"सन्देश रासक -अब्दुल रहमान": अवतरणों में अंतर

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
यहाँ जाएँ:नेविगेशन, खोजें
('*सन्देश रासक अपभ्रंश की रचना है। *इस [[...' के साथ नया पन्ना बनाया)
 
छो (Text replacement - "पश्चात " to "पश्चात् ")
 
(4 सदस्यों द्वारा किए गए बीच के 5 अवतरण नहीं दर्शाए गए)
पंक्ति 5: पंक्ति 5:
*यह रचना विप्रलम्भ श्रृंगार की है।  
*यह रचना विप्रलम्भ श्रृंगार की है।  
*इसमें विजय नगर की कोई वियोगिनी अपने पति को संदेश भेजने के लिए व्याकुल है, तभी  कोई पथिक आ जाता है और वह विरहिणी उसे अपने विरह जनित कष्टों को सुनाते लगती है। जब पथिक उससे पूछता है कि उसका पति किस ॠतु में गया है तो वह उत्तर में ग्रीष्म ॠतु से प्रारम्भ कर विभिन्न ॠतुओं के विरह जनित कष्टों का वर्णन करने लगती है। यह सब सुनकर जब पथिक चलने लगता है, तभी उसका प्रवासी पति आ जाता है।  
*इसमें विजय नगर की कोई वियोगिनी अपने पति को संदेश भेजने के लिए व्याकुल है, तभी  कोई पथिक आ जाता है और वह विरहिणी उसे अपने विरह जनित कष्टों को सुनाते लगती है। जब पथिक उससे पूछता है कि उसका पति किस ॠतु में गया है तो वह उत्तर में ग्रीष्म ॠतु से प्रारम्भ कर विभिन्न ॠतुओं के विरह जनित कष्टों का वर्णन करने लगती है। यह सब सुनकर जब पथिक चलने लगता है, तभी उसका प्रवासी पति आ जाता है।  
*यह रचना सं 1100 वि. के पश्चात की है।
*यह रचना सं 1100 वि. के पश्चात् की है।<ref>{{cite web |url=http://knowhindi.blogspot.com/2011/02/blog-post_4165.html |title=रासो काव्य : वीरगाथायें|accessmonthday=15 मई|accessyear=2011|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}</ref>
 


{{प्रचार}}
{{प्रचार}}
पंक्ति 14: पंक्ति 15:
==सम्बंधित लेख==
==सम्बंधित लेख==
{{रासो काव्य}}
{{रासो काव्य}}
[[Category:नया पन्ना]]


[[Category:आदि_काल]][[Category:साहित्य_कोश]]
[[Category:आदि_काल]][[Category:साहित्य_कोश]]
[[Category:रासो_काव्य]]
[[Category:रासो_काव्य]]
__INDEX__
__INDEX__

07:33, 7 नवम्बर 2017 के समय का अवतरण

  • सन्देश रासक अपभ्रंश की रचना है।
  • इस रासो काव्य के रचनाकार 'अब्दुल रहमान' हैं।
  • यह रचना 'मूल स्थान या मुल्तान' के क्षेत्र से सम्बन्धित है।
  • इस रचना की कुल छन्द संख्या 223 है।
  • यह रचना विप्रलम्भ श्रृंगार की है।
  • इसमें विजय नगर की कोई वियोगिनी अपने पति को संदेश भेजने के लिए व्याकुल है, तभी कोई पथिक आ जाता है और वह विरहिणी उसे अपने विरह जनित कष्टों को सुनाते लगती है। जब पथिक उससे पूछता है कि उसका पति किस ॠतु में गया है तो वह उत्तर में ग्रीष्म ॠतु से प्रारम्भ कर विभिन्न ॠतुओं के विरह जनित कष्टों का वर्णन करने लगती है। यह सब सुनकर जब पथिक चलने लगता है, तभी उसका प्रवासी पति आ जाता है।
  • यह रचना सं 1100 वि. के पश्चात् की है।[1]



पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. रासो काव्य : वीरगाथायें (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 15 मई, 2011।

सम्बंधित लेख