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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>साँचा:जैन धर्म</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;'''सावधान''' इस प्रकार के दो साँचे हैं। यदि इस साँचे कोई परिवर्तन हो तो [[साँचा:जैन धर्म2]] में भी वही परिवर्तन करें।&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;sidebar&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{PageMenu}}&lt;br /&gt;
* जैन संस्कार&lt;br /&gt;
** संस्कार|संस्कार&lt;br /&gt;
** जैन अन्नप्राशन संस्कार|अन्नप्राशन&lt;br /&gt;
** जैन आधान संस्कार|आधान&lt;br /&gt;
** जैन उपनीति संस्कार|उपनीति&lt;br /&gt;
** जैन केशवाय संस्कार|केशवाय&lt;br /&gt;
** जैन धृति संस्कार|धृति&lt;br /&gt;
** जैन नामकरण संस्कार|नामकरण&lt;br /&gt;
** जैन निषद्या संस्कार|निषद्या&lt;br /&gt;
** जैन प्रीति संस्कार|प्रीति&lt;br /&gt;
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** जैन लिपिसंख्यान संस्कार|लिपिसंख्यान&lt;br /&gt;
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** जैन व्युष्टि संस्कार|व्युष्टि&lt;br /&gt;
** जैन व्रताचरण संस्कार|व्रताचरण&lt;br /&gt;
** जैन सुप्रीति संस्कार|सुप्रीति&lt;br /&gt;
** जैन जातकर्म|जातकर्म&lt;br /&gt;
** जैन मोद क्रिया|मोद क्रिया&lt;br /&gt;
* जैन धर्म&lt;br /&gt;
** जैन धर्म|जैन&lt;br /&gt;
* जैन साहित्य&lt;br /&gt;
** जैन पुराण साहित्य|जैन पुराण साहित्य&lt;br /&gt;
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** गोम्मट पंजिका|गोम्मट पंजिका&lt;br /&gt;
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** जयधवल टीका|जयधवल टीका&lt;br /&gt;
** जीवतत्त्व प्रदीपिका|जीवतत्त्व प्रदीपिका&lt;br /&gt;
** आगम|आगम&lt;br /&gt;
**त्रिभंगी टीका|त्रिभंगी टीका&lt;br /&gt;
**धवला टीका|धवला टीका&lt;br /&gt;
**पंचसंग्रह टीका|पंचसंग्रह टीका&lt;br /&gt;
**रामकथा साहित्य|रामकथा साहित्य&lt;br /&gt;
**लब्धिसार क्षपणासार टीका|लब्धिसार क्षपणासार टीका&lt;br /&gt;
** भाव संग्रह|भाव संग्रह&lt;br /&gt;
** मन्द्रप्रबोधिनी|मन्द्रप्रबोधिनी&lt;br /&gt;
**पउम चरिउ|पउम चरित&lt;br /&gt;
**रिट्ठिनेमि चरिउ|हरिवंश पुराण&lt;br /&gt;
* जैन दर्शन&lt;br /&gt;
** जैन दर्शन और उसका उद्देश्य|उद्देश्य&lt;br /&gt;
** जैन दर्शन का उद्भव और विकास|उद्भव और विकास&lt;br /&gt;
** जैन दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ|प्रमुख ग्रन्थ&lt;br /&gt;
** जैन दर्शन में अध्यात्म|अध्यात्म&lt;br /&gt;
** जैन तार्किक और उनके न्यायग्रन्थ|तार्किक और उनके न्यायग्रन्थ&lt;br /&gt;
**तीर्थंकर उपदेश|उपदेश&lt;br /&gt;
* जैन कला&lt;br /&gt;
** जैन संग्रहालय मथुरा|जैन संग्रहालय, मथुरा&lt;br /&gt;
* जैन तीर्थंकर&lt;br /&gt;
** तीर्थंकर|तीर्थंकर&lt;br /&gt;
** ऋषभनाथ तीर्थंकर|ऋषभनाथ &lt;br /&gt;
** नेमिनाथ तीर्थंकर|नेमिनाथ&lt;br /&gt;
** तीर्थंकर पार्श्वनाथ|पार्श्वनाथ&lt;br /&gt;
** महावीर|महावीर&lt;br /&gt;
*जैन आचार्य&lt;br /&gt;
**अकलंकदेव|अकलंकदेव  &lt;br /&gt;
**अजितसेन|अजितसेन&lt;br /&gt;
**अनन्तकीर्ति|अनन्तकीर्ति&lt;br /&gt;
**अभयचन्द्र|अभयचन्द्र&lt;br /&gt;
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**अभिनव धर्मभूषणयति|अभिनव धर्मभूषणयति&lt;br /&gt;
**कुमारनन्दि|कुमारनन्दि&lt;br /&gt;
**गृद्धपिच्छ|गृद्धपिच्छ&lt;br /&gt;
**चारुकीर्ति भट्टारक|चारुकीर्ति भट्टारक&lt;br /&gt;
**देवनन्दि पूज्यपाद|देवनन्दि पूज्यपाद&lt;br /&gt;
**देवसूरि|देवसूरि&lt;br /&gt;
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**नरेन्द्रसेन भट्टारक|नरेन्द्रसेन भट्टारक&lt;br /&gt;
**पात्रस्वामी|पात्रस्वामी&lt;br /&gt;
**प्रभाचन्द्र|प्रभाचन्द्र&lt;br /&gt;
**बृहदनन्तवीर्य|बृहदनन्तवीर्य&lt;br /&gt;
**भावसेन त्रैविद्य|भावसेन त्रैविद्य&lt;br /&gt;
**मल्लिषेण|मल्लिषेण&lt;br /&gt;
**माणिक्यनन्दि|माणिक्यनन्दि&lt;br /&gt;
**यशोविजय|यशोविजय   &lt;br /&gt;
**रत्नप्रभसूरि|रत्नप्रभसूरि  &lt;br /&gt;
**लघु अनन्तवीर्य|लघु अनन्तवीर्य&lt;br /&gt;
**लघु समन्तभद्र|लघु समन्तभद्र&lt;br /&gt;
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**सिद्धसेन|सिद्धसेन&lt;br /&gt;
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*जैन साहित्यकार&lt;br /&gt;
**पुष्पदंत|पुष्पदंत&lt;br /&gt;
**स्वयंभू देव|स्वयंभू देव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/sidebar&amp;gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:जैन धर्म के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>साँचा:जैन धर्म</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;'''सावधान''' इस प्रकार के दो साँचे हैं। यदि इस साँचे कोई परिवर्तन हो तो [[साँचा:जैन धर्म2]] में भी वही परिवर्तन करें।&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
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** संस्कार|संस्कार&lt;br /&gt;
** जैन अन्नप्राशन संस्कार|अन्नप्राशन&lt;br /&gt;
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**रिट्ठिनेमि चरिउ|हरिवंश पुराण&lt;br /&gt;
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** जैन दर्शन और उसका उद्देश्य|उद्देश्य&lt;br /&gt;
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** जैन दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ|प्रमुख ग्रन्थ&lt;br /&gt;
** जैन दर्शन में अध्यात्म|अध्यात्म&lt;br /&gt;
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**तीर्थंकर उपदेश|उपदेश&lt;br /&gt;
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**पुष्पदंत|पुष्पदंत&lt;br /&gt;
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*test&lt;br /&gt;
**kh:789|123&lt;br /&gt;
&amp;lt;/sidebar&amp;gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:जैन धर्म के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>सदस्य:आदित्य चौधरी/प्रयोग पन्ना</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भईया [[माउंट आबू]] के page में Check क्या करना है?&lt;br /&gt;
[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:30, 29 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उत्तर प्रदेश की झीलें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भईया मैंने [[उत्तर प्रदेश की झीलें|उत्तर प्रदेश की झीलों]] में लिंक लगा दिया है। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 10:35, 15 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== श्रेणि ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरे द्वारा बनाये गये [[पटना]] के पन्ने में श्रेणियाँ जाच लीजिए। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 10:39, 17 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
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== नीलकंठ महादेव ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[नीलकंठ महादेव]] के पेज को जाँचें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:48, 19 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ॠषिकेश ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[ॠषिकेश]] पेज ले लिंक को जाँचें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:28, 19 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:लेख सूची ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[साँचा:लेख सूची]] बना दिया गया है कृपा आप इस साँचे के उदाहरण के लिय [[उदयपुर]] का पन्ना देखें । जैसे कि उदयपुर के सम्बंधित लेख उदयपुर के पन्ने में लगा दियें गये है । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:55, 28 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== श्रेणि ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरे द्वारा बनाये गये [[पोरबंदर]] के पन्ने में श्रेणियाँ जाच लीजिए। &lt;br /&gt;
[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:फ़ौज़िया ख़ान]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:फ़ौज़िया ख़ान|फ़ौज़िया ख़ान]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:फ़ौज़िया ख़ान|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:30, 29 जून 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[देहरादून]] के पेज को देखें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:43, 8 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[प्रयोग:Shilpi]] में अमृतसर का साँचा जाचें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:35, 17 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== वंश वृक्ष ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्य वंश अच्छा लग रहा है। कोलकाता पर भी कार्य संतोषजनक है [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आदित्य चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 08:00, 19 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:लेख प्रगति ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[साँचा:लेख प्रगति]] में अब &amp;lt;nowiki&amp;gt;==पन्ने की प्रगति अवस्था==&amp;lt;/nowiki&amp;gt; heading ना लगायें वो heading साँचे में ही डाल दी गई है । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:13, 31 जुलाई 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ब्रज/आलेख ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{50-50}} क्या इसे ब्रज से replace कर दिया जाए ? &amp;lt;u&amp;gt;बाहरी लिंक में ब्रजडिस्कवरी के लिंक डालें&amp;lt;/u&amp;gt; [[चित्र:nib4.png|35px|top]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:29, 7 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कोलकाता और ब्रज ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वार्ता:कोलकाता]] और [[वार्ता:ब्रज]] पन्ने को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:07, 8 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== श्रेणी:अंग्रेज़ी शासन ==&lt;br /&gt;
श्रेणी:अंग्रेज़ी शासन नई बनी है पुरानी हटा दि गयी है। उसमें &amp;lt;u&amp;gt;'''अंग्रेजी'''&amp;lt;/u&amp;gt; लिखा था।  [[चित्र:nib4.png|35px|top]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्रेमचन्द ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अच्छा बन गया है लेकिन अभी काम बाक़ी है। सूचना बक्सा आदि लगाएँ। [[चित्र:nib4.png|35px|top]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 10:47, 30 अगस्त 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साँचा:व्रत और उत्सव2 ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[साँचा:व्रत और उत्सव2]] को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:31, 10 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==शिवाजी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वार्ता:शिवाजी]] पन्ने को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:36, 12 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जम्मू और कश्मीर ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[साँचा:जम्मू और कश्मीर के पर्यटन स्थल]] बना दिया गया है कृपया इस को [[पर्यटन]] के पन्ने में डाले  [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:21, 13 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वैशेषिक दर्शन की तत्त्व मीमांसा]] पर चित्र लगाए। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 13:02, 19 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[संसद]] image&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[लता मंगेशकर]], [[आशा भोंसले]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 12:07, 23 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कपिल सिब्बल ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संदेश देने के लिए धन्यवाद जल्दी ही लग जाएगी।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:38, 28 सितंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== चित्रकार ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्रकार का लिंक नहीं दिया जा रहा ??? [[चित्र:nib4.png|35px|top]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 22:26, 23 अक्टूबर 2010 (IST)&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>सदस्य:Govind Ram</title>
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		<updated>2010-12-04T05:00:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[सदस्य:गोविन्द राम]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>साँचा:राज्य और के. शा. प्र.</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87._%E0%A4%B6%E0%A4%BE._%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0.&amp;diff=41155"/>
		<updated>2010-07-12T14:23:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
|name=राज्य और के. शा. प्र.&lt;br /&gt;
|title =[[:श्रेणी:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश|भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]]&lt;br /&gt;
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}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>जयपुर</title>
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		<updated>2010-07-12T14:19:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Hawa-Mahal-Jaipur.jpg&lt;br /&gt;
|विवरण=जयपुर राजस्थान राज्य की राजधानी है। यहाँ के भवनों के निर्माण में गुलाबी रंग के पत्थरों का उपयोग किया गया है, इसलिए इसे 'गुलाबी नगर' भी कहते हैं।&lt;br /&gt;
|राज्य=[[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[जयपुर ज़िला]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=[[राजा जयसिंह द्वितीय]]&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=सन 1728 ई॰ में स्थापित&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=26.9260°N 75.8235°E&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=कराँची का हलवा&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=सितंबर से मार्च&lt;br /&gt;
|यातायात=स्थानीय बस, ऑटो रिक्शा, साईकिल रिक्शा &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=जयपुर के दक्षिण में स्थित संगनेर हवाई अड्डा नजदीकी हवाई अड्डा है। जयपुर और संगनेर की दूरी 14 किमी. है।&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=जयपुर जक्शन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=सिन्धी कैम्प, घाट गेट&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=दिल्ली से अजमेर शताब्दी और दिल्ली जयपुर एक्सप्रेस से जयपुर पहुँचा जा सकता है। कोलकाता से हावड़ा-जयपुर एक्सप्रेस और मुम्बई से अरावली व बॉम्बे सेन्ट्रल एक्सप्रेस से जयपुर पहुँचा जा सकता है। दिल्ली से राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से जयपुर पहुँचा जा सकता है जो 256 किमी. की दूरी पर है। राजस्थान परिवहन निगम की बसें अनेक शहरों से जयपुर जाती हैं। &lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[#पर्यटन|पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=[[जयपुर प्रवास]]&lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=कला व हस्तशिल्प द्वारा तैयार आभूषण, हथकरघा बुनाई, आसवन व शीशा, होज़री, क़ालीन, कम्बल आदि खरीदे जा सकते है।&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=0141&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?f=q&amp;amp;source=s_q&amp;amp;hl=en&amp;amp;geocode=&amp;amp;q=Jaipur,+Rajasthan&amp;amp;sll=24.537129,72.737732&amp;amp;sspn=1.84886,3.56781&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;hq=&amp;amp;hnear=Jaipur,+Rajasthan&amp;amp;ll=26.925743,75.809784&amp;amp;spn=0.906062,1.783905&amp;amp;z=10 गूगल मानचित्र], [http://maps.google.co.in/maps?f=d&amp;amp;source=s_d&amp;amp;saddr=Unknown+road&amp;amp;daddr=Sawai+Mansingh+Rd+to:26.924825,75.799484&amp;amp;geocode=FaZJmQEdy8yEBA%3BFbR9mgEdYtOEBA%3B&amp;amp;hl=en&amp;amp;mra=dme&amp;amp;mrcr=0&amp;amp;mrsp=2&amp;amp;sz=12&amp;amp;via=1&amp;amp;sll=26.867262,75.820427&amp;amp;sspn=0.226635,0.445976&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;z=12 हवाई अड्डा]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
वर्तमान राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर 1947 ई॰ तक इसी नाम की एक देशी रियासत की राजधानी थी। कछवाहा राजा जयसिंह द्वितीय का बसाया हुआ [[राजस्थान]] का इतिहास प्रसिद्ध नगर है। इस नगर की स्थापना 1728 ई॰ में की थी और उन्हीं के नाम पर इसका यह नाम रखा गया गया। स्वतंत्रता के बाद इस रियासत का विलय भारतीय गणराज्य में हो गया। जयपुर सूखी झील के मैदान में बसा है जिसके तीन ओर की पहाड़ियों की चोटी पर पुराने किले हैं। यह बड़ा सुनियोजित नगर है। बाज़ार सब सीधी सड़कों के दोनों ओर हैं और इनके भवनों का निर्माण भी एक ही आकार-प्रकार का है। नगर के चारों ओर चौड़ी और ऊँची दीवार है, जिसमें सार द्वार हैं। यहाँ के भवनों के निर्माण में गुलाबी रंग के पत्थरों का उपयोग किया गया है, इसलिए इसे 'गुलाबी नगर' भी कहते हैं। जयपुर में अनेक दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें हवा महल, जंतर-मंतर और कुछ पुराने किले अधिक प्रसिद्ध हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
कछवाहा राजपूत अपने वंश का आदि पुरुष श्री [[राम]]चन्द्र जी के पुत्र [[लव कुश|कुश]] को मानते हैं। उनका कहना है कि प्रारम्भ में उनके वंश के लोग रोहतासगढ़ (बिहार) में जाकर बसे थे। तीसरी शती ई॰ में वे लोग [[ग्वालियर]] चले आए। एक ऐतिहासिक [[अनुश्रुति]] के आधार पर यह भी कहा जाता है कि 1068 ई॰ के लगभग, [[अयोध्या]]-नरेश [[लक्ष्मण]] ने ग्वालियर में अपना प्रभुत्व स्थापित किया और तत्पश्चात इनके वंशज दौसा नामक स्थान पर आए और उन्होंने मीणाओं से आमेर का इलाक़ा छीनकर इस स्थान पर अपनी राजधानी बनाई। ऐतिहासिकों का यह भी मत है कि आमेर का गिरिदुर्ग 967 ई॰ में ढोलाराज ने बनवाया था और यहीं 1150 ई॰ के लगभग कछवाहों ने अपनी राजधानी बनाई। 1300 ई॰ में जब राज्य के प्रसिद्ध दुर्ग रणथंभौर पर अलाउद्दीन ख़िलजी ने आक्रमण किया तो आमेर नरेश राज्य के भीतरी भाग में चले गए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने क़िले को पुन: हस्तगत कर लिया और अलाउद्दीन से संधि कर ली। 1548-74 ई॰ में भारमल आमेर का राजा था। उसने [[हुमायूँ]] और [[अकबर]] से मैत्री की और अकबर के साथ अपनी पुत्री [[हरकाबाई]] (वर्तमान में [[जोधाबाई]] के नाम से प्रचलित) का विवाह भी कर दिया। उसके पुत्र भगवान दास ने भी अकबर के पुत्र [[जहाँगीर|सलीम]] के साथ अपनी पुत्री का विवाह करके पुराने मैत्री-सम्बन्ध बनाए रखे। भगवान दास को अकबर ने पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया था। उसने 16 वर्ष तक आमेर में राज्य किया। उसके पश्चात उसका पुत्र [[मानसिंह]] 1590 ई॰ से 1614 ई॰ तक आमेर का राजा रहा। मानसिंह अकबर का विश्वस्त सेनापति था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{highleft}}सवाई जयसिंह ने नए नगर जयपुर को आमेर से तीन मील (4.8 कि0 मी0 ) की दूरी पर मैदान में बसाया। इसका क्षेत्रफल तीन वर्गमील (7.8 वर्ग कि0 मी0) रखा गया। नगर को परकोटे और सात प्रवेश द्वारों से सुरक्षित बनाया गया।&lt;br /&gt;
इस नगर की स्थापना 1728 ई॰ में की थी और राजा जयसिंह द्वितीय के नाम पर इसका यह नाम रखा गया गया। स्वतंत्रता के बाद इस रियासत का विलय भारतीय गणराज्य में हो गया। जयपुर सूखी झील के मैदान में बसा है जिसके तीन ओर की पहाड़ियों की चोटी पर पुराने क़िले हैं।{{highclose}}&lt;br /&gt;
कहते हैं उसी के कहने से अकबर ने चित्तौड़ नरेश राणा प्रताप पर आक्रमण किया था (1577 ई॰)। मानसिंह के पश्चात जयसिंह प्रथम ने आमेर की गद्दी सम्हाली। उसने भी [[शाहजहाँ]] और [[औरंगज़ेब]] से मित्रता की नीति जारी रखी। जयसिंह प्रथम [[शिवाजी]] को औरंग़ज़ेब के दरबार में लाने में समर्थ हुआ था। कहा जाता है जयसिंह को औरंग़ज़ेब ने 1667 ई॰ में ज़हर देकर मरवा डाला था। 1699 ई॰ से 1743 ई॰ तक आमेर पर जयसिंह द्वितीय का राज्य रहा। इसने 'सवाई' का उपाधि ग्रहण की। यह बड़ा ज्योतिषविद और वास्तुकलाविशारद था। इसी ने 1728 ई॰ में वर्तमान जयपुर नगर बसाया। आमेर का प्राचीन दुर्ग एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है जो 350 फुट ऊँची है। इस कारण इस नगर के विस्तार के लिए पर्याप्त स्थान नहीं था। सवाई जयसिंह ने नए नगर जयपुर को आमेर से तीन मील(4.8 कि0 मी0 ) की दूरी पर मैदान में बसाया। इसका क्षेत्रफल तीन वर्गमील(7.8 वर्ग कि0 मी0) रखा गया। नगर को परकोटे और सात प्रवेश द्वारों से सुरक्षित बनाया गया। चौपड़ के नक्शे के अनुसार ही सड़कें बनवाई गई। पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाली मुख्य सड़क 111 फुट चौड़ी रखी गई। यह सड़क, एक दूसरी उतनी ही चौड़ी सड़क को ईश्वर लाट के निकट समकोण पर काटती थी। अन्य सड़कें 55 फुट चौड़ी रखी गई। ये मुख्य सड़क को कई स्थानों पर समकोणों पर काटती थी। कई गलियाँ जो चौड़ाई में इनकी आधी या 27 फुट थी, नगर के भीतरी भागों से आकर मुख्य सड़क में मिलती थी। सड़कों के किनारों के सारे मकान लाल  बलुवा पत्थर के बनवाए गए थे जिससे सारा नगर गुलाबी रंग का  दिखाई देता था। राजमहल नगर के केंद्र में बनाया गया था। यह सात मंज़िला है। इसमें एक दिवानेख़ास है। इसके समीप ही तत्कालीन सचिवालय--बावन कचहरी--स्थित है। 18 वीं शती में राजा माधोसिंह का बनवाया हुआ छ: मंज़िला हवामहल भी नगर की मुख्य सड़क पर ही दिखाई देता है। राजा जयसिंह द्वितीय ने जयपुर, [[दिल्ली]], [[मथुरा]], [[बनारस]], और [[उज्जयिनी|उज्जैन]] में वेधशालाएँ भी बनाई थी। जयपुर की वेधशाला इन सबसे बड़ी है। कहा जाता है कि जयसिंह को नगर का नक्शा बनाने में दो बंगाली पंड़ितों से विशेष सहायता प्राप्त हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
जयपुर में प्रमुख सड़क, रेल और वायुसम्पर्क उपलब्ध है।  &lt;br /&gt;
==कृषि और खनिज==&lt;br /&gt;
बाजरा, जौ, चना, दलहन और कपास इस क्षेत्र की मुख्य फ़सलें हैं। लौह अयस्क, बेरिलियम, अभ्रक, फ़ेल्सपार, संगमरमर, ताँबा और रक्तमणि का खनन होता है। &lt;br /&gt;
==उद्योग और व्यापार==&lt;br /&gt;
यह वाणिज्यिक व्यापार केन्द्र है। यहाँ के उद्योगों में इंजीनियरिंग और धातुकर्म, हथकरघा बुनाई, आसवन व शीशा, होज़री, क़ालीन, कम्बल, जूतों और दवाइयों का निर्माण प्रमुख है। जयपुर के विख्यात कला व हस्तशिल्प में आभूषणों की मीनाकारी, धातुकर्म व छापेवाले वस्त्र के साथ-साथ पत्थर, संगमरमर व हाथीदांत पर नक़्क़ाशी शामिल है।&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
जयपुर में 1947 में स्थापित राजस्थान विश्वविद्यालय स्थित है।&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
जयपुर की जनसंख्या (2001) 23,24,319 है और जयपुर ज़िले की कुल जनसंख्या 52,52,388 है।&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
राजस्थान पर्यटन की दृष्टि से पूरे विश्व में एक अलग स्थान रखता है लेकिन शानदार महलों, ऊँची प्राचीर व दुर्गों वाला शहर जयपुर राजस्थान में पर्यटन का केंद्र है। यह शहर चारों ओर से परकोटों (दीवारों) से घिरा है, जिस में प्रवेश के लीये 7 दरवाजे बने हुए हैं 1876 मैं प्रिंस आफ वेल्स के स्वागत में महाराजा सवाई मानसिहं ने इस शहर को गुलाबी रंग से रंगवा दिया था तभी से इस शहर का नाम गुलाबी नगरी (पिंक सिटी) पड़ गया। यहाँ के प्रमुख भवनों में सिटी पैलेस, 18वीं शताब्दी में बना जंतर-मंतर, हवामहल, रामबाग़ पैलेस और नाहरगढ़ शामिल हैं। अन्य सार्वजनिक भवनों में एक संग्रहालय और एक पुस्तकालय शामिल है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Govind-Dev-Temple-Jaipur-Panorama-1.jpg|400px|thumb|[[गोविंद देवजी का मंदिर जयपुर|गोविंद देव जी का मंदिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; View of Govind Dev Temple]]&lt;br /&gt;
*[[सिटी पैलेस जयपुर|सिटी पैलेस]]&lt;br /&gt;
*[[हवा महल जयपुर|हवा महल]]&lt;br /&gt;
*[[जल महल जयपुर|जल महल]]&lt;br /&gt;
*[[जन्‍तर मन्‍तर जयपुर|जन्‍तर मन्‍तर]]&lt;br /&gt;
*[[रामनिवास बाग़ जयपुर|रामनिवास बाग़]]&lt;br /&gt;
*[[अल्‍बर्ट हॉल जयपुर|अल्‍बर्ट हॉल]]&lt;br /&gt;
*[[आमेर का क़िला जयपुर|आमेर का क़िला]]&lt;br /&gt;
*[[बी॰एम॰ बिडला सभागार जयपुर|बी॰एम॰ बिडला सभागार]]&lt;br /&gt;
*[[ईसरलाट जयपुर|ईसरलाट]]&lt;br /&gt;
*[[गलता जयपुर|गलता]]&lt;br /&gt;
*[[बैराठ जयपुर|बैराठ]]&lt;br /&gt;
*[[गैटोर जयपुर|गैटोर]]&lt;br /&gt;
*[[अम्बर क़िला जयपुर|अम्बर क़िला]]&lt;br /&gt;
*[[गोविंद देवजी का मंदिर जयपुर|गोविंद देवजी का मंदिर]]&lt;br /&gt;
*[[स्टैच्यू सर्किल जयपुर|स्टैच्यू सर्किल]]&lt;br /&gt;
*[[सांगानेर जयपुर|सांगानेर]]&lt;br /&gt;
*[[सांभर झील जयपुर|सांभर झील]]&lt;br /&gt;
*[[जयगढ़ क़िला जयपुर|जयगढ़ क़िला]]&lt;br /&gt;
*[[नाहरगढ़ क़िला जयपुर|नाहरगढ़ क़िला]]&lt;br /&gt;
*[[जमवारामगढ बांध जयपुर|जमवारामगढ बांध]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery perrow=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Jantar-Mantar-Jaipur.jpg|[[जन्‍तर मन्‍तर जयपुर|जंतर मंतर]], जयपुर&amp;lt;br /&amp;gt; Jantar Mantar, Jaipur&lt;br /&gt;
चित्र:Albert-Hall-Museum-Jaipur.jpg|[[अल्‍बर्ट हॉल जयपुर|अल्‍बर्ट हॉल संग्रहालय]], जयपुर&amp;lt;br /&amp;gt; Albert Hall Museum, Jaipur&lt;br /&gt;
चित्र:Jal-Mahal-Jaipur.jpg|[[जल महल जयपुर|जल महल]], जयपुर&amp;lt;br /&amp;gt; Jal Mahal, Jaipur&lt;br /&gt;
चित्र:City-Palace-Jaipur-1.jpg|[[सिटी पैलेस जयपुर|सिटी पैलेस]], जयपुर&amp;lt;br /&amp;gt; City Palace, Jaipur&lt;br /&gt;
चित्र:Amber-Fort-Jaipur-2.jpg|[[आमेर का क़िला जयपुर|आमेर का क़िला]], जयपुर&amp;lt;br /&amp;gt; Amber Fort, Jaipur&lt;br /&gt;
चित्र:B-M-Birla-Planetarium-Jaipur.jpg|[[बी॰एम॰ बिडला सभागार जयपुर|बी॰एम॰ बिडला सभागार]], जयपुर&amp;lt;br /&amp;gt; B.M.Birla Auditorium, Jaipur&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बहारी कड़ी==&lt;br /&gt;
[http://jaipur.nic.in अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रदेशों की राजधानियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>गोविंद देवजी का मंदिर जयपुर</title>
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		<updated>2010-07-12T14:17:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Govind-Dev-Temple-Jaipur-Panorama-1.jpg|400px|thumb|गोविंद देव जी का मंदिर का दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt; View of Govind Dev Temple]]&lt;br /&gt;
*भगवान [[कृष्ण]] का [[जयपुर]] का सबसे प्रसिद्ध बिना शिखर का मंदिर है। &lt;br /&gt;
*यह चन्द्र महल के पूर्व में बने जन निवास बगीचे के मध्य अहाते में स्थित है। &lt;br /&gt;
*संरक्षक देवता गोविंदजी की मूर्ति पहले वृंदावन के मंदिर में स्थापित थी जिसको सवाई [[जयसिंह द्वितीय]] ने अपने परिवार के [[देवता]] के रूप में यहाँ पुनः स्थापित किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:जयपुर के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>राजस्थान</title>
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		<updated>2010-07-12T14:12:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{wait}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=rajasthan Map.jpg&lt;br /&gt;
|स्थानीय भाषाओं में नाम=राजस्थान&lt;br /&gt;
|राजधानी=जयपुर&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=56,473,122&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=165&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=342239 sqkm&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=26°34′22″N 73°50′20″E﻿&lt;br /&gt;
|ज़िले=33&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=जयपुर&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=जयपुर, अजमेर, उदयपुर&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=हिन्दी भाषा, राजस्थानी भाषा&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=जयपुर, भरतपुर, जोधपुर,  जैसलमेर,  उदयपुर,  बीकानेर&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=जयपुर, जोधपुर,  बीकानेर, माउण्ट आबू&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:921&lt;br /&gt;
|साक्षरता=61.03&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=8 °C&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=प्रभु राव&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=अशोक गहलोत&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=200&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.rajasthan.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/03/29&lt;br /&gt;
|emblem=Rajasthan-logo.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
राजस्थान भारत का एक प्रान्त है। यहाँ की राजधानी [[जयपुर]] है। राजस्थान भारत गणराज्य के क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में [[गुजरात]], दक्षिण-पूर्व में [[मध्यप्रदेश]], उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में [[उत्तर प्रदेश]] और [[हरियाणा]] है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है। जयपुर राज्य की राजधानी है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरूस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एकमात्र पहाड़ी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, [[माउंट आबू]] और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर को सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, रणथम्भौर एवम् सरिस्का हैं और [[भरतपुर]] के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उध्यान है, जो पक्षियों की रक्षार्थ निर्मित किया गया है। राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी, जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
भारत की आजादी से पहले यह क्षेत्र राजपूताना (राजपूतों का स्थान) कहलाता था। रणबांकुरे राजपूतों ने कई सदियों तक इस क्षेत्र पर राज्य किया। राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है। ईसा पूर्व 3000 से 1000 के बीच यहाँ की संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता जैसी थी। 7वीं शताब्दी में यहाँ चौहान राजपूतों का प्रभुत्व बढने लगा और 12वीं शताब्दी तक उन्होंने एक साम्राज्य स्थापित कर लिया था। चौहान के बाद इस योद्धा जाति का नेतृत्व [[मेवाड़]] के गहलोतों ने सँभाला। मेवाड़ के अलावा जो अन्य रियासतें ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख रहीं, वे हैं - भरतपुर, जयपुर, [[बूंदी]], [[मारवाड़]], [[कोटा]],  और [[अलवर]]। अन्य सभी रियासतें इन्हीं रियासतों से बनी। इन सभी रियासतों ने 1818 में अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश संधि स्वीकार कर ली जिसमें राजाओं के हितों की रक्षा की व्यवस्था थी, लेकिन इस संधि से आम जनता स्वाभाविक रूप से असंतुष्ट थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद लोग [[स्वतंत्रता आंदोलन]] में भाग लेने के लिए [[महात्मा गाँधी]] के नेतृत्व में एकजुट हुए। सन 1935 में अंग्रेजी शासन वाले भारत में प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन और तेज हो गया। 1948 में इन बिखरी हुई रियासतों को एक करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1956 में राज्य में पुनर्गठन क़ानून लागू होने तक जारी रही। सबसे पहले 1948 में मत्स्य संघ बना, जिसमें कुछ ही रियासतें शामिल हुई। धीरे-धीरे बाकी रियासतें भी इसमें मिलती गई। सन 1949 तक [[बीकानेर]], जयपुर, [[जोधपुर]] और [[जैसलमेर]] जैसी मुख्य रियासतें इसमें शामिल हो चुकी थीं और इसे बृहत्तर राजस्थान संयुक्त राज्य का नाम दिया गया। सन 1958 में [[अजमेर]], आबू रोड तालुका और सुनेल टप्पा के भी शामिल हो जाने के बाद वर्तमान राजस्थान राज्य विधिवत अस्तित्व में आया। राजस्थान की समूची पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान पडता है जबकि उत्तर में [[पंजाब]], उत्तर पूर्व में [[हरियाणा]], पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में गुजरात है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
राज्य में वर्ष 2006-07 में कुल कृषि योग्य क्षेत्र 217 लाख हेक्टेयर था और वर्ष (2007-08) में अनुमानित खाद्यान उत्पादन 155.10 लाख टन रहा। राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। चावल, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, गेहूं, तिलहन, दालें कपास और तंबाकू। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो में सब्जियों और संतरा तथा माल्टा जैसे नींबू प्रजाति के फलों के उत्पादन में काफ़ी वृद्धि हुई है। यहाँ की अन्य फ़सलें है लाल मिर्च, सरसों, मेथी, ज़ीरा, और हींग।&lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
राजस्थान सांस्कृतिक रूप में समृद्ध होने के साथ-साथ खनिजों के मामले में भी समृद्ध रहा है और अब वह देश के औद्योगिक परिदृश्य में भी तेजी से उभर रहा है। राज्य के प्रमुख केंद्रीय प्रतिष्ठानों में देबरी ([[उदयपुर]]) में जस्ता गलाने का संयंत्र, खेतडी (झुंझनूं) में तांबा परियोजना और कोटा में सूक्ष्म उपकरणों का कारखाना शामिल है। मार्च, 2006 तक राज्य में लघु उद्योगों की 2,75,400 इकाइयां थी। जिनमें 4,336.70 करोड़ रुपये की पूँजी लगी थी और लगभग 10.55 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था। मुख्य उद्योग हैं :वस्त्र, ऊनी कपडे, चीनी, सीमेंट, काँच, सोडियम संयंत्र, आक्सीजन, वनस्पति रंग, कीटनाशक, जस्ता, उर्वरक, रेल के डिब्बे, बॉल बियरिंग, पानी व बिजली के मीटर, टेलीवीजन सेट, सल्फ्यूरिक एसिड, सिंथेटिक धागे तथा तापरोधी ईंटें आदि। बहुमूल्य और कम मूल्य के रत्नों के अलावा कास्टिक सोडा, कैलशियम कार्बाइड, नाइलोन तथा टायर आदि अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाइयां हैं। राज्य में जिंक कंसंट्रेट, पन्ना, गार्नेट, जिप्सम, खनिज चांदी, एस्बेस्टस, फैल्सपार तथा अभ्रक के प्रचुर भंडार हैं। राज्य में नमक, रॉक फास्फेट, मारबल तथा लाल पत्थर भी काफ़ी मात्रा में मिलता है। सीतापुर (जयपुर) में देश पहला निर्यात संवर्द्धन पार्क बनाया गया है जिसने काम करना प्रारंभ कर दिया है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
*मार्च 2007 के अंत तक राज्य में विभिन्न प्रमुख, मध्यम और छोटी सिचाई परियोजनाओं के माध्यम से 34.85 लाख हेक्टेयर की सिंचाई संभाव्यता का सृजन किया गया (2007-08) और 92,200 हेक्टेयर (आईजीएनपी और सीएडी के अलावा) की अतिरिक्त सिंचाई संभाव्यता का सृजन मार्च 2007 तक किया गया है। &lt;br /&gt;
*राज्य में संस्थापित विद्युत क्षमता दिसम्बर 2007 तक 6335.33 मेगावॉट हो गई है, जिसमें से 4000 मेगावॉट राज्य की अपनी परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न की जाती है, 521.85 मेगावॉट सहयोगी परियोजनाओं से तथा 1813.18 मेगावॉट केन्द्रीय विद्युत उत्पादन स्टेशनों से आबंटित की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
[[image:Map-Rajasthan-1.jpg|thumb|राजस्थान का मानचित्र&amp;lt;br /&amp;gt;Map of Rajasthan]]&lt;br /&gt;
*सडकें: मार्च 2006 में राजस्थान में सड़को की कुल लंबाई 1,58,250 कि.मी. है।&lt;br /&gt;
*रेलवे: जोधपुर, बीकानेर, [[सवाई माधोपुर]], कोटा और भरतपुर राज्य के प्रमुख रेलवे जंक्शन है।&lt;br /&gt;
==उड्डयन== &lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] और [[मुंबई]] से जयपुर, जोधपुर तथा उदयपुर के लिए नियमित विमान सेवाएं हैं।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
राजस्थान मेलों और उत्सवों की धरती है। [[होली]], [[दीपावली]], [[विजय दशमी|विजयदशमी]], [[क्रिसमस]] जैसे प्रमख राष्ट्रीय त्योहारों के अलावा अनेक देवी-देवताओं, संतो और लोकनायकों तथा नायिकाओं के जन्मदिन मनाए जाते है। यहाँ के महत्वपूर्ण मेले हैं [[तीज]], [[गणगौर]](जयपुर), अजमेर शरीफ और गलियाकोट के वार्षिक उर्स, बेनेश्वर (डूंगरपुर) का जनजातीय कुंभ, श्री महावीर जी (सवाई माधोपुर मेला), रामदेउरा (जैसलमेर), जंभेश्वर जी मेला(मुकाम-बीकानेर), [[कार्तिक पूर्णिमा]] और पशु-मेला ([[पुष्कर]]-अजमेर) और श्याम जी मेला ([[सीकर]]) आदि।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:City-Palace-Udaipur.jpg|[[सिटी पैलेस काम्‍पलेक्‍स उदयपुर|सिटी पैलेस]], [[उदयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; City Palace, Udaipur|thumb]]&lt;br /&gt;
राज्य में पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं:&lt;br /&gt;
*जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, [[बीकानेर]], माउंट आबू, &lt;br /&gt;
*अलवर में [[सरिस्का बाघ विहार]], &lt;br /&gt;
*भरतपुर में केवलादेव [[राष्ट्रीय पक्षी विहार]], &lt;br /&gt;
*अजमेर, [[जैसलमेर]], [[पाली]], [[चित्तौडगढ़]] आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजस्थानी कला==&lt;br /&gt;
इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्या, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है जो पुन: विभिन्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
====स्थापत्य कला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Amber-Fort-Jaipur-2.jpg|[[आमेर का क़िला जयपुर|आमेर का क़िला]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Amber Fort, Jaipur|thumb|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में प्राचीन काल से ही हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा मध्यकाल से मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर, स्तम्भ, मठ, मस्जिद, मकबरे, समाधियों और छतरियों का निर्माण किया जाता रहा है। इनमें कई भग्नावेश के रुप में तथा कुछ सही हालत में अभी भी विद्यमान है।  इनमें कला की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के भग्नावशेष हमें चित्तौड़ के उत्तर में नगरी नामक स्थान पर मिलते हैं। प्राप्त अवशेषों में [[वैष्णव]], [[बौद्ध]] तथा [[जैन]] धर्म की तक्षण कला झलकती है। तीसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवी शताब्दी तक स्थापत्य की विशेषताओं को बतलाने वाले उपकरणों में देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की कई मूर्तियां, [[बौद्ध]], [[स्तूप]], विशाल प्रस्तर खण्डों की चाहर दीवारी का एक बाड़ा, 36 फुट और नीचे से 14 फुल चौड़ दीवर कहा जाने वाला 'गरुड़ स्तम्भ' यहाँ भी देखा जा सकता है। 1567 ई. में [[अकबर]] द्वारा [[चित्तौड़]] आक्रमण के समय इस स्तम्भ का उपयोग सैनिक शिविर में प्रकाश करने के लिए किया गया था। गुप्तकाल के पश्चात् कालिका मन्दिर के रुप में विद्यमान चित्तौड़ का प्राचीन 'सूर्य मन्दिर' इसी ज़िले में छोटी सादड़ी का भ्रमरमाता का मन्दिर कोटा में, [[चित्र:Jal-Mahal-Jaipur.jpg|thumb|	[[जल महल जयपुर|जल महल]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jal Mahal, Jaipur]] बाड़ौली का शिव मन्दिर तथा इनमें लगी मूर्तियाँ तत्कालीन कलाकारों की तक्षण कला के बोध के साथ जन-जीवन की अभिक्रियाओं का संकेत भी प्रदान करती हैं। चित्तौड़ ज़िले में स्थित मेनाल, [[डूंगरपुर]] ज़िले में अमझेरा, उदयपुर में डबोक के देवालय अवशेषों की [[शिव]], [[पार्वती देवी|पार्वती]], [[विष्णु]], [[महावीर]], भैरव तथा नर्तकियों का शिल्प इनके निर्माण काल के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का क्रमिक इतिहास बतलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवीं शताब्दी से राजस्थान की शिल्पकला में राजपूत प्रशासन का प्रभाव हमें शक्ति और भक्ति के विविध पक्षों द्वारा प्राप्त होता है। जयपुर ज़िले में स्थित आभानेरी का मन्दिर (हर्षत माता का मंदिर), जोधपुर में ओसिया का सच्चियां माता का मन्दिर, जोधपुर संभाग में किराडू का मंदिर, इत्यादि और भिन्न प्रांतों के प्राचीन मंदिर कला के विविध स्वरों की अभिव्यक्ति संलग्न राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले स्थापत्य के नमूने हैं। उल्लेखित युग में निर्मित चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथंभोर, गागरोन, अचलगढ़, गढ़ बिरली (अजमेर का तारागढ़) जालोर, जोधपुर आदि के दुर्ग-स्थापत्य कला में राजपूत स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। सुरक्षा प्रेरित शिल्पकला इन दुर्गों की विशेषता कही जा सकती है जिसका प्रभाव इनमें स्थित मन्दिर शिल्प-मूर्ति लक्षण एवं भवन निर्माण में आसानी से परिलक्षित है। &lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image= चित्र:Mount-Abu-Panorama-1.jpg&lt;br /&gt;
|height= 200&lt;br /&gt;
|alt= माउंट आबू&lt;br /&gt;
|caption= हिमालयन पीक से माउंट आबू का विहंगम दृश्य  &amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View of Mount Abu from the Himalayan Peak.&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मुद्रा कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान के प्राचीन प्रदेश मेवाड़ में मज्झमिका (मध्यमिका) नामधारी चित्तौड़ के पास स्थित नगरी से प्राप्त ताम्रमुद्रा इस क्षेत्र को शिविजनपद घोषित करती है। तत्पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी की स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई। जनरल [[कनिंघम]] को [[आगरा]] में मेवाड़ के संस्थापक शासक गुहिल के सिक्के प्राप्त हुए तत्पश्चात ऐसे ही सिक्के औझाजी को भी मिले। इसके उर्ध्वपटल तथा अधोवट के चित्रण से मेवाड़ राजवंश के शैवधर्म के प्रति आस्था का पता चलता है।  [[चित्र:Camel-Cart-Mount-Abu.jpg|ऊँट गाड़ी, [[माउंट आबू]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Cart, Mount Abu|thumb|left]] राणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) सिक्कों में ताम्र मुद्राएं तथा रजत मुद्रा का उल्लेख जनरल कनिंघम ने किया है। इन पर उत्कीर्ण विक्रम सम्वत् 1510, 1512, 1523 आदि तिथियों 'श्री कुभंलमेरु महाराणा श्री कुभंकर्णस्य', 'श्री एकलिंगस्य प्रसादात' और 'श्री' के वाक्यों सहित भाले और डमरु का बिन्दु चिन्ह बना हुआ है। यह सिक्के वर्गाकृति के जिन्हें 'टका' पुकारा जाता था। यह प्रभाव सल्तनत कालीन मुद्रा व्यवस्था को प्रकट करता है जो कि मेवाड़ में राणा सांगा तक प्रचलित रही थी। सांगा के पश्चात् शनै: शनै: मुग़लकालीन मुद्रा की छाया हमें मेवाड़ और राजस्थान के तत्कालीन अन्यत्र राज्यों में दिखलाई देती है। सांगा कालीन (1509-1528 ई.) प्राप्त तीन मुद्राएं ताम्र तथा तीन पीतल की है। इनके उर्ध्वपटल पर नागरी अभिलेख तथा नागरी अंकों में तिथि तथा अधोपटल पर 'सुल्तान विन सुल्तान' का अभिलेख उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। प्रतीक चिन्हों में [[स्वास्तिक]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] और [[चन्द्र देवता|चन्द्र]] प्रदर्शित किये गए हैं। इस प्रकार सांगा के उत्तराधिकारियों राणा रत्नसिंह द्वितीय, राणा विक्रमादित्य, बनवीर आदि की मुद्राओं के संलग्न मुग़ल-मुद्राओं का प्रचलन भी मेवाड़ में रहा था जो टका, रुप्य आदि कहलाती थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rajasthan-Man.jpg|thumb|[[माउंट आबू]] में राजस्थानी ग्रामीण &amp;lt;br /&amp;gt; A Rajasthani at Mount Abu]]&lt;br /&gt;
परवर्ती काल में आलमशाही, मेहताशाही, चांदोडी, स्वरुपशाही, भूपालशाही, उदयपुरी, चित्तौड़ी, भीलवाड़ी त्रिशूलिया, फींतरा आदि कई मुद्राएं भिन्न-भिन्न समय में प्रचलित रहीं वहां सामन्तों की मुद्रा में भीण्डरीया पैसा एवं सलूम्बर का ठींगला व पदमशाही नामक ताम्बे का सिक्का जागीर क्षेत्र में चलता था। ब्रिटीश सरकार का 'कलदार' भी व्यापार-वाणिज्य में प्रयुक्त किया जाता रहा था। जोधपुर अथवा [[मारवाड़]] प्रदेश के अन्तर्गत प्राचीनकाल में 'पंचमार्क' मुद्राओं का प्रचलन रहा था। ईसा की दूसरी शताब्दी में यहाँ बाहर से आए क्षत्रपों की मुद्रा 'द्रम' का प्रचलन हुआ जो लगभग सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक आधार के साधन-रुप में प्रतिष्ठित हो गई। [[बाँसवाड़ा]] ज़िले के सरवानियां गाँव से 1911 ई. में प्राप्त वीर दामन की मुद्राएं इसका प्रमाण हैं। प्रतिहार तथा चौहान शासकों के सिक्कों के अलावा मारवाड़ में 'फदका' या 'फदिया' मुद्राओं का उल्लेख भी हमें प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान के अन्य प्राचीन राज्यों में जो सिक्के प्राप्त होते हैं वह सभी उत्तर मुग़लकाल या उसके पश्चात् स्थानीय शासकों द्वारा अपने-अपने नाम से प्रचलित कराए हुए मिलते हैं। इनमें जयपुर अथवा ढुंढ़ाड़ प्रदेश में झाड़शाही रामशाही मुहर मुग़ल बादशाह के के नाम वाले सिक्को में मुम्मदशाही, [[प्रतापगढ़]] के सलीमशाही बांसवाड़ा के लछमनशाही, बून्दी का हाली, कटारशाही, झालावाड़ का मदनशाही, जैसलमैर में अकेशाही व ताम्र मुद्रा - 'डोडिया' अलवर का रावशाही आदि मुख्य कहे जा सकते हैं। मुद्राओं को ढ़ालने वाली टकसालों तथा उनके ठप्पों का भी अध्ययन अपेक्षित है। इनसे तत्कालीन मुद्रा-विज्ञान पर वृहत प्रकाश डाला जा सकता है। मुद्राओं पर उल्लेखित विवरणों द्वारा हमें सत्ता के क्षेत्र विस्तार, शासकों के तिथिक्रम ही नहीं मिलते वरन् इनसे राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन भी किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
====मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Fort.jpg|[[जैसलमेर क़िला|जैसलमेर का क़िला]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaisalmer Fort, Jaisalmer|thumb|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में काले, सफेद, भूरे तथा हल्के सलेटी, हरे, गुलाबी पत्थर से बनी मूर्तियों के अतिरिक्त पीतल या धातु की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। गंगा नगर ज़िले के कालीबंगा तथा उदयपुर के निकट आहड़-सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी से बनाई हुई खिलौनाकृति की मूर्तियां भी मिलती हैं। किन्तु आदिकाल से शास्रोक्य मूर्ति कला की दृष्टि से ईसा पूर्व पहली से दूसरी शताब्दी के मध्य निर्मित जयपुर के लालसोट नाम स्थान पर 'बनजारे की छतरी' नाम से प्रसिद्ध चार वेदिका स्तम्भ मूर्तियों का लक्षण द्रष्टत्य है। पदमक के धर्मचक्र, मृग, मत्स, आदि के अंकन मरहुत तथा अमरावती की कला के समानुरुप हैं। राजस्थान में गुप्त शासकों के प्रभावस्वरुप गुप्त शैली में निर्मित मूर्तियों, [[आभानेरी]], कामवन तथा कोटा में कई स्थलों पर उपलब्ध हुई हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Albert-Hall-Museum-Jaipur.jpg|thumb|[[अल्‍बर्ट हॉल जयपुर|एल्बर्ट हॉल संग्रहालय]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Albert Hall Museum, Jaipur]]&lt;br /&gt;
गुप्तोतर काल के पश्चात् राजस्थान में सौराष्ट्र शैली, महागुर्जन शैली एवं महामास शैली का उदय एवं प्रभाव परिलक्षित होता है जिसमें महामास शैली केवल राजस्थान तक ही सीमित रही। इस शैली को मेवाड़ के गुहिल शासकों, जालौर व मण्डोर के प्रतिहार शासकों और शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों को संरक्षण प्रदान कर आठवीं से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक इसे विकसित किया। 15वीं शताब्दी राजस्थान में मूर्तिकला के विकास का स्वर्णकाल था जिसका प्रतीक विजय स्तम्भ (चित्तौड़) की मूर्तियाँ है। सोलहवीं शताब्दी का प्रतिमा शिल्प प्रदर्शन जगदीश मंदिर उदयपुर में देखा जा सकता है। यद्यपि इसके पश्चात् भी मूर्तियाँ बनी किंतु उस शिल्प वैचिञ्य कुछ भी नहीं है किंतु अठाहरवीं शताब्दी के बाद परम्परावादी शिल्प में पाश्चात्य शैली के लक्षण हमें दिखलाई देने लगते हैं। इसके फलस्वरुप मानव मूर्ति का शिल्प का प्रादूर्भाव राजस्थान में हुआ।&lt;br /&gt;
====धातु मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
धातु मूर्ति कला को भी राजस्थान में प्रयाप्त प्रश्रय मिला। पूर्व मध्य, मध्य तथा उत्तरमध्य काल में जैन मूर्तियों का यहाँ बहुतायत में निर्माण हुआ। सिरोही ज़िले में वसूतगढ़ पिण्डवाड़ा नामक स्थान पर कई धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जिसमें शारदा की मूर्ति शिल्प की दृष्टि से द्रस्टव्य है। भरतपुर, जैसलमेर, उदयपुर के ज़िले इस तरह के उदाहरण से परिपूर्ण है। अठाहरवीं शताब्दी से मूर्तिकला ने शनै: शनै: एक उद्योग का रुप लेना शुरु कर दिया था। अत: इनमें कलात्मक शैलियों के स्थान पर व्यवसायिकृत स्वरुप झलकने लगा। इसी काल में चित्रकला के प्रति लोगों का रुझान दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gadisagar-Lake-Jaisalmer-2.jpg|thumb|[[गडसीसर जलाशय एवं टीला की पोल जैसलमेर|गडसीसर सरोवर]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Gadisagar Lake, Jaisalmer|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में यों तो अति प्राचीन काल से चित्रकला के प्रति लोगों में रुचि रही थी। मुकन्दरा की पहाड़ियों व अरावली पर्वत श्रेणियों में कुछ शैल चित्रों की खोज इसका प्रमाण है। कोटा के दक्षिण में चम्बल के किनारे, माधोपुर की चट्टानों से, आलनिया नदी से प्राप्त शैल चित्रों का जो ब्योरा मिलता है उससे लगता है कि यह चित्र बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा वातावरण प्रभावित, स्वाभाविक इच्छा से बनाए गए थे। इनमें मानव एवं जावनरों की आकृतियों का आधिक्य है। कुछ चित्र शिकार के कुछ यन्त्र-तन्त्र के रुप में ज्यामितिक आकार के लिए पूजा और टोना टोटका की दृष्टि से अंकित हैं। कोटा के जलवाड़ा गाँव के पास विलास नदी के कन्या दाह ताल से बैला, हाथी, घोड़ा सहित घुड़सवार एवं हाथी सवार के चित्र मिलें हैं। यह चित्र उस आदिम परम्परा को प्रकट करते हैं आज भी राजस्थान में 'मांडला' नामक लोक कला के रुप में घर की दीवारों तथा आंगन में बने हुए देखे जा सकते हैं। इस प्रकार इनमें आदिम लोक कला के दर्शन सहित तत्कालीन मानव की आन्तरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति सहज प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Desert-2.jpg|ऊँट सवारी, [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Safari, Jaisalmer|thumb]] &lt;br /&gt;
कालीबंगा और आहड़ की खुदाई से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों पर किया गया अलंकरण भी प्राचीनतम मानव की लोक कला का परिचय प्रदान करता है। ज्यामितिक आकारों में चौकोर, गोल, जालीदाल, घुमावदार, त्रिकोण तथा समानान्तर रेखाओं के अतिरिक्त काली व सफेद रेखाओं से फूल-पत्ती, पक्षी, खजूर, चौपड़ आदि का चित्रण बर्तनों पर पाया जाता है। उत्खनित-सभ्यता के पश्चात् मिट्टी पर किए जाने वाले लोक अलंकरण कुम्भकारों की कला में निरंतर प्राप्त होते रहते हैं किन्तु चित्रकला का चिन्ह ग्याहरवी शदी के पूर्व नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;
सर्वप्रथम वि.सं. 1117/1080 ई. के दो सचित्र ग्रंथ जैसलमेर के जैन भण्डार से प्राप्त होते हैं।  औघनिर्युक्ति और दसवैकालिक सूत्रचूर्णी नामक यह हस्तलिखित ग्रन्थ जैन दर्शन से सम्बन्धित है। इसी प्रकार ताड़ एवं भोज पत्र के ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए बनाये गए लकड़ी के पुस्तक आवरण पर की गई चित्रकारी भी हमें तत्कालीन काल के दृष्टान्त प्रदान करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी तक निर्मित ऐसी कई चित्र पट्टिकाएं हमें राजस्थान के जैन भण्डारों में उपलब्ध हैं। इन पर जैन साधुओं, वनस्पति, पशु-पक्षी, आदि चित्रित हैं। अजमेर, पाली तथा आबू ऐसे चित्रकारों के मुख्य केन्द्र थे। तत्पशात् आहड़ एवं चित्तौड़ में भी इस प्रकार के सचित्र ग्रंथ बनने आरम्भ हुए। 1260-1317 ई. में लिखा गया 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि' नामक ग्रन्थ मेवाड़ शैली (आहड़) का प्रथम उपलब्ध चिन्ह है, जिसके द्वारा राजस्थानी कला के विकास का अध्ययन कर सकते हैं। ग्याहरवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी तक के उपलब्ध सचित्र ग्रंथों में निशिथचूर्णि, त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र, नेमिनाथ चरित्र, कला सरित्सागर, कल्पसूत्र (1483/1426 ई.) कालक कथा, सुपासनाचरियम् (1485-1428 ई.) रसिकाष्टक (1435/1492 ई.) तथा गीत गोविन्द आदि हैं। 15वीं शदी तक मेवाड़ शैली की विशेषता में सवाचश्म्, गरुड़ नासिका, परवल की खड़ी फांक से नेत्र, घुमावदार व लम्बी उंगलियां, गुड्डिकार जनसमुदाय, चेहरों पर जकड़न, अलंकरण बाहुल्य, लाल-पीले रंग का अधिक प्रयोग कहे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Khwaja-Garib-Nawaz-Dargah.jpg|left|thumb|ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ की दरगाह, [[अजमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Khwaja Garib Nawaz Dargah, Ajmer]]&lt;br /&gt;
मेवाड़ के अनुरुप मारवाड़ में भी चित्रकला की परम्परा प्राचीन काल से पनपती रही थी। किंतु महाराणा मोकल से राणा सांगा (1421-1528 ई.) तक मेवाड़-मारवाड़ कला के राजनीतिक प्रभाव के फलस्वरुप साम्य दिखलाई होता है। राव मालदेव (1531-1462 ई.) ने पुन: मारवाड़ शैली को प्रश्य प्रदान कर चित्रकारों को इस ओर प्रेरित किया। इस शैली का उदाहरण 1591 ई. में चित्रित ग्रन्थ उत्तराध्ययन सूत्र है। मारवाड़ शैली के भित्तिचित्रों मे जोधपुर के चोखेला महल को छतों के अन्दर बने चित्र दृष्टव्य हैं। राजस्थान में मुग़ल प्रभाव के परिणाम स्वरुप सत्रहवीं शती से मुग़ल शैली और राजस्थान की परम्परागत राजपूत शैली के समन्वय ने कई प्रांतीय शेलियों को जन्म दिया, इनमें मेवाड़ और मारवाड़ के अतिरिक्त [[बूंदी]], [[कोटा]], [[जैसलमेर]], [[बीकानेर]], [[जयपुर]], [[किशनगढ़]] और [[नाथद्वारा]] शैली मुख्य है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
मुग़ल प्रभाव के फलत: चित्रों के विषय अन्त:पुर की रंगरेलियाँ, स्रियों के स्नान, होली के खेल, शिकार, बाग-बगीचे, घुड़सवारी, हाथी की सवारी आदि रहे। किन्तु इतिहास के पूरक स्रोत की दृष्चि से इनमें चित्रित समाज का अंकन एवं घटनाओं का चित्रण हमें सत्रहवीं से अठारहवी शताब्दी के अवलोकन की विस्तृत सामग्री प्रदान करता है। उदाहरणत: मारवाड़ शैली में उपलब्ध 'पंचतंत्र' तथा 'शुकनासिक चरित्र' में कुम्हार, धोबी, नाई, मजदूर, चिड़ीमार, लकड़हारा, भिश्ती, सुनार, सौदागर, पनिहारी, ग्वाला, माली, किसान आदि से सम्बन्धित जीवन-वृत का चित्रण मिलता है। किशनगढ़ शैली में [[राधा]] [[कृष्ण]] की प्रेमाभिव्यक्ति के चित्रण मिलते हैं। इस क्रम में बनीठनी का एकल चित्र प्रसिद्ध है। किशनगढ़ शैली में कद व चेहरा लम्बा नाक नुकीली बनाई जाती रही वही विस्तृत चित्रों में दरबारी जीवन की झाँकियों का समावेश भी दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:A-View-Of-The-City-Of-Alwar.jpg|	 [[अलवर]] शहर का एक दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt;A View of the city of Alwar|thumb]]&lt;br /&gt;
मुग़ल शैली का अधिकतम प्रभाव हमें जयपुर तथा अलवर के चित्रों में मिलता है। बारामासा, राग माला, भागवत आदि के चित्र इसके उदाहरण हैं। 1671 ई. से मेवाड़ में पुष्टि मार्ग से प्रभावित श्रीनाथ जी के धर्म स्थल नाथद्वारा की कलम का अलग महत्व है। यद्यपि यहाँ के चित्रों का विषय कृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित रहा है फिर भी जन-जीवन की अभिक्रियाओं का चित्रण भी हमें इनमें सहज दिख जाता  है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश प्रभाव के फलत: राजस्थान में पोट्रेट भी बनने शुरु हुए। यह पोट्रेट तत्कालीन रहन-सहन को अभिव्यक्त करने में इतिहास के अच्छे साधन हैं। चित्रकला के अन्तर्गत भित्ति चित्रों का आधिक्य हमें अठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से दिखलाई देता है, किन्तु इसके पूर्व भी मन्दिरों और राज प्रासादों में ऐसे चित्रांकन की परम्परा विद्यमान थी। चित्तौड़ के प्राचीन महलों में ऐसे भित्ति चित्र उपलब्ध हैं जो सौलहवीं सदी में बनाए गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्रहवीं शताब्दी के चित्रणों में मोजमाबाद (जयपुर), उदयपुर के महलों तथा अम्बामाता के मंदिर, नाडोल के जैन मंदिर, आमेर (जयपुर) के निकट मावदूमशाह की क़ब्र के मुख्य गुम्बद के चित्र, जूनागढ़ (बीकानेर), मारोठ के मान मन्दिर गिने जा सकते हैं। अठाहरवीं शताब्दी के चित्रणों में कृष्ण विलास (उदयपुर) आमेर महल की भोजनशाला, ग़लता के महल, पुण्डरीक जी की हवेली (जयपुर) सूरजमल की छतरी (भरतपुर), झालिम सिंह की हवेली (कोटा) और मोती महल (नाथद्वारा) के भित्ति चित्र मुख्य हैं। यह चित्र आलागीला पद्धति या टेम्परा से बनाए गए थे। शेख़ावटी, जैसलमेर एवं बीकानेर की हवेलियों में इस प्रकार के भित्ति चित्र अध्ययनार्थ अभी भी देखे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कपड़ो पर की जाने वाली कला में छपाई की चित्रकारी भी कला के इतिहास सहित इतिहास के अन्य अंगों पर प्रकाश डालने में समर्थ हो सकती है। यद्यपि वस्र रंगाई, छपाई, तथा कढ़ाई चित्रकला से प्रत्यक्ष सम्बन्धित नहीं हैं, किन्तु काल विशेष में अपनाई जाने वाली इस तकनीक, विद्या का अध्ययन कलागत तकनीकी इतिहास की उपादेय सामग्री बन सकती है। चाँदी और सोने की जरी का काम किए वस्र शामियाने, हाथी, घोड़े तथा बैल की झूले आदि इस अध्ययन के साधन हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer.jpg|left|thumb|[[पुष्कर झील]]&amp;lt;br /&amp;gt; Pushkar Lake]]&lt;br /&gt;
====धातु एवं काष्ठ कला====&lt;br /&gt;
इसके अन्तर्गत तोप, बन्दूक, तलवार, म्यान, छुरी, कटारी, आदि अस्र-शस्र भी इतिहास के स्रोत हैं। इनकी बनावट इन पर की गई खुदाई की कला के साथ-साथ इन पर प्राप्त सन् एवं अभिलेख हमें राजनीतिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी ही तोप का उदाहरण हमें जोधपुर दुर्ग में देखने को मिला जबकि राजस्थान के संग्रहालयों में अभिलेख वाली कई तलवारें प्रदर्शनार्थ भी रखी हुई हैं। पालकी, काठियाँ, बैलगाड़ी, रथ, लकड़ी की टेबल, कुर्सियाँ, कलमदान, सन्दूक आदि भी मनुष्य की अभिवृत्तियों का दिग्दर्शन कराने के साथ तत्कालीन कलाकारों के श्रम और दशाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने में हमारे लिए महत्वपूर्ण स्रोत सामग्री है।&lt;br /&gt;
====लोककला====&lt;br /&gt;
अन्तत: लोककला के अन्तर्गत वाद्य यंत्र, लोक संगीत और नाट्य का हवाला देना भी आवश्यक है। यह सभी सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहरें हैं जो इतिहास का अमूल्य अंग हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राजस्थान में लोगों का मनोरंजन का साधन लोक नाट्य व नृत्य रहे थे। रास-लीला जैसे नाट्यों के अतिरिक्त प्रदेश में ख्याल, रम्मत, रासधारी, नृत्य, भवाई, ढाला-मारु, तुर्रा-कलंगी या माच तथा आदिवासी गवरी या गौरी नृत्य नाट्य, घूमर, अग्नि नृत्य, कोटा का चकरी नृत्य, डीडवाणा पोकरण के तेराताली नृत्य, मारवाड़ की कच्ची घोड़ी का नृत्य, पाबूजी की फड़ तथा कठपुतली प्रदर्शन के नाम उल्लेखनीय हैं। पाबूजी की फड़ चित्रांकित पर्दे के सहारे प्रदर्शनात्मक विधि द्वारा गाया जाने वाला गेय-नाट्य है। लोक बादणें में नगाड़ा ढ़ोल-ढ़ोलक, मादल, रावण हत्था, पूंगी, बसली, सारंगी, तदूरा, तासा, थाली, झाँझ पत्तर तथा खड़ताल आदि हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
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{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=rajasthan Map.jpg&lt;br /&gt;
|स्थानीय भाषाओं में नाम=राजस्थान&lt;br /&gt;
|राजधानी=जयपुर&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=56,473,122&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=165&lt;br /&gt;
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|ज़िले=33&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=जयपुर&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=जयपुर, अजमेर, उदयपुर&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=हिन्दी भाषा, राजस्थानी भाषा&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=जयपुर, भरतपुर, जोधपुर,  जैसलमेर,  उदयपुर,  बीकानेर&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=जयपुर, जोधपुर,  बीकानेर, माउण्ट आबू&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:921&lt;br /&gt;
|साक्षरता=61.03&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=8 °C&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=प्रभु राव&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=अशोक गहलोत&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=200&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.rajasthan.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/03/29&lt;br /&gt;
|emblem=Rajasthan-logo.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
राजस्थान भारत का एक प्रान्त है। यहाँ की राजधानी [[जयपुर]] है। राजस्थान भारत गणराज्य के क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में [[गुजरात]], दक्षिण-पूर्व में [[मध्यप्रदेश]], उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में [[उत्तर प्रदेश]] और [[हरियाणा]] है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है। जयपुर राज्य की राजधानी है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरूस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एकमात्र पहाड़ी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, [[माउंट आबू]] और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर को सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, रणथम्भौर एवम् सरिस्का हैं और [[भरतपुर]] के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उध्यान है, जो पक्षियों की रक्षार्थ निर्मित किया गया है। राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी, जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
भारत की आजादी से पहले यह क्षेत्र राजपूताना (राजपूतों का स्थान) कहलाता था। रणबांकुरे राजपूतों ने कई सदियों तक इस क्षेत्र पर राज्य किया। राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है। ईसा पूर्व 3000 से 1000 के बीच यहाँ की संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता जैसी थी। 7वीं शताब्दी में यहाँ चौहान राजपूतों का प्रभुत्व बढने लगा और 12वीं शताब्दी तक उन्होंने एक साम्राज्य स्थापित कर लिया था। चौहान के बाद इस योद्धा जाति का नेतृत्व [[मेवाड़]] के गहलोतों ने सँभाला। मेवाड़ के अलावा जो अन्य रियासतें ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख रहीं, वे हैं - भरतपुर, जयपुर, [[बूंदी]], [[मारवाड़]], [[कोटा]],  और [[अलवर]]। अन्य सभी रियासतें इन्हीं रियासतों से बनी। इन सभी रियासतों ने 1818 में अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश संधि स्वीकार कर ली जिसमें राजाओं के हितों की रक्षा की व्यवस्था थी, लेकिन इस संधि से आम जनता स्वाभाविक रूप से असंतुष्ट थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद लोग [[स्वतंत्रता आंदोलन]] में भाग लेने के लिए [[महात्मा गाँधी]] के नेतृत्व में एकजुट हुए। सन 1935 में अंग्रेजी शासन वाले भारत में प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन और तेज हो गया। 1948 में इन बिखरी हुई रियासतों को एक करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1956 में राज्य में पुनर्गठन क़ानून लागू होने तक जारी रही। सबसे पहले 1948 में मत्स्य संघ बना, जिसमें कुछ ही रियासतें शामिल हुई। धीरे-धीरे बाकी रियासतें भी इसमें मिलती गई। सन 1949 तक [[बीकानेर]], जयपुर, [[जोधपुर]] और [[जैसलमेर]] जैसी मुख्य रियासतें इसमें शामिल हो चुकी थीं और इसे बृहत्तर राजस्थान संयुक्त राज्य का नाम दिया गया। सन 1958 में [[अजमेर]], आबू रोड तालुका और सुनेल टप्पा के भी शामिल हो जाने के बाद वर्तमान राजस्थान राज्य विधिवत अस्तित्व में आया। राजस्थान की समूची पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान पडता है जबकि उत्तर में [[पंजाब]], उत्तर पूर्व में [[हरियाणा]], पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में गुजरात है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
राज्य में वर्ष 2006-07 में कुल कृषि योग्य क्षेत्र 217 लाख हेक्टेयर था और वर्ष (2007-08) में अनुमानित खाद्यान उत्पादन 155.10 लाख टन रहा। राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। चावल, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, गेहूं, तिलहन, दालें कपास और तंबाकू। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो में सब्जियों और संतरा तथा माल्टा जैसे नींबू प्रजाति के फलों के उत्पादन में काफ़ी वृद्धि हुई है। यहाँ की अन्य फ़सलें है लाल मिर्च, सरसों, मेथी, ज़ीरा, और हींग।&lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
राजस्थान सांस्कृतिक रूप में समृद्ध होने के साथ-साथ खनिजों के मामले में भी समृद्ध रहा है और अब वह देश के औद्योगिक परिदृश्य में भी तेजी से उभर रहा है। राज्य के प्रमुख केंद्रीय प्रतिष्ठानों में देबरी ([[उदयपुर]]) में जस्ता गलाने का संयंत्र, खेतडी (झुंझनूं) में तांबा परियोजना और कोटा में सूक्ष्म उपकरणों का कारखाना शामिल है। मार्च, 2006 तक राज्य में लघु उद्योगों की 2,75,400 इकाइयां थी। जिनमें 4,336.70 करोड़ रुपये की पूँजी लगी थी और लगभग 10.55 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था। मुख्य उद्योग हैं :वस्त्र, ऊनी कपडे, चीनी, सीमेंट, काँच, सोडियम संयंत्र, आक्सीजन, वनस्पति रंग, कीटनाशक, जस्ता, उर्वरक, रेल के डिब्बे, बॉल बियरिंग, पानी व बिजली के मीटर, टेलीवीजन सेट, सल्फ्यूरिक एसिड, सिंथेटिक धागे तथा तापरोधी ईंटें आदि। बहुमूल्य और कम मूल्य के रत्नों के अलावा कास्टिक सोडा, कैलशियम कार्बाइड, नाइलोन तथा टायर आदि अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाइयां हैं। राज्य में जिंक कंसंट्रेट, पन्ना, गार्नेट, जिप्सम, खनिज चांदी, एस्बेस्टस, फैल्सपार तथा अभ्रक के प्रचुर भंडार हैं। राज्य में नमक, रॉक फास्फेट, मारबल तथा लाल पत्थर भी काफ़ी मात्रा में मिलता है। सीतापुर (जयपुर) में देश पहला निर्यात संवर्द्धन पार्क बनाया गया है जिसने काम करना प्रारंभ कर दिया है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
*मार्च 2007 के अंत तक राज्य में विभिन्न प्रमुख, मध्यम और छोटी सिचाई परियोजनाओं के माध्यम से 34.85 लाख हेक्टेयर की सिंचाई संभाव्यता का सृजन किया गया (2007-08) और 92,200 हेक्टेयर (आईजीएनपी और सीएडी के अलावा) की अतिरिक्त सिंचाई संभाव्यता का सृजन मार्च 2007 तक किया गया है। &lt;br /&gt;
*राज्य में संस्थापित विद्युत क्षमता दिसम्बर 2007 तक 6335.33 मेगावॉट हो गई है, जिसमें से 4000 मेगावॉट राज्य की अपनी परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न की जाती है, 521.85 मेगावॉट सहयोगी परियोजनाओं से तथा 1813.18 मेगावॉट केन्द्रीय विद्युत उत्पादन स्टेशनों से आबंटित की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
[[image:Map-Rajasthan-1.jpg|thumb|राजस्थान का मानचित्र&amp;lt;br /&amp;gt;Map of Rajasthan]]&lt;br /&gt;
*सडकें: मार्च 2006 में राजस्थान में सड़को की कुल लंबाई 1,58,250 कि.मी. है।&lt;br /&gt;
*रेलवे: जोधपुर, बीकानेर, [[सवाई माधोपुर]], कोटा और भरतपुर राज्य के प्रमुख रेलवे जंक्शन है।&lt;br /&gt;
==उड्डयन== &lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] और [[मुंबई]] से जयपुर, जोधपुर तथा उदयपुर के लिए नियमित विमान सेवाएं हैं।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
राजस्थान मेलों और उत्सवों की धरती है। [[होली]], [[दीपावली]], [[विजय दशमी|विजयदशमी]], [[क्रिसमस]] जैसे प्रमख राष्ट्रीय त्योहारों के अलावा अनेक देवी-देवताओं, संतो और लोकनायकों तथा नायिकाओं के जन्मदिन मनाए जाते है। यहाँ के महत्वपूर्ण मेले हैं [[तीज]], [[गणगौर]](जयपुर), अजमेर शरीफ और गलियाकोट के वार्षिक उर्स, बेनेश्वर (डूंगरपुर) का जनजातीय कुंभ, श्री महावीर जी (सवाई माधोपुर मेला), रामदेउरा (जैसलमेर), जंभेश्वर जी मेला(मुकाम-बीकानेर), [[कार्तिक पूर्णिमा]] और पशु-मेला ([[पुष्कर]]-अजमेर) और श्याम जी मेला ([[सीकर]]) आदि।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:City-Palace-Udaipur.jpg|[[सिटी पैलेस काम्‍पलेक्‍स उदयपुर|सिटी पैलेस]], [[उदयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; City Palace, Udaipur|thumb]]&lt;br /&gt;
राज्य में पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं:&lt;br /&gt;
*जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, [[बीकानेर]], माउंट आबू, &lt;br /&gt;
*अलवर में [[सरिस्का बाघ विहार]], &lt;br /&gt;
*भरतपुर में केवलादेव [[राष्ट्रीय पक्षी विहार]], &lt;br /&gt;
*अजमेर, [[जैसलमेर]], [[पाली]], [[चित्तौडगढ़]] आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजस्थानी कला==&lt;br /&gt;
इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्या, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है जो पुन: विभिन्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
====स्थापत्य कला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Amber-Fort-Jaipur-2.jpg|[[आमेर का क़िला जयपुर|आमेर का क़िला]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Amber Fort, Jaipur|thumb|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में प्राचीन काल से ही हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा मध्यकाल से मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर, स्तम्भ, मठ, मस्जिद, मकबरे, समाधियों और छतरियों का निर्माण किया जाता रहा है। इनमें कई भग्नावेश के रुप में तथा कुछ सही हालत में अभी भी विद्यमान है।  इनमें कला की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के भग्नावशेष हमें चित्तौड़ के उत्तर में नगरी नामक स्थान पर मिलते हैं। प्राप्त अवशेषों में [[वैष्णव]], [[बौद्ध]] तथा [[जैन]] धर्म की तक्षण कला झलकती है। तीसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवी शताब्दी तक स्थापत्य की विशेषताओं को बतलाने वाले उपकरणों में देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की कई मूर्तियां, [[बौद्ध]], [[स्तूप]], विशाल प्रस्तर खण्डों की चाहर दीवारी का एक बाड़ा, 36 फुट और नीचे से 14 फुल चौड़ दीवर कहा जाने वाला 'गरुड़ स्तम्भ' यहाँ भी देखा जा सकता है। 1567 ई. में [[अकबर]] द्वारा [[चित्तौड़]] आक्रमण के समय इस स्तम्भ का उपयोग सैनिक शिविर में प्रकाश करने के लिए किया गया था। गुप्तकाल के पश्चात् कालिका मन्दिर के रुप में विद्यमान चित्तौड़ का प्राचीन 'सूर्य मन्दिर' इसी ज़िले में छोटी सादड़ी का भ्रमरमाता का मन्दिर कोटा में, [[चित्र:Jal-Mahal-Jaipur.jpg|thumb|	[[जल महल जयपुर|जल महल]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jal Mahal, Jaipur]] बाड़ौली का शिव मन्दिर तथा इनमें लगी मूर्तियाँ तत्कालीन कलाकारों की तक्षण कला के बोध के साथ जन-जीवन की अभिक्रियाओं का संकेत भी प्रदान करती हैं। चित्तौड़ ज़िले में स्थित मेनाल, [[डूंगरपुर]] ज़िले में अमझेरा, उदयपुर में डबोक के देवालय अवशेषों की [[शिव]], [[पार्वती देवी|पार्वती]], [[विष्णु]], [[महावीर]], भैरव तथा नर्तकियों का शिल्प इनके निर्माण काल के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का क्रमिक इतिहास बतलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवीं शताब्दी से राजस्थान की शिल्पकला में राजपूत प्रशासन का प्रभाव हमें शक्ति और भक्ति के विविध पक्षों द्वारा प्राप्त होता है। जयपुर ज़िले में स्थित आभानेरी का मन्दिर (हर्षत माता का मंदिर), जोधपुर में ओसिया का सच्चियां माता का मन्दिर, जोधपुर संभाग में किराडू का मंदिर, इत्यादि और भिन्न प्रांतों के प्राचीन मंदिर कला के विविध स्वरों की अभिव्यक्ति संलग्न राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले स्थापत्य के नमूने हैं। उल्लेखित युग में निर्मित चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथंभोर, गागरोन, अचलगढ़, गढ़ बिरली (अजमेर का तारागढ़) जालोर, जोधपुर आदि के दुर्ग-स्थापत्य कला में राजपूत स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। सुरक्षा प्रेरित शिल्पकला इन दुर्गों की विशेषता कही जा सकती है जिसका प्रभाव इनमें स्थित मन्दिर शिल्प-मूर्ति लक्षण एवं भवन निर्माण में आसानी से परिलक्षित है। &lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image= चित्र:Mount-Abu-Panorama-1.jpg&lt;br /&gt;
|height= 200&lt;br /&gt;
|alt= माउंट आबू&lt;br /&gt;
|caption= हिमालयन पीक से माउंट आबू का विहंगम दृश्य  &amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View of Mount Abu from the Himalayan Peak.&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मुद्रा कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान के प्राचीन प्रदेश मेवाड़ में मज्झमिका (मध्यमिका) नामधारी चित्तौड़ के पास स्थित नगरी से प्राप्त ताम्रमुद्रा इस क्षेत्र को शिविजनपद घोषित करती है। तत्पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी की स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई। जनरल [[कनिंघम]] को [[आगरा]] में मेवाड़ के संस्थापक शासक गुहिल के सिक्के प्राप्त हुए तत्पश्चात ऐसे ही सिक्के औझाजी को भी मिले। इसके उर्ध्वपटल तथा अधोवट के चित्रण से मेवाड़ राजवंश के शैवधर्म के प्रति आस्था का पता चलता है।  [[चित्र:Camel-Cart-Mount-Abu.jpg|ऊँट गाड़ी, [[माउंट आबू]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Cart, Mount Abu|thumb|left]] राणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) सिक्कों में ताम्र मुद्राएं तथा रजत मुद्रा का उल्लेख जनरल कनिंघम ने किया है। इन पर उत्कीर्ण विक्रम सम्वत् 1510, 1512, 1523 आदि तिथियों 'श्री कुभंलमेरु महाराणा श्री कुभंकर्णस्य', 'श्री एकलिंगस्य प्रसादात' और 'श्री' के वाक्यों सहित भाले और डमरु का बिन्दु चिन्ह बना हुआ है। यह सिक्के वर्गाकृति के जिन्हें 'टका' पुकारा जाता था। यह प्रभाव सल्तनत कालीन मुद्रा व्यवस्था को प्रकट करता है जो कि मेवाड़ में राणा सांगा तक प्रचलित रही थी। सांगा के पश्चात् शनै: शनै: मुग़लकालीन मुद्रा की छाया हमें मेवाड़ और राजस्थान के तत्कालीन अन्यत्र राज्यों में दिखलाई देती है। सांगा कालीन (1509-1528 ई.) प्राप्त तीन मुद्राएं ताम्र तथा तीन पीतल की है। इनके उर्ध्वपटल पर नागरी अभिलेख तथा नागरी अंकों में तिथि तथा अधोपटल पर 'सुल्तान विन सुल्तान' का अभिलेख उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। प्रतीक चिन्हों में [[स्वास्तिक]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] और [[चन्द्र देवता|चन्द्र]] प्रदर्शित किये गए हैं। इस प्रकार सांगा के उत्तराधिकारियों राणा रत्नसिंह द्वितीय, राणा विक्रमादित्य, बनवीर आदि की मुद्राओं के संलग्न मुग़ल-मुद्राओं का प्रचलन भी मेवाड़ में रहा था जो टका, रुप्य आदि कहलाती थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rajasthan-Man.jpg|thumb|[[माउंट आबू]] में राजस्थानी ग्रामीण &amp;lt;br /&amp;gt; A Rajasthani at Mount Abu]]&lt;br /&gt;
परवर्ती काल में आलमशाही, मेहताशाही, चांदोडी, स्वरुपशाही, भूपालशाही, उदयपुरी, चित्तौड़ी, भीलवाड़ी त्रिशूलिया, फींतरा आदि कई मुद्राएं भिन्न-भिन्न समय में प्रचलित रहीं वहां सामन्तों की मुद्रा में भीण्डरीया पैसा एवं सलूम्बर का ठींगला व पदमशाही नामक ताम्बे का सिक्का जागीर क्षेत्र में चलता था। ब्रिटीश सरकार का 'कलदार' भी व्यापार-वाणिज्य में प्रयुक्त किया जाता रहा था। जोधपुर अथवा [[मारवाड़]] प्रदेश के अन्तर्गत प्राचीनकाल में 'पंचमार्क' मुद्राओं का प्रचलन रहा था। ईसा की दूसरी शताब्दी में यहाँ बाहर से आए क्षत्रपों की मुद्रा 'द्रम' का प्रचलन हुआ जो लगभग सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक आधार के साधन-रुप में प्रतिष्ठित हो गई। [[बाँसवाड़ा]] ज़िले के सरवानियां गाँव से 1911 ई. में प्राप्त वीर दामन की मुद्राएं इसका प्रमाण हैं। प्रतिहार तथा चौहान शासकों के सिक्कों के अलावा मारवाड़ में 'फदका' या 'फदिया' मुद्राओं का उल्लेख भी हमें प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान के अन्य प्राचीन राज्यों में जो सिक्के प्राप्त होते हैं वह सभी उत्तर मुग़लकाल या उसके पश्चात् स्थानीय शासकों द्वारा अपने-अपने नाम से प्रचलित कराए हुए मिलते हैं। इनमें जयपुर अथवा ढुंढ़ाड़ प्रदेश में झाड़शाही रामशाही मुहर मुग़ल बादशाह के के नाम वाले सिक्को में मुम्मदशाही, [[प्रतापगढ़]] के सलीमशाही बांसवाड़ा के लछमनशाही, बून्दी का हाली, कटारशाही, झालावाड़ का मदनशाही, जैसलमैर में अकेशाही व ताम्र मुद्रा - 'डोडिया' अलवर का रावशाही आदि मुख्य कहे जा सकते हैं। मुद्राओं को ढ़ालने वाली टकसालों तथा उनके ठप्पों का भी अध्ययन अपेक्षित है। इनसे तत्कालीन मुद्रा-विज्ञान पर वृहत प्रकाश डाला जा सकता है। मुद्राओं पर उल्लेखित विवरणों द्वारा हमें सत्ता के क्षेत्र विस्तार, शासकों के तिथिक्रम ही नहीं मिलते वरन् इनसे राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन भी किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
====मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Fort.jpg|[[जैसलमेर क़िला|जैसलमेर का क़िला]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaisalmer Fort, Jaisalmer|thumb|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में काले, सफेद, भूरे तथा हल्के सलेटी, हरे, गुलाबी पत्थर से बनी मूर्तियों के अतिरिक्त पीतल या धातु की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। गंगा नगर ज़िले के कालीबंगा तथा उदयपुर के निकट आहड़-सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी से बनाई हुई खिलौनाकृति की मूर्तियां भी मिलती हैं। किन्तु आदिकाल से शास्रोक्य मूर्ति कला की दृष्टि से ईसा पूर्व पहली से दूसरी शताब्दी के मध्य निर्मित जयपुर के लालसोट नाम स्थान पर 'बनजारे की छतरी' नाम से प्रसिद्ध चार वेदिका स्तम्भ मूर्तियों का लक्षण द्रष्टत्य है। पदमक के धर्मचक्र, मृग, मत्स, आदि के अंकन मरहुत तथा अमरावती की कला के समानुरुप हैं। राजस्थान में गुप्त शासकों के प्रभावस्वरुप गुप्त शैली में निर्मित मूर्तियों, [[आभानेरी]], कामवन तथा कोटा में कई स्थलों पर उपलब्ध हुई हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Albert-Hall-Museum-Jaipur.jpg|thumb|[[अल्‍बर्ट हॉल जयपुर|एल्बर्ट हॉल संग्रहालय]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Albert Hall Museum, Jaipur]]&lt;br /&gt;
गुप्तोतर काल के पश्चात् राजस्थान में सौराष्ट्र शैली, महागुर्जन शैली एवं महामास शैली का उदय एवं प्रभाव परिलक्षित होता है जिसमें महामास शैली केवल राजस्थान तक ही सीमित रही। इस शैली को मेवाड़ के गुहिल शासकों, जालौर व मण्डोर के प्रतिहार शासकों और शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों को संरक्षण प्रदान कर आठवीं से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक इसे विकसित किया। 15वीं शताब्दी राजस्थान में मूर्तिकला के विकास का स्वर्णकाल था जिसका प्रतीक विजय स्तम्भ (चित्तौड़) की मूर्तियाँ है। सोलहवीं शताब्दी का प्रतिमा शिल्प प्रदर्शन जगदीश मंदिर उदयपुर में देखा जा सकता है। यद्यपि इसके पश्चात् भी मूर्तियाँ बनी किंतु उस शिल्प वैचिञ्य कुछ भी नहीं है किंतु अठाहरवीं शताब्दी के बाद परम्परावादी शिल्प में पाश्चात्य शैली के लक्षण हमें दिखलाई देने लगते हैं। इसके फलस्वरुप मानव मूर्ति का शिल्प का प्रादूर्भाव राजस्थान में हुआ।&lt;br /&gt;
====धातु मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
धातु मूर्ति कला को भी राजस्थान में प्रयाप्त प्रश्रय मिला। पूर्व मध्य, मध्य तथा उत्तरमध्य काल में जैन मूर्तियों का यहाँ बहुतायत में निर्माण हुआ। सिरोही ज़िले में वसूतगढ़ पिण्डवाड़ा नामक स्थान पर कई धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जिसमें शारदा की मूर्ति शिल्प की दृष्टि से द्रस्टव्य है। भरतपुर, जैसलमेर, उदयपुर के ज़िले इस तरह के उदाहरण से परिपूर्ण है। अठाहरवीं शताब्दी से मूर्तिकला ने शनै: शनै: एक उद्योग का रुप लेना शुरु कर दिया था। अत: इनमें कलात्मक शैलियों के स्थान पर व्यवसायिकृत स्वरुप झलकने लगा। इसी काल में चित्रकला के प्रति लोगों का रुझान दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gadisagar-Lake-Jaisalmer-2.jpg|thumb|[[गडसीसर जलाशय एवं टीला की पोल जैसलमेर|गडसीसर सरोवर]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Gadisagar Lake, Jaisalmer|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में यों तो अति प्राचीन काल से चित्रकला के प्रति लोगों में रुचि रही थी। मुकन्दरा की पहाड़ियों व अरावली पर्वत श्रेणियों में कुछ शैल चित्रों की खोज इसका प्रमाण है। कोटा के दक्षिण में चम्बल के किनारे, माधोपुर की चट्टानों से, आलनिया नदी से प्राप्त शैल चित्रों का जो ब्योरा मिलता है उससे लगता है कि यह चित्र बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा वातावरण प्रभावित, स्वाभाविक इच्छा से बनाए गए थे। इनमें मानव एवं जावनरों की आकृतियों का आधिक्य है। कुछ चित्र शिकार के कुछ यन्त्र-तन्त्र के रुप में ज्यामितिक आकार के लिए पूजा और टोना टोटका की दृष्टि से अंकित हैं। कोटा के जलवाड़ा गाँव के पास विलास नदी के कन्या दाह ताल से बैला, हाथी, घोड़ा सहित घुड़सवार एवं हाथी सवार के चित्र मिलें हैं। यह चित्र उस आदिम परम्परा को प्रकट करते हैं आज भी राजस्थान में 'मांडला' नामक लोक कला के रुप में घर की दीवारों तथा आंगन में बने हुए देखे जा सकते हैं। इस प्रकार इनमें आदिम लोक कला के दर्शन सहित तत्कालीन मानव की आन्तरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति सहज प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Desert-2.jpg|ऊँट सवारी, [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Safari, Jaisalmer|thumb]] &lt;br /&gt;
कालीबंगा और आहड़ की खुदाई से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों पर किया गया अलंकरण भी प्राचीनतम मानव की लोक कला का परिचय प्रदान करता है। ज्यामितिक आकारों में चौकोर, गोल, जालीदाल, घुमावदार, त्रिकोण तथा समानान्तर रेखाओं के अतिरिक्त काली व सफेद रेखाओं से फूल-पत्ती, पक्षी, खजूर, चौपड़ आदि का चित्रण बर्तनों पर पाया जाता है। उत्खनित-सभ्यता के पश्चात् मिट्टी पर किए जाने वाले लोक अलंकरण कुम्भकारों की कला में निरंतर प्राप्त होते रहते हैं किन्तु चित्रकला का चिन्ह ग्याहरवी शदी के पूर्व नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;
सर्वप्रथम वि.सं. 1117/1080 ई. के दो सचित्र ग्रंथ जैसलमेर के जैन भण्डार से प्राप्त होते हैं।  औघनिर्युक्ति और दसवैकालिक सूत्रचूर्णी नामक यह हस्तलिखित ग्रन्थ जैन दर्शन से सम्बन्धित है। इसी प्रकार ताड़ एवं भोज पत्र के ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए बनाये गए लकड़ी के पुस्तक आवरण पर की गई चित्रकारी भी हमें तत्कालीन काल के दृष्टान्त प्रदान करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी तक निर्मित ऐसी कई चित्र पट्टिकाएं हमें राजस्थान के जैन भण्डारों में उपलब्ध हैं। इन पर जैन साधुओं, वनस्पति, पशु-पक्षी, आदि चित्रित हैं। अजमेर, पाली तथा आबू ऐसे चित्रकारों के मुख्य केन्द्र थे। तत्पशात् आहड़ एवं चित्तौड़ में भी इस प्रकार के सचित्र ग्रंथ बनने आरम्भ हुए। 1260-1317 ई. में लिखा गया 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि' नामक ग्रन्थ मेवाड़ शैली (आहड़) का प्रथम उपलब्ध चिन्ह है, जिसके द्वारा राजस्थानी कला के विकास का अध्ययन कर सकते हैं। ग्याहरवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी तक के उपलब्ध सचित्र ग्रंथों में निशिथचूर्णि, त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र, नेमिनाथ चरित्र, कला सरित्सागर, कल्पसूत्र (1483/1426 ई.) कालक कथा, सुपासनाचरियम् (1485-1428 ई.) रसिकाष्टक (1435/1492 ई.) तथा गीत गोविन्द आदि हैं। 15वीं शदी तक मेवाड़ शैली की विशेषता में सवाचश्म्, गरुड़ नासिका, परवल की खड़ी फांक से नेत्र, घुमावदार व लम्बी उंगलियां, गुड्डिकार जनसमुदाय, चेहरों पर जकड़न, अलंकरण बाहुल्य, लाल-पीले रंग का अधिक प्रयोग कहे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Khwaja-Garib-Nawaz-Dargah.jpg|left|thumb|ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ की दरगाह, [[अजमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Khwaja Garib Nawaz Dargah, Ajmer]]&lt;br /&gt;
मेवाड़ के अनुरुप मारवाड़ में भी चित्रकला की परम्परा प्राचीन काल से पनपती रही थी। किंतु महाराणा मोकल से राणा सांगा (1421-1528 ई.) तक मेवाड़-मारवाड़ कला के राजनीतिक प्रभाव के फलस्वरुप साम्य दिखलाई होता है। राव मालदेव (1531-1462 ई.) ने पुन: मारवाड़ शैली को प्रश्य प्रदान कर चित्रकारों को इस ओर प्रेरित किया। इस शैली का उदाहरण 1591 ई. में चित्रित ग्रन्थ उत्तराध्ययन सूत्र है। मारवाड़ शैली के भित्तिचित्रों मे जोधपुर के चोखेला महल को छतों के अन्दर बने चित्र दृष्टव्य हैं। राजस्थान में मुग़ल प्रभाव के परिणाम स्वरुप सत्रहवीं शती से मुग़ल शैली और राजस्थान की परम्परागत राजपूत शैली के समन्वय ने कई प्रांतीय शेलियों को जन्म दिया, इनमें मेवाड़ और मारवाड़ के अतिरिक्त [[बूंदी]], [[कोटा]], [[जैसलमेर]], [[बीकानेर]], [[जयपुर]], [[किशनगढ़]] और [[नाथद्वारा]] शैली मुख्य है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
मुग़ल प्रभाव के फलत: चित्रों के विषय अन्त:पुर की रंगरेलियाँ, स्रियों के स्नान, होली के खेल, शिकार, बाग-बगीचे, घुड़सवारी, हाथी की सवारी आदि रहे। किन्तु इतिहास के पूरक स्रोत की दृष्चि से इनमें चित्रित समाज का अंकन एवं घटनाओं का चित्रण हमें सत्रहवीं से अठारहवी शताब्दी के अवलोकन की विस्तृत सामग्री प्रदान करता है। उदाहरणत: मारवाड़ शैली में उपलब्ध 'पंचतंत्र' तथा 'शुकनासिक चरित्र' में कुम्हार, धोबी, नाई, मजदूर, चिड़ीमार, लकड़हारा, भिश्ती, सुनार, सौदागर, पनिहारी, ग्वाला, माली, किसान आदि से सम्बन्धित जीवन-वृत का चित्रण मिलता है। किशनगढ़ शैली में [[राधा]] [[कृष्ण]] की प्रेमाभिव्यक्ति के चित्रण मिलते हैं। इस क्रम में बनीठनी का एकल चित्र प्रसिद्ध है। किशनगढ़ शैली में कद व चेहरा लम्बा नाक नुकीली बनाई जाती रही वही विस्तृत चित्रों में दरबारी जीवन की झाँकियों का समावेश भी दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:A-View-Of-The-City-Of-Alwar.jpg|	 [[अलवर]] शहर का एक दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt;A View of the city of Alwar|thumb]]&lt;br /&gt;
मुग़ल शैली का अधिकतम प्रभाव हमें जयपुर तथा अलवर के चित्रों में मिलता है। बारामासा, राग माला, भागवत आदि के चित्र इसके उदाहरण हैं। 1671 ई. से मेवाड़ में पुष्टि मार्ग से प्रभावित श्रीनाथ जी के धर्म स्थल नाथद्वारा की कलम का अलग महत्व है। यद्यपि यहाँ के चित्रों का विषय कृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित रहा है फिर भी जन-जीवन की अभिक्रियाओं का चित्रण भी हमें इनमें सहज दिख जाता  है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश प्रभाव के फलत: राजस्थान में पोट्रेट भी बनने शुरु हुए। यह पोट्रेट तत्कालीन रहन-सहन को अभिव्यक्त करने में इतिहास के अच्छे साधन हैं। चित्रकला के अन्तर्गत भित्ति चित्रों का आधिक्य हमें अठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से दिखलाई देता है, किन्तु इसके पूर्व भी मन्दिरों और राज प्रासादों में ऐसे चित्रांकन की परम्परा विद्यमान थी। चित्तौड़ के प्राचीन महलों में ऐसे भित्ति चित्र उपलब्ध हैं जो सौलहवीं सदी में बनाए गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्रहवीं शताब्दी के चित्रणों में मोजमाबाद (जयपुर), उदयपुर के महलों तथा अम्बामाता के मंदिर, नाडोल के जैन मंदिर, आमेर (जयपुर) के निकट मावदूमशाह की क़ब्र के मुख्य गुम्बद के चित्र, जूनागढ़ (बीकानेर), मारोठ के मान मन्दिर गिने जा सकते हैं। अठाहरवीं शताब्दी के चित्रणों में कृष्ण विलास (उदयपुर) आमेर महल की भोजनशाला, ग़लता के महल, पुण्डरीक जी की हवेली (जयपुर) सूरजमल की छतरी (भरतपुर), झालिम सिंह की हवेली (कोटा) और मोती महल (नाथद्वारा) के भित्ति चित्र मुख्य हैं। यह चित्र आलागीला पद्धति या टेम्परा से बनाए गए थे। शेख़ावटी, जैसलमेर एवं बीकानेर की हवेलियों में इस प्रकार के भित्ति चित्र अध्ययनार्थ अभी भी देखे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कपड़ो पर की जाने वाली कला में छपाई की चित्रकारी भी कला के इतिहास सहित इतिहास के अन्य अंगों पर प्रकाश डालने में समर्थ हो सकती है। यद्यपि वस्र रंगाई, छपाई, तथा कढ़ाई चित्रकला से प्रत्यक्ष सम्बन्धित नहीं हैं, किन्तु काल विशेष में अपनाई जाने वाली इस तकनीक, विद्या का अध्ययन कलागत तकनीकी इतिहास की उपादेय सामग्री बन सकती है। चाँदी और सोने की जरी का काम किए वस्र शामियाने, हाथी, घोड़े तथा बैल की झूले आदि इस अध्ययन के साधन हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer.jpg|left|thumb|[[पुष्कर झील]]&amp;lt;br /&amp;gt; Pushkar Lake]]&lt;br /&gt;
====धातु एवं काष्ठ कला====&lt;br /&gt;
इसके अन्तर्गत तोप, बन्दूक, तलवार, म्यान, छुरी, कटारी, आदि अस्र-शस्र भी इतिहास के स्रोत हैं। इनकी बनावट इन पर की गई खुदाई की कला के साथ-साथ इन पर प्राप्त सन् एवं अभिलेख हमें राजनीतिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी ही तोप का उदाहरण हमें जोधपुर दुर्ग में देखने को मिला जबकि राजस्थान के संग्रहालयों में अभिलेख वाली कई तलवारें प्रदर्शनार्थ भी रखी हुई हैं। पालकी, काठियाँ, बैलगाड़ी, रथ, लकड़ी की टेबल, कुर्सियाँ, कलमदान, सन्दूक आदि भी मनुष्य की अभिवृत्तियों का दिग्दर्शन कराने के साथ तत्कालीन कलाकारों के श्रम और दशाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने में हमारे लिए महत्वपूर्ण स्रोत सामग्री है।&lt;br /&gt;
====लोककला====&lt;br /&gt;
अन्तत: लोककला के अन्तर्गत वाद्य यंत्र, लोक संगीत और नाट्य का हवाला देना भी आवश्यक है। यह सभी सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहरें हैं जो इतिहास का अमूल्य अंग हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राजस्थान में लोगों का मनोरंजन का साधन लोक नाट्य व नृत्य रहे थे। रास-लीला जैसे नाट्यों के अतिरिक्त प्रदेश में ख्याल, रम्मत, रासधारी, नृत्य, भवाई, ढाला-मारु, तुर्रा-कलंगी या माच तथा आदिवासी गवरी या गौरी नृत्य नाट्य, घूमर, अग्नि नृत्य, कोटा का चकरी नृत्य, डीडवाणा पोकरण के तेराताली नृत्य, मारवाड़ की कच्ची घोड़ी का नृत्य, पाबूजी की फड़ तथा कठपुतली प्रदर्शन के नाम उल्लेखनीय हैं। पाबूजी की फड़ चित्रांकित पर्दे के सहारे प्रदर्शनात्मक विधि द्वारा गाया जाने वाला गेय-नाट्य है। लोक बादणें में नगाड़ा ढ़ोल-ढ़ोलक, मादल, रावण हत्था, पूंगी, बसली, सारंगी, तदूरा, तासा, थाली, झाँझ पत्तर तथा खड़ताल आदि हैं।&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>राजस्थान</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{wait}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=rajasthan Map.jpg&lt;br /&gt;
|स्थानीय भाषाओं में नाम=राजस्थान&lt;br /&gt;
|राजधानी=जयपुर&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=56,473,122&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=165&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=342239 sqkm&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=26°34′22″N 73°50′20″E﻿&lt;br /&gt;
|ज़िले=33&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=जयपुर&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=जयपुर, अजमेर, उदयपुर&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=हिन्दी भाषा, राजस्थानी भाषा&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=जयपुर, भरतपुर, जोधपुर,  जैसलमेर,  उदयपुर,  बीकानेर&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=जयपुर, जोधपुर,  बीकानेर, माउण्ट आबू&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:921&lt;br /&gt;
|साक्षरता=61.03&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=8 °C&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=प्रभु राव&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=अशोक गहलोत&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=200&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.rajasthan.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/03/29&lt;br /&gt;
|emblem=Rajasthan-logo.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
राजस्थान भारत का एक प्रान्त है। यहाँ की राजधानी [[जयपुर]] है। राजस्थान भारत गणराज्य के क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में [[गुजरात]], दक्षिण-पूर्व में [[मध्यप्रदेश]], उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में [[उत्तर प्रदेश]] और [[हरियाणा]] है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है। जयपुर राज्य की राजधानी है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरूस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एकमात्र पहाड़ी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, [[माउंट आबू]] और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर को सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, रणथम्भौर एवम् सरिस्का हैं और [[भरतपुर]] के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उध्यान है, जो पक्षियों की रक्षार्थ निर्मित किया गया है। राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी, जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
भारत की आजादी से पहले यह क्षेत्र राजपूताना (राजपूतों का स्थान) कहलाता था। रणबांकुरे राजपूतों ने कई सदियों तक इस क्षेत्र पर राज्य किया। राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है। ईसा पूर्व 3000 से 1000 के बीच यहाँ की संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता जैसी थी। 7वीं शताब्दी में यहाँ चौहान राजपूतों का प्रभुत्व बढने लगा और 12वीं शताब्दी तक उन्होंने एक साम्राज्य स्थापित कर लिया था। चौहान के बाद इस योद्धा जाति का नेतृत्व [[मेवाड़]] के गहलोतों ने सँभाला। मेवाड़ के अलावा जो अन्य रियासतें ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख रहीं, वे हैं - भरतपुर, जयपुर, [[बूंदी]], [[मारवाड़]], [[कोटा]],  और [[अलवर]]। अन्य सभी रियासतें इन्हीं रियासतों से बनी। इन सभी रियासतों ने 1818 में अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश संधि स्वीकार कर ली जिसमें राजाओं के हितों की रक्षा की व्यवस्था थी, लेकिन इस संधि से आम जनता स्वाभाविक रूप से असंतुष्ट थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद लोग [[स्वतंत्रता आंदोलन]] में भाग लेने के लिए [[महात्मा गाँधी]] के नेतृत्व में एकजुट हुए। सन 1935 में अंग्रेजी शासन वाले भारत में प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन और तेज हो गया। 1948 में इन बिखरी हुई रियासतों को एक करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1956 में राज्य में पुनर्गठन क़ानून लागू होने तक जारी रही। सबसे पहले 1948 में मत्स्य संघ बना, जिसमें कुछ ही रियासतें शामिल हुई। धीरे-धीरे बाकी रियासतें भी इसमें मिलती गई। सन 1949 तक [[बीकानेर]], जयपुर, [[जोधपुर]] और [[जैसलमेर]] जैसी मुख्य रियासतें इसमें शामिल हो चुकी थीं और इसे बृहत्तर राजस्थान संयुक्त राज्य का नाम दिया गया। सन 1958 में [[अजमेर]], आबू रोड तालुका और सुनेल टप्पा के भी शामिल हो जाने के बाद वर्तमान राजस्थान राज्य विधिवत अस्तित्व में आया। राजस्थान की समूची पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान पडता है जबकि उत्तर में [[पंजाब]], उत्तर पूर्व में [[हरियाणा]], पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में गुजरात है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
राज्य में वर्ष 2006-07 में कुल कृषि योग्य क्षेत्र 217 लाख हेक्टेयर था और वर्ष (2007-08) में अनुमानित खाद्यान उत्पादन 155.10 लाख टन रहा। राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। चावल, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, गेहूं, तिलहन, दालें कपास और तंबाकू। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो में सब्जियों और संतरा तथा माल्टा जैसे नींबू प्रजाति के फलों के उत्पादन में काफ़ी वृद्धि हुई है। यहाँ की अन्य फ़सलें है लाल मिर्च, सरसों, मेथी, ज़ीरा, और हींग।&lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
राजस्थान सांस्कृतिक रूप में समृद्ध होने के साथ-साथ खनिजों के मामले में भी समृद्ध रहा है और अब वह देश के औद्योगिक परिदृश्य में भी तेजी से उभर रहा है। राज्य के प्रमुख केंद्रीय प्रतिष्ठानों में देबरी ([[उदयपुर]]) में जस्ता गलाने का संयंत्र, खेतडी (झुंझनूं) में तांबा परियोजना और कोटा में सूक्ष्म उपकरणों का कारखाना शामिल है। मार्च, 2006 तक राज्य में लघु उद्योगों की 2,75,400 इकाइयां थी। जिनमें 4,336.70 करोड़ रुपये की पूँजी लगी थी और लगभग 10.55 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था। मुख्य उद्योग हैं :वस्त्र, ऊनी कपडे, चीनी, सीमेंट, काँच, सोडियम संयंत्र, आक्सीजन, वनस्पति रंग, कीटनाशक, जस्ता, उर्वरक, रेल के डिब्बे, बॉल बियरिंग, पानी व बिजली के मीटर, टेलीवीजन सेट, सल्फ्यूरिक एसिड, सिंथेटिक धागे तथा तापरोधी ईंटें आदि। बहुमूल्य और कम मूल्य के रत्नों के अलावा कास्टिक सोडा, कैलशियम कार्बाइड, नाइलोन तथा टायर आदि अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाइयां हैं। राज्य में जिंक कंसंट्रेट, पन्ना, गार्नेट, जिप्सम, खनिज चांदी, एस्बेस्टस, फैल्सपार तथा अभ्रक के प्रचुर भंडार हैं। राज्य में नमक, रॉक फास्फेट, मारबल तथा लाल पत्थर भी काफ़ी मात्रा में मिलता है। सीतापुर (जयपुर) में देश पहला निर्यात संवर्द्धन पार्क बनाया गया है जिसने काम करना प्रारंभ कर दिया है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
*मार्च 2007 के अंत तक राज्य में विभिन्न प्रमुख, मध्यम और छोटी सिचाई परियोजनाओं के माध्यम से 34.85 लाख हेक्टेयर की सिंचाई संभाव्यता का सृजन किया गया (2007-08) और 92,200 हेक्टेयर (आईजीएनपी और सीएडी के अलावा) की अतिरिक्त सिंचाई संभाव्यता का सृजन मार्च 2007 तक किया गया है। &lt;br /&gt;
*राज्य में संस्थापित विद्युत क्षमता दिसम्बर 2007 तक 6335.33 मेगावॉट हो गई है, जिसमें से 4000 मेगावॉट राज्य की अपनी परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न की जाती है, 521.85 मेगावॉट सहयोगी परियोजनाओं से तथा 1813.18 मेगावॉट केन्द्रीय विद्युत उत्पादन स्टेशनों से आबंटित की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
[[image:Map-Rajasthan-1.jpg|thumb|राजस्थान का मानचित्र&amp;lt;br /&amp;gt;Map of Rajasthan]]&lt;br /&gt;
*सडकें: मार्च 2006 में राजस्थान में सड़को की कुल लंबाई 1,58,250 कि.मी. है।&lt;br /&gt;
*रेलवे: जोधपुर, बीकानेर, [[सवाई माधोपुर]], कोटा और भरतपुर राज्य के प्रमुख रेलवे जंक्शन है।&lt;br /&gt;
==उड्डयन== &lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] और [[मुंबई]] से जयपुर, जोधपुर तथा उदयपुर के लिए नियमित विमान सेवाएं हैं।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
राजस्थान मेलों और उत्सवों की धरती है। [[होली]], [[दीपावली]], [[विजय दशमी|विजयदशमी]], [[क्रिसमस]] जैसे प्रमख राष्ट्रीय त्योहारों के अलावा अनेक देवी-देवताओं, संतो और लोकनायकों तथा नायिकाओं के जन्मदिन मनाए जाते है। यहाँ के महत्वपूर्ण मेले हैं [[तीज]], [[गणगौर]](जयपुर), अजमेर शरीफ और गलियाकोट के वार्षिक उर्स, बेनेश्वर (डूंगरपुर) का जनजातीय कुंभ, श्री महावीर जी (सवाई माधोपुर मेला), रामदेउरा (जैसलमेर), जंभेश्वर जी मेला(मुकाम-बीकानेर), [[कार्तिक पूर्णिमा]] और पशु-मेला ([[पुष्कर]]-अजमेर) और श्याम जी मेला ([[सीकर]]) आदि।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:City-Palace-Udaipur.jpg|[[सिटी पैलेस काम्‍पलेक्‍स उदयपुर|सिटी पैलेस]], [[उदयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; City Palace, Udaipur|thumb]]&lt;br /&gt;
राज्य में पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं:&lt;br /&gt;
*जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, [[बीकानेर]], माउंट आबू, &lt;br /&gt;
*अलवर में [[सरिस्का बाघ विहार]], &lt;br /&gt;
*भरतपुर में केवलादेव [[राष्ट्रीय पक्षी विहार]], &lt;br /&gt;
*अजमेर, [[जैसलमेर]], [[पाली]], [[चित्तौडगढ़]] आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजस्थानी कला==&lt;br /&gt;
इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्या, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है जो पुन: विभिन्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
====स्थापत्य कला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Amber-Fort-Jaipur-2.jpg|[[आमेर का क़िला जयपुर|आमेर का क़िला]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Amber Fort, Jaipur|thumb|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में प्राचीन काल से ही हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा मध्यकाल से मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर, स्तम्भ, मठ, मस्जिद, मकबरे, समाधियों और छतरियों का निर्माण किया जाता रहा है। इनमें कई भग्नावेश के रुप में तथा कुछ सही हालत में अभी भी विद्यमान है।  इनमें कला की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के भग्नावशेष हमें चित्तौड़ के उत्तर में नगरी नामक स्थान पर मिलते हैं। प्राप्त अवशेषों में [[वैष्णव]], [[बौद्ध]] तथा [[जैन]] धर्म की तक्षण कला झलकती है। तीसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवी शताब्दी तक स्थापत्य की विशेषताओं को बतलाने वाले उपकरणों में देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की कई मूर्तियां, [[बौद्ध]], [[स्तूप]], विशाल प्रस्तर खण्डों की चाहर दीवारी का एक बाड़ा, 36 फुट और नीचे से 14 फुल चौड़ दीवर कहा जाने वाला 'गरुड़ स्तम्भ' यहाँ भी देखा जा सकता है। 1567 ई. में [[अकबर]] द्वारा [[चित्तौड़]] आक्रमण के समय इस स्तम्भ का उपयोग सैनिक शिविर में प्रकाश करने के लिए किया गया था। गुप्तकाल के पश्चात् कालिका मन्दिर के रुप में विद्यमान चित्तौड़ का प्राचीन 'सूर्य मन्दिर' इसी ज़िले में छोटी सादड़ी का भ्रमरमाता का मन्दिर कोटा में, [[चित्र:Jal-Mahal-Jaipur.jpg|thumb|	[[जल महल जयपुर|जल महल]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jal Mahal, Jaipur]] बाड़ौली का शिव मन्दिर तथा इनमें लगी मूर्तियाँ तत्कालीन कलाकारों की तक्षण कला के बोध के साथ जन-जीवन की अभिक्रियाओं का संकेत भी प्रदान करती हैं। चित्तौड़ ज़िले में स्थित मेनाल, [[डूंगरपुर]] ज़िले में अमझेरा, उदयपुर में डबोक के देवालय अवशेषों की [[शिव]], [[पार्वती देवी|पार्वती]], [[विष्णु]], [[महावीर]], भैरव तथा नर्तकियों का शिल्प इनके निर्माण काल के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का क्रमिक इतिहास बतलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवीं शताब्दी से राजस्थान की शिल्पकला में राजपूत प्रशासन का प्रभाव हमें शक्ति और भक्ति के विविध पक्षों द्वारा प्राप्त होता है। जयपुर ज़िले में स्थित आभानेरी का मन्दिर (हर्षत माता का मंदिर), जोधपुर में ओसिया का सच्चियां माता का मन्दिर, जोधपुर संभाग में किराडू का मंदिर, इत्यादि और भिन्न प्रांतों के प्राचीन मंदिर कला के विविध स्वरों की अभिव्यक्ति संलग्न राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले स्थापत्य के नमूने हैं। उल्लेखित युग में निर्मित चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथंभोर, गागरोन, अचलगढ़, गढ़ बिरली (अजमेर का तारागढ़) जालोर, जोधपुर आदि के दुर्ग-स्थापत्य कला में राजपूत स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। सुरक्षा प्रेरित शिल्पकला इन दुर्गों की विशेषता कही जा सकती है जिसका प्रभाव इनमें स्थित मन्दिर शिल्प-मूर्ति लक्षण एवं भवन निर्माण में आसानी से परिलक्षित है। &lt;br /&gt;
====मुद्रा कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान के प्राचीन प्रदेश मेवाड़ में मज्झमिका (मध्यमिका) नामधारी चित्तौड़ के पास स्थित नगरी से प्राप्त ताम्रमुद्रा इस क्षेत्र को शिविजनपद घोषित करती है। तत्पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी की स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई। जनरल [[कनिंघम]] को [[आगरा]] में मेवाड़ के संस्थापक शासक गुहिल के सिक्के प्राप्त हुए तत्पश्चात ऐसे ही सिक्के औझाजी को भी मिले। इसके उर्ध्वपटल तथा अधोवट के चित्रण से मेवाड़ राजवंश के शैवधर्म के प्रति आस्था का पता चलता है।  [[चित्र:Camel-Cart-Mount-Abu.jpg|ऊँट गाड़ी, [[माउंट आबू]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Cart, Mount Abu|thumb|left]] राणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) सिक्कों में ताम्र मुद्राएं तथा रजत मुद्रा का उल्लेख जनरल कनिंघम ने किया है। इन पर उत्कीर्ण विक्रम सम्वत् 1510, 1512, 1523 आदि तिथियों 'श्री कुभंलमेरु महाराणा श्री कुभंकर्णस्य', 'श्री एकलिंगस्य प्रसादात' और 'श्री' के वाक्यों सहित भाले और डमरु का बिन्दु चिन्ह बना हुआ है। यह सिक्के वर्गाकृति के जिन्हें 'टका' पुकारा जाता था। यह प्रभाव सल्तनत कालीन मुद्रा व्यवस्था को प्रकट करता है जो कि मेवाड़ में राणा सांगा तक प्रचलित रही थी। सांगा के पश्चात् शनै: शनै: मुग़लकालीन मुद्रा की छाया हमें मेवाड़ और राजस्थान के तत्कालीन अन्यत्र राज्यों में दिखलाई देती है। सांगा कालीन (1509-1528 ई.) प्राप्त तीन मुद्राएं ताम्र तथा तीन पीतल की है। इनके उर्ध्वपटल पर नागरी अभिलेख तथा नागरी अंकों में तिथि तथा अधोपटल पर 'सुल्तान विन सुल्तान' का अभिलेख उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। प्रतीक चिन्हों में [[स्वास्तिक]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] और [[चन्द्र देवता|चन्द्र]] प्रदर्शित किये गए हैं। इस प्रकार सांगा के उत्तराधिकारियों राणा रत्नसिंह द्वितीय, राणा विक्रमादित्य, बनवीर आदि की मुद्राओं के संलग्न मुग़ल-मुद्राओं का प्रचलन भी मेवाड़ में रहा था जो टका, रुप्य आदि कहलाती थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rajasthan-Man.jpg|thumb|[[माउंट आबू]] में राजस्थानी ग्रामीण &amp;lt;br /&amp;gt; A Rajasthani at Mount Abu]]&lt;br /&gt;
परवर्ती काल में आलमशाही, मेहताशाही, चांदोडी, स्वरुपशाही, भूपालशाही, उदयपुरी, चित्तौड़ी, भीलवाड़ी त्रिशूलिया, फींतरा आदि कई मुद्राएं भिन्न-भिन्न समय में प्रचलित रहीं वहां सामन्तों की मुद्रा में भीण्डरीया पैसा एवं सलूम्बर का ठींगला व पदमशाही नामक ताम्बे का सिक्का जागीर क्षेत्र में चलता था। ब्रिटीश सरकार का 'कलदार' भी व्यापार-वाणिज्य में प्रयुक्त किया जाता रहा था। जोधपुर अथवा [[मारवाड़]] प्रदेश के अन्तर्गत प्राचीनकाल में 'पंचमार्क' मुद्राओं का प्रचलन रहा था। ईसा की दूसरी शताब्दी में यहाँ बाहर से आए क्षत्रपों की मुद्रा 'द्रम' का प्रचलन हुआ जो लगभग सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक आधार के साधन-रुप में प्रतिष्ठित हो गई। [[बाँसवाड़ा]] ज़िले के सरवानियां गाँव से 1911 ई. में प्राप्त वीर दामन की मुद्राएं इसका प्रमाण हैं। प्रतिहार तथा चौहान शासकों के सिक्कों के अलावा मारवाड़ में 'फदका' या 'फदिया' मुद्राओं का उल्लेख भी हमें प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान के अन्य प्राचीन राज्यों में जो सिक्के प्राप्त होते हैं वह सभी उत्तर मुग़लकाल या उसके पश्चात् स्थानीय शासकों द्वारा अपने-अपने नाम से प्रचलित कराए हुए मिलते हैं। इनमें जयपुर अथवा ढुंढ़ाड़ प्रदेश में झाड़शाही रामशाही मुहर मुग़ल बादशाह के के नाम वाले सिक्को में मुम्मदशाही, [[प्रतापगढ़]] के सलीमशाही बांसवाड़ा के लछमनशाही, बून्दी का हाली, कटारशाही, झालावाड़ का मदनशाही, जैसलमैर में अकेशाही व ताम्र मुद्रा - 'डोडिया' अलवर का रावशाही आदि मुख्य कहे जा सकते हैं। मुद्राओं को ढ़ालने वाली टकसालों तथा उनके ठप्पों का भी अध्ययन अपेक्षित है। इनसे तत्कालीन मुद्रा-विज्ञान पर वृहत प्रकाश डाला जा सकता है। मुद्राओं पर उल्लेखित विवरणों द्वारा हमें सत्ता के क्षेत्र विस्तार, शासकों के तिथिक्रम ही नहीं मिलते वरन् इनसे राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन भी किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
====मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Fort.jpg|[[जैसलमेर क़िला|जैसलमेर का क़िला]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaisalmer Fort, Jaisalmer|thumb|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में काले, सफेद, भूरे तथा हल्के सलेटी, हरे, गुलाबी पत्थर से बनी मूर्तियों के अतिरिक्त पीतल या धातु की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। गंगा नगर ज़िले के कालीबंगा तथा उदयपुर के निकट आहड़-सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी से बनाई हुई खिलौनाकृति की मूर्तियां भी मिलती हैं। किन्तु आदिकाल से शास्रोक्य मूर्ति कला की दृष्टि से ईसा पूर्व पहली से दूसरी शताब्दी के मध्य निर्मित जयपुर के लालसोट नाम स्थान पर 'बनजारे की छतरी' नाम से प्रसिद्ध चार वेदिका स्तम्भ मूर्तियों का लक्षण द्रष्टत्य है। पदमक के धर्मचक्र, मृग, मत्स, आदि के अंकन मरहुत तथा अमरावती की कला के समानुरुप हैं। राजस्थान में गुप्त शासकों के प्रभावस्वरुप गुप्त शैली में निर्मित मूर्तियों, [[आभानेरी]], कामवन तथा कोटा में कई स्थलों पर उपलब्ध हुई हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Albert-Hall-Museum-Jaipur.jpg|thumb|[[अल्‍बर्ट हॉल जयपुर|एल्बर्ट हॉल संग्रहालय]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Albert Hall Museum, Jaipur]]&lt;br /&gt;
गुप्तोतर काल के पश्चात् राजस्थान में सौराष्ट्र शैली, महागुर्जन शैली एवं महामास शैली का उदय एवं प्रभाव परिलक्षित होता है जिसमें महामास शैली केवल राजस्थान तक ही सीमित रही। इस शैली को मेवाड़ के गुहिल शासकों, जालौर व मण्डोर के प्रतिहार शासकों और शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों को संरक्षण प्रदान कर आठवीं से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक इसे विकसित किया। 15वीं शताब्दी राजस्थान में मूर्तिकला के विकास का स्वर्णकाल था जिसका प्रतीक विजय स्तम्भ (चित्तौड़) की मूर्तियाँ है। सोलहवीं शताब्दी का प्रतिमा शिल्प प्रदर्शन जगदीश मंदिर उदयपुर में देखा जा सकता है। यद्यपि इसके पश्चात् भी मूर्तियाँ बनी किंतु उस शिल्प वैचिञ्य कुछ भी नहीं है किंतु अठाहरवीं शताब्दी के बाद परम्परावादी शिल्प में पाश्चात्य शैली के लक्षण हमें दिखलाई देने लगते हैं। इसके फलस्वरुप मानव मूर्ति का शिल्प का प्रादूर्भाव राजस्थान में हुआ।&lt;br /&gt;
====धातु मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
धातु मूर्ति कला को भी राजस्थान में प्रयाप्त प्रश्रय मिला। पूर्व मध्य, मध्य तथा उत्तरमध्य काल में जैन मूर्तियों का यहाँ बहुतायत में निर्माण हुआ। सिरोही ज़िले में वसूतगढ़ पिण्डवाड़ा नामक स्थान पर कई धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जिसमें शारदा की मूर्ति शिल्प की दृष्टि से द्रस्टव्य है। भरतपुर, जैसलमेर, उदयपुर के ज़िले इस तरह के उदाहरण से परिपूर्ण है। अठाहरवीं शताब्दी से मूर्तिकला ने शनै: शनै: एक उद्योग का रुप लेना शुरु कर दिया था। अत: इनमें कलात्मक शैलियों के स्थान पर व्यवसायिकृत स्वरुप झलकने लगा। इसी काल में चित्रकला के प्रति लोगों का रुझान दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gadisagar-Lake-Jaisalmer-2.jpg|thumb|[[गडसीसर जलाशय एवं टीला की पोल जैसलमेर|गडसीसर सरोवर]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Gadisagar Lake, Jaisalmer|left]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में यों तो अति प्राचीन काल से चित्रकला के प्रति लोगों में रुचि रही थी। मुकन्दरा की पहाड़ियों व अरावली पर्वत श्रेणियों में कुछ शैल चित्रों की खोज इसका प्रमाण है। कोटा के दक्षिण में चम्बल के किनारे, माधोपुर की चट्टानों से, आलनिया नदी से प्राप्त शैल चित्रों का जो ब्योरा मिलता है उससे लगता है कि यह चित्र बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा वातावरण प्रभावित, स्वाभाविक इच्छा से बनाए गए थे। इनमें मानव एवं जावनरों की आकृतियों का आधिक्य है। कुछ चित्र शिकार के कुछ यन्त्र-तन्त्र के रुप में ज्यामितिक आकार के लिए पूजा और टोना टोटका की दृष्टि से अंकित हैं। कोटा के जलवाड़ा गाँव के पास विलास नदी के कन्या दाह ताल से बैला, हाथी, घोड़ा सहित घुड़सवार एवं हाथी सवार के चित्र मिलें हैं। यह चित्र उस आदिम परम्परा को प्रकट करते हैं आज भी राजस्थान में 'मांडला' नामक लोक कला के रुप में घर की दीवारों तथा आंगन में बने हुए देखे जा सकते हैं। इस प्रकार इनमें आदिम लोक कला के दर्शन सहित तत्कालीन मानव की आन्तरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति सहज प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Desert-2.jpg|ऊँट सवारी, [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Safari, Jaisalmer|thumb]] &lt;br /&gt;
कालीबंगा और आहड़ की खुदाई से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों पर किया गया अलंकरण भी प्राचीनतम मानव की लोक कला का परिचय प्रदान करता है। ज्यामितिक आकारों में चौकोर, गोल, जालीदाल, घुमावदार, त्रिकोण तथा समानान्तर रेखाओं के अतिरिक्त काली व सफेद रेखाओं से फूल-पत्ती, पक्षी, खजूर, चौपड़ आदि का चित्रण बर्तनों पर पाया जाता है। उत्खनित-सभ्यता के पश्चात् मिट्टी पर किए जाने वाले लोक अलंकरण कुम्भकारों की कला में निरंतर प्राप्त होते रहते हैं किन्तु चित्रकला का चिन्ह ग्याहरवी शदी के पूर्व नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;
सर्वप्रथम वि.सं. 1117/1080 ई. के दो सचित्र ग्रंथ जैसलमेर के जैन भण्डार से प्राप्त होते हैं।  औघनिर्युक्ति और दसवैकालिक सूत्रचूर्णी नामक यह हस्तलिखित ग्रन्थ जैन दर्शन से सम्बन्धित है। इसी प्रकार ताड़ एवं भोज पत्र के ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए बनाये गए लकड़ी के पुस्तक आवरण पर की गई चित्रकारी भी हमें तत्कालीन काल के दृष्टान्त प्रदान करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी तक निर्मित ऐसी कई चित्र पट्टिकाएं हमें राजस्थान के जैन भण्डारों में उपलब्ध हैं। इन पर जैन साधुओं, वनस्पति, पशु-पक्षी, आदि चित्रित हैं। अजमेर, पाली तथा आबू ऐसे चित्रकारों के मुख्य केन्द्र थे। तत्पशात् आहड़ एवं चित्तौड़ में भी इस प्रकार के सचित्र ग्रंथ बनने आरम्भ हुए। 1260-1317 ई. में लिखा गया 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि' नामक ग्रन्थ मेवाड़ शैली (आहड़) का प्रथम उपलब्ध चिन्ह है, जिसके द्वारा राजस्थानी कला के विकास का अध्ययन कर सकते हैं। ग्याहरवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी तक के उपलब्ध सचित्र ग्रंथों में निशिथचूर्णि, त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र, नेमिनाथ चरित्र, कला सरित्सागर, कल्पसूत्र (1483/1426 ई.) कालक कथा, सुपासनाचरियम् (1485-1428 ई.) रसिकाष्टक (1435/1492 ई.) तथा गीत गोविन्द आदि हैं। 15वीं शदी तक मेवाड़ शैली की विशेषता में सवाचश्म्, गरुड़ नासिका, परवल की खड़ी फांक से नेत्र, घुमावदार व लम्बी उंगलियां, गुड्डिकार जनसमुदाय, चेहरों पर जकड़न, अलंकरण बाहुल्य, लाल-पीले रंग का अधिक प्रयोग कहे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Khwaja-Garib-Nawaz-Dargah.jpg|left|thumb|ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ की दरगाह, [[अजमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Khwaja Garib Nawaz Dargah, Ajmer]]&lt;br /&gt;
मेवाड़ के अनुरुप मारवाड़ में भी चित्रकला की परम्परा प्राचीन काल से पनपती रही थी। किंतु महाराणा मोकल से राणा सांगा (1421-1528 ई.) तक मेवाड़-मारवाड़ कला के राजनीतिक प्रभाव के फलस्वरुप साम्य दिखलाई होता है। राव मालदेव (1531-1462 ई.) ने पुन: मारवाड़ शैली को प्रश्य प्रदान कर चित्रकारों को इस ओर प्रेरित किया। इस शैली का उदाहरण 1591 ई. में चित्रित ग्रन्थ उत्तराध्ययन सूत्र है। मारवाड़ शैली के भित्तिचित्रों मे जोधपुर के चोखेला महल को छतों के अन्दर बने चित्र दृष्टव्य हैं। राजस्थान में मुग़ल प्रभाव के परिणाम स्वरुप सत्रहवीं शती से मुग़ल शैली और राजस्थान की परम्परागत राजपूत शैली के समन्वय ने कई प्रांतीय शेलियों को जन्म दिया, इनमें मेवाड़ और मारवाड़ के अतिरिक्त [[बूंदी]], [[कोटा]], [[जैसलमेर]], [[बीकानेर]], [[जयपुर]], [[किशनगढ़]] और [[नाथद्वारा]] शैली मुख्य है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
मुग़ल प्रभाव के फलत: चित्रों के विषय अन्त:पुर की रंगरेलियाँ, स्रियों के स्नान, होली के खेल, शिकार, बाग-बगीचे, घुड़सवारी, हाथी की सवारी आदि रहे। किन्तु इतिहास के पूरक स्रोत की दृष्चि से इनमें चित्रित समाज का अंकन एवं घटनाओं का चित्रण हमें सत्रहवीं से अठारहवी शताब्दी के अवलोकन की विस्तृत सामग्री प्रदान करता है। उदाहरणत: मारवाड़ शैली में उपलब्ध 'पंचतंत्र' तथा 'शुकनासिक चरित्र' में कुम्हार, धोबी, नाई, मजदूर, चिड़ीमार, लकड़हारा, भिश्ती, सुनार, सौदागर, पनिहारी, ग्वाला, माली, किसान आदि से सम्बन्धित जीवन-वृत का चित्रण मिलता है। किशनगढ़ शैली में [[राधा]] [[कृष्ण]] की प्रेमाभिव्यक्ति के चित्रण मिलते हैं। इस क्रम में बनीठनी का एकल चित्र प्रसिद्ध है। किशनगढ़ शैली में कद व चेहरा लम्बा नाक नुकीली बनाई जाती रही वही विस्तृत चित्रों में दरबारी जीवन की झाँकियों का समावेश भी दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:A-View-Of-The-City-Of-Alwar.jpg|	 [[अलवर]] शहर का एक दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt;A View of the city of Alwar|thumb]]&lt;br /&gt;
मुग़ल शैली का अधिकतम प्रभाव हमें जयपुर तथा अलवर के चित्रों में मिलता है। बारामासा, राग माला, भागवत आदि के चित्र इसके उदाहरण हैं। 1671 ई. से मेवाड़ में पुष्टि मार्ग से प्रभावित श्रीनाथ जी के धर्म स्थल नाथद्वारा की कलम का अलग महत्व है। यद्यपि यहाँ के चित्रों का विषय कृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित रहा है फिर भी जन-जीवन की अभिक्रियाओं का चित्रण भी हमें इनमें सहज दिख जाता  है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश प्रभाव के फलत: राजस्थान में पोट्रेट भी बनने शुरु हुए। यह पोट्रेट तत्कालीन रहन-सहन को अभिव्यक्त करने में इतिहास के अच्छे साधन हैं। चित्रकला के अन्तर्गत भित्ति चित्रों का आधिक्य हमें अठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से दिखलाई देता है, किन्तु इसके पूर्व भी मन्दिरों और राज प्रासादों में ऐसे चित्रांकन की परम्परा विद्यमान थी। चित्तौड़ के प्राचीन महलों में ऐसे भित्ति चित्र उपलब्ध हैं जो सौलहवीं सदी में बनाए गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्रहवीं शताब्दी के चित्रणों में मोजमाबाद (जयपुर), उदयपुर के महलों तथा अम्बामाता के मंदिर, नाडोल के जैन मंदिर, आमेर (जयपुर) के निकट मावदूमशाह की क़ब्र के मुख्य गुम्बद के चित्र, जूनागढ़ (बीकानेर), मारोठ के मान मन्दिर गिने जा सकते हैं। अठाहरवीं शताब्दी के चित्रणों में कृष्ण विलास (उदयपुर) आमेर महल की भोजनशाला, ग़लता के महल, पुण्डरीक जी की हवेली (जयपुर) सूरजमल की छतरी (भरतपुर), झालिम सिंह की हवेली (कोटा) और मोती महल (नाथद्वारा) के भित्ति चित्र मुख्य हैं। यह चित्र आलागीला पद्धति या टेम्परा से बनाए गए थे। शेख़ावटी, जैसलमेर एवं बीकानेर की हवेलियों में इस प्रकार के भित्ति चित्र अध्ययनार्थ अभी भी देखे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कपड़ो पर की जाने वाली कला में छपाई की चित्रकारी भी कला के इतिहास सहित इतिहास के अन्य अंगों पर प्रकाश डालने में समर्थ हो सकती है। यद्यपि वस्र रंगाई, छपाई, तथा कढ़ाई चित्रकला से प्रत्यक्ष सम्बन्धित नहीं हैं, किन्तु काल विशेष में अपनाई जाने वाली इस तकनीक, विद्या का अध्ययन कलागत तकनीकी इतिहास की उपादेय सामग्री बन सकती है। चाँदी और सोने की जरी का काम किए वस्र शामियाने, हाथी, घोड़े तथा बैल की झूले आदि इस अध्ययन के साधन हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer.jpg|left|thumb|[[पुष्कर झील]]&amp;lt;br /&amp;gt; Pushkar Lake]]&lt;br /&gt;
====धातु एवं काष्ठ कला====&lt;br /&gt;
इसके अन्तर्गत तोप, बन्दूक, तलवार, म्यान, छुरी, कटारी, आदि अस्र-शस्र भी इतिहास के स्रोत हैं। इनकी बनावट इन पर की गई खुदाई की कला के साथ-साथ इन पर प्राप्त सन् एवं अभिलेख हमें राजनीतिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी ही तोप का उदाहरण हमें जोधपुर दुर्ग में देखने को मिला जबकि राजस्थान के संग्रहालयों में अभिलेख वाली कई तलवारें प्रदर्शनार्थ भी रखी हुई हैं। पालकी, काठियाँ, बैलगाड़ी, रथ, लकड़ी की टेबल, कुर्सियाँ, कलमदान, सन्दूक आदि भी मनुष्य की अभिवृत्तियों का दिग्दर्शन कराने के साथ तत्कालीन कलाकारों के श्रम और दशाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने में हमारे लिए महत्वपूर्ण स्रोत सामग्री है।&lt;br /&gt;
====लोककला====&lt;br /&gt;
अन्तत: लोककला के अन्तर्गत वाद्य यंत्र, लोक संगीत और नाट्य का हवाला देना भी आवश्यक है। यह सभी सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहरें हैं जो इतिहास का अमूल्य अंग हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राजस्थान में लोगों का मनोरंजन का साधन लोक नाट्य व नृत्य रहे थे। रास-लीला जैसे नाट्यों के अतिरिक्त प्रदेश में ख्याल, रम्मत, रासधारी, नृत्य, भवाई, ढाला-मारु, तुर्रा-कलंगी या माच तथा आदिवासी गवरी या गौरी नृत्य नाट्य, घूमर, अग्नि नृत्य, कोटा का चकरी नृत्य, डीडवाणा पोकरण के तेराताली नृत्य, मारवाड़ की कच्ची घोड़ी का नृत्य, पाबूजी की फड़ तथा कठपुतली प्रदर्शन के नाम उल्लेखनीय हैं। पाबूजी की फड़ चित्रांकित पर्दे के सहारे प्रदर्शनात्मक विधि द्वारा गाया जाने वाला गेय-नाट्य है। लोक बादणें में नगाड़ा ढ़ोल-ढ़ोलक, मादल, रावण हत्था, पूंगी, बसली, सारंगी, तदूरा, तासा, थाली, झाँझ पत्तर तथा खड़ताल आदि हैं।&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A4%B0&amp;diff=41148</id>
		<title>अलवर</title>
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		<updated>2010-07-12T13:51:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=A-View-Of-The-City-Of-Alwar.jpg|thumb|अलवर शहर का एक दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt; A view of the city of Alwar&lt;br /&gt;
|विवरण=अलवर पूर्वोत्तर [[राजस्थान]] राज्य के पश्चिमोत्तर भारत में स्थित है।&lt;br /&gt;
|राज्य=राजस्थान&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[अलवर ज़िला]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=राजा [[शाल्व]] महाभारतकाल&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 27° 41' -  पूर्व -76° 6' &lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=यह शहर सड़क द्वारा [[आगरा]] से 150 किमी., [[दिल्ली]] से 164 किमी., [[सरिस्का अलवर|सरिस्का]] से 42 किमी., [[भरतपुर]] से 94 किमी., [[डीग भरतपुर|डीग]] से 61 किमी. और [[जयपुर]] से 143 किमी. दुरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=अरावली पर्वत श्रेणियों की तलहटी में बसा अलवर पूर्वी राजस्थान में '[[काश्मीर]]' नाम से जाना जाता है। &amp;lt;br /&amp;gt; अलवर की कलाकंद मिठाई प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=अक्टूबर से मार्च&lt;br /&gt;
|यातायात=&lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=निकट्टम हवाई अड्डा जयपुर और दिल्ली में स्थित है।&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=अलवर जंक्शन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=जनरल बस अड्डा &lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=&lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[सिटी पैलेस अलवर|सिटी पैलेस]], [[बाला क़िला अलवर|बाला क़िला]], [[फतहगंज का मक़बरा अलवर|फतहगंज का मक़बरा]], [[मोती डुंगरी अलवर|मोती डुंगरी]], सरिस्का, राजसमन्द झील, सिलीसेढ़ झील &lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=[[अलवर प्रवास]]&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{लेख सूची&lt;br /&gt;
|लेख का नाम=अलवर&lt;br /&gt;
|पर्यटन=अलवर पर्यटन&lt;br /&gt;
|ज़िला=अलवर ज़िला&lt;br /&gt;
|प्रवास=अलवर प्रवास&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
अलवर शहर, पूर्वोत्तर [[राजस्थान]] राज्य के पश्चिमोत्तर [[भारत]] में स्थित है। अलवर का क्षेत्र दक्षिण से उत्तर में लगभग 13 किमी. तथा पूर्व में लगभग 110 किमी तक फैला हुआ हैं। अलवर का प्राचीन नाम शाल्वपुर था। चारदीवारी और खाई से घिरे इस शहर में एक पर्वतश्रेणी की पृष्ठभूमि के सामने शंक्वाकार पहाड़ पर स्थित 'बाला क़िला' इसकी विशिष्टता है। 1775 में इसे अलवर रजवाड़े की राजधानी बनाया गया था। &lt;br /&gt;
अरावली पर्वत श्रेणियों की तलहटी में बसा अलवर पूर्वी राजस्थान में 'काश्मीर' नाम से जाना जाता है तथा पर्यटकों के लिए सदैव आकर्षण का केंद्र रहा है। [[दिल्ली]] के निकट होने के कारण यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे शामिल है। दिल्ली से क़रीब 100 मील दूर बसा राजस्थान का 'सिंहद्धार' अलवर ज़िला अपनी प्राकृतिक सुषमा के कारण अन्य ज़िलों से अपना अलग अस्तित्व बनाए हुए है। अलवर अरावली की पहाडियों के मध्य में बसा है। अलवर की सीमायें&lt;br /&gt;
*उत्तर एवं पूर्वोत्तर में [[हरियाणा]] गाँव के [[गुडगाँव]] ज़िले। &lt;br /&gt;
*पूर्व में राजस्थान का [[भरतपुर]] ज़िला।&lt;br /&gt;
*पश्चिम में [[जयपुर]]। &lt;br /&gt;
*दक्षिण में यह [[दौसा]] ज़िलों से लगती हैं। &lt;br /&gt;
*पश्चिमोत्तर में हरियाणा राज्य का [[महेन्द्रगढ़]] ज़िला इससे लगा हुआ है। अलवर ज़िले का मध्य भाग अरावली पहाडियों से घिरा हुआ हैं। अलवर जयपुर से 150 किमी दूर स्थित है।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
[[चित्र: Neemrana-Fort-Palace-Alwar-2.jpg|[[नीमराना फ़ोर्ट पैलेस]], अलवर&amp;lt;br /&amp;gt;  Neemrana Fort Palace, Alwar|thumb|left]]&lt;br /&gt;
किंवदंती के अनुसार महाभारतकालीन राजा [[शाल्व]] ने इसे बसाया था। अलवर शायद शाल्वपुर का अपभ्रंश है। [[महाभारत]] के अनुसार शाल्व ने जो मार्तिकावतक का राजा था तथा सौभ नामक अद्भुत विमान का स्वामी था, द्वारका पर आक्रमण किया था। मार्तिकावतक नगर की स्थिति अलवर के निकट ही मानी जा सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति का परचम फहराने वाले [[स्वामी विवेकानन्द]] अलवर में पहली बार वर्ष 1891 ई॰ में आए। अलवर आने के बाद अलवर के चिकित्सालय में कार्यरत बंगाली चिकित्सक से उनकी मुलाकत हुई और चिकित्सक ने बाद में उन्हें वर्तमान में मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में स्थित एक कोठरीनुमा कमरे में ठहरने के लिए जगह दी। यहाँ प्रवास के दौरान उनके कम्पनी बाग में उस मिट्टी के टीले पर प्रवचन होते थे जहाँ वर्तमान में [[छत्रपति शिवाजी महाराज|शिवाजी]] की मूर्ति है। इसी दौरान उनकी शहर के कई लोगों से पहचान हो गई थी। इसके बाद वे पैदल चलकर सरिस्का गए। स्वामी विवेकानंद अलवर में दो बार आए थे। पहली बार वे 28 फरवरी 1891 में अलवर आए और पूरे एक महीने तक यहाँ रहे तथा दूसरी बार में 1897 ई॰ में अलवर आए थे। यह यात्रा उन्होंने अमेरिका से वापस लौटने के बाद की थी।&lt;br /&gt;
==कृषि और खनिज==&lt;br /&gt;
अलवर एक कृषि विपणन और यातायात केंद्र है। यहाँ वस्त्र निर्माण, तिलहन तथा आटा मिलें एवं पेंट, वार्निश व मिट्टी के बर्तन बनाने के उद्योग स्थित हैं। &lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
अलवर में राजस्थान विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालय भी हैं।&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
===रेलमार्ग===&lt;br /&gt;
[[चित्र:Siliserh-Lake-Alwar.jpg|[[सिलीसेढ़ झील]], अलवर&amp;lt;br /&amp;gt; Siliserh Lake, Alwar|thumb]]&lt;br /&gt;
उत्तर-पश्चिमी रेलवे के दिल्ली-[[अहमदाबाद]] रेलमार्ग पर स्थित अलवर दिल्ली और जयपुर के लगभग मध्य में पडता है। राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर-8 अलवर ज़िले से होकर ही गुजरता है। सरिस्का से 37 किमी. दूर अलवर के नजदीकी रेलवे स्टेशन है। अलवर देश के प्रमुख रेलवे स्टेशनों से अनेक रेलगाड़ियों के माध्यम से जुड़ा हुआ है।&lt;br /&gt;
===सड़क मार्ग===&lt;br /&gt;
सरिस्का दिल्ली-अलवर-जयपुर हाइवे पर स्थित है। जयपुर से सरिस्का जाने के लिए डीलक्स और नॉन डीलक्स बसों की व्यवस्था है। इसके अलावा दिल्ली और राजस्थान के अन्य शहरों से नियमित हैं। अलवर जयपुर से 143 किमी. और दिल्ली से 164 किमी. दूरी पर स्थित है।&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
अलवर की कुल जनसंख्या (2001 की गणना के अनुसार) 2,60,245 है। अलवर के कुल ज़िले की जनसंख्या 29,90,862 है। &lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
{{main|अलवर पर्यटन}}&lt;br /&gt;
अलवर का राजस्थान के पर्यटन स्थलों में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। अलवर ऐतिहासिक इमारतों से भरा पड़ा है। नयनाभिराम सिलिसर्थ झील के किनारे स्थित महल में एक संग्रहालय है, जिसमें हिंदी, संस्कृत और फ़ारसी पांडुलिपियाँ तथा राजस्थानी व मुग़ल लघु चित्रों का संग्रह रखा गया है। अलवर के दर्शनीय स्थान- &lt;br /&gt;
[[चित्र: Neemrana-Fort-Palace-Alwar-1.jpg|[[नीमराना फ़ोर्ट पैलेस]], अलवर&amp;lt;br /&amp;gt;  Neemrana Fort Palace, Alwar|thumb|left]]&lt;br /&gt;
'''[[सिटी पैलेस अलवर|सिटी पैलेस]] :-''' सिटी पैलैस परिसर अलवर के पूर्वी छोर की शान है।  सिटी पैलैस के ऊपर अरावली की पहाड़ियाँ हैं, जिन पर बाला क़िला बना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''[[बाला क़िला अलवर|बाला क़िला]] :-''' बाला क़िले की दीवार पूरी पहाडी पर फैली हुई है जो हरे-भरे मैदानों से गुजरती है। पूरे अलवर शहर में यह सबसे पुरानी इमारत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''[[फतहगंज का मक़बरा अलवर|फतहगंज का मक़बरा]] :-''' अलवर में फतहगंज का मक़बरा 5 मंजिला है। ख़ूबसूरती के मामले में यह [[हुमायूँ]] के मक़बरे से भी सुन्दर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''[[मोती डुंगरी अलवर|मोती डुंगरी]] :-''' मोती डुंगरी का निर्माण वर्ष 1882 ई॰ में हुआ था। मोती डुंगरी को वर्ष 1928 ई॰ तक अलवर के शाही परिवारों का आवास रहा था। &lt;br /&gt;
'''[[सरिस्का अलवर|सरिस्का]] :-''' राजस्थान के अलवर ज़िले में अरावली की पहाड़ियों पर 800 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैला सरिस्का मुख्य रूप से वन्य जीव अभ्यारण्य और टाइगर रिजर्व के लिए प्रसिद्ध है। अलवर के सरिस्का की गिनती भारत के जाने माने वन्य जीव अभ्यारण्यों में की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;झील&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
'''राजसमन्द झील :-''' 7 किमी. लम्बी व 3 किमी. चौडी यह झील 55 फीट गहरी हैं। राजसमन्द झील की पाल, नौचौकी व इस ख़ूबसूरत झील के पाल पर बनी छतरियों की छतों, स्तम्भों तथा तोरण द्वार पर की गयी मूर्तिकला व नक्काशी देखकर स्वतः ही देलवाडा के [[जैन]] मंदिरों की याद आ जाती है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''सिलीसेढ़ झील :-''' सिलीसेढ़ झील एक प्राकृतिक झील है। सिलीसेढ़ झील सुंदर है तथा पर्यटन का मुख्य स्थल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://www.alwar.nic.in/homepage.htm अधिकारिक वेबसाइट]&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
[http://www.archive.org/details/gazetteerofulwur00powliala Gazetteer of Ulwur]&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान  के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]  &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>ओडिशा</title>
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		<updated>2010-04-03T15:34:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|स्थानीय भाषाओं में नाम=उडिया&lt;br /&gt;
|राजधानी=भुवनेश्वर&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=36,804,660&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=236&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=1,55,707&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=20°09′N 85°30′E&lt;br /&gt;
|ज़िले=30&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=भुवनेश्वर&lt;br /&gt;
|स्थापना=1 अप्रैल 1936&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=मुरलीधर चन्द्रकान्त भंडारे&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=नवीन पटनायक&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=147&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/03/30&lt;br /&gt;
|emblem=Orissa-Logo.gif&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[State::उड़ीसा]] / Orissa&lt;br /&gt;
उड़ीसा भारत  का एक प्रान्त है जो भारत के पूर्वी तट पर बसा है। उड़ीसा उत्तर में [[झारखण्ड]], उत्तर पूर्व में [[पश्चिम बंगाल]] दक्षिण में [[आंध्र प्रदेश]] और पश्चिम में [[छत्तीसगढ़]] से घिरा है तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी है। भौगोलिक लिहाज से इसके उत्तर में छोटा नागपुर का पठार है जो अपेक्षाकत कम उपजाऊ है लेकिन दक्षिण में महानदी, ब्राह्मणी, कालिंदी और वैतरणी नदियों का उपजाऊ मैदान है। यह पूरा क्षेत्र मुख्य रूप से चावल उत्पादक क्षेत्र है्।&lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
उड़ीसा राज्य प्राचीन समय में '[[कलिंग]]' के नाम से विख्यात था। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी (261 ई.पू.) में [[मौर्य]] सम्राट [[अशोक]] ने [[कलिंग]] विजय करने के लिए एक शक्तिशाली सेना भेजी थी, जिसका कलिंग के निवासियों ने जमकर सामना किया। सम्राट अशोक ने कलिंग तो जीता, परन्तु युद्ध के भीषण संहार से सम्राट का मन में वितृष्णा पैदा हो गई और अशोक की मृत्यु के बाद कलिंग फिर से स्वाधीन हो गया। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में [[खारवेल]] राजा के अधीन कलिंग एक शक्तिशाली साम्राज्य बन गया। खारवेल की मृत्यु के बाद उड़ीसा की ख्याति लुप्त हो गई। चौथी शताब्दी में विजय पर निकले [[समुद्रगुप्त]] ने उड़ीसा पर आक्रमण किया और इस प्रदेश के पांच राजाओं को पराजित किया। सन 610 में उड़ीसा पर शशांक नरेश का अधिकार हो गया। शशांक के निधन के बाद [[हर्षवर्धन]] ने उड़ीसा पर विजय प्राप्त की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवीं शताब्दी में उड़ीसा पर गंग वंश का शासन रहा। सन 795 मे महाशिवगुप्त यजाति द्वितीय ने उड़ीसा का शासन भार संभाला और उड़ीसा के इतिहास का सबसे गौरवशाली अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने कलिंग, कनगोडा, उत्कल और कोशल को मिलाकर खारवेल की भाँति विशाल साम्राज्य की नींव रखी। गंग वंश के शासकों के समय में उड़ीसा राज्य की बहुत उन्नति हुई। इस राजवंश के शासक राजा नरसिंह देव ने कोणार्क का विश्व भर में प्रसिद्ध सूर्य मंदिर बनवाया था। 16 वीं शताब्दी के लगभग मध्य से 1592 तक उड़ीसा  पांच मुस्लिम राजाओं द्वारा शासित रहा। सन 1592 में [[अकबर]] ने उड़ीसा को अपने अधीन कर अपने शासन में शामिल कर लिया। मुग़लों के पतन के पश्चात उड़ीसा पर मराठों का अधिकार रहा। सन 1803 में ब्रिटिश राज से पहले उड़ीसा मराठा शासकों के अधीन रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1 अप्रैल सन 1936 को उड़ीसा को स्वतंत्र प्रांत बनाया गया। स्वतंत्रता के बाद उड़ीसा तथा इसके आसपास की रियासतों ने भारत सरकार को अपनी सत्ता सौंप दी। रियासतों (गवर्नर के अधीन प्रांतों) के विलय संबंधी आदेश 1949 के अंतर्गत जनवरी 1949 में उड़ीसा की सभी रियासतों का उड़ीसा राज्य में सम्पूर्ण विलय हो गया। उड़ीसा के कलिंग, उत्कल और उद्र जैसे कई प्राचीन नाम हैं, परन्तु यह प्रदेश मुख्यत: भगवान जगन्नाथ की भूमि के लिए प्रसिद्ध है। भगवान जगन्नाथ उड़ीसा के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन से बहुत गहरे जुडे हुए हैं। विभिन्न समय में उड़ीसा के लोगों पर जैन, ईसाई और इस्लाम धर्मो का प्रभाव पडा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उड़ीसा भारत के उत्तर पूर्वी भाग में स्थित है। इसकी पूर्व दिशा में बंगाल की खाडी, उत्तर-पूर्व दिशा में [[पश्चिम बंगाल]], उत्तर दिशा में [[झारखण्ड]], पश्चिम दिशा में [[छत्तीसगढ़]] और दक्षिण दिशा में [[आंध्र प्रदेश]] है। राज्य को सामान्यत: चार भौगोलिक क्षेत्रों में बांटा जा सकता है। ये हैं - &lt;br /&gt;
#उत्तरी पठार, &lt;br /&gt;
#मध्य नदी थाला, &lt;br /&gt;
#पूर्वी पहाडियां और &lt;br /&gt;
#तटवर्ती मैदान।&lt;br /&gt;
==कृषि व्यवस्था==&lt;br /&gt;
राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे राज्य के कुल उत्पाद का 28 प्रतिशत प्राप्त होता है और  जनसंख्या का 65 प्रतिशत भाग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि कार्य में लगा हुआ है। चावल उड़ीसा की मुख्य फसल है। 2004 - 2005 में 65.37 लाख मी. टन चावल का उत्पादन हुआ। गन्ने की खेती भी किसान करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उच्च फसल उत्पादन प्रौद्योगिकी, समन्वित पोषक प्रबंधन और कीट प्रबंधन को अपनाकर कृषि का विस्तार किया जा रहा है। अलग -अलग फलों की 12.5 लाख और काजू की 10 लाख तथा सब्जियों की 2.5 लाख कलमें किसानों में वितरित की गई हैं। राज्य में प्याज की फसल को बढावा देने के लिए अच्छी किस्म की प्याज के 300 क्विंटल बीज बांटे गए हैं जिनसे 7,500 एकड जमीन प्याज उगायी जाएगी। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत  गुलाब, गुलदाऊदी और गेंदे के फूलों की 2,625 प्रदर्शनियां की गईं।  किसानों को  धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने के लिए उड़ीसा राज्य नागरिक आपूर्ति निगम लि. (पी ए सी), मार्कफेड, नाफेड आदि एजेंसियों के द्वारा 20 लाख मी. टन चावल खरीदने का लक्ष्य बनाया है। सूखे की आशंका से ग्रस्त क्षेत्रों में लघु जलाशय लिए 13 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में  2,413  लघु जलाशय विकसित करने का लक्ष्य है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
बडी, मंझोली और छोटी परियोजनाओं और जल दोहन परियोजनाओं से सिचांई क्षमता को बढाने का प्रयास किया गया है-  *वर्ष 2004 - 2005  तक  2,696 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की व्यवस्था पूर्ण की जा चुकी है। &lt;br /&gt;
*2005-06 के सत्र में 12,685 हेक्टेयर सिंचाई  की छह  सिंचाई परियोजनाओं को चिन्हित किया गया है जिसमें से चार योजनाएं लक्ष्य प्राप्त कर चुकी हैं। &lt;br /&gt;
*2005 - 2006 में उड़ीसा लिफ्ट सिंचाई निगम ने 'बीजू कृषक विकास योजना' के अंतर्गत 500 लिफ्ट सिंचाई पाइंट बनाये हैं और 1,200 हेक्टेयर की  सिंचाई क्षमता प्राप्त की है। &lt;br /&gt;
*2004 - 2005 में राज्य में बिजली की कुल उत्पादन क्षमता 4,845.34 मेगावाट थी तथा कुल स्रोतों से प्राप्त बिजली क्षमता 1,995.82 मेगावाट थी। &lt;br /&gt;
*मार्च 2005 तक राज्य के कुल  46,989  गांवों में  से 37,744 गांवों में बिजली पहुंचा दी गई है।&lt;br /&gt;
==उद्योग==&lt;br /&gt;
उद्योग प्रोत्साहन एवं निवेश निगम लि., औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड और उड़ीसा राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम ये तीन प्रमुख एजेंसियां राज्य के उद्योगों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है। इस्पात, एल्यूमीनियम, तेलशोधन, उर्वरक आदि  विशाल उद्योग लग रहे हैं। राज्य सरकार लघु, ग्रामीण और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए छूट देकर वित्तीय मदद दे रही है।  2004 - 2005 वर्ष में  83,075 लघु उद्योग इकाई स्थापित की गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
औद्योगिक विकास करने के लिए रोजगार के अवसर और आर्थिक विकास दर को बढाने के लिए उड़ीसा उद्योग (सुविधा) अधिनियम, 2004 को लागू किया है जिससे निवेश प्रस्तावों के कम समय में निबटारा और निरीक्षण कार्य हो सके। निवेश को सही दिशा में प्रयोग करने के लिए ढांचागत सुविधा में सुधार को  प्राथमिकता दी गई है। सूचना प्रौद्योगिकी में ढांचागत विकास करने के लिए [[भुवनेश्वर]] में एक निर्यात संवर्द्धन औद्योगिक पार्क स्थापित किया गया है। राज्य में लघु और मध्यम उद्योगों को बढाने के लिए  2005 - 2006 में  2,255 लघु उद्योग स्थापित किए गये, इन योजनाओं में 123.23 करोड़ रूपये का निवेश किया गया और लगभग 10,308 व्यक्तियों को काम मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रमिकों और उनके परिवार के सदस्यों को सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाएं दी गई हैं। उद्योगों में लगे बाल मजदूरों को मुक्त किया गया और औपचारिक शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना के अंतर्गत प्रवेश दिया गया। राज्य भर में 18 जिलों में 18 बालश्रमिक परियोजनाएं क्रियान्वित हैं। लगभग 33,843 बाल श्रमिकों को राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना द्वारा संचालित स्कूलों में प्रवेश दिलाया गया है और 64,885 बाल श्रमिकों को स्कूली शिक्षा के माध्यम से मुख्यधारा में जोडने का प्रयास किया गया। श्रमिकों को दिया जाने वाला न्यूनतम वेतन बढाया गया।&lt;br /&gt;
==सूचना प्रौद्योगिकी==&lt;br /&gt;
सूचना प्रौद्योगिक  में राज्य  में संतोष जनक प्रगति हो रही है। भुवनेश्वर की इन्फोसिटी में विकास केंद्र खोलने का प्रयास चल रहा है। उड़ीसा सरकार और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस तथा नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर ने संयुक्त रूप एक पारदर्शी और कुशल प्रणाली शुरू की है। राज्य मुख्यालय को  ज़िला मुख्यालयों, सब डिवीजन मुख्यालयों, ब्लाक मुख्यालयों से जोडने के लिए ई-गवर्नेंस पर आधारित क्षेत्र नेटवर्क से जोडा जा रहा है। उडिया भाषा को कंप्यूटर में लाने के लिए ‘भारतीय भाषाओं के लिए प्रौद्योगिकी विकास’ कार्यक्रम के अंतर्गत उडिया भाषा का पैकेज तैयार किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
राज्य के आर्थिक विकास में पर्यटन के महत्व को समझते हुए मीडिया प्रबंधन एजेंसियों और पर्व प्रबंधकों को प्रचार एवं प्रसार का कार्य दिया गया है। उड़ीसा को विभिन्न महत्वपूर्ण पर्यटन परिजनाओं - धौली में शांति पार्क, ललितगिरि, उदयगिरि तथा लांगुडी के बौद्ध स्थलों को ढांचागत विकास और पिपिली में पर्यटन विकास का काम किया जाएगा। (पुरी) भुवनेश्वर का एकाग्र उत्सव, कोणार्क का कोणार्क पर्व के मेलों और त्योहारों के विकास के लिए प्रयास किया जा रहा है। उड़ीसा पर्यटन विभाग ने बैंकाक, मास्को, लंदन, कुआलालंपुर, कोच्चि, कोलकाता, रायपुर आदि के भ्रमण व्यापार के आयोजनों में भाग लिया। पर्यटन क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन देने के लिए 373 मार्गदर्शकों (गाइडों) को प्रशिक्षण दिया गया।&lt;br /&gt;
==मत्स्य पालन और पशु संसाधन विकास==&lt;br /&gt;
राज्य की कृषि नीति में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकी का प्रयोग करते हुए, दूध, मछली और मांस उत्पादन के विकास को विशेष रूप से विकसित करने का प्रयास करके कुल दुग्ध उत्पादन 36 लाख लीटर प्रतिदिन  अर्थात 3 लाख लीटर से अधिक तक पहुँचा दिया गया है। डेयरी उत्पादन के विकास के लिए उड़ीसा दुग्ध फेडरेशनमें राज्य के सभी 30 जिलों को सम्मिलित गया है। फेडरेशन ने दुग्ध संरक्षण को बढाकर 2.70 लाख लीटर प्रतिदिन तक कर दिया है। ‘स्टैप’ कार्यक्रम के तहत फेडरेशन द्वारा 17 जिलों में ‘महिला डेयरी परियोजना’ चल रही है। राज्य में 837 महिला डेयरी सहकारी समितियां हैं, जिनमें 60,287 महिलाएं कार्यरत हैं।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
राज्य में विकास दर बढाने के लिए परिवहन की अनेक योजनाओं को क्रियान्वित किया जा रहा है-&lt;br /&gt;
==सडकें== &lt;br /&gt;
*2004 - 05 तक राज्य में  सडकों की कुल लंबाई 2,37,332 कि.मी. थी। इसमें राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई 3,595 कि.मी., एक्सप्रेस राजमार्गों की कुल लंबाई 29 किलोमीटर, राजकीय राजमार्गों की कुल लंबाई  5,102 कि.मी. ज़िला मुख्य सड़कों की कुल लंबाई 3,189 कि.मी., अन्य ज़िला सड़कों की कुल लंबाई 6,334 कि.मी. और  ग्रामीण सड़कों की कुल लंबाई 27,882 कि.मी. है। पंचायत समिति सड़कों  की कुल लंबाई 1,39,942 कि.मी. और 88 कि.मी. ग्रिडको सड़कें हैं।&lt;br /&gt;
==रेलवे==&lt;br /&gt;
31 मार्च 2004 तक  राज्य में  2,287 किलोमीटर लंबी बडी रेल लाइनें और 91 किलोमीटर छोटी लाइनें थी।&lt;br /&gt;
==उड्डयन==&lt;br /&gt;
भुवनेश्वर में हवाई अड्डे का आधुनिकीकरण का कार्य हो रहा है। यहां से [[दिल्ली]], [[कोलकाता]], [[चेन्नई]], [[नागपुर]] और [[हैदराबाद]] के लिए सीधी उड़ानें हैं। इस समय राज्य भर में 13 हवाई पट्टियां और 16 हेलीपैड की व्यवस्था है।&lt;br /&gt;
==बंदरगाह==&lt;br /&gt;
पारादीप राज्य का एक मात्र मुख्य बंदरगाह है। गोपालपुर को पूरे साल काम करने वाले बंदरगाह के रूप में विकसित करने का कार्य प्रगति पर है।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
प्रमुख पर्यटन स्थलों मे &lt;br /&gt;
*सूर्य मंदिर, कोणार्क &lt;br /&gt;
*राज्य की राजधानी भुवनेश्वर लिंगराज मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
*पुरी का जगन्नाथ मंदिर और &lt;br /&gt;
*सुंदर पुरी तट सुविख्यात हैं। &lt;br /&gt;
*राज्य के अन्य प्रसिद्ध पर्यटन केंद्र हैं कोणार्क, नंदनकानन, चिलका झील, धौली बौद्ध मंदिर, उदयगिरि-खंडगिरि की प्राचीन गुफाएं, रत्नगिरि, ललितगिरि और उदयगिरि के बौद्ध भित्तिचित्र और गुफाएं, सप्तसज्या का मनोरम पहाडी दृश्य, सिमिलिपाल राष्ट्रीय उद्यान तथा बाघ परियोजना, हीराकुंड बांध, दुदुमा जलप्रपात, उषाकोठी वन्य जीव अभयारण्य, गोपानपुर समुद्री तट, हरिशंकर, नृसिंहनाथ, तारातारिणी, तप्तापानी, भितरकणिका, भीमकुंड कपिलाश आदि स्थान प्रसिध्द हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{उड़ीसा के ज़िले}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राज्य_और_केन्द्र_शासित_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
	</entry>
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		<title>प्रयोग:Janmejay2</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[उड़ीसा]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>ओडिशा</title>
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		<updated>2010-04-03T15:10:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: 'asdeasd' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;asdeasd&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>गंग वंश</title>
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		<updated>2010-04-03T14:30:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;big&amp;gt;गंग वंश / Gang Vansh&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
पश्चिमी गंग वंश का 250 से लगभग 1004 ई. तक [[मैसूर]] राज्य (गंगवाडी) पर शासन था।  पूर्वी गंग वंश ने 1028 से 1434-35 ई. तक कलिंग पर शासन किया। इस नाम के भारत में  दो अलग-अलग, लेकिन दूर के संबंधी राजवंश थे। पश्चिमी गंग वंश के प्रथम शासक, [[कोंगानिवर्मन]], ने अपने विजय अभिमानों से राज्य की स्थापना की, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों [[माधव]]  और [[हरिवर्मन]] ने पल्लवों, चालुक्यों और कंदबों के साथ वैवाहिक और सैनिक समझौतों से अपने प्रभाव क्षेत्रों में वृद्धि की। आठवीं शताब्दी के अंत में एक पारिवारिक विवाद ने गंग वंश को कमजोर कर दिया, लेकिन बूतुंग द्वितीय (लगभग 937-960) ने [[तुंगभद्रा नदी|तुंगभद्रा]] और [[कृष्णा नदी|कृष्णा]] नदियों के बीच व्यापक क्षेत्र पर राज्य कायम किया। उनका राज्य तलकाड (राजधानी) से वातापी तक फैला हुआ था। चोलों के बार- बार आक्रमण ने गंगवाडी और उनकी राजधानी के बीच संबंध विच्छेद कर दिया और लगभग 1004 ई.  में चोल राजा विष्णुवर्द्धन के क़ब्ज़े में चला गया। &lt;br /&gt;
==धर्म और कला==&lt;br /&gt;
पूर्वी गंग वंश धर्म और कला का महान संरक्षक था और उसके शासनकाल में निर्मित मंदिर हिंदू वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। पश्चिमी गंग वंश के अधिकांश लोग [[जैन धर्म]] के अनुयायी थे, लेकिन कुछ लोगों ने ब्राह्मणवादी [[हिंदू धर्म]] को भी प्रश्रय दिया था। उन्होंने कन्नड़ भाषा में विद्वत्तापूर्ण शैक्षिक कार्यो को बढ़ाया दिया, कुछ उल्लेखनीय मंदिर बनवाए, जंगल साफ़ कर खेती योग्य ज़मीन तैयार करवाई और सिंचाई तथा अंतर्प्रायद्वीपीय व्यापार को बढ़ावा दिया।&lt;br /&gt;
==अंतर्विवाह==&lt;br /&gt;
पूर्वी गंग वंशों में अंतर्विवाह की शुरुआत हुई और उन्होंने ऐसे समय में चोलों और चालुक्य वंशों को चुनौती देना आरंभ किया, जब पश्चिमी गंग यह सब छोड़ने पर विवश हो चुके थे। &lt;br /&gt;
==आरंभिक वंश==&lt;br /&gt;
पूर्वी गंगों का आरंभिक वंश आठवीं शताब्दी से [[उड़ीसा]] में सत्तासीन था; लेकिन वज्रास्त III , जिन्होंने 1028 में त्रिकलिंगाधिपति (तीन कलिंगों का शासक) की उपाधि धारण की थी, शायद ये पहले शासक थे, जिन्होंने [[कलिंग]] के तीनों हिस्सों पर एक साथ शासन किया। उनके पुत्र राजराज प्रथम ने चालों और पूर्वी चालुक्यों पर आक्रमण किया  और चोल राजकुमारी राजसुंदरी से विवाह करके अपनी सत्ता मज़बूत की। उनके पुत्र अनंतवर्मन कोडगंगदेव का शासन उत्तर में [[गंगा नदी|गंगा]]  के उद्गम स्थल से लेकर दक्षिण में [[गोदावरी नदी|गोदावरी]] के उद्गम स्थल तक फैला हुआ था; उन्होंने 11वीं शताब्दी के अंत में [[पुरी]] में  विशाल [[जगन्नाथ मंदिर]] का निर्माण आरंभ करवाया । &lt;br /&gt;
==आक्रमण==&lt;br /&gt;
====1206 में आक्रमण====&lt;br /&gt;
राजराज III ने 1198 में गद्दी संभाली। उन्होंने 1206 में उड़ीसा पर आक्रमण करने वाले [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] के मुसलमानों का विरोध नहीं किया, लेकिन उनके पुत्र अनंगभीम III ने मुसलमानों को पीछे हटाकर [[भुवनेश्वर]] में मेघेश्वर मंदिर की स्थापना की। &lt;br /&gt;
====1243 में आक्रमण====&lt;br /&gt;
अनंगभीम के पुत्र  नरसिंह I ने 1243 में दक्षिण बंगाल के मुसलमान शासक को हराकर उनकी राजधानी (गौडा) पर क़ब्जा कर लिया और विजय स्मारक के रूप में [[कोणार्क]] में [[सूर्य मंदिर]] बनवाया। 1264 में नरसिंह की मृत्यु के साथ ही पूर्वी गंग वंश का पतन शुरु हो गया। &lt;br /&gt;
====1324 में आक्रमण====&lt;br /&gt;
1324 में [[दिल्ली]] के सुल्तान ने उड़ीसा पर आक्रमण कर दिया और 1356 में विजयनगर ने उड़ीसा के राजाओं को पराजित कर दिया। &lt;br /&gt;
==अंतिम शासक==&lt;br /&gt;
गंग वंश के  अंतिम प्रसिद्ध शासक IV ने 1425 तक शासन किया। उनके उत्तराधिकारी ‘पागल राजा’  भानुदेव IV के बारे में कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। उनके मंत्री कपिलेंद्र ने उन्हें सत्ताच्युत करके 1434-35 में सूर्य वंश की नींव रखी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<updated>2010-03-30T11:41:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;graphviz&amp;gt;&lt;br /&gt;
digraph G {&lt;br /&gt;
size =&amp;quot;18,16&amp;quot;;&lt;br /&gt;
कृष्ण [shape=box];&lt;br /&gt;
pain [shape=box];&lt;br /&gt;
main -&amp;gt; pain;&lt;br /&gt;
main -&amp;gt; parse [weight=8];&lt;br /&gt;
parse -&amp;gt; execute;&lt;br /&gt;
main -&amp;gt; init [style=dotted];&lt;br /&gt;
main -&amp;gt; cleanup;&lt;br /&gt;
execute -&amp;gt; { make_string; printf}&lt;br /&gt;
init -&amp;gt; make_string;&lt;br /&gt;
edge [color=blue]; // die folgenden Pfeile in blau&lt;br /&gt;
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parse -&amp;gt; execute;&lt;br /&gt;
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main -&amp;gt; cleanup;&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
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		<title>प्रयोग:Janmejay2</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: /* हिरण्याक्ष / Hiranyaksh */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==हिरण्याक्ष / Hiranyaksh==&lt;br /&gt;
*हिरण्याक्ष अपनी शक्ति पर बहुत गर्व करता था। वह पहले तो स्वर्ग में घूमता रहा। उसके विशाल शरीर और गदा को देखकर कोई भी उससे युद्ध करने सामने नहीं आया। युद्ध की पिपासा से आतुर वह समुद्र में विचरण करने लगा। &lt;br /&gt;
*[[वरुण]] ने उसे [[विष्णु]] को [[वराह]] के रूप में दाढ़ी की नोंक पर टिकाकर पृथ्वी को समुद्र के ऊपर ले जाते देखा तो वह परिहास के स्वर में वराह के लिए ‘जंगली’ इत्यादि विशेषणों का प्रयोग करके उनसे बार-बार पृथ्वी को छोड़ देने के लिए कहने लगा। &lt;br /&gt;
*[[पृथ्वी]] के लिए बैर बांधकर यज्ञमूर्ति वराह तथा हिरण्याक्ष में गदा-युद्ध होने लगा। [[ब्रह्मा]] ने [[विष्णु]] से कहा कि हिरण्याक्ष ब्रह्मा से वर प्राप्त होने के कारण विशेष शक्तिशाली है। &lt;br /&gt;
*हिरण्याक्ष ने आसुरी मायाजाल का प्रसार किया। वराह ने उस माया को नष्ट कर अपने पैर से प्रहार किया। हिरण्याक्ष ने वराह के मुख का दर्शन करते-करते शरीर त्याग दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद् भागवत, तृतीय स्कंध, अध्याय 17-19&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
हरि वंश पुराण, भविष्यपर्व,38, 39|-&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: /* हिरण्याक्ष / Hiranyaksh */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==हिरण्याक्ष / Hiranyaksh==&lt;br /&gt;
*हिरण्याक्ष अपनी शक्ति पर बहुत गर्व करता था। वह पहले तो स्वर्ग में घूमता रहा। उसके विशाल शरीर और गदा को देखकर कोई भी उससे युद्ध करने सामने नहीं आया। युद्ध की पिपासा से आतुर वह समुद्र में विचरण करने लगा। &lt;br /&gt;
*[[वरुण]] ने उसे [[विष्णु]] को वराह के रूप में दाढ़ी की नोंक पर टिकाकर पृथ्वी को समुद्र के ऊपर ले जाते देखा तो वह परिहास के स्वर में वराह के लिए ‘जंगली’ इत्यादि विशेषणों का प्रयोग करके उनसे बार-बार पृथ्वी को छोड़ देने के लिए कहने लगा। &lt;br /&gt;
*[[पृथ्वी]] के लिए बैर बांधकर यज्ञमूर्ति वराह तथा हिरण्याक्ष में गदा-युद्ध होने लगा। [[ब्रह्मा]] ने [[विष्णु]] से कहा कि हिरण्याक्ष ब्रह्मा से वर प्राप्त होने के कारण विशेष शक्तिशाली है। &lt;br /&gt;
*हिरण्याक्ष ने आसुरी मायाजाल का प्रसार किया। वराह ने उस माया को नष्ट कर अपने पैर से प्रहार किया। हिरण्याक्ष ने वराह के मुख का दर्शन करते-करते शरीर त्याग दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद् भागवत, तृतीय स्कंध, अध्याय 17-19&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
हरि वंश पुराण, भविष्यपर्व,38, 39|-&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
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		<title>प्राकृत</title>
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		<updated>2010-03-30T10:18:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: /* प्राकृत भाषा / Prakrit Dialect */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
==प्राकृत भाषा / Prakrit Dialect==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राकृत भाषा भारतीय आर्यभाषा का एक प्राचीन रूप है। इसके प्रयोग का समय 500 ई॰पू0 से 1000 ई॰ सन तक माना जाता है। धार्मिक कारणों से जब [[संस्कृत]] का महत्व कम होने लगा तो प्राकृत भाषा अधिक व्यवहार में आने लगी। इसके चार रूप विशेषत: उल्लेखनीय हैं। &lt;br /&gt;
#अर्धमागधी प्राकृत- इसमें [[जैन]] और [[बौद्ध]] साहित्य अधिक है। इसका मुख्य क्षेत्र [[मगध]] था। &lt;br /&gt;
#पैशाची प्राकृत- इसका क्षेत्र देश का पश्चिमोत्तर भाग था और विद्वान कश्मीरी आदि भाषा को इसकी उत्तराधिकारी भाषा मानते हैं।  &lt;br /&gt;
#महाराष्ट्री प्राकृत- यह व्यापक रूप से प्रचलित थी और [[महाराष्ट्र]] में फैली होने के कारण इस नाम से पहिचानी जाती थी। &lt;br /&gt;
#शौरसेनी प्राकृत- इसका क्षेत्र [[मथुरा]] और मध्य प्रदेश का आँचल था। इस भाषा में अनेक ग्रंथ रचे गए जिनमें जैन धर्मग्रंथों की संख्या अधिक हैं संस्कृत के प्राचीन नाटकों में भी स्त्री पात्रों और जनसामान्य के संवादों के लिए प्राकृत भाषा का ही प्रयोग हुआ है। मध्यदेशी भाषा ही बाद में शौरसेनी प्राकृत का क्षेत्र बनी। प्राचीन 'शूरसेन' जनपद के नाम पर इसका नामकरण किया गया। मथुरा इसका केन्द्र था। इसी क्षेत्र में शौरसेनी का कालान्तर में विकास अर्वाचीन लोकव्यापी [[ब्रजभाषा]] के रूप में हुआ। शौरसेनी न केवल अपने क्षेत्र की व्यापक भाषा थी, वरन अन्य प्राकृतों के भाषा-क्षेत्रों को भी इसने यथेष्ट रूप में प्रभावित किया तथा कई उत्तर और पश्चिमोत्तर भाषाओं के उद्भव में सहायता की। इस क्षेत्र में अधिक राजनीतिक उथल-पुथल होने के कारण इसका साहित्य उपलब्ध नहीं होता। केवल संस्कृत नाटकों तथा जैन धर्म के ग्रन्थों में यह सुरक्षित मिलती है। वरूचि तथा [[हेमचन्द्र]] ने इसकी विशेषताओं का विस्तृत परिचय दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]]  &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>साँचा:गीता2</title>
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		<updated>2010-03-30T10:14:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;bottomtemplate&amp;quot;&lt;br /&gt;
! '''[[गीता]]'''&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[गीता कर्म जिज्ञासा]] | [[गीता कर्म योग]]&lt;br /&gt;
|}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>सूरजमल और जवाहर सिंह</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A4%B2_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9&amp;diff=8436"/>
		<updated>2010-03-30T09:51:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==सूरजमल==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
कुम्हेर का घेरा उठ जाने से सूरजमल को कुछ चैन मिला जिसकी उसे बहुत आवश्यकता थी। उसके साधन लगभग समाप्ति की सीमा तक पहुँच गए थे। प्रशासनिक, वित्तीय तथा सैनिक स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए उसे कुछ देर विश्राम की आवश्यकता थी। [[दिल्ली]] की दशा जितनी आम तौर पर हुआ करती थी, उससे भी अधिक बिगड़ी हुई थी। इससे सूरजमल को मराठों से समझौता करके छोटे-मोटे लाभ उठाने का मौक़ा मिल गया। वह इस बात के लिए राज़ी हो गया कि वह उत्तर भारत के मराठों के कार्यों का विरोध नहीं करेगा और उत्तर भारत में उनके बार-बार होने वाले धावों में बाधा नहीं डालेगा। रघुनाथ ने सूरजमल को छूट दे दी कि वह [[आगरा]] प्रान्त के अधिकांश प्रदेश पर क़ब्जा कर ले। यह प्रदेश अब तक मराठों के पास था सूरजमल और [[जवाहर सिंह]] ने पलवल पर अधिकार कर लिया, बल्लभगढ़ वापस ले लिया और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मार्च, 1756 में अलवर को अपने नियन्त्रण में ले लिया। परन्तु अब सब काम निर्विघ्न, शान्ति से नहीं चल रहा था। अब एक नए व्यक्ति ने साम्राज्य के मामलों में प्रवेश किया, जो बाद में बहुत भयावह पुरुष सिद्ध हुआ। वह था-अफ़गान रूहेला नजीब़ ख़ाँ। सूरजमल को इस नवागन्तुक की उपस्थिति का अनुभव तुरन्त ही करना पड़ गया। जून, 1755 में नजीब़ ख़ाँ नए वज़ीर–इमाद-उल-मुल्क के आदेश पर उन इलाक़ो को वापस लेने के लिए निकला, जिन पर [[गंगा]]–[[यमुना]] के दोआब में सूरजमल ने क़ब्जा कर लिया था। चूँकि दोनो पक्षों में से कोई भी लम्बे सैनिक संग्राम के लिए उत्सुक नहीं था, इसलिए राजकीय भूमि के दीवान नागरमल ने एक सन्धि की रूपरेखा तैयार की। यह दोनों में से किसी भी पक्ष के लिए पूरी तरह सन्तोषजनक नहीं था। इस 'डासना की सन्धि' की शर्तें निम्न थीं– &lt;br /&gt;
#अलीगढ़ ज़िले में सूरजमल ने जिन ज़मीनों पर दख़ल किया हुआ है, वे उसी के पास रहेंगी। &lt;br /&gt;
#इन ज़मीनों पर स्थायी राजस्व छब्बीस लाख रूपए तय हुआ, जिसमें से अठारह लाख रूपए उन जागीरों के नक़द मुआवज़े के कम किए जाने थे, जो अहमदशाह के शासन-काल में खोजा जाविद ख़ाँ ने सूरजमल के नाम कर दी थीं, परन्तु उन दिनों की निरन्तर अशान्ति के कारण जिन्हें बाक़ायदा हस्तान्तिरित नहीं किया जा सका था। &lt;br /&gt;
#सूरजमल सिकन्दराबाद के क़िले और ज़िले को ख़ाली कर देगा, जो मराठों ने उसे दे दिया था। &lt;br /&gt;
#बाक़ी आठ लाख रूपयों में से, जो शाही राजकोष को मिलने थे, सूरजमल दो लाख रूपए डासना-सन्धि पर हस्ताक्षर करते समय और बाक़ी छह लाख एक साल के अन्दर चुका देगा। 'डासना की सन्धि' बेलाग विजय तो नहीं थी, परन्तु इसे बड़ी पराजय भी नहीं कहा जा सकता। कहा जा सकता है कि जोड़ बराबरी पर छूटा, जिसमें सारे समय जाटों का पलड़ा भारी रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ठाकुर बदनसिंह का निधन==&lt;br /&gt;
भगवान की माया सचमुच विचित्र है। अब तक सूरजमल का भाग्य-नक्षत्र ज़ोरों से दमकता रहा था और जाटों के आकाश को अपनी दीप्ति से जगमगाता रहा था। अचानक ही दो दुखद घटनाओं ने उसके जीवन को अन्धकारमय कर दिया। पहले तो उसके पिता ठाकुर बदनसिंह का जून, 1756 में डीग में स्वर्गवास हो गया। यह अन्त बहुत अप्रत्यशित नहीं था, क्योंकि वृद्ध ठाकुर का स्वास्थ बहुत समय से गिरता जा रहा था। वह बिलकुल अन्धे हो चुके थे और अपने महल में ही रहते थे। यहाँ तक कि [[गोवर्धन]], [[वृन्दावन]] और [[गोकुल]] के मन्दिरों में भी उनका जाना बहुत कम हो गया था। जब तक वह जीवित थे, तब तक सूरजमल उत्साहपूर्वक अपने काम में जुटा रह सकता था और अपने भविष्य का निर्माण कर सकता था। अगर कोई काम बिगड़ने लगे, तो वह तुरन्त अपने पिता के पास जा सकता था और वह समस्या का सही हल निकाल देते। उनकी मृत्यु से सूरजमल की चिन्ताएँ, बोझ और ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गई। अब वह वैधानिक तथा वास्तविक–दोनों रूपों के एक विशाल एवं सामारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य का शासक था। इस राज्य को उसके पिता ने, जो किसी भी दृष्टि से देखने पर एक अत्यन्त सत्वशाली पुरुष थे, बिलकुल शून्य में से गढ़कर तैयार किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जवाहर सिंह का विद्रोह== &lt;br /&gt;
अभी वह अपने पिता की मृत्यु के शोक से उबर भी नहीं पाया था कि उसके पुत्र जवाहरसिंह ने विद्रोह का झंडा खड़ा करके उस पर मर्मान्तक आघात किया। पिता के विरूद्ध [[जवाहर सिंह]] के विद्रोह का वर्णन करने के पहले सूरजमल के घरेलू मामलों की चर्चा कर देना उपयोगी होगा, क्योंकि इनका उन झगड़े पर बहुत प्रभाव रहा, जो बढ़ते-बढ़ते चिन्ताजनक सीमा तक जा पहुँचा और उसकी शाखा-प्रशाखाएँ दूर-दूर तक फैल गई। &lt;br /&gt;
*फ़िलिप मेसन भारतीय सेना की सहाहना करते हुए अपने इतिहास में लिखता है- 'उत्तरकालीन मुग़ल सम्राटों के किसी पुत्र के लिए विद्रोह बहुत कुछ वैसा ही था, जैसा कि किसी निर्वाचन–क्षेत्र को पटाना। इससे महत्वाकांक्षा प्रकट होती थी, साथियों की परख हो जाती थी, अनुभव प्राप्त हो जाता था और इससे सिंहासन तक पहुँचने का मार्ग भी साफ़ हो सकता था।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;फ़िलिप मेसन, 'ए मैटर आफ़ आनर,' पृ.92&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
विद्रोह का रोग संक्रामक था। अफ़गान, राजपूत, मराठे, सिख और जाट भी इससे ग्रस्त हो गए थे, लेकिन इससे उनका कुछ भी भला नहीं हुआ। विद्रोह कर बैठना एक बात है और उसे सफल बना पाना बिलकुल दूसरी बात । इस विशिष्ट मनोरंजन में हताहतों का अनुपात कुछ अधिक ही रहता है। यद्यपि इस विषय में निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता, फिर भी किंवदन्ती है कि राजा सूरजमल की चौदह पत्नियाँ थी, जिनमें सबसे प्रसिद्ध दो हैं– &lt;br /&gt;
*रानी हँसिया और &lt;br /&gt;
*रानी किशोरी। रानी हँसिया सलीमपुर कलाँ की थी और रानी किशोरी होडल की, उसका पिता चौधरी काशीराम वहाँ का काफ़ी प्रभावशाली और धनी व्यक्ति था। विवाह को राजनीतिक साधन बनाने में सूरजमल अपने पिता के चरण-चिन्हों पर चला था। रानी हँसिया का पुत्र नाहरसिंह था, जो अच्छा आदमी नहीं था और यह एक रहस्य ही है कि सूरजमल ने उसे अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार भी क्यों किया। तीसरी पत्नी थी गंगा, जिसके दो पुत्र थे– जवाहरसिंह और रतन सिंह। &lt;br /&gt;
*ठाकुर गंगासिह ने अपने ग्रन्थ 'यदुवंश' में लिखा है कि रानी गंगा चौहान राजपूत थी, परन्तु अन्य लेखकों का कथन है कि गोरी राजपूत थी। &lt;br /&gt;
*कर्नल टाड के इस कथन के समर्थन में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि जवाहरिसंह एक कुर्मी (निम्न जाति) महिला का पुत्र था । परन्तु यह विचार-विमर्श निरर्थक है और हमें इस पर देर तक अटकने की आवश्यकता नहीं है। रानी कावरिया और रानी खेतकुमारी ने क्रमशः नवलसिंह और रणजीतसिंह को जन्म दिया। रानी किशोरी के कोई सन्तान नहीं था, उसने [[जवाहर सिंह]] को गोद ले लिया। जवाहर सिंह के साथ अन्य चार भाईयों की कोई बराबरी थी ही नहीं। उसमें गुण तो थे, परन्तु उसके स्वभाव के दोष उन गुणों की अपेक्षा कहीं अधिक थे। वह क्रोधी स्वभाव का था और धैर्य तथा शान्तिपूर्ण लगन के मूल्य को नही समझ पाया था। अनियन्त्रित महत्वाकांक्षा विनाश का कारण बनती है  जवाहर सिंह में साहस इतना अधिक था कि दोष की सीमा एक पहुँच गया था। अपनी झोंक में आकर वह औंरो की बुद्धिमत्ता की अवहेलना कर देता था। वह ख़ुशामद से रीझ जाता था और आलोचना ज़रा भी नहीं सह सकता था। उसे यह ग़लतफ़हमी थी कि जो लोग नरमी से काम लेते हैं, वे यश और धन अर्जित नहीं कर पाते। उसमें न तो अपने पिता की-सी निष्कपट भावना थी, न सतर्क समझदारी। जवाहर सिंह के निरन्तर चिड़चिडे़पन के फलस्परूप पहले मतभेद और उसके बाद विद्रोह होना अवश्यंभावी था। छोटी-छोटी बातों पर छोटे-छोटे मतभेद प्रायः बड़े संघर्षों का कारण बन जाते हैं । किसी ज्ञानी पुरुष ने कहा है – 'जो धनुष झुक सकता है, उसका बाण बहुत दूर जाता है।' जवाहरसिंह झुक ही नहीं सकता था।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
कलह का आरम्भ तब हुआ, जब सूरजमल ने जवाहर सिंह की नितन्तर बढ़ती धन की माँगों को पूरा करने में आनाकानी की। सूरजमल धन के विषय में सावधान था, परन्तु उसका पुत्र नहीं। जवाहरसिंह का रहन-सहन ऐसा था कि आय और व्यय में कहीं दूर तक का कोई सम्बन्ध जोड़ने की गुंजाइश नहीं थी। सूरजमल अपने ऊपर बहुत कम ख़र्च करता था और अपने विचार से उसने अपने निरन्तर माँग करते रहने वाले पुत्र के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था की हुई थी। जैसा कि सदा होता है, ख़ुशामदी लोगों और दरबारियों ने झगड़ा खड़ा किया। जवाहर ने अपने आसपास ऐसे युवक समान्तों का एक झुंड जमा कर लिया था जो उसकी दुर्बलताओं का लाभ उठाते थे, और उसे उकसाते रहते थे। जवाहर सिंह अपने पिता के साथ कई सफल अभियानों पर गया था और [[दिल्ली]] में सम्राट के दरबार और [[जयपुर]] के दरबार में भी जा चुका था। उसे कोई कारण दिखाई न पड़ता था कि वह– हिन्दुस्तान के सबसे धनी और सबसे सशक्त कहे जा सकने वाले शासक का पुत्र, क्यों कम ठाठ-बाट से रहे या उसे किसी भी चीज़ की कमी क्यों रहे। सूरजमल को फ़िजूलख़र्ची बिलकुल पसन्द नहीं थी, वह उसे समझाता – बुझाता भी था, परन्तु जवाहर पर उसका कोई असर नहीं होता था। जवाहर को खुश करने के लिए उसने उसे [[डीग]] का क़िलेदार (कमांडेंट) बना दिया। इस पद और स्थान–दोनों के जीवन में समझदारी का स्थान नहीं के बराबर था। उसके पिता ने उसे सलाह दी कि अच्छे साथियों की संगति में रहे, परन्तु उसके उस पर ध्यान नहीं दिया। अनिवार्यतः भरतपुर-दरबार गुटों में बँट गया। राजकुमारों में भी वैसी ही फूट थी, जैसी कि दरबारियों में और 'एक-दूसरे के प्रति उनकी भावना भाईचारे की नहीं, अपितु भ्रातृघात की थी।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गुटबंदी==&lt;br /&gt;
अनेक गुट के नेता वयोवृद्ध बलराम और मोहनराम थे। &lt;br /&gt;
*इनमें से पहला बलराम सूरजमल का साला और सेना का अध्यक्ष तथा भरतपुर का राज्यपाल था। &lt;br /&gt;
*मोहनराम वित्त तथा राजकीय तोपख़ाने का अध्यक्ष था। वे और जवाहर एक-दूसरे की फूटी आँखों देख नहीं सकते थे। वे दोनों प्रभावशाली पुरुष थे, जिनकी बात सूरजमल और रानी हँसिया सुनते और मानते थे। युवक सामन्त इस वृद्ध गुट की गतिविधियों को पसन्द नहीं करते थे और वे जवाहरसिंह की ओर आकर्षित हो गए। इनमें ठाकुर रतनसिंह, ठाकुर अजीतसिंह, राजकुमार रतनसिंह और रानी गंगा भी सम्मिलित थी।&lt;br /&gt;
*तीसरे गुट की नेता थी रानी किशोरी। इसका सबसे प्रमुख सदस्य था– रूपराम कटारिया। उसके पिता और पुत्र में मेल करा देने की भरसक चेष्टा की, परन्तु विफल रहा। एक और सक्रिय सामन्त था, गाड़ोली गाँव का सरदार ठाकुर सभाराम। वह धनी था और समय-समय पर जवाहर सिंह को बड़ी-बड़ी धन-राशियाँ भेंट देता रहता था। एक बार सभाराम ने जवाहर सिंह को सात लाख रूपए दिए। जब राजा सूरजमल ने उसे डाँटा कि इस प्रकार वह जवाहर की आदत बिगाड़ देगा, तब सभारात ने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया–'चिड़ियों के पानी पीने से तालाब ख़ाली नहीं होता। मेरे पास बहुत रूपया है। फिर, मैं तो उसे अपना भतीजा मानता हूँ।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उत्तराधिकार का विवाद==&lt;br /&gt;
ठाकुर बदनसिंह की मृत्यु के बाद स्थिति पराकाष्ठा पर पहुँच गई। अपने जीवन में पहली बार सूरजमल ने कच्ची बाज़ी खेली और यह इशारा दिया कि उसका उत्तराधिकारी नारहसिंह बनेगा। 'सूरजमल ने यह ठीक ही भाँप लिया था कि उसका पुत्र (जवाहर) जाटों का विनाश का कारण बनेगा।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बैंदेल 'और्म की पांडुलिपि'&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; अपने पिता का यह निर्णय जवाहरसिंह को एकदम अमान्य था और उसने बिना कुछ हायतौबा मचाए स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। इसके लिए बढ़ावा उसके साथी युवक समान्तों ने दिया। जब सूरजमल ने जवाहर सिंह को होश में लाने के सब शान्तिपूर्ण उपाय आज़माकर देख लिए और कोई लाभ न हुआ, तब उसके सम्मुख इसके सिवाय कोई विकल्प ही न रहा कि वह अपने विद्रोही पुत्र पर चढ़ाई कर दे । जवाहर सिंह ने दिखा दिया कि वह भी मिट्टी का लौंदा नहीं है। उसके कड़ा प्रतिरोध किया। उसने डीग के क़िले से बाहर निकलकर सूरजमल की सेना पर आक्रमण किया। 'शहर के परकोटे के नीचे जमकर लड़ाई हुई। जिन बदमाशों ने जवाहर सिंह को इस दुष्कर्म के लिए भड़काया था, उन्हें पीछे धकेल दिया गया। परन्तु जवाहर सिंह झपटकर वहाँ जा पहुँचा जहाँ घनघोर युद्ध हो रहा था और असाधारण वीरतापूर्वक लड़ने लगा। उसे एक तलवार लगी, एक बर्छा लगा और बन्दूक की एक गोली उसके पेट के निचले भाग में लगी और पार हो गई। वह बुरी तरह घायल हो गया। अपने पुत्र के घावों को देखकर सूरजमल को उससे भी अधिक व्यथा हुई, जितनी कि [[डीग]] के विनाश से हुई थी। वह बदहवास होकर अपने पुत्र को उन लोगों के हाथो से छीन लेने के झपटा, जो उसके सब निषेधों और चीख़-पुकार की परवार न करते हुए उसका मलीदा बनाए दे रहे थे।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वैंदेल, और्म की पांडुलिपि।&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; घावों को भरने में बहुत समय लगा और जवाहरसिंह के अंग कभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए। वह जीवन-भर लँगड़ता रहा।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
यहाँ तक तो फ़ादर वैंदेल का विवरण प्रामाणिक जान पड़ता है, परन्तु इससे आगे उसकी उर्वर कल्पना ऊँची उड़ान भरने लगती है। वह कहता है 'यद्यपि यह बिलकुल सत्य है कि जवाहरसिंह इस अप्रिय कार्य में कुछ तो अपने स्वभाव के कारण और कुछ अपने साथियों की सलाह के कारण फँसा था, फिर भी यह सत्य है कि उसका पिता सूरजमल उससे अधिक टोका-टाकी करता था उसकी कंजूसी के कारण जवाहरसिंह स्वयं को गरीब अनुभव करता था। इस कारण और जवाहरसिंह को उसके वीरतापूर्ण कार्यों के लिए धन देते रहने वाले लोगो की दुष्टता के कारण जवाहरसिंह अन्त में वह हिंसात्तमक क़दम उठाने के लिए विवश हो गया था, जिसके लिए उसे उचित ही धिक्कारा गया है। उन दोनों में मनमुटाव का एक और भी कारण था। अपनी मृत्यु से पूर्व बदनसिंह ने युवक जवाहरसिंह को (जो उसे बहुत प्रिय था और जिसे वह औरों से अधिक पसन्द करता था) एक कागज़ का पुर्ज़ा दिया था। यह समझा जाता था कि इसमें एक बहुत बड़े, छिपाकर रखे गए ख़जाने की जानकारी दी गई थी। सूरजमल कागज़ के इस पुर्जे़ को प्राप्त करने के लिए बैचेन था। जो बात मैं सुनाने लगा हूँ, वह इसलिए बहुत अधिक सम्भव जान पड़ती है, क्योंकि सभी भरोसे-योग्य लोगों ने, निरपवाद रूपसे मुझे इसकी सत्यता का विश्वास दिलाया है। प्रतीत होता है कि उसी दिन और उसी समय, जबकि सूरजमल के सामने ही जवाहरसिंह के घावों की मरहम-पट्टी हो रही थी, जवाहरसिंह  से कई बार पूछा-बाबा ने जो कागज का पुर्ज़ा दिया था, वह कहाँ रखा है। इस पर जवाहरसिंह ने सिर दूसरी ओर फेर लिया और हाथ से इशारा किया, जिससे सूरजमल के लोभी स्वभाव के प्रति अरूचि प्रकट होती थी, जो ऐसी दशा में अपनी आँखों के सामने मरते हुए पुत्र की अपेक्षा उस ख़ज़ाने के लिए अधिक चिन्तित जान पड़ता था।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वैंदेल, और्म की पांडुलिपि।&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; यह वर्णन न केवल काल्पनिक है, अपितु बेहूदगी की सीमा तक जा पहुँचा है। क्या हम यह कल्पना कर सकते है कि सूरजमल एक ओर तो अपने पुत्र की जीवन-रक्षा के लिए प्रार्थना कर रहा हो और दूसरी ओर अपने मृतप्राय पुत्र से बदनसिंह के उस पुर्ज़े को माँग रहा हो, जिसका कभी कोई अस्तित्व था ही नहीं। और वह भी सब लोगों के सामने । इतना ही बेहूदा यह सुझाव भी है कि बदनसिंह कोई रहस्य जवाहरसिंह को तो बताने को तैयार था, किन्तु सूरजमल को नहीं, जो पिछले बीस वर्षों से राज्य का वास्तविक शासक था। यह बात सोची भी नहीं जा सकती है कि सूरजमल के पिता ने उसे विश्वासपात्र न माना हो। अतः हम बैंदेल के कथन को अमान्य कर सकते हैं, वैसे ही जैसे कि हमें उसके इस आरोप को करना होगा कि सूरजमल बदनसिंह का पुत्र नहीं था। इस विषय में तो विवाद ही नहीं है कि इस उग्र तथा दुखद कलह से पिता और पुत्र के आपसी सम्बन्धों में कटुता आ गई। सूरजमल को भविष्य के विषय में आशंका होने लगी। इस बात का कोई भरोसा नहीं था कि उसकी मृत्यु के उपरान्त उसके पुत्रों में भ्रातृघात युद्ध न होगा। जवाहरसिंह को लड़ने से आनन्द आता था। यह ऐसा भविष्य नहीं था, जिसे सोचकर सूरजमल को आनन्द हो सकता। उसे पता था कि बलराम और मोहनराम जवाहरसिंह को अपना शासक स्वीकार नहीं करेंगे। आवश्यकता हुई तो वे लड़कर इसका फ़ैसला करेंगे। अन्ततोगत्वा विजेता कोई न होगा और उससे हानि जाट-राष्ट्र को पहुँचेगी। &lt;br /&gt;
*कानूनगो का कथन है कि जवाहरसिंह अपने लोगों को समझ नहीं पाया था, जबकि उसका पिता समझता था– 'जवाहर अभिजात-वर्गीय होने का दिखावा करता था और अपने निकटतम सम्बन्धियों तथा रिश्तेदारों को यह जताए बिना न रहता था कि वह अपने कुल के कारण उनसे बड़ा है और उन पर शासन करने का हक़दार है। हर-एक जाट को यही बात सबसे बुरी लगती है वह अफ़गानों की तरह किसी भी झूठी दावेदार को उसके मुँह पर यह कहते नहीं डरता कि 'तू ऐसा क्या है, जो मैं नहीं हूँ, तू ऐसा क्या बन जाएगा, जो मैं नहीं बनूँगा।' इसके अलावा, इस राजकुमार का चरित्र भी ऐसा था कि उससे अन्य लोगो में विश्वास बिलकुल उत्पन्न नहीं होता था।&amp;quot;&amp;lt;balloon title=&amp;quot;के.आर.कानूनगो, 'हिस्ट्री आफ द जाट्स' पृ.165&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;  	&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
सूरजमल की सभी आंशकाएँ आगे चलकर सत्य सिद्ध हुई। जवाहरसिंह ने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात ठीक वही कुछ किया जिसकी उसके पिता को आंशका थी। उसके पिता और दादा ने इतने कठिन परिश्रम से जो कुछ जीता और जमा किया था, उस सबको प्रायः गँवाते और नष्ट करते उसे ज़रा देर नहीं लगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>साँचा:सूचना बक्सा राज्य</title>
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		<title>साँचा:सूचना बक्सा राज्य</title>
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		<title>साँचा:सूचना बक्सा राज्य</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=7977"/>
		<updated>2010-03-29T16:56:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: &lt;/p&gt;
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		<title>साँचा:सूचना बक्सा राज्य</title>
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		<updated>2010-03-29T16:54:11Z</updated>

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		<title>Property:Female Literacy</title>
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		<updated>2010-03-29T16:53:39Z</updated>

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		<author><name>BharatDiscovery</name></author>
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		<title>Property:Male Literacy</title>
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		<updated>2010-03-29T16:52:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;BharatDiscovery: Property:Male का नाम बदलकर Property:Male Literacy कर दिया गया है&lt;/p&gt;
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		<title>साँचा:सूचना बक्सा राज्य</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=7972"/>
		<updated>2010-03-29T16:50:10Z</updated>

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