मणिकर्णिका घाट वाराणसी

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मणिकर्णिका घाट, वाराणसी

मणिकर्णिका घाट वाराणसी में स्थित गंगा नदी का एक घाट है। इस घाट का निर्माण महाराजा, इंदौर ने करवाया है। पौराणिक मान्यताओं से जुड़े मणिकर्णिका घाट का धर्मप्राण जनता में मरणोपरांत अंतिम संस्कार के लिहाज़ से अत्यधिक महत्त्व है। इस घाट की गणना काशी के पंचतीर्थो में की जाती है। मणिकर्णिका घाट पर स्थित भवनों का निर्माण पेशवा बाजीराव तथा अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। वाराणसी (काशी) में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। वाराणसी में लगभग 84 घाट हैं। ये घाट लगभग 4 मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं। वाराणसी के 84 घाटों में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से 'पंचतीर्थ' कहा जाता है। ये हैं असी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट।

मणिकर्णिका स्नान

मणिकर्णिका घाट, वाराणसी

मणिकर्णिका स्नान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता का उत्सव है। इस दिन वाराणसी में लाखों श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना करते हैं।  कहा गया है, "काश्यां मरणं मुक्तिः, स्नानं मणिकर्णिकायाम्" अर्थात्: काशी में मरण मुक्ति का द्वार है और मणिकर्णिका में स्नान उसका प्रारंभ। हर साल कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्दशी को यहाँ मणिकर्णिका स्नान का विशेष पर्व मनाया जाता है, जिसे वैकुंठ चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन का स्नान केवल शरीर की शुद्धि के लिए नहीं बल्कि आत्मा की मुक्ति के लिए किया जाता है। कहा जाता है, इस दिन गंगा के पवित्र जल में स्नान करने से भगवान शिव और विष्णु दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

मोक्षभूमि काशी

वाराणसी का मणिकर्णिका घाट न केवल गंगा के तट का सबसे प्राचीन स्थान है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु के रहस्यों का संगम भी है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति यहां स्नान करता है या देह त्यागता है, उसे भगवान शिव स्वयं मोक्ष प्रदान करते हैं। इसी कारण इसे मोक्षभूमि काशी का हृदय भी कहा जाता है।

नाम और 51 शक्ति पीठ

मणिकर्णिका घाट का नाम दो शब्दों से बना है मणि (रत्न) और कर्णिका (कान)। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता सती के कान के आभूषण (मणिकर्ण) इसी स्थान पर गिरे थे, जिससे इसका नाम मणिकर्णिका घाट पड़ा। पुराणों के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से किया, तो वे इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे। एक बार दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। जब सती वहां पहुंचीं और अपने पति का अपमान सुना तो उन्होंने यज्ञ अग्नि में आत्मदाह कर लिया। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ, तो वे क्रोध और दुःख से व्याकुल होकर सती के शरीर को उठाए पृथ्वी पर घूमने लगे। उनके इस तांडव से तीनों लोकों में भय फैल गया। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए, जिससे 51 शक्ति पीठों की उत्पत्ति हुई। इसी क्रम में जब सती के कर्ण-आभूषण गिरे, तो वह स्थान वाराणसी का मणिकर्णिका घाट कहलाया। कहा जाता है कि उसी स्थान पर भगवान विष्णु ने भी स्नान कर अपने चक्र प्रहार के पाप से मुक्ति पाई थी। तभी से यहां मणिकर्णिका स्नान का आरंभ हुआ, जो आज भी मोक्षदायिनी परंपरा के रूप में जीवित है।

मणिकर्णिका घाट सबसेे पवित्र घाट

मणिकर्णिका घाट को महा श्मशान कहा गया है, क्योंकि यहाँ चिता की अग्नि कभी बुझती नहीं।कहते हैं, यहाँ एक चिता की अग्नि समाप्त होती नहीं कि दूसरी चिता जल उठती है।यहाँ मृत्यु भी पवित्र मानी जाती है, क्योंकि ऐसा विश्वास है कि इस घाट पर देह त्यागने वाला सीधे मोक्ष प्राप्त करता है।यही कारण है कि हिंदू धर्म में यह घाट जीवन-मरण के रहस्यों का सबसे बड़ा साक्षी माना जाता है।

मणिकर्णिका स्नान का महत्व

धर्मानुसार कार्तिक मास में भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।ऐसा कहा जाता है कि सबसे पहले भगवान विष्णु ने ही वैकुंठ चतुर्दशी के दिन मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया था। स्नान के बाद उन्होंने भगवान शिव की आराधना के लिए एक हजार कमल के फूल अर्पित किए। लेकिन शिव जी नेने विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए एक कमल छिपा दिया।जब भगवान विष्णु को एक कमल कम मिला, तो उन्होंने अपना एक नेत्र भगवान शिव को अर्पित करने का निश्चय किया। जैसे ही वह नेत्र अर्पण करने लगे, भोलेनाथ प्रकट हुए और प्रसन्न होकर बोले हे विष्णु, तुमसे बड़ा मेरा भक्त कोई नहीं है। जो भी इस दिन मणिकर्णिका घाट पर स्नान और पूजा करेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।

मणिकर्णिका स्नान विधि

मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने से पहले श्रद्धा और संकल्प सबसे आवश्यक है।यदि आप काशी में उपस्थित हैं, तो गंगा तट पर जाकर ब्रह्म मुहूर्त या रात्रि के तीसरे प्रहर में स्नान करें। स्नान से पहले यह संकल्प लें । मैं भगवान शिव और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति के लिए मणिकर्णिका स्नान कर रहा/रही हूँ।स्नान के दौरान यह मंत्र जपना शुभ माना गया है:“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” “ॐ नमः शिवाय”।

स्नान के बाद दीप प्रवाहित करें, भगवान शिव पर जल चढ़ाएँ और भगवान विष्णु को तुलसीपत्र अर्पित करें।संध्या समय दीपदान और अन्नदान करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। यदि कोई कारणवश काशी जाकर स्नान करना संभव न हो, तो निराश न हों। आप अपने घर पर ही श्रद्धा से गंगा जल की कुछ बूंदें नहाने के पानी में मिलाकर स्नान करें।गंगा जी का स्मरण करते हुए “हर हर गंगे” का जप करें।इसके बाद दीपदान और भगवान शिव-विष्णु की संयुक्त पूजा करें।ऐसा करने से भी पुण्य फल प्राप्त होता है, जो काशी में जाकर स्नान करने से मिलता है। स्नान के बाद तुलसी और बेलपत्र से भगवान की पूजा करें।भोजन में सात्विक व्यंजन ग्रहण करें और यथासंभव व्रत रखें।गरीबों को वस्त्र, अन्न या मिठाई बाँटना बाँटना अत्यंत शुभ माना गया है।

कथा

शिव महापुराण के अनुसार इस पृथ्वी पर जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्गुण, निर्विकार तथा सनातन ब्रह्मस्वरूप ही है। अपने कैवल्य (अकेला) भाव में रमण करने वाले अद्वितीय परमात्मा में जब एक से दो बनने की इच्छा हुई, तो वही सगुणरूप में ‘शिव’ कहलाने लगा। शिव ही पुरुष और स्त्री, इन दो हिस्सों में प्रकट हुए और उस पुरुष भाग को शिव तथा स्त्रीभाग को ‘शक्ति’ कहा गया। उन्हीं सच्चिदानन्दस्वरूप शिव और शक्ति ने अदृश्य रहते हुए स्वभाववश प्रकृति और पुरुषरूपी चेतन की सृष्टि की। प्रकृति और पुरुष सृष्टिकर्त्ता अपने माता-पिता को न देखते हुए संशय में पड़ गये। उस समय उन्हें निर्गुण ब्रह्म की आकाशवाणी सुनाई पड़ी– ‘तुम दोनों को तपस्या करनी चाहिए, जिससे कि बाद में उत्तम सृष्टि का विस्तार होगा।’ उसके बाद भगवान शिव ने तप:स्थली के रूप में तेजोमय पाँच कोस के शुभ और सुन्दर एक नगर का निर्माण किया, जो उनका ही साक्षात रूप था। उसके बाद उन्होंने उस नगर को प्रकृति और पुरुष के पास भेजा, जो उनके समीप पहुँच कर आकाश में ही स्थित हो गया। तब उस पुरुष (श्री हरि) ने उस नगर में भगवान शिव का ध्यान करते हुए सृष्टि की कामना से वर्षों तपस्या की। तपस्या में श्रम होने के कारण श्री हरि (पुरुष) के शरीर से श्वेतजल की अनेक धाराएँ फूट पड़ीं, जिनसे सम्पूर्ण आकाश भर गया। वहाँ उसके अतिरकित कुछ भी दिखाई नहीं देता था। उसके बाद भगवान विष्णु (श्री हरि) मन ही मन विचार करने लगे कि यह कैसी विचित्र वस्तु दिखाई देती है। उस आश्चर्यमय दृश्य को देखते हुए जब उन्होंने अपना सिर हिलाया, तो उनके एक कान से मणि खिसककर गिर पड़ी। मणि के गिरने से वह स्थान ‘मणिकर्णिका-तीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।[1]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

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