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|विवरण='कविता' का अर्थ है- "काव्यात्मक रचना"। [[हिन्दी साहित्य]] में [[आधुनिक काल]] के पूर्व तक कविता शब्द का प्रयोग 'कविताई' या 'कवि-ता' (कवि-कर्म) के अर्थ में ही होता था। | |||
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'''कविता''' अर्थात् 'काव्यात्मक रचना' (कवि की कृति)। काव्य से जहाँ रचना के भावपक्ष और अन्त:सौंदर्य का अधिक बोध होता है, वहाँ कविता शब्द के प्रयोग से प्राय: उसके कलापक्ष और रूपात्मक सौंदर्य को प्रधानता मिलती है। काव्य, कविता, पद्य, इन तीनों शब्दों को क्रमागत रूप से निम्नतर भावस्थिति में रखा जाता है। गद्य पद्य का विपक्षी रूप है, जो छन्दोबद्ध या विचार तक सीमित है। मात्र छन्दोबद्ध रचना के लिए पद्य शब्द का प्रयोग उचित है, परन्तु कविता शब्द पद्य से ऊँची स्थिति का द्योतक है और उसमें कविता (कवि-कर्म), अर्थात् काव्यकला को अधिक महत्त्व दिया गया है। सामान्यत: तीनों शब्द समान अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। | |||
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यद्यपि व्यापक रूप से छन्दोबद्ध रचना मात्र के लिए कविता शब्द का प्रयोग होता है, संकीर्ण अर्थ में, [[आधुनिक काल]] में विशेष रूप से, कविता शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत आकार में छोटे, ऐसे पद्य विशेष के लिए किया जाता है, जो आधुनिक गीति, प्रगीति या मुक्तक के अनेकानेक प्रकारों में से किसी रूप में रचा गया हो। पद्य की ऐसी रचनाओं का | यद्यपि व्यापक रूप से छन्दोबद्ध रचना मात्र के लिए 'कविता' शब्द का प्रयोग होता है, संकीर्ण अर्थ में, [[आधुनिक काल]] में विशेष रूप से, कविता शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत आकार में छोटे, ऐसे पद्य विशेष के लिए किया जाता है, जो आधुनिक गीति, प्रगीति या मुक्तक के अनेकानेक प्रकारों में से किसी रूप में रचा गया हो। पद्य की ऐसी रचनाओं का पृथक् निर्देश करने के लिए 'काव्य' शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता। 'काव्य' शब्द जब किसी रचना विशेष के लिए प्रयोग होता है, तब उससे अपेक्षाकृत बड़ी, प्राय: सदैव ही प्रबन्धात्मक रचना का अर्थ सूचित होता है। काव्य और कविता शब्द के प्रयोग का एक अन्तर यह भी है कि जहाँ '''काव्य''' सामान्यत: [[साहित्य]] के [[पर्यायवाची शब्द|पर्यायवाची]] अर्थ में ऐसी रचनाओं को भी कह सकते हैं, जो पद्य में न रची गई हों, वहीं '''कविता''' अनिवार्य रूप से पद्यात्मक लय और तालयुक्त शब्दावली की सूचना देती है; भले ही उसमें काव्य की आन्तरिक विशेषता विद्यमान न हो और वह मात्र पद्यबद्ध हो। इसके अतिरिक्त काव्य का अभिधान ऐसी रचनाओं को नहीं दिया जा सकता, जो '''[[अरस्तु]] के 'पोइटिक्स' में निर्दिष्ट 'पोइट्री' से भिन्न 'वर्स' मात्र है।''' | ||
*[[हिन्दी साहित्य]] में आधुनिक काल पूर्व तक कविता शब्द का प्रयोग 'कविताई' या 'कवि-ता' (कवि-कर्म) के अर्थ में ही होता था। [[तुलसीदास]] ने '[[रामचरितमानस]]' की भूमिका में कहा है- | *[[हिन्दी साहित्य]] में आधुनिक काल पूर्व तक कविता शब्द का प्रयोग 'कविताई' या 'कवि-ता' (कवि-कर्म) के अर्थ में ही होता था। [[तुलसीदास]] ने '[[रामचरितमानस]]' की भूमिका में कहा है- | ||
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भिखारीदास ने इसी अर्थ में काव्य शब्द का भी प्रयोग किया है। 'इनके काव्य में मिली [[भाषा]] विविध प्रकार की है। [[हिन्दी]] में कविता शब्द का यह प्रयोग परम्परानुमोदित है, यद्यपि कदाचित यह कथन अयुक्त न होगा कि [[संस्कृत साहित्य]] में कविता की अपेक्षा काव्य शब्द का अधिक प्रयोग हुआ है। | भिखारीदास ने इसी अर्थ में काव्य शब्द का भी प्रयोग किया है। 'इनके काव्य में मिली [[भाषा]] विविध प्रकार की है। [[हिन्दी]] में कविता शब्द का यह प्रयोग परम्परानुमोदित है, यद्यपि कदाचित यह कथन अयुक्त न होगा कि [[संस्कृत साहित्य]] में कविता की अपेक्षा काव्य शब्द का अधिक प्रयोग हुआ है। | ||
==भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान== | ==भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान== | ||
संकीर्ण अर्थ में किसी रचना विशेष के लिए कविता का प्रयोग [[आधुनिक काल]] में ही होने लगा है। प्राचीन काल में अधिकतर या तो प्रबन्ध काव्य की रचना होती थी या मुक्तक काव्य की। एक से अधिक [[छन्द|छन्दों]] में एक विषय पर छोटी पद्य रचनाएँ स्तोत्र, स्तवन, प्रशस्ति, माहात्म्य आदि के रूप में मिलती है। हिन्दी के मध्ययुगीन [[भक्त]] कवियों ने भी इस प्रकार की स्तोत्रादि रचनाएँ की हैं और यह क्रम [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] तक चला आया है। परन्तु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सामयिक विषयों पर विचारोत्तेजक और उद्बोधनपूर्ण स्फुट रचनाओं की नवीन पद्धति चलाई। उनकी 'भारत-भिक्षा', 'विजयिनी-विजय-वैजयन्ती', 'श्रीराजकुमार-शुभागमन-वर्णन', 'मानसोपायन', 'वर्षाविनोद' आदि रचनाओं ने हिन्दी में पद्य निबन्धों की उस परम्परा का सूत्रपात किया, जो आधुनिक काल में अनेकधा विकसित हुई। ऐसी रचनाओं की ही जातिवाचक संज्ञा कविता है, जो [[अंग्रेज़ी]] की 'पोइम' और [[उर्दू]] की 'नज्म' का पर्याय है। भारतेन्दु काल में देशभक्ति, राजभक्ति, समाज सुधार और प्राकृतिक वर्णन सम्बन्धी असंख्य गम्भीर और व्यंग्यात्मक कविताएँ रची गईं। | संकीर्ण अर्थ में किसी रचना विशेष के लिए कविता का प्रयोग [[आधुनिक काल]] में ही होने लगा है। प्राचीन काल में अधिकतर या तो [[प्रबन्ध काव्य]] की रचना होती थी या [[मुक्तक काव्य]] की। एक से अधिक [[छन्द|छन्दों]] में एक विषय पर छोटी पद्य रचनाएँ स्तोत्र, स्तवन, प्रशस्ति, माहात्म्य आदि के रूप में मिलती है। हिन्दी के मध्ययुगीन [[भक्त]] कवियों ने भी इस प्रकार की स्तोत्रादि रचनाएँ की हैं और यह क्रम [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] तक चला आया है। परन्तु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सामयिक विषयों पर विचारोत्तेजक और उद्बोधनपूर्ण स्फुट रचनाओं की नवीन पद्धति चलाई। उनकी 'भारत-भिक्षा', 'विजयिनी-विजय-वैजयन्ती', 'श्रीराजकुमार-शुभागमन-वर्णन', 'मानसोपायन', 'वर्षाविनोद' आदि रचनाओं ने [[हिन्दी]] में पद्य निबन्धों की उस परम्परा का सूत्रपात किया, जो आधुनिक काल में अनेकधा विकसित हुई। ऐसी रचनाओं की ही जातिवाचक संज्ञा '''कविता''' है, जो [[अंग्रेज़ी]] की 'पोइम' और [[उर्दू]] की 'नज्म' का पर्याय है। भारतेन्दु काल में देशभक्ति, राजभक्ति, समाज सुधार और प्राकृतिक वर्णन सम्बन्धी असंख्य गम्भीर और व्यंग्यात्मक कविताएँ रची गईं। | ||
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द्विवेदी काल में सामयिक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से इन कविताओं का प्रचलन और अधिक हो गया। वस्तुत: उन अनेक आधुनिक रूपों में कविता भी है, जिसका उद्गम और विकास [[समाचार पत्र|समाचार पत्रों]] और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हुआ है। परन्तु कविताएँ इतिवृत्त, विवरण, शिक्षा और उद्देश्य विषयक ही नहीं, भावात्मक भी हो सकती है। यह छायावाद की उन असंख्य | द्विवेदी काल में सामयिक [[पत्रिका|पत्र-पत्रिकाओं]] के माध्यम से इन कविताओं का प्रचलन और अधिक हो गया। वस्तुत: उन अनेक आधुनिक रूपों में कविता भी है, जिसका उद्गम और विकास [[समाचार पत्र|समाचार पत्रों]] और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हुआ है। परन्तु कविताएँ इतिवृत्त, विवरण, शिक्षा और उद्देश्य विषयक ही नहीं, भावात्मक भी हो सकती है। यह छायावाद की उन असंख्य कविताओं से सिद्ध हो गया, जो आधुनिक गीतिकाव्य के विविध प्रकार-भेदों के अंतर्गत आती है। 'प्रगतिवाद', 'प्रयोगवाद' और 'नयी कविता' के आन्दोलनों के अंतर्गत ऐसी ही रचनाएँ हुई हैं, जो पृथक-पृथक् '''कविता''' नाम से पुकारी जाती हैं। | ||
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07:46, 7 नवम्बर 2017 के समय का अवतरण
कविता
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विवरण | 'कविता' का अर्थ है- "काव्यात्मक रचना"। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल के पूर्व तक कविता शब्द का प्रयोग 'कविताई' या 'कवि-ता' (कवि-कर्म) के अर्थ में ही होता था। |
विशेष | संकीर्ण अर्थ में किसी रचना विशेष के लिए कविता का प्रयोग आधुनिक काल में ही होने लगा था। प्राचीन काल में अधिकतर या तो प्रबन्ध काव्य की रचना होती थी या मुक्तक काव्य की। |
संबंधित लेख | खंड काव्य, काव्य, महाकाव्य, प्रबोधक काव्य, प्रबन्ध काव्य |
अन्य जानकारी | मात्र छन्दोबद्ध रचना के लिए 'पद्य' शब्द का प्रयोग उचित है, परन्तु 'कविता' शब्द पद्य से ऊँची स्थिति का द्योतक है और उसमें कविता (कवि-कर्म), अर्थात् काव्यकला को अधिक महत्त्व दिया गया है। |
कविता अर्थात् 'काव्यात्मक रचना' (कवि की कृति)। काव्य से जहाँ रचना के भावपक्ष और अन्त:सौंदर्य का अधिक बोध होता है, वहाँ कविता शब्द के प्रयोग से प्राय: उसके कलापक्ष और रूपात्मक सौंदर्य को प्रधानता मिलती है। काव्य, कविता, पद्य, इन तीनों शब्दों को क्रमागत रूप से निम्नतर भावस्थिति में रखा जाता है। गद्य पद्य का विपक्षी रूप है, जो छन्दोबद्ध या विचार तक सीमित है। मात्र छन्दोबद्ध रचना के लिए पद्य शब्द का प्रयोग उचित है, परन्तु कविता शब्द पद्य से ऊँची स्थिति का द्योतक है और उसमें कविता (कवि-कर्म), अर्थात् काव्यकला को अधिक महत्त्व दिया गया है। सामान्यत: तीनों शब्द समान अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।
प्रयोग
यद्यपि व्यापक रूप से छन्दोबद्ध रचना मात्र के लिए 'कविता' शब्द का प्रयोग होता है, संकीर्ण अर्थ में, आधुनिक काल में विशेष रूप से, कविता शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत आकार में छोटे, ऐसे पद्य विशेष के लिए किया जाता है, जो आधुनिक गीति, प्रगीति या मुक्तक के अनेकानेक प्रकारों में से किसी रूप में रचा गया हो। पद्य की ऐसी रचनाओं का पृथक् निर्देश करने के लिए 'काव्य' शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता। 'काव्य' शब्द जब किसी रचना विशेष के लिए प्रयोग होता है, तब उससे अपेक्षाकृत बड़ी, प्राय: सदैव ही प्रबन्धात्मक रचना का अर्थ सूचित होता है। काव्य और कविता शब्द के प्रयोग का एक अन्तर यह भी है कि जहाँ काव्य सामान्यत: साहित्य के पर्यायवाची अर्थ में ऐसी रचनाओं को भी कह सकते हैं, जो पद्य में न रची गई हों, वहीं कविता अनिवार्य रूप से पद्यात्मक लय और तालयुक्त शब्दावली की सूचना देती है; भले ही उसमें काव्य की आन्तरिक विशेषता विद्यमान न हो और वह मात्र पद्यबद्ध हो। इसके अतिरिक्त काव्य का अभिधान ऐसी रचनाओं को नहीं दिया जा सकता, जो अरस्तु के 'पोइटिक्स' में निर्दिष्ट 'पोइट्री' से भिन्न 'वर्स' मात्र है।
- हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल पूर्व तक कविता शब्द का प्रयोग 'कविताई' या 'कवि-ता' (कवि-कर्म) के अर्थ में ही होता था। तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' की भूमिका में कहा है-
'चली सुभग कविता सविता सी। राम बिमल जस जल भरिता सी'।
इसी अर्थ में उन्होंने 'भनिति' शब्द का भी कई बार प्रयोग किया है। इसी अर्थ में कहा गया है कि 'कविता' कर्ता तीन हैं- तुलसी, केशव, सूर।
'कविता' खेती इन लूनी सीला बिनत मज़ूर।
'आगे के सुकवि रीझि हैं तौ 'कविताई', न तो राधिका कान्हा के सुमिरन को बहानी है'।
भिखारीदास ने इसी अर्थ में काव्य शब्द का भी प्रयोग किया है। 'इनके काव्य में मिली भाषा विविध प्रकार की है। हिन्दी में कविता शब्द का यह प्रयोग परम्परानुमोदित है, यद्यपि कदाचित यह कथन अयुक्त न होगा कि संस्कृत साहित्य में कविता की अपेक्षा काव्य शब्द का अधिक प्रयोग हुआ है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान
संकीर्ण अर्थ में किसी रचना विशेष के लिए कविता का प्रयोग आधुनिक काल में ही होने लगा है। प्राचीन काल में अधिकतर या तो प्रबन्ध काव्य की रचना होती थी या मुक्तक काव्य की। एक से अधिक छन्दों में एक विषय पर छोटी पद्य रचनाएँ स्तोत्र, स्तवन, प्रशस्ति, माहात्म्य आदि के रूप में मिलती है। हिन्दी के मध्ययुगीन भक्त कवियों ने भी इस प्रकार की स्तोत्रादि रचनाएँ की हैं और यह क्रम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तक चला आया है। परन्तु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने सामयिक विषयों पर विचारोत्तेजक और उद्बोधनपूर्ण स्फुट रचनाओं की नवीन पद्धति चलाई। उनकी 'भारत-भिक्षा', 'विजयिनी-विजय-वैजयन्ती', 'श्रीराजकुमार-शुभागमन-वर्णन', 'मानसोपायन', 'वर्षाविनोद' आदि रचनाओं ने हिन्दी में पद्य निबन्धों की उस परम्परा का सूत्रपात किया, जो आधुनिक काल में अनेकधा विकसित हुई। ऐसी रचनाओं की ही जातिवाचक संज्ञा कविता है, जो अंग्रेज़ी की 'पोइम' और उर्दू की 'नज्म' का पर्याय है। भारतेन्दु काल में देशभक्ति, राजभक्ति, समाज सुधार और प्राकृतिक वर्णन सम्बन्धी असंख्य गम्भीर और व्यंग्यात्मक कविताएँ रची गईं।
विकास
द्विवेदी काल में सामयिक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से इन कविताओं का प्रचलन और अधिक हो गया। वस्तुत: उन अनेक आधुनिक रूपों में कविता भी है, जिसका उद्गम और विकास समाचार पत्रों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हुआ है। परन्तु कविताएँ इतिवृत्त, विवरण, शिक्षा और उद्देश्य विषयक ही नहीं, भावात्मक भी हो सकती है। यह छायावाद की उन असंख्य कविताओं से सिद्ध हो गया, जो आधुनिक गीतिकाव्य के विविध प्रकार-भेदों के अंतर्गत आती है। 'प्रगतिवाद', 'प्रयोगवाद' और 'नयी कविता' के आन्दोलनों के अंतर्गत ऐसी ही रचनाएँ हुई हैं, जो पृथक-पृथक् कविता नाम से पुकारी जाती हैं।
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