"सी. डी. देशमुख": अवतरणों में अंतर
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'''चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Chintamani Dwarakanath Deshmukh'', जन्म: 14 जनवरी, 1896 | '''चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Chintamani Dwarakanath Deshmukh'', जन्म: [[14 जनवरी]], [[1896]]; मृत्यु: [[2 अक्टूबर]], [[1982]]) [[ब्रिटिश शासन]] के अधीन आई.सी.एस. अधिकारी और [[भारतीय रिज़र्व बैंक]] के तीसरे [[भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर|गवर्नर]] थे। ब्रिटिश राज ने उन्हें 'सर' की उपाधि दी थी। इसके पश्चात् उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल में [[भारत]] के तीसरे वित्तमंत्री के रूप में भी सेवा की। सी.डी. देशमुख 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' के अध्यक्ष और [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] के उपकुलपति बनाये गए थे। उनको [[1975]] में [[राष्ट्रपति]] ने '[[पद्म विभूषण]]' के अलंकरण से सम्मानित किया था। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं। | ||
==जीवन परिचय== | ==जीवन परिचय== | ||
चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख का जन्म [[महाराष्ट्र]] के [[रायगढ़ ज़िला|रायगढ़ ज़िले]] में [[14 जनवरी]], [[1896]] ई. को हुआ। इनके पिता द्वारकानाथ देशमुख एक सम्मानित वकील थे तथा उनकी माँ भागीरथी बाई एक धार्मिक महिला थी। देशमुख ने [[1912]] में [[मुम्बई विश्वविद्यालय|बंबई विश्वविद्यालय]] से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। साथ ही उन्होंने [[संस्कृत]] की जगन्नाथ शंकर सेट छात्रवृत्ति भी हासिल की। [[1917]] में उन्होंने कैंब्रिज | चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख का जन्म [[महाराष्ट्र]] के [[रायगढ़ ज़िला|रायगढ़ ज़िले]] में [[14 जनवरी]], [[1896]] ई. को हुआ। इनके पिता द्वारकानाथ देशमुख एक सम्मानित वकील थे तथा उनकी माँ भागीरथी बाई एक धार्मिक महिला थी। देशमुख ने [[1912]] में [[मुम्बई विश्वविद्यालय|बंबई विश्वविद्यालय]] से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। साथ ही उन्होंने [[संस्कृत]] की जगन्नाथ शंकर सेट छात्रवृत्ति भी हासिल की। [[1917]] में उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से नेचुरल साइंस से, वनस्पति शास्त्र, रसायन शास्त्र तथा भूगर्भ शास्त्र लेकर, ग्रेजुएशन पास किया। साथ ही उन्होंने वनस्पति शास्त्र में फ्रैंक स्मार्ट प्राइस भी जीता। [[1918]] में लन्दन में आयोजित इण्डियन सिविल सर्विस की परीक्षा में वह बैठे और उन्हें सफल उम्मीदवारों में पहला स्थान मिला। लन्दन में छट्टियाँ बिताने के दौरान देशमुख ने दूसरी [[गोलमेज सम्मेलन|गोलमेज कांफ्रेंस]] में बतौर एक सेक्रेटरी काम किया। उस कांफ्रेंस में [[महात्मा गाँधी]] भी भाग ले रहे थे। उस कांफ्रेंस में सेन्ट्रल प्राविंस तथा बेटर सरकार की ओर से एक ज्ञापन रखा गया जिसे देशमुख ने तैयार किया था। यह ज्ञापन सर आटो नीमेय्यर द्वारा की जाने वाली जाँच से सम्बन्धित था, जिसके आधार पर [[भारत सरकार]] के एक्ट 1935 के अन्तर्गत केन्द्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय सम्बन्धों की नीति तय की जानी थी। यह ज्ञापन इतना सूझ-बूझ भरा तथा योग्यतापूर्ण था कि उसकी सबने प्रशंसा की और देशमुख की राजनीतिक हलके में तथा वित्तीय प्रशासन क्षेत्र में पहचान बन गई। बागवानी उनका प्रिय शौक था। [[संस्कृत]] भाषा से उनका लगाव गहरा था और उनका संस्कृत भाषा में एक कविता संग्रह प्रकाशित भी हुआ था, हालाँकि वह कई विदेशी भाषाओं के भी ज्ञाता थे।[[चित्र:C.D.Deshmukh.jpg|thumb|left|सी.डी. देशमुख (बाएँ)]] | ||
====भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर==== | ====भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर==== | ||
[[1939]] में देशमुख रिज़र्व बैंक के लायजन ऑफिसर बने। इनका काम बैंक, व्यवस्था तथा सरकार के बीच तालमेल बनाए रखना था। तीन महीने के भीतर ही अपनी कार्य कुशलता के कारण देशमुख बैंक के सेन्ट्रल बोर्ड के सेक्रेटरी बना दिए गए। दो वर्ष बाद वह डिप्टी गवर्नर बने तथा [[11 अगस्त]] [[1943]] को उन्हें गवर्नर बना दिया गया। यह पद उन्होंने 30 जून 1949 तक सम्भाला। अपने कार्यकाल में देशमुख एक बेहद प्रभावी गवर्नर सिद्ध हुए। उन्होंने रिज़र्व बैंक को निजी शेषन धारकों के बैंक से एक राष्ट्रीय बैंक के रूप में बदले जाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। देशमुख ने बैंकों की गतिविधियों को संयोजित करने के लिए ऐसा कानूनी ढाँचा तैयार करके दिया जो बिना किसी, बाधा के लम्बे समय तक चल सके। इसी के आधार पर ऋण नीतियाँ स्थापित की गईं और इण्डस्ट्रियल फाइनेंस कारपोरेशन ऑफ इण्डिया का गठन हो सका। ऐसा संवैधानिक ढाँचा बैंकिंग उद्योग के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। चिन्तामन देशमुख ने ग्रामीण वित्तीय ऋण भी तय किया जो रिज़र्व बैंक के कृषि ऋण कार्यक्रमों से तालमेल बैठाने में सफल हुआ और गाँव के ऋण पाने वालों, तथा रिज़र्व बैंक की व्यवस्था में किसी हिचकिचाहट की भी गुंजाइश नहीं रह गई। देशमुख की इस सूझबूझ भरी युक्ति की बड़ी प्रशंसा की गई और कहा गया कि इससे पूरी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन आया है, जो लाभकारी है। जुलाई 1944 में चिन्तामन देशमुख ब्रेटन वुड्स कांफ्रेस में भाग ले रहे थे। वहाँ इनकी सक्रिय भूमिका से संयुक्त राष्ट्रसंघ की इकाई इन्टरनैशनल मॉनीटरी फंड (IMF) की स्थापना सम्भव हुई। इसी तरह इन्टरनैशनल बैंक फॉर रिकांस्ट्रक्शन एण्ड डवलेपमेंट | [[1939]] में देशमुख रिज़र्व बैंक के लायजन ऑफिसर बने। इनका काम बैंक, व्यवस्था तथा सरकार के बीच तालमेल बनाए रखना था। तीन महीने के भीतर ही अपनी कार्य कुशलता के कारण देशमुख बैंक के सेन्ट्रल बोर्ड के सेक्रेटरी बना दिए गए। दो वर्ष बाद वह डिप्टी गवर्नर बने तथा [[11 अगस्त]] [[1943]] को उन्हें गवर्नर बना दिया गया। यह पद उन्होंने 30 जून 1949 तक सम्भाला। अपने कार्यकाल में देशमुख एक बेहद प्रभावी गवर्नर सिद्ध हुए। उन्होंने रिज़र्व बैंक को निजी शेषन धारकों के बैंक से एक राष्ट्रीय बैंक के रूप में बदले जाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। देशमुख ने बैंकों की गतिविधियों को संयोजित करने के लिए ऐसा कानूनी ढाँचा तैयार करके दिया जो बिना किसी, बाधा के लम्बे समय तक चल सके। इसी के आधार पर ऋण नीतियाँ स्थापित की गईं और इण्डस्ट्रियल फाइनेंस कारपोरेशन ऑफ इण्डिया का गठन हो सका। ऐसा संवैधानिक ढाँचा बैंकिंग उद्योग के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। चिन्तामन देशमुख ने ग्रामीण वित्तीय ऋण भी तय किया जो रिज़र्व बैंक के कृषि ऋण कार्यक्रमों से तालमेल बैठाने में सफल हुआ और गाँव के ऋण पाने वालों, तथा रिज़र्व बैंक की व्यवस्था में किसी हिचकिचाहट की भी गुंजाइश नहीं रह गई। देशमुख की इस सूझबूझ भरी युक्ति की बड़ी प्रशंसा की गई और कहा गया कि इससे पूरी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन आया है, जो लाभकारी है। जुलाई 1944 में चिन्तामन देशमुख ब्रेटन वुड्स कांफ्रेस में भाग ले रहे थे। वहाँ इनकी सक्रिय भूमिका से संयुक्त राष्ट्रसंघ की इकाई इन्टरनैशनल मॉनीटरी फंड (IMF) की स्थापना सम्भव हुई। इसी तरह इन्टरनैशनल बैंक फॉर रिकांस्ट्रक्शन एण्ड डवलेपमेंट की स्थापना भी हुई। इन दोनों संस्थानों के गवर्नर्स बोर्ड के सदस्य के रूप में देशमुख ने दस वर्षों तक काम किया और पेरिस में 1950 में जब इन दोनों संस्थानों की संयुक्त वार्षिक बैठक हुई उसमें देशमुख ने अध्यक्ष का दायित्व सम्भाला। | ||
====स्वतंत्र भारत के तीसरे वित्तमंत्री==== | ====स्वतंत्र भारत के तीसरे वित्तमंत्री==== | ||
[[सितम्बर]] [[1949]] में [[भारत]] के तत्कालीन प्रधानमन्त्री [[जवाहरलाल नेहरू]] ने देशमुख को भारत का स्पेशल फाइनेन्शियल अम्बेस्डर बनाकर [[अमेरिका]] तथा यूरोप में भेज दिया। वहाँ देशमुख ने अमरीका से [[गेहूँ]] की उधार योजना पर निर्णायक बातचीत की। उसी साल वर्ष के अंत में नेहरू जी ने योजना आयोग की सदस्यता का प्रस्ताव दिया। [[1 अप्रैल]] [[1920]] में जब आयोग शुरू हुआ देशमुख उसके सदस्य बने। जल्दी ही देशमुख ने संसद में वित्तमंत्री का पद सम्भाला जहाँ वह जुलाई 1956 तक बने रहे। उनके इस मंत्री पद सम्भाल ने के दौरान देश की वित्तीय योजनाओं और उनके दृष्टिकोण में बड़े व्यापक परिवर्तन आए जिनका प्रभाव विकास की गति पर स्पष्ट देखा गया। देशमुख ने देश की पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। चिन्तामन देशमुख ने वित्तीय संरचना में सामाजिक नियन्त्रण की जगह बनाई जिससे नया कम्पनी एक्ट बनाया जा सका। इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण हुआ और जीवन बीमा कम्पनियों की संकल्पना की जा सकी। वर्ष 1956 से 1960 के बीच जब चिन्तामन देशमुख विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन थे, तब शिक्षा तथा समाज सेवाओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार सामने आए जिनसे विश्वविद्यालयों के कार्य स्तर में देशव्यापी विकास देखा जा सका।<ref>{{cite web |url=http://www.kaiseaurkya.com/c-d-deshmukh-biography-in-hindi-language/|title=सी. डी. देशमुख का जीवन परिचय |accessmonthday=26 अगस्त |accessyear=2016 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=Kaise Aur Kya कैसे और क्या |language=हिन्दी }}</ref> | [[सितम्बर]] [[1949]] में [[भारत]] के तत्कालीन प्रधानमन्त्री [[जवाहरलाल नेहरू]] ने देशमुख को भारत का स्पेशल फाइनेन्शियल अम्बेस्डर बनाकर [[अमेरिका]] तथा यूरोप में भेज दिया। वहाँ देशमुख ने अमरीका से [[गेहूँ]] की उधार योजना पर निर्णायक बातचीत की। उसी साल वर्ष के अंत में नेहरू जी ने [[योजना आयोग]] की सदस्यता का प्रस्ताव दिया। [[1 अप्रैल]] [[1920]] में जब आयोग शुरू हुआ देशमुख उसके सदस्य बने। जल्दी ही देशमुख ने [[संसद]] में वित्तमंत्री का पद सम्भाला जहाँ वह जुलाई 1956 तक बने रहे। उनके इस मंत्री पद सम्भाल ने के दौरान देश की वित्तीय योजनाओं और उनके दृष्टिकोण में बड़े व्यापक परिवर्तन आए जिनका प्रभाव विकास की गति पर स्पष्ट देखा गया। देशमुख ने देश की [[प्रथम पंचवर्षीय योजना |पहली]] और [[द्वितीय पंचवर्षीय योजना |दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं]] में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। चिन्तामन देशमुख ने वित्तीय संरचना में सामाजिक नियन्त्रण की जगह बनाई जिससे नया कम्पनी एक्ट बनाया जा सका। इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण हुआ और जीवन बीमा कम्पनियों की संकल्पना की जा सकी। वर्ष 1956 से 1960 के बीच जब चिन्तामन देशमुख [[विश्वविद्यालय अनुदान आयोग]] के चेयरमैन थे, तब शिक्षा तथा समाज सेवाओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार सामने आए जिनसे [[विश्वविद्यालय|विश्वविद्यालयों]] के कार्य स्तर में देशव्यापी विकास देखा जा सका।<ref name="कैसे और क्या">{{cite web |url=http://www.kaiseaurkya.com/c-d-deshmukh-biography-in-hindi-language/|title=सी. डी. देशमुख का जीवन परिचय |accessmonthday=26 अगस्त |accessyear=2016 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=Kaise Aur Kya कैसे और क्या |language=हिन्दी }}</ref> | ||
==अन्य महत्त्वपूर्ण योगदान== | |||
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वर्ष [[1956]] से [[1960]] के बीच जब चिन्तामन देशमुख [[विश्वविद्यालय अनुदान आयोग]] के चेयरमैन थे, तब शिक्षा तथा समाज सेवाओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार सामने आए जिनसे विश्वविद्यालयों के कार्य स्तर में देशव्यापी विकास देखा जा सका। चिन्तामन मार्च [[1960]] से फरवरी [[1967]] तक [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] के उपकुलपति भी रहे। उनके कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्यालय ने उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में बेजोड़ नाम कमाया। वित्तीय कार्यक्षेत्र तथा शिक्षा क्षेत्र के अतिरिक्त देशमुख विविध विभागों में कार्यरत रहे। [[1945]] से [[1964]] तक लगातार वह '''इण्डियन स्टैटिस्टकल इन्टीट्यूट''' के प्रेसिडेंट रहे। [[1965]] में उन्होंने '''इण्डियन इकानोमिक ग्रोथ न्यू दिल्ली''' में प्रेसिडेंट का पद संभाला। [[1957]] से [[1960]] तक वह [[नेशनल बुक ट्रस्ट]] के ऑनरेरी चेयरमैन भी रहे। [[1959]] में इन्होंने '''इण्डिया इन्टरनेशनल सेंटर''' की स्थापना की जिसका आजीवन अध्यक्ष इन्हें बनाया गया। चिन्तामन देशमुख ने 1959 से [[1973]] तक '''बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव स्टॉफ कॉलेज ऑफ इण्डिया''' [[हैदराबाद]] अगुवाई की। इस तरह वह एकसाथ एक बार में कई-कई पदों का दायित्व सम्भालते रहे। अपने कार्यभार से मुक्त होने के बाद चिन्तामन देशमुख अपने [[परिवार]] में मग्न हो गए।<ref name="कैसे और क्या"/> | |||
==सम्मान और पुरस्कार== | ==सम्मान और पुरस्कार== | ||
* [[कलकत्ता विश्वविद्यालय]] द्वारा 'डॉक्टर ऑफ़ साइंस' ([[1957]]) की उपाधि मिली। | * [[कलकत्ता विश्वविद्यालय]] द्वारा 'डॉक्टर ऑफ़ साइंस' ([[1957]]) की उपाधि मिली। | ||
* सन [[1959]] में [[रेमन मैग्सेसे पुरस्कार]] से सम्मानित हुए। | * सन [[1959]] में [[रेमन मैग्सेसे पुरस्कार]] से सम्मानित हुए। | ||
* सन 1975 में भारत सरकार द्वारा [[पद्म विभूषण]] से सम्मानित किया गया। | * सन [[1975]] में [[भारत सरकार]] द्वारा [[पद्म विभूषण]] से सम्मानित किया गया। | ||
==निधन== | ==निधन== | ||
डॉ. चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख का निधन [[2 अक्टूबर]], [[1982]] को हो गया। | डॉ. चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख का निधन [[2 अक्टूबर]], [[1982]] को हो गया। |
04:32, 14 जनवरी 2018 के समय का अवतरण
सी. डी. देशमुख
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पूरा नाम | डॉ. चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख |
जन्म | 14 जनवरी, 1896 |
जन्म भूमि | रायगढ़ ज़िला, महाराष्ट्र |
मृत्यु | 2 अक्टूबर, 1982 |
मृत्यु स्थान | हैदराबाद, आंध्र प्रदेश |
अभिभावक | द्वारकानाथ देशमुख और भागीरथी बाई |
पति/पत्नी | रोशिना (1919-1949), दुर्गाबाई देशमुख (1953-1981) |
संतान | 1 |
शिक्षा | स्नातक |
विद्यालय | कैंब्रिज विश्वविद्यालय |
पुरस्कार-उपाधि | पद्म विभूषण, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार |
विशेष योगदान | रिज़र्व बैंक को निजी शेषन धारकों के बैंक से एक राष्ट्रीय बैंक के रूप में बदले जाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। |
नागरिकता | भारतीय |
पद | आई.सी.एस. अधिकारी, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर, स्वतंत्र भारत के तीसरे वित्त मंत्री |
अन्य जानकारी | सी.डी. देशमुख को संस्कृत भाषा से लगाव गहरा था जिसमें इनका एक कविता संग्रह प्रकाशित भी हुआ था, हालाँकि वह कई विदेशी भाषाओं के भी ज्ञाता थे। |
अद्यतन | 17:31, 26 अगस्त 2016 (IST)
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चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख (अंग्रेज़ी: Chintamani Dwarakanath Deshmukh, जन्म: 14 जनवरी, 1896; मृत्यु: 2 अक्टूबर, 1982) ब्रिटिश शासन के अधीन आई.सी.एस. अधिकारी और भारतीय रिज़र्व बैंक के तीसरे गवर्नर थे। ब्रिटिश राज ने उन्हें 'सर' की उपाधि दी थी। इसके पश्चात् उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल में भारत के तीसरे वित्तमंत्री के रूप में भी सेवा की। सी.डी. देशमुख 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' के अध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति बनाये गए थे। उनको 1975 में राष्ट्रपति ने 'पद्म विभूषण' के अलंकरण से सम्मानित किया था। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं।
जीवन परिचय
चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले में 14 जनवरी, 1896 ई. को हुआ। इनके पिता द्वारकानाथ देशमुख एक सम्मानित वकील थे तथा उनकी माँ भागीरथी बाई एक धार्मिक महिला थी। देशमुख ने 1912 में बंबई विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। साथ ही उन्होंने संस्कृत की जगन्नाथ शंकर सेट छात्रवृत्ति भी हासिल की। 1917 में उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से नेचुरल साइंस से, वनस्पति शास्त्र, रसायन शास्त्र तथा भूगर्भ शास्त्र लेकर, ग्रेजुएशन पास किया। साथ ही उन्होंने वनस्पति शास्त्र में फ्रैंक स्मार्ट प्राइस भी जीता। 1918 में लन्दन में आयोजित इण्डियन सिविल सर्विस की परीक्षा में वह बैठे और उन्हें सफल उम्मीदवारों में पहला स्थान मिला। लन्दन में छट्टियाँ बिताने के दौरान देशमुख ने दूसरी गोलमेज कांफ्रेंस में बतौर एक सेक्रेटरी काम किया। उस कांफ्रेंस में महात्मा गाँधी भी भाग ले रहे थे। उस कांफ्रेंस में सेन्ट्रल प्राविंस तथा बेटर सरकार की ओर से एक ज्ञापन रखा गया जिसे देशमुख ने तैयार किया था। यह ज्ञापन सर आटो नीमेय्यर द्वारा की जाने वाली जाँच से सम्बन्धित था, जिसके आधार पर भारत सरकार के एक्ट 1935 के अन्तर्गत केन्द्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय सम्बन्धों की नीति तय की जानी थी। यह ज्ञापन इतना सूझ-बूझ भरा तथा योग्यतापूर्ण था कि उसकी सबने प्रशंसा की और देशमुख की राजनीतिक हलके में तथा वित्तीय प्रशासन क्षेत्र में पहचान बन गई। बागवानी उनका प्रिय शौक था। संस्कृत भाषा से उनका लगाव गहरा था और उनका संस्कृत भाषा में एक कविता संग्रह प्रकाशित भी हुआ था, हालाँकि वह कई विदेशी भाषाओं के भी ज्ञाता थे।

भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर
1939 में देशमुख रिज़र्व बैंक के लायजन ऑफिसर बने। इनका काम बैंक, व्यवस्था तथा सरकार के बीच तालमेल बनाए रखना था। तीन महीने के भीतर ही अपनी कार्य कुशलता के कारण देशमुख बैंक के सेन्ट्रल बोर्ड के सेक्रेटरी बना दिए गए। दो वर्ष बाद वह डिप्टी गवर्नर बने तथा 11 अगस्त 1943 को उन्हें गवर्नर बना दिया गया। यह पद उन्होंने 30 जून 1949 तक सम्भाला। अपने कार्यकाल में देशमुख एक बेहद प्रभावी गवर्नर सिद्ध हुए। उन्होंने रिज़र्व बैंक को निजी शेषन धारकों के बैंक से एक राष्ट्रीय बैंक के रूप में बदले जाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। देशमुख ने बैंकों की गतिविधियों को संयोजित करने के लिए ऐसा कानूनी ढाँचा तैयार करके दिया जो बिना किसी, बाधा के लम्बे समय तक चल सके। इसी के आधार पर ऋण नीतियाँ स्थापित की गईं और इण्डस्ट्रियल फाइनेंस कारपोरेशन ऑफ इण्डिया का गठन हो सका। ऐसा संवैधानिक ढाँचा बैंकिंग उद्योग के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। चिन्तामन देशमुख ने ग्रामीण वित्तीय ऋण भी तय किया जो रिज़र्व बैंक के कृषि ऋण कार्यक्रमों से तालमेल बैठाने में सफल हुआ और गाँव के ऋण पाने वालों, तथा रिज़र्व बैंक की व्यवस्था में किसी हिचकिचाहट की भी गुंजाइश नहीं रह गई। देशमुख की इस सूझबूझ भरी युक्ति की बड़ी प्रशंसा की गई और कहा गया कि इससे पूरी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन आया है, जो लाभकारी है। जुलाई 1944 में चिन्तामन देशमुख ब्रेटन वुड्स कांफ्रेस में भाग ले रहे थे। वहाँ इनकी सक्रिय भूमिका से संयुक्त राष्ट्रसंघ की इकाई इन्टरनैशनल मॉनीटरी फंड (IMF) की स्थापना सम्भव हुई। इसी तरह इन्टरनैशनल बैंक फॉर रिकांस्ट्रक्शन एण्ड डवलेपमेंट की स्थापना भी हुई। इन दोनों संस्थानों के गवर्नर्स बोर्ड के सदस्य के रूप में देशमुख ने दस वर्षों तक काम किया और पेरिस में 1950 में जब इन दोनों संस्थानों की संयुक्त वार्षिक बैठक हुई उसमें देशमुख ने अध्यक्ष का दायित्व सम्भाला।
स्वतंत्र भारत के तीसरे वित्तमंत्री
सितम्बर 1949 में भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने देशमुख को भारत का स्पेशल फाइनेन्शियल अम्बेस्डर बनाकर अमेरिका तथा यूरोप में भेज दिया। वहाँ देशमुख ने अमरीका से गेहूँ की उधार योजना पर निर्णायक बातचीत की। उसी साल वर्ष के अंत में नेहरू जी ने योजना आयोग की सदस्यता का प्रस्ताव दिया। 1 अप्रैल 1920 में जब आयोग शुरू हुआ देशमुख उसके सदस्य बने। जल्दी ही देशमुख ने संसद में वित्तमंत्री का पद सम्भाला जहाँ वह जुलाई 1956 तक बने रहे। उनके इस मंत्री पद सम्भाल ने के दौरान देश की वित्तीय योजनाओं और उनके दृष्टिकोण में बड़े व्यापक परिवर्तन आए जिनका प्रभाव विकास की गति पर स्पष्ट देखा गया। देशमुख ने देश की पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। चिन्तामन देशमुख ने वित्तीय संरचना में सामाजिक नियन्त्रण की जगह बनाई जिससे नया कम्पनी एक्ट बनाया जा सका। इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण हुआ और जीवन बीमा कम्पनियों की संकल्पना की जा सकी। वर्ष 1956 से 1960 के बीच जब चिन्तामन देशमुख विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन थे, तब शिक्षा तथा समाज सेवाओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार सामने आए जिनसे विश्वविद्यालयों के कार्य स्तर में देशव्यापी विकास देखा जा सका।[1]
अन्य महत्त्वपूर्ण योगदान

वर्ष 1956 से 1960 के बीच जब चिन्तामन देशमुख विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन थे, तब शिक्षा तथा समाज सेवाओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार सामने आए जिनसे विश्वविद्यालयों के कार्य स्तर में देशव्यापी विकास देखा जा सका। चिन्तामन मार्च 1960 से फरवरी 1967 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे। उनके कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्यालय ने उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में बेजोड़ नाम कमाया। वित्तीय कार्यक्षेत्र तथा शिक्षा क्षेत्र के अतिरिक्त देशमुख विविध विभागों में कार्यरत रहे। 1945 से 1964 तक लगातार वह इण्डियन स्टैटिस्टकल इन्टीट्यूट के प्रेसिडेंट रहे। 1965 में उन्होंने इण्डियन इकानोमिक ग्रोथ न्यू दिल्ली में प्रेसिडेंट का पद संभाला। 1957 से 1960 तक वह नेशनल बुक ट्रस्ट के ऑनरेरी चेयरमैन भी रहे। 1959 में इन्होंने इण्डिया इन्टरनेशनल सेंटर की स्थापना की जिसका आजीवन अध्यक्ष इन्हें बनाया गया। चिन्तामन देशमुख ने 1959 से 1973 तक बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव स्टॉफ कॉलेज ऑफ इण्डिया हैदराबाद अगुवाई की। इस तरह वह एकसाथ एक बार में कई-कई पदों का दायित्व सम्भालते रहे। अपने कार्यभार से मुक्त होने के बाद चिन्तामन देशमुख अपने परिवार में मग्न हो गए।[1]
सम्मान और पुरस्कार
- कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा 'डॉक्टर ऑफ़ साइंस' (1957) की उपाधि मिली।
- सन 1959 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित हुए।
- सन 1975 में भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
निधन
डॉ. चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख का निधन 2 अक्टूबर, 1982 को हो गया।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ इस तक ऊपर जायें: 1.0 1.1 सी. डी. देशमुख का जीवन परिचय (हिन्दी) Kaise Aur Kya कैसे और क्या। अभिगमन तिथि: 26 अगस्त, 2016।
बाहरी कड़ियाँ
संबंधित लेख