"अंगिरस": अवतरणों में अंतर

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
यहाँ जाएँ:नेविगेशन, खोजें
(आंगिरस को अनुप्रेषित)
 
No edit summary
पंक्ति 1: पंक्ति 1:
#REDIRECT[[आंगिरस]]
{{headnote|छांदोग्य उपनिषद में वर्णित कृष्ण के गुरु 'घोर अंगिरस' इससे भिन्न हैं। पाठक भ्रमित न हों}}
अंगिरस अथवा अंगिरा नाम के ऋषि का उल्लेख [[वेद|वेदों]] से लेकर अनेक [[पुराण|पुराणों]] में मिलने से अनुमान लगाया जाता है कि यह एक नहीं, अनेक व्यक्तियों का नाम है। इन्हें [[ऋग्वेद]] के अनेक मंत्रों का द्रष्टा बताया जाता है। [[अथर्ववेद]] के पाँच कल्पों में से अंगिरस कल्प के दृष्टा भी यही हैं। इसलिए इनका एक नाम अथर्वा भी है। एक उल्लेख के अनुसार [[अग्नि]] को भी सर्वप्रथम अंगिरा ने ही उत्पन्न किया था। वाणी और [[छंद]] के प्रथम ज्ञाता भी यही बताए गए हैं। यह भी उल्लेख मिलता है कि, पहले ये मनुष्य योनि में थे, जो बाद में देवता बन गए।
{{संदर्भ|अथर्ववेद| वैष्णव सम्प्रदाय| गीता कर्म जिज्ञासा| चार्वाक दर्शन| बृहदारण्यकोपनिषद| भृगु| छान्दोग्य उपनिषद|ऋभुगण| राष्ट्रकूट वंश}}
==मनुस्मृति के अनुसार==
[[मनुस्मृति]] में भी यह कथा है कि आंगिरस नामक एक ऋषि को छोटी अवस्था में ही बहुत ज्ञान हो गया था; इसलिए उसके काका–मामा आदि बड़े बूढ़े नातीदार उसके पास अध्ययन करने लग गए थे। एक दिन पाठ पढ़ाते–पढ़ाते आंगिरस ने कहा '''पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान्।''' बस, यह सुनकर सब वृद्धजन क्रोध से लाल हो गए और कहने लगे कि यह लड़का मस्त हो गया है! उसको उचित दण्ड दिलाने के लिए उन लोगों ने देवताओं से शिकायत की। देवताओं ने दोनों ओर का कहना सुन लिया और यह निर्णय लिया कि 'आंगिरस ने जो कुछ तुम्हें कहा, वही न्याय है।' इसका कारण यह है किः–
<poem>
'''न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।'''
'''यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः।।'''
</poem>
'सिर के बाल सफ़ेद हो जाने से ही कोई मनुष्य वृद्ध नहीं कहा जा सकता; देवगण उसी को वृद्ध कहते हैं जो तरुण होने पर भी ज्ञानवान हो'
==स्वायंभुव मन्वंतर==
स्वायंभुव मन्वंतर में अंगिरा को [[ब्रह्मा]] के सिर से उत्पन्न बताया गया है। दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री स्मृति का इनसे विवाह किया था। वैवस्वत मन्वंतर में ये [[शंकर]] के वरदान से उत्पन्न हुए और अग्नि ने अपने पुत्र के समान इनका पालन-पोषण किया। चाक्षुष मन्वंतर में दक्ष प्रजापति की कन्याएँ सती और स्वधा इनकी पत्नियाँ थीं। भागवत में [[स्यमंतक मणि]] की चोरी के प्रसंग में इनके श्री [[कृष्ण]] से मिलने का भी उल्लेख आया है। शर-शैया पर पड़े [[भीष्म]] पितामह के दर्शनों के लिए भी अपने शिष्यों के साथ गए थे। स्मृतिकारों ने अंगिरस के धर्मशास्त्र का उल्लेख किया है। [[महाभारत]] में भी ‘अंगिरस स्मृति’ का उल्लेख मिलता है। [[उपनिषद]] में इनको ब्रह्मा का ज्येष्ठ पुत्र बताया गया है, जिन्हें ब्रह्म विद्या प्राप्त हुई। [[शौनक ऋषि|शौनक]] को इन्होंने विद्या के दो रूपों परा (वेद, [[व्याकरण]] आदि का ज्ञान) तथा अपरा (अक्षर का ज्ञान) से परिचित कराया था।
इस प्रकार ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में एक नाम का उल्लेख सिद्ध करता है कि इस नाम की या तो कोई वंश परम्परा थी या कोई गद्दी। इनका कुल जिसमें भारद्वाज और गौतम भी हुए, ‘आग्नेय’ नाम से प्रसिद्ध था।
 
 
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}
==टीका-टिप्पणी और सन्दर्भ==
<references/>
==बाहरी कड़ियाँ==
==संबंधित लेख==
{{ॠषि-मुनि2}}{{ॠषि-मुनि}}
[[Category:ऋषि मुनि]][[Category:संस्कृत साहित्यकार]]
[[Category:पौराणिक कोश]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]]
 
__INDEX__
__NOTOC__

07:23, 9 फ़रवरी 2014 का अवतरण

छांदोग्य उपनिषद में वर्णित कृष्ण के गुरु 'घोर अंगिरस' इससे भिन्न हैं। पाठक भ्रमित न हों

अंगिरस अथवा अंगिरा नाम के ऋषि का उल्लेख वेदों से लेकर अनेक पुराणों में मिलने से अनुमान लगाया जाता है कि यह एक नहीं, अनेक व्यक्तियों का नाम है। इन्हें ऋग्वेद के अनेक मंत्रों का द्रष्टा बताया जाता है। अथर्ववेद के पाँच कल्पों में से अंगिरस कल्प के दृष्टा भी यही हैं। इसलिए इनका एक नाम अथर्वा भी है। एक उल्लेख के अनुसार अग्नि को भी सर्वप्रथम अंगिरा ने ही उत्पन्न किया था। वाणी और छंद के प्रथम ज्ञाता भी यही बताए गए हैं। यह भी उल्लेख मिलता है कि, पहले ये मनुष्य योनि में थे, जो बाद में देवता बन गए।

अंगिरस का उल्लेख इन लेखों में भी है: अथर्ववेद, वैष्णव सम्प्रदाय, गीता कर्म जिज्ञासा, चार्वाक दर्शन, बृहदारण्यकोपनिषद, भृगु, छान्दोग्य उपनिषद, ऋभुगण एवं राष्ट्रकूट वंश

मनुस्मृति के अनुसार

मनुस्मृति में भी यह कथा है कि आंगिरस नामक एक ऋषि को छोटी अवस्था में ही बहुत ज्ञान हो गया था; इसलिए उसके काका–मामा आदि बड़े बूढ़े नातीदार उसके पास अध्ययन करने लग गए थे। एक दिन पाठ पढ़ाते–पढ़ाते आंगिरस ने कहा पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान्। बस, यह सुनकर सब वृद्धजन क्रोध से लाल हो गए और कहने लगे कि यह लड़का मस्त हो गया है! उसको उचित दण्ड दिलाने के लिए उन लोगों ने देवताओं से शिकायत की। देवताओं ने दोनों ओर का कहना सुन लिया और यह निर्णय लिया कि 'आंगिरस ने जो कुछ तुम्हें कहा, वही न्याय है।' इसका कारण यह है किः–

न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।
यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः।।

'सिर के बाल सफ़ेद हो जाने से ही कोई मनुष्य वृद्ध नहीं कहा जा सकता; देवगण उसी को वृद्ध कहते हैं जो तरुण होने पर भी ज्ञानवान हो'

स्वायंभुव मन्वंतर

स्वायंभुव मन्वंतर में अंगिरा को ब्रह्मा के सिर से उत्पन्न बताया गया है। दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री स्मृति का इनसे विवाह किया था। वैवस्वत मन्वंतर में ये शंकर के वरदान से उत्पन्न हुए और अग्नि ने अपने पुत्र के समान इनका पालन-पोषण किया। चाक्षुष मन्वंतर में दक्ष प्रजापति की कन्याएँ सती और स्वधा इनकी पत्नियाँ थीं। भागवत में स्यमंतक मणि की चोरी के प्रसंग में इनके श्री कृष्ण से मिलने का भी उल्लेख आया है। शर-शैया पर पड़े भीष्म पितामह के दर्शनों के लिए भी अपने शिष्यों के साथ गए थे। स्मृतिकारों ने अंगिरस के धर्मशास्त्र का उल्लेख किया है। महाभारत में भी ‘अंगिरस स्मृति’ का उल्लेख मिलता है। उपनिषद में इनको ब्रह्मा का ज्येष्ठ पुत्र बताया गया है, जिन्हें ब्रह्म विद्या प्राप्त हुई। शौनक को इन्होंने विद्या के दो रूपों परा (वेद, व्याकरण आदि का ज्ञान) तथा अपरा (अक्षर का ज्ञान) से परिचित कराया था। इस प्रकार ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में एक नाम का उल्लेख सिद्ध करता है कि इस नाम की या तो कोई वंश परम्परा थी या कोई गद्दी। इनका कुल जिसमें भारद्वाज और गौतम भी हुए, ‘आग्नेय’ नाम से प्रसिद्ध था।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका-टिप्पणी और सन्दर्भ

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख