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गिरीश कर्नाड (जन्म:19 मई, 1938) एक जाने माने कवि, रंगमंच कर्मी, कहानी लेखक, नाटककार, फ़िल्म निर्देशक और फ़िल्म अभिनेता हैं। गिरीश कर्नाड को 1994 में [[साहित्य अकादमी पुरस्कार]], 1998 में [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] के अलावा [[पद्म श्री]] और [[पद्म भूषण]] से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने [[हिन्दी]] में उत्सव, मंथन, इकबाल, डोर जैसी फिल्मों में काम किया। कन्नड़ फिल्म ‘संस्कार’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया जा चुका है।
गिरीश कर्नाड (जन्म:19 मई, 1938) एक जाने माने कवि, रंगमंच कर्मी, कहानी लेखक, नाटककार, फ़िल्म निर्देशक और फ़िल्म अभिनेता हैं। गिरीश कर्नाड को 1994 में [[साहित्य अकादमी पुरस्कार]], 1998 में [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] के अलावा [[पद्म श्री]] और [[पद्म भूषण]] से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने [[हिन्दी]] में उत्सव, मंथन, इकबाल, डोर जैसी फिल्मों में काम किया।  
==जीवन परिचय==
==जीवन परिचय==
गिरीश कर्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को माथेरान, [[महाराष्ट्र]] में हुआ था। बचपन से उनकी रुचि नाटकों की तरफ थी। महाराष्ट्र में जन्में गिरीश ने स्कूल के समय से ही थियेटर से जुड़कर काम करना शुरु कर दिया था। कर्नाटक आर्ट कॉलेज से स्नातक करने के बाद वह [[इंग्लैण्ड]] चले गए। जहाँ उन्होंने आगे की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद गिरीश कर्नाड [[भारत]] लौट आए और [[चेन्नई]] में ''ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी'' में सात साल तक काम करने के बाद इस्तीफा दे दिया। इस दौरान वह चेन्नई के कई आर्ट और थियेटर क्लबों से जुड़े रहे। इसके बाद वह शिकागो चले गए जहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी और शिकागो में बतौर प्रोफ़ेसर काम किया। तत्पश्चात गिरीश [[भारत]] दुबारा वापस लौट आए और अपने साहित्य के अपार ज्ञान से क्षेत्रीय भाषाओं में कई फ़िल्में भी बनाईं और साथ ही कई फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी।{{cite web |url=http://days.jagranjunction.com/2011/05/19/profile-of-girish-karnad/ |title=जन्मदिन विशेषांक: गिरीश कर्नाड |accessmonthday=20 जनवरी |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=जागरण जंक्शन |language=हिन्दी }}  
गिरीश कर्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को माथेरान, [[महाराष्ट्र]] में हुआ था। बचपन से उनकी रुचि नाटकों की तरफ थी। महाराष्ट्र में जन्में गिरीश ने स्कूल के समय से ही थियेटर से जुड़कर काम करना शुरु कर दिया था। कर्नाटक आर्ट कॉलेज से स्नातक करने के बाद वह [[इंग्लैण्ड]] चले गए। जहाँ उन्होंने आगे की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद गिरीश कर्नाड [[भारत]] लौट आए और [[चेन्नई]] में ''ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी'' में सात साल तक काम करने के बाद इस्तीफा दे दिया। इस दौरान वह चेन्नई के कई आर्ट और थियेटर क्लबों से जुड़े रहे। इसके बाद वह शिकागो चले गए जहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी और शिकागो में बतौर प्रोफ़ेसर काम किया। तत्पश्चात गिरीश [[भारत]] दुबारा वापस लौट आए और अपने साहित्य के अपार ज्ञान से क्षेत्रीय भाषाओं में कई फ़िल्में भी बनाईं और साथ ही कई फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी।<ref name="JJ">{{cite web |url=http://days.jagranjunction.com/2011/05/19/profile-of-girish-karnad/ |title=जन्मदिन विशेषांक: गिरीश कर्नाड |accessmonthday=20 जनवरी |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=जागरण जंक्शन |language=हिन्दी }} </ref>
==कार्यक्षेत्र==
==कार्यक्षेत्र==
गिरीश कर्नाड एक सफल पटकथा लेखक होने के साथ एक बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक भी हैं। गिरीश ने [[कन्नड़ भाषा]] में अपनी रचनाएं लिखीं। जिस समय उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया, उस समय कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था। लेखकों के बीच किसी ऐसी चीज के बारे में लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नयी थी। इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया तथा काफ़ी लोकप्रिय हुए।  
गिरीश ने [[कन्नड़ भाषा]] में अपनी रचनाएं लिखीं। जिस समय उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया, उस समय कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था। लेखकों के बीच किसी ऐसी चीज के बारे में लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नयी थी। इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया तथा काफ़ी लोकप्रिय हुए। गिरीश कर्नाड के नाटक ययाति (1961, प्रथम नाटक) तथा तुग़लक़ (1964) ऐसे ही नाटकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तुगलक से कर्नाड को बहुत प्रसिद्धि मिली और इसका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ।


गिरीश कर्नाड के नाटक ययाति (1961, प्रथम नाटक) तथा तुग़लक़ (1964) ऐसे ही नाटकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तुगलक से कर्नाड को बहुत प्रसिद्धि मिली और इसका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ।
====सिनेमा====
गिरीश कर्नाड एक सफल पटकथा लेखक होने के साथ एक बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक भी हैं। गिरीश कर्नाड ने वर्ष 1970 में कन्नड़ फ़िल्म 'संस्कार' से अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की जिसकी पटकथा उन्होंने ही लिखी थी। इस फिल्म को कई पुरस्कार मिले जिसके बाद गिरीश ने कई फिल्में की। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया, जिसमें निशांत, मंथन, पुकार आदि प्रमुख हैं।<ref name="JJ"/>


==सम्मान और पुरस्कार==
==सम्मान और पुरस्कार==
* 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
* 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
* 1974 में  [[पद्मश्री]]
* 1974 में  [[पद्मश्री]]
* 1992 में  [[पद्मभूषण]]
* 1992 में  [[पद्मभूषण]]
* 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार
* 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार
* 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार
* 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार
* 1998 में [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]]
* 1998 में [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]]
 
* 1998 में कालिदास सम्मान
* इसके अतिरिक्त गिरीश कर्नाड को कन्नड़ फिल्म ‘संस्कार’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का [[राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार|राष्ट्रीय पुरस्कार]] भी मिल चुका है।




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==बाहरी कड़ियाँ==
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*[http://in.jagran.yahoo.com/cinemaaza/cinema/news/201_203_204431.html थियेटर का कोई विकल्प नही: गिरीश कर्नाड]
*[http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3377726.cms गिरीश कर्नाड वर्ल्ड थिएटर के ऐंबैसडर चुने गए]
==संबंधित लेख==
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13:29, 20 जनवरी 2012 का अवतरण

गिरीश कर्नाड (जन्म:19 मई, 1938) एक जाने माने कवि, रंगमंच कर्मी, कहानी लेखक, नाटककार, फ़िल्म निर्देशक और फ़िल्म अभिनेता हैं। गिरीश कर्नाड को 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार के अलावा पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने हिन्दी में उत्सव, मंथन, इकबाल, डोर जैसी फिल्मों में काम किया।

जीवन परिचय

गिरीश कर्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को माथेरान, महाराष्ट्र में हुआ था। बचपन से उनकी रुचि नाटकों की तरफ थी। महाराष्ट्र में जन्में गिरीश ने स्कूल के समय से ही थियेटर से जुड़कर काम करना शुरु कर दिया था। कर्नाटक आर्ट कॉलेज से स्नातक करने के बाद वह इंग्लैण्ड चले गए। जहाँ उन्होंने आगे की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद गिरीश कर्नाड भारत लौट आए और चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में सात साल तक काम करने के बाद इस्तीफा दे दिया। इस दौरान वह चेन्नई के कई आर्ट और थियेटर क्लबों से जुड़े रहे। इसके बाद वह शिकागो चले गए जहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी और शिकागो में बतौर प्रोफ़ेसर काम किया। तत्पश्चात गिरीश भारत दुबारा वापस लौट आए और अपने साहित्य के अपार ज्ञान से क्षेत्रीय भाषाओं में कई फ़िल्में भी बनाईं और साथ ही कई फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी।[1]

कार्यक्षेत्र

गिरीश ने कन्नड़ भाषा में अपनी रचनाएं लिखीं। जिस समय उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया, उस समय कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था। लेखकों के बीच किसी ऐसी चीज के बारे में लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नयी थी। इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया तथा काफ़ी लोकप्रिय हुए। गिरीश कर्नाड के नाटक ययाति (1961, प्रथम नाटक) तथा तुग़लक़ (1964) ऐसे ही नाटकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तुगलक से कर्नाड को बहुत प्रसिद्धि मिली और इसका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ।

सिनेमा

गिरीश कर्नाड एक सफल पटकथा लेखक होने के साथ एक बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक भी हैं। गिरीश कर्नाड ने वर्ष 1970 में कन्नड़ फ़िल्म 'संस्कार' से अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की जिसकी पटकथा उन्होंने ही लिखी थी। इस फिल्म को कई पुरस्कार मिले जिसके बाद गिरीश ने कई फिल्में की। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया, जिसमें निशांत, मंथन, पुकार आदि प्रमुख हैं।[1]

सम्मान और पुरस्कार

  • 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  • 1974 में पद्मश्री
  • 1992 में पद्मभूषण
  • 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार
  • 1998 में कालिदास सम्मान
  • इसके अतिरिक्त गिरीश कर्नाड को कन्नड़ फिल्म ‘संस्कार’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 जन्मदिन विशेषांक: गिरीश कर्नाड (हिन्दी) जागरण जंक्शन। अभिगमन तिथि: 20 जनवरी, 2012।

बाहरी कड़ियाँ

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