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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>हर्यक वंश</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Vinay krishan: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''हर्यक वंश''' (544 ई. पू. से 412 ई. पू. तक), इस वंश का सबसे प्रतापी राजा [[बिम्बिसार]] (544 ई. पू. से 493 ई. पू.) था। इस वंश ने [[गिरिव्रज]] को अपनी राजधानी बनाया। बिम्बिसार का उपनाम '''श्रेणिक''' था। हर्यक वंश कुल के लोग [[नागवंश]] की एक उपशाखा थे। इसने [[कौशल]] एवं [[वैशाली]] के राज परिवारों से वैवाहिक सम्बन्ध क़ायम किया। उसकी पहली पत्नी महाकोशला [[प्रसेनजित]] की [[बहन]] थी, जिससे उसे [[काशी]] नगर का राजस्व प्राप्त हुआ। उसकी दूसरी पत्नी [[चेल्लना]] वैशाली के [[लिच्छवी]] प्रमुख चेटक की बहन थी। इसके पश्चात् उसने मद्र देश (कुरु के समीप) की राजकुमारी [[क्षेमा]] के साथ अपना विवाह कर मद्रों का सहयोग और समर्थन प्राप्त किया। [[महाबग्ग]] में उसकी 500 पत्नियों का उल्लेख है। कुशल प्रशासन की आवश्यकता पर सर्वप्रथम बिम्बिसार ने ही ज़ोर दिया था। बौद्ध साहित्य में उसके कुछ पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं। इनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''सब्बन्थक महामात्त''' (सर्वमहापात्र)-यह सामान्य प्रशासन का प्रमुख पदाधिकारी होता था।&lt;br /&gt;
#'''बोहारिक महामात्त''' (व्यवहारिक महामात्र)-यह प्रधान न्यायिक अधिकारी अथवा न्यायाधीश होता था।&lt;br /&gt;
#'''सेनानायक महामात्त'''-यह सेना का प्रधान अधिकारी होता था।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[बिम्बिसार]] स्वयं शासन की समस्याओं में रुचि लेता था। महाबग्ग जातक में कहा गया है कि उसकी राजसभा में 80 हज़ार ग्रामों के प्रतिनिधि भाग लेते थे। वह जैन तथा ब्राह्मण धर्म के प्रति भी सहिष्णु था। जैन ग्रन्थ उसे अपने मत का पोषक मानते हैं। दीर्धनिकाय से पता चलता है कि बिम्बिसार ने चम्पा के प्रसिद्ध ब्राह्मण सोनदण्ड को वहाँ की पूरी आमदनी दान में दे दी थी।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार बिम्बिसार ने क़रीब 32 [[वर्ष]] तक शासन किया। बिम्बिसार महात्मा [[बुद्ध]] का मित्र एवं संरक्षक था। [[विनयपिटक]] से ज्ञात होता है कि [[बुद्ध]] से मिलने के बाद उसने [[बौद्ध धर्म]] ग्रहण कर लिया और बेलुवन नामक उद्यान बुद्ध तथा संघ के निमित्त कर दिया था। अन्तिम समय में [[अजातशत्रु]] ने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या कर दी। बिम्बिसार ने [[राजगृह]] नामक नवीन नगर की स्थापना करवाई थी। बिम्बिसार का [[अवन्ति]] से अच्छा सम्बन्ध था, क्योंकि जब अवन्ति के राजा प्रद्योत बीमार थे, तो बिम्बिसार ने अपने वैद्य [[जीवक]] को भेजा था। बिम्बिसार ने [[अंग जनपद|अंग]] और [[चम्पा |चम्पा]] को जीता और वहाँ पर अपने पुत्र अजातशत्रु को उपराजा बनाया। &lt;br /&gt;
* बिम्बिसार की हत्या इसके पुत्र अजातशत्रु ने 493 ई.पू. कर दि और मगध का राजा बन गया &lt;br /&gt;
* अजातशत्रु का उपनाम कुणिक था इसने लगभग 32 साल तक शासन किया&lt;br /&gt;
* अजातशत्रु जैन धर्म का अनुयायी था&lt;br /&gt;
* अजातशत्रु कि हत्या उसके पुत्रा उदायिन ने 461 ई.पू. मे कर दी&lt;br /&gt;
* हर्यक वंश का अन्तिम राजा उदायिन का पुत्र नागदशक था&lt;br /&gt;
* नागदशक के आमत्य(सेनापति) शिशुनाग ने 412 ई.पू. मे उन्हे ह्टा के शिशुनाग वंंश की स्थापना की।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक 'लुसेन्ट सामान्य अध्ययन') पृष्ठ संख्या-16&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राजवंश]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Vinay krishan</name></author>
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		<title>हर्यक वंश</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Vinay krishan: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''हर्यक वंश''' (544 ई. पू. से 412 ई. पू. तक), इस वंश का सबसे प्रतापी राजा [[बिम्बिसार]] (544 ई. पू. से 493 ई. पू.) था। इस वंश ने [[गिरिव्रज]] को अपनी राजधानी बनाया। बिम्बिसार का उपनाम '''श्रेणिक''' था। हर्यक वंश कुल के लोग [[नागवंश]] की एक उपशाखा थे। इसने [[कौशल]] एवं [[वैशाली]] के राज परिवारों से वैवाहिक सम्बन्ध क़ायम किया। उसकी पहली पत्नी महाकोशला [[प्रसेनजित]] की [[बहन]] थी, जिससे उसे [[काशी]] नगर का राजस्व प्राप्त हुआ। उसकी दूसरी पत्नी [[चेल्लना]] वैशाली के [[लिच्छवी]] प्रमुख चेटक की बहन थी। इसके पश्चात् उसने मद्र देश (कुरु के समीप) की राजकुमारी [[क्षेमा]] के साथ अपना विवाह कर मद्रों का सहयोग और समर्थन प्राप्त किया। [[महाबग्ग]] में उसकी 500 पत्नियों का उल्लेख है। कुशल प्रशासन की आवश्यकता पर सर्वप्रथम बिम्बिसार ने ही ज़ोर दिया था। बौद्ध साहित्य में उसके कुछ पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं। इनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''सब्बन्थक महामात्त''' (सर्वमहापात्र)-यह सामान्य प्रशासन का प्रमुख पदाधिकारी होता था।&lt;br /&gt;
#'''बोहारिक महामात्त''' (व्यवहारिक महामात्र)-यह प्रधान न्यायिक अधिकारी अथवा न्यायाधीश होता था।&lt;br /&gt;
#'''सेनानायक महामात्त'''-यह सेना का प्रधान अधिकारी होता था।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[बिम्बिसार]] स्वयं शासन की समस्याओं में रुचि लेता था। महाबग्ग जातक में कहा गया है कि उसकी राजसभा में 80 हज़ार ग्रामों के प्रतिनिधि भाग लेते थे। वह जैन तथा ब्राह्मण धर्म के प्रति भी सहिष्णु था। जैन ग्रन्थ उसे अपने मत का पोषक मानते हैं। दीर्धनिकाय से पता चलता है कि बिम्बिसार ने चम्पा के प्रसिद्ध ब्राह्मण सोनदण्ड को वहाँ की पूरी आमदनी दान में दे दी थी।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार बिम्बिसार ने क़रीब 32 [[वर्ष]] तक शासन किया। बिम्बिसार महात्मा [[बुद्ध]] का मित्र एवं संरक्षक था। [[विनयपिटक]] से ज्ञात होता है कि [[बुद्ध]] से मिलने के बाद उसने [[बौद्ध धर्म]] ग्रहण कर लिया और बेलुवन नामक उद्यान बुद्ध तथा संघ के निमित्त कर दिया था। अन्तिम समय में [[अजातशत्रु]] ने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या कर दी। बिम्बिसार ने [[राजगृह]] नामक नवीन नगर की स्थापना करवाई थी। बिम्बिसार का [[अवन्ति]] से अच्छा सम्बन्ध था, क्योंकि जब अवन्ति के राजा प्रद्योत बीमार थे, तो बिम्बिसार ने अपने वैद्य [[जीवक]] को भेजा था। बिम्बिसार ने [[अंग जनपद|अंग]] और [[चम्पा |चम्पा]] को जीता और वहाँ पर अपने पुत्र अजातशत्रु को उपराजा बनाया। &lt;br /&gt;
* बिम्बिसार की हत्या इसके पुत्र अजातशत्रु ने 493 ई.पू. कर दि और मगध का राजा बन गया &lt;br /&gt;
* अजातशत्रु का उपनाम कुणिक था इसने लगभग 32 साल तक शासन किया&lt;br /&gt;
* अजातशत्रु जैन धर्म का अनुयायी था&lt;br /&gt;
* अजातशत्रु कि हत्या उसके पुत्रा उदायिन ने 461 ई.पू. मे कर दी&lt;br /&gt;
* हर्यक वंश का अन्तिम राजा उदायिन का पुत्र नागदशक था&lt;br /&gt;
* नाग्दशक के पुत्र शिशुनाग ने 412 ई.पू. मे उन्हे ह्टा के शिशुनाग वंंश की स्थापना की।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक 'लुसेन्ट सामान्य अध्ययन') पृष्ठ संख्या-16&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:इतिहास कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Vinay krishan</name></author>
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		<title>हिमालय</title>
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		<updated>2013-09-07T08:21:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Vinay krishan: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Himalayas-5.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
'''हिमालय''' [[संस्कृत]] के 'हिम' तथा 'आलय' शब्दों से मिलकर बना है, जिसका शब्दार्थ 'बर्फ़ का घर' होता है। हिमालय [[भारत]] की धरोहर है। हिमालय पर्वत की एक चोटी का नाम 'बन्दरपुच्छ' है। यह चोटी [[उत्तराखंड]] के [[टिहरी गढ़वाल ज़िला|टिहरी गढ़वाल ज़िले]] में स्थित है। इसकी ऊँचाई 20,731 फुट है। इसे [[सुमेरु पर्वत|सुमेरु]] भी कहते हैं। हिमालय एक पूरी पर्वत शृंखला है, जो भारतीय उपमहाद्वीप और [[तिब्बत]] को अलग करता है। यह भारतवर्ष का सबसे ऊँचा [[पर्वत]] है, जो उत्तर में देश की लगभग 2500 किलोमीटर लंबी सीमा बनाता है और देश को उत्तर [[एशिया]] से पृथक करता है। [[कश्मीर]] से लेकर [[असम]] तक इसका विस्तार है।&lt;br /&gt;
==भौगोलिक तथ्य==&lt;br /&gt;
हिमालय पर्वतमाला की गणना वैज्ञानिक विश्व की नवीन पर्वत मालाओं से करते हैं। इसका निर्माण सागर तल के उठने से आज से पाँच-छह करोड़ वर्ष पहले हुआ था। हिमालय को अपनी पूरी ऊँचाई प्राप्त करने में 60 से 70 लाख वर्ष लगे। यह अपनी ऊँची चोटियों के लिये प्रसिद्ध है। विश्व का सर्वोच्च शिखर [[माउंट एवरेस्ट]] हिमालय की है। विश्व के 100 सर्वोच्च शिखरों में कई हिमालय की चोटियाँ हैं। अन्य पर्वतों की अपेक्षा यह काफ़ी नया है। हिमालय से सम्बद्ध पहली पर्वत शृंखला [[पीर पंजाल पर्वतश्रेणी]] है। हिमालय के एक भाग का नाम 'कलिंद' है। यहीं से [[यमुना नदी|यमुना]] निकलती है। इसी से यमुना का नाम 'कलिंदजा' और '[[कालिंदी नदी|कालिंदी]]' भी है। दोनों का मतलब 'कलिंद की बेटी' होता है। यह जगह बहुत सुन्दर है, पर यहाँ पहुँचना बहुत कठिन है। अपने उद्गम से आगे कई मील तक विशाल हिमगारों और हिंम मंडित कंदराओं में अप्रकट रूप से बहती हुई तथा पहाड़ी ढलानों पर से अत्यन्त तीव्रता पूर्वक उतरती हुई इसकी धारा यमुनोत्तरी पर्वत 20,731 फीट ऊँचाई से प्रकट होती है। हिमालय पर्वतश्रेणी के अतिरिक्त [[अनाई शिखर]] [[भारत]] की सबसे ऊँची चोटी है।&lt;br /&gt;
==हिमालय के पौराणिक संदर्भ==&lt;br /&gt;
*[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार हिमालय मैना का पति और [[पार्वती देवी|पार्वती]] का पिता है। [[गंगा नदी|गंगा]] इसकी सबसे बड़ी पुत्री है। भगवान [[शंकर]] का निवास कैलाश यहीं है। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] के अनुसार [[पांडव]] स्वर्गारोहण के लिए यहीं आए थे। [[युधिष्ठर]] देवरथ में बैठकर जब सशरीर स्वर्ग जाने लगे तो उनकी [[इन्द्र]] से भेंट यहीं हुई थी। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-8.jpg|thumb|250px|left|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
==गहन प्रभाव==&lt;br /&gt;
हज़ारों वर्षों तक हिमालय ने दक्षिण एशिया के लोगों पर वैयक्तिक और गहन प्रभाव डाला है, जो उनके साहित्य, राजनीति, अर्थव्यवस्था और पौराणिक कथाओं में भी प्रतिबिंबित होता है। इसकी विस्तृत बर्फ़ीली चोटियाँ लंबे समय से प्राचीन भारत के पर्वतारोही तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती रही हैं, जिन्होंने इस विशाल पर्वत शृंखला का [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] में नामकरण किया। आधुनिक काल में हिमालय विश्व भर के पर्वतारोहियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण और महानतम चुनौती है। &lt;br /&gt;
भारतीय उपमहाद्वीप की उत्तरी सीमा का निर्धारण करने और उत्तर की भूमि के लिए लगभग अगम्य अवरोध बनाने वाली यह पर्वतश्रेणी एक विशाल पर्वत पट्टिका का हिस्सा है जो उत्तरी अफ़्रीका से दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रशांत तट तक लगभग आधी दुनिया में फैली हुई है। हिमालय पर्वतश्रेणी लगभग 2,500 किलोमीटर तक पश्चिम से पूर्व दिशा में [[जम्मू-कश्मीर]] क्षेत्र के [[नंगा पर्वत]] (8,126 मीटर) से तिब्बत में नामचा बरवा (7,756 मीटर) तक निर्बाध रूप से फैली हुई है। पूर्व और पश्चिम के इन दो सुदूर छोरों के बीच दो हिमालयी देश, नेपाल और भूटान, स्थित हैं। हिमालय के पश्चिमोत्तर में [[हिंदुकुश]] और [[कराकोरम पर्वत श्रेणी|कराकोरम पर्वतश्रेणियाँ]] और उत्तर में तिब्बत का ऊँचा पठार है। दक्षिण से उत्तर तक हिमालय की चौड़ाई 201 से 402 किलोमीटर के बीच परिवर्तित होती रहती है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 5,94,400 वर्ग किलोमीटर है। &lt;br /&gt;
==भौगोलिक विशेषताएँ== &lt;br /&gt;
हिमालय की प्रमुख लाक्षणिक विशिष्टता इसकी बुलंद ऊँचाइयाँ, खड़े किनारों वाले नुकीले शिखर, घाटियाँ, पर्वतीय हिमनदियाँ, जो अक्सर विशाल होती हैं, अपरदन द्वारा गहरी कटी हुई स्थलाकृति, अथाह प्रतीत होती नदी घाटियाँ, जटिल भौगर्भिक संरचना और ऊँची पट्टियों (या क्षेत्रों) की शृंखला है, जिनमें विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ, जंतुजीवन और जलवायु हैं। दक्षिण की ओर से देखने पर हिमालय विशालकाय अर्द्ध चंद्र प्रतीत होता है, जिसका मूल अक्ष [[हिमरेखा]] से ऊपर स्थित है, जहाँ [[हिमक्षेत्र]], पर्वतीय हिमनदियाँ और हिमस्खलन निचली घाटियों की उन हिमनदियों का हिस्सा बनते हैं, जो हिमालय से निकलने वाली अधिकांश नदियों के स्रोत हैं। लेकिन हिमालय का बड़ा हिस्सा हिमरेखा के नीचे स्थित है। इस श्रेणी का निर्माण करने वाली पर्वत-निर्माण प्रक्रिया अब भी क्रियाशील है, जिसमें धाराओं के भारी अपरदन और विशाल भूस्खलन जैसी गतिविधियाँ भी शामिल हैं। हिमालय पर्वतश्रेणी को चार समानांतर, लंबवत, भिन्न चौड़ाई वाली पर्वत-पट्टिकाओं में विभक्त किया जा सकता है, जिनमें से प्रत्येक की अपनी भौगोलिक विशिष्टता तथा अपना अलग भूगर्भशास्त्रीय इतिहास है। इन्हें दक्षिण से उत्तर की ओर इस प्रकार बाँटा गया है- बाहरी या उप-हिमालय; लघु या निम्न हिमालय; उच्च या वृहत हिमालय; और टेथिस या तिब्बती हिमालय, इससे आगे उत्तर में तिब्बत में परा-हिमालय है, जो कुछ सुदूर उत्तरी हिमालयी श्रेणियों का पूर्व दिशा में विस्तार है। पश्चिम से पूर्व की ओर हिमालय को मोटे तौर पर तीन पर्वतीय क्षेत्रों में बाँटा गया है-&lt;br /&gt;
*पश्चिमी &lt;br /&gt;
*मध्यवर्ती &lt;br /&gt;
*पूर्वी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भौगर्भिक इतिहास== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-2.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
हिमालय पर्वतश्रेणी आल्प्स से दक्षिण-पूर्व एशिया के पहाड़ों तक फैले यूरेशियाई पर्वतश्रेणी के विस्तार का हिस्सा है, जिसका निर्माण पिछले 6.5 करोड़ वर्षों में सार्वभौमिक प्लेट-विवर्तनिक शाक्तियों के कारण पृथ्वी की ऊपरी सतह पर विशालकाय उभारों के बनने से हुआ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगभग 18 करोड़ वर्ष पहले, ज्यूरैसिक काल में, जब टेथिस सागर नामक एक गहरी भू- अभिनति यूरेशिया के समूचे दक्षिणी किनारे को घेरे हुए थी, पुराने विशाल महाद्वीप गोंडवाना (गोंडवानालैंड) के विखंडन की प्रक्रिया शुरू हुई। अगले 13 करोड़ वर्षों में इसका एक खंड, भारतीय उपमहाद्वीप का निर्माण करने वाली स्थलमंडलीय प्लेट के रूप में, उत्तर दिशा की ओर यूरेशियाई प्लेट से टकराने के मार्ग की ओर बढ़ा, इस भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट ने धीरे-धीरे अपने और यूरेशियाई प्लेट के बीच स्थित टेथिस खाई को विशालकाय चिमटे की भाँति जकड़ लिया। जैसे-जैसे टेथिस खाई संकरी होती गई, बढ़ते हुए दबाव की शाक्तियों ने इसके समुद्री तलछट में कई विवर्तनिक उभारों, गढ्डों और अंतर्ग्रथित भ्रंशों को जन्म दिया और ग्रेनाइट तथा बैसाल्ट के भंडार इसके गहराइयों से कमज़ोर हो चुके तलछट की ऊपरी सतह पर उभर आए। तृतीय महाकल्प (लगभग पाँच करोड़ वर्ष पहले) के आरंभ में भारत, अंततः यूरेशिया से टकरा गया। भारत, नीचे की ओर टेथिस खाई के नीचे लगातार बढ़ने वाली अक्षनति के साथ अपरूपित हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगले तीन करोड़ वर्षों में टेथिस सागर में भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट के डूबने के कारण इसका समुद्र तल ऊपर की ओर उठ गया तथा इसके कम गहरे हिस्से पानी से ऊपर निकल आए। इससे तिब्बत के पठार की रचना हुई। पठार के दक्षिणी किनारे पर सीमांत पर्वत, आज की पराहिमालय पर्वतश्रेणी, इस क्षेत्र का पहला बड़ा जलविभाजक बना और इतनी ऊँचाई तक उपर उठा कि जलवायवीय अवरोध बन सके। दक्षिणी तीखी ढलानों पर भारी [[वर्षा]] होने के साथ उत्तर दिशा में पुरानी अनुप्रस्थ खाइयों में बढ़ती हुई शाक्ति के साथ प्रमुख दक्षिणवर्ती नदियों का शीर्ष जल की ओर अपरदन  बढ़ता गया और ये पठार पर बहने वाली धाराओं में शामिल हो गईं। इस प्रकार, आज की जल [[अपवाह]] प्रणाली की रूपरेखा तैयार हुई। दक्षिण की ओर अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के पुराने मुहाने प्राचीन सिंधु, गंगा और [[ब्रह्मपुत्र]] नदियों द्वारा बहाकर लाई गई सामग्री से तेज़ी से भर गए। विस्तृत अपरदन और निक्षेपण की प्रक्रिया आज भी जारी है और ये नदियाँ प्रतिदिन भारी मात्रा में सामग्री बहाकर ले जाती हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;'नापे' की रचना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
अंततः लगभग तीन करोड़ वर्ष पहले मध्यनूतन युग (माइओसीन एपॉक) में दोनों प्लेटों के बीच टूटते हुए जुड़ने की प्रक्रिया में तेज़ी से वृद्धि हुई और इसके फलस्वरूप हिमालय पर्वत की निर्माण प्रक्रिया का वास्तविक आरंभ हुआ। भारतीय उपमहाद्वीपीय प्लेट का टेथिस खाई में डूबना जारी रहा और प्राचीन गोंडवाना रूपांतरित चट्टानें दक्षिण में लम्बी क्षैतिज दूरी तक छिलके की तरह निकलकर अपने ही ढेर पर एकत्र होती रहीं और इसा प्रकार 'नापे' की रचना हुई। भारतीय भूमि क्षेत्र पर दक्षिण दिशा में 97 किलोमीटर की दूरी तक नापे की तह बिछती गई। प्रत्येक नए नापे में पहले के नापे के मुक़ाबले ज़्यादा पुरानी गोंडवाना चट्टानें थीं। कालक्रम में ये नापे वलयाकार हो गए और इससे भूतपूर्व खाई, पहले के मुक़ाबले लगभग 402 क्षैतिज किलोमीटर (कुछ विद्वान इसे 805 किलोमीटर बताते हैं) तक सिकुड़ गए। इस बीच, नीचे की ओर बहने वाली नदियाँ भी उत्थान की दर सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में इकठ्टा हो रहा था। इस अवसाद के वज़न से वहाँ गढ्डे बन गए, जिससे और अधिक अवसाद एकत्र होता गया। गंगा के मैदान के नीचे कुछ स्थानों पर जलोढक 7,620 मीटर से भी अधिक है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas.jpg|thumb|250px|left|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
पिछले मात्र 6 लाख वर्षों के दौरान, अत्यंत नूतन युग (प्लाइस्टोसीन एपॉक, 16 लाख से 10 हज़ार वर्ष पहले तक) में ही हिमालय पृथ्वी की सबसे ऊँची पर्वत शृंखला बनी। यदि मध्य नूतन युग और अतिनूतन युग की विशेषता शक्तिशाली क्षैतिज बल थी, तो अत्यंत नूतन युग की ख़ासियत ज़बरदस्त उत्थान शक्ति थी। सुदूर उत्तरी नापे के मध्यवर्ती हिस्से में और इसके ठीक बाद नवीन पट्टिताश्म तथा ग्रेनाइट युक्त रवेदार चट्टानें उभरीं, जिनसे आज दिखाई देने वाले ऊँचे शिखरों का निर्माण हुआ। माउंट एवरेस्ट जैसी कुछ चोटियों पर रवेदार चट्टानों ने प्राचीन जीवाश्मों से युक्त उत्तर दिशा के टेथिस अवसाद को शिखर पर जमा कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;जलवायवीय अवरोध&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
एक बार विशाल हिमालय जलवायवीय अवरोध बन गया, तो उत्तर में स्थित सीमांत पर्वत वर्षा से वंचित हो गए तथा तिब्बत के पठार की तरह सूख गए। इसके विपरित नम दक्षिणी कगारों पर नदियाँ इतनी अपरदनकारी शक्तियों के साथ प्रकट हुईं कि उन्होंने शीर्ष रेखा को धीरे-धीरे उत्तर दिशा में ढकेल दिया। साथ ही हिमालय से फूटने वाली विशाल अनुप्रस्थ नदियों ने इन विशाल नदियों के अलावा अन्य सभी को उनकी निचली धाराओं में परिवर्तन के लिए बाध्य किया, क्योंकि जैसे-जैसे उत्तरी शिखर ऊपर उठ रहा था, वैसे ही विशाल नापे का दक्षिणी सिरा भी उठ रहा था। इन शक्तियों तथा वलयों से शिवालिक श्रेणी का निर्माण हुआ तथा निम्न हिमालय क्षेत्र में संवलित होकर मध्यवर्ती क्षेत्र की उत्पत्ति हुई। इस दौरान दक्षिण की ओर बहाव में अवरोध आ जाने से अधिकांश छोटी नदियाँ पूर्व या पश्चिम में मध्यवर्ती क्षेत्र के संरचनात्मक तौर पर कमज़ोर हिस्सों के ज़रिये नए दक्षिणी अवरोध को तोड़ने या किसी बड़ी धारा में मिलने तक बहती रहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कश्मीर घाटी और नेपाल की काठमांडू घाटी जैसी कुछ घाटियों में अस्थाई रूप से झीलों का निर्माण हुआ, जिनमें अत्यंत नूतन युग (प्लाइस्टोसीन) का निक्षेप एकत्र हो गया। लगभग 2 लाख साल पहले सूखने के बाद काठमांडू घाटी कम से कम 198 मीटर तक ऊपर उठी है, जो लघु हिमालय क्षेत्र में स्थानीय उत्थान का सूचक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भू-आकृति विज्ञान== &lt;br /&gt;
बाह्य हिमालय में समतल भूमि वाली संरचनात्मक घाटियाँ और हिमालय पर्वतश्रेणी की दक्षिणी सीमा पर स्थित शिवालिक भारत पर स्थित [[शिवालिक पहाड़ियाँ]] हैं। पूर्व के कुछ छोटे दर्रों को छोड़कर शिवालिक भारत के हिमाचल प्रदेश में अधिकतर 110 किलोमीटर की चौड़ाई के साथ हिमालय की पूरी लंबाई तक फैला हुआ है। आमतौर पर 274 मीटर की समोच्च रेखा इसकी दक्षिणी सीमा निर्धारित करती है। उत्तर भारत में इसकी ऊँचाई 762 मीटर तक है। मुख्य शिवालिक श्रेणी का दक्षिणी हिस्सा भारतीय मैदानों की ओर तीखी ढलान वाला है और उत्तर की ओर समतल भूमि वाले बेसिन, जिन्हें दून कहा जाता है की ढाल कम तीखी है। इनमें से सबसे विख्यात उत्तरांचल का पर्वतीय क्षेत्र [[देहरादून]] है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;लघु हिमालय&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{Main|लघु हिमालय}}&lt;br /&gt;
*लघु हिमालय को आंतरिक हिमालय, निम्न हिमालय या मध्य हिमालय भी कहलाता है। &lt;br /&gt;
*हिमालय पर्वत शृंखला का मध्यवर्ती भाग, दक्षिण-पूर्वी दिशा में उत्तरी [[पाकिस्तान]], उत्तर भारत, [[नेपाल]], [[सिक्किम]] (भारत) और [[भूटान]] तक विस्तृत है। &lt;br /&gt;
*यह शृंखला वृहद (उत्तर) और [[शिवालिक पहाड़ियाँ|शिवालिक]] या बाह (दक्षिण) हिमालय शृंखलाओं के बीच स्थित है। &lt;br /&gt;
*इसकी औरत ऊँचाई 3,700 से 4,500 मीटर तक है। इसमें [[पंजाब]], [[कुमाऊँ]], [[नेपाल]] और असम के हिमालय क्षेत्र शामिल हैं। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;नाग टिब्बा&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-1.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
इन तीन श्रेणियों में सबसे पूर्व में नाग टिब्बा का पूर्वी सिरा नेपाल में लगभग 8,169 मीटर ऊँचा है और यह गंगा व यमुना नदियों के बीच उत्तराखंड में जलविभाजक क्षेत्र का निर्माण करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;संरचनात्मक बेसिन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
पश्चिम में कश्मीर की ख़ूबसूरत घाटी है, जो एक संरचनात्मक बेसिन है (एक वलयाकार बेसिन, जिसमें चट्टानी परत केंद्रीय बिंदु की ओर झुकी हुई है) और लघु हिमालय के एक महत्त्वपूर्ण खंड का निर्माण करती है। यह दक्षिण-पूर्व से पूर्वोत्तर की ओर लगभग 160 किलोमीटर तक फैली हुई है और इसकी चौड़ाई 80 किलोमीटर तक है। इसकी औसत ऊँचाई 1,554 मीटर है। इस बेसिन से होकर तिर्यक रूप से सर्पाकार [[झेलम नदी]] बहती है जो जम्मू-कश्मीर की विशाल मीठे पानी की [[वुलर झील]] से होकर बहती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;उच्च हिमालय श्रेणी&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
समूचे पर्वतीय क्षेत्र की रीढ़ उच्च हिमालय श्रेणी है, जो सतत हिमरेखा से ऊपर तक उठी हुई हैं। यह पर्वतश्रेणी नेपाल में अपनी अधिकतम ऊँचाई तक पहुँचती है, जहाँ विश्व की 14 सबसे ऊँची चोटियों में से 9 स्थित हैं। इनमें से प्रत्येक की ऊँचाई 7,925 मीटर से अधिक है। पश्चिम से पूर्व की ओर इनके नाम हैं। धौलागिरि-1, अन्नपूर्णा-1, मनासलू-1, चो यू, ग्याचुंग कांग-1, माउंट एवरेस्ट, ल्होत्से, मकालू-1 और कंचनजंगा-1। आगे पूर्व में भारत का हिस्सा बन चुके प्राचीर हिमालयी राज्य सिक्किम में प्रवेश करते समय यह श्रेणी दक्षिण-पूर्वी दिशा से पूर्व दिशा अपना लेती है। इसके बाद यह अगले 418.34 किलोमीटर तक भूटान और [[अरुणाचल प्रदेश]] के पूर्वी हिस्से में कांग्टो शिखर (7,090 मीटर) तक यह पूर्व दिशा में बढ़ती है और अंतत: पूर्वोत्तर में मुड़कर नामचा बरवा में समाप्त हो जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उच्च हिमालय और इसके उत्तर की श्रेणियों, पठारों तथा बेसिनों के बीच कोई स्पष्ट सीमारेखा नहीं है और इन्हें आमतौर पर टेथिस हिमालय तथा सुदूर उत्तर में तिब्बत के रूप में समूहबद्ध किया जाता है। कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में टेथिस सबसे चौड़े हैं, जिनसे स्पीति बेसिन और ज़ास्कर पर्वतों का निर्माण होता है। इसके सबसे ऊँचे शिखर दक्षिण-पूर्व दिशा में सतलुज नदी के उत्तर में शिपकी दर्रे के सामने स्थित लियो पार्गियाल 6,791 मीटर और शिल्ला 7,026 मीटर हैं।&lt;br /&gt;
==अपवाह==&lt;br /&gt;
हिमालय के अपवाह में 19 प्रमुख नदियाँ हैं। जिनमें ब्रह्मापुत्र व सिंधु सबसे बड़ी है, दोनों में से प्रत्येक का पर्वतों में 2,59,000 वर्ग किलोमीटर विस्तृत जलसंग्राहक बेसिन है। अन्य नदियों में से पाँच, [[झेलम नदी|झेलम]], [[चिनाव नदी|चेनाब]], [[रावी नदी|रावी]], [[व्यास नदी|व्यास]], और [[सतलुज नदी|सतलुज]] सिंधु तंत्र की नदियाँ हैं। जिनका कुल जलग्रहण क्षेत्र लगभग 1,32,090 वर्ग किलोमीटर है। नौ नदियाँ, [[गंगा नदी|गंगा]], [[यमुना नदी|यमुना]], [[रामगंगा नदी|रामगंगा ]], [[काली नदी|काली]], [[करनाली नदी|करनाली]], [[राप्ती नदी|राप्ती]], [[गंडक नदी|गंडक]], [[बागमती नदी|बागमती]] व [[कोसी नदी|कोसी]], गंगा तंत्र की हैं, जिनका जलग्रहण क्षेत्र 2,17,560 वर्ग किलोमीटर है और [[तीन नदी|तीन]], [[तिस्ता नदी|तिस्ता]], [[रैदक नदी|रैदक]] व [[मनास नदी|मनास]], ब्रह्मपुत्र तंत्र की हैं जो 1,83,890 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपवाहित करती हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-6.jpg|thumb|250px|left|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
प्रमुख हिमालयी नदियाँ पर्वतश्रेणी के उत्तर से निकलती हैं और गहरे महाखड्डों से होती हुई बहती हैं, जो आमतौर पर कुछ भौगोर्भिक संरचनात्मक नियंत्रण को स्पष्ट करता है। सिंधु तंत्र की नदियों का बहाव एक नियम की तरह पश्चिमोत्तर है, जबकि गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र की नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र से बहते हुए पूर्वी मार्ग अपनाती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के उत्तर में कराकोरम श्रेणी, जिसके पश्चिम में हिंदुकुश व पूर्व में लद्दाख़ श्रेणी है, एक विशाल जलविभाग बनाती है जो सिंधु तंत्र को मध्य एशिया की नदियों से अलग करता है। इस विभाजन के पूर्व में कैलाश श्रेणी और पूर्व की ओर आगे निआनकिंग तंग्गुला पर्वत हैं, जो ब्रह्मपुत्र, उच्च हिमालय श्रेणी के महाखड्ड को पार करने से पहले पूर्व की ओर लगभग 1,488 किलोमीटर बहती है। इसकी बहुत सी तिब्बती सहायक नदियाँ विपरीत दिशा में बहती हैं और संभवतः कभी ब्रह्मपुत्र की भी यही दिशा रही होगी। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;जल-विभाजन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
उच्च हिमालय, जो सामान्यः अपनी समूची लंबाई में प्रमुख जल-विभाजन है, कुछ सीमित क्षेत्रों में ही जल-विभाजन का काम करता है। इसका कारण यह है कि प्रमुख हिमालयी नदियाँ, जैसे सिंधु, ब्रह्मपुत्र सतलुज और गंगा की दो प्रमुख धाराएँ, अलकनंदा व भागीरथी उन पर्वतों से भी पुरानी हैं, जिन्हें वे काटती हैं। ऐसा विश्वास है कि हिमालय इतनी धीमी गति से उठा कि पुरानी नदियों को धाराओं में बहते रहने में कोई परेशानी नहीं हुई और हिमालय के उठने से उनके बहाव ने गति पकड़ ली, जिससे वे घाटियों का कटाव तेज़ी से कर पाईं। इस प्रकार हिमालय का उन्नयन और घाटियों का गहरा होना साथ-साथ जारी रहा, परिणामस्वरूप, पर्वतश्रेणियों के साथ पूर्णतः विकसित नदी तंत्र का उद्भव हुआ, जो गहरे अनुप्रस्थ महाखण्डों में कटा था। इनकी गहराई 1,524 से 4,877 मीटर व चौड़ाई 10 से 48 किलोमीटर है। अपवाह तंत्र का आरंभिक मूल इस अनोखे तथ्य को स्पष्ट करता है कि प्रमुख नदियाँ न केवल उच्च हिमालय की दक्षिणी ढालों को, बल्कि एक विशाल सीमा तक इसकी उत्तरी ढालों को भी अपवाहित करती हैं, क्योंकि जल-विभाजक क्षेत्र शीर्ष रेखा के उत्तर में स्थित है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;हिमनद&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
एक जल-विभाजक के रूप में उच्च हिमालय श्रेणी की भूमिका को सतलुज व सिंधु घाटी के बीच के 579 किलोमीटर के क्षेत्र में देखा जा सकता है। उत्तरी ढालों में उत्तर की ओर बहने वाली ज़ॉस्कर व द्रास नदियाँ हैं, जो सिंधु नदी में अपवाहित होती हैं। ग्लेशियर ([[हिमनद]]) भी ऊँचे क्षेत्रों को अपवाहित करने व हिमालयी नदियों के पोषण (पानी देने) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उत्तराखंड में अनेक हिमनद हैं, जिनमें से सबसे बड़ा गंगोत्री हिमनद 32 किलोमीटर लंबा है और गंगा के स्रोतों में से एक है। खुंबु हिमनद नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र को अपवाहित करता है और इस पर्वत की चढ़ाई का सबसे लोकप्रिय मार्ग है। हिमालय क्षेत्र के हिमनदों की गति की दर उल्लेखनीय रूप से भिन्न है। कराकोरम श्रेणी में बाल्टोरो [[हिमनद]] प्रतिदिन दो मीटर खिसकता है, जबकि खुंबु जैसे अन्य हिमनद प्रतिदिन केवल लगभग 30 सेंटीमीटर तक ही खिसक पाते हैं। हिमालय के अधिकांश हिमनद सिकुड़ रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मिट्टी==&lt;br /&gt;
{{main|हिमालय की मिट्टी}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-3.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
हिमालय की मिट्टी के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। उत्तरमुखी ढलानों पर मिट्टी की अच्छी-ख़ासी मोटी परत है, जो कम ऊँचाइयों पर घने जंगलों तथा अधिक ऊँचाई पर घास का पोषण करती है। जंगल की मिट्टी गहरे भूरे रंग की है तथा इसकी बनावट चिकनी दोमट है। यह फलों के वृक्ष उगाने के लिए आदर्श मिट्टी है। पर्वतीय घास स्थली की मिट्टी भलीभाँति विकसित है, लेकिन इसकी मोटाई तथा रासायनिक गुण अलग-अलग हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जलवायु== &lt;br /&gt;
{{Main|हिमालय की जलवायु}}&lt;br /&gt;
हवा और जल संचरण की विशाल प्रणालियों को प्रभावित करने वाले विशाल जलवायवीय विभाजक के रूप में हिमालय दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप और उत्तर में मध्य एशियाई उच्चभूमि की मौसमी स्थितियों को प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। अपनी स्थिति और विशाल ऊँचाई के कारण हिमालय पर्वतश्रेणी सर्दियों में उत्तर की ओर से आने वाली ठंडी यूरोपीय वायु को भारत में प्रवेश करने से रोकती है और दक्षिण-पश्चिम मॉनसूनी हवाओं को पर्वतश्रेणी को पार करके उत्तर में जाने से पहले अधिक वर्षा के लिए भी बाध्य करती है। इस प्रकार, भारतीय क्षेत्र में भारी मात्रा में वर्षा (बारिश और हिमपात) होती है, लेकिन वहीं तिब्बत में मरुस्थलीय स्थितियां हैं। दक्षिणी ढलानों पर [[शिमला]] और पश्चिमी हिमालय के मसूरी में औसत सालाना वर्षा 1,530 मिमी तथा पूर्वी हिमालय के दार्जिलिंग में 3,048 मिमी होती है। उच्च हिमालय के उत्तर में सिन्धु घाटी के कश्मीर क्षेत्र में स्थित स्कार्दू गिलगित और लेह में सिर्फ़ 76 से 152 मिमी वर्षा होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वनस्पति जीवन== &lt;br /&gt;
हिमालय में पाई जाने वाली वनस्पति को ऊँचाई और बारिश के आधार पर मुख्यतः चार क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है- उष्ण, उपोष्ण, शीतोष्ण और आम्लीय। ऊँचाई तथा जलवायु में स्थानीय भिन्नता तथा सूर्य के प्रकाश और हवा के कारण प्रत्येक क्षेत्र के वानस्पतिक जीवन में काफ़ी भिन्नता पाई जाती है। उष्णकटिबंधीय वर्षा प्रचुर वन, पूर्वी और मध्य हिमालय की नम तराइयों तक सीमित है। सदाबहार डिप्टेरोकार्प्स, इमारती लकड़ी और राल उत्पाद करने वाले वृक्ष आम हैं। इनकी विभिन्न प्रजातियाँ, विभिन्न मिट्टियों तथा भिन्न ढालों वाली पर्वतीय ढलानों पर उगती हैं। आयरनवुड (मेसुआ फ़ेरिया) 183 और 732 मीटर की ऊँचाइयों के बीच छिद्रदार मिट्टी के क्षेत्र में पाया जाता है। [[चित्र:Himalayas-7.jpg|thumb|250px|left|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]] तीखी ढलानों पर बांस उगते हैं, ओक और चेस्टनट 1,097 से 1,737 मीटर की ऊँचाइयों पर पश्चिम में हिमाचल प्रदेश से मध्य नेपाल तक बलुई पत्थरों को ढकने वाली अश्ममृदा में उगते हैं। तीखी ढलानों पर जलधाराओं के किनारे एल्डर के वृक्ष पाए जाते हैं। अधिक ऊँचाई पर इनका स्थान पर्वतीय से वन ले लेते हैं, जिनमें सामान्य सदाबहार प्रजाति पेंडानस फ़रकेटस है, जो एक प्रकार का स्क्रू पाइन (केतकी) है। पूर्वी हिमालय में अनुमानतः इन वृक्षों के अलावा लगभग 4,000 प्रजातियों के फूलदार पौधे पाए जाते हैं, जिनमें से 20 खजूर जाति के हैं। पश्चिम की ओर घटती हुई वर्षा और बढ़ती हुई ऊँचाई के साथ-साथ वर्षा वनों का स्थान उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन ले लेते हैं,  जहाँ बहुमूल्य इमारती वृक्ष साल (शोरिया रोबस्टा) प्रमुख प्रजाति है, साल 914 मीटर (नम साल) से 1,372 मीटर (शुष्क साल) की ऊँचाइयों तक के ऊँचे पठारों में फलता-फूलता है। इसके और आगे पश्चिम में क्रमशः स्तेपी वन (विस्तृत मैदानों में स्थित वन) उपोष्ण कटिबंधीय काँटेदार स्तेपी और उपोष्ण कटिबंधीय उपमरुस्थलीय वनस्पति पाई जाती है। शीतोष्ण वन लगभग 1,372 से 3,353 मीटर की ऊँचाइयों के बीच फैले हुए हैं और इनमें शंकुधारी तथा चौड़ी पत्तियों वाले शीतोष्ण कटिबंधीय वृक्ष पाए जाते हैं। ओक तथा शंकुधारी वृक्षों के सदाबहार जंगलों की सुदूर पश्चिमी पर्वतीय सीमा पाकिस्तान में रावलपिंडी के लगभग 48 किलोमीटर पश्चिमोत्तर में मढ़ी के ऊपर के पहाड़ों पर स्थित है। ये वन निम्न हिमालय की विशिष्टता हैं, जो भारत में कश्मीर के पीर पंजाल की बाहरी ढलानों पर स्पष्ट दिखते हैं। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;चीड़ पाइन&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
823 से 1,646 मीटर की ऊँचाई तक चीड़ पाइन (पाइनस रॉक्सबर्घी) प्रमुख प्रजाति है। अंदरूनी घाटियों में यह प्रजाति 1,920 मीटर की ऊँचाई तक भी पाई जा सकती है। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;देवदार&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[देवदार]], जो काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थानीय प्रजाति है, मुख्यतः पर्वतश्रेणी के पश्चिमी हिस्से में पाई जाती है। यह प्रजाति 1,920 से 2,743 मीटर की ऊँचाई के बीच उगती है तथा सतलुज व गंगा नदियों की ऊपरी घाटियों में और अधिक ऊँचाई पर भी उग सकती है। अन्य शंकुधारी वृक्षों में ब्लू पाइन व स्प्रूस के वृक्ष लगभग 2,225 और 3,048 मीटर के बीच पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आल्पीय क्षेत्र 3,200 और 3,566 मीटर की ऊँचाइयों के बीच वृक्ष रेखा से ऊपर का क्षेत्र है और पश्चिमी हिमालय में लगभग 4,176 मीटर तथा पूर्वी हिमालय में 4,450 मीटर की ऊँचाई तक फैला है। इस क्षेत्र में सभी प्रकार की नम आल्पीय वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। जूनिपर कई क्षेत्रों में होता है, विशेषकर धूपदार, तीखी और चट्टानी ढलानों तथा शुष्क क्षेत्रों में इसका आधिक्य है। नंगा पर्वत पर यह 3,886 मीटर की ऊँचाई पर भी पाया जाता है। रोडोडेंड्रोन हर जगह होता है, लेकिन पूर्वी हिमालय के नम हिस्सों में इसकी बहुतायत है, जहाँ यह वृक्षों से लेकर छोटी झाड़ियों तक हर आकार में उगता है। निचले क्षेत्रों में जहाँ नमी की अधिकता है, वहाँ काई और शैवाक (लाइकेन) उगते हैं, अधिक ऊँचाई, विशेषकर नंगा पर्वत और माउंट एवरेस्ट पर फूलदार पौधे भी पाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राणी जीवन== &lt;br /&gt;
{{Main|हिमालय का प्राणी जीवन}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-4.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
पूर्वी हिमालय में पशु जीवन का उद्भव मुख्यतः दक्षिणी चीन और भारतीय-चीनी क्षेत्र से हुआ है। इसमें प्राथमिक रूप से उष्णकटिबंधीय वनों में पाया जाने वाला पशु जीवन है और अनुपूरक रूप से ऊँचे क्षेत्रों में व्याप्त उपोष्ण, पर्वतीय और शीतोष्ण परिस्थितियों तथा शुष्क पश्चिमी क्षेत्रों के लिए अनुकूलित हुए जंतु हैं। लेकिन पश्चिमी हिमालय में पशु जीवन भूमध्य सागरीय, इथियोपियाई और तुर्कमेनियाई क्षेत्रों से ज़्यादा निकटता प्रदर्शित करता है। अतीत में इस क्षेत्र में जिराफ़ और [[दरियाई घोड़ा|दरियाई घोड़े]] जैसे अफ़्रीकी जानवरों की मौजूदगी का पता बाह्य हिमालय के शिवालिक निक्षेप में पाए जाने वाले जीवाश्मों से लगाया जा सकता है। वृक्ष रेखा से ऊपर की ऊँचाई पर पाया जाने वाला पशु जीवन लगभग पूर्णतः स्थानीय प्रजाति का है, जो ठंड के अनुकूलित हो चुके हैं और इनका विकास हिमालय की ऊँचाई बढ़ने के बाद स्तेपी के वन्य जीवन से हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लोग==&lt;br /&gt;
{{Main|हिमालय के नागरिक}}&lt;br /&gt;
भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले चार प्रमुख जातीय समूहों, भारतीय-यूरोपीय, तिब्बती-बर्मी, ऑस्ट्रो-एशियाई और द्रविड़ में से पहले दो समूह हिमालय क्षेत्र में काफ़ी संख्या में पाए जाते हैं, हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में ये अलग-अलग अनुपात में घुले-मिले हुए हैं। इनका वितरण पश्चिम से यूरोपीय समूहों, दक्षिण से भारतीय लोगों और पूर्व व उत्तर से एशियाई जनजातियों की घुसपैठ के लंबे इतिहास का परिणाम है। हिमालय के मध्यवर्ती तिहाई हिस्से नेपाल में ये समूह अंतमिश्रित हैं। लघु हिमालय में घुसपैठ से दक्षिण एशिया के नदी मैदानों के रास्तों में और उनसे होते हुए प्रवास का मार्ग प्रशस्त हुआ। आमतौर पर यह कहा जा सकता है कि उच्च हिमालय तथा टेथिस हिमालय में तिब्बती व अन्य तिब्बती-बर्मी लोगों का निवास है तथा निम्न हिमालय में लंबे, गोरे भारोपीय लोगों का वास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था== &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;संसाधन&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{Main|हिमालय के संसाधन}}&lt;br /&gt;
हिमालय की आर्थिक परिस्थितियाँ इस विभिन्न परिस्थिति वाले विस्तृत और विषम क्षेत्र के सीमित संसाधनों के अनुरूप हैं। यहाँ की मुख्य गतिविधि पशुपालन है, लेकिन वनोपज का दोहन और व्यापार भी महत्त्वपूर्ण है। हिमालय में प्रचुर आर्थिक संसाधन हैं। इनमें उपजाऊ कृषि योग्य भूमि, विस्तृत घास के मैदान व वन, खनन योग्य खनिज भंडार और आसानी से दोहन योग्य जलविद्युत शक्ति शामिल हैं। पश्चिमी हिमालय में सबसे उत्पादक कृषि योग्य भूमि कश्मीर घाटी, कांगड़ा सतलुज नदी के बेसिन और उत्तराखंड में गंगा व यमुना नदियों के कगारी क्षेत्र के सीढ़ीदार खेतों में है। इन क्षेत्रों में चावल, मक्का, गेहूँ, ज्वार-बाजरा का उत्पादन होता है। मध्य हिमालय में नेपाल में दो-तिहाई कृषि योग्य भूमि तराई और इससे लगे मैदानी क्षेत्र में है। इस भूमि में देश के कुल चावल उत्पादन का अधिकांश हिस्सा पैदा होता है। इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में मक्का, गेहूँ, आलू और गन्ने की भी खेती की जाती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-9.jpg|thumb|250px|left|[[मनाली हिमाचल प्रदेश|मनाली]] से [[लेह]] का रासता, हिमालय]]&lt;br /&gt;
==यातायात== &lt;br /&gt;
{{main|हिमालय पर यातायात}}&lt;br /&gt;
हिमालय क्षेत्र में सड़क यातायात सुस्थापित है, जिससे उत्तर तथा दक्षिण, दोनों दिशाओं से हिमालय में पहुँचना सुगम है। [[नेपाल]] के तराई क्षेत्र में पूर्व-पश्चिम दिशा में एक राजमार्ग स्थित है। यह देश के कई जलग्रहण बेसिनों तक जाने वाले मार्गों को जोड़ता है। राजधानी काठमांडू [[लघु हिमालय]] राजमार्ग के ज़रिये पोखरा से जुड़ी हुई है, जबकि कोडारी दर्जे से गुज़रने वाला एक निचला हिमालयी राजमार्ग नेपाल को [[तिब्बत]] के [[ल्हासा]] से जोड़ता है। पश्चिमोत्तर में [[पाकिस्तान]] एक राजमार्ग से [[चीन]] से जुड़ा हुआ है। [[हिमाचल प्रदेश]] से गुज़रने वाले हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अध्ययन तथा पर्यवेक्षण== &lt;br /&gt;
हिमालय की आरंभिक यात्राएँ व्यापारियों, चरवाहों और तीर्थयात्रियों द्वारा की गई थीं। तीर्थयात्रियों को विश्वास था कि यात्रा जितनी कष्टकर होगी, वे मोक्ष या निर्वाण के उतने ही क़रीब पहुँच पाएंगे, जबकि व्यापारियों और चरवाहों ने 5,486 से 5,791 मीटर तक की ऊँचाई पर स्थित दर्रों को सामान्य जीवन मार्ग मानकर पार किया, लेकिन अन्य सभी लोगों के लिए हिमालय एक दुर्गम और भयंकर अवरोध था। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;मानचित्र&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-10.jpg|thumb|250px|हिमालय]]&lt;br /&gt;
{{Main|हिमालय का मानचित्र}}&lt;br /&gt;
हिमालय का कुछ हद तक सटीक मानचित्र मुग़ल बादशाह [[अकबर]] के दरबार के स्पेनी दूत एंतोनियों मौनसेरेट ने 1590 में तैयार किया था। फ़्रांसीसी भू-वैज्ञानिक ज्यां बैपतिस्त बॉरगुईग्नोन डी ऑरविले ने व्यवस्थित पर्यवेक्षण के आधार पर तिब्बत और हिमालय पर्वतश्रेणी का पहला मानचित्र तैयार किया। 19वीं [[सदी]] के मध्य में सर्वे ऑफ़ इंडिया ने हिमालय की चोटियों की ऊँचाई के सही आकलन के लिए व्यवस्थित कार्यक्रम का आयोजन किया। 1849 से 1855 के बीच नेपाल और उत्तराखंड की चोटियों का सर्वेक्षण कर उनका मानचित्र बनाया गया। नंगा पर्वत और उत्तर में कराकोरम श्रेणी की चोटियों को 1855 से 1859 के बीच सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षकों ने इन खोई गई असंख्य चोटियों को अलग-अलग नाम नहीं दिया, बल्कि अंकों और रोमन संख्याओं से उनकी पहचान की। इस प्रकार, माउंट एवरेस्ट को सर्वप्रथम सिर्फ़ ''एच'' नाम दिया गया। 1849 स 1850 में इसे शिखर x.v कर दिया गया। 1865 में शिखर x.v. का नाम भारत के महासर्वेक्षक रहे सर जार्ज एवरेस्ट (1830 से 1843 तक) के नाम पर रखा गया। 1852 में गणना का इस हद तक विकास नहीं हुआ था कि शिखर x.v. दुनिया के अन्य किसी भी शिखर से ऊँचा है, इसकी जानकारी हो सके। 1862 तक, 5,486 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले 40 शिखरों पर सर्वेक्षण कार्य के लिए आरोहण हो चुका था। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image =चित्र:Himalayas-11.jpg&lt;br /&gt;
|height =250&lt;br /&gt;
|alt =हिमालय&lt;br /&gt;
|caption=हिमालय का विहंगम दृश्य &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पर्वत}}&lt;br /&gt;
{{हिमालय}}&lt;br /&gt;
{{शिव2}}&lt;br /&gt;
{{शिव}}&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
[[Category:पर्वत]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:शिव]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिमालय]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Vinay krishan</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6&amp;diff=329220</id>
		<title>संसद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://loginhi.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6&amp;diff=329220"/>
		<updated>2013-05-10T16:05:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Vinay krishan: /* योग्यता */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Sansad-Bhavan.jpg|thumb|300px|[[संसद भवन]], [[नई दिल्ली]]]]&lt;br /&gt;
[[भारत]] में संसदात्मक शासन प्रणाली स्वीकार की गई है। अत: संसद की सर्विच्चता भारतीय शासन की प्रमुख विशेषता है। संसद को विधायिका अथवा व्यवस्थापिका नाम से भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
==गठन==&lt;br /&gt;
संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संघ के लिए एक संसद होगी, जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिल कर बनेगी। उच्च सदन राज्यसभा तथा निम्न सदन लोकसभा कहलाती है। इस प्रकार संसद-&lt;br /&gt;
#[[राष्ट्रपति]],&lt;br /&gt;
#[[राज्यसभा]], &lt;br /&gt;
#[[लोकसभा]] से मिलकर गठित है।&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति संसद का अभिन्न भाग है। इसे संसद का अभिन्न भाग इसलिए माना जाता है क्योंकि इसकी अनुमति के बिना राज्यसभा तथा लोकसभा द्वारा पारित कोई भी व्ह्धेयक अधिनियम का रूप नहीं लेगा। कुछ ऐसे विधेयक भी हैं, जिन्हें राष्ट्रपति की अनुमति के बिना लोकसभा में पेश नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति को राज्यसभा तथा लोकसभा में पेश नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति को राज्यसभा तथा लोकसभा का सत्र बुलाने, सत्रावसान करने और लोकसभा को विघटित करने का अधिकार है।&lt;br /&gt;
==योग्यता==&lt;br /&gt;
#वह भारत का नागरिक हो।&lt;br /&gt;
#वह निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में दिये गये प्रारूप के अनुसार शपथ लेता है या प्रतिज्ञान करता है और उस पर हस्ताक्षर करता है।&lt;br /&gt;
#उसे राज्यसभा की दशा में 30 वर्ष से कम तथा लोकसभा की स्थिति में 25 वर्ष से कम आयु का नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;
#उसके पास ऐसी कोई अन्य अर्हता हो, जो कि संसद द्वारा बनायी गयी किसी विधि द्वारा विहित की गयी है। संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधनियम, 1951 बनाकर निम्नलिखित अर्हता नियत की है-&lt;br /&gt;
====राज्यसभा की सदस्यता====&lt;br /&gt;
राज्यसभा में किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में वह व्यक्ति चुना जाएगा, जो उस राज्य या राज्यक्षेत्र के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का निर्वाचक हो। लेकिन इस प्रावधान की भावना का राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा उल्लंघन किया जाता रहा है, क्योंकि किसी राज्य/संघ राज्यक्षेत्र से राज्यसभा का प्रतिनिधि चुने जाने के लिए राजनीतिक दल के सदस्य उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के किसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक बन जाते हैं, जबकि वे उससे पहले उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक नहीं होते। ऐसे नेताओं भ्रष्टाचार का दोषी माना जाना चाहिए तथा इन्हें सदैव के लिए संसद की सदस्यता के अयोग्य कर देना चाहिए। निवर्तमान चुनाव आयुक्त [[टी. एन. शेषन]] ने इस सम्बन्ध में क़दम उठाये थे।&lt;br /&gt;
राज्यसभा संसद का उच्च सदन है,इसमे सदस्यों की कुल अधिकतम संख्या 250 हो सकती है, वर्तमान में यह संख्या 245 है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====लोकसभा की सदस्यता====&lt;br /&gt;
लोकसभा की सदस्यता के लिए यह अर्हता निश्चित की गयी है कि अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित स्थान की दशा में चुनाव में खड़े होने वाले व्यक्ति के लिए उसी जाति या जनजाति का होना चाहिए तथा सिक्किम राज्य के स्थान/स्थानों की स्थिति में चुनाव में खड़े होने वाले व्यक्तियों को सिक्किम का निर्वाचक होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अयोग्यता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sansad-Bhavan-2.jpg|thumb|250px|[[संसद भवन]], [[नई दिल्ली]]]]&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 102 के अनुसार कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निम्नलिखित आधार पर अयोग्य होगा-&lt;br /&gt;
#यदि वह भारत सरकार के किसी राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, लेकिन यदि संसद ने विधि द्वारा किसी पद को धारण करने की छूट दी है, तो उस पद को धारण करने वाला व्यक्ति संसद की सदस्यता के लिए अयोग्य नहीं होगा।&lt;br /&gt;
#यदि वह सक्षम न्यायालय के द्वारा विकृतचित्त घोषित कर दिया गया है।&lt;br /&gt;
#यदि वह अमुक्त दिवालिया है।&lt;br /&gt;
#यदि वह भारत का नागरिक नहीं है या उसने किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर ली है या यदि वह किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा धारण करता है।&lt;br /&gt;
#यदि वह दल बदल क़ानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) के अधीन संसद की सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराया गया है।&lt;br /&gt;
#यदि वह संसद द्वारा बनायी गयी किसी विधि के अधीन अयोग्य घोषित कर दिया गया है, संसद ने 1951 में लोक प्रतिनिधित्व अधिनयम, 1951 बनाकर निम्नलिखित व्यक्तियों को संसद की सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित किया है–&lt;br /&gt;
##जो भ्रष्ट आचरण का दोषी ठहराया गया हो,&lt;br /&gt;
##जो कुछ अपराधों के लिए सक्षम न्यायालय द्वारा दोषी निर्णीत किया गया हो,&lt;br /&gt;
##जो व्यक्ति भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन पद धारण करते हुए भ्रष्टाचार के कारण या राज्य के प्रति अभक्ति के कारण पदच्युत कर दिया गया हो,&lt;br /&gt;
##जो सरकार के साथ अपने व्यापार या कारोबार के अनुक्रम में सरकार को माल प्रदान करने के लिए या सरकार द्वारा किये जाने वाले किसी कार्य के लिए संविदा लिया हो,&lt;br /&gt;
##जो व्यक्ति किसी ऐसी कम्पनी या निगम का (सहकारी सोसाइटी से भिन्न), जिसकी पूँजी में सरकार का 25% या अधिक हिस्सा है, प्रबन्ध अभिकर्ता या सचिव है,&lt;br /&gt;
##जो व्यक्ति अपने चुनाव व्यय का लेखा दाख़िल करने में असफल रहा है।&lt;br /&gt;
##दिसम्बर, 1988 में जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 में संशोधन कर आतंकवादी गतिविधि, तस्करी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी, खाद्य पदार्थों एवं दवाओं में मिलावट करने वाले, फेरा का उल्लंघन तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराध करने वाले व्यक्तियों को संसद या राज्य के विधानमण्डल का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रश्न का विनिश्चय==&lt;br /&gt;
जब संसद सदस्यों की अयोग्यता से सम्बन्धित प्रश्न उत्पन्न होता है तो उसका विनिश्चय राष्ट्रपति के द्वारा किया जाता है। इस सम्बन्ध में राष्ट्रपति का नर्णिय अन्तिम माना जाता है तथा इस निर्णय के विरुद्ध न्यायालय में याचिका या अपील दाखिल नहीं की जा सकती। राष्ट्रपति संसद सदस्यों की अयोग्यता से सम्बन्धित प्रश्न का निर्णय करते समय [[चुनाव आयोग]] की राय लेता है और उसी के अनुसार कार्य करता है। लेकिन संसद सदस्य के दल बदल के आधार पर संसद की सदस्यता के लिए अयोग्यता का निर्णय लोकसभा या राज्यसभा के सभापति, जैसी भी स्थिति हो, द्वारा किया जाता है।&lt;br /&gt;
==संसद सदस्यों के लिए आचार संहिता==&lt;br /&gt;
[[25 नवम्बर]], [[2001]] को संपन्न सर्वदलीय राष्ट्रीय सम्मेन में संसद एवं विधानसभाओं की मर्यादा बनाये रखने तथा इन सदनों में अनुशासनहीनता को रोकने के उद्देश्य से एक आचार संहिता का निर्माण किया गया है। इस आचार संहिता के प्रमुख बिन्दु निम्नवत् हैं–&lt;br /&gt;
*प्रश्नकाल के दौरान सदन में शान्ति बनाये रखना।&lt;br /&gt;
*सदन के बीच में आने से बचने की कोशिश की जाये।&lt;br /&gt;
*यदि कोई सदस्य किसी सरकारी दस्तावेज़, [[काग़ज़]] या रिपोर्ट के किसी गोपनीय मुद्दे पर हवाला देना चाहता हो तो उन्हें पहले इसकी सूचना अध्यक्ष को देनी चाहिए, ताकि वह इस पर उचित फ़ैसला कर सके।&lt;br /&gt;
*प्रत्येक सदस्य को अपनी सम्पत्ति की घोषणा करनी चाहिए या किसी मामले से यदि वह सम्बद्ध है तो पर चर्चा से पहले उन्हें सदन को यह बताना चाहिए।&lt;br /&gt;
*राष्ट्रपति या [[राज्यपाल]] के अभिभाषण के समय सदन में एकजुटता, सम्मान और मर्यादा का परिचय दें।&lt;br /&gt;
*यदि किसी का व्यक्तिगत हित सार्वजनिक हित के आड़े आता है तो उसे सार्वजनिक हित को तरजीह देनी चाहिए। &lt;br /&gt;
*सदस्यों को अपने कर्तव्यों का सदैव ध्यान रखना चाहिए।&lt;br /&gt;
*कोई सदस्य जब किसी मसले पर बोल रहा हो तो अन्य सदस्यों को शोर-शराबा करके उसकी बात में व्यवधान पैदा नहीं करना चाहिए। किसी सदस्य के बोलने के समय टोकाटाकी करने से अन्य सदस्यों को बचने का प्रयास करना चाहिए।&lt;br /&gt;
*सदन में किसी तरह की नारेबाज़ी नहीं की जानी चाहिए।&lt;br /&gt;
*विरोध व्यक्त करने के लिए सदन में कोई दस्तावेज़ फाड़ा नहीं जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
*संसद विधानमण्डलों अथवा केन्द्रशासित प्रदेशों की विधान सभाओं के भीतर या उसके परिसर में कहीं पर भी सत्याग्रह अथवा धरने पर नहीं बैठना चाहिए।&lt;br /&gt;
*सदनों में सेल्यूलर फ़ोन अथवा पेजर लेकर नहीं जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
*बिना स्पीकर को नोटिस दिये किसी के ख़िलाफ़ किसी तरह का आरोप अथवा उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाली कोई बात नहीं कही जानी चाहिए।&lt;br /&gt;
*चर्चा के दौरान ऐसे किसी मामले अथवा तथ्य ज़िक़्र नहीं करना चाहिए, जो कि न्यायालय में लम्बित हो।&lt;br /&gt;
*पीठ की बिना पूर्व अनुमति के सदस्यों को सदन में कोई बयान नहीं पढ़ना चाहिए।&lt;br /&gt;
*स्पीकर की व्यसस्था पर न तो कोई सवाल उठाया जाना चाहिए और न ही किसी तरह की टिप्पणी की जानी चाहिए।&lt;br /&gt;
*अध्यक्ष द्वारा अनुमति दिये जाने के पूर्व सदस्यों को किसी मसले पर नहीं बोलना चाहिए।&lt;br /&gt;
*सदन की किसी भी समिति के साक्ष्यों को किसी सदस्य अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा तब तक नहीं छापा जाना चाहिए, जब तक वे सदन में पेश न कर दिये गये हों।&lt;br /&gt;
*सदन की समितियों को किसी मामले के तथ्यों को जानने के लिए तब तक यात्रा पर नहीं जाना चाहिए, जब तक कि वह बेहद ज़रूरी न हो।&lt;br /&gt;
*स्थानीय अधिकारियों से चर्चा से पूर्व तो ऐसे टूर क़तई नहीं आयोजित किए जाएँ।&lt;br /&gt;
*किसी संगठन से सम्बद्ध सदस्य उसके लिए सरकार के साथ किसी तरह का व्यापार न करें।&lt;br /&gt;
*सदस्य को उपलब्ध कराए गए सरकारी आवास को यह किराये आदि पर न देकर उससे किसी तरह का आर्थिक लाभ वर्जित न करें।&lt;br /&gt;
*ऐसे किसी मामले में जिसमें सदस्य के हित परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हों किसी सरकारी अधिकारी अथवा मंत्री पर दबाव डालने का प्रयास न किया जाए।&lt;br /&gt;
*सदस्यों को अपने किसी रिश्तेदार, परिचित की नौकरी या व्यापारिक सुविधा के लिए किसी सरकारी अधिकारी को पत्र नहीं लिखना चाहिए तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में रुचि नहीं लेनी चाहिए।&lt;br /&gt;
*सदन में किसी प्रकार का बैज लगाकर न जाएँ।&lt;br /&gt;
*किसी भी तरह का हथियार लेकर सदन में न जाएँ।&lt;br /&gt;
*सदन में कोई झण्डा, निशान या इसी तरह की अन्य वस्तु का प्रदर्शन न करें।&lt;br /&gt;
ऐसा कोई लिटरेचर, प्रश्नावली, परचा प्रेस विज्ञप्ति संसद या विधानमंण्डल के परिसर में वितरित नहीं करें, जिसका सदन के कामकाज़ से मतलब न हो।&lt;br /&gt;
इस आचार संहिता का उल्लंघन करने पर सम्बन्धित सदस्य के ख़िलाफ़ दण्डात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इसमें उसको डाँट-फटकार, निन्दा, सदन से बाहर करना आदि सम्भव है, इसके अलावा उसका सदन से स्वत: ही निलम्बन भी सम्भव है।&lt;br /&gt;
==सत्र, स्थगन, सत्रावसान तथा विघटन==&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति अनुच्छेद 85 के तहत संसद के दोनों सदनों का सत्र बुला सकता है, दोनों सदनों का सत्रावसान कर सकता है तथा लोकसभा का विघटन कर सकता है। संविधान के द्वारा राष्ट्रपति पर यह कर्तव्य अधिरोपित किया गया है कि वह संसद के दोनों सदनों को ऐसे अंतराल पर आहूत करेगा कि एक सत्र की अंतिम बैठक और उसके बाद की पहली बैठक के लिए नियत तिथि के बीच छह मास का अन्तराल नहीं होना चाहिए। इसका परिणाम यह है कि संसद की बैठक वर्ष में कम से कम दो बार होनी चाहिए और दोनों बैठकों के बीच छह मास से अधिक का समय नहीं होना चाहिए। दोनों बैठकों के बीच के समय को 'दीर्घावकाश' कहा जाता है। संसद के वर्ष में सामान्यत: तीन सत्र आयोजित किए जाते हैं–&lt;br /&gt;
#बजट&lt;br /&gt;
#वर्षा सत्र और &lt;br /&gt;
#शीत सत्र।&lt;br /&gt;
प्रत्येक वर्ष संसद का प्रथम अधिवेशन फ़रवरी के तीसरे सप्ताह में बजट सत्र से आरम्भ होता है। इस सत्र के प्रारम्भ होने के पहले दिन दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आयोजित होती है, जिसमें राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है। इस सत्र में बजटीय प्रस्तावों को पारित किया जाता है। संसद या वर्षा सत्र जुलाई के तीसरे सप्ताह में आयोजित होता है। इस सत्र में मुख्यत: विधार्थी कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। शीत सत्र नवम्बर के दूसरे या तीसरे सप्ताह में आरम्भ होता है।&lt;br /&gt;
==सदन का स्थगन==&lt;br /&gt;
कभी-कभी कुछ अत्यावश्य और विशेष कारणों से सदन की बैठक स्थगित करने की आवश्यकता पड़ जाती है। संसद के दोनों सदनों का स्थगन [[लोकसभा अध्यक्ष]] (नियम 15) तथा राज्यसभा के सभापति (नियम 12) द्वारा किया जाता है। यह कुछ घंटे, दिन या सप्ताह की अवधि का हो सकता है। आवश्यकता पड़ने पर सदन को बैठक के बीच में ही स्थगित किया जा सकता है। इसके अलावा सदन किसी मृत व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए, गणपूर्ति न होने पर, सदन के भीतर कार्य संचालन में अव्यवस्था आदि के कारण स्थगित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
==संसद सदस्यों द्वारा स्थान की रिक्ति==&lt;br /&gt;
भारतीय संविधान में तथा संसद द्वारा निर्मित लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के द्वारा संसद सदस्यों द्वारा स्थान की रिक्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-&lt;br /&gt;
#कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों का तथा संसद के किसी सदन और किसी राज्य के विधानमण्डलों में से किसी का सदस्य एक साथ नहीं हो सकता है।&lt;br /&gt;
#यदि कोई व्यक्ति सदन के दोनों सदनों के लिए चुना जाता है और दोनों सदनों में से किसी में भी अपना स्थान ग्रहण नहीं किया है, तो वह अपने चुने जाने की तिथि से 10 दिन के अन्दर आयोग के सचिव को लिखित सूचना देगा, कि वह किस सदन का सदस्य बना रहना चाहता है। जिस सदन का वह सदस्य बना रहना चाहता है, उसके अतिरिक्त दूसरे सदन का उसका स्थान रिक्त हो जाएगा। यदि व्यक्ति चुनाव आयोग के सचिव को ऐसी सूचना नहीं देता, तो उसका राज्यसभा का स्थान स्वत: ही 10 दिन के बाद समाप्त हो जाएगा। &lt;br /&gt;
#यदि कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का पहले सदस्य है और वह दूसरे सदन के लिए चुना जाता है तो उसके चुनाव की तिथि के दिन उसकी उस सदन की सदस्यता समाप्त हो जाएगी, जिसका वह पहले सदस्य था। &lt;br /&gt;
#यदि कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों में से किसी में या राज्य के विधानमण्डल में से किसी के लिए एक स्थान से अधिक स्थान के लिए निर्वाचित हो जाता है तो उसे एक स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों से 14 दिन के अन्दर त्यागपत्र दे देना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसके सभी स्थान स्वत: ही समाप्त हो जाएँगे। &lt;br /&gt;
#यदि राष्ट्रपति उसे चुनाव आयोग की सलाह से संसद की सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराता है तो उसका स्थान रिक्त हो जाता है। &lt;br /&gt;
#वह लोकसभा के मामले में लोकसभाध्यक्ष को अथवा राज्यसभा के मामले में उपराष्ट्रपति को त्यागपत्र देकर अपना स्थान रिक्त कर सकता है।&lt;br /&gt;
#यदि वह दल बदल क़ानून के अधीन लोकसभा के मामले में लोकसभाध्यक्ष द्वारा या राज्यसभा के मामले में उपराष्ट्रपति द्वारा अयोग्य ठहराया जाता है तो उसका स्थान रिक्त हो जाता है। &lt;br /&gt;
==शपथ ग्रहण==&lt;br /&gt;
संसद सदस्यों को अपना स्थान ग्रहण करने के पूर्व राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ ग्रहण करना पड़ता है। बिना शपथ ग्रहण किये कोई भी व्यक्ति संसद का सदस्य नहीं बन सकता। यदि किसी व्यक्ति ने संसद सदस्य के रूप में शपथ नहीं ग्रहण की है या संसद की सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित किया गया है या संसद से निष्कासित कर दिया गया है, तो वह संसद की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकता है और यदि वह संसद की कार्रवाई में भाग लेता है तो वह प्रत्येक दिन के लिए, जब वह संसद की कार्रवाई में भाग लेता है, 500 रुपये के जुर्माने का दायी होगा। &lt;br /&gt;
==वेतन और भत्ते==&lt;br /&gt;
संसद सदस्यों के वेतन और भत्तों के सम्बन्ध में विधि निर्माण का अधिकार संसद को दिया गया है। संसद ने इस अधिकार का प्रयोग करके संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 पारित किया है। इसमें अब तक कई बार संशोधन किये जा चुके हैं। अगस्त, [[2006]] में संसद द्वारा एक बार पुन: सांसदों के वेतन, भत्ते और पेंशन में संशोधन से सम्बन्धित विधेयक को पारित किया गया। वर्तमान समय में (2006) संसद सदस्य को मिलने वाला वेतन, भत्ता तथा अन्य सुविधाएँ निम्नलिखित प्रकार से ह-&lt;br /&gt;
#प्रत्येक संसद सदस्य को प्रति माह 16,000 रुपये वेतन निर्धारित है।&lt;br /&gt;
#प्रत्येक संसद सदस्य को अथवा उसकी समितियों की बैठक के दौरान दैनिक भत्ता 1000 रुपये तथा निजी कार्यालय के व्यय हेतु 23,000 रुपये (मासिक) दिये जाने का प्रावधान है।&lt;br /&gt;
#सांसदों को निर्वाचन क्षेत्र में जाने के लिए 20,000 रुपये भत्ता (मासिक) दिया जाता है।&lt;br /&gt;
#संसद सत्र में भाग लेने हेतु प्रत्येक संसद सदस्य को अपने निवास स्थान (गृह) से आते एवं लौटते समय रेलवे के प्रथम वातानुकूलित श्रेणी का किराया प्राप्त होता है। यह सुविधा सांसद की पत्नी या पति को भी सुलभ होती है।&lt;br /&gt;
#संसद के कार्य हेतु यात्रा करने पर सांसदों को 13 रुपये प्रति किलोमीटर की यात्रा भत्ता देय है।&lt;br /&gt;
#प्रत्येक संसद सदस्य को प्रति वर्ष 32 बार हवाई यात्रा की सुविधा उपलब्ध है। साथ ही अपनी पत्नी अथवा किसी भी एक व्यक्ति के साथ देश में कहीं पर भी वातानुकूलित प्रथम श्रेणी की मुफ़्त रेल यात्रा करने की सुविधा प्राप्त है।&lt;br /&gt;
#प्रत्येक संसद सदस्य को 50,000 यूनिट तक नि:शुल्क विद्युत प्रदान की जाती है।&lt;br /&gt;
#प्रत्येक संसद को दो टेलीफ़ोन मिलते हैं, जिसमें से एक को दिल्ली में तथा दूसरा वे निवास स्थान या निर्वाचन क्षेत्र में ले सकते हैं। इन टेलीफ़ोनों से 1 लाख 20 हज़ार तक की कॉल्स की जा सकती हैं। &lt;br /&gt;
#हर सांसद को [[दिल्ली]] के पॉश क्षेत्र में न्यूनतम किराये पर शानदार आवास मिलता है।&lt;br /&gt;
#केन्द्र तथा राज्य के चिकित्सालयों में उसे नि:शुल्क इलाज की सुविधा होती है।&lt;br /&gt;
#प्रत्येक सांसद को 30,000 रुपये तक का मुफ़्त फर्नीचर उपलब्ध कराया जाता है।&lt;br /&gt;
#प्रत्येक सांसद को केन्द्रीय विद्यालय में हर वर्ष दो नामांकन करवाने का भी अधिकार है। &lt;br /&gt;
#अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर प्रत्येक सांसद प्रतिवर्ष 100 टेलीफ़ोन और 160 एलपीजी कनेक्शन दिला सकता है।&lt;br /&gt;
#वाहन ख़रीदने के लिए प्रत्येक सांसद को बिना ब्याज़ ऋण सुविधा उपलब्ध होती है। &lt;br /&gt;
#सांसद का पद समाप्त होने के बाद वह एक व्यक्ति को साथ लेकर पूरे जीवन काल में वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी की मुफ़्त रेल यात्रा कर सकता है।&lt;br /&gt;
#यदि संसद सदस्य की मृत्यु हो जाती है, तो हवाई जहाज़, रेल या समुद्री जहाज़ के द्वारा उसके शव को वहाँ पर भेजा जाता है, जहाँ पर उसके सम्बन्धी चाहते हैं। &lt;br /&gt;
#संसद द्वारा अगस्त, 2006 में सांसदों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन अधिनियम, 1954 में संशोधन करते हुए सभी पूर्व सांसदों को 8000 रुपये प्रतिमाह न्यूनतम पेंशन प्राप्त होने तथा कार्यशील सांसद के निधन की स्थिति में परिवार को 1500 रुपये प्रतिमाह पेंशन उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। अब तक यह व्यवस्था थी कि दो बार लोकसभा चुनाव जीतने या कम से कम 4 वर्ष तक सांसद रहने पर ही पूर्व सांसद पेंशन का अधिकारी होता था। इस प्रकार जब संसद सदस्य पदमुक्त हो जाता था तो उन्हें 2500 रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलती थी। साथ ही 1000 रुपये प्रतिमाह पारिवारिक पेंशन प्राप्त था। सांसदों का वार्षिक पैकेज 25 लाख रुपये का होता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त सुविधाओं के अलावा प्रत्येक सांसद अपने क्षेत्र में 2 करोड़ रुपये का विकास कार्य करवा सकता है।&lt;br /&gt;
==वेतन तथा भत्ते==&lt;br /&gt;
*वेतन - 16,000 रुपये प्रतिमाह&lt;br /&gt;
*दैनिक भत्ता - 1000 रुपये&lt;br /&gt;
*संसदीय क्षेत्र भत्ता - 20,000 रुपये&lt;br /&gt;
*कार्यालय भत्ता - 23,000 रुपये (3000 रुपये स्टेशनरी, 1000 रुपये चिट्ठी-पत्री और शेष कार्यालय के ख़र्च हेतु)&lt;br /&gt;
*संसदीय क्षेत्र भत्ता - 13 रुपये प्रति किलोमीटर।&lt;br /&gt;
==सदनों में गणपूर्ति==&lt;br /&gt;
संसद के सदनों की कार्रवाई प्रारम्भ करने के लिए गणपूर्ति आवश्यक है। गणपूर्ति के लिए सदन के कुल सदस्यों के दसवें भाग (1/10) का सदन में उपस्थित रहना आवश्यक है। इस प्रकार वर्तमान में राज्यसभा और लोकसभा में गणपूर्ति क्रमश: 25 और 55 सदस्यों से होती है। यदि किसी समय संसद के किसी सदन की गणपूर्ति नहीं होती, तो अध्यक्ष या सभापति तब तक के लिए सदन की कार्रवाई को स्थगित कर सकता है, जब तक सदन की गणपूर्ति न हो जाए।&lt;br /&gt;
==संसद का संयुक्त अधिवेशन==&lt;br /&gt;
संविधान के अनुसार संसद का संयुक्त अधिवेशन निम्नलिखित स्थिति में बुलाया जाता है-&lt;br /&gt;
#लोकसभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के बाद प्रथम सत्र के आम्भ में, इसमें राष्ट्रपति अपना अभिभाषण देता है।&lt;br /&gt;
#प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरम्भ में, उसमें भी राष्ट्रपति अपना अभिभाषण देता है।&lt;br /&gt;
#यदि संसद के दोनों सदनों के बीच धन विधेयक को छोड़कर अन्य किसी विधेयक (जिसमें वित्त विधेयक सम्मलित है) को पारित कराने को लेकर गतिरोध उत्पन्न हो गया हो। संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संसद के दोनों सदनों के बीच असहमति का हल ढँढने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का उपबंध है। यह असहमति इस प्रकार हो सकती है-&lt;br /&gt;
*यदि संसद का एक सदन किसी विधेयक को पारित करके दूसरे सदन को भेजता है और यदि दूसरा सदन उस विधेयक को अस्वीकार कर देता है, &lt;br /&gt;
*दूसरे सदन द्वारा विधेयक में किये गये संशोधन से पहला सदन असहमत है, या &lt;br /&gt;
*दूसरा सदन विधेयक को 6 मास तक अपने पास रोक रखता है, तो राष्ट्रपति दोनों सदनों के संयुक्त बैठक को बुला सकता है। &lt;br /&gt;
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रपति दोनों सदनों के बीच असहमति होने पर उसकी संयुक्त बैठक आहूत करने के अपने आशय की अधिसूचना देता है। यदि विधेयक लोकसभा का विघटन होने के कारण व्यपगत हो गया है, तो राष्ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना नहीं निकाली जाएगी। किन्तु यदि राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक करने के अपने आशय की अधिसूचना जारी कर दी है तो लोकसभा के पश्चातवर्ती विघटन से संयुक्त बैठक में कोई बाधा नहीं आएगी। ऐसी संयुक्त बैठक की अध्यक्षता [[लोकसभा अध्यक्ष]] करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 118(4) के अनुसार लोकसभा के अध्यक्ष की अनुपस्थिति में वह व्यक्ति पीठासीन होगा जो राष्ट्रपति द्वारा बनायी गयी प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित हो। यह नियम राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष के परामर्श से बनाये जायेंगे। उपबंध के अनुसार, &amp;quot;संयुक्त बैठक में लोकसभा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में के दौरान लोकसभा का उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो राज्यसभा का उपसभापति या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा अन्य व्यक्ति पीठासीन (अध्यक्ष) होगा जो उस बैठक में उपस्थित सदस्यों के द्वारा अवधारित किया जाये।&amp;quot; &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
लोकसभा का अध्यक्ष जो कि संयुक्त बैठक या पीठासीन होता है, ही संयुक्त बैठक की प्रक्रिया ऐसे रूप, भेदों तथा परिवर्तनों के साथ लागू करता है जैसा वह आवश्यक अथवा उचित समझता है। लोकसभा का महासचिव प्रत्येक संयुक्त बैठक की कार्रवाई का सम्पूर्ण दस्तावेज़ तैयार करता है तथा उसे यथाशीघ्र ऐसे रूप में तथा ऐसी नीति से प्रकाशित करता है जैसा कि अध्यक्ष समय-समय पर निर्देश देता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसद के संयुक्त अधिवेशन के लिए गणपूर्ति दोनों सदनों के सदस्यों की कुल संख्या का 1/10 भाग होती है। अनुच्छेद 108 द्वारा विहित संयुक्त बैठक की प्रक्रिया केवल सामान्य विधायन तक ही सीमित है, संविधान संशोधन के सम्बन्ध में यह लागू नहीं होती। ध्यातव्य है कि संविधान संशोधन (अनुच्छेद 368) विधेयक को प्रत्येक सदन द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश के संसदीय इतिहास में अब तक केवल तीर बार किसी विवादित विधेयक को पारित करवाने के लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन आहूत किया गया है। पहली बार संयुक्त अधिवेशन 1961 में प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के काल में दहेज विरोधी अधिनियम को पारित कराने के लिए तथा दूसरी बार प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के कार्यकाल में 1978 में बैकिंग सेवा आयोग विधेयक पर विचार करने हेतु आहूत किया गया था। तीसरी बार संसद का संयुक्त अधिवेशन 26 मार्च, 2002 को बहुचर्चित एवं बहुविवादित आतंकवाद विरोधी विधेयक, 2002 पारित कराने के उद्देश्य से आहूत किया गया। &lt;br /&gt;
==प्रयोग की जाने वाली भाषा==&lt;br /&gt;
संसद की कार्रवाई [[अंग्रेज़ी]] या [[हिन्दी]] में होगी, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा का सभापति किसी सदस्य को उसकी मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकता है।&lt;br /&gt;
==कार्य एवं शक्तिया==&lt;br /&gt;
यद्यपि संसद प्रभुसत्ता सम्पन्न नहीं है, लेकिन उसे निम्नलिखित कार्य एवं शक्तियाँ संविधान द्वारा प्रदान की गई हैं-&lt;br /&gt;
====विधि निर्माण की शक्ति====&lt;br /&gt;
संसद को सातवीं अनुसूची के संघ सूची तथा समवर्ती सूची में अन्तर्विट विषयों पर विधि निर्माण का पूर्ण अधिकार है, लेकिन उसे निम्नलिखित स्थितियों में राज्य सूची में शामिल किये गये विषयों पर भी विधि निर्माण का अधिकार है–&lt;br /&gt;
#जब राष्ट्रीय आपात या राज्य में आपात स्थिति प्रवर्तन में हो (अनुच्छेद 250)।&lt;br /&gt;
#जब दो या दो से अधिक राज्य के विधानमण्डल प्रस्ताव पारित करके संसद से विधि निर्माण, का अनुरोध करें (अनुच्छेद 252)।&lt;br /&gt;
#जब राज्यसभा दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संसद से विधि निर्माण का अनुरोध करे (अनुच्छेद 249)।&lt;br /&gt;
====वित्तीय शक्ति====&lt;br /&gt;
संसद को संघ के वित्त पर पूर्ण अधिकार है। प्राक्कलन समिति तथा लोक लेखा समिति का गठन संसद द्वारा किया जाता है तथा भारत की संचित निधि पर संसद का पूर्ण नियत्रंण रहता है। संसद द्वारा निर्मित विधि के प्रावधानों के अनुसार ही भारत की संचित निधि से धन निकाला जा सकता है। संसद को आकस्मिक निधि को भी स्थापित करने का अधिकार है। संसद के समक्ष वार्षिक बजट पेश किया जाता है, जिसमें वर्ष के प्राक्कलित प्राप्तियों तथा व्ययों का विवरण होता है। उसके अतिरिक्त संसद को विनियोग विधेयक, अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान, लेखानुदान, प्रत्यानुदान तथा अपवादानुदान के सम्बन्ध में पर्याप्त शक्ति है। कराधान प्रस्तावों को प्रवर्तित करने हेतु संसद को वित्त विधेयक पारित करने की शक्ति है।&lt;br /&gt;
====कार्यपालिका सम्बन्धी शक्ति====&lt;br /&gt;
संसद सदस्यों में से ही सत्तापक्ष के सदस्यों से [[मंत्रि परिषद]] का गठन किया जाता है। संसद सदस्य कई प्रस्तावों के माध्यम से मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण रखते हैं तथा मंत्रिपरिषद को संसद (विशेषकर लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी बनाये रखते हैं।&lt;br /&gt;
====राज्यों से सम्बन्धित शक्ति====&lt;br /&gt;
संसद राज्यों के सीमाओं तथा नामों में परिवर्तन कर सकती है, नये राज्यों का गठन कर सकती है, राज्यों का विभाजन कर सकती है तथा कई राज्यों को मिलाकर एक राज्य बना सकती है। साथ ही किसी विद्यमान राज्य को किसी विद्यमान राज्य में मिला सकती है।&lt;br /&gt;
====संविधान संशोधन की शक्ति====&lt;br /&gt;
संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है, लेकिन संसद को यह अधिकार असीमित नहीं हैं, क्योंकि संसद संविधान संशोधन द्वारा संविधान के मूल ढाँचे को परिवर्तित नहीं कर सकती है।&lt;br /&gt;
====निर्वाचन सम्बन्धी कार्य====&lt;br /&gt;
संसद के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेते हैं तथा संसद उपराष्ट्रपति को निर्वाचित करती है।&lt;br /&gt;
====महाभियोग की शक्ति====&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 61 के अनुसार संसद को राष्ट्रपति तथा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्याधीशों को महाभियोग प्रक्रिया के द्वारा पदमुक्त करने का भी अधिकार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संसद}}{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:संसद]]&lt;br /&gt;
[[Category:कार्यपालिका]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Vinay krishan</name></author>
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