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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
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		<title>लक्ष्मण काशीनाथ किर्लोस्कर</title>
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		<updated>2011-06-02T15:19:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: Adding category :Category:चरित कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
लक्ष्मण काशीनाथ किर्लोस्कर (जन्म- [[20 जून]], [[1869]] ई., बेलगाँव ज़िला, [[मैसूर]]; मृत्यु- [[26 सितम्बर]], [[1956]] ई.) प्रसिद्ध किर्लोस्कर उद्योग समूह के संस्थापक थे। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
लक्ष्मण काशीनाथ किर्लोस्कर का जन्म 20 जून, 1869 ई. को मैसूर के निकट बेलगाँव ज़िले में हुआ था। बचपन मे पढ़ने में मन न लगने के कारण वे [[मुम्बई]] के जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में भर्ती हो गए। परन्तु शीघ्र ही उन्होंने अनुभव किया कि आँखों में खराबी के कारण वे [[रंग|रंगों]] को सही से पहचान नहीं पाते हैं। इसके बाद उन्होंने मैकेनिकल ड्राइंग सीखी और मुम्बई के विक्टोरिया जुबली टेक्निकल इंस्टीट्यूट में अध्यापक नियुक्त हो गए। वे अपने खाली समय में कारख़ाने में जाकर काम किया करते थे। इससे उनको मशीनों की जानकारी हो गई।&lt;br /&gt;
==व्यवसाय==&lt;br /&gt;
किर्लोस्कर ने जीवन में पहली बार एक व्यक्ति को साइकिल चलाते हुए देखा, तो अपने भाई के साथ मिलकर ‘किर्लोस्कर ब्रदर्स’ नाम से साइकिल की दुकान खोल ली। वे अतिरिक्त समय में साइकिल बेचते, उनकी मरम्मत करते और लोगों को साइकिल चलाना भी सिखाते। नौकरी में जब उनके स्थान पर एक एंग्लों इण्डियन को पदोन्नति दे दी गई तो किर्लोस्कर ने अध्यापक का पद त्याग दिया और छोटा-सा कारख़ाना खोलकर चारा काटने की मशीन और लोहे के हल बनाने लगे। इसी बीच बेलगाँव नगर पालिका के प्रतिबन्धों के कारण उन्हें अपना कारख़ाना [[महाराष्ट्र]] लाना पड़ा। यहाँ 32 एकड़ भूमि में उन्होंने ‘किर्लोस्कर वाड़ी’ नाम की औद्यागिक बस्ती की नींव डाली। इस वीरान जगह की शीघ्र ही काया पलट गई और किर्लोस्कर की औद्योगिक इकाइयाँ [[बंगलौर]], [[पूना]], देवास ([[मध्य प्रदेश]]) आदि में भी स्थापित हो गईं। इनमें खेती और उद्योगों में काम आने वाले विविध उपकरण बनने लगे। किर्लोस्कर के प्रयत्नों के [[लोकमान्य तिलक]], [[जवाहर लाल नेहरू|नेहरूजी]], [[मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया|विश्वेश्वरय्या]], चक्रवर्ती राजगोपालाचारी आदि सभी प्रशंसक थे। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
लक्ष्मण काशीनाथ किर्लोस्कर का 26 सितम्बर, 1956 ई. में देहान्त हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:उद्योगपति और व्यापारी]][[Category:वाणिज्य व्यापार कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=167426</id>
		<title>रैदास</title>
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		<updated>2011-06-02T15:16:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Ravidas.jpg|thumb|200px|रैदास]]&lt;br /&gt;
मध्ययुगीन संतों में रैदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। संत रैदास [[कबीर]] के समसामयिक कहे जाते हैं। अत: इनका समय सन 1388 से 1518 ई. (1445 से 1575 ई.) के आस पास का रहा होगा। अंत: साक्ष्य के आधार पर रैदास का चर्मकार जाति का होना सिद्ध होता है - &lt;br /&gt;
'नीचे से प्रभु आँच कियो है कह रैदास चमारा' संत रविदास [[काशी]] के रहने वाले थे। इन्हें [[रामानन्द]] का शिष्य माना जाता है परंतु अंत:साक्ष्य के किसी भी स्रोत से रैदास का रामानन्द का शिष्य होना सिद्ध नहीं होता। इनके अतिरिक्त रैदास की कबीर से भी भेंट की अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं परंतु उनकी प्रामाणिकता सन्दिग्ध है। नाभादास कृत 'भक्तमाल'&amp;lt;ref&amp;gt;भक्तमाल पृष्ठ सं. पृ.452&amp;lt;/ref&amp;gt; में रैदास के स्वभाव और उनकी चारित्रिक उच्चता का प्रतिपादन मिलता है। प्रियादास कृत 'भक्तमाल' की टीका के अनुसार [[चित्तौड़]] की 'झालारानी' उनकी शिष्या थीं, जो [[राणा साँगा|महाराणा सांगा]] की पत्नी थीं। इस दृष्टि से रैदास का समय सन 1482-1527 ई. (सं. 1539-1584 वि.) अर्थात विक्रम की सोलहवीं शती के अंत तक चला जाता है। कुछ लोगों का अनुमान कि यह चित्तौड़ की रानी [[मीराबाई]] ही थीं और उन्होंने रैदास का शिष्यत्व ग्रहण किया था। मीरा ने अपने अनेक पदों में रैदास का गुरु रूप में स्मरण किया है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी। &lt;br /&gt;
सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली।'&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
रैदास ने अपने पूर्ववर्ती और समसामायिक भक्तों के सम्बन्ध में लिखा है। उनके निर्देश से ज्ञात होता है कि कबीर की मृत्यु उनके सामने ही हो गयी थी। रैदास की अवस्था 120 वर्ष की मानी जाती है।&amp;lt;ref name='hsk&amp;quot;&amp;gt;हिंदी साहित्य कोश, भाग दो, पृष्ठ सं. 539&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
मध्ययुगीन संतों में प्रसिद्ध रैदास के जन्म के संबंध में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। कुछ विद्वान [[काशी]] में जन्मे रैदास का समय 1482-1527 ई. के बीच मानते हैं। रैदास का जन्म [[काशी]] में चर्मकार कुल में हुआ था।  उनके पिता का नाम 'रग्घु' और माता का नाम 'घुरविनिया' बताया जाता है।  रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था।  जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वह अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे।&lt;br /&gt;
==व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
रैदास के समय में स्वामी [[रामानन्द]] काशी के बहुत प्रसिद्ध प्रतिष्ठित सन्त थे।  रैदास उनकी शिष्य-मण्डली के महत्वपूर्ण सदस्य थे। प्रारम्भ में ही रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था।  साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष सुख का अनुभव होता था।  वह उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे।  उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे।  कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया।  रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे। कहते हैं, ये अनपढ़ थे, किंतु संत-साहित्य के ग्रंथों और गुरु-ग्रंथ साहब में इनके पद पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
;वचनबद्धता&lt;br /&gt;
उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का ज्ञान मिलता है।  एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग [[गंगा नदी|गंगा]]-स्नान के लिए जा रहे थे।  रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, 'गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को आज ही जूते बनाकर देने का मैंने वचन दे रखा है।  यदि आज मैं जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा।  गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है।  मन सही है तो इस [[कठौती]] के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है।' कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही [[कहावत लोकोक्ति मुहावरे|कहावत]] प्रचलित हो गयी कि - 'मन चंगा तो कठौती में गंगा।'&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिल जुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया। वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे।  उनका विश्वास था कि [[राम]], [[कृष्ण]], करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। [[वेद]], [[क़ुरान]], [[पुराण]] आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।&lt;br /&gt;
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित - भावना तथा सदव्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है।  अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया।  अपने एक भजन में उन्होंने कहा है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।&lt;br /&gt;
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय [[हाथी]] शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की 'पिपीलिका' &amp;lt;ref&amp;gt;चींटी&amp;lt;/ref&amp;gt; इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है।  इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।&lt;br /&gt;
;सत्संग&lt;br /&gt;
शैशवावस्था से ही सत्संग के प्रति उनमें तीव्र अभिरूचि थी। अत: ''रामजानकी'' की मूर्ति बनाकर पूजन करने लगे थे। पिता ने किसी कारणवश उन्हे अपने से अलग कर दिया था और वे घर के पिछवाड़े छप्पर डालकर रहने लगे। ये परम संतोषी और उदार व्यक्ति थे। वे अपने बनाये हुये जूते बहुधा साधु-सन्तो में बांट दिया करते थे। इनकी विरक्ति के सम्बन्ध में एक प्रसंग मिलता है कि एक बार किसी महात्मा ने उन्हे 'पारस' पत्थर दिया जिसका उपयोग भी उसने बता दिया। पहले तो सन्त रैदास ने उसे लेना ही अस्वीकार कर दिया। किन्तु बार - बार आग्रह करने पर उन्होने ग्रहण कर लिया और अपने छप्पर में खोंस देने के लिये कहा। तेरह दिन के बाद लौटकर उक्त साधु ने जब पारस पत्थर के बारे में पूछा तो संत रैदास का उत्तर था कि जहां रखा होगा, वहीं से उठा लो और सचमुच वह पारस पत्थर वहीं पड़ा मिला।&amp;lt;ref name='hsk&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
;सत्य&lt;br /&gt;
सन्त रैदास ने सत्य को अनुपम और अनिवर्चनीय कहा है। वह सर्वत्र एक रस है। जिस प्रकार जल में तरंगे है उसी प्रकार सारा विश्व उसमें लक्षित होता है। वह नित्य, निराकार तथा सबके भीतर विद्यमान है। सत्य का अनुभव करने के लिये साधक को संसार के प्रति अनासक्त होना पड़ेगा। संत रैदास के अनुसार प्रेममूलक भक्ति के लिये अहंकार की निवृत्ति आवश्यक है। भक्ति और अहंकार एक साथ संभव नही है। जब तक साधक अपने साध्य के चरणो में अपना सर्वस्व अर्पण नही करता तब तक उसे लक्ष्य की सिध्दि नही हो सकती। &lt;br /&gt;
;साधना  &lt;br /&gt;
सन्त रैदास मध्ययुगीन इतिहास के संक्रमण काल में हए थे। ब्राह्मणों की पैशाविक मनोवृत्ति से दलित और उपेक्षित पशुवत जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य थे। यह सब उनकी मानसिकता को उद्वेलित करता था। सन्त रैदास की समन्वयवादी चेतना इसी का परिणाम है। उनकी स्वानुभूतिमयी चेतना ने भारतीय समाज में जागृति का संचार किया और उनके मौलिक चिन्तन ने शोषित और उपेक्षित [[शूद्र|शूद्रो]] में आत्मविश्वास का संचार किया। परिणामत: वह ब्राह्मणवाद की प्रभुता के सामने साहसपूर्वक अपने अस्तित्व की घोषणा करने में सक्षम हो गये। सन्त रैदास ने मानवता की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। सन्त रैदास के मन में [[इस्लाम]] के लिए भी आस्था का समान भाव था। [[कबीर]] की वाणी में जहाँ आक्रोश की अभिव्यक्ति है, वहीं दूसरी ओर सन्त रैदास की रचनात्मक दृष्टि दोनो धर्मो को समान भाव से मानवता के मंच पर लाती है। सन्त रैदास वस्तुत: मानव धर्म के संस्थापक थे।&lt;br /&gt;
;धर्म&lt;br /&gt;
वर्णाश्रम धर्म को समूल नष्ट करने का संकल्प, कुल और जाति की श्रेष्ठता की मिथ्या सिध्दि सन्त रैदास द्वारा अपनाये गये समन्वयवादी मानवधर्म का ही एक अंग है जिसे उन्होनें मानवतावादी समाज के रूप में संकल्पित किया था।&lt;br /&gt;
जन्म जात मत पूछिये , का जात अरू पात।&lt;br /&gt;
रविदास पूत सभ प्रभ के कोउ नहि जात कुजात॥&lt;br /&gt;
;भक्ति&lt;br /&gt;
[[उपनिषद|उपनिषदों]] से लेकर [[नारद|महर्षि नारद]] और शाण्डिल्य ने भक्ति तत्व की अनेक प्रकार से व्याख्या की है। रैदास ने भक्ति में रागात्मिका वृत्ति को ही महत्व दिया है। नाम मार्ग और प्रेम भक्ति उनकी अष्टांग साधना में ही है। रैदास की अष्टांग साधना पध्दति उनकी स्वतंत्र व स्वछंद चेतना का प्रवाह है। यह साधना पूर्णत: मौलिक है।&lt;br /&gt;
==समाज पर प्रभाव==&lt;br /&gt;
रैदास की वाणी, भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उनकी शिक्षाओं का श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे। उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये।  कहा जाता है कि [[मीराबाई]] उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'वर्णाश्र अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।&lt;br /&gt;
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
रैदास अनपढ़ कहे जाते हैं। संत-मत के विभिन्न संग्रहों में उनकी रचनाएँ संकलित मिलती हैं। [[राजस्थान]] में हस्तलिखित ग्रंथों में रूप में भी उनकी रचनाएँ मिलती हैं। रैदास की रचनाओं का एक संग्रह 'बेलवेडियर प्रेस', [[प्रयाग]] से प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त इनके बहुत से पद 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी संकलित मिलते हैं। यद्यपि दोनों प्रकार के पदों की [[भाषा]] में बहुत अंतर है तथापि प्राचीनता के कारण 'गुरु ग्रंथ साहब' में संगृहीत पदों को प्रमाणिक मानते में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। रैदास के कुछ पदों पर [[अरबी भाषा|अरबी]] और [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। रैदास के अनपढ़ और विदेशी भाषाओं से अनभिज्ञ होने के कारण ऐसे पदों की प्रामाणिकता में सन्देह होने लगता है। अत: रैदास के पदों पर अरबी-फ़ारसी के प्रभाव का अधिक संभाव्य कारण उनका लोकप्रचलित होना ही प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महत्व== &lt;br /&gt;
आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।  उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है।  विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं।  इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्याधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। संत कवि रैदास उन महान सन्तों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है। गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी रैदास उच्च-कोटि के विरक्त संत थे। उन्होंने ज्ञान-भक्ति का ऊंचा पद प्राप्त किया था। उन्होंने समता और सदाचार पर बहुत बल दिया। वे खंडन-मंडन में विश्वास नहीं करते थे। सत्य को शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना ही उनका ध्येय था। रैदास का प्रभाव आज भी [[भारत]] में दूर-दूर तक फैला हुआ है। '''इस मत के अनुयायी रैदासी या रविदासी कहलाते हैं।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रैदास की विचारधारा और सिद्धांतों को संत-मत की परम्परा के अनुरूप ही पाते हैं। उनका सत्यपूर्ण ज्ञान में विश्वास था। उन्होंने भक्ति के लिए परम वैराग्य अनिवार्य माना जाता है। परम तत्त्व सत्य है, जो अनिवर्चनीय है - 'यह परमतत्त्व एकरस है तथा जड़ और चेतन में समान रूप से अनुस्यूत है। वह अक्षर और अविनश्वर है और जीवात्मा के रूप में प्रत्येक जीव में अवस्थित है। संत रैदास की साधनापद्धति का क्रमिक विवेचन नहीं मिलता है। जहाँ-तहाँ प्रसंगवश संकेतों के रूप में वह प्राप्त होती है।' विवेचकों ने रैदास की साधना में 'अष्टांग' योग आदि को खोज निकाला है। संत रैदास अपने समय के प्रसिद्ध महात्मा थे। कबीर ने संतनि में रविदास संत' कहकर उनका महत्त्व स्वीकार किया इसके अतिरिक्त नाभादास, प्रियादास, मीराबाई आदि ने रैदास का ससम्मान स्मरण किया है। संत रैदास ने एक पंथ भी चलाया, जो रैदासी पंथ के नाम से प्रसिद्ध है। इस मत के अनुयायी [[पंजाब]], [[गुजरात]], [[उत्तर प्रदेश]] आदि में पाये जाते हैं। &amp;lt;ref name='hsk&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भक्ति काल]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=167425</id>
		<title>रैदास</title>
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		<updated>2011-06-02T15:10:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* रचनाएँ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Ravidas.jpg|thumb|200px|रैदास]]&lt;br /&gt;
मध्ययुगीन संतों में रैदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। संत रैदास [[कबीर]] के समसामयिक कहे जाते हैं। अत: इनका समय सन 1388 से 1518 ई. (1445 से 1575 ई.) के आस पास का रहा होगा। अंत: साक्ष्य के आधार पर रैदास का चर्मकार जाति का होना सिद्ध होता है - &lt;br /&gt;
'नीचे से प्रभु आँच कियो है कह रैदास चमारा' संत रविदास [[काशी]] के रहने वाले थे। इन्हें [[रामानन्द]] का शिष्य माना जाता है परंतु अंत:साक्ष्य के किसी भी स्रोत से रैदास का रामानन्द का शिष्य होना सिद्ध नहीं होता। इनके अतिरिक्त रैदास की कबीर से भी भेंट की अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं परंतु उनकी प्रामाणिकता सन्दिग्ध है। नाभादास कृत 'भक्तमाल'&amp;lt;ref&amp;gt;भक्तमाल पृष्ठ सं. पृ.452&amp;lt;/ref&amp;gt; में रैदास के स्वभाव और उनकी चारित्रिक उच्चता का प्रतिपादन मिलता है। प्रियादास कृत 'भक्तमाल' की टीका के अनुसार [[चित्तौड़]] की 'झालारानी' उनकी शिष्या थीं, जो [[राणा साँगा|महाराणा सांगा]] की पत्नी थीं। इस दृष्टि से रैदास का समय सन 1482-1527 ई. (सं. 1539-1584 वि.) अर्थात विक्रम की सोलहवीं शती के अंत तक चला जाता है। कुछ लोगों का अनुमान कि यह चित्तौड़ की रानी [[मीराबाई]] ही थीं और उन्होंने रैदास का शिष्यत्व ग्रहण किया था। मीरा ने अपने अनेक पदों में रैदास का गुरु रूप में स्मरण किया है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी। &lt;br /&gt;
सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली।'&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
रैदास ने अपने पूर्ववर्ती और समसामायिक भक्तों के सम्बन्ध में लिखा है। उनके निर्देश से ज्ञात होता है कि कबीर की मृत्यु उनके सामने ही हो गयी थी। रैदास की अवस्था 120 वर्ष की मानी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;हिंदी साहित्य कोश, भाग दो, पृष्ठ सं. 539&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
मध्ययुगीन संतों में प्रसिद्ध रैदास के जन्म के संबंध में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। कुछ विद्वान [[काशी]] में जन्मे रैदास का समय 1482-1527 ई. के बीच मानते हैं। रैदास का जन्म [[काशी]] में चर्मकार कुल में हुआ था।  उनके पिता का नाम 'रग्घु' और माता का नाम 'घुरविनिया' बताया जाता है।  रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था।  जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वह अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे।&lt;br /&gt;
==व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
रैदास के समय में स्वामी [[रामानन्द]] काशी के बहुत प्रसिद्ध प्रतिष्ठित सन्त थे।  रैदास उनकी शिष्य-मण्डली के महत्वपूर्ण सदस्य थे। प्रारम्भ में ही रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था।  साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष सुख का अनुभव होता था।  वह उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे।  उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे।  कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया।  रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे। कहते हैं, ये अनपढ़ थे, किंतु संत-साहित्य के ग्रंथों और गुरु-ग्रंथ साहब में इनके पद पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
;वचनबद्धता&lt;br /&gt;
उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का ज्ञान मिलता है।  एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग [[गंगा नदी|गंगा]]-स्नान के लिए जा रहे थे।  रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, 'गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को आज ही जूते बनाकर देने का मैंने वचन दे रखा है।  यदि आज मैं जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा।  गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है।  मन सही है तो इस [[कठौती]] के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है।' कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही [[कहावत लोकोक्ति मुहावरे|कहावत]] प्रचलित हो गयी कि - 'मन चंगा तो कठौती में गंगा।'&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिल जुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया। वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे।  उनका विश्वास था कि [[राम]], [[कृष्ण]], करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। [[वेद]], [[क़ुरान]], [[पुराण]] आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।&lt;br /&gt;
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित - भावना तथा सदव्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है।  अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया।  अपने एक भजन में उन्होंने कहा है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।&lt;br /&gt;
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय [[हाथी]] शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की 'पिपीलिका' &amp;lt;ref&amp;gt;चींटी&amp;lt;/ref&amp;gt; इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है।  इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।&lt;br /&gt;
;सत्संग&lt;br /&gt;
शैशवावस्था से ही सत्संग के प्रति उनमें तीव्र अभिरूचि थी। अत: ''रामजानकी'' की मूर्ति बनाकर पूजन करने लगे थे। पिता ने किसी कारणवश उन्हे अपने से अलग कर दिया था और वे घर के पिछवाड़े छप्पर डालकर रहने लगे। ये परम संतोषी और उदार व्यक्ति थे। वे अपने बनाये हुये जूते बहुधा साधु-सन्तो में बांट दिया करते थे। इनकी विरक्ति के सम्बन्ध में एक प्रसंग मिलता है कि एक बार किसी महात्मा ने उन्हे 'पारस' पत्थर दिया जिसका उपयोग भी उसने बता दिया। पहले तो सन्त रैदास ने उसे लेना ही अस्वीकार कर दिया। किन्तु बार - बार आग्रह करने पर उन्होने ग्रहण कर लिया और अपने छप्पर में खोंस देने के लिये कहा। तेरह दिन के बाद लौटकर उक्त साधु ने जब पारस पत्थर के बारे में पूछा तो संत रैदास का उत्तर था कि जहां रखा होगा, वहीं से उठा लो और सचमुच वह पारस पत्थर वहीं पड़ा मिला। &amp;lt;ref&amp;gt;हिंदी साहित्य कोश, भाग दो, पृष्ठ सं. 539&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
;सत्य&lt;br /&gt;
सन्त रैदास ने सत्य को अनुपम और अनिवर्चनीय कहा है। वह सर्वत्र एक रस है। जिस प्रकार जल में तरंगे है उसी प्रकार सारा विश्व उसमें लक्षित होता है। वह नित्य, निराकार तथा सबके भीतर विद्यमान है। सत्य का अनुभव करने के लिये साधक को संसार के प्रति अनासक्त होना पड़ेगा। संत रैदास के अनुसार प्रेममूलक भक्ति के लिये अहंकार की निवृत्ति आवश्यक है। भक्ति और अहंकार एक साथ संभव नही है। जब तक साधक अपने साध्य के चरणो में अपना सर्वस्व अर्पण नही करता तब तक उसे लक्ष्य की सिध्दि नही हो सकती। &lt;br /&gt;
;साधना  &lt;br /&gt;
सन्त रैदास मध्ययुगीन इतिहास के संक्रमण काल में हए थे। ब्राह्मणों की पैशाविक मनोवृत्ति से दलित और उपेक्षित पशुवत जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य थे। यह सब उनकी मानसिकता को उद्वेलित करता था। सन्त रैदास की समन्वयवादी चेतना इसी का परिणाम है। उनकी स्वानुभूतिमयी चेतना ने भारतीय समाज में जागृति का संचार किया और उनके मौलिक चिन्तन ने शोषित और उपेक्षित [[शूद्र|शूद्रो]] में आत्मविश्वास का संचार किया। परिणामत: वह ब्राह्मणवाद की प्रभुता के सामने साहसपूर्वक अपने अस्तित्व की घोषणा करने में सक्षम हो गये। सन्त रैदास ने मानवता की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। सन्त रैदास के मन में [[इस्लाम]] के लिए भी आस्था का समान भाव था। [[कबीर]] की वाणी में जहाँ आक्रोश की अभिव्यक्ति है, वहीं दूसरी ओर सन्त रैदास की रचनात्मक दृष्टि दोनो धर्मो को समान भाव से मानवता के मंच पर लाती है। सन्त रैदास वस्तुत: मानव धर्म के संस्थापक थे।&lt;br /&gt;
;धर्म&lt;br /&gt;
वर्णाश्रम धर्म को समूल नष्ट करने का संकल्प, कुल और जाति की श्रेष्ठता की मिथ्या सिध्दि सन्त रैदास द्वारा अपनाये गये समन्वयवादी मानवधर्म का ही एक अंग है जिसे उन्होनें मानवतावादी समाज के रूप में संकल्पित किया था।&lt;br /&gt;
जन्म जात मत पूछिये , का जात अरू पात।&lt;br /&gt;
रविदास पूत सभ प्रभ के कोउ नहि जात कुजात॥&lt;br /&gt;
;भक्ति&lt;br /&gt;
[[उपनिषद|उपनिषदों]] से लेकर [[नारद|महर्षि नारद]] और शाण्डिल्य ने भक्ति तत्व की अनेक प्रकार से व्याख्या की है। रैदास ने भक्ति में रागात्मिका वृत्ति को ही महत्व दिया है। नाम मार्ग और प्रेम भक्ति उनकी अष्टांग साधना में ही है। रैदास की अष्टांग साधना पध्दति उनकी स्वतंत्र व स्वछंद चेतना का प्रवाह है। यह साधना पूर्णत: मौलिक है।&lt;br /&gt;
==समाज पर प्रभाव==&lt;br /&gt;
रैदास की वाणी, भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उनकी शिक्षाओं का श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे। उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये।  कहा जाता है कि [[मीराबाई]] उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;'वर्णाश्र अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।&lt;br /&gt;
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।'&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
रैदास अनपढ़ कहे जाते हैं। संत-मत के विभिन्न संग्रहों में उनकी रचनाएँ संकलित मिलती हैं। [[राजस्थान]] में हस्तलिखित ग्रंथों में रूप में भी उनकी रचनाएँ मिलती हैं। रैदास की रचनाओं का एक संग्रह 'बेलवेडियर प्रेस', [[प्रयाग]] से प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त इनके बहुत से पद 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी संकलित मिलते हैं। यद्यपि दोनों प्रकार के पदों की [[भाषा]] में बहुत अंतर है तथापि प्राचीनता के कारण 'गुरु ग्रंथ साहब' में संगृहीत पदों को प्रमाणिक मानते में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। रैदास के कुछ पदों पर [[अरबी भाषा|अरबी]] और [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। रैदास के अनपढ़ और विदेशी भाषाओं से अनभिज्ञ होने के कारण ऐसे पदों की प्रामाणिकता में सन्देह होने लगता है। अत: रैदास के पदों पर अरबी-फ़ारसी के प्रभाव का अधिक संभाव्य कारण उनका लोकप्रचलित होना ही प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महत्व== &lt;br /&gt;
आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।  उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है।  विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं।  इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्याधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। संत कवि रैदास उन महान सन्तों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है। गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी रैदास उच्च-कोटि के विरक्त संत थे। उन्होंने ज्ञान-भक्ति का ऊंचा पद प्राप्त किया था। उन्होंने समता और सदाचार पर बहुत बल दिया। वे खंडन-मंडन में विश्वास नहीं करते थे। सत्य को शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना ही उनका ध्येय था। रैदास का प्रभाव आज भी [[भारत]] में दूर-दूर तक फैला हुआ है। '''इस मत के अनुयायी रैदासी या रविदासी कहलाते हैं।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रैदास की विचारधारा और सिद्धांतों को संत-मत की परम्परा के अनुरूप ही पाते हैं। उनका सत्यपूर्ण ज्ञान में विश्वास था। उन्होंने भक्ति के लिए परम वैराग्य अनिवार्य माना जाता है। परम तत्त्व सत्य है, जो अनिवर्चनीय है - 'यह परमतत्त्व एकरस है तथा जड़ और चेतन में समान रूप से अनुस्यूत है। वह अक्षर और अविनश्वर है और जीवात्मा के रूप में प्रत्येक जीव में अवस्थित है। संत रैदास की साधनापद्धति का क्रमिक विवेचन नहीं मिलता है। जहाँ-तहाँ प्रसंगवश संकेतों के रूप में वह प्राप्त होती है।' विवेचकों ने रैदास की साधना में 'अष्टांग' योग आदि को खोज निकाला है। संत रैदास अपने समय के प्रसिद्ध महात्मा थे। कबीर ने संतनि में रविदास संत' कहकर उनका महत्त्व स्वीकार किया इसके अतिरिक्त नाभादास, प्रियादास, मीराबाई आदि ने रैदास का ससम्मान स्मरण किया है। संत रैदास ने एक पंथ भी चलाया, जो रैदासी पंथ के नाम से प्रसिद्ध है। इस मत के अनुयायी [[पंजाब]], [[गुजरात]], [[उत्तर प्रदेश]] आदि में पाये जाते हैं। &amp;lt;ref&amp;gt;हिंदी साहित्य कोश, भाग दो, पृष्ठ सं. 539&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भक्ति काल]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>प्रयोग:गोविन्द</title>
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		<updated>2010-06-15T11:22:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: पन्ने को खाली किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>रानी लक्ष्मीबाई</title>
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		<updated>2010-06-15T11:21:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* झाँसी का युद्ध */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Rani-Laxmibai.jpg|thumb|झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई &amp;lt;br /&amp;gt; Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
बलिदानों की धरती [[भारत]] में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देशप्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है-झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है। रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थी। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में [[भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] कहलाता है।&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को [[काशी]] के पुण्य व पवित्र क्षेत्र असीघाट, [[वाराणसी]] में हुआ था। इनके पिता का नाम [[मोरोपंत तांबे]] और माता का नाम [[भागीरथी बाई]] था। इनका बचपन का नाम मणिकर्णिका रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को मनु पुकारा जाता था।  मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा [[बाजीराव द्वितीय]] के सेवक थे। माता भागीरथीबाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से 'छबीली' बुलाने थे।&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Laxmibai-Statue.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा&amp;lt;br /&amp;gt; Statue of Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। मनु ने पेशवा के बच्चों के साथ-साथ ही तीर-तलवार तथा बन्दूक से निशाना लगाना सीखा। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्र-शस्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्र-शस्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
समय बीता और मनु विवाह योग्य हो गयी। इनका विवाह सन १८४२ में [[झाँसी]] के राजा [[गंगाधर राव निवालकर]] के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। &lt;br /&gt;
==अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण==&lt;br /&gt;
सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने  घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने क़िले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्रियों की एक सेना भी तैयार की। राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से बहुत प्रसन्न थे।&lt;br /&gt;
==दयालु स्वभाव==&lt;br /&gt;
रानी अत्यन्त दयालु भी थीं  एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा दी कि एक निश्चित दिन गरीबों में वस्रादि का वितरण कराया जाए।&lt;br /&gt;
==विपत्तियाँ==&lt;br /&gt;
सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। सम्पूर्ण झाँसी आनन्दित हो उठा एवं उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रुप से बीमार हुआ और चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। सन १८५३ में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पांच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन २१ नवंबर १८५३ में मृत्यु हो गयी।&lt;br /&gt;
==झाँसी का युद्ध==&lt;br /&gt;
उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेजों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी के पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि '''मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी'''। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरुप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं  चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Laxmibai-Stamp.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की भारतीय डाक टिकट&amp;lt;br /&amp;gt; Indian Postage Stamp of Rani Laxmibai|left]]&lt;br /&gt;
रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा खुदा बक्श। रानी ने किले की मजबूत किलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापित [[सर ह्यूरोज]] भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेज़ आठ दिनों तक किले पर गोले बरसाते रहे परन्तु किला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम श्वाँस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से किला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रुप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;ज़ब्ती का सिद्धांत&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
झाँसी की रानी, जो इस बात से बहुत कुपित थी कि 1853 ई. में उसके पति के मरने पर लार्ड डलहौजी ने ज़ब्ती का सिद्धांत लागू करके उसका राज्य हड़प लिया। अतएव सिपाही विद्रोह शुरू होने पर वह विद्रोहियों से मिल गई और सर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेज़ी फ़ौज का डटकर वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया। जब अंग्रेज़ी फ़ौज क़िले में घुस गई, लक्ष्मीबाई क़िला छोड़कर कालपी चली गई और वहाँ से युद्ध जारी रखा। जब कालपी छिन गई तो रानी लक्ष्मीबाई ने [[तात्या टोपे]] के सहयोग से शिन्दे की राजधानी [[ग्वालियर]] पर हमला बोला, जो अपनी फ़ौज के साथ कम्पनी का वफ़ादार बना हुआ था। लक्ष्मीबाई के हमला करने पर वह अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए [[आगरा]] भागा और वहाँ अंग्रेज़ों की शरण ली। लक्ष्मीबाई की वीरता देखकर शिन्दे की फ़ौज विद्रोहियों से मिल गई। रानी लक्ष्मीबाई तथा उसके सहयोगियों ने [[नाना साहब]] को पेशवा घोषित कर दिया और [[महाराष्ट्र]] की ओर धावा मारने का मनसूबा बाँधा, ताकि मराठों में भी विद्रोहाग्नि फैल जाए। इस संकटपूर्ण घड़ी में सर ह्यूरोज तथा उसकी फ़ौज ने रानी लक्ष्मीबाई को और अधिक सफलताएँ प्राप्त करने से रोकने के लिए जीतोड़ कोशिश की। उसने ग्वालियर फिर से लिया और मुरार तथा कोटा की दो लड़ाइयों में रानी की सेना को पराजित किया।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वयंसेवक सेना का गठन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
झाँसी 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया। 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ो से बच कर भागने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर [[कालपी]] पहुँची और तात्या टोपे से मिली।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बाबा गंगादास की कुटिया&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
रानी ने अपना घोड़ा दौड़ाया पर दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला आ गया। घोड़ा नाला पार न कर सका। घोड़ा नाला पार न कर सका। तभी अंग्रेज़ घुड़सवार वहाँ आ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आँख बाहर निकल आयी। उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया। अत्यन्त घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमणकारियों का वध कर डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी। पठान सरदार [[गौस ख़ाँ]] अब भी रानी के साथ था।  उसका रौद्र रुप देख कर गोरे भाग खड़े हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही [[बाबा गंगादास]] की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
रानी को असह्य वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह 18 जून 1859 का दिन था जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। दानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। आज भी उनकी वीरता के गीत प्रसिद्ध हैं -&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की कविता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,&lt;br /&gt;
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,&lt;br /&gt;
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।&lt;br /&gt;
                        '''सुभद्रा कुमारी चौहान'''&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता संग्राम 1857]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%88&amp;diff=34032</id>
		<title>रानी लक्ष्मीबाई</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%88&amp;diff=34032"/>
		<updated>2010-06-15T11:21:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Rani-Laxmibai.jpg|thumb|झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई &amp;lt;br /&amp;gt; Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
बलिदानों की धरती [[भारत]] में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देशप्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है-झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है। रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थी। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में [[भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] कहलाता है।&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को [[काशी]] के पुण्य व पवित्र क्षेत्र असीघाट, [[वाराणसी]] में हुआ था। इनके पिता का नाम [[मोरोपंत तांबे]] और माता का नाम [[भागीरथी बाई]] था। इनका बचपन का नाम मणिकर्णिका रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को मनु पुकारा जाता था।  मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा [[बाजीराव द्वितीय]] के सेवक थे। माता भागीरथीबाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से 'छबीली' बुलाने थे।&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Laxmibai-Statue.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा&amp;lt;br /&amp;gt; Statue of Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। मनु ने पेशवा के बच्चों के साथ-साथ ही तीर-तलवार तथा बन्दूक से निशाना लगाना सीखा। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्र-शस्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्र-शस्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
समय बीता और मनु विवाह योग्य हो गयी। इनका विवाह सन १८४२ में [[झाँसी]] के राजा [[गंगाधर राव निवालकर]] के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। &lt;br /&gt;
==अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण==&lt;br /&gt;
सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने  घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने क़िले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्रियों की एक सेना भी तैयार की। राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से बहुत प्रसन्न थे।&lt;br /&gt;
==दयालु स्वभाव==&lt;br /&gt;
रानी अत्यन्त दयालु भी थीं  एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा दी कि एक निश्चित दिन गरीबों में वस्रादि का वितरण कराया जाए।&lt;br /&gt;
==विपत्तियाँ==&lt;br /&gt;
सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। सम्पूर्ण झाँसी आनन्दित हो उठा एवं उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रुप से बीमार हुआ और चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। सन १८५३ में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पांच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन २१ नवंबर १८५३ में मृत्यु हो गयी।&lt;br /&gt;
==झाँसी का युद्ध==&lt;br /&gt;
उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेजों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी के पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि '''मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी'''। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरुप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं  चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Laxmibai-Stamp.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की भारतीय डाक टिकट&amp;lt;br /&amp;gt; Indian Postage Stamp of Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा खुदा बक्श। रानी ने किले की मजबूत किलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापित [[सर ह्यूरोज]] भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेज़ आठ दिनों तक किले पर गोले बरसाते रहे परन्तु किला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम श्वाँस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से किला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रुप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;ज़ब्ती का सिद्धांत&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
झाँसी की रानी, जो इस बात से बहुत कुपित थी कि 1853 ई. में उसके पति के मरने पर लार्ड डलहौजी ने ज़ब्ती का सिद्धांत लागू करके उसका राज्य हड़प लिया। अतएव सिपाही विद्रोह शुरू होने पर वह विद्रोहियों से मिल गई और सर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेज़ी फ़ौज का डटकर वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया। जब अंग्रेज़ी फ़ौज क़िले में घुस गई, लक्ष्मीबाई क़िला छोड़कर कालपी चली गई और वहाँ से युद्ध जारी रखा। जब कालपी छिन गई तो रानी लक्ष्मीबाई ने [[तात्या टोपे]] के सहयोग से शिन्दे की राजधानी [[ग्वालियर]] पर हमला बोला, जो अपनी फ़ौज के साथ कम्पनी का वफ़ादार बना हुआ था। लक्ष्मीबाई के हमला करने पर वह अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए [[आगरा]] भागा और वहाँ अंग्रेज़ों की शरण ली। लक्ष्मीबाई की वीरता देखकर शिन्दे की फ़ौज विद्रोहियों से मिल गई। रानी लक्ष्मीबाई तथा उसके सहयोगियों ने [[नाना साहब]] को पेशवा घोषित कर दिया और [[महाराष्ट्र]] की ओर धावा मारने का मनसूबा बाँधा, ताकि मराठों में भी विद्रोहाग्नि फैल जाए। इस संकटपूर्ण घड़ी में सर ह्यूरोज तथा उसकी फ़ौज ने रानी लक्ष्मीबाई को और अधिक सफलताएँ प्राप्त करने से रोकने के लिए जीतोड़ कोशिश की। उसने ग्वालियर फिर से लिया और मुरार तथा कोटा की दो लड़ाइयों में रानी की सेना को पराजित किया।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वयंसेवक सेना का गठन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
झाँसी 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया। 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ो से बच कर भागने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर [[कालपी]] पहुँची और तात्या टोपे से मिली।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बाबा गंगादास की कुटिया&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
रानी ने अपना घोड़ा दौड़ाया पर दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला आ गया। घोड़ा नाला पार न कर सका। घोड़ा नाला पार न कर सका। तभी अंग्रेज़ घुड़सवार वहाँ आ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आँख बाहर निकल आयी। उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया। अत्यन्त घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमणकारियों का वध कर डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी। पठान सरदार [[गौस ख़ाँ]] अब भी रानी के साथ था।  उसका रौद्र रुप देख कर गोरे भाग खड़े हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही [[बाबा गंगादास]] की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया।&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
रानी को असह्य वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह 18 जून 1859 का दिन था जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। दानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। आज भी उनकी वीरता के गीत प्रसिद्ध हैं -&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की कविता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,&lt;br /&gt;
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,&lt;br /&gt;
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।&lt;br /&gt;
                        '''सुभद्रा कुमारी चौहान'''&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता संग्राम 1857]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>चित्र:Laxmibai-Statue.jpg</title>
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		<updated>2010-06-15T11:18:45Z</updated>

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&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[रानी लक्ष्मीबाई]] की प्रतिमा&amp;lt;br /&amp;gt;Statue of Rani Laxmibai&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/guneetnarula/ Guneet  Narula]&lt;br /&gt;
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|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
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|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/guneetnarula/4562904883/ My Grand Observatory]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
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&lt;div&gt;[[चित्र:Rani-Laxmibai.jpg|thumb|झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई &amp;lt;br /&amp;gt; Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Laxmibai-Statue.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा&amp;lt;br /&amp;gt; Statue of Rani Laxmibai]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<updated>2010-06-15T11:03:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Rani-Laxmibai.jpg|thumb|झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई&amp;lt;br /&amp;gt;Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rani-Laxmibai-Statue.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा&amp;lt;br /&amp;gt;Statue Of Rani Laxmibai]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>रानी लक्ष्मीबाई</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Laxmibai-Stamp.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की भारतीय डाक टिकट&amp;lt;br /&amp;gt; Indian Postage Stamp of Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
बलिदानों की धरती [[भारत]] में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देशप्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है-झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है। रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थी। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में [[भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] कहलाता है।&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को [[काशी]] के पुण्य व पवित्र क्षेत्र असीघाट, [[वाराणसी]] में हुआ था। इनके पिता का नाम [[मोरोपंत तांबे]] और माता का नाम [[भागीरथी बाई]] था। इनका बचपन का नाम मणिकर्णिका रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को मनु पुकारा जाता था।  मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा [[बाजीराव द्वितीय]] के सेवक थे। माता भागीरथीबाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से 'छबीली' बुलाने थे।&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। मनु ने पेशवा के बच्चों के साथ-साथ ही तीर-तलवार तथा बन्दूक से निशाना लगाना सीखा। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्र-शस्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्र-शस्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
समय बीता और मनु विवाह योग्य हो गयी। इनका विवाह सन १८४२ में [[झाँसी]] के राजा [[गंगाधर राव निवालकर]] के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। &lt;br /&gt;
==अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण==&lt;br /&gt;
सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने  घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने क़िले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्रियों की एक सेना भी तैयार की। राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से बहुत प्रसन्न थे।&lt;br /&gt;
==दयालु स्वभाव==&lt;br /&gt;
रानी अत्यन्त दयालु भी थीं  एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा दी कि एक निश्चित दिन गरीबों में वस्रादि का वितरण कराया जाए।&lt;br /&gt;
==विपत्तियाँ==&lt;br /&gt;
सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। सम्पूर्ण झाँसी आनन्दित हो उठा एवं उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रुप से बीमार हुआ और चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। सन १८५३ में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पांच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन २१ नवंबर १८५३ में मृत्यु हो गयी।&lt;br /&gt;
==झाँसी का युद्ध==&lt;br /&gt;
उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेजों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी के पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि '''मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी'''। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरुप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं  चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा खुदा बक्श। रानी ने किले की मजबूत किलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापित [[सर ह्यूरोज]] भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेज़ आठ दिनों तक किले पर गोले बरसाते रहे परन्तु किला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम श्वाँस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से किला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रुप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;ज़ब्ती का सिद्धांत&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
झाँसी की रानी, जो इस बात से बहुत कुपित थी कि 1853 ई. में उसके पति के मरने पर लार्ड डलहौजी ने ज़ब्ती का सिद्धांत लागू करके उसका राज्य हड़प लिया। अतएव सिपाही विद्रोह शुरू होने पर वह विद्रोहियों से मिल गई और सर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेज़ी फ़ौज का डटकर वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया। जब अंग्रेज़ी फ़ौज क़िले में घुस गई, लक्ष्मीबाई क़िला छोड़कर कालपी चली गई और वहाँ से युद्ध जारी रखा। जब कालपी छिन गई तो रानी लक्ष्मीबाई ने [[तात्या टोपे]] के सहयोग से शिन्दे की राजधानी [[ग्वालियर]] पर हमला बोला, जो अपनी फ़ौज के साथ कम्पनी का वफ़ादार बना हुआ था। लक्ष्मीबाई के हमला करने पर वह अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए [[आगरा]] भागा और वहाँ अंग्रेज़ों की शरण ली। लक्ष्मीबाई की वीरता देखकर शिन्दे की फ़ौज विद्रोहियों से मिल गई। रानी लक्ष्मीबाई तथा उसके सहयोगियों ने [[नाना साहब]] को पेशवा घोषित कर दिया और [[महाराष्ट्र]] की ओर धावा मारने का मनसूबा बाँधा, ताकि मराठों में भी विद्रोहाग्नि फैल जाए। इस संकटपूर्ण घड़ी में सर ह्यूरोज तथा उसकी फ़ौज ने रानी लक्ष्मीबाई को और अधिक सफलताएँ प्राप्त करने से रोकने के लिए जीतोड़ कोशिश की। उसने ग्वालियर फिर से लिया और मुरार तथा कोटा की दो लड़ाइयों में रानी की सेना को पराजित किया।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वयंसेवक सेना का गठन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
झाँसी 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया। 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ो से बच कर भागने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर [[कालपी]] पहुँची और तात्या टोपे से मिली।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बाबा गंगादास की कुटिया&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
रानी ने अपना घोड़ा दौड़ाया पर दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला आ गया। घोड़ा नाला पार न कर सका। घोड़ा नाला पार न कर सका। तभी अंग्रेज़ घुड़सवार वहाँ आ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आँख बाहर निकल आयी। उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया। अत्यन्त घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमणकारियों का वध कर डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी। पठान सरदार [[गौस ख़ाँ]] अब भी रानी के साथ था।  उसका रौद्र रुप देख कर गोरे भाग खड़े हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही [[बाबा गंगादास]] की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया।&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
रानी को असह्य वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह 18 जून 1859 का दिन था जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। दानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। आज भी उनकी वीरता के गीत प्रसिद्ध हैं -&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की कविता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,&lt;br /&gt;
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,&lt;br /&gt;
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।&lt;br /&gt;
                        '''सुभद्रा कुमारी चौहान'''&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता संग्राम 1857]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>प्रयोग:गोविन्द</title>
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&lt;hr /&gt;
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		<title>रानी लक्ष्मीबाई</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[[चित्र:Laxmibai-Stamp.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की भारतीय डाक टिकट&amp;lt;br /&amp;gt; Indian Postage Stamp of Rani Laxmibai]]&lt;br /&gt;
बलिदानों की धरती [[भारत]] में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देशप्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है-झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है। रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थी। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में [[भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] कहलाता है।&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को [[काशी]] के पुण्य व पवित्र क्षेत्र असीघाट, [[वाराणसी]] में हुआ था। इनके पिता का नाम [[मोरोपंत तांबे]] और माता का नाम [[भागीरथी बाई]] था। इनका बचपन का नाम मणिकर्णिका रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को मनु पुकारा जाता था।  मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा [[बाजीराव द्वितीय]] के सेवक थे। माता भागीरथीबाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से 'छबीली' बुलाने थे।&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। मनु ने पेशवा के बच्चों के साथ-साथ ही तीर-तलवार तथा बन्दूक से निशाना लगाना सीखा। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्र-शस्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्र-शस्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
समय बीता और मनु विवाह योग्य हो गयी। इनका विवाह सन १८४२ में [[झाँसी]] के राजा [[गंगाधर राव निवालकर]] के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। &lt;br /&gt;
==अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण==&lt;br /&gt;
सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने  घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने क़िले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्रियों की एक सेना भी तैयार की। राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से बहुत प्रसन्न थे।&lt;br /&gt;
==दयालु स्वभाव==&lt;br /&gt;
रानी अत्यन्त दयालु भी थीं  एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा दी कि एक निश्चित दिन गरीबों में वस्रादि का वितरण कराया जाए।&lt;br /&gt;
==विपत्तियाँ==&lt;br /&gt;
सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। सम्पूर्ण झाँसी आनन्दित हो उठा एवं उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रुप से बीमार हुआ और चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। सन १८५३ में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पांच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन २१ नवंबर १८५३ में मृत्यु हो गयी।&lt;br /&gt;
==झाँसी का युद्ध==&lt;br /&gt;
उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेजों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी के पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि '''मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी'''। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरुप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं  चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा खुदा बक्श। रानी ने किले की मजबूत किलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापित [[सर ह्यूरोज]] भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेज़ आठ दिनों तक किले पर गोले बरसाते रहे परन्तु किला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम श्वाँस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से किला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रुप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;ज़ब्ती का सिद्धांत&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
झाँसी की रानी, जो इस बात से बहुत कुपित थी कि 1853 ई. में उसके पति के मरने पर लार्ड डलहौजी ने ज़ब्ती का सिद्धांत लागू करके उसका राज्य हड़प लिया। अतएव सिपाही विद्रोह शुरू होने पर वह विद्रोहियों से मिल गई और सर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेज़ी फ़ौज का डटकर वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया। जब अंग्रेज़ी फ़ौज क़िले में घुस गई, लक्ष्मीबाई क़िला छोड़कर कालपी चली गई और वहाँ से युद्ध जारी रखा। जब कालपी छिन गई तो रानी लक्ष्मीबाई ने [[तात्या टोपे]] के सहयोग से शिन्दे की राजधानी [[ग्वालियर]] पर हमला बोला, जो अपनी फ़ौज के साथ कम्पनी का वफ़ादार बना हुआ था। लक्ष्मीबाई के हमला करने पर वह अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए [[आगरा]] भागा और वहाँ अंग्रेज़ों की शरण ली। लक्ष्मीबाई की वीरता देखकर शिन्दे की फ़ौज विद्रोहियों से मिल गई। रानी लक्ष्मीबाई तथा उसके सहयोगियों ने [[नाना साहब]] को पेशवा घोषित कर दिया और [[महाराष्ट्र]] की ओर धावा मारने का मनसूबा बाँधा, ताकि मराठों में भी विद्रोहाग्नि फैल जाए। इस संकटपूर्ण घड़ी में सर ह्यूरोज तथा उसकी फ़ौज ने रानी लक्ष्मीबाई को और अधिक सफलताएँ प्राप्त करने से रोकने के लिए जीतोड़ कोशिश की। उसने ग्वालियर फिर से लिया और मुरार तथा कोटा की दो लड़ाइयों में रानी की सेना को पराजित किया।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वयंसेवक सेना का गठन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
झाँसी 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया। 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ो से बच कर भागने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर [[कालपी]] पहुँची और तात्या टोपे से मिली।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बाबा गंगादास की कुटिया&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
रानी ने अपना घोड़ा दौड़ाया पर दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला आ गया। घोड़ा नाला पार न कर सका। घोड़ा नाला पार न कर सका। तभी अंग्रेज़ घुड़सवार वहाँ आ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आँख बाहर निकल आयी। उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया। अत्यन्त घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमणकारियों का वध कर डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी। पठान सरदार [[गौस ख़ाँ]] अब भी रानी के साथ था।  उसका रौद्र रुप देख कर गोरे भाग खड़े हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही [[बाबा गंगादास]] की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया।&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
रानी को असह्य वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह 18 जून 1859 का दिन था जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। दानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। आज भी उनकी वीरता के गीत प्रसिद्ध हैं -&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की कविता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,&lt;br /&gt;
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,&lt;br /&gt;
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।&lt;br /&gt;
                        '''सुभद्रा कुमारी चौहान'''&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता संग्राम 1857]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<updated>2010-06-15T10:40:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>प्रयोग:गोविन्द</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Laxmibai-Stamp.jpg|thumb|रानी लक्ष्मीबाई की भारतीय डाक टिकट&amp;lt;br /&amp;gt; Indian Postage Stamp of Rani Laxmibai]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
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		<title>वेणु का विनाश</title>
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		<updated>2010-06-15T10:09:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[ध्रुव]] जब [[विष्णु|श्रीहरि]] के लोक में जाने लगे, तो वे अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज्य सौंप गए थे। उनके ज्येष्ठ पुत्र का नाम कल्प था। बहुत से लोग उसे उत्कल भी कहते थे। उत्कल की सांसारिक सुखों और राज्य में बिल्कुल रूचि नहीं थी। वह विरक्त था, समदर्शी था। उसे अपने और दूसरों में बिलकुल भेद मालूम नहीं होता था। वह अपने ही भीतर समस्त प्राणियों को देखता था। अतः उसने राजसिंहासन पर बैठने से इन्कार कर दिया। जब ध्रुव के ज्येष्ठ पुत्र ने राजसिंहासन पर बैठने से इन्कार कर दिया तो ध्रुव का कनिष्ठ पुत्र राजसिंहासन पर बैठा। वह बड़ा धर्मात्मा और बुद्धिमान था। उसने बहुत दिनों तक राज्य किया। उसके राज्य में चारों ओर शांति थी। प्रजा को बड़ा सुख था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वत्सर के ही वंश में एक ऐसा राजा उत्पन्न हुआ जो धर्म की प्रतिमूर्ति था। वह सत्यव्रती और बड़ा शूरवीर था। जिस प्रकार बसंत ऋतु में प्रकृति फूली, फली रहती है, उसी प्रकार उस राजा के राज्य में प्रजा फूली और फली रहती थी। उस राजा का नाम अंग था। अंग की कीर्ति−चांदनी चारों ओर छिटकी हुई थी। छोटे−बड़े सभी उसके यश का गान करते थे। वह पुण्यात्मा तो था ही, बड़ा प्रजापालक भी था। उसकी प्रजा उसका आदर उसी प्रकार करती थी, जिस प्रकार लोग देवताओं का आदर करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार अंग ने एक बहुत बड़े [[यज्ञ]] की रचना की। यज्ञ में बड़े−बड़े ऋषि−मुनि और विद्वान ब्राह्मण बुलाए गए थे। यज्ञ के लिए पवित्र स्थानों से चुन−चुनकर सामग्रियाँ मंगायी गयीं थीं। तीर्थस्थानों से जल मंगाया गया था। शुद्ध और पवित्र लकड़ियाँ इकट्ठी की गई थीं। किंतु विद्वान ब्राह्मणों ने [[वेद]]मन्त्रों के साथ देवताओं को आहुतियाँ दीं तो देवताओं ने उन आहुतियों को लेना अस्वीकार कर दिया। केवल यही नहीं, प्रार्थनापूर्वक बुलाए जाने पर भी देवतागण भाग लेने के लिए नहीं आए। विद्वान ब्राह्मणों ने चिंतित होकर कहा, 'महाराज! यज्ञ की सामग्रियाँ पवित्र हैं, जल भी शुद्ध है और यज्ञ कराने वाले ब्राह्मण भी शुद्ध तथा चरित्रनिष्ठ हैं किंतु फिर भी देवगण आहुतियों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, मन्त्रों से अभिमन्त्रित किए जाने पर भी अपना भाग लेने के लिए नहीं आ रहे हैं।' विद्वान ब्राह्म्णों के कथन को सुनकर महाराज अंग चिंतित और दुःखी हो उठे। उन्होंने दुःख भरे स्वर में कहा, 'पूज्य ब्राह्मणों, यह तो बड़े दुःख की बात है। क्या मुझसे कोई अपराध हुआ है या मुझसे कोई दूषित कर्म हुआ है? मैंने तो अपनी समझ में आज तक कोई ऐसा कार्य किया नहीं।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्वान ब्राह्म्णों ने उत्तर में कहा, 'आप तो बड़े धर्मात्मा और पुण्यात्मा हैं। कोई सोच भी नहीं सकता कि आपके द्वारा कभी कोई पाप कर्म हुआ होगा। इस जन्म में तो आपने कभी कोई दूषित कर्म किया नहीं। हो सकता है, पूर्वजन्म में आपने कोई पाप कर्म किया हो। मनुष्य को पूर्वजन्म में किए हुए अच्छे और बुरे कर्मों का फल भी भोगना पड़ता है।' महाराज अंग ने दुःख के साथ निवेदन किया, 'यज्ञ मंडप में बड़े−बड़े विद्वान ब्राह्मण और ऋषि व मुनि एकत्र हैं। यहाँ ऐसे भी ऋषि और मुनि हैं जो तीनों कालों के ज्ञाता हैं। मेरी प्रार्थना है कि वे मुझे अवगत कराएं, इस जन्म में या पूर्वजन्म में मुझसे कौन−सा दूषित कर्म हुआ है?' महाराज अंग की प्रार्थना को सुनकर ऋषिगण विचारों में डूब गए। कुछ क्षणों के पश्चात ऋषियों ने कहा, 'महाराज, इस जन्म में या पूर्वजन्म में आपसे कोई पाप कर्म नहीं हुआ है। सच बात तो यह है कि आप पुत्रहीन हैं। जो पुत्रहीन होता है, देवगण उसके यज्ञ की आहुतियाँ स्वीकार नहीं करते। अतः यदि आप देवताओं को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो सर्वप्रथम पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ करें। जब तक आप पुत्र प्राप्त नहीं कर लेंगे, देवगण आपकी आहुतियों को स्वीकार नहीं करेंगे।' ऋषियों और मुनियों की सलाह से महाराज अंग ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया। यज्ञकुंड में एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ जो अपने हाथों में खीर का पात्र लिए हुए था। उसने खीर के पात्र को महाराज अंग की ओर बढ़ाते हुए कहा, 'महाराज, पात्र की खीर को अपनी रानी को खिला दीजिए। आपको अवश्यमेव पुत्र की प्राप्ति होगी।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिव्य पुरुष अंग को खीर का पात्र देकर अदृश्य हो गया। अंग की प्रसन्नता की सीमा नहीं थी। उन्होंने पात्र की खीर को अपनी रानी को खिला दिया। रानी गर्भवती हुईं। उन्होंने समय पर एक बालक को जन्म दिया। ज्योतिषियों ने बालक की कुण्डली बनाकर, उसके ग्रहों के अनुसार उसका नाम [[वेणु]] रखा। वेणु का अर्थ होता है − बांस। जहाँ बांस पैदा होता है, वहाँ दूसरे पौधे पैदा नहीं होते। यों भी कहा जा सकता है कि, बांस दूसरे पौधों को उगने नहीं देता है। बांसों की रगड़ से कभी−कभी आग लग जाती है तो सारे बांस अपनी ही आग में जल जाया करते हैं व दूसरों को भी जला देते हैं। वेणु की कुण्डली में भी इसी प्रकार के ग्रह पड़े थे। वेणु धीरे−धीरे बड़ा हुआ। वह जब बड़ा हुआ, तो अंग के उलटे रास्ते पर चलने लगा। जुआ खेलने लगा, मद्यपान करने लगा और परायी स्त्रियों की लज्जा को लूटने लगा। उसके अत्याचारों से प्रजा कांप उठी। अंग के कानों में जब वेणु के बुरे कर्मों के समाचार पड़े, तो वे बड़े दुःखी हुए। उन्होंने वेणु को समझाने का प्रयत्न किया, किंतु वह क्यों मानने लगा? उसकी जन्मकुण्डली में तो ग्रह ही बुरे पड़े थे। किसी ने ठीक ही कहा है−&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''फूलहि फलहिं न बेंत, जदपि सुधा बरसहिं जलद।'''&lt;br /&gt;
'''मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं विरंच सम।।'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंग के बहुत समझाने पर भी जब वेणु ने बुरे कर्मों का परित्याग नहीं किया, तो वे बड़े दुःखी हुए। वे सब कुछ छोड़कर तप करने के लिए वन में चले गए। मनुष्य का जब कोई बस नहीं चलता, तो वह ईश्वर को छोड़कर और किसी का सहारा नहीं लेता। महाराज के चले जाने पर वेणु राजसिंहासन पर आसीन हुआ। वह अतिचारी और अविचारी तो पहले से ही था, जब राजसिंहासन पर बैठा, तो उसके बुरे विचारों को पंख लग गए। वह अपने आप को सर्वेश्वर और अखिलेश्वर समझने लगा। उसने अपने राज्य में चारों ओर आदेशपत्र प्रचारित किया− 'कोई भी मनुष्य यज्ञ न करे, पूजा−पाठ न करे, ईश्वर का नाम न ले, ईश्वर के गुणों का गुणगान न करे। जो मनुष्य ऐसा करेगा, उसे दण्ड दिया जाएगा। प्रत्येक प्रजाजन को ईश्वर की जगह पर वेणु की ही पूजा करनी चाहिए। वेणु के ही यश−गुणों का गान करना चाहिए, क्योंकि वेणु ही परमात्मा है, अखिलेश्वर है।' वेणु की घोषणा ने सारे राज्य में हलचल उत्पन्न की दी। किंतु कोई कर क्या सकता था? उसके सैनिक और सिपाही राज्य में चारों ओर घूम−घूमकर उसकी आज्ञा का पालन करवा रहे थे। जो मनुष्य उसके आदेश का उल्लंघन करता था, उसे तलवार के घाट उतार दिया जाता था, उसके घर को जला दिया जाता था। वेणु और उसके सिपाहियों के अत्याचारों से चारों ओर हाहाकार पैदा हो उठा, दुःख और पीड़ा के बादल छा गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्य में रहने वाले ऋषि, मुनि और ब्राह्मण चिंतित हो उठे। वे वेणु को समझाने के लिए उसकी सेवा में उपस्थित हुए। उन्होंने वेणु को समझाते हुए कहा, 'महाराज, आप जो कुछ कर रहे हैं, वह आपके पूर्वजों के विपरीत है। आपके पूर्वजों में [[स्वायंभुव|स्वयंभू मनु]] और [[ध्रुव]] प्रजा को पुत्रवत मानते थे। वे प्रजा का पालन करना ही अपना सबसे बड़ा धर्म समझते थे। आपके पूर्वज ईश्वरानुरागी थे। वे अपने को ईश्वर का तुच्छ सेवक समझते थे। जो राजा प्रजा का पालन नहीं करता, उसे नर्क की यातना भोगनी पड़ती है।' किंतु वेणु के हृदय पर ऋषियों और मुनियों के कथन का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। वह उनके कथन के उत्तर में बोला, 'ऋषियों, राजा के शरीर में देवता वास करते हैं। अतः वही सर्वश्रेष्ठ है। प्रजा को उसी का गुणानुवाद करना चाहिए, उसी को सर्वेश्वर मानना चाहिए। मैंने जो कुछ किया है, ठीक ही किया है। तुम सबको मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिए। मेरे बताये हुए मार्ग पर चलना चाहिए।' वेणु का खरा उत्तर सुनकर ऋषियों और मुनियों ने सोचा, वेणु के हृदय पर किसी भी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। मनुष्य जब उन्मत्त हो जाता है, तो वह अपने हाथों से ही अपना विनाश कर डालता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि और मुनिगण दुःखी होकर वन में चले गए। वेणु निडर होकर पापाचार से खेलने लगा। अत्याचार का व्यापार करने लगा। प्रजा उसके अत्याचारों से दुःखी होकर करुण क्रंदन करने लगी, चीत्कार करने लगी, सकरुण स्वरों में भगवान को पुकारने लगी। प्रजा की पुकार ऋषियों के कर्णकुहरों में पड़ी। ऋषियों ने एकत्र होकर सोचा, वेणु जब तक जीवित रहेगा, उसका अत्याचार बंद न होगा। अतः उसे मार डालना चाहिए। अत्याचारी और अधर्मी को मार डालने से पाप नहीं लगता। ऋषियों और मुनियों ने अपने मन्त्रों की शक्ति से वेणु को मृत्यु के मुख में पहुँचा दिया। जो अत्याचार करता है, जो अधर्म के पथ पर चलता है, एक न एक दिन सज्जनों के हाथों से वेणु के समान ही मारा जाता है।&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{{कथा}}&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AD&amp;diff=33978</id>
		<title>कृष्ण संदर्भ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AD&amp;diff=33978"/>
		<updated>2010-06-15T10:08:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==छान्दोग्य उपनिषद==&lt;br /&gt;
कृष्ण- एक बार आंगिरस ऋषि ने देवकी के पुत्र [[कृष्ण]] को यज्ञदर्शन सुनाया था। फलस्वरूप कृष्ण शेष समस्त विधाओं के प्रति तृष्णाहीन हो गये थे।(छा.उ., अध्याय 3,खंड 17, श्लोक 6)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृष्ण का मातृपरक नाम 'देवकीपुत्र' [[छान्दोग्य उपनिषद#तेरहवें खण्ड से उन्नीसवें खण्ड तक|छान्दोग्य उप निषद् (3,17,6)]] में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विभिन्न प्रसंग== &lt;br /&gt;
{{Tocright}} &lt;br /&gt;
वे अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त ब्रह्म थे।  मूलत: वे नारायण थे।  वे स्वयंभू तथा संपूर्ण जगत के प्रपितामह थे।  द्युलोक उनका मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी रचण, [[अश्विनीकुमार]] नासिकास्थान, [[चंद्र देवता|चंद्र]] और [[सूर्य देवता|सूर्य]] नेत्र तथा विभिन्न [[देवता]] विभिन्न देहयष्टियां हैं।  वे (ब्रह्म रूप) ही प्रलयकाल के अंत में [[ब्रह्मा]] के रूप में स्वयं प्रकट हुए तथा सृष्टि का विस्तार किया।  [[रुद्र]] इत्यादि की सृष्टि करने के उपरांत वे लोकहित के लिए अनेक रूप धारण करके प्रकट होते रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के रूप में वही अव्यक्त नारायण व्यक्त रूप धारण करके अवतरित हुए।  वे [[वसुदेव]] के पुत्र हुए।  [[कंस]] के भय से वसुदेव उन्हें [[नंद]] गोप के यहाँ छोड़ आये।  वहीं पलकर वे बड़े हुए।  [[यशोदा]] (नंद की पत्नी) से उन्हें अद्भुत वात्सल्य की उपलब्धि हुई।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(1) शिशुरूप में वे एक बार छकड़े  नीचे सो रहे थे।  यशोदा उन्हें वहां छोड़ यमुना तट गयी थी।  बाल-लीला का प्रदर्शन करते हुए रोते हुए कृष्ण ने अपने पांव के अंगूठे से छकड़े को धक्का दिया तो वह उलट गया। उस पर रखे समस्त मटके चूर-चूर हो गये।&amp;lt;br /&amp;gt;   &lt;br /&gt;
(2) देवताओं के देखते-देखते उन्होंने [[पूतना-वध|पूतना]] को मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(3) वे अपने बड़े भाई संकर्षण ([[बलराम|बलदेव]]) के साथ खेलते-कूदते बड़े हुए।  सात वर्ष की अवस्था में गोचारण के लिए जाया करते थे।  एक बार मक्खन चुराकर खाने के दंडस्वरूप मां (यशोदा) ने उन्हें ऊखल में बांध दिया।  कृष्ण ने उस ऊखल को [[यमल तथा अर्जुन]] नामक दो वृक्षों के बीच में फंसाकर इतने जोर से खींचा कि वे दोनों वृक्ष भूमिसात हो गये।  इस प्रकार उन वृक्षो पर रहनेवाले दो राक्षसों को उन्होंने मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(4) वे दोनों भाई ग्वालोचित वेशधारी वन में पिपिहरी तथा [[बांसुरी]] बजाकर आमोद-प्रमोद के साथ गायों को चराते थे।  कृष्ण पीले और बलराम नीले वस्त्र धारण करते थे।  वे पत्तों के मुकुट पहन लेते।  कभी-कभी रस्सी का [[यज्ञोपवीत]] भी धारण कर लेते थे।  वे गोप बालकों के आकर्षण का केंद्रबिंदु थे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(5) उन्होंने [[कदम्ब]]वन के पास हृद (कुण्ड) में रहने वाले [[कालिय नाग|कालिया नाग]] के मस्तक पर नृत्यक्रीड़ा की थी तथा अन्यत्रा जाने का आदेश दिया था।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(6) गोपाल बालकों द्वारा किये सर्वभूत स्त्रष्ट ईश्वर स्वरूप को प्रकट किया तथा [[गिरिराज]] को समर्पित होने वाली खीर वे स्वयं खा गये। तब से [[गोपगण]] उनकी पूजा करने लगे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(7) जब [[इन्द्र]] ने वर्षा की थी तब श्रीकृष्ण ने गौओं की रक्षा के निमित्त एक सप्ताह तक [[गोवर्धन]] पर्वत को अपने हाथ पर उठाए रखा था।  इन्द्र ने प्रसन्न होकर उन्हें गोविंद नाम दिया।&amp;lt;br /&amp;gt;   &lt;br /&gt;
(8) श्रीकृष्ण ने पशुओं की हितकामना से वृक्ष रूप-धारी [[अरिष्ट नामक दैत्य]] का संहार किया।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(9) ब्रजनिवासी [[केशी नामक दैत्य]] का संहार किया।  उस दैत्य का शरीर घोड़े जैसा और बल दस हज़ार हाथियों के समान था।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(10) [[कंस]] के दरबार में रहने वाले चाणूर नामक मल्ल को उन्होंने मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(11) कंस के भाई तथा सेनापति शत्रुनाशक का भी उन्होंने नाश कर डाला।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(12) कंस के [[कुवलयापीड़]] नामक हाथी को भी उन्होंने मार गिराया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(13) कंस को मारकर उन्होंने [[उग्रसेन]] का राज्याभिषेक कर दिया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(14) [[उज्जयिनी]] में दोनों भाइयों ने वेद विद्याध्ययन किया। धनुर्विद्या सीखने वे सांदीपनि के पास गये।  [[सांदीपनि]] ने गुरु-दक्षिणा में अपने पुत्र को वापस मांगा, जिसे कोई समुद्री जंतु खा गया था।  श्रीकृष्ण ने समुद्र में रहने वाले उस दैत्य का संहार कर दिया तथा गुरुपुत्र को पुनर्जीवनदान दिया जो कि वर्षों पूर्व यमलोक में जा चुका था। कृष्ण के कृपाप्रसाद से उसने पूर्ववत् अपना शरीर धारण किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(15)श्रीकृष्ण ने [[नरकासुर]] (भौमासुर) को मार डाला।&lt;br /&gt;
(16) श्रीकृष्ण ने [[उषा अनिरुद्ध]] का मिलन करवाया, [[बाणासुर]] को मारा।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(17) उन्होंने रूक्मी को पराजित करके [[रुक्मिणी]] का हरण किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(18) इन्द्र को परास्त करके [[परिजात वृक्ष]] का अपहरण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाभारत- उद्योगपर्व, द्रोणपर्व==&lt;br /&gt;
स्वयंवर में गांधारराज की राजकुमारी को प्राप्त किया था।  विवाहोपरांत उनके रथ में अच्छी नस्ल के घोड़ो की तरह से राजाओं को जोता गया था।  द्यूतक्रीड़ा के उपरांत [[पांडव|पांडवों]] के वनवास काल में [[कौरव|कौरवों]]-पांडवों के [[महाभारत|युद्ध]] की संभावना देख श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए उनकी सभा में गये।  कृष्ण के साथ [[धृतराष्ट्र]], [[गांधारी]], [[विदुर]], [[सात्यकि]] इत्यादि सभी इस मत के थे कि पांडवों का राज्य उन्हें लौटा देना चाहिए तथा उनसे संधि कर, शांति स्थापित करनी चाहिए; किंतु [[दुर्योधन]] उसके लिए तैयार न था।  उसने [[शकुनि]] तथा [[कर्ण]] से सलाह करके कृष्ण को बंदी बना लेने का निश्चय किया।  सात्यकि को विदित हुआ तो उसने सभासदों के सम्मुख ही कृष्ण को इस तथ्य की सूचना दी।  &lt;br /&gt;
कृष्ण ने क्रुद्ध होकर अपना विश्व रूप (विराट् रूप) प्रदर्शित किया।  कृष्ण की दाहिनी बांह पर [[अर्जुन]], वायीं बांह पर [[बलराम|हलधर]], वक्ष पर [[शिव]] तथा अंग-प्रत्यंग पर विभिन्न देवी-देवता साक्षात् दिखलायी दिए।  कृष्ण के अट्टहास से भूमंडल कांप उठा।  शरीर से ज्वाला प्रस्फुटित हुई तथा सब ओर अनेक देवता और योद्धाओं के दर्शन होने लगे। ऐसे रूप के दर्शन दे, कृष्ण ने वहां से प्रस्थान किया।  [[महाभारत]] युद्ध में कृष्ण ने अर्जुन के सारथी का कार्यभार संभाला था।  [[अभिमन्यु]] की मृत्यु के उपरांत कृष्ण ने अपने-आप स्वीकार किया कि अर्जुन (नर) नारायण (श्रीकृष्ण) का आधा शरीर है। युद्ध में पांडवों की विजय के उपरांत वे लोग कृष्ण सहित [[कुरुक्षेत्र]] में रहे।  जब तक [[सूर्य देवता|सूर्य]] उत्तरायण नहीं हो गया, [[भीष्म]] पितामह नित्य ही उन्हें दान, धर्म, कर्तव्य का उपदेश देते रहे। उनके स्वर्गारोहण उपरांत पांडवों को [[हस्तिनापुर]] छोड़ते हुए कृष्ण अपने माता-पिता के दर्शन करने [[द्वारका|द्वारकापुरी]] चले गये।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(म0भा0, उद्योगपर्व, 130-131, [[द्रोण पर्व महाभारत|द्रोणपर्व]] 79)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण इस प्रकार क्रीड़ा करते हैं जैसे मनुष्य खिलौनें से क्रीड़ा करता है।  संपूर्ण चराचर भूत नारायण से उद्भूत है। पानी के बुद्बुद्वत् उसी में लीन हो जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(म0भा0, सभापर्व, अध्याय 38)&lt;br /&gt;
==हरिवंश पुराण==&lt;br /&gt;
कृष्ण और बलराम ने अनुभव किया कि [[ब्रज]]भूमि की वनश्री बच्चों की क्रीड़ा , गोपों की फल-सब्जी बेचने के लिए उपज तथा गौओं के क्षारयुक्त मल इत्यादि से नष्ट हो गयी है। इस कारण से उन्होंने निश्चय किया कि [[गोवर्धन]] पर्वत से युक्त [[कदम्ब]] इत्यादि वृक्षों से अपूरित [[वृन्दावन]] में जाकर रहना चाहिए।  कृष्ण ने अपने रोम-रोम से भयानक भेड़ियों को उत्पन्न किया।  उनको देखकर गोप-[[गोपी|गोपांगनाएं]] तथा गायें अत्यंत त्रस्त होकर ब्रजभूमि छोड़ने के लिए तुरंत तैयार हो गये।  लोग वृन्दावन में जा बसे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(हरिवंश [[पुराण]], विष्णुपर्व ।8-9)&lt;br /&gt;
==श्रीमद भागवत==&lt;br /&gt;
कंस की कारागार में वसुदेव के यहाँ भगवान ने कृष्ण-रूप में अवतार लिया।  दस वर्ष तक बलराम के साथ ऐसे रहे कि उनकी कीर्ति वृन्दावन से बाहर नहीं गयी।  वे गाय चराते तथा बांसुरी बजाकर सबको रिझाते थे।  खेल-खेल में उन्होंने अनेक असुरों का संहार किया, कंस को उठाकर पटक दिया।  कृष्ण ने अपनी शक्ति योगमाया से भौमासुर की लाई राजकन्याओं से एक ही मुहूर्त में अलग-अलग महलों में विधिवत् पाणिग्रहण संस्कार संपादित किया।  एक बार नंद ने कार्तिक शुक्ल एकादशी का उपवास किया तथा रात्रि में [[यमुना नदी|यमुना]] में स्नान करने लगे। वह असुरों की वेला थी।  अत: एक असुर उन्हें पकड़कर वरुण के पास ले गया।  कृष्ण वरुण के पास गये तथा नंद बाबा को वापस ले आये।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
नारद ने कंस को जाकर बताया कि कृष्ण वसुदेव का बेटा है तथा बलराम [[रोहिणी]] का।  वे दोनों छिपाकर नंद के यहाँ रखे गये हैं।  कंस ने कृष्ण को अपनी भावी मृत्यु का कारण मानकर वसुदेव तथा देवकी को पुन: कैद कर लिया।  श्रीकृष्ण ने कंस को मारकर उन्हें कैद से छुड़ाया। [[यदु]]वंशियों को [[ययाति]] का शाप था कि वे कभी शासन नहीं कर पायेंगे। अत: कृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन से शासन ग्रहण करने का अनुरोध किया।  कृष्ण और बलराम ने नंद से कहा-&amp;quot;पिताजी, आपका वात्सल्य अपूर्व है।  आपने तथा यशोदा ने अपने बालकों के समान ही हमें स्नेह दिया।  आप ब्रज जाइए। हम लोग भी यहाँ का काम निपटाकर आपसे मिलने आयेंगे।&amp;quot; वे दोनों [[अवंती]]पुर (उज्जैन) निवासी गुरुवर संदीपनि के गुरुकुल में रहकर उनकी सेवा करने लगे।  चौंसठ दिन में उन दोनों ने [[चौंसठ कलाएँ|चौंसठ कलाओं]] में निपुणता प्राप्त की तथा संदीपनि को गुरु-दक्षिणास्वरूप उसका मृत पुत्र पुन: लौटाकर वे दोनों मथुरा लौट गये।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 3।3।-,10।28।-,10।44।–)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के अनेक विवाह हुए थे। (कुछ को विशेष प्रसिद्धि नहीं प्राप्त हुई, वे यहाँ उल्लिखित हैं।) उनकी श्रुतकीर्ति नामक बूआ का विवाह केकय देश में हुआ था।  उनकी कन्या का नाम था भद्रा जिसका विवाह उसके भाई सन्तर्दन आदि ने कृष्ण से कर दिया था।  मद्र देश की राजकुमारी सुलक्षणा को कृष्ण ने स्वयंवर में हर लिया था।  इनके अतिरिक्त [[भौमासुर]] को मारकर अनेक सुंदरियों को वे कैद से छुड़ा लाये थे।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 10।56, 57, 58)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक बार सूर्य-ग्रहण के अवसर पर भारत के विभिन्न प्रांतों की जनता कुरुक्षेत्र पहुंची। वहां वसुदेव, कृष्ण और बलराम से नंद, यशोदा, गोप-गोपियों आदि का सम्मिलन हुआ।  कृष्ण ने [[गोपी|गोपियों]] आदि को अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दियां  उन्हीं दिनों वसुदेव के यज्ञोत्सव का आयोजन था।  उस संदर्भ में नंद बाबा, यशोदा तथा पांडव-परिवार के अधिकांश सदस्य तीन माह तक द्वारका में ठहरे।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 10 । 82-84)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक बार कृष्ण अपने दो भक्तों पर विशेष प्रसन्न हुए। उनमें से एक तो मिथिला निवासी गृहस्थी ब्राह्मण श्रुतदेव था और दूसरा मिथिला का राजा बहुलाश्व था।  श्रीकृष्ण ने दो रूप धारण करके एक ही समय में दोनों को दर्शन दिए तथा दोनों भक्तों ने भगवत्स्वरूप प्राप्त किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0, ।10।86।13-)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मा]] की प्रार्थना पर [[विष्णु]] ने हंस का रूप धारण करके सनकादि के चित्त तथा गुणों के अनैक्य के विषय में उपदेश दिया था।  यदुवंशियों के संहार के उपरांत जरा नामक व्याध को निमिंत्त बनाकर श्रीकृष्ण ने स्वधाम में प्रवेश कियां  उन्हें अपने धाम में प्रवेश करते कोई भी देवता देख नहीं पाया।  श्रीकृष्ण की कृपा से उनके शरीर पर प्रहार करने वाला व्याध सदेह स्वर्ग चला गया। &lt;br /&gt;
नश्वर शरीर के त्यागोपरांत वसुदेव, अर्जुन आदि बहुत दुखी हुए।  सब उनकी अलौकिक लीलाओं को स्मरण करते रहे।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0, 11।13।15-42/- 11 । 30/-)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी भागवत==&lt;br /&gt;
कृष्ण-कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्मे थे।  कश्यप ने वरुण से [[कामधेनु]] मांगी थी फिर लौटायी नहीं, अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए। देवी भागवत में [[दिति]] और [[अदिति]] को [[दक्ष]] कन्या माना गया है।  अदिति का पुत्र [[इन्द्र]] था जिसने मां की प्रेरणा से दिति के गर्भ के 49 भाग कर दिए थे जो मरूत हुए।  अदिति से रुष्ट होकर दिति ने शाप दिया था-'जिस प्रकार गुप्त रूप से तूने मेरा गर्भ नष्ट करने का प्रयत्न करवाया है उसी प्रकार पृथ्वी पर जन्म लेकर तू बार-बार मृतवत्सा होगी।' फलत: उसने [[देवकी]] के रूप में जन्म लिया।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
विष्णु ने देवताओं की रक्षा करने के निमित्त [[भृगु]] की पत्नी ([[शुकदेव|शुक]] की मां) का हनन किया था अत: भृगु के शापवश उन्होंने पृथ्वी पर बार-बार जन्म लिया।  [[नर-नारायण]] अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए।  अप्सराएं राजकुमारियों के रूप में जन्मीं तथा कृष्ण की पत्नियां हुई।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
दैत्य [[मधु]] का पुत्र [[लवण]] ब्राह्मणों को अनेक प्रकार से पीड़ित कर रहा था।  [[लक्ष्मण]] के भाई [[शत्रुघ्न]] ने उस दैत्य को मारकर [[मथुरा]] नामक नगरी की स्थापना की।  कालांतर में [[सूर्यवंश]] क्षीण हो गया।  [[ययाति]] कुलोत्पन्न यादवों ने मथुरा पर अधिकार कर लिया।  यादवराज [[शूरसेन]] के पुत्र का नाम वसुदेव था।  वह वरुण के शाप तथा कश्यप के अंश से उत्पन्न हुआ था।  शूरसेन की मृत्यु के उपरांत [[उग्रसेन]] को राज्य की प्राप्ति हुई।  उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था।  देवक राजा की कन्या का नाम [[देवकी]] था।  उसका जन्म वरुण के शाप तथा अदिति के अंश से हुआ था।  देवक ने उसका विवाह [[वसुदेव]] से कर दिया।  विवाह होते ही आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस को मार डालेगी।  कंस ने देवकी के बाल पकड़कर उसे मारने के लिए खड्ग उठा लिया।  वसुदेव के वीर साथियों से [[कंस]] का युद्ध होने लगा।  यादवों ने कंस को समझा-बुझाकर शांत किया कि अपनी बहन पर हाथ उठाना उचित नहीं है।  हो सकता है, किसी शत्रु ने ही यह आकाशवाणी रची हो।  वसुदेव ने कहा कि वह अपनी प्रत्येक संतान कंस को अर्पित कर देगा।  इस शर्त पर कंस ने उसे छोड़ दिया।  &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
वसुदेव देवकी को लेकर अपने घर चला गया।  प्रथम पुत्र उत्पन्न होने पर वसुदेव पुत्र सहित कंस के पास पहुंचा। कंस ने 'प्रथम बालक से नहीं, अष्टम बालक से भय है' कहकर बालक उसे लौटा दिया, किंतु तभी [[नारद]] ने वहां पहुंचकर कंस को समझाया कि गिनती कहां से शुरू करके किस बालक को अष्टम माना जायेगा, नहीं कहा जा सकता।  यह सुनकर कंस ने बालक को शिला पर पटककर मार डाला।  इसी प्रकार देवकी के छह पुत्र मारे गये। वे छहों शापवश जन्मते ही नष्ट हो गये।  पूर्वकाल में ब्रह्मा अपनी कन्या के प्रति कामुक हो उठे थे। रमण करते हुए ब्रह्मा को देख महर्षि मरीचि के (उर्णा नामक पत्नी के गर्भ से उत्पन्न) छह पुत्रों ने उनका परिहास किया था।  इससे रुष्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें असुर योनि में जन्म लेने का शाप दिया था।  फलत: पहले वे [[कालनेमि]] के पुत्र हुए, फिर हिरण्यकशिपु के पुत्र हुए।  दूसरे जन्म में ज्ञान विच्युत न होने के कारण ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा था कि हवे मनवांछित देवता अथवा [[गंधर्व]] हो जायें ! वर पाकर वे लोग तो प्रसन्न हुए।  हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्रों को ब्रह्मा का प्रिय  जान क्रोधावेश में कहा-&amp;quot;तुम पाताल में जाकर निद्रा में पड़े रहोगे। पृथ्वी पर षड्गर्क नाम से प्रसिद्ध होगे।  देवकी के गर्भ से जन्म लेकर कालनेमि के वंश से उत्पन्न कंस के हाथों मारे जाओगे।&amp;quot; देवकी के सातवें गर्भ में अनंत देव आये।  योगमाया ने योग-बल से इस गर्भ का आकर्षण करके उसे [[रोहिणी]] के गर्भ में स्थापित किया।  भौतिक दृष्टि से देवकी का गर्भपात मान लिया गया।  तदनंतर विष्णु के अंशावतार कृष्ण ने अष्टम् पुत्र के रूप में जन्म लिया।  योगमाया ने स्वेच्छा से यशोदा के गर्भ में प्रवेश किया। अन्य पात्रों के जन्म के मूलांश की &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''तालिका निम्नलिखित है:'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| border=&amp;quot;1&amp;quot; cellpadding=&amp;quot;10&amp;quot;&lt;br /&gt;
! मूलांश	&lt;br /&gt;
! कृष्ण-कथा के पात्र &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[हिरण्यकशिपु]]&lt;br /&gt;
|[[शिशुपाल]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|विप्रचित्त	&lt;br /&gt;
|[[जरासंध]] &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[प्रह्लाद]]	&lt;br /&gt;
|[[शल्य]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|खर&lt;br /&gt;
|[[लंबक तथा धेनुक]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वाराह और किशोर&lt;br /&gt;
|[[चाणूर और मुष्टिक]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|दिति पुत्र अरिष्ट&lt;br /&gt;
|कुवलय नामक&amp;lt;br /&amp;gt;कंस का हाथी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[यम]], [[रुद्र]], काम और क्रोध-चारों के अंश से [[अश्वत्थामा]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूमि का भार-हरण करने की प्रार्थना सुनकर हरि ने देवताओं को दो बाल दिये थे; एक काला-कृष्ण, दूसरा सफेद-[[बलराम]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(दे0 भा0, 4 । 20-25) &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण परमात्मा है। उनके सोलहवें अंश का एक अंश, सौ करोड़ सूर्यों के प्रकाश से युक्त एक बालक होकर, मूलशक्ति प्रसूत डिंब में स्थापित था डिंब के दो भागों में विभक्त होने पर भूखा-प्यासा वह बालक रोने लगा।  कालांतर में पूर्व संस्कार के बल से वह परम पुरुष श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न होकर हंसने लगा।  श्रीकृष्ण उस बालक को आशीर्वाद देकर त्रैलोक्य चले गये।  कृष्ण के आशीर्वाद से वह ज्ञानयुक्त हुआ।  उसने विराट रूप धारण किया, उसी के नाभिकमल से ब्रह्मा ने जन्म लिया तथा सृष्टि की रचना की।  सृष्टि के संहार के लिए ब्रह्मा के ललाट से एकादश रुद्र उत्पन्न हुए।  उस बालक के क्षुद्रांश से ही विष्णु ने उत्पन्न होकर सृष्टि का पालन किया ।  श्रीकृष्ण को चतुर्भुज नारायण से भिन्न माना गया है।  कृष्ण ही ब्रह्मा, विष्णु , [[शिव|महेश]] के कारणभूत हैं।  [[राधा]] सर्वशक्तिमति देवी हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(दे0भा0, 8/3)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिव पुराण==&lt;br /&gt;
[[दुर्वासा]] कृष्ण की परीक्षा लेने गये।  पर्याप्त आतिथ्य पाकर उन्होंने अपने रथ को कृष्ण तथा उनकी पत्नी [[रुक्मिणी]] से खिंचवाने की इच्छा प्रकट की।  कृष्ण और रुक्मिणी के सहर्ष रथ खींचने से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कृष्ण को 'पायस' दी और कहा कि वे अपने बदन पर लगा लें। जहां-जहां यह लगेगी, वहां किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं लग पायेगा।  कृष्ण ने वैसा ही किया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(शि0पु0, 44 ।7। 26) &lt;br /&gt;
==महाभारत के प्रमुख पात्र श्रीकृष्ण==&lt;br /&gt;
===मंगलाचरण===&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकों प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष है। यह विविध कथारूपी रत्नों का रत्नाकर तथा अज्ञान के अन्धकारको विनष्ट करने वाला सूर्य है। इस ग्रन्थके मुख्य विषय तथा इस महायुद्ध के महानायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं।  नि:शस्त्र होते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण ही महाभारत के प्रधान योद्धा हैं।  इसलिये सम्पूर्ण महाभारत भगवान् वासुदेव के ही नाम, रूप लीला और धामका संकीर्तन है। नारायण के नाम से इस ग्रन्थ के मंगलाचरण में व्यासजी ने सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्ण की ही वन्दना की है।&lt;br /&gt;
===द्रौपदी स्वयंवर===&lt;br /&gt;
महाभारत के [[आदि पर्व महाभारत|आदिपर्व]] में भगवान् श्रीकृष्ण का प्रथम दर्शन [[द्रौपदी]]-स्वयंवर के अवसर पर होता है।  अब [[अर्जुन]] के लक्ष्यवेध करने पर द्रौपदी उनके गले में जयमाला डालती है। तब [[कौरव]]पक्ष के लोग तथा अन्य राजा मिलकर द्रौपदी को पाने के लिये युद्धकी योजना बनाते हैं उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने उनको समझाते हुए कहा कि 'इन लोगों ने द्रौपदी को धर्मपूर्वक प्राप्त किया है, अत: आप लोगों को अकारण उत्तेजित नहीं होना चाहिये।' भगवान् श्रीकृष्ण को धर्म का पक्ष लेते हुए देखकर सभी लोग शान्त हो गये और द्रौपदी के साथ [[पाण्डव]] सकुशल अपने निवास पर चले गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===प्रथम पूजनीय===&lt;br /&gt;
धर्मराज [[युधिष्ठर]] के [[राजसूययज्ञ]] में जब यह प्रश्र उपस्थित हुआ कि यहाँ सर्वप्रथम किसकी पूजा की जाय तो उस समय महात्मा [[भीष्म]] ने कहा कि 'वासुदेव ही इस विश्व के उत्पत्ति एवं प्रलयस्वरूप हैं और इस चराचर जगत् का अस्तित्व उन्हीं से है।  वासुदेव ही अव्यक्त प्रकृति, सनातन कर्ता और समस्त प्राणियों के अधीश्वर हैं, अतएव वे ही प्रथम पूजनीय हैं।' भीष्म के इस कथन पर चेदिराज शिशुपाल ने श्रीकृष्ण की प्रथम पूजा का विरोध करते हुए उनकी कठोर निन्दा की और भीष्म पितामह को भी खरी-खोटी सुनायी।  भगवान् श्री कृष्ण धैर्यपूर्वक उसकी कठोर बातों को सहते रहे और जब वह सीमा पार करने लगा, तब उन्होंने सुदर्शन चक्र के द्वारा उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।  सबके देखते-देखते शिशुपाल के शरी रसे एक दिव्य तेज निकला और भगवान् श्रीकृष्ण में समा गया।  इस अलौकिक घटना से यह सिद्ध होता है। कि कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, भगवान् के हाथों मरकर वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;
===द्रौपदी===&lt;br /&gt;
पाण्डवों के एकमात्र रक्षक तो भगवान् श्रीकृष्ण ही थे, उन्हीं की कृपा और युक्ति से ही [[भीम|भीमसेन]] के द्वारा जरासन्ध मारा गया और युधिष्ठिर का राजसूययज्ञ सम्पन्न हुआ।  राजसूय यज्ञ का दिव्य सभागार भी मय दानव ने भगवान् श्रीकृष्ण के आदेश से ही बनाया।  द्यूत में पराजित हुए पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी जब भरी सभा में [[दु:शासन]] के द्वारा नग्न की जा रही थी, तब उसकी करुण पुकार सुनकर उस वनमाली ने वस्त्रावतार धारण किया।  शाक का एक पत्ता खाकर भक्तभयहारी भगवान् ने दुर्वासा के कोप से पाण्डवों की रक्षा की।&lt;br /&gt;
===शान्तिदूत===&lt;br /&gt;
युद्ध को रोकने के लिये श्रीकृष्ण शान्तिदूत बने, किंतु [[दुर्योधन]] के अहंकार के कारण युद्धारम्भ हुआ और राजसूययज्ञके अग्रपूज्य भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बने।  संग्राम भूमि में उन्होंने अर्जु नके माध्यम से विश्व को [[गीता]] रूपी दुर्लभ रत्न प्रदान किया।  भीष्म, [[द्रोणाचार्य|द्रोण]], [[कर्ण]] और अश्वत्थामा-जैसे महारथियों के दिव्यास्त्रों से उन्होंने पाण्डवों की रक्षा की।  युद्धका अन्त हुआ और युधिष्ठिर का धर्मराज्य स्थापित हुआ।  पाण्डवों का एकमात्र वंशधर उत्तरा का पुत्र [[परीक्षित]] अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से मृत उत्पन्न हुआ, किंतु भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से ही उसे जीवनदान मिला।  अन्त में [[गांधारी|गान्धारी]] के शाप को स्वीकार करके महाभारत के महानायक भगवान श्रीकृष्णने उद्दण्ड यादवकुल के परस्पर गृहयुद्ध में संहा रके साथ अपनी मानवी लीला का संवरण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऋग्वेद में कृष्ण==&lt;br /&gt;
[[वेद|ऋग्वेद]] में कृष्ण नाम का उल्लेख दो रूपों में मिलता है—एक कृष्ण आंगिरस, जो सोमपान के लिए अश्विनी कुमारों का आवाहन करते हैं (ऋग्वेद 8।85।1-9) और दूसरे कृष्ण नाम का एक असुर, जो अपनी दस सहस्र सेनाओं के साथ अंशुमती तटवर्ती प्रदेश में रहता था और इन्द्र द्वारा पराभूत हुआ था। कृष्ण सम्बन्धी इन दोनों सन्दर्भो में परस्पर सम्बन्ध है अथवा नहीं, इस विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों की स्तुति में कक्षिवान ऋषि द्वारा उन्हे कृष्ण के पौत्र विष्णापु के ज़िलाने का श्रेय दिया गया है(ऋग्वेद 1।116।7,23)।  कृष्ण के पुत्र विश्वक (विश्वकाय) ने भी एक सूक्त में सनतान के लिए अश्विनीकुमारों का आवाहन किया है और दूरस्थ विष्णापु को लाने की प्रार्थना की है (ऋग्वेद 8।86।1-5)। ऐसा जान पड़ता है कि कदाचित विष्णापु किसी प्रकार आहत हो गया था और कृष्ण आंगिरस और उनके पुत्र ने उसके जीवन के लिए आरोग्य के देवता [[अश्विनीकुमार|अश्विनीकुमारों]] से प्रार्थना की थी। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
कृष्णासुर के सम्बन्ध में भी उल्लेख है कि उसकी गर्भवती स्त्रियों का [[इन्द्र]] ने वध किया था (ऋग्वेद 1।101।1) ऋग्वेद के एक छंद में गायों के उद्धारकर्ता और स्वामी का उल्लेख है और विष्णु को उस लोक का अधिपति कहा गया है। परन्तु भागवत धर्म के उपास्य कृष्ण की कथा से इन सन्दर्भों का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं जान पड़ता।  [[छान्दोग्य उपनिषद]] में देवकीपुत्र कृष्ण को घोर [[आंगिरस]] का शिष्य कहा गया है और बताया गया है कि गुरु ने उन्हें यज्ञ की एक ऐसी सरल रीति बतायी थी जिसकी दक्षिणा, तप, दान, [[आर्जव]], अहिंसा, और सत्य थी। गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के बाद कृष्ण की ज्ञान-पिपासा सदा के लिए शान्त हो गयी।(छान्दोग्य उपनिषद 3।17।4-6)।  कृष्ण आंगिरस का उल्लेख कौशीतकी ब्राह्मण में भी मिलता है (30।9)।  कृष्ण-सम्बन्धी यह सन्दर्भ उन्हें गीता के उपदेष्टा और भागवत धर्म के पूज्य कृष्ण के निकट ले जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध साहित्य==&lt;br /&gt;
[[बौद्ध]] साहित्य में कृष्ण का उल्लेख दो स्थलों पर मिलता है-एक घत [[जातक कथा|जातक]] में वर्णित देवगब्भा और उपसागर के बलवान, पराक्रमी, उद्धत और क्रीड़ाप्रिय पुत्र वासुदेव कण्ह की कथा के रूप में और दूसरा महाउमग्ग जातक के कामासक्त वासुदेव कण्ह के सन्दर्भ में। घत जातक के वासुदेव कण्ह पुत्रशोक में दुखी चित्रित किये  गये हैं जिससे ऋग्वेद के आंगिरस कृष्ण के सन्दर्भ से उनका सूत्र जोड़ा जा सकता है।  महाउमग्ग, जातक में वासुदेव कण्ह द्वारा कामासक्त होकर चाण्डाल कन्या जाम्बवती को महिषी बनाने का उल्लेख हुआ है।&lt;br /&gt;
==अनेक वृत्तान्त==&lt;br /&gt;
===निपुण बलवान योद्धा=== &lt;br /&gt;
महाभारत में कृष्ण सम्बन्धी अनेक वृत्तान्त मिलते हैं।  भारत युद्ध में उनके पराक्रम, ऐश्वर्य और नीतिनैपुण्य के साथ उनके देवत्व का भी समन्वय पाया जाता है। सभापर्व में भीष्म द्वारा उनकी प्रशंसा समस्त [[वेद]]-[[वेदान्त]] के ज्ञाता तथा राजनीति में निपुण बलवान योद्धा के रूप में की गयी है।  [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योग पर्व]] में कहा गया है कि अर्जुन वज्रपाणि इन्द्र की अपेक्षा कृष्ण को अधिक पराक्रमी समझकर उन्हें युद्ध में अपनी ओर मिलाने में अपना सौभाग्य मानते हैं।  इसी स्थल पर कृष्ण के पराक्रम का वर्णन करते हुए उनके द्वारा दस्युओं के संहार, दुर्धर्ष राजाओं के विनाश, रुक्मिणी के हरण, नगजित के पुत्रों की पराजय, सुदर्शनराजा की मुक्ति, पाण्डय के संहार, [[काशी]] नगरी के उद्धार, निषादों के राजा एकलव्य के वध, उग्रसेन के पुत्र सुनाम की मृत्यु आदि कार्यो का वर्णन किया गया है। देवताओं के द्वारा उन्हें अवध्यता का वरदान मिला था। उन्होंने बाल्यावस्था में ही इन्द्र के घोड़े उच्चै:श्रवा के समान बली, [[यमुना नदी|यमुना]] के वन में रहने वाले हयराज को मार डाला था तथा वृष [[प्रलंब]], नरग, जृम्भ, मुर, [[कंस]] आदि का संहार किया था, [[जल देवता]] [[वरुण देवता|वरुण]] को पराजित किया था तथा पाताल वासी पंचजन को मारकर [[पान्चजन्य]] प्राप्त किया था। अपनी प्रिय पत्नी [[सत्यभामा]] की प्रसन्नता के लिए वे अमरावती से [[पारिजात]] लाये थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===वासुदेव===&lt;br /&gt;
महाभारत में प्राप्त कृष्ण सम्बन्धी इन सन्दर्भों से उनके ऐतिहासिक व्यक्तित्व की सूचना मिलती है और ज्ञात होता है कि वे [[वृष्णि संघ|वृष्णि]] वंशीय [[सात्वत]] जाति के पूज्य पुरुष थे। यह भी संकेत मिलता है कि महाभारत और पुराणों में वर्णित कृष्ण के चरित्र और किन्हीं ऐतिहासिक वासुदेव कृष्ण सम्बन्धी कथा में कुछ अन्तर अवश्य रहा होगा, क्योंकि महाभारत और [[पुराण|पुराणों]] में अनेक स्थलों पर इस बात पर बल दिया गया है कि यही कृष्ण वास्तविक वासुदेव हैं, यही द्वितीय वासुदेव हैं। द्वितीय वासुदेव कहने का अभिप्राय यह था कि कुछ अन्य राजा भी अपने को द्वितीय वासुदेव के नाम से प्रसिद्ध करने का यत्न करते थे।  पौण्ड्र राजा पुरुषोत्तम और करवीरपुर के राजा श्रृगाल इसी प्रकार के व्यक्ति थे, जिन्हें मारकर कृष्ण ने सिद्ध किया कि उनका वासुदेवत्व मिथ्या है तथा वे ही स्चयं एकमात्र वासुदेव हैं।&lt;br /&gt;
===पुराणों में कृष्ण===&lt;br /&gt;
[[महाभारत]], [[हरिवंश पुराण]] तथा [[विष्णु पुराण]], [[वायु पुराण]], [[वामन पुराण]], [[भागवत पुराण]] आदि पुराणों में कृष्ण की तुलना में इन्द्र की हीनता सिद्ध करने के लिए अनेक कथाएँ दी गयी हैं; परन्तु फिर भी [[गोवर्धन]] धारण के प्रसंग में उनके इन्द्र द्वारा अभिषिक्त होने और 'उपेन्द्र' नाम से स्वीकृत होने का उल्लेख हुआ है। पुराणों में विविध कथाओं के माध्यम से उत्तरोत्तर कृष्ण की महत्ता और उसी अनुपात में इन्द्र की हीनता प्रमाणित की गयी है। महाभारत में कृष्ण के ऐश्वर्य और देवत्व का प्रचुर वर्णन है परन्तु उनके लालित्य और माधुर्य का कोई संकेत नहीं मिलता। महाभारत उनके गोप जीवन और [[गोपी]] प्रेम के सम्बन्ध में सर्वथा मौन है। [[सभा पर्व महाभारत|सभा पर्व]] के उस प्रसंग में भी, जिसे प्रक्षिप्त कहा जाता है और जिसमें शिशुपाल कृष्ण की निन्दा करते हुए उनके द्वारा पूतना, बकासुर, केशी, वत्सासुर और कंस के वध तथा गोवर्द्धन धारण किये जाने का उल्लेख करता है, गोपियों से उनके प्रेम का कोई संकेत नहीं किया गया है।  इससे यह स्पष्ट सूचित होता है कि गोपाल कृष्ण का ललित और मधुर चरित मूलत: महाभारत के कृष्ण के चरित से भिन्न था।  पुराणों में वर्णित कृष्ण सम्बन्धी ललित कथाएँ उनमें उत्तरोत्तर वृद्धि पाती गयी हैं।  उदाहरण के लिए हरिवंश में जिसे 'वास्तव में महाभारत का परिशिष्ट कहा जाता है, उनके गोपाल रूप सम्बन्धी सन्दर्भ अतयन्त संक्षिप्त है।  उनकी तुलना में उनके ऐश्वर्य रूप की भोग-विलास सम्बन्धी अनेक कथाएँ कहीं अधिक विस्तार से वर्णित हैं।  विष्णु पुराण में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। किन्तु भागवत, [[पद्म पुराण]] , [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]] तथा कुछ अन्य पुराणों में, जिन्हें परवर्ती कहा जा सकता है, गोपालकृष्ण सम्बन्धी कथन अधिक विस्तृत होने लगे हैं। पुराणों के भोग-ऐश्वर्य सम्बन्धी आख्यानों और गोप-गोपी लीला सम्बन्धी मधुर कथाओं में वातावरण का बहुत अन्तर पाया जाता है। यदि एक में घोर भौतिकता, विलासिता और नग्न ऐन्द्रियता है तो दूसरे में भावात्मक कोमलता, हार्दिक उत्फुल्लता, सूक्ष्म अनुभूति और अलौकिकता की ओर उन्मुख उदात्तता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===शूरसेन प्रदेश===&lt;br /&gt;
अनुमान है कि गोपाल कृष्ण मूलत: [[शूरसेन]] प्रदेश के सात्वत वृष्णिवंशी पशुपालक क्षत्रियों के कुल देवता थे और उनके क्रीड़ा कौतुक की मनोरंजक कथाएँ मौखिक रूप में लोक-प्रचलित थीं। इन कथाओं के लोक-प्रचलित होने के प्रमाण कुछ पाषाण मूर्तियों और शिलापट्टों पर उत्कीर्ण चित्रों में मिले है।  मथुरा में प्राप्त एक खण्डित शिलापट्ट में वसुदेव नवजात कृष्ण को एक सूप में सिर पर रखकर यमुना पार करते हुए दिखाये गये हैं। 5वीं शताब्दी ईसवी के एक दूसरे खण्डित शिलापट्ट में [[कालिय नाग|कालिय-दमन]] का दृश्य दिखाया गया है।  यह छठी शताब्दी ईस्वी की अनुमान की गयी है। बंगाल के पहाड़पुर नामक स्थान में छठी शताब्दी की कुछ मृण्मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें [[धेनुकासुर वध]], [[यमलार्जुन उद्धार]] तथा [[मृष्टिक चाणूर]] के साथ मल्ल-युद्ध के दृश्य दिखाये गये हैं।  यहीं पर एक अन्य मूर्ति मिली है जिसमें कृष्ण को किसी गोपी के साथ प्रसिद्ध मुद्रा में खड़े दिखाया गया है।  अनुमान किया गया है कि यह गोपी सम्भवत: [[राधा]] का सबसे प्राचीन मूर्तिगत प्रमाण प्रस्तुत करती है। राजस्थान के मण्डोर तथा बीकानेर के पास सूरतगढ़ में क्रमश: द्वारपाटों पर उत्कीर्ण गोवर्द्धन –धारण, नवनीत-चौर्य, [[शकटभंजन]] और कालिय-दमन के चित्र उत्कीर्ण मिले हैं तथा गोवर्द्धन-धारण और दान-लीला का दृश्यांकन प्रस्तुत करने वाले कुछ सुन्दर मिट्टी के खिलौने प्राप्त हुए हैं। मण्डोर के चित्र चौथी-पाँचवी शताब्दी ईस्वी के अनुमान किये गये हैं।  दक्षिण भारत के बादामी के पहाड़ी किले पर कृष्ण-जन्म, पूतना-वध, शकट-भंजन, कंस-वध आदि के अनेक दृश्य गुफ़ाओं में उत्कीर्ण मिले हैं। जो छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी के माने जाते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;(दे0 आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्ट 1926-27, 1905-6 तथा 1928-29 ई॰)&amp;lt;/ref&amp;gt;।&lt;br /&gt;
==काव्य में कृष्ण==&lt;br /&gt;
काव्य में गोपाल कृष्ण की लीला का पहला सन्दर्भ प्रथम शताब्दी ईसवी में रचित [[अश्वघोष]] के बुद्धिचरित' (1-5) में मिलता है। अनुमानत: प्रथम शताब्दी ईस्वी में हाल [[सातवाहन]] द्वारा संगृहीत 'गाहासत्तसई' (गाथा सप्तशती) में कई गाथाएँ कृष्ण, राधा, गोपी, [[यशोदा]] आदि से सम्बद्ध मिलती हैं &amp;lt;ref&amp;gt;(दे0 'गाहासत्तसई' 1।29, 5।47, 2।12, 2।14)&amp;lt;/ref&amp;gt;। इन गाथाओं में कृष्ण द्वारा नारियों के गौरवहरण, मुखमारूत से राधिका के गोरज के अपनयन आदि के उल्लेख हुए हैं।  इन उल्लेखों से सूचित होता है कि कृष्ण के गोपी-प्रेमसम्बन्धी प्रसंग कम से कम पहली शताब्दी ईस्वी के पहले से ही लोक-प्रचलित थे।  यह अवश्य द्रष्टव्य है कि'गाहासत्तसई' में भक्ति भावना का कोई संकेत नहीं मिलता, उसका वातावरण सर्वथा लौकिक श्रृंगार का ही है परन्तु इससे भिन्न दक्षिण के आलवार सन्तों द्वारा रचित गीत पूर्णतया भक्ति भावना से प्रेरित और अनुप्राणित हैं।  इन सन्तों का समय पाँचवीं से नवीं शताब्दी ईसवी अनुमान किया गया है।  आलवार सन्तों के इन गीतों में विष्णु , नारायण अथवा वासुदेव तथा उनके अवतारों-[[राम]] और कृष्ण के प्रति अपूर्व भक्ति –भाव प्रकट किया गया है।  इनमें गोपाल-कृष्ण की ललित लीला के ऐसे अनेक प्रसंग वर्णित हैं जो उत्तर भारत के मध्यकालीन कृष्ण भक्ति- काव्य के प्रिय विषय रहे हैं।  इन गीतों में कृष्ण की प्रेम-लीलाओं से सम्बद्ध एक नाप्पित्राय नामक गोपी का प्रमुख रूप समें वर्णन है। उसे कृष्ण की प्रियतमा और विष्णु की अर्द्धागिनी [[महालक्ष्मी देवी|लक्ष्मी]] का अवतार कहा गया है। अनुमान है कि यह गोपी उत्तर भारत की कृष्णकथा में प्रयुक्त राधा ही है। राधाकृष्ण कथा की प्राचीनता की दृष्टि से तमिल साहित्य का यह प्रमाण महत्त्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
===राधा के प्रेम सन्दर्भ===&lt;br /&gt;
आठवीं शंताब्दी में रचित भट्टानारायण के 'वेणीसंहार' नामक-नाटक में नांदीश्लोक में तथा वाकपति राज द्वारा लिखित प्राकृत महाकाव्य 'गउडवहो' के मंगलाचरण में कृष्ण की स्तुति उनके राधा और गोपी-प्रेम तथा यशोदा के वात्सल्यभाजन होने की स्पष्ट सूचना देती है। 'गउडवहो' में उन्हें 'विष्णुस्वरूप' और 'लक्ष्मीपति' भी कहा गया है। नवीं शताब्दी ईसवी के 'ध्वन्यालोक' में उद्धृत दो [[श्लोक|श्लोकों]] में कृष्ण और राधा के मधुर प्रेम के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं।  दसवीं शताब्दी के त्रिविक्रम भट्ट रचित 'नलचम्पू' के एक श्लोक में परम पुरुष कृष्ण के साथ राधा के अनुराग का संकेत प्राप्त होता है। दसवीं शताब्दी की ही बल्लभदेव द्वारा रचित 'शिशुपालवध' की टीका तथा सोमदेवपूरि के 'यशस्यतिलकचम्पू' में भी राधा के प्रिय कृष्ण का जिस रूप में उल्लेख मिलता है उससे कृष्ण के गोपीवल्लभ रूप की सूचना प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;
===प्रेम क्रीड़ाओं का सन्दर्भ===&lt;br /&gt;
'कवीन्द्रवचन समुच्चय' नामक कवितासंग्रह भी दसवीं शताब्दी का माना गया है।  इसमें संकलित अनेक श्लोकों में कृष्ण की गोपी और राधा सम्बन्धी प्रेम क्रीड़ाओं का सन्दर्भ मिलता है जिनसे कृष्ण के यशोदा के वात्सल्य-भाजन, गोपियों के कान्त, गोपों के सृहृद् तथा राधा के अनन्य प्रेमभाजन व्यक्तित्व की सूचना मिलती है। इन सभी सन्दर्भो में कृष्ण के दक्षिण और धृष्ट नायकत्व के भी स्पष्ट संकेत हैं। दशवीं शताब्दी तक राधा और कृष्ण के प्रति पूज्यभाव भी विकसित हो चुका था। इसका प्रमाण मालवाधीश वाक्पति मुंजपरमार के एक अभिलेख से भी मिलता है जिसमें श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए उनका विष्णु रूप में वर्णन है और साथ ही उन्हे राधा के विरह में पीड़ित कहा गया है। दशवीं शताब्दी के आसपास रचित श्रीमद्भागवत में कृष्णचरित का व्यापक वर्णन है इसमें उनके सभी स्वरूपों का वर्णन और संकेत है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
कृष्ण के व्यक्तित्व के लालित्य और माधुर्य के साथ उनके दैवत रूप की प्रतिष्ठा 12वीं शताब्दी तक और अधिक दृढ़ता के साथ हो गयी थी। इसका प्रमाण लीलाशुक द्वारा रचित 'कृष्णकर्णामृतस्तोत्र' ईश्वरपुरी द्वारा रचित 'श्रीकृष्णलीलामृत ' का श्रृगांर रस निश्चित रूप से माधुर्य भक्ति है। इसी प्रकार 'गीतगोविन्द' में राधा-माधव के जिस उद्दाम श्रृंगार का वर्णन किया गया है, उसकी मूल प्रेरणा भी धार्मिक है। कृष्ण के व्यक्तित्व में इस प्रकार जिस लोकरंजनकारी लालित्य का उदात्तीकरण वैष्णव भक्ति के विकास में होता गया उसी की चरम परिणति हम परवर्ती साहित्य में पाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===असंख्य कथा प्रसंग===&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी के बाद कृष्ण-काव्य मृक्तकों के अतिरिक्त प्रबन्धों के रूप में भी प्राप्त होता है। 'सदुक्तिकर्णामृत' नामक एक मुक्तक संग्रह 13वीं शताब्दी के प्रारम्भ का हैं। जिसमें गोपाल कृष्ण की लीला से सम्बद्ध साठ श्लोक हैं। इन श्लोकों में गोपाल कृष्ण के शैशव, कैशोर और यौवन की ललित लीलाओं का ही वर्णन मिलता है। 13वी-14वी शताब्दी में रचित बोपदेव की 'हरिलीला' तथा वेदान्तदेशिककी 'यादवाभ्युदय' नामक रचनाएँ तथा पन्द्रहवीं शताब्दी की 'ब्रजबिहारी' (श्रीधरस्वामी), 'गोपलीला' (रामचन्द्र भट्ट), ' हरिचरित'-काव्य (चतुर्भुज), 'हरिविलास'-काव्य (ब्रजलोलिम्बराज), 'गोपालचरित' (पद्मनाभ), 'मुरारिविजय'- नाटक (कृष्ण भट्ट) और 'कंस-निधन' महाकाव्य (श्रीराम) आदि अनेक काव्य और नाटक गोपालकृष्ण के मधुर, ललित और पूज्य चरित का चित्रण करते हैं। 16वीं शताब्दी से कृष्णभक्ति आन्दोलन सम्पूर्ण उत्तर भारत में व्याप्त हो गया और कृष्ण-काव्य आधुनिक भाषाओं में रचा जाने लगा।  इस काव्य का मूलाधार श्रीमद्भागवत था, परन्तु साथ ही कवियों ने लोक में प्रचलित कृष्णसम्बन्धी उन असंख्य कथा प्रसंगों का भरपूर उपयोग किया जिनमें कृष्ण का चरित वात्सल्य, सख्य और माधुर्यव्यंजक लीलाओं से समन्वित रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सूरदास==&lt;br /&gt;
हिन्दी का कृष्ण-भक्ति काव्य यद्यपि [[सूरदास]] से प्रारम्भ होता है परन्तु इससे पहले 15वीं शताब्दी में [[विद्यापति]] ने अपने पदों में कृष्ण के श्रृंगारी रूप का जो वर्णन किया था उसकी प्रकृति भले ही लौकिक श्रृंगार की रही हो, उसका उपयोग भक्तों ने माधुर्य भक्ति के सन्दर्भों में ही किया। विद्यापति और हिन्दी के रीतिकालीन राधाकृष्ण सम्बन्धी श्रृंगार –काव्य के बीच हिन्दी भक्तिकाव्य का एक लम्बा व्यवधान है जिसमें कृष्ण का व्यक्तित्व कवियों ने अत्यन्त कुशलता के साथ् मानव और अतिमानव के परस्पर विरोधी तत्त्वों से निर्मित कर चित्रित किया है। कृष्ण के इस चरित-चित्रण में बड़ी विलक्षणता है। एक ओर उन्हें विष्णु का अवतार, ब्रह्मा-विष्णु और महेश से परे तथा साक्षात् सच्चिदानन्द ब्रह्म कहा गया है, तो दूसरी ओर उनकी शैशव, बाल्य और किशोरकाल की अत्यन्त मानवीय और स्वाभाविक लीला का मनोहर वर्णन किया गया है। हिन्दी कृष्ण-काव्य के रचयिताओं में कृष्ण का सम्यक् चरित्र-चित्रण वास्तव में सूरदास ने ही किया किन्तु सूरदास का चरित्र-चित्रण वस्तुत: भावांत्मक है। प्रधान रूप से उन्होंने कृष्ण को वात्सल्य, सख्य और माधुर्य का आलम्बन बनाया है और इन भावों का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण करते हुए दैन्य और विस्मय के भावों के सहारे उनके प्रति पूज्य भावना व्यक्त की है।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
कृष्ण के चरित्र-चित्रण में सूर की अन्य विशेषता यह है कि यद्यपि वे नन्द-यशोदा, गोप-गोपी, आदि के साथ राग-रंग में आचूल मग्न रहते हैं, फिर भी उनके व्यवहार से व्यंजित होता है कि वास्तव में वे भावातीत और वीतराग हैं। कृष्ण के मथुरा और द्वारका-प्रवास तथा उनके प्रति ब्रजवासियों और विशेषकर गोपियों के विरह-भाव का वर्णन करते हुए सूरदास ने कृष्ण के इस विलक्षण व्यक्तित्व का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है।  इसके द्वारा हमें गीता के योगिराज कृष्ण की अनासक्ति का व्यावहारिक परिचय मिलता है।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
सूरदास के अतिरिक्त अन्य कृष्ण-भक्त कवियों ने कृष्ण के सम्पूर्ण चरित का चित्रण नहीं किया।  बहुत थोड़े से कवियों ने कृष्ण के बाल्य और किशोरकाल के जीवन का परिचय दिया। अधिकांश कवि उनके माधुर्यपूर्ण चरित की ओर ही झुके और राधा और गोपियों के साथ उनके प्रेम सम्बन्धों के चित्रण में ही निमग्न रहें कृष्ण के प्रेमी और प्रेमपात्र दोनों रूपों के चित्रण में अनेक कवियों ने तन्मयता प्रदर्शित की, परन्तु सूरदास ने उनमें वीतरागत्व और अनासक्ति के संकेतों तथा अन्य उपायों द्वारा जिस आध्यात्मिकता की उच्च काव्यमयी व्यंजना की थी, वह कोई अन्य कवि नहीं कर सका।  सूरदास ने कृष्ण के असुर-संहारी रूप का भी विशद वर्णन किया था।  यद्यपि उनके वर्णन में कृष्ण की वीरता और पराक्रम के स्थान पर उनके विस्मयकारी क्रीडा-कौतक की ही प्रधानता है, परन्तु उनका उद्देश्य जिस अलौकिक की व्यंजना करना था उसे परवर्ती कवि नहीं समझ सके। इस कारण उन्होंने कृष्ण-चरित के इस पक्ष की प्राय: उपेक्षा ही की।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के सहज मानवीय श्रृंगारी रूप को सूरदास ने उनके प्रति दैन्य भावना व्यक्त करके तथा उनके अलौकिक कृत्यों के वर्णयन द्वारा विस्मय की व्यंजना करके उनके चरित में जिस उदात्तता का सन्निवेश किया था, परवर्ती कवियों ने उसे विस्मृत कर दिया और श्रीकृष्ण का चरित लगभग पूर्ण रूप में इहलौकिक हो गया और उसमें मानव व्यक्तित्व की संकुचित एकांगिता ही शेष रह गयी।  फलत: जीवन की व्याख्या की कसौटी पर कसने पर वह अत्यन्त कल्पित और अयथार्थ लगता है, जैसे राग-रंग और आनन्द-विहार में लिप्त जीवन का कोई उद्देश्य ही न हो। वास्तव में तथ्य यही है कि कृष्ण-चरित जीवन के वास्तविक चित्रण अथवा आदर्श चित्रण के रूप में रचा ही नहीं गया, उनका चरित वास्तव में परब्रह्म की लीलामात्र हैं जिसका प्रयोजन लीलानन्द के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं। उसका उद्देश्य अखण्ड आनन्द में जीवन की आध्यात्मिक परिपूर्णता की व्यंजना करना ही हैं भक्त कवियों ने उस आनन्द का रूप स्त्री-आनन्द रूप में परम पुरुष हैं और उनकी परा शक्ति रूप प्रकृति स्वरूपा राधा हैं जिनके संयोग से ही परम आनंद की परिपूर्णता सिद्ध होती है।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{कृष्ण}}&lt;br /&gt;
{{कृष्ण2}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कृष्ण काल]]&lt;br /&gt;
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		<title>ताजमहल</title>
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[[चित्र:Tajmahal.jpg|ताजमहल, [[आगरा]] &amp;lt;br /&amp;gt;Tajmahal, Agra|thumb]]&lt;br /&gt;
*[[आगरा]] में [[यमुना नदी|यमुना]] के किनारे स्थित ताजमहल [[मुग़ल काल|मुग़ल]] शासन का सबसे प्रसिद्ध स्मारक है। &lt;br /&gt;
*इसे [[शाहजहाँ]] ने अपनी बेगम मुमताज महल की क़ब्र के ऊपर बनवाया था। मृत्यु के बाद शाहजहाँ को भी वहीं दफ़नाया गया। &lt;br /&gt;
*इस स्मारक का नक़्शा भारतीय वास्तुकार ईसा ने बनाया था। कुछ लोगों का अनुमान है कि नक़्शा बनाने में इटली अथवा फ्रांस के वास्तुकार की भी मदद ली गई थी। [[चित्र:Tajmahal-1.jpg|thumb|ताजमहल, [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Tajmahal, Agra|left]]&lt;br /&gt;
*ताजमहल का निर्माण 1632 ई॰ में आरंभ हुआ और 1653 ई॰ में पूरा हुआ। उस समय इसके निर्माण में तीन करोड़ बीस लाख रुपये लगे थे। &lt;br /&gt;
*सफेद संगमरमर की यह कृति संसार भर में प्रसिद्ध है और पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंन्द्र है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर_प्रदेश_के_पर्यटन_स्थल]][[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]][[Category:ऐतिहासिक_स्थान_कोश]][[Category:मुग़ल_साम्राज्य]][[Category:ऐतिहासिक_स्थल]][[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय स्मारक]]&lt;br /&gt;
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[[चित्र:Tajmahal.jpg|ताजमहल, [[आगरा]] &amp;lt;br /&amp;gt;Tajmahal, Agra|thumb]]&lt;br /&gt;
*[[आगरा]] में [[यमुना नदी|यमुना]] के किनारे स्थित ताजमहल [[मुग़ल काल|मुग़ल]] शासन का सबसे प्रसिद्ध स्मारक है। &lt;br /&gt;
*इसे [[शाहजहाँ]] ने अपनी बेगम मुमताज महल की क़ब्र के ऊपर बनवाया था। मृत्यु के बाद शाहजहाँ को भी वहीं दफ़नाया गया। &lt;br /&gt;
*इस स्मारक का नक़्शा भारतीय वास्तुकार ईसा ने बनाया था। कुछ लोगों का अनुमान है कि नक़्शा बनाने में इटली अथवा फ्रांस के वास्तुकार की भी मदद ली गई थी। [[चित्र:Tajmahal-1.jpg|thumb|ताजमहल, आगरा&amp;lt;br /&amp;gt; Tajmahal, Agra|left]]&lt;br /&gt;
*ताजमहल का निर्माण 1632 ई॰ में आरंभ हुआ और 1653 ई॰ में पूरा हुआ। उस समय इसके निर्माण में तीन करोड़ बीस लाख रुपये लगे थे। &lt;br /&gt;
*सफेद संगमरमर की यह कृति संसार भर में प्रसिद्ध है और पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंन्द्र है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर_प्रदेश_के_पर्यटन_स्थल]][[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]][[Category:ऐतिहासिक_स्थान_कोश]][[Category:मुग़ल_साम्राज्य]][[Category:ऐतिहासिक_स्थल]][[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
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		<title>ब्रह्माण्ड घाट महावन</title>
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&lt;div&gt;[[चित्र:Brhamand-Ghat-1.jpg|ब्रह्माण्ड घाट, [[महावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Brhamand Ghat, Mahavan|thumb]]&lt;br /&gt;
जन्मस्थली नन्दभवन से प्राय: एक मील पूर्व में ब्रह्माण्ड घाट विराजमान है। यहाँ पर बाल[[कृष्ण]] ने गोप-बालकों के साथ खेलते समय मिट्टी खाई थी।  माँ [[यशोदा]] ने [[बलराम]] से इस विषय में पूछा।  बलराम ने भी कन्हैया के मिट्टी खाने की बात का समर्थन किया। मैया ने घटनास्थल पर पहुँच कर कृष्ण से पूछा-'क्या तुमने मिट्टी खाई?' कन्हैया ने उत्तर दिया- नहीं मैया! मैंने मिट्टी नहीं खाईं।' यशोदा मैया ने कहा-कन्हैया ! अच्छा तू मुख खोलकर दिखा।' कन्हैया ने मुख खोल कर कहा- 'देख ले मैया।' मैया तो स्तब्ध रह गई।  अगणित ब्रह्माण्ड, अगणित [[ब्रह्मा]], [[विष्णु]], [[शिव|महेश]] तथा चराचर सब कुछ कन्हैया के मुख में दिखाई पड़ा।  भयभीत होकर उन्होंने आँखें बन्द कर लीं तथा सोचने लगीं, मैं यह क्या देख रही हूँ? क्या यह मेरा भ्रम है य किसी की माया है? आँखें खोलने पर देखा कन्हैया उसकी गोद में बैठा हुआ है।  यशोदा जी ने घर लौटकर ब्राह्मणों को बुलाया।  इस दैवी प्रकोप की शान्ति के लिए स्वस्ति वाचन कराया और ब्राह्मणों को गोदान तथा दक्षिणा दी। श्रीकृष्ण के मुख में भगवत्ता के लक्षण स्वरूप अखिल सचराचर विश्व ब्रह्माण्ड को देखकर भी यशोदा मैया ने कृष्ण को स्वयं-भगवान के रूप में ग्रहण नहीं किया।  उनका वात्सल्य प्रेम शिथिल नहीं हुआ, बल्कि और भी समृद्ध हो गया । दूसरी ओर कृष्ण का चतुर्भुज रूप दर्शन कर [[देवकी]] और [[वसुदेव]] का वात्सल्य-प्रेम और विश्वरूप दर्शन कर [[अर्जुन]] का सख्य-भाव शिथिल हो गया। ये लोग हाथ जोड़कर कृष्ण की स्तुति करने लगे। इस प्रकार [[ब्रज]] में कभी-कभी कृष्ण की भगवत्तारूप ऐश्वर्य का प्रकाश होने पर भी ब्रजवासियों का प्रेम शिथिल नहीं होता । वे कभी भी श्रीकृष्ण को भगवान के  रूप में ग्रहण नहीं करते। उनका कृष्ण के प्रति मधुर भाव कभी शिथिल नहीं होता ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दूसरा प्रसंग'''&lt;br /&gt;
[[चित्र:Brhamand-Ghat-2.jpg|ब्रह्माण्ड घाट, [[महावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Brhamand Ghat, Mahavan|thumb]]&lt;br /&gt;
बालकृष्ण एक समय यहाँ सहचर ग्वालबालों के साथ खेल रहे थें  अकस्मात बाल-टोली ताली बजाती और हँसती हुई कृष्ण को चिढ़ाने लगी।  पहले तो कन्हैया कुछ समझ नहीं सके, किन्तु क्षण भर में उन्हें समझमें आ गया।  दाम, श्रीदाम, मधुमंगल आदि ग्वालबाल कह रहे थे कि [[नन्द]]बाबा गोरे, [[यशोदा]] मैया गोरी किन्तु तुम काले क्यों? सचमुच में तुम यशोदा मैया की गर्भजात सन्तान नहीं हो।  किसी ने तुम्हें जन्म के बाद पालन-पोषण करने में असमर्थ होकर जन्मते ही किसी वट वृक्ष के कोटरे में रख दिया था। परम दयालु नन्दबाबा ने वहाँ पर असहाय रोदन करते हुए देखकर तुम्हें उठा लिया और यशोदा जी की गोद में डाल दिया।  किन्तु यथार्थत: तुम नन्द-यशोदा के पुत्र नहीं हो। कन्हैया खेलना छोड़कर घर लौट गया और आँगन में क्रन्दन करता हुआ लोटपोट करने लगा। माँ यशोदा ने उसे गोद में लेकर बड़े प्यार से रोने का कारण पूछना चाहा, किन्तु आज कन्हैया गोद में नहीं आया।  तब मैया जबरदस्ती अपने अंक में धारण कर अंगों की धूल झाड़ते हुए रोने का कारण पूछने लगी।  कुछ शान्त होने पर कन्हैया ने कहा-दाम, श्रीदाम आदि गोपबालक कह रहे हैं कि तू अपनी मैया की गर्भजात सन्तान नहीं है। 'बाबा गोरे, मैया गोरी और तू कहाँ से काला निकल आया।  यह सुनकर मैया हँसने लगी और बोली-'अरे लाला! ऐसा कौन कहता हैं?' कन्हैया ने कहा-'दाम, श्रीदाम, आदि  के साथ दाऊ भैया भी ऐसा कहते हैं।' मैया गृहदेवता श्रीनारायण की शपथ लेते हुए कृष्ण के मस्तक पर हाथ रखकर बोली- 'मैं श्री नारायण की शपथ खाकर कहती हूँ कि तुम मेरे ही गर्भजात पुत्र हो।' अभी मैं बालकों को फटकारती हूँ।  इस प्रकार कहकर कृष्ण को स्तनपान कराने लगी।  इस लीला को संजोए हुए यह स्थली आज भी विराजमान है। यथार्थत: नन्दबाबा जी गौर वर्ण के थे।  किन्तु यशोदा मैया कुछ हल्की सी साँवले रंग की बड़ी ही सुन्दरी गोपी थीं। नहीं तो यशोदा के गर्भ से पैदा हुए कृष्ण इतने सुन्दर क्यों होते? किन्तु कन्हैया यशोदा जी से कुछ अधिक साँवले रगं के थे। बच्चे तो केवल चिढ़ाने के लिए वैसा कह रहे थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चिन्ताहरणघाट==&lt;br /&gt;
ब्रह्माण्ड घाट से सटे हुए पूर्व की ओर श्री[[यमुना नदी|यमुना]] जी का चिन्ताहरण घाट है। यहाँ चिन्ताहरण [[शिव|महादेव]]का दर्शन है।  ब्रजवासी इनका पूजन करते हैं  कन्हैया के मुख में ब्रह्माण्ड दर्शन के पश्चात माँ यशोदा ने अत्यन्त चिन्तित होकर चिन्ताहरण महादेव से कृष्ण के कल्याण की प्रार्थना की थी।&lt;br /&gt;
==ब्रह्माण्ड घाट वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Brhamand-Ghat-3.jpg|ब्रह्माण्ड घाट, [[महावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Brhamand Ghat, Mahavan&lt;br /&gt;
चित्र:Brhamand-Ghat-4.jpg|ब्रह्माण्ड घाट, [[महावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Brhamand Ghat, Mahavan&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थल]] [[Category:उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल]] [[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]] [[Category:पर्यटन कोश]] [[Category:ब्रज के धार्मिक स्थल]] [[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>बलदेव मथुरा</title>
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		<updated>2010-06-15T09:45:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==स्थिति==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Baldev-Temple-1.jpg|[[बलदेव मन्दिर मथुरा|दाऊजी मन्दिर]], बलदेव&amp;lt;br /&amp;gt; Dauji Temple, Baldev|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
यह स्थान [[मथुरा]] जनपद में ब्रजमंडल के पूर्वी छोर पर स्थित है। मथुरा से 21 कि॰मी॰ दूरी पर [[एटा]]-मथुरा मार्ग के मध्य में स्थित है। मार्ग के बीच में [[गोकुल]] एवं [[महावन]] जो कि [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित 'वृहद्वन' के नाम से विख्यात है, पड़ते हैं। यह स्थान पुराणोक्त 'विद्रुमवन' के नाम से निर्दिष्ट है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी विद्रुभवन में भगवान श्री [[बलराम]] जी की अत्यन्त मनोहारी विशाल प्रतिमा तथा उनकी सहधर्मिणी राजा ककु की पुत्री ज्योतिष्मती रेवती जी का विग्रह है। यह एक विशालकाय देवालय है जो कि एक दुर्ग की भाँति सुदृढ प्राचीरों से आवेष्ठित है। मन्दिर के चारों ओर सर्प की कुण्डली की भाँति परिक्रमा मार्ग में एक पूर्ण पल्लवित बाज़ार है। इस मन्दिर के चार मुख्य दरवाजे हैं, जो क्रमश: &lt;br /&gt;
#सिंहचौर, &lt;br /&gt;
#जनानी ड्योढी, &lt;br /&gt;
#गोशाला द्वार,  &lt;br /&gt;
#बड़वाले दरवाज़े के नाम से जाने जाते हैं। &lt;br /&gt;
मन्दिर के पीछे एक विशाल कुण्ड है जो कि बलभद्र कुण्ड के नाम से पुराण में वर्णित है। आजकल इसे 'क्षीरसागर' के नाम से पुकारते हैं। &lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक तथ्य==&lt;br /&gt;
मगधराज [[जरासंध]] के राज्य की पश्चिमी सीमा यहाँ लगती थीं, अत: यह क्षेत्र [[कंस]] के आतंक से प्राय: सुरक्षित था। इसी निमित्त [[नन्द]] बाबा ने बलदेव जी की माता [[रोहिणी]] को बलदेव जी के प्रसव के निमित इसी विद्रुमवन में रखा था और यहीं बलदेव जी का जन्म हुआ जिसके प्रतीक रूप रीढ़ा (रोहिणेयक ग्राम का अपभ्रंश तथा अबैरनी, बैर रहित क्षेत्र) दोनों ग्राम आज तक मौजूद हैं। &lt;br /&gt;
==मुग़लकाल में ==&lt;br /&gt;
धीरे-धीरे समय बीत गया बलदेव जी की ख्याति एवं वैभव निरन्तर बढ़ता गया और समय आ गया धर्माद्वेषी शंहशाह [[औरंगज़ेब]] का। जिसका मात्र संकल्प समस्त हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्ति भंजन एवं देव स्थान को नष्ट-भ्रष्ट करना था। मथुरा के [[कटरा केशवदेव मन्दिर मथुरा|केशवदेव मन्दिर]] एवं महावन के प्राचीनतम देव स्थानों को नष्ट-भ्रष्ट करता आगे बढा तो उसने बलदेव जी की ख्याति सुनी व निश्चय किया कि क्यों न इस मूर्ति को तोड़ दिया जाय। फलत: मूर्ति भंजनी सेना को लेकर आगे बढ़ा। कहते हैं कि सेना निरन्तर चलती रही जहाँ भी पहुँचते बलदेव की दूरी पूछने पर दो कोस ही बताई जाती जिससे उसने समझा कि निश्चय ही बल्देव कोई चमत्कारी देव विग्रह है, किन्तु अधमोन्मार्द्ध सेना लेकर बढ़ता ही चला गया जिसके परिणाम-स्वरूप कहते हैं कि भौरों और ततइयों (बेर्रा) का एक भारी झुण्ड उसकी सेना पर टूट पडा जिससे सैकडों सैनिक एवं घोडे उनके देश के आहत होकर काल कवलित हो गये। औरंगजेब के अन्तर ने स्वीकार किया देवालय का प्रभाव और शाही फ़रमान ज़ारी किया जिसके द्वारा मंदिर को 5 गाँव की माफी एवं एक विशाल नक्कारखाना निर्मित कराकर प्रभु को भेंट किया एवं नक्कारखाना की व्यवस्था हेतु धन प्रतिवर्ष राजकोष से देने के आदेश प्रसारित किया। वहीं नक्कारखाना आज भी मौजूद है और यवन शासक की पराजय का मूक साक्षी है।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
इसी फरमान-नामे का नवीनीकरण उसके पौत्र शाह आलम ने सन् 1196 फ़सली की ख़रीफ़ में दो गाँव और बढ़ाकर यानी 7 गाँव कर दिया। जिनमें खड़ेरा, छवरऊ, नूरपुर, अरतौनी, रीढ़ा आदि जिसको तत्कालीन क्षेत्रीय प्रशासक (वज़ीर) नज़फ ख़ाँ बहादुर के हस्ताक्षर से शाही मुहर द्वारा प्रसारित किया गया तथा स्वयं शाह आलम ने एक पृथक से आदेश चैत सुदी 3 संवत 1840 को अपनी मुहर एवं हस्ताक्षर से जारी किया। शाह आलम के बाद इस क्षेत्र पर सिंधिया राजवंश का अधिकार हुआ। उन्होंने सम्पूर्ण जागीर को यथास्थान रखा एवं पृथक से भोगराग माखन मिश्री एवं मंदिर के रख-रखाव के लिये राजकोष से धन देने की स्वीकृति दिनाँक भाद्रपद-वदी चौथ संवत 1845 को गोस्वामी कल्याण देवजी के पौत्र गोस्वामी हंसराजजी, जगन्नाथजी को दी। यह सारी जमींदारी आज भी मंदिर श्री दाऊ जी महाराज एवं उनके मालिक कल्याण वंशज, जो कि मंदिर के पण्डा पुरोहित कहलाते हैं, उनके अधिकार में है। मुग़ल काल में एक विशिष्ट मान्यता यह थी कि सम्पूर्ण महावन तहसील के समस्त गाँवों में से श्री दाऊजी महाराज के नाम से पृथक देव स्थान खाते की माल गुजारी शासन द्वारा वसूल कर मंदिर को भेंट की जाती थी, जो मुग़लकाल से आज तक शाही ग्रांट के नाम से जानी जाती हैं, सरकारी खजाने से आज तक भी मंदिर को प्रतिवर्ष भेंट की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्रिटिश शासन==&lt;br /&gt;
इसके बाद अंग्रेज़ों का जमाना आया। मन्दिर सदैव से देश-भक्तों के जमावड़े का केन्द्र रहा। उनकी सहायता एवं शरण-स्थल का एक मान्य-स्रोत भी। जब ब्रिटिश शासन को पता चला तो उन्होंने मन्दिर के मालिकान पण्डों को आगाह किया कि वे किसी भी स्वतन्त्रता प्रेमी को अपने यहाँ शरण न दें परन्तु आत्मीय सम्बन्ध एवं देश के स्वतन्त्रता प्रेमी मन्दिर के मालिकों ने यह हिदायत नहीं मानी, जिससे चिढ़-कर अंग्रेज शासकों ने मन्दिर के लिये जो जागीरें भूमि एवं व्यवस्थाएं पूर्व शाही परिवारों से प्रदत्त थी उन्हें दिनाँक 31 दिसम्बर सन 1841 को स्पेशल कमिश्नर के आदेश से कुर्की कर जब्त कर लिया गया और मन्दिर के ऊपर पहरा बिठा दिया जिससे कोई भी स्वतन्त्रता प्रेमी मन्दिर में न आ सके, परन्तु किले जैसे प्राचीरों से आवेष्ठित मन्दिर में किसी दर्शनार्थी को कैसे रोक लेते? अत: स्वतन्त्रता संग्रामी दर्शनार्थी के रूप में आते तथा मन्दिर में निर्बाध चलने वाले सदावर्त एवं भोजन व्यवस्था का आनन्द लेते ओर अपनी कार्य-विधि का संचालन करके पुन: अभीष्ट स्थान को चले जाते। अत: प्रयत्न करने के बाद भी गदर प्रेमियों को शासन न रोक पाया। [[चित्र:Baldev-Temple-2.jpg|क्षीर सागर, बलदेव&amp;lt;br /&amp;gt; Sheer Sagar, Baldev|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
==मान्यताएं==&lt;br /&gt;
बलदेव एक ऐसा तीर्थ है जिसकी मान्यताएं हिन्दू धर्मावलम्बी करते आये हैं। धर्माचार्यों में श्रीमद [[वल्लभाचार्य]] जी के वंश की तो बात ही पृथक् है। [[निम्बार्क संप्रदाय|निम्बार्क]], [[माध्व सम्प्रदाय|माध्व]], [[गौड़ीय सम्प्रदाय|गौड़ीय]], [[रामानुज]], शंकर कार्ष्णि, उदासीन आदि समस्त धर्माचार्यो, में बलदेव जी की मान्यताएं हैं। सभी नियमित रूप से बलदेव जी के दशनार्थ पधारते रहे हैं और यह क्रम आज भी जारी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग्राउस के अनुसार==&lt;br /&gt;
इसके साथ ही एक धक्का ब्रिटिश राज में मंदिर को तब लगा जब [[एफ॰ एस॰ ग्राउस]] यहाँ का कलेक्टर नियुक्त हुआ। ग्राउस महोदय का विचार था कि बलदेव जैसे प्रभावशाली स्थान पर एक चर्च का निर्माण कराया जाय क्योंकि बलदेव उस समय एक मूर्धन्य तीर्थ स्थल था। अत: उसने मंदिर की बिना आज्ञा के चर्च निर्माण प्रारम्भ कर दिया। शाही जमाने से ही मंदिर की 256 एकड़ भूमि में मंदिर की आज्ञा के बगैर कोई व्यक्ति किसी प्रकार का निर्माण नहीं करा सकता था। क्योंकि उपर्युक्त भूमि के मालिक जमींदार श्री दाऊजी हैं। तो उनकी आज्ञा के बिना कोई निर्माण कैसे हो सकता था? परन्तु उन्मादी ग्राउस महोदय ने बिना कोई परवाह किये निर्माण कराना शुरू कर दिया। मंदिर के मालिकान ने उसको बलपूर्वक ध्वस्त करा दिया जिससे चिढ़-कर ग्राउस ने पंडा वर्ग एवं अन्य निवासियों को भारी आतंकित किया।  [[आगरा]] के एक मूर्धन्य सेठ एवं महाराज मुरसान के व्यक्तिगत प्रभाव का प्रयोग कर वायसराय से भेंट कर ग्राउस का स्थानान्तरण [[बुलन्दशहर]] कराया। जिस स्थान पर चर्च का निर्माण कराने की ग्राउस की हठ थीं। उसी स्थान पर आज वहाँ 'बेसिक प्राइमरी पाठशाला' है जो पश्चिमी स्कूल के नाम से जानी जाती है। ग्राउस की पराजय का मूक साक्षी है। &lt;br /&gt;
====[[बलदेव मन्दिर मथुरा|देखे बलदेव मन्दिर]]====&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{ब्रज के प्रमुख स्थल2}}&lt;br /&gt;
{{ब्रज के प्रमुख स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थल]] [[Category:उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल]] [[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]] [[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5_%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0,_%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;diff=33964</id>
		<title>होली बलदेव मन्दिर, मथुरा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5_%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0,_%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;diff=33964"/>
		<updated>2010-06-15T09:44:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Baldev-Temple-1.jpg|दाऊजी मन्दिर, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt; Dauji Temple, Baldev|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
'''श्री दाऊजी का मन्दिर / बलदेव मन्दिर'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह स्थान [[मथुरा]] जनपद में [[ब्रज|ब्रजमंडल]] के पूर्वी छोर पर स्थित है। मथुरा से 21 कि॰मी॰ दूरी पर [[एटा]]-मथुरा मार्ग के मध्य में स्थित है। मार्ग के बीच में [[गोकुल]] एवं [[महावन]] जो कि [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित वृहद्वन के नाम से विख्यात है, पड़ते हैं। यह स्थान पुराणोक्त विद्रुमवन के नाम से निर्दिष्ट है। इसी विद्रुभवन में भगवान श्री [[बलराम]] जी की अत्यन्त मनोहारी विशाल प्रतिमा तथा उनकी सहधर्मिणी राजा ककु की पुत्री ज्योतिष्मती [[रेवती]] जी का विग्रह है। यह एक विशालकाय देवालय है जो कि एक दुर्ग की भाँति सुदृढ प्राचीरों से आवेष्ठित है। मन्दिर के चारों ओर सर्प की कुण्डली की भाँति परिक्रमा मार्ग में एक पूर्ण पल्लवित बाज़ार है। इस मन्दिर के चार मुख्य दरवाजे हैं, जो क्रमश: सिंहचौर, जनानी ड्योढी, गोशाला द्वार या बड़वाले दरवाज़े के नाम से जाने जाते हैं। मन्दिर के पीछे एक विशाल कुण्ड है जो कि [[बलभद्र कुण्ड]] के नाम से पुराण वर्णित है। आजकल इसे क्षीरसागर के नाम से पुकारते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==श्री दाऊजी की मूर्ति== &lt;br /&gt;
देवालय में पूर्वाभिमुख 2 फुट ऊँचे संगमरमर के सिंहासन पर स्थापित है। पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान श्री [[कृष्ण]] के पौत्र श्री वज्रनाभ ने अपने पूर्वजों की पुण्य स्मृति में तथा उनके उपासना क्रम को संस्थापित करने हेतु 4 देव विग्रह तथा 4 देवियों की मूर्तियाँ निर्माणकर स्थापित की थीं। जिनमें से श्री बलदेवजी का यही विग्रह है जो कि [[द्वापर युग]] के बाद कालक्षेप से भूमिस्थ हो गया था। पुरातत्ववेत्ताओं का मत है यह मूर्ति पूर्व [[कुषाण]] कालीन है जिसका निर्माण काल 2 सहस्र या इससे अधिक होना चाहिये। [[ब्रजमण्डल]] के प्राचीन देव स्थानों में यदि श्री बलदेवजी विग्रह को प्राचीनतम कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं। [[ब्रज]] के अतिरिक्त शायद कहीं इतना विशाल [[वैष्णव]] श्री विग्रह दर्शन को मिले। यह मूर्ति क़रीब 8 फुट ऊँची एवं साढे तीन फुट चौडी श्याम वर्ण की है। पीछे [[शेषनाग]] सात फनों से युक्त मुख्य मूर्ति की छाया करते हैं। मूर्ति नृत्य मुद्रा में है, दाहिना हाथ सिर से ऊपर वरद मुद्रा में है एवं बाँये हाथ में चषक है। विशाल नेत्र, भुजाएं-भुजाओं में आभूषण, कलाई में कंडूला उत्कीर्णित हैं। मुकट में बारीक नक्काशी का आभास होता है पैरों में भी आभूषण प्रतीत होते हैं तथा कटि प्रदेश में धोती पहने हुए हैं मूर्ति के कान में एक कुण्डल है तथा कण्ठ में वैजन्ती माला उत्कीर्णित हैं। मूर्ति के सिर के ऊपर से लेकर चरणों तक शेषनाग स्थितहै। शेष के तीन वलय हैं जो कि मूर्ति में स्पष्ट दिखाई देते हैं। और योगशास्त्र की कुण्डलिनी शक्ति के प्रतीक रूप हैं क्योंकि पौराणिक मान्यता के अनुसार बलदेव जी शाक्ति के प्रतीक योग एवं शिलाखण्ड में स्पष्ट दिखाई देती हैं जो कि सुबल, तोष एवं [[श्रीदामा]] सखाओं की हैं। बलदेवजी के सामने दक्षिण भाग में दो फुट ऊँचे सिंहासन पर रेवती जी की मूर्ति स्थापित हैं जो कि बलदेव जी के चरणोन्मुख है और रेवती जी के पूर्ण सेवा-भाव की प्रतीक है। यह मूर्ति क़रीब पाँच फुट ऊँची है। दाहिना हाथ वरद मुद्रा में तथा वाम हस्त कटि प्रदेश के पास स्थित है। इस मूर्ति में ही सर्पवलय का अंकन स्पष्ट है। दोनों भुजाओं में, कण्ठ में, चरणों में आभूषणों का उत्कीर्णन है। उन्मीलित नेत्रों एवं उन्नत उरोजों से युक्त विग्रह अत्यन्त शोभायमान लगता हैं।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[वैदिक धर्म]] के प्रचार एवं अर्चना का आरम्भ चर्तुव्यूह उपासना से होता है जिसमें संकर्षण प्रधान हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो ब्रजमण्डल के प्राचीनतम [[देवता]] बलदेव ही हैं। सम्भवत: ब्रजमण्डल में बलदेवजी से प्राचीन कोई देव विग्रह नहीं। ऐतिहासिक प्रमाणों में चित्तौड़ के शिलालेखों में जो कि ईसा से पाँचवी शताब्दी पूर्व के हैं बलदेवोपासना एवं उनके मन्दिर को इंगित किया है। अर्पटक, भोरगाँव नानाघटिका के शिलालेख जो कि ईसा के प्रथम द्वितीय शाताब्दी के हैं, जुनसुठी की बलदेव मूर्ति [[शुंग]] कालीन है तथा यूनान के शासक अगाथोक्लीज की चाँदी की मुद्रा पर हलधारी बलराम की मूर्ति का अंकन सभी बलदेव जी की पूजा उपासना एवं जनमान्यओं के प्रतीक हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मूर्ति का प्राकट्य==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Baldev-Temple-2.jpg|क्षीर सागर, बलदेव&amp;lt;br /&amp;gt; Sheer Sagar, Baldev|thumb|250px|left]]&lt;br /&gt;
इस [[बलराम|बलदेव]] मूर्ति के प्राकट्य का भी एक बहुत रोचक इतिहास है। मध्ययुग का समय था [[मुग़ल]] साम्राज्य का प्रतिष्ठा सूर्य मध्यान्ह में था। [[अकबर]] अपने भारी श्रम, बुद्धिचातुर्य एवं युद्ध कौशल से एक ऐसी सल्तनत की प्राचीर के निर्माण में रत था जो कि उसके कल्पना लोक की मान्यता के अनुसार कभी भी न ढहे और पीढी-दर-पीढी मुग़लिया ख़ानदान हिन्दुस्तान की सरज़मीं पर निष्कंटक अपनी सल्तनत को क़ायम रखकर गद्दी एवं ताज का उपभोग करते रहे। एक ओर यह मुग़लों की स्थापना का समय था दूसरी ओर मध्ययुगीन धर्माचार्य एवं सन्तों के अवतरण तथा अभ्युदय का स्वर्ण युग। ब्रज मण्डल में तत्कालीन धर्माचार्यों में महाप्रभु [[बल्लभाचार्य]], श्री [[निम्बकाचार्य]] एवं चैतन्य संप्रदाय की मान्यताएं अत्यन्त लोकप्रिय थीं। किसी समय [[गोवर्धन]] की तलहटी में एक बहुत प्राचीन तीर्थ-स्थल [[सूर्यकुण्ड]] एवं उसका तटवर्ती ग्राम भरना-खुर्द (छोटा भरना) था। इसी सूर्यकुण्ड के घाट पर परम सात्विक ब्राह्मण वंशावतंश गोस्वामी कल्याण देवाचार्य तपस्या करते थे। उनका जन्म भी इसी ग्राम में इभयराम जी के घर में हुआ था। वे वंश-तंश श्री बलदेवजी के अनन्य अर्चक थे।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक दिन श्री कल्याण-देवजी को ऐसी अनुभूति हुई कि उनका अन्तर्मन तीर्थाटन का आदेश दे रहा है। कुछ समय यों-ही बिताया किन्तु स्फुरणा बलवती ही होती जाती। अत: कल्याण-देवजी ने जगदीश यात्रा का निश्चय कर घर से प्रस्थान कर दिया श्री [[गिर्राज परिक्रमा]] कर [[मानसी गंगा गोवर्धन|मानसी गंगा]] स्नान किया और फिर पहुँचे मथुरा, [[यमुना नदी|यमुना]] स्नान, दर्शनकर आगे बढ़े और पहुँचे विद्रुमवन जहाँ आज का वर्तमान बल्देव नगर है। यहाँ रात्रि विश्राम किया। सघन वट-वृक्षों की छाया तथा सरोवर का किनारा ये दोनों स्थितियाँ उनको रमीं। फलत: कुछ दिन यहीं तप करने का निश्चय किया। एक दिन अपने आन्हिक कर्म से निवृत हुये ही थे कि दिव्य हल-मूसलधारी भगवान श्री बलराम उनके सम्मुख प्रकट हुये तथा बोले कि मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, वर माँगो। कल्याण-देवजी ने करबद्ध प्रणाम कर निवेदन किया कि प्रभु आपके नित्य दर्शन के अतिरिक्त मुझे कुछ भी अभीष्ट नहीं हैं। अत: आप नित्य मेरे घर विराजें। बलदेवजी ने तथास्तु कहकर स्वीकृति दी और अन्तर्धान हो गये। साथ ही यह भी आदेश किया कि 'जिस प्रयोजन हेतु जगदीश यात्रा कर रहे हो, वे सभी फल तुम्हें यहीं मिलेंगे, इस हेतु इसी वट-वृक्ष के नीचे मेरी एवं श्री रेवती की प्रतिमाएं भूमिस्थ हैं, उनका प्राकट्य करो'। अब तो कल्याण-देवजी की व्यग्रता बढ गई और जुट गये भूमि के खोदने में, जिस स्थान का आदेश श्री बलराम|दाऊ जी ने किया था।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
इधर एक और विचित्र आख्यान उपस्थित हुआ कि जिस दिन श्री कल्याण-देवजी को साक्षात्कार हुआ उसी पूर्व रात्रि को गोकुल में श्रीमद् बल्लभाचार्य महाप्रभु के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथजी को स्वप्न हुआ कि 'जो श्यामा गौ के बारे में आप चिन्तित हैं वह नित्य दूध मेरी प्रतिमा ऊपर स्त्रवित कर देती है। ग्वाला निर्दोष है। मेरी प्रतिमाएं विद्रुमवन में वट-वृक्ष के नीचे भूमिस्थ हैं प्राकट्य कराओ ' यह श्यामा गौ सद्य: प्रसूता होने के बावजूद दूध नहीं देती थी। महाराज श्री को दूध के बारे ग्वाला के ऊपर सन्देह होता था। प्रभु की आज्ञा से गोस्वामीजी ने उपर्युक्त स्थल पर जाने का निर्णय किया। वहाँ जाकर देखा कि श्री कल्याण-देवजी मूर्तियुगल को भूमि से खोदकर निकाल चुके हैं। वहाँ पहुँच नमस्कार अभिवादन के उपरान्त दोनों ने अपने-अपने वृतान्त सुनाये। अत्यन्त हर्ष विह्वल धर्माचार्य हृदय को विग्रहों के स्थापन के निर्णय की चिन्ता हुई और निश्चय किया कि इस घोर जंगल से मूर्तिद्वय को हटाकर क्यों न श्री [[गोकुल]] में प्रतिष्ठित किया जाय। एतदर्थ अनेक गाढ़ा मँगाये किन्तु मूर्ति अपने स्थान से, कहते हैं कि चौबीस बैल और अनेक व्यक्तियों के द्वारा हटाये जाने पर भी, टस से मस न हुई और इतना श्रम व्यर्थ गया। हार मानकर यही निश्चय किया गया कि दोनों मूर्तियों को अपने प्राकट्य के स्थान पर ही प्रतिष्ठित कर दिया जाय। अत: जहाँ श्रीकल्याण-देव तपस्या करते थे उसी पर्णकुटी में सर्वप्रथम स्थापना हुई जिसके द्वारा कल्याण देवजी को नित्य घर में निवास करने का दिया गया, वरदान सफल हुआ।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
यह दिन संयोगत: [[मार्गशीर्ष]] मास की पूर्णमासी थी। षोडसोपचार क्रम से वेदाचार के अनुरूप दोनों मूर्तियों की अर्चना को गई तथा सर्वप्रथम श्री ठाकुरजी को खीर का भोग रखा गया, अत: उस दिन से लेकर आज पर्यन्त प्रतिदिन खीर भोग में अवश्य आती है। गोस्वामी गोकुलनाथजी ने एक नवीन मंदिर के निर्माण का भार वहन करने का संकल्प लिया तथा पूजा अर्चना का भार श्रीकल्याण-देवजी ने। उस दिन से अद्यावधि कल्याण वंशज ही श्री ठाकुरजी की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। यह दिन मार्ग शीर्ष पूर्णिमा सम्वत् 1638 विक्रम था। एक वर्ष के भीतर पुन: दोनों मूर्तियों को पर्णकुटी से हटाकर श्री गोस्वामी महाराजश्री के नव-निर्मित देवालय में, जो कि सम्पूर्ण सुविधाओं से युक्त था, मार्ग शीर्ष पूर्णिमा [[संवत]] 1639 को प्रतिष्ठित कर दिया गया। यह स्थान कहते हैं भगवान बलराम की जन्म-स्थली एवं नित्य क्रीड़ा स्थली है पौराणिक आख्यान के अनुसार यह स्थान नन्द बाबा के अधिकार क्षेत्र में था। यहाँ बाबा की गौ के निवास के लिये बड़े-बड़े खिरक निर्मित थे।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
मगधराज [[जरासंध]] के राज्य की पश्चिमी सीमा यहाँ लगती थीं, अत: यह क्षेत्र कंस के आतंक से प्राय: सुरक्षित था। इसी निमित्त [[नंद|नन्द बाबा]] ने बलदेव जी की माता रोहिणी को बलदेवजी के प्रसव के निमित इसी विद्रुमवन में रखा था और यहीं बलदेवजी का जन्म हुआ जिसके प्रतीक रूप रीढ़ा (रोहिणेयक ग्राम का अपभ्रंश तथा अबैरनी, बैर रहित क्षेत्र) दोनों ग्राम आज तक मौजूद हैं। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
धीरे-धीरे समय बीत गया बलदेवजी की ख्याति एवं वैभव निरन्तर बढ़ता गया और समय आ गया धर्माद्वेषी शंहशाह [[औरंगजेब]] का। जिसका मात्र संकल्प समस्त हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्ति भंजन एवं देव स्थान को नष्ट-भ्रष्ट करना था। मथुरा के [[कटरा केशवदेव मन्दिर|केशवदेव]] मन्दिर एवं [[महावन]] के प्राचीनतम देव स्थानों को नष्ट-भ्रष्ट करता आगे बढा तो उसने बलदेव।जी की ख्याति सुनी व निश्चय किया कि क्यों न इस मूर्ति को तोड़ दिया जाय। फलत: मूर्ति भंजनी सेना को लेकर आगे बढ़ा। कहते हैं कि सेना निरन्तर चलती रही जहाँ भी पहुँचते बलदेव की दूरी पूछने पर दो कोस ही बताई जाती जिससे उसने समझा कि निश्चय ही बल्देव कोई चमत्कारी देव विग्रह है, किन्तु अधमोन्मार्द्ध सेना लेकर बढ़ता ही चला गया जिसके परिणाम-स्वरूप कहते हैं कि भौरों और ततइयों (बेर्रा) का एक भारी झुण्ड उसकी सेना पर टूट पडा जिससे सैकडों सैनिक एवं घोडे उनके देश के आहत होकर काल कवलित हो गये। औरंगजेब के अन्तर ने स्वीकार किया देवालय का प्रभाव। और शाही फ़रमान जारी किया जिसके द्वारा मंदिर को 5 गाँव की माफी एवं एक विशाल नक्कारखाना निर्मित कराकर प्रभु को भेंट किया एवं नक्कारखाना की व्यवस्था हेतु धन प्रतिवर्ष राजकोष से देने के आदेश प्रसारित किया। वहीं नक्कारखाना आज भी मौजूद है और यवन शासक की पराजय का मूक साक्षी है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Baldev-Temple-3.jpg|[[होली]], दाऊजी मन्दिर, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]] &amp;lt;br /&amp;gt; Holi, Dauji Temple, Baldev |thumb|250px]]&lt;br /&gt;
इसी फरमान-नामे का नवीनीकरण उसके पौत्र शाह आलम ने सन् 1196 फ़सली की ख़रीफ़ में दो गाँव और बढ़ाकर यानी 7 गाँव कर दिया। जिनमें खड़ेरा, छवरऊ, नूरपुर, अरतौनी, रीढ़ा आदि जिसको तत्कालीन क्षेत्रीय प्रशासक (वज़ीर) नज़फ ख़ाँ बहादुर के हस्ताक्षर से शाही मुहर द्वारा प्रसारित किया गया तथा स्वयं शाह आलम ने एक पृथक् से आदेश चैत सुदी 3 संवत 1840 को अपनी मुहर एवं हस्ताक्षर से जारी किया। शाह आलम के बाद इस क्षेत्र पर सिंधिया राजवंश का अधिकार हुआ। उन्होंने सम्पूर्ण जागीर को यथास्थान रखा एवं पृथक् से भोगराग माखन मिश्री एवं मंदिर के रख-रखाव के लिये राजकोष से धन देने की स्वीकृति दिनाँक भाद्रपद-वदी चौथ संवत 1845 को गोस्वामी कल्याण देवजी के पौत्र गोस्वामी हंसराजजी, जगन्नाथजी को दी। यह सारी जमींदारी आज भी मंदिर श्री [[बलराम|दाऊ जी]] महाराज एवं उनके मालिक कल्याण वंशज, जो कि मंदिर के पण्डा पुरोहित कहलाते हैं, उनके अधिकार में है। [[मुग़ल काल]] में एक विशिष्ट मान्यता यह थी कि सम्पूर्ण [[महावन]] तहसील के समस्त गाँवों में से श्री दाऊजी महाराज के नाम से पृथक् देव स्थान खाते की माल गुजारी शासन द्वारा वसूल कर मंदिर को भेंट की जाती थी, जो मुग़लकाल से आज तक शाही ग्रांट के नाम से जानी जाती हैं, सरकारी खजाने से आज तक भी मंदिर को प्रतिवर्ष भेंट की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्रिटिश शासन==&lt;br /&gt;
इसके बाद फिरंगी का जमाना आया। मन्दिर सदैव से देश-भक्तों के जमावड़े का केन्द्र रहा। उनकी सहायता एवं शरण-स्थल का एक मान्य-स्रोत भी। जब ब्रिटिश शासन को पता चला तो उन्होंने मन्दिर के मालिकान पाण्डों को आगाह किया कि वे किसी भी स्वतन्त्रता प्रेमी को अपने यहाँ शरण न दें परन्तु आत्मीय सम्बन्ध एवं देश के स्वतन्त्रता प्रेमी मन्दिर के मालिकों ने यह हिदायत नहीं मानी, जिससे चिढ़-कर अंग्रेज शासकों ने मन्दिर के लिये जो जागीरें भूमि एवं व्यवस्थाएं पूर्व शाही परिवारों से प्रदत्त थी उन्हें दिनाँक 31 दिसम्बर सन् 1841 को स्पेशल कमिश्नर के आदेश से कुर्की कर जब्त कर लिया गया और मन्दिर के ऊपर पहरा बिठा दिया जिससे कोई भी स्वतन्त्रता प्रेमी मन्दिर में न आ सके। परन्तु किले जैसे प्राचीरों से आवेष्ठित मन्दिर में किसी दर्शनार्थी को कैसे रोक लेते? अत: [[स्वतंत्रता संग्राम 1857|स्वतन्त्रता संग्रामी]] दर्शनार्थी के रूप में आते तथा मन्दिर में निर्बाध चलने वाले सदावर्त एवं भोजन व्यवस्था का आनन्द लेते ओर अपनी कार्य-विधि का संचालन करके पुन: अभीष्ट स्थान को चले जाते। अत: प्रयत्न करने के बाद भी गदर प्रेमियों को शासन न रोक पाया।&lt;br /&gt;
==मान्यताएं==&lt;br /&gt;
बलदेव एक ऐसा तीर्थ है जिसकी मान्यताएं [[हिन्दू]] धर्मा्वलम्बी करते आये हैं। धर्माचार्यों में श्रीमद् [[बल्लभाचार्य]] जी के वंश की तो बात ही पृथक् है। [[निम्बार्क]], [[मध्वाचार्य|माध्व]], [[गौड़ीय]], [[रामानुज]], शंकर [[कार्ष्णि]], [[उदासीन]] आदि समस्त धर्माचार्यो, में बलदेव जी की मान्यताएं हैं। सभी नियमित रूप से बलदेवजी के दशनार्थ पधारते रहे हैं और यह क्रम आज भी जारी है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
इसके साथ ही एक धक्का ब्रिटिश राज में मंदिर को तब लगा जब ग्राउस यहाँ का कलेक्टर नियुक्त हुआ। [[ग्राउस]] महोदय का विचार था कि बलदेव जैसे प्रभावशाली स्थान पर एक चर्च का निर्माण कराया जाय क्योंकि बलदेव उस समय एक मूर्धन्य तीर्थ स्थल था। अत: उसने मंदिर की बिना आज्ञा के चर्च निर्माण प्रारम्भ कर दिया। शाही जमाने से ही मंदिर की 256 एकड़ भूमि में मंदिर की आज्ञा के बगैर कोई व्यक्ति किसी प्रकार का निर्माण नहीं करा सकता था। क्योंकि उपर्युक्त भूमि के मालिक जमींदार श्री दाऊजी हैं। तो उनकी आज्ञा के बिना कोई निर्माण कैसे हो सकता था? परन्तु उन्मादी ग्राउस महोदय ने बिना कोई परवाह किये निर्माण कराना शुरू कर दिया। मंदिर के मालिकान ने उसको बलपूर्वक ध्वस्त करा दिया जिससे चिढ़-कर ग्राउस ने पंडा वर्ग एवं अन्य निवासियों को भारी आतंकित किया। तो [[आगरा]] के एक मूर्धन्य सेठ एवं महाराज मुरसान के व्यक्तिगत प्रभाव का प्रयोग कर वायसराय से भेंट कर ग्राउस का स्थानान्तरण बुलन्दशहर कराया। जिस स्थान पर चर्च का निर्माण कराने की ग्राउस की हठ थीं। उसी स्थान पर आज वहाँ बेसिक प्राइमरी पाठशाला है जो पश्चिमी स्कूल के नाम से जानी जाती है। ग्राउस की पराजय का मूक साक्षी है।&lt;br /&gt;
==मुख्य आकर्षण==&lt;br /&gt;
वैसे बलदेव में मुख्य आकर्षण श्री दाऊजी का मंदिर है। किन्तु इसके अतिरिक्त क्षीरसागर तालाब जो कि क़रीब 80 गज़ चौड़ा 80 गज़ लम्बा है। जिसके चारों ओर पक्के घाट बने हुए हैं जिसमें हमेशा जल पूरित रहता है। उस जल में सदैव जैसे दूध पर मलाई होती है उसी प्रकार काई (शैवाल) छायी रहती है। दशनार्थी इस सरोवर में स्नान आचमन करते हैं। पश्चात दर्शन को जाते हैं।&lt;br /&gt;
==पर्वोत्सव-मन्दिर==&lt;br /&gt;
पर्वोत्सव-मन्दिर मूलत: [[बलभद्र]] सम्प्रदायी है। किन्तु पूजार्चन में ज़्यादा-तर प्रसाव पुष्टि मार्गीय है। वैसे वर्ष-भर कोई न कोई उत्सव होता ही रहता है किन्तु मुख्यत: वर्ष प्रतिपदा, चैत्र पूर्णिमा बलदेवजी का रासोत्सव [[अक्षय तृतीया]], (चरण दर्शन) [[गंगा दशहरा]], [[देवशयनी एकादशी]], समस्त [[श्रावण मास]] के झूलोत्सव, [[कृष्ण जन्माष्टमी|श्रीकृष्ण जन्माष्टमी]], बलदेव श्रीदाऊजी का जन्मोत्सव (भाद्रपद शुक्ल 6) तथा [[राधाष्टमी]], दशहरा, [[शरद पूर्णिमा]], दीपमालिका, [[गोवर्धन पूजा]], (अन्नकूट) [[यम द्वितीया]] तथा अन्य समस्त कार्तिक मास के उत्सव मार्गशीर्ष पूर्णिमा (पाटोत्सव) तथा माघ की [[बसंत पंचमी]] से प्रारम्भ होकर चैत्र कृष्ण-पंचमी तक का 1-1/2 माह का [[होली]] उत्सव प्रमुख है। होली में विशेषकर फाल्गुन शुक्ल 15 को होली पूजन सम्पूर्ण हुरंगा जो कि ब्रज मंडल के होली उत्सव का मुकुट मणि है, अत्यन्त सुरम्य एंवं दर्शनीय हैं। पंचमी को होली उत्सव के बाद 1 वर्ष के लिये इस मदन-पर्व को विदायी दी जाती है। वैसे तो बलदेव में प्रतिमाह पूर्णिमा को विशेष मेला लगता है फिर भी विशेषकर चैत्र पूर्णिमा, [[शरद पूर्णिमा]], मार्गशीर्ष पूर्णिमा एवं देवछट को भारी भीड़ होती है। इसके अतिरिक्त वर्ष-भर हज़ारों दर्शनार्थी प्रतिदिन आते हैं। भगवान [[विष्णु]] के अवतारों की तिथियों को विशेष स्नान भोग एवं अर्चना होती है तथा 2 बार स्नान श्रृंगार एवं विशेष भोग राग की व्यवस्था होती है। यहाँ का मुख्य प्रसाद माखन एवं मिश्री है तथा खीर का प्रसाद, जो कि नित्य भगवान आरोगते हैं, प्रसिद्ध हैं। &lt;br /&gt;
==दर्शन का क्रम==&lt;br /&gt;
यहाँ दर्शन का क्रम प्राय: गर्मी में [[अक्षय तृतीया]] से [[हरियाली तीज]] तक प्रात: 6 बजे से 12 बजे तक दोपहर 4 बजे से 5 बजे तक एवं सायं 7 बजे से 10 तक होते हैं। हरियाली तीज से प्रात: 6 से 11 एवं दोपहर 3-4 बजे तक एवं रात्रि 6-1/2 से 9 तक होते हैं। मन्दिर में समय-समय पर दर्शन, एवं उत्सवों के अनुरूप यहाँ की समाज गायकी अत्यन्त प्रसिद्ध है।  &lt;br /&gt;
यहाँ की साँझी कला जिसका केन्द्र मन्दिर ही है अत्यन्त प्रसिद्ध है। बलदेव पटेबाजी के अखाड़ेबन्दी (जिसमें हथियार चलाना लाठी भाँजना आदि) का बड़ा शौक़ है समस्त [[मथुरा]] जनपद एवं पास-पड़ौसी जिलों में भी यहाँ का `काली` का प्रदर्शन अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि का है। बलदेव के मिट्टी के बर्तन बहुत प्रसिद्ध हैं। यहाँ का मुख्य प्रसाद माखन मिश्री तथा श्री ठाकुरजी को भाँग का भोग लगने से यहाँ प्रसाद रूप में भाँग पीने के शौक़ीन लोगों की भी कमी नहीं। भाँग तैयार करने के भी कितने ही सिद्ध हस्त-उस्ताद हैं यहाँ की समस्त परम्पराओं का संचालन आज भी मन्दिर से होता है। यदि सामंती युग का दर्शन करना हो तो आज भी बलदेव में प्रत्यक्ष हो सकता है। आज भी मन्दिर के घंटे एवं नक्कारखाने में बजने वाली बम्ब की आवाज से नगर के समस्त व्यापार व्यवहार चलते हैं। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
महामना मालवीय जी, पं0 मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, मोहनदास करमचन्दगाँधी (बापू) माता कस्तूरबा, राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद, राजवंशी देवी जी, डॉ0 राधाकृष्णजी, सरदार बल्लभ भाई पटेल, मोरार जी देसाई, दीनदयालजी उपाध्याय, जैसे श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, भारतेन्दु बाबू हरिशचन्द्रजी, हरिओमजी, निरालाजी, भारत के मुख्य न्यायाधीश जास्टिस बांग्चू के0 एन0 जी जैसे महापुरुष बलदेव दर्शनार्थ पधारते रहे हैं। जिनके दर्शनार्थ पधारने के दस्तावेज आज भी सुरक्षित हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका बलदेव मन्दिर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Baldev-Holi-Mathura-24.jpg|दाऊजी मन्दिर का हुरंगा, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt;Huranga in Dauji Temple, Baldev&lt;br /&gt;
चित्र:Baldev-Holi-Mathura-12.jpg|[[होली]], दाऊजी मन्दिर, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt;Holi, Dauji Temple, Baldev&lt;br /&gt;
चित्र:Baldev-Holi-Mathura-17.jpg|दाऊजी मन्दिर का हुरंगा, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt;Huranga in Dauji Temple, Baldev&lt;br /&gt;
चित्र:Baldev-Holi-Mathura-32.jpg|[[होली]], दाऊजी मन्दिर, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt;Holi, Dauji Temple, Baldev&lt;br /&gt;
चित्र:Baldev-Holi-Mathura-23.jpg|दाऊजी मन्दिर का हुरंगा, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt;Huranga in Dauji Temple, Baldev&lt;br /&gt;
चित्र:Baldev-Holi-Mathura-30.jpg|दाऊजी मन्दिर का हुरंगा, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt;Huranga in Dauji Temple, Baldev&lt;br /&gt;
चित्र:Baldev-Holi-Mathura-28.jpg|दाऊजी मन्दिर का हुरंगा, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt;Huranga in Dauji Temple, Baldev&lt;br /&gt;
चित्र:Baldev-Holi-Mathura-7.jpg|[[होली]], दाऊजी मन्दिर, [[बलदेव मथुरा|बलदेव]]&amp;lt;br /&amp;gt;Holi, Dauji Temple, Baldev&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थल]] [[Category:उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल]] [[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]] [[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%81&amp;diff=33962</id>
		<title>हुमायूँ</title>
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		<updated>2010-06-15T09:38:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Humayun.jpg|हुमायूँ&amp;lt;br /&amp;gt; Humayun|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
बाबर के बेटों में हुमायूँ सबसे बड़ा था। वह वीर, उदार और भला था; लेकिन [[बाबर]] की तरह कुशल सेनानी और निपुण शासक नहीं था। वह सन 1530 में अपने पिता की मृत्यु होने के बाद बादशाह बना और 10 वर्ष तक राज्य को दृढ़ करने के लिए शत्रुओं और अपने भाइयों से लड़ता रहा। उसे शेरख़ाँ नाम के पठान सरदार ने शाहबाद ज़िले के चौसा नामक जगह पर सन 1539 में हरा दिया था। पराजित हो कर हुमायूँ ने दोबारा अपनी शक्ति को बढ़ा [[कन्नौज]] नाम की जगह पर शेरख़ाँ की सेना से 17 मई, सन 1540 में युद्ध किया लेकिन उसकी फिर हार हुई और वह इस देश से भाग गया। इस समय [[शेरशाह सूरी|शेर ख़ाँ सूर]] और उसके वंशजों ने भारत पर शासन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हुमायूँ द्वारा पुन: राज्य−प्राप्ति==&lt;br /&gt;
भागा हुआ हुमायूँ लगभग 14 वर्ष तक [[काबुल]] में रहा। सिकंदर सूर की व्यवस्था बिगड़ने का समाचार सुन उसका लाभ उठाने के लिए उसने सन 1554 में भारत पर आक्रमण किया और लाहौर तक अधिकार कर लिया। उसके बाद तत्कालीन बादशाह सिंकदर ने सूर पर आक्रमण किया और उसे हराया। 23 जुलाई, सन 1554 में दोबारा भारत का बादशाह बना लेकिन 7 माह राज्य करने के बाद 24 जनवरी, सन 1555 (लगभग) में पुस्तकालय की सीढ़ी से गिरकर उसकी मृत्यु हो गई। उसका मक़बरा [[दिल्ली]] में बना हुआ है। हुमायूँ की मृत्यु के समय उसका पुत्र [[अकबर]] 13−14 वर्ष का बालक था। हुमायूँ के बाद उसका पुत्र अकबर उत्तराधिकारी घोषित किया गया और उसका संरक्षक बैरमखां को बनाया गया, तब [[हेमू|हेमचंद्र]] सेना लेकर [[दिल्ली]] आया और उसने मु्ग़लों को वहाँ से भगा दिया। हेमचंद्र की पराजय 6 नवंबर सन 1556 में पानीपत के मैदान में हुई थी। उसी दिन स्वतंत्र हिन्दू राज्य का सपना टूट बालक अकबर के नेतृत्व में मुग़लों का शासन जम गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:मुग़ल साम्राज्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>तात्या टोपे</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* झांसी की रानी और तात्या टोपे */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Head&lt;br /&gt;
|शीर्षक=रामचंद्र पांडुरंग येवालकर (तांत्या टोपे)&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tatya-Tope.jpg|thumb|तात्या टोपे]]&lt;br /&gt;
सन 1857 के [[प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] के अग्रणीय वीरों में तात्या टोपे को बड़ा उच्च स्थान प्राप्त है। इस वीर ने कई स्थानों पर अपने सैनिक अभियानों में [[उत्तर प्रदेश]], [[राजस्थान]], [[मध्य प्रदेश]], [[गुजरात]] में अंग्रेजी सेनाओं से टक्कर ली थी और उन्हें परेशान कर दिया था। गोरिल्ला युद्ध प्रणाली को अपनाते हुए तात्या ने अंग्रेजी सेनाओं के कई स्थानों पर छक्के छुड़ा दिये थे। तात्या टोपे जो 'तांतिया टोपी' के नाम से विख्यात हैं, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उन महान सैनिक नेताओं में से एक थे, जो प्रकाश में आए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1857 तक लोग इनके नाम से अपरिचित थे। लेकिन 1857 की नाटकीय घटनाओं ने उन्हें अचानक अंधकार से प्रकाश में ला खड़ा किया। इस महान विद्रोह के प्रारंभ होने से पूर्व वह राज्यच्युत [[पेशवा बाजीराव द्वितीय]] के सबसे बड़े पुत्र बिठूर के राजा, [[नाना साहब]] के एक प्रकार से साथी-मुसाहिब मात्र थे, किंतु स्वतंत्रता संग्राम में [[कानपुर]] के सम्मिलित होने के पश्चात तात्या पेशवा की सेना के सेनाध्यक्ष की स्थिति तक पहुंच गए। उसके पश्चातवर्ती युद्धों की सभी घटनाओं ने उनका नाम सबसे आगे एक पुच्छलतारे की भांति बढ़ाया, जो अपने पीछे प्रकाश की एक लंबी रेखा छोड़ता गया। उनका नाम केवल देश में नहीं वरन देश के बाहर भी प्रसिद्ध हो गया। मित्र ही नहीं शत्रु भी उनके सैनिक अभियानों को जिज्ञासा और उत्सुकता से देखने और समझने का प्रयास करते थे। समाचार पत्रों में उनके नाम के लिए विस्तृत स्थान उपलब्ध था। उनके विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते थे। उदाहरणार्थ- &lt;br /&gt;
*कर्नल माल्सन ने उनके संबंध में कहा है, 'भारत में संकट के उस क्षण में जितने भी सैनिक नेता उत्पन्न हुए, वह उनमें सर्वश्रेष्ठ थे।' &lt;br /&gt;
*सर जार्ज फारेस्ट ने उन्हें, 'सर्वोत्कृष्ट राष्ट्रीय नेता' कहा है। &lt;br /&gt;
*आधुनिक अंग्रेजी इतिहासकार, पर्सीक्रास स्टेडिंग ने सैनिक क्रांति के दौरान देशी पक्ष की ओर से उत्पन्न 'विशाल मस्तिष्क' कहकर उनका सम्मान किया। उसने उनके विषय में यह भी कहा है कि 'वह विश्व के प्रसिद्ध छापामार नेताओं में से एक थे।'&lt;br /&gt;
==झांसी की रानी और तात्या टोपे==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
1857 के दो विख्यात वीरों - [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई|झांसी की रानी]] और तात्या टोपे में से झांसी की रानी को अत्यधिक ख्याति मिली। उनके नाम के चारों ओर यश का चक्र बन गया, किंतु तात्या टोपे के साहसपूर्ण कार्य और विजय अभियान [[रानी लक्ष्मीबाई]] के साहसिक कार्यों और विजय अभियानों से कम रोमांचक नहीं थे। रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध अभियान जहां केवल [[झांसी]], [[कालपी]] और [[ग्वालियर]] के क्षेत्रों तक सीमित रहे थे वहां तात्या एक विशाल राज्य के समान कानपुर के राजपूताना और मध्य भारत तक फैल गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्नल ह्यू रोज- जो मध्य भारत युद्ध अभियान के सर्वेसर्वा थे, ने यदि रानी लक्ष्मीबाई की प्रशंसा 'उन सभी में सर्वश्रेष्ठ वीर' के रूप में की थी तो मेजर मीड को लिखे एक पत्र में उन्होंने तात्या टोपे के विषय में यह कहा था कि वह 'भारत युद्ध नेता और बहुत ही विप्लवकारी प्रकृति के थे और उनकी संगठन क्षमता भी प्रशंसनीय थी।' तात्या ने अन्य सभी नेताओं की अपेक्षा शक्तिशाली ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया था। उन्होंने शत्रु के साथ लंबे समय तक संघर्ष जारी रखा। जब स्वतंत्रता संघर्ष के सभी नेता एक-एक करके अंग्रेजों की श्रेष्ठ सैनिक शक्ति से पराभूत हो गए तो वे अकेले ही विद्रोह की पताका फहराते रहे। उन्होंने लगातार नौ मास तक उन आधे दर्जन ब्रिटिश कमांडरों को छकाया जो उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। वे अपराजेय ही बने रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रारंभिक जीवन==&lt;br /&gt;
तात्या टोपे के प्रारंभिक जीवन के संबंध में अधिक जानकारी नहीं है। उनके विषय में थोड़े बहुत तथ्य उस बयान से इकट्ठे किए जा सकते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के बाद दिया और कुछ तथ्य तात्या के सौतेले भाई रामकृष्ण टोपे के उस बयान से इकट्ठे किए जा सकते हैं जो उन्होंने 1862 ई. में [[बड़ौदा]] के सहायक रेजीडेंस के समक्ष दिया था। तात्या का वास्तविक नाम 'रामचंद्र पांडुरंग येवालकर' था और 'तात्या' मात्र उपनाम था। जबकि टोपे भी उनका उपनाम था जो उनके साथ ही चिपका रहा। उनका परिवार मूलतः [[नासिक]] के निकट पटौदा ज़िले में एक छोटे से गांव येवाले में रहता था। इसलिए उनका उपनाम येवालकर पड़ा। महान वीर देशभक्त तात्या टोपे का जन्म सन 1814 [[नासिक]], [[महाराष्ट्र]] में हुआ था। तात्या शब्द का प्रयोग और अधिक प्यार के लिये होता था। पेशवा बाजीराम द्बितीय के यहाँ अपके पिता पुरोहित थे। उसका बालकाल [[बिठूर]] में पेशवा के दत्तक पुत्र [[नाना साहब]] और [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई|झाँसी की वीरांगन रानी लक्ष्मीबाई]] के साथ व्यतीत हुआ था। आगे चलकर 1857 में देश की स्वाधीनता के लिए तीनों ने जो आत्मोत्सर्ग किया था वह हमारे स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। तात्या ने, 1859 में दिए गए अपने बयान में अपनी आयु 45 वर्ष बताई थी। जिससे यह पता लगता है कि उनका जन्म 1813 या 1814 के आसपास हुआ था। उनके पिता, जो एक देशस्थ ब्राह्मण थे, बहुत ही विद्वान थे। उनकी विद्वता उनकी जाति के अनुकूल थी। अच्छी नौकरी की तलाश में वह परिवार सहित [[पूना]] चले गए। पूना पेशवाओं की राजधानी थी। त्रयम्बक जी देंगाल, जो प्रसिद्ध दरबारी था, की सहायता से उन्हें अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के साथ परिचय प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। जिन्होंने उन्हें अपने महल में पुजारी के रूप में नियुक्त कर लिया। &lt;br /&gt;
==बिठूर में==&lt;br /&gt;
अपनी विद्वता, निष्ठा और विवेक बुद्धि से वह आगे चलकर पेशवा के धार्मिक विन्यास और गृह-व्यवस्था विभाग के पर्यवेक्षक की स्थिति तक पहुंच गए। &lt;br /&gt;
तात्या जब मुश्किल से 4 वर्ष के थे तभी उनके पिता के स्वामी के भाग्य में अचानक परिवर्तन हुआ। बाजीराव 1818 में बसाई के युद्ध में अंग्रेजों से हार गए। उनका साम्राज्य उनसे छिन गया। उन्हें आठ लाख रुपये की सालान पेंशन मंजूर की गई और उनकी राजधानी से उन्हें बहुत दूर हटाकर बिठूर में रखा गया। यह स्पष्ट रूप से ऎसी स्थिति से बचने के लिए किया गया था कि वह अपने खोए हुए साम्राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए कुछ नई चालें न चल सकें। बिठूर, कानपुर से 12 मील दूर [[गंगा नदी|गंगा]] के तट पर छोटा सा सुंदर नगर था। वहां उन्होंने अपने लिए एक विशाल प्रासाद का निर्माण करवाया और अपना अधिकांश समय धार्मिक कार्यकलापों में व्यतीत करने लगे। तात्या का परिवार भी पेशवा के साथ वहीं पर आ गया। &lt;br /&gt;
==युवावस्था और साथी==&lt;br /&gt;
तात्या एक अच्छे महत्वाकांक्षी नवयुवक थे। उन्होंने अनेक वर्ष बाजीराव के तीन दत्तक पुत्र- नाना साहब, बाला साहब और बाबा भट्ट के साहचर्य में बिताए। एक कहानी प्रसिद्ध है कि नाना साहब, उनके भाई, झांसी की भावी रानी जिनके पिता उस समय सिंहासनच्युत पेशवा के एक दरबारी थे और तात्या; ये सभी आगे चलकर विद्रोह के प्रख्यात नेता बने। ये अपने बचपन में एक साथ युद्ध के खेल खेला करते थे और उन्होंने मराठों की वीरता की कहानियां सुनी थी। जिनसे उन्हें विद्रोह के लिए प्रेरणा प्राप्त हुई थी। इस कहानी को कुछ इतिहासज्ञ 'अप्रमाणिक' मानते हैं। उनके विचार से गाथा के इस भाग का ताना-बाना इन वीरों का सम्मान करने वाले देश प्रेमियों के मस्तिष्क की उपज है। फिर भी यह सच है कि इन सभी का पेशवा के परिवार से निकटतम संबंध और वह अपनी आयु तथा स्थिति भिन्न होने के बावजूद प्रायः एक-दूसरे के निकट आए होंगे और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। खोए हुए राज्य की स्मृतियां अभी ताजा ही थी, धुंधली नहीं पड़ी थी। साम्राज्य को पुनः प्राप्त करना और अपने नुकसान को पूरा करना नाना और उनके भाइयों के अनेक युवा सपनों में से एक स्वप्न अवश्य रहा होगा। वे सभी बाद में अपने दुर्बल पिता की तुलना में काफ़ी अच्छे साबित हुए थे। &lt;br /&gt;
==युद्ध कला प्रशिक्षण==&lt;br /&gt;
तात्या ने कुछ सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त तो किया था किंतु उन्हें युद्धों का अनुभव बिल्कुल भी नहीं था। तात्या ने पेशवा के पुत्रों के साथ उस काल के औसत नवयुवक की भांति युद्ध प्रशिक्षण प्राप्त किया था। घेरा डालने और हमला करने का जो भी ज्ञान उन्हें रहा हो वह उनके उस कार्य के लिए बिलकुल उपयुक्त न था जिसके लिए भाग्य ने उनका निर्माण किया था। ऎसा प्रतीत होता है कि उन्होंने 'गुरिल्ला' युद्ध जो उनकी मराठा जाति का स्वाभाविक गुण था, अपनी वंश परंपरा से प्राप्त किया था। यह बात उन तरीकों से सिद्ध हो जाती है जिनका प्रयोग उन्होंने ब्रिटिश सेनानायकों से बचने के लिए किया। रामकृष्ण टोपे के बयान के अनुसार तात्या अपने पिता की 12 संतानों में से दूसरे थे। उनका एक सगा और छह सौतेले भाई और चार बहनें थी। यद्यपि तात्या अपनी बच्चों के साथ अलग रहते थे, फिर भी सभी व्यवहारिक कार्यों के लिए उनका परिवार संयुक्त परिवार था। &lt;br /&gt;
==विशिष्ट व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
तात्या के व्यक्तित्व में विशिष्ट आकर्षण था। जानलैंग ने जब उन्हें बिठूर में देखा था तो वे उनके व्यक्तित्व से प्रभावित नहीं हुए थे। उन्होंने तात्या के विषय में कहा है कि वह 'औसत ऊंचाई, लगभग पांच फीट 8 इंच और इकहरे बदन के किंतु दृढ़ व्यक्तित्व के थे। देखने में सुंदर नहीं थे। उनका माथा नीचा, नाक नासाछिद्रों के पास फैली हुई और दांत बेतरतीब थे। उनकी आंखें प्रभावी और चालाकी से भरी हुई थी। जैसी की अधिकांश एशियावासियों में होती हैं। किंतु उसके ऊपर उनकी विशिष्ट योग्यता के व्यक्ति के रूप में कोई प्रभाव नहीं पड़ा&amp;lt;ref&amp;gt;जान लैंग; वांडरिंग इन इंडिया एंड अदर्स स्केचेज आफ लाइफ इन हिंदुस्तान&amp;lt;/ref&amp;gt;।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'बाम्बे टाइम्स' के संवाददाता ने, तात्या से उनकी गिरफ्तारी के पश्चात भेंट की थी। अप्रैल 18, 1849 के संस्करण में लिखा था कि तात्या न तो ख़ूबसूरत है और न ही बदसूरत, किंतु वह बुद्धिमान हैं। उनका स्वभाव शांत और निर्बध है। उनका स्वास्थ्य अच्छा और कद औसत है। उन्हें मराठी, उर्दू और गुजराती का अच्छा ज्ञान था। वे इन भाषाओं में धाराप्रवाह बोल सकते थे। अंग्रेजी तो वह मात्र अपने हस्ताक्षर करने भर के लिए जानते थे, उससे अधिक नहीं। वह रूक-रूक कर, किंतु स्पष्ट रूप से, एक नपी-तुली शैली में बोलते थे। किंतु उनकी अभिव्यक्ति का ढंग अच्छा था और वे श्रोताओं को अपनी ओर आकृष्ट कर लेते थे। यह सच है कि तात्या अपनी वाक-शक्ति और समझाने की अपनी शक्ति से प्रायः अपने विरोधियों की सेनाओं को भी समझाकर अपने पक्ष में मिला लेते थे। &lt;br /&gt;
==चरित्र==&lt;br /&gt;
बिठूर में तात्या की योग्यताओं और महत्वाकांक्षाओं के लिए न के बराबर स्थान था और वह एक उद्धत्त व्यक्ति बनकर ही वहां रहते, यह बात इस तथ्य से स्पष्ट है कि वह कानपुर गए और उन्होंने [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] की नौकरी कर ली। किंतु शीघ्र ही हतोत्साहित होकर लौट आए। इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक महाजनी का काम किया, किंतु इसे बाद में छोड़ दिया क्योंकि यह उनके स्वभाव के बिलकुल प्रतिकूल था। तात्या के पिता पेशवा के गृह प्रबंध के पहले से ही प्रधान थे, इसलिए उन्हें एक लिपिक के रूप में नौकरी पाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। किंतु वह अपनी इस हालत से खुश नहीं थे। &lt;br /&gt;
==उपाधि 'टोपे'==&lt;br /&gt;
एक कर्मचारी की विश्वासघात संबंधी योजनाओं का पता लगाने में इस नवयुवक लिपिक की योग्यता, तत्परता और चातुर्य से प्रभावित होकर पेशवा ने एक विशेष दरबार में 9 हीरों से जड़ी हुई एक टोपी उन्हें दी और दरबार में उपस्थित लोगों ने 'तात्या टोपे' के नाम से उनकी जय-जयकार की। 1851 में पेशवा की मृत्यु के पश्चात नाना बिठूर के राजा हो गए और तात्या उनके प्रधान लिपिक बने। विचारधारा एक जैसी होने के कारण वे एक-दूसरे के इतना निकट आए जितना कि पहले कभी नहीं थे और शीघ्र ही वह नाना के मुसाहिब के रूप में प्रसिद्ध हो गए। &lt;br /&gt;
==ब्रिटिश शासन से विद्रोह के कारण==&lt;br /&gt;
1857 का विद्रोह जिन कारणों से हुआ उनसे सभी परिचित हैं। सर जौन लारेंस ने कहा था, 'यह चरबी लगी कारतूस और मात्र चरबी लगी कारतूसों के कारण हुआ' किंतु मात्र चरबी लगी कारतूस इतना बड़ा और शक्तिशाली तूफान लाने में समर्थ नहीं हो सकती थी। वास्तव में चरबी लगी कारतूस, जैसा कि सिपाहियों को संदेह था, उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तन करने का एक जघन्य हथियार था। इसके लिए तो रूपक की भाषा में यह कहा जा सकता है कि यह पके हुए फोड़े पर नश्तर था। इससे पहले भी अनेक सैनिक सुधार हो चुके थे। जिसमें -&lt;br /&gt;
#यह कहा था कि सिपाही अपनी शान से बढ़ाई गई दाढ़ी एक निर्दिष्ट पैटर्न में ही रखे। &lt;br /&gt;
#दूसरा था भारतीय पगड़ी के स्थान पर चमड़े से बने टोप पहनें (इस टोप की वजह से वेल्लोर में सिपाही विद्रोह हो चुका था) &lt;br /&gt;
#बर्मा युद्ध के दौरान सिपाहियों को समुद्र यात्रा करने पर मजबूर कर दिया गया था। (समुद्र यात्रा हिंदू धर्म में निषिद्ध है) सिपाहियों ने इसका विरोध भी किया था, क्योंकि वह ऎसा समझते थे कि यह उनके धार्मिक विश्वासों पर अनावश्यक हस्तक्षेप था, लेकिन कम्पनी सरकार ने उनके संदेह के निराकरण के लिए कोई भी प्रयास नहीं किया था। &lt;br /&gt;
#चार्टर अधिनियम, 1813 ने सारे भारत का द्वार सभी अंग्रेजों के लिए खोल दिया था। जिसके परिणामस्वरूप मिशनरियों के धर्म परिवर्तन कराने पर संबंधी कार्यकलाप तेजी से बढ़ते जा रहे थे। #एक समसामयिक व्यक्ति ने यह कहा कि 'मिशनरियों पर से रोक हटा ली गई थी, ताला तोड़कर चर्च के दरवाजे पर फेंक दिया गया था, धर्मग्रंथों को बाहर ले जाकर उन पर प्रवचन करने का मौका दे दिया गया था। जब ईसाई सरकार भारत में ईसाइयत के प्रसार का विरोध न कर सकी।'&lt;br /&gt;
==युद्ध अभियान==&lt;br /&gt;
सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के विस्फोट होने पर तात्या भी समरांगण में कूद गया था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहब के प्रति अंग्रेजों ने जो अन्याय किये थे, उनकी उसके हृदय मे एक टीस थी। उसने उत्तरी भारत में शिवराजपुर, [[कानपुर]], [[कालपी]] और [[ग्वालियर]] आदि अनेक स्थानों में अंग्रेजों की सेनाओं से कई बार लोहा लिया था। सन 1857 के स्वातंत्र्य योद्धाओं में वही ऐसा तेजस्वी वीर था जिसने विद्युत गति के समान अपनी गतिविधियों से शत्रु को आश्चर्य में ड़ाल दिया था। वही एकमात्र एसा चमत्कारी स्वतन्त्रता सेनानी था जिसमे पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के सैनिक अभियानों में फिरंगी अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिये थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान की भूमि में उसके जो शौर्य का परिचय दिया था वह अविस्मरणीय है। देश का दुर्भाग्य था कि राजस्थान के राजाओं ने उसका साथ नहीं दिया था। नाना साहब के साथ उसने 1 दिसम्बर से 6 दिसमबर 1857 तक कानपुर में अंग्रेजों के साथ घोर संग्राम किया था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ भी वह कालपी में शत्रु सेना से लड़ा था।&lt;br /&gt;
==मृत्यु और भ्रांतियां==&lt;br /&gt;
इसी वीर के सम्बन्ध में कहा जाता है कि मानसिंह ने तात्या के साथ धोखा करके उसे अंग्रेजों को सुपुर्द कर दिया था। अंग्रेजों ने उसे फांसी पर लटका दिया था। लेकिन खोज से ये ज्ञात हुआ है कि फाँसी पर लटकाये जाने वाला दूसरा व्यक्ति था। असली तात्या टोपे तो छद्मावेश में शत्रुओं से बचते हुए स्वतन्त्रता संग्राम के कई वर्ष बाद तक जीवित रहा। ऐसा कहा जाता है कि 1862-82 की अवधि में स्वतन्त्रता संग्राम का सेनानी तात्या टोपे नारायण स्वामी के रूप में गोकुलपुर [[आगरा]] में स्थित सोमेश्वरनाथ के मन्दिर में कई मास रहा था।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता संग्राम 1857]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>पंजाब</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* भूगोल और इतिहास */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Punjab-Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=चंडीगढ़&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=24289296&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=484&lt;br /&gt;
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|भौगोलिक निर्देशांक=30.73°N 76.78°E&lt;br /&gt;
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|राजभाषा(एँ)=पंजाबी, हिन्दी&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:876&lt;br /&gt;
|साक्षरता=69.95&lt;br /&gt;
|स्त्री=63.55&lt;br /&gt;
|पुरुष=75.63&lt;br /&gt;
|वर्षा=459.5&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=शिवराज पाटिल&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=प्रकाश सिंह बादल&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=117&lt;br /&gt;
|राज्यसभा सदस्य=7&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.punjabgovt.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/04/24&lt;br /&gt;
|emblem=Punjab-logo.png&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भारत]] के उत्तर पश्चिम में पंजाब राज्य है ,जिसकी सीमायें पश्चिम में [[पाकिस्तान]],  उत्तर में [[जम्मू और कश्मीर]] राज्य, उत्तर पूर्व में [[हिमाचल प्रदेश]] और दक्षिण में [[हरियाणा]] और [[राजस्थान]] राज्य हैं। 'पंजाब' शब्द फारसी के 'पंज' जिसका अर्थ होता है 'पांच' और 'आब' जिसका अर्थ होता है 'पानी' के मेल से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ 'पांच नदियों का क्षेत्र' है। ये पांच नदियां हैं- &lt;br /&gt;
*[[सतलुज नदी]], &lt;br /&gt;
*[[व्यास नदी]], &lt;br /&gt;
*[[रावी नदी]], &lt;br /&gt;
*[[चिनाव नदी]] और &lt;br /&gt;
*[[झेलम नदी]]&lt;br /&gt;
आज़ादी के बाद सन 1947 में भारत के विभाजन के समय चिनाब और झेलम नदियां पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में चली गयीं थीं। 20 जिलों के इस ख़ूबसूरत राज्य में अब चार नदियाँ बहती हैं-&lt;br /&gt;
*सतलुज,&lt;br /&gt;
*व्यास,&lt;br /&gt;
*रावी,और &lt;br /&gt;
*घग्गर &lt;br /&gt;
भूमि उपजाऊ होने और पानी की अच्छी व्यवस्था होने के कारण एक मुहावरा प्रयोग में लाया जाता है कि यहाँ 'धरती सोना उगलती' है। पंजाब का क्षेत्रफल 50,362 वर्ग किलोमीटर है। पंजाब की राजधानी [[चंडीगढ़]] है जो संयुक्त रूप से पंजाब और हरियाणा प्रदेश की राजधानी है। और 2001 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 243.59 लाख है। राज्य में साक्षरता 52 प्रतिशत है। पंजाब में मुख्य रूप से पंजाबी और हिंदी भाषा बोली जाती हैं। राज्य के मुख्य नगर [[अमृतसर]], [[जालंधर]], [[लुधियाना]] और [[पटियाला]] हैं।&lt;br /&gt;
==भूगोल और इतिहास== &lt;br /&gt;
प्राचीन समय में पंजाब भारत और ईरान का क्षेत्र था। यहाँ [[मौर्य]], बैक्ट्रियन, यूनानी, [[शक]], [[कुषाण]], [[गुप्त]] आदि अनेक शक्तियों का उत्थान और पतन हुआ। पंजाब मध्यकाल में मुस्लिम शासकों के अधीन रहा। यहाँ सबसे पहले [[महमूद ग़ज़नवी|गज़नवी]], [[मुहम्मद ग़ोरी|ग़ोरी]], [[ग़ुलाम वंश]], [[ख़िलजी वंश]], [[तुग़लक वंश|तुग़लक]],[[लोदी वंश|लोदी]] और [[मुग़ल वंश]] के शासकों ने यहाँ राज किया। 15वीं और 16वीं शती में गुरु [[नानक देव, गुरु|नानकदेव जी]] की शिक्षाओं से भक्ति आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। सिख पंथ ने एक धार्मिक और सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया, मूल रूप से जिसका उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों को दूर करना था। दसवें गुरु [[गुरु गोविंद सिंह |गोविंद सिंह जी]] ने सिखों को '[[खालसा पंथ]]' के रूप में संगठित किया। मुग़लों के दमन और अत्याचार के ख़िलाफ़ सिक्खों को एकत्र करके 'पंजाबी राज' की स्थापना की। एक फ़ारसी लेखक ने लिखा है कि 'महाराजा [[रणजीत सिंह जी, महाराजा|रणजीत सिंह]] ने पंजाब को 'मदम कदा'('बाग़-ए-बहिश्त')' अर्थात स्वर्ग में बदल दिया था। उनके देहांत के बाद अंग्रेज़ों की साज़िशों से यह साम्राज्य समाप्त हो गया। 1849 में दो युद्धों के बाद पंजाब ब्रिटिश साम्राज्य में आ गया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[महात्मा गाँधी|गांधी जी]] के [[स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन|स्वतंत्रता आन्दोलन]] से पहले ही ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ पंजाब में संघर्ष प्रारम्भ हो गया था। स्वतंत्रता संग्राम में [[लाला लाजपतराय]] ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब के नागरिकों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। देश हो या विदेश, पंजाब बलिदान में सबसे आगे रहा। विभाजन का कष्ट भी उठाना पड़ा जिसके कारण बड़े पैमाने पर रक्तपात और विस्थापन का दंश उठाया और पुनर्वास के साथ साथ राज्य के नये सिरे से संगठित करने की चुनौती का बख़ूबी सामना किया।&lt;br /&gt;
पूर्वी पंजाब की आठ रियासतों को मिलाकर नया राज्य 'पेप्सू' बनाया गया और 'पूर्वी पंजाब राज्य संघ, पटियाला' का निर्माण करके [[पटियाला]] को इसकी राजधानी बनाया गया। 1956 में 'पेप्सू' को पंजाब में मिला दिया गया। 1966 में पंजाब के कुछ भाग से 'हरियाणा' राज्य का निर्माण किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
पंजाब कृषि प्रधान राज्य है। पंजाब की भूमि बहुत ही उपजाऊ है। यहाँ गेंहू और चावल की फ़सल  मुख्य रूप से होती है्। पंजाब राज्य में दिश के भौगोलिक क्षेत्र के सिर्फ 1.5 प्रतिशत भाग में देश के गेहूं के उत्पादन का 22 प्रतिशत, चावल का 12 प्रतिशत और कपास की भी 12 प्रतिशत पैदावार का उत्पादन करता है। आजकल पंजाब में फ़सल गहनता 186 प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले दो तीन दशकों में पंजाब ने गेहूँ का 40 से 50 प्रतिशत अधिक उत्पादन करके 'देश की खाद्य टोकरी' और 'भारत का अनाज भंडार' होने का ख़िताब ले लिया है। पंजाब का विश्व के कुल उत्पादन में, चावल एक प्रतिशत,  गेहूं दो प्रतिशत और कपास में 2 प्रतिशत का योगदान है। पंजाब में प्रति हेक्टेयर खाद का उत्पादन 177 कि.ग्रां.है। राष्ट्रीय स्तर पर खाद 90 कि ग्रा प्र्ति हेक्टेयर प्रयोग की जाती है। 1991-92 से 1988-99 तक और 2001 से 2003-04 तक लगातार कृषि विस्तार सेवाओं का राष्ट्रीय उत्पादक पुरस्कार प्राप्त किया है। आनंदपुर साहब में विश्व की सबसे बड़ी अनाज मंडी है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई==&lt;br /&gt;
पंजाब में सिंचाई के लिए 1134 सरकारी नहरें हैं, जिनसे भूमि की सिंचाई होती है। यहाँ सभी प्रकार की खेती होती है। कृषि प्रधान राज्य होने के कारण कृषि विकास को प्राथमिकता दी जाती है। &lt;br /&gt;
पंजाब सरकार फ़सलों के विविधीकरण के लिए अनेक योजनाएँ चला रही है। पानी के सही इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करके विभिन्न ज़िलों के सिंचाई क्षेत्र में 0.97 लाख हेक्टेयर को बढ़ाया लिया है। राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्र 50.36 लाख हेक्टेयर है। कुल भूमि में से 42.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती है। राज्य में 33.88 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में नहरों से सिंचाई की जाती है। मुख्य नहरों और उनकी शाखाओं की कुल लम्बाई 14,500 कि.मी. है। रावी नदी पर बना '[[रणजीत सागर बाँध]]' एक बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना है। 160 मीटर ऊंचे इस बांध में 3.48 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई उपलब्ध कराने की क्षमता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्व बैंक की सहायता से पंजाब में सिंचाई और जल परियोजनाओं का दूसरा चरण पूरा हो गया है। 1,0920 कि.मी. नालियों का निर्माण किया जा चुका है। 1260 कि.मी. लम्बी नालियों की मरम्मत और 53 कि.मी. नई नालियों का निर्माण किया गया है। भटिंडा नहर प्रणाली की तीन नहरों की क्षमता बढ़ाने के लिए 18.83 करोड की लागत की परियोजनाएँ पूरी कर ली हैं। &lt;br /&gt;
रणजीत सागर बाँध के अतिरिक्त पानी के लिए पुनर्निमाण की परियोजना प्रारम्भ की गयी है। 364.10कि.मी. लम्बी मुख्य नहर के निर्माण कार्य में से 298 कि.मी. के लगभग कार्य पूरा किया जा चुका है, 1,507 कि.मी. छोटी नालियों का का निर्माण 140 करोड रुपये की लागत से पूरा हो चुका है। बानुर नहर में सदैव पानी रहे, 38.08 करोड की लागत की योजना का प्रस्ताव नाबार्ड के पास भेजा है। पंजाब के कांदी क्षेत्र के विकास के लिए 11 छोटे बांधों को बनाया गया है जिनसे 12,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का लक्ष्य है। राज्य में 1,615 टयूबवैल लगे हुए हैं। राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र में से 60 प्रतिशत की सिंचाई निजी और सरकारी टयूबवैलों से और 40 प्रतिशत नहरों से सिंचाई होती है।&lt;br /&gt;
==बिजली==&lt;br /&gt;
[[भाखड़ा बाँध]], भाखड़ा मेन लाइन, नाँगल पनबिजली योजना, गंगूवाल और कोटला पावर हाउस, हरिके बैराज, सरहिंद फीडर, माधोपुर हेडवर्क को बैराज बनाना और पोग में व्यास नदी का बांध आदि कुछ सिंचाई और पनबिजली परियोजना हैं। माधोपुर व्यास लिंक का निर्माण रावी नदी के अतिरिक्त पानी को व्यास में स्थानांतरित करने के लिए किया गया है। व्यास-सतलुज नदी लिंक परियोजना में व्यास नदी के पानी का प्रयोग बिजली के उत्पादन के बाद इस पानी को [[गोविंद सागर झील]] में भेजने का प्रबंध किया गया है। मुकेरिया और आनंदपुर साहिब पनबिजली योजनाएँ महत्वपूर्ण सिंचाई और बिजली परियोजनाएं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रणजीत सागर बांध योजना एक बहु उद्देशीय परियोजना है जिसमें  रावी नदी पर 160 मीटर ऊंचा बांध बनाया जा रहा है जिससे 3.48 लाख हेक्टेयरभूमि के लिए सिंचाई की क्षमता है। रणजीत सागर बाँध की चारों इकाइयां सफलतापूर्वक चल रही हैं। इस परियोजना से 2100 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा। कुल उत्पादन की 4.6 बिजली जम्मू और कश्मीर को दी जाएगी।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
*राज्य सरकार की सड़कों, पुलों और भवनों के रखरखाव का दायित्व पी.डब्लू.डी. की है। सड़कों की कुल लम्बाई 50,506 कि.मी. है। 'पंजाब सड़क और बाँध विकास बोर्ड' की स्थापना 1998 में हुई। इसका उद्देश्य राज्य की सड़कों के लिए अतिरिक्त साधन जुटाना था। &lt;br /&gt;
*राज्य में रेलवे मार्ग की कुल लम्बाई 3,726.06 कि.मी. है। पाकिस्तान से जुड़ा रेल मार्ग भी पंजाब के अमृतसर से है।&lt;br /&gt;
*पंजाब राज्य में चार नागरिक विमान क्लब अमृतसर, लुधियाना, पटियाला और जालंधर में हैं। इनके अतिरिक्त चंडीगढ़ में एक अंतरराज्यीय हवाई अड्डा, राजासांसी (अमृतसर) में एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और पटियाला, सहनेवाल (लुधियाना) में दो हवाई अड्डे हैं। &lt;br /&gt;
==मेले और त्योहार==&lt;br /&gt;
*[[विजय दशमी|दशहरा]]&lt;br /&gt;
*[[दीपावली]]&lt;br /&gt;
*[[होली]]&lt;br /&gt;
*[[मुक्तसर]] का [[माघी मेला]] &lt;br /&gt;
*क़िला [[रायपुर]] में ग्रामीण खेल&lt;br /&gt;
*पटियाला का बसंत&lt;br /&gt;
*[[आनंदपुर साहिब]] का होला मोहल्ला&lt;br /&gt;
*तलवंडी साबू में [[वैशाखी]]&lt;br /&gt;
*सरहिंद में रोज़ा शरीफ़ पर उर्स, [[छप्पर मेला]]&lt;br /&gt;
*[[फ़रीदकोट]] में शेख़ फ़रीद आगम पर्व&lt;br /&gt;
*गांव रामतीरथ में राम तीरथ&lt;br /&gt;
*सरहिंद में शहीदी जोर मेला &lt;br /&gt;
*हरि वल्लभ संगीत सम्मेलन&lt;br /&gt;
*जालंधर में बाबा सोदाल आदि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
पंजाब की पावन भूमि से संत भी पैदा हुए और ऐतिहासिक युद्ध भी हुए। पुरातत्व ज्ञान का यहाँ भंडार है। राज्य में पर्यटकों की रुचि के बहुत से स्थान हैं। इनमें अमृतसर का [[स्वर्णमंदिर]], दुर्गियाना मंदिर, [[जलियाँवाला बाग़]], स्टील सिटी- गोविन्दगढ़ में, आनंदपुर साहब में तख़्त श्री केशगढ़ साहब, खालसा सांस्कृतिक परिसर, भाखड़ा-नांगल बांध, पटियाला में क़िला अंदरून, मोतीबाग़ राजमहल, हरिके पट्टन में  आर्द्र भूमि, पुरातात्विक महत्व का संगोल और छतवीर चिडियाघर, आम ख़ास बाग़ में मुग़लकालीन स्मारक परिसर और सरहिंद में अफ़ग़ान शासकों की क़ब्रें और शेख़ अहमद का रोज़ा शरीफ, जालंधर में सोदाल मंदिर और महर्षि वाल्मीकि का स्मारक आदि मुख्य हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{पंजाब के ज़िले}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पंजाब]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राज्य_और_केन्द्र_शासित_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
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		<title>पंजाब</title>
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		<updated>2010-06-15T09:27:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* भूगोल और इतिहास */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Punjab-Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=चंडीगढ़&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=24289296&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=484&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=50,362&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=30.73°N 76.78°E&lt;br /&gt;
|ज़िले=20&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=लुधियाना&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=अमृतसर, जालंधर&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=पंजाबी, हिन्दी&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:876&lt;br /&gt;
|साक्षरता=69.95&lt;br /&gt;
|स्त्री=63.55&lt;br /&gt;
|पुरुष=75.63&lt;br /&gt;
|वर्षा=459.5&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=शिवराज पाटिल&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=प्रकाश सिंह बादल&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=117&lt;br /&gt;
|राज्यसभा सदस्य=7&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.punjabgovt.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/04/24&lt;br /&gt;
|emblem=Punjab-logo.png&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भारत]] के उत्तर पश्चिम में पंजाब राज्य है ,जिसकी सीमायें पश्चिम में [[पाकिस्तान]],  उत्तर में [[जम्मू और कश्मीर]] राज्य, उत्तर पूर्व में [[हिमाचल प्रदेश]] और दक्षिण में [[हरियाणा]] और [[राजस्थान]] राज्य हैं। 'पंजाब' शब्द फारसी के 'पंज' जिसका अर्थ होता है 'पांच' और 'आब' जिसका अर्थ होता है 'पानी' के मेल से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ 'पांच नदियों का क्षेत्र' है। ये पांच नदियां हैं- &lt;br /&gt;
*[[सतलुज नदी]], &lt;br /&gt;
*[[व्यास नदी]], &lt;br /&gt;
*[[रावी नदी]], &lt;br /&gt;
*[[चिनाव नदी]] और &lt;br /&gt;
*[[झेलम नदी]]&lt;br /&gt;
आज़ादी के बाद सन 1947 में भारत के विभाजन के समय चिनाब और झेलम नदियां पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में चली गयीं थीं। 20 जिलों के इस ख़ूबसूरत राज्य में अब चार नदियाँ बहती हैं-&lt;br /&gt;
*सतलुज,&lt;br /&gt;
*व्यास,&lt;br /&gt;
*रावी,और &lt;br /&gt;
*घग्गर &lt;br /&gt;
भूमि उपजाऊ होने और पानी की अच्छी व्यवस्था होने के कारण एक मुहावरा प्रयोग में लाया जाता है कि यहाँ 'धरती सोना उगलती' है। पंजाब का क्षेत्रफल 50,362 वर्ग किलोमीटर है। पंजाब की राजधानी [[चंडीगढ़]] है जो संयुक्त रूप से पंजाब और हरियाणा प्रदेश की राजधानी है। और 2001 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 243.59 लाख है। राज्य में साक्षरता 52 प्रतिशत है। पंजाब में मुख्य रूप से पंजाबी और हिंदी भाषा बोली जाती हैं। राज्य के मुख्य नगर [[अमृतसर]], [[जालंधर]], [[लुधियाना]] और [[पटियाला]] हैं।&lt;br /&gt;
==भूगोल और इतिहास== &lt;br /&gt;
प्राचीन समय में पंजाब भारत और ईरान का क्षेत्र था। यहाँ [[मौर्य]], बैक्ट्रियन, यूनानी, [[शक]], [[कुषाण]], [[गुप्त]] आदि अनेक शक्तियों का उत्थान और पतन हुआ। पंजाब मध्यकाल में मुस्लिम शासकों के अधीन रहा। यहाँ सबसे पहले [[महमूद ग़ज़नवी|गज़नवी]], [[मुहम्मद ग़ोरी|ग़ोरी]], [[ग़ुलाम वंश]], [[ख़िलजी वंश]], [[तुग़लक वंश|तुग़लक]],[[लोदी वंश|लोदी]] और [[मुग़ल वंश]] के शासकों ने यहाँ राज किया। 15वीं और 16वीं शती में गुरु [[नानक देव, गुरु|नानकदेव जी]] की शिक्षाओं से भक्ति आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। सिख पंथ ने एक धार्मिक और सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया, मूल रूप से जिसका उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों को दूर करना था। दसवें गुरु [[गुरु गोविंद सिंह, |गोविंद सिंह जी]] ने सिखों को '[[खालसा पंथ]]' के रूप में संगठित किया।  मुग़लों के दमन और अत्याचार के ख़िलाफ़ सिक्खों को एकत्र करके 'पंजाबी राज' की स्थापना की। एक फ़ारसी लेखक ने लिखा है कि 'महाराजा [[रणजीत सिंह जी, महाराजा|रणजीत सिंह]] ने पंजाब को 'मदम कदा'('बाग़-ए-बहिश्त')' अर्थात स्वर्ग में बदल दिया था। उनके देहांत के बाद अंग्रेज़ों की साज़िशों से यह साम्राज्य समाप्त हो गया। 1849 में दो युद्धों के बाद पंजाब ब्रिटिश साम्राज्य में आ गया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[गाँधी मोहनदास करमचंद|गांधी जी]] के [[स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन|स्वतंत्रता आन्दोलन]] से पहले ही ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ पंजाब में संघर्ष प्रारम्भ हो गया था। स्वतंत्रता संग्राम में [[लाला लाजपतराय]] ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब के नागरिकों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। देश हो या विदेश, पंजाब बलिदान में सबसे आगे रहा। विभाजन का कष्ट भी उठाना पड़ा जिसके कारण बड़े पैमाने पर रक्तपात और विस्थापन का दंश उठाया और पुनर्वास के साथ साथ राज्य के नये सिरे से संगठित करने की चुनौती का बख़ूबी सामना किया।&lt;br /&gt;
पूर्वी पंजाब की आठ रियासतों को मिलाकर नया राज्य 'पेप्सू' बनाया गया और 'पूर्वी पंजाब राज्य संघ, पटियाला' का निर्माण करके [[पटियाला]] को इसकी राजधानी बनाया गया। 1956 में 'पेप्सू' को पंजाब में मिला दिया गया। 1966 में पंजाब के कुछ भाग से 'हरियाणा' राज्य का निर्माण किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
पंजाब कृषि प्रधान राज्य है। पंजाब की भूमि बहुत ही उपजाऊ है। यहाँ गेंहू और चावल की फ़सल  मुख्य रूप से होती है्। पंजाब राज्य में दिश के भौगोलिक क्षेत्र के सिर्फ 1.5 प्रतिशत भाग में देश के गेहूं के उत्पादन का 22 प्रतिशत, चावल का 12 प्रतिशत और कपास की भी 12 प्रतिशत पैदावार का उत्पादन करता है। आजकल पंजाब में फ़सल गहनता 186 प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले दो तीन दशकों में पंजाब ने गेहूँ का 40 से 50 प्रतिशत अधिक उत्पादन करके 'देश की खाद्य टोकरी' और 'भारत का अनाज भंडार' होने का ख़िताब ले लिया है। पंजाब का विश्व के कुल उत्पादन में, चावल एक प्रतिशत,  गेहूं दो प्रतिशत और कपास में 2 प्रतिशत का योगदान है। पंजाब में प्रति हेक्टेयर खाद का उत्पादन 177 कि.ग्रां.है। राष्ट्रीय स्तर पर खाद 90 कि ग्रा प्र्ति हेक्टेयर प्रयोग की जाती है। 1991-92 से 1988-99 तक और 2001 से 2003-04 तक लगातार कृषि विस्तार सेवाओं का राष्ट्रीय उत्पादक पुरस्कार प्राप्त किया है। आनंदपुर साहब में विश्व की सबसे बड़ी अनाज मंडी है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई==&lt;br /&gt;
पंजाब में सिंचाई के लिए 1134 सरकारी नहरें हैं, जिनसे भूमि की सिंचाई होती है। यहाँ सभी प्रकार की खेती होती है। कृषि प्रधान राज्य होने के कारण कृषि विकास को प्राथमिकता दी जाती है। &lt;br /&gt;
पंजाब सरकार फ़सलों के विविधीकरण के लिए अनेक योजनाएँ चला रही है। पानी के सही इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करके विभिन्न ज़िलों के सिंचाई क्षेत्र में 0.97 लाख हेक्टेयर को बढ़ाया लिया है। राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्र 50.36 लाख हेक्टेयर है। कुल भूमि में से 42.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती है। राज्य में 33.88 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में नहरों से सिंचाई की जाती है। मुख्य नहरों और उनकी शाखाओं की कुल लम्बाई 14,500 कि.मी. है। रावी नदी पर बना '[[रणजीत सागर बाँध]]' एक बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना है। 160 मीटर ऊंचे इस बांध में 3.48 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई उपलब्ध कराने की क्षमता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्व बैंक की सहायता से पंजाब में सिंचाई और जल परियोजनाओं का दूसरा चरण पूरा हो गया है। 1,0920 कि.मी. नालियों का निर्माण किया जा चुका है। 1260 कि.मी. लम्बी नालियों की मरम्मत और 53 कि.मी. नई नालियों का निर्माण किया गया है। भटिंडा नहर प्रणाली की तीन नहरों की क्षमता बढ़ाने के लिए 18.83 करोड की लागत की परियोजनाएँ पूरी कर ली हैं। &lt;br /&gt;
रणजीत सागर बाँध के अतिरिक्त पानी के लिए पुनर्निमाण की परियोजना प्रारम्भ की गयी है। 364.10कि.मी. लम्बी मुख्य नहर के निर्माण कार्य में से 298 कि.मी. के लगभग कार्य पूरा किया जा चुका है, 1,507 कि.मी. छोटी नालियों का का निर्माण 140 करोड रुपये की लागत से पूरा हो चुका है। बानुर नहर में सदैव पानी रहे, 38.08 करोड की लागत की योजना का प्रस्ताव नाबार्ड के पास भेजा है। पंजाब के कांदी क्षेत्र के विकास के लिए 11 छोटे बांधों को बनाया गया है जिनसे 12,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का लक्ष्य है। राज्य में 1,615 टयूबवैल लगे हुए हैं। राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र में से 60 प्रतिशत की सिंचाई निजी और सरकारी टयूबवैलों से और 40 प्रतिशत नहरों से सिंचाई होती है।&lt;br /&gt;
==बिजली==&lt;br /&gt;
[[भाखड़ा बाँध]], भाखड़ा मेन लाइन, नाँगल पनबिजली योजना, गंगूवाल और कोटला पावर हाउस, हरिके बैराज, सरहिंद फीडर, माधोपुर हेडवर्क को बैराज बनाना और पोग में व्यास नदी का बांध आदि कुछ सिंचाई और पनबिजली परियोजना हैं। माधोपुर व्यास लिंक का निर्माण रावी नदी के अतिरिक्त पानी को व्यास में स्थानांतरित करने के लिए किया गया है। व्यास-सतलुज नदी लिंक परियोजना में व्यास नदी के पानी का प्रयोग बिजली के उत्पादन के बाद इस पानी को [[गोविंद सागर झील]] में भेजने का प्रबंध किया गया है। मुकेरिया और आनंदपुर साहिब पनबिजली योजनाएँ महत्वपूर्ण सिंचाई और बिजली परियोजनाएं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रणजीत सागर बांध योजना एक बहु उद्देशीय परियोजना है जिसमें  रावी नदी पर 160 मीटर ऊंचा बांध बनाया जा रहा है जिससे 3.48 लाख हेक्टेयरभूमि के लिए सिंचाई की क्षमता है। रणजीत सागर बाँध की चारों इकाइयां सफलतापूर्वक चल रही हैं। इस परियोजना से 2100 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा। कुल उत्पादन की 4.6 बिजली जम्मू और कश्मीर को दी जाएगी।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
*राज्य सरकार की सड़कों, पुलों और भवनों के रखरखाव का दायित्व पी.डब्लू.डी. की है। सड़कों की कुल लम्बाई 50,506 कि.मी. है। 'पंजाब सड़क और बाँध विकास बोर्ड' की स्थापना 1998 में हुई। इसका उद्देश्य राज्य की सड़कों के लिए अतिरिक्त साधन जुटाना था। &lt;br /&gt;
*राज्य में रेलवे मार्ग की कुल लम्बाई 3,726.06 कि.मी. है। पाकिस्तान से जुड़ा रेल मार्ग भी पंजाब के अमृतसर से है।&lt;br /&gt;
*पंजाब राज्य में चार नागरिक विमान क्लब अमृतसर, लुधियाना, पटियाला और जालंधर में हैं। इनके अतिरिक्त चंडीगढ़ में एक अंतरराज्यीय हवाई अड्डा, राजासांसी (अमृतसर) में एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और पटियाला, सहनेवाल (लुधियाना) में दो हवाई अड्डे हैं। &lt;br /&gt;
==मेले और त्योहार==&lt;br /&gt;
*[[विजय दशमी|दशहरा]]&lt;br /&gt;
*[[दीपावली]]&lt;br /&gt;
*[[होली]]&lt;br /&gt;
*[[मुक्तसर]] का [[माघी मेला]] &lt;br /&gt;
*क़िला [[रायपुर]] में ग्रामीण खेल&lt;br /&gt;
*पटियाला का बसंत&lt;br /&gt;
*[[आनंदपुर साहिब]] का होला मोहल्ला&lt;br /&gt;
*तलवंडी साबू में [[वैशाखी]]&lt;br /&gt;
*सरहिंद में रोज़ा शरीफ़ पर उर्स, [[छप्पर मेला]]&lt;br /&gt;
*[[फ़रीदकोट]] में शेख़ फ़रीद आगम पर्व&lt;br /&gt;
*गांव रामतीरथ में राम तीरथ&lt;br /&gt;
*सरहिंद में शहीदी जोर मेला &lt;br /&gt;
*हरि वल्लभ संगीत सम्मेलन&lt;br /&gt;
*जालंधर में बाबा सोदाल आदि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
पंजाब की पावन भूमि से संत भी पैदा हुए और ऐतिहासिक युद्ध भी हुए। पुरातत्व ज्ञान का यहाँ भंडार है। राज्य में पर्यटकों की रुचि के बहुत से स्थान हैं। इनमें अमृतसर का [[स्वर्णमंदिर]], दुर्गियाना मंदिर, [[जलियाँवाला बाग़]], स्टील सिटी- गोविन्दगढ़ में, आनंदपुर साहब में तख़्त श्री केशगढ़ साहब, खालसा सांस्कृतिक परिसर, भाखड़ा-नांगल बांध, पटियाला में क़िला अंदरून, मोतीबाग़ राजमहल, हरिके पट्टन में  आर्द्र भूमि, पुरातात्विक महत्व का संगोल और छतवीर चिडियाघर, आम ख़ास बाग़ में मुग़लकालीन स्मारक परिसर और सरहिंद में अफ़ग़ान शासकों की क़ब्रें और शेख़ अहमद का रोज़ा शरीफ, जालंधर में सोदाल मंदिर और महर्षि वाल्मीकि का स्मारक आदि मुख्य हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{पंजाब के ज़िले}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पंजाब]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राज्य_और_केन्द्र_शासित_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
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		<title>प्रयोग:गोविन्द</title>
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		<updated>2010-06-15T09:18:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: पन्ने को खाली किया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>प्रयोग:गोविन्द</title>
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		<updated>2010-06-15T09:18:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[{{Main|राम|राम के कार्य}}|राम के कार्य]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
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		<title>बुंदेलखण्ड</title>
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		<updated>2010-06-15T09:06:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: बुंदेलखंड को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT[[बुंदेलखंड]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Shivaji&amp;diff=33946</id>
		<title>Shivaji</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Shivaji&amp;diff=33946"/>
		<updated>2010-06-15T09:05:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: शिवाजी को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT[[शिवाजी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Kujula_Kadphises&amp;diff=33945</id>
		<title>Kujula Kadphises</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Kujula_Kadphises&amp;diff=33945"/>
		<updated>2010-06-15T09:04:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: कुजुल कडफ़ाइसिस को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT[[कुजुल कडफ़ाइसिस]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>मदर टेरेसा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%B0_%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A4%BE&amp;diff=33943"/>
		<updated>2010-06-15T08:56:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Mother-Teresa-2.jpg|मदर टेरेसा&amp;lt;br /&amp;gt; Mother Teresa|thumb]]&lt;br /&gt;
जन्म 26 अगस्त 1910 - मृत्यु 5 सितम्बर 1997&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करुणा और सेवा की साकार मूर्ति मदर टेरेसा ने जिस आत्मीयता से [[भारत]] के दीन-दुखियों की सेवा की है, उसके लिए देश सदैव उनका ऋणी रहेगा। &lt;br /&gt;
==भारत आगमन==&lt;br /&gt;
वे 1929 में यूगोस्लाविया से [[भारत]] आईं और [[कोलकाता|कलकत्ता]] को केन्द्र मानकर उन्होंने अपनी गतिविधियाँ शुरू कीं। तभी से अधिक आयु होने पर भी अपनी हज़ारों स्वयं सेविकाओं के साथ अनाथ, अनाश्रित एवं पीड़ितों के उद्धार कार्य में अथक रूप से लगी हुई थीं। मदर टेरेसा को पीड़ित मानवता की सेवा के लिए विश्व के अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। जिनमें [[नोबेल पुरस्कार]] 1979, [[पद्मश्री]] 1962, मेडल आफ़ फ्रीडम 1985 प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को 'यूगोस्लाविया' में हुआ। उनका वास्तविक नाम है- '''एग्नेस गोनक्शा बोजाक्शिहउ'''। उनके पिता एक साधारण व्यवसायी थे। एक रोमन कैथोलिक संगठन की वे सक्रिय सदस्य थीं और 12 वर्ष की अल्पायु में ही उनके ह्रदय में विराट करुणा का बीज अंकुरित हो उठा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ईसाई मिशनरी==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
1925 में यूगोस्लाविया के ईसाई मिशनरियों का एक दल सेवाकार्य हेतु भारत आया और यहाँ की निर्धनता तथा कष्टों के बारे में एक पत्र, सहायतार्थ, अपने देश भेजा। इस पत्र को पढ़कर एग्नेस भारत में सेवाकार्य को आतुर हो उठीं और 19 वर्ष की आयु में भारत आ गईं।&lt;br /&gt;
==मिशनरीज़ की स्थापना==&lt;br /&gt;
मदर टेरेसा कॅथोलिक नन थीं। समाजसेवा के लिए उन्होंने मिशनरीज़ की स्थापना की।&lt;br /&gt;
==समाजसेवा का व्रत== &lt;br /&gt;
मदर टेरेसा जब भारत आईं तो उन्होंने यहाँ बेसहारा और विकलांग बच्चों तथा सड़क के किनारे पड़े असहाय रोगियों की दयनीय स्थिति को अपनी आँखों से देखा और फिर वे भारत से मुँह मोड़ने का साहस नहीं कर सकीं। वे यहीं पर रुक गईं और जनसेवा का व्रत ले लिया, जिसका वे अनवरत पालन कर रही हैं। मदर टेरेसा ने भ्रूण हत्या के विरोध में सारे विश्व में अपना रोष दर्शाते हुए अनाथ एवं अवैध संतानों को अपनाकर मातृत्व-सुख प्रदान किया है। उन्होंने फुटपाथों पर पड़े हुए रोत-सिसकते रोगी अथवा मरणासन्न असहाय व्यक्तियों को उठाया और अपने सेवा केन्द्रों में उनका उपचार कर स्वस्थ बनाया, या कम से कम उनके अन्तिम समय को शान्तिपूर्ण बना दिया। दुखी मानवता की सेवा ही उनके जीवन का व्रत है। &lt;br /&gt;
==भारत रत्न==&lt;br /&gt;
1980 में मदर टेरेसा को उनके द्वारा किये गये कार्यों के कारण भारत सरकार ने &amp;quot;भारत रत्‍न&amp;quot; से विभूषित किया।&lt;br /&gt;
==विडियो==&lt;br /&gt;
[http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%B0_%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B वक्तव्य]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{नोबेल पुरस्कार}}&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
[[Category:नोबेल_पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध_व्यक्तित्व_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:सामाजिक_कार्यकर्ता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
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		<title>मदर टेरेसा</title>
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		<updated>2010-06-15T08:54:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* जीवन परिचय */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Mother-Teresa-2.jpg|मदर टेरेसा&amp;lt;br /&amp;gt; Mother Teresa|thumb]]&lt;br /&gt;
जन्म 26 अगस्त 1910 - मृत्यु 5 सितम्बर 1997&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करुणा और सेवा की साकार मूर्ति मदर टेरेसा ने जिस आत्मीयता से [[भारत]] के दीन-दुखियों की सेवा की है, उसके लिए देश सदैव उनका ऋणी रहेगा। &lt;br /&gt;
==भारत आगमन==&lt;br /&gt;
वे 1929 में यूगोस्लाविया से [[भारत]] आईं और [[कोलकाता|कलकत्ता]] को केन्द्र मानकर उन्होंने अपनी गतिविधियाँ शुरू कीं। तभी से अधिक आयु होने पर भी अपनी हज़ारों स्वयं सेविकाओं के साथ अनाथ, अनाश्रित एवं पीड़ितों के उद्धार कार्य में अथक रूप से लगी हुई थीं। मदर टेरेसा को पीड़ित मानवता की सेवा के लिए विश्व के अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। जिनमें [[नोबेल पुरस्कार]] 1979, [[पद्मश्री]] 1962, मेडल आफ़ फ्रीडम 1985 प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को 'यूगोस्लाविया' में हुआ। उनका वास्तविक नाम है- '''एग्नेस गोनक्शा बोजाक्शिहउ'''। उनके पिता एक साधारण व्यवसायी थे। एक रोमन कैथोलिक संगठन की वे सक्रिय सदस्य थीं और 12 वर्ष की अल्पायु में ही उनके ह्रदय में विराट करुणा का बीज अंकुरित हो उठा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ईसाई मिशनरी==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
1925 में यूगोस्लाविया के ईसाई मिशनरियों का एक दल सेवाकार्य हेतु भारत आया और यहाँ की निर्धनता तथा कष्टों के बारे में एक पत्र, सहायतार्थ, अपने देश भेजा। इस पत्र को पढ़कर एग्नेस भारत में सेवाकार्य को आतुर हो उठीं और 19 वर्ष की आयु में भारत आ गईं।&lt;br /&gt;
==मिशनरीज़ की स्थापना==&lt;br /&gt;
मदर टेरेसा कॅथोलिक नन थीं। समाजसेवा के लिए उन्होंने मिशनरीज़ की स्थापना की।&lt;br /&gt;
==समाजसेवा का व्रत== &lt;br /&gt;
मदर टेरेसा जब भारत आईं तो उन्होंने यहाँ बेसहारा और विकलांग बच्चों तथा सड़क के किनारे पड़े असहाय रोगियों की दयनीय स्थिति को अपनी आँखों से देखा और फिर वे भारत से मुँह मोड़ने का साहस नहीं कर सकीं। वे यहीं पर रुक गईं और जनसेवा का व्रत ले लिया, जिसका वे अनवरत पालन कर रही हैं। मदर टेरेसा ने भ्रूण हत्या के विरोध में सारे विश्व में अपना रोष दर्शाते हुए अनाथ एवं अवैध संतानों को अपनाकर मातृत्व-सुख प्रदान किया है। उन्होंने फुटपाथों पर पड़े हुए रोत-सिसकते रोगी अथवा मरणासन्न असहाय व्यक्तियों को उठाया और अपने सेवा केन्द्रों में उनका उपचार कर स्वस्थ बनाया, या कम से कम उनके अन्तिम समय को शान्तिपूर्ण बना दिया। दुखी मानवता की सेवा ही उनके जीवन का व्रत है। &lt;br /&gt;
==भारत रत्न==&lt;br /&gt;
1980 में मदर टेरेसा को उनके द्वारा किये गये कार्यों के कारण भारत सरकार ने &amp;quot;भारत रत्‍न&amp;quot; से विभूषित किया।&lt;br /&gt;
==विडियो==&lt;br /&gt;
[http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%B0_%E0%A4%9F%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B वक्तव्य]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{नोबेल पुरस्कार}}&lt;br /&gt;
{{भारत रत्‍न}}&lt;br /&gt;
[[Category:नोबेल_पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध_व्यक्तित्व_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_रत्न_सम्मान]]&lt;br /&gt;
[[Category:सामाजिक_कार्यकर्ता]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>सर्प</title>
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		<updated>2010-06-15T08:40:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Python-Snake.jpg|thumb|अज़गर सर्प&amp;lt;br /&amp;gt;Python Snake]]&lt;br /&gt;
'''सांप''' या '''सर्प''', पृष्ठवंशी [[सरीसृप]] वर्ग का प्राणी है। यह जल तथा थल दोनों जगह पाया जाता है। इसका शरीर लम्बी रस्सी के समान होता है जो पूरा का पूरा स्केल्स से ढँका रहता है। साँप के पैर नहीं होते हैं। यह निचले भाग में उपस्थित घड़ारियों की सहायता से चलता फिरता है। इसकी आँखों में पलके नहीं होती, ये हमेशा खुली रहती हैं। साँप विषैले तथा विषहीन दोनों प्रकार के होते हैं। इसके ऊपरी और निचले जबड़े की हड्डियाँ इस प्रकार की सन्धि बनाती है जिसके कारण इसका मुँह बड़े आकार में खुलता है। इसके मुँह में विष की थैली होती है जिससे जुडे़ दाँत तेज तथा खोखले होते हैं अतः इसके काटते ही विष शरीर में प्रवेश कर जाता है। दुनिया में सांपों की कोई 2500-3000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.reptileknowledge.com/articles/article9.php |title=रेप्टाइल नालेज&lt;br /&gt;
|accessmonthday=[[23 अप्रॅल]]|accessyear=[[2009]]|format=पीएचपी|publisher=रेप्टाइल नालेज.कॉम|language=अँग्रेजी}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इसकी कुछ प्रजातियों का आकार 10 सेण्टीमीटर होता है जबकि [[अजगर]] नामक साँप 25 फिट तक लम्बा होता है। साँप [[मेढक]], [[छिपकली]], [[पक्षी]], [[चूहा|चूहे]] तथा दूसरे साँपों को खाता है। यह कभी-कभी बड़े जन्तुओं को भी निगल जाता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Cobra-Snake.jpg|thumb|कोबरा सर्प&amp;lt;br /&amp;gt;Cobra Snake|left]]&lt;br /&gt;
सरीसृप वर्ग के अन्य सभी सदस्यों की तरह ही सर्प [[शीतरक्त का प्राणी]] है अर्थात् यह अपने शरीर का [[तापमान]] स्वंय नियंत्रित नहीं कर सकता है। इसके शरीर का तापमान वातावरण के ताप के अनुसार घटता या बढ़ता रहता है। यह अपने शरीर के तापमान को बढ़ाने के लिए भोजन पर निर्भर नहीं है इसलिए अत्यन्त कम भोजन मिलने पर भी यह जीवीत रहता है। कुछ साँपों को महीनों बाद-बाद भोजन मिलता है तथा कुछ सर्प वर्ष में मात्र एक बार या दो बार ढेड़ सारा खाना खाकर जीवीत रहते हैं। खाते समय साँप भोजन को चबाकर नहीं खाता है बल्कि पूरा का पूरा निकल जाता है। अधिकांश सर्पों के जबड़े इनके सिर से भी बड़े शिकार को निगल सकने के लिए अनुकुलित होते हैं। [[अफ्रीका]] का [[अजगर]] तो छोटी [[गाय]] आदि को भी निगल जाता है। विश्व का सबसे छोटा साँप थ्रेड स्नेक होता है । जो कैरेबियन सागर के सेट लुसिया माटिनिक तथा वारवडोस आदि द्वीपों में पाया जाता है वह केवल 10-12 सेंटीमीटर लंबा होता है। विश्व का सबसे लंबा सांप रैटिकुलेटेड पेथोन (जालीदार अजगर ) है, जो प्राय: 10 मीटर से भी अधिक लंबा तथा 120 किलोग्राम वजन तक का पाया जाता है । यह दक्षिण -पूर्वी एशिया तथा फिलीपींस में मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://khulasaa.com/index.php?option=com_content&amp;amp;view=article&amp;amp;id=116&amp;amp;Itemid=48|title=साँपों का संसार |accessmonthday=[[23 अप्रॅल]]|accessyear=[[2009]]|format=पीएचपी|publisher=खुलासा.कॉम|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संदर्भ ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:सरीसृप]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%BF&amp;diff=33940</id>
		<title>ब्राह्मी लिपि</title>
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		<updated>2010-06-15T08:32:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;templateright&amp;quot; cellspacing=&amp;quot;5&amp;quot; align=&amp;quot;right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
'''अन्य सम्बंधित लेख'''&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
* [[ब्राह्मी लिपि]]&lt;br /&gt;
* [[अशोक के शिलालेख]]&lt;br /&gt;
* [[ब्राह्मी लिपि अशोक-काल|ब्राह्मी लिपि अशोक काल]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
*प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट [[अशोक]] (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते है । नये अनुसंधानों के आधार 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है । ब्राह्मी भी [[खरोष्ठी]] की तरह ही पूरे [[एशिया]] में फैली हुई थी ।&lt;br /&gt;
*अशोक ने अपने लेखों की लिपि को 'धम्मलिपि' का नाम दिया है; उसके लेखों में कहीं भी इस लिपि के लिए 'ब्राह्मी' नाम नहीं मिलता। लेकिन [[बौद्ध|बौद्धों]], [[जैन|जैनों]] तथा [[ब्राह्मण]]-धर्म के ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम 'ब्राह्मी' लिपि ही रहा होगा। &lt;br /&gt;
*हमारे प्राचीन [[संस्कृत]] ग्रंथों में यह बात आम तौर से पाई जाती है कि जिस किसी भी चीज की उत्पत्ति कुछ अधिक प्राचीन या अज्ञेय हो उसके निर्माता के रूप में बड़ी आसानी से 'ब्रह्मा' का नाम ले लिया जाता है। संसार की अन्य पुरालिपियों की उत्पत्ति के बारे में भी यही देखने को मिलता है कि प्राय: उनके जनक कोई न कोई दैवी पुरुष ही माने गए हें। हमारे यहाँ  भी '[[ब्रह्मा]]' को लिपि का जन्मदाता माना जाता रहा है, और इसीलिए हमारे देश की इस प्राचीन लिपि का नाम ब्राह्मी पड़ा है। &lt;br /&gt;
*बौद्ध ग्रंथ '[[ललितविस्तर]]' में 64 लिपियों के नाम दिए गए हैं। इनमें पहला नाम 'ब्राह्मी' है और दूसरा '[[खरोष्ठी]]'। इन 64 लिपि-नामों में से अधिकांश नाम कल्पित जान पड़ते हैं। &lt;br /&gt;
*जैनों के 'पण्णवणासूत्र' तथा 'समवायांगसूत्र' में 16 लिपियों के नाम दिए गए हैं, जिनमें से पहला नाम 'बंभी' (ब्राह्मी) का है। &lt;br /&gt;
*'भगवतीसूत्र' में सर्वप्रथम 'बंभी' (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके (नमो बंभीए लिविए) सूत्र का आरंभ किया गया है। &lt;br /&gt;
*668 ई॰ में लिखित एक चीनी बौद्ध विश्वकोश 'फा-शु-लिन्' में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उल्लेख मिलता है। इसमें लिखा है कि, 'लिखने की कला का शोध दैवी शक्ति वाले तीन आचार्यों ने किया है; उनमें सबसे प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर को पढ़ी जाती है।'&lt;br /&gt;
*इससे यही जान पड़ता है कि ब्राह्मी [[भारत]] की सार्वदेशिक लिपि थी और उसका जन्म भारत में ही हुआ किंतु बहुत-से विदेशी पुराविद मानते हैं कि किसी बाहरी वर्णमालात्मक लिपि के आधार पर ही ब्राह्मी वर्णमाला का निर्माण किया गया था। &lt;br /&gt;
*ब्यूह्लर जैसे प्रसिद्ध पुरालिपिविद की मान्यता रही कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण फिनीशियन लिपि के आधार पर हुआ। इसके लिए उन्होंने एरण के एक सिक्के का प्रमाण भी दिया था। &lt;br /&gt;
*एरण (सागर ज़िला, म.प्र.) से तांबे के कुछ सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक पर 'धमपालस' शब्द के अक्षर दाईं ओर से बाईं ओर को लिखे हुए मिलते हैं। चूंकि, सेमेटिक लिपियां भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थीं, इसलिए ब्यूह्लर ने इस अकेले सिक्के के आधार पर यह कल्पना कर ली कि आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी सेमेटिक लिपियों की तरह दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। ओझा जी तथा अन्य अनेक पुरालिपिविदों ने ब्यूह्लर की इस मान्यता का तर्कयुक्त खंडन किया है। उस समय ओझा जी ने लिखा था, 'किसी सिक्के पर लेख का उलटा आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सिक्के पर उभरे हुए अक्षर सीधे आने के लिए सिक्के के ठप्पे में अक्षर उलटे खोदने पड़ते हैं, अर्थात जो लिपियां बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती हैं उनके ठप्पों में सिक्कों की इबारत की पंक्ति का आरंभ दाहिनी ओर से करके प्रत्येक अक्षर उलटा खोदना पड़ता है, परंतु खोदनेवाला इसमें चूक जाए और ठप्पे पर बाईं ओर से खोदने लग जाए तो सिक्के पर सारा लेख उलटा आ जाता है, जैसा कि एरण के सिक्के पर पाया जाता है।' साथ ही, ओझा जी ने लिखा था, 'अब तक कोई शिलालेख इस देश में ऐसा नहीं मिला है कि जिसमें ब्राह्मी लिपि फ़ारसी की नाईं उलटी लिखी हुई मिली हो।'&lt;br /&gt;
*यह 1918 के पहले की बात है। &lt;br /&gt;
*1929 में अनु घोष को एर्रगुडी (कुर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश) में [[अशोक]] का एक लघु-शिलालेख मिला, जिसे बाद में दयाराम साहनी ने 1933 में प्रकाशित किया। इस लेख की कुल 23 पंक्तियों में से 8 पंक्तियां – 2,4,6,9,11,13,14, और 23 वीं पंक्तियां- दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी गई हैं। पुरालिपियों में यह एक अद्भुत उदाहरण है। पहली पंक्ति बाईं ओर से दाईं ओर, फिर दूसरी पंक्ति दाईं ओर से बाईं ओर, फिर तीसरी पंक्ति बाईं ओर से दाईं ओर.... इसी तरह का सिलसिला यदि सारे लेख में चलता रहे, तो इस प्रकार की लेखन-प्रणाली को 'ब्यूस्त्रफीदान', अर्थात बैलों द्वारा हल जोतने की विधि कहा जाता है। यूनानी लिपि के आरंभिक लेख इसी प्रणाली के देखने को मिलते हैं। किन्तु एर्रगुडी के इस ब्राह्मी लेख को 'ब्यूस्त्राफीदान' प्रणाली में लिखा हुआ भी नहीं मान सकते; क्योंकि इसमें एक के बाद हर दूसरी पंक्ति नियमत: दाईं ओर से बाईं ओर को नहीं लिखी गई है। फिर भी, डिरिंजेर&amp;lt;ref&amp;gt;'अल्फाबेट', पृष्ठ 339&amp;lt;/ref&amp;gt; ने इस लेख के आधार पर सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि यूनानी लिपि की तरह आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। यदि केवल यह सिद्ध करने के लिए कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जानेवाली किसी विदेशी लिपि के आधार पर हुआ है। &lt;br /&gt;
*श्रीलंका में इस प्रकार के कई लेख मिलते हैं, परंतु ये अशोक के बाद के हैं और जान पड़ता है कि इनके लिखनेवालों को ब्राह्मी लिपि का यथार्थ ज्ञान भी नहीं था। आंध्र प्रदेश के भट्टिप्रोलु-लेखों में भी ब्राह्मी के कुछ अक्षर उलटे लिखे हुए मिलते हैं। चालुक्य काल का एक लेख तो नीचे से ऊपर को भी लिखा हुआ मिलता है! इन अपवादात्मक लेखों के आधार पर कोई यदि यह सिद्ध करने का प्रयत्न करे कि ब्राह्मी लिपि विदेशी लिपि के आधार पर बनाई गई है, तो उसे हठधर्मी ही कहा जाएगा। &lt;br /&gt;
*बहुत-से विद्वान मानते हैं कि किसी सेमेटिक वर्णमाला के आधार पर ही ब्राह्मी संकेतों का निर्माण हुआ है। लेकिन इसमें भी मतभेद हैं। कुछ लोग उत्तरी सेमेटिक को ब्राह्मी का आधार मानते हैं, कुछ दक्षिणी सेमेटिक को, और कुछ फिनीशियन तथा आरमेई लिपि को। चूंकि आरमेई लिपि का प्रचार भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश तक था, इसलिए &lt;br /&gt;
*डिरिंजेर का मत है कि आरमेई के आधार पर ही ब्राह्मी का निर्माण हुआ। आज प्राय: सभी विद्वान यह बात स्वीकार करते हैं कि [[खरोष्ठी]] का निर्माण आरमेई लिपि के आधार पर हुआ है, किंतु यह संभव नहीं है कि ब्राह्मी लिपि भी आरमेई के आधार पर बनाई गई हो। &lt;br /&gt;
*इसके बारे में ओझाजी ने लिखा है, 'ब्राह्मी लिपि के न तो अक्षर फिनीशियन या किसी अन्य लिपि से निकले हैं और न उसकी बाईं ओर से दाहिनी ओर को लिखने की प्रणाली किसी और लिपि से बदलकर बनाई गई है। यह भारतवर्ष के आर्यों का अपनी खोज से उत्पन्न किया हुआ मौलिक आविष्कार है। इसकी प्राचीनता और सर्वांग सुंदरता से चाहे इसका कर्त्ता ब्रह्मा देवता माना जाकर इसका नाम ब्राह्मी पड़ा, चाहे साक्षर-समाज ब्राह्मणों की लिपि होने से यह ब्राह्मी कहलायी हो, पर इसमें संदेह नहीं कि इसका फिनिशियन से कुछ भी संबंध नहीं है।' &lt;br /&gt;
*एडवर्ड टॉमस का भी यह मत है कि 'ब्राह्मी अक्षर भारतवासियों के ही बनाए हुए हैं और उनकी सरलता से उनके बनाने वालों की बड़ी बुद्धिमानी प्रकट होती है।' &lt;br /&gt;
*[[कनिंघम]] भी मानते हैं कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण भारतवासियों ने ही किया है। &lt;br /&gt;
*आर. शाम शास्त्री ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया था कि देवताओं की उपासना के लिए जिन सांकेतिक चिन्हों का उपयोग होता था, उन्हीं से ब्राह्मी लिपि के अक्षरों का निर्माण हुआ है। &lt;br /&gt;
*जगमोहन वर्मा ने 1913-15 में 'सरस्वती' पत्रिका में ब्राह्मी लिपि के बारे में कुछ लेख थे, जिनमें उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया था कि वैदिक चित्रलिपि या उससे निकली किसी सांकेतिक लिपि से ब्राह्मी लिपि निकली है। &lt;br /&gt;
*लेकिन शास्त्री और वर्मा के ये दोनों सिद्धांत किसी ठोस प्रमाण पर आधारित नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता। &lt;br /&gt;
*यही अधिक संभव जान पड़ता है कि सिंधु लिपि से ही ब्राह्मी का विकास हुआ है। वस्तुत: सिंधु लिपि में और ब्राह्मी लिपि के उपलब्ध लेखों में लगभग एक हज़ार वर्षों का अंतर है। सिंधु लिपि के संकेतों में और ब्राह्मी लिपि के संकेतो में कुछ साम्य भी देखने को मिलता है। &lt;br /&gt;
*संभव है कि 1000 ई॰ पू॰ के आसपास सिंधु लिपि के आधार पर किसी 'प्राक्-ब्राह्मी' लिपि का निर्माण किया गया हो और आगे चलकर इसी का परिष्कार होने पर ब्राह्मी लिपि अस्तित्व में आई हो। &lt;br /&gt;
*सिंधु लिपि का स्वरूप भी अक्षरमालात्मक प्रतीत होता है। उसमें भी मूलाक्षरों के साथ स्वरों की मात्राओं का रूप देखने को मिलता है। साथ ही, संयुक्ताक्षर भी देखने को मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*कुछ विद्वान तो यह भी आशा रखते हैं कि सिंधु लिपि में शायद 'आद्य संस्कृत' भाषा की खोज हो जाए।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>बाघ</title>
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		<updated>2010-06-15T08:31:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* विलुप्त होती प्रजाति */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Tiger.jpg|thumb|250px|राष्‍ट्रीय पशु- बाघ&amp;lt;br /&amp;gt;National Animal- Tiger]]&lt;br /&gt;
'''बाघ, राष्‍ट्रीय पशु'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
राष्ट्रीय पशु 'बाघ' (पैंथरा टाइग्रिस-लिन्नायस), पीले रंगों और धारीदार लोमचर्म वाला एक पशु है। राजसी बाघ, तेंदुआ, टाइग्रिस धारीदार जानवर है। अपनी शालीनता, दृढ़ता, फुर्ती और अपार शक्ति के लिए बाघ को 'राष्ट्रीय पशु' कहलाने का गौरव प्राप्त है। इसकी आठ प्रजातियों में से [[भारत]] में पाई जाने वाली प्रजाति को ‘रॉयल बंगाल टाइगर’ के नाम से जाना जाता है। उत्तर-पश्चिम भारत को छोड़कर बाकी सारे देशों में यह प्रजाति पायी जाती है। भारत के अतिरिक्त यह [[नेपाल]], [[भूटान]] और [[बंगलादेश]] जैसे पड़ोसी देशों में भी पाया जाता है। बाघ कहलाए जाने वाले अन्य जानवर है- &lt;br /&gt;
#मेघश्याम तेंदुआ या मेघश्याम बाघ, &lt;br /&gt;
#प्यूमा (लाल-भूरे रंग का बिलाव ) या हिरन बाघ और &lt;br /&gt;
#असिदंत विडाल।&lt;br /&gt;
*वर्ष 2010 में 'वर्ल्ड वाइड फ़ंड फ़ॉर नेचर' ने बाघों की आबादी महज 3,500 बताई। इसके पहले डब्ल्यू॰डब्ल्यू॰एफ॰ ने दुनिया भर में बाघों की संख्या 4000 के लगभग बताई थी।&lt;br /&gt;
==उत्पत्ति==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
*ऐसा समझा जाता है कि बाघ की उत्पत्ति उत्तरी यूरेशिया में हुई और यह दक्षिण की ओर चला आया था। &lt;br /&gt;
*वर्तमान में यह रूस के सुदूर पूर्वी इलाक़े से चीन, भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया तक पाया जाता है। &lt;br /&gt;
*इसकी सामान्य रूप से मान्य आठ प्रजातियां होती हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें से जावा बाघ, बाली बाघ और कैरिबयाई बाघ विलुप्त हो गए है। &lt;br /&gt;
*चीनी बाघ विलुप्त होने के क़रीब हैं और सुमात्राई, साइबेरियाई एवं भारतीय उपप्रजातियां रेड डेटा बुक में निश्चित तौर पर संकटापन्न बताई गई हैं। &lt;br /&gt;
==रूप और आकृति==&lt;br /&gt;
*बाघ पर मोटी पीली लोमचर्म का कोट होता है जिस पर गहरी धारीदार पट्टियां होती हैं। &lt;br /&gt;
*लावण्‍यता, ताकत, फुर्तीलापन और आपार शक्ति के कारण बाघ को भारत के 'राष्‍ट्रीय जानवर' के रूप में गौरवान्वित किया है।&lt;br /&gt;
*बाघ की अयाल नहीं होती, लेकिन बूढ़े नर के गाल के बाल अपेक्षाकृत लंबे और फैले हुए होते हैं। &lt;br /&gt;
*नर बाघ मादा से बड़ा होता है और इसकी कंधे तक की ऊचाई क़रीब 1 मीटर, लंबाई लगभग 2.2 मीटर, पूंछ क़रीब 1 मीटर लंबी, और वज़न लगभग 160 से 230 किग्रा या ज़्यादा से ज़्यादा लगभग 290 किग्रा होता है।&lt;br /&gt;
*सफ़ेद बाघों में सभी पूर्णत सफ़ेद नहीं होते, इनमें से लगभग सभी भारत में विंध्य और कैमूर पर्वत श्रृंखलाओं में पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*काले बाघ के पाए जाने की भी ख़बर है, ये [[म्यांमार]], [[बांग्लादेश]] और पूर्वी भारत के घने जंगलों में कभी-कभी पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*बाघ घास वाले दलदली इलाक़ों और जंगलों में रहता है; यह महलों या मंदिरों जैसी इमारतों के खंडहरों में भी पाया जाता है। &lt;br /&gt;
*शक्तिशाली और आमतौर पर एकांत प्रिय यह विडाल एक अच्छा तैराक है और लगता है कि इसे नहाने में मज़ा आता है, विपत्ति में यह पेड़ पर चढ़ सकता है। &lt;br /&gt;
*स्थान और प्रजाति के अनुसार बाघ के आकार और विशिष्ट रंग एवं धारीदार चिह्न में भी परिवर्तन होता है। उत्तर के मुक़ाबले दक्षिण के बाघ छोटे और ज़्यादा भड़कीले रंग के होते हैं। &lt;br /&gt;
*बंगाल टाइगर (पी. टाइग्रिस) और दक्षिण-पूर्वी [[एशिया]] के द्वीपों के बाघ, उदाहरण के तौर पर, कुछ-कुछ लाल और भूरे रंग के, लगभग गहरी काली सुंदर अनुप्रस्थ धारियों वाले होते हैं। भीतरी हिस्से, पैर के अंदर की ओर, गाल और दोनों आंखों के ऊपर एक बड़ा सफ़ेद सा धब्बा होता है। लेकिन उत्तरी [[चीन]] और [[रूस]] के बहुत बड़े और दुर्लभ साईबेरियाई बाघों (पी. टाइग्रिस एल्टाइका) के बाल लंबे, मुलायम और हल्के पीले होते हैं। &lt;br /&gt;
*कुछ काले और सफ़ेद बाघ भी होते है और केवल एक पूर्णतः सफ़ेद बाघ की ही जानकारी मिली है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भोजन==&lt;br /&gt;
शिकार करने और भरपेट खाने के बाद बाघ बची हुई लाश को गिद्ध और अन्य अपमार्जकों से छुपाने का जान-बूझकर प्रयास करता है, जिससे भविष्य में भी खाना मिल सके। वह अन्य बाघों या तेंदुओं द्वारा मारे गए शिकार को ले जाने में भी नहीं झिझकता और कभी-कभी वह सड़ा मांस भी खा लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाघ रात को शिकार करता है। हिरन, जंगली सूअर एवं मोर सहित विभिन्न प्रकार के जानवरों को अपना शिकार बनाता है। साधारणत: यह हृष्ट-पुष्ट बड़े स्तनधारियों पर हमला नहीं करता,  यद्यपि ऐसी घटनाएं हैं, जब बाघ ने [[हाथी]] या जवान भैंसे पर हमला किया। बाघ कभी-कभी मानव बस्तियों से भी पालतू जानवरों को उठाकर ले जाता है। बूढ़ा या विकलांग बाघ या शावकों वाली बाघिन आदमी का आसानी से शिकार कर सकते हैं तथा नरभक्षी बन जाते हैं।&lt;br /&gt;
==संरक्षण के प्रयास==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tiger2.jpg|बाघ &amp;lt;br /&amp;gt; Tiger|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
यद्यपि विगत 1,000 साल से बाघ का शिकार किया जाता रहा है, फिर भी 20वीं सदी के शुरू में जंगलों में रहने वाले बाघ की संख्या 1,00,000 आंकी गई थी। इस सदी के अवसान पर ऐसी आशंका थी कि विश्व भर में केवल 5,000 से 7,000 बाघ बचे हुए हैं। आज तक बाघों का महत्व विजयचिह्न और महंगे कोटों के लिए खाल के स्त्रोत के रूप में था। बाघों को इस आधार पर भी मारा जाता था कि वे मानव के लिए ख़तरा हैं। 1970 के दशक में अधिकतर देशों में शौक़िया शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा बाघ की खाल का व्यापार ग़ैर क़ानूनी बना दिया गया। 1980 के दशक में बाघों की गणना से पता चला कि उनकी संख्या बढ़ रही है और ऐसा लगा कि संरक्षण प्रयास सफल हो रहे हैं और उनके विलुप्त होने का कोई ख़तरा नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु स्थिति ऐसी नहीं थी, जैसी दिखाई देती थी। बाघ के अंगों, खोपड़ी, हड्डियों, गलमुच्छ, स्नायुतंत्र और ख़ून को लंबे समय से एशियाई लोग, विशेष रूप से चीनी, औषधि और शक्तिवर्द्धक पेय बनाने में इस्तेमाल करते रहे हैं, जिसका गठिया, मूषक दंश और विभिन्न बीमारियों को ठीक करने, ताक़त बहाल करने और कामोत्तेजक के रूप में उपयोग किया जाता है। जब तक बाघ के शिकार पर प्रतिबंध नहीं लगा था। उसके शरीर के इन भागों की कभी कमी नहीं रही। लेकिन 1980 के दशक के अंत में इन अंगों के भंडार ख़त्म हो रहे थे और ऐसे सबूत थे कि इनको पाने के लिए तब भी बाघों को मारा जा रहा था। सावधानीपूर्वक की गई गणना से पता चला कि कर्मचारियों ने, जिनकी ग़ैरक़ानूनी शिकारियों से सांठ-गांठ थी या जो उच्चाधिकारियों को खुश करने के लिए उत्सुक थे, पहले की गणना को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया था। इसी समय ग़ैरक़ानूनी शिकार की ख़बरें तेज़ी से बढ़ रही थीं तथा बाघ के अंगों का अवैध व्यापार फलफूल रहा था और आपूर्ति में कमी के कारण इनकी क़ीमतें और ज़्यादा हो गई थीं। कभी-कभी अपराधी को पकड़ा जाता था और बरामद माल को नष्ट किया जाता था, जिसका अत्यधिक प्रचार भी किया जाता था। वास्तव में तस्करों को रोकने के लिए बहुत कम प्रयास किए गए और कई देशों में चीनी औषधि विक्रेताओं के पास शक्तिवर्धक पेय अब भी उपलब्ध हैं।&lt;br /&gt;
==प्रतिबंधित देश==&lt;br /&gt;
सरकारों पर उन देशों के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाने के लिए दबाव डाला गया, जो बाघ के अंगों के व्यापार को समाप्त करने के लिए समुचित उपाय करने में विफल रहे। संरक्षणकर्ताओं ने यह विश्वास करते हुए कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा दंडात्मक उपाय की धमकी ही परिवर्तन लाने में मदद करेगी, राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन से कार्यवाही करने का आग्रह किया और अप्रैल 1994 में उन्होंने ऐसा किया भी। ताइवान से क़रीब 2 करोड़ 50 लाख डॉलर सालाना मूल्य के वन्य जीव उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कुछ सरकारों ने सहयोग का प्रयास किया। मार्च 1994 में [[भारत]] ने बाघों को बचाने के एक संगठित प्रयास के तहत 10 राष्ट्रों के 'विश्व बाघ मंच' की पहली बैठक बुलाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग़ैर क़ानूनी शिकार बंद हो जाने के बावजूद बाघ के लिए ख़तरा समाप्त नहीं होगा। भारत में, जहां सबसे अधिक संख्या में बाघ रहते हैं। तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या की अधिक भूमि की आवश्यकता के कारण बाघों के आवास और भोजन आपूर्ति में कमी आ रही है। इसके बावजूद प्रकृति के प्रति वास्तविक सम्मान क़ायम है और बाघों को बचाने के लिए भारत पहले ही बड़ी राशि ख़र्च कर चुका है। आशा है कि शायद मानव और बाघ सहअस्तित्व जारी रखने के लिए कोई रास्ता ढूंढ निकालेंगे।&lt;br /&gt;
==भारत में बाघ==&lt;br /&gt;
खत्म होते जंगल और शिकारियों पर अंकुश न होने से राष्ट्रीय पशु और जंगल के राजा बाघ की संख्या लगातार कम होती जा रही है। देश के सभी अभयारण्य में लगातार इनकी संख्या कम होती जा रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बीसवीं सदी के शुरू में देश में 40 हजार से ज्यादा बाघ थे। सदी के शुरूआती सात दशकों में अंधाधुंध शिकार और जंगलों के सिमटने के कारण 1972 में बाघों की संख्या घटकर 1872 रह गई। बाघों की इस तरह गिरती संख्या पर केन्द्र सरकार ने 1973 में 'नौ टाइगर रिजर्व' इलाकों में 'बाघ बचाओ योजना' शुरू की। इसमें [[उत्तर प्रदेश]] तथा अब [[उत्तराखंड]] का [[जिम कार्बेट बाघ संरक्षित वन]] क्षेत्र भी शामिल था। उत्तरप्रदेश में राज्य में 26 हजार हेक्टयर से ज्यादा वन इलाके पर अतिक्रमण हो गया है। राज्य में बाघों के रहने का एकमात्र स्थान 'दुधवा टाइगर रिजर्व' में भी 827 हेक्टयर जमीन पर गैरकानूनी कब्जा हो चुका है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में जब 1990 में गिनती हुई तो बाघों की संख्या 240 थी। वर्ष 2001 में हुई गणना में 284 बाघ थे जिनमें 123 नर,132 मादा और 29 शावक थे। दो साल बाद 2003 में हुई गिनती में इनकी संख्या स्थिर रही और दो साल में सिर्फ एक बाघ कम मिला। उस समय पाए गए 283 बाघ में 92 नर, 162 मादा और 29 शावक थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 2005 की गिनती में दस बाघ कम हुए और इनकी संख्या 273 हो गई। वर्ष 2007 में कराई गई गिनती के परिणाम 2008 में आए और इनकी संख्या 109 हो गई। बाघों की गिनती पहले उनके पंजों के निशान के आघार पर होती थी लेकिन 2007 की गणना में नयी पद्धति का इस्तेमाल किया गया। गिनती के इस तरीके को ज्यादा विश्वसनीय माना गया। कुछ लोगों ने 'कैमरा ट्रैप पद्धति' पर यह कह कर सवाल उठाया कि इसमें कैमरे जमीन से डेढ़ फुट ऊपर लगे होते हैं और शावक उसकी रेंज में नहीं आ पाते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शहरीकरण, औद्योगिकी विकास की रफ्तार ने दुनिया भर में जल, जंगल, जमीन को नुकसान पहुंचाया है। इससे सर्वाधिक हानि पर्यावरण एवं उसको बनाए रखने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अन्य प्राणियों की हुई। जंगल में जबरन घुसे विकास ने जानवरों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। परिणाम स्वरूप वन्य प्राणी लगातार खत्म होते जा रहे हैं। कुछ जीव जंतु समाप्त हो गये और कुछ जानवरों की कई प्रजातियां लुप्तप्राय होने की कगार पर है। ऐसे में छोटे-छोटे वन्य प्राणियों से लेकर जंगल के राजा शेर (बाघ) तक सबके लिए अपनी जान बचाए रखना मुश्किल हो गया है। बाघ संरक्षण के सरकारी इंतजाम 'सफेद हाथी' साबित हो रहे हैं। &lt;br /&gt;
*पेंथेरा टाइग्रिस, नियोफ़ेलिस टाइग्रिस या लियो टाइग्रिस, एशिया की विशालकाय बिल्ली, विडाल कुल (फ़ीलीडी) का सबसे बड़ा सदस्य है। शेर, तेंदुआ और अन्य की तरह बाघ बड़े और दहाड़ने वाले विडालों में से एक हैं। ताक़त और उग्रता में इसका एकमात्र प्रतिद्वंद्वी केवल सिंह है।&lt;br /&gt;
*मनुष्य के अनुसार विश्व में सबसे बड़े विडाल वंशी, बाघ (पेंथेरा टाइग्रिस) से अधिक हिंसक कोई जानवर नहीं है और कोई भी इससे ज़्यादा डर पैदा नहीं करता। ऐमूर बाघ (पी.टी. अटलांटिका) की प्रजाति का वज़न 300 किग्रा तक और नाक से पूंछ तक लंबाई चार मीटर पाई गई है।&lt;br /&gt;
*ज्ञात आठ किस्‍मों की प्रजाति में से शाही बंगाल टाइगर (बाघ) उत्‍तर पूर्वी क्षेत्रों को छोड़कर देश भर में पाया जाता है और पड़ोसी देशों में भी पाया जाता है जैसे नेपाल, भूटान और बंगलादेश। भारत में बाघों की घटती जनसंख्‍या की जांच करने के लिए अप्रैल 1973 में 'प्रोजेक्‍ट टाइगर' (बाह्य परियोजना) शुरू की गई। अब तक इस परियोजना के अधीन बाघ के 27  आरक्षित क्षेत्रों की स्‍थापना की गई है जिनमें 37,761 वर्ग कि.मी. क्षेत्र शामिल है।&lt;br /&gt;
===बाघ की उपजातियां===&lt;br /&gt;
बाघ की 8 उपप्रजातियां, जिनकी पहचान हुई है, वे हैं -&lt;br /&gt;
#पेंथेरा टाइग्रिस, भारतीय या बंगाल टाइगर (बाघ), भारत , नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पश्चिमी म्यांमार में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. कोर्बेटाई या भारतीय चीनी बाघ, पूर्वी और दक्षिणि म्यांमार, मलेशियाई प्रायद्वीप, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम और चीन के युन्नान प्रांत में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. सुमात्राई या सुमात्राई बाघ, सुमात्रा, इंडोनेशिया में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. सोंडेइका या जावा का जावाई बाघ, अब विलुप्त माना जाता है ।&lt;br /&gt;
#पी.टी. बालिका, बाली देश का बाली बाघ, अब विलुप्त माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. एमोएंसिस या दक्षिण चीन का बाघ, दक्षिण-मध्य चीन में मुश्किल से जीवित है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. विर्गाटा, कैस्पियाई बाघ, यह भी विलुप्त माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. अटलंटिका या एमूर बाघ, रूस के सूदूर पूर्वी इलाक़े और पड़ोसी चीन एवं उत्तर कोरिया में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
==जंगली विडाल==&lt;br /&gt;
एशियाई जंगली विडालों में तेंदुए के बाद बाघ भौगोलिक रूप से सबसे ज़्यादा फैला हुआ है और व्यापक आवासीय विविधता के अनुरूप उसने अपने आप को ढाल लिया है। साइबेरियाई टैगा वन, जहां सर्दियों में तापमान - 40डिग्री से. तक गिर जाता है, से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया के सदाबहार वन, भारत के शुष्क पतझड़ वन, [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] के कछार की ऊंची घास के मैदान और सुंदरवन के मैंग्रोव वन तक, जहां तापमान 40 डिग्री से. तक चढ़ जाता है, इन सभी जगहों पर बाघ आराम से रहता है। बाघ की सबसे ज़्यादा आबादी घने वनों के अतिरिक्त उस भूभाग में पाई जाती है, जहां बड़ी संख्या में शिकार पाया जाता है, जैसे ऊंची घास के मैदान, मिश्रित घास के मैदानी जंगल और पतझड़ एवं अर्द्ध पतझड़ वन। पूर्वी एशिया के शीतोष्ण और उष्णोष्ण वनों में विकसित विडालवंशियों में सबसे विशालकाय यह बाघ गर्मी को अब भी अपेक्षाकृत कम ही सहन कर पाता है। यह एक कुशल तैराक है, फिर भी न तो मेघश्याम तेंदुए (नियोफ़ेलिस नेबुलोसा) की तरह ताइवान और बोर्नियो द्वीप में और न ही तेंदुए (पेंथेरा पार्डस) की तरह श्रीलंका (भूतपूर्व सीलोन) द्वीप में बस सका। इससे संकेत मिलता है कि बाघ इस द्वीपों के मुख्यभूमि से अलग होने के बाद यहां पहुंचे, हालांकि बाघ इंडोनेशियाई द्वीपसमूह के सुमात्रा, जावा और बाली में पाया जाता है। लेकिन अन्य कई जंतु प्रजातियों की तरह यह [[बाली]] के पूर्व में गहरे जल मार्ग वैलेस रेखा को पार नहीं कर पाया। अन्य जंतुओं की तरह इन द्वीपों में बाघ औसतन छोटे शरीर का था। विलुप्त बाली बाघ सभी 8 उपप्रजातियों में सबसे छोटा था, शरीर और पूंछ को मिलाकर उसकी औसत लंबाई 2.5 मीटर थ। उपयुक्त आवास की तलाश में यह पश्चिम की ओर तुर्की और काला सागर तक चला आया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निवास का विशेष इलाका==&lt;br /&gt;
बाघ विशेषकर नर अपान इलाक़ा स्थापित व क़ायम करने की कोशिश करते है, जिसका आकार व स्वरूप शिकार की संख्या और फैलाव, इलाक़े में अन्य बाघों की उपस्थिति, भूभाग की प्रकृति, पानी की उपलब्धता, जलवायु तथा व्यक्तिगत विशेषताओं पर निर्भर करता है। बाघ एक-दुसरे से दूरी और अपने इलाक़े का क़ब्ज़ा, दहाड़ने, भूमि खुरचने, पेड़ों पर पंजों के निशान, विष्ठा निक्षेपण, चेहरे की ग्रथियों को रगड़कर गंध निक्षेपण तथा गुदा ग्रंथियों से निकाली गंध एवं मूत्र के मिश्रण के छिड़काव से हासिल करता है। इस जाति की एकांतप्रियता भी क्षेत्र संघर्ष को टालने में मदद करती है। फिर भी संघर्ष होता है, जो कभी चोट या मृत्यु का भी कारण बन जाता है। बाघ विशेष शिकार को प्राथमिकता देता है। आमतौर पर अपने  शरीर के वज़न के बराबर वज़न वाली प्रजातियां, जैसे सांबर, दलदली हिरन और जंगली सूअर आदि को। क़ांटों से घायल होने के ख़तरे के बावजूद साही के प्रति विशेष रूचि एक अपवाद है कई इलाक़ों में केवल अपनी अधिक संख्या के कारण चीतल, बाघ के आहार का मुख्य भाग है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रकृति संतुलन में बाघ की भूमिका==&lt;br /&gt;
सर्वोच्च परभक्षी होने के कारण बाघ प्रकृति की नियंत्रण और संतुलन योजना में प्रमुख भूमिका निभाता है। शिकार किए जाने वाले जानवरों के अलावा यह अपने इलाक़े के अन्य परभक्षी तेंदुए की संख्या पर भी नियंत्रण रखता है। इसके विपरीत शिकार होने वाली प्रजातियों की स्थिति का भी बाघ की संख्या और वितरण पर असर पड़ता है, लेकिन उतना नहीं जितना प्राकृतिक शिकार पर पूरी तरह निर्भर परभक्षी प्रजातियों, जैसे जंगली कुत्ते और मेघश्याम तेंदुए पर पड़ता है, क्योंकि बाघ पालतू जानवरों को भी खाता है।&lt;br /&gt;
==परंपरागत हिंदू विश्वास के अनुसार==&lt;br /&gt;
बाघ देवी [[दुर्गा]] का वाहन है। जीववाद का अनुसरण करने वाले कुछ जनजातीय समुदाय अब भी बाघ को पूजते है और उसके आवासीय क्षेत्र में रहने वाले उसे भय और श्रद्धा से देखते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों में बाघ को दर्शाया गया है। प्राचीन काल में गुप्त सम्राटों में से सबसे महान [[समुद्रगुप्त]] के विशेष सोने के सिक्के में उन्हें बाघ का वध करते हुए दिखाया गया है। अपने प्रबल शत्रु अंग्रेज़ों को हरा न सकने के कारण [[टीपू सुल्तान]] ने अपनी कुंठा को दूर करने के लिए अंग्रेज़ सैनिक का शिकार करता हुआ जीवित बाघ जितना बड़ा और आवाज़ निकालने वाला बाघ का खिलौना मंगवाया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एशियाई कला और दंत कथाओं में [[हाथी]] और सिंह के बाद बाघ जितना चित्रण किसी अन्य वन्य पशु का नहीं हुआ है। वैज्ञानिक प्रमाणों के विपरीत बाघ के अंगों को तावीज़, खुराक या औषधि के रूप में इस्तेमाल करने की वर्तमान प्रथा बाघ के प्रभामंडल तथा सहस्राब्दियों से उसके प्रति भय से उपजे विश्वास को दर्शाता है। चीनी पंचाग का प्रत्येक 12वां साल व्याघ्र वर्ष के रूप में मनाया जाता है और इसमें जन्में बच्चे विशेष रूप से भाग्यशाली और शक्तिशाली माने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाघ दंतकथाओं और अंधविश्वासों का विषय रहा है। खेल और खाल के लिए इसका शिकार किया जात है। जहां यह पाया जाता है, वहां अपने विभिन्न अंगों के कथित रोगनाशक, संरक्षी या कामोत्तेजक गुणों के कारण इसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाघ के अंगों का प्रयोग==&lt;br /&gt;
*प्रदर्शन और पूजा के लिए खाल सहित बाघ के अंगों को काफ़ी महत्त्वपूर्ण माना जाता है।&lt;br /&gt;
*तावीज़ के लिए पंजे, दांत और हंसुली। &lt;br /&gt;
*अपने दुश्मन को आंत के अल्सर से पीड़ित करने के लिए गलमुच्छ। &lt;br /&gt;
*औषधि के लिए रक्त और मूत्र। &lt;br /&gt;
*शक्तिवर्द्धन और पराक्रम के लिए मांस। &lt;br /&gt;
*संभोग शक्ति के लिए शिश्न। &lt;br /&gt;
*सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि औषधि एवं चीनी शराब के लिए हड्डियां इस्तेमाल की जाती है। एक अच्छी खाल की क़ीमत 15,000 डॉलर तक हो सकती है। एक किग्रा हड्डियां 250 डॉलर में बेची जा सकती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग़ैरक़ानूनी शिकार==&lt;br /&gt;
ग़ैरक़ानूनी शिकार बाघों की संख्या में कमी का एक प्रमुख कारण रहा है, लेकिन पिछली दो सदियों में उनकी संख्या में भारी कमी के कारण हैं- &lt;br /&gt;
*आवासीय इलाक़े में तेज़ी से कटौती, गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनो रूप से। &lt;br /&gt;
*शौक़िया शिकार। &lt;br /&gt;
*बाघ जातियों की संख्या में कमी के कारण पालतू जानवरों पर ज़्यादा निर्भरता और इस कारण आदमी द्वारा बदले की कार्यवाही। &lt;br /&gt;
*मानव और पालतू जानवरों की संख्या में वृद्धि से बाघ के आवासीय इलाक़े में अशांति व कटौती। &lt;br /&gt;
*कृषि के लिए वनों तथा विशेष रूप से बाघ की पसंदीदा ऊंची घास के मैदानों की कटाई।&lt;br /&gt;
*युद्ध और विद्रोह।&lt;br /&gt;
*आवासीय इलाक़े के विखंडन और अलगाव तथा परिवर्तित वातावरण के अनुसार अपने को ढालने एवं मनुष्य की निकटता व अपव्यय से तालमेल बिठाने में बाघ की विफलता।&lt;br /&gt;
===बाघ की केवल पांच जातियाँ शेष===&lt;br /&gt;
1999 के आकलन के अनुसार, बाघ की शेष पांच जातियों की संख्या इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
भारतीय बाघ -       3,000 से 4,550&lt;br /&gt;
सुमात्राई बाघ -       400 से 500&lt;br /&gt;
भारत-चीनी बाघ -     1,200 से 1,700&lt;br /&gt;
दक्षिणी चीन का बाघ -  20 से 30&lt;br /&gt;
एमूर बाघ -          360 से 400&lt;br /&gt;
इस प्रकार 20वीं सदी के अंत में विश्व भर में बाघों की कुल संख्या 5,000 से 7,500 के बीच होने का अनुमान था।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घटती संख्या पर चिंतन==&lt;br /&gt;
तीन दशक पहले बाघों की घटती संख्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी और धीरे-धीरे सभी देशों ने इस जानवर की सुरक्षा के उपाय किए, जिनमें अलग-अलग हद तक सफलता मिली। बाघ को अपने आवासीय इलाक़े में क़ानूनी सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन सब जगह क़ानून कारगर ढंग से लागू नहीं हो रहा है। भारत ने, जहां बाघों की आधी संख्या पाई जाती है, इसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया है और 1973 में महत्त्वाकांक्षी बाघ परियोजना शुरू की, जिसके तहत चुने हुए बाघ आरक्षित क्षेत्रों को विशिष्ट दर्जा दिया गया और वहां विशेष संरक्षण प्रयास किए गए। नेपाल, [[मलेशिया]] और [[इंडोनेशिया]] ने कई राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य स्थापित किए हैं, जहां इस जानवर की कारगर ढंग से रक्षा की जाती है। [[थाइलैंड]], [[कंबोडिया]] और [[वियतनाम]] भी ऐसी ही कार्रवाई कर रही हैं। चीन एकमात्र ऐसा देश है, जहां बाघ की तीनों उपप्रजातियां हैं, जिनमें सबसे अधिक संकटापन्न दक्षिण चीन का बाघ है; वह भी बाघ के संरक्षण पर विशेष ध्यान दे रहा है, रूस एवं सुदूर पूर्व में, जहां ग़ैरक़ानूनी शिकार ने एमूर बाघ के लिए गंभीर ख़तरा पैदा कर दिया है, सघन प्रयास और कारगर गश्त से इसकी संख्या में बढ़ोतरी हुई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाघ की स्थिति ने व्यापक सहानुभूति जगाई है और इसके संरक्षण के लिए काफ़ी पैसा मिला है। वर्ल्ड वाइड फ़ंड फ़ॉर नेचर (डब्लू. डब्लू.एफ.) पथप्रदर्शक और सबसे बड़ा अंशदाता रहा है, लेकिन एक्सॉन एवं कई अन्य संगठनों ने भी बड़ा योगदान किया है। द कनवेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एन्डेंजर्ड स्पीशीज़ (साइटेस) को बाघ के उत्पादों के ग़ैरक़ानूनी व्यापार पर नियंत्रण का काम सौंपा गया है बाघ को बचाने के लिए संयुक्त प्रयासों में समन्वय के लिए विश्व बाघ मंच की स्थापना की गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कम होते बाघ===&lt;br /&gt;
[[एशिया]] में पाए जाने वाले इस राजसी प्राणी के भविष्य पर मनुष्य की काली नज़र बहुत पहले से पड़ चुकी है। प्रकृति के इस भव्य, ताकतवर, अद्भुत और शाही प्राणी को बचाने के लिए अब तक जितनी भी योजनाएं बनीं, उन्हें ठीक से पालन नहीं करने से और लगातार बढ़ती मानव जनसंख्या से जंगलों पर इतना दबाव पड़ रहा है कि कमोबेश हर क्षेत्र में जंगल पिछले एक दशक में अपनी वास्तविक सीमाओं से 47 प्रतिशत तक सिकुड़ चुके हैं। भारत और चीन जैसे ज़्यादा आबादी वाले देशों में तो स्थिति भयावह हो चुकी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===विलुप्त होती प्रजाति===&lt;br /&gt;
एशिया में बाघों की कुल नौ प्रजातियां हैं, जिन्हें क्षेत्र के आधार पर बांटा गया है। इसमें साइबेरियन बाघ, जो रूस के सुदूर और दुर्गम साइबेरिया के बर्फीले जंगलों में अब शायद सिर्फ 450 के क़्ररीब बचे हैं। रॉयल बंगाल टाइगर, जो भारत, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के जंगलों में पाया जाता है। इनकी संख्या कुल 1800 के आस पास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बंगाल टाइगर]] की सबसे निकटतम प्रजाति है इंडोचाइनीज़ टाइगर, जो कभी लाओस, वियतनाम, कम्बोडिया और मलयेशिया में पाया जाता था। इनकी संख्या अब सिर्फ 300 बची है। इसके अलावा मलय टाइगर जो थाइलैंड और मलयेशिया में पाया जाता है। यह अब सिर्फ 500 बचे हैं जिनमें से अधिकतर मानव निर्मित पशु शिविरों में पाए जाते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके अलावा सुमात्रा टाइगर, जो सुमात्रा द्वीप समूह में पाया जाता है। इसकी संख्या अब 400 बताई जा रही है। हिंद महासागर में बसे जावा और बाली द्वीपों में पाए जाने वाले जावा टाइगर और बाली टाइगर, जो आकार में सबसे छोटे माने जाते थे, अब विलुप्त मान लिए गए हैं। किसी ज़माने में उत्तर एशिया में मंगोलिया से लेकर कज़ाकिस्तान, [[अफ़ग़ानिस्तान]], तुर्कमेनिस्तान, ईरान, इराक़ से लेकर तुर्की तक पाया जाने वाला कैस्पियन टाइगर भी अब विलुप्त हो चुका है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अवैध कारोबार के शिकार==&lt;br /&gt;
चीन में वर्ष 2010 में टाइगर वर्ष मनाया जा रहा है और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस कारण से इस वर्ष बाघ के अंगों की मांग में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार मध्य एशिया और चीन में बाघ के लिंग की कीमत 80,000 डॉलर प्रति 10 ग्राम है, बाघ की खाल 10,000 से लेकर 1,00,000 डॉलर तक, बाघ की हड्डियां 9,000 डॉलर प्रति किलो तक बिक जाती है। हृदय और अन्य आंतरिक अंगों की कीमत भी हजारों लाखों में है. इसके बावजूद ख़रीदारों की कोई कमी नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीनी मान्यता के अनुसार मनाए जाने वाले टाइगर इयर में सभी को इस साल इस विलक्षण प्राणी को बचाने की कोशिश करनी चाहिए वरना आने वाले सालों में बाघ भी ड्रैगन की तर्ज़ पर क़िस्से कहानियों में देखा पढ़ा जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश में सिर्फ 1411 बाघ ही बचे है यह गिनती सही है या गलत इस पर सवाल उठाया जा सकता है पर यह सच है कि हमारे देश के जंगलों व अभ्यारण्यों में तस्करों द्वारा किये गए अवैध शिकार के चलते  बाघों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है और यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब बाघ सिर्फ चिड़ियाघरों तक ही सिमित हो जायेंगे | हमारे नन्हे ब्लोगर आदि की आशंका भी निराधार नहीं कि अगली बार बाघ चिड़ियाघर में भी देखने को ना मिले |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाघों को शिकारियों के शिकार से बचाने के लिए सरकार भी इतने सुरक्षा कर्मी जंगलों में तैनात नहीं कर सकती जो इन शिकारियों पर अंकुश लगा सके | इसके लिए हमें जंगल के आस-पास रहने वाले ग्रामीणों के सामने ही बाघ की महत्ता के उदहारण पेश उन्हें समझाना होगा कि बाघ उनके खेतों से दूर जंगल रह कर भी कैसे उनकी खेतों में कड़ी फसल की रखवाली कर सकता है और इस असंतुलन से बचने के लिए जंगल में बाघ का होना हमारे लिए कितना जरुरी है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पारिवारिक इकाई==&lt;br /&gt;
*गर्म इलाक़ों में बाघ वर्ष भर बच्चे पैदा करते हैं। &lt;br /&gt;
*ठंडे इलाक़ों में ये वसंत के मौसम में प्रजनन करते हैं। &lt;br /&gt;
*इनकी औसत गर्भावधि 113 दिन की होती है और एक बार में 2 या 3 शावक पैदा होते हैं। &lt;br /&gt;
*शावक धारीदार होते हैं और मां के साथ तब तक रहते हैं, जब तक वे वयस्क होकर अपने आप शिकार करने में समर्थ न हो जाएं। शावक जब तक आत्मनिर्भर नहीं हो जाते, बाघिन दुबारा प्रजनन नहीं करती। &lt;br /&gt;
*बाघ की औसत आयु क़रीब 11 साल होती है।&lt;br /&gt;
*क़ैद में रहने पर अत्यधिक निकट संबंध के कारण बाघ और सिंह का संकर पैदा हो सकता है। ऐसे प्रजनन में यदि बाघ पिता है, तो शावक टिगॉन और यदि सिंह पिता है, तो शावक लाइगर कहलाता है।&lt;br /&gt;
==शावकों का लालन पालन==&lt;br /&gt;
100 दिन की गर्भावधि के बाद शावक पैदा होते है। एक बार में दो से चार शावक पैदा होते हैं। शावक अंधे पैदा होते हैं और जब उनकी आंखें खुली भी रहती हैं, तब भी वे अपारदर्शिता के कारण छह से आठ हफ़्ते तक स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते। इस कारण दूध-छुड़ाई, संरक्षण और प्रशिक्षण का लंबा समय होता है, जिसके दौरान शावक की मृत्यु दर अधिक होती है, विशेष रूप से यदि खाने की भी कमी हो। शिकार पर जाने के कारण लंबे समय तक मां की अनुपस्थिति और कभी-कभी खाना उपलब्ध होने की स्थिति में ताक़तवर शावकों की आक्रामकता के कारण कमज़ोर शावकों को कम भोजन मिलता है। नर शावक मादा शावकों की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ते हैं और अपनी मां को जल्दी छोड़ देते हैं। शिकार करने का कौशल आंशिक रूप क़ैद में पाले-पोसे गए बाघों को यदि वनों में छोड़ा गया, तो वे अच्छी तरह से अपना भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं। हालांकि मुख्य रूप से नर द्वारा शावकों की हत्या की बात का पता चलता है, लेकिन बाघिन और शावकों के साथ नर के होने, यहां तक कि शिकार में हिस्सेदारी असामान्य बात नहीं है। लेकिन यह साथ लंबे समय तक नहीं रहता।&lt;br /&gt;
==नरभक्षी बाघ==&lt;br /&gt;
नरभक्षण से बढ़कर बाघ के किसी और आचरण ने आदमी को विकर्षित नहीं किया है। इस विपथन के कई कारण हैं, उम्र व चोट के कारण विकलांगता, शिकार की कमी, मां से यह आदत सीखना, शावक या शिकार किए जानवर को बचाने या अन्य कारणों से आदमी को मारना और इसके बाद उसे खाना। बाघों की संख्या में कमी के कारण नरभक्षी  बाघ भी दुर्लभ हो गए हैं, केवल पश्चिम बंगाल में सुंदरबन के जंगल इसका अपवाद हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ी==&lt;br /&gt;
*[http://www.indianwildlifeportal.com/project-tiger/index.html http://www.indianwildlifeportal.com]&lt;br /&gt;
*[http://projecttiger.nic.in/ http://projecttiger]&lt;br /&gt;
*[http://subhashinmedia.blogspot.com/2010/02/blog-post_11.html राजा का है हाल बेहाल]&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राष्ट्रीय चिन्ह और प्रतीक}}&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय_चिन्ह_और_प्रतीक]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%BF&amp;diff=33936</id>
		<title>ब्राह्मी लिपि</title>
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		<updated>2010-06-15T08:30:55Z</updated>

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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;templateright&amp;quot; cellspacing=&amp;quot;5&amp;quot; align=&amp;quot;right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
'''अन्य सम्बंधित लेख'''&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
* [[ब्राह्मी लिपि]]&lt;br /&gt;
* [[अशोक के शिलालेख]]&lt;br /&gt;
* [[ब्राह्मी लिपि अशोक-काल|ब्राह्मी लिपि अशोक काल]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
*प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट [[अशोक]] (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते है । नये अनुसंधानों के आधार 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है । ब्राह्मी भी [[खरोष्ठी]] की तरह ही पूरे [[एशिया]] में फैली हुई थी ।&lt;br /&gt;
*अशोक ने अपने लेखों की लिपि को 'धम्मलिपि' का नाम दिया है; उसके लेखों में कहीं भी इस लिपि के लिए 'ब्राह्मी' नाम नहीं मिलता। लेकिन [[बौद्ध|बौद्धों]], [[जैन|जैनों]] तथा [[ब्राह्मण]]-धर्म के ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम 'ब्राह्मी' लिपि ही रहा होगा। &lt;br /&gt;
*हमारे प्राचीन [[संस्कृत]] ग्रंथों में यह बात आम तौर से पाई जाती है कि जिस किसी भी चीज की उत्पत्ति कुछ अधिक प्राचीन या अज्ञेय हो उसके निर्माता के रूप में बड़ी आसानी से 'ब्रह्मा' का नाम ले लिया जाता है। संसार की अन्य पुरालिपियों की उत्पत्ति के बारे में भी यही देखने को मिलता है कि प्राय: उनके जनक कोई न कोई दैवी पुरुष ही माने गए हें। हमारे यहाँ  भी '[[ब्रह्मा]]' को लिपि का जन्मदाता माना जाता रहा है, और इसीलिए हमारे देश की इस प्राचीन लिपि का नाम ब्राह्मी पड़ा है। &lt;br /&gt;
*बौद्ध ग्रंथ '[[ललितविस्तर]]' में 64 लिपियों के नाम दिए गए हैं। इनमें पहला नाम 'ब्राह्मी' है और दूसरा '[[खरोष्ठी]]'। इन 64 लिपि-नामों में से अधिकांश नाम कल्पित जान पड़ते हैं। &lt;br /&gt;
*जैनों के 'पण्णवणासूत्र' तथा 'समवायांगसूत्र' में 16 लिपियों के नाम दिए गए हैं, जिनमें से पहला नाम 'बंभी' (ब्राह्मी) का है। &lt;br /&gt;
*'भगवतीसूत्र' में सर्वप्रथम 'बंभी' (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके (नमो बंभीए लिविए) सूत्र का आरंभ किया गया है। &lt;br /&gt;
*668 ई॰ में लिखित एक चीनी बौद्ध विश्वकोश 'फा-शु-लिन्' में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उल्लेख मिलता है। इसमें लिखा है कि, 'लिखने की कला का शोध दैवी शक्ति वाले तीन आचार्यों ने किया है; उनमें सबसे प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर को पढ़ी जाती है।'&lt;br /&gt;
*इससे यही जान पड़ता है कि ब्राह्मी भारत की सार्वदेशिक लिपि थी और उसका जन्म भारत में ही हुआ किंतु बहुत-से विदेशी पुराविद मानते हैं कि किसी बाहरी वर्णमालात्मक लिपि के आधार पर ही ब्राह्मी वर्णमाला का निर्माण किया गया था। &lt;br /&gt;
*ब्यूह्लर जैसे प्रसिद्ध पुरालिपिविद की मान्यता रही कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण फिनीशियन लिपि के आधार पर हुआ। इसके लिए उन्होंने एरण के एक सिक्के का प्रमाण भी दिया था। &lt;br /&gt;
*एरण (सागर ज़िला, म.प्र.) से तांबे के कुछ सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक पर 'धमपालस' शब्द के अक्षर दाईं ओर से बाईं ओर को लिखे हुए मिलते हैं। चूंकि, सेमेटिक लिपियां भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थीं, इसलिए ब्यूह्लर ने इस अकेले सिक्के के आधार पर यह कल्पना कर ली कि आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी सेमेटिक लिपियों की तरह दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। ओझा जी तथा अन्य अनेक पुरालिपिविदों ने ब्यूह्लर की इस मान्यता का तर्कयुक्त खंडन किया है। उस समय ओझा जी ने लिखा था, 'किसी सिक्के पर लेख का उलटा आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सिक्के पर उभरे हुए अक्षर सीधे आने के लिए सिक्के के ठप्पे में अक्षर उलटे खोदने पड़ते हैं, अर्थात जो लिपियां बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती हैं उनके ठप्पों में सिक्कों की इबारत की पंक्ति का आरंभ दाहिनी ओर से करके प्रत्येक अक्षर उलटा खोदना पड़ता है, परंतु खोदनेवाला इसमें चूक जाए और ठप्पे पर बाईं ओर से खोदने लग जाए तो सिक्के पर सारा लेख उलटा आ जाता है, जैसा कि एरण के सिक्के पर पाया जाता है।' साथ ही, ओझा जी ने लिखा था, 'अब तक कोई शिलालेख इस देश में ऐसा नहीं मिला है कि जिसमें ब्राह्मी लिपि फ़ारसी की नाईं उलटी लिखी हुई मिली हो।'&lt;br /&gt;
*यह 1918 के पहले की बात है। &lt;br /&gt;
*1929 में अनु घोष को एर्रगुडी (कुर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश) में [[अशोक]] का एक लघु-शिलालेख मिला, जिसे बाद में दयाराम साहनी ने 1933 में प्रकाशित किया। इस लेख की कुल 23 पंक्तियों में से 8 पंक्तियां – 2,4,6,9,11,13,14, और 23 वीं पंक्तियां- दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी गई हैं। पुरालिपियों में यह एक अद्भुत उदाहरण है। पहली पंक्ति बाईं ओर से दाईं ओर, फिर दूसरी पंक्ति दाईं ओर से बाईं ओर, फिर तीसरी पंक्ति बाईं ओर से दाईं ओर.... इसी तरह का सिलसिला यदि सारे लेख में चलता रहे, तो इस प्रकार की लेखन-प्रणाली को 'ब्यूस्त्रफीदान', अर्थात बैलों द्वारा हल जोतने की विधि कहा जाता है। यूनानी लिपि के आरंभिक लेख इसी प्रणाली के देखने को मिलते हैं। किन्तु एर्रगुडी के इस ब्राह्मी लेख को 'ब्यूस्त्राफीदान' प्रणाली में लिखा हुआ भी नहीं मान सकते; क्योंकि इसमें एक के बाद हर दूसरी पंक्ति नियमत: दाईं ओर से बाईं ओर को नहीं लिखी गई है। फिर भी, डिरिंजेर&amp;lt;ref&amp;gt;'अल्फाबेट', पृष्ठ 339&amp;lt;/ref&amp;gt; ने इस लेख के आधार पर सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि यूनानी लिपि की तरह आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। यदि केवल यह सिद्ध करने के लिए कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जानेवाली किसी विदेशी लिपि के आधार पर हुआ है। &lt;br /&gt;
*श्रीलंका में इस प्रकार के कई लेख मिलते हैं, परंतु ये अशोक के बाद के हैं और जान पड़ता है कि इनके लिखनेवालों को ब्राह्मी लिपि का यथार्थ ज्ञान भी नहीं था। आंध्र प्रदेश के भट्टिप्रोलु-लेखों में भी ब्राह्मी के कुछ अक्षर उलटे लिखे हुए मिलते हैं। चालुक्य काल का एक लेख तो नीचे से ऊपर को भी लिखा हुआ मिलता है! इन अपवादात्मक लेखों के आधार पर कोई यदि यह सिद्ध करने का प्रयत्न करे कि ब्राह्मी लिपि विदेशी लिपि के आधार पर बनाई गई है, तो उसे हठधर्मी ही कहा जाएगा। &lt;br /&gt;
*बहुत-से विद्वान मानते हैं कि किसी सेमेटिक वर्णमाला के आधार पर ही ब्राह्मी संकेतों का निर्माण हुआ है। लेकिन इसमें भी मतभेद हैं। कुछ लोग उत्तरी सेमेटिक को ब्राह्मी का आधार मानते हैं, कुछ दक्षिणी सेमेटिक को, और कुछ फिनीशियन तथा आरमेई लिपि को। चूंकि आरमेई लिपि का प्रचार भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश तक था, इसलिए &lt;br /&gt;
*डिरिंजेर का मत है कि आरमेई के आधार पर ही ब्राह्मी का निर्माण हुआ। आज प्राय: सभी विद्वान यह बात स्वीकार करते हैं कि [[खरोष्ठी]] का निर्माण आरमेई लिपि के आधार पर हुआ है, किंतु यह संभव नहीं है कि ब्राह्मी लिपि भी आरमेई के आधार पर बनाई गई हो। &lt;br /&gt;
*इसके बारे में ओझाजी ने लिखा है, 'ब्राह्मी लिपि के न तो अक्षर फिनीशियन या किसी अन्य लिपि से निकले हैं और न उसकी बाईं ओर से दाहिनी ओर को लिखने की प्रणाली किसी और लिपि से बदलकर बनाई गई है। यह भारतवर्ष के आर्यों का अपनी खोज से उत्पन्न किया हुआ मौलिक आविष्कार है। इसकी प्राचीनता और सर्वांग सुंदरता से चाहे इसका कर्त्ता ब्रह्मा देवता माना जाकर इसका नाम ब्राह्मी पड़ा, चाहे साक्षर-समाज ब्राह्मणों की लिपि होने से यह ब्राह्मी कहलायी हो, पर इसमें संदेह नहीं कि इसका फिनिशियन से कुछ भी संबंध नहीं है।' &lt;br /&gt;
*एडवर्ड टॉमस का भी यह मत है कि 'ब्राह्मी अक्षर भारतवासियों के ही बनाए हुए हैं और उनकी सरलता से उनके बनाने वालों की बड़ी बुद्धिमानी प्रकट होती है।' &lt;br /&gt;
*[[कनिंघम]] भी मानते हैं कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण भारतवासियों ने ही किया है। &lt;br /&gt;
*आर. शाम शास्त्री ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया था कि देवताओं की उपासना के लिए जिन सांकेतिक चिन्हों का उपयोग होता था, उन्हीं से ब्राह्मी लिपि के अक्षरों का निर्माण हुआ है। &lt;br /&gt;
*जगमोहन वर्मा ने 1913-15 में 'सरस्वती' पत्रिका में ब्राह्मी लिपि के बारे में कुछ लेख थे, जिनमें उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया था कि वैदिक चित्रलिपि या उससे निकली किसी सांकेतिक लिपि से ब्राह्मी लिपि निकली है। &lt;br /&gt;
*लेकिन शास्त्री और वर्मा के ये दोनों सिद्धांत किसी ठोस प्रमाण पर आधारित नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता। &lt;br /&gt;
*यही अधिक संभव जान पड़ता है कि सिंधु लिपि से ही ब्राह्मी का विकास हुआ है। वस्तुत: सिंधु लिपि में और ब्राह्मी लिपि के उपलब्ध लेखों में लगभग एक हज़ार वर्षों का अंतर है। सिंधु लिपि के संकेतों में और ब्राह्मी लिपि के संकेतो में कुछ साम्य भी देखने को मिलता है। &lt;br /&gt;
*संभव है कि 1000 ई॰ पू॰ के आसपास सिंधु लिपि के आधार पर किसी 'प्राक्-ब्राह्मी' लिपि का निर्माण किया गया हो और आगे चलकर इसी का परिष्कार होने पर ब्राह्मी लिपि अस्तित्व में आई हो। &lt;br /&gt;
*सिंधु लिपि का स्वरूप भी अक्षरमालात्मक प्रतीत होता है। उसमें भी मूलाक्षरों के साथ स्वरों की मात्राओं का रूप देखने को मिलता है। साथ ही, संयुक्ताक्षर भी देखने को मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*कुछ विद्वान तो यह भी आशा रखते हैं कि सिंधु लिपि में शायद 'आद्य संस्कृत' भाषा की खोज हो जाए।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>खरोष्ठी</title>
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		<updated>2010-06-15T08:29:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''खरोष्ठी लिपि'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*खरोष्ठी लिपि गान्धारी लिपि के नाम से जानी जाती है । जो गान्धारी और [[संस्कृत]] भाषा को लिपिवद्ध प्रयोग करने में आती है । इसका प्रयोग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी तक प्रमुख रूप से [[एशिया]] में होता रहा है । [[शक-कुषाण काल|कुषाण काल]] में इसका प्रयोग भारत में बहुतायत में हुआ । [[बौद्ध]] उल्लेखों में खरोष्ठी लिपि प्रारम्भ से भी प्रयोग में आयी । कहीं-कहीं सातवी शताब्दी में भी इसका प्रयोग हुआ है।&lt;br /&gt;
{{highright}}&lt;br /&gt;
[[सिकन्दर]] के भारत-आक्रमण (326 ई॰पू॰) के बाद पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा बल्ख पर यूनानियों का शासन स्थापित हुआ तो उन्होंने भी अपने सिक्कों पर खरोष्ठी लिपि के अक्षरों का उपयोग किया। यूनानियों से भी पहले ईरानी शासकों के चांदी के सिक्कों पर खरोष्ठी के अक्षरों के ठप्पे देखने को मिलते हैं।&lt;br /&gt;
{{highclose}}&lt;br /&gt;
*एक प्राचीन भारतीय लिपि जो अरबी लिपि की तरह दांये  से बांये को लिखी जाती थी। चौथी-तीसरी शताब्दी ई॰पू॰ में भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांतों में इस लिपि का प्रचलन था। शेष भागों में [[ब्राह्मी लिपि]] का प्रचलन था जो बांये से दांये को लिखी जाती थी। इस लिपि के प्रसार के कारण खरोष्ठी लिपि लुप्त हो गई इस लिपि में लिखे हुए कुछ सिक्के और अशोक के दो शिलालेख प्राप्त हुए हैं।&lt;br /&gt;
*भारत में इस्लामी शासन के साथ जिस प्रकार अरबी-फ़ारसी लिपि के आधार पर दाईं ओर से बाईं ओर लिखी जाने वाली एक लिपि उर्दू के लिए रची गयी, उसी प्रकार भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश पर ईरानियों का अधिकार हो जाने पर वहां ई॰पू॰ पांचवी शताब्दी में आरमेई लिपि के आधार पर दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाने वाली एक नई लिपि खरोष्ठी का निर्माण किया गया था। &lt;br /&gt;
*सम्राट [[अशोक]] (272-232 ई॰ पू॰) के मानसेहरा (हज़ारा ज़िला, सरहदी सूबा, पाकिस्तान) तथा शाहबाज़गढ़ी (पेशावर ज़िला, पंजाब, पाकिस्तान) के शिलालेख इस खरोष्ठी में ही हैं। इन दो को छोड़कर अशोक के अन्य सारे लेख [[ब्राह्मी लिपि]] में हैं। &lt;br /&gt;
*[[सिकन्दर]] के भारत-आक्रमण (326 ई॰पू॰) के बाद पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा बल्ख पर यूनानियों का शासन स्थापित हुआ तो उन्होंने भी अपने सिक्कों पर खरोष्ठी लिपि के अक्षरों का उपयोग किया। यूनानियों से भी पहले ईरानी शासकों के चांदी के सिक्कों पर खरोष्ठी के अक्षरों के ठप्पे देखने को मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*यूनानियों के बाद [[शक]], [[क्षत्रप]], [[पह्लव]], [[कुषाण]] तथा औदुंबर राजाओं ने भी इस लिपि का प्रयोग किया। &lt;br /&gt;
*खरोष्ठी के अधिकतर लेख प्राचीन [[गांधार|गंधार देश]] में ही मिले हैं। &lt;br /&gt;
*[[तक्षशिला]] के धर्मराजिका स्तूप की खुदाई से सन 78 का एक खरोष्ठी का लेख मिला है, जो रजतपत्र पर अंकित है। वहीं से ताम्रपत्र पर अंकित सन 76 का एक और लेख प्राप्त हुआ है। प्राचीन पुष्कलावती (चारसद्दा, सरहदी सूबा, पाकिस्तान) तथा अफ़्गानिस्तान के वर्डक और ह्ड्डा नामक स्थानों से भी खरोष्ठी के लेख मिले हैं। '''मथुरा से भी [[महाक्षत्रप]] [[राजुबुल|राजुल]] की रानी का सिंहाकृति पर खुदा हुआ खरोष्ठी लेख उपलब्ध''' हुआ है। &lt;br /&gt;
*पटना से भी खरोष्ठी एक लेख मिला है, परन्तु वह पश्चिमोत्तर के किसी यात्री द्वारा लाया गया होगा। इसके अलावा सिद्दापुर (ज़िला चित्रदुर्ग, कर्नाटक) के [[अशोक]] के [[ब्राह्मी लिपि|ब्राह्मी]] के लेख की अंतिम पंक्ति में 'चपदेन लिखिते' शब्दों के बाद 'लिपिकरेण' शब्द के पांच अक्षर खरोष्ठी लिपि में खुदे हुए हैं, जिससे ज्ञात होता है कि इस लेख का लेखक पश्चिमोत्तर भारत का निवासी रहा होगा। लेकिन इन उदाहरणों का अर्थ यह नहीं है कि दक्षिण में सिद्दापुर और पूर्व में पटना तक कभी खरोष्ठी लिपि का प्रचार था। वस्तुत: गंधार देश  में ही इस लिपि ने जन्म लिया था और वहीं पर इसका सर्वाधिक प्रयोग हुआ।&lt;br /&gt;
{{Blank table}}&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 1.jpg|300px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अशोक के सिद्दापुर (ज़िला चित्रदुर्ग, कर्नाटक) के पास के ब्रह्मगिरि लेख की अंतिम पंक्ति।&amp;lt;br /&amp;gt; इसमें बाईं ओर के शब्द हैं ''चपडेने लिखिते'' (ब्राह्मी में) और दाईं ओर का शब्द है &amp;lt;br /&amp;gt;''लिपकिरेण'' (खरोष्ठी लिपि में), जो दाईं ओर से बाईं ओर पढ़ा जाएगा। &amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 2.jpg|300px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
हिंद-यवन शासक मिनांदर (ई॰पू॰ दूसरी सदी) के &amp;lt;br /&amp;gt;सिक्के पर अंकित खरोष्ठी लेख (दाएं से बाएं): &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''महरजस त्रतरस मेनंद्रस'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 3.jpg|300px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पश्चिमोत्तर भारत के शक शासक मोअस (लगभग 90 ई॰ पू॰) के &amp;lt;br /&amp;gt;सिक्के पर अंकित खरोष्ठी लेख (दाएं से बाएं) : &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''रजतिरजस महतस मोअस'''&lt;br /&gt;
{{tableclose}}&lt;br /&gt;
*लेकिन अब हमें चीनी तुर्किस्तान को भी खरोष्ठी लिपि का क्षेत्र मानना पड़ेगा। &lt;br /&gt;
*1892 में एक फ्रांसीसी यात्री द्यूत्र्य द रॅन्स ने खोतान से खरोष्ठी लिपि में भोजपत्र में लिखी हुई 'धम्मपद' की एक प्रति प्राप्त की थी। यह भोजपत्र पर लिखी हुई सबसे प्राचीन उपलब्ध पुस्तक है। &lt;br /&gt;
*प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता ऑरेल स्टाइन (1862-1943) ने मध्य एशिया  के मासी-मजार, नीया, लोन-लन् आदि स्थानों से काष्टपट्टिकाओं पर लिखे हुए सैंकड़ों खरोष्ठी लेख प्राप्त किए हैं। इन काष्टपत्तिकाओं की लंबाई 7॰5 से 15 इंच और चौड़ाई 1॰5 से 2॰5 इंच है। कुछ चौकोर पट्टिकाएं भी मिली हैं। ऐसी पट्टिकाओं को जब पत्र रूप में भेजा जाता था, तो इन्हें दूसरी पट्टिकाओं से ढककर उन पर मोहर लगा दी जाती थी चर्मपट्ट पर अंकित अंकित लेख भी नीया से मिले हैं। &lt;br /&gt;
*खरोष्ठी लिपि के ये सारे लेख  [[प्राकृत]] में हैं, जो धम्मपद की प्राकृत से काफ़ी मिलती जुलती है। &lt;br /&gt;
*चीनी तुर्किस्तान से ही एक पट्टिका पर खरोष्ठी लिपि में [[संस्कृत]] के चार श्लोक प्राप्त हुए हैं। संस्कृत के लिए खरोष्ठी लिपि के प्रयोग का यह एक मात्र उपलब्ध उदाहरण है। &lt;br /&gt;
*लोन-लन् से कागज पर खरोष्ठी के लेख प्राप्त हुए हैं। हमें चीनी तुर्किस्तान को भी खरोष्ठी लिपि का क्षेत्र मानना पड़ेगा। &lt;br /&gt;
*सामान्यत: ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से ईसा की चौथी शताब्दी तक खरोष्ठी लिपि का व्यवहार होता रहा। &lt;br /&gt;
*खरोष्ठी के प्राचीनतम अभिलेख अशोक के शाहबाजगढ़ी तथा मानसेहरा के शिलालेख हैं। &lt;br /&gt;
*भारत में मिले खरोष्ठी के सबसे बाद के अभिलेख कुषाण शासकों (ईसा की तीसरी और चौथी शताब्दी) के हैं। &lt;br /&gt;
*चीनी तुर्किस्तान के लेख भी तीसरी-चौथी शताब्दी के हैं। संभव है कि इसके बाद भी वहां के निवासियों ने कुछ समय तक इस लिपि का उपयोग जारी रखा हो; परंतु भारत में पांचवीं शताब्दी में जब [[हूण|हूणों]] का आगमन होता है तो हम खरोष्ठी का कहीं कोई अस्तित्व नहीं देखते। जब विदेशी शासक भारत की संस्कृति में घुल-मिल गए तो उन्होंने खरोष्ठी लिपि को त्यागकर यहाँ की अधिक प्रचलित [[ब्राह्मी लिपि]] को अपना लिया। &lt;br /&gt;
==इस लिपि का नाम खरोष्ठी क्यों पड़ा==&lt;br /&gt;
इसके बारे में विद्वानों में काफ़ी मतभेद है। कुछ विद्वानों ने इसे 'इंडो-बैक्ट्रियन' , 'बैक्ट्रियन' 'बैक्ट्रो-पालि', 'काबुली' , 'गांधारी' आदि नाम भी दिए हैं। लेकिन अब इसके लिए 'खरोष्ठी' नाम ही रूढ़ हो गया है। किंतु इस नाम की उत्पत्ति के बारे में भी नाना प्रकार के मत प्रचलित हैं। &lt;br /&gt;
*प्रसिद्ध [[बौद्ध]] ग्रंथ '[[ललितविस्तर]]' (ईसा की दूसरी शताब्दी में रचित) के दसवें अध्याय में 64 लिपियों के नाम गिनाए गए हैं, जिनमें पहला नाम '[[ब्राह्मी लिपि|ब्राह्मी]]' का और दूसरा 'खरोष्ठी' का है। इन 64 नामों में अधिकतर नाम कल्पित यानी अवास्तविक ही जान पड़ते हैं। &lt;br /&gt;
*668 ई॰ में लिखे गए एक चीनी बौद्ध विश्वकोश 'फा-वान-शु-लिन्' में भी ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों के उल्लेख मिलते हैं। उसमें खरोष्ठी लिपि के बारे में लिखा हैं, '''किअ-लु (किअ-लु-से-आ&amp;gt;क-लु-से-टो&amp;gt;ख-रो-स-ट&amp;gt; खरोष्ठ''') की लिपि दाईं ओर से बाईं ओर को पढ़ी जाती है।  ....[[ब्रह्मा]] और खरोष्ठ भारतवर्ष में हुए। ब्रह्मा और खरोष्ठ ने अपनी लिपियां देवलोक से पाईं।' &lt;br /&gt;
*[[ललितविस्तर]] और चीनी विश्वकोश के इन्हीं उल्लेखों के आधार पर प्रसिद्ध पुरालिपिविद ब्यूह्लर ने इस लिपि को 'खरोष्ठी' का नाम दिया था। &lt;br /&gt;
*खरोष्ठ का अर्थ 'गध् के ओठ वाला' होता है! &lt;br /&gt;
*एक मत के अनुसार गधे की खाल पर लिखी जाने से इसे ईरानी में '''खरपोस्त''' कहते थे और उसी का अपभ्रंश रूप खरोष्ठ है। &lt;br /&gt;
*एक अन्य मत यह है कि आरमेई भाषा में 'खरोष्ठ' शब्द था, और उसी के भ्रामक साम्य के आधार पर [[संस्कृत]] का 'खरोष्ठ' शब्द बना। लेकिन ये सारे मत अटकलें ही हैं; इनमें से किसी को भी ठोस प्रमाणों से सिद्ध नहीं किया जा सकता। &lt;br /&gt;
{{Blank table}}&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 4.jpg|450px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''लिप्यंतर (दाएं से बाएं):'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;1.	स 1 100 20 10 4 2 (=136) अयस अषडस मसस दिवसे 1 4 1 (=15) इश दिवसे प्रदिस्तवित भगवतो धतुओ उरस&lt;br /&gt;
2.	केन लोत फ्रिअपुत्रन बहलिएन नोअचए नगरे वस्तवेन तेन इमे प्रदिस्तवित भगवतो धतुओ धमर-&lt;br /&gt;
3.	इए तछशि (ल) ए तनुवए बोधिसत्व गहमि महरजस रजतिरजस देवपुत्रस खुषनस अरोग दक्षिणए &lt;br /&gt;
4.	सर्व बुधन पुयए प्रचग बुधन पुयए अरह (त) न पुयए सर्वसन पुयए मतपितु पुयए मित्रमच ञतिस&lt;br /&gt;
5.	लोहिन पुयए अत्वनो अरोग दछिनए निवनए होतु अ (य) दे समपरिचगो&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
तक्षशिला के धर्मराजिका स्तूप से प्राप्त, रजतपत्र पर अंकित खरोष्ठी लेख (प्रथम शताब्दी ई॰) &amp;lt;br /&amp;gt;इसमें इस बात का उल्लेख है कि अय-वर्ष 136 (लगभग 78 ई॰) में बल्ख देश के उरसक ने &amp;lt;br /&amp;gt;उपर्युक्त स्तूप के निजी उपासना-गृह में अपने गुरुजनों, &amp;lt;br /&amp;gt;संबंधियों और मित्रों के सम्मान के लिए तथा महान कुषाण सम्राट के तथा &amp;lt;br /&amp;gt;अपने स्वास्थ्य के लिए भगवान बुद्ध के अस्थि-अवशेषों की प्रतिष्ठापना की। &lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 5.jpg|450px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
खरोष्ठी वर्णमाला &lt;br /&gt;
{{tableclose}}&lt;br /&gt;
*खरोष्ठी लिपि, सेमेटिक लिपियों की तरह, दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। इसके कुछ अक्षर ही नहीं, बल्कि इनके ध्वनिमान भी आरमेई लिपि से मिलते हैं। इसलिए अनेक विद्वान ऐसा मानते हैं कि खरोष्ठी का निर्माण आरमेई लिपि के आधार पर हुआ है। &lt;br /&gt;
*ईरान के हखामनी शासन-काल में संपूर्ण पश्चिम एशिया में आरमेई भाषा तथा लिपि का प्रचार था। &lt;br /&gt;
*[[तक्षशिला]] से भी आरमेई लिपि में लिखा हुआ एक शिलालेख मिला है। &lt;br /&gt;
*हखामनी शासकों का गंधारदेश पर भी शासन था। आरमेई लिपि सेमेटिक भाषाओं को लिखने के लिए तो ठीक थी, परंतु भारोपीय परिवार की [[प्राकृत]] भाषा को इस लिपि में लिखना संभव नहीं था। इसलिए, ऐसा जान पड़ता है कि ई.पू. पांचवीं शताब्दी मं गंधार देश में, आरमेई लिपि का अनुकरण करते हुए, इस नई लिपि को जन्म दिया गया। आरमेई लिपि में केवल '''22 अक्षर''' थे और उसमें स्वरों की अपूर्णता (जैसा कि सभी सेमेटिक लिपियों में देखने को मिलता है) थी और उसमें '''ह्रस्व-दीर्घ''' का कोई भेद नहीं था। इसलिए प्राकृत ([[पालि भाषा|पालि]]) के लिए नई लिपि का निर्माण करते समय कुछ नए स्वर तथा उनकी मात्राओं के लिए संकेत गढ़ने पड़े। &lt;br /&gt;
*खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला को देखने से स्पष्ट पता चलता है कि उसके निर्माण में [[ब्राह्मी लिपि]] का प्रभाव काफ़ी रहा है। इतना होने पर भी ब्राह्मी की तरह खरोष्ठी के स्वरों तथा उनकी मात्राओं में ह्रस्व-दीर्घ का भेद नहीं है। इसमें संयुक्ताक्षर भी बहुत कम मिलते हैं। कुछ संयुक्ताक्षरों का पढ़ना तो अब भी संदेह से मुक्त नहीं है। वस्तुत: जिस प्रकार हमारे देश में आज भी एक कामचलाऊ 'महाजनी' लिपि' चलती है, उसी की तरह इस खरोष्ठी का भी जन्म मामूली पत्र-व्यवहार, बही-खातों के हिसाब आदि के लिए ही हुआ था। &lt;br /&gt;
{{Blank table}}&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 6.jpg|450px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
खरोष्ठी व्यंजनों के साथ स्वर-मात्राएं जोड़ने की व्यवस्था&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 7.jpg|450px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अशोक के खरोष्ठी लेखों के कुछ संयुक्ताक्षर, क्रमश:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| cellspacing=&amp;quot;10&amp;quot; class=&amp;quot;brajtable&amp;quot; width=&amp;quot;400&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1.  &lt;br /&gt;
|त्र  &lt;br /&gt;
| त्व  &lt;br /&gt;
| थ्र   &lt;br /&gt;
|थ्रि    &lt;br /&gt;
|द्र   &lt;br /&gt;
|ध्र   &lt;br /&gt;
|ध्र   &lt;br /&gt;
|क्र   &lt;br /&gt;
|ग्रं &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2.&lt;br /&gt;
|प्र   &lt;br /&gt;
|प्रि   &lt;br /&gt;
|ब्र    &lt;br /&gt;
|ब्र    &lt;br /&gt;
|भ्ये   &lt;br /&gt;
|भ्र   &lt;br /&gt;
|म्म  &lt;br /&gt;
|म्य  &lt;br /&gt;
| म्रु&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3.  &lt;br /&gt;
|श्र   &lt;br /&gt;
|व्रं   &lt;br /&gt;
|स्प   &lt;br /&gt;
|स्पि   &lt;br /&gt;
|स्त्र   &lt;br /&gt;
|स्त्र   &lt;br /&gt;
|ठ्र&lt;br /&gt;
{{tableclose}}&lt;br /&gt;
{{tableclose}}&lt;br /&gt;
*खरोष्ठी के लेख शिलाओं, धातु-फलकों, काष्ठ-पट्टिकाओं, सिक्कों, भूर्जपत्रों तथा कागज पर मिलते हैं और इन सभी लेखन-सामग्रियों पर इस लिपि का सामान्यत: एक-सा ही स्वरूप देखने को मिलता है। यों यह लिपि स्याही और कलम से लिखने के लिए अधिक उपयुक्त थी।&lt;br /&gt;
*पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में कर्नल जेम्स टॉड, जनरल वेंटुरा, अलेक्जैंडर बर्न्स आदि पुराविदों ने बाख्त्री, [[यूनानी]], [[शक]], [[पह्लव]] तथा [[कुषाण]] शासकों के ढेरों सिक्कों का संग्रह किया था। इन सिक्कों में से कई पर एक तरफ यूनानी लिपि के अक्षर हैं और दूसरी तरफ खरोष्ठी लिपि के। आरंभ में खरोष्ठी लिपि के बारे में काफ़ी अटकलें लगाई गईं। इन सिक्कों के यूनानी अक्षरों को आसानी से पढ़ा जा सकता था। &lt;br /&gt;
*[[अफ़ग़ानिस्तान]] में पुरातत्वान्वेषण में जुटे हुए मेसन महाशय ने सबसे पहले सिक्कों के एक तरफ के यूनानी नामों की तुलना दूसरी ओर के खरोष्ठी अक्षरों से करके दूसरी तरफ की इबारतों का अध्ययन किया, तो उन्हें 'मिनांडर' 'एपोलोडोटस', 'हर्मिअस' , 'बेसिलियस' (राजा) और 'सोटेरस' (रक्षक) शब्दों के खरोष्ठी अक्षरों को पहचानने में सफलता मिली। मेसन ने अपनी इस खोज की जानकारी जेम्स प्रिन्सेप को दी। &lt;br /&gt;
{{Blank table}}&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 8.jpg|450px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरमेई और खरोष्ठी अक्षरों में साम्य&lt;br /&gt;
{{tableclose}}&lt;br /&gt;
*प्रिन्सेप (1799-1840) उस समय ब्राह्मी और खरोष्ठी के अन्वेषण में जुटे हुए थे। उन्होंने ब्राह्मी लिपि का तो उद्घाटन किया ही, उन्हें खरोष्ठी लिपि का भी उद्घाटन करने का श्रेय प्राप्त है। &lt;br /&gt;
*मेसन के अक्षरमानों के आधार पर प्रिन्सेप को आरंभ में 12 राजाओं के नामों तथा 6 पदवियों को पढ़ने में सफलता मिली। इसके साथ यह भी पता चला कि यह लिपि दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। लेकिन प्रिन्सेप आरंभ में इस लिपि की भाषा को ग़लती से पहलवी समझ बैठे थे। &lt;br /&gt;
*1838 में पहली बार दो बाख्त्री राजाओं के सिक्कों पर प्राकृत (पालि) में लेख देखने को मिले, तो यह सिद्ध हो गया कि खरोष्ठी लेखों की भाषा [[पालि भाषा|पालि]] है। इसके बाद तो खरोष्ठी लिपि के अक्षरों को पहचानना और भी अधिक आसान हो गया। &lt;br /&gt;
*स्वयं प्रिन्सेप ने इस लिपि के 17 अक्षर पहचाने थे। &lt;br /&gt;
*बाद में जनरल [[कनिंघम]] (1814-93) ने खरोष्ठी की संपूर्ण वर्णमाला तथा संयुक्ताक्षरों को पहचानने का काम पूरा कर दिया। &lt;br /&gt;
{{Blank table}}&lt;br /&gt;
[[चित्र: Kharoshthi Script 9.jpg|400px|खरोष्ठी लिपि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
खरोष्ठी लिपि में शाहबाजगढ़ी का सप्तम शिलालेख। &amp;lt;br /&amp;gt;दाईं ओर से बाईं को इसे यों पढ़ा जाता है:&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;1.	देवनं प्रियो प्रियशि रज सव्रत्र इछति सव्र&lt;br /&gt;
2.	प्रषंड वसेयु सवे हि ते सयमे भवशुधि च इछंति&lt;br /&gt;
3.	जनो चु उचवुचछंदो उचवुचरगो ते सव्रं व एकदेशं व &lt;br /&gt;
4.	पि कषंति विपुले पि चु दने बस नस्ति सयम भव&lt;br /&gt;
5.	शुधि किट्रञत द्रिढ भतित निचे पढं&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''अर्थात्,'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा चाहते हैं कि सब जगह सब संप्रदायों&amp;lt;br /&amp;gt; के लोग (एकसाथ) निवास करें, क्योंकि सब संप्रदाय संयम और चित्त की शुद्धि चाहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt; परंतु भिन्न-भिन्न मनुष्यों की प्रवृत्ति तथा रूचि भिन्न-भिन्न- ऊंची या नीची,&amp;lt;br /&amp;gt; अच्छी या बुरी – होती है। वे या तो संपूर्ण रूप से या केवल आंशिक रूप से&amp;lt;br /&amp;gt; (अपने धर्म का पालन) करेंगे। किंतु जो बहुत अधिक दान नहीं कर&amp;lt;br /&amp;gt; सकता उसमें संयम, चित्तशुद्धि,&amp;lt;br /&amp;gt; कृतज्ञता और दृढ़ भक्ति का होना नितांत आवश्यक है।  &lt;br /&gt;
{{tableclose}}&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]] &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%98&amp;diff=33934</id>
		<title>बाघ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%98&amp;diff=33934"/>
		<updated>2010-06-15T08:29:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* कम होते बाघ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Tiger.jpg|thumb|250px|राष्‍ट्रीय पशु- बाघ&amp;lt;br /&amp;gt;National Animal- Tiger]]&lt;br /&gt;
'''बाघ, राष्‍ट्रीय पशु'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
राष्ट्रीय पशु 'बाघ' (पैंथरा टाइग्रिस-लिन्नायस), पीले रंगों और धारीदार लोमचर्म वाला एक पशु है। राजसी बाघ, तेंदुआ, टाइग्रिस धारीदार जानवर है। अपनी शालीनता, दृढ़ता, फुर्ती और अपार शक्ति के लिए बाघ को 'राष्ट्रीय पशु' कहलाने का गौरव प्राप्त है। इसकी आठ प्रजातियों में से [[भारत]] में पाई जाने वाली प्रजाति को ‘रॉयल बंगाल टाइगर’ के नाम से जाना जाता है। उत्तर-पश्चिम भारत को छोड़कर बाकी सारे देशों में यह प्रजाति पायी जाती है। भारत के अतिरिक्त यह [[नेपाल]], [[भूटान]] और [[बंगलादेश]] जैसे पड़ोसी देशों में भी पाया जाता है। बाघ कहलाए जाने वाले अन्य जानवर है- &lt;br /&gt;
#मेघश्याम तेंदुआ या मेघश्याम बाघ, &lt;br /&gt;
#प्यूमा (लाल-भूरे रंग का बिलाव ) या हिरन बाघ और &lt;br /&gt;
#असिदंत विडाल।&lt;br /&gt;
*वर्ष 2010 में 'वर्ल्ड वाइड फ़ंड फ़ॉर नेचर' ने बाघों की आबादी महज 3,500 बताई। इसके पहले डब्ल्यू॰डब्ल्यू॰एफ॰ ने दुनिया भर में बाघों की संख्या 4000 के लगभग बताई थी।&lt;br /&gt;
==उत्पत्ति==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
*ऐसा समझा जाता है कि बाघ की उत्पत्ति उत्तरी यूरेशिया में हुई और यह दक्षिण की ओर चला आया था। &lt;br /&gt;
*वर्तमान में यह रूस के सुदूर पूर्वी इलाक़े से चीन, भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया तक पाया जाता है। &lt;br /&gt;
*इसकी सामान्य रूप से मान्य आठ प्रजातियां होती हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें से जावा बाघ, बाली बाघ और कैरिबयाई बाघ विलुप्त हो गए है। &lt;br /&gt;
*चीनी बाघ विलुप्त होने के क़रीब हैं और सुमात्राई, साइबेरियाई एवं भारतीय उपप्रजातियां रेड डेटा बुक में निश्चित तौर पर संकटापन्न बताई गई हैं। &lt;br /&gt;
==रूप और आकृति==&lt;br /&gt;
*बाघ पर मोटी पीली लोमचर्म का कोट होता है जिस पर गहरी धारीदार पट्टियां होती हैं। &lt;br /&gt;
*लावण्‍यता, ताकत, फुर्तीलापन और आपार शक्ति के कारण बाघ को भारत के 'राष्‍ट्रीय जानवर' के रूप में गौरवान्वित किया है।&lt;br /&gt;
*बाघ की अयाल नहीं होती, लेकिन बूढ़े नर के गाल के बाल अपेक्षाकृत लंबे और फैले हुए होते हैं। &lt;br /&gt;
*नर बाघ मादा से बड़ा होता है और इसकी कंधे तक की ऊचाई क़रीब 1 मीटर, लंबाई लगभग 2.2 मीटर, पूंछ क़रीब 1 मीटर लंबी, और वज़न लगभग 160 से 230 किग्रा या ज़्यादा से ज़्यादा लगभग 290 किग्रा होता है।&lt;br /&gt;
*सफ़ेद बाघों में सभी पूर्णत सफ़ेद नहीं होते, इनमें से लगभग सभी भारत में विंध्य और कैमूर पर्वत श्रृंखलाओं में पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*काले बाघ के पाए जाने की भी ख़बर है, ये [[म्यांमार]], [[बांग्लादेश]] और पूर्वी भारत के घने जंगलों में कभी-कभी पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*बाघ घास वाले दलदली इलाक़ों और जंगलों में रहता है; यह महलों या मंदिरों जैसी इमारतों के खंडहरों में भी पाया जाता है। &lt;br /&gt;
*शक्तिशाली और आमतौर पर एकांत प्रिय यह विडाल एक अच्छा तैराक है और लगता है कि इसे नहाने में मज़ा आता है, विपत्ति में यह पेड़ पर चढ़ सकता है। &lt;br /&gt;
*स्थान और प्रजाति के अनुसार बाघ के आकार और विशिष्ट रंग एवं धारीदार चिह्न में भी परिवर्तन होता है। उत्तर के मुक़ाबले दक्षिण के बाघ छोटे और ज़्यादा भड़कीले रंग के होते हैं। &lt;br /&gt;
*बंगाल टाइगर (पी. टाइग्रिस) और दक्षिण-पूर्वी [[एशिया]] के द्वीपों के बाघ, उदाहरण के तौर पर, कुछ-कुछ लाल और भूरे रंग के, लगभग गहरी काली सुंदर अनुप्रस्थ धारियों वाले होते हैं। भीतरी हिस्से, पैर के अंदर की ओर, गाल और दोनों आंखों के ऊपर एक बड़ा सफ़ेद सा धब्बा होता है। लेकिन उत्तरी [[चीन]] और [[रूस]] के बहुत बड़े और दुर्लभ साईबेरियाई बाघों (पी. टाइग्रिस एल्टाइका) के बाल लंबे, मुलायम और हल्के पीले होते हैं। &lt;br /&gt;
*कुछ काले और सफ़ेद बाघ भी होते है और केवल एक पूर्णतः सफ़ेद बाघ की ही जानकारी मिली है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भोजन==&lt;br /&gt;
शिकार करने और भरपेट खाने के बाद बाघ बची हुई लाश को गिद्ध और अन्य अपमार्जकों से छुपाने का जान-बूझकर प्रयास करता है, जिससे भविष्य में भी खाना मिल सके। वह अन्य बाघों या तेंदुओं द्वारा मारे गए शिकार को ले जाने में भी नहीं झिझकता और कभी-कभी वह सड़ा मांस भी खा लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाघ रात को शिकार करता है। हिरन, जंगली सूअर एवं मोर सहित विभिन्न प्रकार के जानवरों को अपना शिकार बनाता है। साधारणत: यह हृष्ट-पुष्ट बड़े स्तनधारियों पर हमला नहीं करता,  यद्यपि ऐसी घटनाएं हैं, जब बाघ ने [[हाथी]] या जवान भैंसे पर हमला किया। बाघ कभी-कभी मानव बस्तियों से भी पालतू जानवरों को उठाकर ले जाता है। बूढ़ा या विकलांग बाघ या शावकों वाली बाघिन आदमी का आसानी से शिकार कर सकते हैं तथा नरभक्षी बन जाते हैं।&lt;br /&gt;
==संरक्षण के प्रयास==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tiger2.jpg|बाघ &amp;lt;br /&amp;gt; Tiger|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
यद्यपि विगत 1,000 साल से बाघ का शिकार किया जाता रहा है, फिर भी 20वीं सदी के शुरू में जंगलों में रहने वाले बाघ की संख्या 1,00,000 आंकी गई थी। इस सदी के अवसान पर ऐसी आशंका थी कि विश्व भर में केवल 5,000 से 7,000 बाघ बचे हुए हैं। आज तक बाघों का महत्व विजयचिह्न और महंगे कोटों के लिए खाल के स्त्रोत के रूप में था। बाघों को इस आधार पर भी मारा जाता था कि वे मानव के लिए ख़तरा हैं। 1970 के दशक में अधिकतर देशों में शौक़िया शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा बाघ की खाल का व्यापार ग़ैर क़ानूनी बना दिया गया। 1980 के दशक में बाघों की गणना से पता चला कि उनकी संख्या बढ़ रही है और ऐसा लगा कि संरक्षण प्रयास सफल हो रहे हैं और उनके विलुप्त होने का कोई ख़तरा नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु स्थिति ऐसी नहीं थी, जैसी दिखाई देती थी। बाघ के अंगों, खोपड़ी, हड्डियों, गलमुच्छ, स्नायुतंत्र और ख़ून को लंबे समय से एशियाई लोग, विशेष रूप से चीनी, औषधि और शक्तिवर्द्धक पेय बनाने में इस्तेमाल करते रहे हैं, जिसका गठिया, मूषक दंश और विभिन्न बीमारियों को ठीक करने, ताक़त बहाल करने और कामोत्तेजक के रूप में उपयोग किया जाता है। जब तक बाघ के शिकार पर प्रतिबंध नहीं लगा था। उसके शरीर के इन भागों की कभी कमी नहीं रही। लेकिन 1980 के दशक के अंत में इन अंगों के भंडार ख़त्म हो रहे थे और ऐसे सबूत थे कि इनको पाने के लिए तब भी बाघों को मारा जा रहा था। सावधानीपूर्वक की गई गणना से पता चला कि कर्मचारियों ने, जिनकी ग़ैरक़ानूनी शिकारियों से सांठ-गांठ थी या जो उच्चाधिकारियों को खुश करने के लिए उत्सुक थे, पहले की गणना को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया था। इसी समय ग़ैरक़ानूनी शिकार की ख़बरें तेज़ी से बढ़ रही थीं तथा बाघ के अंगों का अवैध व्यापार फलफूल रहा था और आपूर्ति में कमी के कारण इनकी क़ीमतें और ज़्यादा हो गई थीं। कभी-कभी अपराधी को पकड़ा जाता था और बरामद माल को नष्ट किया जाता था, जिसका अत्यधिक प्रचार भी किया जाता था। वास्तव में तस्करों को रोकने के लिए बहुत कम प्रयास किए गए और कई देशों में चीनी औषधि विक्रेताओं के पास शक्तिवर्धक पेय अब भी उपलब्ध हैं।&lt;br /&gt;
==प्रतिबंधित देश==&lt;br /&gt;
सरकारों पर उन देशों के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाने के लिए दबाव डाला गया, जो बाघ के अंगों के व्यापार को समाप्त करने के लिए समुचित उपाय करने में विफल रहे। संरक्षणकर्ताओं ने यह विश्वास करते हुए कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा दंडात्मक उपाय की धमकी ही परिवर्तन लाने में मदद करेगी, राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन से कार्यवाही करने का आग्रह किया और अप्रैल 1994 में उन्होंने ऐसा किया भी। ताइवान से क़रीब 2 करोड़ 50 लाख डॉलर सालाना मूल्य के वन्य जीव उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कुछ सरकारों ने सहयोग का प्रयास किया। मार्च 1994 में [[भारत]] ने बाघों को बचाने के एक संगठित प्रयास के तहत 10 राष्ट्रों के 'विश्व बाघ मंच' की पहली बैठक बुलाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग़ैर क़ानूनी शिकार बंद हो जाने के बावजूद बाघ के लिए ख़तरा समाप्त नहीं होगा। भारत में, जहां सबसे अधिक संख्या में बाघ रहते हैं। तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या की अधिक भूमि की आवश्यकता के कारण बाघों के आवास और भोजन आपूर्ति में कमी आ रही है। इसके बावजूद प्रकृति के प्रति वास्तविक सम्मान क़ायम है और बाघों को बचाने के लिए भारत पहले ही बड़ी राशि ख़र्च कर चुका है। आशा है कि शायद मानव और बाघ सहअस्तित्व जारी रखने के लिए कोई रास्ता ढूंढ निकालेंगे।&lt;br /&gt;
==भारत में बाघ==&lt;br /&gt;
खत्म होते जंगल और शिकारियों पर अंकुश न होने से राष्ट्रीय पशु और जंगल के राजा बाघ की संख्या लगातार कम होती जा रही है। देश के सभी अभयारण्य में लगातार इनकी संख्या कम होती जा रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बीसवीं सदी के शुरू में देश में 40 हजार से ज्यादा बाघ थे। सदी के शुरूआती सात दशकों में अंधाधुंध शिकार और जंगलों के सिमटने के कारण 1972 में बाघों की संख्या घटकर 1872 रह गई। बाघों की इस तरह गिरती संख्या पर केन्द्र सरकार ने 1973 में 'नौ टाइगर रिजर्व' इलाकों में 'बाघ बचाओ योजना' शुरू की। इसमें [[उत्तर प्रदेश]] तथा अब [[उत्तराखंड]] का [[जिम कार्बेट बाघ संरक्षित वन]] क्षेत्र भी शामिल था। उत्तरप्रदेश में राज्य में 26 हजार हेक्टयर से ज्यादा वन इलाके पर अतिक्रमण हो गया है। राज्य में बाघों के रहने का एकमात्र स्थान 'दुधवा टाइगर रिजर्व' में भी 827 हेक्टयर जमीन पर गैरकानूनी कब्जा हो चुका है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में जब 1990 में गिनती हुई तो बाघों की संख्या 240 थी। वर्ष 2001 में हुई गणना में 284 बाघ थे जिनमें 123 नर,132 मादा और 29 शावक थे। दो साल बाद 2003 में हुई गिनती में इनकी संख्या स्थिर रही और दो साल में सिर्फ एक बाघ कम मिला। उस समय पाए गए 283 बाघ में 92 नर, 162 मादा और 29 शावक थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 2005 की गिनती में दस बाघ कम हुए और इनकी संख्या 273 हो गई। वर्ष 2007 में कराई गई गिनती के परिणाम 2008 में आए और इनकी संख्या 109 हो गई। बाघों की गिनती पहले उनके पंजों के निशान के आघार पर होती थी लेकिन 2007 की गणना में नयी पद्धति का इस्तेमाल किया गया। गिनती के इस तरीके को ज्यादा विश्वसनीय माना गया। कुछ लोगों ने 'कैमरा ट्रैप पद्धति' पर यह कह कर सवाल उठाया कि इसमें कैमरे जमीन से डेढ़ फुट ऊपर लगे होते हैं और शावक उसकी रेंज में नहीं आ पाते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शहरीकरण, औद्योगिकी विकास की रफ्तार ने दुनिया भर में जल, जंगल, जमीन को नुकसान पहुंचाया है। इससे सर्वाधिक हानि पर्यावरण एवं उसको बनाए रखने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अन्य प्राणियों की हुई। जंगल में जबरन घुसे विकास ने जानवरों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। परिणाम स्वरूप वन्य प्राणी लगातार खत्म होते जा रहे हैं। कुछ जीव जंतु समाप्त हो गये और कुछ जानवरों की कई प्रजातियां लुप्तप्राय होने की कगार पर है। ऐसे में छोटे-छोटे वन्य प्राणियों से लेकर जंगल के राजा शेर (बाघ) तक सबके लिए अपनी जान बचाए रखना मुश्किल हो गया है। बाघ संरक्षण के सरकारी इंतजाम 'सफेद हाथी' साबित हो रहे हैं। &lt;br /&gt;
*पेंथेरा टाइग्रिस, नियोफ़ेलिस टाइग्रिस या लियो टाइग्रिस, एशिया की विशालकाय बिल्ली, विडाल कुल (फ़ीलीडी) का सबसे बड़ा सदस्य है। शेर, तेंदुआ और अन्य की तरह बाघ बड़े और दहाड़ने वाले विडालों में से एक हैं। ताक़त और उग्रता में इसका एकमात्र प्रतिद्वंद्वी केवल सिंह है।&lt;br /&gt;
*मनुष्य के अनुसार विश्व में सबसे बड़े विडाल वंशी, बाघ (पेंथेरा टाइग्रिस) से अधिक हिंसक कोई जानवर नहीं है और कोई भी इससे ज़्यादा डर पैदा नहीं करता। ऐमूर बाघ (पी.टी. अटलांटिका) की प्रजाति का वज़न 300 किग्रा तक और नाक से पूंछ तक लंबाई चार मीटर पाई गई है।&lt;br /&gt;
*ज्ञात आठ किस्‍मों की प्रजाति में से शाही बंगाल टाइगर (बाघ) उत्‍तर पूर्वी क्षेत्रों को छोड़कर देश भर में पाया जाता है और पड़ोसी देशों में भी पाया जाता है जैसे नेपाल, भूटान और बंगलादेश। भारत में बाघों की घटती जनसंख्‍या की जांच करने के लिए अप्रैल 1973 में 'प्रोजेक्‍ट टाइगर' (बाह्य परियोजना) शुरू की गई। अब तक इस परियोजना के अधीन बाघ के 27  आरक्षित क्षेत्रों की स्‍थापना की गई है जिनमें 37,761 वर्ग कि.मी. क्षेत्र शामिल है।&lt;br /&gt;
===बाघ की उपजातियां===&lt;br /&gt;
बाघ की 8 उपप्रजातियां, जिनकी पहचान हुई है, वे हैं -&lt;br /&gt;
#पेंथेरा टाइग्रिस, भारतीय या बंगाल टाइगर (बाघ), भारत , नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पश्चिमी म्यांमार में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. कोर्बेटाई या भारतीय चीनी बाघ, पूर्वी और दक्षिणि म्यांमार, मलेशियाई प्रायद्वीप, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम और चीन के युन्नान प्रांत में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. सुमात्राई या सुमात्राई बाघ, सुमात्रा, इंडोनेशिया में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. सोंडेइका या जावा का जावाई बाघ, अब विलुप्त माना जाता है ।&lt;br /&gt;
#पी.टी. बालिका, बाली देश का बाली बाघ, अब विलुप्त माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. एमोएंसिस या दक्षिण चीन का बाघ, दक्षिण-मध्य चीन में मुश्किल से जीवित है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. विर्गाटा, कैस्पियाई बाघ, यह भी विलुप्त माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पी.टी. अटलंटिका या एमूर बाघ, रूस के सूदूर पूर्वी इलाक़े और पड़ोसी चीन एवं उत्तर कोरिया में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
==जंगली विडाल==&lt;br /&gt;
एशियाई जंगली विडालों में तेंदुए के बाद बाघ भौगोलिक रूप से सबसे ज़्यादा फैला हुआ है और व्यापक आवासीय विविधता के अनुरूप उसने अपने आप को ढाल लिया है। साइबेरियाई टैगा वन, जहां सर्दियों में तापमान - 40डिग्री से. तक गिर जाता है, से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया के सदाबहार वन, भारत के शुष्क पतझड़ वन, [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] के कछार की ऊंची घास के मैदान और सुंदरवन के मैंग्रोव वन तक, जहां तापमान 40 डिग्री से. तक चढ़ जाता है, इन सभी जगहों पर बाघ आराम से रहता है। बाघ की सबसे ज़्यादा आबादी घने वनों के अतिरिक्त उस भूभाग में पाई जाती है, जहां बड़ी संख्या में शिकार पाया जाता है, जैसे ऊंची घास के मैदान, मिश्रित घास के मैदानी जंगल और पतझड़ एवं अर्द्ध पतझड़ वन। पूर्वी एशिया के शीतोष्ण और उष्णोष्ण वनों में विकसित विडालवंशियों में सबसे विशालकाय यह बाघ गर्मी को अब भी अपेक्षाकृत कम ही सहन कर पाता है। यह एक कुशल तैराक है, फिर भी न तो मेघश्याम तेंदुए (नियोफ़ेलिस नेबुलोसा) की तरह ताइवान और बोर्नियो द्वीप में और न ही तेंदुए (पेंथेरा पार्डस) की तरह श्रीलंका (भूतपूर्व सीलोन) द्वीप में बस सका। इससे संकेत मिलता है कि बाघ इस द्वीपों के मुख्यभूमि से अलग होने के बाद यहां पहुंचे, हालांकि बाघ इंडोनेशियाई द्वीपसमूह के सुमात्रा, जावा और बाली में पाया जाता है। लेकिन अन्य कई जंतु प्रजातियों की तरह यह [[बाली]] के पूर्व में गहरे जल मार्ग वैलेस रेखा को पार नहीं कर पाया। अन्य जंतुओं की तरह इन द्वीपों में बाघ औसतन छोटे शरीर का था। विलुप्त बाली बाघ सभी 8 उपप्रजातियों में सबसे छोटा था, शरीर और पूंछ को मिलाकर उसकी औसत लंबाई 2.5 मीटर थ। उपयुक्त आवास की तलाश में यह पश्चिम की ओर तुर्की और काला सागर तक चला आया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निवास का विशेष इलाका==&lt;br /&gt;
बाघ विशेषकर नर अपान इलाक़ा स्थापित व क़ायम करने की कोशिश करते है, जिसका आकार व स्वरूप शिकार की संख्या और फैलाव, इलाक़े में अन्य बाघों की उपस्थिति, भूभाग की प्रकृति, पानी की उपलब्धता, जलवायु तथा व्यक्तिगत विशेषताओं पर निर्भर करता है। बाघ एक-दुसरे से दूरी और अपने इलाक़े का क़ब्ज़ा, दहाड़ने, भूमि खुरचने, पेड़ों पर पंजों के निशान, विष्ठा निक्षेपण, चेहरे की ग्रथियों को रगड़कर गंध निक्षेपण तथा गुदा ग्रंथियों से निकाली गंध एवं मूत्र के मिश्रण के छिड़काव से हासिल करता है। इस जाति की एकांतप्रियता भी क्षेत्र संघर्ष को टालने में मदद करती है। फिर भी संघर्ष होता है, जो कभी चोट या मृत्यु का भी कारण बन जाता है। बाघ विशेष शिकार को प्राथमिकता देता है। आमतौर पर अपने  शरीर के वज़न के बराबर वज़न वाली प्रजातियां, जैसे सांबर, दलदली हिरन और जंगली सूअर आदि को। क़ांटों से घायल होने के ख़तरे के बावजूद साही के प्रति विशेष रूचि एक अपवाद है कई इलाक़ों में केवल अपनी अधिक संख्या के कारण चीतल, बाघ के आहार का मुख्य भाग है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रकृति संतुलन में बाघ की भूमिका==&lt;br /&gt;
सर्वोच्च परभक्षी होने के कारण बाघ प्रकृति की नियंत्रण और संतुलन योजना में प्रमुख भूमिका निभाता है। शिकार किए जाने वाले जानवरों के अलावा यह अपने इलाक़े के अन्य परभक्षी तेंदुए की संख्या पर भी नियंत्रण रखता है। इसके विपरीत शिकार होने वाली प्रजातियों की स्थिति का भी बाघ की संख्या और वितरण पर असर पड़ता है, लेकिन उतना नहीं जितना प्राकृतिक शिकार पर पूरी तरह निर्भर परभक्षी प्रजातियों, जैसे जंगली कुत्ते और मेघश्याम तेंदुए पर पड़ता है, क्योंकि बाघ पालतू जानवरों को भी खाता है।&lt;br /&gt;
==परंपरागत हिंदू विश्वास के अनुसार==&lt;br /&gt;
बाघ देवी [[दुर्गा]] का वाहन है। जीववाद का अनुसरण करने वाले कुछ जनजातीय समुदाय अब भी बाघ को पूजते है और उसके आवासीय क्षेत्र में रहने वाले उसे भय और श्रद्धा से देखते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों में बाघ को दर्शाया गया है। प्राचीन काल में गुप्त सम्राटों में से सबसे महान [[समुद्रगुप्त]] के विशेष सोने के सिक्के में उन्हें बाघ का वध करते हुए दिखाया गया है। अपने प्रबल शत्रु अंग्रेज़ों को हरा न सकने के कारण [[टीपू सुल्तान]] ने अपनी कुंठा को दूर करने के लिए अंग्रेज़ सैनिक का शिकार करता हुआ जीवित बाघ जितना बड़ा और आवाज़ निकालने वाला बाघ का खिलौना मंगवाया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एशियाई कला और दंत कथाओं में [[हाथी]] और सिंह के बाद बाघ जितना चित्रण किसी अन्य वन्य पशु का नहीं हुआ है। वैज्ञानिक प्रमाणों के विपरीत बाघ के अंगों को तावीज़, खुराक या औषधि के रूप में इस्तेमाल करने की वर्तमान प्रथा बाघ के प्रभामंडल तथा सहस्राब्दियों से उसके प्रति भय से उपजे विश्वास को दर्शाता है। चीनी पंचाग का प्रत्येक 12वां साल व्याघ्र वर्ष के रूप में मनाया जाता है और इसमें जन्में बच्चे विशेष रूप से भाग्यशाली और शक्तिशाली माने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाघ दंतकथाओं और अंधविश्वासों का विषय रहा है। खेल और खाल के लिए इसका शिकार किया जात है। जहां यह पाया जाता है, वहां अपने विभिन्न अंगों के कथित रोगनाशक, संरक्षी या कामोत्तेजक गुणों के कारण इसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाघ के अंगों का प्रयोग==&lt;br /&gt;
*प्रदर्शन और पूजा के लिए खाल सहित बाघ के अंगों को काफ़ी महत्त्वपूर्ण माना जाता है।&lt;br /&gt;
*तावीज़ के लिए पंजे, दांत और हंसुली। &lt;br /&gt;
*अपने दुश्मन को आंत के अल्सर से पीड़ित करने के लिए गलमुच्छ। &lt;br /&gt;
*औषधि के लिए रक्त और मूत्र। &lt;br /&gt;
*शक्तिवर्द्धन और पराक्रम के लिए मांस। &lt;br /&gt;
*संभोग शक्ति के लिए शिश्न। &lt;br /&gt;
*सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि औषधि एवं चीनी शराब के लिए हड्डियां इस्तेमाल की जाती है। एक अच्छी खाल की क़ीमत 15,000 डॉलर तक हो सकती है। एक किग्रा हड्डियां 250 डॉलर में बेची जा सकती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग़ैरक़ानूनी शिकार==&lt;br /&gt;
ग़ैरक़ानूनी शिकार बाघों की संख्या में कमी का एक प्रमुख कारण रहा है, लेकिन पिछली दो सदियों में उनकी संख्या में भारी कमी के कारण हैं- &lt;br /&gt;
*आवासीय इलाक़े में तेज़ी से कटौती, गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनो रूप से। &lt;br /&gt;
*शौक़िया शिकार। &lt;br /&gt;
*बाघ जातियों की संख्या में कमी के कारण पालतू जानवरों पर ज़्यादा निर्भरता और इस कारण आदमी द्वारा बदले की कार्यवाही। &lt;br /&gt;
*मानव और पालतू जानवरों की संख्या में वृद्धि से बाघ के आवासीय इलाक़े में अशांति व कटौती। &lt;br /&gt;
*कृषि के लिए वनों तथा विशेष रूप से बाघ की पसंदीदा ऊंची घास के मैदानों की कटाई।&lt;br /&gt;
*युद्ध और विद्रोह।&lt;br /&gt;
*आवासीय इलाक़े के विखंडन और अलगाव तथा परिवर्तित वातावरण के अनुसार अपने को ढालने एवं मनुष्य की निकटता व अपव्यय से तालमेल बिठाने में बाघ की विफलता।&lt;br /&gt;
===बाघ की केवल पांच जातियाँ शेष===&lt;br /&gt;
1999 के आकलन के अनुसार, बाघ की शेष पांच जातियों की संख्या इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
भारतीय बाघ -       3,000 से 4,550&lt;br /&gt;
सुमात्राई बाघ -       400 से 500&lt;br /&gt;
भारत-चीनी बाघ -     1,200 से 1,700&lt;br /&gt;
दक्षिणी चीन का बाघ -  20 से 30&lt;br /&gt;
एमूर बाघ -          360 से 400&lt;br /&gt;
इस प्रकार 20वीं सदी के अंत में विश्व भर में बाघों की कुल संख्या 5,000 से 7,500 के बीच होने का अनुमान था।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घटती संख्या पर चिंतन==&lt;br /&gt;
तीन दशक पहले बाघों की घटती संख्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी और धीरे-धीरे सभी देशों ने इस जानवर की सुरक्षा के उपाय किए, जिनमें अलग-अलग हद तक सफलता मिली। बाघ को अपने आवासीय इलाक़े में क़ानूनी सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन सब जगह क़ानून कारगर ढंग से लागू नहीं हो रहा है। भारत ने, जहां बाघों की आधी संख्या पाई जाती है, इसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया है और 1973 में महत्त्वाकांक्षी बाघ परियोजना शुरू की, जिसके तहत चुने हुए बाघ आरक्षित क्षेत्रों को विशिष्ट दर्जा दिया गया और वहां विशेष संरक्षण प्रयास किए गए। नेपाल, [[मलेशिया]] और [[इंडोनेशिया]] ने कई राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य स्थापित किए हैं, जहां इस जानवर की कारगर ढंग से रक्षा की जाती है। [[थाइलैंड]], [[कंबोडिया]] और [[वियतनाम]] भी ऐसी ही कार्रवाई कर रही हैं। चीन एकमात्र ऐसा देश है, जहां बाघ की तीनों उपप्रजातियां हैं, जिनमें सबसे अधिक संकटापन्न दक्षिण चीन का बाघ है; वह भी बाघ के संरक्षण पर विशेष ध्यान दे रहा है, रूस एवं सुदूर पूर्व में, जहां ग़ैरक़ानूनी शिकार ने एमूर बाघ के लिए गंभीर ख़तरा पैदा कर दिया है, सघन प्रयास और कारगर गश्त से इसकी संख्या में बढ़ोतरी हुई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाघ की स्थिति ने व्यापक सहानुभूति जगाई है और इसके संरक्षण के लिए काफ़ी पैसा मिला है। वर्ल्ड वाइड फ़ंड फ़ॉर नेचर (डब्लू. डब्लू.एफ.) पथप्रदर्शक और सबसे बड़ा अंशदाता रहा है, लेकिन एक्सॉन एवं कई अन्य संगठनों ने भी बड़ा योगदान किया है। द कनवेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एन्डेंजर्ड स्पीशीज़ (साइटेस) को बाघ के उत्पादों के ग़ैरक़ानूनी व्यापार पर नियंत्रण का काम सौंपा गया है बाघ को बचाने के लिए संयुक्त प्रयासों में समन्वय के लिए विश्व बाघ मंच की स्थापना की गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कम होते बाघ===&lt;br /&gt;
[[एशिया]] में पाए जाने वाले इस राजसी प्राणी के भविष्य पर मनुष्य की काली नज़र बहुत पहले से पड़ चुकी है। प्रकृति के इस भव्य, ताकतवर, अद्भुत और शाही प्राणी को बचाने के लिए अब तक जितनी भी योजनाएं बनीं, उन्हें ठीक से पालन नहीं करने से और लगातार बढ़ती मानव जनसंख्या से जंगलों पर इतना दबाव पड़ रहा है कि कमोबेश हर क्षेत्र में जंगल पिछले एक दशक में अपनी वास्तविक सीमाओं से 47 प्रतिशत तक सिकुड़ चुके हैं। भारत और चीन जैसे ज़्यादा आबादी वाले देशों में तो स्थिति भयावह हो चुकी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===विलुप्त होती प्रजाति===&lt;br /&gt;
एशिया में बाघों की कुल नौ प्रजातियां हैं, जिन्हें क्षेत्र के आधार पर बांटा गया है। इसमें साइबेरियन बाघ, जो रूस के सुदूर और दुर्गम साइबेरिया के बर्फीले जंगलों में अब शायद सिर्फ 450 के क़्ररीब बचे हैं। रॉयल बंगाल टाइगर, जो भारत, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के जंगलों में पाया जाता है। इनकी संख्या कुल 1800 के आस पास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बंगाल]] टाइगर की सबसे निकटतम प्रजाति है इंडोचाइनीज़ टाइगर, जो कभी लाओस, वियतनाम, कम्बोडिया और मलयेशिया में पाया जाता था। इनकी संख्या अब सिर्फ 300 बची है। इसके अलावा मलय टाइगर जो थाइलैंड और मलयेशिया में पाया जाता है। यह अब सिर्फ 500 बचे हैं जिनमें से अधिकतर मानव निर्मित पशु शिविरों में पाए जाते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके अलावा सुमात्रा टाइगर, जो सुमात्रा द्वीप समूह में पाया जाता है। इसकी संख्या अब 400 बताई जा रही है। हिंद महासागर में बसे जावा और बाली द्वीपों में पाए जाने वाले जावा टाइगर और बाली टाइगर, जो आकार में सबसे छोटे माने जाते थे, अब विलुप्त मान लिए गए हैं। किसी ज़माने में उत्तर एशिया में मंगोलिया से लेकर कज़ाकिस्तान, [[अफ़ग़ानिस्तान]], तुर्कमेनिस्तान, ईरान, इराक़ से लेकर तुर्की तक पाया जाने वाला कैस्पियन टाइगर भी अब विलुप्त हो चुका है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अवैध कारोबार के शिकार==&lt;br /&gt;
चीन में वर्ष 2010 में टाइगर वर्ष मनाया जा रहा है और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस कारण से इस वर्ष बाघ के अंगों की मांग में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार मध्य एशिया और चीन में बाघ के लिंग की कीमत 80,000 डॉलर प्रति 10 ग्राम है, बाघ की खाल 10,000 से लेकर 1,00,000 डॉलर तक, बाघ की हड्डियां 9,000 डॉलर प्रति किलो तक बिक जाती है। हृदय और अन्य आंतरिक अंगों की कीमत भी हजारों लाखों में है. इसके बावजूद ख़रीदारों की कोई कमी नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीनी मान्यता के अनुसार मनाए जाने वाले टाइगर इयर में सभी को इस साल इस विलक्षण प्राणी को बचाने की कोशिश करनी चाहिए वरना आने वाले सालों में बाघ भी ड्रैगन की तर्ज़ पर क़िस्से कहानियों में देखा पढ़ा जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश में सिर्फ 1411 बाघ ही बचे है यह गिनती सही है या गलत इस पर सवाल उठाया जा सकता है पर यह सच है कि हमारे देश के जंगलों व अभ्यारण्यों में तस्करों द्वारा किये गए अवैध शिकार के चलते  बाघों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है और यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब बाघ सिर्फ चिड़ियाघरों तक ही सिमित हो जायेंगे | हमारे नन्हे ब्लोगर आदि की आशंका भी निराधार नहीं कि अगली बार बाघ चिड़ियाघर में भी देखने को ना मिले |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाघों को शिकारियों के शिकार से बचाने के लिए सरकार भी इतने सुरक्षा कर्मी जंगलों में तैनात नहीं कर सकती जो इन शिकारियों पर अंकुश लगा सके | इसके लिए हमें जंगल के आस-पास रहने वाले ग्रामीणों के सामने ही बाघ की महत्ता के उदहारण पेश उन्हें समझाना होगा कि बाघ उनके खेतों से दूर जंगल रह कर भी कैसे उनकी खेतों में कड़ी फसल की रखवाली कर सकता है और इस असंतुलन से बचने के लिए जंगल में बाघ का होना हमारे लिए कितना जरुरी है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पारिवारिक इकाई==&lt;br /&gt;
*गर्म इलाक़ों में बाघ वर्ष भर बच्चे पैदा करते हैं। &lt;br /&gt;
*ठंडे इलाक़ों में ये वसंत के मौसम में प्रजनन करते हैं। &lt;br /&gt;
*इनकी औसत गर्भावधि 113 दिन की होती है और एक बार में 2 या 3 शावक पैदा होते हैं। &lt;br /&gt;
*शावक धारीदार होते हैं और मां के साथ तब तक रहते हैं, जब तक वे वयस्क होकर अपने आप शिकार करने में समर्थ न हो जाएं। शावक जब तक आत्मनिर्भर नहीं हो जाते, बाघिन दुबारा प्रजनन नहीं करती। &lt;br /&gt;
*बाघ की औसत आयु क़रीब 11 साल होती है।&lt;br /&gt;
*क़ैद में रहने पर अत्यधिक निकट संबंध के कारण बाघ और सिंह का संकर पैदा हो सकता है। ऐसे प्रजनन में यदि बाघ पिता है, तो शावक टिगॉन और यदि सिंह पिता है, तो शावक लाइगर कहलाता है।&lt;br /&gt;
==शावकों का लालन पालन==&lt;br /&gt;
100 दिन की गर्भावधि के बाद शावक पैदा होते है। एक बार में दो से चार शावक पैदा होते हैं। शावक अंधे पैदा होते हैं और जब उनकी आंखें खुली भी रहती हैं, तब भी वे अपारदर्शिता के कारण छह से आठ हफ़्ते तक स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते। इस कारण दूध-छुड़ाई, संरक्षण और प्रशिक्षण का लंबा समय होता है, जिसके दौरान शावक की मृत्यु दर अधिक होती है, विशेष रूप से यदि खाने की भी कमी हो। शिकार पर जाने के कारण लंबे समय तक मां की अनुपस्थिति और कभी-कभी खाना उपलब्ध होने की स्थिति में ताक़तवर शावकों की आक्रामकता के कारण कमज़ोर शावकों को कम भोजन मिलता है। नर शावक मादा शावकों की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ते हैं और अपनी मां को जल्दी छोड़ देते हैं। शिकार करने का कौशल आंशिक रूप क़ैद में पाले-पोसे गए बाघों को यदि वनों में छोड़ा गया, तो वे अच्छी तरह से अपना भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं। हालांकि मुख्य रूप से नर द्वारा शावकों की हत्या की बात का पता चलता है, लेकिन बाघिन और शावकों के साथ नर के होने, यहां तक कि शिकार में हिस्सेदारी असामान्य बात नहीं है। लेकिन यह साथ लंबे समय तक नहीं रहता।&lt;br /&gt;
==नरभक्षी बाघ==&lt;br /&gt;
नरभक्षण से बढ़कर बाघ के किसी और आचरण ने आदमी को विकर्षित नहीं किया है। इस विपथन के कई कारण हैं, उम्र व चोट के कारण विकलांगता, शिकार की कमी, मां से यह आदत सीखना, शावक या शिकार किए जानवर को बचाने या अन्य कारणों से आदमी को मारना और इसके बाद उसे खाना। बाघों की संख्या में कमी के कारण नरभक्षी  बाघ भी दुर्लभ हो गए हैं, केवल पश्चिम बंगाल में सुंदरबन के जंगल इसका अपवाद हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ी==&lt;br /&gt;
*[http://www.indianwildlifeportal.com/project-tiger/index.html http://www.indianwildlifeportal.com]&lt;br /&gt;
*[http://projecttiger.nic.in/ http://projecttiger]&lt;br /&gt;
*[http://subhashinmedia.blogspot.com/2010/02/blog-post_11.html राजा का है हाल बेहाल]&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{राष्ट्रीय चिन्ह और प्रतीक}}&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय_चिन्ह_और_प्रतीक]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A4%BC_%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%81&amp;diff=33933</id>
		<title>चंगेज़ ख़ाँ</title>
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		<updated>2010-06-15T08:28:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* ख़ारज़म और चंगेज़ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==परिचय==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
सन 1211 और 1236 ई॰ के बीच, [[भारत]] की सरहद पर एक बड़ा भंयकर बादल उठा। यह बादल मंगोलों का था, जिसका नेता चंगेज़ ख़ाँ था। चंगेज़ ख़ाँ अपने एक दुश्मन का पीछा करता हुआ ठेठ [[सिंधु नदी]] तक आ गया, लेकिन यहीं पर रुक गया। भारत बच गया। इसके क़रीब दो सौ वर्ष बाद इसी के वंश का एक दूसरा आदमी [[तैमूर लंग|तैमूर]] भारत में मार-काट और बरबादी लेकर आया। लेकिन बहुत से मंगोलों ने भारत पर छापा मारने और ठेठ लाहौर तक भी आ धमकने की आदत-सी डाल ली। कभी-कभी ये आतंक फैलाते थे और सुल्तानों तक को भी डरा देते थे कि वे धन देकर अपना पिण्ड छुड़ाते थे। हज़ारों मंगोल पंजाब में ही बस गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
मंगोलिया के ये ख़ानाबदोश मर्द और औरत बड़े मज़बूत थे। कष्ट झेलने की इन्हें आदत थी और ये लोग उत्तरी एशिया के लम्बे चौड़े मैदानों में तम्बुओं में रहते थे। लेकिन इनका शारीरिक बल और कष्ट झेलने का मुहावरा इनके ज्यादा काम न आते, अगर इन्होंने एक सरदार न पैदा किया होता, जो बड़ा अनोखा व्यक्ति था। यह वही व्यक्ति है जो चंगेज़ ख़ाँ के नाम से मशहूर है। यह सन 1155 ई॰ में पैदा हुआ था और इसका असली नाम तिमूचिन था। इसका पिता येगुसी-बगातुर इसको बच्चा छोड़कर मर गया था। 'बगातुर' मंगोल अमीरों का लोकप्रिय नाम था। इसका मतलब है 'वीर' और मेरा ख्याल है कि अर्दू का 'बहादुर' शब्द इसी से निकला है। &lt;br /&gt;
==बचपन==&lt;br /&gt;
हालाँकि चंगेज़ दस वर्ष का छोटा लड़का ही था और उसका कोई मददगार नहीं था। फिर भी वह मेहनत करता चला गया और आख़िर में कामयाब हुआ। वह क़दम-क़दम आगे बढ़ता गया, यहाँ तक की अंत में मंगोलों की बड़ी सभा 'कुरुलताई' ने अधिवेशन करके उसे अपना 'ख़ान महान' या 'कागन' या सम्राट चुना। इससे कुछ साल पहले उसे चंगेज़ का नाम दिया जा चुका है। &lt;br /&gt;
==महान या कागन==&lt;br /&gt;
चंगेज़ जब 'महान' या 'कागन' बना, उस समय उसकी उम्र 51 वर्ष की हो चुकी थी। यह जवानी की उम्र नहीं थी और इस उम्र पर पहुँचकर ज़्यादातर आदमी शांति और आराम चाहते हैं। लेकिन उसके लिए तो यह विजय यात्रा के जीवन की शुरूआत थी। यह ग़ौर करने की बात है, क्योंकि ज्यादातर महान विजेताओं ने मुल्कों को जीतने का काम जवानी में ही पूरा किया है। इससे हम यह नतीजा भी निकाल सकते हैं कि चंगेज़ ने जवानी के जोश में एशिया को नहीं रौंद डाला था। वह अधेड़ उम्र का एक होशियार और सावधान आदमी था और हर बड़े काम को हाथ में लेने से पहले उस पर विचार और उसकी तैयारी कर लेता था। &lt;br /&gt;
==ख़ानाबदोश मंगोल==&lt;br /&gt;
मंगोल लोग ख़ानाबदोश थे। शहरों और शहरों के रंग-ढंग से भी उन्हें नफ़रत थी। बहुत से लोग समझते हैं कि चूंकि वे ख़ानाबदोश थे, इसलिए जंगली रहे होंगे, लेकिन यह ख्याल ग़लत है। शहर की बहुत सी कलाओं का उन्हें अलबत्ता ज्ञान नहीं था, लेकिन उन्होंने जिन्दगी का अपना एक अलग तरीक़ा ढाल लिया था और उनका संगठन बहुत ही गुंथा हुआ था। लड़ाई के मैदान में अगर उन्होंने महान विजय प्राप्त कीं तो अधिक संख्या होने के कारण नहीं, बल्कि अनुशासन और संगठन के कारण और इसका सबसे बड़ा कारण तो यह था कि उन्हें चंगेज़ जैसा जगमगाता सेनानी मिला था। इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास में चंगेज़ जैसा महान और प्रतिभा वाला सैनिक नेता दूसरा कोई नहीं हुआ है। [[सिकन्दर]] और सीजर इसके सामने नाचीज़ नज़र आते हैं। चंगेज़ न सिर्फ खुद बहुत बड़ा सिपहसलार था, बल्कि उसने अपने बहुत से फौजी अफसरों को तालीम देकर होशियार नायक बना दिया था। अपने वतन से हज़ारों मील दूर होते हुए भी, दुश्मनों और विरोधी जनता से घिरे रहते हुए भी, वे अपने से ज्यादा तादाद की फौजों से लड़कर उन पर विजय प्राप्त करते थे। &lt;br /&gt;
==विजय यात्रा की तैयारियाँ==&lt;br /&gt;
चंगेज़ ने बड़ी सावधानी के साथ अपनी विजय यात्रा की तैयारियाँ कीं। उसने अपनी फौज को लड़ाई की तालीम दी। सबसे ज्यादा इसने अपने घोड़ों को सिखाया था और इस बात का ख़ास इन्तजाम किया था कि एक घोड़ा मरने के बाद दूसरा घोड़ा तुरन्त ही सिपाहियों के पास पहुँच सके, क्योंकि ख़ानाबदोशों के लिए घोड़ों से ज्यादा महत्व की चीज़ और कोई नहीं होती है। इन सब तैयारियों के बाद उसने पूर्व की तरफ़ कूंच किया और उत्तर चीन और मंचूरिया के किन-साम्राज्यों को क़रीब-क़रीब खत्म कर दिया और पेकिंग पर भी क़ब्ज़ा कर लिया। उसने कोरिया जीत लिया। मालूम होता है कि दक्षिणी सुंगों को उसने अपना दोस्त बना लिया था। इन सुंगों ने किन लोगों के ख़िलाफ़ उसकी मदद भी की थी। बेचारे यह नहीं समझते थे कि इनके बाद उनकी भी बारी आने वाली है। चंगेज़ ने बाद में सुंगों को भी जीत लिया था। &lt;br /&gt;
==ख़ारज़म और चंगेज़==&lt;br /&gt;
इन विजयों के बाद चंगेज़ आराम कर सकता था। ऐसा मालूम होता है कि पश्चिम पर हमला करने की उसकी इच्छा नहीं थी। वह ख़ारज़म के शाह से मित्रता का सम्बन्ध रखना चाहता था, लेकिन यह हो नहीं पाया। एक पुरानी कहावत है, जिसका मतलब है कि देवता जिसे नष्ट करना चाहते हैं, उसे पहले पागल कर देते हैं। ख़ारज़म का बादशाह अपनी ही बरबादी पर तुला हुआ था और उसे पूरा करने के लिए जो कुछ मुमकिन था, उसने किया। उसके एक सबे के हाक़िम ने मंगोल सौदागरों को क़त्ल कर दिया। चंगेज़ फिर भी सुलह चाहता था और उसने यह संदेश लेकर राजदूत भेजे कि उस गवर्नर को सज़ा दी जाए। लेकिन बेवक़ूफ शाह इतना घमंडी था और अपने को इतना बड़ा समझता कि उसने इन राजदूतों की बेइज्जती की और उनको मरवा डाला। चंगेज़ के लिए इसे बरदाश्त करना नामुमकिन था, लेकिन उसने जल्दबाज़ी से काम नहीं लिया। उसने सावधानी से तैयारी की और तब पश्चिम की तरफ़ अपनी फौज के साथ कूंच का डंका बजा दिया। &lt;br /&gt;
इस कूंच ने, जो सन् 1219 ई॰ में शुरू हुआ, [[एशिया]] की ओर कुछ हद तक यूरोप की आँखें इस नये आतंक की तरफ़ खोल दीं, जो बड़े भारी बेलन की तरह शहरों और करोड़ों आदमियों को बेरहमी के साथ कुचलता हुआ चला आ रहा था। ख़ारज़म का सम्राट मिट गया। बुखारा का बड़ा शहर, जिसमें बहुत महल थे और दस लाख से ज्यादा आबादी थी, जलाकर राख़ कर दिया। राजधानी समरकंद बर्बाद कर दी गई। और उसकी दस लाख की आबादी में सिर्फ पचास हज़ार लोग ही जिन्दा बचे। हिरात, बलख और दूसरे बहुत से ग़ुलज़ार शहर नष्ट कर दिये गए। करोड़ों आदमी मार डाले गए। जो कलाएँ और दस्तकारियाँ वर्षों से मध्य एशिया में फल-फूल रही थीं, गायब हो गईं। ईरान और मध्य एशिया में सभ्य जीवन का ख़ात्मा सा हो गया। जहाँ से चंगेज़  गुज़रा, वहाँ वीराना हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ख़ारज़म का युद्ध==&lt;br /&gt;
ख़ारज़म के बादशाह का लड़का जलालुद्दीन इस तूफान के ख़िलाफ़ बहादुरी से लड़ा। वह पीछे हटते-हटते सिंध नदी तक चला गया और जब यहाँ भी इस पर ज़ोर का दबाव पड़ा तो कहते हैं कि वे घोड़े पर बैठा हुआ, तीस फुट नीचे सिंध नदी में कूद पड़ा और तैरकर इस पार निकल आया। उसे दिल्ली दरबार में आश्रय मिला। चंगेज़ ने वहाँ तक उसका पीछा करना फ़िज़ूल समझा। &lt;br /&gt;
सेलजूक तुर्कों की और बग़दाद की खुशकिस्मती थी कि चंगेज़ ने इनको बिना छेड़े छोड़ दिया और वह रूस की तरफ बढ़ गया। उसने कीफ़ के ग्रैड ड्यूक को हराकर क़ैद कर लिया। फिर वह हिसियों या तंगतों के बलवे को दबाने के लिए पूर्व की तरफ लौट गया। &lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
चंगेज़ सन् 1227 ई॰ में बहत्तर वर्ष की उम्र में मर गया। उसका साम्राज्य पश्चिम में काले समुद्र से पूर्व में प्रशान्त महासागर तक फैला हुआ था। उसमें अब भी काफ़ी तेज़ी थी और वह दिन-ब-दिन बढ़ ही रहा था। इसकी राजधानी अभी तक मंगोलिया में कराकुरम नाम का एक छोटा सा क़स्बा था। ख़ानाबदोश होते हुए भी चंगेज़ बड़ा ही योग्य संगठन करने वाला था और उसने बुद्धिमानी के साथ अपनी मदद के लिए योग्य मंत्री मुकर्रर कर रखे थे। उसका इतनी तेज़ी के साथ जीता हुआ साम्राज्य उसके मरने पर टूटा नहीं। &lt;br /&gt;
==इतिहास-लेखकों की नज़र में चंगेज़==&lt;br /&gt;
*अरब और ईरानी इतिहास-लेखकों की नज़र में चंगेज़ एक दानव है, उसे उन्होंने 'ख़ुदा का क़हर' कहा है। उसे बड़ा ज़ालिम आदमी बताया गया है। इसमें शक नहीं कि वह बड़ा ज़ालिम था। लेकिन उसके जमाने के दूसरे बहुत से शासकों में और उसमें कोई ज्यादा फर्क नहीं था। भारत में अफ़ग़ान बादशाह, कुछ छोटे पैमाने पर, इसी तरह के थे। जब ग़ज़नी पर अफ़ग़ानों ने सन 1150 ई॰ में क़ब्ज़ा किया तो पुराने खून का बदला लेने के लिए इन लोगों ने उस शहर को लूट और जला तक दिया। सात दिनों तक 'लूट-मार, बरबादी और मार-काट जारी रही। जो मर्द मिला, उसे क़त्ल कर दिया गया। तमाम स्त्रियों और बच्चों को क़ैद कर लिया गया। महमूदी बादशाहों (यानी सुल्तान महमूद के वंशजों) के महल और इमारतें, जिनका दुनिया में कोई सानी नहीं था, नष्ट कर दिये गए।' मुसलमानों का अपने बिरादर मुसलमानों के साथ यह सलूक था। इसके, और यहाँ भारत में जो कुछ अफ़ग़ान बादशाहों ने किया उसके, और मध्य एशिया और ईरान में चंगेज़ की विनाशपूर्ण कार्रवाई के, दरजों में कोई फर्क नहीं था। चंगेज़ ख़ारज़म खासतौर पर नाराज़ था, क्योंकि शाह ने उस राजदूत को क़त्ल करवा दिया था। उसके लिए तो यह खूनी झगड़ा था। और जगहों पर भी चंगेज़ ने खूब सत्यानाश किया था, लेकिन उतना नहीं, जितना मध्य एशिया में। &lt;br /&gt;
*शहरों को यों बरबाद करने के पीछे चंगेज़ की एक और भावना भी थी। उसकी ख़ानाबदोशी की तबीयत थी और वह क़स्बों और शहरों से नफ़रत करता था। वह खुले मैदानों में रहना पसंद करता था। एक दफा तो चंगेज़ को ख्याल हुआ कि चीन के तमाम शहर बरबाद कर दिये जाएँ तो अच्छा होगा। लेकिन खुशकिस्मती कहिये कि उसने ऐसा किया नहीं। उसका विचार था कि सभ्यता और ख़ानाबदोशी की जिन्दगी को मिला दिया जाय, लेकिन न तो यह सम्भव था और न है। &lt;br /&gt;
*चंगेज़ ख़ाँ के नाम से शायद यह ख्याल हो कि वह मुसलमान था, लेकिन वह मुसलमान नहीं था। यह एक मंगोल नाम है। मज़हब के मामले में चंगेज़ बड़ा उदार था। उसका अपना मज़हब अगर कुछ था तो शमाबाद था, जिसमें 'अविनाशी नीले आकाश' की पूजा होती थी। वह चीन के 'ताओ' धर्म के पंडितों से अक्सर खूब ज्ञान-चर्चा किया करता था। लेकिन वह खुद शमा-मत पर ही क़ायम रहा और जब कठिनाई में होता, तब आकाश का ही आश्रय लिया करता था। &lt;br /&gt;
*चंगेज़ को मंगोलों की सभा ने 'ख़ान-महान' चुना था। यह सभा असल में सामन्तों की सभा थी, जनता की नहीं, और यों चंगेज़ इस फ़िरके का सामन्ती सरदार था। &lt;br /&gt;
*वह पढ़ा-लिखा नहीं था और उसके तमाम अनुयायी भी उसी की तरह थे। शायद वह बहुत दिनों तक यह भी नहीं जानता था कि लिखने जैसी भी कोई चीज़ होती है। &lt;br /&gt;
*संदेश ज़बानी भेजे जाते थे और आमतौर पर छन्द में रूपकों या कहावतों के रूप में होते थे। ताज्जुब तो यह है कि ज़बानी संदेशों से किस तरह इतने ब़ड़े साम्राज्य का कारबार चलाया जाता था। जब चंगेज़ को मालूम हुआ कि वह वड़ी फायेदमन्द चीज़ है और उसने अपने पुत्रों और मुख्य सरदारों को इसे सीखने का हुक्म दिया। उसने यह भी हुक्म दिया था कि मंगोलों का पुराना रिवाज़ी क़ानून और उसकी अपनी उक्तियाँ भी लिख डाली जाएँ। मुराद यह थी कि यह रिवाज़ी क़ानून सदा-सर्वदा के लिए 'अपरिवर्तनशाल क़ानून' है, और कोई इसे भंग नहीं कर सकता था। बादशाह के लिए भी इसका पालन करना ज़रूरी था। लेकिन यह 'अपरिवर्तनशील क़ानून' अब अप्राप्य  है और आजकल के मंगोलों को न तो इसकी कोई याद है और न ही इसकी कोई परम्परा ही बाक़ी रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चंगेज़ ख़ाँ का उत्तराधिकारी==&lt;br /&gt;
*चंगेज़ ख़ाँ की मृत्यु के बाद उसका लड़का ओगताई 'ख़ान-महान' हुआ। चंगेज़ और उस ज़माने के मंगोलों के मुकाबले में वह दयावान और शान्तिप्रिय स्वभाव का था। वह कहा करता था कि &amp;quot;हमारे कागन चंगेज़ ने बड़ी मेहनत से हमारे शाही ख़ानदान को बनाया है। अब वक्त आ गया है कि हम अपने लोगों को शान्ति दें, खुशहाल बनायें और उनकी मुसीबतों का कम करें।&amp;quot;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>हाथी</title>
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		<updated>2010-06-15T08:27:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* एशियाई हाथी */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
हाथी जमीन पर पाया जाने वाला सबसे बड़ा जीविर जानवर है। इस की दो प्रजातियों, एशियाई हाथी एलिफ़ैस मैक्सीमस और अफ़्रीकी हाथी लॉक्सोडोंटा अफ़्रीकाना में से एक, दोनों ही एलिफ़ैंटिडी परिवार गण, कुल के हैं, जिनका विशिष्ट लक्षण उनका बड़ा आकार, लंबी सूंड (विस्तारित नाक), स्तंभाकार पैर, विशाल कान (विशेषकर एल अफ़्रीकाना में) और बड़ा सिर है। इ. मैक्सीमस भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाया जाता है; जबकि एल. अफ़्रीकाना अफ़्रीका के उपसहारा क्षेत्र में पाया जाता है। दोनों  ही प्रजातियां घने जंगलों से लेकर सवाना (घास के खुले मैदान) तक में रहती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एशियाई हाथी==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Asian-Elephant.jpg|एशियाई हाथी &amp;lt;br /&amp;gt; Asian Elephant|thumb|300px|left]]&lt;br /&gt;
[[एशिया|एशियाई]] हाथी अब पहले के मुक़ाबले सीमित क्षेत्र में ही पाए जाते हैं। पहले यह क्षेत्र पश्चिम एशिया के टिग्रिस-यूफ़्रेटस बेसिन से पूर्व की ओर उत्तरी [[चीन]] तक फैला हुआ था। इसमें वर्तमान [[इराक़]] और पड़ोसी देश, दक्षिण [[ईरान]], [[पाकिस्तान]], [[हिमालय]] के दक्षिण में समूचा भारतीय उपमहाद्वीप, [[एशिया महाद्वीप]] का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा, चीन का एक बड़ा हिस्सा और [[श्रीलंका]] (भूतपूर्व सीलोन), सुमात्रा तथा संभवतः जावा के क्षेत्र शामिल हैं। जीवाश्मों से पता चलता है कि किसी समय बोर्नियों में भी हाथी थे, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वे वहां के मूल निवासी थे या 1750 के दशक में वहां लाकर छोड़े गए बंदी हाथियों के वंशज हैं। अभी मुख्य रूप से हाथी सबाह ([[मलेशिया]]) और कालिमंतन ([[इंडोनेशिया]]) के एक छोटे क्षेत्र तक सीमित हैं। हथी पश्चिम एशिया, [[भारत|भारतीय]] महाद्वीप के अधिकांश हिस्से, दक्षिण-पूर्व एशिया के काफी हिस्से और लगभग समूचे चीन (युन्नान प्रांत के दक्षिणी क्षेत्रों को छोड़कर) से विलुप्त हो चुके हैं। इसके क्षेत्र के पश्चिमी हिस्सों की शुष्कता, पालतू बनाए जाने के लिए बड़े पैमाने पर बंदी बनाने (जो लगभग 4,000 साल पाहले सिंधु घाटी में शुरू हुआ था), मानव आबादी के लगातार बढ़ने से इनके पर्यावास में कमी और इनका शिकार, इनके क्षेत्र व संख्या में कमी के प्रमुख कारण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक गणना के अनुसार, जंगली एशियाई हाथियों की संख्या 37 से 57 हज़ार के बीच है; इनका पर्यावास लगभग 5,00,000 वर्ग किमी में फ़ैला हुआ है। हाथी कंटीले झाड़ीदार जंगलों से लेकर सदाबहार वनों तक, दलदली क्षेत्र से लेकर घास के मैदानों तक और शुष्क एवं नम पर्णपाती वनों जैसे भिन्न पर्यावासों में पाए जाते हैं। पूर्वी हिमालय में हाथी 3,000 मीटर की ऊंचाई तक रहने में सक्षम है। 15 हज़ार हाथी बंदी अवस्था में हैं। भारत में लगभग 22 हज़ार जंगली और 3,000 पालतू हाथी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====भारतीय हाथी====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indian-Elephant.jpg|भारतीय हाथी &amp;lt;br /&amp;gt; Indian Elephant|thumb|300px]]&lt;br /&gt;
भारतीय हाथी एशियाई हाथियों की ही उपजाति हैं, अतः इनमें कोई खास फ़र्क नहीं है। भारतीय हाथियों के अफ़्रीकी हाथियों के मुकाबले कान छोटे होते हैं, और माथा चौड़ा होता है। मादा के हाथीदाँत नहीं होते हैं। नर मादा से ज़्यादा बड़े होते हैं। सूँड अफ़्रीकी हाथी से ज़्यादा बड़ी होती है। पंजे बड़े व चौड़े होते हैं। पैर के नाखून ज़्यादा बड़े नहीं होते हैं। अफ़्रीकी पड़ोसियों के मुकाबले इनका पेट शरीर के वज़न के अनुपात में ही होता है, लेकिन अफ़्रीकी हाथी का सिर के अनुपात में पेट बड़ा होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय हाथी लंबाई में ६.४ मीटर (२१ फ़ुट) तक पहुँच सकता है; यह थाईलैंड के एशियाई हाथी से लंबा व पतला होता है। सबसे लंबा ज्ञात भारतीय हाथी २६ फ़ुट (७.८८ मी) का था, पीठ के मेहराब के स्थान पर इसकी ऊँचाई ११ फुट (३.४ मी.), ९इंच (३.६१मी) थी और इसका वज़न ८ टन (१७९३५ पौंड) था&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अफ़्रीकी हाथी==&lt;br /&gt;
[[चित्र:African-Elephant.jpg|अफ़्रीकी हाथी &amp;lt;br /&amp;gt; African Elephant|thumb|300px|left]]&lt;br /&gt;
[[अफ़्रीका|अफ़्रीकी]] हाथी जमीन पर पाया जाने वाला सबसे बड़ा जीविर जानवर है, जिसका वजन 7,500 किग्रा तक होता है और कंधे तक ऊंचाई 3 से 4 मीटर होती है। भारतीय हाथी का वज़न लगभग 5,500 किग्रा और कंधे तह ऊंचाई 3 मीटर होती है; इसके कान अफ़्रीकी हाथी की तुलना में काफी छोट होते हैं। हाथियों में चर्वणक दांत एक साथ ही पैदा नहीं होते; बल्कि पुराने दांत के घिस जाने पर नया पैदा हो जाता है। लगभग  वर्ष की आयु में चर्वणक दांतों का छठा और अंतिम जोड़ा निकलता है, इसलिए बहुत कम हाथी इससे अधिक आयु तक जीवित रह पाते हैं।&lt;br /&gt;
जंगलों में हाथी वरिष्ठ हथिनी के नेतृत्व में छोटे पारिवारिक समूहों में रहते हैं। जहां भरपूर भोजन उपलब्ध होता है, वहां झुंड बड़े भी हो सकते हैं। अधिकांश नर मादाओं से अलग झुंड में रहते हैं। भोजन और पानी की उपलब्धता के अनुसार, हाथी मौसमी प्रवास करते हैं। वे कई घंटे भोजन करने में बिताते है और एक दिन में 225 किग्रा घास और अन्य वनस्पति खा सकते हैं। एशियाई हाथी अफ़्रीकी हाथी की तुलना में छोटा होता है और उसके शरीर का इच्चतम बिंदु कंधे के बजाय सिर होते है, सामने के पैरों पर नाख़ून जैसी पांच संरचनाएं और पिछले पैरों पर चार संरचनाएं होती हैं। आमतौर पर सिर्फ़ नरों के ही गजदंत होते हैं, जबकि अफ़्रीकी हाथियों में नर और मादा, दोनों में गजदंत पाए जाते हैं। हाथियों में घ्राणशाक्ति अत्यंत विकसित होती है और इसके जरिये वे ख़तरों का पता लगाते हैं तथा बांस के घने झुंडों में नरम कॉपल जैसे मनपसंद आहार ढूंढते हैं। खाते समय हाथी इस प्रकार खड़े होते है कि सबसे बड़ी हथिनी हवा की दिशा में खड़ी हो और बच्चे उसे ढूंढ सकें।&lt;br /&gt;
एशियाई हाथी किसी भी समय भोजन कर सकते हैं, लेकिन 24 घंटों में दो मुख्य भोजनकाल होते हैं। वयस्कों की गतिविधियों का 72 से 90 प्रतिशत हिस्सा भोजन ढूंढने और उसे खाने में बीतता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लक्षण==&lt;br /&gt;
हाथी कुछ-कुछ स्लेटी से भूरे रंग के होते है और उनके शरीर के बाल बिखरे हुए तथा रूखे होते हैं। दोनों प्रजातियों में दो ऊपरी कृंतक दंत हाथीदांत के रूप में विकसित होते हैं, लेकिन भारतीय हाथियों में यह आमतौर पर नहीं पाए जाते। नथुने, मांसल सूंड के छोर पर स्थित होते हैं, जो सांस लेने, खाने और पीने में उपयोगी होते हैं। हाथी सूंड के ज़रिये पानी खींचकर अपने मुंह में डालते हैं। यह सूंड के छोर से घास, पत्तियां और फल तोड़कर अपने मुंह में डालते हैं। सूंड के छोर पर छोटे उंगलीनुमा उभार के ज़रिये ये छोटी वस्तुओं को भी उठाने में संक्षम होते हैं। अफ़्रीकी हाथियों में ऐसी दो संरचनाएं और भारतीय हाथी में एक होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भोजन==&lt;br /&gt;
विशालकाय जंगली हाथी की ख़ुराक भी उसके शरीर के अनुसार होती है। एक सामान्य वयस्क हाथी आराम के दिनों में 75 किलो तक भोजन एक दिन में खाता है। यह भोजन विभिन्न वनस्पतियों के रूप में होता है. लेकिन, लंबी यात्रा और श्रम करने वाला हाथी एक दिन में 150 किलो चारा यानी घास, पत्ती, वनस्पति और फल-फूल खा लेता है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली हथनी तो 200 किलो तक भोजन कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक वयस्क हाथी एक घंटे में सात किग्रा भोजन ग्रहण कर सकता है और वे प्रतिदिन 18 घंटे भोजन करते हैं, इस प्रकार वे प्रतिदिन 150 किग्रा वनसपति सामग्री (आर्द्र वज़न) का भक्षण करते हैं। दक्षिण भारत में एक अध्ययन से पाया गया कि हाथी पौधों की कम से कम 112 किस्म की प्रजातिया खाते हैं, लेकिन उनके आहार का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा मॉलवेल्स गण और लेगुमिनसी, पाल्मे, साइपरेसी और ग्रामिनी परिवार की सिर्फ़ 25 प्रजातियों पर आधारित है। अध्ययन से पता चला कि आर्द्र मौसम की शुरूआत में ये प्रोटीन युक्त घास खाते है और जब शुष्क मौसम में घास बड़ी हो जाती है, तब आहार में कॉपलों  की प्रधानता रहती है। चूंकि खेत में पैदा होने वाले खाद्यान्न तथा मिलेट फ़सकों में जंगली  घास की अपेक्षा अधिक प्रोटीन, कैल्शियम और सोडियम होता है, इसलिए वे प्रायः खेतों पर भी धावा बोल देते हैं, लेकिन चाहे खेत जंगलों के पास स्थित क्यों न हों, सभी हाथी फ़सलों में घुसपैठ नहीं करते। हाथी, मिट्टी से सोडियम और पेड़ की छालों से भी कैल्शियम प्राप्त करते हैं। ये दिन में कम से कम एक बार पानी अवश्य पीते हैं और ताज़े पानी के स्थायी स्रोतों से कभी बहुत दूर नहीं जाते। दिन के गर्म समय में इनके लिए छांव अनिवार्य है। हाथी अपने कानों के ज़रिये ऊष्मा का विकिरण करते है और इनके कानों के फड़फड़ाने की दर हवा के वेग, परिवेश के तापमान तथा बादलों की स्थिति के अनुसार बदलती रहती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वितरण==&lt;br /&gt;
वर्तमान समय में हाथी अपेक्षाकृत छोटे टेपिरनुमा स्तनधारी जंतु के वंशज हैं, जो कम से कम 4.50 करोड़ वर्ष पहले पाए जाते थे : इनके अवशेष मिस्र में मोएरिस झील के पास पाए गए हैं। इसी आधार पर इन्हें मोएरिथेरियम नाम दिया गया। इनके दोनों जबड़ों में दो-दो बड़े कृंतक दांत प्राथमिक गजदंतों के रूप में विकसित हो चुके थे। मोएरिथेरियम की एक प्रशाखा प्रिमिलेफ़स से वृहद परिवार एलिफ़ैंटोइडी का विकास हुआ, जिसके तहत नवीनतम प्रोबोसीडियन परिवार भी आते हैं। ये परिवार होमो सेपियंस (मानव जाति) के प्रादुर्भाव के एकमात्र साक्षी हैं। विकास क्रम में इनके कई रूपों की उत्पत्ति और विलुप्ति हुई। 10 हज़ार साल पहले तक इस परिवार में सित्ग रोएंदार मैमथ (मैमथस प्रिमीजीनियस), इसके निकट संबंधी एशियाई हाथी (एलिफ़ैस मैक्सीमस), और इससे भिन्न अफ़्रीकी हाथी (लॉक्सोडोंटा अफ़्रीकाना) ही बचे थे। लगभग 5,000 साल पहले रोएंदार मैमथ समाप्त हो गए। जलवायु के गर्म होने से इनके विलुप्त होने की प्रक्रिया शुरू हुई, क्योंकि उससे इनका चारा जलमग्न को गया। मानव द्वारा शिकार से भी इनके विलुप्त होने की गति तेज़ हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कई शताब्दियों से भारतीय हाथी, समारोहों और बोझा ढोने के काम के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं। अपने महावत के नियंत्रण में हाथी पेड़ों की कटाई के अपरिहार्य अंग हैं। अफ़्रीकी हाथी का भी इस्तेमाल बोझा ढोने के लिए होता है, लेकि न यह अपेक्षाकृत बहुत व्यापक नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पारिवारिक इकाई==&lt;br /&gt;
दोनों ही प्रजातियों में उसी झुंड में रहने की प्रवृति होती है, जिसमें उनका जन्म हुआ हो। हाथियों के सामाजिक संगठन की आधारभूत इकाई पारिवारिक समूह है, जिसमें दो से आठ हाथी हो सकते हैं। कई समूह मिलकर एक झुंड या कुल का निर्माण करते हैं तथा कई कुलों से किसी क्षेत्र में हाथियों की संख्या का निर्धारण होता है। झुंड मातृवंशीय आधार पर संगठित होता है और सबसे बड़ी व अनुभवी मादा इसके संचालन की देखरेख करती है। लेकिन सबसे मज़बूत बंधन मादा और उसके नवजात बच्चे का होती है। चार वर्ष की आयु में वे झुंड की मादाओं के साथ कम समय व्यतीत करते हैं तथा अपनी उम्र के या अपने से बड़े नरों के साथ अस्थायी रूप से सपर्क स्थापित करते हैं। एशियाई नर हाथियों के सबसे बड़े झुंड में सात सदस्य होते हैं। नर 14 से 15 वर्ष की आयु में यौन परिपक्वता हासिल कर लेते हैं और  मादाएं 15 या 16 वर्ष की आयु में पहले बच्चे को जन्म देती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयस्क नर तब तक किसी झुंड से संबद्ध नहीं होता है, जब तक झुंड में मैथुन के लिए तैयार कोई हथिनी मौजूद न हो। दिखावटी संघर्ष और अन्य सामान्य मुक़ाबलों से नर एक-दूसरे की शक्ति का अनुमान लगाते हैं, इसलिए मादाओं के लिए गंभीर संघर्ष शायद ही कभी होते हैं। 20 वर्ष की अवस्था में नर के शरीर का पूर्ण विकास हो जाता है। परिपक्व हाथी हर साल एक बार मद की स्थिति में आता है, जिसके दौरान उसकी आंखों के पीछे स्थित ग्रंथियों से स्राव होता है। वे आक्रामक हो जाते हैं और मादाओं के साथ रहने लगते हैं, जिसके बाद सहावास होता है। मद की तुलना अन्य खुरदार पशुओं के मैथुन काल से की जा सकती है। नर हाथी कभी भी सहवास कर सकते हैं, लेकिन मदकाल में उनकी यौन उत्तेजना बढ जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हथिनियों में गर्भावस्था 18 से 22 महीने तक की होती है। अंतिम चरण को छोड़कर अन्य समय में गर्भ का बाहर से पता नहीं चलता है। गर्भावधि के अंत में स्तनों में सूजन आ जाती है, थन फूल जाते है और उनसे पानी जैसे द्रव का रिसाव भी हो सकता है। प्रसव पीड़ा कम समय से लेकर कई घंटों की की हो सकती है, लेकिन प्रसव लगभग पांच मिनट में ही हो जाता है। मादा आमतौर पर प्रसव के समय निकलने वाले पदार्थों को खा जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====बच्चों का जन्म====&lt;br /&gt;
बच्चों का जन्म साल के किसी भी मौसम में हो सकता है, लेकिन अधिकांश बच्चे वर्षा ॠतु के अंतिम दिनों में पैदा होते हैं। आमतौर पर एक ही बच्चा जन्म लेता है और कभी-कभार ही जुड़वां या तीन बच्चों का जन्म होता है। अनुकूल पर्यावास में दो बच्चों के बीच का अंतर 2.5-4 वर्ष होता है। कम अनुकूल क्षेत्रों में यह अंतराल 5 से 8 वर्ष तक का हो सकता है। नवजात का वज़न 100 किग्रा (80 से 110 किग्रा तक) और कंधे तक ऊंचाई 75 से 90 सेमी होती है। वयस्कों के मुक़ाबले बच्चों के शरीर पर काफ़ी बाल होते हैं। शिशु प्रायः माता की सहायता से सीधे थन पर मुंह लगाकर (सूंड के ज़रिये नहीं) दूध पीते हैं, और अपनी मां या अन्य दुग्धपान करा सकने वाली मादाओं का दूध पीते हैं। डेढ महीने से बच्चे ठोस आहार लेना शुरू कर देते हैं और वे वयस्कों से उचित भोजन के बारे में सीखते हैं। प्रायः बच्चे अपनी मां की लीद भी खा लेते हैं, जिससे सेल्युलोज़ पचाने में सहायक सहजीवी बैक्टीरिया उनके जठरांत्र में पहुंच जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
हाथियों की मृत्यु छोटी अवस्था में अन्य पशुओं द्वारा उन्हें मारकर खाने, रोग और परजीवी, दुर्घटनाओं, शूखा, तनाव, शिकार, वृद्धावस्था और आपसी संघर्ष के कारण होती है। जब हाथी की छह चर्वणक दंतावलियों में से अंतिम दंतावली भी घिसं जाती है, तो वह भूख से मर जाता है। ऐसा आमतौर पर 50 वर्ष (जीवन भर सेलखड़ी और घास के पौष्टिक आहार के बाद) से 65 वर्ष (कई प्रकार की रसदार वनस्पतियों के आहार के बाद) के बीच होते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झुंड तथा नरों का गृहक्षेत्र 60 से 500 वर्ग किमी तक होता है, इसलिए इनके संरक्षण के सफल उपाय के लिए विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और पर्याप्त स्वच्छ जल वाले विशाम क्षेत्र की आवश्यकता होती है। हाथियों के पर्यावास के अंदर और उसके किनारे पर मानव आबादी के फलस्वरूप हाथी और मनुष्यों में संघर्ष से हाथी व मनुष्य, दोनों की ही जानों का नुक़सान होता है। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 300 लोग हाथियों द्वारा मारे जाते हैं और 200 हाथी अवैध शिकार, फ़सल रक्षा और दुर्घटनाओं के कारण मरते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाथी अपने पर्यावास के विनाश और मनुष्यों द्वारा शोषण के कारण गहरे संकट में है। भारतीय हाथी को विलुप्तप्राय प्रजाति माना गया है और अफ़्रीकी हाथी संकटग्रस्त वर्ग में है। अफ़्रीकी हाथी को प्रमुख ख़तरा हाथीदांत के व्यापार के कारण होने वाले अवैध शिकार से है। चूंकि मादा एशियाई हाथीके गजदंत नहीं होते और सिर्फ़ मांस के लिए शिकार आमतौर पर नहीं होता, इसलिए वे सुरक्षित हैं। लेकिन हाथीदांत के लिए नर एशियाई हाथियों के शिकार के कारण दक्षिण भारत के कई इलाकों में वयस्कों का लैंगिक अनुपात बिगड़ गया है। कुछ इलाक़ों में गजदंत वाले नर की अनुपस्थिति में गजदंतहीन नर (जिसे मखना कहा जाता है) प्रजनन कर सकता है। लेकिन कुछ इलाक़ों में बहुत कम गजदांतहीन नर हैं, इसलिए अंततः स्थिति यह है कि सभी मादाओं के साथ सहवास के लिए किसी भी प्रकार के नरों की संख्या काफ़ी नहीं है। 1999 में दक्षिण भारत के सबसे अधिक अवैध शिकार प्रभावित पेरियार व्याघ्र अभयारण्य में यह लिंग अनुपात 100 मादाओं पर एक नर का था। दूसरी तरफ़ हिमालय के निचले क्षेत्रों के राजाजी कॉर्बेट अभयारण्य में यह अनुपात 2.5 मादाओं पर एक हाथी का है और वहां 90 प्रतिशत से अधिक वयस्क मादाओं के साथ 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे थे। भारत सरकार द्वारा 1992 में शुरू की गई हाथी परियोजना उनके पर्यावास विखंडन, पर्यावास क्षरण, शिकार-चोरी और हाथी-मानव संघर्ष जैसे समस्याओं को दूर करने का एक प्रयास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वन्यजीव अभयारण्यों में हाथियों की संख्या आवश्यकता से अधिक भी हो सकती है, जिससे उनके पर्यावास को और नुक़सान हो सकता है। इसलिए सीमित संख्या में उन्हें मार डालने की भी ज़रूरत होती है। संरक्षण के उपायों में अवैध शिकारियों से सुरक्षा और प्रमुख प्रवासी मार्ग की रक्षा के लिए पगडंडियों समेत बड़े अभयारण्यों की स्थापना भी शामिल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हाथी के अन्य संदर्भ==&lt;br /&gt;
====गुलाबी हाथी====&lt;br /&gt;
अभी तक आपने  काले और सफेद हाथी के बारे में ही सुना होगा, पर कुछ दिनों पहले एक फोटोग्राफर ने अफ्रीका के जंगल में गुलाबी हाथी के बच्चे को कैद किया है। बोट्स्वाना के जंगल में देखे गए इस हाथी के बचने को लेकर विशेषज्ञों को काफी आशंकाएं हैं। उनका मानना है कि यह एल्बिनो नस्ल का हाथी रहा होगा, जिसके बचने की संभावना काफी कम है। उनका मानना है कि अफ्रीका के जंगलों में चिलचिलाती सूरज की किरणों की वजह से उसे अंधापन और चमड़े की बीमारी हो सकती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बीबीसी वाइल्ड लाइफ प्रोग्राम के लिए फिल्म की शूटिंग कर रहे माइक होल्डिंग ने ओकावेंगो नदी के पास 80 हाथियों के समूह में एक गुलाबी रंग के हाथी बच्चे को जाते देखा और उन्होंने इस दृश्य को कैमरे में कैद करने में तनिक भी देरी नहीं की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====हिंसक हाथी====&lt;br /&gt;
यदि ख़बरों पर विश्वास किया जाए तो पिछले दो दशकों के दौरान हाथियों ने केवल छत्तीसगढ़ में 120 से ज़्यादा मनुष्यों की जान ली है। आंकड़ों की यह सच्चाई बताती है कि विकास के नाम पर जंगलों के कटने और वनस्पतियों के अभाव के कारण पर्यावरण को कितना नुक़सान हो रहा है। अपने ठिकानों पर क़ब्ज़ा होते देखकर जानवर शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसी आपाधापी में वे हिंसक भी होते जा रहे हैं। राज्य सरकारें केवल मुआवज़ा वितरित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती हैं, जबकि समस्या का हल केवल पर्यावरण एवं वन संरक्षण के ज़रिए ही संभव है। ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीक में लगातार समृद्ध हो रहे मानव समाज ने वनों और प्राकृतिक पर्यावरण से जिस प्रकार छेड़छाड़ की है, उससे अब वन्य प्राणियों में अपने अस्तित्व के लिए जंग लड़ने की भावना पैदा हो गई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आए दिन वन्य प्राणियों के गांवों एवं शहरों में प्रवेश, खेती-पालतू पशुओं को नुक़सान पहुंचाने और मनुष्यों पर घातक हमला करने की घटनाएं मध्य प्रदेश में भी बढ़ रही हैं। मनुष्य ने वनों पर क़ब्ज़ा कर लिया है। इसलिए वन्य प्राणियों के सामने सुरक्षित निवास और भोजन की समस्या पैदा हो गई है। पेट की आग बुझाने के लिए वे मौक़ा पाते ही गांवों और शहरों की तऱफ दौड़ते हैं तथा मनचाहा भोजन छीन लेते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरगुजा ज़िले में 2000 से सितंबर 2009 तक हाथियों के हमलों में 20 लोग मारे गए, जिनके परिवारजनों को 17 लाख 90 हज़ार रुपये का मुआवज़ा दिया गया. 19 घायलों को 27000 रुपये और फ़सल-मकान उजाड़ने के 8263 मामलों में सात करोड़ 13 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया गया. मुआवज़ा वितरण, मनुष्यों के मारे जाने और घायल होने के आंकड़े इस अंचल में हाथियों एवं मनुष्यों के बीच चल रही जंग के सबूत हैं. इसके बावजूद सरकार हाथियों के लिए सुरक्षित निवास और आरक्षित वन क्षेत्र देने में आनाकानी कर रही है. जब सरकार मान चुकी है कि छत्तीसगढ़ में हाथियों की रक्षा के लिए एक अभयारण्य और एक सुरक्षित हरा-भरा वनक्षेत्र होना चाहिए, तो फिर हाथी अभयारण्य अभी तक अस्तित्व में क्यों नहीं लाया जा सका?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:स्तनधारी जीव]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
	</entry>
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		<title>मुग़ल काल</title>
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		<updated>2010-06-15T08:26:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: /* मुग़ल और अफ़ग़ान */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Copyright}}&lt;br /&gt;
{{मुग़ल काल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{incomplete}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==मुग़ल और अफ़ग़ान== &lt;br /&gt;
1525-1556&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पन्द्रहवीं शताब्दी में मध्य और पश्चिम एशिया में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। चौदहवीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य के विघटन के पश्चात [[तैमूर लंग|तैमूर]] ने ईरान और तूरान को फिर से एक शासन के अंतर्गत संगठित किया। तैमूर का साम्राज्य वोलगा नदी के निचले हिस्से से [[सिन्धु नदी]] तक फैला हुआ था और उसमें [[एशिया]] का माइनर (आधुनिक तुर्की), [[ईरान]], ट्रांस-आक्सियाना, [[अफ़ग़ानिस्तान]] और [[अखंडित पंजाब|पंजाब]] का एक भाग था। 1404 में तैमूर की मृत्यु हो गई। लेकिन उसके पोते शाहरूख मिर्ज़ा ने साम्राज्य का अधिकांश भाग संगठित रखा। उसके समय में [[समरकन्द]] और [[हिरात]] पश्चिम एशिया के सांस्कृतिक केन्द्र बन गए। प्रत्येक समरकन्द के शासक का इस्लामी दुनिया में काफ़ी सम्मान था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तैमूर== &lt;br /&gt;
पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में देशों का सम्मान तेज़ी से कम हुआ। इसका कारण तैमूर के साम्राज्य को विभाजित करने की परम्परा थी। अनेक तैमूर रियासतें, जो इस प्रक्रिया में बनी, आपस में लड़ती-झगड़ती रहीं। इससे नये तत्वों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिला। उत्तर से एक मंगोल जाति उज़बेक ने ट्रांस-आक्सीयाना में अपने कदम बढ़ाये। उज़बेकों ने इस्लाम अपना लिया था। लेकिन तैमूरी उन्हें असंस्कृत बर्बर ही समझते थे। और पश्चिम की ओर ईरान में सफ़वीं वंश का उदय हुआ। सफ़वी सन्तों की परम्परा में पनपे थे। जो स्वयं को पैग़म्बर के वंशज मानते थे। वे मुसलमानों के शिया मत का समर्थन करते थे और उन्हें परेशान करते थे जो [[शिया]] सिद्धांतों को अस्वीकार करते थे। दूसरी ओर [[उज़बेक]] [[सुन्नी]] थे। इसलिए उन दोनों तत्वों के बीच संघर्ष साम्प्रदायिक मतभेद के कारण और भी बढ़ गया। ईरान के भी पश्चिम में आटोमन तुर्कों की शक्ति उभर रही थी। जो पूर्वी यूरोप तथा इराक और ईरान पर अधिपत्य जमाना चाहते थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सोलहवीं शताब्दी में एशिया में तीन बड़ी साम्राज्य शक्तियों के बीच संघर्ष की भूमिका तैयार हो गई। &lt;br /&gt;
==बाबर==&lt;br /&gt;
1494 में ट्रांस-आक्सीयाना की एक छोटी सी रियासत फ़रगाना का बाबर उत्तराधिकारी बना। उज़बेक ख़तरे से बेख़बर होकर तैमूर राजकुमार आपस में लड़ रहे थे। [[बाबर]] ने भी अपने चाचा से [[समरकन्द]] छीनना चाहा। उसने दो बार उस शहर को फ़तह किया, लेकिन दोनों ही बार उसे जल्दी ही छोड़ना पड़ा। दूसरी बार उज़बेक शासक शैबानी ख़ान को समरकन्द से बाबर को खदेड़ने के लिए आमंत्रित किया गया था। उसने बाबर को हराकर समरकन्दर पर अपना झंडा फहरा दिया। उसके बाद जल्दी ही उसने उस क्षेत्र में तैमूर साम्राज्य के भागों को भी जीत लिया। इससे बाबर को [[क़ाबुल]] की ओर बढ़ना पड़ा और उसने 1504 में उस पर अधिकार कर लिया। उसके बाद चौदह वर्ष तक वह इस अवसर की तलाश में रहा कि फिर उज़बेकों को हराकर अपनी मातृभूमि पर पुनः अधिकार कर सके। उसने अपने चाचा, हिरात के शासक को अपनी ओर मिलाना चाहा, लेकिन इस कार्य में वह सफल नहीं हुआ। शैबानी ख़ान ने अंततः हिरात पर भी अधिकार कर लिया। इससे सफ़वीयों से उसका सीधा संघर्ष उत्पन्न हो गया। क्योंकि वे भी हिरात और उसके आस-पास के क्षेत्र को अपना कहते थे। इस प्रदेश को तत्कालीन लेखकों ने ख़ुरासान कहा है। 1510 की प्रसिद्ध लड़ाई में ईरान के शाह इस्माइल ने शैबानी को हराकर मार डाला। इसी समय बाबर ने समरकन्द जीतने का एक प्रयत्न और किया। इस बार उसने ईरानी सेना की सहायता ली। वह समरकन्द पहुंच गया। लेकिन जल्दी ही ईरानी सेनापतियों के व्यवहार के कारण रोष से भर गया। वे उसे ईरानी साम्राज्य का एक गवर्नर ही मानते थे। स्वतंत्र शासक नहीं। इसी बीच उज़बेक भी अपनी हार से उभर गये। बाबर को एक बार फिर समरकन्द से खदेड़ दिया गया और उसे क़ाबुल लौटना पड़ा। स्वयं शाह ईरान इस्माइल को भी आटोहान-साम्राज्य के साथ हुई प्रसिद्ध लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार उज़बेक ट्रांस-आक्सीयाना के निर्विरोध स्वामी हो गए। &lt;br /&gt;
इन घटनाऔं के कारण ही अन्ततः बाबर ने भारत की ओर रूख किया। &lt;br /&gt;
==दिल्ली विजय==&lt;br /&gt;
बाबर ने लिखा है कि क़ाबुल जीतने (1504) से लेकर पानीपत की लड़ाई तक उसने हिन्दुस्तान जीतने का विचार कभी नहीं त्यागा। लेकिन उसे भारत विजय के लिए कभी सही अवसर नहीं मिला था। &lt;br /&gt;
&amp;quot;कभी अपने बेगों के भय के कारण, कभी मेरे और भाइयों के बीच मतभेद के कारण।&amp;quot; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मध्य एशिया के कई अन्य आक्रमणकारियों की भांति बाबर भी भारत की अपार धन-राशि के कारण इसकी ओर आकर्षित हुआ था। भारत सोने की क़ान था। बाबर का पूर्वज तैमूर यहां से अपार धन-दौलत और बड़ी संख्या में कुशल शिल्पी ही नहीं ले गया था, जिन्होंने बाद में उसके एशिया साम्राज्य को सुदृढ़ करने और उसकी राजधानी को सुन्दर बनाने में योगदान दिया, बल्कि पंजाब के एक भाग को अपने कब्जे में कर लिया था। ये भाग अनेक पीढ़ियों तक तैमूर के वंशजों के अधीन रहे थे। जब बाबर ने अफ़ग़ानिस्तान पर विजय प्राप्त की तो उसे लगा कि इन दोनों पर भी उसका कानूनी अधिकार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क़ाबुल की सीमित आय भी पंजाब परगना को विजित करने का एक कारण थी। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;उसका (बाबर) राज्य बदखशां, [[कंधार]] और काबुल पर था। जिनसे सेना की अनिवार्यताएं पूरी करने के लिए भी आय नहीं होती थी। वास्तव में कुछ सीमा प्रान्तों पर सेना बनाए रखने में और प्रशासन के काम में व्यय आमदनी से ज़्यादा था।&amp;quot;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
सीमित आय साधनों के कारण बाबर अपने बेगों और परिवार वालों के लिए अधिक चीज़ें उपलब्ध नहीं कर सकता था। उसे क़ाबुल पर उज़बेक आक्रमण का भी भय था। वह भारत को बढ़िया शरण-स्थल समझता था। उसकी दृष्टि में उज़बेकों के विरुद्ध अभियानों के लिए भी यह अच्छा स्थल था।&lt;br /&gt;
==लोदी== &lt;br /&gt;
उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीतिक स्थिति ने बाबर को भारत आने का अवसर प्रदान किया। 1517 में [[सिकन्दर लोदी]] की मृत्यु हो गई थी और [[इब्राहिम लोदी]] गद्दी पर बैठा था। एक केन्द्राभिमुखी बड़ा साम्राज्य स्थापित करने के इब्राहिम के प्रयत्नों ने अफ़ग़ानों और राजपूतों दोनों को सावधान कर दिया था। अफ़ग़ान सरदारों में सर्वाधिक शक्तिशाली सरदार दौलत ख़ाँ लोदी था। जो पंजाब का गवर्नर था। पर वास्तव में लगभग स्वतंत्र था। दौलत ख़ाँ ने अपने बेटे को इब्राहिम लोदी के दरबार में उपहार देखकर उसे मनाने का प्रयत्न किया। साथ ही साथ वह भीरा का सीमान्त प्रदेश जीतकर अपनी स्थिति को भी मज़बूत बनाना चाहता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1518-19 में बाबर ने भीरा के शक्तिशाली क़िले को जीत लिया। फिर उसने दौलत ख़ाँ और इब्राहिम लोदी को पत्र और मौखिक संदेश भेजकर यह मांग की कि जो प्रदेश तुर्कों के हैं, वे उसे लौटा दिए जाएं। लेकिन दौलत ख़ाँ ने बाबर के दूत को [[लाहौर]] में अटका लिया। वह न स्वयं उससे मिला और न उसे इब्राहिम लोदी के पास जाने दिया। जब बाबर क़ाबुल लौट गया, तो दौलत ख़ाँ ने भीरा से उसके प्रतिनिधियों को निकाल बाहर किया।&lt;br /&gt;
==कंन्धार में विद्रोह== &lt;br /&gt;
1520-21 में बाबर ने एक बार फिर सिंधु नदी पार की और आसानी से भीरा और [[सियालकोट]] पर क़ब्ज़ा कर लिया। ये भारत के लिए मुग़ल द्वार थे। लाहौर भी पदाक्रांत हो गया। वह सम्भवतः और आगे बढ़ता, लेकिन तभी उसे कंन्धार में विद्रोह का समाचार मिला। वह उल्टे पांव लौट गया और डेढ़ साल के घेरे के बाद कन्धार को जीत लिया। उधर से निश्चिंत होकर बाबर की निगाहें फिर भारत की ओर उठीं। इसी समय के लगभग बाबर के पास दौलत ख़ाँ लोदी के पुत्र दिलावर ख़ाँ के नेतृत्व में दूत पहुंचे। उन्होंने बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया और कहा कि चूंकि इब्राहिम लोदी अत्याचारी है और उसके सरदारों का समर्थन अब उसे प्राप्त नहीं है, इसलिए उसे अपदस्थ करके बाबर राजा बने। इस बात की सम्भावना है कि राणा सांगा का दूत भी इसी समय उसके पास पहुंचा। इन दूतों के पहुंचने पर बाबर को लगा कि यदि हिन्दुस्तान को नहीं, तो सारे पंजाब को जीतने का समय आ गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1525 में जब बाबर [[पेशावर]] में था, उसे ख़बर मिली कि दौलतखां लोदी ने फिर से अपना पाला बदल लिया है। उसने 30,000-40,000 सिपाहियों को इकट्ठा कर लिया था और बाबर की सेनाओं को स्यालकोट से खदेड़ने के बाद लाहौर की ओर बढ़ रहा था। बाबर से सामना होने पर दौलत ख़ाँ लोदी की सेना बिखर गई। दौलत ख़ाँ ने आत्मसमर्पण कर दिया और बाबर ने उसे माफ़ी दे दी। इस प्रकार सिंधु नदी पार करने के तीन सप्ताह के भीतर ही पंजाब पर बाबर का क़ब्ज़ा हो गया।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==पानीपत की लड़ाई ==&lt;br /&gt;
21 अप्रैल, 1526&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ संघर्ष अवश्यम्भावी था। बाबर इसके लिए तैयार था और उसने दिल्ली की ओर बढ़ना शृरू किया। इब्राहिम लोदी ने [[पानीपत]] में एक लाख सैनिकों को और एक हज़ार हाथियों को लेकर बाबर का सामना किया। क्योंकि हिन्दुस्तानी सेनाओं में एक बड़ी संख्या सेवकों की होती थी, इब्राहिम की सेना में लड़ने वाले सिपाही कहीं कम रहे होंगे। बाबर ने सिंधु को जब पार किया था तो उसके साथ 12000 सैनिक थे, परन्तु उसके साथ वे सरदार और सैनिक भी थे जो पंजाब में उसके साथ मिल गये थे। इस प्रकार उसके सिपाहियों की संख्या बहुत अधिक हो गई थी। फिर भी बाबर की सेना संख्या की दृष्टि से कम थी। बाबर ने अपनी सेना के एक अंश को शहर में टिका दिया जहां काफ़ी मकान थे, फिर दूसरे अंश की सुरक्षा उसने खाई खोद कर उस पर पेड़ों की डालियां डाल दी। सामने उसने गाड़ियों की कतार खड़ी करके सुरक्षात्मक दीवार बना ली। इस प्रकार उसने अपनी स्थिति काफ़ी मजबूत कर ली। दो गाड़ियों के बीच उसने ऎसी संरचना बनवायी, जिस पर सिपाही अपनी तोपें रखकर गोले चला सकत थे। बाबर इस विधि को आटोमन (रूमी) विधि कहता था। क्योंकि इसका प्रयोग आटोमनों ने ईरान के शाह इस्माईल के विरुद्ध हुई प्रसिद्ध लड़ाई में किया था। बाबर ने दो अच्छे निशानेबाज़ तोपचियों उस्ताद अली और मुस्तफ़ा की सेवाएं भी प्राप्त कर ली थीं। भारत मे बारूद का प्रयोग धीरे-धीरे होना शुरू हुआ। बाबर कहता है कि इसका प्रयोग सबसे पहले उसने भीरा के क़िले पर आक्रमण के समय किया था। ऎसा अनुमान है कि बारूद से भारतीयों का परिचय तो था, लेकिन प्रयोग बाबर के आक्रमण के साथ ही आरम्भ हुआ। &lt;br /&gt;
==इब्राहिम लोदी की कमज़ोरी==&lt;br /&gt;
बाबर की सुदृढ़ रक्षा-पंक्ति का इब्राहिम लोदी को कोई आभास नहीं था। उसने सोचा कि अन्य मध्य एशियायी लड़ाकों की तरह बाबर भी दौड़-भाग कर युद्ध लड़ेगा और आवश्यकतानुसार तेज़ी से आगे बढ़ेगा या पीछे हटेगा। सात या आठ दिन तक छुट-पुट झड़पों के बाद इब्राहिम लोदी की सेना अन्तिम युद्ध के लिए मैदान में आ गई। बाबर की शक्ति देखकर लोदी के सैनिक हिचके इब्राहिम लोदी अभी अपनी सेना को फिर से संगठित कर ही रहा था कि बाबर की सेना के आगे वाले दोनों अंगों ने चक्कर लगा कर उसकी सेना पर पीछे और आगे से आक्रमण कर दिया। सामने की ओर बाबर के तोपचियों ने अच्छी निशानेबाज़ी की लेकिन बाबर अपनी विजय का अधिकांश श्रेय अपने तीर अन्दाज़ों को देता है। यह आश्चर्य की बात है कि वह इब्राहिम के हाथियों का उल्लेख नहीं के बराबर करता है। यह स्पष्ट है कि इब्राहिम को उनके इस्तेमाल का समय ही नहीं मिला। &lt;br /&gt;
==लोदियों की हार==&lt;br /&gt;
प्रारम्भिक धक्कों के बावजूद इब्राहिम की सेना वीरता से लड़ी। दो या तीन घंटों तक युद्ध होता रहा। इब्राहिम 5000-6000 हज़ार सैनिकों के साथ अन्त तक लड़ता रहा। अनुमान है कि इब्राहिम के अतिरिक्त उसके 15000 से अधिक सैनिक इस लड़ाई में मारे गये। पानीपत की लड़ाई भारतीय इतिहास में एक निर्णायक लड़ाई मानी जाती है। इसमें लोदियों की कमर टूट गई और दिल्ली और आगरा का सारा प्रदेश बाबर के अधीन हो गया। इब्राहिम लोदी द्वारा आगरा में एकत्र ख़ज़ाने से बाबर की आर्थिक कठिनाइयां दूर हो गई। जौनपुर तक का समृद्ध क्षेत्र भी बाबर के सामने खुला था। लेकिन इससे पहले की बाबर इस पर अपना अधिकार सुदृढ़ कर सके उसे दो कड़ी लड़ाइयां लड़नी पड़ी, एक मेवाड़ के विरुद्ध दूसरी पूर्वी अफ़ग़ानों के विरुद्ध।''' इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो पानीपत की लड़ाई राजनीतिक क्षेत्र में इतनी निर्णायक नहीं थी जितनी की समझी जाती है। इसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि इसने उत्तर भारत पर आधिपत्य के लिए संघर्ष का एक नया युग प्रारम्भ किया।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पानीपत की लड़ाई में विजय के बाद बाबर के सामने बहुत सी कठिनाइयाँ  आईं। उसके बहुत से बेग भारत में लम्बे अभियान के लिये तैयार नहीं थे। गर्मी का मौसम आते ही उनके संदेह बढ़ गये। वे अपने घरों से दूर तक अनजाने और शत्रु देश में थे। बाबर कहता है कि भारत के लोगों ने 'अच्छी शत्रुता' निभाई, उन्होंने मुग़ल सेनाओं के आने पर गांव ख़ाली कर दिए। निःसन्देह तैमूर द्वारा नगरों और गांवों की लूटपाट और क़त्लेआम उनकी याद में ताज़ा थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबर यह बात जानता था कि भारतीय साधन ही उसे एक दृढ़ साम्राज्य बनाने में मदद दे सकते हैं और उसके बेगों को भी संतुष्ट कर सकते हैं। &amp;quot;क़ाबुल की ग़रीबी हमारे लिए फिर नहीं&amp;quot; वह अपनी डायरी में लिखता है। इसलिए उसने दृढ़ता से काम लिया, और भारत में रहने की अपनी इच्छा जाहिर कर दी और उन बेगों को छुट्टी दे दी जो क़ाबुल लौटना चाहते थे। इससे उसका रास्ता साफ़ हो गया। लेकिन इससे राणा साँगा से भी उसकी शत्रुता हो गयी, जिसने उससे दो-दो हाथ करने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं।&lt;br /&gt;
==खानवा की लड़ाई==&lt;br /&gt;
पूर्वी राजस्थान और मालवा पर आधिपत्य के लिए [[राणा साँगा]] और इब्राहिम लोदी के बीच बढ़ते संघर्ष का संकेत पहले ही किया जा चुका है। मालवा के महमूद ख़िल्जी को हराने के बाद राणा साँगा प्रभाव [[आगरा]] के निकट एक छोटी-सी नदी पीलिया ख़ार तक धीरे-धीरे बढ़ गया था। सिंधु-गंगा घाटी में बाबर द्वारा साम्राज्य की स्थापना से राणा साँगा को खतरा बढ़ गया। साँगा ने बाबर को भारत से खदेड़ने, कम-से-कम उसे पंजाब तक सीमित रखने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं।&lt;br /&gt;
==राणा साँगा और बाबर== &lt;br /&gt;
बाबर ने राणा साँगा पर संधि तोड़ने का दोष लगाया। वह कहता है कि राणा साँगा ने मुझे हिन्दुस्तान आने का न्योता दिया और इब्राहिम लोदी के ख़िलाफ़ मेरा साथ देने का वायदा किया, लेकिन जब में दिल्ली और आगरा फ़तह कर रहा था, तो उसने पांव भी नहीं हिलाये। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि राणा साँगा ने बाबर के साथ क्या समझौता किया था। हो सकता है कि उसने एक लम्बी लड़ाई और कल्पना की हो और सोचा हो कि तब तक वह स्वयं उन प्रदेशों पर अधिकार कर सकेगा जिन पर उसकी निगाह थी या, शायद उसने यह सोचा हो कि दिल्ली को रौंद कर लोदियों की शक्ति को क्षीण करके बाबर भी तैमूर की भाँति लौट जायेगा। बाबर के भारत में ही रुकने के निर्णय ने परिस्थिति को पूरी तरह से बदल दिया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
इब्राहिम लोदी के छोटे भाई महमूद लोदी सहित अनेक अफ़ग़ानों ने यह सोच कर राणा साँगा का साथ दिया कि अगर वह जीत गया, तो शायद उन्हें दिल्ली की गद्दी वापस मिल जायेगी। मेवात के शासक हसन ख़ाँ मेवाती ने भी राणा साँगा का पक्ष लिया। '''लगभग सभी बड़ी राजपूत रियासतों ने राणा की सेवा में अपनी-अपनी सेनाएँ भेजीं।'''&lt;br /&gt;
==जिहाद का नारा== &lt;br /&gt;
राणा साँगा की प्रसिद्धि और बयाना जैसी बाहरी मुग़ल छावनियों पर उसकी प्रारम्भिक सफलताओं से बाबर के सिपाहियों का मनोबल गिर गया। उनमें फिर से साहस भरने के लिए बाबर ने राणा साँगा के ख़िलाफ़ 'जिहाद' का नारा दिया। लड़ाई से पहले की शाम उसने अपने आप को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए शराब के घड़े उलट दिए और सुराहियाँ फोड़ दी। उसने अपने राज्य में शराब की ख़रीदफ़रोख़्त पर रोक लगा दी और मुसलमानों पर से सीमा कर हटा दिया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
बाबर ने बहुत ध्यान से रणस्थली का चुनाव किया और वह आगरा से चालीस किलोमीटर दूर [[खानवा]] पहुँच गया। पानीपत की तरह ही उसने बाहरी पंक्ति में गाड़ियाँ लगवा कर और उसके साथ खाई खोद कर दुहरी सुरक्षा की पद्धति अपनाई। इन तीन पहियों वाली गाड़ियों की पंक्ति में बीच-बीच में बन्दूक़चियों के आगे बढ़ने और गोलियाँ चलाने के लिए स्थान छोड़ दिया गया। &lt;br /&gt;
==राजस्थान के सबसे बड़े योद्धा साँगा की पराजय==&lt;br /&gt;
खानवा की लड़ाई (1527) में ज़बर्दस्त संघर्ष हुआ। बाबर के अनुसार साँगा की सेना में 200,000 से भी अधिक सैनिक थे। इनमें 10,000 अफ़ग़ान घुड़सवार और इतनी संख्या में हसन ख़ान मेवाती के सिपाही थे। यह संख्या भी, और स्थानों की भाँति बढ़ा-बढ़ा कर कही गई हो सकती है, लेकिन बाबर की सेना निःसन्देह छोटी थी। साँगा ने बाबर की दाहिनी सेना पर ज़बर्दस्त आक्रमण किया और उसे लगभग भेद दिया। लेकिन बाबर के तोपख़ाने ने काफ़ी सैनिक मार गिराये और साँगा को खदेड़ दिया गया। इसी अवसर पर बाबर ने केन्द्र-स्थित सैनिकों से, जो गाड़ियों के पीछे छिपे हुए थे, आक्रमण करने के लिए कहा। ज़जीरों से गाड़ियों से बंधे तोपख़ाने को भी आगे बढ़ाया गया। इस प्रकार साँगा की सेना बीच में घिर गई और बहुत से सैनिक मारे गये। साँगा की पराजय हुई। राणा साँगा बच कर भाग निकला ताकि बाबर के साथ फिर संघर्ष कर सके परन्तु उसके सामन्तों ने ही उसे ज़हर दे दिया जो इस मार्ग को ख़तरनाक और आत्महत्या के समान समझते थे।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इस प्रकार राजस्थान का सबसे बड़ा योद्धा अन्त को प्राप्त हुआ। साँगा की मृत्यु के साथ ही आगरा तक विस्तृत संयुक्त राजस्थान के स्वप्न को बहुत धक्का पहुँचा।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
खानवा की लड़ाई से दिल्ली-आगरा में बाबर की स्थिति सुदृढ़ हो गई। आगरा के पूर्व में [[ग्वालियर]] और [[धौलपुर]] जैसे क़िलों की श्रंखला जीत कर बाबर ने अपनी स्थिति और भी मज़बूत कर ली। उसने हसन ख़ाँ मेवाती से [[अलवर]] का बहुत बड़ा भाग भी छीन लिया। फिर उसने मालवा-स्थित चन्देरी के मेदिनी राय के विरुद्ध अभियान छेड़ा। राजपूत सैनिकों द्वारा रक्त की अंतिम बूँद तक लड़कर जौहर करने के बाद चन्देरी पर बाबर का राज्य हो गया। बाबर को इस क्षेत्र में अपने अभियान को सीमित करना पड़ा क्योंकि उसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में अफ़ग़ानों की हलचल की ख़बर मिली। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:मुग़ल_साम्राज्य]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>मिस्र</title>
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		<updated>2010-06-15T08:23:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{incomplete}}&lt;br /&gt;
मिस्र या ईजिप्ट (Egypt) उत्तर अफ्रीका में स्थित एक देश हैं। मिस्र [[एशिया]] से सिनाई प्रायद्वीप के द्वारा जुड़ा हुआ हैं। मिस्र उत्तर मे भूमध्य सागर, उत्तर पूर्व में गाजा पट्टी और इस्राइल, पूर्व में लाल सागर, पश्चिम में लीबिया एवं दक्षिण में सूडान से घिरा हुआ है। यह लगभग 1,010,000 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिस्र की सभ्यता बहुत प्राचीन है। यहाँ के शासक को फारो नाम से जाना जाता था। ईसाई और इस्लाम काल के पूर्व काल मे इस पदवी का प्रयोग होता था। इसे फारोह भी लिखते हैं। फारो को मिस्र के देवता होरस का पुनर्जन्म माना जाता था। होरस द्यौ (आकाश) का देवता था और इसे सूर्य भी माना जाता था।&lt;br /&gt;
[[Category:विदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>अफ़ग़ानिस्तान</title>
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		<updated>2010-06-15T08:21:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*अफ़ग़ानिस्तान या अफ़ग़ान इस्लामिक गणराज्य जंबूद्वीप ([[एशिया]]) का एक देश है। यह दक्षिणी मध्य एशिया में अवस्थित देश है जो चारों ओर से ज़मीन से घिरा हुआ है। प्रायः इसकी गिनती मध्य एशिया के देशों में होती है पर देश में लगातार चल रहे संघर्षों ने इसे कभी मध्य पूर्व तो कभी दक्षिण एशिया से जोड़ दिया है। इसके पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर पूर्व में [[कश्मीर]] तथा चीन, उत्तर में ताज़िकिस्तान, कज़ाकिस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है।&lt;br /&gt;
*अफ़ग़ानिस्तान का नाम अफ़ग़ान और स्तान से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है अफ़ग़ानों की भूमि। स्तान इस क्षेत्र के कई देशों के नाम में है जैसे- [[पाकिस्तान]], तुर्कमेनिस्तान, कज़ाख़स्तान, हिन्दुस्तान इत्यादि जिसका अर्थ है भूमि या देश। अफ़ग़ान का अर्थ यहाँ के सबसे अधिक वसित नस्ल (पश्तून) को कहते है। &lt;br /&gt;
*अफ़ग़ानिस्तान कई सम्राटों, आक्रमणकारियों तथा विजेताओं की कर्मभूमि रहा है । इनमें [[सिकन्दर]],फ़ारसी शासक दारा प्रथम, तुर्क,मुग़ल शासक [[बाबर]], [[मुहम्मद ग़ोरी|मुहम्मद गौरी]], [[नादिरशाह]] इत्यादि के नाम प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
*अफ़ग़ानिस्तान [[आर्य|आर्यों]] की पुरातन भूमि है। ईसा के 1800 साल पहले आर्यों का आगमन इस क्षेत्र में हुआ। ईसा के 700 साल पहले इसके उत्तरी क्षेत्र मे [[गांधार]] [[महाजनपद]] था जिसके बारे में भारतीय स्रोत [[महाभारत]] तथा अन्य ग्रंथों में वर्णन मिलता है। यह महाभारत काल में गांधार महाजनपद था। [[कौरव|कौरवों]] की माता [[गान्धारी]] और प्रसिद्ध मामा [[शकुनि]] गांधार के ही थे। &lt;br /&gt;
*वेदों में वर्णित [[सोम रस|सोमरस]] का पौधा जिसे सोम कहते हैं अफ़ग़ानिस्तान की पहाड़ियों पर ही पाया जाता है। &lt;br /&gt;
*सिकन्दर के फ़ारस विजय अभियान के तहत अफ़ग़ानिस्तान भी यूनानी साम्राज्य का अंग बन गया। इसके बाद यह [[शक|शकों]] के शासन में आए। हिन्दी-यूनानी,हिन्दी-यूरोपीय, हिन्दी-ईरानी शासकों के यहाँ वर्चस्व को लेकर यहाँ झगड़े भी हुए और उन्होंने यहाँ शासन भी किया। भारतीय [[मौर्य काल|मौर्य]], [[शुंग]], [[कुषाण]] आदि शासकों ने यहाँ शासन किया। &lt;br /&gt;
*मौर्य और कुषाणों ने यहाँ [[बौद्ध|बुद्धधर्म]] का प्रचार, प्रसार किया। काम्बोज, पश्तो और बैक्ट्रिया का शासन यहाँ रहा।&lt;br /&gt;
*शक स्कीथियों के भारतीय अंग थे। ईसापूर्व 230 में मौर्य शासन के तहत अफ़ग़ानिस्तान का संपूर्ण इलाक़ा आ चुका था पर मौर्यों का शासन अधिक दिनों तक नहीं रहा। इसके बाद पार्थियन और फ़िर सासानी शासकों ने फ़ारस में केन्द्रित अपने साम्राज्यों का हिस्सा इसे बना लिया। &lt;br /&gt;
*सासनी वंश [[इस्लाम]] के आगमन से पूर्व का आख़िरी ईरानी वंश था। अरबों ने ख़ोरासान पर सन 707 में अधिकार कर लिया। सामानी वंश, जो फ़ारसी मूल के, पर सुन्नी थे, ने 987 ईस्वी में अपना शासन गज़नवियों को खो दिया जिसके फलस्वरूप लगभग संपूर्ण अफ़ग़ानिस्तान ग़ज़नवियों के हाथों आ गया। &lt;br /&gt;
*ग़ोर के शासकों ने गज़नी पर 1183 में अधिकार कर लिया। मध्यकाल में कई अफ़ग़ान शासकों ने [[दिल्ली]] की सत्ता पर अधिकार किया या करने का प्रयत्न किया जिनमें [[लोदी वंश]] का नाम प्रमुख है। इसके अलावा भी कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने अफ़ग़ानशाहों की मदद से हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया था जिसमें बाबर,नादिरशाह तथा [[अहमदशाह अब्दाली]] शामिल है। अफ़ग़ानिस्तान के कुछ क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के अंग थे। ब्रिटिश सेनाओं ने भी कई बार अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया। अफ़ग़ानिस्तान के प्रमुख नगर हैं - &lt;br /&gt;
#राजधानी काबुल, &lt;br /&gt;
#कांधार.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:विदेशी स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पड़ोसी देश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<title>फ़ारसी भाषा</title>
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		<updated>2010-06-15T08:20:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{incomplete}}&lt;br /&gt;
'''फ़ारसी (فارسی)'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*फ़ारसी एक भाषा है जो [[ईरान]], [[ताज़िकिस्तान]], [[अफ़गानिस्तान]] और [[उज़बेकिस्तान]] में बोली जाती है। &lt;br /&gt;
*यह तीन देशों की राजभाषा है और इसे क़रीब 7.5 करोड़ लोग इस्तेमाल करते हैं। &lt;br /&gt;
*यह हिन्द यूरोपीय भाषाई परिवार, की हिन्द ईरानी (इंडो ईरानियन) शाखा की ईरानी उपशाखा का सदस्य है और इसमें क्रियापद वाक्य के अंत में आता है। &lt;br /&gt;
*फ़ारसी [[संस्कृत]] से क़ाफ़ी मिलती-जुलती है, और [[उर्दू भाषा|उर्दू]] (और [[हिन्दी]]) में इसके कई शब्द प्रयुक्त होते हैं। &lt;br /&gt;
*ये फ़ारसी-अरबी लिपि में लिखी जाती है ।&lt;br /&gt;
*अंग्रेज़ों के आगमन से पहले भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी भाषा का प्रयोग दरबारी कामों तथा लेखन की भाषा के रूप में होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Egypt&amp;diff=33925</id>
		<title>Egypt</title>
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		<updated>2010-06-15T08:19:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Govind: मिस्र को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT[[मिस्र]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Govind</name></author>
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