चुनाव आयोग

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भारतीय चुनाव आयोग / भारतीय निर्वाचन आयोग (अंग्रेज़ी: Election Commission of India) एक स्वायत्त एवं अर्ध-न्यायिक संस्था है। इसका गठन भारत में स्तवंत्र एवं निष्पक्ष रूप से प्रतिनिधिक संस्थानों में जन प्रतिनिधि चुनने के लिए किया गया था। 'भारतीय चुनाव आयोग' की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को की गई थी। आयोग में वर्तमान में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। भारत जैसे बड़े और भारी जनसंख्‍या वाले देश में चुनाव कराना एक बहुत बड़ा काम है। संसद के दोनों सदनों-लोकसभा और राज्य सभा के लिए चुनाव बेरोक-टोक और निष्‍पक्ष हों, इसके लिए एक स्‍वतंत्र चुनाव (निर्वाचन) आयोग बनाया गया है। भारत के निर्वाचन अायोग से जुड़े महत्‍वपूर्ण तथ्‍य इस प्रकार हैं-

  1. संविधान के भाग-15 के अनुच्छेद-324 से 329 में निर्वाचन से संबंधित उपबंध दिया गया है।
  2. निर्वाचन आयोग का गठन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्तों से किया जाता है, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है।
  3. मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो तब तक होगा। अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु जो पहले हो तब तक रहता है।
  4. मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के बराबर वेतन (90 हजार रुपये मासिक) एवं भत्ते प्राप्त होंगे।
  5. पहले चुनाव आयोग एक सदस्यीय आयोग था, लेकिन अक्टूबर 1993 में तीन सदस्यीय आयोग बना दिया गया।

संवैधानिक निकाय

भारत एक समाजवादी, धर्म निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य एवं विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। आधुनिक भारतीय राष्ट्र राज्य 15 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में आया था। तब से संविधान में प्रतिष्ठापित सिद्धान्तों, निर्वाचन विधियों तथा पद्धति के अनुसार नियमित अन्तरालों पर स्वतंत्र तथा निष्पक्ष निर्वाचनों का संचालन किया गया है। भारत के संविधान ने संसद और प्रत्येक राज्य के विधान मंडल तथा भारत के राश्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के संचालन की पूरी प्रक्रिया का अधीक्षण, निदेशन तथा नियंत्रण का उत्तरदायित्व भारत निर्वाचन आयोग को सौंपा है। भारत निर्वाचन आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है। संविधान के अनुसार निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को की गई थी। आयोग ने अपनी स्वर्ण जयंती वर्ष 2001 में मनाई थी। प्रारम्भ में, आयोग में केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे। वर्तमान में इसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त हैं। 16 अक्तूबर, 1989 को पहली बार दो अतिरिक्त आयुक्तों की नियुक्ति की गई थी परन्तु उनका कार्यकाल बहुत कम था जो 1 जनवरी, 1990 तक चला। तत्पश्चात 1 अक्तूबर, 1993 को दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई थी। तब से आयोग की बहु-सदस्यीय अवधारणा प्रचलन में है, जिसमें निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है।

निर्वाचन आयोग के मुख्य कार्य

  1. चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन।
  2. मतदाता सूचियों को तैयार करवाना।
  3. विभिन्न राजनितिक दलों को मान्यता प्रदान करना।
  4. राजनितिक दलों को आरक्षित चुनाव चिन्ह प्रदान करना।
  5. चुनाव करवाना।
  6. राजनितिक दलों के लिए आचार संहिता तैयार करवाना।

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के लिए संवैधानिक प्रावधान

  1. निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है अर्थात इसका निर्माण संविधान ने किया है।
  2. मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।
  3. मुख्य चुनाव आयुक्त महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है।
  4. मुख्य चुनाव आयुक्त का दर्जा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश के समान ही है।
  5. नियुक्ति के पश्चात मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों की सेवा सशर्तों में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।
  6. मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों का वेतन भरता की संचित निधि में से दिया जाता है।

आयुक्तों की नियुक्ति एवं कार्यकाल

मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उनका कार्यकाल 6 वर्ष तक, या 65 वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पहले हो, तक का होता है। उनका वही स्तर होता है जो कि भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का होता है तथा उन्हें उनके समतुल्य ही वेतन और अनुलाभ मिलते हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से, केवल संसद द्वारा महाभियोग के माध्यम से हटाया जा सकता है।

कार्य निष्पादन

आयोग अपने कार्यों का निष्पादन, नियमित बैठकों के आयोजन और दस्तावेजों के परिचालन द्वारा करता है। आयोग द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी निर्वाचन आयुक्तों के पास समान अधिकार होते हैं। समय-समय पर आयोग अपने सचिवालय में अपने अधिकारियों को कुछ कार्यकारी प्रकार्यों का प्रत्यायोजन करता है।

संरचना

आयोग का नई दिल्ली में एक पृथक सचिवालय है जिसमें लगभग 300 अधिकारी/कर्मचारी पदानुक्रम रूप से कार्य करते हैं। आयोग के कार्यों में सहयोग देने के लिए सचिवालय के वरिष्ठतम अधिकारी के रूप में दो या तीन उप निर्वाचन आयुक्त और महानिदेशक होते हैं। वे सामान्यतः देश की राष्ट्रीय सिविल सेवा से नियुक्त किए जाते हैं और उनका चयन व कार्यकाल सहित उनकी नियुक्ति आयोग द्वारा की जाती है। इसी तरह से, निदेशक, प्रधान सचिव, सचिव, अवर सचिव और उप निदेशक, उप निर्वाचन आयुक्तों और महानिदेशकों को सहयोग देते हैं। आयोग में कार्य का प्रकार्यात्मक और प्रादेशिक वितरण किया गया है। कार्य को डिविजनों, शाखाओं और अनुभागों में वितरित किया गया है; उल्लिखित इकाईयों में से प्रत्येक आखिरी इकाई अनुभाग अधिकारी के प्रभार में होती है। मुख्य प्रकार्यात्मक प्रभाग हैः योजना, न्यायिक, प्रशासन, सुव्यवस्थित मतदाता शिक्षा एवं निर्वाचक सहभागिता (स्वीप), सूचना प्रणालियां, मीडिया और सचिवालय समन्वयन। विभिन्न जोन के लिए उत्तरदायी पृथक-इकाईयों के मध्य प्रादेशिक कार्य का बँटवारा किया गया है जिसके लिए प्रबंधन की सुविधा हेतु देश के 35 संघटक राज्यों और संघ राज्य-क्षेत्रों को समूहीकृत किया गया है।

राज्य स्तर पर निर्वाचन कार्य का अधीक्षण राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा आयोग के समग्र अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अध्यधीन किया जाता है, इन मुख्य निर्वाचन अधिकारियों की नियुक्ति संबंधित राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित वरिष्ठ सिविल सेवकों में से आयोग द्वारा की जाती है। अधिकतर राज्यों में वे एक पूर्णकालिक अधिकारी होते हैं और उनके पास सहायक स्टाफ की छोटी सी एक टीम होती है।

जिला एवं निर्वाचन क्षेत्र स्तरों पर जिला निर्वाचन अधिकारी, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और रिटर्निंग अधिकारी होते हैं जिन्हें बड़ी संख्या में कनिष्ठ पदाधिकारियों का सहयोग मिलता है और वे निर्वाचन कार्य निष्पादित करते हैं। वे सभी अपने अन्य दायित्वों के अतिरिक्त निर्वाचनों से संबंधित अपने प्रकार्यों का भी निष्पादन करते हैं। तथापि, निर्वाचन के दौरान, वे आयोग के लिए कमोबेश, पूर्णकालिक आधार पर उपलब्ध होते हैं।

देश व्यापी स्तर पर साधारण निर्वाचन का संचालन करने के लिए अति विशाल कार्यबल में लगभग पाँच मिलियन निर्वाचन कर्मी एवं सिविल पुलिस बल शामिल हैं। यह विशाल निर्वाचन तंत्र निर्वाचन आयोग की प्रतिनियुक्ति पर माना जाता है और निर्वाचन अवधि, जो डेढ़ से दो महीनों की अवधि तक विस्तारित होती है, के दौरान उसके नियंत्रण, अधीक्षण एवं अनुशासन के अध्यधीन होता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त

चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। पहले यह अवधि 65 साल तक होती थी। प्रोटोकाल में चुनाव आयुक्त/निर्वाचन आयुक्त का सम्मान और वेतन भारत के सर्वोच्च न्यायलय के न्यायधीश के सामान होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद द्वारा महाभियोग के द्वारा ही हटाया जा सकता हैं।

संसद सदस्‍यों का चुनाव

  • लोक सभा के लिए सामान्‍य चुनाव जब उसकी कार्यवधि समाप्‍त होने वाली हो या उसके भंग किए जाने पर कराए जाते हैं।
  • भारत का प्रत्‍येक नागरिक जो 18 वर्ष का या उससे अधिक हो मतदान का अधिकारी है।
  • लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए कम से कम आयु 25 वर्ष है और राज्‍य सभा के लिए 30 वर्ष।

राज्‍य सभा

राज्‍य सभा के सदस्‍य राज्‍यों के लोगों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। इनका चुनाव राज्‍य की विधानसभा के चुने हुए सदस्‍यों द्वारा होता है। राज्‍य सभा में स्‍थान भरने के लिए राष्‍ट्रपति, चुनाव आयोग द्वारा सुझाई गई तारीख को, अधिसूचना जारी करता है। जिस तिथि को सेवानिवृत्त होने वाले सदस्‍यों की पदावधि समाप्‍त होनी हो उससे तीन मास से अधिक समय से पूर्व ऐसी अधिसूचना जारी नहीं की जाती। चुनाव अधिकारी, चुनाव आयोग के अनुमोदन से मतदान का स्‍थान निर्धारित और अधिसूचित करता है।

लोक सभा

नयी लोक सभा के चुनाव के लिए राष्‍ट्रपति, राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा, चुनाव आयोग द्वारा सुझाई गई तिथि को, सभी संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों से सदस्‍य चुनने के लिए कहता है। अधिसूचना जारी किए जाने के पश्‍चात चुनाव आयोग नामांकन पत्र दायर करने, उनकी छानबीन करने, उन्‍हें वापस लेने और मतदान के लिए तिथियां निर्धारित करता है। लोक सभा के लिए प्रत्‍यक्ष चुनाव होने के कारण भारत के राज्‍य क्षेत्र को उपयुक्‍त प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा जाता है। प्रत्‍येक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से एक सदस्‍य को चुना जाता है।

स्‍थान रिक्त होना

यदि एक सदन का कोई सदस्‍य दूसरे सदन के लिए भी चुन लिया जाता है तो पहले सदन में उसका स्‍थान उस तिथि से ख़ाली हो जाता है जब वह अन्‍य सदन के लिए चुना गया हो। इसी प्रकार, यदि वह किसी राज्‍य विधानमंडल के सदस्‍य के रूप में भी चुन लिया जाता है तो, यदि वह राज्‍य विधानमंडल में अपने स्‍थान से, राज्‍य के राजपत्र में घोषणा के प्रकाशन से 14 दिनों के भीतर, त्‍यागपत्र नहीं दे देता तो, संसद का सदस्‍य नहीं रहता। यदि कोई सदस्‍य, सदन की अनुमति के बिना 60 दिन की अवधि तक सदन की किसी बैठक में उपस्‍थित नहीं होता तो वह सदन उसके स्‍थान को रिक्‍त घोषित कर सकता है। इसके अलावा, किसी सदस्‍य को सदन में अपना स्‍थान रिक्‍त करना पड़ता है यदि-

  1. वह लाभ का कोई पद धारण करता है
  2. उसे विकृत चित्त वाला व्‍यक्‍ति या दिवालिया घोषित कर दिया जाता है
  3. वह स्‍वेच्‍छा से किसी विदेशी राज्‍य की नागरिकता प्राप्‍त कर लेता है
  4. उसका निर्वाचन न्‍यायालय द्वारा शून्‍य घोषित कर दिया जाता है
  5. वह सदन द्वारा निष्‍कासन का प्रस्‍ताव स्‍वीकृत किए जाने पर निष्‍कासित कर दिया जाता है
  6. वह राष्‍ट्रपति या किसी राज्‍य का राज्‍यपाल चुन लिया जाता है

यदि किसी सदस्‍य को संविधान की दसवीं अनुसूची के उपबंधों के अंतर्गत दल-बदल के आधार पर अयोग्‍य सिद्ध कर दिया गया हो, तो उस स्‍थिति में भी उसकी सदस्‍यता समाप्‍त हो सकती है।

राज्य संरचना

संधीय स्तर पर मुख्य चुनाव आयुक्त / मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अनुरूप राज्य स्तर पर प्रत्येक राज्य में मुख्य चुनाव अधिकारी / मुख्य निर्वाचन अधिकारी का प्रविधान है जो उस राज्य में निर्वाचन के लिये विधायी शक्तियों का उपभोग करता है।

चुनाव संबंधी विवाद

संसद के या किसी राज्‍य विधानमंडल के किसी सदन के लिए हुए किसी चुनाव को चुनौती उच्‍च-न्‍यायालय में दी जा सकती है। याचिका चुनाव के दौरान कोई भ्रष्‍ट प्रक्रिया अपनाने के कारण पेश की जा सकती है। यदि सिद्ध हो जाए तो उच्च न्यायालय को यह शक्‍ति प्राप्‍त है कि वह सफल उम्‍मीदवार का चुनाव शून्‍य घोषित कर दे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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