 के आख़िर में जब कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को कुछ प्रांतों में ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया, तब पहली बार नेहरू जेल गये। अगले 24 वर्ष में उन्हें आठ बार बंदी बनाया गया, जिनमें से अंतिम और सबसे लंबा बंदीकाल, लगभग तीन वर्ष का कारावास जून 1945 में समाप्त हुआ। नेहरू ने कुल मिलाकर नौ वर्ष से ज़्यादा समय जेलों में बिताया। अपने स्वभाव के अनुरूप ही उन्होंने अपनी जेल-यात्राओं को असामान्य राजनीतिक गतिविधि वाले जीवन के अंतरालों के रूप में वर्णित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====व्यापक क्षेत्रों की यात्रा====&lt;br /&gt;
कांग्रेस के साथ उनका राजनीतिक प्रशिक्षण 1919 से 1929 तक चला। 1923 में और फ़िर 1927 में वह दो-दो वर्ष के लिए पार्टी के महासचिव बने। उनकी रुचियों और ज़िम्मेदारियों ने उन्हें भारत के व्यापक क्षेत्रों की यात्रा का अवसर प्रदान किया, विशेषकर उनके गृह प्रदेश संयुक्त प्रांत का, जहाँ उन्हें घोर ग़रीबी और किसानों की बदहाली की पहली झलक मिली और जिसने इन महत्त्वपूर्ण समस्याओं को दूर करने की उनकी मूल योजनाओं को प्रभावित किया। यद्यपि उनका कुछ-कुछ झुकाव समाजवाद की ओर था, लेकिन उनका सुधारवाद किसी निश्चित ढांचे में ढला हुआ नहीं था। 1926-27 में उनकी यूरोप तथा सोवियत संघ की यात्रा ने उनके आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि से, आज का बड़ा सवाल विश्वशान्ति का है। आज हमारे लिए यही विकल्प है कि हम दुनिया को उसके अपने रूप में ही स्वीकार करें। हम देश को इस बात की स्वतन्त्रता देते रहे कि वह अपने ढंग से अपना विकास करे और दूसरों से सीखे, लेकिन दूसरे उस पर अपनी कोई चीज नहीं थोपें। निश्चय ही इसके लिए एक नई मानसिक विधा चाहिए। पंचशील या पाँच सिद्धान्त यही विधा बताते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्क्सवाद और समाजवादी विचारधारा में नेहरू की वास्तविक रुचि इसी यात्रा से पैदा हुई, यद्यपि इससे उनके साम्यवादी सिद्धांतों और व्यवहार के ज्ञान में कोई ख़ास वृद्धि नहीं हुई। बाद में जेल यात्राओं के दौरान उन्हें अधिक गहराई से मार्क्सवाद के अध्ययन का मौक़ा मिला। इसके सिद्धांतों में उनकी रुचि थी, लेकिन इसके कुछ तरीक़ों से विकर्षित होने के कारण वह कार्ल मार्क्स की कृतियों को सारे प्रश्नों का उत्तर देने वाले शास्त्रों के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए। फ़िर भी मार्क्सवाद ही उनकी आर्थिक विचारधारा का मानदंड रहा, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर भारतीय परिस्थितियों के अनुसार फेरबदल किया गया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawaharlal-Nehru-1.jpg|thumb|चाचा नेहरू बच्चों के साथ &amp;lt;br /&amp;gt; Jawaharlal Nehru with Childrens]]&lt;br /&gt;
====चाचा नेहरू====&lt;br /&gt;
देशभर में जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन 14 नवंबर बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे और यही कारण था कि उन्हें प्यार से चाचा नेहरू बुलाया जाता था।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''राधाकृष्णन के शब्दों में'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'जवाहर लाल नेहरू हमारी पीढ़ी के एक महानतम व्यक्ति थे। वह एक ऐसे अद्वितीय राजनीतिज्ञ थे, जिनकी मानव-मुक्ति के प्रति सेवाएं चिरस्मरणीय रहेंगी। स्वाधीनता-संग्राम के योद्धा के रूप में वह यशस्वी थे और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका अंशदान अभूतपूर्व था।'&lt;br /&gt;
==अखिल भारतीय कांग्रेस समिति==&lt;br /&gt;
वह महात्मा गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़े। चाहे असहयोग आंदोलन की बात हो या फिर नमक सत्याग्रह या फिर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की बात हो उन्होंने गांधी जी के हर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। मलिक ने बताया कि नेहरू की विश्व के बारे में जानकारी से गांधी जी काफी प्रभावित थे और इसीलिए आजादी के बाद वह उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते थे। सन् 1920 में उन्होंने [[उत्तर प्रदेश]] के [[प्रतापगढ़ जिला|प्रतापगढ़ जिले]] में पहले किसान मार्च का आयोजन किया। 1923 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव चुने गए।&lt;br /&gt;
==पहला चुनाव प्रचार==&lt;br /&gt;
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पहला चुनाव प्रचार भी यादगार है। एक कमेंटेटर के मुताबिक कांग्रेस का चुनाव प्रचार केवल नेहरू पर केन्द्रित था। चुनाव में नेहरू ने सड़क, रेल, पानी और हवाई जहाज सभी का सहारा लिया। उन्होंने 25,000 मील की दूरी तय की। 18,000 मील हवाई जहाज से, 5200 मील कार से, 1600 मील ट्रेन से और 90 मील नाव से। चुनाव आयोग के लिए राहत की बात ये थी कि निरक्षरता के बावजूद पूरे देश में 60 प्रतिशत वोटिंग हुई। जबकि पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सबसे ज्यादा 364 सीटें मिली थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; align=&amp;quot;right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! वर्ष &lt;br /&gt;
! घटना क्रम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1889 &lt;br /&gt;
|14 नवंबर जन्म इलाहाबाद उत्तर प्रदेश&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1912&lt;br /&gt;
|इलाहाबाद उच्च न्यायालय की बार की सदस्यता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1916&lt;br /&gt;
|8 फ़रवरी  श्रीमती कमला नेहरू से विवाह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1917&lt;br /&gt;
|19 नवंबर इंदिरा गांधी का जन्म&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1921&lt;br /&gt;
|पहली बार जेल गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1923&lt;br /&gt;
|पिता मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस छोड़ दी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1924&lt;br /&gt;
|इलाहाबाद महानगर पालिका के अध्यक्ष बने&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1926&lt;br /&gt;
|यूरोप की यात्रा की&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1929&lt;br /&gt;
|कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1929&lt;br /&gt;
|कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1931&lt;br /&gt;
|मोतीलाल नेहरू की मृत्यु&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1944&lt;br /&gt;
|भारत एक खोज पुस्तक लिखी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1947&lt;br /&gt;
|भारत के प्रथम प्रधान मंत्री बन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1948&lt;br /&gt;
|गांधी जी की हत्या।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1951&lt;br /&gt;
|पहली पंचवर्षीय योजना लागू की।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1964&lt;br /&gt;
|27 मई निधन&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
साइमन कमीशन के विरुद्ध लखनऊ के प्रदर्शन में उन्होंने भाग लिया। एक अहिंसात्मक सत्याग्रही होने पर भी उन्हें पुलिस की लाठियों की गहरी मार सहनी पड़ी। 1928 ई॰ में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महामंत्री बने 1929 के लाहौर अधिवेशन के बाद नेहरू देश के बुद्धिजीवियों और युवाओं के नेता के रूप में उभरे। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;मेरे विचार में, हम भारतवासियों के लिए- एक विदेशी भाषा को अपनी सरकारी भाषा के रूप में स्वीकारना सरासर अशोभनीय होगा। मैं आपको कह सकता हूँ कि बहुत बार जब हम लोग विदेशों में जाते हैं, और हमें अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बातचीत करनी पड़ती है, तो मुझे कितना बुरा लगता है। लोगों को बहुत ताज्जुब होता है, और वे हमसे पूछते हैं कि हमारी कोई भाषा नहीं है? हमें विदेशी भाषा में क्यों बोलना पड़ता हैं?&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सोचकर कि उस समय अतिवादी वामपंथी धारा की ओर आकर्षित हो रहे युवाओं को नेहरू कांग्रेस आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल कर सकेंगे, गांधी ने बुद्धिमानीपूर्वक कुछ वरिष्ठ नेताओं को अनदेखा करते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। महात्मा का यह आकलन भी सही था कि इस अतिरिक्त ज़िम्मेदारी के साथ नेहरू भी मध्यम मार्ग पर क़ायम रहेंगे।&lt;br /&gt;
====राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में====&lt;br /&gt;
1931 में पिता की मृत्यु के बाद जवाहरलाल कांग्रेस की केंद्रीय परिषद में शामिल हो गए और महात्मा के अंतरंग बन गए। यद्यपि 1942 तक गांधी ने आधिकारिक रूप से उन्हें अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था, पर 1930 के दशक के मध्य में ही देश को गांधी जी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में नेहरू दिखाई देने लगे थे। मार्च 1931 में महात्मा और ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड इरविन (बाद में लॉर्ड हैलिफ़ैक्स) के बीच हुए गांधी-इरविन समझौते से भारत के दो प्रमुख नेताओं के बीच समझौते का आभास मिलने लगा। इसने एक साल पहले शुरू किए गए गांधी के प्रभावशाली सविनय अवज्ञा आंदोलन को तेज़ी प्रदान की, जिसके दौरान नेहरू को गिरफ़्तार किया गया।&lt;br /&gt;
====गोलमेज़ सम्मेलन====&lt;br /&gt;
यह आशा कि गांधी-इरविन समझौता भारत और ब्रिटेन के संबंधों में शांति का पूर्वाभास साबित होगा, साकार नहीं हुई; लॉर्ड वैलिंगडन (जिन्होंने वाइसरॉय के रूप में 1931 में लॉर्ड इरविन का स्थान लिया) ने दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन के बाद लंदन से स्वदेश लौटने के कुछ ही समय बाद जनवरी 1932 में गांधी को जेल भेज दिया। उन पर फिर से [[सविनय अवज्ञा आंदोलन]] शुरू करने के प्रयास का आरोप लगाया गया। नेहरू को भी गितफ़्तार करके दो साल के कारावास की सज़ा दी गई।&lt;br /&gt;
====प्रांतीय स्वशासन====&lt;br /&gt;
भारत में स्वशासन की स्थापना की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए लंदन में हुए गोलमेज़ सम्मेलनों की परिणति अंततः 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट के रूप में हुई, जिसके तहत भारतीय प्रांतों के लोकप्रिय स्वशासी सरकार की प्रणाली प्रदान की गई। आख़िरकार इससे एक संघीय प्रणाली का जन्म हुआ, जिसमें स्वायत्तशासी प्रांत और रजवाड़े शामिल थे। संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया, लेकिन प्रांतीय स्वशासन लागू हो गया। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;आप में जितना अधिक अनुशासन होगा, आप में उतनी ही आगे बढ़ने की शक्ति होगी। कोई भी देश-जिसमें न तो थोपा गया अनुशासन है, और न आत्मा-अनुशासन-बहुत समय तक नहीं टिक सकता।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{highright}}&lt;br /&gt;
जवाहर लाल नेहरू हमारी पीढ़ी के एक महानतम व्यक्ति थे। वह एक ऐसे अद्वितीय राजनीतिज्ञ थे, जिनकी मानव-मुक्ति के प्रति सेवाएं चिरस्मरणीय रहेंगी। स्वाधीनता-संग्राम के योद्धा के रूप में वह यशस्वी थे और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका अंशदान अभूतपूर्व था। &lt;br /&gt;
{{highclose}}&lt;br /&gt;
1930 के दशक के मध्य में नेहरू यूरोप के घटनाक्रम के प्रति ज़्यादा चिंतित थे, जो एक अन्य विश्व युद्ध की ओर बढ़ता प्रतीत हो रहा था। 1936 के आरंभ में वह अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए यूरोप में थे। इसके कुछ ही समय बाद स्विट्ज़रलैंड के एक सेनीटोरियम में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। उस समय भी उन्होंने इस बात पर बल दिया कि युद्ध की स्थिति में भारत का स्थान लोकतांत्रिक देशों के साथ होगा, हालांकि वह इस बात पर भी ज़ोर देते थे कि भारत एक स्वतंत्र देशों के रूप में ही ग्रेट ब्रिटेन और फ़्रांस के समर्थन में युद्ध कर सकता है।&lt;br /&gt;
====कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विवाद====&lt;br /&gt;
प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद हुए चुनाव में अधिकांश प्रांतों में कांग्रेस पार्टी सत्तारूढ़ हुई, तो नेहरू दुविधा में पड़ गए। चुनावों में मुहम्मद अली जिन्ना (जो पाकिस्तान के जनक बने) के नेतृत्व में मुस्लिम लीग का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। इसलिए कांग्रेस ने अदूरदर्शिता दिखाते हुए कुछ प्रांतों में मुस्लिम लीग और कांग्रेस की गठबंधन सरकार बनाने के जिन्ना के अनुरोध को ठुकरा दिया। इस निर्णय में नेहरू की कोई भूमिका नहीं थी। इसके फलस्वरूप कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच के विवाद ने अंततः हिंदूओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष का रूप ले लिया, जिसकी परिणति भारत के विभाजन और पाकिस्तान के गठन के रूप में हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कारावास==&lt;br /&gt;
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के बाद जब वाइसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने स्वायत्तशासी प्रांतीय मंत्रिमंडलों से परामर्श किए बिना भारत को युद्ध में झोंक दिया, तो इसके विरोध में कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने अपने प्रांतीय मंत्रिमंडल वापस ले लिए। कांग्रेस की इस कार्यवाही से राजनीति का अखाड़ा जिन्ना और मुस्लिम लीग के लिए साफ़ हो गया। &lt;br /&gt;
====विचारों में मतभेद====&lt;br /&gt;
युद्ध के बारे में नेहरू के विचार गांधी से भिन्न थे। &lt;br /&gt;
*आरंभ में महात्मा का विचार था कि अंग्रेज़ों को बिना शर्त समर्थन दिया जाए और यह समर्थन अहिंसक होना चाहिए। &lt;br /&gt;
*नेहरू का विचार था कि आक्रमण से प्रतिरक्षा में अहिंसा का कोई स्थान नहीं है और सिर्फ़ एक स्वतंत्र देश के रूप में ही भारत को नाज़ियों के ख़िलाफ़ युद्ध में ग्रेट ब्रिटेन का साथ देना चाहिए। अगर भारत मदद नहीं कर सकता, तो अड़चन भी न डाले।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;'हिन्दी' का मज़हब से कोई सम्बन्ध नहीं, और हिन्दूस्तानी मुसलमान और ईसाई उसी तरह से जिन्दा हैं-जिस तरह कि एक हिन्दू मत का मानने वाला। अमरीका के लोग, जो सभी हिन्दुस्तानियों को 'हिन्दू' कहते हैं, बहुत गलती नहीं करते अगर वे 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग करें, तो उनका प्रयोग बिल्कुल ठीक होगा। '''जवाहर लाल नेहरू'''&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अक्तूबर 1940 में महात्मा गाँधी ने अपने मूल विचार से हटकर एक सीमित नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का फ़ैसला किया, जिसमें भारत की आज़ादी के अग्रणी पक्षधरों को क्रमानुसार हिस्सा लेने के लिए चुना गया था। नेहरू को गिरफ़्तार करके चार वर्ष के कारावास की सज़ा दी गई। एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक ज़ेल में रहने के बाद उन्हें अन्य कांग्रेसी क़ैदियों के साथ रिहा कर दिया गया। इसके तीन दिन बाद हवाई में पर्ल हारबर पर बमबारी हुई। 1942 की बसंत ॠतु में, जब जापान ने बर्मा (वर्तमान म्यांमार) के रास्ते भारत की सीमाओं पर हमला किया, तो इस नए सैनिक ख़तरे के मद्देनज़र ब्रिटिश सरकार ने भारत की तरफ़ थोड़ा हाथ बढ़ाने का फ़ैसला किया। प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने सर स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स, जो युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य और राजनीतिक रूप से नेहरू के नज़दीकी तथा जिन्ना के परिचित थे, को संवैधानिक समस्याओं को सुलझाने के प्रस्तावों के साथ भेजा। क्रिप्स का यह अभिमान असफल रहा, क्योंकि गाँधी स्वतंत्रता से कम कुछ भी स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====भारत छोड़ो प्रस्ताव====&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी में अब नेतृव्य गाँधी के हाथों में था, जिन्होंने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ देने का आह्वान किया, नेहरू हालांकि युद्ध- प्रयत्नों पर प्रश्न उठाने में संकोच कर रहे थे, लेकिन गाँधी का साथ देने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। 8 अगस्त 1942 को [[मुंबई]] में कांग्रेस पार्टी द्वारा 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित करने के बाद गाँधी जी और नेहरू समेत समूची कांग्रेस कार्यकारिणी समिति को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया। अपने नौवें और अंतिम कारावास से नेहरू 15 जून 1945 को रिहा हुए।&lt;br /&gt;
====भारत और पाकिस्तान का विभाजन====&lt;br /&gt;
दो वर्ष के भीतर भारत को स्वतन्त्र और विभाजित होना था। वाइसरॉय लॉर्ड वेवेल द्वारा कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग को साथ लाने की अंतिम कोशिश भी नाक़ाम रही। इस बीच लंदन में युद्ध के दौरान सत्तारूढ़ चर्चिल प्रशासन का स्थान लेबर पार्टी की सरकार ने ले लिया था। उसने अपने पहले कार्य के रूप में भारत में एक कैबिनेट मिशन भेजा और बाद में लॉर्ड वेवेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को नियुक्त कर दिया। अब प्रश्न भारत की स्वतन्त्रता का नहीं, बल्कि यह था कि इसमें एक ही स्वतंत्र राज्य होगा या एक से अधिक होंगे। जहाँ गाँधी ने विभाजन को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। वहीं नेहरू ने अनिच्छा, लेकिन यथार्थवादिता से मौन सहमति दे दी। 15 अगस्त 1947 को भारत और [[पाकिस्तान]] दो अलग-अलग स्वतंत्र देश बने। नेहरू स्वाधीन भारत के पहले प्रधानमंत्री हो गए।&lt;br /&gt;
==आज़ाद भारत के मुख्य पड़ाव==&lt;br /&gt;
ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को आधार मान कर बनाए गए भारतीय संविधान के तहत हुआ यह पहला चुनाव था जिसमें जनता ने मतदान के अधिकार का प्रयोग किया। इस चुनाव के समय मतदाताओं की कुल संख्या 17 करोड़ 60 लाख थी जिनमें से 15 फ़ीसदी साक्षर थे। 1952 में पहले आमचुनाव हुए जिसमें कांग्रेस पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। इससे पहले वह 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से अंतरिम प्रधानमंत्री थे। संसद की 497 सीटों के साथ-साथ राज्यों कि विधानसभाओं के लिए भी चुनाव हुए। लेकिन जहाँ संसद में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ वहीं कुछ राज्यों में इसे दूसरे दलों से ज़बर्दस्त टक्कर मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी बहुमत हासिल करने में इस शहरों [[मद्रास]], [[हैदराबाद]] और त्रावणकोर में विफल रही जहाँ उसे कम्युनिस्ट पार्टी ने कड़ी टक्कर दी। हालाँकि इन चुनावों में हिंदू महासभा और अलगाववादी सिक्ख अकाली पार्टी को मुँह की खानी पड़ी। पहले चुनाव के बाद से ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) ने दक्षिणी राज्यों में जनसमर्थन बढ़ाना शुरू कर दिया जिसके नतीजे 1957 में हुए चुनाव में उसे मिले। त्रावणकोर-कोचिन और मालाबार को मिला कर बने [[केरल]] में कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई। &lt;br /&gt;
==राज्यों का पुनर्गठन==&lt;br /&gt;
नेहरू के समय में एक और अहम फ़ैसला भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का था। इसके लिए राज्य पुनर्गठन क़ानून (1956) पास किया गया। आज़ादी के बाद भारत में राज्यों की सीमाओं में हुआ यह सबसे बड़ा बदलाव था। इसके तहत 14 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना हुई। इसी क़ानून के तहत केरल और बॉम्बे को राज्य का दर्जा मिला। संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया जिसके तहत भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रधानमंत्री के रूप में उपलब्धियाँ== &lt;br /&gt;
1929 में जब लाहौर अधिवेशन में गांधी ने नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना था, तब से 35 वर्षों तक- 1964 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए मृत्यु तक, 1962 में चीन से हारने के बावजूद, नेहरू अपने देशवासियों के आदर्श बने रहे। राजनीति के प्रति उनका धर्मनिरपेक्ष रवैया गांधी के धार्मिक और पारंपरिक दृष्टिकोण से भिन्न था। गांधी के विचारों ने उनके जीवनकाल में भारतीय राजनीति को भ्रामक रूप से एक धार्मिक स्वरूप दे दिया था। गांधी धार्मिक रुढ़िवादी प्रतीत होते थे, किन्तु वस्तुतः वह सामाजिक उदारवादी थे, जो हिन्दू धर्म को धर्मनिरपेक्ष बनाने की चेष्ठा कर रहे थे। गांधी और नेहरू के बीच असली विरोध धर्म के प्रति उनके रवैये के कारण नहीं, बल्कि सभ्यता के प्रति रवैये के कारण था। जहाँ नेहरु लगातार आधुनिक संदर्भ में बात करते थे। वहीं गांधी प्राचीन भारत के गौरव पर बल देते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश के इतिहास में एक ऐसा मौका भी आया था, जब महात्मा गांधी को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त और बागी तेवर के सामने नेहरू का विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा और वह न सिर्फ इस पद पर चुने गए, बल्कि उन्हें सबसे लंबे समय तक विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र की बागडोर संभालने का गौरव हासिल भी हुआ।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;हिन्दुस्तान एक खूबसूरत औरत नहीं है। नंगे किसान हिन्दुस्तान हैं। वे न तो खूबसूरत हैं, न देखने में अच्छे हैं- क्योंकि गरीबी अच्छी चीज नहीं है, वह बुरी चीज है। इसलिए जब आप 'भारतमाता' की जय कहते हैं- तो याद रखिए कि भारत क्या है, और भारत के लोग निहायत बुरी हालत में हैं- चाहे वे किसान हों, मजदूर हों, खुदरा माल बेचने वाले दूकानदार हों, और चाहे हमारे कुछ नौजवान हों। '''जवाहर लाल नेहरू'''&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में नेहरु का महत्व उनके द्वारा आधुनिक जीवन मूल्यों और भारतीय परिस्थतियों के लिए अनुकूलित विचारधाराओं के आयात और प्रसार के कारण है। धर्मनिरपेक्षता और भारत की जातीय तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बावजूद देश की मौलिक एकता पर ज़ोर देने के अलावा नेहरु भारत को वैज्ञानिक खोजों और तकनीकी विकास के आधुनिक युग में ले जाने के प्रति भी सचेत थे। साथ ही उन्होंने अपने देशवासियों में निर्धनों तथा अछूतों के प्रति सामाजिक चेतना की ज़रूरत के प्रति जागरुकता पैदा करने और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान पैदा करने का भी कार्य किया। उन्हें अपनी एक उपलब्धि पर विशेष गर्व था कि उन्होंने प्राचीन हिन्दू सिविल कोड में सुधार करके अंततः उत्तराधिकार तथा संपत्ति के मामले में विधवाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार प्रदान करवाया।&lt;br /&gt;
====गुटनिरपेक्ष आंदोलन====&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेहरू का सितारा अक्टूबर 1956 तक बुलंदी पर था। 1956 में सोवियत संघ के खिलाफ़ हंगरी के विद्रोह के दौरान भारत के रवैये के कारण उनके गुटनिरपेक्ष नीति की जमकर आलोचना हुई। संयुक्त राष्ट्र में भारत अकेला ऐसा गुटनिरपेक्ष देश था, जिसने हंगरी पर आक्रमण के मामले में सोवियत संघ के पक्ष में मत दिया। इसके बाद नेहरू को गुटनिरपेक्ष आंदोलन के आह्वान की विश्वनियता साबित करने में काफ़ी मुश्किल हुई। स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में उपनिवेशवाद का विरोध उनकी विदेश- नीति का मूल आधार था, लेकिन 1961 के गुटनिरपेक्ष देशों के बेलग्रेड सम्मेलन तक नेहरू ने प्रतिउपनिवेशवाद की जगह गुटनिरपेक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था। 1962 में लंबे समय से चले आ रहे सीमा-विवाद के फलस्वरुप चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर हमले की चेतावनी दी। नेहरू ने अपनी गुटनिरपेक्ष नीति को ताक पर रखते हुए पश्चिमी देशों से सहायता की मांग की और चीन को पीछे हटाना पड़ा। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;संस्कृति का मतलब है- मन और आत्मा की विशालता और व्यापकता। इसका मतलब दिमाग को तंग रखना, या आदमी या मुल्क की भावना को सीमित करना कभी नहीं होता।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कश्मीर, जिस पर भारत और पाकिस्तान, दोनों दावा कर रहे थे, नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में लगातार एक समस्या बना रहा। संघर्ष विराम रेखा को समायोजित करके इस विवाद को निपटाने की उनकी प्रारंभिक कोशिशें नाकाम रहीं और 1948 में पाकिस्तान ने बलपूर्वक कश्मीर पर क़ब्ज़ा का असफल प्रयास किया। भारत में बचे अंतिम उपनिवेश, पुर्तग़ाली [[गोवा]] की समस्या को सुलझाने में नेहरू अधिक भाग्यशाली रहे। यद्यपि दिसंबर 1961 में भारतीय सेनाओं द्वारा इस पर क़ब्ज़ा किए जाने से कई पश्चिमी देशों में नराज़गी पैदा हुई। लेकिन नेहरू की कार्यवाही न्यायसंगत थी। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के मन को मुक्त करना है, न कि उसे बाँधे हुए चौखटों में बंद करना है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेज़ों और फ़्रांसीसियों के वापस चले जाने के बाद भारत में पुर्तग़ाली उपनिवेश की उपस्थिती एक कालदोष बनकर रह गई थी। अंग्रेज़ और फ़ांसीसी दोनों शांतिपूर्वक वापस चले गए थे। अगर पुर्तग़ाली जाने के लिए तैयार नहीं थे, तो नेहरू को उन्हें वहाँ से हटाने का तरीक़ा ढूंढ़ना ही था। पहले समझाने-बुझाने की कोशिशें की गईं, फिर अगस्त 1955 में उन्होंने निहत्थे भारतीयों के एक समूह को पुर्तग़ाली क्षेत्र में जाकर अहिंसक प्रदर्शन की अनुमति दी। पुर्तग़ालियों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाकर 30 लोगों को मार डाला, लेकिन नेहरू ने छह वर्षों तक कोई क़दम नहीं उठाया और इस बीच पुर्तग़ाल के पश्चिमी मित्रों से यह अपील करते रहे कि वे पुर्तग़ाली सरकार से यह उपनिवेश वापस दिला दें। अंतत: जब भारत ने हमला किया, तो नेहरू का दावा था कि उन्होंने और भारत सरकार ने कभी भी नीति के रूप में अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता नहीं जताई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मंत्रिमंडल का पुनर्गठन====&lt;br /&gt;
पंडित नेहरू पहले राष्ट्राध्यक्ष थे, जिन्होंने  1963 ई॰ में रूस, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका के बीच आंशिक परमाणविक परीक्षण-निषेध संधि पर हस्ताक्षर किये जाने का स्वागत किया। उपरान्त लोकसभा के कुछ उपचुनावों में कांग्रेसी उम्मीदवारों की विफलता के कारण कांग्रेस दल ने उन्हें सुझाव दिया कि वे अपने मंत्रिमंडल का पुनर्गठन करें, ताकि कांग्रेस के कुछ गण्यमान्य नेता दल को पुनर्गठित करने में अपना पूर्ण समय दे सकें। पंडित नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों की संख्या कम कर दी और श्री मोरार जी देसाई तथा श्री पाटिल सरीखे अपने पुराने सहयोगियों का त्यागपतत्र स्वीकार कर लिया। साथ ही उन्होंने एक छोटे तथा ठोस मंत्रीमंडल का गठन किया। जनवरी 1964 ई॰ में जब वे [[भुवनेश्वर]] कांग्रेस अधिवेशन में भाग ले रहे थे, तभी वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गये। यद्यपि कुछ दिनों के लिए उनके स्वास्थ्य में थोड़ा सुधार अवश्य हुआ।&lt;br /&gt;
====भारत-चीन युद्ध====&lt;br /&gt;
हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा उस समय बेमानी साबित हो गया जब सीमा विवाद को लेकर 10 अक्तूबर 1962 को चीनी सेना ने लद्दाख़ और नेफ़ा में भारतीय चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया। नेहरू ने इसे जानबूझ कर की गई कारवाई बताया। नवंबर में एक बार फिर चीन की ओर से हमले शुरू हुए। हालाँकि चीन ने एकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा कर दी। तब तक 1300 से ज़्यादा भारतीय सैनिक मारे जा चुके थे। पंडित नेहरू के करियर का यह सबसे बुरा दौर साबित हुआ। उनकी सरकार के ख़िलाफ़ संसद में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मृत्यु====&lt;br /&gt;
चीन के साथ संघर्ष के कुछ ही समय बाद नेहरू के स्वास्थ्य में गिरावट के लक्षण दिखाई देने लगे। उन्हें 1963 में दिल का हल्का दौरा पड़ा, जनवरी 1964 में उन्हें और दुर्बल बना देने वाला दौरा पड़ा। कुछ ही महीनों के बाद तीसरे दौरे में 27 मई 1964 में उनकी मृत्यु हो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ख्यातिलब्ध लेखक==&lt;br /&gt;
पंडित नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली वक्ता ही नहीं, ख्यातिलब्ध लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा 1936 ई॰ में प्रकाशित हुई और संसार के सभी देशों में उसका आदर हुआ। उनकी अन्य रचनाओं में भारत और विश्व, सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता और उसके बाद विशेष उल्लेखनीय हैं।  इनमें से अन्तिम दो पुस्तकें उनके फुटकर लेखों और भाषणों के संग्रह हैं।&lt;br /&gt;
==मूल्यांकन==&lt;br /&gt;
अपनी भारतीयता पर ज़ोर देने वाले नेहरू में वह हिन्दू प्रभामंडल और छवि कभी नहीं उभरी, जो गाँधी के व्यक्तितत्व का अंग थी। अपने आधुनिक राजनीतिक और आर्थिक विचारों के कारण वह भारत के युवा बुद्धिजीवियों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ गाँधी के अहिंसक आन्दोलन कि ओर आकर्षित करने में और स्वतन्त्रता के बाद उन्हें अपने आसपास बनाए रखने में सफल रहे। पश्चिम में पले-बढ़े होने और स्वतन्त्रता के पहले यूरोपीय यात्राओं के कारण उनके सोचने का ढंग पश्चिमी साँचे में ढल चुका था। 17 वर्षों तक सत्ता में रहने के दौरान उन्होंने लोकतांत्रिक समाजवाद को दिशा-निर्देशक माना। उनके कार्यकाल में संसद में कांग्रेस पार्टी के ज़बरदस्त बहुमत के कारण वह अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर होते रहे। लोकतन्त्र, समाजवाद, एकता और धर्मनिरपेक्षता उनकी घरेलू नीति के चार स्तंभ थे। वह जीवन भर इन चार स्तंभों से सुदृढ़ अपनी इमारत को काफ़ी हद तक बचाए रखने में कामयाब रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेहरू की इकलौती संतान [[इंदिरा गाँधी]] 1966 से 1977 तक और फिर 1980 से 1984 तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। इंदिरा गाँधी के बेटे [[राजीव गाँधी]] 1984 से 1989 तक प्रधानमंत्री रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://ritbansal.blogspot.com/2008/11/blog-post.html ritbansal.blogspot]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[http://www.culturalindia.net/leaders/jawaharlal-nehru.html  culturalindia.net]&lt;br /&gt;
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[http://www.indianchild.com/jawaharlal_nehru.htm indianchild.com]&lt;br /&gt;
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[http://www.biographyonline.net/politicians/indian/nehru.html biographyonline.net]&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
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{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
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{{भारत के प्रधानमंत्री}}&lt;br /&gt;
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[[Category:भारत के प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत रत्न सम्मान]]&lt;br /&gt;
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[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>जवाहरलाल नेहरू</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;div style=text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;gt;&amp;lt;font color=#999900 size=5&amp;gt;पंडित जवाहरलाल नेहरू&amp;lt;/font&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Jawahar-Lal-Nehru.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=चाचा नेहरू, पंडित जी&lt;br /&gt;
|जन्म=14 नवम्बर 1889&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=[[पं॰ मोतीलाल नेहरू]], श्रीमती [[स्वरूप रानी]]&lt;br /&gt;
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|मृत्यु=27 मई 1964&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=दिल का दौरा&lt;br /&gt;
|स्मारक=शांतिवन, दिल्ली &lt;br /&gt;
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|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[काँग्रेस]]&lt;br /&gt;
|पद=[[:श्रेणी:भारत के प्रधानमंत्री|भारत के प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
|भाषा=हिन्दी, अंग्रेज़ी&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=नौ बार जेल यात्रा की&lt;br /&gt;
|कार्य काल=15 अगस्त 1947-27 मई 1964&lt;br /&gt;
|विद्यालय=इंग्लैण्ड के हैरो स्कूल, केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज&lt;br /&gt;
|शिक्षा=बैरिस्टर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[भारत रत्न]] सम्मान&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=लेखन, स्वाधीनता सग्राम, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[जलियाँवाला बाग़]], [[इंदिरा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
जवाहरलाल नेहरू भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं स्वतन्त्र [[भारत]] के प्रथम प्रधान मंत्री (1947-640) थे। जवाहर लाल नेहरू, संसदीय सरकार की स्थापना और विदेशी मामलों में 'गुटनिरपेक्ष' नीतियों के लिए विख्यात हुए। 1930 और 1940 के दशक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से वह एक थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
नेहरू कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के थे, जो अपनी प्रशासनिक क्षमताओं तथा विद्वत्ता के लिए विख्यात थे और जो 18वीं शताब्दी के आरंभ में इलाहाबाद आ गये थे। इनका जन्म [[इलाहाबाद]] में 14 नवम्बर 1889 ई॰ को हुआ। वे [[पं॰ मोतीलाल नेहरू]] और श्रीमती स्वरूप रानी के एकमात्र पुत्र थे। अपने सभी भाई-बहनों में, जिनमें दो बहनें थीं, जवाहरलाल सबसे बड़े थे। उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई 14 वर्ष की आयु में नेहरू ने घर पर ही कई अंग्रेज़ अध्यापिकाओं और शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त कि। इनमें से सिर्फ़ एक, फ़र्डिनैंड ब्रुक्स का, जो आधे आयरिश और आधे बेल्जियन अध्यात्मज्ञानी थे, उन पर कुछ प्रभाव पड़ा। जवाहरलाल के एक समादृत भारतीय शिक्षक भी थे, जो उन्हें हिंदी और संस्कृत पढ़ाते थे। 15 वर्ष की उम्र में 1905 में नेहरू एक अग्रणी इंग्लिश विद्यालय [[इंग्लैण्ड]] के हैरो स्कूल में भेजे गये। हैरो में दाख़िल हुए, जहाँ वह दो वर्ष तक रहे। नेहरू का शिक्षा काल किसी तरह से असाधारण नहीं था। और हैरो से वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, जहाँ उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और उनके अपने ही शब्दों में परीक्षा उत्तीर्ण करने में उन्हें 'न कीर्ति, न अपकीर्ति' मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Teen Murti Bhavan.jpg|तीन मूर्ति भवन, जवाहरलाल नेहरू का निवास, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Teen Murti Bhavan, Nehru's Residence |thumb|left]]&lt;br /&gt;
भारत लौटने के चार वर्ष बाद मार्च 1916 में नेहरू का विवाह [[कमला नेहरू|कमला कौल]] के साथ हुआ, जो [[दिल्ली]] में बसे कश्मीरी परिवार की थीं। उनकी अकेली संतान [[इंदिरा गाँधी|इंदिरा प्रियदर्शिनी]] का जन्म 1917 में हुआ; बाद में वह, विवाहोपरांत नाम 'इंदिरा गांधी', भारत की प्रधानमंत्री बनीं। तथा एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बैरिस्टर के रूप में==&lt;br /&gt;
1912 ई॰ में वे बैरिस्टर बने और उसी वर्ष [[भारत]] लौटकर उन्होंने इलाहाबाद में वकालत प्रारम्भ की। वकालत में उनकी विशेष रूचि न थी और शीघ्र ही वे भारतीय राजनीति में भाग लेने लगे। 1912 ई॰ में उन्होंने बाँकीपुर ([[बिहार]]) में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।&lt;br /&gt;
{{tocleft}}&lt;br /&gt;
==राजनीतिक प्रशिक्षण==&lt;br /&gt;
भारत लौटने के बाद नेहरू ने पहले वकील के रूप में स्थापित होने का प्रयास किया लेकिन अपने पिता के विपरीत उनकी इस पेशे में कोई ख़ास रुची नहीं थी और उन्हें वकालत और वकीलों का साथ, दोनों ही नापसंद थे। उस समय वह अपनी पीढ़ी के कई अन्य लोगों की भांति भीतर से एक ऐसे राष्ट्रवादी थे, जो अपने देश की आज़ादी के लिए बेताब हो, लेकिन अपने अधिकांश समकालीनों की तरह उसे हासिल करने की ठोस योजनाएं न बना पाया हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गाँधी जी से मुलाकात====&lt;br /&gt;
1916 ई॰ के [[लखनऊ]] अधिवेशन में वे सर्वप्रथम [[महात्मा गाँधी]] के सम्पर्क में आये। गांधी उनसे 20 साल बड़े थे। दोनों में से किसी ने भी आरंभ में एक-दूसरे को बहुत प्रभावित नहीं किया। बहरहाल, 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे। इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई। उससे पहले मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक स्थिति की माँग था। नेहरू जी के शब्दों में:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;कुटिलता की नीति अन्त में चलकर फायदेमन्द नहीं होती। हो सकता है कि अस्थायी तौर पर इससे कुछ फायदा हो जाए।&lt;br /&gt;
अगर हम इस देश की गरीबी को दूर करेंगे, तो कानूनों से नहीं, शोरगुल मचाके नहीं, शिकायत करके नहीं, बल्कि मेहनत करके। एक-एक आदमी बूढ़ा और छोटा, मर्द , औरत और बच्चा मेहनत करेगा। हमारे सामने आराम नहीं है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समय के साथ-साथ पं॰ नेहरू की रुचि भारतीय राजनीति में बढ़ती गयी। [[जलियाँवाला बाग़]] हत्याकाण्ड की जाँच में देशबन्धु चितरंजनदास एवं महात्मा गाँधी के सहयोगी रहे और 1921 के असहयोग आन्दोलन में तो महात्मा गाँधी के अत्यधिक निकट सम्पर्क में आ गये। यह सम्बन्ध समय की गति के साथ-साथ दृढ़तर होता गया और उसकी समाप्ति केवल महात्मा गाँधी जी की मृत्यु से ही हुई।&lt;br /&gt;
====गाँधी जी के अनुयायी के रूप में====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawaharlal-Nehru-And-Mahatma-Gandhi.jpg|thumb|जवाहरलाल नेहरू और [[महात्मा गाँधी]] &amp;lt;br /&amp;gt; Jawaharlal Nehru and Mahatma Gandhi|left]]&lt;br /&gt;
नेहरू की आत्मकथा से भारतीय राजनीति में उनकी गहरी रुचि का पता चलता है। उन्हीं दिनों अपने पिता को लिखे गए पत्रों से भारत की स्वतंत्रता में उन दोनों की समान रुचि दिखाई देती है। लेकिन गांधी से मुलाक़ात होने तक पिता और पुत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए निश्चित योजनाओं का विकास नहीं हुआ था। गांधी ने उन्हें राजनीति में अपना अनुयायी बना लिया। गांधी द्वारा कर्म पर बल दिए जाने के गुण से वह दोनों प्रभावित हुए। महात्मा गांधी का तर्क था कि ग़लती की सिर्फ़ निंदा ही नहीं, बल्कि प्रतिरोध भी किया जाना चाहिए। इससे पहले नेहरू और उनके पिता समकालीन भारतीय राजनीतिज्ञों का तिरस्कार करते थे, जिनका राष्ट्रवाद, कुछ अपवादों को छोड़कर लंबे भाषणों और प्रस्तावों तक सीमित था। गांधी द्वारा ग्रेट ब्रिटेन के ख़िलाफ़ बिना भय या घृणा के लड़ने पर ज़ोर देने से भी जवाहरलाल बहुत प्रभावित हुए।&lt;br /&gt;
====जेल यात्रा====&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी के साथ नेहरू का जुड़ाव 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद आरंभ हुआ। इस काल में राष्ट्रवादी गतिविधियों की लहर ज़ोरों पर थी और अप्रैल 1919 को अमृतसर के नरसंहार के रूप में सरकारी दमन खुलकर सामने आया; स्थानीय ब्रिटिश सेना कमांडर ने अपनी टुकड़ियों को निहत्थे भारतीयों की एक सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया, जिसमें 379 लोग मारे गये और कम से कम 1,200 घायल हुए। नेहरू जी के शब्दों में:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;भारत की सेवा का अर्थ, करोड़ों पीड़ितों की सेवा है। इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान, और अवसर की विषमता का अन्त करना है। हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े आदमी की यह आकांक्षा रही है-कि प्रत्येक आँख के प्रत्येक आँसू को पोंछ दिया जाए। ऐसा करना हमारी शक्ति से बाहर हो सकता है, लेकिन जब तक आँसू हैं और पीड़ा है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1921 के आख़िर में जब कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को कुछ प्रांतों में ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया, तब पहली बार नेहरू जेल गये। अगले 24 वर्ष में उन्हें आठ बार बंदी बनाया गया, जिनमें से अंतिम और सबसे लंबा बंदीकाल, लगभग तीन वर्ष का कारावास जून 1945 में समाप्त हुआ। नेहरू ने कुल मिलाकर नौ वर्ष से ज़्यादा समय जेलों में बिताया। अपने स्वभाव के अनुरूप ही उन्होंने अपनी जेल-यात्राओं को असामान्य राजनीतिक गतिविधि वाले जीवन के अंतरालों के रूप में वर्णित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====व्यापक क्षेत्रों की यात्रा====&lt;br /&gt;
कांग्रेस के साथ उनका राजनीतिक प्रशिक्षण 1919 से 1929 तक चला। 1923 में और फ़िर 1927 में वह दो-दो वर्ष के लिए पार्टी के महासचिव बने। उनकी रुचियों और ज़िम्मेदारियों ने उन्हें भारत के व्यापक क्षेत्रों की यात्रा का अवसर प्रदान किया, विशेषकर उनके गृह प्रदेश संयुक्त प्रांत का, जहाँ उन्हें घोर ग़रीबी और किसानों की बदहाली की पहली झलक मिली और जिसने इन महत्त्वपूर्ण समस्याओं को दूर करने की उनकी मूल योजनाओं को प्रभावित किया। यद्यपि उनका कुछ-कुछ झुकाव समाजवाद की ओर था, लेकिन उनका सुधारवाद किसी निश्चित ढांचे में ढला हुआ नहीं था। 1926-27 में उनकी यूरोप तथा सोवियत संघ की यात्रा ने उनके आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि से, आज का बड़ा सवाल विश्वशान्ति का है। आज हमारे लिए यही विकल्प है कि हम दुनिया को उसके अपने रूप में ही स्वीकार करें। हम देश को इस बात की स्वतन्त्रता देते रहे कि वह अपने ढंग से अपना विकास करे और दूसरों से सीखे, लेकिन दूसरे उस पर अपनी कोई चीज नहीं थोपें। निश्चय ही इसके लिए एक नई मानसिक विधा चाहिए। पंचशील या पाँच सिद्धान्त यही विधा बताते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्क्सवाद और समाजवादी विचारधारा में नेहरू की वास्तविक रुचि इसी यात्रा से पैदा हुई, यद्यपि इससे उनके साम्यवादी सिद्धांतों और व्यवहार के ज्ञान में कोई ख़ास वृद्धि नहीं हुई। बाद में जेल यात्राओं के दौरान उन्हें अधिक गहराई से मार्क्सवाद के अध्ययन का मौक़ा मिला। इसके सिद्धांतों में उनकी रुचि थी, लेकिन इसके कुछ तरीक़ों से विकर्षित होने के कारण वह कार्ल मार्क्स की कृतियों को सारे प्रश्नों का उत्तर देने वाले शास्त्रों के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए। फ़िर भी मार्क्सवाद ही उनकी आर्थिक विचारधारा का मानदंड रहा, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर भारतीय परिस्थितियों के अनुसार फेरबदल किया गया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawaharlal-Nehru-1.jpg|thumb|चाचा नेहरू बच्चों के साथ &amp;lt;br /&amp;gt; Jawaharlal Nehru with Childrens]]&lt;br /&gt;
====चाचा नेहरू====&lt;br /&gt;
देशभर में जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन 14 नवंबर बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे और यही कारण था कि उन्हें प्यार से चाचा नेहरू बुलाया जाता था।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''राधाकृष्णन के शब्दों में'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'जवाहर लाल नेहरू हमारी पीढ़ी के एक महानतम व्यक्ति थे। वह एक ऐसे अद्वितीय राजनीतिज्ञ थे, जिनकी मानव-मुक्ति के प्रति सेवाएं चिरस्मरणीय रहेंगी। स्वाधीनता-संग्राम के योद्धा के रूप में वह यशस्वी थे और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका अंशदान अभूतपूर्व था।'&lt;br /&gt;
==अखिल भारतीय कांग्रेस समिति==&lt;br /&gt;
वह महात्मा गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़े। चाहे असहयोग आंदोलन की बात हो या फिर नमक सत्याग्रह या फिर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की बात हो उन्होंने गांधी जी के हर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। मलिक ने बताया कि नेहरू की विश्व के बारे में जानकारी से गांधी जी काफी प्रभावित थे और इसीलिए आजादी के बाद वह उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते थे। सन् 1920 में उन्होंने [[उत्तर प्रदेश]] के [[प्रतापगढ़ जिला|प्रतापगढ़ जिले]] में पहले किसान मार्च का आयोजन किया। 1923 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव चुने गए।&lt;br /&gt;
==पहला चुनाव प्रचार==&lt;br /&gt;
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पहला चुनाव प्रचार भी यादगार है। एक कमेंटेटर के मुताबिक कांग्रेस का चुनाव प्रचार केवल नेहरू पर केन्द्रित था। चुनाव में नेहरू ने सड़क, रेल, पानी और हवाई जहाज सभी का सहारा लिया। उन्होंने 25,000 मील की दूरी तय की। 18,000 मील हवाई जहाज से, 5200 मील कार से, 1600 मील ट्रेन से और 90 मील नाव से। चुनाव आयोग के लिए राहत की बात ये थी कि निरक्षरता के बावजूद पूरे देश में 60 प्रतिशत वोटिंग हुई। जबकि पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सबसे ज्यादा 364 सीटें मिली थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; align=&amp;quot;right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! वर्ष &lt;br /&gt;
! घटना क्रम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1889 &lt;br /&gt;
|14 नवंबर जन्म इलाहाबाद उत्तर प्रदेश&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1912&lt;br /&gt;
|इलाहाबाद उच्च न्यायालय की बार की सदस्यता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1916&lt;br /&gt;
|8 फ़रवरी  श्रीमती कमला नेहरू से विवाह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1917&lt;br /&gt;
|19 नवंबर इंदिरा गांधी का जन्म&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1921&lt;br /&gt;
|पहली बार जेल गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1923&lt;br /&gt;
|पिता मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस छोड़ दी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1924&lt;br /&gt;
|इलाहाबाद महानगर पालिका के अध्यक्ष बने&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1926&lt;br /&gt;
|यूरोप की यात्रा की&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1929&lt;br /&gt;
|कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1929&lt;br /&gt;
|कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1931&lt;br /&gt;
|मोतीलाल नेहरू की मृत्यु&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1944&lt;br /&gt;
|भारत एक खोज पुस्तक लिखी।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1947&lt;br /&gt;
|भारत के प्रथम प्रधान मंत्री बन।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1948&lt;br /&gt;
|गांधी जी की हत्या।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1951&lt;br /&gt;
|पहली पंचवर्षीय योजना लागू की।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1964&lt;br /&gt;
|27 मई निधन&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
साइमन कमीशन के विरुद्ध लखनऊ के प्रदर्शन में उन्होंने भाग लिया। एक अहिंसात्मक सत्याग्रही होने पर भी उन्हें पुलिस की लाठियों की गहरी मार सहनी पड़ी। 1928 ई॰ में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महामंत्री बने 1929 के लाहौर अधिवेशन के बाद नेहरू देश के बुद्धिजीवियों और युवाओं के नेता के रूप में उभरे। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;मेरे विचार में, हम भारतवासियों के लिए- एक विदेशी भाषा को अपनी सरकारी भाषा के रूप में स्वीकारना सरासर अशोभनीय होगा। मैं आपको कह सकता हूँ कि बहुत बार जब हम लोग विदेशों में जाते हैं, और हमें अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बातचीत करनी पड़ती है, तो मुझे कितना बुरा लगता है। लोगों को बहुत ताज्जुब होता है, और वे हमसे पूछते हैं कि हमारी कोई भाषा नहीं है? हमें विदेशी भाषा में क्यों बोलना पड़ता हैं?&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सोचकर कि उस समय अतिवादी वामपंथी धारा की ओर आकर्षित हो रहे युवाओं को नेहरू कांग्रेस आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल कर सकेंगे, गांधी ने बुद्धिमानीपूर्वक कुछ वरिष्ठ नेताओं को अनदेखा करते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। महात्मा का यह आकलन भी सही था कि इस अतिरिक्त ज़िम्मेदारी के साथ नेहरू भी मध्यम मार्ग पर क़ायम रहेंगे।&lt;br /&gt;
====राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में====&lt;br /&gt;
1931 में पिता की मृत्यु के बाद जवाहरलाल कांग्रेस की केंद्रीय परिषद में शामिल हो गए और महात्मा के अंतरंग बन गए। यद्यपि 1942 तक गांधी ने आधिकारिक रूप से उन्हें अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था, पर 1930 के दशक के मध्य में ही देश को गांधी जी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में नेहरू दिखाई देने लगे थे। मार्च 1931 में महात्मा और ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड इरविन (बाद में लॉर्ड हैलिफ़ैक्स) के बीच हुए गांधी-इरविन समझौते से भारत के दो प्रमुख नेताओं के बीच समझौते का आभास मिलने लगा। इसने एक साल पहले शुरू किए गए गांधी के प्रभावशाली सविनय अवज्ञा आंदोलन को तेज़ी प्रदान की, जिसके दौरान नेहरू को गिरफ़्तार किया गया।&lt;br /&gt;
====गोलमेज़ सम्मेलन====&lt;br /&gt;
यह आशा कि गांधी-इरविन समझौता भारत और ब्रिटेन के संबंधों में शांति का पूर्वाभास साबित होगा, साकार नहीं हुई; लॉर्ड वैलिंगडन (जिन्होंने वाइसरॉय के रूप में 1931 में लॉर्ड इरविन का स्थान लिया) ने दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन के बाद लंदन से स्वदेश लौटने के कुछ ही समय बाद जनवरी 1932 में गांधी को जेल भेज दिया। उन पर फिर से [[सविनय अवज्ञा आंदोलन]] शुरू करने के प्रयास का आरोप लगाया गया। नेहरू को भी गितफ़्तार करके दो साल के कारावास की सज़ा दी गई।&lt;br /&gt;
====प्रांतीय स्वशासन====&lt;br /&gt;
भारत में स्वशासन की स्थापना की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए लंदन में हुए गोलमेज़ सम्मेलनों की परिणति अंततः 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट के रूप में हुई, जिसके तहत भारतीय प्रांतों के लोकप्रिय स्वशासी सरकार की प्रणाली प्रदान की गई। आख़िरकार इससे एक संघीय प्रणाली का जन्म हुआ, जिसमें स्वायत्तशासी प्रांत और रजवाड़े शामिल थे। संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया, लेकिन प्रांतीय स्वशासन लागू हो गया। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;आप में जितना अधिक अनुशासन होगा, आप में उतनी ही आगे बढ़ने की शक्ति होगी। कोई भी देश-जिसमें न तो थोपा गया अनुशासन है, और न आत्मा-अनुशासन-बहुत समय तक नहीं टिक सकता।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{highright}}&lt;br /&gt;
जवाहर लाल नेहरू हमारी पीढ़ी के एक महानतम व्यक्ति थे। वह एक ऐसे अद्वितीय राजनीतिज्ञ थे, जिनकी मानव-मुक्ति के प्रति सेवाएं चिरस्मरणीय रहेंगी। स्वाधीनता-संग्राम के योद्धा के रूप में वह यशस्वी थे और आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका अंशदान अभूतपूर्व था। &lt;br /&gt;
{{highclose}}&lt;br /&gt;
1930 के दशक के मध्य में नेहरू यूरोप के घटनाक्रम के प्रति ज़्यादा चिंतित थे, जो एक अन्य विश्व युद्ध की ओर बढ़ता प्रतीत हो रहा था। 1936 के आरंभ में वह अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए यूरोप में थे। इसके कुछ ही समय बाद स्विट्ज़रलैंड के एक सेनीटोरियम में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। उस समय भी उन्होंने इस बात पर बल दिया कि युद्ध की स्थिति में भारत का स्थान लोकतांत्रिक देशों के साथ होगा, हालांकि वह इस बात पर भी ज़ोर देते थे कि भारत एक स्वतंत्र देशों के रूप में ही ग्रेट ब्रिटेन और फ़्रांस के समर्थन में युद्ध कर सकता है।&lt;br /&gt;
====कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विवाद====&lt;br /&gt;
प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद हुए चुनाव में अधिकांश प्रांतों में कांग्रेस पार्टी सत्तारूढ़ हुई, तो नेहरू दुविधा में पड़ गए। चुनावों में मुहम्मद अली जिन्ना (जो पाकिस्तान के जनक बने) के नेतृत्व में मुस्लिम लीग का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। इसलिए कांग्रेस ने अदूरदर्शिता दिखाते हुए कुछ प्रांतों में मुस्लिम लीग और कांग्रेस की गठबंधन सरकार बनाने के जिन्ना के अनुरोध को ठुकरा दिया। इस निर्णय में नेहरू की कोई भूमिका नहीं थी। इसके फलस्वरूप कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच के विवाद ने अंततः हिंदूओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष का रूप ले लिया, जिसकी परिणति भारत के विभाजन और पाकिस्तान के गठन के रूप में हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कारावास==&lt;br /&gt;
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के बाद जब वाइसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने स्वायत्तशासी प्रांतीय मंत्रिमंडलों से परामर्श किए बिना भारत को युद्ध में झोंक दिया, तो इसके विरोध में कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने अपने प्रांतीय मंत्रिमंडल वापस ले लिए। कांग्रेस की इस कार्यवाही से राजनीति का अखाड़ा जिन्ना और मुस्लिम लीग के लिए साफ़ हो गया। &lt;br /&gt;
====विचारों में मतभेद====&lt;br /&gt;
युद्ध के बारे में नेहरू के विचार गांधी से भिन्न थे। &lt;br /&gt;
*आरंभ में महात्मा का विचार था कि अंग्रेज़ों को बिना शर्त समर्थन दिया जाए और यह समर्थन अहिंसक होना चाहिए। &lt;br /&gt;
*नेहरू का विचार था कि आक्रमण से प्रतिरक्षा में अहिंसा का कोई स्थान नहीं है और सिर्फ़ एक स्वतंत्र देश के रूप में ही भारत को नाज़ियों के ख़िलाफ़ युद्ध में ग्रेट ब्रिटेन का साथ देना चाहिए। अगर भारत मदद नहीं कर सकता, तो अड़चन भी न डाले।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;'हिन्दी' का मज़हब से कोई सम्बन्ध नहीं, और हिन्दूस्तानी मुसलमान और ईसाई उसी तरह से जिन्दा हैं-जिस तरह कि एक हिन्दू मत का मानने वाला। अमरीका के लोग, जो सभी हिन्दुस्तानियों को 'हिन्दू' कहते हैं, बहुत गलती नहीं करते अगर वे 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग करें, तो उनका प्रयोग बिल्कुल ठीक होगा। '''जवाहर लाल नेहरू'''&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अक्तूबर 1940 में महात्मा गाँधी ने अपने मूल विचार से हटकर एक सीमित नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का फ़ैसला किया, जिसमें भारत की आज़ादी के अग्रणी पक्षधरों को क्रमानुसार हिस्सा लेने के लिए चुना गया था। नेहरू को गिरफ़्तार करके चार वर्ष के कारावास की सज़ा दी गई। एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक ज़ेल में रहने के बाद उन्हें अन्य कांग्रेसी क़ैदियों के साथ रिहा कर दिया गया। इसके तीन दिन बाद हवाई में पर्ल हारबर पर बमबारी हुई। 1942 की बसंत ॠतु में, जब जापान ने बर्मा (वर्तमान म्यांमार) के रास्ते भारत की सीमाओं पर हमला किया, तो इस नए सैनिक ख़तरे के मद्देनज़र ब्रिटिश सरकार ने भारत की तरफ़ थोड़ा हाथ बढ़ाने का फ़ैसला किया। प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने सर स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स, जो युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य और राजनीतिक रूप से नेहरू के नज़दीकी तथा जिन्ना के परिचित थे, को संवैधानिक समस्याओं को सुलझाने के प्रस्तावों के साथ भेजा। क्रिप्स का यह अभिमान असफल रहा, क्योंकि गाँधी स्वतंत्रता से कम कुछ भी स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====भारत छोड़ो प्रस्ताव====&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी में अब नेतृव्य गाँधी के हाथों में था, जिन्होंने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ देने का आह्वान किया, नेहरू हालांकि युद्ध- प्रयत्नों पर प्रश्न उठाने में संकोच कर रहे थे, लेकिन गाँधी का साथ देने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। 8 अगस्त 1942 को [[मुंबई]] में कांग्रेस पार्टी द्वारा 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित करने के बाद गाँधी जी और नेहरू समेत समूची कांग्रेस कार्यकारिणी समिति को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया। अपने नौवें और अंतिम कारावास से नेहरू 15 जून 1945 को रिहा हुए।&lt;br /&gt;
====भारत और पाकिस्तान का विभाजन====&lt;br /&gt;
दो वर्ष के भीतर भारत को स्वतन्त्र और विभाजित होना था। वाइसरॉय लॉर्ड वेवेल द्वारा कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग को साथ लाने की अंतिम कोशिश भी नाक़ाम रही। इस बीच लंदन में युद्ध के दौरान सत्तारूढ़ चर्चिल प्रशासन का स्थान लेबर पार्टी की सरकार ने ले लिया था। उसने अपने पहले कार्य के रूप में भारत में एक कैबिनेट मिशन भेजा और बाद में लॉर्ड वेवेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को नियुक्त कर दिया। अब प्रश्न भारत की स्वतन्त्रता का नहीं, बल्कि यह था कि इसमें एक ही स्वतंत्र राज्य होगा या एक से अधिक होंगे। जहाँ गाँधी ने विभाजन को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। वहीं नेहरू ने अनिच्छा, लेकिन यथार्थवादिता से मौन सहमति दे दी। 15 अगस्त 1947 को भारत और [[पाकिस्तान]] दो अलग-अलग स्वतंत्र देश बने। नेहरू स्वाधीन भारत के पहले प्रधानमंत्री हो गए।&lt;br /&gt;
==आज़ाद भारत के मुख्य पड़ाव==&lt;br /&gt;
ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को आधार मान कर बनाए गए भारतीय संविधान के तहत हुआ यह पहला चुनाव था जिसमें जनता ने मतदान के अधिकार का प्रयोग किया। इस चुनाव के समय मतदाताओं की कुल संख्या 17 करोड़ 60 लाख थी जिनमें से 15 फ़ीसदी साक्षर थे। 1952 में पहले आमचुनाव हुए जिसमें कांग्रेस पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। इससे पहले वह 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से अंतरिम प्रधानमंत्री थे। संसद की 497 सीटों के साथ-साथ राज्यों कि विधानसभाओं के लिए भी चुनाव हुए। लेकिन जहाँ संसद में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ वहीं कुछ राज्यों में इसे दूसरे दलों से ज़बर्दस्त टक्कर मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कांग्रेस पार्टी बहुमत हासिल करने में इस शहरों [[मद्रास]], [[हैदराबाद]] और त्रावणकोर में विफल रही जहाँ उसे कम्युनिस्ट पार्टी ने कड़ी टक्कर दी। हालाँकि इन चुनावों में हिंदू महासभा और अलगाववादी सिक्ख अकाली पार्टी को मुँह की खानी पड़ी। पहले चुनाव के बाद से ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) ने दक्षिणी राज्यों में जनसमर्थन बढ़ाना शुरू कर दिया जिसके नतीजे 1957 में हुए चुनाव में उसे मिले। त्रावणकोर-कोचिन और मालाबार को मिला कर बने [[केरल]] में कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई। &lt;br /&gt;
==राज्यों का पुनर्गठन==&lt;br /&gt;
नेहरू के समय में एक और अहम फ़ैसला भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का था। इसके लिए राज्य पुनर्गठन क़ानून (1956) पास किया गया। आज़ादी के बाद भारत में राज्यों की सीमाओं में हुआ यह सबसे बड़ा बदलाव था। इसके तहत 14 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना हुई। इसी क़ानून के तहत केरल और बॉम्बे को राज्य का दर्जा मिला। संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया जिसके तहत भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रधानमंत्री के रूप में उपलब्धियाँ== &lt;br /&gt;
1929 में जब लाहौर अधिवेशन में गांधी ने नेहरू को अध्यक्ष पद के लिए चुना था, तब से 35 वर्षों तक- 1964 में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए मृत्यु तक, 1962 में चीन से हारने के बावजूद, नेहरू अपने देशवासियों के आदर्श बने रहे। राजनीति के प्रति उनका धर्मनिरपेक्ष रवैया गांधी के धार्मिक और पारंपरिक दृष्टिकोण से भिन्न था। गांधी के विचारों ने उनके जीवनकाल में भारतीय राजनीति को भ्रामक रूप से एक धार्मिक स्वरूप दे दिया था। गांधी धार्मिक रुढ़िवादी प्रतीत होते थे, किन्तु वस्तुतः वह सामाजिक उदारवादी थे, जो हिन्दू धर्म को धर्मनिरपेक्ष बनाने की चेष्ठा कर रहे थे। गांधी और नेहरू के बीच असली विरोध धर्म के प्रति उनके रवैये के कारण नहीं, बल्कि सभ्यता के प्रति रवैये के कारण था। जहाँ नेहरु लगातार आधुनिक संदर्भ में बात करते थे। वहीं गांधी प्राचीन भारत के गौरव पर बल देते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश के इतिहास में एक ऐसा मौका भी आया था, जब महात्मा गांधी को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त और बागी तेवर के सामने नेहरू का विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा और वह न सिर्फ इस पद पर चुने गए, बल्कि उन्हें सबसे लंबे समय तक विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र की बागडोर संभालने का गौरव हासिल भी हुआ।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;हिन्दुस्तान एक खूबसूरत औरत नहीं है। नंगे किसान हिन्दुस्तान हैं। वे न तो खूबसूरत हैं, न देखने में अच्छे हैं- क्योंकि गरीबी अच्छी चीज नहीं है, वह बुरी चीज है। इसलिए जब आप 'भारतमाता' की जय कहते हैं- तो याद रखिए कि भारत क्या है, और भारत के लोग निहायत बुरी हालत में हैं- चाहे वे किसान हों, मजदूर हों, खुदरा माल बेचने वाले दूकानदार हों, और चाहे हमारे कुछ नौजवान हों। '''जवाहर लाल नेहरू'''&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में नेहरु का महत्व उनके द्वारा आधुनिक जीवन मूल्यों और भारतीय परिस्थतियों के लिए अनुकूलित विचारधाराओं के आयात और प्रसार के कारण है। धर्मनिरपेक्षता और भारत की जातीय तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बावजूद देश की मौलिक एकता पर ज़ोर देने के अलावा नेहरु भारत को वैज्ञानिक खोजों और तकनीकी विकास के आधुनिक युग में ले जाने के प्रति भी सचेत थे। साथ ही उन्होंने अपने देशवासियों में निर्धनों तथा अछूतों के प्रति सामाजिक चेतना की ज़रूरत के प्रति जागरुकता पैदा करने और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान पैदा करने का भी कार्य किया। उन्हें अपनी एक उपलब्धि पर विशेष गर्व था कि उन्होंने प्राचीन हिन्दू सिविल कोड में सुधार करके अंततः उत्तराधिकार तथा संपत्ति के मामले में विधवाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार प्रदान करवाया।&lt;br /&gt;
====गुटनिरपेक्ष आंदोलन====&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेहरू का सितारा अक्टूबर 1956 तक बुलंदी पर था। 1956 में सोवियत संघ के खिलाफ़ हंगरी के विद्रोह के दौरान भारत के रवैये के कारण उनके गुटनिरपेक्ष नीति की जमकर आलोचना हुई। संयुक्त राष्ट्र में भारत अकेला ऐसा गुटनिरपेक्ष देश था, जिसने हंगरी पर आक्रमण के मामले में सोवियत संघ के पक्ष में मत दिया। इसके बाद नेहरू को गुटनिरपेक्ष आंदोलन के आह्वान की विश्वनियता साबित करने में काफ़ी मुश्किल हुई। स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में उपनिवेशवाद का विरोध उनकी विदेश- नीति का मूल आधार था, लेकिन 1961 के गुटनिरपेक्ष देशों के बेलग्रेड सम्मेलन तक नेहरू ने प्रतिउपनिवेशवाद की जगह गुटनिरपेक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था। 1962 में लंबे समय से चले आ रहे सीमा-विवाद के फलस्वरुप चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी घाटी पर हमले की चेतावनी दी। नेहरू ने अपनी गुटनिरपेक्ष नीति को ताक पर रखते हुए पश्चिमी देशों से सहायता की मांग की और चीन को पीछे हटाना पड़ा। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;संस्कृति का मतलब है- मन और आत्मा की विशालता और व्यापकता। इसका मतलब दिमाग को तंग रखना, या आदमी या मुल्क की भावना को सीमित करना कभी नहीं होता।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कश्मीर, जिस पर भारत और पाकिस्तान, दोनों दावा कर रहे थे, नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में लगातार एक समस्या बना रहा। संघर्ष विराम रेखा को समायोजित करके इस विवाद को निपटाने की उनकी प्रारंभिक कोशिशें नाकाम रहीं और 1948 में पाकिस्तान ने बलपूर्वक कश्मीर पर क़ब्ज़ा का असफल प्रयास किया। भारत में बचे अंतिम उपनिवेश, पुर्तग़ाली [[गोवा]] की समस्या को सुलझाने में नेहरू अधिक भाग्यशाली रहे। यद्यपि दिसंबर 1961 में भारतीय सेनाओं द्वारा इस पर क़ब्ज़ा किए जाने से कई पश्चिमी देशों में नराज़गी पैदा हुई। लेकिन नेहरू की कार्यवाही न्यायसंगत थी। नेहरू जी ने कहा था:-&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के मन को मुक्त करना है, न कि उसे बाँधे हुए चौखटों में बंद करना है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेज़ों और फ़्रांसीसियों के वापस चले जाने के बाद भारत में पुर्तग़ाली उपनिवेश की उपस्थिती एक कालदोष बनकर रह गई थी। अंग्रेज़ और फ़ांसीसी दोनों शांतिपूर्वक वापस चले गए थे। अगर पुर्तग़ाली जाने के लिए तैयार नहीं थे, तो नेहरू को उन्हें वहाँ से हटाने का तरीक़ा ढूंढ़ना ही था। पहले समझाने-बुझाने की कोशिशें की गईं, फिर अगस्त 1955 में उन्होंने निहत्थे भारतीयों के एक समूह को पुर्तग़ाली क्षेत्र में जाकर अहिंसक प्रदर्शन की अनुमति दी। पुर्तग़ालियों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाकर 30 लोगों को मार डाला, लेकिन नेहरू ने छह वर्षों तक कोई क़दम नहीं उठाया और इस बीच पुर्तग़ाल के पश्चिमी मित्रों से यह अपील करते रहे कि वे पुर्तग़ाली सरकार से यह उपनिवेश वापस दिला दें। अंतत: जब भारत ने हमला किया, तो नेहरू का दावा था कि उन्होंने और भारत सरकार ने कभी भी नीति के रूप में अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता नहीं जताई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मंत्रिमंडल का पुनर्गठन====&lt;br /&gt;
पंडित नेहरू पहले राष्ट्राध्यक्ष थे, जिन्होंने  1963 ई॰ में रूस, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका के बीच आंशिक परमाणविक परीक्षण-निषेध संधि पर हस्ताक्षर किये जाने का स्वागत किया। उपरान्त लोकसभा के कुछ उपचुनावों में कांग्रेसी उम्मीदवारों की विफलता के कारण कांग्रेस दल ने उन्हें सुझाव दिया कि वे अपने मंत्रिमंडल का पुनर्गठन करें, ताकि कांग्रेस के कुछ गण्यमान्य नेता दल को पुनर्गठित करने में अपना पूर्ण समय दे सकें। पंडित नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों की संख्या कम कर दी और श्री मोरार जी देसाई तथा श्री पाटिल सरीखे अपने पुराने सहयोगियों का त्यागपतत्र स्वीकार कर लिया। साथ ही उन्होंने एक छोटे तथा ठोस मंत्रीमंडल का गठन किया। जनवरी 1964 ई॰ में जब वे [[भुवनेश्वर]] कांग्रेस अधिवेशन में भाग ले रहे थे, तभी वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गये। यद्यपि कुछ दिनों के लिए उनके स्वास्थ्य में थोड़ा सुधार अवश्य हुआ।&lt;br /&gt;
====भारत-चीन युद्ध====&lt;br /&gt;
हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा उस समय बेमानी साबित हो गया जब सीमा विवाद को लेकर 10 अक्तूबर 1962 को चीनी सेना ने लद्दाख़ और नेफ़ा में भारतीय चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया। नेहरू ने इसे जानबूझ कर की गई कारवाई बताया। नवंबर में एक बार फिर चीन की ओर से हमले शुरू हुए। हालाँकि चीन ने एकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा कर दी। तब तक 1300 से ज़्यादा भारतीय सैनिक मारे जा चुके थे। पंडित नेहरू के करियर का यह सबसे बुरा दौर साबित हुआ। उनकी सरकार के ख़िलाफ़ संसद में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मृत्यु====&lt;br /&gt;
चीन के साथ संघर्ष के कुछ ही समय बाद नेहरू के स्वास्थ्य में गिरावट के लक्षण दिखाई देने लगे। उन्हें 1963 में दिल का हल्का दौरा पड़ा, जनवरी 1964 में उन्हें और दुर्बल बना देने वाला दौरा पड़ा। कुछ ही महीनों के बाद तीसरे दौरे में 27 मई 1964 में उनकी मृत्यु हो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ख्यातिलब्ध लेखक==&lt;br /&gt;
पंडित नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली वक्ता ही नहीं, ख्यातिलब्ध लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा 1936 ई॰ में प्रकाशित हुई और संसार के सभी देशों में उसका आदर हुआ। उनकी अन्य रचनाओं में भारत और विश्व, सोवियत रूस, विश्व इतिहास की एक झलक, भारत की एकता और स्वतंत्रता और उसके बाद विशेष उल्लेखनीय हैं।  इनमें से अन्तिम दो पुस्तकें उनके फुटकर लेखों और भाषणों के संग्रह हैं।&lt;br /&gt;
==मूल्यांकन==&lt;br /&gt;
अपनी भारतीयता पर ज़ोर देने वाले नेहरू में वह हिन्दू प्रभामंडल और छवि कभी नहीं उभरी, जो गाँधी के व्यक्तितत्व का अंग थी। अपने आधुनिक राजनीतिक और आर्थिक विचारों के कारण वह भारत के युवा बुद्धिजीवियों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ गाँधी के अहिंसक आन्दोलन कि ओर आकर्षित करने में और स्वतन्त्रता के बाद उन्हें अपने आसपास बनाए रखने में सफल रहे। पश्चिम में पले-बढ़े होने और स्वतन्त्रता के पहले यूरोपीय यात्राओं के कारण उनके सोचने का ढंग पश्चिमी साँचे में ढल चुका था। 17 वर्षों तक सत्ता में रहने के दौरान उन्होंने लोकतांत्रिक समाजवाद को दिशा-निर्देशक माना। उनके कार्यकाल में संसद में कांग्रेस पार्टी के ज़बरदस्त बहुमत के कारण वह अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर होते रहे। लोकतन्त्र, समाजवाद, एकता और धर्मनिरपेक्षता उनकी घरेलू नीति के चार स्तंभ थे। वह जीवन भर इन चार स्तंभों से सुदृढ़ अपनी इमारत को काफ़ी हद तक बचाए रखने में कामयाब रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेहरू की इकलौती संतान [[इंदिरा गाँधी]] 1966 से 1977 तक और फिर 1980 से 1984 तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। इंदिरा गाँधी के बेटे [[राजीव गाँधी]] 1984 से 1989 तक प्रधानमंत्री रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://ritbansal.blogspot.com/2008/11/blog-post.html ritbansal.blogspot]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[http://www.culturalindia.net/leaders/jawaharlal-nehru.html  culturalindia.net]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[http://www.indianchild.com/jawaharlal_nehru.htm indianchild.com]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[http://www.biographyonline.net/politicians/indian/nehru.html biographyonline.net]&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
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{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
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{{भारत के प्रधानमंत्री}}&lt;br /&gt;
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[[Category:भारत के प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
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[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>सूरदास</title>
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		<updated>2010-05-31T06:50:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Head&lt;br /&gt;
|शीर्षक=महाकवि सूरदास&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Surdas.jpg&lt;br /&gt;
|जन्म=संवत 1535 वि0(सन 1478 ई॰) &lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[रुनकता]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=श्री रामदास&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[ब्रज]] ([[मथुरा]]-[[आगरा]])&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=सगुण भक्ति काव्य&lt;br /&gt;
|मृत्यु= 1583 ई॰&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=[[सूरसागर]], [[सूरसारावली]], [[साहित्य-लहरी]], [[नल-दमयन्ती]], [[ब्याहलो]]&lt;br /&gt;
|विषय=भक्ति&lt;br /&gt;
|भाषा=[[ब्रज भाषा]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हिन्दी साहित्य में [[भक्तिकाल]] में [[कृष्ण]] भक्ति के भक्त कवियों में महाकवि सूरदास का नाम अग्रणी है। &lt;br /&gt;
*उनका जन्म 1478 ईस्वी में [[मथुरा]] [[आगरा]] मार्ग पर स्थित [[रुनकता]] नामक गांव में हुआ था। कुछ लोगों का कहना है कि सूरदास जी का जन्म सीही नामक ग्राम में एक ग़रीब सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में वह आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। &lt;br /&gt;
*सूरदास जी के पिता श्री रामदास गायक थे। सूरदास जी के जन्मांध होने के विषय में भी मतभेद हैं। आगरा के समीप गऊघाट पर उनकी भेंट श्री [[वल्लभाचार्य]] से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको [[वल्लभ-सम्प्रदाय|पुष्टिमार्ग]] में दीक्षा दे कर [[कृष्णलीला]] के पद गाने का आदेश दिया। &lt;br /&gt;
*सूरदास जी [[अष्टछाप]] कवियों में एक थे। सूरदास जी की मृत्यु [[गोवर्धन]] के पास [[पारसौली]] ग्राम में 1583 ईस्वी में हुई। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
इनके बारे में ‘भक्तमाल’ और ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ में थोड़ी-बहुत जानकारी मिल जाती है। ‘आईना-ए-अकबरी’ और ‘मुंशियात अब्बुलफजल’ में भी किसी संत सूरदास का उल्लेख है, किन्तु वे [[काशी|बनारस]] के कोई और सूरदास प्रतीत होते हैं। अनुश्रुति यह अवश्य है कि [[अकबर]] बादशाह सूरदास का यश सुनकर उनसे मिलने आए थे। ‘भक्तमाल’ में इनकी भक्ति, कविता एवं गुणों की प्रशंसा है तथा इनकी अंधता का उल्लेख है। ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ के अनुसार वे आगरा और मथुरा के बीच साधु के रूप में रहते थे। वे वल्लभाचार्य के दर्शन को गए और उनसे लीलागान का उपदेश पाकर कृष्ण-चरित विषयक पदों की रचना करने लगे। कालांतर में श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण होने पर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इन्हें यहाँ कीर्तन का कार्य सौंपा।&lt;br /&gt;
सूरदास के विषय में कहा जाता है कि वे जन्मांध थे। उन्होंने अपने को ‘जन्म को आँधर’ कहा भी है। किन्तु इसके शब्दार्थ पर अधिक नहीं जाना चाहिए। सूर के काव्य में प्रकृतियाँ और जीवन का जो सूक्ष्म सौन्दर्य चित्रित है उससे यह नहीं लगता कि वे जन्मांध थे। उनके विषय में ऐसी कहानी भी मिलती है कि तीव्र अंतर्द्वन्द्व के किसी क्षण में उन्होंने अपनी आँखें फोड़ ली थीं। उचित यही मालूम पड़ता है कि वे जन्मांध नहीं थे। कालांतर में अपनी आँखों की ज्योति खो बैठे थे। सूरदास अब अंधों को कहते हैं। यह परम्परा सूर के अंधे होने से चली है। सूर का आशय ‘शूर’ से है। शूर और सती मध्यकालीन भक्त साधकों के आदर्श थे।&lt;br /&gt;
==महाकवि सूरदास का स्थान==&lt;br /&gt;
धर्म, साहित्य और संगीत के सन्दर्भ में महाकवि सूरदास का स्थान न केवल हिन्दी-भाषा क्षेत्र, बल्कि सम्पूर्ण भारत में मध्ययुग की महान विभूतियों में अग्रगण्य है। यह सूरदास की लोकप्रियता और महत्ता का ही प्रमाण है  कि 'सूरदास' नाम किसी भी अन्धे भक्त गायक के लिए रूढ़ सा हो गया है। मध्ययुग में इस नाम के कई भक्त कवि और गायक हो गये हैं अपने विषय में मध्ययुग के ये भक्त कवि इतने उदासीन थे कि उनका जीवन-वृत्त निश्चित रूप से पुन: निर्मित करना असम्भवप्राय हैं परन्तु इतना कहा जा सकता है कि 'सूरसागर' के रचयिता सूरदास इस नाम के व्यक्तियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध और महान थे और उन्हीं के कारण कदाचित यह नाम उपर्युक्त विशिष्ट अर्थ के द्योतक सामान्य अभिधान के रूप में प्रयुक्त होने लगा। ये सूरदास विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित [[अष्टछाप]] के अग्रणी भक्त कवि थे और पुष्टिमार्ग में उनकी वाणी का आदर बहुत कुछ सिद्धान्त वाक्य के रूप में होता है।&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
गोस्वामी हरिराय के 'भाव प्रकाश' के अनुसार सूरदास का जन्म [[दिल्ली]] के पास सीही नाम के गाँव में एक अत्यन्त निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके तीन बड़े भाई थे । सूरदास जन्म से ही अन्धे थे किन्तु सगुन बताने की उनमें अद्भुत शक्ति थी। 6 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने अपनी सगुन बताने की विद्या से माता-पिता को चकित कर दिया था। किन्तु इसी के बाद वे घर छोड़कर चार कोस दूर एक गाँव में तालाब के किनारे रहने लगे थे। सगुन बताने की विद्या के कारण शीघ्र ही उनकी ख्याति हो गयी। गानविद्या में भी वे प्रारम्भ से ही प्रवीण थे।  शीघ्र ही उनके अनेक सेवक हो गये और वे 'स्वामी' के रूप में पूजे जाने लगे। 18 वर्ष की अवस्था में उन्हें पुन: विरक्ति हो गयी। और वे यह स्थान छोड़कर आगरा और मथुरा के बीच [[यमुना नदी|यमुना]] के किनारे गऊघाट पर आकर रहने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-19.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra|thumb|left|250px]]&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
सूरदास का जन्म कब हुआ, इस विषय में पहले उनकी तथाकथित रचनाओं, 'साहित्य लहरी' और सूरसागर सारावली  के आधार पर अनुमान लगाया गया था और अनेक वर्षों तक यह दोहराया जाता रहा कि उनका जन्म [[संवत]] 1540 वि0(सन 1483 ई॰) में हुआ था परन्तु विद्वानों ने इस अनुमान के आधार को पूर्ण रूप में अप्रमाणिक सिद्ध कर दिया तथा पुष्टि-मार्ग में प्रचलित इस अनुश्रुति के आधार पर कि सूरदास श्रीमद्वल्लभाचार्य से 10 दिन छोटे थे, यह निश्चित किया कि सूरदास का जन्म वैशाख शुक्ल 5, संवत 1535 वि0(सन 1478 ई॰) को हुआ था।  इस साम्प्रदायिक अनुश्रुति को प्रकाश में लाने तथा उसे अन्य प्रमाणों में पुष्ट करने का श्रेय डा॰ दीनदयाल गुप्त को है। जब तक इस विषय में कोई अन्यथा प्रमाण न मिले, हम सूरदास की जन्म-तिथि को यही मान सकते हैं।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
सूरदास के विषय में आज जो भी ज्ञात है, उसका आधार मुख्यतया'[[वैष्णवन की वार्ता|चौरासी वैष्णवन की वार्ता]]' ही है। उसके अतिरिक्त् पुष्टिमार्ग में प्रचलित अनुश्रुतियाँ जो गोस्वामी हरिराय द्वारा किये गये उपर्युक्त वार्ता के परिवर्द्धनों तथा उस पर लिखी गयी 'भावप्रकाश' नाम की टीका और गोस्वामी यदुनाथ द्वारा लिखित 'वल्लभ दिग्विजय' के रूप में प्राप्त होती हैं-सूरदास के जीवनवृत्त की कुछ घटनाओं की सूचना देती हैं। नाभादास के 'भक्तमाल' पर लिखित प्रियादास की टीका, कवि मियासिंह के 'भक्त विनोद', ध्रुवदास की 'भक्तनामावली' तथा नागरीदास की 'पदप्रसंगमाला' में भी सूरदास सम्बन्धी अनेक रोचक अनुश्रुतियाँ प्राप्त होती हैं परन्तु विद्वानों ने उन्हें विश्वसनीय नहीं माना है। 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' से ज्ञात होता है कि प्रसिद्ध मुग़ल सम्राट् [[अकबर]] ने सूरदास से भेंट की थी परन्तु यह आश्चर्य की बात हे कि उस समय के किसी फ़ारसी इतिहासकार ने '[[सूरसागर]]' के रचयिता महान भक्त कवि सूरदास का कोई उल्लेख नहीं किया। इसी युग के अन्य महान भक्त कवि [[तुलसीदास]] का भी मुग़लकालीन इतिहासकारों ने उल्लेख नहीं किया। अकबरकालीन प्रसिद्ध इतिहासग्रन्थों-आईने अकबरी', 'मुशि आते-अबुलफज्ल' और 'मुन्तखबुत्तवारीख' में सूरदास नाम के दो व्यक्तियों का उल्लेख हुआ है परन्तु ये दोनों प्रसिद्ध भक्त कवि सूरदास से भिन्न हैं। 'आईने अकबरी' और 'मुन्तखबुत्तवारीख' में अकबरी दरबार के रामदास नामक गवैया के पुत्र सूरदास का उल्लेख है। ये सूरदास अपने पिता के साथ अकबर के दरबार में जाया करते थे। 'मुंशिआते-अबुलफज्ल' में जिन सूरदास का उल्लेख है, वे [[काशी]] में रहते थे, अबुलफजल ने अनके नाम एक पत्र लिखकर उन्हें आश्वासन दिया था कि काशी के उस करोड़ी के स्थान पर जो उन्हें क्लेश देता है, नया करोड़ी उन्हीं की आज्ञा से नियुक्त किया जायगा। कदाचित ये सूरदास मदनमोहन नाम के एक अन्य भक्त थे।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Surdas-Stamp.jpg|सूरदास डाक टिकट&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas Stamp|thumb]]&lt;br /&gt;
==वल्लभाचार्य==  &lt;br /&gt;
'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' में सूर का जीवनवृत्त गऊघाट पर हुई वल्लभाचार्य से उनकी भंट के साथ प्रारम्भ होता है। गऊघाट पर भी उनके अनेक सेवक उनके साथ रहते थे तथा 'स्वामी' के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। कदाचित इसी कारण एक बार अरैल से जाते समय वल्लभाचार्य ने उनसे भेंट की और उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया। 'वार्ता' में वल्लभाचार्य और सूरदास के प्रथम भेंट का जो रोचक वर्णन दिया गया है, उससे व्यंजित होता है कि सूरदास उस समय तक कृष्ण की आनन्दमय ब्रजलीला से परिचित नहीं थे और वे वैराग्य भावना से प्रेरित होकर पतितपावन हरि की दैन्यपूर्ण दास्यभाव की भक्ति में अनुरक्त थे और इसी भाव के विनयपूर्ण पद रच कर गाते थे। वल्लभाचार्य ने उनका 'धिधियाना' (दैन्य प्रकट करना) छुड़ाया और उन्हें भगवद्-लीला से परिचत कराया। इस विवरण के आधार पर कभी-कभी यह कहा जाता है कि सूरदास ने विनय के पदों की रचना वल्लभाचार्य से भेंट होने  के पहले ही कर ली होगी परन्तु यह विचार भ्रमपूर्ण है &amp;lt;balloon title=&amp;quot;'सूरसागर'&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;* &amp;lt;/balloon&amp;gt; वल्लभाचार्य द्वारा 'श्रीमद् भागवत' में वर्णित कृष्ण की लीला का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त सूरदास ने अपने पदों में उसका वर्णन करना प्रारम्भ कर दिया। 'वार्ता' में कहा गया है कि उन्होंने 'भागवत' के द्वादश स्कन्धों पर पद-रचना की। उन्होंने 'सहस्त्रावधि' पद रचे, जो 'सागर' कहलाये। वल्लभाचार्य के संसर्ग से सूरदास को &amp;quot;माहात्म्यज्ञान पूर्वक प्रेम भक्ति&amp;quot; पूर्णरूप में सिद्ध हो गयी। वल्लभाचार्य ने उन्हें [[गोकुल]] में [[श्रीनाथ जी]] के मन्दिर पर कीर्तनकार के रूप में नियुक्त किया और वे आजन्म वहीं रहे।&lt;br /&gt;
==अकबर==  &lt;br /&gt;
सूरदास की पद-रचना और गान-विद्या की ख्याति सुनकर देशाधिपति अकबर ने उनसे मिलने की इच्छा की। गोस्वामी हरिराय के अनुसार प्रसिद्ध संगीतकार [[तानसेन]] के माध्यम से अकबर और सूरदास की भेंट मथुरा में हुई। सूरदास का भक्तिपूर्ण पद-गान सुनकर अकबर बहुत प्रसन्न हुए किन्तु उन्होंने सूरदास से प्रार्थना की कि वे उनका यशगान करें परन्तु सूरदास ने 'नार्हिन रहयो मन में ठौर' से प्रारम्भ होने वाला पद गाकर यह सूचित कर दिया कि वे केवल कृष्ण के यश का वर्णन कर सकते है, किसी अन्य का नहीं। इसी प्रसंग मे 'वार्ता' में पहली बार बताया गया है। कि सूरदास अन्धे थे। उपर्युक्त पर के अन्त में 'सूर से दर्श को एक मरत लोचन प्यास' शब्द सुनकर अकबर ने पूछा कि तुम्हारे लोचन तो दिखाई नहीं देते, प्यासे कैसे मरते है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
वार्ता' में सूरदास के जीवन की किसी अन्य घटना का उल्लेख नहीं है, केवल इतना बताया गया है कि वे भगवद्भक्तों को अपने पदों के द्वारा भक्ति का भावपूर्ण सन्देश देते रहते थे। कभी-कभी वे श्रीनाथ जी के मन्दिर से [[नवनीतप्रिया जी का मन्दिर|नवनीत प्रिय जी]] के मन्दिर भी चले जाते थे किन्तु हरिराय ने कुछ अन्य चमत्कारपूर्ण रोचक प्रसंगों का उल्लेख किया है। जिनसे केवल यह प्रकट होता है कि सूरदास परम भगवदीय थे और उनके समसामयिक भक्त [[कुम्भनदास]], [[परमानन्ददास]] आदि उनका बहुत आदर करते थे। 'वार्ता' में सूरदास के गोलोकवास का प्रसंग अत्यन्त रोचक है। श्रीनाथ जी की बहुत दिनों तक सेवा करने के उपरान्त जब सूरदास को ज्ञात हुआ कि भगवान की इच्छा उन्हें उठा लेने की है तो वे श्रीनाथ जी के मन्दिर में पारसौली के चन्द्र सरोवर पर आकर लेट गये और दूर से सामने ही फहराने वाली श्रीनाथ जी की ध्वजा का ध्यान करने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शरीर त्याग==&lt;br /&gt;
पारसौली वह स्थान है, जहाँ पर कहा जाता है कि श्री[[कृष्ण]] ने [[रासलीला]] की थी। इस समय सूरदास को आचार्य वल्लभ, श्रीनाथ जी और गोसाई [[विट्ठलनाथ]] ने श्रीनाथ जी की [[आरती पूजन|आरती]] करते समय सूरदास को अनुपस्थित पाकर जान लिया कि सूरदास का अन्त समय निकट आ गया है। उन्होंने अपने सेवकों से कहा कि, &amp;quot;पुष्टिमार्ग का जहाज&amp;quot; जा रहा है, जिसे जो लेना हो ले ले। आरती के उपरान्त गोसाई जी [[रामदास]], [[कुम्भनदास]], [[गोविंदस्वामी]] और [[चतुर्भुजदास]] के साथ सूरदास के निकट पहुँचे और सूरदास को, जो अचेत पड़े हुए थे, चैतन्य होते हुए देखा। सूरदास ने गोसाई जी का साक्षात् भगवान के रूप में अभिनन्दन किया और उनकी भक्तवत्सलता की प्रशंसा की।  चतुर्भुजदास ने इस समय शंका की कि सूरदास ने भगवद्यश तो बहुत गाया, परन्तु आचार्य वल्लभ का यशगान क्यों नहीं किया। सूरदास ने बताया कि उनके निकट आचार्य जी और भगवान में कोई अन्तर नहीं है-जो भगवद्यश है, वही आचार्य जी का भी यश है। गुरु के प्रति अपना भाव उन्होंने &amp;quot;भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो&amp;quot; वाला पद गाकर प्रकट किया। इसी पद में सूरदास ने अपने को &amp;quot;द्विविध आन्धरो&amp;quot; भी बताया। गोसाई विट्ठलनाथ ने पहले उनके 'चित्त की वृत्ति' और फिर 'नेत्र की वृत्ति' के सम्बन्ध में प्रश्न किया तो उन्होंने क्रमश: बलि बलि बलि हों कुमरि राधिका नन्द सुवन जासों रति मानी' तथा 'खंजन नैन रूप रस माते' वाले दो पद गाकर सूचित किया कि उनका मन और आत्मा पूर्णरूप से राधा भाव में लीन है। इसके बाद सूरदास ने शरीर त्याग दिया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-21.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
==काल-निर्णय==  &lt;br /&gt;
सूरदास की जन्म-तिथि तथा उनके जीवन की कुछ अन्य मुख्य घटनाओं के काल-निर्णय का भी प्रयत्न किया गया है। इस आधार पर कि गऊघाट पर भेंट होने के समय वल्लभाचार्य गद्दी पर विराजमान थे, यह अनुमान किया गया है। कि उनका विवाह हो चुका था क्योंकि ब्रह्मचारी का गद्दी पर बैठना वर्जित है। वल्लभाचार्य का विवाह संवत 1560-61 (सन 1503-1504 ई॰) में हुआ था, अत: यह घटना इसके बाद की है। 'वल्लभ दिग्विजय' के अनुसार यह घटना संवत 1567 वि0 के (सन 1510 ई॰) आसपास की है। इस प्रकार सूरदास 30-32 वर्ष की अवस्था में पुष्टिमार्ग में दीक्षित हुए होंगे। 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' से सूचित होता है कि सूरदास को गोसाई विट्ठलनाथ का यथेष्ट सत्संग प्राप्त हुआ था। गोसाई जी सं0 1628 वि0 मं (सन 1571 ई॰) स्थायी रूप से [[गोकुल]] में रहने लगे थे।  उनका देहावसान सं0 1642 वि0 (सन 1585 ई॰) में हुआ।  'वार्ता' से सूचित होता है कि सूरदास को देहावसान गोसाई जी के सामने ही हो गया था।  सूरदास ने गोसाई जी के सत्संग का एकाध स्थल पर संकेत करते हुए ब्रज के जिस वैभवपूर्ण जीवन का वर्णन किया है, उससे विदित होता है कि गोसाई जी को सूरदास के जीवनकाल में ही सम्राट अकबर की ओर से वह सुविधा और सहायता प्राप्त हो चुकी थी, जिसका उल्लेख सं0 1634 (सन 1577 ई॰) तथा सं0 1638 वि0 के0 (सन 1581 ई॰) शाही फ़रमानों में हुआ है। अत: यह अनुमान किया जा सकता है कि सूरदास  सं0 1638 (सन 1581 ई॰) या कम से कम सं0 1634 विं के (सन 1577 ई॰) बाद तक जीवित रहे होंगे। मौटे तौर पर कहा जा सकता है कि वे सं0 1640 वि0 अथवा सन 1582-83 ई॰ के आसपास गोलोकवासी हुए होंगे। इन तिथियों के आधार पर भी उनका जन्म सं0 1535 वि0 के0 (सन 1478 ई॰) आसपास पड़ता है क्योंकि वे 30-32 वर्ष की अवस्था में पुष्टिमार्ग में दीक्षित हुए थे। 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' में अकबर और सूरदास की भेंट का वर्णन हुआ है।  गोसाई हरिराय के अनुसार यह भेंट तानसेन ने करायी थी। तानसेन सं0 1621 (सन 1564 ई॰) में अकबर के दरबार में आये थे।  अकबर के राज्य काल की राजनीतिक घटनाओं पर विचार करते हुए यह अनुमान किया जा सकता है कि वे सं0 1632-33 (सन 1575-76 ई॰) के पहले सूरदास से भेंट नहीं कर पाये होंगे। क्योंकि सं0 1632 में (सन 1775 ई॰) उन्होंने [[फतेहपुर सीकरी]] में इबादतखाना बनवाया था तथा सं0 1633 (सन 1576 ई॰) तक वे उत्तरी भारत के साम्राज्य को पूर्ण रूप में अपने अधीन कर उसे संगठित करने में व्यस्त रहे थे। गोसाई विट्ठलनाथ से भी अकबर ने इसी समय के आसपास भेंट की थी।&lt;br /&gt;
=='सूरसागर' के रचयिता==&lt;br /&gt;
सूरदास की जीवनी के सम्बन्ध में कुछ बातों पर काफ़ी विवाद और मतभेद है।  सबसे पहली बात उनके नाम के सम्बन्ध में है। 'सूरसागर' में जिस नाम का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है, वह सूरदास अथवा उसका संक्षिप्त रूप सूर ही है। सूर और सूरदास के साथ अनेक पदों में स्याम, प्रभु और स्वामी का प्रयोग भी हुआ है परन्तु सूर-स्याम, सूरदास स्वामी, सूर-प्रभु अथवा सूरदास-प्रभु को कवि की छाप न मानकर सूर या सूरदास छाप के साथ स्याम, प्रभु या स्वामी का समास समझना चाहिये। कुछ पदों में सूरज और सूरजदास नामों का भी प्रयोग मिलता है परन्तु ऐसे  पदों के सम्बन्ध में निश्चत पूर्वक नहीं कहा जा सकता कि वे सूरदास के प्रामाणिक पद हैं अथवा नहीं। 'साहित्य लहरी' के जिस पद में उसके रचयिता ने अपनी वंशावली दी है, उसमें उसने अपना असली नाम सूरजचन्द बताया हे परन्तु उस रचना अथवा कम से कम उस पद की प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जाती निष्कर्षत: 'सूरसागर' के रचयिता का वास्तविक नाम सूरदास ही माना जा सकता है।&lt;br /&gt;
==जाति==&lt;br /&gt;
सूरदास की जाति के सम्बन्ध में भी बहुत वाद-विवाद हुआ है। &amp;quot;साहित्य लहरी' के उपर्युक्त पद के अनुसार कुछ समय तक सूरदास को भट्ट या ब्रह्मभट्ट माना जाता रहा। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने इस विषय में प्रसन्नता प्रकट की थी कि सूरदास महाकवि चन्दबरदाई के वंशज थे किन्तु बाद में अधिकतर पुष्टिमार्गीय स्त्रोतों के आधार पर यह प्रसिद्ध हुआ कि वे सारस्वत ब्राह्मण थे। बहुत कुछ इसी आधार पर 'साहित्य लहरी' का वंशावली वाला पद अप्रामाणिक माना गया। 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' में मूलत: सूरदास की जाति के विषय में कोई उल्लेख नहीं था परन्तु गोसाई हरिराय द्वारा बढ़ाये गयू 'वार्ता' के अंश में उन्हें सारस्वत ब्राह्मण कहा गया है। उनके सारस्वत ब्राह्मण होने के प्रमाण पुष्टिमार्ग के अन्य वार्ता साहित्य से भी दिये गये है। अत: अधिकतर यही माना जाने लगा है कि सूरदास सारस्वत ब्राह्मण थे यद्यपि कुछ विद्वानों को इस विषय में अब भी सन्देह है। डा॰ मंशीराम शर्मा ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि सूरदास ब्रह्मभट्ट ही थे। यह सम्भव है कि ब्रह्मभट्ट होने के नाते ही वे परम्परागत कवि –गायकों के वंशज होने का कारण सरस्वती पुत्र और सारस्वत नाम से विख्यात हो गये हों। अन्त: साक्ष्य से सूरदास के ब्राह्मण होने का कोई संकेत नहीं मिलता बल्कि इसके विपरीत अनेक पदों में उन्होंने ब्राह्मणों की हीनता का उल्लेख किया है। इस विषय में श्रीधर ब्राह्मण के अंग-भंग तथा महराने के पाँड़ेवाले प्रसंग दृष्टव्य हैं। ये दोनों प्रसंग 'भागवत' से स्वतन्त्र सूरदास द्वारा कल्पित हुए जान पड़ते हैं। इनमें सूरदास ने बड़ी निर्ममता पूर्वक ब्राह्मणत्व के प्रति निरादर का भाव प्रकट किया है। [[अजामिल]] तथा [[सुदामा]] के प्रसंगों में भी उनकी उच्च जाति का उल्लेख करते हुए सूर ने ब्राह्मणत्व के साथ कोई ममता नहीं प्रकट की। इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण 'सूरसागर' में ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता, जससे इसका किंचित् भी आभास मिल सके कि सूर ब्राह्मण जाति के सम्बन्ध में कोई आत्मीयता का भाव रखते थे। वस्तुत: जाति के सम्बन्ध में वे पूर्ण रूप से उदासीन थे। दानलीला के एक पद में उन्होंने स्पष्ट रूप में कहा है कि कृष्ण भक्ति के लिए उन्होंने अपनी जाति ही छोड़ दी थी। वे सच्चे अर्थों में हरिभक्तों की जाति के थे, किसी अन्य जाति से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-24.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
==सूरदास की अन्धता==  &lt;br /&gt;
तीसरा मतभेद का विषय सूरदास की अन्धता से सम्बन्धित है। सामान्य रूप से यह प्रसिद्ध रहा है कि सूरदास जन्मान्ध थे और उन्होंने भगवान् की कृपा से दिव्य-दृष्टि पायी थी, जिसके आधार पर उन्होंने कृष्ण-लीला का आँखों देखा जैसा वर्णन किया। गोसाई  हरिरासय ने भी सूरदास को जन्मान्ध बताया है। परन्तु उनके जन्मान्ध होने का कोई स्पष्ट उल्लेख उनके पदों में नहीं मिलता। 'चौरासी वार्ता' के मूल रूप में भी इसका कोई संकेत नहीं। जैसा पीछे कहा जा चुका है, उनके अन्धे होने का उल्लेख केवल अकबर की भेंट के प्रसंग में हुआ है। 'सूरसागर' के लगभग 7-8 पदों में की प्रत्यक्ष रूप से और कभी प्रकारान्तर से सूर ने अपनी हीनता और तुच्छता का वर्णन करते हुए अपने को अन्धा कहा है। सूरदास के सम्बन्ध में जी किंवदान्तियाँ प्रचलित है।, उन सब में उनके अन्घे होने का उल्लेख हुआ है। उनके कुढँ में गिरने और स्वयं कृष्ण के द्वारा उद्धार पाने एवं दृष्टि प्राप्त करने तथा पुन: कृष्ण से अन्धे होने का वरदान माँगने की घटना लोकविश्रुत है। बिल्वमंगल सूरदास के विषय में भी यह चमत्कारपूर्ण घटना कही-सुनी जाती है। इसके अतिरिक्त कवि मियाँसिंह ने तथा महाराज रघुराज सिंह ने भी कुछ चमत्कारपूर्ण घटनाओं का उल्लेख किया है, जिससे उनकी दिव्य-दृष्टि सम्पन्नता की सूचना मिलती है। नाभादास ने भी अपने 'भक्तमाल' में उन्हें दिव्य-दृष्टिसम्पन्न बताया है। निश्चय की सूरदास एक महान कवि और भक्त होने के नाते असाधारण दृष्टि रखते थे किन्तु उन्होंने अपने काव्य में वाह्य जगत के जैसे नाना रूपों, रंगों और व्यापारों का वर्णन किया है, उससे प्रमाणित होता है कि उन्होंने अवश्य की कभी अपने चर्म-चक्षुओं से उन्हें देखा होगा। उनका काव्य उनकी निरीक्षण-शक्ति  की असाधारण सूक्ष्मता प्रकट करता हे क्योंकि लोकमत उनके माहात्म्य के प्रति इतना श्रद्धालु रहा है कि वह उनहं जन्मान्ध मानने में ही उनका गौरव समता है, इसलिए इस सम्बन्ध में कोई साक्षी नहीं मिलती कि वे किसी परिस्थिति में दृष्टिहीन हो गये थे। हो सकता है कि वे वृद्धवस्था  के निकट दृष्टि-विहीन हो गये हों परन्तु इसकी कोई स्पष्ट सूचना उनके पदों में नहीं मिलती। विनय के पदों में वृद्धावस्था की दुर्दशा के वर्णन के अन्तर्गत चक्षु-विहीन हाने का जो उल्लेख हुआ है, उसे आत्मकथा नहीं माना जा सकता, वह तो सामान्य जीवन के एक तथ्य के रूप में कहा गया है। &lt;br /&gt;
=='सूरसागर'==&lt;br /&gt;
सूरदास की सर्वसम्मत प्रामाणिक रचना 'सूरसागर' हैं। एक प्रकार से 'सूरसागर' जैसा कि उसके नाम से सूचित होता है, उनकी सम्पूर्ण रचनाओं का संकलन कहा जा सकता है&amp;lt;balloon title=&amp;quot;'सूरसागर'&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;* &amp;lt;/balloon&amp;gt; 'सूरसागर' के अतिरिक्त 'साहित्य लहरी' और 'सूरसागर सारावली' को भी कुछ विद्वान् उनकी प्रामाणिक रचनाएँ मानते हैं परन्तु इनकी प्रामाणिकता सन्दिग्ध है &amp;lt;balloon title=&amp;quot;'सूरसागर सारावली' और 'साहित्य लहरी'&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;* &amp;lt;/balloon&amp;gt;। सूरदास के नाम से कुछ अन्य तथाकथित रचनाएँ भी प्रसिद्ध हुई हैं परन्तु वे या तो 'सूरसागर' के ही अंश हैं अथवा अन्य कवियों को रचनाएँ हैं। 'सूरसागर' के अध्ययन से विदित होता है कि कृष्ण की अनेक लीलाओं का वर्णन जिस रूप में हुआ है, उसे सहज ही खण्ड-काव्य जैसे स्वतन्त्र रूप में रचा हुआ भी माना जा सकता है। प्राय: ऐसी लीलाओं को पृथक् रूप में प्रसिद्धि भी मिल गयी है। इनमें से कुछ हस्तलिखित रूप में तथा कुछ मुद्रित रूप में प्राप्त होती हैं।  उदाहरण के लिए 'नागलीला' जिसमें [[कालियदह|कालियदमन]] का वर्णन हुआ है, '[[गोवर्धन लीला]]' जिसमें कालियदमन का वर्णन हुआ है, 'नागलीला', जिसमें गोवर्धनधारण और [[इन्द्र]] के शरणागमन का वर्णन है, 'प्राण प्यारी' जिसमें प्रेम के उच्चादर्श का पच्चीस दोहों में वर्णन हुआ है, मुद्रित रूप में प्राप्त हैं। हस्तलिखित रूप में 'व्याहलों' के नाम से राधा-कृष्ण विवाहसम्बन्धीप्रसंग, 'सूरसागर सार' नाम से रामकथा और रामभक्ति सम्बन्धी प्रसंग तथा 'सूरदास जी के दृष्टकूट' नाम से कूट-शैली के पद पृथक् ग्रन्थों में मिले हैं। इसके अतिरिक्त 'पद संग्रह', 'दशम स्कन्ध', 'भागवत', 'सूरसाठी' , 'सूरदास जी के पद' आदि नामों से 'सूरसागर' के पदों के विविध संग्रह पृथक् रूप में प्राप्त हुए है। ये सभी 'सूरसागर के' अंश हैं।  वस्तुत: 'सूरसागर' के छोटे-बड़े हस्तलिखित रूपों के अतिरिक्त उनके प्रेमी भक्तजन समय-समय पर अपनी-अपनी रूचि के अनुसार 'सूरसागर' के अंशो को पृथक् रूप में लिखते-लिखाते रहे हैं। 'सूरसागर' का वैज्ञानिक रीति से सम्पादित प्रामाणिक संस्करण निकल जाने के बाद ही कहा जा सकता है कि उनके नाम से प्रचलित संग्रह और तथाकथित ग्रन्थ कहाँ तक प्रमाणित हैं।&lt;br /&gt;
==विवेकशील और चिन्तनशील व्यक्तित्व== &lt;br /&gt;
सूरदास के काव्य से उनके बहुश्रुत, अनुभव सम्पन्न, विवेकशील और चिन्तनशील व्यक्तित्व का परिचय मिलता है। उनका हृदय गोप बालकों की भाँति सरल और निष्पाप, ब्रज [[गोपी|गोपियों]] की भाँति सहज संवेदनशील, प्रेम-प्रवण और माधुर्यपूर्ण तथा [[नन्द]] और [[यशोदा]] की भाँति सरल-विश्वासी, स्नेह-कातर और आत्म-बलिदान की भावना से अनुप्रमाणित था। साथ ही उनमें कृष्ण जैसी गम्भीरता और विदग्धता तथा राधा जैसी वचन-चातुरी और आत्मोत्सर्गपूर्ण प्रेम विवशता भी थी। काव्य में प्रयुक्त पात्रों के विविध भावों से पूर्ण चरित्रों का निर्माण करते हुए वस्तुत: उन्होंने अपने महान व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति की है। उनकी प्रेम-भक्ति के सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भावों का चित्रण जिन आंख्य संचारी भावों , अनगिनत घटना-प्रसंगों बाह्य जगत् प्राकृतिक और सामाजिक-के अनन्त सौन्दर्य चित्रों के आश्रय से हुआ है, उनके अन्तराल में उनकी गम्भीर वैराग्य-वृत्ति  तथा अत्यन्त दीनतापूर्ण आत्म निवेदात्मक भक्ति-भावना की अन्तर्धारा सतत प्रवहमान रही है परन्तु उनकी स्वाभाविक विनोदवृत्ति तथा हास्य प्रियता के कारण उनका वैराग्य और दैन्य उनके चित्तकी अधिक ग्लानियुक्त और मलिन नहीं बना सका। आत्म हीनता की चरम अनुभूति के बीच भी वे उल्लास व्यक्त कर सके। उनकी गोपियाँ विरह की हृदय विदारक वेदना को भी हास-परिहास के नीचे दबा सकीं। करुण और हास का जैसा एकरस रूप सूर के काव्य में मिलता है, अन्यत्र दुर्लभ है। सूर ने मानवीय मनोभावों और चित्तवृत्तियों को, लगता है, नि:शेष कर दिया है। यह तो उनकी विशेषता है ही परन्तु उनकी सबसे बड़ी विशेषता कदाचित यह है कि मानवीय भावों को वे सहज रूप में उस स्तर पर उठा सके, जहाँ उनमें लोकोत्तरता का संकेत मिलते हुए भी उनकी स्वाभाविक रमणीयता अक्षुण्ण ही नहीं बनी रहती, बल्कि विलक्षण आनन्द की व्यंजना करती है। सूर का काव्य एक साथ ही लोक और परलोक को प्रतिबिम्बित करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विशाल काव्य सर्जन== &lt;br /&gt;
सूर की रचना परिमाण और गुण दोनों में महान कवियों के बीच अतुलनीय है। आत्माभिव्यंजना के रूप में इतने विशाल काव्य का सर्जन सूर ही कर सकते थे क्योंकि उनके स्वात्ममुं सम्पूर्ण युग जीवन की आत्मा समाई हुई थी। उनके स्वानुभूतिमूलक गीतिपदों की शैली के कारण प्राय: यह समझ लिया गया हे कि वे अपने चारों ओर के सामाजिक जीवन के प्रति पूर्ण रूप में सजग नहीं थे परन्तु प्रचारित पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर यहदि देखा जाय तो स्वीकार किया जाएगा कि सूर के काव्य में युग जीवन की प्रबुद्ध आत्मा का जैसा स्पन्दन मिलता है, वैसा किसी दूसरे कवि में नहीं मिलेगा। यह अवश्य है कि उन्होंने उपदेश अधिक नहीं दिये, सिद्धान्तों का प्रतिपादन पण्डितों की भाषा में नहीं किया, व्यावहारिक अर्थात् सांसारिक जीवन के आदर्शों का प्रचार करने वाले सुधारक का बना नहीं धारण किया परन्तु मनुष्य की भावात्मक सत्ता का आदर्शीकृत रूप गढ़ने में उन्होंने जिस व्यवहार बुद्धि का प्रयोग किया है। उससे प्रमाणित होता है कि वे किसी मनीषी से पीछे नहीं थे। उनका प्रभाव सच्चे कान्ता सम्मित उपदेश की भाँति सीधे हृदय पर पड़ता है। वे निरे भक्त नहीं थे, सच्चे कवि थे-ऐसे द्रष्टा कवि, जो सौन्दर्य के ही माध्यम से सत्य का अन्वेषण कर उसे मूर्त रूप देने में समर्थ होते हैं। युगजीवन का प्रतिबिम्ब हदेते हुए उसमें लोकोत्तर सत्य के सौन्दर्य का आभास देने की शक्ति महाकवि में ही होती है, निरे भक्त, उपदेशक और समाज सुधारक में नहीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सहायक ग्रन्थ-सूरदास: डा॰ ब्रजेश्वर वर्मा हिन्दी परिषद् प्रयाग विश्वविद्यालय&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;  &amp;lt;balloon title=&amp;quot;सूर साहित्य: डा॰ हज़ारी प्रसाद द्विवेदी&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;  &amp;lt;balloon title=&amp;quot;सूर व उनका साहित्य: डा॰ हरिवंशलाल शर्मा&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &amp;lt;balloon title=&amp;quot;भारतीय साधना और सूरदास: डा॰ मुंशीराम शर्मा&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-12.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है । '[[साहित्य-लहरी]]' सूरदास जी की रचना मानी जाती है । 'साहित्य लहरी' के रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुनि पुनि के रस लेख ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत पेख ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रचनाएं-==&lt;br /&gt;
सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|1 [[सूरसागर]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2 [[सूरसारावली]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3 [[साहित्य-लहरी]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4 [[नल-दमयन्ती]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|5 [[ब्याहलो]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैसे उड़ि जहाज की पंछी, फिरि जहाज पै आवै ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भावै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Surkuti Sur Sarovar-Agra-3.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surkuti Sur Sarovar-Agra-2.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-22.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-9.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-20.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-23.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-7.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Sur Shyam Temple Sur Kuti Sur Sarovar Agra-17.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-8.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-6.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Sur Shyam Temple Sur Kuti Sur Sarovar Agra-25.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-10.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Sur Shyam Temple Sur Kuti Sur Sarovar Agra-13.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Sur Shyam Temple Sur Kuti Sur Sarovar Agra-14.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Sur Kuti Sur Sarovar Agra-15.jpg|प्रवेश द्वार, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Entry Gate, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Well Sur Sarovar Agra-16.jpg|सूरदास जी का कुंआ, सूर सरोवर, आगरा&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas Well, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Sur Shyam Temple Sur Kuti Sur Sarovar Agra-18.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-11.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surkuti Sur Sarovar-Agra-4.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surkuti Sur Sarovar-Agra-5.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surdas Blind School Sur Sarovar Agra-26.jpg|सूरदास नेत्रहीन विद्यालय, सूर सरोवर, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Surdas Blind School, Sur Sarovar, Agra&lt;br /&gt;
चित्र:Surkuti Sur Sarovar-Agra-1.jpg|सूर श्याम मंदिर, सूर कुटी, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Sur Shyam Temple, Sur Kuti, Agra&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>राजस्थान</title>
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		<updated>2010-05-23T11:07:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=rajasthan Map.jpg&lt;br /&gt;
|स्थानीय भाषाओं में नाम=राजस्थान&lt;br /&gt;
|राजधानी=जयपुर&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=56,473,122&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=165&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=342239 sqkm&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=26°34′22″N 73°50′20″E﻿&lt;br /&gt;
|ज़िले=33&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=जयपुर&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=जयपुर, अजमेर, उदयपुर&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=हिन्दी, राजस्थानी भाषा&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=जयपुर, भरतपुर, जोधपुर,  जैसलमेर,  उदयपुर,  बीकानेर&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=जयपुर, जोधपुर,  बीकानेर, माउण्ट आबू&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:921&lt;br /&gt;
|साक्षरता=61.03&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=8 °C&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=प्रभु राव&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=अशोक गहलोत&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=200&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.rajasthan.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/03/29&lt;br /&gt;
|emblem=Rajasthan-logo.jpg&lt;br /&gt;
}}'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान भारत का एक प्रान्त है। यहाँ की राजधानी [[जयपुर]] है। राजस्थान भारत गणराज्य के क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में [[गुजरात]], दक्षिण-पूर्व में [[मध्यप्रदेश]], उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में [[उत्तर प्रदेश]] और [[हरियाणा]] है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है। जयपुर राज्य की राजधानी है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरूस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एकमात्र पहाड़ी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, [[माउंट आबू]] और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर को सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, रणथम्भौर एवम् सरिस्का हैं और [[भरतपुर]] के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उध्यान है, जो पक्षियों की रक्षार्थ निर्मित किया गया है। राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी, जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
भारत की आजादी से पहले यह क्षेत्र राजपूताना (राजपूतों का स्थान) कहलाता था। रणबांकुरे राजपूतों ने कई सदियों तक इस क्षेत्र पर राज्य किया। राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है। ईसा पूर्व 3000 से 1000 के बीच यहाँ की संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता जैसी थी। 7वीं शताब्दी में यहाँ चौहान राजपूतों का प्रभुत्व बढने लगा और 12वीं शताब्दी तक उन्होंने एक साम्राज्य स्थापित कर लिया था। चौहान के बाद इस योद्धा जाति का नेतृत्व [[मेवाड़]] के गहलोतों ने सँभाला। मेवाड़ के अलावा जो अन्य रियासतें ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख रहीं, वे हैं - भरतपुर, जयपुर, [[बूंदी]], [[मारवाड़]], [[कोटा]],  और [[अलवर]]। अन्य सभी रियासतें इन्हीं रियासतों से बनी। इन सभी रियासतों ने 1818 में अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश संधि स्वीकार कर ली जिसमें राजाओं के हितों की रक्षा की व्यवस्था थी, लेकिन इस संधि से आम जनता स्वाभाविक रूप से असंतुष्ट थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद लोग [[स्वतंत्रता आंदोलन]] में भाग लेने के लिए [[महात्मा गाँधी]] के नेतृत्व में एकजुट हुए। सन 1935 में अंग्रेजी शासन वाले भारत में प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन और तेज हो गया। 1948 में इन बिखरी हुई रियासतों को एक करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1956 में राज्य में पुनर्गठन क़ानून लागू होने तक जारी रही। सबसे पहले 1948 में मत्स्य संघ बना, जिसमें कुछ ही रियासतें शामिल हुई। धीरे-धीरे बाकी रियासतें भी इसमें मिलती गई। सन 1949 तक [[बीकानेर]], जयपुर, [[जोधपुर]] और [[जैसलमेर]] जैसी मुख्य रियासतें इसमें शामिल हो चुकी थीं और इसे बृहत्तर राजस्थान संयुक्त राज्य का नाम दिया गया। सन 1958 में [[अजमेर]], आबू रोड तालुका और सुनेल टप्पा के भी शामिल हो जाने के बाद वर्तमान राजस्थान राज्य विधिवत अस्तित्व में आया। राजस्थान की समूची पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान पडता है जबकि उत्तर में [[पंजाब]], उत्तर पूर्व में [[हरियाणा]], पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में गुजरात है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
राज्य में वर्ष 2006-07 में कुल कृषि योग्य क्षेत्र 217 लाख हेक्टेयर था और वर्ष (2007-08) में अनुमानित खाद्यान उत्पादन 155.10 लाख टन रहा। राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। चावल, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, गेहूं, तिलहन, दालें कपास और तंबाकू। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो में सब्जियों और संतरा तथा माल्टा जैसे नींबू प्रजाति के फलों के उत्पादन में काफ़ी वृद्धि हुई है। यहाँ की अन्य फ़सलें है लाल मिर्च, सरसों, मेथी, ज़ीरा, और हींग।&lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
राजस्थान सांस्कृतिक रूप में समृद्ध होने के साथ-साथ खनिजों के मामले में भी समृद्ध रहा है और अब वह देश के औद्योगिक परिदृश्य में भी तेजी से उभर रहा है। राज्य के प्रमुख केंद्रीय प्रतिष्ठानों में देबरी ([[उदयपुर]]) में जस्ता गलाने का संयंत्र, खेतडी (झुंझनूं) में तांबा परियोजना और कोटा में सूक्ष्म उपकरणों का कारखाना शामिल है। मार्च, 2006 तक राज्य में लघु उद्योगों की 2,75,400 इकाइयां थी। जिनमें 4,336.70 करोड़ रुपये की पूँजी लगी थी और लगभग 10.55 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था। मुख्य उद्योग हैं :वस्त्र, ऊनी कपडे, चीनी, सीमेंट, काँच, सोडियम संयंत्र, आक्सीजन, वनस्पति रंग, कीटनाशक, जस्ता, उर्वरक, रेल के डिब्बे, बॉल बियरिंग, पानी व बिजली के मीटर, टेलीवीजन सेट, सल्फ्यूरिक एसिड, सिंथेटिक धागे तथा तापरोधी ईंटें आदि। बहुमूल्य और कम मूल्य के रत्नों के अलावा कास्टिक सोडा, कैलशियम कार्बाइड, नाइलोन तथा टायर आदि अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाइयां हैं। राज्य में जिंक कंसंट्रेट, पन्ना, गार्नेट, जिप्सम, खनिज चांदी, एस्बेस्टस, फैल्सपार तथा अभ्रक के प्रचुर भंडार हैं। राज्य में नमक, रॉक फास्फेट, मारबल तथा लाल पत्थर भी काफ़ी मात्रा में मिलता है। सीतापुर (जयपुर) में देश पहला निर्यात संवर्द्धन पार्क बनाया गया है जिसने काम करना प्रारंभ कर दिया है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
*मार्च 2007 के अंत तक राज्य में विभिन्न प्रमुख, मध्यम और छोटी सिचाई परियोजनाओं के माध्यम से 34.85 लाख हेक्टेयर की सिंचाई संभाव्यता का सृजन किया गया (2007-08) और 92,200 हेक्टेयर (आईजीएनपी और सीएडी के अलावा) की अतिरिक्त सिंचाई संभाव्यता का सृजन मार्च 2007 तक किया गया है। &lt;br /&gt;
*राज्य में संस्थापित विद्युत क्षमता दिसम्बर 2007 तक 6335.33 मेगावॉट हो गई है, जिसमें से 4000 मेगावॉट राज्य की अपनी परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न की जाती है, 521.85 मेगावॉट सहयोगी परियोजनाओं से तथा 1813.18 मेगावॉट केन्द्रीय विद्युत उत्पादन स्टेशनों से आबंटित की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
*सडकें: मार्च 2006 में राजस्थान में सड़को की कुल लंबाई 1,58,250 कि.मी. है।&lt;br /&gt;
*रेलवे: जोधपुर, बीकानेर, [[सवाई माधोपुर]], कोटा और भरतपुर राज्य के प्रमुख रेलवे जंक्शन है।&lt;br /&gt;
==उड्डयन== &lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] और [[मुंबई]] से जयपुर, जोधपुर तथा उदयपुर के लिए नियमित विमान सेवाएं हैं।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
राजस्थान मेलों और उत्सवों की धरती है। [[होली]], [[दीपावली]], [[विजय दशमी|विजयदशमी]], [[क्रिसमस]] जैसे प्रमख राष्ट्रीय त्योहारों के अलावा अनेक देवी-देवताओं, संतो और लोकनायकों तथा नायिकाओं के जन्मदिन मनाए जाते है। यहाँ के महत्वपूर्ण मेले हैं [[तीज]], [[गणगौर]](जयपुर), अजमेर शरीफ और गलियाकोट के वार्षिक उर्स, बेनेश्वर (डूंगरपुर) का जनजातीय कुंभ, श्री महावीर जी (सवाई माधोपुर मेला), रामदेउरा (जैसलमेर), जंभेश्वर जी मेला(मुकाम-बीकानेर), [[कार्तिक पूर्णिमा]] और पशु-मेला ([[पुष्कर]]-अजमेर) और श्याम जी मेला ([[सीकर]]) आदि।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
राज्य में पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं:&lt;br /&gt;
*जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, [[बीकानेर]], माउंट आबू, &lt;br /&gt;
*अलवर में [[सरिस्का बाघ विहार]], &lt;br /&gt;
*भरतपुर में केवलादेव [[राष्ट्रीय पक्षी विहार]], &lt;br /&gt;
*अजमेर, [[जैसलमेर]], [[पाली]], [[चित्तौडगढ़]] आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजस्थानी कला==&lt;br /&gt;
इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्या, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है जो पुन: विभिन्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
====स्थापत्य कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान में प्राचीन काल से ही हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा मध्यकाल से मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर, स्तम्भ, मठ, मस्जिद, मकबरे, समाधियों और छतरियों का निर्माण किया जाता रहा है। इनमें कई भग्नावेश के रुप में तथा कुछ सही हालत में अभी भी विद्यमान है। इनमें कला की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के भग्नावशेष हमें चित्तौड़ के उत्तर में नगरी नामक स्थान पर मिलते हैं। प्राप्त अवशेषों में [[वैष्णव]], [[बौद्ध]] तथा [[जैन]] धर्म की तक्षण कला झलकती है। तीसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवी शताब्दी तक स्थापत्य की विशेषताओं को बतलाने वाले उपकरणों में देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की कई मूर्तियां, [[बौद्ध]], [[स्तूप]], विशाल प्रस्तर खण्डों की चाहर दीवारी का एक बाड़ा, 36 फुट और नीचे से 14 फुल चौड़ दीवर कहा जाने वाला 'गरुड़ स्तम्भ' यहाँ भी देखा जा सकता है। 1567 ई. में [[अकबर]] द्वारा [[चित्तौड़]] आक्रमण के समय इस स्तम्भ का उपयोग सैनिक शिविर में प्रकाश करने के लिए किया गया था। गुप्तकाल के पश्चात् कालिका मन्दिर के रुप में विद्यमान चित्तौड़ का प्राचीन 'सूर्य मन्दिर' इसी ज़िले में छोटी सादड़ी का भ्रमरमाता का मन्दिर कोटा में, बाड़ौली का शिव मन्दिर तथा इनमें लगी मूर्तियाँ तत्कालीन कलाकारों की तक्षण कला के बोध के साथ जन-जीवन की अभिक्रियाओं का संकेत भी प्रदान करती हैं। चित्तौड़ ज़िले में स्थित मेनाल, [[डूंगरपुर]] ज़िले में अमझेरा, उदयपुर में डबोक के देवालय अवशेषों की [[शिव]], [[पार्वती देवी|पार्वती]], [[विष्णु]], [[महावीर]], भैरव तथा नर्तकियों का शिल्प इनके निर्माण काल के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का क्रमिक इतिहास बतलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवीं शताब्दी से राजस्थान की शिल्पकला में राजपूत प्रशासन का प्रभाव हमें शक्ति और भक्ति के विविध पक्षों द्वारा प्राप्त होता है। जयपुर ज़िले में स्थित आभानेरी का मन्दिर (हर्षत माता का मंदिर), जोधपुर में ओसिया का सच्चियां माता का मन्दिर, जोधपुर संभाग में किराडू का मंदिर, इत्यादि और भिन्न प्रांतों के प्राचीन मंदिर कला के विविध स्वरों की अभिव्यक्ति संलग्न राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले स्थापत्य के नमूने हैं। उल्लेखित युग में निर्मित चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथंभोर, गागरोन, अचलगढ़, गढ़ बिरली (अजमेर का तारागढ़) जालोर, जोधपुर आदि के दुर्ग-स्थापत्य कला में राजपूत स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। सुरक्षा प्रेरित शिल्पकला इन दुर्गों की विशेषता कही जा सकती है जिसका प्रभाव इनमें स्थित मन्दिर शिल्प-मूर्ति लक्षण एवं भवन निर्माण में आसानी से परिलक्षित है। &lt;br /&gt;
====मुद्रा कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान के प्राचीन प्रदेश मेवाड़ में मज्झमिका (मध्यमिका) नामधारी चित्तौड़ के पास स्थित नगरी से प्राप्त ताम्रमुद्रा इस क्षेत्र को शिविजनपद घोषित करती है। तत्पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी की स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई। जनरल [[कनिंघम]] को [[आगरा]] में मेवाड़ के संस्थापक शासक गुहिल के सिक्के प्राप्त हुए तत्पश्चात ऐसे ही सिक्के औझाजी को भी मिले। इसके उर्ध्वपटल तथा अधोवट के चित्रण से मेवाड़ राजवंश के शैवधर्म के प्रति आस्था का पता चलता है। राणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) सिक्कों में ताम्र मुद्राएं तथा रजत मुद्रा का उल्लेख जनरल कनिंघम ने किया है। इन पर उत्कीर्ण विक्रम सम्वत् 1510, 1512, 1523 आदि तिथियों 'श्री कुभंलमेरु महाराणा श्री कुभंकर्णस्य', 'श्री एकलिंगस्य प्रसादात' और 'श्री' के वाक्यों सहित भाले और डमरु का बिन्दु चिन्ह बना हुआ है। यह सिक्के वर्गाकृति के जिन्हें 'टका' पुकारा जाता था। यह प्रभाव सल्तनत कालीन मुद्रा व्यवस्था को प्रकट करता है जो कि मेवाड़ में राणा सांगा तक प्रचलित रही थी। सांगा के पश्चात् शनै: शनै: मुग़लकालीन मुद्रा की छाया हमें मेवाड़ और राजस्थान के तत्कालीन अन्यत्र राज्यों में दिखलाई देती है। सांगा कालीन (1509-1528 ई.) प्राप्त तीन मुद्राएं ताम्र तथा तीन पीतल की है। इनके उर्ध्वपटल पर नागरी अभिलेख तथा नागरी अंकों में तिथि तथा अधोपटल पर 'सुल्तान विन सुल्तान' का अभिलेख उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। प्रतीक चिन्हों में [[स्वास्तिक]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] और [[चन्द्र देवता|चन्द्र]] प्रदर्शित किये गए हैं। इस प्रकार सांगा के उत्तराधिकारियों राणा रत्नसिंह द्वितीय, राणा विक्रमादित्य, बनवीर आदि की मुद्राओं के संलग्न मुग़ल-मुद्राओं का प्रचलन भी मेवाड़ में रहा था जो टका, रुप्य आदि कहलाती थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परवर्ती काल में आलमशाही, मेहताशाही, चांदोडी, स्वरुपशाही, भूपालशाही, उदयपुरी, चित्तौड़ी, भीलवाड़ी त्रिशूलिया, फींतरा आदि कई मुद्राएं भिन्न-भिन्न समय में प्रचलित रहीं वहां सामन्तों की मुद्रा में भीण्डरीया पैसा एवं सलूम्बर का ठींगला व पदमशाही नामक ताम्बे का सिक्का जागीर क्षेत्र में चलता था। ब्रिटीश सरकार का 'कलदार' भी व्यापार-वाणिज्य में प्रयुक्त किया जाता रहा था। जोधपुर अथवा [[मारवाड़]] प्रदेश के अन्तर्गत प्राचीनकाल में 'पंचमार्क' मुद्राओं का प्रचलन रहा था। ईसा की दूसरी शताब्दी में यहाँ बाहर से आए क्षत्रपों की मुद्रा 'द्रम' का प्रचलन हुआ जो लगभग सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक आधार के साधन-रुप में प्रतिष्ठित हो गई। [[बाँसवाड़ा]] ज़िले के सरवानियां गाँव से 1911 ई. में प्राप्त वीर दामन की मुद्राएं इसका प्रमाण हैं। प्रतिहार तथा चौहान शासकों के सिक्कों के अलावा मारवाड़ में 'फदका' या 'फदिया' मुद्राओं का उल्लेख भी हमें प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान के अन्य प्राचीन राज्यों में जो सिक्के प्राप्त होते हैं वह सभी उत्तर मुग़लकाल या उसके पश्चात् स्थानीय शासकों द्वारा अपने-अपने नाम से प्रचलित कराए हुए मिलते हैं। इनमें जयपुर अथवा ढुंढ़ाड़ प्रदेश में झाड़शाही रामशाही मुहर मुग़ल बादशाह के के नाम वाले सिक्को में मुम्मदशाही, [[प्रतापगढ़]] के सलीमशाही बांसवाड़ा के लछमनशाही, बून्दी का हाली, कटारशाही, झालावाड़ का मदनशाही, जैसलमैर में अकेशाही व ताम्र मुद्रा - 'डोडिया' अलवर का रावशाही आदि मुख्य कहे जा सकते हैं। मुद्राओं को ढ़ालने वाली टकसालों तथा उनके ठप्पों का भी अध्ययन अपेक्षित है। इनसे तत्कालीन मुद्रा-विज्ञान पर वृहत प्रकाश डाला जा सकता है। मुद्राओं पर उल्लेखित विवरणों द्वारा हमें सत्ता के क्षेत्र विस्तार, शासकों के तिथिक्रम ही नहीं मिलते वरन् इनसे राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन भी किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
====मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान में काले, सफेद, भूरे तथा हल्के सलेटी, हरे, गुलाबी पत्थर से बनी मूर्तियों के अतिरिक्त पीतल या धातु की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। गंगा नगर ज़िले के कालीबंगा तथा उदयपुर के निकट आहड़-सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी से बनाई हुई खिलौनाकृति की मूर्तियां भी मिलती हैं। किन्तु आदिकाल से शास्रोक्य मूर्ति कला की दृष्टि से ईसा पूर्व पहली से दूसरी शताब्दी के मध्य निर्मित जयपुर के लालसोट नाम स्थान पर 'बनजारे की छतरी' नाम से प्रसिद्ध चार वेदिका स्तम्भ मूर्तियों का लक्षण द्रष्टत्य है। पदमक के धर्मचक्र, मृग, मत्स, आदि के अंकन मरहुत तथा अमरावती की कला के समानुरुप हैं। राजस्थान में गुप्त शासकों के प्रभावस्वरुप गुप्त शैली में निर्मित मूर्तियों, [[आभानेरी]], कामवन तथा कोटा में कई स्थलों पर उपलब्ध हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुप्तोतर काल के पश्चात् राजस्थान में सौराष्ट्र शैली, महागुर्जन शैली एवं महामास शैली का उदय एवं प्रभाव परिलक्षित होता है जिसमें महामास शैली केवल राजस्थान तक ही सीमित रही। इस शैली को मेवाड़ के गुहिल शासकों, जालौर व मण्डोर के प्रतिहार शासकों और शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों को संरक्षण प्रदान कर आठवीं से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक इसे विकसित किया। 15वीं शताब्दी राजस्थान में मूर्तिकला के विकास का स्वर्णकाल था जिसका प्रतीक विजय स्तम्भ (चित्तौड़) की मूर्तियाँ है। सोलहवीं शताब्दी का प्रतिमा शिल्प प्रदर्शन जगदीश मंदिर उदयपुर में देखा जा सकता है। यद्यपि इसके पश्चात् भी मूर्तियाँ बनी किंतु उस शिल्प वैचिञ्य कुछ भी नहीं है किंतु अठाहरवीं शताब्दी के बाद परम्परावादी शिल्प में पाश्चात्य शैली के लक्षण हमें दिखलाई देने लगते हैं। इसके फलस्वरुप मानव मूर्ति का शिल्प का प्रादूर्भाव राजस्थान में हुआ।&lt;br /&gt;
====धातु मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
धातु मूर्ति कला को भी राजस्थान में प्रयाप्त प्रश्रय मिला। पूर्व मध्य, मध्य तथा उत्तरमध्य काल में जैन मूर्तियों का यहाँ बहुतायत में निर्माण हुआ। सिरोही ज़िले में वसूतगढ़ पिण्डवाड़ा नामक स्थान पर कई धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जिसमें शारदा की मूर्ति शिल्प की दृष्टि से द्रस्टव्य है। भरतपुर, जैसलमेर, उदयपुर के ज़िले इस तरह के उदाहरण से परिपूर्ण है। अठाहरवीं शताब्दी से मूर्तिकला ने शनै: शनै: एक उद्योग का रुप लेना शुरु कर दिया था। अत: इनमें कलात्मक शैलियों के स्थान पर व्यवसायिकृत स्वरुप झलकने लगा। इसी काल में चित्रकला के प्रति लोगों का रुझान दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
राजस्थान में यों तो अति प्राचीन काल से चित्रकला के प्रति लोगों में रुचि रही थी। मुकन्दरा की पहाड़ियों व अरावली पर्वत श्रेणियों में कुछ शैल चित्रों की खोज इसका प्रमाण है। कोटा के दक्षिण में चम्बल के किनारे, माधोपुर की चट्टानों से, आलनिया नदी से प्राप्त शैल चित्रों का जो ब्योरा मिलता है उससे लगता है कि यह चित्र बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा वातावरण प्रभावित, स्वाभाविक इच्छा से बनाए गए थे। इनमें मानव एवं जावनरों की आकृतियों का आधिक्य है। कुछ चित्र शिकार के कुछ यन्त्र-तन्त्र के रुप में ज्यामितिक आकार के लिए पूजा और टोना टोटका की दृष्टि से अंकित हैं। कोटा के जलवाड़ा गाँव के पास विलास नदी के कन्या दाह ताल से बैला, हाथी, घोड़ा सहित घुड़सवार एवं हाथी सवार के चित्र मिलें हैं। यह चित्र उस आदिम परम्परा को प्रकट करते हैं आज भी राजस्थान में 'मांडला' नामक लोक कला के रुप में घर की दीवारों तथा आंगन में बने हुए देखे जा सकते हैं। इस प्रकार इनमें आदिम लोक कला के दर्शन सहित तत्कालीन मानव की आन्तरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति सहज प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालीबंगा और आहड़ की खुदाई से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों पर किया गया अलंकरण भी प्राचीनतम मानव की लोक कला का परिचय प्रदान करता है। ज्यामितिक आकारों में चौकोर, गोल, जालीदाल, घुमावदार, त्रिकोण तथा समानान्तर रेखाओं के अतिरिक्त काली व सफेद रेखाओं से फूल-पत्ती, पक्षी, खजूर, चौपड़ आदि का चित्रण बर्तनों पर पाया जाता है। उत्खनित-सभ्यता के पश्चात् मिट्टी पर किए जाने वाले लोक अलंकरण कुम्भकारों की कला में निरंतर प्राप्त होते रहते हैं किन्तु चित्रकला का चिन्ह ग्याहरवी शदी के पूर्व नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;
सर्वप्रथम वि.सं. 1117/1080 ई. के दो सचित्र ग्रंथ जैसलमेर के जैन भण्डार से प्राप्त होते हैं।  औघनिर्युक्ति और दसवैकालिक सूत्रचूर्णी नामक यह हस्तलिखित ग्रन्थ जैन दर्शन से सम्बन्धित है। इसी प्रकार ताड़ एवं भोज पत्र के ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए बनाये गए लकड़ी के पुस्तक आवरण पर की गई चित्रकारी भी हमें तत्कालीन काल के दृष्टान्त प्रदान करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी तक निर्मित ऐसी कई चित्र पट्टिकाएं हमें राजस्थान के जैन भण्डारों में उपलब्ध हैं। इन पर जैन साधुओं, वनस्पति, पशु-पक्षी, आदि चित्रित हैं। अजमेर, पाली तथा आबू ऐसे चित्रकारों के मुख्य केन्द्र थे। तत्पशात् आहड़ एवं चित्तौड़ में भी इस प्रकार के सचित्र ग्रंथ बनने आरम्भ हुए। 1260-1317 ई. में लिखा गया 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि' नामक ग्रन्थ मेवाड़ शैली (आहड़) का प्रथम उपलब्ध चिन्ह है, जिसके द्वारा राजस्थानी कला के विकास का अध्ययन कर सकते हैं। ग्याहरवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी तक के उपलब्ध सचित्र ग्रंथों में निशिथचूर्णि, त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र, नेमिनाथ चरित्र, कला सरित्सागर, कल्पसूत्र (1483/1426 ई.) कालक कथा, सुपासनाचरियम् (1485-1428 ई.) रसिकाष्टक (1435/1492 ई.) तथा गीत गोविन्द आदि हैं। 15वीं शदी तक मेवाड़ शैली की विशेषता में सवाचश्म्, गरुड़ नासिका, परवल की खड़ी फांक से नेत्र, घुमावदार व लम्बी उंगलियां, गुड्डिकार जनसमुदाय, चेहरों पर जकड़न, अलंकरण बाहुल्य, लाल-पीले रंग का अधिक प्रयोग कहे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेवाड़ के अनुरुप मारवाड़ में भी चित्रकला की परम्परा प्राचीन काल से पनपती रही थी। किंतु महाराणा मोकल से राणा सांगा (1421-1528 ई.) तक मेवाड़-मारवाड़ कला के राजनीतिक प्रभाव के फलस्वरुप साम्य दिखलाई होता है। राव मालदेव (1531-1462 ई.) ने पुन: मारवाड़ शैली को प्रश्य प्रदान कर चित्रकारों को इस ओर प्रेरित किया। इस शैली का उदाहरण 1591 ई. में चित्रित ग्रन्थ उत्तराध्ययन सूत्र है। मारवाड़ शैली के भित्तिचित्रों मे जोधपुर के चोखेला महल को छतों के अन्दर बने चित्र दृष्टव्य हैं। राजस्थान में मुग़ल प्रभाव के परिणाम स्वरुप सत्रहवीं शती से मुग़ल शैली और राजस्थान की परम्परागत राजपूत शैली के समन्वय ने कई प्रांतीय शेलियों को जन्म दिया, इनमें मेवाड़ और मारवाड़ के अतिरिक्त [[बूंदी]], [[कोटा]], [[जैसलमेर]], [[बीकानेर]], [[जयपुर]], [[किशनगढ़]] और [[नाथद्वारा]] शैली मुख्य है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
मुग़ल प्रभाव के फलत: चित्रों के विषय अन्त:पुर की रंगरेलियाँ, स्रियों के स्नान, होली के खेल, शिकार, बाग-बगीचे, घुड़सवारी, हाथी की सवारी आदि रहे। किन्तु इतिहास के पूरक स्रोत की दृष्चि से इनमें चित्रित समाज का अंकन एवं घटनाओं का चित्रण हमें सत्रहवीं से अठारहवी शताब्दी के अवलोकन की विस्तृत सामग्री प्रदान करता है। उदाहरणत: मारवाड़ शैली में उपलब्ध 'पंचतंत्र' तथा 'शुकनासिक चरित्र' में कुम्हार, धोबी, नाई, मजदूर, चिड़ीमार, लकड़हारा, भिश्ती, सुनार, सौदागर, पनिहारी, ग्वाला, माली, किसान आदि से सम्बन्धित जीवन-वृत का चित्रण मिलता है। किशनगढ़ शैली में [[राधा]] [[कृष्ण]] की प्रेमाभिव्यक्ति के चित्रण मिलते हैं। इस क्रम में बनीठनी का एकल चित्र प्रसिद्ध है। किशनगढ़ शैली में कद व चेहरा लम्बा नाक नुकीली बनाई जाती रही वही विस्तृत चित्रों में दरबारी जीवन की झाँकियों का समावेश भी दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुग़ल शैली का अधिकतम प्रभाव हमें जयपुर तथा अलवर के चित्रों में मिलता है। बारामासा, राग माला, भागवत आदि के चित्र इसके उदाहरण हैं। 1671 ई. से मेवाड़ में पुष्टि मार्ग से प्रभावित श्रीनाथ जी के धर्म स्थल नाथद्वारा की कलम का अलग महत्व है। यद्यपि यहाँ के चित्रों का विषय कृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित रहा है फिर भी जन-जीवन की अभिक्रियाओं का चित्रण भी हमें इनमें सहज दिख जाता  है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश प्रभाव के फलत: राजस्थान में पोट्रेट भी बनने शुरु हुए। यह पोट्रेट तत्कालीन रहन-सहन को अभिव्यक्त करने में इतिहास के अच्छे साधन हैं। चित्रकला के अन्तर्गत भित्ति चित्रों का आधिक्य हमें अठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से दिखलाई देता है, किन्तु इसके पूर्व भी मन्दिरों और राज प्रासादों में ऐसे चित्रांकन की परम्परा विद्यमान थी। चित्तौड़ के प्राचीन महलों में ऐसे भित्ति चित्र उपलब्ध हैं जो सौलहवीं सदी में बनाए गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्रहवीं शताब्दी के चित्रणों में मोजमाबाद (जयपुर), उदयपुर के महलों तथा अम्बामाता के मंदिर, नाडोल के जैन मंदिर, आमेर (जयपुर) के निकट मावदूमशाह की क़ब्र के मुख्य गुम्बद के चित्र, जूनागढ़ (बीकानेर), मारोठ के मान मन्दिर गिने जा सकते हैं। अठाहरवीं शताब्दी के चित्रणों में कृष्ण विलास (उदयपुर) आमेर महल की भोजनशाला, ग़लता के महल, पुण्डरीक जी की हवेली (जयपुर) सूरजमल की छतरी (भरतपुर), झालिम सिंह की हवेली (कोटा) और मोती महल (नाथद्वारा) के भित्ति चित्र मुख्य हैं। यह चित्र आलागीला पद्धति या टेम्परा से बनाए गए थे। शेख़ावटी, जैसलमेर एवं बीकानेर की हवेलियों में इस प्रकार के भित्ति चित्र अध्ययनार्थ अभी भी देखे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कपड़ो पर की जाने वाली कला में छपाई की चित्रकारी भी कला के इतिहास सहित इतिहास के अन्य अंगों पर प्रकाश डालने में समर्थ हो सकती है। यद्यपि वस्र रंगाई, छपाई, तथा कढ़ाई चित्रकला से प्रत्यक्ष सम्बन्धित नहीं हैं, किन्तु काल विशेष में अपनाई जाने वाली इस तकनीक, विद्या का अध्ययन कलागत तकनीकी इतिहास की उपादेय सामग्री बन सकती है। चाँदी और सोने की जरी का काम किए वस्र शामियाने, हाथी, घोड़े तथा बैल की झूले आदि इस अध्ययन के साधन हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====धातु एवं काष्ठ कला====&lt;br /&gt;
इसके अन्तर्गत तोप, बन्दूक, तलवार, म्यान, छुरी, कटारी, आदि अस्र-शस्र भी इतिहास के स्रोत हैं। इनकी बनावट इन पर की गई खुदाई की कला के साथ-साथ इन पर प्राप्त सन् एवं अभिलेख हमें राजनीतिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी ही तोप का उदाहरण हमें जोधपुर दुर्ग में देखने को मिला जबकि राजस्थान के संग्रहालयों में अभिलेख वाली कई तलवारें प्रदर्शनार्थ भी रखी हुई हैं। पालकी, काठियाँ, बैलगाड़ी, रथ, लकड़ी की टेबल, कुर्सियाँ, कलमदान, सन्दूक आदि भी मनुष्य की अभिवृत्तियों का दिग्दर्शन कराने के साथ तत्कालीन कलाकारों के श्रम और दशाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने में हमारे लिए महत्वपूर्ण स्रोत सामग्री है।&lt;br /&gt;
====लोककला====&lt;br /&gt;
अन्तत: लोककला के अन्तर्गत वाद्य यंत्र, लोक संगीत और नाट्य का हवाला देना भी आवश्यक है। यह सभी सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहरें हैं जो इतिहास का अमूल्य अंग हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राजस्थान में लोगों का मनोरंजन का साधन लोक नाट्य व नृत्य रहे थे। रास-लीला जैसे नाट्यों के अतिरिक्त प्रदेश में ख्याल, रम्मत, रासधारी, नृत्य, भवाई, ढाला-मारु, तुर्रा-कलंगी या माच तथा आदिवासी गवरी या गौरी नृत्य नाट्य, घूमर, अग्नि नृत्य, कोटा का चकरी नृत्य, डीडवाणा पोकरण के तेराताली नृत्य, मारवाड़ की कच्ची घोड़ी का नृत्य, पाबूजी की फड़ तथा कठपुतली प्रदर्शन के नाम उल्लेखनीय हैं। पाबूजी की फड़ चित्रांकित पर्दे के सहारे प्रदर्शनात्मक विधि द्वारा गाया जाने वाला गेय-नाट्य है। लोक बादणें में नगाड़ा ढ़ोल-ढ़ोलक, मादल, रावण हत्था, पूंगी, बसली, सारंगी, तदूरा, तासा, थाली, झाँझ पत्तर तथा खड़ताल आदि हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{राजस्थान प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राज्य_और_केन्द्र_शासित_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8&amp;diff=31020</id>
		<title>कोकिलावन</title>
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		<updated>2010-05-20T14:50:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'विरूद्ध ' to 'विरुद्ध '&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
'''कोकिलावन / कोलवन / Kokilavan]] / Kolvan'''&lt;br /&gt;
{{Tocright}}&lt;br /&gt;
[[नन्दगाँव|नन्दगांव]] से तीन मील उत्तर और [[जावट ग्राम]] से एक मील पश्चिम में कोकिलावन स्थित है। यहाँ अभी भी इस सुरक्षित रमणीय वन में मयूर-मयूरी, शुक-सारी, हंस-सारस आदि विविध प्रकार के पक्षी मधुर स्वर से कलरव करते रहते हैं तथा हिरण, नीलगाय आदि पशु भी विचरते हैं। ब्रजवासी लोग झुण्ड के झुण्ड में अपनी गायों को चराते हैं। विशेषत: इस वन में सैकड़ो कोकिलें मीठे स्वर से कुहू-कुहू शब्द के द्वारा वन प्रान्त को गुंजार कर देती हैं। [[ब्रज]] के अधिकांश वन नष्ट हो जाने पर भी यह वन कुछ सुरक्षित है। इस वन की प्रदक्षिणा पौने दो कोस की है। ब्रजभूक्ति विलास के अनुसार कोकिलावन में रत्नाकर सरोवर और रासमण्डल अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रसंग'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक समय महाकौतुकी श्रीकृष्ण राधिकाजी से मिलने के लिए बड़े उत्कण्ठित थे, किन्तु सास जटिला, ननद कुटिला और पति अभिमन्यु की बाधा के कारण वे इस संकेत स्थल पर नहीं आ सके। बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के पश्चात कृष्ण वहाँ किसी ऊँचे वृक्ष पर चढ़ गये और कोयल के समान बारम्बार मधुर रूप से कुहकने लगे। इस अद्भुत कोकिल के मधुर और ऊँचे स्वर को सुनकर सखियां के साथ राधिका कृष्ण के संकेत को समझ गयीं और उनसे मिलने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो उठीं। उस समय जटिला ने विशाखा को सम्बोधित करते हुए कहा- विशाखे! मैंने कोकिलों की मधुर कूक बहुत सुनी है, किन्तु आज तो यह कोयल अद्भुत कोयल है। यदि आदेश हो तो हम इस निराली कोकिल को देख आएँ । वृद्धा ने प्रसन्न होकर उन्हें जाने का आदेश दे दिया। सखियाँ बड़ी प्रसन्न हुईं और इस कोकिलवन में प्रवेश किया तथा यहाँ श्रीकृष्ण से मिलकर बड़ी प्रसन्न हुई। इसलिए इसे कोकिला वन कहते हैं। भक्तिरत्नाकर में इसका बड़ा ही सरस वर्णन है&amp;lt;ref&amp;gt;जावटेर पश्चिमे ए वन मनोहर ।&lt;br /&gt;
लक्ष-लक्ष कोकिल कूहरे निरन्तर ।।&lt;br /&gt;
एकदिन कृष्ण एई वनेते आसिया । &lt;br /&gt;
कोकिल-सदृश शब्द करे हर्ष हईया ।।&lt;br /&gt;
सकल कोकिल हईते शब्द सुमधुर ।&lt;br /&gt;
ये सुने बारेक तार धैर्य जाय दूर ।।&lt;br /&gt;
जटिला कहये विशाखारे प्रियवाणी ।&lt;br /&gt;
कोकिलेर शब्द ऐछे कभु नाहि शुनि ।।&lt;br /&gt;
विशाखा कहये-एई मो सभार मने ।&lt;br /&gt;
 यदि कह ए कोकिले देखि गिया वने ।।&lt;br /&gt;
वृद्धा कहे-जाओ ! शुनि उल्लास अशेष ।&lt;br /&gt;
राई सखीसह वने करिला प्रवेश ।।&lt;br /&gt;
हईल महाकौतुक सुखेर सीमा नाई ।&lt;br /&gt;
सकलेई आसिया मिलिला एक ठाँई ।।&lt;br /&gt;
कोकिलेर शब्दे कृष्ण मिले राधिकारे ।&lt;br /&gt;
ए हेतु 'कोकिलावन' कहये इहारे ।।(भक्तिरत्नाकर)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==रत्नाकर कुण्ड==&lt;br /&gt;
सखियों ने अपने-अपने घरों से दूध लाकर इस सरोवर को प्रकट किया था। इस सरोवर से नाना प्रकार के रत्न निकलते थे, जिससे सखियाँ राधिका जी का श्रृंगार करती थीं।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;सख्या: क्षीरसमुद्भुत रत्नाकरसरोवरे। नाना प्रकाररत्नानामुद्भवे वरदे नम: ।। नारद पंचरात्र&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; समस्त पापों को क्षय करने वाला तथा धन-धान्य प्रदान करने वाला यह सरोवर भक्तो को श्रीराधाकृष्ण युगल की अहैतुकी भक्ति रूप महारत्न प्रदान करने वाला है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रास मण्डल==&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण ने यहाँ [[गोपी|गोपियों]] के साथ [[रासलीला]] सम्पन्न की थी तथा रास की समाप्ति के पश्चात इस कुण्ड में परस्पर जल सिञ्चन आदि क्रीड़ाएँ की थीं । &lt;br /&gt;
==आँजनौक==&lt;br /&gt;
यह [[अष्टसखी|अष्टसखियों]] में से एक विख्यात श्रीविशाखा सखी का निवास-स्थान है। इनके पिता का नाम श्रीपावनगोप और माता का नाम देवदानी गोपी है।&amp;lt;ref&amp;gt;अञ्जपुरे समाख्याते सुभानुर्गोप: संस्थित:। देवदानीति विख्याता गोपिनी निमिषसुना। तयो: सुता समुत्पन्ना विशाखा नाम विश्रुता ।। &amp;lt;/ref&amp;gt; नन्दगाँव से पाँच मील पूर्व–दक्षिण कोण में यह अवस्थित है। यहाँ कौतुकी [[कृष्ण]] ने अपनी प्राणवल्लभा श्री [[राधा]] जी के नेत्रों में अञ्जन लगाया था। इसलिए यह लीला-स्थली आँजनौक नाम से प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रसंग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक समय राधिका ललिता-विशाखादि सखियों के साथ किसी निर्जन कुञ्ज में बैठकर सखियों के द्वारा वेश-भूषा धारणकर रही थीं। सखियों ने नाना प्रकार के अलंकारों एवं आभूषणों से उन्हें अलंकृत किया। केवल नेत्रों में अञ्जन लगाने जा रही थीं कि उसी समय अचानक कृष्ण ने मधुर बंशी बजाई। कृष्ण की बंशी ध्वनि सुनते ही राधिका उन्मत्त होकर बिना अञ्जन लगाये ही प्राणवल्लभ से मिलने के लिए परम उत्कण्ठित होकर चल दीं। कृष्ण भी उनकी उत्कण्ठा से प्रतीक्षा कर रहे थे। जब वे प्रियतम से मिलीं तो कृष्ण उन्हें पुष्प आसन पर बिठाकर तथा उनके गले में हाथ डालकर सतृष्ण नेत्रों से उनके अंग-प्रत्यंग की शोभा का निरीक्षण करने लगे। परन्तु उनके नेत्रों में अञ्जन न देखकर सखियों से इसका कारण पूछा। सखियों ने उत्तर दिया कि हम लोग इनका श्रृंगार कर रही थीं। प्राय: सभी श्रृंगार हो चुका था, केवल नेत्रों में अञ्जन लगाना बाक़ी था, किन्तु इसी बीच आपकी वंशी की मधुर ध्वनि सुनकर आप से मिलने के लिए अनुरोध करने पर भी बिना एक क्षण रूके चल पड़ीं, ऐसा सुनकर कृष्ण रसावेश में आकर स्वयं अपने हाथों से उनके नेत्रों में अञ्जन लगाकर दर्पण के द्वारा उनकी रूप माधुरी का उनको आस्वादन कराकर स्वयं भी आस्वादन करने लगे। इस लीला के कारण इस स्थान का नाम आँजनौक है यहाँ रासमण्डल है, जहाँ रासलीला हुई थी। गाँव के दक्षिण में किशोरी कुण्ड है। कुण्ड के पश्चिम तट पर अञ्जनी शिला है, जहाँ श्रीकृष्ण ने श्रीराधाजी को बैठाकर अञ्जन लगाया था।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रसेर आवेशे कृष्ण अञ्जन लईया । दिलेन राधिका नेत्रे महा हर्ष हईया &amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बिजवारी==&lt;br /&gt;
नन्दगाँव से डेढ़ मील दक्षिण-पूर्व तथा खायरो गाँव से एक मील दक्षिण में यह गाँव स्थित है । इस स्थान का वर्तमान नाम बिजवारी है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रसंग'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब [[अक्रूर]]जी श्री[[बलराम|राम]] और [[कृष्ण]] दोनों भाईयों को [[मथुरा]] ले जा रहे थे, तब यहीं पर दोनों भाई रथ पर बैठे। उनके विरह में गोपियाँ व्याकुल होकर एक ही साथ हे प्राणनाथ! ऐसा कहकर मूर्छित होकर भूतल पर गिर गई । उस समय सबको ऐसा प्रतीत हुआ, मानो आकाश से विद्युतपुञ्ज गिर रहा हो। विद्युतपुञ्ज का अपभ्रंश शब्द बिजवारी है अक्रूरजी दोनों भाईयों को लेकर बिजवारी से पिसाई, साहार तथा [[जैंत]] आदि गाँवों से होकर [[अक्रूर घाट]] पहुँचे और वहाँ स्नानकर मथुरा पहुँचे थे। बिजवारी और नन्दगाँव के बीच में अक्रूर—स्थान है, जहाँ शिलाखण्ड के ऊपर श्रीकृष्ण के चरण चिह्न हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परसों (पलसों)==&lt;br /&gt;
रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण ने गोपियों की विरह दशा से व्याकुल होकर उनको यह संदेश भेजा कि मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि परसों यहाँ अवश्य ही लौट आऊँगा। तब से इस गाँव का नाम परसों हो गया। [[गोवर्धन]]-[[बरसाना|बरसाने]] के रास्ते में यह गाँव स्थित है। सी और परसों दोनों गाँव पास-पास में हैं। 'शीघ्र ही आऊँगा' बार-बार कहा था। इस शीघ्र शब्द से ही इस लीला-स्थली का नाम 'सी' पड़ा है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मथुरा हईते शीघ्र करिब गमन।&lt;br /&gt;
एई हेतु शीघ्र सी, कहये सर्वजन ।। भक्तिरत्नाकर &amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कामई==&lt;br /&gt;
यह अष्टसखियों में प्रमुख सखी विशाखाजी का जन्मस्थान है। यह गाँव बरसाना से पाँच मील तथा उमराव गाँव से साढ़े चार मील दक्षिण-पश्चिम में अवस्थित है। कामई के दक्षिण में सी और परसों गाँव हैं। करेहला ललिताजी का जन्मस्थान है। &lt;br /&gt;
==करेहला==&lt;br /&gt;
यह ललिताजी का जन्मस्थान है। करहाला गोपी के पुत्र गोवर्धन मल्ल अपनी पत्नी चन्द्रावली के साथ यहाँ कभी-कभी रहता था। कभी-कभी सखीथरा (सखी-स्थली गोवर्धन के निकट) में रहता था। चन्द्रावली के पिता का नाम चन्द्रभानु गोप और माता का नाम इन्दुमती गोपी था। चन्द्रावली जी राधिका की ज्येष्ठी बहन हैं। [[वृषभानु]] महाराज पाँच भाई थे।- वृषभानु, चन्द्रभानु रत्नभानु, सुभानु और श्रीभानु। वृषभानुजी सबसे बड़े थे। राधिका इन्हीं वृषभानुजी की कन्या होने के कारण राधिका और चन्द्रावली दोनों बहनें लगतीं थीं। पद्मा आदि यूथेश्वरियाँ इस स्थान पर रहकर चन्द्रावली से कृष्ण का मिलन कराने के लिए प्रयत्न करती थीं। यहाँ कंकण कुण्ड, कदम्ब खण्डी, झूला, श्रीवल्लभाचार्य, श्रीविट्ठलेश तथा श्रीगोकुलनाथजी की बैठकें है। यह स्थान कामई से एक मील उत्तर में हैं। भाद्रपूर्णिमा तिथि में बूढ़ीलीला प्रसंग में यहाँ [[रासलीला]] होती है। &lt;br /&gt;
==लुधौली==&lt;br /&gt;
यह पीसाई गाँव से आधा मील पश्चिम में है। यहाँ पर ललिताजी ने श्रीराधा कृष्ण दोनों का मिलन कराया था। दोनों परस्पर मिलकर यहाँ अत्यन्त लुब्ध हो गये थे। लुब्ध होने के कारण इस स्थान का नाम लुधौली पड़ा। गाँव के बाहर उत्तर में ललिताकुण्ड है, जहाँ दोनों का मिलन हुआ था। कुण्ड के पूर्वी तट पर ललितबिहारी जी का दर्शन है। &lt;br /&gt;
==पीसाई==&lt;br /&gt;
गोचारण के समय कृष्ण को प्यास लगने पर बलदेव जी ने जल लाकर उनको पिलाया था इसीलिए इस गाँव का नाम प्यासाई अर्थात प्यास आई पड़ा है। यहाँ तृष्णा कुण्ड और विशाखा कुण्ड हैं। गाँव के पास ही उत्तर-पश्चिम में मनोहर कदम्ब खण्डी हैं। यह गाँव करेहला से डेढ़ मील उत्तर में स्थित है। &lt;br /&gt;
==सहार==&lt;br /&gt;
यह नन्दजी के सबसे बड़े भाई उपानन्द जी का निवास स्थान है। ये परम बुद्धिमान और सब प्रकार से महाराज नन्द के परामर्शदाता थे। ये नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। इन्हीं उपानन्द के पुत्र सुभद्र थे, जिन्हें श्रीकृष्ण अपने सहोदर ज्येष्ठ भ्राता के समान आदर करते थे। सुभद्रा सखा ज्योतिष आदि समस्त कलाओं में पारदर्शी और कृष्ण के प्रति अत्यन्त स्नेहशील थे। ये गोचारण के समय सब प्रकार की विपदाओं से कृष्ण की रक्षा करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते थे। इन्हीं सुभद्र की पत्नी का नाम कुन्दलता है। कृष्ण उनके जीवन सर्वस्य थे। ये बड़ी परिहासप्रिया थीं तथा राधाकृष्ण का परस्पर मिलन कराने में अत्यन्त पटु थीं। यशोदा  के आदेश से ये श्रीमती राधिका को जावट से रंधन कार्य के लिए अपने साथ लाती थीं। &lt;br /&gt;
==साँखी==&lt;br /&gt;
यह लीलास्थान नरी से एक मील पश्चिम तथा सहार से दो मील उत्तर में है। यहीं पर श्रीकृष्ण ने शंखचूड़ा का बधकर उसके मस्तक से मणि निकाल कर श्रीबलदेवजी को दी थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रसंग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन गोवर्धन की तलहटी में राधाकुण्ड के निकट सखा मण्डली के साथ कृष्ण तथा सखीमण्डली के साथ राधाजी परस्पर रंगीली होली खेलने में व्यस्त थीं। उसी समय शंखचूड़ नामक असुर गोपियों के पकड़कर ले भागा। श्रीकृष्ण और बलदेव ने शाल के वृक्षों को हाथ में लेकर उसे मारने के लिए पीछा किया। इन दोनों का प्रचण्ड वेग से आते हुए देखकर वह गोपियों को छोड़कर अकेले ही बड़े वेग से भागा, किन्तु कृष्ण ने दाऊ भैया को गोपियों की रक्षा के लिए वहाँ रखकर अकेले ही उसका पीछा किया तथा यहाँ आने पर शंखचूड़ का बंध कर उसके मस्तक से मणि निकाल ली। उन्होंने वह मणि बलदेवजी को दे दी। बलदेवजी ने उस मणि को धनिष्ठा के माध्यम से राधिका के पास भिजवा दिया। राधिकाजी ने उसे बड़े आदर के साथ ग्रहण कर लिया। इसके पास ही रामकुण्ड है। जिसको रामतला भी कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छत्रवन(छाता)==&lt;br /&gt;
[[मथुरा]] [[दिल्ली]] राजमार्ग पर मथुरा से लगभग 20 मील उत्तर-पश्चिम तथा पयगाँव से चार मील दक्षिण-पश्चिम में अवस्थित है। छत्रवन का वर्तमान नाम छाता है। गाँव के उत्तर-पूर्व कोने में सूर्यकुण्ड, दक्षिण-पश्चिम कोण में चन्द्रकुण्ड स्थित है। चन्द्रकुण्ड के तट पर [[दाऊजी का मन्दिर]] विराजमान है। यहीं पर श्रीदाम आदि सखाओं ने श्रीकृष्ण को सिंहासन पर बैठाकर [[ब्रज]] का छत्रपति महाराजा बनाकर एक अभूतपूर्व लीला अभिनय का कौतुक रचा था। श्रीबलरामजी कृष्ण के बाएं बैठकर मन्त्री का कार्य करने लगे। श्रीदाम ने कृष्ण के सिर के ऊपर छत्र धारण किया, अर्जुन चामर ढुलाने लगे, मधुमंगल सामने बैठकर विदूषक का कार्य करने लगे, सुबल ताम्बूल बीटिका देने लगे तथा सुबाहु और विशाल आदि कुछ सखा प्रजा का अभिनय करने लगे। छत्रपति महाराज कृष्ण ने मधुमंगल के माध्यम से सर्वत्र घोषणा करवा दी कि-महाराज छत्रपति नन्दकुमार- यहाँ के एकछत्र राजा हैं। यहाँ अन्य किसी का अधिकार नहीं हैं। गोपियाँ प्रतिदिन मेरे इस बाग को नष्ट करती हैं, अत: वे सभी दण्डनीय हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने सखाओं के साथ यह अभिनय लीला कौतुकी क्रीड़ा की थी। इसलिए इस गाँव का नाम छत्रवन या छाता हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उमराओ==&lt;br /&gt;
छत्रवन से लगभग चार-पाँच मील पूर्व दिशा में उमराओ गाँव अवस्थित है। श्रीकृष्ण की दूहाई सुनकर सखियों ने ललिता के पास कृष्ण के विरुद्ध शिकायत की। &amp;lt;ref&amp;gt; ललितादि सखी क्रोधे कहे बार बार। राधिकार राज्य के करये अधिकार। ऐछे कत कहि ललितादि सखीगण। राधिकारे उमराओ कैला ईक्षण ।।(भक्तिरत्नाकर)&amp;lt;/ref&amp;gt;ललिताजी ने क्रोधित होकर कहा ऐसा कौन है? जो राधिका के राज्य को अपने अधिकार में कर सकता है। हम इसका प्रतिकार करेंगी। ऐसा कहकर राधिकाजी को एक सुन्दर सिंहासन पर पधराकर उमराव होने की घोषणा की। उमराओ का तात्पर्य राज्य के अधिपति से है। चित्रा सखी ने उनके सिर पर छत्र धारण किया, विशाखा चामर ढुलाने लगी ललिता जी राधिका के बाँए बैठकर मन्त्री का कार्य करने लगी। कोई सखी उन्हें पान का बीड़ा देने लगी तथा अवशिष्ट सखियाँ प्रजा का अभिनय करने लगीं। राधिकाजी ने सिंहासन पर बैठकर सखियों को आदेश दिया- जाओ, जो मेरे राज्य पर अधिकार करना चाहता है, उसे पराजित कर तथा बाँधकर मेरे सामने उपस्थित करो।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;मोर राज्य अधिकार करे येई जन। पराभव करि तारे आन एई क्षण ।। (भक्तिरत्नाकर)&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; उमराव का आदेश पाकर सहस्त्र-सहस्त्र सखियों ने हाथों में पुष्प छड़ी लेकर युद्ध के लिए यात्रा की। अर्जुन, लवंग, भृंग, कोकिल, सुबल और मधुमंगल उन्हें देखकर इधर-उधर भागने लगे, परन्तु किसी चतुर सखी ने मधुमग्ङल को पकड़ लिया और उसे पुष्प माला द्वारा बाँधकर उमराव के चरणों में उपस्थित किया तथा कुछ गोपियाँ मधुमग्ङल को दो- चार गंल्चे भी जड़कर बोलीं- हमारे उमराव के राज्य पर अधिकार करने का इतना साहस? अभी हम तुम्हें दण्ड देती हैं। मधुमंगल पराजित सेनापति की भाँति सिर नीचे कर कहने लगा- ठीक है! हम पराजित हैं, किन्तु दण्ड ऐसा दो कि हमारा पेट भरे। ऐसा सुनकर महारानी राधिका हँसकर बोली- यह कोई पेटू ब्राह्मण है, इसे मुक्त कर दो। सखियों ने उसे पेटभर लड्डू खिलाकर छोड़ दिया। मधुमंगल लौटकर छत्रपति महाराजा कृष्ण को अपने बँध जाने का विवरण सुनाकर रोने का अभिनय करने लगा। ऐसा सुनकर कृष्ण ने मधुमंगल और सखाओं को लेकर उमराओ के ऊपर आक्रमण कर दिया। जब राधिका ने अपने प्राण वल्लभ श्रीकृष्ण को देखा तब बड़ी लज्जित होकर अपने उमराव वेश को दूर करने के लिए चेष्टा करने लगीं। सखियाँ हँसती हुई उन्हें ऐसा करने से रोकने लगीं। मधुमंगल ने छत्रपति बने हुए श्रीकृष्ण को उमराव राधिका के दक्षिण में बैठा दिया। दोनों में संधि हुई तथा कृष्ण ने राधिकाजी का आधिपत्य स्वीकार किया। मधुमंगल ने राधिका के प्रति हाथ जोड़कर कहा- कृष्ण का अंगरूपी राज्य अब तुम्हारे अधिकार में हैं। अब जो चाहो इनसे भेंट ग्रहण कर सकती हो। सारी सखियाँ और सखा इस अभिनय क्रीड़ा-विलास को देखकर बड़े आनन्दित हुय। उमराव लीला के कारण इस गाँव का नाम उमराओ है। यह स्थान राधास्थली के रूप में भी प्रसिद्ध है। तत्पश्चात पूर्णमासीजी ने यहाँ पर राधिका को ब्रजेश्वरी के रूप में अभिषिक्त किया। यहाँ किशोरी कुण्ड भी है। श्रीलोकनाथ गोस्वामी यहीं पर भजन करते थे। किशोरी कुण्ड से ही श्रीराधाविनोद-विग्रह प्रकट हुए थे। ये श्रीराधाविनोद जी ही लोकनाथ गोस्वामी आराध्यदेव हैं। अब यह श्रीविग्रह [[जयपुर]] में विराजमान हैं। उमराओ गाँव के पास ही [[धनशिंगा]] गाँव है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==                                                       &lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{ब्रज के वन2}} {{ब्रज के वन}}&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के वन]] [[Category:पर्यटन कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के दर्शनीय स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1&amp;diff=20742</id>
		<title>उत्तराखण्ड</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Uttarakhand-Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=देहरादून (अस्थाई)&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=8,489,349&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=158&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=53,484&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=30°20′N 78°04′E&lt;br /&gt;
|ज़िले=13&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=देहरादून&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=हिन्दी, कुमाँऊनी, गढ़वाली, अंग्रेजी,&lt;br /&gt;
|स्थापना=2000/11/09&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=हरिद्वार, नैनीताल, गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ, ऋषिकेश&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=नैनीताल, अल्मोड़ा, हरिद्वार, मसूरी, ऋषिकेश&lt;br /&gt;
|साक्षरता=72&lt;br /&gt;
|वर्षा=1079&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=श्रीमती मार्गरेट अल्वा&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=डॉ. रमेश पोखरियाल &amp;quot;निशंक&amp;quot;&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=71&lt;br /&gt;
|राज्यसभा सदस्य=3&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://gov.ua.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/04/04&lt;br /&gt;
|emblem=Uttarakhand Logo.png&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[State::उत्तराखंड]] / Uttarakhand&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तराखण्ड या उत्तराखंड [[भारत]]  के उत्तर में स्थित एक राज्य है। 2000 और 2006 के बीच यह उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था, 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड भारत गणराज्य के 27 वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। राज्य का निर्माण कई वर्ष के आन्दोलन के पश्चात हुआ। [[चित्र:Haridwar.jpg|[[गंगा नदी]], [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar|thumb|left]] इस प्रान्त में वैदिक संस्कृति के कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं। उत्तर प्रदेश से अलग किये गये नए प्रांत उत्तरांचल 8 नवम्बर 2000 को अस्तित्व में आया। इस राज्य की राजधानी देहरादून है। उत्तरांचल अपनी भौगोलिक स्थिता, जलवायु, नैसर्गिक, प्राकृतिक दृश्यों एवं संसाधनों की प्रचुरता के कारण देश में प्रमुख स्थान रखता है। उत्तरांचल राज्य तीर्थ यात्रा और पर्यटन की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। यहाँ चारों धाम [[बद्रीनाथ]], [[केदारनाथ]], [[यमनोत्री]] और [[गंगोत्री]] हैं। इस चार धाम यात्रा मार्ग पर कई दर्शनीय स्थल हैं। पंचप्रयाग के नाम से प्रसिद्ध पाँच अत्यन्त पवित्र संगम स्थल यहीं स्थित है। ये हैं- विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग व देवप्रयाग। इसके अलावा सिक्खों के तीर्थस्थल के रुप में हेमकुण्ड साहिब भी विशेष रुप से महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
प्राचीन धर्मग्रंथों में उत्तराखंड का उल्लेख केदारखंड, मानसखंड और हिमवंत के रूप में मिलता है। यहाँ पर [[कुषाण|कुषाणों]], कुनिंदों, [[कनिष्क]], [[समुद्रगुप्त]], पौरवों, कत्यूरियों, पालों, चंद्रों, पंवारों और ब्रिटिश शासकों ने शासन किया है। इसके पवित्र तीर्थस्थलों के कारण इसे देवताओं की धरती ‘देवभूमि’ कहा जाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को निर्मल प्राकृतिक दृश्य प्रदान करते हैं।&lt;br /&gt;
वर्तमान उत्तराखंड राज्य 'आगरा और अवध संयुक्त प्रांत' का हिस्सा था। यह प्रांत 1902 में बनाया गया। सन 1935 में इसे 'संयुक्त प्रांत'  कहा जाता था। जनवरी 1950 में 'संयुक्त प्रांत' का नाम 'उत्तर प्रदेश' हो गया। 9 नंवबर, 2000 तक भारत का 27वां राज्य बनने से पहले तक उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा बना रहा।&lt;br /&gt;
[[हिमालय]] की तराई में स्थित इस राज्य की अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं उत्तर में चीन (तिब्बत) और पूर्व दिशा में नेपाल से मिलती हैं। इसकी उत्तर पश्चिम दिशा में [[हिमाचल प्रदेश]] और दक्षिण दिशा में [[उत्तर प्रदेश]] हैं।&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
उत्तराखंड की लगभग 90 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर ही निर्भर है। राज्य में कुल खेती योग्य क्षेत्र 7,84,117 हेक्टेयर हैं।&lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
उत्तराखंड में चूना पत्थर, राक फास्फेट, डोलोमाइट, मैग्नेसाइट, तांबा, ग्रेफाइट, जिप्सम आदि के भंडार हैं। राज्य में 25294 लघु औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, जिनमें लगभग 63,599 लोगों को रोजगार प्राप्त है। इसके अतिरिक्त 20,000 करोड़ रुपये के निवेश वाले 1802  उद्योगों में 5 लाख लोगों को कार्य मिला हुआ है। इस राज्य के अधिकांश उद्योग वन संपदा पर आधारित हैं। राज्य में कुल 54,047 हस्तशिल्प उद्योग क्रियाशील हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Haridwar1.jpg|[[गंगा नदी]], [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar|thumb]]&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
राज्य की लगभग कुल  5,91,418 हेक्टेयर कृषि भूमि में सिंचाई की जा रही हैं। राज्य में पनबिजली उत्पादन की भरपूर क्षमता है। [[यमुना नदी|यमुना]], [[भागीरथी नदी|भागीरथी]], [[भीलांगना नदी|भीलांगना]], [[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]], [[मंदाकिनी नदी|मंदाकिनी]], [[सरयू नदी|सरयू]], गौरी, कोसी और काली नदियों पर अनेक पनबिजली संयंत्र लगे हुए हैं, जिनसे बिजली का उत्पादन हो रहा है। राज्य के 15,667 गांवों में से 14,447 गांवों में बिजली है।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
==सडकें==&lt;br /&gt;
उत्तराखंड में पक्की सडकों की कुल लंबाई 21,490 किलोमीटर है। लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित सड़कों की लंबाई 17,772 कि.मी., स्थानीय निकायों द्वारा बनाई गई सड़कों की लंबाई 3,925 कि.मी. हैं।&lt;br /&gt;
==रेलवे==&lt;br /&gt;
उत्तराखंड के प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं-&lt;br /&gt;
#देहरादून, &lt;br /&gt;
#हरिद्वार, &lt;br /&gt;
#रूड़की, &lt;br /&gt;
#कोटद्वार, &lt;br /&gt;
#काशीपुर, &lt;br /&gt;
#हल्द्वानी, &lt;br /&gt;
#ऊधमसिंह नगर, &lt;br /&gt;
#रामनगर और &lt;br /&gt;
#काठगोदाम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उड्डयन==&lt;br /&gt;
जौली ग्रांट (देहरादून) और पंतनगर (ऊधमसिंह नगर) में हवाई पट्टियां हैं। नैनी-सैनी (पिथौरागढ़), गौचर (चमोली) और चिनयालिसौर (उत्तरकाशी) में हवाई पट्टियों को बनाने का कार्य निर्माणाधीन है। 'पवनहंस लि.' ने 'रूद्र प्रयाग' से 'केदारनाथ' तक तीर्थ यात्रियों के लिए हेलीकॉप्टर की सेवा शुरू की है।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
*विश्व प्रसिद्ध कुंभ मेला/अर्द्ध कुंभ मेला हरिद्वार में प्रति बारहवें/छठे वर्ष के अंतराल में मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
* अन्य प्रमुख मेले/त्योहार हैं- &lt;br /&gt;
#देवीधुरा मेला (चंपावत), &lt;br /&gt;
#पूर्णागिरि मेला (चंपावत), &lt;br /&gt;
#नंदा देवी मेला (अल्मोड़ा), &lt;br /&gt;
#गौचर मेला (चमोली), &lt;br /&gt;
#वैशाखी (उत्तरकाशी), &lt;br /&gt;
#माघ मेला (उत्तरकाशी), &lt;br /&gt;
#उत्तरायणी मेला (बागेश्वर), &lt;br /&gt;
#विशु मेला (जौनसार बावर), &lt;br /&gt;
#पीरान कलियार (रूड़की), और &lt;br /&gt;
#नंदा देवी राज जात यात्रा हर बारहवें वर्ष होती है।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Haridwar2.jpg|[[गंगा नदी]], [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar|thumb]]&lt;br /&gt;
*केदारनाथ मंदिर&lt;br /&gt;
*नैनीताल&lt;br /&gt;
*अन्य प्रमुख स्थल हैं- &lt;br /&gt;
*गंगोत्री, &lt;br /&gt;
*यमुनोत्री, &lt;br /&gt;
*बद्रीनाथ, &lt;br /&gt;
*केदारनाथ, &lt;br /&gt;
*हरिद्वार, &lt;br /&gt;
*ऋषिकेश, &lt;br /&gt;
*हेमकुंड साहिब,&lt;br /&gt;
* नानकमत्ता, आदि। &lt;br /&gt;
*कैलाश मानसरोवर की यात्रा कुमाऊं क्षेत्र से होकर है। &lt;br /&gt;
*विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी, पिंडारी ग्लेसियर, रूपकुंड, दयारा, बुग्याल, औली तथा मसूरी, देहरादून, चकराता, नैनीताल, रानीखेत, बागेश्वर, भीमताल, कौसानी और लैंसडाउन जैसे पर्वतीय स्थल आकर्षण के केन्द्र हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{उत्तराखंड के ज़िले}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राज्य_और_केन्द्र_शासित_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=20739</id>
		<title>गंगा नदी</title>
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		<updated>2010-05-12T10:45:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Haridwar.jpg|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar|thumb]] &lt;br /&gt;
'''गंगा नदी / Ganga River'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा का उद्गम स्थल [[हिमालय]] पर्वत की दक्षिण श्रेणियाँ हैं । प्रवाह के प्रारंभिक चरण में भारत के उत्तराखंड राज्य में दो नदियाँ अलकनन्दा व भागीरथी निकलती हैं । अलकनन्दा की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है । भागीरथी गोमुख स्थान से 25 कि.मी. लम्बे गंगोत्री हिमनद से निकलती है । भागीरथी व अलकनन्दा देव प्रयाग में संगम करती है यहाँ से वह गंगा के रुप में पहचानी जाती है । भारत के विशाल मैदानी इलाके से होकर बहती हुई गंगा बंगाल की खाड़ी में बहुत सी शाखाओं में विभाजित होकर मिलती है । इनमें से एक शाखा का नाम हुगली नदी भी है जो कोलकाता के पास बहती है, दूसरी शाखा पद्मा नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है । इस नदी की पूरी लंबाई लगभग 2507 किलोमीटर है । गंगा और बंगाल की खाड़ी के मिलन स्थल पर बनने वाले मुहाने को सुंदरवन के नाम से जाना जाता है जो विश्व की बहुत सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध बंगाल टाईगर का निवास स्थान है । [[यमुना नदी|यमुना]] नदी यों तो अपने आप में एक स्वतंत्र और बड़ी नदी है,किन्तु ये गंगा में प्रयाग यानि इलाहाबाद में आकर मिलती है ।&lt;br /&gt;
==प्रमुख तीर्थस्थान==&lt;br /&gt;
गंगा-भारत की सर्वाधिक पवित्र पुण्यसलिला नदी है । राजा [[भगीरथ]] तपस्या करके गंगा को [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] पर लाये थे। यह कथा [[भागवत]] [[पुराण]] में विस्तार से हैं। आदित्य पुराण के अनुसार पृथ्वी पर गंगावतरण वैशाख शुक्ल तृतीया को तथा हिमालय से गंगानिर्गमन ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (गंगादशहरा) को हुआ था। इसको दशहरा इसलिए कहते है कि इस दिन का गंगास्नान दस पापों को हरता है। कई प्रमुख तीर्थस्थान-[[हरिद्वार]], [[गढ़मुक्तेश्वर]], [[सोरों]], [[प्रयाग]], [[काशी]] आदि इसी के तट पर स्थित है। [[ॠग्वेद]] के नदीसूक्त&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ऋग्वेद  (10.75.5-6)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; के अनुसार गंगा भारत की कई प्रसिद्ध नदियों में से सर्वप्रथम है। [[महाभारत]] तथा पद्मपुराणादि में गंगा की महिमा तथा पवित्र करनेवाली शक्तियों की विस्तारपूर्वक प्रशंसा की गयी है। [[पुराण|स्कन्धपुराण]] के काशीखण्ड&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(स्कन्दपुराण अध्याय 29)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में इसके सहस्त्र नामों का उल्लेख है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वनपर्व में गंगा==&lt;br /&gt;
इसके भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों रूपों की ओर विद्वानों ने संकेत किये है। अत: गंगा का भौतिक रूप के साथ एक पारमार्थिक रूप भी है। [[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]] के अनुसार यद्यपि [[कुरुक्षेत्र]] में स्नान करके मनुष्य पुण्य को प्राप्त कर सकता है, पर कनखल और प्रयाग के स्नान में अपेक्षाकृत अधिक विशेषता है। प्रयाग के स्नान को सबसे अधिक पवित्र माना गया है। यदि कोई व्यक्ति सैकड़ों पाप करके भी गंगा (प्रयाग) में स्नान कर ले तो उसके सभी पाप धुल जाते है। इसमें स्नान करने या इसका जल पीने से पूर्वजों की सातवीं पीढ़ी तक पवित्र हो जाती है। गंगाजल मनुष्य की अस्थियों को जितनी ही देर तक स्पर्श करता है उसे उतनी ही अधिक स्वर्ग में प्रसन्नता या प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। जिन-जिन स्थानों से होकर गंगा बहती है उन स्थानों को इससे संबद्ध होने के कारण पूर्ण पवित्र माना गया है। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
{| id=&amp;quot;textboxrt&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
गंगा तुमरी साँच बड़ाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक सगर-सुत-हित जग आई तारयौ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम लेत जल पिअत एक तुम तारत कुल अकुलाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'हरीचन्द्र' याही तें तो सिव राखी सीस चढ़ाई॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-'''भारतेन्दु हरिश्चंद्र''' (कृष्ण-चरित्र, 37)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
गंगा की पवित्रता में कोई विश्वास नहीं करने जाता। गंगा के निकट पहुँच जाने पर अनायास, वह विश्वास पता नहीं कहाँ से आ जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''-लक्ष्मीनारायण मिश्र''' (गरुड़ध्वज, पृ0 79)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
*[[गीता]]&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(गीता 10.31)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में भगवान् श्री[[कृष्ण]] ने अपने को नदियों में गंगा कहा है। &lt;br /&gt;
*[[मनुस्मृति]]&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(मनुस्मृति 8.92)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में गंगा और कुरुक्षेत्र को सबसे अधिक पवित्र स्थान माना गया है।  &lt;br /&gt;
*[[पुराण|पुराणों]] में गंगा की तीन धाराओं का उल्लेख हैं—स्वर्गगंगा (मन्दाकिनी), भूगंगा (भागीरथी) और पातालगंगा (भोगवती)। पुराणों में भगवान् विष्णु के बायें चरण के अँगूठे के रख से गंगा का जन्म और भगवान् शंकर की जटाओं में उसका विलयन बताया गया है। &lt;br /&gt;
*विष्णुपुराण&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(विष्णुपुराण  2.8.120-121)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में लिखा है कि गंगा का नाम लेने, सुनने, उसे देखने, उसका जल पीने, स्पर्श करने, उसमें स्नान करने मात्र से सौ [[योजन]] से भी 'गंगा' नाम का उच्चारण करने मात्र से मनुष्य के तीन जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते है। &lt;br /&gt;
*भविष्यपुराण&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(भविष्यपुराण पृष्ठ 9,12 तथा 198)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में भी यही कहा है। &lt;br /&gt;
*मत्स्य, गरूड और पद्मपुराणों के अनुसार हरिद्वार, प्रयाग और गंगा के समुद्रसंगम में स्नान करने से मनुष्य करने पर स्वर्ग पहुँच जाता है और फिर कभी उत्पन्न नहीं होता। उसे निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है। मनुष्य गंगा के महत्त्व को मानता हो या न मानता हो यदि वह गंगा के समीप लाया जाय और वहीं मृत्यु को प्राप्त हो तो भी वह स्वर्ग को जाता है और नरक नहीं देखता। &lt;br /&gt;
*वाराहपुराण&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(वाराहपुराण अध्याय 82)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में गंगा के नाम को 'गाम् गता' (जो पृथ्वी को चली गयी है) के रूप में विवेचित किया गया है।&lt;br /&gt;
*पद्मपुराण&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(पद्मपुराण सृष्टिखंड, 60.35)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; के अनुसार गंगा सभी प्रकार के पतितों का उद्धार कर देती है। कहा जाता है कि गंगा में स्नान करते समय व्यक्ति को गंगा के सभी नामों का उच्चारण करना चाहिए। उसे जल तथा मिट्टी लेकर गंगा से याचना करनी चाहिए कि आप मेरे पापों को दूर कर तीनों लोकों का उत्तम मार्ग प्रशस्त करें। बुद्धिमान् व्यक्ति हाथ में दर्भ लेकर पितरों की सन्तुष्टि के लिए गंगा से प्रार्थना करे। इसके बाद उसे श्रद्धा के साथ सूर्य भगवान् को कमल के फूल तथा अक्षत इत्यादि समर्पण करना चाहिए। उसे यह भी कहना चाहिए कि वे उसके दोषों को दूर करें। &lt;br /&gt;
*काशीखण्ड&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(काशीखण्ड 27.80)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में कहा गया है कि जो लोग गंगा के तट पर खड़े होकर दूसरे तीर्थों की प्रशंसा करते है और अपने मन में उच्च विचार नहीं रखते, वे नरक में जाते हैं। काशीखण्ड&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(काशीखण्ड 27.129-131)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में यह भी कहा गया है कि शुक्ल प्रतिपदा को गंगास्नान नित्यस्नान से सौ गुना, संक्रान्ति का स्नान सहस्त्र गुना, चन्द्र-सूर्यग्रहण का स्नान लाख गुना लाभदायक है। चन्द्रग्रहण सोमवार को तथा सूर्यग्रहण रविवार को पड़ने पर उस दिन का गंगास्नान असंख्य गुना पुण्यकारक है। &lt;br /&gt;
भविष्यपुराण में गंगा के निम्नांकित रूप का ध्यान करने का विधान है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सितमकरनिषण्णां शुक्लवर्णां त्रिनेत्राम्&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करधृतकमलोद्यत्सूत्पलाऽभीत्यभीष्टाम् ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विधिहरिहररूपां सेन्दुकोटीरचूडाम् &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कलितसितदुकूलां जाह्नवीं तां नमामि ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;भविष्यपुराण&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा के स्मरण और दर्शन का बहुत बड़ा फल बतलाया गया है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृष्टा तु हरते पापं स्पृष्टा तु त्रिदिवं नयेत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रसगेंनापि या गंगा मोक्षदा त्ववगाहिता ॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;भविष्यपुराण&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गंगा-कथायें== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Haridwar1.jpg|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar|thumb]]&lt;br /&gt;
[[शिव]] ने [[ब्रह्मा]] के दोष के निवारण के लिए गंगा को जुटाया था। किंतु स्वयं उस पर मोहित हो गये। शिव उसे निरंतर अपनी जटाओं में छिपाकर रखते थे। [[पार्वती देवी|पार्वती]] अत्यंत क्षुब्ध थी तथा उसे सौतवत मानती थी। पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों तथा एक कन्या गणेश, स्कंद तथा जया को बुलाकर इस विषय में बताया। [[गणेश]] ने एक उपाय सोचा। उन दिनों समस्त भूमंडल पर अकाल का प्रकोप था। एकमात्र [[गौतम]] ऋषि के आश्रम में खाद्य पदार्थ थे क्योंकि उस आश्रम की स्थापना उस पहाड़ पर की गयी थी जहां पहले शिव तपस्या कर चुके थे। अनेक ब्राह्मण उनकी शरण में पहुंचे हुए थे। [[गणेश]] ने स्वयं ब्राह्मण वेश धारण किया तो [[जया]] को गाय का रूप धारण करने को कहा, साथ ही उसे आदेश दिया कि वह आश्रम में जाकर गेहूं के पौधे खाना आरंभ करे, रोकने पर बेहोश होकर गिर जाये। वहां पहुंचकर उन दोनों ने वैसा ही किया। मुनि ने तिनके से गाय को हटाने का प्रयास किया तो वह जड़वत् गिर गयी। ब्राह्मणों के साथ गणेश ने गौतम के पाप-कर्म की ओर संकेत कर तुरंत आश्रम छोड़ने की इच्छा प्रकट की। गोहत्या के पाप से दुखी गौतम ने पूछा कि पाप का निराकरण कैसे किया जाये। गणेश ने कहा-&amp;quot; शिव की जटाओं में गंगा का पुनीत जल है, तपस्या करके उन्हें प्रसन्न करो। गंगा को पर्वत पर लाओ और इस गऊ पर छिड़को। इस प्रकार पाप-शमन होने पर ही हम सब यहाँ रह सकेंगे।&amp;quot; गौतम तपस्यारत हो गये। उससे प्रसन्न होकर शिव अपनी जटाओं में समेटी हुई गंगा का एक अंश उसे प्रदान कर दिया। गौतम ने यह भी वर मांगा कि वह धरती पर सागर से मिलने से पूर्व अत्यंत पावन रहेगी तथा सबके पापों का नाश करने वाली होगी। गौतम गंगा को लेकर ब्रह्म गिरि पहुंचे। वहां सबने गंगा की पूजा-अर्चना की। गंगा ने गौतम से पूछा-&amp;quot;मैं देवलोक जाऊं? कमंडल में अथवा रसातल में?&amp;quot; गौतम ने कहा-&amp;quot;मैंने शिव से तीनों लोकों के उपकार के लिए तुम्हें मांगा था। गंगा ने पंद्रह आकृतियां धारण कीं जिनमें से चार स्वर्गलोक, सात मृत्युलोक तथा चार रूपों में रसातल में प्रवेश किया। हर लोक की गंगा का रूप उस लोक में ही दृष्टिगत होता है अन्यत्र नहीं।&amp;quot;&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ब्र0 पु0, अ0 72 से 78 तक&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; गंगा का बचा हुआ दूसरा अंश [[भगीरथ]] को तप के फलस्वरूप अपने पितरों के उद्धार के निमित्त शिव से प्राप्त हुआ। गंगा ने पहले [[सगर]] के पुत्रों का त्राण किया फिर उसकी प्रार्थना से हिमालय पहुंचकर भारत में प्रवाहित होते हुए वह बंगसागर की ओर चली गयी।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ब्र0पु0, अध्याय 76,77,175&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर [[कृष्ण]] ने उसे दर्शन दिये। उन्होंने गंगा को आज्ञा दी कि वह शीध्र भारत में अवतीर्ण होकर सगर-पुत्रों का उद्धार करे। गंगा के पूछने पर उन्होंने कहा-&amp;quot;वहां मेरे अंश से बना लवणोदधि तुम्हारा पति होगा। भारती के शापवश तुम्हें पांच हज़ार वर्ष तक भारत में रहना पड़ेगा। भारत में पापियों का पाप तुम्हारे जल में घुल जायेगा किंतु भक्तों के स्पर्श से तुममें समाहित समस्त पाप नष्ट हो जायेंगे&amp;quot;&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(त्रिपथगा : दे0 राधा)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण ने [[राधा]] की पूजा करके रास में उनकी स्थापना की। सरस्वती तथा समस्त [[देवता]] प्रसन्न होकर संगीत में खो गये। चैतन्य होने पर उन्होंने देखा कि राधा और कृष्ण उनके मध्य नहीं हैं। सब ओर जल ही जल है। सर्वात्म, सर्वव्यापी राधा-कृष्ण ने ही संसारवासियों के उद्धार के लिए जलमयी मूर्ति धारण की थी, वही गोलोक में स्थित गंगा है। एक बार गंगा श्रीकृष्ण के पार्श्व में बैठी उनके सौंदर्य-दर्शन में मग्न थी। राधा उसे देखकर रुष्ट हो गयी थी। लज्जावश उसने श्रीकृष्ण के चरणों में आश्रय लिया था । फलत: पशु, पक्षी, पौधे, मनुष्य अपने कष्ट की दुहाई देते हुए ब्रह्मा की शरण में पहुंचे। ब्रह्मा, विष्णु, महेश कृष्ण के पास गये। कृष्ण की प्रेरणा से उन्होंने राधा से गंगा के निमित्त अभयदान लिया। फिर श्रीकृष्ण के पांव के अंगूठे से गंगा निकली। उसका वेग थामने के लिए पहले ब्रह्मा ने उसे अपने कमंडल में ग्रहण किया, फिर शिव ने अपनी जटाओं में, फिर वह पृथ्वी पर पहुंची। जब समस्त संसार जल से आपूरित हो गया तब ब्रह्मा उसे नारायण के पास बैंकुंठधाम में ले गये जहां ब्रह्मा ने समस्त घटनाएं सुनाकर उसे नारायण को सौंप दिया। नारायण ने स्वयं गांधर्व-विधान द्वारा गंगा से पाणिग्रहण किया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;भागवत, 9 ।11-14&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Haridwar2.jpg|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar&lt;br /&gt;
चित्र:Kachla-Ghat.jpg|गंगा नदी, कछला घाट&amp;lt;br /&amp;gt;Ganga River, Kachla Ghat&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
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		<title>उत्तराखण्ड</title>
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		<updated>2010-05-12T10:34:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Uttarakhand-Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=देहरादून (अस्थाई)&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=8,489,349&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=158&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=53,484&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=30°20′N 78°04′E&lt;br /&gt;
|ज़िले=13&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=देहरादून&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=हिन्दी, कुमाँऊनी, गढ़वाली, अंग्रेजी,&lt;br /&gt;
|स्थापना=2000/11/09&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=हरिद्वार, नैनीताल, गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ, ऋषिकेश&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=नैनीताल, अल्मोड़ा, हरिद्वार, मसूरी, ऋषिकेश&lt;br /&gt;
|साक्षरता=72&lt;br /&gt;
|वर्षा=1079&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=श्रीमती मार्गरेट अल्वा&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=डॉ. रमेश पोखरियाल &amp;quot;निशंक&amp;quot;&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=71&lt;br /&gt;
|राज्यसभा सदस्य=3&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://gov.ua.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/04/04&lt;br /&gt;
|emblem=Uttarakhand Logo.png&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[State::उत्तराखंड]] / Uttarakhand&lt;br /&gt;
उत्तराखण्ड या उत्तराखंड [[भारत]]  के उत्तर में स्थित एक राज्य है। 2000 और 2006 के बीच यह उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था, 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड भारत गणराज्य के 27 वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। राज्य का निर्माण कई वर्ष के आन्दोलन के पश्चात हुआ। [[चित्र:Haridwar.jpg|[[गंगा नदी]], [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar|thumb|left]] इस प्रान्त में वैदिक संस्कृति के कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं। उत्तर प्रदेश से अलग किये गये नए प्रांत उत्तरांचल 8 नवम्बर 2000 को अस्तित्व में आया। इस राज्य की राजधानी देहरादून है। उत्तरांचल अपनी भौगोलिक स्थिता, जलवायु, नैसर्गिक, प्राकृतिक दृश्यों एवं संसाधनों की प्रचुरता के कारण देश में प्रमुख स्थान रखता है। उत्तरांचल राज्य तीर्थ यात्रा और पर्यटन की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। यहाँ चारों धाम [[बद्रीनाथ]], [[केदारनाथ]], [[यमनोत्री]] और [[गंगोत्री]] हैं। इस चार धाम यात्रा मार्ग पर कई दर्शनीय स्थल हैं। पंचप्रयाग के नाम से प्रसिद्ध पाँच अत्यन्त पवित्र संगम स्थल यहीं स्थित है। ये हैं- विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग व देवप्रयाग। इसके अलावा सिक्खों के तीर्थस्थल के रुप में हेमकुण्ड साहिब भी विशेष रुप से महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
प्राचीन धर्मग्रंथों में उत्तराखंड का उल्लेख केदारखंड, मानसखंड और हिमवंत के रूप में मिलता है। यहाँ पर [[कुषाण|कुषाणों]], कुनिंदों, [[कनिष्क]], [[समुद्रगुप्त]], पौरवों, कत्यूरियों, पालों, चंद्रों, पंवारों और ब्रिटिश शासकों ने शासन किया है। इसके पवित्र तीर्थस्थलों के कारण इसे देवताओं की धरती ‘देवभूमि’ कहा जाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को निर्मल प्राकृतिक दृश्य प्रदान करते हैं।&lt;br /&gt;
वर्तमान उत्तराखंड राज्य 'आगरा और अवध संयुक्त प्रांत' का हिस्सा था। यह प्रांत 1902 में बनाया गया। सन 1935 में इसे 'संयुक्त प्रांत'  कहा जाता था। जनवरी 1950 में 'संयुक्त प्रांत' का नाम 'उत्तर प्रदेश' हो गया। 9 नंवबर, 2000 तक भारत का 27वां राज्य बनने से पहले तक उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा बना रहा।&lt;br /&gt;
[[हिमालय]] की तराई में स्थित इस राज्य की अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं उत्तर में चीन (तिब्बत) और पूर्व दिशा में नेपाल से मिलती हैं। इसकी उत्तर पश्चिम दिशा में [[हिमाचल प्रदेश]] और दक्षिण दिशा में [[उत्तर प्रदेश]] हैं।&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
उत्तराखंड की लगभग 90 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर ही निर्भर है। राज्य में कुल खेती योग्य क्षेत्र 7,84,117 हेक्टेयर हैं।&lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
उत्तराखंड में चूना पत्थर, राक फास्फेट, डोलोमाइट, मैग्नेसाइट, तांबा, ग्रेफाइट, जिप्सम आदि के भंडार हैं। राज्य में 25294 लघु औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, जिनमें लगभग 63,599 लोगों को रोजगार प्राप्त है। इसके अतिरिक्त 20,000 करोड़ रुपये के निवेश वाले 1802  उद्योगों में 5 लाख लोगों को कार्य मिला हुआ है। इस राज्य के अधिकांश उद्योग वन संपदा पर आधारित हैं। राज्य में कुल 54,047 हस्तशिल्प उद्योग क्रियाशील हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Haridwar1.jpg|[[गंगा नदी]], [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar|thumb]]&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
राज्य की लगभग कुल  5,91,418 हेक्टेयर कृषि भूमि में सिंचाई की जा रही हैं। राज्य में पनबिजली उत्पादन की भरपूर क्षमता है। [[यमुना नदी|यमुना]], [[भागीरथी नदी|भागीरथी]], [[भीलांगना नदी|भीलांगना]], [[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]], [[मंदाकिनी नदी|मंदाकिनी]], [[सरयू नदी|सरयू]], गौरी, कोसी और काली नदियों पर अनेक पनबिजली संयंत्र लगे हुए हैं, जिनसे बिजली का उत्पादन हो रहा है। राज्य के 15,667 गांवों में से 14,447 गांवों में बिजली है।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
==सडकें==&lt;br /&gt;
उत्तराखंड में पक्की सडकों की कुल लंबाई 21,490 किलोमीटर है। लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित सड़कों की लंबाई 17,772 कि.मी., स्थानीय निकायों द्वारा बनाई गई सड़कों की लंबाई 3,925 कि.मी. हैं।&lt;br /&gt;
==रेलवे==&lt;br /&gt;
उत्तराखंड के प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं-&lt;br /&gt;
#देहरादून, &lt;br /&gt;
#हरिद्वार, &lt;br /&gt;
#रूड़की, &lt;br /&gt;
#कोटद्वार, &lt;br /&gt;
#काशीपुर, &lt;br /&gt;
#हल्द्वानी, &lt;br /&gt;
#ऊधमसिंह नगर, &lt;br /&gt;
#रामनगर और &lt;br /&gt;
#काठगोदाम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उड्डयन==&lt;br /&gt;
जौली ग्रांट (देहरादून) और पंतनगर (ऊधमसिंह नगर) में हवाई पट्टियां हैं। नैनी-सैनी (पिथौरागढ़), गौचर (चमोली) और चिनयालिसौर (उत्तरकाशी) में हवाई पट्टियों को बनाने का कार्य निर्माणाधीन है। 'पवनहंस लि.' ने 'रूद्र प्रयाग' से 'केदारनाथ' तक तीर्थ यात्रियों के लिए हेलीकॉप्टर की सेवा शुरू की है।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
*विश्व प्रसिद्ध कुंभ मेला/अर्द्ध कुंभ मेला हरिद्वार में प्रति बारहवें/छठे वर्ष के अंतराल में मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
* अन्य प्रमुख मेले/त्योहार हैं- &lt;br /&gt;
#देवीधुरा मेला (चंपावत), &lt;br /&gt;
#पूर्णागिरि मेला (चंपावत), &lt;br /&gt;
#नंदा देवी मेला (अल्मोड़ा), &lt;br /&gt;
#गौचर मेला (चमोली), &lt;br /&gt;
#वैशाखी (उत्तरकाशी), &lt;br /&gt;
#माघ मेला (उत्तरकाशी), &lt;br /&gt;
#उत्तरायणी मेला (बागेश्वर), &lt;br /&gt;
#विशु मेला (जौनसार बावर), &lt;br /&gt;
#पीरान कलियार (रूड़की), और &lt;br /&gt;
#नंदा देवी राज जात यात्रा हर बारहवें वर्ष होती है।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Haridwar2.jpg|[[गंगा नदी]], [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Haridwar|thumb]]&lt;br /&gt;
*केदारनाथ मंदिर&lt;br /&gt;
*नैनीताल&lt;br /&gt;
*अन्य प्रमुख स्थल हैं- &lt;br /&gt;
*गंगोत्री, &lt;br /&gt;
*यमुनोत्री, &lt;br /&gt;
*बद्रीनाथ, &lt;br /&gt;
*केदारनाथ, &lt;br /&gt;
*हरिद्वार, &lt;br /&gt;
*ऋषिकेश, &lt;br /&gt;
*हेमकुंड साहिब,&lt;br /&gt;
* नानकमत्ता, आदि। &lt;br /&gt;
*कैलाश मानसरोवर की यात्रा कुमाऊं क्षेत्र से होकर है। &lt;br /&gt;
*विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी, पिंडारी ग्लेसियर, रूपकुंड, दयारा, बुग्याल, औली तथा मसूरी, देहरादून, चकराता, नैनीताल, रानीखेत, बागेश्वर, भीमताल, कौसानी और लैंसडाउन जैसे पर्वतीय स्थल आकर्षण के केन्द्र हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{उत्तराखंड के ज़िले}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राज्य_और_केन्द्र_शासित_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<updated>2010-05-12T06:03:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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/***** 1. INDICATION OF NAMESPACES *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
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 &lt;br /&gt;
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 &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
/* NS Manual + Manual_talk (light bluish violet) */&lt;br /&gt;
.ns-112 #content, .ns-112 #content { background-color: #f3f3ff; }&lt;br /&gt;
.ns-112 div.thumb, .ns-112 div.thumb { border-color: #f3f3ff; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Help (but NOT Help_talk) (blue border and Public Domain icon)  */&lt;br /&gt;
.ns-12 #content {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid #0000cc;&lt;br /&gt;
	border-right: none;&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/b/b8/PD-banner.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: right top;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ns-12 #bodyContent {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/6/67/PD-icon-faded.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: right 5em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 2. COLOR CLASSES FOR CONTENT  *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Border colors */&lt;br /&gt;
.borderc1 { border-color: #e9e9e9; border-width: thin; }  /* light grey */&lt;br /&gt;
.borderc2 { border-color: #aaaaaa; border-width: thin; }  /* grey (as toc) */&lt;br /&gt;
.borderc3 { border-color: #777777; border-width: thin; }  /* dark grey */&lt;br /&gt;
.borderc4 { border-color: #000000; border-width: thin; }  /* black */&lt;br /&gt;
.borderc5 { border-color: #c00000; border-width: thin; }  /* red */&lt;br /&gt;
.borderc6 { border-color: #025e9d; border-width: thin; }  /* blue */&lt;br /&gt;
.borderc7 { border-color: #008040; border-width: thin; }  /* green */&lt;br /&gt;
.borderc8 { border-color: #ffcc00; border-width: thin; }  /* yellow */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Background colors */&lt;br /&gt;
.backgroundc1 { background-color: #ffffff; }  /* white */&lt;br /&gt;
.backgroundc2 { background-color: #f9f9f9; }  /* light grey (as toc)  */&lt;br /&gt;
.backgroundc3 { background-color: #eeeeee; }  /* light grey (headers) */ &lt;br /&gt;
.backgroundc4 { background-color: #e0e0e0; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc5 { background-color: #d2d2d2; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc6 { background-color: #b7b7b7; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc7 { background-color: #a3a3a3; }  /* darker grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc8 { background-color: #444455; }  /* very dark grey */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 3. SPECIAL PAGES *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Marking redirects  */&lt;br /&gt;
.allpagesredirect, .watchlistredir, .redirect-in-category { font-style: italic; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Coloured edit size numbers on watchlist/recentchanges */&lt;br /&gt;
.mw-plusminus-pos { color: #006400; } /* darkgreen */&lt;br /&gt;
.mw-plusminus-neg { color: #8b0000; } /* darkred */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Consistent special page navigation */&lt;br /&gt;
.sp-cached {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/8c/Clock%20and%20warning.svg/20px-Clock%20and%20warning.svg);&lt;br /&gt;
	background-position: 5px 3px;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding: 4px 0 4px 30px;&lt;br /&gt;
	font-style: italic;&lt;br /&gt;
	color: #606000;&lt;br /&gt;
	margin: 0.3em 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #eeee80;&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffe0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.SpecialPageInfo {&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/89/Exquisite-khelpcenter.png/35px-Exquisite-khelpcenter.png);&lt;br /&gt;
	background-position: 0.8em 0.5em;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em 0.5em 0.3em 5.0em;&lt;br /&gt;
	border-color: #025e9d; &lt;br /&gt;
	border-width: 1px; &lt;br /&gt;
	border-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: medium;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#searchresulttext {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f1/Exquisite-kfind.png/45px-Exquisite-kfind.png);&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.mw-viewprevnext {&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cccccc;&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f2;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Special:Statistics */&lt;br /&gt;
.StatsTable {&lt;br /&gt;
	background: transparent;&lt;br /&gt;
	width: 75%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable th {&lt;br /&gt;
	vertical-align: middle;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
	width: 50px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable th, .StatsTable td {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
	padding: 0.5em 1em;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #ccccdd;&lt;br /&gt;
	margin: 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable tr {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Special:Search (more whitespace) */&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #search {&lt;br /&gt;
	padding: 1em 0 2em 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cccccc;&lt;br /&gt;
	padding: 0.5em 0.5em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch-namespaces {&lt;br /&gt;
	padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
	margin: 0.7em 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch-namespaces label {&lt;br /&gt;
	white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
	min-width: 8.4em;&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	float: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search br { clear: left; } /* Clear search button, but not check-boxes */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 4. MAIN PAGE STYLING *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#mainpage_topbox {&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	padding: 0px;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	margin: 0.2em 10px 10px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxtitle, .mainpage_hubtitle, #mainpage_pagetitle {&lt;br /&gt;
	font-size: 105%;&lt;br /&gt;
	padding: 0.4em;&lt;br /&gt;
	background-color: #eeeeee;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	line-height: 120%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_pagetitle {&lt;br /&gt;
	color: #cf7606;&lt;br /&gt;
	font-size: 200% !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_sitelinks {&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubtitle {&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxcontents, .mainpage_boxcontents_small {&lt;br /&gt;
	background: #ffffff;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxcontents_small {&lt;br /&gt;
	font-size: 95%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubbox, #mainpage_newscell, #mainpage_downloadcell {&lt;br /&gt;
	padding: 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubbox {&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_newscell {&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 15px;&lt;br /&gt;
	margin-top: 0 !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_newscell .mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/89/Exquisite-khelpcenter.png/20px-Exquisite-khelpcenter.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: 99% 0.3em;&lt;br /&gt;
	padding-right: 25px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_downloadcell {&lt;br /&gt;
	width: 17em;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_downloadcell .mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5d/Crystal_Clear_action_build.png/18px-Crystal_Clear_action_build.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: 96% 0.33em;&lt;br /&gt;
	padding-right: 25px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_mwtitle { color: #005288; } /* The words 'MediaWiki.org' in the title. */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* The &amp;quot;mainpage&amp;quot; class is added to the body with javascript for the main page in all */&lt;br /&gt;
/* languages, so we can style things that apppear on the main page and also elsewhere. */&lt;br /&gt;
.mainpage #lastmod, &lt;br /&gt;
.mainpage #siteSub, &lt;br /&gt;
.mainpage h1.firstHeading {&lt;br /&gt;
	display: none !important;&lt;br /&gt;
} &lt;br /&gt;
.mainpage #content {&lt;br /&gt;
	padding-top: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 5. SIDEBAR EXTERNAL LINKS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#n-browse-cvs a, #n-phpdoc a, #n-Mailing-list a {&lt;br /&gt;
	background: url(/skins-1.5/monobook/external.png) center right no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding-right: 13px;&lt;br /&gt;
	color: #3366bb;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 6. PRETTIFY [[Extension Matrix]] *****/  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.xm-table {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #666666;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-table td, .xm-table th {&lt;br /&gt;
	vertical-align: top;&lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	background-color: #EEEEEE;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-table th, .xm-name { font-weight: bold; }&lt;br /&gt;
.xm-status-unknown, &lt;br /&gt;
.xm-type-unknown {&lt;br /&gt;
	color: #888888;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-status-experimental { color: red; }&lt;br /&gt;
.xm-status-beta { color: blue; }&lt;br /&gt;
.xm-status-stable { color: green; }&lt;br /&gt;
.xm-name, .xm-status,&lt;br /&gt;
.xm-type, .xm-version,&lt;br /&gt;
.xm-updated {&lt;br /&gt;
	white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-updated { font-size:80%; }&lt;br /&gt;
.xm-alert { background-color: yellow; }&lt;br /&gt;
td.xm-blank { background-color: inherit; }&lt;br /&gt;
td.xm-updated { background-color: inherit; }&lt;br /&gt;
td.xm-description { background-color: inherit; font-style: italic; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
th.xm-blank,&lt;br /&gt;
th.xm-updated,&lt;br /&gt;
th.xm-description {&lt;br /&gt;
	background-color: inherit;&lt;br /&gt;
	padding-bottom: 0.6ex;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #666666;&lt;br /&gt;
}  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 7. WIKITABLES, INFOBOX TEMPLATES, WARNINGS AND OTHER SUCH STYLINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Wikitable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.wikitable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #a7d7f9 solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable th, table.wikitable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #a7d7f9 solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable th, table.wikitable td.hl3, table.wikitable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.wikitable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #94c3eb;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable td.hl1, table.wikitable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.wikitable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable td.hl2, table.wikitable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.wikitable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 7A. BHARATTABLES, INFOBOX TEMPLATES, WARNINGS AND OTHER SUCH STYLINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* bharattable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.bharattable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable th, table.bharattable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable th, table.bharattable td.hl3, table.bharattable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.bharattable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f7e6b9;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable td.hl1, table.bharattable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.bharattable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable td.hl2, table.bharattable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.bharattable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* tourinfotable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.tourinfotable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#4f4f01;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable th, table.tourinfotable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable th, table.tourinfotable td.hl3, table.tourinfotable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.tourinfotable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f7e6b9;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#4f4f01;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable td.hl1, table.tourinfotable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.tourinfotable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable td.hl2, table.tourinfotable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.tourinfotable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* Infoboxtable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.infoboxtable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #ffffff;&lt;br /&gt;
	border: 1px #c8e3f7 solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#075352;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable th, table.infoboxtable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #c8e3f7 solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable th, table.infoboxtable td.hl3, table.infoboxtable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.infoboxtable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f0f7fd;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#075352;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable td.hl1, table.infoboxtable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.infoboxtable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable td.hl2, table.infoboxtable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.infoboxtable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* General purpose &amp;quot;pretty (data) tables&amp;quot; */&lt;br /&gt;
table.datatable { background-color: transparent; }&lt;br /&gt;
table.datatable th, table.datatable td { padding: 4px; }&lt;br /&gt;
table.datatable th { text-align: left; background-color: #999999; }&lt;br /&gt;
table.datatable tr { background-color: #cccccc; }&lt;br /&gt;
table.datatable tr:hover { background-color: #ffffcc; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* SideBox styling */&lt;br /&gt;
div.sideBox {&lt;br /&gt;
	position: relative;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	background: white;&lt;br /&gt;
	margin-left: 1em;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid gray;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em;&lt;br /&gt;
	width: 200px;&lt;br /&gt;
	overflow: hidden; &lt;br /&gt;
	clear: right;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl {&lt;br /&gt;
	padding: 0;&lt;br /&gt;
	margin: 0 0 0.3em 0;&lt;br /&gt;
	font-size: 96%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl dt {&lt;br /&gt;
	background: none;&lt;br /&gt;
	margin: 0.4em 0 0 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl dd {&lt;br /&gt;
	margin: 0.1em 0 0 1.1em;&lt;br /&gt;
	background-color: #f3f3f3;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Extension infobox styling */&lt;br /&gt;
.ext-infobox {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	width: 272px;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	margin: 0 0 0.5em 0.5em;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-infobox td {&lt;br /&gt;
	border: 2px none #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.5em;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #f0f0f0 !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-header {&lt;br /&gt;
	background-color: #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	color: white;&lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-header td { padding-top: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.ext-header img { padding: 0 0.2em 0 0.5em; }&lt;br /&gt;
.ext-status-unstable, .ext-status-unstable td { border-color: #990000; }&lt;br /&gt;
.ext-status-unstable .ext-header { background-color: #990000; color: #ffff00; }&lt;br /&gt;
.ext-status-experimental, .ext-status-experimental td { border-color: #cc6600; }&lt;br /&gt;
.ext-status-experimental .ext-header { background-color: #cc6600; }&lt;br /&gt;
.ext-status-beta, .ext-status-beta td { border-color: #000099; }&lt;br /&gt;
.ext-status-beta .ext-header { background-color: #000099; }&lt;br /&gt;
.ext-status-stable, .ext-status-stable td { border-color: #009900; }&lt;br /&gt;
.ext-status-stable .ext-header { background-color: #009900; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Cute little &amp;quot;tip&amp;quot; boxes */&lt;br /&gt;
div.tip {&lt;br /&gt;
	padding: 4px;&lt;br /&gt;
	margin-top: 4px;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 4px;&lt;br /&gt;
	min-height: 30px; /* IE users will hate this... */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.tip-info {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cc9933;&lt;br /&gt;
	background-color: #cccc99;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.tip-gotcha {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cc0000;&lt;br /&gt;
	background-color: #cc6666;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Language template */&lt;br /&gt;
.LanguageLinks { margin-top: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.LanguageLinks table {&lt;br /&gt;
	clear: both;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
	margin: 0;&lt;br /&gt;
	font-size: 85%;&lt;br /&gt;
	margin: 0 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.LanguageLinks span { white-space: nowrap; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Version box on [[Manual:Downloading MediaWiki]] */&lt;br /&gt;
#DownloadVersionBox {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid black;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse; &lt;br /&gt;
	margin: auto;&lt;br /&gt;
	width: 50%;&lt;br /&gt;
	color: black;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#DownloadVersionBox td {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid black;&lt;br /&gt;
	padding: 20px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Major warning - used on the main page template to warn against editing carelessly, but can be used elsewhere as well */&lt;br /&gt;
.majorwarning {&lt;br /&gt;
	background: yellow; &lt;br /&gt;
	padding: 0.3em; &lt;br /&gt;
	text-align: center; &lt;br /&gt;
	font-size: 125%; &lt;br /&gt;
	border: 2px solid red;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Page headings used throughout the wiki (though not very much at the time of writing…) */ &lt;br /&gt;
.page-notice, .page-warning {&lt;br /&gt;
	border-width: 1px; &lt;br /&gt;
	border-style: solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em 0.5em;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 1em;&lt;br /&gt;
	width: 95%; &lt;br /&gt;
	margin-left: auto; &lt;br /&gt;
	margin-right: auto; &lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Informative notices at the top of pages (blue) */&lt;br /&gt;
.page-notice {&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border-color: #025e9d; &lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Warning information at the top of pages (red) */&lt;br /&gt;
.page-warning {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
	border-color: #c51919;&lt;br /&gt;
	border-width: 2px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.pw-head {&lt;br /&gt;
	color: #c51919;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Used in Template:Notice */&lt;br /&gt;
.block-note {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/6/60/Bulbgraph.png/18px-Bulbgraph.png);&lt;br /&gt;
	background-position: top left;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/*&lt;br /&gt;
   Using block-contents in the hope that it can apply to all block-level warning templates, &lt;br /&gt;
   with different images applied as backgrounds to the wrapping DIV.&lt;br /&gt;
*/&lt;br /&gt;
.block-contents {&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	padding-left: 20px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Template documentation ([[Template:Documentation]]) */&lt;br /&gt;
.template-documentation {&lt;br /&gt;
	clear: both;&lt;br /&gt;
	margin: 1em 0 0 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaa; &lt;br /&gt;
	background-color: #ecfcf4; &lt;br /&gt;
	padding: 5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 8. SOME OTHER SMALL THINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Give a bit of space to the TOC */&lt;br /&gt;
#toc { margin: 1em 0; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* make the list of references look smaller and highlight clicked reference in blue */&lt;br /&gt;
ol.references { font-size: 100%; }&lt;br /&gt;
.references-small { font-size: 90%;}&lt;br /&gt;
ol.references &amp;gt; li:target { background-color: #ddeeff; }&lt;br /&gt;
sup.reference:target { background-color: #ddeeff; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Printing of thumbnails (bug 1583) */&lt;br /&gt;
div.tright { clear: right; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* extra buttons for edit dialog (from commons:MediaWiki:Common.css) */&lt;br /&gt;
.my-buttons { padding: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.my-buttons a {&lt;br /&gt;
	color: black;&lt;br /&gt;
	background-color: #ccddee !important;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
	font-size: 0.9em;&lt;br /&gt;
	text-decoration: none;&lt;br /&gt;
	border: thin #006699 outset;&lt;br /&gt;
	padding: 0 0.1em 0.1em 0.1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.my-buttons a:hover, .my-buttons a:active {&lt;br /&gt;
	background-color: #bbccdd;&lt;br /&gt;
	border-style: inset;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* from [[User:Splarka/Help:Linked images]] */&lt;br /&gt;
.imagelink_wikilogo a {&lt;br /&gt;
	width: 135px;&lt;br /&gt;
	height: 135px;&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	text-decoration: none;&lt;br /&gt;
	background-image: url(&amp;quot;http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/b/bc/Wiki.png&amp;quot;);&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/**** reduced subset of the mbox styles from enwiki, mainly for the nice boxflow ****/&lt;br /&gt;
th.mbox-text, td.mbox-text {     /* The message body cell(s) */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 0.25em 0.9em;       /* 0.9em left/right */&lt;br /&gt;
	width: 100%;    /* Make all mboxes the same width regardless of text length */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-image {                  /* The left image cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 2px 0 2px 0.9em;    /* 0.9em left, 0px right */&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-imageright {             /* The right image cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 2px 0.9em 2px 0;    /* 0px left, 0.9em right */&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-empty-cell {         /* An empty narrow cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 0px;&lt;br /&gt;
	width: 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* These mbox-small classes must be placed after all other &lt;br /&gt;
   ambox/tmbox/ombox etc classes. &amp;quot;body.mediawiki&amp;quot; is so &lt;br /&gt;
   they override &amp;quot;table.ambox + table.ambox&amp;quot; above. */&lt;br /&gt;
body.mediawiki table.mbox-small {   /* For the &amp;quot;small=yes&amp;quot; option. */&lt;br /&gt;
	clear: right;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	margin: 4px 0 4px 1em;&lt;br /&gt;
	width: 238px;&lt;br /&gt;
	font-size: 88%;&lt;br /&gt;
	line-height: 1.25em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
body.mediawiki table.mbox-small-left {   /* For the &amp;quot;small=left&amp;quot; option. */&lt;br /&gt;
	margin: 4px 1em 4px 0;&lt;br /&gt;
	width: 238px;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	font-size: 88%;&lt;br /&gt;
	line-height: 1.25em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Infobox template style */&lt;br /&gt;
.infobox {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
    background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
    color: black;&lt;br /&gt;
    margin: 0.5em 0 0.5em 1em;&lt;br /&gt;
    padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
    float: right;&lt;br /&gt;
    clear: right;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox td,&lt;br /&gt;
.infobox th {&lt;br /&gt;
    vertical-align: top;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox caption {&lt;br /&gt;
    font-size: larger;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered {&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered th {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .borderless td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .borderless th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.sisterproject {&lt;br /&gt;
    width: 20em;&lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #c0c090;&lt;br /&gt;
    background-color: #f8eaba;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk.bordered td,&lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk.bordered th {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #c0c090;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* styles for bordered infobox with merged rows */&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    border-top: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
    border-right: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    border-right: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Styles for geography infoboxes, eg countries,&lt;br /&gt;
   country subdivisions, cities, etc.            */&lt;br /&gt;
.infobox.geography {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography  td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.templateright {&lt;br /&gt;
background: #f0f7fd;&lt;br /&gt;
border: 1px #98C9F1 solid;&lt;br /&gt;
margin-left:10px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.bottom-nil {&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: none;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
.top-nil {&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: none;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.right-nil {&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: none;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.left-nil {&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for images infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.images {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg14.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images  td,&lt;br /&gt;
.infobox.images  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for District infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.district {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg14.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district  td,&lt;br /&gt;
.infobox.district  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for author infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.author {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg39.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author  td,&lt;br /&gt;
.infobox.author  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for scientists infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.scientists {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists  td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for artists infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.artists {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists  td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for player infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.player {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg10.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player  td,&lt;br /&gt;
.infobox.player  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for Collapsible Table */&lt;br /&gt;
.collapseButton {		/* 'show'/'hide' buttons created dynamically by the        */&lt;br /&gt;
	float: right;		/* CollapsibleTables JavaScript in [[MediaWiki:Common.js]] */&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;	/* are styled here so they can be customised.              */&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	width: auto;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Default skin for navigation boxes */&lt;br /&gt;
table.navbox {            /* Navbox container style */&lt;br /&gt;
  border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
  width: 100%; &lt;br /&gt;
  margin: auto;&lt;br /&gt;
  clear: both;&lt;br /&gt;
  font-size: 88%;&lt;br /&gt;
  text-align: center;&lt;br /&gt;
  padding: 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.navbox + table.navbox {  /* Single pixel border between adjacent navboxes */&lt;br /&gt;
  margin-top: -1px;            /* (doesn't work for IE6, but that's okay)       */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-title,&lt;br /&gt;
.navbox-abovebelow,&lt;br /&gt;
table.navbox th {&lt;br /&gt;
  text-align: center;      /* Title and above/below styles */&lt;br /&gt;
  padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
  padding-right: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-group {            /* Group style */&lt;br /&gt;
  white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
  text-align: right;&lt;br /&gt;
  font-weight: bold;&lt;br /&gt;
  padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
  padding-right: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox, .navbox-subgroup {&lt;br /&gt;
  background: #fdfdfd;     /* Background color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-list {&lt;br /&gt;
  border-color: #fdfdfd;   /* Must match background color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-title,&lt;br /&gt;
table.navbox th {&lt;br /&gt;
  background: #ccccff;     /* Level 1 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-abovebelow,&lt;br /&gt;
.navbox-group,&lt;br /&gt;
.navbox-subgroup .navbox-title {&lt;br /&gt;
  background: #ddddff;     /* Level 2 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-subgroup .navbox-group, .navbox-subgroup .navbox-abovebelow {&lt;br /&gt;
  background: #e6e6ff;     /* Level 3 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-even {&lt;br /&gt;
  background: #f7f7f7;     /* Even row striping */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-odd {&lt;br /&gt;
  background: transparent; /* Odd row striping */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox .collapseButton {  /* In navboxes, the show/hide button balances */&lt;br /&gt;
    width: 6em;            /* the vde links from [[Template:Tnavbar]],   */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.sign {&lt;br /&gt;
background:white;&lt;br /&gt;
border:1px solid #a7d7f9; &lt;br /&gt;
border-left:none;&lt;br /&gt;
padding-left:5px; &lt;br /&gt;
padding-right:5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
border:2px #CC9900 solid; &lt;br /&gt;
padding-left:5px; &lt;br /&gt;
padding-right:5px&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:link {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:visited {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:hover {&lt;br /&gt;
text-decoration: underline;&lt;br /&gt;
}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>साँचा:मुग़ल काल</title>
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		<updated>2010-05-12T06:00:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;top-menu&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[मुग़ल काल|प्रारम्भिक मुग़ल काल]] '''·''' [[मुग़ल काल 2|अफ़ग़ान और हुमायुँ]] '''·''' [[मुग़ल काल 3|शेरशाह का शासन]]  '''·''' [[मुग़ल काल 4|अकबर-प्रारम्भिक काल]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=20712</id>
		<title>साँचा:मुग़ल काल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=20712"/>
		<updated>2010-05-12T05:58:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;top-menu&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[मुग़ल काल|प्रारम्भिक मुग़ल काल]] '''·''' [[मुग़ल काल 2|अफ़ग़ान और हुमायुँ]] '''·''' [[मुग़ल काल 3|शेरशाह का शासन]]  '''·''' [[मुग़ल काल 4|अकबर का युग]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>साँचा:मुग़ल काल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=20711"/>
		<updated>2010-05-12T05:56:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;top-menu&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[मुग़ल काल|प्रारम्भिक मुग़ल काल]] '''·''' [[मुग़ल काल 2|अफ़ग़ान और हुमायुँ]] '''·''' [[मुग़ल काल 3|शेरशाह का शासन]]  '''·''' [[मुग़ल काल 4|अकबर का युग]]&lt;br /&gt;
|}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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	<entry>
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		<title>मीडियाविकि:Common.css</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF:Common.css&amp;diff=20709"/>
		<updated>2010-05-12T05:53:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;/* यहां रखी css सभी त्वचाओंपर असर करेगी */&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/*&lt;br /&gt;
This is the CSS for all skins (for all users) on MediaWiki.org. &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
SECTIONS:&lt;br /&gt;
1. Indication of namespaces&lt;br /&gt;
2. Color classes for content&lt;br /&gt;
3. Special pages&lt;br /&gt;
4. Main page styling&lt;br /&gt;
5. Sidebar external links&lt;br /&gt;
6. Extension:Matrix stuff&lt;br /&gt;
7. Wikitables, infobox templates, warnings, and other such stylings&lt;br /&gt;
8. Some other small things&lt;br /&gt;
*/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 1. INDICATION OF NAMESPACES *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Pseudo NS Special (light grey) */&lt;br /&gt;
.ns--2 #content { background-color: #f4f4f4; }&lt;br /&gt;
.ns--2 div.thumb { border-color: #f4f4f4; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Project + Project_talk (light sky blue) */&lt;br /&gt;
.ns-4 #content, .ns-5 #content { background-color: #f8fcff; }&lt;br /&gt;
.ns-4 div.thumb, .ns-5 div.thumb { border-color: #f8fcff; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS MediaWiki + MediaWiki_talk (light grey) */&lt;br /&gt;
.ns-8 #content, .ns-9 #content { background-color: #f4f4f4; }&lt;br /&gt;
.ns-8 div.thumb, .ns-9 div.thumb { border-color: #f4f4f4; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Manual + Manual_talk (light bluish violet) */&lt;br /&gt;
.ns-100 #content, .ns-101 #content { background-color: #f3f3ff; }&lt;br /&gt;
.ns-100 div.thumb, .ns-101 div.thumb { border-color: #f3f3ff; } &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* NS Manual + Manual_talk (light bluish violet) */&lt;br /&gt;
.ns-112 #content, .ns-112 #content { background-color: #f3f3ff; }&lt;br /&gt;
.ns-112 div.thumb, .ns-112 div.thumb { border-color: #f3f3ff; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Help (but NOT Help_talk) (blue border and Public Domain icon)  */&lt;br /&gt;
.ns-12 #content {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid #0000cc;&lt;br /&gt;
	border-right: none;&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/b/b8/PD-banner.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: right top;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ns-12 #bodyContent {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/6/67/PD-icon-faded.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: right 5em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 2. COLOR CLASSES FOR CONTENT  *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Border colors */&lt;br /&gt;
.borderc1 { border-color: #e9e9e9; border-width: thin; }  /* light grey */&lt;br /&gt;
.borderc2 { border-color: #aaaaaa; border-width: thin; }  /* grey (as toc) */&lt;br /&gt;
.borderc3 { border-color: #777777; border-width: thin; }  /* dark grey */&lt;br /&gt;
.borderc4 { border-color: #000000; border-width: thin; }  /* black */&lt;br /&gt;
.borderc5 { border-color: #c00000; border-width: thin; }  /* red */&lt;br /&gt;
.borderc6 { border-color: #025e9d; border-width: thin; }  /* blue */&lt;br /&gt;
.borderc7 { border-color: #008040; border-width: thin; }  /* green */&lt;br /&gt;
.borderc8 { border-color: #ffcc00; border-width: thin; }  /* yellow */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Background colors */&lt;br /&gt;
.backgroundc1 { background-color: #ffffff; }  /* white */&lt;br /&gt;
.backgroundc2 { background-color: #f9f9f9; }  /* light grey (as toc)  */&lt;br /&gt;
.backgroundc3 { background-color: #eeeeee; }  /* light grey (headers) */ &lt;br /&gt;
.backgroundc4 { background-color: #e0e0e0; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc5 { background-color: #d2d2d2; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc6 { background-color: #b7b7b7; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc7 { background-color: #a3a3a3; }  /* darker grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc8 { background-color: #444455; }  /* very dark grey */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 3. SPECIAL PAGES *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Marking redirects  */&lt;br /&gt;
.allpagesredirect, .watchlistredir, .redirect-in-category { font-style: italic; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Coloured edit size numbers on watchlist/recentchanges */&lt;br /&gt;
.mw-plusminus-pos { color: #006400; } /* darkgreen */&lt;br /&gt;
.mw-plusminus-neg { color: #8b0000; } /* darkred */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Consistent special page navigation */&lt;br /&gt;
.sp-cached {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/8c/Clock%20and%20warning.svg/20px-Clock%20and%20warning.svg);&lt;br /&gt;
	background-position: 5px 3px;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding: 4px 0 4px 30px;&lt;br /&gt;
	font-style: italic;&lt;br /&gt;
	color: #606000;&lt;br /&gt;
	margin: 0.3em 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #eeee80;&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffe0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.SpecialPageInfo {&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/89/Exquisite-khelpcenter.png/35px-Exquisite-khelpcenter.png);&lt;br /&gt;
	background-position: 0.8em 0.5em;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em 0.5em 0.3em 5.0em;&lt;br /&gt;
	border-color: #025e9d; &lt;br /&gt;
	border-width: 1px; &lt;br /&gt;
	border-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: medium;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#searchresulttext {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f1/Exquisite-kfind.png/45px-Exquisite-kfind.png);&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.mw-viewprevnext {&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cccccc;&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f2;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Special:Statistics */&lt;br /&gt;
.StatsTable {&lt;br /&gt;
	background: transparent;&lt;br /&gt;
	width: 75%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable th {&lt;br /&gt;
	vertical-align: middle;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
	width: 50px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable th, .StatsTable td {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
	padding: 0.5em 1em;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #ccccdd;&lt;br /&gt;
	margin: 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable tr {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Special:Search (more whitespace) */&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #search {&lt;br /&gt;
	padding: 1em 0 2em 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cccccc;&lt;br /&gt;
	padding: 0.5em 0.5em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch-namespaces {&lt;br /&gt;
	padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
	margin: 0.7em 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch-namespaces label {&lt;br /&gt;
	white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
	min-width: 8.4em;&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	float: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search br { clear: left; } /* Clear search button, but not check-boxes */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 4. MAIN PAGE STYLING *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#mainpage_topbox {&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	padding: 0px;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	margin: 0.2em 10px 10px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxtitle, .mainpage_hubtitle, #mainpage_pagetitle {&lt;br /&gt;
	font-size: 105%;&lt;br /&gt;
	padding: 0.4em;&lt;br /&gt;
	background-color: #eeeeee;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	line-height: 120%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_pagetitle {&lt;br /&gt;
	color: #cf7606;&lt;br /&gt;
	font-size: 200% !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_sitelinks {&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubtitle {&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxcontents, .mainpage_boxcontents_small {&lt;br /&gt;
	background: #ffffff;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxcontents_small {&lt;br /&gt;
	font-size: 95%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubbox, #mainpage_newscell, #mainpage_downloadcell {&lt;br /&gt;
	padding: 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubbox {&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_newscell {&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 15px;&lt;br /&gt;
	margin-top: 0 !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_newscell .mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/89/Exquisite-khelpcenter.png/20px-Exquisite-khelpcenter.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: 99% 0.3em;&lt;br /&gt;
	padding-right: 25px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_downloadcell {&lt;br /&gt;
	width: 17em;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_downloadcell .mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5d/Crystal_Clear_action_build.png/18px-Crystal_Clear_action_build.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: 96% 0.33em;&lt;br /&gt;
	padding-right: 25px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_mwtitle { color: #005288; } /* The words 'MediaWiki.org' in the title. */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* The &amp;quot;mainpage&amp;quot; class is added to the body with javascript for the main page in all */&lt;br /&gt;
/* languages, so we can style things that apppear on the main page and also elsewhere. */&lt;br /&gt;
.mainpage #lastmod, &lt;br /&gt;
.mainpage #siteSub, &lt;br /&gt;
.mainpage h1.firstHeading {&lt;br /&gt;
	display: none !important;&lt;br /&gt;
} &lt;br /&gt;
.mainpage #content {&lt;br /&gt;
	padding-top: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 5. SIDEBAR EXTERNAL LINKS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#n-browse-cvs a, #n-phpdoc a, #n-Mailing-list a {&lt;br /&gt;
	background: url(/skins-1.5/monobook/external.png) center right no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding-right: 13px;&lt;br /&gt;
	color: #3366bb;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 6. PRETTIFY [[Extension Matrix]] *****/  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.xm-table {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #666666;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-table td, .xm-table th {&lt;br /&gt;
	vertical-align: top;&lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	background-color: #EEEEEE;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-table th, .xm-name { font-weight: bold; }&lt;br /&gt;
.xm-status-unknown, &lt;br /&gt;
.xm-type-unknown {&lt;br /&gt;
	color: #888888;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-status-experimental { color: red; }&lt;br /&gt;
.xm-status-beta { color: blue; }&lt;br /&gt;
.xm-status-stable { color: green; }&lt;br /&gt;
.xm-name, .xm-status,&lt;br /&gt;
.xm-type, .xm-version,&lt;br /&gt;
.xm-updated {&lt;br /&gt;
	white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-updated { font-size:80%; }&lt;br /&gt;
.xm-alert { background-color: yellow; }&lt;br /&gt;
td.xm-blank { background-color: inherit; }&lt;br /&gt;
td.xm-updated { background-color: inherit; }&lt;br /&gt;
td.xm-description { background-color: inherit; font-style: italic; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
th.xm-blank,&lt;br /&gt;
th.xm-updated,&lt;br /&gt;
th.xm-description {&lt;br /&gt;
	background-color: inherit;&lt;br /&gt;
	padding-bottom: 0.6ex;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #666666;&lt;br /&gt;
}  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 7. WIKITABLES, INFOBOX TEMPLATES, WARNINGS AND OTHER SUCH STYLINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Wikitable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.wikitable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #a7d7f9 solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable th, table.wikitable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #a7d7f9 solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable th, table.wikitable td.hl3, table.wikitable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.wikitable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #94c3eb;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable td.hl1, table.wikitable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.wikitable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable td.hl2, table.wikitable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.wikitable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 7A. BHARATTABLES, INFOBOX TEMPLATES, WARNINGS AND OTHER SUCH STYLINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* bharattable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.bharattable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable th, table.bharattable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable th, table.bharattable td.hl3, table.bharattable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.bharattable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f7e6b9;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable td.hl1, table.bharattable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.bharattable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable td.hl2, table.bharattable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.bharattable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* tourinfotable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.tourinfotable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#4f4f01;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable th, table.tourinfotable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable th, table.tourinfotable td.hl3, table.tourinfotable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.tourinfotable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f7e6b9;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#4f4f01;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable td.hl1, table.tourinfotable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.tourinfotable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable td.hl2, table.tourinfotable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.tourinfotable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* Infoboxtable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.infoboxtable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #ffffff;&lt;br /&gt;
	border: 1px #c8e3f7 solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#075352;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable th, table.infoboxtable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #c8e3f7 solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable th, table.infoboxtable td.hl3, table.infoboxtable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.infoboxtable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f0f7fd;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#075352;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable td.hl1, table.infoboxtable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.infoboxtable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable td.hl2, table.infoboxtable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.infoboxtable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* General purpose &amp;quot;pretty (data) tables&amp;quot; */&lt;br /&gt;
table.datatable { background-color: transparent; }&lt;br /&gt;
table.datatable th, table.datatable td { padding: 4px; }&lt;br /&gt;
table.datatable th { text-align: left; background-color: #999999; }&lt;br /&gt;
table.datatable tr { background-color: #cccccc; }&lt;br /&gt;
table.datatable tr:hover { background-color: #ffffcc; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* SideBox styling */&lt;br /&gt;
div.sideBox {&lt;br /&gt;
	position: relative;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	background: white;&lt;br /&gt;
	margin-left: 1em;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid gray;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em;&lt;br /&gt;
	width: 200px;&lt;br /&gt;
	overflow: hidden; &lt;br /&gt;
	clear: right;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl {&lt;br /&gt;
	padding: 0;&lt;br /&gt;
	margin: 0 0 0.3em 0;&lt;br /&gt;
	font-size: 96%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl dt {&lt;br /&gt;
	background: none;&lt;br /&gt;
	margin: 0.4em 0 0 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl dd {&lt;br /&gt;
	margin: 0.1em 0 0 1.1em;&lt;br /&gt;
	background-color: #f3f3f3;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Extension infobox styling */&lt;br /&gt;
.ext-infobox {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	width: 272px;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	margin: 0 0 0.5em 0.5em;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-infobox td {&lt;br /&gt;
	border: 2px none #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.5em;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #f0f0f0 !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-header {&lt;br /&gt;
	background-color: #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	color: white;&lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-header td { padding-top: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.ext-header img { padding: 0 0.2em 0 0.5em; }&lt;br /&gt;
.ext-status-unstable, .ext-status-unstable td { border-color: #990000; }&lt;br /&gt;
.ext-status-unstable .ext-header { background-color: #990000; color: #ffff00; }&lt;br /&gt;
.ext-status-experimental, .ext-status-experimental td { border-color: #cc6600; }&lt;br /&gt;
.ext-status-experimental .ext-header { background-color: #cc6600; }&lt;br /&gt;
.ext-status-beta, .ext-status-beta td { border-color: #000099; }&lt;br /&gt;
.ext-status-beta .ext-header { background-color: #000099; }&lt;br /&gt;
.ext-status-stable, .ext-status-stable td { border-color: #009900; }&lt;br /&gt;
.ext-status-stable .ext-header { background-color: #009900; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Cute little &amp;quot;tip&amp;quot; boxes */&lt;br /&gt;
div.tip {&lt;br /&gt;
	padding: 4px;&lt;br /&gt;
	margin-top: 4px;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 4px;&lt;br /&gt;
	min-height: 30px; /* IE users will hate this... */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.tip-info {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cc9933;&lt;br /&gt;
	background-color: #cccc99;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.tip-gotcha {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cc0000;&lt;br /&gt;
	background-color: #cc6666;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Language template */&lt;br /&gt;
.LanguageLinks { margin-top: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.LanguageLinks table {&lt;br /&gt;
	clear: both;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
	margin: 0;&lt;br /&gt;
	font-size: 85%;&lt;br /&gt;
	margin: 0 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.LanguageLinks span { white-space: nowrap; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Version box on [[Manual:Downloading MediaWiki]] */&lt;br /&gt;
#DownloadVersionBox {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid black;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse; &lt;br /&gt;
	margin: auto;&lt;br /&gt;
	width: 50%;&lt;br /&gt;
	color: black;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#DownloadVersionBox td {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid black;&lt;br /&gt;
	padding: 20px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Major warning - used on the main page template to warn against editing carelessly, but can be used elsewhere as well */&lt;br /&gt;
.majorwarning {&lt;br /&gt;
	background: yellow; &lt;br /&gt;
	padding: 0.3em; &lt;br /&gt;
	text-align: center; &lt;br /&gt;
	font-size: 125%; &lt;br /&gt;
	border: 2px solid red;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Page headings used throughout the wiki (though not very much at the time of writing…) */ &lt;br /&gt;
.page-notice, .page-warning {&lt;br /&gt;
	border-width: 1px; &lt;br /&gt;
	border-style: solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em 0.5em;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 1em;&lt;br /&gt;
	width: 95%; &lt;br /&gt;
	margin-left: auto; &lt;br /&gt;
	margin-right: auto; &lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Informative notices at the top of pages (blue) */&lt;br /&gt;
.page-notice {&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border-color: #025e9d; &lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Warning information at the top of pages (red) */&lt;br /&gt;
.page-warning {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
	border-color: #c51919;&lt;br /&gt;
	border-width: 2px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.pw-head {&lt;br /&gt;
	color: #c51919;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Used in Template:Notice */&lt;br /&gt;
.block-note {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/6/60/Bulbgraph.png/18px-Bulbgraph.png);&lt;br /&gt;
	background-position: top left;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/*&lt;br /&gt;
   Using block-contents in the hope that it can apply to all block-level warning templates, &lt;br /&gt;
   with different images applied as backgrounds to the wrapping DIV.&lt;br /&gt;
*/&lt;br /&gt;
.block-contents {&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	padding-left: 20px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Template documentation ([[Template:Documentation]]) */&lt;br /&gt;
.template-documentation {&lt;br /&gt;
	clear: both;&lt;br /&gt;
	margin: 1em 0 0 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaa; &lt;br /&gt;
	background-color: #ecfcf4; &lt;br /&gt;
	padding: 5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 8. SOME OTHER SMALL THINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Give a bit of space to the TOC */&lt;br /&gt;
#toc { margin: 1em 0; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* make the list of references look smaller and highlight clicked reference in blue */&lt;br /&gt;
ol.references { font-size: 100%; }&lt;br /&gt;
.references-small { font-size: 90%;}&lt;br /&gt;
ol.references &amp;gt; li:target { background-color: #ddeeff; }&lt;br /&gt;
sup.reference:target { background-color: #ddeeff; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Printing of thumbnails (bug 1583) */&lt;br /&gt;
div.tright { clear: right; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* extra buttons for edit dialog (from commons:MediaWiki:Common.css) */&lt;br /&gt;
.my-buttons { padding: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.my-buttons a {&lt;br /&gt;
	color: black;&lt;br /&gt;
	background-color: #ccddee !important;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
	font-size: 0.9em;&lt;br /&gt;
	text-decoration: none;&lt;br /&gt;
	border: thin #006699 outset;&lt;br /&gt;
	padding: 0 0.1em 0.1em 0.1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.my-buttons a:hover, .my-buttons a:active {&lt;br /&gt;
	background-color: #bbccdd;&lt;br /&gt;
	border-style: inset;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* from [[User:Splarka/Help:Linked images]] */&lt;br /&gt;
.imagelink_wikilogo a {&lt;br /&gt;
	width: 135px;&lt;br /&gt;
	height: 135px;&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	text-decoration: none;&lt;br /&gt;
	background-image: url(&amp;quot;http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/b/bc/Wiki.png&amp;quot;);&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/**** reduced subset of the mbox styles from enwiki, mainly for the nice boxflow ****/&lt;br /&gt;
th.mbox-text, td.mbox-text {     /* The message body cell(s) */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 0.25em 0.9em;       /* 0.9em left/right */&lt;br /&gt;
	width: 100%;    /* Make all mboxes the same width regardless of text length */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-image {                  /* The left image cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 2px 0 2px 0.9em;    /* 0.9em left, 0px right */&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-imageright {             /* The right image cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 2px 0.9em 2px 0;    /* 0px left, 0.9em right */&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-empty-cell {         /* An empty narrow cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 0px;&lt;br /&gt;
	width: 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* These mbox-small classes must be placed after all other &lt;br /&gt;
   ambox/tmbox/ombox etc classes. &amp;quot;body.mediawiki&amp;quot; is so &lt;br /&gt;
   they override &amp;quot;table.ambox + table.ambox&amp;quot; above. */&lt;br /&gt;
body.mediawiki table.mbox-small {   /* For the &amp;quot;small=yes&amp;quot; option. */&lt;br /&gt;
	clear: right;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	margin: 4px 0 4px 1em;&lt;br /&gt;
	width: 238px;&lt;br /&gt;
	font-size: 88%;&lt;br /&gt;
	line-height: 1.25em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
body.mediawiki table.mbox-small-left {   /* For the &amp;quot;small=left&amp;quot; option. */&lt;br /&gt;
	margin: 4px 1em 4px 0;&lt;br /&gt;
	width: 238px;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	font-size: 88%;&lt;br /&gt;
	line-height: 1.25em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Infobox template style */&lt;br /&gt;
.infobox {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
    background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
    color: black;&lt;br /&gt;
    margin: 0.5em 0 0.5em 1em;&lt;br /&gt;
    padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
    float: right;&lt;br /&gt;
    clear: right;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox td,&lt;br /&gt;
.infobox th {&lt;br /&gt;
    vertical-align: top;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox caption {&lt;br /&gt;
    font-size: larger;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered {&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered th {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .borderless td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .borderless th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.sisterproject {&lt;br /&gt;
    width: 20em;&lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #c0c090;&lt;br /&gt;
    background-color: #f8eaba;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk.bordered td,&lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk.bordered th {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #c0c090;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* styles for bordered infobox with merged rows */&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    border-top: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
    border-right: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    border-right: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Styles for geography infoboxes, eg countries,&lt;br /&gt;
   country subdivisions, cities, etc.            */&lt;br /&gt;
.infobox.geography {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography  td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.templateright {&lt;br /&gt;
background: #f0f7fd;&lt;br /&gt;
border: 1px #98C9F1 solid;&lt;br /&gt;
margin-left:10px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.bottom-nil {&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: none;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
.top-nil {&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: none;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.right-nil {&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: none;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.left-nil {&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for images infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.images {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg14.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images  td,&lt;br /&gt;
.infobox.images  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for District infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.district {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg14.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district  td,&lt;br /&gt;
.infobox.district  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for author infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.author {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg39.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author  td,&lt;br /&gt;
.infobox.author  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for scientists infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.scientists {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists  td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for artists infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.artists {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists  td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for player infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.player {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg10.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player  td,&lt;br /&gt;
.infobox.player  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for Collapsible Table */&lt;br /&gt;
.collapseButton {		/* 'show'/'hide' buttons created dynamically by the        */&lt;br /&gt;
	float: right;		/* CollapsibleTables JavaScript in [[MediaWiki:Common.js]] */&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;	/* are styled here so they can be customised.              */&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	width: auto;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Default skin for navigation boxes */&lt;br /&gt;
table.navbox {            /* Navbox container style */&lt;br /&gt;
  border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
  width: 100%; &lt;br /&gt;
  margin: auto;&lt;br /&gt;
  clear: both;&lt;br /&gt;
  font-size: 88%;&lt;br /&gt;
  text-align: center;&lt;br /&gt;
  padding: 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.navbox + table.navbox {  /* Single pixel border between adjacent navboxes */&lt;br /&gt;
  margin-top: -1px;            /* (doesn't work for IE6, but that's okay)       */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-title,&lt;br /&gt;
.navbox-abovebelow,&lt;br /&gt;
table.navbox th {&lt;br /&gt;
  text-align: center;      /* Title and above/below styles */&lt;br /&gt;
  padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
  padding-right: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-group {            /* Group style */&lt;br /&gt;
  white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
  text-align: right;&lt;br /&gt;
  font-weight: bold;&lt;br /&gt;
  padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
  padding-right: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox, .navbox-subgroup {&lt;br /&gt;
  background: #fdfdfd;     /* Background color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-list {&lt;br /&gt;
  border-color: #fdfdfd;   /* Must match background color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-title,&lt;br /&gt;
table.navbox th {&lt;br /&gt;
  background: #ccccff;     /* Level 1 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-abovebelow,&lt;br /&gt;
.navbox-group,&lt;br /&gt;
.navbox-subgroup .navbox-title {&lt;br /&gt;
  background: #ddddff;     /* Level 2 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-subgroup .navbox-group, .navbox-subgroup .navbox-abovebelow {&lt;br /&gt;
  background: #e6e6ff;     /* Level 3 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-even {&lt;br /&gt;
  background: #f7f7f7;     /* Even row striping */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-odd {&lt;br /&gt;
  background: transparent; /* Odd row striping */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox .collapseButton {  /* In navboxes, the show/hide button balances */&lt;br /&gt;
    width: 6em;            /* the vde links from [[Template:Tnavbar]],   */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.sign {&lt;br /&gt;
background:white;&lt;br /&gt;
border:1px solid #a7d7f9; &lt;br /&gt;
border-left:none;&lt;br /&gt;
padding-left:5px; &lt;br /&gt;
padding-right:5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
border:2px #CC9900 solid; &lt;br /&gt;
padding-left:5px; &lt;br /&gt;
padding-right:5px&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:link {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:visited {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:hover {&lt;br /&gt;
text-decoration: underline;&lt;br /&gt;
}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=20707</id>
		<title>साँचा:मुग़ल काल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=20707"/>
		<updated>2010-05-12T05:52:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;top-menu&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[मुग़ल काल|प्रारम्भिक मुग़ल काल]] '''·''' [[मुग़ल काल 2|अफ़ग़ान और हुमाँयु]] '''·''' [[मुग़ल काल 3|शेरशाह का शासन]]  '''·''' [[मुग़ल काल 4|अकबर का युग]]&lt;br /&gt;
|}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF:Common.css&amp;diff=20706</id>
		<title>मीडियाविकि:Common.css</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF:Common.css&amp;diff=20706"/>
		<updated>2010-05-12T05:51:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;/* यहां रखी css सभी त्वचाओंपर असर करेगी */&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/*&lt;br /&gt;
This is the CSS for all skins (for all users) on MediaWiki.org. &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
SECTIONS:&lt;br /&gt;
1. Indication of namespaces&lt;br /&gt;
2. Color classes for content&lt;br /&gt;
3. Special pages&lt;br /&gt;
4. Main page styling&lt;br /&gt;
5. Sidebar external links&lt;br /&gt;
6. Extension:Matrix stuff&lt;br /&gt;
7. Wikitables, infobox templates, warnings, and other such stylings&lt;br /&gt;
8. Some other small things&lt;br /&gt;
*/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 1. INDICATION OF NAMESPACES *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Pseudo NS Special (light grey) */&lt;br /&gt;
.ns--2 #content { background-color: #f4f4f4; }&lt;br /&gt;
.ns--2 div.thumb { border-color: #f4f4f4; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Project + Project_talk (light sky blue) */&lt;br /&gt;
.ns-4 #content, .ns-5 #content { background-color: #f8fcff; }&lt;br /&gt;
.ns-4 div.thumb, .ns-5 div.thumb { border-color: #f8fcff; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS MediaWiki + MediaWiki_talk (light grey) */&lt;br /&gt;
.ns-8 #content, .ns-9 #content { background-color: #f4f4f4; }&lt;br /&gt;
.ns-8 div.thumb, .ns-9 div.thumb { border-color: #f4f4f4; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Manual + Manual_talk (light bluish violet) */&lt;br /&gt;
.ns-100 #content, .ns-101 #content { background-color: #f3f3ff; }&lt;br /&gt;
.ns-100 div.thumb, .ns-101 div.thumb { border-color: #f3f3ff; } &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* NS Manual + Manual_talk (light bluish violet) */&lt;br /&gt;
.ns-112 #content, .ns-112 #content { background-color: #f3f3ff; }&lt;br /&gt;
.ns-112 div.thumb, .ns-112 div.thumb { border-color: #f3f3ff; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Help (but NOT Help_talk) (blue border and Public Domain icon)  */&lt;br /&gt;
.ns-12 #content {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid #0000cc;&lt;br /&gt;
	border-right: none;&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/b/b8/PD-banner.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: right top;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ns-12 #bodyContent {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/6/67/PD-icon-faded.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: right 5em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 2. COLOR CLASSES FOR CONTENT  *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Border colors */&lt;br /&gt;
.borderc1 { border-color: #e9e9e9; border-width: thin; }  /* light grey */&lt;br /&gt;
.borderc2 { border-color: #aaaaaa; border-width: thin; }  /* grey (as toc) */&lt;br /&gt;
.borderc3 { border-color: #777777; border-width: thin; }  /* dark grey */&lt;br /&gt;
.borderc4 { border-color: #000000; border-width: thin; }  /* black */&lt;br /&gt;
.borderc5 { border-color: #c00000; border-width: thin; }  /* red */&lt;br /&gt;
.borderc6 { border-color: #025e9d; border-width: thin; }  /* blue */&lt;br /&gt;
.borderc7 { border-color: #008040; border-width: thin; }  /* green */&lt;br /&gt;
.borderc8 { border-color: #ffcc00; border-width: thin; }  /* yellow */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Background colors */&lt;br /&gt;
.backgroundc1 { background-color: #ffffff; }  /* white */&lt;br /&gt;
.backgroundc2 { background-color: #f9f9f9; }  /* light grey (as toc)  */&lt;br /&gt;
.backgroundc3 { background-color: #eeeeee; }  /* light grey (headers) */ &lt;br /&gt;
.backgroundc4 { background-color: #e0e0e0; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc5 { background-color: #d2d2d2; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc6 { background-color: #b7b7b7; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc7 { background-color: #a3a3a3; }  /* darker grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc8 { background-color: #444455; }  /* very dark grey */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 3. SPECIAL PAGES *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Marking redirects  */&lt;br /&gt;
.allpagesredirect, .watchlistredir, .redirect-in-category { font-style: italic; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Coloured edit size numbers on watchlist/recentchanges */&lt;br /&gt;
.mw-plusminus-pos { color: #006400; } /* darkgreen */&lt;br /&gt;
.mw-plusminus-neg { color: #8b0000; } /* darkred */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Consistent special page navigation */&lt;br /&gt;
.sp-cached {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/8c/Clock%20and%20warning.svg/20px-Clock%20and%20warning.svg);&lt;br /&gt;
	background-position: 5px 3px;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding: 4px 0 4px 30px;&lt;br /&gt;
	font-style: italic;&lt;br /&gt;
	color: #606000;&lt;br /&gt;
	margin: 0.3em 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #eeee80;&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffe0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.SpecialPageInfo {&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/89/Exquisite-khelpcenter.png/35px-Exquisite-khelpcenter.png);&lt;br /&gt;
	background-position: 0.8em 0.5em;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em 0.5em 0.3em 5.0em;&lt;br /&gt;
	border-color: #025e9d; &lt;br /&gt;
	border-width: 1px; &lt;br /&gt;
	border-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: medium;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#searchresulttext {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f1/Exquisite-kfind.png/45px-Exquisite-kfind.png);&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.mw-viewprevnext {&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cccccc;&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f2;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Special:Statistics */&lt;br /&gt;
.StatsTable {&lt;br /&gt;
	background: transparent;&lt;br /&gt;
	width: 75%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable th {&lt;br /&gt;
	vertical-align: middle;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
	width: 50px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable th, .StatsTable td {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
	padding: 0.5em 1em;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #ccccdd;&lt;br /&gt;
	margin: 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable tr {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Special:Search (more whitespace) */&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #search {&lt;br /&gt;
	padding: 1em 0 2em 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cccccc;&lt;br /&gt;
	padding: 0.5em 0.5em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch-namespaces {&lt;br /&gt;
	padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
	margin: 0.7em 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch-namespaces label {&lt;br /&gt;
	white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
	min-width: 8.4em;&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	float: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search br { clear: left; } /* Clear search button, but not check-boxes */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 4. MAIN PAGE STYLING *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#mainpage_topbox {&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	padding: 0px;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	margin: 0.2em 10px 10px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxtitle, .mainpage_hubtitle, #mainpage_pagetitle {&lt;br /&gt;
	font-size: 105%;&lt;br /&gt;
	padding: 0.4em;&lt;br /&gt;
	background-color: #eeeeee;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	line-height: 120%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_pagetitle {&lt;br /&gt;
	color: #cf7606;&lt;br /&gt;
	font-size: 200% !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_sitelinks {&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubtitle {&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxcontents, .mainpage_boxcontents_small {&lt;br /&gt;
	background: #ffffff;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxcontents_small {&lt;br /&gt;
	font-size: 95%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubbox, #mainpage_newscell, #mainpage_downloadcell {&lt;br /&gt;
	padding: 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubbox {&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_newscell {&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 15px;&lt;br /&gt;
	margin-top: 0 !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_newscell .mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/89/Exquisite-khelpcenter.png/20px-Exquisite-khelpcenter.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: 99% 0.3em;&lt;br /&gt;
	padding-right: 25px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_downloadcell {&lt;br /&gt;
	width: 17em;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_downloadcell .mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5d/Crystal_Clear_action_build.png/18px-Crystal_Clear_action_build.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: 96% 0.33em;&lt;br /&gt;
	padding-right: 25px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_mwtitle { color: #005288; } /* The words 'MediaWiki.org' in the title. */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* The &amp;quot;mainpage&amp;quot; class is added to the body with javascript for the main page in all */&lt;br /&gt;
/* languages, so we can style things that apppear on the main page and also elsewhere. */&lt;br /&gt;
.mainpage #lastmod, &lt;br /&gt;
.mainpage #siteSub, &lt;br /&gt;
.mainpage h1.firstHeading {&lt;br /&gt;
	display: none !important;&lt;br /&gt;
} &lt;br /&gt;
.mainpage #content {&lt;br /&gt;
	padding-top: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 5. SIDEBAR EXTERNAL LINKS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#n-browse-cvs a, #n-phpdoc a, #n-Mailing-list a {&lt;br /&gt;
	background: url(/skins-1.5/monobook/external.png) center right no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding-right: 13px;&lt;br /&gt;
	color: #3366bb;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 6. PRETTIFY [[Extension Matrix]] *****/  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.xm-table {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #666666;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-table td, .xm-table th {&lt;br /&gt;
	vertical-align: top;&lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	background-color: #EEEEEE;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-table th, .xm-name { font-weight: bold; }&lt;br /&gt;
.xm-status-unknown, &lt;br /&gt;
.xm-type-unknown {&lt;br /&gt;
	color: #888888;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-status-experimental { color: red; }&lt;br /&gt;
.xm-status-beta { color: blue; }&lt;br /&gt;
.xm-status-stable { color: green; }&lt;br /&gt;
.xm-name, .xm-status,&lt;br /&gt;
.xm-type, .xm-version,&lt;br /&gt;
.xm-updated {&lt;br /&gt;
	white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-updated { font-size:80%; }&lt;br /&gt;
.xm-alert { background-color: yellow; }&lt;br /&gt;
td.xm-blank { background-color: inherit; }&lt;br /&gt;
td.xm-updated { background-color: inherit; }&lt;br /&gt;
td.xm-description { background-color: inherit; font-style: italic; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
th.xm-blank,&lt;br /&gt;
th.xm-updated,&lt;br /&gt;
th.xm-description {&lt;br /&gt;
	background-color: inherit;&lt;br /&gt;
	padding-bottom: 0.6ex;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #666666;&lt;br /&gt;
}  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 7. WIKITABLES, INFOBOX TEMPLATES, WARNINGS AND OTHER SUCH STYLINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Wikitable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.wikitable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #a7d7f9 solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable th, table.wikitable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #a7d7f9 solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable th, table.wikitable td.hl3, table.wikitable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.wikitable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #94c3eb;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable td.hl1, table.wikitable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.wikitable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable td.hl2, table.wikitable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.wikitable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 7A. BHARATTABLES, INFOBOX TEMPLATES, WARNINGS AND OTHER SUCH STYLINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* bharattable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.bharattable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable th, table.bharattable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable th, table.bharattable td.hl3, table.bharattable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.bharattable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f7e6b9;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable td.hl1, table.bharattable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.bharattable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable td.hl2, table.bharattable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.bharattable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* tourinfotable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.tourinfotable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#4f4f01;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable th, table.tourinfotable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable th, table.tourinfotable td.hl3, table.tourinfotable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.tourinfotable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f7e6b9;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#4f4f01;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable td.hl1, table.tourinfotable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.tourinfotable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable td.hl2, table.tourinfotable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.tourinfotable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* Infoboxtable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.infoboxtable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #ffffff;&lt;br /&gt;
	border: 1px #c8e3f7 solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#075352;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable th, table.infoboxtable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #c8e3f7 solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable th, table.infoboxtable td.hl3, table.infoboxtable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.infoboxtable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f0f7fd;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#075352;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable td.hl1, table.infoboxtable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.infoboxtable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable td.hl2, table.infoboxtable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.infoboxtable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* General purpose &amp;quot;pretty (data) tables&amp;quot; */&lt;br /&gt;
table.datatable { background-color: transparent; }&lt;br /&gt;
table.datatable th, table.datatable td { padding: 4px; }&lt;br /&gt;
table.datatable th { text-align: left; background-color: #999999; }&lt;br /&gt;
table.datatable tr { background-color: #cccccc; }&lt;br /&gt;
table.datatable tr:hover { background-color: #ffffcc; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* SideBox styling */&lt;br /&gt;
div.sideBox {&lt;br /&gt;
	position: relative;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	background: white;&lt;br /&gt;
	margin-left: 1em;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid gray;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em;&lt;br /&gt;
	width: 200px;&lt;br /&gt;
	overflow: hidden; &lt;br /&gt;
	clear: right;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl {&lt;br /&gt;
	padding: 0;&lt;br /&gt;
	margin: 0 0 0.3em 0;&lt;br /&gt;
	font-size: 96%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl dt {&lt;br /&gt;
	background: none;&lt;br /&gt;
	margin: 0.4em 0 0 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl dd {&lt;br /&gt;
	margin: 0.1em 0 0 1.1em;&lt;br /&gt;
	background-color: #f3f3f3;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Extension infobox styling */&lt;br /&gt;
.ext-infobox {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	width: 272px;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	margin: 0 0 0.5em 0.5em;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-infobox td {&lt;br /&gt;
	border: 2px none #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.5em;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #f0f0f0 !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-header {&lt;br /&gt;
	background-color: #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	color: white;&lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-header td { padding-top: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.ext-header img { padding: 0 0.2em 0 0.5em; }&lt;br /&gt;
.ext-status-unstable, .ext-status-unstable td { border-color: #990000; }&lt;br /&gt;
.ext-status-unstable .ext-header { background-color: #990000; color: #ffff00; }&lt;br /&gt;
.ext-status-experimental, .ext-status-experimental td { border-color: #cc6600; }&lt;br /&gt;
.ext-status-experimental .ext-header { background-color: #cc6600; }&lt;br /&gt;
.ext-status-beta, .ext-status-beta td { border-color: #000099; }&lt;br /&gt;
.ext-status-beta .ext-header { background-color: #000099; }&lt;br /&gt;
.ext-status-stable, .ext-status-stable td { border-color: #009900; }&lt;br /&gt;
.ext-status-stable .ext-header { background-color: #009900; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Cute little &amp;quot;tip&amp;quot; boxes */&lt;br /&gt;
div.tip {&lt;br /&gt;
	padding: 4px;&lt;br /&gt;
	margin-top: 4px;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 4px;&lt;br /&gt;
	min-height: 30px; /* IE users will hate this... */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.tip-info {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cc9933;&lt;br /&gt;
	background-color: #cccc99;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.tip-gotcha {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cc0000;&lt;br /&gt;
	background-color: #cc6666;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Language template */&lt;br /&gt;
.LanguageLinks { margin-top: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.LanguageLinks table {&lt;br /&gt;
	clear: both;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
	margin: 0;&lt;br /&gt;
	font-size: 85%;&lt;br /&gt;
	margin: 0 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.LanguageLinks span { white-space: nowrap; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Version box on [[Manual:Downloading MediaWiki]] */&lt;br /&gt;
#DownloadVersionBox {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid black;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse; &lt;br /&gt;
	margin: auto;&lt;br /&gt;
	width: 50%;&lt;br /&gt;
	color: black;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#DownloadVersionBox td {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid black;&lt;br /&gt;
	padding: 20px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Major warning - used on the main page template to warn against editing carelessly, but can be used elsewhere as well */&lt;br /&gt;
.majorwarning {&lt;br /&gt;
	background: yellow; &lt;br /&gt;
	padding: 0.3em; &lt;br /&gt;
	text-align: center; &lt;br /&gt;
	font-size: 125%; &lt;br /&gt;
	border: 2px solid red;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Page headings used throughout the wiki (though not very much at the time of writing…) */ &lt;br /&gt;
.page-notice, .page-warning {&lt;br /&gt;
	border-width: 1px; &lt;br /&gt;
	border-style: solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em 0.5em;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 1em;&lt;br /&gt;
	width: 95%; &lt;br /&gt;
	margin-left: auto; &lt;br /&gt;
	margin-right: auto; &lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Informative notices at the top of pages (blue) */&lt;br /&gt;
.page-notice {&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border-color: #025e9d; &lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Warning information at the top of pages (red) */&lt;br /&gt;
.page-warning {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
	border-color: #c51919;&lt;br /&gt;
	border-width: 2px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.pw-head {&lt;br /&gt;
	color: #c51919;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Used in Template:Notice */&lt;br /&gt;
.block-note {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/6/60/Bulbgraph.png/18px-Bulbgraph.png);&lt;br /&gt;
	background-position: top left;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/*&lt;br /&gt;
   Using block-contents in the hope that it can apply to all block-level warning templates, &lt;br /&gt;
   with different images applied as backgrounds to the wrapping DIV.&lt;br /&gt;
*/&lt;br /&gt;
.block-contents {&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	padding-left: 20px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Template documentation ([[Template:Documentation]]) */&lt;br /&gt;
.template-documentation {&lt;br /&gt;
	clear: both;&lt;br /&gt;
	margin: 1em 0 0 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaa; &lt;br /&gt;
	background-color: #ecfcf4; &lt;br /&gt;
	padding: 5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 8. SOME OTHER SMALL THINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Give a bit of space to the TOC */&lt;br /&gt;
#toc { margin: 1em 0; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* make the list of references look smaller and highlight clicked reference in blue */&lt;br /&gt;
ol.references { font-size: 100%; }&lt;br /&gt;
.references-small { font-size: 90%;}&lt;br /&gt;
ol.references &amp;gt; li:target { background-color: #ddeeff; }&lt;br /&gt;
sup.reference:target { background-color: #ddeeff; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Printing of thumbnails (bug 1583) */&lt;br /&gt;
div.tright { clear: right; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* extra buttons for edit dialog (from commons:MediaWiki:Common.css) */&lt;br /&gt;
.my-buttons { padding: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.my-buttons a {&lt;br /&gt;
	color: black;&lt;br /&gt;
	background-color: #ccddee !important;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
	font-size: 0.9em;&lt;br /&gt;
	text-decoration: none;&lt;br /&gt;
	border: thin #006699 outset;&lt;br /&gt;
	padding: 0 0.1em 0.1em 0.1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.my-buttons a:hover, .my-buttons a:active {&lt;br /&gt;
	background-color: #bbccdd;&lt;br /&gt;
	border-style: inset;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* from [[User:Splarka/Help:Linked images]] */&lt;br /&gt;
.imagelink_wikilogo a {&lt;br /&gt;
	width: 135px;&lt;br /&gt;
	height: 135px;&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	text-decoration: none;&lt;br /&gt;
	background-image: url(&amp;quot;http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/b/bc/Wiki.png&amp;quot;);&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/**** reduced subset of the mbox styles from enwiki, mainly for the nice boxflow ****/&lt;br /&gt;
th.mbox-text, td.mbox-text {     /* The message body cell(s) */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 0.25em 0.9em;       /* 0.9em left/right */&lt;br /&gt;
	width: 100%;    /* Make all mboxes the same width regardless of text length */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-image {                  /* The left image cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 2px 0 2px 0.9em;    /* 0.9em left, 0px right */&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-imageright {             /* The right image cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 2px 0.9em 2px 0;    /* 0px left, 0.9em right */&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-empty-cell {         /* An empty narrow cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 0px;&lt;br /&gt;
	width: 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* These mbox-small classes must be placed after all other &lt;br /&gt;
   ambox/tmbox/ombox etc classes. &amp;quot;body.mediawiki&amp;quot; is so &lt;br /&gt;
   they override &amp;quot;table.ambox + table.ambox&amp;quot; above. */&lt;br /&gt;
body.mediawiki table.mbox-small {   /* For the &amp;quot;small=yes&amp;quot; option. */&lt;br /&gt;
	clear: right;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	margin: 4px 0 4px 1em;&lt;br /&gt;
	width: 238px;&lt;br /&gt;
	font-size: 88%;&lt;br /&gt;
	line-height: 1.25em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
body.mediawiki table.mbox-small-left {   /* For the &amp;quot;small=left&amp;quot; option. */&lt;br /&gt;
	margin: 4px 1em 4px 0;&lt;br /&gt;
	width: 238px;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	font-size: 88%;&lt;br /&gt;
	line-height: 1.25em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Infobox template style */&lt;br /&gt;
.infobox {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
    background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
    color: black;&lt;br /&gt;
    margin: 0.5em 0 0.5em 1em;&lt;br /&gt;
    padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
    float: right;&lt;br /&gt;
    clear: right;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox td,&lt;br /&gt;
.infobox th {&lt;br /&gt;
    vertical-align: top;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox caption {&lt;br /&gt;
    font-size: larger;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered {&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered th {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .borderless td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .borderless th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.sisterproject {&lt;br /&gt;
    width: 20em;&lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #c0c090;&lt;br /&gt;
    background-color: #f8eaba;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk.bordered td,&lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk.bordered th {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #c0c090;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* styles for bordered infobox with merged rows */&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    border-top: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
    border-right: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    border-right: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Styles for geography infoboxes, eg countries,&lt;br /&gt;
   country subdivisions, cities, etc.            */&lt;br /&gt;
.infobox.geography {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography  td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.templateright {&lt;br /&gt;
background: #f0f7fd;&lt;br /&gt;
border: 1px #98C9F1 solid;&lt;br /&gt;
margin-left:10px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.bottom-nil {&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: none;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
.top-nil {&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: none;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.right-nil {&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: none;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.left-nil {&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for images infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.images {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg14.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images  td,&lt;br /&gt;
.infobox.images  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for District infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.district {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg14.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district  td,&lt;br /&gt;
.infobox.district  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for author infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.author {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg39.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author  td,&lt;br /&gt;
.infobox.author  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for scientists infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.scientists {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists  td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for artists infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.artists {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists  td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for player infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.player {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg10.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player  td,&lt;br /&gt;
.infobox.player  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for Collapsible Table */&lt;br /&gt;
.collapseButton {		/* 'show'/'hide' buttons created dynamically by the        */&lt;br /&gt;
	float: right;		/* CollapsibleTables JavaScript in [[MediaWiki:Common.js]] */&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;	/* are styled here so they can be customised.              */&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	width: auto;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Default skin for navigation boxes */&lt;br /&gt;
table.navbox {            /* Navbox container style */&lt;br /&gt;
  border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
  width: 100%; &lt;br /&gt;
  margin: auto;&lt;br /&gt;
  clear: both;&lt;br /&gt;
  font-size: 88%;&lt;br /&gt;
  text-align: center;&lt;br /&gt;
  padding: 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.navbox + table.navbox {  /* Single pixel border between adjacent navboxes */&lt;br /&gt;
  margin-top: -1px;            /* (doesn't work for IE6, but that's okay)       */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-title,&lt;br /&gt;
.navbox-abovebelow,&lt;br /&gt;
table.navbox th {&lt;br /&gt;
  text-align: center;      /* Title and above/below styles */&lt;br /&gt;
  padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
  padding-right: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-group {            /* Group style */&lt;br /&gt;
  white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
  text-align: right;&lt;br /&gt;
  font-weight: bold;&lt;br /&gt;
  padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
  padding-right: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox, .navbox-subgroup {&lt;br /&gt;
  background: #fdfdfd;     /* Background color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-list {&lt;br /&gt;
  border-color: #fdfdfd;   /* Must match background color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-title,&lt;br /&gt;
table.navbox th {&lt;br /&gt;
  background: #ccccff;     /* Level 1 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-abovebelow,&lt;br /&gt;
.navbox-group,&lt;br /&gt;
.navbox-subgroup .navbox-title {&lt;br /&gt;
  background: #ddddff;     /* Level 2 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-subgroup .navbox-group, .navbox-subgroup .navbox-abovebelow {&lt;br /&gt;
  background: #e6e6ff;     /* Level 3 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-even {&lt;br /&gt;
  background: #f7f7f7;     /* Even row striping */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-odd {&lt;br /&gt;
  background: transparent; /* Odd row striping */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox .collapseButton {  /* In navboxes, the show/hide button balances */&lt;br /&gt;
    width: 6em;            /* the vde links from [[Template:Tnavbar]],   */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.sign {&lt;br /&gt;
background:white;&lt;br /&gt;
border:1px solid #a7d7f9; &lt;br /&gt;
border-left:none;&lt;br /&gt;
padding-left:5px; &lt;br /&gt;
padding-right:5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
border:2px #CC9900 solid; &lt;br /&gt;
padding-left:5px; &lt;br /&gt;
padding-right:5px&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:link {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:visited {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:hover {&lt;br /&gt;
text-decoration: underline;&lt;br /&gt;
}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF:Common.css&amp;diff=20703</id>
		<title>मीडियाविकि:Common.css</title>
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		<updated>2010-05-12T05:40:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;/* यहां रखी css सभी त्वचाओंपर असर करेगी */&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/*&lt;br /&gt;
This is the CSS for all skins (for all users) on MediaWiki.org. &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
SECTIONS:&lt;br /&gt;
1. Indication of namespaces&lt;br /&gt;
2. Color classes for content&lt;br /&gt;
3. Special pages&lt;br /&gt;
4. Main page styling&lt;br /&gt;
5. Sidebar external links&lt;br /&gt;
6. Extension:Matrix stuff&lt;br /&gt;
7. Wikitables, infobox templates, warnings, and other such stylings&lt;br /&gt;
8. Some other small things&lt;br /&gt;
*/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 1. INDICATION OF NAMESPACES *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Pseudo NS Special (light grey) */&lt;br /&gt;
.ns--2 #content { background-color: #f4f4f4; }&lt;br /&gt;
.ns--2 div.thumb { border-color: #f4f4f4; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Project + Project_talk (light sky blue) */&lt;br /&gt;
.ns-4 #content, .ns-5 #content { background-color: #f8fcff; }&lt;br /&gt;
.ns-4 div.thumb, .ns-5 div.thumb { border-color: #f8fcff; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS MediaWiki + MediaWiki_talk (light grey) */&lt;br /&gt;
.ns-8 #content, .ns-9 #content { background-color: #f4f4f4; }&lt;br /&gt;
.ns-8 div.thumb, .ns-9 div.thumb { border-color: #f4f4f4; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Manual + Manual_talk (light bluish violet) */&lt;br /&gt;
.ns-100 #content, .ns-101 #content { background-color: #f3f3ff; }&lt;br /&gt;
.ns-100 div.thumb, .ns-101 div.thumb { border-color: #f3f3ff; } &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* NS Manual + Manual_talk (light bluish violet) */&lt;br /&gt;
.ns-112 #content, .ns-112 #content { background-color: #f3f3ff; }&lt;br /&gt;
.ns-112 div.thumb, .ns-112 div.thumb { border-color: #f3f3ff; } &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* NS Help (but NOT Help_talk) (blue border and Public Domain icon)  */&lt;br /&gt;
.ns-12 #content {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid #0000cc;&lt;br /&gt;
	border-right: none;&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/b/b8/PD-banner.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: right top;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ns-12 #bodyContent {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/6/67/PD-icon-faded.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: right 5em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 2. COLOR CLASSES FOR CONTENT  *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Border colors */&lt;br /&gt;
.borderc1 { border-color: #e9e9e9; border-width: thin; }  /* light grey */&lt;br /&gt;
.borderc2 { border-color: #aaaaaa; border-width: thin; }  /* grey (as toc) */&lt;br /&gt;
.borderc3 { border-color: #777777; border-width: thin; }  /* dark grey */&lt;br /&gt;
.borderc4 { border-color: #000000; border-width: thin; }  /* black */&lt;br /&gt;
.borderc5 { border-color: #c00000; border-width: thin; }  /* red */&lt;br /&gt;
.borderc6 { border-color: #025e9d; border-width: thin; }  /* blue */&lt;br /&gt;
.borderc7 { border-color: #008040; border-width: thin; }  /* green */&lt;br /&gt;
.borderc8 { border-color: #ffcc00; border-width: thin; }  /* yellow */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Background colors */&lt;br /&gt;
.backgroundc1 { background-color: #ffffff; }  /* white */&lt;br /&gt;
.backgroundc2 { background-color: #f9f9f9; }  /* light grey (as toc)  */&lt;br /&gt;
.backgroundc3 { background-color: #eeeeee; }  /* light grey (headers) */ &lt;br /&gt;
.backgroundc4 { background-color: #e0e0e0; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc5 { background-color: #d2d2d2; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc6 { background-color: #b7b7b7; }  /* more grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc7 { background-color: #a3a3a3; }  /* darker grey */&lt;br /&gt;
.backgroundc8 { background-color: #444455; }  /* very dark grey */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 3. SPECIAL PAGES *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Marking redirects  */&lt;br /&gt;
.allpagesredirect, .watchlistredir, .redirect-in-category { font-style: italic; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Coloured edit size numbers on watchlist/recentchanges */&lt;br /&gt;
.mw-plusminus-pos { color: #006400; } /* darkgreen */&lt;br /&gt;
.mw-plusminus-neg { color: #8b0000; } /* darkred */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Consistent special page navigation */&lt;br /&gt;
.sp-cached {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/8c/Clock%20and%20warning.svg/20px-Clock%20and%20warning.svg);&lt;br /&gt;
	background-position: 5px 3px;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding: 4px 0 4px 30px;&lt;br /&gt;
	font-style: italic;&lt;br /&gt;
	color: #606000;&lt;br /&gt;
	margin: 0.3em 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #eeee80;&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffe0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.SpecialPageInfo {&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/89/Exquisite-khelpcenter.png/35px-Exquisite-khelpcenter.png);&lt;br /&gt;
	background-position: 0.8em 0.5em;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em 0.5em 0.3em 5.0em;&lt;br /&gt;
	border-color: #025e9d; &lt;br /&gt;
	border-width: 1px; &lt;br /&gt;
	border-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: medium;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#searchresulttext {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f1/Exquisite-kfind.png/45px-Exquisite-kfind.png);&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.mw-viewprevnext {&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cccccc;&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f2;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Special:Statistics */&lt;br /&gt;
.StatsTable {&lt;br /&gt;
	background: transparent;&lt;br /&gt;
	width: 75%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable th {&lt;br /&gt;
	vertical-align: middle;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
	width: 50px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable th, .StatsTable td {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
	padding: 0.5em 1em;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #ccccdd;&lt;br /&gt;
	margin: 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.StatsTable tr {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Special:Search (more whitespace) */&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #search {&lt;br /&gt;
	padding: 1em 0 2em 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cccccc;&lt;br /&gt;
	padding: 0.5em 0.5em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch-namespaces {&lt;br /&gt;
	padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
	margin: 0.7em 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search #powersearch-namespaces label {&lt;br /&gt;
	white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
	min-width: 8.4em;&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	float: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.page-Special_Search br { clear: left; } /* Clear search button, but not check-boxes */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 4. MAIN PAGE STYLING *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#mainpage_topbox {&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	padding: 0px;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	margin: 0.2em 10px 10px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxtitle, .mainpage_hubtitle, #mainpage_pagetitle {&lt;br /&gt;
	font-size: 105%;&lt;br /&gt;
	padding: 0.4em;&lt;br /&gt;
	background-color: #eeeeee;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	line-height: 120%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_pagetitle {&lt;br /&gt;
	color: #cf7606;&lt;br /&gt;
	font-size: 200% !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_sitelinks {&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubtitle {&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxcontents, .mainpage_boxcontents_small {&lt;br /&gt;
	background: #ffffff;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_boxcontents_small {&lt;br /&gt;
	font-size: 95%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubbox, #mainpage_newscell, #mainpage_downloadcell {&lt;br /&gt;
	padding: 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.mainpage_hubbox {&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_newscell {&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 15px;&lt;br /&gt;
	margin-top: 0 !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_newscell .mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/89/Exquisite-khelpcenter.png/20px-Exquisite-khelpcenter.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: 99% 0.3em;&lt;br /&gt;
	padding-right: 25px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_downloadcell {&lt;br /&gt;
	width: 17em;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_downloadcell .mainpage_boxtitle {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5d/Crystal_Clear_action_build.png/18px-Crystal_Clear_action_build.png);&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
	background-position: 96% 0.33em;&lt;br /&gt;
	padding-right: 25px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#mainpage_mwtitle { color: #005288; } /* The words 'MediaWiki.org' in the title. */&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* The &amp;quot;mainpage&amp;quot; class is added to the body with javascript for the main page in all */&lt;br /&gt;
/* languages, so we can style things that apppear on the main page and also elsewhere. */&lt;br /&gt;
.mainpage #lastmod, &lt;br /&gt;
.mainpage #siteSub, &lt;br /&gt;
.mainpage h1.firstHeading {&lt;br /&gt;
	display: none !important;&lt;br /&gt;
} &lt;br /&gt;
.mainpage #content {&lt;br /&gt;
	padding-top: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 5. SIDEBAR EXTERNAL LINKS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
#n-browse-cvs a, #n-phpdoc a, #n-Mailing-list a {&lt;br /&gt;
	background: url(/skins-1.5/monobook/external.png) center right no-repeat;&lt;br /&gt;
	padding-right: 13px;&lt;br /&gt;
	color: #3366bb;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 6. PRETTIFY [[Extension Matrix]] *****/  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.xm-table {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #666666;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-table td, .xm-table th {&lt;br /&gt;
	vertical-align: top;&lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	background-color: #EEEEEE;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-table th, .xm-name { font-weight: bold; }&lt;br /&gt;
.xm-status-unknown, &lt;br /&gt;
.xm-type-unknown {&lt;br /&gt;
	color: #888888;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-status-experimental { color: red; }&lt;br /&gt;
.xm-status-beta { color: blue; }&lt;br /&gt;
.xm-status-stable { color: green; }&lt;br /&gt;
.xm-name, .xm-status,&lt;br /&gt;
.xm-type, .xm-version,&lt;br /&gt;
.xm-updated {&lt;br /&gt;
	white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.xm-updated { font-size:80%; }&lt;br /&gt;
.xm-alert { background-color: yellow; }&lt;br /&gt;
td.xm-blank { background-color: inherit; }&lt;br /&gt;
td.xm-updated { background-color: inherit; }&lt;br /&gt;
td.xm-description { background-color: inherit; font-style: italic; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
th.xm-blank,&lt;br /&gt;
th.xm-updated,&lt;br /&gt;
th.xm-description {&lt;br /&gt;
	background-color: inherit;&lt;br /&gt;
	padding-bottom: 0.6ex;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #666666;&lt;br /&gt;
}  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 7. WIKITABLES, INFOBOX TEMPLATES, WARNINGS AND OTHER SUCH STYLINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Wikitable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.wikitable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #a7d7f9 solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable th, table.wikitable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #a7d7f9 solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable th, table.wikitable td.hl3, table.wikitable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.wikitable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #94c3eb;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable td.hl1, table.wikitable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.wikitable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable td.hl2, table.wikitable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.wikitable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.wikitable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 7A. BHARATTABLES, INFOBOX TEMPLATES, WARNINGS AND OTHER SUCH STYLINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* bharattable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.bharattable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable th, table.bharattable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable th, table.bharattable td.hl3, table.bharattable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.bharattable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f7e6b9;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable td.hl1, table.bharattable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.bharattable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable td.hl2, table.bharattable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.bharattable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.bharattable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* tourinfotable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.tourinfotable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#4f4f01;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable th, table.tourinfotable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #aaaaaa solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable th, table.tourinfotable td.hl3, table.tourinfotable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.tourinfotable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f7e6b9;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#4f4f01;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable td.hl1, table.tourinfotable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.tourinfotable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable td.hl2, table.tourinfotable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.tourinfotable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.tourinfotable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* Infoboxtable (Prettytable) class for skinning normal tables */&lt;br /&gt;
table.infoboxtable,&lt;br /&gt;
table.prettytable {&lt;br /&gt;
	margin: 1em 1em 1em 0;&lt;br /&gt;
	background: #ffffff;&lt;br /&gt;
	border: 1px #c8e3f7 solid;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	empty-cells: show;&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#075352;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable th, table.infoboxtable td,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td {&lt;br /&gt;
	border: 1px #c8e3f7 solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.4em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable th, table.infoboxtable td.hl3, table.infoboxtable th.hl3,&lt;br /&gt;
table.prettytable th, table.prettytable td.hl3, table.infoboxtable th.hl3 {&lt;br /&gt;
	background: #f0f7fd;&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	vertical-align:top&lt;br /&gt;
	font-size:12px;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
	color:#075352;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable td.hl1, table.infoboxtable th.hl1,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl1, table.infoboxtable th.hl1 {&lt;br /&gt;
	background: #c5d8fc;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable td.hl2, table.infoboxtable th.hl2,&lt;br /&gt;
table.prettytable td.hl2, table.infoboxtable th.hl2 {&lt;br /&gt;
	background: #a7c1f2;&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.infoboxtable caption,&lt;br /&gt;
table.prettytable caption {&lt;br /&gt;
	margin-left: inherit;&lt;br /&gt;
	margin-right: inherit;&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* General purpose &amp;quot;pretty (data) tables&amp;quot; */&lt;br /&gt;
table.datatable { background-color: transparent; }&lt;br /&gt;
table.datatable th, table.datatable td { padding: 4px; }&lt;br /&gt;
table.datatable th { text-align: left; background-color: #999999; }&lt;br /&gt;
table.datatable tr { background-color: #cccccc; }&lt;br /&gt;
table.datatable tr:hover { background-color: #ffffcc; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* SideBox styling */&lt;br /&gt;
div.sideBox {&lt;br /&gt;
	position: relative;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	background: white;&lt;br /&gt;
	margin-left: 1em;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid gray;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em;&lt;br /&gt;
	width: 200px;&lt;br /&gt;
	overflow: hidden; &lt;br /&gt;
	clear: right;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl {&lt;br /&gt;
	padding: 0;&lt;br /&gt;
	margin: 0 0 0.3em 0;&lt;br /&gt;
	font-size: 96%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl dt {&lt;br /&gt;
	background: none;&lt;br /&gt;
	margin: 0.4em 0 0 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.sideBox dl dd {&lt;br /&gt;
	margin: 0.1em 0 0 1.1em;&lt;br /&gt;
	background-color: #f3f3f3;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Extension infobox styling */&lt;br /&gt;
.ext-infobox {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	width: 272px;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	margin: 0 0 0.5em 0.5em;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	background-color: white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-infobox td {&lt;br /&gt;
	border: 2px none #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em 0.5em;&lt;br /&gt;
	border-bottom: 1px solid #f0f0f0 !important;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-header {&lt;br /&gt;
	background-color: #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	color: white;&lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.ext-header td { padding-top: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.ext-header img { padding: 0 0.2em 0 0.5em; }&lt;br /&gt;
.ext-status-unstable, .ext-status-unstable td { border-color: #990000; }&lt;br /&gt;
.ext-status-unstable .ext-header { background-color: #990000; color: #ffff00; }&lt;br /&gt;
.ext-status-experimental, .ext-status-experimental td { border-color: #cc6600; }&lt;br /&gt;
.ext-status-experimental .ext-header { background-color: #cc6600; }&lt;br /&gt;
.ext-status-beta, .ext-status-beta td { border-color: #000099; }&lt;br /&gt;
.ext-status-beta .ext-header { background-color: #000099; }&lt;br /&gt;
.ext-status-stable, .ext-status-stable td { border-color: #009900; }&lt;br /&gt;
.ext-status-stable .ext-header { background-color: #009900; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Cute little &amp;quot;tip&amp;quot; boxes */&lt;br /&gt;
div.tip {&lt;br /&gt;
	padding: 4px;&lt;br /&gt;
	margin-top: 4px;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 4px;&lt;br /&gt;
	min-height: 30px; /* IE users will hate this... */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.tip-info {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cc9933;&lt;br /&gt;
	background-color: #cccc99;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
div.tip-gotcha {&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #cc0000;&lt;br /&gt;
	background-color: #cc6666;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Language template */&lt;br /&gt;
.LanguageLinks { margin-top: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.LanguageLinks table {&lt;br /&gt;
	clear: both;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaaaaa;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
	margin: 0;&lt;br /&gt;
	font-size: 85%;&lt;br /&gt;
	margin: 0 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.LanguageLinks span { white-space: nowrap; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Version box on [[Manual:Downloading MediaWiki]] */&lt;br /&gt;
#DownloadVersionBox {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid black;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse; &lt;br /&gt;
	margin: auto;&lt;br /&gt;
	width: 50%;&lt;br /&gt;
	color: black;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
#DownloadVersionBox td {&lt;br /&gt;
	border: 2px solid black;&lt;br /&gt;
	padding: 20px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Major warning - used on the main page template to warn against editing carelessly, but can be used elsewhere as well */&lt;br /&gt;
.majorwarning {&lt;br /&gt;
	background: yellow; &lt;br /&gt;
	padding: 0.3em; &lt;br /&gt;
	text-align: center; &lt;br /&gt;
	font-size: 125%; &lt;br /&gt;
	border: 2px solid red;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Page headings used throughout the wiki (though not very much at the time of writing…) */ &lt;br /&gt;
.page-notice, .page-warning {&lt;br /&gt;
	border-width: 1px; &lt;br /&gt;
	border-style: solid;&lt;br /&gt;
	padding: 0.3em 0.5em;&lt;br /&gt;
	margin-bottom: 1em;&lt;br /&gt;
	width: 95%; &lt;br /&gt;
	margin-left: auto; &lt;br /&gt;
	margin-right: auto; &lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Informative notices at the top of pages (blue) */&lt;br /&gt;
.page-notice {&lt;br /&gt;
	background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
	border-color: #025e9d; &lt;br /&gt;
	text-align: left;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Warning information at the top of pages (red) */&lt;br /&gt;
.page-warning {&lt;br /&gt;
	background-color: #ffffff;&lt;br /&gt;
	border-color: #c51919;&lt;br /&gt;
	border-width: 2px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.pw-head {&lt;br /&gt;
	color: #c51919;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Used in Template:Notice */&lt;br /&gt;
.block-note {&lt;br /&gt;
	background-image: url(http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/6/60/Bulbgraph.png/18px-Bulbgraph.png);&lt;br /&gt;
	background-position: top left;&lt;br /&gt;
	background-repeat: no-repeat;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/*&lt;br /&gt;
   Using block-contents in the hope that it can apply to all block-level warning templates, &lt;br /&gt;
   with different images applied as backgrounds to the wrapping DIV.&lt;br /&gt;
*/&lt;br /&gt;
.block-contents {&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	padding-left: 20px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Template documentation ([[Template:Documentation]]) */&lt;br /&gt;
.template-documentation {&lt;br /&gt;
	clear: both;&lt;br /&gt;
	margin: 1em 0 0 0;&lt;br /&gt;
	border: 1px solid #aaa; &lt;br /&gt;
	background-color: #ecfcf4; &lt;br /&gt;
	padding: 5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/***** 8. SOME OTHER SMALL THINGS *****/&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Give a bit of space to the TOC */&lt;br /&gt;
#toc { margin: 1em 0; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* make the list of references look smaller and highlight clicked reference in blue */&lt;br /&gt;
ol.references { font-size: 100%; }&lt;br /&gt;
.references-small { font-size: 90%;}&lt;br /&gt;
ol.references &amp;gt; li:target { background-color: #ddeeff; }&lt;br /&gt;
sup.reference:target { background-color: #ddeeff; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Printing of thumbnails (bug 1583) */&lt;br /&gt;
div.tright { clear: right; }&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* extra buttons for edit dialog (from commons:MediaWiki:Common.css) */&lt;br /&gt;
.my-buttons { padding: 0.5em; }&lt;br /&gt;
.my-buttons a {&lt;br /&gt;
	color: black;&lt;br /&gt;
	background-color: #ccddee !important;&lt;br /&gt;
	font-weight: bold;&lt;br /&gt;
	font-size: 0.9em;&lt;br /&gt;
	text-decoration: none;&lt;br /&gt;
	border: thin #006699 outset;&lt;br /&gt;
	padding: 0 0.1em 0.1em 0.1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.my-buttons a:hover, .my-buttons a:active {&lt;br /&gt;
	background-color: #bbccdd;&lt;br /&gt;
	border-style: inset;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* from [[User:Splarka/Help:Linked images]] */&lt;br /&gt;
.imagelink_wikilogo a {&lt;br /&gt;
	width: 135px;&lt;br /&gt;
	height: 135px;&lt;br /&gt;
	display: block;&lt;br /&gt;
	text-decoration: none;&lt;br /&gt;
	background-image: url(&amp;quot;http://upload.wikimedia.org/wikipedia/mediawiki/b/bc/Wiki.png&amp;quot;);&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/**** reduced subset of the mbox styles from enwiki, mainly for the nice boxflow ****/&lt;br /&gt;
th.mbox-text, td.mbox-text {     /* The message body cell(s) */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 0.25em 0.9em;       /* 0.9em left/right */&lt;br /&gt;
	width: 100%;    /* Make all mboxes the same width regardless of text length */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-image {                  /* The left image cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 2px 0 2px 0.9em;    /* 0.9em left, 0px right */&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-imageright {             /* The right image cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 2px 0.9em 2px 0;    /* 0px left, 0.9em right */&lt;br /&gt;
	text-align: center;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
td.mbox-empty-cell {         /* An empty narrow cell */&lt;br /&gt;
	border: none;&lt;br /&gt;
	padding: 0px;&lt;br /&gt;
	width: 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* These mbox-small classes must be placed after all other &lt;br /&gt;
   ambox/tmbox/ombox etc classes. &amp;quot;body.mediawiki&amp;quot; is so &lt;br /&gt;
   they override &amp;quot;table.ambox + table.ambox&amp;quot; above. */&lt;br /&gt;
body.mediawiki table.mbox-small {   /* For the &amp;quot;small=yes&amp;quot; option. */&lt;br /&gt;
	clear: right;&lt;br /&gt;
	float: right;&lt;br /&gt;
	margin: 4px 0 4px 1em;&lt;br /&gt;
	width: 238px;&lt;br /&gt;
	font-size: 88%;&lt;br /&gt;
	line-height: 1.25em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
body.mediawiki table.mbox-small-left {   /* For the &amp;quot;small=left&amp;quot; option. */&lt;br /&gt;
	margin: 4px 1em 4px 0;&lt;br /&gt;
	width: 238px;&lt;br /&gt;
	border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
	font-size: 88%;&lt;br /&gt;
	line-height: 1.25em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Infobox template style */&lt;br /&gt;
.infobox {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
    background-color: #f9f9f9;&lt;br /&gt;
    color: black;&lt;br /&gt;
    margin: 0.5em 0 0.5em 1em;&lt;br /&gt;
    padding: 0.2em;&lt;br /&gt;
    float: right;&lt;br /&gt;
    clear: right;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox td,&lt;br /&gt;
.infobox th {&lt;br /&gt;
    vertical-align: top;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox caption {&lt;br /&gt;
    font-size: larger;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered {&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered th {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .borderless td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .borderless th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.sisterproject {&lt;br /&gt;
    width: 20em;&lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #c0c090;&lt;br /&gt;
    background-color: #f8eaba;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk.bordered td,&lt;br /&gt;
.infobox.standard-talk.bordered th {&lt;br /&gt;
    border: 1px solid #c0c090;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* styles for bordered infobox with merged rows */&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    border-top: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
    border-right: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.bordered .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    border-right: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
/* Styles for geography infoboxes, eg countries,&lt;br /&gt;
   country subdivisions, cities, etc.            */&lt;br /&gt;
.infobox.geography {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography  td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.geography .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.geography .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.templateright {&lt;br /&gt;
background: #f0f7fd;&lt;br /&gt;
border: 1px #98C9F1 solid;&lt;br /&gt;
margin-left:10px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.bottom-nil {&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: none;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
.top-nil {&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: none;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #52A5E9;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.right-nil {&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-left-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: none;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-left-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-left-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.left-nil {&lt;br /&gt;
	border-right-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-bottom-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-bottom-style: solid;&lt;br /&gt;
	border-right-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-bottom-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
	border-top-width: thin;&lt;br /&gt;
	border-top-color: #9DCCF2;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for images infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.images {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg14.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images  td,&lt;br /&gt;
.infobox.images  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #80bde9;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.images .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.images .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for District infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.district {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg14.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district  td,&lt;br /&gt;
.infobox.district  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.district .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.district .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for author infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.author {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg39.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author  td,&lt;br /&gt;
.infobox.author  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
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.infobox.author .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedrow td,&lt;br /&gt;
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}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
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}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.author .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.author .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
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}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for scientists infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.scientists {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists  td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.scientists .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.scientists .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for artists infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.artists {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists  td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.artists .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.artists .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for player infoboxes */&lt;br /&gt;
.infobox.player {&lt;br /&gt;
    text-align: left;&lt;br /&gt;
    border-collapse: collapse;&lt;br /&gt;
    line-height: 1.2em; &lt;br /&gt;
    font-size: 90%;&lt;br /&gt;
    background-image: url(&amp;quot;http://bharatdiscovery.org/hi/w/skins/vector/images-bharat/homebg10.gif&amp;quot;);&lt;br /&gt;
    background-repeat:repeat-y;&lt;br /&gt;
    background-color:white;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player  td,&lt;br /&gt;
.infobox.player  th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedtoprow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedtoprow th {&lt;br /&gt;
    border-top: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0.4em 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedrow th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.2em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedbottomrow td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .mergedbottomrow th {&lt;br /&gt;
    border-top: 0;&lt;br /&gt;
    border-bottom: solid 1px #aaa;&lt;br /&gt;
    padding: 0 0.6em 0.4em 0.6em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
.infobox.player .maptable td,&lt;br /&gt;
.infobox.player .maptable th {&lt;br /&gt;
    border: 0;&lt;br /&gt;
    padding: 0;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Bharatdiscovery Styles for Collapsible Table */&lt;br /&gt;
.collapseButton {		/* 'show'/'hide' buttons created dynamically by the        */&lt;br /&gt;
	float: right;		/* CollapsibleTables JavaScript in [[MediaWiki:Common.js]] */&lt;br /&gt;
	font-weight: normal;	/* are styled here so they can be customised.              */&lt;br /&gt;
	text-align: right;&lt;br /&gt;
	width: auto;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/* Default skin for navigation boxes */&lt;br /&gt;
table.navbox {            /* Navbox container style */&lt;br /&gt;
  border: 1px solid #aaa;&lt;br /&gt;
  width: 100%; &lt;br /&gt;
  margin: auto;&lt;br /&gt;
  clear: both;&lt;br /&gt;
  font-size: 88%;&lt;br /&gt;
  text-align: center;&lt;br /&gt;
  padding: 1px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
table.navbox + table.navbox {  /* Single pixel border between adjacent navboxes */&lt;br /&gt;
  margin-top: -1px;            /* (doesn't work for IE6, but that's okay)       */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-title,&lt;br /&gt;
.navbox-abovebelow,&lt;br /&gt;
table.navbox th {&lt;br /&gt;
  text-align: center;      /* Title and above/below styles */&lt;br /&gt;
  padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
  padding-right: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-group {            /* Group style */&lt;br /&gt;
  white-space: nowrap;&lt;br /&gt;
  text-align: right;&lt;br /&gt;
  font-weight: bold;&lt;br /&gt;
  padding-left: 1em;&lt;br /&gt;
  padding-right: 1em;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox, .navbox-subgroup {&lt;br /&gt;
  background: #fdfdfd;     /* Background color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-list {&lt;br /&gt;
  border-color: #fdfdfd;   /* Must match background color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-title,&lt;br /&gt;
table.navbox th {&lt;br /&gt;
  background: #ccccff;     /* Level 1 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-abovebelow,&lt;br /&gt;
.navbox-group,&lt;br /&gt;
.navbox-subgroup .navbox-title {&lt;br /&gt;
  background: #ddddff;     /* Level 2 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-subgroup .navbox-group, .navbox-subgroup .navbox-abovebelow {&lt;br /&gt;
  background: #e6e6ff;     /* Level 3 color */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-even {&lt;br /&gt;
  background: #f7f7f7;     /* Even row striping */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox-odd {&lt;br /&gt;
  background: transparent; /* Odd row striping */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.navbox .collapseButton {  /* In navboxes, the show/hide button balances */&lt;br /&gt;
    width: 6em;            /* the vde links from [[Template:Tnavbar]],   */&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.sign {&lt;br /&gt;
background:white;&lt;br /&gt;
border:1px solid #a7d7f9; &lt;br /&gt;
border-left:none;&lt;br /&gt;
padding-left:5px; &lt;br /&gt;
padding-right:5px;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:link {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:visited {&lt;br /&gt;
background:#003366;&lt;br /&gt;
color:#FFFFCC;&lt;br /&gt;
}&lt;br /&gt;
.top-menu a:hover {&lt;br /&gt;
text-decoration: underline;&lt;br /&gt;
}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%A8&amp;diff=37022</id>
		<title>धर्म कुण्ड काम्यवन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%A8&amp;diff=37022"/>
		<updated>2010-05-11T12:58:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'खून' to 'ख़ून'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
यह कुण्ड [[काम्यवन]] की पूर्व दिशा में हैं । यहाँ श्रीनारायण धर्म के रूप में विराजमान हैं । पास में ही विशाखा नामक वेदी है । श्रवणा नक्षत्र, बुधवार, भाद्रपद कृष्णाष्टमी में यहाँ स्नान की विशेष विधि है । धर्मकुण्ड के अन्तर्गत नर–नारायण कुण्ड, नील वराह, पंच [[पाण्डव]], हनुमान जी, पंच पाण्डव कुण्ड (पञ्च तीर्थ) मणिकर्णिका, विश्वेश्वर महादेवादि दर्शनीय हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रसंग'''&lt;br /&gt;
पाँचों पाण्डवों ने अपने वनवास के समय इस रमणीय काम्यवन में बहुत दिनों तक वास किया था । यहाँ निवास करते समय एक दिन महारानी द्रोपदी तथा पाण्डवों को प्यास लगी । गर्मी के दिन थे, आस पास के सरोवर और जल–स्त्रोत सूख गये थे । दूर दूर तक कहीं भी जल उपलब्ध नहीं था । महाराज [[युधिष्ठर]] ने अपने परम पराक्रमी भ्राता [[भीम|भीमसेन]] को एक पात्र देकर निर्मल जल लाने के लिए भेजा । बुद्धिमान भीम पक्षियों के गमनागमन को लक्ष्य कर कुछ आगे बढ़े । कुछ दूर अग्रसर होने पर उन्होंने निर्मल और सुगन्धित जल से भरे हुए एक सुन्दर सरोवर को देखा । वे बड़े प्यासे थे । उन्होंने सोचा पहले स्वयं जलपान कर पीछे भाईयों के लिए जल भर कर ले जाऊँगा । ऐसा सोचकर ज्यों ही वे सरोवर में उतरे, त्यों ही एक यक्ष उनके सामने प्रकट हुआ और बोला– पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो तत्पश्चात जल पीने की धृष्टता करना, अन्यथा मारे जाओगे । महापराक्रमी भीमसेन ने यक्ष के आदेश की उपेक्षाकर जलपान करने के लिए ज्यों ही अञ्जलि में जल उठाया, तत्क्षणात वे वहीं पर मूर्छित होकर गिर पड़े । इधर भाईयों के साथ महाराज युधिष्ठर ने भीमसेन के आने में विलम्ब देखकर क्रमश: [[अर्जुन]], [[नकुल]] और [[सहदेव]] को पानी लाने के लिए आदेश दिया किन्तु, उस सरोवर पर पहुँचकर सबकी वही गति हुई, जो भीम की हुई थी क्योंकि उन्होंने भी यक्ष के आदेश की परवाह किये बिना जलपान करना चाहा था । अन्त में महाराज युधिष्ठिर भी वहीं पहुँचे । वहाँ पहुँचकर अपने भाईयों को मूर्छित पड़े हुए देखा । वे बड़े चिन्तित हुए । उन्होंने सोचा पहले जलपान कर लूँ और फिर भाईयों को सचेत करने की चेष्टा करूँगा । ऐसा सोचकर वे ज्यों ही पानी पीने के लिए सरोवर में उतरे, त्यों ही उस यक्ष ने पहले की भाँति प्रकट होकर उसके प्रश्नों का सदुत्तर देकर जलपान करने के लिए कहा । महाराज युधिष्ठिर ने धैर्य धारण कर यक्ष से प्रश्न करने का अनुरोध किया । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक्ष ने पूछा–सूर्य को कौन उदित करता है ? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर–ब्रह्म सूर्य को उदित करता है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक्ष–पृथ्वी से भारी क्या है ? आकाश से भी ऊँचा क्या है ? [[वायु]] से भी तेज चलने वाला क्या है ? और तिनकों से भी अधिक संख्या में क्या है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर–माता भूमि से भी भारी है । पिता आकाश से भी ऊँचा है। मन वायु से भी तेज चलनेवाला है । चिन्ता तिनकों से भी अधिक संख्या में हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक्ष– लोक में सर्वश्रेष्ठ धर्म क्या है ? उत्तम क्षमा क्या है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर– लोक में श्रेष्ठ धर्म दया है । सुख–दु:ख, लाभ–हानि, जीवन–मरण आदि द्वन्द्वों को सहना ही क्षमा है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक्ष– मनुष्यों का दुर्जेय शत्रु कौन है ? अनन्त व्याधि क्या है ? साधु कौन है ? असाधु कौन है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर– मनुष्यों का क्रोध ही दुर्जेय शत्रु है । लोभ अनन्त व्याधि समस्त प्राणियों का हित करने वाला साधु हैं । अजितेन्द्रिय निर्दय पुरुष ही असाधु है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक्ष–सुखी कौन है ? सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? मार्ग क्या है ? वार्ता क्या है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर– जिस पर कोई ऋण न हो और जो परदेश में नहीं है, किसी प्रकार साग–पात पकाकर खा ले, वही सुखी है । रोज–रोज प्राणी यमराज के घर जा रहे हैं , किन्तु जो बचे हुए हैं, वे सर्वदा जीवित रहने की इच्छा करते हैं । इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य हो सकता है । तर्क की स्थिति नहीं है । श्रुतियाँ भी भिन्न–भिन्न हैं । कोई एक ऐसा ऋषि नहीं, जिसका मत भिन्न न हो, अत: धर्म का तत्त्व अत्यन्त गूढ़ है । इसलिए महापुरुष जिस मार्ग पर चलते हैं, वही मार्ग है । इस माया– मोह रूप कड़ाह में काल समस्त प्राणियों को माह और ऋतु रूप कलछी से उलट–पलट कर सूर्यरूप अग्नि और दिन–रात रूप ईधन के द्वारा पका रहे हैं , यही वार्ता है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक्ष– राजन ! तुमने हमारे प्रश्नों का ठीक–ठीक उत्तर दिया है । इसलिए अपने भाईयों में से किसी एक को तुम कहो वही जीवित हो सकता है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर–हमारे इन भाईयों में से महाबाहु श्यामवर्णवाले नकुल जीवित हो जाएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक्ष– राजन् ! जिसमें दस हज़ार हाथियों के समान बल है, उस भीम को तथा अद्वितीय धनुर्धर अर्जुन को भी छोड़कर तुम्हें नकुल को जीवित कराने की इच्छा क्यों है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर– मैं धर्म का त्याग नहीं कर सकता । मेरा ऐसा विचार है कि सबके प्रति समान भाव रखना ही परम धर्म है । मेरे पिता की कुन्ती और माद्री दो पत्नियाँ थीं । वे दोनों ही पुत्रवती बनी रहें–ऐसा मेरा विचार है । मेरे लिए जैसी कुन्ती हैं, वैसी माद्री भी हैं । दोनों के प्रति समान भाव रखना चाहता हूँ, इसलिए नकुल ही जीवित हो उठें । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक्ष– भक्त श्रेष्ठ ! तुमने अर्थ और काल से भी धर्म का विशेष आदर किया । इसलिए तुम्हारे सभी भाई जीवित हो उठें । &lt;br /&gt;
यह यक्ष और कोई नहीं स्वयं धर्मराज (श्रीनारायण) थे । वे अपने पुत्र युधिष्ठिर के धर्म की परीक्षा लेना चाहते थे, जिसमें महाराज युधिष्ठिर उत्तीर्ण हुए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दूसरा प्रसंग'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब [[पाण्डव]] [[द्रौपदी]] के साथ वनवास का समय यहाँ काट रहे थे, एक समय महारानी द्रौपदी अकेली विमल कुण्ड में स्नान करने गई थीं । पाण्डव लोग अपने निवास  स्थान पर निश्चिन्त होकर भगवद कथा में निमग्न थे । इधर [[दुर्योधन]] का बहनोई जो पाण्डवों का भी बहनोई लगता था, द्रौपदी पर आसक्त था । वह पाण्डवों का अपमान करने के लिए इस अवसर की प्रतीक्षा में था कि द्रौपदी कहीं मुझे अकेली मिल जाए तो सहज ही उसका अपहरण कर लूँ । होनहारवश आज उसे द्रौपदी अपने निवास स्थान से दूर विमल कुण्ड पर स्नान करती हुई मिल गई। [[जयद्रथ]] ने द्रौपदी के निकट साम, दाम, दण्ड, भेद का अवलम्बन कर उसे अपने  साथ अपने राज्य में ले जाने की चेष्टा की । किन्तु, पतिव्रता शिरोमणि ने दृढ़ता से उसके विचारों को अस्वीकार कर दिया, जिससे क्रोधित होकर जयद्रथ ने उसे बलपूर्वक खींचकर अपने रथ में बैठा लिया तथा बड़े वेग से घोड़ों को हाँकने लगा । द्रौपदी जोर–जोर से अर्जुन, भीम और [[कृष्ण]] को अपनी रक्षा के लिए पुकारने लगी । किसी प्रकार से उसकी चीख अर्जुन और भीम के कानों में पड़ी, वे दोनों महाबली तुरन्त बड़े वेगपूर्वक दौड़े । महारथी अर्जुन ने अपने अग्नि बाण से जयद्रथ का रथ रोक दिया । जयद्रथ रथ से कूदकर प्राणों को बचाने के लिए भागा । किन्तु भीम ने उससे भी अधिक वेग से दौड़कर उसे पकड़ लिया । दोनों भाईयों ने जयद्रथ को पकड़कर द्रौपदी के सामने प्रस्तुत किया फिर तीनों महाराज युधिष्ठिर के पास आये । भीम ने क्रोधित होकर कहा– इस आततायी को अभी तुरन्त मार डालना चाहिए । अर्जुन ने भी भीम के प्रस्ताव का समर्थन किया । किंन्तु धर्मराज युधिष्ठिर ने दोनों भाईयों को शान्त करते हुए कहा– इस नीच ने द्रौपदी के चरणों में अपराध किया किया है । इसलिए द्रौपदी से पूछकर ही इसे उचित दण्ड देना चाहिए । द्रौपदी ने गम्भीर होकर कहा- जैसा भी हो इसने भयंकर अपराध तो किया है, किन्तु यह आप लोगों की बहन का पति हैं । मैं अपनी ननद को विधवा होकर सारा जीवन रोते हुए नहीं देखना चाहती । इसे छोड़ देना ही उचित है । किन्तु भीम उसे मार ही डालना चाहते थे । अन्त में यह निश्चित  हुआ कि किसी सम्मानीय व्यक्ति का अपमान करना भी मृत्यु के समान है । इसलिए इसका सिर मुण्डन कर दिया जाये और पाँच चोटियाँ रख दी जाएँ, उसी प्रकार ही मूँछ मुड़कार दाढ़ी रख दी जाये और उसे छोड़ दिया जाये । अन्त में अर्जुन ने वैसे ही मुण्डनकर एवं मूँछ काटकर– अपमानित कर उसे छोड़ दिया । जयद्रथ घोर अपमानित होकर चला गया और पाण्डवों का वध करने के लिए घोर तपस्या करने लगा । किन्तु अन्त में [[महाभारत]] के युद्ध में श्रीकृष्ण के परामर्श से अर्जुन के हाथों वह मारा गया । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''तीसरा प्रसंग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डव लोग द्रौपदी के साथ वनवास के समय यहीं निवास कर रहे थे । उधर दुष्ट दुर्योधन पाण्डवों को समूल नष्टकर देने के लिए सदा चिन्तित रहता था । उसने महर्षि दुर्वासाजी को निमन्त्रित कर बड़े ही सम्मान और आदर के साथ परमस्वादिष्ट षडरस भोजन कराकर उन्हें तृप्त किया । उसकी सेवा से सन्तुष्ट होकर दुर्वासा जी ने उसे कोई भी वर माँगने के लिए कहा । उसने हाथ जोड़कर महर्षि से यह वरदान माँगा कि महाराज युधिष्ठिर मेरे बड़े भईया हैं । आप कृपाकर अपने साठ हज़ार शिष्यों के साथ उनके निवास स्थान पर आतिथ्य ग्रहण करें । किन्तु आप लोग दोपहर के पश्चात तृतीय प्रहर में ही उनका आतिथ्य ग्रहण करें । आजकल पाण्डव लोग काम्यवन में निवासकर रहे हैं । दुर्योधन यह भलीभाँति जानता था कि पाण्डव लोग आतिथियों की भलीभाँति सेवा करते हैं । द्रौपदी के पास सूर्यदेव की दी हुई एक ऐसी बटलोई है, जिसमें अन्न पाक करने पर अगणित व्यक्तियों को तृप्ति पूर्वक भोजन कराया जा सकता है, किन्तु द्रौपदी के भोजन कर लेने पर उसे माँजकर रख देने के पश्चात उससे कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है । द्रौपदी अतिथियों और पाँचों पाण्डवों को खिला पिलाकर तृतीय प्रहर से पूर्व अवश्य ही उस बटलोई को माँजकर रख देती है । अत: तृतीय प्रहर के बाद दुर्वासाजी के पहुँचने पर उस समय पाण्डव लोग साठ हज़ार शिष्यों सहित दुर्वासाजी को भोजन नहीं करा सकेंगे । फलत: महाक्रोधी दर्वास ऋषि पाण्डवों को अपने अभिशाप से भस्म कर देंगे । महर्षि दुर्वास तो कृष्णभक्त पाण्डवों की महिमा को भलीभाँति जानते हैं । परन्तु उनकी अटपटी चेष्टाओं को समझ पाना देवताओं के लिए भी बड़ा ही कठिन है । कब, किसलिए वे क्या करते हैं, यह वे ही जानते हैं । अत: वे साठ हज़ार ऋषियों को साथ लेकर तृतीय प्रहर में पाण्डवों के निवास स्थल काम्यवन में पहुँचे । उन्हें देखकर पाण्डवगण बड़े प्रसन्न हुए । महाराज युधिष्ठिर ने उनकी पूजा कर उनसे आतिथ्य ग्रहण  करने के लिए प्रार्थना की । महर्षि ने कहा– हम लोग अभी विमलकुण्ड में स्नान करने के लिए जा रहे हैं । स्नानादि से निवृत्त होकर तुरन्त आ रहे हैं । भोजन की व्यवस्था ठीक रखना । हम यहीं पर भोजन करेंगे । ऐसा कहकर वे सारे ऋषि–शिष्यों को लेकर स्नान करने चले गये  &lt;br /&gt;
इधर पाण्डव लोग बड़े चिन्तित हुए । भोजन की क्या व्यवस्था हो ? उन्होंने द्रौपदी को बुलाया और उससे साठ हज़ार ऋषियों के भोजन की व्यवस्था करने के लिए कहा । परन्तु उसकी बटलोई माँजी हुई औंधी पड़ी हुई थी । वह सोच रही थीं । कि क्या करूँ ? उसे पाण्डवों को बचाने के लिए कोई भी उपाय सूझ नहीं रहा था । अन्त में अपने प्रियसखा श्रीकृष्ण को बड़े आर्त स्वर से पुकारने लगी । उसकी पुकार सुनकर द्वारकानाथ भला कैसे रूक सकते थे ? तुरन्त द्रौपदी के सामने प्रकट हो गये  और बोले– सखि ! मुझे बड़ी भूख लगी है । मुझे कुछ खिलाओ । द्रौपदी ने उत्तर दिया– तुम्हें भूख लगी हुई है, इधर घर में कुछ भी नहीं है । मेरी बटलोई भी मँजी हुई औंधी पड़ी हुई है । परमक्रोधी महर्षि दुर्वासा अपने साठ हज़ार शिष्यों के साथ अभी तुरन्त भोजन करने के लिए पधारने वाले हैं । भोजन नही मिलने पर पाण्डवों का सर्वनाश अनिवार्य है । अत: पहले इसकी व्यवस्था कीजिये । श्रीकृष्ण ने कहा– बिना कुछ खाये–पीये मैं कुछ भी नहीं कर सकता । जरा अपनी बटलोई लाना तो । द्रौपदी ने करुण स्वर से कहा– बटलोई में कुछ भी नहीं है । मैंने उसे भलीभाँति माँजकर रख दिया है । श्रीकृष्ण– फिर भी लाओ तो देखूँ । &lt;br /&gt;
द्रौपदी ने बटलोई को लाकर कृष्ण के हाथों में दे दिया । श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए । उस बटलोई के भीतर कहीं एक छोटा सा साग का टुकड़ा चिपका हुआ था । श्रीकृष्ण ने उसे अपने नाख़ून से कुरेदकर अपने मुख में डाल लिया । फिर द्रौपदी के हाथों से पेट भरकर पानी पीया । तत्पश्चात तृप्तो ऽस्मि ! तृप्तोऽस्मि ! कहकर अपने पेट पर हाथ फेरने लगे । श्रीकृष्ण को तृप्ति की डकार भी आने लगी । उन्होंने भीमसेन को ऋषियों को शीघ्र ही बुला लाने के लिए भेजा । महापराक्रमी भीम अपने हाथ में गदा लेकर ऋषियों को बुलाने विमलकुण्ड की ओर गये । &lt;br /&gt;
महर्षि दुर्वासा  और  उनके शिष्य विमलकुण्ड में स्नान कर रहे थे  । अचानक इनका पेट पूर्णरूप से भर गया । सबको भोजन करने के पश्चात वाली डकारें भी आने लगीं । उसी समय भीम को अपनी ओर आते देखा तो दुर्वासाजी को [[अम्बरीष]] महाराज जी की घटना का स्मरण हो आया । वे बहुत डरे और सारे शिष्यों को लेकर जल्दी–से जल्दी आकाश मार्ग से भागकर महर्षि लोक में चले गये । भीम वहाँ पहुँचकर ऋषियों को न पाकर लौट आयें तथा महाराज युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण को बतलाया कि– चारों ओर खोजकर भी मैं उनको नहीं पा सका । द्रौपदी और पाण्डव श्रीकृष्ण से सब कुछ जानकर निश्चन्त हो गये । श्रीकृष्ण के परितृप्त होने पर विश्व परितृप्त हो जाता है । इस उपाख्यान का विश्व के लिए यही सन्देश है । श्रीकृष्ण की यह लीला यहीं पर हुई थीं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चतुर्थ प्रसंग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक समय की बात है । जब पाण्डव लोग यहीं निवास कर रहे थे । दुष्ट दुर्योधन को यह पता लगा । उसने पाण्डवों को नीचा दिखलाने के लिए अपने सारे भाईयों, परिकरों [[कर्ण]]–[[शकुनि]] आदि बंधु–बान्धवों और चतुरगंनी सेना के साथ काम्यवन में विमल कुण्ड के तट पर कुछ दिन के लिए उत्सव मनाना आरम्भ किया । यह बात [[इन्द्र]] को मालूम पड़ने पर उन्होंने अपने सेनापति [[चित्रसेन]] को दुर्याधन को पकड़ लाने के लिए आदेश दिया । वह दुर्योधन की सारी सेना की परास्तकर उसे पकड़कर आकाश मार्ग से इन्द्र के पास ले जाने लगा । दुर्योधन बड़े जारे से चीख चिल्ला रहा था । उसके रोने का शब्द महाराज युधिष्ठिर के कानों में पहुँचा । उन्होंने दुर्योधन को छुड़ा लाने के लिए भीमसेन को आदेश दिया । किन्तु भीमसेन ने कहा– महाराज ! दुर्योधन हमारा अनिष्ट करना चाहता था । इसे जानकर ही हमारे परम हितैषी चित्रसेन उसे पकड़कर ले जा रहे हैं । हमारे लिए चुपचाप रहना ही अच्छा है । महाराज युधिष्ठिर से रहा नहीं गया । उन्होंने अर्जुन की तरफ देखकर कहा– भाई अर्जुन ! हमारा भाई दुर्योधन संकट में फँसा है । उसे छुड़ा लाना हमारा कर्तव्य है । हम परस्पर किसी बात के लिए लड़–झगड़ सकते हैं । किन्तु दूसरों के लिए हम 105 भाई एक हैं । शीघ्र ही दुर्योधन को छुड़ा लाओ । महारथी अर्जुन ने देव–सेनापति चित्रसेन के हाथों से दुर्योधन को छुड़ाकर अपने बाणों से सहज ही महाराज युधिष्ठिर के सामने उतार लिया । महाराज युधिष्ठिर बड़े प्रेम से उससे मिले तथा आदरपूर्वक उसे उसके निवास स्थल की ओर बिदा किया । किन्तु कोयला लाख साबुन लगाने से भी अपना कालापन नहीं छोड़ता । महाराज युधिष्ठिर का यह प्रेमपूर्ण व्यवहार भी उसके हृदय में शूल की भाँति चुभ गया । वह अपने को अपमानित समझ बहुत क्षुब्ध होकर [[हस्तिनापुर]] लौटा । जाको राखे साईयाँ मार सके ना कोई । श्रीकृष्ण जिसकी रक्षा करते हैं, उसका कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता – यह घटना भी यहीं हुई थी । पञ्चतीर्थ सरोवर के निकट इसी स्थान पर पाण्डवों और द्रौपदी की दिव्य मूर्तियाँ थीं । कुछ समय पहले यह स्थान जनशून्य होने पर इसमें से कुछ मूर्तियों को चोर चुरा कर ले गये और कुछ का अंग–भंग हो गया । तब ये बची हुई मूर्तियाँ निकट ही कामेश्वर मंदिर में पधराई गई । वे यहीं पर उपेक्षित रूप में पड़ी हुई हैं । पास ही धर्मकूप, धर्मकुण्ड और अनेक ऐसी स्थलियाँ हैं जिनका सम्बन्ध पाण्डवों से रहा दीखता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>जुगलकिशोर जी का मन्दिर वृन्दावन</title>
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[[चित्र:jugal-kishor-temple-1.jpg|जुगलकिशोर जी का मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jugal Kishor Temple, Vrindavan|thumb|200px|right]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरानी शृंखला में यह चौथा है। यह [[केशी घाट]] के पास स्थित है। इसका निर्माण [[जहाँगीर]] के समय में सन् 1627 ई॰ में हुआ था। इसका निर्माणकर्त्ता नानकरन था। यह चौहान ठाकुर था। परन्तु यह भी असंभव नहीं है कि वह [[गोपी नाथ जी मन्दिर|गोपीनाथ]] मन्दिर के निर्माता रायसिल का बड़ा भाई रहा हो। इसका जगमोहन दूसरे मन्दिरों के जगमोहन की अपेक्षा कुछ बड़ा है जो 25 वर्गफीट का है,द्वार पूर्व को है। किन्तु उत्तर और दक्षिण में भी छोटे-छोटे द्वार हैं। गर्भग्रह नष्ट हो चुका था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jugal Kishor-Temple-2.jpg|thumb|200px|left|जुगलकिशोर मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
Jugal Kishor Temple, Vrindavan]]&lt;br /&gt;
[[ग्राउस]] ने मन्दिर का जीर्णोध्दार कराया था। नगरपालिका ने ऊपर के कमरे को एक रुपया मासिक किराये पर उठा दिया था जिससे कि कोई उस पर अनाधिकार न कर ले और उस की सफ़ाई होती रहे। कुछ ही दिनों बाद नये कलक्टर के आते ही इसका दुरूपयोग होने लगा और यह पशु घर बन गया था।&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
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		<title>जयपुर मन्दिर वृन्दावन</title>
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[[चित्र:Jaipur-Temple-Vrindavan-2.jpg|जयपुर मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaipur Temple, Vrindavan|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
*[[जयपुर]] के महाराजा श्रीमाधोसिंह जी ने बहुत रुपये व्ययकर लगभग तीस वर्षो में इस भव्य मन्दिर का निर्माण किया था।  &lt;br /&gt;
*मूल मन्दिर में तीन द्वार हैं।  &lt;br /&gt;
*उत्तरी प्रकोष्ठ में श्रीआनन्दबिहारी जी, बीच के प्रकोष्ठ में श्रीराधामाधव जी तथा दक्षिणी प्रकोष्ठ में श्रीनित्य गोपालजी, श्रीगिरिधारी जी, श्रीसनक-सनातन-सनन्दन-सनत कुमार और श्री[[नारद]]जी की मूर्तियाँ विराजमान हैं।  &lt;br /&gt;
*सन 1916 ई॰ में इस मन्दिर में विग्रहों की प्रतिष्ठा हुई थी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==वीथिका जयपुर मन्दिर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Jaipur-Temple-Vrindavan-1.jpg|जयपुर मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaipur Temple, Vrindavan&lt;br /&gt;
चित्र:Jaipur-Temple-Vrindavan-3.jpg|जयपुर मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaipur Temple, Vrindavan&lt;br /&gt;
चित्र:Jaipur-Temple-Vrindavan-7.jpg|जयपुर मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaipur Temple, Vrindavan&lt;br /&gt;
चित्र:Jaipur-Temple-Vrindavan-4.jpg|जयपुर मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaipur Temple, Vrindavan&lt;br /&gt;
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चित्र:Jaipur-Temple-Vrindavan-9.jpg|जयपुर मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaipur Temple, Vrindavan&lt;br /&gt;
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		<title>राधारमण जी मन्दिर वृन्दावन</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'यहां' to 'यहाँ'&lt;/p&gt;
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[[चित्र:Radha-Raman-Temple-1.jpg|राधारमण जी मन्दिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Radha Raman Temple, Vrindavan|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
*[[वृन्दावन]] के इस प्रसिद्ध मन्दिर में श्री गोपाल भक्त गोस्वामी जी के उपास्य ठाकुर हैं। यहाँ श्री राधारमण जी, ललित त्रिभंगी मूर्ति के दर्शन हैं। 1599 विक्रम संवत वैशाख शुक्ला पूर्णिमा की बेला में शालिगराम से श्री गोपालभट्ट प्रेम वशीभूत हो [[ब्रज]] निधि श्री राधारमण विग्रह के रूप में अवतरित हुए।&lt;br /&gt;
*यह श्रीमन महाप्रभु के कृपापात्र श्री गोपालभट्ट जी के द्वारा सेवित विग्रह है। श्रीभट्टगोस्वामी पहले एक शालग्राम शिला की सेवा करते थे।  एक समय उनकी यह प्रबल अभिलाषा हुई कि यदि शालग्राम ठाकुर जी के हस्त-पद होते तो मैं उनकी विविध प्रकार से अलंकृत कर सेवा करता, उन्हीं झूले पर झुलाता।  भक्तवत्सल प्रभु अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए उसी रात में ही ललितत्रिभंग श्री राधारमण रूप में परिवर्तित हो गये।  भक्त की इच्छा पूर्ण हुई।  भट्ट गोस्वामी ने नानाविध अलंकारों से भूषितकर उन्हें झूले में झुलाया तथा बड़े लाड़-प्यार से उन्हें भोगराग अर्पित किया।  &lt;br /&gt;
*श्रीराधारमण विग्रह की पीठ शालग्राम शिला जैसी दीखती है। अर्थात पीछे से दर्शन करने में शालग्राम शिला जैसे ही लगते हैं। &lt;br /&gt;
*द्वादश अंगुल का श्रीविग्रह होने पर भी बड़ा ही मनोहर दर्शन है। &lt;br /&gt;
*श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द गोविन्द जी के समान, वक्षस्थल श्री गोपीनाथ के समान तथा चरणकमल मदनमोहन जी के समान हैं।  इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
*सेवाप्राकट्य ग्रन्थ के अनुसार सम्वत 1599 में शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए।  &lt;br /&gt;
*उसी वर्ष वैशाख की पूर्णिमा तिथि में उनका अभिषेक हुआ था।  &lt;br /&gt;
*राधारमणजी के साथ श्रीराधाजी का विग्रह नहीं है।  परन्तु उनके वाम भाग में सिंहासन पर गोमती चक्र की पूजा होती है। &lt;br /&gt;
*श्रीहरिभक्तिविलास में गोमतीचक्र के साथ ही शालग्राम शिला के पूजन की विधि दी गई है।  &lt;br /&gt;
*श्रीराधारमण मन्दिर के पास ही दक्षिण में श्रीगोपालभट्टगोस्वामी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है। &lt;br /&gt;
*अन्य विग्रहों की भाँति श्री राधारमण जी [[वृन्दावन]] से कहीं बाहर नहीं गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>राधादामोदर जी मन्दिर वृन्दावन</title>
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		<updated>2010-05-11T10:33:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'यहां' to 'यहाँ'&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
[[चित्र:Radhadamodar.jpg|राधादामोदर मंदिर, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Radha Damodar Temple, Vrindavan|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राधा दामोदर मंदिर में [[गौड़ीय संप्रदाय]] का ही नहीं अपितु अन्य संप्रदायों के भक्तों और अनुयाईयों का आस्था का केंद्र रहा है। इसी मंदिर को [[इस्कॉन मन्दिर]] के संस्थापक प्रभुपाद महाराज ने अपने [[वृन्दावन]] प्रवास के दौरान सर्वप्रथम आराधना का केंद्र बनाया था।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
'''नगर''' के सेवाकुंज और लोई बाज़ार क्षेत्र में स्थित राधा दामोदर मंदिर की स्थापना [[रूप गोस्वामी]] के शिष्य [[जीव गोस्वामी]] ने संवत 1599 माघ शुक्ला दशमी तिथि को की थी। इसी मंदिर में छह गोस्वामियों, [[रूप गोस्वामी]], [[सनातन गोस्वामी]], भक्त रघुनाथ, [[जीव गोस्वामी]], गोपाल भट्ट, रघुनाथ दास ने अपनी साधना स्थली बनाया। श्री रूपगोस्वामी जी [[सेवाकुंज]] के अन्तर्गत यहीं भजन कुटी में वास करते थे।  यहीं पर तत्कालीन गोस्वामीगण एवं भक्तजन सम्मिलित होकर इष्टगोष्ठी करते थे तथा श्री रघुनाथभट्ट जी अपने मधुर कंठ से उस वैष्णव सभा में [[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत]] की व्याख्या करते।  यहीं पर श्री रूप गोस्वामी ने श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु, उज्ज्वलनीलमणि एवं अन्यान्य भक्ति ग्रन्थों का संकलन किया।  युवक श्री जीव गोस्वामी श्री रूप गोस्वामी की सब प्रकार से सेवा में नियुक्त थे।  श्रील रूप गोस्वामी ने स्वयं अपने हाथों से श्री राधादामोदर विग्रह को प्रकाश कर श्री जीव को सेवापूजा के लिए अर्पण किया था।  सेवाप्राकट्य ग्रन्थ के अनुसार 1599 सम्वत में माघ शुक्ल दशमी तिथि में श्रीराधादामोदर की प्रतिष्ठा हुई। मूल श्री राधादामोदर विग्रह [[जयपुर]] में विराजमान हैं। उनकी प्रतिभू विग्रह स्वरूप वृन्दावन में विराजमान है।  इनके साथ सिंहासन में श्री वृन्दावनचन्द्र, श्री छैलचिकनिया, श्री राधाविनोद और श्री राधामाधव आदि विग्रह विराजमान हैं।  मन्दिर के पीछे श्री जीवगोस्वामी तथा श्री कृष्णदास गोस्वामी की समाधियाँ प्रतिष्ठित हैं।  मन्दिर के उत्तर भाग में श्रीपाद रूपगोस्वामी की भजन-कुटी और समाधि मन्दिर स्थित हैं।  पास ही श्रीभूगर्भ गोस्वामी की समाधि है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''इस''' मंदिर के संबंध में कहावत है कि गौड़ीय संप्रदाय के संत [[सनातन गोस्वामी]] इस मंदिर में निवास के दौरान प्रतिदिन श्री गिरिराज जी की परिक्रमा करने यहाँ से [[गोवर्धन]] जाते थे। जब वे काफ़ी वृद्ध हो गए तो एक दिन गिरिराज जी की परिक्रमा करने नहीं जा सके। तब भगवान श्री [[कृष्ण]] ने एक बालक के रूप में आकर उन्हें एक डेढ़ हाथ लम्बी वट पत्राकार श्याम रंग की गिरिराज शिला दी। उस पर भगवान के चरण चिन्ह एवं गाय के खुर का निशान अंकित था। बालक रूप भगवान ने सनातन गोस्वामी से कहा कि बाबा अब तुम बहुत वृद्ध हो गए हो। तुमको गिरिराजजी की परिक्रमा करने के नियम को पूरा करने में काफ़ी तक़लीफ़ हो रही है। इस शिला की परिक्रमा करके अपने नियम को पूरा कर लिया करो। बालरूप भगवान की आज्ञा मानकर सनातन गोस्वामी ने इसी शिला की परिक्रमा करे अपना नियम प्रतिदिन पूरा करने लगे। सनातन गोस्वामी द्वारा इस शिला की परिक्रमा लगाने के कारण यहाँ आने वाला हर श्रद्धालु शिला की परिक्रमा करके अपने आप को धन्य महसूस करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[कार्तिक मास]] में नियम सेवा के दिनों में हज़ारों नर-नारी श्रीराधा दामोदर तथा गिरिराजजी की शिला की चार परिक्रमा लगाकर के अति आनंद लाभ प्राप्त करते हैं। वर्तमान काल में इस मंदिर में श्रीवृन्दावन चंद्र तथा दो युगल श्री विग्रह भी यहाँ सेवित है। इस्कॉन संस्था की स्थापना से पूर्व जब स्वामी प्रभुपाद महाराज पश्चिमी बंगाल से यहाँ आए तो उन्होंने इसकी मंदिर को अपनी साधना का प्रमुख केंद्र बनाया। यहीं से उन्होंने पूरे विश्व में श्रीकृष्ण भक्ति का संदेश पहुंचाया और इस्कॉन संस्था की स्थापना की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{ब्रज के दर्शनीय स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
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		<title>मधुवन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%A8&amp;diff=31036"/>
		<updated>2010-05-11T10:32:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'यहां' to 'यहाँ'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
'''मधुवन / महोली / Madhuvan / Maholi '''&lt;br /&gt;
मधुपुरी या मधुरा के पास का एक वन जिसका स्वामी मधु नाम का दैत्य था। मधु के पुत्र लवणासुर को शत्रुघ्न ने विजित किया था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dhruva-Temple-Madhuvan.jpg|[[ध्रुव]] जी मन्दिर, मधुवन&amp;lt;br /&amp;gt;Dhruva Ji Temple, Madhuvan|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
[[मथुरा]] से लगभग साढ़े तीन मील दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित यह ग्राम [[वाल्मीकि रामायण]] में वर्णित मधुपुरी के स्थान पर बसा हुआ है। मधुपुरी को [[मधु]] नामक दैत्य ने बसाया था। उसके पुत्र [[लवणासुर]] को शत्रुघ्न ने युद्ध में पराजित कर उसका वध कर दिया था और मधुपुरी के स्थान पर उन्होंने नई मथुरा या मथुरा नगरी बसाई थी। महोली ग्राम को आजकल मधुवन-महोली कहते हैं। महोली मधुपुरी का अपभ्रंश है। लगभग 100 वर्ष पूर्व इस ग्राम से [[गौतम बुद्ध]] की एक मूर्ति मिली थी। इस कलाकृति में भगवान को परमकृशावस्था में प्रदर्शित किया गया है। यह उनकी उस समय की अवस्था का अंकन है जब बोधिगया में 6 वर्षों तक कठोर तपस्या करने के उपरांत उनके शरीर का केवल शरपंजन मात्र ही अवशिष्ट रह गया था।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*इस वन का उल्लेख [[रामायण|वाल्मीकि रामायण]] में इस प्रकार है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'तमुवाच सहस्त्राक्षो लवणो नाम राक्षस: मधुपुत्रो मधुवने न तेऽज्ञां कुरुतेऽनघ'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वाल्मीकि रामायण उत्तर0 67,13&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*विष्णुपुराण में भी [[यमुना]] तटवर्ती इस वन का वर्णन है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'मधुसंज्ञ महापुण्यं जगाम यमुनातटम्, पुनश्च मधुसंज्ञेन दैत्यानाधिष्ठितं यत:,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो मधुवनं नाम्ना ख्यातमत्र महीतले'&amp;lt;ref&amp;gt; [[पुराण|विष्णुपुराण]] 1,12,2-3&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*विष्णुपुराण से सूचित होता है कि शत्रुघ्न ने मधुवन के स्थान पर नई नगरी बसाई थी- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'हत्वा च लवणं रक्षो मधुपुत्रं महाबलम्, शत्रुघ्नो मधुरां नाम पुरींयत्र चकार वै'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;विष्णुपुराण 1,12,4&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हरिवशंपुराण के अनुसार इस वन को शत्रुघ्न ने कटवा दिया था- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'छित्वा वनं तत् सौमित्रि....  &amp;lt;ref&amp;gt; [[पुराण|हरिवशंपुराण]] 1,54-55&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*पौराणिक कथा के अनुसार [[ध्रुव]] ने इसी वन में तपस्या की थी।&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
*प्राचीन [[संस्कृत]] साहित्य में मधुवन को श्री[[कृष्ण]] की अनेक चंचल बाल-लीलाओं की क्रीड़ास्थली बताया गया है। यह [[गोकुल]] या [[वृन्दावन]] के निकट कोई वन था।  आजकल मथुरा से साढ़े तीन मील दूर महोली मधुवन नामक एक ग्राम है। यह ब्रज के प्रसिद्ध बारह वनों में से एक है। मथुरा से लगभग साढ़े तीन मील दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित यह ग्राम वाल्मीकि रामायण में वर्णित मधुपुरी के स्थान पर बसा हुआ है। मधुपुरी को मधु नामक दैत्य ने बसाया था। उसके पुत्र लवणासुर को शत्रुघ्न ने युद्ध में पराजित कर उसका वध कर दिया था और मधुपुरी के स्थान पर उन्होंने नई मथुरा या मथुरा नगरी बसाई थी। महोली ग्राम को आजकल मधुवन-महोली कहते है। महोली मधुपुरी का अपभ्रंश है। लगभग 100 वर्ष पूर्व इस ग्राम से गौतम बुद्ध की एक मूर्ति मिली थी। इस कलाकृति में भगवान को परम कृशावस्था में प्रदर्शित किया गया है। यह उनकी उस समय की अवस्था का अंकन है जब बोधि गया में 6 वर्षों तक कठोर तपस्या करने के उपरांत उनके शरीर का केवल शरपंजन मात्र ही अवशिष्ट रह गया था। पारंपरिक अनुश्रुति में मधु दैत्य की मथुरा और उसका मधुवन इसी स्थान पर थे। यहाँ लवणासुर की गुफ़ा नामक एक स्थान है जिसे मधु के पुत्र लवणासुर का निवासस्थान माना जाता है। &lt;br /&gt;
==मधुवन-कथा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[सत युग|सत्य युग]] में [[मधु]] नामक एक दैत्य का भगवान ने यहाँ वध किया था। इस कारण भगवान का नाम मधुसूदन हो गया। अत: भगवान श्री मधुसूदन के नाम पर इस वन का नाम मधुवन पड़ा है, क्योंकि यह मधुवन भगवान श्री मधुसूदन के समान ही प्रिय एवं मधुर है। मधुसूदन का ही दूसरा नाम माधव है, क्योंकि ये सर्व लक्ष्मीमयी [[राधा|राधिका]] के प्रियतम या वल्लभ हैं। ये श्री माधव ही वन के अधिष्ठात देवता हैं। वन भ्रमण के समय यहाँ स्नान एवं आचमन के समय 'ओं ह्रां ह्रीं मधुवनाधिपतये माधवाय नम: [[स्वाहा]]' मन्त्र का जप करना चाहिए। इस मन्त्र के जप से यहाँ परिक्रमा सफल होती है। मधुवन का वर्तमान नाम महोली ग्राम है। ग्राम के पूर्व में ध्रुव टीला है। जिस पर बालक ध्रुव एवं उनके आराध्य चतुर्भुज नारायण का श्रीविग्रह विराजमान है। यही ध्रुव की तपस्यास्थली है। यहीं पर बालक ध्रुव ने देवर्षि नारद के दिये हुए मन्त्र के द्वारा भगवान की कठोर आराधना की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने उनको दर्शन दिया और छत्तीस हज़ार वर्ष का एकछत्र भूमण्डल का राज्य एवं तत्पश्चात अक्षय ध्रुवलोक प्रदान किया। ध्रुवलोक ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत ही श्रीहरि का एक अक्षयधाम है।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
[[त्रेता युग]] में मधुदैत्य के अत्याचार से ऋषि–मुनि और यहाँ के निवासी बहुत भयभीत थे। उस दैत्य ने [[शंकर]] जी की कठोर आराधना कर उनसे एक शूल प्राप्त किया था। वह शूल उसके हाथों में रहने पर उसे [[देवता]], दानव अथवा मनुष्य कोई भी पराजित नहीं कर सकता था। वह [[सूर्यवंश]] का एक राजकुमार था। किन्तु कुसंगति में पड़कर बड़ा ही क्रूर और सदाचार विहीन हो गया। इसीलिए उसके पिता ने उसे त्यज्य पुत्र के रूप में अपने राज्य से निकाल दिया था। वह मधुवन में रहता था। मधुवन में एक नये राज्य की स्थापना कर वह सभी को उत्पीड़ित करने लगा। सूर्यवंश के महाप्रतापी राजा [[मांधाता]] ने उसे दण्ड देने के लिए उस पर आक्रमण किया, किन्तु मधु दैत्य के शंकर प्रदत्त शूल के द्वारा वे भी मारे गये। अपनी मृत्यु से पूर्व दैत्य ने उस शूल को अपने पुत्र लवणासुर को दिया और उससे कहा कि जब तक तेरे हाथों में यह शूल रहेगा, तुम्हें कोई नहीं मार सकता। शत्रु तुम्हारे इस अमोघ त्रिशूल के द्वारा मारा जायेगा। उस शूल को पाकर लवणासुर और भी भयंकर अत्याचारी हो गया। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर मधुवन के आस पास के ऋषि महर्षि [[अयोध्या]] में श्री [[राम]] के समीप पहुँचे और दीन हीन होकर लवणासुर से अपनी रक्षा की प्रर्थना की। उन्होंने लवणासुर के पराक्रम एवं अमोद्य शूल के सम्बन्ध में भी सूचना दी। उन्होंने कहा कि वह उक्त शूलरहित अवस्था में ही मारा जा सकता है, अन्यथा वह अजेय है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने अपने छोटे भैया [[शत्रुघ्न]] जी को अयोध्या में ही मधुवन के राज्य का राजतिलक किया। शत्रुघ्न जी ने लंका से लाये हुये प्रभावशाली श्री [[वराह]] मूर्ति को पूजा के लिए माँगा। श्रीरामचन्द्र जी ने सहर्ष वह वराहमूर्ति शत्रुघ्नजी को प्रदान की। शत्रुघ्न जी ऋषि-महर्षियों के साथ [[वाल्मीकि]] ऋषि के आश्रम से होते हुए उनका आशीर्वाद लेकर मधुवन पहुँचे और धनुष–बाण के साथ लवणासुर की गुफ़ा के द्वार पर उस समय पहुँचे, जिस समय वह अपने शूल को गुफ़ा में रखकर शिकार के लिए जंगल में गया हुआ था। जब वह हाथी और बहुत से मृग आदि जानवरों का बध कर उन्हें लेकर अपने वासस्थान में लौट रहा था, उसी समय शत्रुघ्न जी ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। वह किसी प्रकार से अपना शूल लाने की चेष्टा कर रहा था। किन्तु, महापराक्रमी शत्रुघ्नजी ने उसे शूल ग्रहण करने का समय नहीं दिया और अपने पैने बाणों से उसका सिर काट दिया। फिर उन्होंने उजड़ी हुई मधुपुरी को पुन: बसाया और वहाँ भगवान वराहदेव की स्थापना की। ये [[आदिवराहदेव]] मथुरा में उसी स्थान पर विराजमान हैं। मधुवन में भगवान माधव का प्रिय मधुकुण्ड भी है, अब इसे कृष्णकुण्ड भी कहते हैं पास ही में लवणासुर की गुफ़ा है। यहीं कृष्णकुण्ड के तट पर भगवान शत्रुघ्नजी का दर्शनीय श्रीविग्रह है।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
[[चित्र:Dhruva-Kund-Madhuvan.jpg|[[ध्रुव]] कुण्ड, मधुवन&amp;lt;br /&amp;gt;Dhruva Kund, Madhuvan|thumb|250px|left]]&lt;br /&gt;
द्वापर युग के अन्त में श्री [[कृष्ण]] लाखों गऊओं के पीछे उनका नाम धौली, धूमरी, [[कालिन्दी]] आदि पुकारते हुए हियो–हियो, धीरी–धीरी, तीरी–तीरी ध्वनि करते हुए [[बलराम|दाऊ भैया]] के साथ मधुर [[बांसुरी]] बजाते सखाओं के कन्धे पर हाथ रखे हँसते–हँसाते हुए कभी कुञ्जों की ओर से ब्रजमणियों की ओर सतृष्ण नेत्रों से कटाक्षपात करते हुए गोचारण के लिए जाते। गोचारण में ग्वाल मण्डली में रसीली धूम मच जाती। इस प्रकार मधुवन में जहाँ तहाँ सर्वत्र ही प्रेम का मधु बरसता था। गोचारण करते हुए श्रीकृष्ण श्रीबलराम जी के साथ उस प्रेम मधु को पानकर निहाल हो उठते। ब्रज रमणियाँ गोष्ठ से निकलते एवं लौटते समय कुञ्जों की आड़ से, महलों की अटारियों और झरोखों से अपनी प्रेमभरी तिरछी चितवनों से कृष्ण की [[आरती]] उतारती थीं। कृष्ण उसे नेत्रभंगी से स्वीकार करते। कृष्ण के विरह में ये ब्रजवधुएँ एक पल का समय भी करोड़ों युगों के समान और मिलन में एक युग का समय भी निमेष के समान अनुभव करती थीं।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
मधुवन में गोचारण की लीला भी मधु के समान मधुर और वर्णनातीत है। कलियुग में अभी पाँच सौ पच्चीस वर्ष पूर्व श्री[[चैतन्य महाप्रभु]] जी वन भ्रमण के समय मधुवन में पधारे थे। यहाँ श्रीकृष्ण लीलाओं की स्फूर्ति से वे विहृल हो उठे। यहाँ पर प्रतिवर्ष बहुत सी यात्राएँ विश्राम करती हैं।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
ऐसी किंवदन्ती है कि दाऊजी यहाँ मधुपानकर सखाओं के साथ नृत्य करते थे। आज भी यहाँ काले दाऊजी का विग्रह दर्शनीय है। इसका गूढ़ रहस्य यह है कि श्रीकृष्ण बलदेव वृन्दावन और मथुरा को छोड़कर द्वारका में परिजनों के साथ वास करने लगे। उस समय ब्रज एवं ब्रजवासियों का श्रीकृष्ण विरह से व्याकुलता की बात सुनकर बलदेव जी ने कृष्ण को साथ लेकर ब्रज में जाने की इच्छा व्यक्त की। किन्तु किसी कारण से श्री कृष्ण के जाने में विलम्ब देखकर वे अकेले ही ब्रज में पधारे और सबको यथा साध्य सांत्वना देने की चेष्टा की किन्तु ब्रजवासियों की विरह दशा देखकर स्वयं भी कृष्ण विरह में कातर हो गये। कृष्ण की ब्रजलीलाओं का चिन्तन करते हुए श्यामरस पान करते हुए एवं श्याम की चिन्ता करते हुए, स्वयं श्याम अंगकान्ति वाले हो गये। यह श्यामरस ही मधु है, जिसे बलदेव सतत पानकर कृष्ण प्रेम में विभोर रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category:ब्रज के दर्शनीय स्थल]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>मदन मोहन मन्दिर मथुरा</title>
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{{Incomplete}}&lt;br /&gt;
[[मथुरा]] में चैचा घाट पर [[वल्लभ संप्रदाय]] का यह भी प्राचीन मन्दिर है। यहाँ मदन मोहन जी,&lt;br /&gt;
मथुरा नाथ जी तथा द्वारकानाथ जी के श्री विग्रह हैं।&lt;br /&gt;
[[मदनमोहन]] (वृन्दावन) जी का प्राचीन मन्दिर [[वृन्दावन]] में है। जो स्थापत्य कला का नमूना है। यह ब्रज के प्राचीनतम मंदिरों में एक है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{मथुरा के स्थान और मन्दिर}}&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
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[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>बहुलावन</title>
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		<updated>2010-05-11T10:31:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'यहां' to 'यहाँ'&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
'''बहुलावन / वाटी / Bahulavan'''&lt;br /&gt;
द्वादश वन (बारह वनों में) में बहुला नामक वन पंचम वन एंव वनों में से श्रेष्ठ है। जो लोग इस वन में आते है वे मृत्यु पश्चात अग्निलोक को प्राप्त होते है। आजकल यहाँ वाटी नाम का गांव बसा है बहुला नामक गांव की पौराणिक गाथा इसी वन से सम्बन्धित है। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
बहुलावन एक परम सुन्दर और रमणीय वन है। यह स्थान बहुला नामक श्रीहरि की सखी ([[गोपी]]) का निवास स्थल है। 'बहुला श्रीहरे: पत्नी तत्र तिष्ठति सर्वदा'। इसका वर्तमान नाम बाटी है। यह स्थान [[मथुरा]] से पश्चिम में सात मील की दूरी पर [[राधाकुण्ड]] एवं [[वृन्दावन]] के मध्य स्थित है। यहाँ संकर्षण कुण्ड तथा मानसरोवर नामक दो कुण्ड हैं। कभी [[राधा|राधिका]] मान करके इस स्थान के एक कुंज में छिप गई। [[कृष्ण]] ने उनके विरह में कातर होकर सखियों के द्वारा अनुसंधान कर बड़ी कठिनता से उनका मान भंग किया था। जनश्रुति है कि जो लोग जैसी कामना कर उसमें स्नान करते हैं, उनके मनोरथ सफल हो जाते हैं। कुण्ड के तट पर स्थित श्रीलक्ष्मी-नारायण मन्दिर, बहुला नामक गाय का स्थान, सुदर्शनचक्र का चिन्ह, श्री कुण्डेश्वर महादेव एंव श्री [[वल्लभाचार्य]] जी की बैठक दर्शनीय है। लोक-कथा के अनुसार किसी समय बहुला नाम की एक गाय इस सरोवर में पानी पी रही थी, उसी समय एक भयंकर बाघ ने उस पर आक्रमण कर उसे पकड़ लिया। वह अपने भूखे बछड़े को दूध पिलाकर लौट आने का आश्वासन देकर अपने स्वामी ब्राह्मण के घर लौटी। उसने अपने द्वारा बाघ को दिये हुये वचन की बात सुनाकर अपने बछड़े को भर-पेट दूध पी लेने के लिए कहा तो बछड़ा भी बिना दूध पिये माता के साथ जाने की हठ करने लगा। ब्राह्मण उन दोनों को घर रखकर बाघ का ग्रास बनने के लिए स्वयं जाने को उद्यत हो गया। अन्तत: ये तीनों बाघ के समीप पहुँचे। तीनों ने अपने-अपने को प्रस्तुत करने पर बाघ का हृदय बदल गया। श्रीकृष्ण की कृपा से वह ब्राह्मण, गाय और बछड़े को लेकर सकुशल घर लौट आया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==श्री राधाकुण्ड–श्रीकृष्णकुण्ड==&lt;br /&gt;
बहुलावन के अन्तर्गत ही राधाकुण्ड है। इसलिए बहुलाष्टमी के दिन श्रीराधाकुण्ड में स्नान की विधि है तथा उस दिन स्नान का विशाल मेला लगता है। भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु वन–भ्रमण के समय यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर विहृल हो गये। श्रीचैतन्य चरितामृत में इसका मनोरम हृदयस्पर्शी वर्णन उपलब्ध होता है&amp;lt;ref&amp;gt;जिस समय श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस बहुलावन में प्रवेश किया उस समय वहाँ पर चरती हुई सुन्दर-सुन्दर गायों ने चरना छोड़कर उन्हें घेर लिया। वे प्रेम में भरकर हूँकार करने लगी तथा उनके अंगों को चाटने लगीं। गऊओं के प्रेम-भरे वात्सल्य को देखकर महाप्रभुजी प्रेम की तरंग बहते हुए भावाविष्ट हो गये। कुछ स्वस्थ होने पर उनकी लोरियों को सहलाने लगे। गऊएँ भी उनका संग नहीं छोड़ना चाहती थी। किन्तु चरवाहों ने बड़े कष्ट से उन्हें किसी प्रकार रोका। उस समय महाप्रभु 'कोथाय कृष्ण, कोथाय कृष्ण' कहकर भावाविष्ट हो रोदन कर रहे थे। झुण्ड के झुण्ड हिरण और हिरणियाँ एकत्रित हो गई और निर्भय होकर प्रेम से महाप्रभुजी के अंगों को चाटने लगीं। शुक–सारी, कोयल, पपीहे, भृड पञ्चमस्वर में गाने लगे। मयूर महाप्रभु के आगे–आगे नृत्य करने लगे। वृक्ष और लताएँ पुलकित हो उठीं– अंकुर, नव– किशलय एवं पुष्पों से भरपूर हो गयी। वे प्रेमपूर्वक अपनी टहनीरूपी करपल्लवों से महाप्रभु के चरणों में पुष्प और फलों का उपहार देने लगीं। महाप्रभु वृन्दावन के स्थावर और जंगम सभी के उच्छ्वलित भावों को देखकर और भी अधिक भावविष्ट हो गये। जब महाप्रभु जी भावाविष्ट होकर कृष्ण बोलो! कहकर उच्च स्वर में रोदन करते, ब्रज के स्थावन–जंगम सभी प्रतिध्वनि के रूप में उनको दोहराते। महाप्रभुजी कभी-कभी हिरण और हिरणियों के गले को पकड़कर बहुत ही कातर स्वर से रोदन करते। वे भी अश्रुपूरित नेत्रों से उनके मुखारविन्द को प्रणय भरी दृष्टि से निहारने लगतीं। कुछ आगे बढ़ने पर महाप्रभुजी ने देखा आमने–सामने वृक्षों को डालियों पर शुक–सारी परस्पर प्रेम–कलह करते हुए श्री राधाकृष्ण युगल का गुणवान कर रहे हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt;गोविन्द लीलामृत के 13 वें सर्ग के 26 श्लोक में शुकवाक्य है &amp;lt;ref&amp;gt;सौन्दर्यम् ललनालिधैर्यदलनं लीला रमास्तम्भिनी तीर्याम् कन्दुकिताद्रि–वर्यममला: पारे–पराद्धं गुणा:। शीलं सर्वजनानुरञ्जनमहो यस्यायमस्मत प्रभुर्विश्वं विश्वजनीनकीर्तिरवतात् कृष्णे जगन्मोहन:/ गोविन्दलीलामृत /सर्ग13/ श्लोक 26। अनुवाद- जिनका अनुपम सौन्दर्य असंख्य रमणीसमूह के धैर्य धन को अपहरण कर लेता है, जिनकी विश्वविख्यात कीर्ति लक्ष्मी देवी को भी स्तम्भित कर देती है, जिनका वीर्य गिरिवर गोवर्धन को बालकों को खिलौना बना देता है, जिनके गुण अनन्त हैं, जिनका सरल स्वभाव सर्वसाधारण को मनोरंजन करता है, जिनकी कीर्ति निखिल ब्रह्मण्ड का कल्याण साधन करती है वे हम लोगों के प्रभु जगमोहन समस्त विश्व की रक्षा करें। &amp;lt;/ref&amp;gt;गोविन्द लीलामृत के 13 वें सर्ग के 30 श्लोक में सारीवाक्य है &amp;lt;ref&amp;gt;श्रीराधिकाया: प्रियता स्वरूपता सुशीलता नर्तनगानचातुरी। गुणालिसम्पत कविता च राजते जगन्मोहन–चित्तमोहिनी।। वंशीधारी जगन्नारी–चित्तहारी स सारिके। विहारी गोपनारीभिर्जीयान्मदनमोहन: ।। गोविन्दलीलामृत /सर्ग13/ श्लोक 30 ।अनुवाद- यह सुनकर शारिका ने उत्तर दिया– शुक! श्रीराधिका का प्रेम, सौन्दर्य, नृत्य, उनकी सुशीलता और संगीत की चातुरी, अखिल गुण सम्पत्ति, कविता अर्थात् पाण्डित्य जगन्मनोमोहन श्रीकृष्ण की मनोमोहिनी होकर सुशोभित हो रही है। &amp;lt;/ref&amp;gt; श्री चैतन्य महाप्रभु शुक–सारी के इस प्रेम–कलह को सुनकर इतने विह्रल हो गये कि वे स्थिर नहीं रह सके, मूर्च्छित होकर [[पृथ्वी]] पर गिर पड़े। उनके साथियों ने उन्हें किसी प्रकार सचेतन कराया। तत्पश्चात ब्रज–परिक्रमा अग्रसर हुए। श्री [[राधाकुण्ड]] गोवर्धन पर्वत की तलहटी में शोभायमान है, कार्तिक माह की कृष्णाष्टमी (इस दोनों कुण्ड की प्रकट तिथि बहुलाष्टमी) के दिन यहाँ स्नान करने वालों श्रद्धालुओं को श्रीराधा–कुञ्जविहारी श्रीहरि की सेवामयी प्रेमाभक्ति प्राप्त होती है। कार्तिक माह की दीपावली के दिन श्रीराधाकुण्ड में श्रीराधाकृष्ण के ऐकान्तिक भक्तों को अखिलब्रह्माण्ड तथा सम्पूर्ण ब्रजमंडल दिखाई पड़ता है। श्री राधाकुण्ड के पास ही श्री [[राधाकुण्ड|श्यामकुण्ड]] भी है।   &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शकना गाँव==&lt;br /&gt;
यह बाटी गाँव से एक मील की दूरी पर स्थित है। यहाँ बलभद्र और दाऊजी के दर्शन हैं। यहाँ जाने पर गणेशराक, दतिया एवं फेचरी गांव पड़ते हैं। दतिया से दन्तचक्र मारा गया था।&lt;br /&gt;
फेचरी पूतना का स्थान है।&lt;br /&gt;
==तोषगाँव==&lt;br /&gt;
यहाँ के तोष नामक गोप नृत्यकला में बड़े निपुण थे। उन्होंने श्रीकृष्ण को नृत्य कला में निपुण किया। उस नृत्य से कृष्ण को बहुत ही सन्तोष हुआ। यहाँ तरस कुण्ड है। जिसके जल को पीकर गऊएँ, ग्वाल–बाल, कृष्ण और बलराम को बड़ा ही सन्तोष होता था। इसलिए भी इस गाँव का नाम तोष गाँव है। &lt;br /&gt;
==जखिन ग्राम==&lt;br /&gt;
यह तो ग्राम से दो मील की दूरी पर है।  इसका पूर्व नाम दक्षिण ग्राम है। राधिकाजी का वाम्य भाव ही प्रसिद्ध है। श्रीकृष्ण को वही भाव सर्वाधिक सुखकर है। किन्तु राधिकाजी में अखिल नायिकोचित भाव भी विद्यमान हैं। अत: कभी-कभी विशेष स्थिति में यहाँ दक्षिण नायिकोचित भाव को प्रकाश कर किशोरी जी ने श्रीकृष्ण को आनन्दित किया था। इसलिए इस ग्राम का नाम दक्षिण ग्राम हुआ है। किसी समय दाऊजी ने कृष्ण विलास में बाधा देने वाले एक यक्षिणी का बध किया था। इसिलिए इसे जक्षिण या जखिन ग्राम भी कहते हैं। यहाँ बलभद्र कुण्ड तथा बलदेव रेवती का दर्शन है। &lt;br /&gt;
==विहारवन==&lt;br /&gt;
यह श्रीराधाकृष्ण युगल की विहारस्थली है। यहाँ पर राधिकाजी ने कृष्ण के नृत्य की परीक्षा ली थी। &amp;lt;ref&amp;gt;प्रिय को नचवन सिखवत राधा प्यारी! मान गुमान लकुट लिए ठाढ़ी मंथरागति जबहि, डरपत कुञ्जबिहारी।। &amp;lt;/ref&amp;gt; मान–गुमान की छड़ी लेकर राधाप्यारी प्यारे कुञ्जबिहारी को नाचना सिखा रही हैं। किन्तु जब राधा प्यारी के निर्देश के अनुसार क्षिप्र गति से नृत्य में कोई त्रुटि आ पड़ी तो प्यारी जी ने आँखों की प्रखर दृष्टि से उन्हें ताड़न किया। यहाँ विहारकुण्ड है, जिसके निर्मल जल में ग्वालबालों के साथ कृष्ण ने गऊओं को मधुर जल पिलाया तथा जल विहार किया। पास ही अति रमणीय कदम्ब खण्डी है, जिसमें छोटी-सी छत्री में भगवान के श्रीचरणों के चिन्ह दर्शनीय है।&lt;br /&gt;
==बसौंती और राल ग्राम==&lt;br /&gt;
वर्तमान बसौती का नाम बसती है और राल का वर्तमान नाम राल ग्राम है। जिस समय नन्दबाबा ने सपरिवार गोकुल महावन को छोड़कर छटीकरा में निवास किया, उस समय उनके मित्र वृषभानु महाराज ने यहाँ बसौंती ग्राम में निवास किया। उनके यहाँ वास करने से यहाँ बसौंती हुआ है। निकट ही राल गाँव है। राल राधाजी की बाल्य लीलास्थली है। तथा बसौंती उनकी आंशिक पौगण्ड लीला स्थली है। बरसाना, जावट और राधाकुण्ड उनकी किशोर लीला की स्थलियाँ हैं। किंन्तु श्रीराधाकुण्ड उनकी परिपूर्णतम लीला विलास की परमोच्चतम लीला स्थली है यहाँ बलभद्रकुण्ड, बलभद्रमन्दिर तथा पास ही में कदम्ब–खण्डी है। &lt;br /&gt;
==अडींग==&lt;br /&gt;
मथुरा से पश्चिम में 9 मील की दूरी पर मुख्य राजमार्ग तथा गोवर्धन से चार मील पूर्व में अडींग स्थित है। सखाओं के साथ श्रीकृष्ण ने यहाँ सखियों से अड़कर दान लिया था। इसिलिए इसका नाम अडींग है। यहाँ किल्लोल कुण्ड में श्रीकृष्ण–बलराम ने जल कल्लोल जल बिहार किया था। &lt;br /&gt;
==माधुरी कुण्ड==&lt;br /&gt;
अडींग से दो मील अग्निकोण में माधुरी खोर है। यह राधाजी की प्रिय सखी माधुरीजी का स्थान है। वाणीकार माधुरी दासजी की यहाँ जन-स्थली है। यह स्थान बड़ा ही रमणीय है।&lt;br /&gt;
==मयूर ग्राम==&lt;br /&gt;
यह स्थान बहुलावन से दो मील नैऋत कोण में है। यहाँ श्रीकृष्ण अपनी प्रिय गोपियों के साथ मयूरों का नृत्य देखकर स्वयं भी उनके बीच में आनन्द पूर्वक नृत्य करने लगे। मयूरों ने प्रसन्न होकर कृष्ण को अपना एक सुन्दर बहुरंगी पंख न्यौछावर स्वरूप दिया, जिसे कृष्ण ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। यहाँ मयूर कुण्ड दर्शनीय है। &lt;br /&gt;
==छकना ग्राम==&lt;br /&gt;
मयूर गाँव के पास में ही छकना ग्राम है। गोचारण के समय यहाँ की गोपियों ने सखाओं के साथ श्रीकृष्ण बलराम को पेट भरकर छाछ पिलायी थी।&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==                                                       &lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{ब्रज के वन2}} {{ब्रज के वन}}&lt;br /&gt;
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[[Category:ब्रज के दर्शनीय स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>कंकाली देवी मन्दिर मथुरा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'यहां' to 'यहाँ'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{Incomplete}}&lt;br /&gt;
*[[मथुरा]] मे [[कंकाली टीला]] पर कंकाली देवी का मन्दिर स्थापित है । &lt;br /&gt;
*कंकाली को पूर्व में [[कंस]] काली के नाम से जाना जाता है, जिसकी स्थापना [[कृष्ण]] जन्म की घटना से जुड़ी बताई जाती हैं। कंस के द्वारा पूजित होने के कारण यह कंस काली या कंकाली देवी कहलाती है । &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kankali-Devi-Kankali-Tila-Mathura-1.jpg|thumb|250px|कंकाली देवी मन्दिर, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kankali  Devi Temple, Mathura]]&lt;br /&gt;
*यह वही अष्टभुजा सिंहवाहनी [[दुर्गा]] देवी है, जिसे कंस ने [[देवकी]] की कन्या समझकर उसे मारना चाहा था, किन्तु देवी उसके हाथ से छूटकर  आकाश में चली गई थी ।   &lt;br /&gt;
*[[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत]] के अनुसार [[यशोदा]] रानी के गर्भ से पैदा हुई कन्या को [[वसुदेव]] जी [[मथुरा]] लाये और इसी कन्या के बदले में [[नन्द|नन्दबाबा]] के घर श्रीकृष्ण पहुंचाये गये । कहा जाता है कि क्रूर कंस ने इसी बालिका का वध करने के लिए इस स्थान पर एक पत्थर की शिला पर पटख कर मारने का प्रयास किया था, किन्तु बालिका कंस के हाथ से छूट कर आकाश में चली गई तभी से यह स्थल [[कंस]] काली के नाम से विख्यात है । &lt;br /&gt;
*मथुरा में कृष्ण जन्मस्थान के पश्चात द्वितीय महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल यही है, जहां देव निर्मित स्तूप एवं नर वाहना कुबेरा देवी मन्दिर जैसे प्राचीन देव स्थानों के अतिरिक्त [[जैन]] , [[बौद्ध]] धर्म के मन्दिर, मठ और देवालय थे। &lt;br /&gt;
*[[हूण|हूणों]] के आक्रमण काल में इस महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की बड़ी क्षति हुई है । इस समय यहाँ स्थापित देवी प्रतिमा को मथुरा की प्रसिद्ध चार देवियों में से एक माना गया है ।&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{{मथुरा के स्थान और मन्दिर}}&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के दर्शनीय स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>सेतुबन्ध रामेश्वर कुण्ड काम्यवन</title>
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		<updated>2010-05-11T07:26:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'हजार' to 'हज़ार'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
श्री [[कृष्ण]] ने यहाँ पर श्री [[राम]] के आवेश में [[गोपी|गोपियों]] के कहने से बंदरों के द्वारा सेतु का निर्माण किया था। अभी भी इस सरोवर में सेतु बन्ध के भग्नावशेष दर्शनीय हैं। कुण्ड के उत्तर में रामेश्वर महादेव जी दर्शनीय हैं। जो श्री राम वेशी श्री कृष्ण के द्वारा प्रतिष्ठित हुए थे। कुण्ड के दक्षिण में उस पार एक टीले के रूप में [[लंका|लंकापुरी]] भी दर्शनीय है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रसंग'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री कृष्ण लीला के समय परम कौतुकी श्री कृष्ण इसी कुण्ड के उत्तरी तट पर गोपियों के साथ वृक्षों की छाया में बैठकर विनोदिनी श्री [[राधा|राधिका]] के साथ हास्य–परिहास कर रहे थे। उस समय इनकी रूप माधुरी से आकृष्ट होकर आस पास के सारे बंदर पेड़ों से नीचे उतरकर उनके चरणों में प्रणाम कर किलकारियाँ मार कर नाचने–कूदने लगे। बहुत से बंदर कुण्ड के दक्षिण तट के वृक्षों से लम्बी छलांग मारकर उनके चरणों के समीप पहुँचे। भगवान श्री कृष्ण उन बंदरों की वीरता की प्रशंसा करने लगे। गोपियाँ भी इस आश्चर्यजनक लीला को देखकर मुग्ध हो गई। वे भी भगवान श्री रामचन्द्र की अद्भुत लीलाओं का वर्णन करते हुए कहने लगीं कि श्री रामचन्द्र जी ने भी बंदरों की सहायता ली थी। उस समय [[ललिता]] जी ने कहा– 'हमने सुना है कि महापराक्रमी [[हनुमान]] जी ने [[त्रेता युग]] में एक छलांग में समुद्र को पार कर लिया था। परन्तु आज तो हम साक्षात रूप में बंदरों को इस सरोवर को एक छलांग में पार करते हुए देख रही हैं।' &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
ऐसा सुनकर [[कृष्ण]] ने गर्व करते हुए कहा– जानती हो! मैं ही [[त्रेता युग]] में श्री राम था मैंने ही राम रूप में सारी लीलाएँ की थी।&lt;br /&gt;
ललिता श्री रामचन्द्र की अद्भुत लीलाओं की प्रशंसा करती हुई बोलीं– तुम झूठे हो। तुम कदापि राम नहीं थे। तुम्हारे लिए कदापि वैसी वीरता सम्भव नहीं। श्री कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा– तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है, किन्तु मैंने ही राम रूप धारण कर [[जनकपुरी]] में [[शिव]] धनुष को तोड़कर [[सीता]] से विवाह किया था। पिता के आदेश से धनुष बाण धारण कर सीता और [[लक्ष्मण]] के साथ [[चित्रकूट]] और [[दण्डकारण्य]] में भ्रमण किया तथा वहाँ अत्याचारी दैत्यों का विनाश किया। फिर सीता के वियोग में वन–वन भटका। पुन: बन्दरों की सहायता से [[रावण]] सहित लंकापुरी का ध्वंसकर [[अयोध्या]] में लौटा। मैं इस समय गोपालन के द्वारा वंशी धारण कर गोचारण करते हुए वन–वन में भ्रमण करता हुआ प्रियतमा श्री राधिका के साथ तुम गोपियों से विनोद कर रहा हूँ। पहले मेरे राम रूप में धनुष–बाणों से त्रिलोकी काँप उठती थी। किन्तु, अब मेरे मधुर वेणुनाद से स्थावर–जग्ङम सभी प्राणी उन्मत्त हो रहे हैं।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
ललिता जी ने भी मुस्कराते हुए कहा–हम केवल कोरी बातों से ही विश्वास नहीं कर सकतीं। यदि श्री राम जैसा कुछ पराक्रम दिखा सको तो हम विश्वास कर सकती हैं। श्री रामचन्द्र जी सौ [[योजन]] समुद्र को भालू–कपियों के द्वारा बंधवा कर सारी सेना के साथ उस पार गये थे। आप इन बंदरों के द्वारा इस छोटे से सरोवर पर पुल बँधवा दें तो हम विश्वास कर सकती हैं। ललिता की बात सुनकर श्री कृष्ण ने वेणू–ध्वनि के द्वारा क्षण-मात्र में सभी बंदरों को एकत्र कर लिया तथा उन्हें प्रस्तर शिलाओं के द्वारा उस सरोवर के ऊपर सेतु बाँधने के लिए आदेश दिया। देखते ही देखते श्री कृष्ण के आदेश से हज़ारों बंदर बड़ी उत्सुकता के साथ दूर -दूर स्थानों से पत्थरों को लाकर सेतु निर्माण में लग गये। श्री कृष्ण ने अपने हाथों से उन बंदरों के द्वारा लाये हुए उन पत्थरों के द्वारा सेतु का निर्माण किया। सेतु के प्रारम्भ में सरोवर की उत्तर दिशा में श्री कृष्ण ने अपने रामेश्वर महादेव की स्थापना भी की। आज भी ये सभी लीलास्थान दर्शनीय हैं। इस कुण्ड का नामान्तर लंका कुण्ड भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{ब्रज के दर्शनीय स्थल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>विमल कुण्ड काम्यवन</title>
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		<updated>2010-05-11T07:25:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'हजार' to 'हज़ार'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vimal-Kund-Kama-3.jpg|विमल कुण्ड, [[काम्यवन]]&amp;lt;br /&amp;gt;Vimal Kund, Kamyavan|thumb|600px|center]]&lt;br /&gt;
[[काम्यवन|कामवन]] ग्राम से दो फर्लांग दूर दक्षिण–पश्चिम कोण में प्रसिद्ध विमलकुण्ड स्थित है । कुण्ड के चारों ओर क्रमश: &lt;br /&gt;
#दाऊजी, &lt;br /&gt;
#सूर्यदेव, &lt;br /&gt;
#श्रीनीलकंठेश्वर महादेव, &lt;br /&gt;
#श्रीगोवर्धननाथ, &lt;br /&gt;
#श्री मदनमोहन एवं काम्यवन विहारी, &lt;br /&gt;
#श्री विमल विहारी, &lt;br /&gt;
#विमला देवी, &lt;br /&gt;
#श्री मुरलीमनोहर, &lt;br /&gt;
#भगवती गंगा और &lt;br /&gt;
#श्री गोपालजी विराजमान हैं ।&lt;br /&gt;
'''प्रसंग'''&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vimal-Kund-Kama-1.jpg|thumb|200px|विमल कुण्ड, [[काम्यवन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Vimal Kund, Kamyavan]]&lt;br /&gt;
[[गर्ग संहिता]] के अनुसार प्राचीनकाल में सिन्धु देश की चम्पकनगरी में विमल नामक के  एक प्रतापी राजा थे । उनकी छह हज़ार रानियों में से किसी को कोई सन्तान नहीं थी । श्री[[याज्ञवल्क्य]] ऋषि की कृपा से उन रानियों के गर्भ से बहुत सी सुन्दर कन्याओं ने जन्म ग्रहण किया । वे सभी कन्याएँ पूर्व जन्म में जनकपुर की वे स्त्रियाँ थीं जो श्री[[राम]]चन्द्रजी को पति रूप से प्राप्त करने की इच्छा रखती थीं । राजा विमल के घर जन्म ग्रहण करने पर जब वे विवाह के योग्य हुई, तब महर्षि याज्ञवल्क्य की सम्मति से राजा विमल ने अपनी कन्याओं के लिए सुयोग्य वर श्री[[कृष्ण]] को ढूँढने के लिए अपना दूत [[मथुरा|मथुरापुरी]] में भेजा । सौभाग्य से मार्ग में उस दूत की भेंट श्री[[भीष्म|भीष्म पितामह]] से हुई । श्री भीष्म पितामह ने उस दूत को श्रीकृष्ण का दर्शन करने के लिए श्री[[वृन्दावन]] भेजा । श्रीकृष्ण उस समय वृन्दावन में विराजमान थे । राजदूत ने वृन्दावन पहुँचकर श्रीकृष्ण को राजा विमल का निमन्त्रण–पत्र दिया, जिसमें श्रीकृष्ण को चम्पक नगरी में आकर राजकन्याओं का पाणिग्रहण करने की प्रार्थना की गई थी । श्रीकृष्ण, महाराज विमल का निमन्त्रण पाकर चम्पक नगरी पहुँचे और राजकन्याओं को अपने साथ [[ब्रजमंडल]] के इस कमनीय कामवन में ले आये । उन्होंने उन कन्याओं की संख्या के अनुरूप रूप धारणकर उन्हें अंगीकार किया । उनके साथ रास आदि विविध प्रकार की क्रीड़ाएँ कीं । उन कुमारियों की चिरकालीन अभिलाषा पूर्ण हुई । उनके आनन्दाश्रु से प्रपूरित यह कुण्ड विमल कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इस विमल कुण्ड में स्नान करने से लौकिक, अलौकिक एवं अप्राकृत सभी प्रकार की कामनाएँ पूर्ण होती हैं । हृदय निर्मल होता है तथा उसमें ब्रज भक्ति का संचार होता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''द्वितीय प्रसंग'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनश्रुति के अनुसार चातुर्मास्य काल में विश्व के सारे तीर्थ [[ब्रज]] में आगमन करते हैं । एक बार चातुर्मास्य काल में तीर्थराज [[पुष्कर]] ब्रज में नहीं आये । श्रीकृष्ण ने योगमाया का स्मरण किया । स्मरण करते ही पृथ्वी तल से एक जल का प्रबल प्रवाह निकला । आश्चर्य की बात उस पवित्र जल के प्रवाह से परम सुन्दर एक किशोरी प्रकट हुई । श्रीकृष्ण ने उस सुन्दरी के साथ जल–प्रवाह में विविध प्रकार से जलविहार किया । उस किशोरी ने अपनी विशुद्ध प्रेममयी सेवाओं और सौन्दर्य से परम रसिक श्रीकृष्ण को परितृप्त कर दिया । श्रीकृष्ण ने परितृप्त होकर उस किशोरी को वरदान दिया कि आज से तुम विमला देवी के नाम से विख्यात होगी । यह कुण्ड तुम्हारे नाम से प्रसिद्ध होगा । इसमें स्नान करने से तीर्थराज पुष्कर में स्नान करने की अपेक्षा सात गुणा अधिक पुण्यफल प्राप्त होगा । तब से यह कुण्ड विमला कुण्ड के नाम से विख्यात हुआ । इस कुण्ड के किनारे श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त करने के लिए बड़े–बड़े ऋषि–महर्षियों ने वास किया है । महर्षि [[दुर्वासा]] और [[पांडव|पाण्डवों]] का निवास यहाँ प्रसिद्ध ही है । प्रत्येक ब्रजमण्डल परिक्रमा–मण्डली अथवा परिक्रमा करने वाले यात्री यहाँ निवास करते हैं तथा यहीं से [[काम्यवन]] की परिक्रमा आरम्भ करते हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Vimal-Kund-Neelkantheshwar-Mahadeva- kama-2.jpg|नीलकंठेश्वर महादेव, विमल कुण्ड, [[काम्यवन]]&amp;lt;br /&amp;gt;Neelkantheshwar Mahadev, Vimal Kund, Kamyavan&lt;br /&gt;
चित्र:Vimal-Kund-Neelkantheshwar-Mahadeva-Kamyavan-Kama-3.jpg|नीलकंठेश्वर महादेव, विमल कुण्ड, [[काम्यवन]]&amp;lt;br /&amp;gt;Neelkantheshwar Mahadev, Vimal Kund, Kamyavan&lt;br /&gt;
चित्र:Vimal-Kund-Shani-Dev-Temple-Kamyavan-Kama-1.jpg|[[शनि|शनिदेव]] मंदिर, विमल कुण्ड, [[काम्यवन]] &amp;lt;br /&amp;gt;Shanidev Temple, Vimal Kund, Kamyavan&lt;br /&gt;
चित्र:Vimal-Kund-Kama-4.jpg|विमल कुण्ड, [[काम्यवन]]&amp;lt;br /&amp;gt;Vimal Kund, Kamyavan&lt;br /&gt;
चित्र:Vimal-Kund-Santoshi-Maa-Temple-Kamyavan-Kama-1.jpg|संतोषी मां का मंदिर, विमल कुण्ड, [[काम्यवन]] &amp;lt;br /&amp;gt;Santoshi Maa Temple, Vimal Kund, Kamyavan&lt;br /&gt;
चित्र:Vimal-Kund-Kamyavan-Kama-6.jpg|विमल कुण्ड, [[काम्यवन]]&amp;lt;br /&amp;gt;Vimal Kund, Kamyavan&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{ब्रज के दर्शनीय स्थल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%A8&amp;diff=31034</id>
		<title>भांडीरवन</title>
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		<updated>2010-05-11T07:23:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'हजार' to 'हज़ार'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
भांडीरवन [[मथुरा]] - माँट मार्ग पर स्थित हैं। भांडीरवन [[श्रीकृष्ण]] की विविध प्रकार की मधुर लीलाओं की स्थली है । बारह वनों से यह एक प्रमुख वन हैं । यहाँ भाण्डीरवट, वेणुकूप, रासस्थली, वंशीवट, मल्लक्रीड़ा स्थान, श्रीदासमजी का मन्दिर, श्याम तलैया, छायेरी गाँव और [[आगियारा]] गाँव आदि लीला स्थलियाँ दर्शनीय हैं । जहाँ सब प्रकार के तत्त्वज्ञान तथा ऐश्वर्य-माधुर्यपूर्ण लीला-माधुरियों का सम्पूर्ण रूप से प्रकाश हो, उसे भाण्डीरवन कहते हैं ।&lt;br /&gt;
*श्रीकृष्णलीला-स्थलों का वर्णन किया जा रहा है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भाण्डीरवट==&lt;br /&gt;
भाण्डीरवन के अन्तर्गत भाण्डीरवट एक प्रसिद्ध लीलास्थली है। यहाँ श्रीराधाकृष्ण युगल की विविध लीलाएँ सम्पन्न होती हैं। श्रीकृष्ण की प्रकट-लीला के समय यहाँ पर एक बहुत बृहत वट का वृक्ष था उसकी अनेकों लम्बी शाखाएँ ऊपर-नीचे चारों ओर बहुत दूर-दूर तक फैली हुई थीं। पास में ही श्री[[यमुना]] मधुरा  किल्लोल करती हुई वक्रगति से प्रवाहित हो रही थीं, जिस पर श्रीकृष्ण- बलदेव सखाओं के साथ विविध-प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हुए डालियों के ऊपर-ही-ऊपर श्रीयमुना को पार कर जाते थे । इसकी विस्तृत शाखाओं पर शुक-सारी, मयूर-मयूरी, कोयलें, पपीहे सदा सर्वदा चहकते रहते थे तथा इसके फलों के तृप्त रहते थे । इसकी स्निग्ध एवं सुशीतल छाया में हिरण-हिरणियाँ तथा वन के अन्य प्राणी यमुना का मधुर जलपान कर विश्राम करते थे । श्रीमती [[यशोदा]] आदि ग्वालबालों की माताएँ अपने-अपने पुत्रों के लिए दोपहर का 'छाक' गोपों के माध्यम से अधिकांश इसी निर्दिष्ट भाण्डीरवट पर भेज दिया करती थीं । श्रीकृष्ण-बलदेव सखाओं के साथ गोचारण करते हुए यमुना में गायों को जलपान कराकर निकट की हरी-भरी घासों से पूर्ण वन में चरने के लिए छोड़ देते । वे स्वयं यमुना के शीतल जल में स्नान एवं जलक्रीड़ा कर इस वट की सुशीतल छाया में बैठकर माताओं के द्वारा प्रेरित विविध प्रकार के सुस्वादु अन्न व्यंजन का सेवन करते थे । श्रीकृष्ण सबके मध्य में बैठते । सखा लोग चारों ओर से घेर कर हज़ारों पंक्तियों में अगल-बगल एवं आगे-पीछे बैठ जाते । ये सभी सखा पीछे या दूर रहने पर भी अपने को श्रीकृष्ण के सबसे निकट सामने देखते थे । ये परस्पर सबको हँसते-हँसाते हुए विविध प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हुए भोजन सम्पन्न करते थे । आकाश से ब्रह्मा आदि देवगण उनके भोजन क्रीड़ा-कौतुक देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे। इसी वट वृक्ष के नीचे श्रीराधाकृष्ण युगल का ब्रह्माजी द्वारा गान्धर्व विवाह सम्पन्न हुआ था। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''प्रसंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[गर्गसंहिता]] एवं [[गीतगोविन्द]] के अनुसार एक समय [[नन्द]]बाबा श्रीकृष्ण को लेकर गोचारण हेतु भाण्डीरवन में पधारे । सघन तमाल, कदम्ब वृक्षों और हरी-भरी लताओं से आच्छादित यह वन बड़ा ही रमणीय सघन वन होने के कारण इसमें सूर्य की रश्मियाँ भी बहुत ही कम प्रवेश करती थीं। सहसा चारों ओर काले-काले मेघ घिर आये तथा प्रचण्ड आँधी के साथ कुछ-कुछ वर्षा  भी प्रारम्भ हो गई । चारों तरफ अंधकार हो गया। नन्दबाबा दुर्योग देखकर भयभीत हो उठे । उन्होंने कन्हैया को अपने अकं में सावधानी से छिपा लिया । इसी समय वहाँ नख से शिख तक श्रृंगार धारण की हुई अपूर्व सुन्दरी वृषभानु कुमारी श्री[[राधा|राधिका]]जी उपस्थित हुई । उन्होंने नन्दबाबा के आगे अपने दोनों होथों को पसार दिया , मानों कृष्ण को अपनी गोद में लेना चाहती हो । नन्दबाबा को बहुत ही आश्चर्य हुआ । उन्होंने कृष्ण को उनके हाथों मं समर्पित कर दिया । श्रीमती राधिका कृष्ण को लेकर भाण्डीरवन के अन्तर्गत इसी भाण्डीरवट की छाया में ले गई। वहाँ पहुँचते ही श्रीकृष्ण मन्मथ-मन्मथ किशोर के रूप में प्रकट हो गये। इतने में ललिता, विशाखा आदि सखियाँ तथा चतुर्मुख ब्रह्मा भी वहाँ उपस्थित हुए दोनों की अभिलाषा जानकर [[ब्रह्मा]]जी ने [[वेद]] मन्त्रों के द्वारा किशोर-किशोरी का गान्धर्व विवाह सम्पन्न कराया श्रीमती राधिका और श्रीकृष्ण ने परस्पर एक दूसरे को सुन्दर फूलों के हार अर्पण किये । सखियों ने प्रसन्नतापूर्वक विवाहकालीन गीत गाये और देवताओं ने आकाश से पुष्पों की वृष्टि की। देखते-देखते कुछ क्षणों के पश्चात ब्रह्माजी चले गये । सखियाँ भी अन्तर्धान हो गईं और कृष्ण ने पुन: बालक का रूप धारण कर लिया ।  श्रीमती राधिका ने कृष्ण को पूर्ववत उठाकर प्रतीक्षा में खड़े नन्दबाबा की गोदी में सौंप दिया। इतने में बादल छट गये। आँधी भी शान्त हो गई । नन्दबाबा कृष्ण को लेकर अपने नन्द ब्रज में लौट आये।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''दूसरा प्रसंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
एक समय गर्मी के दिनों में सखाओं के साथ श्रीकृष्ण गायों को यमुना में जलपान कराकर उन्हें चरने के लिए छोड़ दिया तथा वे मण्डलीबद्ध होकर भोजन क्रीड़ा-कौतुक में इतने मग्न हो गये कि उन्हें यह पता नही चला कि गायें उन्हें छोड़कर बहुत दूर निकल गई हैं । चारों ओर सूखे हुए मुञ्जावन, जिसमें हाथी भी मार्ग न पा सके, जेठ की चिलचिलाती हुई धूप, नीचे तप्त बालुका, दूर तक कहीं भी छाया नहीं, गायें उस वीहड़ मुञ्जवन से निकलने का मार्ग भूल गई, प्यास के मारे उनकी छाती फटने लगी । इधर सखा लोग भी कृष्ण-बलदेव को सूचित किये बिना ही गायों को खोजते हुए उसी मुञ्जवन में पहुँचे। इनकी भी गायों जैसी विकट अवस्था हो गई इतने में दुष्ट कंस के अनुचरों ने मुञ्जवन में आग लगा दी । आग हवा के साथ क्षणभर में चारों ओर फैल गई। आग की लपलपाती हुई लपटों ने गायों एवं ग्वालबालों को घेर लिया । बचने का और कोई उपाय न देखकर वे कृष्ण को पुकारने लगे । श्रीकृष्ण ने वहाँ पहुँचकर सखाओं को  को आँख बन्द करने को कहा। श्रीकृष्ण ने पलभर में उस दावाग्नि का पान कर लिया । सखाओं ने आँख खोलते ही देखा कि सभी भाण्डीरवट की  सुशीतल छाया में कृष्ण-बलदेव के साथ पूर्ववत भोजन क्रीड़ा-कौतुक में मग्न हैं, पास में गौएँ भी आराम से बैठी हुई जुगाली कर रही हैं । दावाग्नि की विपत्ति उन्हें स्वप्न की भाँति प्रतीत हुई । श्रीकृष्ण ने जहाँ दावाग्नि का पान किया था वह मुञ्जाटवी या ईषिकाटवी है, उसका वर्तमान नाम आगियारा है। वह यमुना के उस पार भाण्डीर गाँव में है। जहाँ कृष्ण सखाओं के साथ भोजन क्रीड़ा –कौतुक कर रहे थे, दावाग्नि-पान के पश्चात जहाँ पुन: सखा लोग भोजन क्रीड़ा-कौतुक करने लगे तथा गायों को सुख से जुगाली करते हुए देखा, वह यही लीला-स्थली भाण्डीरवट है । श्रीमद्भागवत में इस लीला का वर्णन है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथेति मीलिताक्षेषु भगवानग्निमुल्बणम् ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीत्वा मुखेन तान कृच्छाद् योगाधीशो व्यमोचयत् ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वेणुकूप==&lt;br /&gt;
भाण्डीरवट के पास ही वेणुकूप है। यहाँ श्रीकृष्ण ने अपने वेणु से एक कूप को प्रकट किया था ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
'''प्रसंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
वत्सासुर का वध करने  के पश्चात श्रीकृष्ण अपने बल की डींग हाँकते हुए भाण्डीरवट के पास गोपियों से मिले, किन्तु गोपियों ने श्रीकृष्ण के ऊपर गोवध का आरोप लगाकर स्पर्श करने से मना कर दिया । कृष्ण ने कहा कि मैंने गोवध नहीं किया, बल्कि बछड़े के रूप में एक असुर का वध किया है । किन्तु गोपियाँ कृष्ण के तर्क से सहमत नहीं हुई । तब कृष्ण ने उनसे पवित्र होने का उपाय पूछा। गोपियों ने कहा -'यदि तुम [[पृथ्वी]] के सारे तीर्थों में स्नान करोगे तब पवित्र होओगे, तभी हमें स्पर्श कर सकते हो ।' गोपियों की बात सुनकर कृष्ण ने अपने वेणु से एक सुन्दर कूप का निर्माण कर उसमें पृथ्वी के सारे तीर्थों का आह्वान किया । फिर उस कूप के जल में स्नानकर गोपियों से मिले। यहाँ भाण्डीरवट के निकट ही यह वेणुकूप है । उसमें स्नान करने से सब तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त होता है। आज भी [[ब्रज]] की महिलाएँ किसी विशेष योग में इस कूप का पूजन करती हैं तथा जिनको सन्तान उत्पन्न नहीं होती अथवा जिनकी सन्तानें अकाल मृत्यु को प्राप्त होती हैं, वे यहाँ मनौती करती हैं इस प्रकार उनकी मनोवाच्छा पूर्ण होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*मान्यता है कि [[सोमवती अमावस्या]] को स्नान किया जाता है। स्नान के बाद वस्त्र वहीं कूप के पास ही छोड़ (त्याग दिए) दिए जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==श्रीबलदेवजी का मन्दिर==&lt;br /&gt;
श्रीबलभद्रजी, छोटे भैया कन्हैया और सखाओं को लेकर भाण्डीरवन में गोचारण के लिए आते थे। [[यमुना]] से पूर्व की ओर स्थित [[भद्रवन]], भाण्डीरवन, [[बेलवन]], [[गोकुल]]-[[महावन]], [[लोहवन]] आदि वनों में श्रीबलभद्रजी की प्रमुखता है । इसलिए इन सभी स्थानों में श्रीबलदेवजी के मन्दिर  हैं । यहाँ भाण्डीरवट में भी इनका यह मन्दिर दर्शनीय है। &lt;br /&gt;
==छाहेरी गाँव==&lt;br /&gt;
भाण्डीरवट एवं वंशीवट के बीच में बसे हुए गाँव का नाम छाहेरी गाँव है । श्रीकृष्ण सखाओं के साथ भाण्डीरवन में विविध प्रकार की क्रीड़ाओं के पश्चात पेड़ों की छाया में बैठकर नाना प्रकार की भोजन-सामग्री क्रीड़ा-कौतुक के साथ ग्रहण करते थे। इसे छाहेरी गाँव कहते हैं । छाया शब्द से छाहेरी नाम बना है । ग्राम का नामान्तर बिजौली भी है। भाण्डीरवट के पास ही बिजौली ग्राम है। &lt;br /&gt;
==रासस्थली वंशीवट==&lt;br /&gt;
भाण्डीरवट से थोड़ी दूर समीप ही श्रीकृष्ण की रासस्थली वंशीवट है । यह [[वृन्दावन]] वाले वंशीवट से पृथक् है। श्रीकृष्ण इधर गोचारण करते समय इसी वटवृक्ष के ऊपर चढ़कर अपनी वंशी में गायों का नाम पुकार कर उन्हें एकत्र करते और उन सबको एकसाथ लेकर अपने गोष्ठ में लौटते। कभी-कभी सुहावनी रात्रिकाल में यहीं से प्रियतमा गोपियों के नाम राधिके ! ललिते ! विशाखे ! पुकारते। इन सखियों के आने पर इस वंशीवट के नीचे रासलीलाएँ सम्पन्न होतीं थीं।&lt;br /&gt;
==श्रीदामवट==&lt;br /&gt;
इसी वंशीवट के नीचे श्रीदाम भैया का दर्शन है। श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर विरह में अनुतप्त होकर श्रीदाम सखा इस निर्जन वंशीवट पर चले आये । वे श्रीकृष्ण  की मधुर लीलाओं का स्मरण कर बड़े दुखी रहते थे। बहुत दिनों के बाद दन्तवक्र को बांधकर जब श्रीकृष्ण गोकुल में लौटे, तब इनसे मिले और इनको अपने साथ ले आये। श्रीदाम का मन्दिर यहाँ दर्शनीय है। &lt;br /&gt;
==श्याम तलैया==&lt;br /&gt;
वंशीवट के पास ही श्याम तलैया है । रास के समय गोपियों को प्यास लगने पर श्रीश्यामसुन्दर ने अपनी वंशी से इस तलैया को प्रकटकर उसके सुस्वादु जल से उन सबको तृप्त किया था । आजकल यह तलैया टूटी-फूटी खण्डहर के रूप में वर्तमान है। थोड़ा सा जल है। लोग श्रद्धा से यहाँ आचमन करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{ब्रज के वन2}} {{ब्रज के वन}}&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के वन]] [[Category:पर्यटन कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के दर्शनीय स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
	</entry>
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		<title>बिहारवन</title>
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		<updated>2010-05-11T07:22:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'हजार' to 'हज़ार'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{Tocright}}&lt;br /&gt;
रामघाट से डेढ़ मील दक्षिण-पश्चिम में बिहारवन है। यहाँ बिहारी जी का दर्शन और बिहारकुण्ड है। यहाँ पर ब्रजबिहारी [[कृष्ण]] ने [[राधा|राधिका]] के सहित [[गोपी|गोपियों]] के साथ रासविहार किया एवं अन्यान्य नाना प्रकार के क्रीड़ा-विलास किये थे। श्री [[यमुना]] के पास ही यह एक रमणीय स्थल है। [[ब्रज]] के अधिकांश वनों के कट जाने पर भी अभी तक बिहारवन का कुछ अंश सुरक्षित है। अभी भी इसमें हज़ारों मयूर 'के-का' रव करते हैं, वर्षा के दिनों में पंख फैलाकर नृत्य करते हैं, कोयलें कुहकती हैं। इसमें अभी भी सुन्दर-सुन्दर कृञ्ज, कदम्बखण्डी तथा नाना प्रकार की लताएँ वर्तमान हैं। इनका दर्शन करने से कृष्णलीला की मधुर स्मृतियाँ जग उठती हैं। यहाँ की गोशाला में बड़ी सुन्दर-सुन्दर गऊएँ, फुदकते हुए बछड़े और मत्त साँड़ श्रीकृष्ण की गोचारण लीला की मधुर स्मृति जागृत करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तपोवन==&lt;br /&gt;
यह स्थान [[अक्षयवट]] की पूर्व दिशा में एक मील दूर यमुना के तट पर अवस्थित है। गोप कन्याओ ने 'श्रीकृष्ण ही हमारे पति हों' इस कामना से आराधना की थीं कहते हैं ये गोप कन्याएँ वे है जो पूर्व जन्म में दण्डकारण्य में श्रीकृष्ण को पाने की लालसा से तपस्या में रत थे तथा श्री [[राम|रामचन्द्र]] जी की कृपा से द्वापर में गोपीगर्भ से जन्मे थे। इनमें जनकपुर की राजकन्याएँ भी सम्मिलित थीं, जो [[सीता]] की भाँति श्रीरामचन्द्र जी से विवाह करना चाहती थीं। वे भी श्रीरामचन्द्र जी की कृपा से [[युग|द्वापरयुग]] के अंत में [[ब्रज]] में गोपकन्याओं के रूप में जन्मी थीं। इन्हीं गोप कुमारियों की श्रीकृष्ण प्राप्ति के लिए आराधना स्थल है यह तपोवन। ब्रज की श्रीललिता विशाखा आदि नित्यसिद्धा गोपियाँ अन्तरग्ङस्वरूप शक्ति राधिका जी की कायव्यूह स्वरूपा है। उन्हें तप करने की कोई भी आवश्यकता नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गोपीघाट==&lt;br /&gt;
यहाँ उपरोक्त गोपियाँ यमुना में स्नान करती थीं। इसलिए इसका नाम गोपी घाट है। &lt;br /&gt;
==चीरघाट==&lt;br /&gt;
यह लीलास्थली अक्षयवट से दो मील पश्चिम में स्थित है। गोप कुमारियों ने 'श्रीकृष्ण पति के रूप में प्राप्त हों',&amp;lt;ref&amp;gt;कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नम:॥ श्रीमद्भागवत 10/22/04&amp;lt;/ref&amp;gt; इस आशय से एक मास तक नियमित रूप से नियम व्रतादि का पालन करते हुए [[कात्यायनी पीठ|कात्यायनी देवी]] की पूजा की थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;एवं मासं व्रतं चेरू: कुमार्य: कृष्णचेतस:। भद्रकालीं समानर्चुर्भूयान्नन्दसुत: पति:।।  श्रीमद्भागवत 10/22/05&amp;lt;/ref&amp;gt; व्रत के अंत में कुछ प्रिय सखाओं के साथ श्रीकृष्ण ने गोपियों के वस्त्र-हरण किये तथा उन्हें उनकी अभिलाषा पूर्ण होने का वरदान दिया था। [[यमुना]] के तट पर यहाँ [[कात्यायनी पीठ|कात्यायनी देवी का मन्दिर]] है। गाँव का वर्तमान नाम सियारो है।&lt;br /&gt;
==नन्दघाट==&lt;br /&gt;
यह स्थान गोपी घाट से दो मील दक्षिण और अक्षयवट से एक मील दक्षिण पूर्व में स्थित है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रसंग'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार महाराज [[नन्द]] ने एकादशी का व्रत किया और द्वादशी लगने पर रात्रि की बेला में ही वे इसी घाट पर स्नान कर रहे थे। यह आसुरिक बेला थी इसलिए वरुण के दूत उन्हें पकड़कर वरुण देव के सामने ले गये। यमुनाजी में महाराज नन्द के अदृश्य हाने का समाचार पाकर ब्रजवासी लोग बड़े दुखी हुए। ब्रजवासियों का क्रन्दन देखकर श्रीकृष्ण, बलरामजी को उनकी देख-रेख करने  के लिए वहीं छोड़कर स्वयं वरुणलोक में गये। वहाँ वरुणदेव ने कृष्ण को देखकर नाना-प्रकार से उनकी स्तव-स्तुति की और उपहारस्वरूप नाना प्रकार के मणि-मुक्ता रत्नालंकार आदि भेंटकर अपने इस कृत्य के लिए क्षमा याचना की। श्रीकृष्ण पिता श्रीनन्द महाराजजी को लेकर इसी स्थान पर पुन: ब्रजवासियों से मिले। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दूसरा प्रसंग'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक समय [[जीव गोस्वामी]] ने किसी दिग्विजयी पण्डित को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया था। वह दिग्विजयी पण्डित श्री [[रूप गोस्वामी]] के ग्रन्थों का संशोधन करना चाहता था। बालक जीव गोस्वामी इसे सह नहीं सके। वृन्दावन में यमुना घाट पर पराजित होने पर दिग्विजयी पण्डित बालक की विद्धत्ता की भूरी प्रशंसा करता हुआ व श्री रूपगोस्वामी से परिचय पूछा। श्री रूपगोस्वमी ने नम्रता के साथ उत्तर दिया- यह मेरे भाई का पुत्र तथा मेरा शिष्य है। श्री रूप गोस्वामी समझ गये कि जीव ने इसके साथ शास्त्रार्थ किया है। दिग्विजयी पण्डित के चले जाने के बाद श्रीलरूपगोस्वामी ने कहा- जीव! तुम इतनी-सी बात भी सहन नहीं कर सकते? अभी भी तुम्हारे अन्दर प्रतिष्ठा की लालसा है। अत: तुम अभी यहाँ से चले जाओ। &lt;br /&gt;
श्री जीवगोस्वामी, श्री रूपगोस्वामी के कठोर शासन वाक्य को सुनकर बड़े दुखी हुए। वे [[वृन्दावन]] से नन्दघाट के निकट [[यमुना]] के किनारे सघन निर्जन वन में किसी प्रकार बड़े कष्ट से रहने लगे । वे यमुना के तट पर मगरों की माँद में रहते। कभी-कभी आटा में जल मिलाकर वैसे ही पी लेते, तो कभी उपवास रहते। इस प्रकार श्रीगुरुदेव के विरह में तड़फते हुए जीवन यापन करने लगे। कुछ ही दिनों में शरीर सूखकर काँटा हो गया। उन्हीं दिनों श्री [[सनातन गोस्वामी]] [[ब्रज परिक्रमा]] के बहाने नन्दघाट पर उपस्थित हुए। वहाँ ब्रजवासियों के मुख से एक किशोर गौड़ीय बाल के साधु की कठोर आराधना एवं उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा सुनकर वे जीव गोस्वामी के पास पहुँचे तथा सांत्वना देकर उसे अपने साथ वृन्दावन ले आये। अपनी भजन कुटी में जीव को छोड़कर वे अकेले ही रूप गोस्वामी के पास पहुँचे। श्री रूप गोस्वामी उस समय जीवों पर दया के सम्बन्ध में उपस्थित वैष्णवों के सामने व्याख्या कर रहे थे। श्री सनातन गोस्वामी ने उस व्याख्या के बीच में ही श्री रूप गोस्वामी से पूछा- तुम दूसरों को तो जीव पर दया करने का उपदेश दे रहे हो किन्तु स्वयं जीव पर दया क्यों नही करते? श्री रूप गोस्वामी ने बड़े भाई और गुरु श्री सनातन गोस्वामी की पहेली का रहस्य जानकर श्री जीव को अपने पास बुलाकर उनकी चिकित्सा कराई तथा पुन: अपनी सेवा में नियुक्त कर उन्हें अपने पास रख लिया। नन्दघाट में रहते हुए श्रीजीव गोस्वामी ने अपने षट्सन्दर्भ रूप प्रसिद्ध ग्रन्थ का प्रणयन किया था। यहाँ पर अभी भी श्रीजीव गोस्वामी का स्थान जीव गोस्वामी की गुफ़ा के रूप में प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
==भैया भयगाँव==&lt;br /&gt;
श्रीनन्द महाराज वरुण के दूतों को देखकर यहाँ भयभीत हो गये थे। इसलिए वज्रनाभ ने इस गाँव का नाम भयगाँव रखा। भयगाँव नन्दघाट से संलग्न है।&lt;br /&gt;
==गांग्रली==&lt;br /&gt;
चीरघाट से दो मील दक्षिण और कुछ पूर्व दिशा में तथा भयगाँव से दो मील उत्तर में गांग्रली अवस्थित है। &lt;br /&gt;
==उनाई अथवा जनाई गाँव==&lt;br /&gt;
यह स्थान बाजना से डेढ़ मील दक्षिण में स्थित है। यहाँ श्रीकृष्ण सखाओं के साथ बैठकर भोजन लीला कर रहे थे, जिससे ब्रह्मा को मोह उत्पन्न हुआ। अंत में कृष्ण ने अनुग्रह कर ब्रह्माजी का मोह दूर किया और अपने को जना दिया। उस समय ब्रह्मा ने इस विश्व को कृष्णमय देखा(जाना) इसलिए इस स्थान का नाम जनाई गाँव है। &lt;br /&gt;
==बालहारा==&lt;br /&gt;
यहाँ ब्रह्माजी ने ग्वालबालों का हरण किया था। अतएव इस स्थान का नाम बालहारा है। &lt;br /&gt;
==तमालवन तथा कृष्णकुण्ड टीला==&lt;br /&gt;
तमाल वृक्षों सघन वन से परिमण्डित, श्रीराधाकृष्ण के मिलन और रसमयी क्रीड़ाओं का स्थान है, एक समय रसिक बिहारी श्रीकृष्ण सखियों के साथ राधाजी से इसी तमालकुञ्ज में मिले। तमालवृक्षों से लिपटी हुई ऊपर तक फैली नाना प्रकार की लताएँ वल्लरियाँ बड़ी सुहावनी लग रही थीं। श्रीकृष्ण ने प्रियाजी को इंगित कर पूछा- 'यह लता तमाल वृक्ष से लिपटी हुईं क्या कह रही हैं? 'राधिका ने मुस्कराकर  उत्तर दिया- 'स्वाभाविक रूप से इस लता ने तमाल वृक्ष का अवलम्बन कर उसे अपनी बेलो, पत्तों और पुष्पों से आच्छादित कर रखा है, यह वृक्ष का सौभाग्य है कि वृक्ष में फल और पुष्प नही रहने पर भी लताएँ अपने पल्लवों और पुष्पों से इस वृक्ष का का सौन्दर्य अधिक बढ़ा रही है। ' इसी समय पवन के एक झोंके ने लता को झकझोर दिया। यह देखकर किशोर-किशोरी दोनों युगल भाव में विभोर हो गये। यह तमालवन इस स्मृति को संजोए हुए अभी भी वर्तमान है। &lt;br /&gt;
==छूनराक==&lt;br /&gt;
सौभरी ऋषि का यहीं पर आश्रम था। यह स्थान [[वृन्दावन]] स्थित कालीयह्नद के समीप ही एक मील पश्चिम में अवस्थित है। &lt;br /&gt;
==हारासली==&lt;br /&gt;
यहाँ श्रीकृष्ण की रासलीला स्थली है। पास ही सुरूखुरू गाँव है। सेईसे डेढ़ मील उत्तर-पूर्व में माई-बसाई नामक दो गाँव हैं। माई के उत्तर-पूर्व में बसाई गाँव है।&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==                                                       &lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{ब्रज के वन2}} {{ब्रज के वन}}&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के वन]] [[Category:पर्यटन कोश]] &lt;br /&gt;
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[[Category:ब्रज के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के दर्शनीय स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>बलदाऊ मन्दिर मथुरा</title>
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		<updated>2010-05-11T07:22:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: Text replace - 'हजार' to 'हज़ार'&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
{{Incomplete}}&lt;br /&gt;
*[[मथुरा]] के कंसखार दशावतार गली के सामने स्थित यह मन्दिर शेरगढ़ निवासी बौहरे खुशाली राम ने संवत् 1922 में लगभग 25 हज़ार की लागत से बनवाया था। इसके साथ एक धर्मशाला भी है, जो शेरगढ़ वाली कुंज कहलाती है। &lt;br /&gt;
*दाऊजी या [[बलराम]] का [[बलदेव मन्दिर|मुख्य मंदिर]] बलदेव में है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{{मथुरा के स्थान और मन्दिर}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज के दर्शनीय स्थल]]&lt;br /&gt;
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[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>अरुणाचल प्रदेश</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%B2_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6&amp;diff=20304"/>
		<updated>2010-05-10T10:34:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &amp;quot;अरुणाचल प्रदेश&amp;quot; असुरक्षित कर दिया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Arunachal-map-large.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=ईटानगर&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=1,097,968&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=13&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=83,743sqkm&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=27°04′N 93°22′E&lt;br /&gt;
|ज़िले=16&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=ईटानगर&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=अंग्रेज़ी, हिन्दी, असमिया&lt;br /&gt;
|स्थापना=1987/02/20&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=ईटानगर, तवांग, दिरांग, बोमडिला, टीपी, मालिनिथान, लीकाबाली, पासीघाट&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:901&lt;br /&gt;
|साक्षरता=54.74&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=42 °C&lt;br /&gt;
|वर्षा=3000&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=जोगिन्दर  जसवंत  सिंह&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=दोरजी खांडू&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=60&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.arunachalpradesh.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/03/30&lt;br /&gt;
|emblem=Arunachal Pradesh-Logo.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[State::अरुणाचल प्रदेश]] / Arunachal Pradesh&lt;br /&gt;
*अरुणाचल प्रदेश [[भारत]] गणराज्य का एक उत्तर पूर्वी राज्य है। &lt;br /&gt;
*'अरुणाचल' का अर्थ हिन्दी में शाब्दिक अर्थ है 'उगते सूर्य की भूमि' (अरुण+अचल)। &lt;br /&gt;
*अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न राज्य है किन्तु चीन राज्य के एक भाग पर अपना अधिकार दक्षिणी तिब्बत के रूप में जताता है। &lt;br /&gt;
*अरुणाचल प्रदेश की मुख्य भाषा हिन्दी और असमिया है साथ ही अंग्रेजी भाषा भी आजकल धीरे धीरे लोकप्रिय हो रही है।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश को पहले पूर्वात्तर सीमांत एजेंसी (नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी- नेफा) के नाम से जाना जाता था। इस राज्य के पश्चिम, उत्तर और पूर्व में क्रमश: भूटान, तिब्बत, चीन, और म्यांमार देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं हैं। अरुणाचल प्रदेश की सीमा नागालैंड और असम से भी मिलती है। इस राज्य में पहाड़ी और अर्द्ध-पहाड़ी क्षेत्र है। इसके पहाड़ों की ढलान [[असम]] राज्य के मैदानी भाग की ओर है। 'कामेंग', 'सुबनसिरी', 'सिआंग', 'लोहित' और 'तिरप' आदि नदियां इन्हें अलग-अलग घाटियों में विभाजित कर देती हैं। यहाँ का इतिहास  लिखित रूप में उपलब्ध नहीं है। मौखिक परंपरा के रूप में कुछ थोड़ा सा साहित्य और ऐतिहासिक खंडहर हैं जो इस पर्वतीय क्षेत्र में मिलते हैं।  इन स्थानों की खुदाई और विश्लेषण के द्वारा पता चलता है कि ये ईस्वी सन प्रारंभ होने के समय के हैं। ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि यह  जाना-पहचाना क्षेत्र ही नहीं था वरन जो लोग यहाँ रहते थे उनका देश के अन्य भागों से निकट का संबंध था। अरुणाचल प्रदेश का आधुनिक इतिहास 24 फरवरी, 1826 को  'यंडाबू संधि' होने के बाद असम में ब्रिटिश शासन लागू होने के बाद से प्राप्त होता हैं। सन 1962 से पहले इस राज्य को नार्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) के नाम से जाना जाता था। संवैधानिक रूप से यह असम का ही एक भाग था परंतु सामरिक महत्व के कारण 1965 तक यहाँ के प्रशासन की देखभाल विदेश मंत्रालय करता था। 1965 के पश्चात असम के राज्पाल के द्वारा यहाँ का प्रशासन गृह मंत्रालय के अन्तर्गत आ गया था। सन 1972 में अरुणाचल प्रदेश को केंद्र शासित राज्य बनाया गया था और इसका नाम 'अरुणाचल प्रदेश' किया गया। इस सब के बाद '''20 फरवरी, 1987 को यह भारतीय संघ का 24वां राज्य''' बनाया गया।&lt;br /&gt;
==भूगोल==&lt;br /&gt;
अरुणाचल का अधिकतर भाग [[हिमालय]] से ढका है, लेकिन लोहित, चांगलांग और तिरप  पतकाई पहाडि़यों मे स्थित हैं। काँग्तो, न्येगी कांगसांग, मुख्य गोरीचन चोटी और पूर्वी गोरीचन चोटी इस राज्य में हिमालय की सबसे ऊंची चोटियाँ हैं। तवांग का 'बुमला दर्रा'  सन 2006 में 44 वर्षों मे पहली बार व्यापार के लिए खोला गया था और व्यापारियों को एक दूसरे &lt;br /&gt;
के क्षेत्र मे प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी। हिमालय पर्वतमाला का पूर्वी भाग अरुणाचल प्रदेश को चीन से अलग करता है। यह पर्वतमाला आगे [[नागालैंड]] की ओर मुड़ जाती है और भारत और बर्मा के मध्य चांगलांग और तिरप ज़िले में एक प्राकृतिक सीमा का निर्माण करती है और एक सीमा का कार्य करती है। अरुणाचल प्रदेश की सीमायें दक्षिण में असम, दक्षिण पूर्व मे नागालैंड, पूर्व में [[म्यांमार]], पश्चिम में [[भूटान]] और उत्तर में [[तिब्बत]] से मिलती हैं। प्रसिद्ध 'लेडो बर्मा रोड' का एक भाग इस राज्य से होकर जाता है, इस सड़क ने द्वितीय &lt;br /&gt;
विश्व युद्ध के दौरान चीन के लिये 'जीवन रेखा' की भूमिका निभाई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश का मौसम बदलता रहता है। हिमालय के ऊंचाई वाले भाग स्थित तिब्बत के निकटवर्ती भागों में मौसम टुन्ड्रा प्रदेश की भाँति होता है। मध्य हिमालयी भागों में मौसम समशीतोष्ण होता है। यहाँ सेब, संतरा, आदि फलदार वृक्ष होते हैं। हिमालय के क्षेत्र में नम उष्णकटिबंधीय मौसम रहता है जहां अधिक तेज़ गरमी और हल्की सर्दियाँ होती है। अरुणाचल प्रदेश की प्राकृतिक सुन्दरता देखते ही बनती है। यहाँ आर्किड के फूल भी पाए जाते हैं। हरी भरी घाटियाँ और यहाँ के लोक-गीत संगीत,हस्तशिल्प सभी कुछ मन लुभावना है। अरुणाचल प्रदेश में 160 से 80 इंच (2000 से 4000 मिमी) तक वार्षिक वर्षा होती है। अधिकतर वर्षा मई और सितंबर माह में होती है। यहाँ के पहाड़ और उनकी ढलानें समशीतोष्ण और उपविषुवतीय जंगलों से  भरी हैं, इसी कारण से यहाँ बौना रॉडॉडेन्ड्रोन, ओक, चीड़, मैप्ले, फर और जुनिपर के वृक्ष मिलते हैं साथ ही साल और सागौन प्रजाति के वृक्ष भी मिलते है।&lt;br /&gt;
==जनसाँख्यिकी आंकडे==&lt;br /&gt;
63 प्रतिशत अरुणाचल निवासी 19 प्रमुख जनजाति तथा 85 अन्य जनजातियों से हैं। इनमें से अधिकतर तिब्बत-बर्मा मूल से हैं। शेष 35 प्रतिशत जनसंख्या आप्रवासी हैं, जिनमें से 31,000 बंगाली, बोड़ो, हजोन्ग, बंगला देश से आये चकमा शरणार्थी और असम , नागालैंड और भारत के अन्य भागों से आये प्रवासी हैं। सबसे बडी़ जनजातियों में गालो, निशि, खम्ति, मोंपा और अपातनी प्रमुख रूप से हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश की साक्षरता दर 1991 में 41,59 % से बढ़कर 54,74 % हो गयी है । 487796 व्यक्ति पढ़े लिखे है। भारत सरकार की 2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार अरुणाचल के 20 % निवासी प्रकृतिधर्मी हैं, जो जीववादी धर्म- डो न्यी-पोलो और रन्गफ्राह का निर्वाह करते है। मिरि और नोक्ते जाति के लगभग पैंतीस प्रतिशत निवासी हिन्दू हैं। राज्य के 13% निवासी बौद्ध धर्म का पालन करते है। तिब्बती बौद्ध धर्म मुख्य रूप से तवांग, पश्चिम कामेंग और तिब्बत से लगे भागों मे प्रचलित है। थेरावाद बौद्ध धर्म का म्यांमार की सीमा से सटे क्षेत्रों में पालन किया जाता है। लगभग 19 प्रतिशत निवासी ईसाई धर्म से हैं।&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था==&lt;br /&gt;
सन 2004 में अरुणाचल प्रदेश का सकल घरेलू उत्पादन 706 मिलियन डॉलर के लगभग था। अर्थव्यवस्था  मुख्यत: कृषि प्रधान है। 'झुम' खेती जो आदिवासी समूहों में पहले प्रचलित थी, अब कम लोग इस प्रकार खेती करते है। अरुणाचल प्रदेश का लगभग 61000 वर्ग किलोमीटर का भाग घने जंगलों से भरा है, और वन्य उत्पाद राज्य की अर्थव्यवस्था का दूसरा महत्वपूर्ण भाग है। यहाँ फसलों में चावल, मक्का, बाजरा, गेहूं, दलहन, गन्ना, अदरक और तिलहन मुख्य रूप से हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश फलों के उत्पादन के लिए आदर्श है। पर्यावरण की दृष्टि से यहाँ के प्रमुख उद्योग आरा मिल और प्लाईवुड को कानूनन बंद कर दिया गया है। चावल मिल, फल परिरक्षण इकाइयाँ, हस्तशिल्प और हथकरघा आदि यहाँ के अन्य प्रमुख उद्योग हैं।&lt;br /&gt;
==सामाजिक जीवन==&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण त्योहारों में 'अदीस' समुदाय का 'मापिन और सोलंगु', 'मोनपा' समुदाय का त्योहार 'लोस्सार', 'अपतानी' समुदाय का 'द्री', 'तगिनों' समुदाय का 'सी-दोन्याई', 'इदु-मिशमी' समुदाय का 'रेह', 'निशिंग समुदाय का 'न्योकुम' आदि त्योहार शामिल हैं। अधिकतर त्योहारों पर पशुओं को बलि चढ़ाने की पुरातन प्रथा है।&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों के जीवनयापन का मुख्य आधार कृषि है। यहाँ की अर्थव्यवस्था 'झूम' खेती पर ही मुख्यत: आधरित है। आजकल नकदी फसलों, जैसे-आलू और बागबानी की फसलें, जैसे सेब, संतरे और अनन्नास आदि को प्रोत्साहन  जा रहा है।&lt;br /&gt;
==खनिज और उद्योग==&lt;br /&gt;
राज्य की विशाल खनिज संपदा के संरक्षण के लिए 1991 में 'अरुणाचल प्रदेश खनिज विकास' और 'व्यापार निगम लिमिटेड' (ए. पी. एम. डी. टी. सी. एल.) की स्थापना की गई थी। विभिन्न प्रकार के व्यापार में दस्तकारों को प्रशिक्षण देना, रोइंग, टबारीजो, दिरांग, युपैया और मैओ में कार्यरत पांच 'सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान' (आई॰टी॰आई॰) हैं। आई॰टी॰आई॰ युपैया महिलाओं के लिए विशेष रूप से बना है जो पापुम पारे ज़िले में स्थित है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश में 87,500 हेक्टेयर से अधिक भूमि सिंचित क्षेत्र है। राज्य की विद्युत क्षमता लगभग 30,735 मेगावॉट है। राज्य के 3,649 गांवों में से लगभग 2,600 गांवों का विद्युतीकरण कर दिया गया है।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश में 330 किलोमीटर लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग (सड़क मार्ग) है।&lt;br /&gt;
==पंचायती राज==&lt;br /&gt;
ग्रामीण क्षेते के विकास के लिए 'अरुणाचल प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग' ने राज्य सरकार के सहयोग से मई, 2008 में पंचायती चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न कराए हैं जिससे कि ग्रामों का समुचित विकास हो सके।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थल- &lt;br /&gt;
*तवांग, &lt;br /&gt;
*दिरांग, &lt;br /&gt;
*बोमडिला, &lt;br /&gt;
*टीपी, &lt;br /&gt;
*ईटानगर, &lt;br /&gt;
*मालिनीथन, &lt;br /&gt;
*लीकाबाली, &lt;br /&gt;
*पासीघट, &lt;br /&gt;
*अलोंग, &lt;br /&gt;
*तेजू, &lt;br /&gt;
*मियाओ, &lt;br /&gt;
*रोइंग, &lt;br /&gt;
*दापोरिजो, &lt;br /&gt;
*नामदफा, &lt;br /&gt;
*भीष्मकनगर, &lt;br /&gt;
*परशुराम कुंड और &lt;br /&gt;
*खोंसा हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ईटा किला'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस किले का निर्माण 14 -15वीं शताब्दी में कराया गया था। इसके नाम पर ही इस जगह का नाम ईटानगर है। इस किले से बहुत ही सुन्दर दृश्य दिखायी देते हैं। किले को देखने के बाद सैलानी पौराणिक गंगा झील भी देख सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पौराणिक गंगा झील'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौराणिक गंगा झील ईटानगर से 6 किमी. की दूरी पर है। झील के पास सुन्दर प्राकृतिक जंगल है। सैलानी यहाँ सुन्दर पेड़-पौधे, वन्य जीव और फूलों के बगीचे भी देख सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''बौद्ध मंदिर'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर एक खूबसूरत बौद्ध मन्दिर है। बौद्ध गुरु दलाई लामा भी  यहाँ की यात्रा कर चुके हैं। इस मन्दिर की छत पीले रंग की है और इस मन्दिर का निर्माण तिब्बती शैली में किया गया है। इस मन्दिर की छत से ईटानगर के सुंदर दृश्य दिखायी देते हैं। मन्दिर में एक संग्राहलय भी है जिसका नाम जवाहरलाल नेहरू संग्राहलय है। इस संग्राहलय में पूरे अरुणाचल प्रदेश की झाँकी देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त यहाँ पर लकड़ियों से बनी खूबसूरत वस्तुएं, वाद्ययंत्र, सुन्दर कपड़े, हस्तनिर्मित वस्तुएं और केन की बनी सुन्दर कलाकृतियों का संग्रह देख सकते हैं। संग्राहलय में एक पुस्तकालय भी है। अन्य स्थलों में दोन्यी-पोलो विद्या भवन, विज्ञान संस्थान, इंदिरा गांधी उद्यान और अभियांत्रिकी संस्थान प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पापुम पेर'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश का पापुम पेर बहुत ही सुन्दर स्थान है। इसका मुख्यालय यूपिया में स्थित है। यह ईटानगर से 20 किमी. दूर है। पापुम पेर हिमालय की तराई में बसा हुआ है। यहाँ से हिमालय की अनेक चोटियाँ दिखायी देती हैं। इनके अतिरिक्त यहाँ जंगलों, नदियों की प्राकृतिक छटा को भी देख सकते हैं। अधिकतर पर्यटन स्थल ईटानगर, दोईमुख, सिगेली और किमीन में स्थित है। इन  स्थलों की यात्रा करने के लिए पर्यटकों को अरुणाचल प्रदेश के सरकारी कार्यालय से परमिट लेना पड़ता है।&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश में महत्वपूर्ण जगहें हैं-&lt;br /&gt;
#तवांग&lt;br /&gt;
#परशुराम कुंद&lt;br /&gt;
#भिस्माक्नगर.&lt;br /&gt;
#मालिनिथन&lt;br /&gt;
#अकाशिगंगा.&lt;br /&gt;
#नामडाफा&lt;br /&gt;
#ईटानगर&lt;br /&gt;
#बोमडिला&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
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{{अरुणाचल प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
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[[Category:भारत_के_राज्य_और_केन्द्र_शासित_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:अरुणाचल प्रदेश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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		<title>साँचा:सूचना बक्सा साहित्यकार</title>
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		<title>साँचा:सूचना बक्सा साहित्यकार</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
==उदाहरण==&lt;br /&gt;
&amp;lt;pre&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|Image=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
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		<updated>2010-05-07T14:38:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ashwani Bhatia: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[श्रेणी:व्यवस्थापन]]&lt;br /&gt;
[[Has default form::चित्र सूचना]]&lt;br /&gt;
__HIDDENCAT__&lt;br /&gt;
__NOGALLERY__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ashwani Bhatia</name></author>
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