'संक्रान्ति' का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना, अत: वह राशि जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, संक्रान्ति की संज्ञा से विख्यात है।[1] राशियाँ बारह हैं, यथा मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक , धनु, मकर, कुम्भ, मीन। मलमास पड़ जाने पर भी वर्ष में केवल 12 राशियाँ होती हैं। प्रत्येक संक्रान्ति पवित्र दिन के रूप में ग्राह्य है। मत्स्यपुराण [2]ने संक्रान्ति व्रत का वर्णन किया है। एक दिन पूर्व व्यक्ति (नारी या पुरुष) को केवल एक बार मध्याह्न में भोजन करना चाहिए और संक्रान्ति के दिन दाँतों को स्वच्छ करके तिल युक्त जल से स्नान करना चाहिए। व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी संयमी ब्राह्मण गृहस्थ को भोजन सामग्रियों से युक्त तीन पात्र तथा एक गाय यम, रुद्र एवं धर्म के नाम पर दे और चार श्लोकों को पढ़े, जिनमें से एक यह है- 'यथा भेदं' न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्। तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकर:शंकर: सदा।।'[3], अर्थात् 'मैं शिव एवं विष्णु तथा सूर्य एवं ब्रह्मा में अन्तर नहीं करता, वह शंकर, जो विश्वात्मा है, सदा कल्याण करने वाला है। दूसरे शंकर शब्द का अर्थ है- शं कल्याणं करोति। यदि हो सके तो व्यक्ति को चाहिए कि वह ब्राह्मण को आभूषणों, पर्यंक, स्वर्णपात्रों (दो) का दान करे। यदि वह दरिद्र हो तो ब्राह्मण को केवल फल दे। इसके उपरान्त उसे तैल-विहीन भोजन करना चाहिए और यथा शक्ति अन्य लोगों को भोजन देना चाहिए। स्त्रियों को भी यह व्रत करना चाहिए। संक्रान्ति, ग्रहण, अमावस्या एवं पूर्णिमा पर गंगा स्नान महापुण्यदायक माना गया है और ऐसा करने पर व्यक्ति ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।[4] प्रत्येक संक्रान्ति पर सामान्य जल (गर्म नहीं किया हुआ) से स्नान करना नित्यकर्म कहा जाता है, जैसा कि देवीपुराण[5]) में घोषित है- 'जो व्यक्ति संक्रान्ति के पवित्र दिन पर स्नान नहीं करता वह सात जन्मों तक रोगी एवं निर्धन रहेगा; संक्रान्ति पर जो भी देवों को हव्य एवं पितरों को कव्य दिया जाता है, वह सूर्य द्वारा भविष्य के जन्मों में लौटा दिया जाता है।[6]
पुण्यकाल

प्राचीन ग्रंथ में ऐसा लिखित है कि केवल सूर्य का किसी राशि में प्रवेश मात्र ही पुनीतता का द्योतक नहीं है, प्रत्युत सभी ग्रहों का अन्य नक्षत्र या राशि में प्रवेश पुण्यकाल माना जाता है[7]। हेमाद्रि[8] एवं काल निर्णय[9] ने क्रम से जैमिनि एवं ज्योति:शास्त्र से उद्धरण देकर सूर्य एवं ग्रहों की संक्रान्ति का पुण्यकाल को घोषित किया है- 'सूर्य के विषय में संक्रान्ति के पूर्व या पश्चात् 16 घटिकाओं का समय पुण्य समय है; चन्द्र के विषय में दोनों ओर एक घटी 13 फल पुण्यकाल है; मंगल के लिए 4 घटिकाएँ एवं एक पल; बुध के लिए 3 घटिकाएँ एवं 14 पल, बृहस्पति के लिए चार घटिकाएँ एवं 37 पल, शुक्र के लिए 4 घटिकाएँ एवं एक पल तथा शनि के लिए 82 घटिकाएँ एवं 7 पल।[6]
सूर्य जब एक राशि छोड़कर दूसरी में प्रवेश करता है तो उस काल का यथावत् ज्ञान हमारी माँसल आँखों से सम्भव नहीं है, अत: संक्रान्ति की 30 घटिकाएँ इधर या उधर के काल का द्योतन करती हैं[10]। सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश काल इतना कम होता है कि उसमें संक्रान्ति कृत्यों का सम्पादन असम्भव है, अत: इसकी सन्निधि का काल उचित ठहराया गया है। देवीपुराण में संक्रान्ति काल की लघुता का उल्लेख यों है- 'स्वस्थ एवं सुखी मनुष्य जब एक बार पलक गिराता है तो उसका तीसवाँ काल 'तत्पर' कहलाता है, तत्पर का सौवाँ भाग 'त्रुटि' कहा जाता है तथा त्रुटि के सौवें भाग में सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश होता है। सामान्य नियम यह है कि वास्तविक काल के जितने ही समीप कृत्य हो वह उतना ही पुनीत माना जाता है।' इसी से संक्रान्तियों में पुण्यतम काल सात प्रकार के माने गये हैं- 3, 4, 5, 7, 8, 9 या 12 घटिकाएँ। इन्हीं अवधियों में वास्तविक फल प्राप्ति होती है। यदि कोई इन अवधियों के भीतर प्रतिपादित कृत्य न कर सके तो उसके लिए अधिकतम काल सीमाएँ 30 घटिकाओं की होती हैं; किंतु ये पुण्यकाल-अवधियाँ षडशीति[11]एवं विष्णुपदी[12]को छोड़कर अन्य सभी संक्रान्तियों के लिए है।'[6]

आज के ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जाड़े का अयन काल 21 दिसम्बर को होता है और उसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। किंतु भारत में वे लोग, जो प्राचीन पद्धतियों के अनुसार रचे पंचांगों का सहारा लेते हैं, उत्तरायण का आरम्भ 14 जनवरी से मानते हैं। वे इस प्रकार उपयुक्त मकर संक्रान्ति से 23 दिन पीछे हैं। मध्यकाल के धर्मशास्त्र ग्रंथों में यह बात उल्लिखित है, यथा हेमाद्रि[13] ने कहा है कि प्रचलित संक्रान्ति से 12 दिन पूर्व ही पुण्यकाल पड़ता है, अत: प्रतिपादित दान आदि कृत्य प्रचलित संक्रान्ति दिन के 12 दिन पूर्व भी किये जा सकते हैं।[6]
पुण्यकाल के नियम
संक्रान्ति के पुण्यकाल के विषय में सामान्य नियम के प्रश्न पर कई मत हैं। शातातप[14], जाबाल एवं मरीचि ने संक्रान्ति के धार्मिक कृत्यों के लिए संक्रान्ति के पूर्व एवं उपरान्त 16 घटिकाओं का पुण्यकाल प्रतिपादित किया है; किंतु देवीपुराण एवं वसिष्ठ[15] ने 15 घटिकाओं के पुण्यकाल की व्यवस्था दी है। यह विरोध यह कहकर दूर किया जाता है कि लघु अवधि केवल अधिक पुण्य फल देने के लिए है और 16 घटिकाओं की अवधि विष्णुपदी संक्रान्तियों के लिए प्रतिपादित है। संक्रान्ति दिन या रात्रि दोनों में हो सकती है। दिन वाली संक्रान्ति पूरे दिन भर पुण्यकाल वाली होती है। रात्रि वाली संक्रान्ति के विषय में हेमाद्रि, माधव आदि में लम्बे विवेचन उपस्थित किए गये हैं। एक नियम यह है कि दस संक्रान्तियों में, मकर एवं कर्कट को छोड़कर पुण्यकाल दिन में होता है, जबकि वे रात्रि में पड़ती हैं। इस विषय का विस्तृत विवरण तिथितत्त्व[16] और धर्मसिंधु[17] में मिलता है।[6]
ग्रहों की संक्रान्ति

ग्रहों की भी संक्रान्तियाँ होती हैं, किन्तु पश्चात्कालीन लेखकों के अनुसार 'संक्रान्ति' शब्द केवल रवि-संक्रान्ति के नाम से ही द्योतित है, जैसा कि स्मृतिकौस्तुभ[18]में उल्लिखित है। वर्ष भर की 12 संक्रान्तियाँ चार श्रेणियों में विभक्त हैं-
- दो अयन संक्रान्तियाँ- मकर संक्रान्ति, जब उत्तरायण का आरम्भ होता है एवं कर्कट संक्रान्ति, जब दक्षिणायन का आरम्भ होता है।
- दो विषुव संक्रान्तियाँ अर्थात् मेष एवं तुला संक्रान्तियाँ, जब रात्रि एवं दिन बराबर होते हैं।
- वे चार संक्रान्तियाँ, जिन्हें षडयीतिमुख अर्थात् मिथुन, कन्या, धनु एवं मीन कहा जाता है तथा
- विष्णुपदी या विष्णुपद अर्थात् वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुम्भ नामक संक्रान्तियाँ।[19][6]
संक्रांति के प्रकार
'ये बारह संक्रान्तियाँ सात प्रकार की, सात नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं; वे ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता।
- घोरा रविवार, मेष या कर्क या मकर संक्रान्ति को,
- ध्वांक्षी सोमवार को,
- महोदरी मंगल को,
- मन्दाकिनी बुध को,
- मन्दा बृहस्पति को,
- मिश्रिता शुक्र को एवं
- राक्षसी शनि को होती है।
- इसके अतिरिक्त कोई संक्रान्ति यथा मेष या कर्क आदि क्रम से मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी, मिश्रित कही जाती है, यदि वह क्रम से ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित नक्षत्र से युक्त हों। 27 या 28 नक्षत्र निम्नोक्त रूप से सात दलों में विभाजित हैं-
- ध्रुव (या स्थिर) – उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी
- मृदु – अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष
- क्षिप्र (या लघु) – हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित
- उग्र – पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा
- चर – पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति , शतभिषक
- क्रूर (या तीक्ष्ण) – मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा
- मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण) – कृत्तिका, विशाखा[20]। ऐसा उल्लिखित है कि ब्राह्मणों के लिए मन्दा, क्षत्रियों के लिए मन्दाकिनी, वैश्यों के लिए ध्वांक्षी, शूद्रों के लिए घोरा, चोरों के लिए महोदरी, मद्य विक्रेताओं के लिए राक्षसी तथा चाण्डालों, पुक्कसों तथा जिनकी वृत्तियाँ (पेशे) भयंकर हों एवं अन्य शिल्पियों के लिए मिश्रित संक्रान्ति श्रेयस्कर होती है[21]।[6]
संक्रान्ति का देवीकरण
आगे चलकर संक्रान्ति का देवीकरण हो गया और वह साक्षात् दुर्गा कही जाने लगी। देवीपुराण[22] में आया है कि देवी वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, दिन आदि के क्रम से सूक्ष्म विभाग के कारण सर्वगत विभु रूप वाली है। देवी पुण्य तवं पाप के विभागों के अनुसार फल देने वाली है। संक्रान्ति के काल में किये गये एक कृत्य से भी कोटि-कोटि फलों की प्राप्ति होती है। धर्म से आयु, राज्य, पुत्र, सुख आदि की वृद्धि होती है, अधर्म से व्याधि, शोक आदि बढ़ते हैं। विषुव[23] संक्रान्ति के समय जो दान या जप किया जाता है या अयन [24] में जो सम्पादित होता है, वह अक्षय होता है। यही बात विष्णुपद एवं षडशीति मुख के विषय में भी है।[6]

आजकल के पंचांगों में मकर संक्रान्ति का देवीकरण भी हो गया है। वह देवी मान ली गयी है। संक्रान्ति किसी वाहन पर चढ़ती है, उसका प्रमुख वाहन हाथी जैसे वाहन पशु हैं; उसके उपवाहन भी हैं; उसके वस्त्र काले, श्वेत या लाल आदि रंगों के होते हैं; उसके हाथ में धनुष या शूल रहता है, वह लाह या गोरोचन जैसे पदार्थों का तिलक करती है; वह युवा, प्रौढ़ या वृद्ध है; वह खड़ी या बैठी हुई वर्णित है; उसके पुष्पों, भोजन, आभूषणों का उल्लेख है; उसके दो नाम सात नामों में से विशिष्ट हैं; वह पूर्व आदि दिशाओं से आती है और पश्चिम आदि दिशाओं को चली जाती है और तीसरी दिशा की ओर झाँकती है; उसके अधर झुके हैं, नाक लम्बी है, उसके 9 हाथ है। उसके विषय में अग्र सूचनाएँ ये हैं- संक्रान्ति जो कुछ ग्रहण करती है, उसके मूल्य बढ़ जाते हैं या वह नष्ट हो जाता है; वह जिसे देखती है, वह नष्ट हो जाता है, जिस दिशा से वह जाती है, वहाँ के लोग सुखी होते हैं, जिस दिशा को वह चली जाती है, वहाँ के लोग दुखी हो जाते हैं।[6]
संक्रांति पर दान पुण्य
पूर्व पुण्यलाभ के लिए पुण्यकाल में ही स्नान दान आदि कृत्य किये जाते हैं। सामान्य नियम यह है कि रात्रि में न तो स्नान किया जाता है और न ही दान। पराशर[25] में आया है कि सूर्य किरणों से पूरे दिन में स्नान करना चाहिए, रात्रि में ग्रहण को छोड़कर अन्य अवसरों पर स्नान नहीं करना चाहिए। यही बात विष्णुधर्मसूत्र में भी है। किंतु कुछ अपवाद भी प्रतिपादित हैं। भविष्यपुराण [26] में आया है कि रात्रि में स्नान नहीं करना चाहिए, विशेषत: रात्रि में दान तो नहीं ही करना चाहिए, किंतु उचित अवसरों पर ऐसा किया जा सकता है, यथा ग्रहण, विवाह, संक्रान्ति, यात्रा, जनन, मरण तथा इतिहास श्रवण में। अत: प्रत्येक संक्रान्ति पर विशेषत: मकर संक्रान्ति पर स्नान नित्य कर्म है।
- दान निम्न प्रकार के किये जाते हैं-
मेष में भेड़, वृषभ में गायें, मिथुन में वस्त्र, भोजन एवं पेय पदार्थ, कर्कट में घृतधेनु, सिंह में सोने के साथ वाहन, कन्या में वस्त्र एवं गौएँ, नाना प्रकार के अन्न एवं बीज, तुला-वृश्चिक में वस्त्र एवं घर, धनु में वस्त्र एवं वाहन, मकर में इन्घन एवं अग्नि, कुम्भ में गौएँ जल एवं घास, मीन में नये पुष्प। अन्य विशेष प्रकार के दानों के विषय में देखिए स्कन्दपुराण [27], विष्णुधर्मोत्तर, कालिका. [28] आदि।[29]
भारत के विभिन्न प्रदेशों में मकर संक्रांति
हरियाणा और पंजाब की मकर संक्रांति
हरियाणा और पंजाब में मकर संक्रांति पर्व को लोहड़ी के रूप में मनाया जलाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्नि की पूजा करते हैं और तिल, गुड़, चावल भुने कर मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की गजक, रेवड़ियाँ एक-दूसरे में बांटकर खुशियां मनाते हैं। महिलाएँ घर घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं। इसके साथ पारंपरिक मक्के की रोटी और सरसों का साग का भी लुत्फ उठाया जाता है।
उत्तर प्रदेश की मकर संक्रांति
उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति मुख्य रूप से 'दान का पर्व' है। इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक महा मेला लगता है। 14 जनवरी से इलाहाबाद में हर साल महा मेले की शुरुआत होती है। 14 दिसम्बर से 14 जनवरी का समय खर मास के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में इस एक महीने में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत नहीं जाती थी पर अब तो समय के साथ लोग भी काफ़ी बदल गए हैं। 14 जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। महा मेला पहला नहान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्रि तक नहान तक चलता है और आखरी नहान भी शिवरात्री के दिन ही होता है। संक्रान्ति के दिन नहान के बाद दान करने का भी चलन है और इसी दिन बागेश्वर में बड़ा मेला होता है। संक्रान्ति के दिन गंगास्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं। इस दिन गंगा में स्नान करके , तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है। मकर संक्रान्ति पर्व पर क्षेत्र में गंगा एवं रामगंगा घाटों पर बड़े मेले लगते है। उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी सेवन एवं खिचड़ी दान का अत्यधिक महत्व होता है।
महाराष्ट्र की मकर संक्रांति
महाराष्ट्र में इस दिन नवविवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल, नमक आदि चीज़ें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बांटने की प्रथा भी है। इस दिन महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं। पुरुष एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और बोलते हैं:- `लिळ गूळ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला` अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो।
बंगाल की मकर संक्रांति
बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात् तिल दान करने की प्रथा है। यहाँ गंगासागर में प्रतिवर्ष विशाल मेला लगता है। यह भी माना जाता है कि इस दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिए लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करने के लिए आते हैं। वर्ष में केवल मकर संक्रांति के दिन ही यहाँ लोगों की अपार भीड़ देखने को मिलती है। इसीलिए कहा जाता है-`
- सारे तीर्थ बार बार लेकिन गंगा सागर एक बार।
तमिलनाडु की मकर संक्रांति
तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं।
- प्रथम दिन भोगी-पोंगल,
- द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल,
- तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल,
- चौथे व अंतिम दिन कन्या-पोंगल।
तमिलनाडु में पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा करके जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिए स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है फिर खीर को प्रसाद के रूप में सभी लोग ग्रहण करते हैं। तमिलनाडु में इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।
असम की मकर संक्रांति
असम में मकर संक्रांति को महा-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाया जाता हैं।
राजस्थान की मकर संक्रांति
राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएं किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं।
मकर संक्रान्ति की महत्वता
शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए मकर संक्रांति के दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व होता है। धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल दान करने से मोक्ष की प्राप्ती हती है। यथा-
महो मासि महादेव यो दाद घृतकंबलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अंते मोक्षं च विंदति॥
मकर संक्रांति के पर्व पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यंत शुभ कार्य माना गया है। मकर संक्रांति के पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई सूर्य है। मकर संक्रांति के सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किंतु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक दायक होता है। सूर्य का राशियों प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अंतराल पर होती रहती है। भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है और भारत से दूर भी होता है। इसी कारण यहाँ रातें बड़ी और दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है, किंतु मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अत: इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। अत: मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्यशक्ति में वृद्धि होती है। ऐसा जानकर संपूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन किया जाता है सूर्यदेव के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। सामान्यत: भारतीय पंचांग की समस्त तिथियां चंद्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किंतु मकर संक्रांति पर्व को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। इसी कारण मकर संक्रांति पर्व प्रतिवर्ष 14 जनवरी को ही पड़ता है।
विभिन्न संक्रांतियाँ
- मेष संक्रान्ति
- वृष संक्रांति
- मिथुन संक्रान्ति
- कर्क संक्रांति
- सिंह संक्रांति
- कन्या संक्रांति
- तुला संक्रांति
- वृश्चिक संक्रांति
- धनु संक्रांति
- मकर संक्रांति
- कुम्भ संक्रांति
- मीन संक्रांति
ऐतिहासिक महत्वता
कहा जाता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनिदेव से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं क्योंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने भी अपनी शरीर त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में मिली जाती थीं।अत: मकर संक्रांति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ रवे: संक्रमणं राशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। स्नानदानतप:श्राद्धहोमादिषु महाफला।। नागरखंड (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 410); मेषादिषु द्वादशराशिषु क्रमेण सञ्चरत: सूर्यस्य पूर्वस्माद्राशेरुत्तरराशौ संक्रमणं प्रवेश: संक्रान्ति। अतस्तद्राशिनामपुर:सरं सा संक्रान्तिर्व्यपदिश्यते। काल निर्णय, पृष्ठ 331।
- ↑ मत्स्यपुराण, अध्याय 98
- ↑ मत्स्यपुराण, 98|17
- ↑ संक्रान्त्यां पक्षयोरन्ते ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो:। गंगास्नातो नर: कामाद् ब्रह्मण: सदनं व्रजेत्।। भविष्यपुराण (वर्ष क्रिया कौमदी., पृष्ठ 415)।
- ↑ (काल विवेक, पृष्ठ 380 काल निर्णय, पृष्ठ 333 आदि में उद्धृत
- ↑ 6.0 6.1 6.2 6.3 6.4 6.5 6.6 6.7 6.8 धर्मशास्त्र का इतिहास, चतुर्थ भाग |लेखक: डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 79-84 |
- ↑ (काल निर्णय, पृष्ठ 345)
- ↑ हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 437
- ↑ काल निर्णय, पृष्ठ 345
- ↑ (काल निर्णय, पृष्ठ 333)
- ↑ इसमें अधिकतम पुण्यकाल 60 घटिकाओं का है
- ↑ जहाँ 16 घटिकाओं की इधर-उधर छूट है
- ↑ (काल, पृष्ठ 436-437)
- ↑ हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 417, काल विवेक, पृष्ठ 382; कृत्यकल्पतरु., नैयतकाल, पृष्ठ 361-362 एवं 365
- ↑ कृत्यकल्पतरु., नैयतकाल, पृष्ठ 360; हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 418; समय मयूख, पृष्ठ 167
- ↑ तिथितत्त्व, पृष्ठ 144-145
- ↑ धर्मसिंधु, पृष्ठ 2-3
- ↑ पृष्ठ 531
- ↑ पञ्चसिद्धान्तिका (3|23-24, पृष्ठ 9) ने परिभाषा दी है- 'मेषतुलादौ विषुवत् षडशीतिमुखं तुलादिभागेषु। षडशीतिमुखेषु रवे: पितृदिवसा येऽवशेषा: स्यु:।। षडशीतिमुखं कन्याचतुर्दशेऽष्टादशे च मिथुनस्य। मीनस्य द्वार्विशे षडविशे कार्मुकस्यांशे।। तुला आदिर्यस्या: सा तुलादि: कन्या। द्वादशैव भवन्त्येषां द्विज नामानि मे श्रृणु। एकं विष्णुपदं नाम षडशीतिमुखं तथा।। विषुवं च तृतीयं च अन्ये द्वे दक्षिणोत्तरे।। कुम्भालिगोहरिषु विष्णुपदं वदन्ति स्त्रीचापमीनमिथुने षडशीतिवक्त्रम्। अर्कस्य सौम्यमयनं शशिधाम्नि याम्यमृक्षे झषे विषुवति त्वजतौलिनो: स्यात्।। ब्रह्मवैवर्त (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 407) । कुछ शब्दों की व्याख्या आवश्यक है- अलि वृश्चिक, गो वृषभ, हरि सिंह, स्त्री कन्या, चाप धनु:, शशिधाम्नि शशिगृह कर्कटक, सौम्यायन उत्तरायण, याम्य दक्षिणायन (यम दक्षिण का अधिपति है), झष मकर, अज मेष, तौली (जो तराजू पकड़े रहता है) तुला।'
- ↑ देखिए बृहत्संहिता, 98|6-11; कृत्यकल्पतरु, नैयतकाल, पृष्ठ 361; हेमाद्रि, काल., पृष्ठ 409; काल निर्णय, पृष्ठ 341-342; समय मयूख, पृष्ठ 137। बृहत्संहिता 98|9 एवं कृत्यकल्पतरु, नैयत ने लघु दल में विभाजित का उल्लेख नहीं किया है
- ↑ (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 409-410 एवं वर्ष क्रिया कौमदी., पृष्ठ 210 जहाँ देवीपुराण की उक्तियाँ उद्धृत हैं)
- ↑ हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 418-419; कृत्य रत्नाकर, पृष्ठ 614-165 एवं कृत्यकल्प, पृष्ठ 361-361
- ↑ मेष एवं तुला
- ↑ मकर एवं कर्कट संक्रान्ति
- ↑ पराशर (12|20; स्मृतिचंद्रिका 1, पृष्ठ 120)
- ↑ (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 433; काल निर्णय, पृष्ठ 339)
- ↑ (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 415-416, निर्णय सिंधु, पृष्ठ 218)
- ↑ (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 413; कृत्यकल्पतरु., नैयतकाल, पृष्ठ 366-367)
- ↑ स्कन्दे-धेनुं तिलमयीं राजन् दद्याद्यश्चोत्तरायणे। सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दते परमं सुखम।। विष्णुधर्मोत्तरे-उत्तरे त्वयने विप्रा वस्त्रदनं महाफलम्। तिलपूर्वमनड्वाहं दत्त्व। रोगै: प्रमुच्यते।। शिवरहस्ये। पुरा मकरसंक्रान्तौ शंकरो गोसवे कृते। तिलानुत्पादयामास तृप्तये सर्वदेहिनाम्। तस्मात्तस्यां तिलै: स्नानं कार्य चोद्वर्तनं बुधै:। देवतानां विपृणां च सोदकैस्तर्पणं तिलै:। तिला देयाश्च विप्रेभ्य: सर्वदैवोत्तरायणे। तिलांश्च भक्षयेत्पुण्यान् होतव्याश्च तथा तिला:। तस्यां तथौ तिलैर्हुत्वा येऽर्चयन्ति द्विजोत्तमान्। त्रिदिवे ते विराजन्ते गोसहस्त्रप्रदायिन:। तिलतैलेन दीपाश्च देया: शिवगृहे शुभा:। सतिलैस्तण्डुलैर्देवं पूजयेद्विधिवद् द्विजम्।। हेमाद्रि (काल, पृष्ठ 415-416); निर्णय सिंधु (पृष्ठ 218)। गोसहस्त्र 16 महादानों में एक है। देखिए इस महाग्रंथ का खण्ड 2। 'त्रिदिवे ते विराजन्ते' के साथ मिलाइए ऋ. (10|107|2): 'उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो अस्थुर्ये अश्वदा स्रह ते सूर्येण।'
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