बन्धन से गर छूटनू चाहत -शिवदीन राम जोशी

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
Kailash Pareek (वार्ता | योगदान) द्वारा परिवर्तित 09:57, 11 जून 2012 का अवतरण
(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ:नेविगेशन, खोजें

शांत सुभाव करो मनवा, न जरो अविवेक के फंद में आकर।
ज्ञान विचार दया उर धारके, राम चितार तू चित्त लगाकर।
धीरज आसन दृढ जमाय के या विधि से मन को समझाकर।
बंधन से गर छुटनू चाहत, तू अजपा उर सत्य जपाकर ।।

        नित्त ही चित्त प्रसन्न रखो यह साधन साधू से सिख तू जाकर।
        फेर भी भूल परे तुमको धृक है धृक है तन मानव पाकर।
        क्रोध व तृष्णा को दूर करो कहूँ संत समागम संगत जाकर।
        बंधन से गर छुटनू चाहत, तू अजपा उर सत्य जपाकर।।

परलोक बनावन से हटके मद क्रोध भऱ् यो तृष्णा उर आकर।
क्रोधको जीतके तृष्णा न राखत ज्ञानी वही गति ज्ञानकी पाकर।
जो मनको न दृढावत राम, कहो किन काम के ग्रन्थ पढ़ाकर।
बंधन से गर छुटनू चाहत, तू अजपा उर सत्य जपाकर।।
 
        अजपा वही जो जपे दिन रैन यह होता है स्वांस के साथ सुनाकर।
        ध्यान से युक्त व सत्य परायण उच्च विचार हृदय में धराकर।
        भोजन अल्प एकांत निवास तू थोरी ही नींद ले जाग उठाकर।
        बंधन से गर छुटनू चाहत, तू अजपा उर सत्य जपाकर।।

संबंधित लेख