"कल आज और कल -आदित्य चौधरी": अवतरणों में अंतर
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कृष्ण की कूटनीति से [[महाभारत]] में [[कौरव|कौरवों]] के सभी महारथी मारे गए। पहले [[भीष्म]] फिर [[द्रोणाचार्य]] फिर [[कर्ण]] और अंत में [[दुर्योधन]]। [[जयद्रथ]] और [[जरासंध]] वध भी भगवान कृष्ण की कूटनीति का ही फल था। कृष्ण ने भीष्म से ही पूछा कि वो कैसे मरेंगे क्योंकि भीष्म प्रतिदिन दस सहस्त्र रथियों को मार कर ही जल ग्रहण करते थे। दस दिनों में भीष्म ने [[पांडव|पांडवों]] की सेना को गाजर मूली की तरह संहारित किया था। भीष्म ने बताया कि स्त्री और उभयलिङ्गी पर अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाने की प्रतिज्ञा कर चुके हैं। इसीलिए [[शिखंडी|शिखङ्डी]] को [[अर्जुन]] ने अपने सामने खड़ा करके भीष्म पर तीर मारे और भीष्म शरशैय्या पर लेटे हुए मृत्यु की प्रतीक्षा तब तक करते रहे जब तक कि सूर्य [[उत्तरायण]] नहीं हो गए। | कृष्ण की कूटनीति से [[महाभारत]] में [[कौरव|कौरवों]] के सभी महारथी मारे गए। पहले [[भीष्म]] फिर [[द्रोणाचार्य]] फिर [[कर्ण]] और अंत में [[दुर्योधन]]। [[जयद्रथ]] और [[जरासंध]] वध भी भगवान कृष्ण की कूटनीति का ही फल था। कृष्ण ने भीष्म से ही पूछा कि वो कैसे मरेंगे क्योंकि भीष्म प्रतिदिन दस सहस्त्र रथियों को मार कर ही जल ग्रहण करते थे। दस दिनों में भीष्म ने [[पांडव|पांडवों]] की सेना को गाजर मूली की तरह संहारित किया था। भीष्म ने बताया कि स्त्री और उभयलिङ्गी पर अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाने की प्रतिज्ञा कर चुके हैं। इसीलिए [[शिखंडी|शिखङ्डी]] को [[अर्जुन]] ने अपने सामने खड़ा करके भीष्म पर तीर मारे और भीष्म शरशैय्या पर लेटे हुए मृत्यु की प्रतीक्षा तब तक करते रहे जब तक कि सूर्य [[उत्तरायण]] नहीं हो गए। | ||
द्रोणाचार्य के संबंध में सभी को मालूम था कि वे केवल [[अश्वत्थामा]] के लिए ही जीवन जी रहे हैं और अश्वत्थामा के मरने से वे भी मर जाएँगे। सत्यवादी धर्मराज [[युधिष्ठिर]] से "अश्वत्थामा हतौहत: नरोवाकुंजरोवा" कहलवाया गया। जिससे द्रोणाचार्य ने समझा कि अश्वत्थामा मारा गया और वे समाधिस्त हो गए। समाधि अवस्था में ही [[धृष्टद्युम्न]] ने उनका वध किया। दुर्योधन की जंघा पर वार करवाना हो या जयद्रथ को मरवाने के लिए सूर्य को छिपा कर सूर्यास्त का भ्रम पैदा करना हो, कृष्ण सदा सफल ही रहे। | द्रोणाचार्य के संबंध में सभी को मालूम था कि वे केवल [[अश्वत्थामा]] के लिए ही जीवन जी रहे हैं और अश्वत्थामा के मरने से वे भी मर जाएँगे। सत्यवादी धर्मराज [[युधिष्ठिर]] से "अश्वत्थामा हतौहत: नरोवाकुंजरोवा" कहलवाया गया। जिससे द्रोणाचार्य ने समझा कि अश्वत्थामा मारा गया और वे समाधिस्त हो गए। समाधि अवस्था में ही [[धृष्टद्युम्न]] ने उनका वध किया। दुर्योधन की जंघा पर वार करवाना हो या जयद्रथ को मरवाने के लिए सूर्य को छिपा कर सूर्यास्त का भ्रम पैदा करना हो, कृष्ण सदा सफल ही रहे। | ||
राजा हरिश्चंद्र सतयुग में हुए और उन्हें अपना राज्य, रानी और पुत्र ऋषि [[विश्वामित्र]] के कारण त्यागने पड़े। हरिश्चंद्र अपने सत्य के मार्ग से नहीं हटे चाहे कितनी भी कठिनाइयां आईं। अपना राज्य भी वापस नहीं लिया और यह कहकर छोड़ दिया कि दान की हुई वस्तु वापस कैसे लूँ ? राजा हरिश्चंद्र को भगवान का अवतार नहीं माना जाता इसलिए कहीं भी उनके मंदिर नहीं पाए जाते। | राजा हरिश्चंद्र सतयुग में हुए और उन्हें अपना राज्य, रानी और पुत्र ऋषि [[विश्वामित्र]] के कारण त्यागने पड़े। हरिश्चंद्र अपने सत्य के मार्ग से नहीं हटे चाहे कितनी भी कठिनाइयां आईं। अपना राज्य भी वापस नहीं लिया और यह कहकर छोड़ दिया कि दान की हुई वस्तु को वापस कैसे लूँ ? राजा हरिश्चंद्र को भगवान का अवतार नहीं माना जाता इसलिए कहीं भी उनके मंदिर नहीं पाए जाते। | ||
ऐसा क्यों है ? हमारे अवतार और भगवान वे क्यों नहीं हैं जो सदा सत्य के नियमों पर चले, जिन्होंने कभी किसी भी परिस्थिति में छल-कपट का सहारा नहीं लिया ? इसका दूसरा पहलू भी है जो व्यावहारिक धरातल पर खरा उतरता है। राम ने अपने माता-पिता के प्रति पूरी श्रद्धा-भक्ति का परिचय दिया और अनेक मर्यादाओं का पालन भी किया लेकिन अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ छल का सहारा भी लिया। कृष्ण के संबंध में भी यही है। | ऐसा क्यों है ? हमारे अवतार और भगवान वे क्यों नहीं हैं जो सदा सत्य के नियमों पर चले, जिन्होंने कभी किसी भी परिस्थिति में छल-कपट का सहारा नहीं लिया ? इसका दूसरा पहलू भी है जो व्यावहारिक धरातल पर खरा उतरता है। राम ने अपने माता-पिता के प्रति पूरी श्रद्धा-भक्ति का परिचय दिया और अनेक मर्यादाओं का पालन भी किया लेकिन अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ छल का सहारा भी लिया। कृष्ण के संबंध में भी यही है। | ||
राजा हरिश्चंद्र के बारे में यदि हम विचार करें तो समझ में आता है कि उन्होंने अपना राज्य एक ऋषि को सौंप दिया जो कि राज्य की जनता के प्रति पूर्णत: अन्याय ही हुआ। ठीक इसी तरह हरिश्चंद्र ने अपने राज्य, पत्नी और पुत्र को एक वस्तु की तरह दान कर दिया जो कि जनता को अन्यायपूर्ण लगा और सतयुगीन राजा होने के बावजूद भी, राजा हरिश्चंद्र कभी भी अवतार या भगवान का स्थान नहीं पा सके। | राजा हरिश्चंद्र के बारे में यदि हम विचार करें तो समझ में आता है कि उन्होंने अपना राज्य एक ऋषि को सौंप दिया जो कि राज्य की जनता के प्रति पूर्णत: अन्याय ही हुआ। ठीक इसी तरह हरिश्चंद्र ने अपने राज्य, पत्नी और पुत्र को एक वस्तु की तरह दान कर दिया जो कि जनता को अन्यायपूर्ण लगा और सतयुगीन राजा होने के बावजूद भी, राजा हरिश्चंद्र कभी भी अवतार या भगवान का स्थान नहीं पा सके। |
13:20, 9 जुलाई 2013 का अवतरण
कल आज और कल -आदित्य चौधरी हमारी भाषा हिन्दी में गुज़रे हुए कल और आने वाले कल के लिए एक ही शब्द है 'कल'। ऐसा क्यों है और क्या यह सही है या फिर इसके पीछे हमारी कौन सी सोच या मानसिकता काम करती है, इस पर चर्चा करते हैं लेकिन पहले नारद जी क्या पूछ रहे हैं वह भी देखें-
इन पंक्तियों में छिपे अर्थ बड़ा ही अन्यायपूर्ण हैं। बिचारे कौओं की क्या ग़लती है जो उन्हें कलियुग से पहले के युगों में दाना-तिनका ही खाने को मिलता था और हंस में ऐसी क्या ख़ास बात थी कि वह बेशक़ीमती मोती ही खाता था। क्या इसका उत्तर है, गोरा रंग और सुंदरता, जो हंस में थी और कौओं में नहीं। इसे तो नस्ली पक्षपात की मानसिकता ही कहेंगे। ईश्वर ने तो सबको समान ही बनाया है। बाढ़ आती है तो गोरे को भी डुबाती है और काले को भी, सुंदर को भी और असुंदर को भी... तो फिर ये भेद-भाव भी ईश्वर ने तो नहीं किया होगा। ये तो मनुष्य के दिमाग़ की उपज है।
ऊपर की तालिका में हिन्दी के अलावा सभी भाषाओं के पास गुज़रे और आने वाले दोनों कल के लिए अलग-अलग शब्द हैं। जिसका अर्थ है कि जो कल बीत गया वह उस कल से भिन्न है जो कि अगले दिन आएगा। समय को सीधे रेखा की तरह मान लिया गया। जो कि विकास और प्रगतिवादी दृष्टिकोण हुआ। लेकिन हिन्दी की सोच भिन्न जा रही है और यह संदेश देती है कि समय सीधे रेखा में गतिमान नहीं है, यह वर्तुलाकार पथ पर गतिमान है। जो घट गया वही फिर घटेगा और जो घटेगा वह पहले भी घट चुका है। इसलिए आने वाला कल वही है जो बीता हुआ कल था। यह सोच हमें किस तरह प्रगति और विकास की ओर ले जाएगी ? कहना मुश्किल है। खोज और रचना में क्या अंतर है? जो पहले से उपस्थित हो लेकिन उसकी जानकारी न हो और उसकी जानकारी हमें किसी साधन से हो जाय तो उसे 'खोज' कहते हैं। जो पहले से उपस्थित नहीं है लेकिन पहले से उपस्थित साधनों द्वारा जिसे बनाया जाय उसे 'रचना' कहते हैं। समय कोई मोटरकार या रेलगाड़ी नहीं है जो किसी रेखा में या वर्तुल में चलेगा। समय की कोई खोज नहीं की गई बल्कि इसे तो मनुष्य ने अपनी सुविधानुसार परिभाषित किया है जो आइंसटाइन के 'सापेक्षता के सिद्धांत' पर आधारित है। एक तरह से कह सकते हैं कि विज्ञान के बहुत से प्रश्नों के हल के लिए, समय को बनाया गया है रचा गया है। ब्रह्माण्ड में समय, आकार और गति की परिभाषा करने के लिए जो नियम और वैज्ञानिक-तथ्य इस्तेमाल किए गए हैं, वे निश्चित रूप से अपूर्ण ही हैं लेकिन फिर भी हम समय को परिभाषित तो करते ही हैं। साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि समय की परिभाषा विज्ञान के पास न होने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हम धर्म ग्रंथों को खंगालना प्रारम्भ कर दें और किसी अव्यावहारिक से नतीजे से संतुष्ट हो कर बैठ जाएँ। |
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